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सुशांत केस: ‘राब्ता’ के डायरेक्टर के घर और ऑफिस पर ED ने मारा छापा, अधिकारियों ने जब्त किए कुछ डाक्यूमेंट्स

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) मनी लॉन्ड्रिंग के ऐंगल से जाँच कर रहा है। ईडी इस सिलसिले में कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है। बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) को ED ने डायरेक्टर दिनेश विजान के घर और ऑफिस में छापा मारा है। अधिकारियों ने इस दौरान विजान के घर से कुछ डॉक्यूमेंट्स लिए हैं। सुशांत ने दिनेश की फिल्म ‘राब्ता’ में काम किया था। फिल्म में कृति सेनन भी थी।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी अब तक नहीं खुल पाई है। इस केस में सीबीआई जाँच कर रही है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) कई गिरफ्तारियाँ कर चुका है। इस बीच खबर आ रही है कि ईडी ने ‘राब्ता’ फिल्म के डायरेक्टर दिनेश विजान के घर और ऑफिस में सर्च ऑपरेशन चलाया है।

इस फिल्म के लेन-देन पर सवाल उठाए जाए रहे थे। बताया जा रहा है कि अधिकारियों ने दिनेश से कुछ दस्तावेज लिए हैं। रिपोर्ट्स हैं कि ‘राब्ता’ के अलावा सुशांत और दिनेश के बीच एक और फिल्म को लेकर बात हुई थी। मगर वो फिल्म बन नहीं सकी। पेमेंट्स को लेकर ईडी सितंबर में दिनेश से 8 घंटे पूछताछ कर चुकी है।

जानकारी के मुताबिक, साल 2016 में दिनेश विजान ने सुशांत को पेमेंट की थी। इसको लेकर ईडी विजान से दो बार पूछताछ कर चुकी है और सुशांत के साइनिंग अमाउंट से जुड़े डॉक्यूमेंट और दूसरी जानकारी भी माँगी।

हाल ही में ईडी ने श्रुति मोदी और उदय सिंह गौरी से पूछताछ की थी। उदय सिंह गौरी, सुशांत सिंह का अकाउंट सँभालते थे। उदय सिंह गौरी ने सुशांत से उनके मौत से एक दिन पहले बात की थी। इससे पहले निर्देशक रूमी जाफरी से भी ईडी ने पूछताछ की थी।

रूमी जाफरी ने पूछताछ में बताया कि उन्होंने सुशांत को एक फिल्म का ऑफर दिया था। फिल्म में सुशांत और रिया साथ में काम करने वाले थे लेकिन लॉकडाउन की वजह से शूटिंग शुरू नहीं हो पाई थी। बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत का शव 14 जून को बांद्रा स्थित फ्लैट में मिला था।

इस मामले ने फिल्म इंडस्ट्री को झकझोर कर रख दिया। इस केस को लेकर सीबीआई, ईडी और एनसीबी जाँच कर रही है। ड्रग्स एंगल में बॉलीवुड के कई बड़े नाम सामने आए, जिनमें दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर, सारा अली खान, रकुल प्रीत समेत कई लोगों से पूछताछ की गई है।

गौरतलब है कि हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में मुजफ्फरपुर की अदालत ने करण जौहर और एकता कपूर समेत 7 फ़िल्मी हस्तियों को नोटिस जारी किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश राकेश मालवीय की अदालत ने आदेश जारी किया कि ये सभी अक्टूबर 21, 2020 तक हाजिर हों, या फिर अपने वकीलों के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराएँ। इन दोनों के अलावा आदित्य चोपड़ा, संजय लीला भंसाली, साजिद नाडियावाला, एकता कपूर, भूषण कुमार और दिनेश विजया को भी नोटिस भेजा गया है।

‘गाँधीधाम में Tanishq के शोरूम पर हिन्दुओं ने किया हमला’: NDTV की फेक न्यूज़ को लिबरल लॉबी ने लिया हाथों हाथ

सोशल मीडिया पर ‘Tanishq’ ज्वेलरी के विज्ञापन वीडियो को लेकर विरोध प्रदर्शन होने के बाद गुजरात के गाँधीधाम में स्थित ‘Tanishq’ के एक स्टोर ने हिन्दुओं से माफ़ी माँगी। ‘लव जिहाद’ के महिमामंडन को लेकर हो रहे विरोध के बाद स्टोर ने माफीनामा लिख कर बोर्ड पर लगा दिया था। अब NDTV सहित पूरा वामपंथी इकोसिस्टम ये दिखाने में जुटा हुआ है कि 1 दिन पहले ‘Tanishq’ के गाँधीधाम स्थित स्टोर पर उसके वीडियो को लेकर ‘हिन्दू भीड़’ ने हमला किया, जिसके बाद उसे माफ़ी माँगने के लिए बाध्य होना पड़ा।

सबसे पहले तो NDTV ने नैरेटिव बनाने के लिए ट्विटर पर ब्रेकिंग न्यूज़ दे दिया और इसके कुछ देर बाद इस घटना पर जो लेख आया, उसमें न तो उसके सोर्स का जिक्र था, और न ही स्टोर पर हमले की घटना का कोई वर्णन था इसके बाद NDTV ने एक वीडियो डाला, जिसमें मंगलवार (अक्टूबर 11, 2020) को दोपहर 12 बजे हमले की बात कही गई। ‘सूत्रों’ के हवाले से चैनल ने कह दिया कि मैनेजर को माफीनामा लिखने को बाध्य होना पड़ा।

NDTV की फेक खबर

इसके कुछ ही देर बाद ट्विटर यूजर डॉक्टर नील ने एक ऑडियो क्लिप शेयर किया, जिसमें उन्होंने गाँधीधाम में स्थित ‘Tanishq’ के स्टोर मैनेजर से बात कर के NDTV के झूठ का पर्दाफाश किया है। उन्होंने स्टोर में कॉल कर के जब पूछा कि क्या किसी ने वहाँ हमला किया है, जैसी NDTV पर खबर आ रही है? इस पर स्टोर के मैनेजर ने कहा कि नहीं, किसी ने भी कोई हमला नहीं किया है। मैनेजर को इस झूठी खबर के बारे में कुछ पता ही नहीं था।

