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हिंदू-मुस्लिम एकता पर बने ‘5 Best विज्ञापन’… लेकिन सबमें सिर्फ हिंदू ही नेगेटिव और कट्टर क्यों?

अपने विज्ञापन में लव जिहाद को प्रमोट करने के कारण तनिष्क को सोशल मीडिया पर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। हालाँकि, तनिष्क ने भले ही व्यापक स्तर पर लोगों का विरोध देखने के बाद हिंदू समुदाय से माफी माँग ली हो मगर यह पहली बार नहीं है जब किसी एड एजेंसी ने हकीकत से अलग चीजों को दिखाने का प्रयास किया है

तनिष्क से पहले भी कई उत्पादों पर हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करने का इल्जाम लगा है। ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों में न केवल हिंदुओं को कट्टरपंथी दिखाया गया बल्कि उन्हें असहिष्णु भी दर्शाया गया। वहीं दूसरे समुदाय को बेहद सौम्य व्यवहार वाला दिखाया गया।

आज हम आपके सामने ऐसे ही विज्ञापनों के 5 उदाहरण पेश करने जा रहे हैं, जिसमें सेकुलरिज्म दिखाने की कोशिश में हिंदुओं का अपमान हुआ।

यू्ट्यूब पर हिंदू-मुस्लिम पर 5 सबसे बेहतरीन एड के संकलन (5 Best Creative Indian Ads About Hindu Muslim) में कम से कम दो हिंदू विरोधी विज्ञापन हैं और तीसरे में गंगा जमुनी तहजीब को दर्शाने के लिए हिंदू लड़की का इस्तेमाल हुआ है।

इसी तरह एक विज्ञापन में हिंदू व्यक्ति को ऐसे दर्शाया गया है, जैसे उनके परिवार में ही दूसरे समुदाय के घर खाना पीने से मना किया जाता हो।

पहले प्रचार में हम देख सकते हैं कि एक हिंदू व्यक्ति गणपति बप्पा की मूर्ति खरीदने आता है और जब उसे पता चलता है कि उसे बनाने वाला विशेष समुदाय का है तो वह असहज दिखने लगता है। आगे विज्ञापन में दिखाया जाता है कि इसके बाद मुस्लिम व्यक्ति सब समझ जाता है और अपनी बातों से उसका दिल जीत लेता है। फिर, हिंदू युवक को गलती का एहसास होता है और वह मूर्ति खरीदने का फैसला करता है।

दूसरे विज्ञापन में हिंदू दंपत्ति को पहले मुस्लिम महिला के घर जाने से मना करते हुए दिखाया जाता है, लेकिन जैसे ही उसके घर से चाय की खुशबू आती है, वह दोनों किसी बहाने वहाँ चले जाते हैं और रेड लेबल चाय के स्वाद में डूब कर एक और कप चाय माँग लेते हैं।

तीसरा एड सर्फ एक्सेल का है। एक बच्ची इसमें सभी हिंदू बच्चों से अपने ऊपर रंग फेंकने को कहती है फिर जब सबके पास रंग खत्म हो जाते हैं तो वह एक मुस्लिम लड़के को अपने साइकल के पीछे बिठाती है और मस्जिद तक छोड़कर आती है और बाकी बच्चे भी यह देखने के बाद रंग फेंकने से गुरेज करने लगते हैं।

फिर एक और वीडियो! राहुल नाम के एक बच्चे को इसमें उसकी माँ पंडित को खाना खिलाने भेजती है, लेकिन वह पहुँच मस्जिद जाता है और फिर मौलवी को खाना खिलाकर जब घर लौटता है तो माँ पूछती है कि पंडितजी ने क्या कहा। जिस पर बच्चा जवाब देता है- बिस्मिल्लाह रहमान ए रहीम। इसे सुन माँ हैरानी से पूछती है कि राहुल, तुम कहाँ गए थे। पूरा वीडियो देखकर बस यही लगता है कि जैसे सेकुलरिज्म का दारोमदार हिंदुओं के कंधे पर ही है।

इसी प्रकार एक शॉर्ट फिल्म में बाइक चोरी होती है। हिंदू युवक एक मुस्लिम व्यक्ति को उसकी बाइक पर गणपति बप्पा की फोटो देखकर पकड़ लेते है। वीडियो के शुरू से ही इस्लामी टोपी पहने लड़के को सिर्फ़ डरा हुआ दर्शाया जाता है। हालाँकि, बाद में वो बताता है कि उसने अपनी बाइक पर गणेश जी की फोटो इसलिए लगाई है क्योंकि उसे एक हिंदू आदमी ने दिल दिया था और वह गणेश जी का भक्त था। इसलिए उसने अपनी गाड़ी पर इसे लगाया।

कुल 5 विज्ञापनों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदुओं को लेकर एड एजेंसी किस तरह की तस्वीर समाज में परोस रही है। गंगा जमुनी तहजीब दिखाने के लिए हिंदुओं को नकारात्मक दर्शाया जाता है और दूसरा समुदाय अचानक से बहुत शांत, सरल, सहिष्णु हो जाता है जबकि हकीकत इससे कोसों दूर है। अजेंडा चलाने के लिए न केवल तनिष्क बल्कि तमाम कंपनियाँ सेकुलरिज्म का सारा भार सिर्फ़ हिंदुओं के ऊपर मढ़ रही हैं।

PM मोदी ने किया डॉ बालासाहेब विखे पाटिल की आत्मकथा का विमोचन, महाराष्ट्र में बढ़ते कोरोना मामलों पर सरकार को चेताया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (अक्टूबर 13, 2020) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए महाराष्ट्र के बड़े नेता रहे और पूर्व केंद्रीय मंत्री बालासाहेब विखे पाटिल की आत्मकथा ‘देह वीचवा करणी’ (अपना जीवन किसी नेक काम के लिए समर्पित करना) का विमोचन किया। इसके अलावा उन्होंने प्रवर रूरल एजुकेशन सोसाइटी का नाम बदलकर ‘लोकनेते डॉ. बालासाहेब विखे पाटिल प्रवर रूरल एजुकेशन सोसाइटी’ कर दिया।

इस सोसाइटी की स्थापना पद्मश्री डॉ. विट्ठलराव विखे पाटिल ने 1964 में की थी। डॉ. बालासाहेब विखे पाटिल, डॉ. विट्ठलराव विखे पाटिल के सबसे बड़े पुत्र और सोसाइटी के अध्यक्ष थे।

इस दौरान कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस सहित कई अन्य नेता मौजूद रहे। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि बालासाहेब की कई पीढ़ी लगातार समाजसेवा कर रही है, वरना कुछ पीढ़ियाँ कम ताकतवर नजर आती हैं। उन्होंने कहा कि बालासाहेब ने सत्ता और राजनीति के जरिए समाज की भलाई का संदेश दिया।

डॉक्टर बालासाहेब विखे पाटिल की आत्मकथा के विमोचन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आत्मकथा का विमोचन भले आज हुआ हो लेकिन उनके जीवन की कथाएँ महाराष्ट्र के हर क्षेत्र में पहले से मौजूद हैं।

डॉक्टर बाला साहेब विखे पाटिल की तारीफ में पीएम मोदी ने कहा कि उन्होंने सत्ता और राजनीति के जरिए हमेशा समाज की भलाई का प्रयास किया। उन्होंने हमेशा इसी बात पर बल दिया कि राजनीति को समाज के सार्थक बदलाव का माध्यम कैसे बनाया जाए, गाँव और गरीब की समस्याओं का समाधान कैसे हो। पीएम ने आगे कहा, “गाँव गरीब के विकास के लिए, शिक्षा के लिए, उनका योगदान हो, महाराष्ट्र में कॉपरेटिव की सफलता का उनका प्रयास हो, ये आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरणा देगा, इसलिए बालासाहेब विखे पाटिल के जीवन पर ये किताब हम सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।”

वहीं कोरोना वायरस महामारी पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा, “कोरोना का खतरा अभी भी बना हुआ है। महाराष्ट्र में स्थिति थोड़ी और चिंता में डालने वाली है। मेरी सबसे अपील है कि मास्क और सामाजिक दूरी के लिए अभी गैर जिम्मेदार ना हों, इनका पालन करें। याद रखें – जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।”

बता दें कि महाराष्ट्र भारत में कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित है। वहाँ अब तक 15,35,315 कोरोना मरीज मिल चुके हैं। इसमें से 2,12,439 केस एक्टिव हैं, वहीं 40,514 की जान जा चुकी है।

