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‘अटल टनल’ से गायब हो गया सोनिया गाँधी के शिलान्यास वाला शिलापट्ट: कॉन्ग्रेस ने दी आंदोलन की धमकी

हिमाचल प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस ने धमकी दी है कि वो राज्य भर में विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। पार्टी का आरोप है कि ‘अटल टनल’ के शिलान्यास से सम्बंधित एक सोनिया गाँधी का भी शिलापट्ट था, जो गायब हो गया है। भाजपा का कहना है कि इसे हटा दिया गया है। रोहतांग पास के नजदीक हाल ही में पीएम मोदी द्वारा देश को समर्पित किए गए ‘अटल टनल’ का काम कई सालों से चल रहा था, जो अभी पूरा हुआ।

साल 2010 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी, तब गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने जून महीने में ‘अटल टनल’ का शिलान्यास किया था। कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौड़ ने कहा है कि पीएम मोदी ने अक्टूबर 3, 2020 को इसका उद्घाटन किया, उससे पहले ही सोनिया गाँधी के नाम वाला शिलान्यास के समय की तख्ती वहाँ से हटा दी गई।

उन्होंने इसके लिए राज्य में जयराम ठाकुर की सरकार और स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही उन्होंने धमकी दी है कि अगर सरकार 15 दिनों के भीतर इस शिलापट्ट को वापस अपनी जगह पर नहीं लगवाती है तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। बताया गया है कि जून 28, 2010 को जब सोनिया गाँधी ने कॉन्ग्रेस नेता वीरभद्र सिंह और पूर्व-मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की उपस्थिति में इसका शिलान्यास किया था।

राठौड़ ने कहा कि वो उस शिलापट्ट को हटाए जाने की सूचना से अवाक् हैं। उन्होंने कहा कि ये सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है कि वो शिलापट्ट जहाँ कहीं भी हो, उसे ढूँढ कर, वापस अपनी जगह पर लगवाएँ। कॉन्ग्रेस पार्टी का कहना है कि उसके कार्यकाल की लाहौल-स्पीति, सोलन और किन्नौर सहित कई जगहों पर लगे शिलापट्ट गायब होने की ख़बरें आ रही हैं। इस मामले में कई FIR भी दर्ज हुए हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी का आरोप है कि तमाम FIR दर्ज करने के बावजूद इन घटनाओं पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। राठौड़ ने आरोप लगाया कि तमाम शिकायतों के बाद भी कोई कार्रवाई न होने बताता है कि सत्ताधारी पार्टी को खुश करने के लिए प्रशासन ये सब कर रहा है। ताज़ा मामले में के जिलाध्यक्ष जियाचेन ठाकुर ने केलांग पुलिस को और ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी मनाली के अध्यक्ष हरि चंद शर्मा ने मनाली पुलिस को इस संबंध में तहरीर दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) को प्रातः 10 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से रोहतांग में 9.02 किलोमीटर लम्बे ‘अटल टनल’ का उद्घाटन किया था। इससे मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर घट गई है, अर्थात 4-5 घंटे कम हो गई है। ये दुनिया की सबसे लम्बी राजमार्ग टनल है, जो पूरे साल मनाली को लाहौल-स्पीति घाटी से जोड़ कर रखेगी। इससे पहले ठंड में बर्फबारी के कारण ये घाटियाँ अलग-थलग हो जाती थीं।

ये टनल हिमालय की पीर पंजाल शृंखला में औसत समुद्र तल (MSL) से 3000 मीटर (10,000 फीट) की ऊँचाई पर अत्याधुनिक तकनीक और संरचनाओं के साथ बनाई गई है। अटल टनल का दक्षिण पोर्टल (SP) मनाली से 25 किलोमीटर दूर 3060 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जबकि इसका उत्तर पोर्टल (NP) लाहौल घाटी में तेलिंगसिस्सुगाँव के पास 3071 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

इंग्लैंड के एक छोटे से गाँव से तय हुआ पूरी दुनिया का समय: GMT की शुरुआत से लेकर अब तक की कहानी

