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‘सरकारी पैसे से नहीं पढ़ाई जा सकती कुरान, अगर ऐसा है तो बाइबिल और गीता भी पढ़ाओ’ – हिमंत बिस्वा सरमा

असम के शिक्षा मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि राज्य के सभी सरकारी मदरसों को बंद करने का निर्णय ‘समानता’ के लिए लिया गया है। असम सरकार ने सभी मदरसों को बंद कर के उन्हें नियमित स्कूलों में तब्दील कर दिया है, जिससे कई इस्लामी विचारधारा वाले लोग नाराज़ हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी पैसे से कुरान नहीं पढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता है (सरकारी पैसों से कुरान पढ़ाया जाता है) तो फिर बाइबिल और भगवद्गीता भी पढ़ानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस चलन को खत्म कर के समानता लाने के लिए ये निर्णय लिया गया है। ‘ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF)’ के मुखिया और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने कहा है कि राज्य की भाजपा सरकार ने जिन मदरसों को बंद कर दिया है, उनकी पार्टी की सरकार बनने पर उन सभी मदरसों को वापस बहाल किया जाएगा। कई पार्टियों ने सेकुलरिज्म की बातें करते हुए इस फैसले का विरोध किया है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने इस दौरान ‘लव जिहाद’ के मुद्दे को भी उठाया और कहा कि मुस्लिम लड़के अक्सर खुद को हिन्दू दिखाते हैं और हिन्दू लड़कियों से शादी कर लेते हैं। उन्होंने इसे ‘किसी को विश्वास को धोखा देना’ करार दिया। हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि कई मुस्लिम लड़के हिन्दू नाम के साथ फेसबुक अकाउंट बनाते हैं और किसी मंदिर के साथ खुद की तस्वीर डालते हैं, ताकि किसी को लगे कि वो मुस्लिम हैं।

उन्होंने कहा कि जब लड़की उससे शादी कर लेती है, तब उसे अचानक से पता चलता है कि जिससे उसकी शादी हुई है, वो मुस्लिम है। उन्होंने कहा कि ये प्रामाणिक शादी कभी नहीं हो सकता, ये किसी के भरोसे को धोखा देना हुआ। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इन मामलों को देख रही है और अगले 5 वर्षों में ये सुनिश्चित किया जाएगा कि ये शादियाँ स्वेच्छा से हो, किसी को जाल में फँसा कर नहीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि असम सरकार कार्रवाई कर रही है।

असम में विधानसभा चुनाव अगले साल मार्च-अप्रैल में प्रस्तावित है। डिब्रूगढ़ में भाजपा महिला मोर्चा की एक बैठक में शिक्षा मंत्री ने कहा था, ‘‘हमें असम की जमीन पर लव जिहाद के खिलाफ एक नई और कड़ी लड़ाई शुरू करनी होगी। अगर भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो हम यह निर्णय लेंगे कि अगर कोई भी लड़का धार्मिक पहचान छुपाता है और असम की बेटियों और महिलाओं पर कुछ भी नकारात्मक टिप्पणी करता है तो उसे कड़ी सजा मिले।” 

‘फर्जी नाम रखकर, मंदिर में फोटो खिंचा कर लड़की से शादी करना विश्वासघात है न कि सच्ची शादी’

लव जिहाद के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में कई सरकारें इसे रोकने की दिशा में लगातार प्रयासरत हैं और इसके खिलाफ़ मुखर होकर एक्शन भी ले रही हैं। आज इसी कड़ी में असम के मंत्री (वित्त, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण) व भाजपा विधायक हिमंत बिस्वा सरमा ने भी अपना बयान दिया है।

उन्होंने लव जिहाद की ओर इशारा करते हुए बताया कि जो मुस्लिम लड़के झूठा नाम रख कर हिंदू लड़कियों से निकाह करते हैं, वह कोई सच्ची शादी नहीं होती बल्कि विश्वासघात होता है।

समाचार एजेंसी से बात करते हुए असम मंत्री हिमंत बिस्वा ने कहा, “कई मुस्लिम लड़के हिंदू नाम से फेसबुक अकॉउंट बनाते हैं और मंदिर में जाकर अपनी तस्वीर डालते हैं और जब एक बार लड़की ऐसे लड़कों से शादी कर लेती है तो उसे लड़के का असली नाम पता चलता है। इसे असली विवाह नहीं बल्कि विश्वासघात कहा जाता है।”

बता दें कि इससे पहले असम मंत्री हिमंत ने मदरसों पर भी अपना बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि उनके राज्य में नवंबर में सभी मदरसों को बंद करने के बारे में एक अधिसूचना जारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य में लगभग 100 संस्कृत स्कूल भी बंद किए जाएँगे।

बिस्वा ने एएनआई को बताया था, “मेरी राय में, कुरान का शिक्षण सरकारी धन पर नहीं हो सकता है। अगर हमें ऐसा करना है तो हमें बाइबल और भगवद गीता दोनों को भी पढ़ाना चाहिए। इसलिए, हम एकरूपता लाना चाहते हैं और इस प्रथा को रोकना चाहते हैं।” 

गौरतलब है कि पिछले दिनों लव जिहाद के कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब लड़की को हिंदू नाम बताकर फँसा लिया गया और बाद में उसे नरकीय जीवन जीने पर या तो मजबूर किया गया या फिर मार कर कहीं फेंक दिया गया। पिछले दिनों भी इसी संबंध में भाजपा के वरिष्ठ नेता हिमंत बिस्वा ने असम चुनावों के मद्देनजर आह्वान किया था कि यदि उनकी सरकार आई तो इस लव जिहाद के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी।

उन्होंने कहा था, ‘‘हमें असम की जमीन पर लव जिहाद के खिलाफ एक नई और कड़ी लड़ाई शुरू करनी होगी। अगर भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो हम यह निर्णय लेंगे कि अगर कोई भी लड़का धार्मिक पहचान छुपाता है और असम की बेटियों और महिलाओं पर कुछ भी नकारात्मक टिप्पणी करता है तो उसे कड़ी सजा मिले।” 

हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी कहा था, ‘‘लव जिहाद ने असम की बेटियों के लिए पहाड़ जैसी बड़ी समस्या खड़ी की है। कई लड़कियों की तो तलाक की नौबत आ गई क्योंकि उन्हें गलत नाम बताकर लड़कों ने धोखा दिया।”

PM मोदी की ‘जय हो-जय हो’ कर रहे कॉन्ग्रेसी, लेकिन गलत टैग को ट्रेंड करा कर उड़वा ली हँसी

जब बेरोजगारी दर घटती है, तो इसका अर्थ है कि रोजगार बढ़ा है और बेरोजगारी में कमी आई है। केंद्र सरकार को इसे अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करना चाहिए, लेकिन यहाँ उलटा हो रहा है। विपक्षी कॉन्ग्रेस ही घूम-घूम कर सबको बता रही है कि बेरोजगारी दर घटी है। अर्थात, कॉन्ग्रेस कह रही है कि कि बेरोजगारी में कमी आई है, इसीलिए लोग नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार का विरोध करें। बिहार चुनाव से पहले ये ट्रेंड कराया जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस पार्टी को आँकड़े नहीं पता हैं। ‘भारतीय यूथ कॉन्ग्रेस’ के कई राज्यों के ट्विटर हैंडल्स से बताया गया कि जून में बेरोजगारी दर 12.02% थी, जो अगले ही महीने जुलाई में घट कर 9.15% हो गई है। इसे बुरी खबर की तरह दिखाते हुए पार्टी ने ‘युवा विरोधी नीतीश-मोदी’ का टैग भी ट्रेंड कराया। इससे कॉन्ग्रेस नेताओं और उनके सोशल मीडिया हैंडलर्स की समझ का भी पता चलता है।