जैसे ही ये खबर NDTV पर आई, प्रोपेगंडा पोर्टलों ने इसे उठा कर प्रकाशित करना शुरू कर दिया। लेकिन, किसी ने भी स्टोर के मैनेजर या किसी कर्मचारी से बयान लेने की जहमत नहीं उठाई। हिन्दुओं को इसी बहाने हिंसक साबित किया जाने लगा। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने तो एक अज्ञात कर्मचारी के हवाले से यहाँ तक दावा कर दिया कि 120 लोगों की भीड़ वहाँ जमा हो कर गालियाँ देने लगी और कहने लगी कि हिन्दू अब ये सब बर्दाश्त नहीं करेंगे।

अज्ञात कर्मचारी के हवाले से मीडिया संस्थान ने लिखा कि कर्मचारी कहते रहे कि गाँधीधाम शोरूम को ‘Tanishq’ के इस निर्णय के बारे में कुछ नहीं पता, और वो लोग भी हिन्दू ही हैं। बकौल ‘अज्ञात कर्मचारी’, उसे भीड़ से कहा कि कंपनी ने सिर्फ ज्वेलरी बेचने के लिए ये वीडियो बनाया था, इसका और कोई मकसद नहीं था। पुलिस ने भी स्पष्ट कहा है कि कोई हमला नहीं हुआ। कच्छ के एसपी ने इसे प्रोपेगंडा के तहत चलाई गई खबर करार दिया।

तनिष्क विवाद पर बोले जावेद अख्तर, कहा- लड़की वालों को हमेशा लड़के ‘पशु चोर’ ही लगते हैं, लोगों ने पूछा- राहुल पर क्यों चुप थे चचा!

तनिष्क को अपने विवादित विज्ञापन के कारण बड़े स्तर पर लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। ऐसे में जावेद अख्तर अब उस एड पर आ रही प्रतिक्रिया पर अपना मत रखने मैदान में उतरे हैं।

अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा है कि अतंरजातीय विवाह हमेशा ही कुछ लोगों को परेशान करता है और नाराज लोग दूल्हे और परिवार को पशु चोर की तरह देखते हैं। 

सुनंदा वशिष्ठ के ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए जावेद अख्तर ने कहा, “चाहे फिल्म हो, विज्ञापन या वास्तविक जीवन सभी जगह इंटर रिलीजियस शादी हमेशा ही कुछ लोगों को परेशान करती है, जिनमें हमेशा ही लड़की पक्ष का गुस्सा देखने को मिलता है या इससे संबंधित होता है, यह नाराजगी इस बात पर आधारित होती है कि उन्हें लगता है महिलाएँ अपनी संपत्ति की तरह हैं। नाराज लोग दुल्हे और उसके परिवार को किसी गाँव के पशु चोर रूप में देखते हैं।”

इस ट्वीट के बाद से सोशल मीडिया पर लोग जावेद अख्तर को ट्रोल कर रहे हैं। कुछ यूजर्स का सीधा सा सवाल है कि फिल्मों में चाहे बॉम्बे के रिलीज समय को याद कर लिया जाए या फिर गदर को जिसमें मुस्लिम लड़की को सिंदूर लगाने भर से विवाद खड़ा हो गया था। इसके अलावा वास्तविक जीवन में भी नुसरत जहां को मौलवियों ने कितनी धमकियाँ दी थीं यह किसी से छिपी नहीं है।

एक यूजर जावेद अख्तर के लिए लिखता है, “चाचा को बिना सच्चाई के और बर्बर विचारधारा के साथ सामंजस्य के लिए सेकुलरिज्म चाहिए।”

लोगों का जावेद अख्तर से पूछना है कि आखिर खुद को नास्तिक बताने वाले राहुल राजपूत के साथ हुई घटना पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं कर रहे और ऐसी कुप्रथाओं के समर्थन में क्यों अपनी आवाज उठा रहे हैं।

एक नेटिजन उनको लिखता है कि सेकुलर होने और पाकिस्तानी होने में कोई अंतर नहीं है। रिपोर्टिंग के लिए सेकुलर एजेंडा बिलकुल पाकिस्तानियों जैसा है। सिर्फ़ आतंकियों का असली चेहरा दिखाकर बर्बर चेहरे को छिपा ले जाना।

इसी प्रकार अन्य ट्विटर अकॉउंट से जावेद से अपील की जाती है कि चूँकि वह फिल्म इडस्ट्री से जुड़े हुए हैं इसलिए ऐसी स्थिति को रिवर्स करके एड बनाएँ और फिर लुटियंस साथियों को उनके समर्थन में ट्वीट करने को बोलें।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ जावेद अख्तर के ट्वीट के बाद उसके रिप्लाई में कोई भी व्यक्ति उनके समर्थन में खड़ा नहीं दिखाई दे रहा है। वहीं कई अन्य लिरबल व कट्टरपंथी गिरोह के लोग भी इस मामले में लीपा-पोती करने में जुटे में हैं। ऐसे में तनिष्क को बहिष्कृत करने का विचार बना चुके लोग उनकी टाइम लाइन पर भी उन्हें आड़े हाथों ले रहे हैं।

‘हिंदुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना बड़ी भूल होगी’ – कह गए थे आंबेडकर, पढ़िए

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर ने विधिवत बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इसी दिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर में आंबेडकर ने सामूहिक धर्म परिवर्तन का एक कार्यक्रम भी किया और अपने 385000 अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलवाईं, जिनका सार ये था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद किसी हिंदू देवी देवता और उनकी पूजा में विश्वास नहीं किया जाएगा। हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे और ब्राह्मणों से किसी किस्म की कोई पूजा अर्चना नहीं करवाई जाएगी। 

इसके अलावा उन्होंने मनुष्य की समानता और नैतिकता को अपनाने संबंधी प्रतिज्ञा ली थी, मगर आज के ‘नवबौद्ध’ उनके मूल्यों से कोसों दूर हैं। आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले ‘नवबौद्धों’ में समानता और अहिंसा का कोई रूप नजर नहीं आता। हाल ही में उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना को लेकर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद उर्फ ‘रावण’ का हंगामा सबने देखा।