ग्रीनविच मीन टाइम (GMT), एक ऐसी इकाई जिससे दुनिया के समय का आकलन लागाया जाता है। आसान शब्दों में इसे औसत समय भी कहा जा सकता है, जिस 24 घंटे की अवधि में पृथ्वी अपनी धुरी पर 360 डिग्री घूमती है। इसका इतिहास वैसे तो काफी पुराना है, इंग्लैंड का एक गाँव है ‘ग्रीनविच’ (Greenwich) जिसके आधार पर इसकी नींव रखी गई। इसके बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि यह धरती के मध्य में स्थित है। हालाँकि, इससे जुड़े तमाम तकनीकी तथ्य हैं, सभी अहम हैं लेकिन सवाल यह है कि कितने समझे जा सकते हैं। 

GMT (Greenwich Mean Time) को सालाना औसत कहा जाता है, जिस अवधि में सूर्य इंग्लैंड स्थित ‘रॉयल ऑब्जर्वेटरी ग्रीनविच’ (Royal Observatory Greenwich) से होकर गुज़रता है। इसे साल 1884 में ठीक आज के दिन ही मान्यता दी गई थी और 1972 तक यह ‘अंतर्राष्ट्रीय सिविल टाइम’ का मानक बन गया था। असल में यह प्रक्रिया शुरू हुई थी 16वीं शताब्दी से जब पेंडुलम का अविष्कार हुआ था। इसके बाद ही समय और सौर मंडल समयावधि (solar time) के बीच सम्बंध पता चला था। 19वीं सदी के दौरान इंग्लैंड के हर शहर का अपना समय होता था, कोई राष्ट्रीय मानक नहीं था नतीजतन कई तरह की परेशानियाँ सामने आती थीं। 

1850 से 1860 के बीच वहाँ रेलवे और व्यापार का विस्तार हुआ, आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी। ऐसे हालातों में वहाँ एक राष्ट्रीय मानक समय की आवश्यकता पड़ी, फिर रेलवे ने ही एक मानक समय (स्टैंडर्ड टाइम) तय किया। अंततः साल 1847 के दिसंबर महीने में ब्रिटिश रेलवे ने GMT स्वीकार किया, जिसे ‘रेलवे टाइम’ भी कहा गया। 1850 के बाद इंग्लैंड स्थित छोटे बड़े शहरों की सार्वजनिक घड़ियों को GMT के आधार पर तय किया गया और 1880 तक इसे पूरी तरह स्वीकृति मिल गई। 

साल 1884 में GMT की ग्रीनविच मेरिडियन को 2 वजहों के चलते बतौर ‘प्राइम मेरिडियन’ (Prime Meridian) स्थापित किया गया। 

पहली, अमेरिका (USA) ने अपने राष्ट्रीय टाइम ज़ोन के आधार पर सब कुछ तय कर लिया था। 

दूसरी, 90 के दशक में दुनिया का लगभग 70 से 75 फ़ीसदी व्यापार और लेन-देन समुद्र तालिका (sea charts) पर निर्भर करता था। यह पहले ही ग्रीनविच को ‘प्राइम मेरिडियन’ के तौर पर स्वीकार कर लिया था। 

इसके अलावा भी एक और वजह थी जिसके आधार पर ग्रीनविच को महत्त्व दिया गया क्योंकि इसका देशांतर (longitude) 0 डिग्री पर था। दलील दी गई कि इससे दुनिया की एक बड़ी आबादी को फायदा होगा। द शेफ़र्ड गेट क्लॉक (The Shepherd Gate Clock) दुनिया की पहली ऐसी घड़ी थी जिसने पहली बार GMT को सार्वजनिक रूप से दिखाया था। इसे ‘स्लेव क्लॉक’ भी कहा जाता है जो रॉयल ऑब्जर्वेटरी स्थित शेफ़र्ड मास्टर क्लॉक से जुड़ी हुई है। वहीं दूसरी तरफ ‘रॉयल ऑब्जर्वेटरी’ को GMT का घर भी कहा जाता है।     

एक और ऐसी चीज़ है जिसके बिना GMT विषय अधूरा है, अन्तराष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Time)। इसके आधार पर दिन तय किए जाते हैं और GMT के आधार पर समय तय किया जाता है। दुनिया में हर देश का अपना अलग टाइम ज़ोन जो इस आधार पर तय किया जाता है कि देशांतर रेखा किस प्रकार या किस स्थिति में उससे होकर गुज़रती है। उदाहरण के लिए भारत में यह रेखा 82.5 डिग्री पर होकर गुज़रती है जिसके आधार पर भारत GMT से 5.30 घंटे आगे है।