कॉन्ग्रेस ने सोशल मीडिया पर दिखाई अपनी नासमझी

जैसा कि आप ऊपर संलग्न किए गए स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं, ‘इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस’ के तेलंगाना, गोवा और ओडिशा के ट्विटर हैंडल्स ने बरोजगारी दर के घटने का मातम मनाया और इसे बुरी खबर की तरह दिखाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ ट्रेंड्स चलाए। ऐसे ही नीचे संलग्न किए गए स्क्रीनशॉट में हरियाणा और तमिलनाडु के यूथ कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैंडल्स को यही करामात करते हुए देख सकते हैं।

बेरोजगारी दर का घटना है बुरी खबर? कॉन्ग्रेस ऐसा ही सोचती है

‘लाइव मिंट’ की खबर के अनुसार, जुलाई 2020 में भारत की बेरोजगारी दर गिर कर कोरोना वायरस संक्रमण आपदा के पहले के काल वाली स्थिति में चली गई, जिससे पता चलता है कि नौकरियाँ बढ़ी हैं। ‘Centre of Monitoring Indian Economy (CMIE)’ के आँकड़ों की मानें तो जून में बेरोजगारी दर 10.99% था, जो जुलाई में घट कर 7.43% पर गिर कर आ गया। ओडिशा और गुजरात में बेरोजगारी दर सबसे कम है।

‘मैंने कभी नहीं लगाया रेप का आरोप’: पीड़िता ने चिन्मयानन्द के खिलाफ सारे आरोपों को नकारा, बयान से मुकरने का मामला दर्ज

पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री चिन्मयानन्द पर चल रहे रेप केस के मामले में अदालत में चल रही सुनवाई के दौरान नया मोड़ आया। एलएलबी की जिस छात्रा ने उन पर रेप के आरोप लगाए थे, उसने अब ये केस वापस ले लिया है। पीड़िता अब अपने पुराने बयान से भी मुकर गई है। आरोपों से मुकरने के बाद अभियोजन पक्ष ने पीड़िता को ‘पक्षद्रोही’ साबित करते हुए उसके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत मुकदमा पंजीकृत करवाया है।

एमपी-एमएलए कोर्ट के विशेष जज पवन कुमार राय ने अभियोजन पक्ष की अर्जी को स्वीकार कर लिया है। साथ ही पीड़िता और उसके वकील को इस अर्जी को लेकर अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए गुरुवार (अक्टूबर 15, 2020) की तारीख तय की गई है। सरकारी वकील अभय त्रिपाठी ने कहा कि पीड़िता ने सितम्बर 5, 2019 को खुद इस मामले की FIR लोधी कॉलोनी थाने में दर्ज कराई थी

पीड़िता के पिता ने भी शाहजहाँपुर में एक FIR दर्ज कराई थी। बाद में दोनों ही FIR को आपस में मर्ज कर दिया गया था। इसके बाद इस मामले की जाँच के लिए SIT का गठन किया गया था, जिसने सीआरपीसी की धारा-161 के तहत मामले की जाँच शुरू की और मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करवाया। इन दोनों बयानों में रेप की बात दोहराई गई थी। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया है कि पीड़िता ने 9 अक्टूबर को जानबूझ कर अपना बयान बदला।

वकील अभय त्रिपाठी का दावा है कि अदालत से बाहर ही आरोपित और पीड़िता का समझौता हो चुका है, जिसके बाद वो अपने बयान से पलट गई है। फ़रवरी 2020 में चिन्मयानन्द ने स्वास्थ्य कारणों से जमानत की अर्जी दी थी, जिसके बाद उन्हें बेल मिल गई थी। अगस्त 2019 में चिन्मयानन्द के ही शाहजहाँपुर स्थित कॉलेज में पढ़ने वाले विधि संकाय की छात्रा कई दिन तक गायब रही थी, जिसके बाद उसने एक वीडियो के जरिए कई आरोप लगाए थे।

इसके अगले ही महीने चिन्मयानन्द को गिरफ्तार कर लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाईकोर्ट की दो सदस्यीय बेंच को इसकी जाँच सौंपी थी और SIT का गठन किया था। अब 23 वर्षीय छात्रा ने अपने सारे आरोपों को नकार दिया है। पीड़िता ने कहा कि उसने कोई आरोप लगाया ही नहीं था। इसी मामले में चिन्मयानन्द के वकील ने एक अज्ञात नंबर से 5 करोड़ रुपए की रंगदारी माँगे जाने की शिकायत भी दर्ज कराई थी।

चिन्मयानंद पर आरोप लगाने वाली छात्रा के लापता होने के बाद यह मामला सुर्ख़ियों में आया था। अपने वीडियो में पीड़ित छात्रा ने चिन्मयानंद पर आरोप लगाते हुए कहा था कि संत समाज के एक बहुत बड़े नेता ने मेरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी से मदद की गुहार लगाते हुए पीड़ित छात्रा का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसके बाद पुलिस ने छात्रा को उसके दोस्तों के साथ राजस्थान के मेहंदीपुर बालाजी के पास एक होटल से बरामद किया था।

कॉन्ग्रेसी नेता अलका लांबा ने फैलाया झूठ: घेरना चाहा CM योगी को, जो फोटो शेयर किया वो निकला राजस्थान का!

आम आदमी पार्टी की पूर्व विधायक और वर्तमान में कॉन्ग्रेस नेत्री अलका लांबा को झूठ फैलाने के बाद मेरठ पुलिस से ट्विटर पर करारा जवाब मिला है। लांबा ने अपने ट्विटर पर उत्तर प्रदेश सरकार को घेरने का प्रयास किया था। उन्होंने न्यूज24 चैनल का पोस्ट शेयर करते हुए भाजपा पर आरोप लगाए थे।

इस पोस्ट में एक वायरल पोस्टर की जानकारी दी गई थी जिसमें कोई जॉन्टी बदमाश नाम का युवक अपराधिक कार्यों के लिए मूल्य बता रहा था। इन अपराधों में धमकाना, प्रताड़ना, नुकसान पहुँचाना और हत्या तक के रेट लिखे थे।

अलका लांबा द्वारा शेयर किया गया ट्वीट

न्यूज 24 ने इसी विज्ञापन को शेयर किया था और मेरठ पुलिस को इसमें टैग भी किया था। इसी के बाद लांबा ने इस पोस्ट को शेयर किया और बिना उसकी प्रमाणिकता जाँचे सोशल मीडिया पर अपना निष्कर्ष निकाल लिया। अलका लांबा ने लिखा कि गुंडे-बदमाशों द्वारा ऐसा प्रचार-प्रसार मात्र भाजपा के राज में ही संभव हो सकता है।

इसी ट्वीट के रिप्लाई में मेरठ पुलिस ने अपना बयान जारी किया। मेरठ पुलिस ने फर्जी पोस्ट की हकीकत बताते हुए कहा कि इसका संबंध यूपी से नहीं है और यह कॉन्ग्रेस शासित प्रदेश राज्य राजस्थान से निकाला गया प्रचार है।