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि ‘जय भीम जय मीम’ का नारा देने वाले ‘नवबौद्ध’ रावण के लिए बाकी किसी और जाति की तो छोड़िए, दलित भी एकसमान नहीं हैं। वो दलितों को भी एक नजर से नहीं देखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हाथरस में हुई घटना को लेकर ‘रावण’ की नौटंकी तो हम सबने देखी, लेकिन क्या उसी राज्य के बलरामपुर में एक और दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार पर रावण का बयान, ट्वीट या विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। नहीं न… क्योंकि यहाँ आरोपित ‘मीम’ थे और हाथरस में आरोपित ठाकुर थे।

इसलिए हाथरस पर ‘संवेदनाओं’ और ‘एकजुटता’ को बोरियों में भर-भर कर उड़ेला गया, लेकिन वही बोरियाँ बलरामपुर की दलित पीड़िता के लिए खाली हो जाती है। खुद को आंबेडकर का अनुयायी बताने वाले ‘नवबौद्ध’ यहाँ पर इसलिए चुप हो जाते हैं, ताकि उनका ‘जय भीम जय मीम’ वाला संतुलन बना रहे और मुस्लिम तुष्टीकरण होता रहे।

इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के 18 वर्षीय दलित छात्र राहुल की मुस्लिम लड़की के साथ प्रेम प्रसंग होने की वजह से मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर उस पर बर्बरतापूर्वक हमला किया। राहुल घायल अवस्था में ही अस्पताल पहुँचा जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

बलरामपुर और दिल्ली के आदर्श नगर की घटना ने दलित हितैषी कथित बुद्धिजीवियों को नंगा ही नहीं किया बल्कि उदित राज, मायावती और चंद्रशेखर जैसे कथित दलित हितैषी नेताओं की भी पोल खोल कर रख दी है। वे मौन हैं क्योंकि इस मामले में आरोपित न तो सवर्ण हैं और न ही बीजेपी से उनका कोई कनेक्शन। जय भीम-जय मीम के नाम पर दलितों के साथ होने वाले छलावे को यह मामला बेनकाब करता है। इसलिए सबने चुप्पी साध रखी है।

दोनों घटनाओं पर इनकी प्रतिक्रियाओं का अंतर यह भी बताता है कि कैसे मौकापरस्त गिरोह हमारे सामने किसी भी मामले को अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है। अपने नजरिए को ही अंतिम सत्य बताकर हम पर थोपने की कोशिश करता है। हाथरस मामले पर जिस सक्रियता से राणा अय्यूब जैसे कट्टरपंथी, दलित विचारक और उनके हितैषी बन बैठे थे, वह सभी इस घटना पर मौन हो गए।

न किसी ने इस वाकये की निंदा की और न ही दलितों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। कारण शायद सिर्फ़ एक ही था कि हाथरस में आरोपित सवर्ण निकल आया था, जो इनके एजेंडे के लिए फिट था और दिल्ली में आरोपित मुस्लिम थे, इसलिए ये इनकी राजनीति के लिए फिट नहीं बैठता है।

बाबा साहब ने इस बारे में चेताया था

देश में उथल-पुथल मचा रहे वामपंथियों और बात-बात पर हर किसी को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले यह बताएँ कि क्या किसी ने बाबा साहब को उस शिद्दत से पढ़ा भी है, उनके विचार समझने की कोशिश भी की है, जो कि आज के भारत के निर्माण में जरूरी भी है और समसामयिक भी। बाबा साहब अस्पृश्यता एवं जन्माधारित विशेषाधिकारों पर चल रही समाज व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे।

उन्होंने हिन्दू समाज रचना के विविध पहलुओं का गंभीर चिन्तन करने के साथ भारत में मुस्लिम राजनीति का भी विस्तृत अध्ययन किया था। डॉ. आंबेडकर ने भारत पर मुसलमानों के क्रूर तथा रक्तरंजित आक्रमणों का गहराई से अध्ययन किया था। उन चाटुकारों तथा दिशाभ्रमित वामपंथी इतिहासकारों को फटकारते हुए उन्होंने लिखा है, “यह कहना गलत है कि ये सभी आक्रमणकारी केवल लूट या विजय के उद्देश्य से आए थे।”

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

बाबा साहब आंबेडकर ने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि इनका उद्देश्य हिन्दुओं में मूर्ति पूजा तथा बहुदेववाद को नष्ट कर भारत में इस्लाम की स्थापना करना था। इस संदर्भ में उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज तुगलक, शाहजहाँ, औरंगजेब और महमूद गजनवी की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने बताया कि हिंदू मंदिरों को तोड़कर उस पर मस्जिद बनाए गए। बाबा साहब दलितों की जितनी दूरी ब्रह्मणवाद से रखने के पक्ष में थे, उससे कहीं ज्यादा दूरी वो दलितों को इस्लाम से रखने के पक्ष में थे। 

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

आंबेडकर इस्लाम में महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंतित थे। वो बहु विवाह प्रथा के खिलाफ थे। आंबेडकर बहु विवाह प्रथा को महिला मुद्दों के साथ जोड़कर देखते थे। वो मानते थे कि इससे स्त्रियों को कष्ट होता है। उनका मानना था कि इस प्रथा में उनका शोषण और दमन होता है। हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर आंबेडकर ने कड़ा प्रहार करते हुए इसकी आलोचना की थी। उनका इशारा बुर्का और हिजाब जैसी चीजों को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं।

इस्लाम में भाईचारा है, लेकिन कहाँ तक?