महाराष्ट्र केस

पिछले महीने, महाराष्ट्र में पुणे सबसे बुरी तरह प्रभावित शहर की सूची में सबसे ऊपर था। वहाँ पर कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या 2 लाख तक पहुँच गई थी। यह शहर देश के पाँच सबसे अधिक प्रभावित शहरों में से एक रहा है। अब पुणे में स्थिति में सुधार हो रहा है, लेकिन यह अभी भी महाराष्ट्र में सबसे अधिक प्रभावित जिलों में सबसे ऊपर है, जहाँ अब तक 42,112 सक्रिय मामले सामने आए हैं।

IIT का वो इंजीनियर, जो चाहता था सड़कें चकाचक बने, सड़क पर मारा गया: भ्रष्टाचार को लेकर PM को लिखा था पत्र

जब कोई युवक आईआईटी से पढ़ कर निकलता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वो एक अच्छा नागरिक बन कर परिवार और देश का भला करेगा। इसके बाद जो सरकारी सेवाओं में जाते हैं, उनका सपना होता है कि वो अपने देश के लिए कुछ कर के घर-परिवार और क्षेत्र का नाम और रौशन करें। ऐसी ही एक प्रतिभा थी सत्येंद्र दुबे, भारतीय इंजीनियरिंग सेवा के अधिकारी। लेकिन, अफ़सोस ये कि उस दौरान बिहार में जंगलराज का साम्राज्य था। इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या हो गई।

तब बिहार में अधिकारी वही करते थे, जो गुंडे-बदमाश कहते थे। नेताओं और अपराधियों का फर्क मिट गया था और लालू-राबड़ी को केवल अपने वोट बैंक बचाने से मतलब था। इसके लिए वो और उनकी पार्टी कुछ भी करने को तैयार रहती थी। इंजीनियर हों या ठेकेदार, अस्पताल हो या स्कूल, एनजीओ हो या कोई प्राइवेट कम्पनी – जो भी सत्ता द्वारा संरक्षित अपराधियों के विरुद्ध जाता था या उनकी बात नहीं मानता था, उन्हें ‘सबक’ सिखाया जाता था।

कौन थे इंजीनियर सत्येंद्र दुबे?

सत्येंद्र दुबे की क्या गलती थी? वो प्रधानमंत्री की राजमार्ग योजना पर ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे। उन्होंने तो बस अपने विभाग में हर स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार और ठेकेदारी में हो रही गड़बड़ियों को लेकर शिकायत भर की थी। अफ़सोस ये कि नवम्बर 30, 2003 को इस घटना का ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने खुलासा किया, लेकिन इसके बाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई करने की जहमत नहीं उठाई।

उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय के OSD खुद आईआईटी से पढ़े हुए थे लेकिन इस मामले में कोई कुछ नहीं कर पाया। इस घटना के बाद इंजीनियरों के मन में ऐसा डर बैठा कि वो भ्रष्टाचार देख कर भी चुप रहना पसंद करते थे, शिकायत कर के अपनी जान दाँव पर भला कोई क्यों लगाए? सत्येंद्र दुबे ने इन्हीं चीजों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायती पत्र भेजा था। कुछ ही दिनों बाद अपराधियों ने गया में उनकी हत्या कर दी।

सत्येंद्र दुबे ‘सेन्ट्रल नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ में डिप्टी जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने 1994 में आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक उत्तीर्ण किया था। वो स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के औरंगाबाद-बाराचट्टी हाइवे पर काम कर रहे थे, जो 60 किलोमीटर लम्बा था। कोडरमा (झारखण्ड) में इसका मुख्यालय था, जहाँ से सारे कार्य संचालित किए जा रहे थे। नवंबर 11, 2003 को PMO को भेजे पत्र में उन्होंने इसे देश के लिए अनंत महत्व वाली परियोजना करार दिया था।

इसी पत्र में उन्होंने बताया था कि कैसे जनता के रुपयों की लूट मची हुई है और योजनाओं को जमीन पर सही तरीके से लागू करने में क्या परेशानियाँ आ रही हैं। इंजीनियर सत्येंद्र दुबे से एक गलती ये हो गई थी कि उन्होंने इस पत्र में अपना नाम जाहिर कर दिया था, लेकिन, साथ ही इसे गोपनीय रखने की अपील भी की थी। उन्होंने पत्र के साथ अपने सारे डिटेल्स अटैच कर दिए थे और इसे गोपनीय रखने को कहा था।

क्या था इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या का कारण?

असल में उन्हें डर था कि उनके पत्र को किसी आम आदमी का पत्र समझ कर गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, इसीलिए उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि उनकी बातें महत्वपूर्ण हैं और वो एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो इस परियोजना से एकदम करीब से जुड़े हुए हैं। यहाँ PMO से भी गलती हुई और उसने बिना उनकी पहचान गोपनीय रखे इस पत्र को राजमार्ग मंत्रालय को भेज दिया। लगभग 8 अधिकारियों के टेबल से ये पत्र गुजरा।

अब आप समझ सकते हैं कि बाबूगिरी की इस प्रक्रिया में किसी की गोपनीयता कहाँ तक बनी रहने की सम्भावना है? इस पत्र को भेजे जाने के 16 दिनों बाद नवम्बर 27, 2002 को इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या कर दी गई। राज्य सरकार से इस मामले में न्याय की कोई उम्मीद तो नहीं ही थी, लेकिन केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी इस मामले में एकदम लापरवाही भरा रवैया दिखाया। आइए जानते हैं कि सत्येंद्र दुबे की क्या शिकायतें थीं:

  1. डिजाइन कंसल्टेंट्स ने जो डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स तैयार की हैं, वो इतनी ख़राब हैं कि उनके आधार पर काम ही नहीं किया जा सकता है। इसी के आधार पर सारे टेंडर्स अलॉट किए जाते हैं लेकिन ये एक कूड़े की तरह है।
  2. काम के लिए सामान वगैरह खरीदने के कार्यों को बड़े ठेकेदारों ने पूरी तरह से हाईजैक कर के रखा हुआ है। साथ ही ये ठेकेदार अपनी तकनीकी और वित्तीय क्षमताओं के फर्जी डिटेल्स देते हैं और उनके दस्तावेज भी गड़बड़ होते हैं।
  3. चेयरमैन के अप्रूवल वाली नोटशीट भी सार्वजनिक हो जाती है और इन बड़े ठेकेदारों को NHAI के बड़े अधिकारियों द्वारा भी फेवर किया जाता है।
  4. कॉन्ट्रैक्ट का ‘मोबिलाइजेशन एडवांस’ के रूप में प्रोजेक्ट का 10% भाग, अर्थात 40 करोड़ रुपए ठेकदारों को दिए जा चुके हैं और कहा गया है कि ये उनके ‘कुछ सप्ताह के कार्यों का अवॉर्ड’ है।
  5. इस प्रोजेक्ट पर काम के लिए NHAI अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिडिंग करवा रहा है लेकिन जब बात सच्चाई की आती है तो सारे प्रोजेक्ट्स छोटे ठेकेदारों को दिए जा रहे हैं, जो असल में इस काम को करने में सक्षम ही नहीं हैं और न ही वो गुणवत्ता से इसे कर सकते हैं।

केंद्र से लेकर राज्य तक, हर स्तर पर लापरवाही ही लापरवाही

अब बात करते हैं ‘संडे एक्सप्रेस’ को दिए गए उस समय के नेताओं-अधिकारियों के बयानों की। इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या को लेकर खुलासा होने के बाद बिहार के तत्कालीन डीजीपी डीपी ओझा ने स्वीकार किया था कि ठेकों का अपराधीकरण होना दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन ये सच्चाई है। उन्होंने कबूला था कि अधिकतर ठेके माफियाओं को जाते हैं। उन्होंने आश्वासन दिया था कि ‘एक ईमानदार व्यक्ति की मौत’ के मामले में न्याय के लिए वो व्यक्तिगत रूप से काम करेंगे।

तब राजमार्ग विभाग में भारत के केंद्रीय मंत्री रहे बीसी खंडूरी ने कहा था कि उन्हें ऐसे किसी पत्र की जानकारी ही नहीं है। उन्हें कुछ याद ही नहीं है, जो है वो NHAI के अध्यक्ष को पता है। उन्होंने कहा था कि इस पर टिप्पणी करना न तो उनके लिए उचित है और न ही संभव है। उन्होंने इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या की खबर सामने आने के बाद बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और मृतक के भाई से बात कर के इतिश्री कर ली।

प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता ने कहा था कि रोज अनगिनत पत्र आते हैं और उन सभी को ट्रेस करना खासा मुश्किल है। उन्होंने कहा था कि उन्हें पत्र की कॉपी भेजी जाए, तभी वो कुछ बता पाएँगे। आईआईटी एलुमनाई एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष शैलेश गाँधी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिख कर रोष जताया था। उन्होंने कहा था कि इसका सीधा अर्थ है कि भारत में ईमानदारी का एक ही मतलब है और वो ये कि आप विफल होंगे।

सबसे जानने लायक बात तो ये है कि इस घटना का आरोपित उदय मल्लाह को सीबीआई ने गिरफ्तार किया लेकिन वो 2010 में फरार भी हो गया। इसके बाद नवम्बर 2017 में उसे फिर से गिरफ्तार किया गया। वो 7 वर्षों से सीबीआई अदालत से फरार चल रहा था। नालंदा पुलिस ने एसटीएफ के साथ मिल कर उसे पकड़ा था। गया रेलवे स्टेशन के पास हुए इस हत्याकांड को सीबीआई तक ने लूट का मामला बता दिया था।

इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या: असली अपराधी अब भी बाहर?