मेरठ पुलिस का ट्वीट

मेरठ पुलिस ने पोस्ट में कहा कि यह पोस्ट साल 2019 में फेसबुक पर शेयर हुआ था। मगर, जिस पत्रकार ने इसे बाद में उत्तर प्रदेश और मेरठ से जोड़ दिया, उसके खिलाफ़ शिकायत दर्ज करके उसे जेल भेज दिया गया है। पुलिस ने लांबा से भी फौरन झूठे पोस्ट को हटाने और मेरठ या यूपी के बारे अफवाह न फैलाने की अपील की। बयान में लांबा से कहा गया कि वह इस पोस्ट का जल्द से जल्द खंडन करें।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब लांबा ने ऐसी फर्जी जानकारी सोशल मीडिया पर फैलाई हो। हाल में इससे पहले उन्होंने एक चार साल पुरानी तस्वीर को शेयर करके कहा था कि डोनेशन इकट्ठा करने के लिए मंदिर को लॉकडाउन में खोला गया। उन्होंने उस समय श्रद्धालुओं की पूजा व भक्ति पर भी टिप्पणी की थी।

घड़ी बेचने के लिए दुबई में पहना बुर्का… यहाँ मुस्लिम परिवार में गर्भवती हिन्दू बहू: चीफ डिजाइनर रेवती कांत की कहानी

तनिष्क (Tanishq) के विज्ञापन को लेकर उपजे विवाद की चहुँओर चर्चा है। हर जगह इसे लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कहीं तनिष्क के प्रचार का समर्थन है तो कहीं पर आलोचना। 

ऐसे में तनिष्क पर मालिकाना अधिकार रखने वाली टाइटन पर खासा फर्क देखने को मिला है। खबर है कि जबसे हिंदुओं ने तनिष्क का बहिष्कार शुरू किया है तभी से टाइटन का स्टॉक 2.58% गिर गया है। इसके साथ ही टाइटन की चीफ डिजाइन ऑफिसर भी चर्चा में आ गई हैं।

जी हाँ, क्या आपको मालूम है कि टाइटन कंपनी की चीफ डिजाइन ऑफिसर रेवती कांत हैं। वही रेवती कांत, जिन्होंने दुबई में अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए वहाँ जाकर बुर्का पहना, शेख से मीटिंग की और बात जब भारत की आई तो यहाँ पर आकर एकत्वं के नाम पर ऐसा सेकुलर विज्ञापन जारी करवा दिया, जो लव जिहाद को प्रमोट करता हो।

विज्ञापन में भी यह ध्यान नहीं रखा गया कि यहाँ की बहुसंख्यक आबादी की भावनाएँ क्या है? उनकी संस्कृति क्या है? उनके त्योहारों के क्या मूल्य हैं? बस वामपंथियों के गढ़े नैरेटिव पर खरा उतरने के लिए पूरा एड तैयार किया गया और बाद में जब आलोचना शुरू हुई तो स्पष्टीकरण जारी (माफी नहीं माँगी) कर मामले को रफा दफा करने का प्रयास भी हुआ।

हालाँकि, अब समय पुराना नहीं रहा है और न ही उपभोक्ता पहले की तरह जानकारी से अनभिज्ञ है। उन्हें अपनी संस्कृति और सेकुलरिज्म के नाम पर तैयार किए जा रहे अजेंडे का अच्छे से ज्ञान है। शायद इसीलिए वह व्यापक स्तर पर सवाल पूछ रहे हैं कि जब दुबई में वहाँ की जनता व संस्कृति का सम्मान किया जा सकता है, ग्राहकों की भावनाओं को समझा जा सकता है तो भारत में क्यों नहीं?

कई वर्षों तक मध्य-पूर्व एवं अफ्रीका में टाइटन की मार्केंटिंग हेड के सामने बेशक शुरुआत में बतौर महिला कई चुनौतियाँ रही होंगी। उन्होंने कंपनी के व्यापार के लिए जो किया, उस पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। मगर, भारत की हकीकत जानने के बावजूद एकत्वं के नाम पर ऐसा एड अगर लव जिहाद को प्रेरित नहीं करता तो किस ओर इशारा करता है?

तनिष्क की ओर से ठीक एक हफ्ते पहले घोषणा की जाती है कि उनकी चीफ डिजाइन ऑफिसर रेवती कांत त्योहारों के मौके पर उनका उत्पाद #EkatvamByTanishq लॉन्च करने जा रही हैं। अगर कोई सवाल हों तो उनसे पूछ लिया जाए, इसका वह खुशी-खुशी जवाब देंगी।

हालाँकि, शुरू में तनिष्क ने कुछ यूजर्स के सवालों के जवाब दिए भी। मगर जैसे ही बातें विज्ञापन पर होना शुरू हुईं, तनिष्क की ओर से रिप्लाई आना बंद हो गए। कई लोगों ने कहा कि जो कॉन्सेप्ट वो दिखा रहे हैं, उसकी हकीकत बहुत बर्बर है और ऐसे प्रचार से सिर्फ़ उन्हें बढ़ावा ही मिलेगा। 

खास बात देखिए कि तनिष्क ने ऐसा एड दिवाली के त्योहार के मद्देनजर निकाला है और इस बात को उन्होंने अपने ट्वीट में भी उल्लेखित किया है। इसी पाखंड को समझने के बाद लोगों का पूछना है कि अगर बात एकत्वं की ही थी तो फिर हिंदू परिवार में मुस्लिम महिला को दिखाने से कोई गुरेज नहीं होना चाहिए था। फिर भी यही कोशिश क्यों?

बता दें कि रेवती कांत को लेकर साल 2019 की फरवरी में ‘मिंट’ ने एक लेख प्रकाशित किया था। आज वही लेख रेवती की और इस विज्ञापन के पीछे छिपी कुत्सित मानसिकता को उजागर कर रहा है।

कांत ने अपने प्रोफेशनल जीवन के दौरान आई चुनौतियों को सामने रखते हुए इसमें बताया है कि जब वह दुबई गईं थीं, तब ब्रांडेड घड़ियों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिर्फ़ स्विस व जापानी ब्रांड्स का बोल बाला था।

भारतीय कंपनी के लिए जगह बनाना वहाँ बहुत मुश्किल था। उनके मुताबिक उस समय उस जगह भारतीयों को लेकर अच्छी धारणा नहीं थी। स्थानीय लोग, भारत को शाइनिंग इंडिया के नाम से नहीं ‘अल हिंद’ के नाम से पुकारते थे, वो भी बहुत अपमानजनक तरह से। 

जाहिर है एक इस्लामी देश में रेवती के लिए कई चुनौतियाँ रही होंगी। मगर, उनके ऊपर उन्होंने कैसे काबू पाया, इसका उल्लेख करते हुए वह कहती हैं कि एक महिला होने के नाते उनके सामने केवल अकेले ट्रैवल करने की समस्या नहीं थी बल्कि वीजा मिलना भी बहुत कठिन था। ऐसे में एक प्रभावशाली डिस्ट्रिब्यूटर ने उन्हें वीजा दिलवाया और वह अपना बुर्का पहन कर दुबई में शेख से मिलने पहुँची।

वह आगे कहती हैं कि मीटिंग के बाद उनके एड एजेंसी वाले एक व्यक्ति ने बताया कि वह दृश्य बहुत असामान्य था कि वो शेख के साथ बुर्के में एक बड़े कॉन्फ्रेंस रूम में थीं व अपना मीडिया प्लान डिस्कस कर रही थीं। रेवती के अनुसार, उनके लिए यह एक अनुभव था, जहाँ उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला। अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने आगे कहा कि उन्हें वहाँ अलग संस्कृति का सम्मान करने का मौका मिला और उन्होंने दूसरों के दिमाग को भी समझा।

इस लेख के मुताबिक रेवती का दुबई के संदर्भ में कहना है कि कहीं की संस्कृति को जितना समझा जाएगा, उतना ही कंपनी को अपना ग्राहक भी समझ आएगा। मगर दुखद बात यह है कि भारतीय होने के बावजूद रेवती का सरोकार भारत की बहुसंख्यक आबादी से नहीं रहा। भेड़ चाल में चलते हुए इतने बड़े ब्रांड को भी उन्होंने बहिष्कृत करवा ही दिया, वो भी सिर्फ़ अपनी अति सेकुलरवादी सोच और दुबई में सीखी मार्केंटिंग टेक्निक के कारण!