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

डॉ आंबेडकर ने साफ-साफ बताया, “मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इस्लाम विश्व को दो भागों में बाँटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है, वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। और जिस किसी देश में जहाँ मुसलमान रहते हैं परन्तु उनका राज नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इसके अनुसार उनके लिए भारत दारुल हरब है। इस तरह वे मानव मात्र में और भाईचारे में बिल्कुल भरोसा नहीं रखते हैं। यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।”

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

इसके अलावा उन्होंने जिहाद पर चर्चा करते हुए कहा था कि हिजरत के अलावा मुस्लिम कानून की एक और निषेधाज्ञा जिहाद है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। ऐसे कई उदाहरण भी हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया। इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

सिर्फ इस्लाम मानने वालों तक सीमित है भाईचारा

आंबेडकर के शब्दों में इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है। उनके अनुसार इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत को अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने की महत्वाकांक्षा हमेशा रही है। डा. अम्बेडकर ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “इस्लाम में राष्ट्रवाद का कोई चिंतन नहीं है। इस्लाम में राष्ट्रवाद की अवधारणा ही नहीं है। वह राष्ट्रवाद को तोड़ने वाला मजहब है।”

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

आखिर क्यों बाबा साहब बौद्ध धर्म की ओर ही गए

आंबेडकर ने इस्लाम और ईसाइयत को विदेशी मजहब माना। वह धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी वजह से उन्होंने ईसाइयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।

बाबा साहब के विचारों को समझने की जरूरत

1945 में डॉ. आंबेडकर की पुस्तक “थाट्स ऑन पाकिस्तान” प्रकाशित हुई, जिसने उनके प्रखर देशभक्त विचारों से अवगत कराया। भारत की राजनीतिक एकता को मूर्तरुप देने का जैसा शानदार कार्य सरदार पटेल ने अंजाम दिया, उसी कोटि का कार्य राष्ट्र की सामाजिक एकता को शक्तिशाली बनाते हुए बाबा साहब डॉक्टर आंबेडकर ने किया।

लेकिन दुखद है कि अलगाववाद की नीति अपनाने वाले भारत में ही रहने वाले कई लोग और वामपंथी ताकतें हमेशा इस देश को और इस एकता को खंडित करने में जुटे रहे हैं। कोरोना महामारी के बीच भी उनके यह प्रयास जारी हैं। जरूरी है कि बाबा साहब को ही नहीं उनके विचारों को भी व्यापक तरीके से तरजीह देते हुए उसे समझा जाए, अपनाया जाए।

उल्लेखनीय है कि बौद्ध धर्म को अहिंसा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सम्राट अशोक ने भी शस्त्र त्याग कर बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा ली थी। लेकिन उसी बौद्ध धर्म और आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले आज के ‘नवबौद्ध’ की सेना हिंसा और लोगों को भड़काने के अलावा कुछ नहीं करती है। चाहे वो हालिया हाथरस मामला हो या फिर सीएए के नाम पर दंगा भड़काने का। दलित परिवार को पीटने का आरोप हो या फिर स्वास्थ्यकर्मी पर हमला करने का। इन सभी कृत्यों में भीम आर्मी के नेता, कार्यकर्ता आगे रहते हैं।

आज के भीमवादी और कॉन्ग्रेस उसी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं, जो बाबा साहब आंबेडकर का बहुप्रतीक्षित सपना था। एनडीए सरकार ने बाबा साहब आंबेडकर के एक लंबे समय से लंबित सपने को पूरा किया है, जिसकी अनुभूति वह अपने जीवनकाल में महसूस नहीं कर सके। सीएए पारित होने के साथ ही भीम आर्मी पार्टी और कॉन्ग्रेस समेत कई विरोधी दल एवं देश के बड़े वर्ग ने इस कानून का उग्र विरोध किया।

उनका कहना था कि यह डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान के खिलाफ है, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता और समानता का उल्लंघन करता है। ऐसी स्थिति में गौर करने वाली बात है कि यदि आज आंबेडकर जीवित होते तो इस अधिनियम पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? 

दरअसल 1947 में देश के बँटवारे के बाद पाकिस्तान में हिन्दू और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार होगा, यह दूरदृष्टा एवं मनीषी डॉ. आंबेडकर को उसी वक्त पूर्वाभास हो गया था। बाबा साहब आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’ में विभाजन के कई महत्वपूर्ण अनछुए सवाल उठाए हैं। डॉ. आंबेडकर ने कहा था जब तक पाकिस्तान से एक-एक हिन्दू भारत वापस नहीं आ जाएगा तब तक विभाजन की प्रक्रिया शायद समाप्त नहीं होगी।

तो क्या आंबेडकर जानते थे कि जो गरीब पिछड़े, अनुसूचित जाति के हिन्दू पाकिस्तान में रह गए हैं वह इस्लामिक पाकिस्तान से एक दिन वापस जरूर भारत में शरण लेंगे? बाबा साहब को शायद इस बात का भान था कि जिन्ना ने भारत-पाकिस्तान का विभाजन कराते वक्त भले ही यह कहा हो पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क न होकर धर्मनिरपेक्ष मुल्क होगा। लेकिन शायद ही उसके बातों पर किसी को भरोसा रहा हो और बाबा साहब की आशंका इस बात की तस्दीक भी करती है।

उन्होंने सभी दलितों को भी, जो पाकिस्तान में फँस गए थे, कहा था कि मुसलमानों या मुस्लिम लीग पर भरोसा करना उनके लिए घातक होगा। उनको किसी भी तरीके से भारत आ जाना चाहिए। उन्होंने तब सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि निजाम के राज हैदराबाद में रह रहे दलितों को भी चेतावनी देते हुए कहा था कि उच्चवर्गीय हिंदुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना एक बड़ी भूल होगी। कॉन्ग्रेस पार्टी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को लेकर उन्होंने कहा था कि वह पागलपन की हद तक मुस्लिमों के साथ हैं और अनुसूचित जातियों के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं है।

अब सोचने वाली बात है कि जिस मुस्लिम के लिए आंबेडकर ने दलितों को इतना ज्यादा चेताया था, आज भीमवादी उसी मुस्लिम के साथ गठजोड़ बनाकर घूम रहे हैं। क्या यही है उनका आंबेडकर वाला भारत? डॉ. आंबेडकर के बयानों को देखने के बाद तो यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि दलित-मुस्लिम गठबंधन बनाने की कोशिश करने वाला कोई भी नेता या पार्टी आंबेडकर की विरासत के साथ धोखा कर रही है।