उदय मल्लाह और उसके 4 सहयोगियों को डकेती के आरोप में गिरफ्तार किया गया। भीषण डकैती की साजिश की सूचना मिलने के बाद ये लोग धरे गए थे। इन सभी का नक्सली कनेक्शन भी सामने आया था। हालाँकि, मार्च 2010 में ही मंटू कुमार, उदय मल्लाह और पिंटू रविदास को इस मामले में दोषी पाया गया था। ये सभी गया के कटारी गाँव के रहने वाले थे। हालाँकि, सत्येंद्र दुबे के भाई का इस मामले में कुछ और ही कहना था।

उनका कहना था कि वो इस मामले की सुनवाई से काफी निराश हैं क्योंकि ये तीनों ही आरोपित पूरी तरह निर्दोष हैं और सीबीआई ने इस मामले को कवर-अप किया। उन्होंने सीबीआई के बयान को झूठा बताते हुए कहा था कि जो असली अपराधी हैं, वो अभी भी बाहर हैं। सीबीआई का कहना था कि इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की गया सर्किट हाउस के सामने तब हत्या की गई थी, जब वो वाराणसी से लौटे थे।

सीबीआई के अनुसार, वापस आकर उन्होंने देखा कि उन्हें लेने के लिए कोई गाड़ी नहीं आई है तो उन्होंने ऑटो रिक्शा कर लिया। उस समय तड़के सुबह के 3 बज रहे थे। इधर उनका ड्राइवर गाड़ी लेकर पहुँचा और उसने दुबे को वहाँ नहीं पाया। इसके बाद उसने उनकी लाश सड़क पर पड़ी हुई देखी। सीबीआई ने इसे डकैती का मामला बता कर केस दर्ज किया। अंत में तीन आरोपितों को पकड़ के इतिश्री कर ली।

इंजीनियर सत्येंद्र दुबे के नाम पर मिलते हैं अवॉर्ड्स?

आईआईटी कानपुर की वेबसाइट पर दुबे की प्रोफ़ाइल के अनुसार, वो एक सामान्य परिवार से आते थे और उनका जन्म 1973 में बिहार के शाहपुर में हुआ था। उन्होंने दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में भी टॉप किया था। उनकी मृत्यु के बाद भ्रष्टाचार पर उनके खुलासे को लेकर उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड्स मिले। हालाँकि, उनके लिए न्याय की माँग कहीं दब कर रह गई, राजनेताओं और ब्यूरोक्रेसी की निष्क्रियता और माफियाओं की धमक के बीच।

‘मंदिर बंद मदिरालय चालू’: महाराष्ट्र में BJP का जबर्दस्त प्रदर्शन, CM उद्धव ने राज्यपाल ने कहा- आपसे हिंदुत्व का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए

महाराष्ट्र में मंदिरों को लेकर उद्धव ठाकरे की सरकार के रवैये के बाद राज्यपाल और मुख्यमंत्री में ठन गई है। साथ ही भाजपा ने भी मंदिरों को खोलने के लिए विरोध प्रदर्शन चालू कर दिया है। भाजपा कार्यकर्ताओं ने शिरडी के साईं बाबा और प्रभादेवी के सिद्धिविनायक मंदिर के सामने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। उधर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सीएम उद्धव ठाकरे से पूछा है कि उन्हें कोई दिव्य प्रेम प्राप्त हुआ है या वो सेक्युलर हो गए हैं?

भाजपा नेता प्रसाद लाड को कार्यकर्ताओं संग हिरासत में लिया गया है। मुख्यमंत्री और शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने राज्यपाल के पत्र का जवाब देते हुए कहा है कि उन्हें उनसे हिंदुत्व का पाठ पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। प्रदर्शनकारी भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग होने के बावजूद मंदिरों में घुसने की कोशिश में लगे हुए हैं। पुलिस का कहना है कि किसी अप्रिय घटना से बचने के लिए कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है।

भाजपा नेता प्रवीण दारेकर ने कहा, “हमारी माँग हैं कि हमें सिद्धिविनायक मंदिर में प्रवेश करने दिया जाए। अगर वो हमें प्रवेश नहीं देते हैं, तो हम मंदिर में जाने के लिए अपना रास्ता बनाने के लिए बाध्य होंगे। यह एक अखिल महाराष्ट्र आंदोलन है क्योंकि हम चाहते हैं कि जल्द से जल्द राज्य के सभी मंदिरों को पुनः खोल दिया जाए।” कई पोस्टरों में कहा जा रहा है कि मंदिर बंद है और मदिरालय चालू है – ये कैसी सरकार है?

भाजपा की माँग है कि राज्य में सारे मंदिरों को खोलने की अनुमति दी जाए। राज्यपाल की आपत्ति इस बात को लेकर है कि राज्य सरकार ने जून में ही धार्मिक स्थलों को खोलने की घोषणा की थी लेकिन अब 4 महीने बाद भी मंदिर बंद ही हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि सारे रेस्टॉरेंट खुले हुए हैं। राज्यपाल ने उद्धव को याद दिलाया कि वो हिंदुत्व के मजबूत पक्षधर रहे हैं और भगवान राम के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से श्रद्धा व्यक्त की थी।

वहीं सीएम उद्धव का कहना है कि अचानक से लॉकडाउन लगाना सही निर्णय नहीं था और इसे एक बार में ही हटाना भी ठीक नहीं होगा। उन्होंने कहा कि वो एक ऐसा व्यक्ति हैं जो हिंदुत्व का अनुसरण करते हैं और और उन्हें किसी से सर्टिफिकेट लेने की आवश्यकता नहीं है। पुणे शहर के ग्रामदैवत तांबड़ी जोगेश्वरी मंदिर के बाहर भजन कर भाजपा ने विरोध जताया। सारे भाजपा नेता विरोध प्रदर्शन में लगे हुए हैं।

महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा हटाने का स्थानीय लोगों ने किया विरोध, बंद के आह्वान के बाद क्षेत्र में तनाव

महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के एक गाँव में कुछ लोगों ने कथित तौर पर प्रशासन की अनुमति के बिना छत्रपति शिवाजी महाराज की एक अर्ध-निर्मित प्रतिमा स्थापित कर दी, जिसे पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने वहाँ से हटा दिया।

सहायक पुलिस निरीक्षक भालचंद्र देशमुख ने बताया, ‘‘कुछ अज्ञात लोगों ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) तड़के शाहुवाड़ी तहसील के बंबावडे गाँव के एक चौराहे पर मराठा योद्धा सम्राट की प्रतिमा स्थापित की थी।’’

अधिकारी ने बताया कि कुछ स्थानीय संगठनों के सदस्यों और स्थानीय निवासियों ने प्रतिमा हटाए जाने का विरोध किया और कहा कि इसे यहीं होना चाहिए, लेकिन पुलिस ने उनको समझाया। उन्होंने कहा, ‘‘प्रतिमा को बिना अनुमति के स्थापित किया गया था, इसे बाद में सम्मान पूर्वक वहाँ से हटा दिया गया।’’

अधिकारी ने बताया कि इस घटना को लेकर संबंधित धाराओं के तहत एक मामला दर्ज किया गया है। मलकापुर और वंबवाडे जैसे कुछ गाँवों ने मूर्ति को हटाने की निंदा करने के लिए बंद का आह्वान किया है। विरोध के बाद तनाव पर काबू पाने के लिए वंबवाडे गाँव में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले फरवरी महीने में ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के गृह क्षेत्र छिंदवाड़ा में शिवाजी की प्रतिमा हटा दी गई थी। छिंदवाड़ा के सौंसर के मोहगॉंव तिराहे पर लगी इस प्रतिमा को जेसीबी से तोड़ने के मसले पर शिवसेना ने चुप्पी साधे रखी। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना को लेकर कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने पूछा था कि क्या छत्रपति शिवाजी महाराज को अपना आदर्श मानने वाली शिवसेना ये अपमान सह पाएगी?