‘जो हमसे छीन लिया गया, उसे वापस लेना होगा’ – महबूबा मुफ्ती ने रिहा होते ही शुरू की ‘जहर’ की खेती

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को रिहा कर दिया गया है। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के साथ ही पीडीपी प्रमुख को जम्मू कश्मीर के कई अन्य नेताओं और अलगाववादियों सहित हिरासत में लिया गया था और नज़रबंद कर दिया गया था। लगभग 14 महीने और 1 सप्ताह बाद उन्हें रिहा किया गया। इस साल जुलाई 31 को ही तीन महीने के लिए उनकी हिरासत अवधि बढ़ा दी गई थी लेकिन उन्हें इसके पूरे होने से पहले ही छोड़ दिया गया

महबूबा मुफ़्ती ने अब बाहर निकलते ही ज़हर उगलना शुरू कर दिया है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे वो एक साल से भी अधिक समय तक हिरासत में रह कर रिहा हुई हैं। उन्होंने कहा कि उनकी हिरासत के दौरान ‘अगस्त 5, 2019 के काले दिन का काला फैसला’ हर पल उनके ‘रूह और दिलोंदिमाग’ पर वार करता रहा। महबूबा ने उम्मीद जताई कि यही कैफियत (परिस्थिति) जम्मू कश्मीर के तमाम नागरिकों की भी रही होगी।

महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि जम्मू कश्मीर का कोई भी शख्स उस दिन की ‘डाकाजनी और बेइज्जती’ को कतई नहीं भूल सकता। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने लोगों को ये याद करने के लिए कहा कि ‘दिल्ली दरबार’ ने अगस्त 5, 2019 को ‘असंवैधानिक, गैर-जम्हूरी और गैर-क़ानूनी’ तरीके से जो उनसे छीन लिया है, अब उसे वापस लेना होगा। भारत के खिलाफ ज़हर उगलते हुए महबूबा मुफ़्ती ने कहा:

“अनुच्छेद 370 के साथ-साथ कश्मीर का मुद्दा, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर में हजारों लोगों ने अपनी जान न्योछावर किया है, उसे हल करने के लिए हमें अपनी जद्दोजहद जारी रखनी होगी। मुझे मालूम है कि ये राह जरा भी आसान नहीं होगी। लेकिन, मुझे विश्वास है कि हम सबका हौसला इस मुश्किल रास्ते को तय करने में हमारा सहयोगी होगा। अब जब मुझे रिहा कर दिया गया है, मैं चाहती हूँ कि जम्मू कश्मीर के जितने भी लोग अलग-अलग जेलों में बंद किए गए हैं, उन्हें जल्द से जल्द रिहा किया जाए।”

इससे पहले महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा ने अपनी अम्मी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से सूचना दी कि पीडीपी प्रमुख को रिहा कर दिया गया है और वो ‘इस कठिन काल में’ समर्थन के लिए सभी की आभारी हैं। वहीं डीएमके प्रमुख स्टालिन ने महबूबा मुफ़्ती की रिहाई का स्वागत करते हुए दावा किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को निलंबन में रखा गया है, जिसे बहाल करते हुए सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाना चाहिए।

महबूबा मुफ़्ती ने स्टालिन का धन्यवाद अदा किया। सुप्रीम कोर्ट में 15 अक्टूबर को महबूबा मुफ़्ती को हिरासत में लिए जाने को लेकर सुनवाई होने वाली है। जम्मू कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश के गृह विभाग ने जानकारी दी कि श्रीनगर के मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया हिरासत का आदेश अब वापस लिया जाता है। सितम्बर के अंतिम सप्ताह में उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा भी दिल्ली आए थे, जहाँ प्रदेश की स्थिति को लेकर चर्चा हुई थी।

अगस्त 2020 में खबर आई थी कि पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती की छोटी बेटी अपने पासपोर्ट में माँ का नाम बदलकर महबूबा सैयद कराना चाहती है। इस सम्बन्ध में दिए गए नोटिस में लिखा गया था, “मैं इर्तिका जावेद, पुत्री जावेद इकबाल शाह, निवासी फेयरव्यू हाउस गुपकर रोड, श्रीनगर, कश्मीर-190001, अपने पासपोर्ट में अपनी माँ का नाम महबूबा मुफ्ती से बदलकर महबूबा सैयद कराना चाहती हूँ।

पहले घटिया ‘सेक्युलर’ एड बना कर लव जिहाद को किया मेनस्ट्रीम, अब फर्जी हिंसा की धमकी की बात कर रहा Tanishq

टाटा समूह की ‘Titan’ की सब्सिडियरी कम्पनी ‘Tanishq’ ज्वेलरी ने अपने प्रचार वीडियो के जरिए हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के बहाने ‘लव जिहाद’ को प्रमोट किया। अब जनता इन चीजों को बर्दाश्त नहीं करती है, इसलिए उसका जबरदस्त विरोध हुआ। अब ‘Tanishq’ ने इस पर खेद जताते हुए फिर से अपने झूठे अभिमान का परिचय तो दिया ही है, साथ ही उसकी भाषा बताती है कि उसे हिन्दुओं की भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं है। ‘Tanishq’ ने अपने वीडियो पर माफ़ी माँगने की बजाए हिन्दुओं को ही हिंसक बताया है।

आज जब मीडिया के लाख छिपाने के बावजूद ‘लव जिहाद’ की एक के बाद एक खबरें आ रही हैं, ‘Tanishq’ का ये विज्ञापन वीडियो मुस्लिमों के महिमामंडन में जुटा है और हिन्दुओं को नीचा दिखा रहा है। ‘किसी मुस्लिम ने हिन्दू महिला को गर्भवती कर दिया’ और मुस्लिम परिवार इतने सहिष्णु होते हैं कि वहाँ महिलाओं की हद से ज्यादा इज्जत होती है – एक तरह से इस विज्ञापन वीडियो की थीम यही है।

‘Tanishq’ के विज्ञापन वीडियो से भी ओछा है उसका स्पष्टीकरण

अब वापस आते हैं कम्पनी के स्पष्टीकरण की तरफ, क्योंकि उसे माफीनामा तो बिलकुल ही नहीं कहा जा सकता है। उसका कहना कि उसके ‘एकत्वम्’ वाले वीडियो का उद्देश्य है कि अलग-अलग लोग, स्थानीय समुदाय और परिवार साथ आएँ, वो इस चुनौती भरे काल में ‘एकता’ का प्रदर्शन करें। साथ ही उसने लिखा है कि इस वीडियो को उसके उद्देश्य के उलट काफी तीव्र प्रतिक्रिया मिली, जिससे वो खासे उदास हैं।