खुद को ‘दलितों का मसीहा’ कहने वाली मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण भी सीएए के विरोध में और मुस्लिम के गले में हाथ डाले बैठे हैं। कारण वही वोट बैंक। अब इनके जैसे नेता भी जब डॉ. आंबेडकर का हवाला देकर इस कानून का विरोध कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि यदि डॉ. आंबेडकर का वश चलता तो वह देश के बँटवारे के वक्त ही इस समस्या को खत्म कर देते और ओवैसी जैसे नेता पाकिस्तान में होते, क्योंकि डॉ. आंबेडकर के लिए वोट बैंक नहीं, बल्कि देश महत्वपूर्ण था।

बाबा साहब का नाम बेच कर अपनी राजनीतिक फसल काटने वाले दलितों के तथाकथित हितैषियों ने यदि कभी मन से बाबा साहब के विचारों को पढ़ा और समझा होता तो ‘जय भीम-जय मीम’ गठजोड़ की बात ही नहीं करते। इनकी मानें तो मुगल आततायियों ने भारत में केवल ब्राह्मण-ठाकुर और अगड़ी जाति वाले लोगों को ही चुन-चुन कर मारा। उनकी यातनाओं के शिकार केवल और केवल अगड़ी जाति की बेटियाँ और महिलाएँ हुईं। 

मुगलों ने तो जैसे अनुसूचित जातियों के लोगों को गोद में खिलाया हो, मुगलों ने सदैव ही दलित महिलाओं का सम्मान किया हो, शायद यही वजह है जो आजकल के ‘नवबौद्ध’ जिनका वास्तविक ‘बौद्ध धर्म’ के विचारों से कोई सरोकार नहीं होता वो उसी मुगल के वंशजों को अपना हितैषी और हिन्दू धर्मावलंबियों को अपना दुश्मन समझते हैं। 

आए दिन किसी भी मंच पर भारतीय संविधान लहराते हुए पहुँच जाने वाले और अपनी हर दो पंक्ति में तीन बार बाबा साहब का नाम लेने वाले दलितों के स्वयंभू नेता कभी भी मुस्लिमों के प्रति बाबा साहब के विचारों का ज़िक्र तक नहीं करते। वो विभाजन और पाकिस्तान निर्माण पर बात करना भी नहीं चाहते। सम्भवतः उन्हें इस बारे में ज्यादा ज्ञान ना हो या फिर वो इस बारे के बात करके अपनी राजनीतिक दुकान बंद नहीं करवाना चाहते।

खुद को बौद्ध धर्मावलंबी बताना और ‘नमो बुद्धाय’ का नारा देने के पीछे उनकी एक ही मनसा नजर आती है वो है हिन्दू धर्म व ब्राह्मण-क्षत्रिय एवं अगड़ी जातियों से घृणा। इस घृणा के खेल में वो इतने आगे निकल गए कि आज पूरा विश्व जिस इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है, उसके हितैषी बनने में भी इन्हें कोई गुरेज नहीं। बौद्ध धर्म के मूल समानता व अहिंसावादी विचारों, जिसका जिक्र डॉ. आंबेडकर ने भी किया था, उसको ही अपना आदर्श मान कर यदि ये आगे बढ़ते तो शायद समाज मे आज इतनी वैमनस्यता नहीं होती, किन्तु अपने राजनीतिक हित को साधने हेतु ये उससे कोशों दूर निकल चुके हैं। आंबेडकर को इन्होंने ‘एक हिन्दू से बौद्ध में धर्मांतरित व्यक्ति’ के अलावा कुछ समझा ही नहीं।

मौजूदा परिपेक्ष्य में देखें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और कई राज्यों में दलितों पर हुए अत्याचार, जिसमें आरोपित ‘मीम’ हो, उन विभत्स घटनाओं में भी आधुनिक दलित हितैषियों को साँप सूँघ जाता है, इनके मुँह से संवेदना के दो शब्द भी नहीं निकलते। वहीं आरोपित यदि अगड़ी जाति का हो तो इनके लिए सामाजिक वैमनस्यता फैलाने, दंगे भड़काने और अपनी राजनैतिक ज़मीन तैयार करने का एक सुनहरा मौका बन जाता है।

हाथरस कांड में नक्सल कनेक्शन सामने आना, राजनैतिक गिद्धों द्वारा मामले को तूल देना और नक्सली भाभी का भीम आर्मी से कनेक्शन सामने आना इस बात को दर्शाता है कि बाबा साहब के नाम पर राजनीतिक फसल काटने वाले लोग इस क्रम में इतने नीचे गिर चुके हैं कि आज के परिपेक्ष्य में डॉ. आंबेडकर के विचारों का इनसे कोई सरोकार नहीं। आज ‘जय भीम-जय मीम’ का नारा लगाने वाले शायद इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि बाबा साहब मजहबी कट्टरता और पाकिस्तान को जन्म देने वाले ‘द्विराष्ट्रवाद’ के विचार के कितने बड़े विरोधी थे।

पाकिस्तान में महँगाई की मार, आटे के लिए मची हाहाकार: 3 दिन से भूखे व्यक्ति ने रो-रोकर सुनाया दुखड़ा, वीडियो वायरल

पाकिस्तान में महँगाई का असर साफ दिख रहा है। गिरती अर्थव्यवस्था से पहले से ही चरमराया पाकिस्तान अब कमरतोड़ महँगाई को लेकर सुर्खियों में है। यहाँ पर महँगाई कुछ इस कदर है कि लोगों में मूलभूत खाने-पीने की चीजों को लेकर भी हाहाकार मचा हुआ है।

सब्जियाँ तो दूर, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि पाकिस्तान के कई हिस्सों में आटा 75 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। कई जगहों पर तो आटे की किल्लत के कारण कुछ ही दुकानों पर आटा उपलब्ध होने की वजह से दुकानों पर लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं। 

इसी दौरान एक शख्स आटा नहीं मिलने के कारण इतना दुखी और निराश हो गया कि वह अपना सिर पीट-पीट कर रोने लगा। जब मीडिया उसे कवर करने पहुँची तो उसने मीडिया के कैमरे के सामने अपना रोना-गाना शुरू कर दिया और इमरान खान सरकार को कोसते हुए अपने दुखड़े सुनाने शुरू कर दिए।