GMT से सम्बंधित कुछ और बातें बेहद अहम होती हैं जिसके बिना इसकी कार्यप्रणाली समझना मुश्किल है। इसमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है अक्षांश (latitude) और देशांतर (longitude)। अक्षांश रेखाएं समानांतर (parallel) होती हैं, इनकी दूरी समान होती है, यह पूर्व से पश्चिम की तरफ होती हैं और इनकी कुल संख्या 181 होती है। वहीं देशांतर रेखाएं उत्तर से पश्चिम की तरफ होती हैं, इसकी रेखाओं में दूरी समान नहीं होती है और यह भूमध्य रेखा से भी काफी दूर होती हैं। अंग्रेज़ों के शासनकाल में हमारे देश के 2 टाइम ज़ोन हुआ करता था, पहला कोलकाता के आधार पर और दूसरा मुंबई के आधार पर। उनके जाने के बाद IST (Indian Standard Time) बना, यानी एक देश का एक ही मानक समय होगा। हमारा GMT + 5:30 है यानी ग्रीनविच मीन टाइम से लगभग 5:30 घंटे आगे।       

‘सबके सामने पाँव छुओ, तब SC-ST एक्ट वाला मुकदमा वापस लूँगा’ – सैनिक की पत्नी को जिन्दा जलाने का आरोप

आगरा के ताजगंज स्थित पुष्पा इको सिटी कॉलोनी से एक हृदयविदारक खबर सामने आई है, जहाँ एक सैनिक की पत्नी की आग में जल कर मौत हो गई। हुआ यूँ कि आपसी झगड़े ने जातीय विवाद का रूप ले लिया और एससी-एसटी केस दर्ज होने के बाद मामले को सुलझाने के लिए रविवार (अक्टूबर 11, 2020) को पंचायत बैठी थी। सैनिक का आरोप है कि विरोधी पक्ष ने उसकी पत्नी पर केरोसिन डाल कर आग लगा दी, जिससे उसकी मौत हो गई।

सैनिक अनिल राजावत का परिवार गढ़मुक्तेश्वर का रहने वाला है। उनकी पत्नी संगीता की मृत्यु के बाद घर में 8 वर्षीय दो जुड़वा बेटे पियूष और आयुष हैं। ‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, अनिल ने बताया कि उनके बेटे का कॉलोनी के ही रहने वाले भरत खरे के बेटे से झगड़ा हो गया था। भरत के बेटे के सिर में चोट आई और उसने थाने में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करा दिया।

आरोप है कि पंचायत के दौरान समझौते की बात करते हुए भरत खरे ने अनिल राजावत के परिवार से मुकदमा वापस लेने के एवज में न सिर्फ 10 लाख रुपए की माँग की है बल्कि दोनों पति-पत्नी को सबके सामने पाँव छू कर माफ़ी माँगने को भी कहा। संगीता पाँव छूने के लिए तैयार नहीं हुई और रुपयों पर भी बात नहीं बनी। सैनिक अनिल का कहना है कि इसी दौरान उनकी पत्नी के चीखने की आवाज़ आई।

जब उन्होंने जाकर देखा तो वो आग की लपटों में जल रही थी। संगीता को इसके बाद मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उसे दिल्ली गेट स्थित एक निजी अस्पताल में रेफर कर दिया गया। वहाँ से उसे एसएन इमरजेंसी और वहाँ से दिल्ली के आरआर हॉस्पिटल में रेफर किया गया। रविवार की सुबह साढ़े 9 बजे संगीता की मौत हो गई। अनिल ने भरत पर 10-15 साथियों के साथ मिल कर उनकी पत्नी की हत्या का आरोप लगाया है।

इस मामले में सीओ से भी मिल कर कॉलोनीवासियों ने पूरे मामले से अवगत कराया था लेकिन उनका कहना था कि जब तक मुकदमा दर्ज कराने वाला पक्ष संतुष्ट होकर सहमति नहीं देता, तब तक मुकदमा वापस नहीं किया जा सकता है। कॉलोनी के लोगों का कहना है कि संगीता आग की लपटों से घिरी सड़क पर दौड़ रही थी। उसे बचाने के लिए अनिल भी उससे लिपट गए, जिससे उनका हाथ भी झुलस गया।