लेकिन, सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है इस स्पष्टीकरण की अंतिम पंक्ति, जिसमें दावा किया गया है कि कम्पनी अपने अधिकारियों, स्टोर कर्मचारियों और पार्टनरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस विज्ञापन वीडियो को वापस ले रही है। उसने ऐसा भी नहीं कहा कि वो हिन्दुओं से माफ़ी माँगता है या फिर ये विज्ञापन वीडियो गलत था, उसने उलटा हिन्दुओं को ही एक तरह से हिंसक और असहिष्णु ठहराया है।

विरोध होने के बाद ‘Tanishq’ ने जारी किया बयान

आपने कब देखा है कि हिन्दुओं ने अपने देवी-देवताओं पर बने कार्टून्स से आक्रोशित होकर किसी मीडिया संस्थान के कर्मचारियों को मार डाला? आपने कब देखा है कि किसी विधायक के रिश्तेदार द्वारा फेसबुक पर कुछ लिख देने से देश के तीसरे सबसे बड़े महानगर में हजारों हिन्दुओं ने मिल कर दंगा कर दिया? आपने कब देखा है कि सरकार ने वंचितों के लिए कोई क़ानून बनाया और विरोध में देश की राजधानी में हिन्दुओं ने मौत का तांडव खेला?

आपने कब देखा है कि हिन्दुओं ने मजहब के नाम पर दुनिया के दो सबसे बड़े आतंकी संगठन खड़े कर दिए? आपने कब देखा है कि हिन्दू राजाओं ने दूसरे मजहब के सैकड़ों धर्मस्थानों को ध्वस्त करवा कर वहाँ अपनी चीजें खड़ी कर दीं? आपने कब देखा है कि किसी फिल्म में अपने मजहब की महिला को किसी अन्य धर्म के व्यक्ति से प्यार होने की कहानी दिखाने पर हिन्दुओं ने सिनेमा हॉल्स पर पेट्रोम बमों से हमला कर दिया?

आपने कब देखा है कि अनगिनत फिल्मों में हिंदी देवी-देवताओं के अपमान के बाद हिन्दुओं ने किसी फ़िल्मी हस्ती पर हमला किया हो? लेकिन नहीं, ‘Tanishq’ को लगता है कि हिन्दू काफी हिंसक होते हैं और वो उसके स्टोर्स पर हमले करेंगे, उसके कर्मचारियों को मारेंगे, उसके अधिकारियों की जान के दुश्मन बन जाएँगे और उसके पार्टनर्स को धमकाएँगे। इसी देश में पली-बढ़ी एक कम्पनी की सोच इसी देश के लोगों को लेकर इस तरह की है।

असल में ये स्पष्टीकरण, ये सब कुछ मार्केट स्ट्रेटेजी है। असली बात तो ये है कि विरोध प्रदर्शन के बाद ‘Tanishq’ की ब्रांड को चोट पहुँची है और 1 दिन में उसके शेयर्स 2.58% लुढ़क गए, जिसके बाद उसके मार्केट कैप के भी धड़ाम होने की बात कही जा रही है। ऐसे में ये क़दम कुछ और नहीं, बल्कि अपने पार्टनर्स और शेयरधारकों को ये दिखाने की चेष्टा है कि उसे इस विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ा है और वो तो एकता की बातें कर रहा था।

ये वही कम्पनियाँ हैं, जिनसे कोई भूल न होने पर भी अगर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसी 1 विधायक वाली पार्टी भी इन्हें माफ़ी माँगने के लिए कह दे तो ये बाहर निकल कर साष्टांग दण्डवत हो जाएँगे। अगर ओवैसी की पार्टी को कुछ बुरा लग जाए तो ये रेंगते हुए माफ़ी माँगेंगे। ये सब छोड़िए, अगर मुस्लिमों को इनकी कोई बात बुरी लगी तब तो ये डर के मारे हाथ जोड़े ही खड़े रहेंगे। वैसे अंदाज़ा कम है कि ऐसा होने पर इन्हें इसके लिए समय भी मिलेगा।

जब फ़िल्मी हस्तियाँ तक भी बाइबिल के एक शब्द को लेकर मजाक करने पर हुए विरोध के बाद सीधे पोप के प्रतिनिधि पादरी के साथ जाकर हस्तलिखित माफीनामा सौंपती है और हिन्दुओं के विरोध पर जवाब देकर खुद को ‘आधुनिक और बहादुर’ समझती हैं, वैसा ही रवैया इन कंपनियों का है। हिन्दुओं के विरोध का मजाक बनाना बहादुरी की निशानी है और बाकी मजहबों के विरोध पर साष्टांग दण्डवत हो जाना सहिष्णुता की।

एक तो सेक्युलर बनने के चक्कर में ‘Tanishq’ ने एकता का सारा दारोमदार हिन्दुओं पर थोप दिया। हिन्दू महिलाएँ मुस्लिमों से शादी कर के गर्भवती होंगी, तभी उसे सेक्युलर कहा जाएगा। ऐसे ही एकता बढ़ाई जाती है क्या? ‘सर्फ एक्सेल और ‘रेड लेबल टी’ से लेकर ‘Tanishq’ तक, हमेशा हिन्दुओं को ही क्यों अपना सम्मान दाँव पर लगा कर इज्जत बेचनी पड़ती है इस हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए? हिन्दू महिलाएँ ही क्यों किसी अन्य मजहब के व्यक्ति से गर्भवती हों इस तथाकथित एकता के लिए?

ऊपर से ये दिखाना कि हिन्दुओं से उन्हें खतरा है! ‘Tanishq’ को पता है कि इस विवाद के बाद पूरी दुनिया की नजरें उस पर हैं और इसीलिए उसने विवाद के बीच बयान जारी कर के हिन्दुओं को ही आतंकवादी की तरह पेश कर दिया और ये जताया कि उसके कर्मचारियों और उसकी दुकानों को हिन्दुओं से खतरा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ये प्रदर्शित किया जा रहा है कि हिन्दू कितने असहिष्णु होते हैं कि एकता की बात करने पर हिंसा करते हैं।

कुल मिला कर यहाँ ‘एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी’ वाली कहावत फिट बैठती है। एक तो ‘Tanishq’ ने ‘लव जिहाद’ जैसे खतरनाक अपराध को मेनस्ट्रीम बना कर उसका महिमामंडन किया, ऊपर से हिन्दुओं के अपमान के बाद हिन्दुओं को ही हिंसक घोषित कर दिया। अगर ‘Tanishq’ को जानना है कि हिंसक कौन है तो किसी अन्य मजहब की महिला को अलग धर्म के व्यक्ति से गर्भवती हुआ दिखाए और ज्यादा नहीं, बस कुछेक मिनट इन्तजार करे – एकता का मतलब समझ में आ जाएगा।

पहले वीडियो और फिर हिन्दुओं को बताया हिंसक: क्या है ‘Tanishq’ वाला मामला?