दरअसल, एक व्यक्ति 3 दिनों से आटे के लिए तरस रहा था लेकिन उसे कहीं आटा नहीं मिला अंत में वह बेचारा रोने लगा। उसने वायरल वीडियो में बताया कि उसने व उसके परिवार बच्चों ने 3 दिनों से खाना नहीं खाया है। उसने बताया कि अपने बच्चों के कारण 3 दिनों से दौड़ रहा है पर उसे कहीं आटा नहीं मिल रहा है। 

वीडियो में वह व्यक्ति रोते हुए कहता है, “मैं अपने बच्‍चों के लिए तीन दिनों से दौड़ रहा हूँ लेकिन आटा नहीं मिल रहा है। 15 रुपए में एक रोटी मिल रही है। हम गरीब लोग कहाँ जाएँ, कहाँ से खाएँ। आटे के लिए इतना पैसा कहाँ से दूँ, दवाइयाँ कहाँ से खरीदूँ। हम सूखी रोटी भी खाने को तैयार हैं लेकिन वह भी नहीं मिल रही है। 3 दिन से मारा मारा फिर रहा हूँ आटे के पीछे।”

महँगाई के खिलाफ देश के अलग-अलग कोनों में विपक्षी दल लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। गले तक कर्ज में डूबे पाकिस्तान की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। भ्रष्टाचार और कुशासन की वजह से इमरान सरकार से तंग आ चुकी जनता अब भूख से बिलबिला रही है। पड़ोसी देश में इन दिनों महँगाई चरम पर है। खाने-पीने की चीजें हद से ज्यादा महँगी हो गई हैं। आलम यह है कि गेहूँ की कीमत रेकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। पाकिस्तान में एक किलो गेहूँ के लिए लोगों को 60 से 75 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में महँगाई का इस कदर बेकाबू होना यूँ तो नई बात नहीं है, लेकिन इस बार बात अलग है। पाकिस्तान में इस समय इस तरह महँगाई बढ़ना इमरान खान को बेचैन इसलिए कर रहा है क्योंकि विपक्ष ने पहले ही महागठबंधन बनाकर सेना और इमरान खान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसी महीने से व्यवस्था परिवर्तन के लिए देशव्यापी आंदोलन किए जाने हैं। माना जा रहा है कि महँगाई से बेचैन जनता विपक्ष के साथ सड़कों पर उतर सकती है।

मिलिए उससे जिसने बनाया था Tanishq का ‘सेक्युलर’ वीडियो: शरजील इमाम की समर्थक, करती हैं CAA का विरोध

टाटा समूह की ‘Titan’ की सब्सिडियरी कम्पनी ‘Tanishq’ द्वारा ‘लव जिहाद’ का महिमामंडन करने वाले विज्ञापन वीडियो को लेकर अब नए खुलासे सामने आ रहे हैं। इस वीडियो को “Culture Film Company” नामक प्रोडक्शन हाउस ने बनाया था। इस कम्पनी का स्वामित्व जोइता पटपटिया (Joyeeta Patpatia) के पास है। साथ ही इस विज्ञापन वीडियो का निर्देशन भी उन्होंने ही किया था।

अब जोइता पटपटिया (Joyeeta Patpatia) के सोशल मीडिया हैंडल्स से जो स्क्रीनशॉट्स सामने आ रहे हैं, उससे पता चलता है कि वो न सिर्फ सीएए की विरोधी हैं बल्कि देश को खंडित करने की धमकी देने वाले शरजील इमाम की फैन भी हैं। साथ ही वो ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के लोगों की प्रशंसा करते हुए भी पाई जाती हैं। उन्होंने मार्च 2020 में ‘The Quint’ का वीडियो ‘सब याद रखा जाएगा’ भी शेयर किया था।

सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान जोइता पटपटिया (Joyeeta Patpatia) ने प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें शेयर करते हुए ‘No CAA’ और ‘No NRC’ के ट्रेंड के साथ फेसबुक पर पोस्ट किए थे। उन्होंने इन विरोध प्रदर्शनों को मानवता की एकता करार दिया था। ‘Tanishq’ के वीडियो को लेकर भी उन्होंने कहा कि इसे काफी प्यार से बनाया गया है और इसमें जरा भी घृणा नहीं है। हालाँकि, अब उनके खिलाफ भी सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हो गया है।

वहीं विरोध के बाद ‘Tanishq’ द्वारा इस विज्ञापन वीडियो को हटाए जाने को लेकर भी उन्होंने इंस्टाग्राम स्टोरीज के लिए अपनी प्रतिक्रिया दी है। लोगों के बयानों को अपनी स्टोरीज में डालते हुए जोइता पटपटिया (Joyeeta Patpatia) ने लिखा है कि उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों के पास कुछ अच्छा करने को नहीं है, वो इस वीडियो के खिलाफ घृणा फैला रहे हैं। उन्होंने इसके लिए ‘दक्षिणपंथी ट्रॉल्स’ को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि ये उनलोगों ने इसके खिलाफ दुष्प्रचार किया।

जोइता ने किया था ‘Tanishq’ के विज्ञापन वीडियो का निर्देशक

अब जोइता अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर हर उस व्यक्ति का पोस्ट शेयर कर रही हैं, जो इस वीडियो की आलोचना करने वालों को भला-बुरा कह रहे हैं। उन्होंने एक स्टोरी शेयर की, जिसमें लिखा था कि ‘वो लोग’ ‘लव जिहाद’ देखते हैं लेकिन हमें ‘लव? जी हाँ’ दिखाई देता है। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर इस वीडियो को ‘सेक्युलर इंडिया’ के टैग के साथ शेयर किया और लिखा कि ये उनका भारत है। विरोधियों को उन्होंने ‘ट्रॉल्स’ करार दिया।