प्रशासन ने दावा किया था कि हिन्दू संगठनों ने बिना अनुमति शिवाजी की प्रतिमा की स्थापना कर दी थी। इसके बाद प्रशासन की टीम जेसीबी के साथ पहुँची और शिवाजी की प्रतिमा को हटा दिया गया। मंगलवार (फरवरी 11, 2020) को बड़ी संख्या में लोग पहुँचे और उन्होंने प्रशासन व सरकार के ख़िलाफ़ जम कर नारेबाजी की थी। इससे पहले कमलनाथ सरकार के दौरान ही महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति के साथ छेड़छाड़ हुई थी।

शिवराज सिंह ने कमलनाथ को निशाने पर लेते हुए कहा था, “छत्रपति शिवाजी महाराज का तुम अपमान करते रहो और हम चुप बैठे रहें यह हो नहीं सकता। कमलनाथ जी, जरूरत पड़ी तो अपने महापुरुषों के सम्मान में खून के बदले खून दे देंगे।” उन्होंने कहा था, “छत्रपति शिवाजी महाराज, जिन्होंने औरंगजेब के छक्के छुड़ा दिए थे, जो भारत के गौरव का प्रतीक हैं, उनका अपमान किया गया। उनकी प्रतिमा को गिराने के लिए जेसीबी मशीन। देश अपने महापुरुषों का अपमान सहन नहीं करेगा।”

बीजेपी नेता ने एक ट्वीट में लिखा था, “पहले तो मूर्ति गिराकर छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान किया गया और उसके बाद पैसों का दम्भ भरा गया! सौंसर की जनता में इतना सामर्थ्य है कि वे जनभागीदारी से प्रतिमा को ससम्मान पुनर्स्थापित कर सकें।”

चरसी वामपंथनों के नाम: ‘बड़ा प्यारा एड था’ से शुरू ‘संघी साले मूर्ख होते हैं’ पर खत्म (चरसी वामपंथी भी पढ़ें)

सावन में अंडे से सर निकाल कर बाहर झाँकती वामपंथन, भादो में बोली ‘गे माय एहन बाइढ़ त देखबे नै कैलों!’ मतलब, ‘Oh my dog! Never seens this kinds of floods… Oh mah gods!’ यही वामपंथने आहें भर रही हैं कि 2014 के बाद से देश का माहौल खराब हो गया है और ऐसे संवेदनशील माहौल में एक उम्मीद की किरण आई थी तनिष्क के विज्ञापन के रूप में, जो कि मूर्ख संघियों को पच नहीं रही।

एड पर तो बाद में बात करेंगे, पहले स्वीकार्यता के लिए तरसती इन वामपंथनों पर बात करेंगे जो कई स्तर पर फ्रस्ट्रेटेड रहती हैं। इनका नकलीपना ‘पिंक’ और ‘हॉट पिंक’ से ले कर ‘नो नो नो नो नो… ये ग्रीन नहीं है, ये बॉटल ग्रीन है’ नापने में बीतता है। यही चरसी वामपंथनें आपको गरीबी पर कविता करती भी दिखेंगी और यही वामपंथनें तापसी पनु के कमर तक पानी में खड़े हो कर इनफिनिटी पूल पर ब्रेकफास्ट के टेबल पर अंडे के पॉच देख कर ‘ओ मा गॉड ताप्सी इज स्लेइंग इट’ भी कहती हैं।

इनके ‘रिक्शावाले की व्यथा’ पर लिखे पोस्ट देख कर आपको आत्मग्लानि होने लगेगी और तभी ये लिख देंगी कि ‘तनिष्क के जूलरी खरीदने की औकात है नहीं, चले हैं बॉयकॉट करने!’ अरे दीदी पहले डिसाइड कर लो कि गरीबों की इज्जत करती हो कि समय देख कर अपनी एलीटिज्म दिखानी है। किसी को एक जीवनशैली पसंद हो, पैसे हों तो घूमने, खाने, या नग्न हो कर नहाने में कोई समस्या नहीं, लेकिन वही व्यक्ति ये सब करते हुए दिखाता भी है स्वयं को, या ऐसा करने वालों को देख कर आहें भरता है, फिर वो गरीब मजदूरों के ऊपर एक ट्वीट कर देता है कि वो भी माइग्रेंट है, तब दिमाग भन्ना जाता है।

पूरा जीवन इसी दोगलेपन की निर्लज्जता में बैलेंस बनाने में बीतता है और बाद में डिफेंड करेंगे कि अमीर होने का मतलब ये नहीं कि गरीबों की व्यथा वो नहीं समझ सकते। लेकिन फ्रस्टू गँजेड़न वामपंथन दूसरे ही दिन लिख देगी कि जिसके अपने पत्नी-बच्चे नहीं, वो क्या जानेगा परिवार का दर्द। इनका वश चले तो कह देंगे ‘जा के पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ गलत है, हमने फोटो देखी है बिवाई की, तो हमें दर्द भी मालूम है, और जिनके फटी है उनसे ज्यादा मालूम है।

क्या विज्ञापन का विरोध करने वाले वाकई मूर्ख हैं?

विज्ञापन का विरोध करने वाले वो हैं जो देर से जगे हैं। वो मूर्ख नहीं हैं, वो बस सहिष्णु हैं, और अभी तक सिर्फ सहिष्णुता ही दिखाते रहे क्योंकि पिछले दौर में कुछ भी बोलने को ‘साम्प्रदायिक’ माना जाता था। लम्बे समय से ये नौटंकी चलती रही कि एक खास मजहब अपने उन्माद का उन्मुक्त प्रदर्शन करता रहे और तुमने कुछ कह दिया तो तुम कम्यूनल हो जाते थे। अब वो दौर गायब हो रहा है।

हिन्दुओं में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा है जहाँ वो अब यह देख रहे हैं कि उनके धार्मिक प्रतीकों पर किस-किस तरीके से, उसे विज्ञापन, वेब सीरिज, फिक्शन आदि के छद्मावरण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। तुरंत ही उस पर कोई सवाल पूछ देता है, कोई तर्क रखता है, और फिर उस पर एक चर्चा शुरू हो जाती है। पहले ये चर्चा हो ही नहीं पाती थी और हर नैरेटिव एकतरफा होता था।

अब हिन्दू यह भी पूछ रहा है कि पाँच दशक पहले की फिल्मों में हर ब्राह्मण चोर, ठग या व्यभिचारी ही क्यों दिखाया जाता था? अब उसे यह जानने में दिलचस्पी है कि हर बार कोई मजहबी पात्र शेर खान या अब्दुल के बाप की तरह हरिश्चंद्र से ज्यादा सत्यवादी और ईमानदार कैसे हो जाता था? अब उसे यह पता लगाना है कि हर लाला किसी के माँ के कंगन क्यों ले लिया करता था सूदखोरी करते हुए? अब उसे यह जानना है कि पूरी मुंबई दाऊद, शकील जैसे बड़े और छोटे गुंडों से भरी होती थी, लेकिन फिल्मों का डॉन हमेशा हिन्दू ही क्यों हुआ करता था?

तनिष्क के विज्ञापन से ले कर ‘पाताल लोक’ वेब सिरीज तक, एक मजहब को ग्लैमराइज किया गया है और दूसरे धर्म को ब्राह्मण कान पर जनेऊ चढ़ा कर व्यभिचार करता दिखाया जाता है। ये किसी समानांतर ब्रह्मांड में ही संभव है कि ‘लव जिहाद’ को मेनस्ट्रीम बना चुका मजहब अपने घर में हिन्दू बहू की गोदभराई की रस्म कराता होगा और ब्राह्मण कान पर जनेऊ रख कर पराई स्त्री के साथ सेक्स।

आप सोचिए कि किस तरह की विकृत मानसिकता वाले लोग इस तरह के कॉन्सेप्ट पर काम करते होंगे! किस दूसरे समुदाय के घर में आपने सुना है कि हिन्दू की लड़की गई और उसका निकाह बिना मजहब स्वीकारे हुआ है? ऐसे परिवारों का प्रतिशत कितना है? फ्रस्टू वामपंथनों से पूछेंगे तो वो कह देंगी कि ‘ये एड उम्मीदों से भरा हुआ था’। तुम्हारी उम्मीद की हर स्कीम में हिन्दू की ही बेटी क्यों दिखती है दूसरे समुदाय के लड़कों के साथ? कभी समुदाय विशेष की बेटी भी दिखाओ जिसके गाल पर हिन्दू लड़का गुलाल मल रहा हो…

क्या हिन्दू लोग कट्टर हो रहे हैं?