‘लव जिहाद’ की कई खबरों के बीच आए इस वीडियो में महिला को पारम्परिक साड़ी, बिंदी और गहने पहने हुए दिखाया गया है। हालाँकि, उसके साथ परिवार में जो अन्य लोग हैं, वो मुस्लिम हैं। उसके साथ जो बुजुर्ग महिला दिख रही है, उसने बिंदी भी नहीं लगाई है। परिवार के लोग गहनों से लदी हिन्दू महिला को सरप्राइज के लिए बगीचे में लेकर जा रहे होते हैं। बैकग्राउंड में दीपमालाएँ हैं और नटराज की प्रतिमा भी है। मुस्लिम परिवार को एकदम ‘सहिष्णु’ दिखाने का प्रयास किया गया है।

साथ ही मुस्लिम परिवार का बुजुर्ग भी साज-सजावट में व्यस्त रहता है। बैकग्राउंड में एक महिला कहती है, “रिश्ते हैं कुछ नए-नए, धागे हैं कुछ कच्चे-पक्के। अपने बल से इन्हें सहलाएँगे, प्यार पिरोते जाएँगे। एक से दूजा सिरा जोड़ देंगे, एक बँधन बनते जाएँगे।” इस वीडियो में भरा-पूरा मुस्लिम परिवार दिखता है, जहाँ बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक गर्भवती महिला को सरप्राइज देने के लिए बगीचे में इन्तजार कर रहे हैं।

ये भी जानने लायक बात है कि ‘Tanishq’ की वेबसाइट पर ‘हिन्दू’ कीवर्ड से कल तक एक भी परिणाम उपलब्ध नहीं था। इस कीवर्ड को सर्च करने के बाद बताया गया कि कोई परिणाम सामने नहीं आता है। इसमें स्पेलिंग को डबल चेक करने की बात की जाती है। लोगों का कहना था कि दोनों (हिंदू-मुस्लिम) के लिए अलग-अलग रवैया क्यों अपनाया जा रहा है। मुस्लिम के लिए 352 प्रोडक्ट्स और एक (हिंदू) के लिए एक भी नहीं। विरोध के बाद ‘Tanishq’ ने इसमें परिवर्तन किया है।

‘गरीब का बेटा’ जिसने 100 करोड़ रुपए में की बेटी की शादी, इनकम टैक्स को 4 लाख बोल कर ले लिया क्लीन चिट

बिहार में अमीर और गरीब के बीच की खाई इतनी ज्यादा बढ़ा दी गई है कि जहाँ एक तरफ अमीर नेताओं के निजी कार्यक्रमों में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, वहीं अधिकतर लोगों के पास साफ़ पीने का पानी तक नहीं होता। जंगलराज में ये खाई और ज्यादा गहरी और बड़ी थी। आज हम बात करेंगे लालू की बेटियों मीसा भारती और रोहिणी आचार्य की शादी की। लालू यादव के घर के कार्यक्रम तब पूरे देश की मीडिया में सुर्ख़ियों में छाए रहे थे।

लालू प्रसाद यादव और बिहार में जंगलराज, ये दोनों ही पर्यायवाची हैं। सोनिया गाँधी ने रिमोट कण्ट्रोल से मनमोहन सिंह की सरकार चलाई थी, महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की रिमोट पर मनोहर जोशी थिरके थे और तमिलनाडु में जयललिता ने पनीरसेल्वम को बिठाया था। लेकिन, जिस तरह से बिहार में कभी किचेन से बाहर भी न निकलने वाली राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया गया, उसने बड़ी-बड़ी रिमोट कण्ट्रोल सरकारों को चित कर दिया।

बिहार का जंगलराज और लालू यादव की बेटी की शादी

मई 2002 में पत्रकार संतोष झा ने लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की शादी के लिए बनाए गए मंच को किसी शादी फंक्शन के लिए बना सबसे कीमती मंच करार दिया था। उनका आकलन था कि न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश में शायद ही इतना महँगा स्टेज तैयार किया गया हो, वो भी शादी के लिए। मई 23, 2002 को हुई इस शादी के दौरान जयमाला का मंच तैयार करने के लिए 1 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे।

इतना ही नहीं, अतिथियों के लिए खाने-पीने की मेनू में 150 आइटम्स थे, जिनमें से वो चुन सकते थे। बिहार का शायद ही कोई बड़ा नेता रहा होगा, जिसे इस शादी में न बुलाया गया हो। इस शादी में 100 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे, और वो भी बिहार सरकार के। ये उस राज्य की कहानी है, जिसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए रुपए नहीं थे। अब आप सोच लीजिए कि 18 साल पहले हुआ ये समारोह कितना खर्चीला रहा होगा!

तब उस समारोह में उपस्थित रहे समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता अमर सिंह ने एक मुहावरा कहा था, जो इस पूरे घटनाक्रम पर सबसे सटीक बैठता है – “जब सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का?” वहीं जब किसी ने लालू यादव से इतने बड़े खर्चीले समारोह को लेकर पूछा तो राजद सुप्रीमो ने कहा कि उन्होंने तो कुछ खर्च किया ही नहीं है, ये सारी व्यवस्थाएँ उनके समर्थकों और ‘शुभचिंतकों’ द्वारा की गई हैं।

ये वो शादी थी, जिसमें राजद के नेता-कार्यकर्ता तो छोड़िए, बिहार सरकार का हर महकमा लगा हुआ था, सारे अधिकारी लगे हुए थे। उस समय पूरे बिहार के कामकाज को ठप्प कर के उन अधिकारियों का एक ही उद्देश्य था – लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की शादी। पूछने पर किसी अधिकारी ने कहा था, ‘लालू यादव और मुख्यमंत्री की बेटी, यानी बिहार की बेटी‘। यानी, लालू यादव के परिवार का विकास और चापलूसी, मतलब बिहार का भला।

राजद समर्थकों का ऐसा हुजूम था कि विपक्षी पार्टी तक के नेता इस पर बोलने से हिचकते थे। लालू यादव के राजद कार्यकर्ताओं में ऐसा क्रेज था कि उनके लिए जान लेना-देना तो जैसे इन गुंडे-बदमाशों के लिए बाएँ हाथ का खेल था। करोड़ों रुपए बहाए जा रहे थे और उसे जनता का दान बताया जा रहा था, शुभचिंतकों द्वारा की गई व्यवस्था कहा जा रहा था। ये सब कुछ इतनी बेशर्मी से हो रहा था, जैसे उन्हें किसी क़ानून, किसी जाँच का डर न हो।

लालू यादव के साले सुभाष यादव और साधु यादव सहित उनके कई नेता, हथियारों के साथ घूम रहे थे। गुंडे-बदमाश, माफिया और अपराधी ये सुनिश्चित करने में लगे हुए थे कि शादी में आने वाला हर व्यक्ति ‘शुभचिंतक’ ही हो, कोई आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं कर पाए। एक विपक्षी नेता ने कहा था कि बिहार में वोट डालने वाली जनता भले ही निरक्षर और गरीब हो, लेकिन वो चाहती है कि उनके नेता शक्तिशाली, साहसी और क़ानून से ऊपर हों – एक राजा की तरह।

बिहार की विडम्बना देखिए कि एक नेता खुद को गरीब का बेटा भी कहता था और फिर वो 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले में भी फँसा हुआ था। ऐसा व्यक्ति, जो खुद को गरीब परिवार का बता कर वोट लेता था और उसका लाइफस्टाइल ऐसा था कि बड़े-बड़े उद्योगपति भी उसके सामने फीके पड़ जाएँ। फिर वो कहता था कि उसे फँसाया जा रहा है। जब-जब उसे जमानत मिलती थी, वो क़ानून में अपना भरोसा जताता था।

यही अंतर था घोटालेबाज लालू यादव और ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर में

‘ट्रिब्यून इंडिया’ में तब राजनीति में चलाए जा रहे इस कॉर्पोरेट कल्चर को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री रहे ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर की बेटी की शादी को याद किया था, जो बिहार के पहले नॉन-कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री थे। उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए कार्ड तक नहीं छपवाया था, लालू यादव ने 10,000 कार्ड्स छपवाए थे। और आपको पता है कि किन लोगों को इन कार्ड्स को बाँटने की जिम्मेदारी दी गई थी?

लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य अपनी माँ राबड़ी देवी और भाई तेजस्वी यादव के साथ

पब्लिक रिलेशन्स विभाग के अधिकारियों, इंस्पेक्टरों, पुलिस अधिकारियों और कलक्टरों को लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की शादी के लिए आमंत्रण-पत्र वितरित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। जबकि कर्पूरी ठाकुर ने अधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि अगर वो उनकी बेटी की शादी की तैयारियाँ करते हुए या समारोह के आसपास भी पाए गए तो उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने अपने कैबिनेट तक के साथियों को इसकी सूचना नहीं दी थी।

जब मंत्रियों ने कर्पूरी ठाकुर से पूछा कि उन्हें कोई मदद चाहिए, तो उन्होंने जवाब दिया कि ये कर्पूरी ठाकुर की बेटी की शादी है, बिहार के मुख्यमंत्री की नहीं। 70 के दशक में उन्होंने मात्र 10-11 हजार रुपए खर्च किए थे। वहीं लालू यादव की बेटी की शादी में तो खर्च का कोई हिसाब-किताब ही नहीं था। जब कर्पूरी ठाकुर के जिले का डीएम उनके यहाँ पहुँचा तो उसे वापस जाकर अपनी आधिकारिक ड्यूटी निभाने को कहा गया।

वहीं जब लालू प्रसाद यादव अपने होने वाले समधी के घर तिलक फलदान कार्यक्रम के लिए पहुँचे, तो हिच्छन बीघा नाम के उस गाँव में 4 जिलों की पुलिस को तैनात कर के उसे किले में तब्दील कर दिया गया था। आईजी और डीआईजी के अलावा कई सारे डीएम, एसपी, डीएसपी सहित कई अधिकारियों की 50 से अधिक कारें उनकी अगवानी के लिए खड़ी थीं। उस गाँव में सड़क, बिजली, फोन और हाईस्कूल की भी सुविधा तक नहीं थी, लेकिन रातोंरात सब बना दिया गया।

लालू यादव की बेटी की शादी के दौरान कारोबारियों में मचा था आतंक

इस समारोह के लिए बिहार सरकार के खजाने से 10 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। ये रुपए सरकारी खर्च से किस मद में खर्च किए गए, ऑडिट में क्या दिखाया जाएगा और ये रुपए रखे किसलिए गए थे, इन सबका हिसाब-किताब कहीं नहीं था। पत्रकारों का यही कहना था कि काश लालू की सैकड़ों बेटियाँ होतीं, तो शायद ऐसे ही कई गाँवों की तस्वीर बदल जाती। अव्वल तो यह कि बिहार गरीब राज्य है और उस वक़्त स्थिति और खराब थी।

इस शादी के लिए कारोबारियों और व्यापारियों तक से वसूली की गई। जिस कारोबारी से जो भी सामान लिया गया, उन्हें डरा-धमका कर। लालू यादव और राबड़ी देवी आय से अधिक संपत्ति के मामले में इनकम टैक्स विभाग की कार्रवाई का सामना कर रहे थे। जब मीसा भारती की शादी हुई थी, उसके बाद ही लालू और उनके पहले समधी को आईटी नोटिस मिला था, लेकिन मजाल था कि इनके खिलाफ कोई कार्रवाई हो जाए?

हाँ, तमिलनाडु में जयललिता के बेटे और माधवराव सिंधिया की बेटी की शादी उस जमाने में पूरे भारत में भव्य मानी गई थी लेकिन जहाँ जयललिता एक बहुत बड़ी फिल्म स्टार रह चुकी थीं, सिंधिया परिवार के पास अब भी खानदानी धन-दौलत की कोई सीमा नहीं है। लालू यादव का किस्सा उलट था। उनकी संपत्ति बिहार की लूटी हुई संपत्ति थी। रोहिणी की शादी में 20 मंत्री, 40 विधायक और कई डीएम-एसपी लगे हुए थे।

मुख्यमंत्री आवास की तरफ जाने वाली सभी सड़कों को ब्लॉक कर के ट्रैफिक मेंटेन किया जा रहा था और इसमें जिला-प्रखंड स्तर के अधिकारी लगाए गए थे। बिजली, भोजन और गाड़ियों से लेकर हर चीज के लिए अलग-अलग मंत्री की जिम्मेदारी थी। अब वो भी आपस में प्रतियोगिता कर रहे थे, ताकि उनका काम सबसे बेहतर हो और मुख्यमंत्री की कृपा उन पर बरसे। विपक्षी नेता भी बयान दे रहे थे तो नाम न छपने की शर्त पर।

अपने पति के साथ लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य

पटना के 1, अणे मार्ग में जब राव समरेश सिंह बारात लेकर आए तो वो एक ‘राजसी रथ’ पर सवार थे, जो एक पुराना बिहार मिलिट्री पुलिस बग्गी था। 20 एकड़ के क्षेत्र में फैले लालू-राबड़ी के आवासों में जब बारात आई, तब 25,000 अतिथि जमा हुए थे। जबकि बाकी पटना में आतंक का माहौल था। आलम ऐसा था कि एक बड़ी कम्पनी ने पटना में अपनी दुकानों को बंद कर के कर्मचारियों को कोलकाता शिफ्ट कर दिया था।

मारुती के शोरूम वाले का तो कहना था कि उन्होंने पहले ही कई कारें दे दी थीं लेकिन इसके बावजूद उनके शोरूम से 10 लक्जरी गाड़ियाँ ले जाया गया। गाड़ियों की दुकानों में से जबरन गाड़ियाँ खिंचवा ली गईं। वहीं बिहार पुलिस लालू के डर से हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई थी और कह रही थी गाड़ियाँ वापस हो जाएँगी तो सब ठीक हो जाएगा। कुछ गाड़ियाँ वापस की तो गईं, लेकिन उन्हें खरीदने वालों ने वो गाड़ियाँ लेने से इनकार कर दिया।

‘इंडिया टुडे’ मैग्जीन में तभी छपी एक रिपोर्ट में दिए गए आँकड़ों के अनुसार, अलग-अलग शोरूम्स से न सिर्फ 50 गाड़ियाँ जबरन उठा ली गईं बल्कि 6 पंडालों को सजाने के लिए कई फर्नीचर दुकानों से 100 से भी अधिक सोफे उठा लिए गए। बिजली विभाग को 25 लाख का घाटा हुआ। बैंकॉक सहित बड़े अंतरराष्ट्रीय शहरों से फूल लाए गए। लालू खुद कहते थे कि वो आयकर विभाग के डर के बीच नहीं जी सकते।

जिस राय इंद्रजीत सिंह के बेटे से लालू की बेटी की शादी हुई, वो इनकम टैक्स विभाग में कार्यरत थे। वो 1970 बैच के आईआरएस अधिकारी थे। उनसे उनके बेटे का हाथ माँगने के लिए खुद लालू मुंबई गया था। लालू के दामाद आईटी कम्पनी में कार्यरत थे। राय इंद्रजीत सिंह की जब मृत्यु हुई थी, उसके बाद भी लालू यादव उनके घर गया था और ये वो अंतिम बार था, जब वो उनके गाँव गया। लालू फ़िलहाल जेल में सजा काट रहा है।

मीसा भारती की शादी में खर्च हुए थे मात्र 4 लाख रुपए?