बता दें कि ‘लव जिहाद’ की कई खबरों के बीच आए इस वीडियो में महिला को पारम्परिक साड़ी, बिंदी और गहने पहने हुए दिखाया गया है। हालाँकि, उसके साथ परिवार में जो अन्य लोग हैं, वो मुस्लिम हैं। उसके साथ जो बुजुर्ग महिला दिख रही है, उसने बिंदी भी नहीं लगाई है। परिवार के लोग गहनों से लदी हिन्दू महिला को सरप्राइज के लिए बगीचे में लेकर जा रहे होते हैं। बैकग्राउंड में दीपमालाएँ हैं और नटराज की प्रतिमा भी है। मुस्लिम परिवार को एकदम ‘सहिष्णु’ दिखाने का प्रयास किया गया है।

Tanishq के शोरूम पर हमला, NDTV ने चलाई ब्रेकिंग खबर… खुद IPS ऑफिसर ने जाँच कर बोला – ‘झूठी खबर चलाई गई’

आभूषण ब्रांड तनिष्क ने मंगलवार (अक्टूबर 13, 2020) को अपने उस विज्ञापन को वापस ले लिया, जिसमें दो अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोगों के एक परिवार को दिखाया गया था। तनिष्क ने सोशल मीडिया पर तीखे हमले किए जाने के बाद अपना विज्ञापन वापस ले लिया, जिसमें लोगों ने उस पर ‘लव जिहाद’ और ‘फर्जी धर्मनिरपेक्षता’ को बढ़ावा देने के आरोप लगाए थे।

कंपनी के इस कदम को लेकर सोशल मीडिया और अन्य जगहों पर तीव्र बहस शुरू हो गई। तनिष्क ने अपने आभूषण संग्रह ‘एकत्वम’ को बढ़ावा देने के लिए विज्ञापन पिछले सप्ताह जारी किया था और तभी से इसे लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। 

इसके बाद वामपंथी मीडिया चैनल एनडीवी ने ब्रेकिंग चलाते हुए दावा किया कि विवाद के चलते गुजरात में तनिष्क के एक स्टोर पर हमला हुआ है। एनडीटीवी के मुताबिक, हमलावरों की भीड़ ने कथित तौर पर स्टोर मैनेजर को माफी पत्र लिखने के लिए कहा था।

रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के गाँधीधाम में तनिष्क स्टोर पर हमला हुआ है। हमला होने के बाद स्टोर मैनेजर के माफी पत्र में कथित तौर पर सेक्युलर विज्ञापन प्रसारित करके हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए कच्छ जिले के लोगों से माफी माँगवाई गई।

हालाँकि कच्छ के IPS ऑफिसर ने इस खबर का पूरी तरह से खंडन किया। उन्होंने इस खबर को प्रोपेगेंडा के तहत चलाई जाने वाली खबर बताया। उन्होंने कहा, “मीडिया चैनल दिखा रहे हैं कि तनिष्क शॉप पर हमला हुई है, दंगा हुआ है या चोरी हुआ है, तो ये यब गलत न्यूज है, फेक न्यूज है। ये एक प्रोपेगेंडा के हिसाब से चल रहा है। इसलिए इस तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें।” उन्होंने बताया कि शोरूम के मालिक भी इस बारे में बात करना चाहते हैं।

तनिष्क के विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था। 

विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।

हाथरस केस में मृतका के परिवार और गवाहों को दी गई थ्री लेयर सुरक्षा, लगाए गए CCTV: योगी सरकार का SC में हलफनामा

उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित युवती से कथित गैंगरेप और मौत मामले में यूपी की योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा दाखिल किया है। अपने हलफनामे में यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि पीड़िता के परिवार और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए थ्री लेयर की सुरक्षा मुहैया कराई गई है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पीड़िता के परिवार और गवाहों के संरक्षण के प्रयासों पर जवाब दाखिल करने को कहा था। कोर्ट ने सरकार को कहा था कि वो गवाहों की सुरक्षा मुहैया कराने को लेकर डिटेल रिपोर्ट फाइल करें।

अपने हलफनामे में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि पीड़ित परिवार और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तीन-स्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई है। इसके साथ ही सरकार ने बताया कि उन्होंने गाँव में सीसीटीवी लगवाए हैं ताकि कड़ी निगरानी रखी जा सके और मृतक पीड़िता के परिवार को सुरक्षा प्रदान की जा सके। 

राज्य सरकार ने हलफनामे में यह भी उल्लेख किया है कि उन्होंने पीड़ित परिवार के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए गाँव में पुलिस कर्मियों को तैनात किया है। हलफनामे में कहा गया है कि पीड़ित परिवार की महिला सदस्यों की सुरक्षा के लिए गाँव में महिला पुलिस की भी एक टीम तैनात की गई है। साथ ही योगी आदित्‍यनाथ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वो सर्वोच्‍च न्‍यायालय सीबीआई जाँच की निगरानी करें।

पिछली सुनवाई में प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध एक जनहित याचिका की प्रतिक्रिया में प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय से हाथरस मामले में सीबीआई जाँच का निर्देश देने का अनुरोध किया था। साथ ही अदालत से हाथरस कांड की जाँच पर 15 दिनों की स्थिति रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करने के लिए सीबीआई को निर्देश देने के लिए कहा था। इसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यूपी डीजीपी द्वारा दायर किया जा सकता है। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने हाथरस मामले की जाँच अपने हाथ में ले ली है और मामला भी दर्ज कर लिया है।

हाथरस गैंगरेप और हत्या मामले में सीबीआई ने पहले दिन मंगलवार (अक्टूबर 13, 2020) को घटनास्थल का मुआयना किया था और सबूत जुटाए थे। टीम ने पीड़ित परिवार के लोगों से भी पूछताछ की थी। इस दौरान सीबीआई की टीम पीड़िता के भाई को साथ लेकर अज्ञात स्थल पर गई। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में बताया गया था कि पीड़िता के भाई के बयानों में कुछ असमानता पाए जाने के बाद सीबीआई ने कथित तौर पर यह निर्णय लिया।