अपने सम्मान, धर्म, धार्मिक चिह्नों या उससे जुड़े विषयों पर मुखर हो कर बोलना कट्टरता नहीं है। हिन्दू थे तो एड को हटवाया, समुदाय विशेष के होते तो बेंग्लुरु के दंगों की तरह शोरूम जला देते। शार्ली एब्दो का याद कर लीजिए और ब्रूसेल्स से ले कर मैनचेस्टर तक, यूरोप के हर शहर में हुए धमाकों, नीस से ले कर पेरिस तक लोगों के ऊपर ट्रक चढ़ाने और लंदन के पुलों पर चाकूबाजी की घटनाएँ याद कर लीजिए।

इसलिए, कट्टरता की परिभाषा फिर से समझने की जरूरत है। लेकिन दीदी अल्पसंख्यक वाला कार्ड खेल जाएगी क्योंकि चरसी वामपंथन का पूरा जीवन उर्दू के दस शब्द पढ़ने और फेसबुक पर लिखने में बीता है। वो बताएगी कि ‘ऐसे संवेदनशील समय में जब स्कोडा की जरूरत थी तो लहसुन बोया जा रहा है’। अरे! बो तो हम धनिया देंगे, और वहाँ बोएँगे जहाँ प्रकाश संश्लेषण की रसायनिक क्रिया संभव नहीं, लेकिन हम कायदे में रहना जानते हैं।

ये नकली लोग दो-चार शब्द सीख लेते हैं जिसमें ‘संवेदनशील’, ‘अल्पसंख्यक’, ‘समाज’, ‘आज का दौर’, ‘ऐसे समय में’, ‘संघी’ आदि प्रमुख हैं, उसी को सस्ती लोकप्रियता के लिए, स्वादानुसार लेखों में गार्निशिंग के तौर पर छिड़क कर हिरोइन बनी फिरती हैं। नीचे ठरकी लौंडे ‘वाह मैम, क्या लिखा है… आज के दौर में आपसे बेहतर इन मुद्दों पर कौन लिख पाया है’, ‘अरे मैम, बिल्कुल मेरी सोच थी, ये संघी कहाँ से समझेंगे आज के दौर की नाजुकता को। आपने बेहतरीन लिखा है।’ लिख कर मजे लेते हैं।

फिर ऐसे लेखों को अपने वॉल पर मजे लेने के लिए ये दुष्ट लौंडे शेयर कर देते हैं, वामपंथन 15 शेयर को ‘पूरे भारत में पढ़ा गया’ और 30 शेयर को ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वायरल हो गया’ मान कर नेत्रों के कोर के काजल को सर पर लगा कर ‘काली माय की जय’ कर देती है। आकाशगंगा के दूसरे छोर पर दिमाग को सूखने छोड़ कर फेसबुक पर स्वीकृति के लिए लाइक-लव पाने की आस में कटोरा लिए ऐसी वामपंथन के हर कमेंट पर जब दूसरे विचार के लोग ट्रोल करते हुए ‘हा-हा’ गिराने लगते हैं तो वामपंथन समूह नाराज हो जाता है।

तब ये लोग विक्टिम कार्ड निकालते हैं या फिर स्वयं के विचारों से इतर कुछ न सुन पाने में अक्षम मक्षिकामस्तिष्कधारिणी ये वीरांगनाएँ तुरंत ‘मिडिल फिंगर’ दिखाने की सलाह देती पाई जाती हैं। जिसको जो दिखाना है, दिखा दो, किसने रोका है? लेकिन हाँ, जब ऐसे में कोई दूसरा तुम्हें कुछ कह दे तो उस पर अश्लीलता का इल्जाम मत लगाना।

कट्टरता तो इनके विचारों में होती है। हिन्दू तो बस जगा है और पहचान रहा है कि कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे अजेंडा पेला जा रहा है। तनिष्क की साइट पर ‘हिन्दू’ शब्द सर्च करने पर जहाँ शून्य परिणाम आए, वहीं ‘मुस्लिम’ लिखने पर तीन सौ से ज्यादा प्रोडक्ट थे। ये क्या नौटंकी है? जब नेट पर शेयर होने लगी बात, तो तुरंत उन्होंने उसे ‘हर दुल्हन के लिए’ लिख कर उन प्रोडक्ट्स के बारे में जानकारी को ‘सेकुलर’ से ‘कम्यूनल’ बनाया।

वामपंथन चाचियाँ इससे भी फ्रस्ट्रेटेड हैं कि तनिष्क वाले इन संघियों से डर क्यों गए? ऐसा है, चाची जी कि दुर्गापूजा से ले कर दीवाली-छठ, अक्षय तृतीया तक और पूरे साल, गहने खरीदने वाले कौन हैं, ये बात तनिष्क को अच्छे से पता है। जिनको कन्फ्यूजन था कि ‘छपाक’ फिल्म को ये संघी कैसे फ्लॉप करवाएँगे, वो जा कर बॉक्स ऑफिस के आँकड़े देख लें।

उन्हें भी पता है कि कौन पंचर साटता है, और कौन आभूषण खरीद सकता है। हर व्यापारी को, हर फिल्म निर्माता को इस बात का अहसास होना चाहिए कि उनके करोड़ में अस्सी लाख कौन देता है। उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि बीस लाख के बिज़नेस के लिए अस्सी लाख के देवी-देवताओं पर हमला करने का परिणाम क्या होता है। हर उस साम्प्रदायिक वामी-कामी-इस्लामी कट्टरपंथी सोच वाले, और उनके समर्थकों के मनोमस्तिष्क पर स्पष्ट तौर पर यह बात छप जानी चाहिए कि भारत में व्यापार करना है तो जबरदस्ती का सेकुलरिज्म नहीं चलेगा, जिसका मतलब यह होता है कि हिन्दुओं के प्रतीकों पर हमला बोलो, ‘शांतिदूतों’ को तेल लगाओ।

जिसको, जहाँ तेल लगाना है, लगाओ, मसाज करो, हमें कोई मतलब नहीं। लेकिन, हमारे प्रतीकों पर हमला करोगे, ‘लव जिहाद’ जैसे कुकृत्यों को ग्लैमराइज करने की कोशिश करोगे तो हम तुम्हें बताएँगे कि समस्या कहाँ है। फिर उन्हीं तीन फीट चौड़ी गलियों में ठेले पर रत्नजड़ित अंगूठियाँ बेचते रहना जहाँ कबूतर भी उड़ता है तो इधर-उधर टकराता रहता है।

बात एक विज्ञापन की है ही नहीं

बात यह नहीं है कि ‘यार एक विज्ञापन ही तो था, ये ओवर रिएक्ट कर रहे हैं हम लोग’, बात यह है कि तुम पीछे की बात भूल रहे हो। यह एक शृंखलाबद्ध तरीके से, लगातार, कभी डिटर्जेंट में, तो कभी चाय के नाम पर हिन्दुओं में आत्मग्लानि भरने का कुत्सित प्रयास है। यह ऐसा दिखाने का प्रयास है कि ‘देखो, वो तो अपने घर में गोदभराई करा रहे हैं’, जबकि वास्तव में वो लड़की अपने ससुर, देवर, जेठ और पति के दोस्तों के लगातार सामूहिक बलात्कार का शिकार हो कर, एक दिन सूटकेस में किसी नदी में बहती मिलती है।

दिखाया यह जाता है कि ‘अफरोज तो राहुल को घर बुला कर सेवइयाँ खिला रहा है’ लेकिन होता यह है कि अफरोज अपने पाँच दोस्तों के साथ राहुल की हत्या कर देता है क्योंकि उसने उसकी बहन से प्रेम किया था। दिखाया जाता है कि ‘बुर्के वाली पड़ोसन की चाय की खुशबू कमाल की है’, होता यह है कि वही बुर्के वाली कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार के समय चिल्ला-चिल्ला कर बताती है कि किस घर के किस फ्लोर पर चावल के डिब्बे में वही पड़ोसी बैठा हुआ है। पटाक्षेप कुछ यूँ होता है कि पति को गोली मारी जाती है, पत्नी को बंदूक की नोक पर रक्त से सने चावल खिलाए जाते हैं।