इसी तरह मीसा भारती की शादी में भी 1999 में जम कर खर्च किया गया था। कई लोगों ने तब तंज कसा था कि खुद को सेक्युलर बताने वाले लालू यादव ने अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी जाति का ही लड़का ढूँढ़ा। मीसा भारती के पति शैलेन्द्र कुमार भी आईटी इंजीनियर ही थे। मेडिकल की पढ़ाई करने वाली मीसा भारती के बारे में कहा जाता है कि जब राबड़ी देवी पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं, तब वो ही सरकार चलाने में उनकी सहायता करती थीं।

कहा जाता था कि मीसा भारती एकदम धूर्त टेम्पर्ड हैं और वो अधिकारियों की एक नहीं सुनती थीं। कई बार उनका अधिकारियों से झगड़ा भी हो जाता था। उनकी शादी में भी बड़े-बड़े नेताओं से लेकर फ़िल्मी हस्तियों तक का जमघट लगा था। सजावट के लिए फुल वगैरह कोलकाता से आए थे। कुल 10,000 अतिथि समारोह में मौजूद थे। क़ानून का मजाक देखिए कि इस शादी के खर्च के लिए लालू-राबड़ी को आईटी विभाग का नोटिस मिला लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि इसमें मात्र 4 लाख रुपए खर्च हुए हैं, और उन्हें क्लीन चिट मिल गई।

Tanishq नहीं… इस धनतेरस #VocalForLocal, स्थानीय सुनार को मिले दीपावली मनाने का मौका

भारत में कई दूसरी चीज़ों के अलावा दवा-दारू के विज्ञापनों पर भी प्रतिबन्ध है। इसका नतीजा क्या होता है? दोनों ही चीज़ें बनाने वाली कंपनियाँ दूसरे तिकड़म लगाती हैं। जहाँ दवाओं वाले डॉक्टर से साठ-गाँठ, उपहार जैसी चीज़ों के सहारे चल जाते हैं, वहीं दारू वाली कंपनियाँ दूसरी धूर्तता करती हैं। सीधे-सीधे शराब का विज्ञापन देने के बदले वो पानी-सोडा और म्यूजिक सीडी बेचने लगती हैं!

हमारी रूचि विज्ञापनों में रहती है तो हम एक “मेन विल बी मेन” वाला प्रचार देखते हैं। इस मजेदार प्रचार में होता क्या है कि पुरुष बेचारा हमेशा वैसी मूर्खताएँ करता दिखता है, जैसा आम तौर पर पुरुष करते रहते हैं। प्रचार ख़त्म होने पर पता चलता है कि मुर्खता क्या थी, और साथ ही कहा जाता है “मेन विल बी मेन”! इस सीरीज जैसे विज्ञापन में सारे प्रचार ऐसे ही होते हैं।

अब जैसे इसके एक प्रचार में दिखाते हैं कि कोई लिफ्ट है, जिसमें एक सुन्दर सी युवती घुस रही होती है। दो पुरुष उस लिफ्ट में पहले से दोनों किनारों की ओर खड़े अपने अपने मोबाइल में लगे होते हैं। अपने दफ्तर का फ्लोर आते ही जैसे ही वो लड़की उतरती है, वैसे ही दोनों साँस छोड़ते हैं और तब पता चलता है कि दोनों के दोनों इतनी देर से अपनी तोंद अन्दर किए साँस रोके खड़े थे! नेपथ्य से आवाज आती है – मेन विल बी मेन!

खैर आज जो इसी श्रृंखला का प्रचार याद आया, उसमें एक व्यक्ति हीरे की अंगूठी खरीद रहा होता है। सेल्समेन उसे एक बढ़िया अंगूठी दिखा कर पूछता है, किस मौके पर देनी है सर? वो बताता है कि पत्नी के जन्मदिन पर, और ये सुनते ही सेल्समेन कहता है, फिर तो बढ़िया पीस चुना है सर, पाँच कैरट का हीरा! वो बिलकुल बेचने वालों की मुस्कान के साथ पूछता है कब है जन्मदिन? जवाब मिलता है, कल था! सुनते ही सेल्समेन की शक्ल उतर जाती है। वो दूसरी अंगूठी उठाता है, कहता है, दस कैरट है, और ऐसे सर हिलाता है जैसे कह रहा हो, इतना तो लगेगा ही! नेपथ्य से आवाज आती है – मेन विल बी मेन!

तो मामला ये है कि तनिष्क जैसी दुकानों से जेवर कौन खरीदता है? ये या तो वो पुरुष होंगे जिन्हें उपहार में देना है, डबल इनकम नो किड (डीआईएनके) या एकल परिवार वाले भी हो सकते हैं। जो संयुक्त परिवारों में रहे स्त्री-पुरुष हैं, उन्हें अपने इलाके के स्थानीय सुनार की पैरोकारी करते आप कभी भी देख सकते हैं। वो #VocalForLocal वाले अलग-अलग जगहों के स्थानीय डिजाईन पर जोर देती स्त्रियाँ होंगी। हमने अपनी बहनों से आभूषणों का पूछा तो फ़ौरन बंगलौर के मल्लपुरम गोल्ड एंड डायमंड और कोलकाता के पीसी ज्वेलर का नाम पता चल गया।

अब सवाल है कि ऐसे में बायकॉट का तनिष्क पर क्या असर होगा? तो जिन भक्तों की औकात सोना खरीदने की नहीं थी, जिनके शोर मचाने से कुछ नहीं होता, उनके #BoycottTanishq ट्रेंड करवा देने भर से 1256 से गिरकर शेयर की कीमत 1224 पर पहुँच गई, जिसका मतलब मोटे तौर पर 2.58 प्रतिशत की गिरावट हुई है। जो कहने आ रहे होंगे कि मार्केट कई चीज़ों पर निर्भर करता है, उन्हें बताते चलें कि निफ्टी में कोई गिरावट दर्ज नहीं की गई है। हाँ लेकिन इतने पर अगर कंपनी सोच रही है कि मामला निपट चुका तो वो ग़लतफ़हमी में है। अभी #VocalForLocal बाकी है।

बायकॉट की आवाज लगाने वालों को भी सोचना होगा कि क्या उनकी आवाज सुनी भी जा रही है? जैसे एक बार के विरोध से कइयों की नौकरियाँ जा चुकी हैं, वैसा कुछ हमारे विरोध से होता भी है या चार दिन में मामला ठंडा पड़ जाने दिया जाता है? क्या विरोध दर्ज करवाने से ज़ोमेटो ने अपनी हरकतें सुधारीं या आप फिर से ज़ोमेटो से खाना मँगवाने लगे हैं?

सर्फ एक्सेल के विरोध का क्या हुआ? लगातार अलग-अलग मंचों से इस सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का विरोध हुआ भी है या हम किसी और शबाना बनी शालिनी की मौत का इन्तजार करते रहने वाले हैं? अपने विरोध को किले की घेराबंदी जैसा स्थाई रूप देने पर भी हमें विचार करना ही होगा।

बाकी के लिए इस बार अपने स्थानीय सुनार को भी मौका दीजिए! इस धनतेरस में उसे भी तो दीपावली मनाने का मौका मिलना चाहिए ना? हॉलमार्क जैसे मानकों से लैस कई सुनार आपके आस-पास होंगे। इनके बदले, कम से कम इस बार तो उनके पास जाइए!