उसके बयानों में असमानता के कारण ही सीबीआई ने पीड़िता के भाई से पूछताछ करने का फैसला किया। इससे पहले बताया गया CBI की टीम ‘नष्ट किए गए सबूतों’ को वापस लेने के लिए एक फोरेंसिक विशेषज्ञ टीम के साथ भी वहाँ गई थी। सीबीआई बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) को फिर से पीड़ित परिवार से पूछताछ कर रही है। इसके लिए मृत पीड़िता के दोनों भाइयों और पिता को हाथरस में कृषि कार्यालय स्थित सीबीआई के अस्थाई कार्यालय में बुलाया गया है। 

महिला को आत्मदाह के लिए उकसाया: कॉन्ग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष और पूर्व राज्यपाल के बेटे को लखनऊ पुलिस ने लिया हिरासत में

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित विधानसभा के बाहर अंजना तिवारी नाम की महिला ने खुद के शरीर में आग लगा कर आत्मदाह की कोशिश की थी। अब इस मामले में कॉन्ग्रेस के ही एक नेता आलोक प्रसाद को हिरासत में लिया गया है। लखनऊ पुलिस ने कॉन्ग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष और पूर्व राज्यपाल सुखदेव प्रसाद के बेटे आलोक प्रसाद को हिरासत में लिया है। आरोप है कि मंगलवार (अक्टूबर 13, 2020) को आत्मदाह का प्रयास करने वाली महिला को UP कॉन्ग्रेस के SC विभाग के अध्यक्ष आलोक प्रसाद ने ही उकसाया था।

‘आजतक’ की खबर के अनुसार, पुलिस ने बुधवार की सुबह उनके आवास से ही आलोक प्रसाद को हिरासत में ले लिया। महिला ने उनके द्वारा उकसाए जाने के बाद खुद के ऊपर ज्वलनशील पदार्थ डाल कर आग लगा ली और आत्मदाह का प्रयास किया। 35 वर्षीय महिला का सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है, जहाँ उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है। आलोक के पिता सुखदेव प्रसाद राज्यपाल भी रहे थे।

महिला का आरोप है कि महाराजगंज के निवासी अखिलेश तिवारी से उसकी शादी हुई थी जिसके बाद तलाक हो गया। तत्पश्चात महिला ने धर्म परिवर्तन कर आसिफ नाम के युवक से शादी कर ली। बताया गया है कि शादी के बाद आसिफ सऊदी अरब चला गया। महिला ने आसिफ के परिजनों पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है। हाथरस मामले के बीच इस तरह की घटना का सामने आना चर्चा का विषय बन रहा है।

उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने ‘जय भीम’ का नारा देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश दलित कॉन्ग्रेस के चेयरमैन आलोक प्रसाद जी को मध्य रात्रि बिना वारंट गिरफ़्तार करना निंदनीय है। उन्होंने आरोप लगाया कि योगी सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए साजिशों का खेल कर रही है और लगातार दलितों-वंचितों का दमन कर रही है। उन्होंने कहा, “सीएम जान लें कि कॉन्ग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता डरने वाला नहीं है।

महिला का नाम अंजना तिवारी है। लेकिन, आसिफ के साथ निकाह के बाद उसने अपना नाम बदल कर आइसा रख लिया था। उसने विधानसभा के गेट पर खुद को आग लगाई। महिला ने जैसे ही खुद को आग लगाई, पुलिस ने जल्दी-जल्दी में वहाँ पहुँच कर उसे बचाया और अस्पताल में ले जाया गया। लखनऊ डीसीपी सेंट्रल सोमेन वर्मा का कहना है कि जाँच शुरू है और इस मामले की तह तक पुलिस पहुँचेगी।

पहले गुंडा अयान खान का, अब भू-माफिया का… मुंबई पुलिस थाने में केक खिला मनाती है बर्थडे, Video वायरल

पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत समेत कई मामलों को लेकर विवादों से घिरने वाली महाराष्ट्र पुलिस का कथित तौर पर एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में पुलिस एक हिस्ट्रीशीटर का जन्मदिन मनाते दिख रही हैं।

मामला मुंबई से सटे वसई विरार के तुलिंज थाने का है। थाने में भूमाफिया के बर्थडे सेलीब्रेशन की वीडियो अब सोशल मीडिया पर भी वायरल है। इसे न्यूज 24 ने अपने ट्विटर से शेयर भी किया है।

जानकारी के अनुसार, तुलिंज पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक डीएस पाटील के केबिन में सभी पुलिस स्टाफ के साथ सचिन गाला नाम के भूमाफिया का जन्मदिन मनाया गया। दिलचस्प बात यह है कि सचिन गाला नाम के इस भूमाफिया के ख़िलाफ़ इसी पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी के कई अन्य मामले भी दर्ज हैं।

इसके अलावा इस संबंध में वसई और विरार शहर की महानगर पालिका द्वारा अवैध निर्माण को लेकर भी एमआरटीपी का नोटिस जारी किया गया है। हिस्ट्रीशीटर के ऊपर यह भी आरोप है कि उसने जानवरों के चारागाह के लिए महाराष्ट्र प्रशासन द्वारा आरक्षित जमीन पर अवैध रूप से कब्जा कर उस पर निर्माण कार्य करवाया है।

बता दें कि वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि सचिन का जन्मदिन मनाने के वक्त वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक समेत पूरा पुलिस महकमा और कुछ अन्य लोग उनके केबिन में मौजूद हैं। वहीं पुलिस अधिकारी स्वयं आरोपित को उसके परिजनों की तरह केक खिलाने की कोशिश कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र पुलिस का ऐसा कारनाम पहली दफा सामने नहीं आया है। इससे पहले एक अन्य हिस्ट्रीशीटर अयान खान का जन्मदिवस भी भांडुप पुलिस थाने में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा पिछले वर्ष मनाया गया था। इस घटना में भी कई पुलिसकर्मी आरोपित को केक खिलाते नजर आए थे। हालाँकि बाद में इस वीडियो के आधार पर 5 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया था। इनके नाम कॉन्सटेबल सुभाष घोसलकार, अनिल गायकवाड, माररूति जुमाडे और सब इंस्पेक्टर पंकज शेवाले और सचिन कोक्रे हैं।