जो है ही नहीं, वो दिखा कर हिन्दुओं को गिल्ट ट्रिप पर क्यों भेज रहे हो? आज के दौर की, और हर उस दौर और समय की सच्चाई यही है कि एक मजहब ऐसा है जो दुनिया के किसी भी कोने में दूसरे धर्म या रिलीजन के साथ शांति से रह ही नहीं सकता। ये जहाँ पहुँचता है, वहाँ रेप की वारदातें अचानक से बढ़ जाती हैं। स्वीडन एक अच्छा उदाहरण है। इन्हें रहने को जगह दो, तो दो पीढ़ी के बाद ये आपको आपके ही घर पर ‘ये मकान बिकाऊ है’ लिखने पर मजबूर कर देते हैं।

कभी विज्ञापन या फिल्म में यह तो दिखा नहीं। इसी मानसिकता पर किताब आई तो उसको ब्लॉक करवा दिया। इसलिए, बात कभी भी एक विज्ञापन की न तो थी, न रहेगी। ये न तो आम है, न हो सकती है। जो है नहीं, वो मत दिखाओ। ‘आशा’ और ‘उम्मीद’ दिखानी है तो मेरे पास दसियों कहानियाँ हैं जहाँ हिन्दू बच्चियों को न्याय की दरकार है। आशा और उम्मीद दिखानी है तो इस मजहब में स्त्रियों के शिक्षा के स्तर के आँकड़े निकाल कर पूछो कि दस करोड़ की महिला आबादी में मात्र एक प्रतिशत को ही ग्रेजुएशन तक क्यों पढ़ाया जाता है?

लव जिहाद, रेप जिहाद आदि व्यवस्थित तरीके से समाज में घुलते उस जहर की तरह हैं जिसकी शुरुआत में उपेक्षा की गई कि ये तो कहीं-कहीं हो रहा है, प्यार करना गुनाह नहीं है। लेकिन, अब चाहे केरल हो या फिर कानपुर की जूही कॉलोनी, इसका विकृत रूप दिख रहा है। इसलिए, नहीं चाहिए मजहब विशेष वाले घर में हिन्दू बहू की गोदभराई की हिन्दू रस्म वाली नौटंकी क्योंकि ये न सिर्फ काल्पनिक है, बल्कि परोक्ष रूप से हिन्दुओं को नीचा दिखाने की कोशिश है। यहाँ यह दिखाया जा रहा है कि जिन पर तुम लव जिहाद के इल्जाम लगाते हो, वो तो हिन्दू लड़की को उसकी रस्में निभाने दे रहे हैं।

सच्चाई यह है कि हिन्दू लड़की हो, या हिन्दू लड़का हो, अगर वो समुदाय विशेष के घर में जाते हैं तो पहली शर्त ही इस्लाम स्वीकारने की होती है। अपवादों को छोड़ दें, तो आपके लिए खोजना कठिन हो जाएगा। हो सकता है पहले छः महीने आपको स्वतंत्रता का बहकावा दिया जाए, लेकिन उसके बाद चाहे इमोशनल ब्लैकमेल कर के हो, या फिर तलाक की धमकी दे कर, धर्मांतरण तो करना ही पड़ता है।

इसलिए ये ढोंग स्वीकार्य नहीं है।

क्या राइट वाले लेफ्ट होते जा रहे हैं?

ऐसे सवाल भी कल ट्विटर पर देखने को मिले कि गैर-वामपंथी भी उन्हीं की राह पर जा रहे हैं। बात यह है कि जा रहे हैं तो समस्या क्या है? इस वामी-कामी-इस्लामी कट्टरपंथी गिरोह को भी तो समझ में आए कि उन्होंने जैसी कट्टरता, वैचारिक अनम्यता दिखाई है, वो सामने से आते हुए कैसी दिखती है। ये तो करना आवश्यक है ताकि इन वामपंथी शूकरों का मानमर्दन किया जा सके।

राइट या गैर-वामपंथी समूह के साथ यही समस्या है कि मार वामपंथियों को पड़ती है, दर्द इन्हें भी होने लगता है कि इतना मत मारो! जबकि, चाणक्य के वचनानुसार दुश्मनों की संततियों का भी विनाश अत्यावश्यक है। इनका समूल नाश होना चाहिए, किसी भी तरह की छूट देने की आवश्यकता नहीं है। तय करो कि रोना-गाना है या अनवरत पेलाई करनी है इनकी, फिर तय करो कि तुम्हें इसका हिस्सा बनना है कि नहीं।

बलराम की तरह महाभारत के युद्ध के अंतिम समय में गदायुद्ध के नियम तय मत करो। कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु को जब मारा गया तब के अट्टहास याद करो। हिन्दू वही सोलह साल का किशोर है जिसकी मूँछों के रोम भी प्रकट नहीं हुए थे, और उसे तथाकथित महारथियों ने घेर कर मार डाला था। इसलिए, कर्ण अगर वैयक्तिक तौर पर सही भी है, फिर भी दुश्मन की तरफ से है तो पहिया निकालते वक्त उसके सर को धड़ से अलग करना न्यायोचित और धर्मानुसार किया गया कृत्य है।

तुम इन चक्करों में मत पड़ो कि ‘हम ओवररिएक्ट कर रहे हैं’ क्योंकि चोर की भीड़ द्वारा पिटाई को पूरे हिन्दू समुदाय पर फेंकना भी ओवररिएक्शन ही था, कठुआ के रेप का मसला ओवररिएक्शन से भी एक कदम आगे की बात थी, जुनैद की लिंचिंग एक फेक न्यूज थी, लेकिन वो तो आज भी नाम लेते ही हैं। फिर ये ‘हम ओवररिएक्ट कर रहे हैं’ क्या होता है? जब मौका मिले दबोचो, तुम्हें वामपंथियों की तरह तथ्यों को ‘मैनुफैक्चर’ करने की आवश्यकता भी नहीं, तथ्य तो हम दे रहे हैं तुम्हें, तुम रिएक्ट करना सीखो तो पहले।

पहले ही भावुक होने लगते हैं लोग! अरे, पहले इनको यह दिखाओ कि हमें समझ में आता है सब, फिर उस पर प्रतिक्रिया दो, फिर सामूहिक प्रतिक्रिया दो, फिर ब्रांड्स पर दबाव बनाना सीखो, फिर इन्हें ध्यान दिलाओ कि सामान कौन खरीदता है, फिल्में कौन देखता है, फिर अपने प्रण पर डँटे रहो कि इसकी फिल्म नहीं देखनी, इस ब्रांड का सामान नहीं लेना। जो देख ली, वो ठीक है, जो खरीद लिया वो ठीक है, लेकिन आगे का याद रखो।

संघी या भक्त कहलाने पर गौरव महसूस करो

जिनकी आँखें बजबजाते माहौल में हर रोज खुलती हों, जो बकरी के भेनारी (अपशिष्ट) के दुर्गंध में जीवन जीते हैं, जो वही टट्टी फेसबुक पर पढ़ते और लिखते हैं, वो इतने क्वालिफाइड नहीं है कि वो ‘संघी’ या ‘भक्त’ क्या होता है समझ सकेंगे। संघ ने देश के लिए क्या किया, और ‘भक्त’ कहे जाने वालों ने क्या नहीं किया, ये सबके सामने है। मूर्ख संघी को कम से कम यह तो समझ में आता है कि CAA का भारत के समुदाय विशेष पर कोई असर नहीं होने वाला, लेकिन स्वयं को फ्रस्टू वामपंथन विचारक भी मानती हैं, अपनी डिग्री की फोटोकॉपी भी फेंक कर मारती हैं, लेकिन उनको ये कानून समझ में नहीं आता।

भक्त कहे जाने वाले न तो अपने मंदिर पर ईंट-पत्थर जमा कर के रखते हैं, न ही अपनी बहू-बेटियों को कहते हैं कि छत से पेट्रोल बम फेंकना। भक्त कृष्ण भगवान को बलात्कारी कहे जाने पर भी चुप रहते हैं, नंबर प्लेट स्कैन कर के विधर्मियों की कार में न तो आग लगाते हैं, न ही ह्यूमन चेन की नौटंकी करते हैं। भक्त होना तो सौभाग्य है, वरना मजहबी शिक्षा देने वाले दीन और दाढ़ी वाले बच्चों को हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार करने की शिक्षा तो खुलेआम दे ही रहे हैं।

जिनकी औकात नहीं है हमारे स्तर तक पहुँचने की, वो हमें किसी भी नाम से पुकारें, आपको तनिक भी फर्क नहीं पड़ना चाहिए। उन्हें अपने ही तरह के लोगों में स्वीकार्यता चाहिए इसलिए वो मुँह से भी मलद्वार का काम लेते हैं। जीवन ही दूसरों के द्वारा ‘सराहना’ पाने की उम्मीद पर टिका हुआ हो, पूरा गैंग एक तरह की बात कर रहा हो, तो उनके पास विकल्प नहीं हैं। ये सारे दोगले निजी बातचीत में आपको जता देंगे कि उन्हें भी पता है कि बीफ के लिए जुनैद की लिंचिंग फर्जी खबर थी, लेकिन फेसबुक पर लिखे पोस्ट में उदाहरण दे ही देंगे।

चरसी वामपंथनों की बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए, उन्हें बस उनकी औकात दिखाते रहना चाहिए कि तुम्हारी अहमियत, तुम्हारे शब्दों का वजन शराबियों की महफिल में कहे गए चुटकुलों जितना है जिसका मजा सिर्फ वही ले पाते हैं जो नशे में नहीं हैं, और दुर्भाग्य यह कि वो भी चुटकुलों की गुणवत्ता पर नहीं, उसके घटिया होने के स्तर पर हँसते हैं। इसलिए, इनको लिखने दो और मजे लो। नीचे में लिखते रहो, ‘अरे मैम, इतनी गहरी और संवेदनशील बात, आपके सिवाय और लिख कौन पाता है’, ‘वाह मैम, ऐसे शब्द लिखने के लिए हिम्मत होनी चाहिए, वरना कई पढ़े-लिखे तो बस टाइमपास कर रहे हैं’, ‘जब से फेसबुक पर आया हूँ, जब से अकाउंट बनाया है, इससे बेहतर बात पढ़ी ही नहीं कहीं। इजाजत हो तो कॉपी कर लूँ?’

ऐसे मूढ़मतियों को पता भी नहीं चलता कि कौन संघी उनकी ले कर निकल गया, और कौन उनके स्क्रीनशॉट किस ग्रुप में लगा कर मजे ले रहा है। मैम को बस इससे मतलब है कि मेरा पोस्ट तो वायरल हो गया। सही बात है, अगर तीस शेयर होना वायरल होना है तो उस हिसाब से मेरे इस लेख को व्हर्लपूल या सोम्ब्रेरो मंदाकिनी नहीं, तो एंड्रोमेडा के किसी सौर परिवार के ग्रह पर कोई अवश्य पढ़ रहा होगा। या साकेत धाम में शेषसय्या पर लेटे भगवान विष्णु, पद्महस्ता, भुवनेश्वरी, हरिवल्लभा, विष्णुवक्षा माता लक्ष्मी के लेटेस्ट आइपैड प्रो पर अवश्य ही स्क्रॉल कर रहे होंगे। रीट्वीट तो मेरा मोदी जी भी नहीं करते, विष्णु जी तो नहीं ही करेंगे।

जय श्री राम!

कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच पंजाब सरकार की लापरवाही, पिछले साल के मुकाबले जलाई 4 गुना ज्यादा पराली

कोरोना वायरस के कारण एक ओर जहाँ स्थिति आए दिन भयावह होती जा रही है, वहीं  कुछ राज्यों में इसे रोकने के लिए किए जा रहे कार्यों में लापरवाही साफ देखने को मिल रही है। कॉन्ग्रेस शासित प्रदेश पंजाब इन्हीं राज्यों में से एक है। ताजा जानकारी के अनुसार पंजाब में इस वर्ष पिछले साले के मुकाबले अधिक खूँटी जलाई गई है जिससे कोरोना के अधिक दुष्प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

यह जानकारी लुधियाना के पंजाब रिमोट सेंसिंग सेटर (PRSC) के एसीएम डिविजन के प्रमुख अनिल सूद ने दी है। उन्होंने कहा कि पिछले साल 21 सितंबर से 12 अक्टूबर तक पंजाब में 755 पराली जलाने के मामले सामने आए जबकि 2018 में यह संख्या 510 थी। मगर इस साल इन मामलों की गिनती बढ़कर 2,873 हो गई है। 

उन्होंने इसके पीछे का कारण बताते हुए कहा कि पहले के सालों में बारिश हो गई थी तो वहाँ कटाई देरी में हुई इसलिए पराली जलाने की घटना कम हुई, लेकिन इस वर्ष मौसम शुष्क था इसलिए ज़्यादा घटना हो रही।

वह कहते हैं, “अभी कटाई की शुरूआती है तो जब तक इसका समय पूरा नहीं होता (यानी 30 नवंबर तक) तब तक ये कहना मुश्किल है कि पिछले सालों से कितनी ज़्यादा या कम होगी। लेकिन आने दिनों में मेरा अनुमान है ये कम ही दिखेगी।”

PRSC के मुताबिक, इस साल 21 सितंबर से 12 अक्टूबर तक के दरम्यान पराली जलानी की घटना पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब चार गुना दर्ज की गई है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों पराली जलाने के बढ़ते मामलों का असर भी सामने आ चुका है। दिल्ली-एनसीआर में सोमवार को सीजन का सबसे ज्यादा प्रदूषण पाया गया। गाजियाबाद की स्थिति तो यह है कि वह हवा के सबसे घटिया स्तर को छू गई है वहीं गुरुग्राम की हवा में भी पिछले सालों के मुकाबले सबसे खराब स्तर देखा गया है।

दिल्ली की यदि बात करें तो यहाँ का एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 261 दर्ज किया गया। पीएम 2.5 और पीएम 10 की मात्रा सबसे अधिक रही। इसके बाद बागपत में यही इंडेक्स 333, बहादुरगढ़ में 217, बलभागढ़ में 161, भिवाड़ी में 266, फरीदाबाद में 224, गाजियाबाद का 302, ग्रेटर नोएडा का 292, गुरुग्राम का 259, जींद का 294, कुरुक्षेत्र का 315, नोएडा में 274 रिकॉर्ड किया गया।

जिस आसिफ के लिए बनी अंजना से आइसा, उसके ही परिवार ने किया प्रताड़ित: महिला ने विधानसभा के सामने किया आत्मदाह का प्रयास

उत्तर प्रदेश में विधानसभा के सामने ही एक महिला ने खुद के शरीर में आग लगा कर आत्मदाह का प्रयास किया है। लखनऊ विधानसभा के बाहर महिला द्वारा खुद को आग लगाए जाने के बाद हंगामा मच गया। महिला का शरीर काफी जल गया है, जिसके बाद पुलिस ने उसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया है। निजी अस्पताल में इलाजरत महिला की स्थिति काफी गंभीर है, ऐसा डॉक्टरों ने जानकारी दी है।

‘आजतक’ की खबर के अनुसार, 35 वर्षीय महिला का आरोप है कि महाराजगंज के निवासी अखिलेश तिवारी से उसकी शादी हुई थी जिसके बाद तलाक हो गया। तत्पश्चात महिला ने धर्म परिवर्तन कर आसिफ नाम के युवक से शादी कर ली। बताया गया है कि शादी के बाद आसिफ सऊदी अरब चला गया। महिला ने आसिफ के परिजनों पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है। हाथरस मामले के बीच इस तरह की घटना का सामने आना चर्चा का विषय बन रहा है।

महिला का नाम अंजना तिवारी है। लेकिन, आसिफ के साथ निकाह के बाद उसने अपना नाम बदल कर आइसा रख लिया हुआ था। उसने विधानसभा के गेट पर खुद को आग लगाई। महिला ने जैसे ही खुद को आग लगाई, पुलिस ने जल्दी-जल्दी में वहाँ पहुँच कर उसे बचाया और अस्पताल में ले जाया गया। लखनऊ डीसीपी सेंट्रल सोमेन वर्मा का कहना है कि जाँच शुरू है और इस मामले की तह तक पुलिस पहुँचेगी।

वैसे ये पहला मामला नहीं है, जब किसी ने आत्मदाह का प्रयास किया हो। अमेठी की एक माँ-बेटी ने इसी तरह खुद को आग लगा ली थी। उन दोनों का पड़ोसी से विवाद चल रहा था, जिसका समाधान न निकलने के कारण उन्होंने आत्मदाह कर लिया था। मीडियाकर्मियों ने तब इन दोनों की जान बचाने का प्रयास भी किया था, लेकिन वो असफल हुए। हालाँकि, पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल ज़रूर उठे थे।

पत्रकारों पर हमला और शेखर गुप्ता बॉलीवुड के साथ: कौन सी ‘जर्नलिज्म’ के दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं एडिटर्स गिल्ड के चीफ?

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से बॉलीवुड के काले सच को उजागर करने वाले मीडिया हाउस के पत्रकारों के ख़िलाफ़ कई बॉलीवुड हस्तियों ने याचिका दर्ज की है। ऐसे में कुछ मीडिया गिरोह के लोग भी इन हस्तियों के साथ हैं, जो आम दिनों में तो खुद को पत्रकारिता का संरक्षक बताते हैं मगर जब बात उसके साथ खड़े होने की आती है तो पल्ला झाड़कर दूसरे खेमे में चले जाते हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम पत्रकार शेखर गुप्ता का है।

द प्रिंट के शेखर गुप्ता ने मीडिया जगत के ऊपर फिल्मी हस्तियों को समर्थन देने का चुनाव किया है। शेखर गुप्ता ने लिखा है, “झूठे इल्जामों के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप से कानूनी कार्रवाई बॉलीवुड के लिए टर्निंग प्वाइंट हो सकती हैं। इससे ‘उद्योग’ को एक संस्था की तरह देखने की हिम्मत मिलेगी और एक संस्था की हमेशा रीढ़ होती है।”

दिलचस्प बात यह है कि मीडिया गिरोह का सक्रिय सदस्य होने के अलावा शेखर गुप्ता की पहचान एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के चीफ के रूप में होती है और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया एक ऐसी संस्था है जिसकी स्थापना प्रेस की आजादी की रक्षा करने के लिए हुई थी।

हालाँकि, इसी संस्था के प्रमुख अपने कर्तव्यों को भूलकर बॉलीवुड के फैन बने नजर आ रहे हैं। उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि पत्रकारिता की जगह चाटुकारिता में निहित दायित्वों का निर्वाहन ही अब उनके लिए अभियव्यक्ति की आजादी बन गया है।

अपने प्रतिद्वंदी चैनल या विपरीत विचारधारा के पत्रकार को वह इतना भी नहीं सह पा रहे कि अपने प्रोफेशन का ही लिहाज कर लें। वह खुलकर उसी बॉलीवुड का समर्थन कर रहे हैं जो उनकी ही इंडस्ट्री के लोगों पर उंगली उठा रही है वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्होंने चंद सवाल पूछे।

क्या शेखर गुप्ता बॉलीवुड के इस प्रयास को पत्रकारिता पर हमला नहीं मानते? या वह ठान चुके हैं कि उनकी आइयॉलिजी नैतिकता से और लेफ्ट जर्नलिज्म भारतीय मीडिया, से ऊपर है ।

गौरतलब है कि हाल में फ़िल्मी दुनिया से जुड़े 34 फिल्म निर्माताओं जिसमें अभिनेता और निर्देशक भी शामिल हैं, इन्होंने 4 पत्रकारों के विरुद्ध दिल्ली की उच्च न्यायालय में याचिका दर्ज कराई थी। याचिका मीडिया वालों द्वारा बॉलीवुड पर अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी करने के चलते दायर की गई थी।

इसके बाद ट्विटर पर यूजर्स की प्रतिक्रिया आनी शुरू हुई, इस ख़बर के सामने आते ही ट्विटर पर एक हैशटैग ट्रेंड करने लगा #BoycottBollywood। लोग इस बात को लेकर बॉलीवुड की जम कर आलोचना करने लगे और कुछ ने इसका मजाक भी उड़ाया।

इंडिया टुडे के राहुल कंवल भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूके। अर्नब गोस्वामी के धुर विरोधी राहुल कंवल ने लिखा, “ये अच्छा है कि बॉलीवुड एकजुट होकर जहरीले चैनलों का सामना करने को तैयार है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई अनर्गल आरोप लगाकर आपकी छवि खराब करे और आप खामोश रहें। पगलाए एंकर्स और एडिटर्स को समझना चाहिए कि बिना सबूत किसी पर आरोप लगाने का अंजाम बुरा हो सकता है। ये बहुत पहले हो जाना चाहिए था।” जबकि ये बात उल्लेखनीय है कि सुशांत सिंह राजपूत केस में उनके चैनल आजतक ने ही रिया के काले जादू से लेकर नई-नई रचनात्मक हेडलाइनों से सुशांत के लिए आवाज उठाने का नाटक किया था।

आज शेखर गुप्ता का ऐसा ट्वीट सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स भी उनकी छीछालेदर करने में लगे हैं। आम लोगों तक को मीडिया गिरोह के दोहरे चेहरे का ज्ञान है। लोगों का पूछना है कि यह बेहद हास्यास्पद है कि अभिव्यक्ति की आजादी को तहस-नहस करने वाले बाहर निकल कर आ रहे हैं और बॉलीवुड की सराहना कर रहे हैं ताकि अपने प्रतिद्वंदियों की आवाज को दबा सके। लोगों का कहना है कि यह सब न तो भारतीय पत्रकारिता का हिस्सा है और न फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का।

‘अटल टनल’ से गायब हो गया सोनिया गाँधी के शिलान्यास वाला शिलापट्ट: कॉन्ग्रेस ने दी आंदोलन की धमकी

हिमाचल प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस ने धमकी दी है कि वो राज्य भर में विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। पार्टी का आरोप है कि ‘अटल टनल’ के शिलान्यास से सम्बंधित एक सोनिया गाँधी का भी शिलापट्ट था, जो गायब हो गया है। भाजपा का कहना है कि इसे हटा दिया गया है। रोहतांग पास के नजदीक हाल ही में पीएम मोदी द्वारा देश को समर्पित किए गए ‘अटल टनल’ का काम कई सालों से चल रहा था, जो अभी पूरा हुआ।

साल 2010 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी, तब गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने जून महीने में ‘अटल टनल’ का शिलान्यास किया था। कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौड़ ने कहा है कि पीएम मोदी ने अक्टूबर 3, 2020 को इसका उद्घाटन किया, उससे पहले ही सोनिया गाँधी के नाम वाला शिलान्यास के समय की तख्ती वहाँ से हटा दी गई।

उन्होंने इसके लिए राज्य में जयराम ठाकुर की सरकार और स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही उन्होंने धमकी दी है कि अगर सरकार 15 दिनों के भीतर इस शिलापट्ट को वापस अपनी जगह पर नहीं लगवाती है तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। बताया गया है कि जून 28, 2010 को जब सोनिया गाँधी ने कॉन्ग्रेस नेता वीरभद्र सिंह और पूर्व-मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की उपस्थिति में इसका शिलान्यास किया था।

राठौड़ ने कहा कि वो उस शिलापट्ट को हटाए जाने की सूचना से अवाक् हैं। उन्होंने कहा कि ये सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है कि वो शिलापट्ट जहाँ कहीं भी हो, उसे ढूँढ कर, वापस अपनी जगह पर लगवाएँ। कॉन्ग्रेस पार्टी का कहना है कि उसके कार्यकाल की लाहौल-स्पीति, सोलन और किन्नौर सहित कई जगहों पर लगे शिलापट्ट गायब होने की ख़बरें आ रही हैं। इस मामले में कई FIR भी दर्ज हुए हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी का आरोप है कि तमाम FIR दर्ज करने के बावजूद इन घटनाओं पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। राठौड़ ने आरोप लगाया कि तमाम शिकायतों के बाद भी कोई कार्रवाई न होने बताता है कि सत्ताधारी पार्टी को खुश करने के लिए प्रशासन ये सब कर रहा है। ताज़ा मामले में के जिलाध्यक्ष जियाचेन ठाकुर ने केलांग पुलिस को और ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी मनाली के अध्यक्ष हरि चंद शर्मा ने मनाली पुलिस को इस संबंध में तहरीर दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) को प्रातः 10 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से रोहतांग में 9.02 किलोमीटर लम्बे ‘अटल टनल’ का उद्घाटन किया था। इससे मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर घट गई है, अर्थात 4-5 घंटे कम हो गई है। ये दुनिया की सबसे लम्बी राजमार्ग टनल है, जो पूरे साल मनाली को लाहौल-स्पीति घाटी से जोड़ कर रखेगी। इससे पहले ठंड में बर्फबारी के कारण ये घाटियाँ अलग-थलग हो जाती थीं।

ये टनल हिमालय की पीर पंजाल शृंखला में औसत समुद्र तल (MSL) से 3000 मीटर (10,000 फीट) की ऊँचाई पर अत्याधुनिक तकनीक और संरचनाओं के साथ बनाई गई है। अटल टनल का दक्षिण पोर्टल (SP) मनाली से 25 किलोमीटर दूर 3060 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जबकि इसका उत्तर पोर्टल (NP) लाहौल घाटी में तेलिंगसिस्सुगाँव के पास 3071 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।