कॉलोनी के लोगों का कहना है कि वो घर में खाना भी नहीं बना रहे हैं क्योंकि जिन्दा जलती संगीता की तस्वीर उनके आँखों के सामने से हट नहीं रही है। साथ ही वो एससी-एसटी एक्ट के तहत हुए मुक़दमे को अनिल राजावत के हँसते-खेलते परिवार को बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। भरत खरे और उसके परिवार को पुलिस ने अपनी अभिरक्षा में ले लिया है, क्योंकि पुलिस को डर था कि उन पर आक्रोशित लोगों द्वारा हमला हो सकता है।

‘वो आपके चैनल को बंद कर देंगे… ये नहीं कि TRP के लिए कुछ भी खेलो’ – सलमान का रिपब्लिक TV पर ‘निशाना’

बॉलीवुड एक्टर सलमान खान ने अपने शो बिग बॉस-14 में अर्नब गोस्वामी और उनके चैनल रिपब्लिक टीवी पर टीआरपी मामले को लेकर तंज कसने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि अगर लोग ये सब न करें, तो उनका चैनल बंद हो जाएगा। बता दें इससे पहले रिपब्लिक टीवी ने ड्रग्स मामले व सुशांत सिंह राजपूत केस में सलमान खान को लेकर कई सवाल खड़े किए थे।

‘बिग बॉस 14’ के वीकेंड का वार में सलमान कंटेस्टेंट को टीआरपी को लेकर कुछ बातें कह रहे थे, तभी उन्होंने घर वालों को समझाया कि सिर्फ टीआरपी पाने के लिए वो लोग कुछ न करें, नहीं तो उनका चैनल बंद हो जाएग।

हालाँकि, अपनी बात कहते हुए सलमान खान ने किसी चैनल का जिक्र नहीं किया। मगर, प्रतिभागियों से बात करते हुए उन्होंने कहा:

“बिग बॉस के अंदर या किसी भी शो के अंदर आपको सही खेल खेलना होता है। ये नहीं कि टीआरपी के लिए कुछ भी खेलो। बहुत अच्छा जा रहे हो तुम लोग। पहले दिन से मैंने ऐसा रिस्पॉन्स नहीं देखा। इसे बड़ा और बढ़िया बनाने के लिए इमानदार रहो और रियल रहो। न कि ऐसे कि इसके जरिए ये बकवास कर रहा है, झूठ बोल रहा है, चिल्ला रहा है। प्वाइंट ये नहीं है। वो आपके चैनल को बंद कर देंगे।” आगे सलमान कहते हैं, “जो मुझे कहना था मैंने अप्रत्यक्ष रूप से कह दिया है।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों सोशल मीडिया पर रिपब्लिक टीवी की वीडियो वायरल हुई थी। उसमें गोस्वामी सलमान खान की चुप्पी पर सवाल उठा रहे थे। इसके अलावा वह फिल्म इंडस्ट्री के लोगों के ख़िलाफ़ भी सवाल खड़े कर रहे थे और पूछ रहे थे कि अब सलमान कहाँ हैं?

इसके बाद जब टीआरपी स्कैम का मामला उछला तो रिपब्लिक टीवी के अधिकांश विरोधी मोर्चे पर आ गए। सबने खुल कर मीडिया संस्थान के ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया और उसकी नीति पर सवाल भी उठाने लगे।

हालाँकि रिपब्लिक टीवी ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों का खंडन किया और कहा कि वह इस लड़ाई को कानूनी रूप से लड़ने को तैयार हैं, उनका इस मामले में दर्ज एफआईआऱ में नाम भी नहीं है, मगर मुंबई पुलिस जानबूझकर उन्हें घेर रही है।

Tanishq Vs गदर: सिनेमा हॉल पर 500 की भीड़ का पेट्रोल बम से हमला, पलट गई थीं शबाना आज़मी

कुछ ही दिन पहले की बात है जब “कौन बनेगा करोड़पति” में स्वदेशी आन्दोलन के बारे में पूछा गया था। हमारा सामान्य ज्ञान भी कम है, और हम इतिहास के छात्र भी नहीं थे, तो जवाब हमें मालूम नहीं था। लेकिन, किन्तु, परन्तु, हमें ऐसे वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) सवालों को हल करने का एक दूसरा तरीका जरूर पता था। अगर सही जवाब पता हो तो सीधे वो बताया जा सकता है, लेकिन साथ ही अगर गलत जवाबों को काटते जाएँ तो अंत में जो बचेगा, वो सही जवाब होगा। तो हमने दूसरे वाले तरीके से सवाल हल करना शुरू किया।

“चंपारण सत्याग्रह” पर एक मित्र ने किताब लिखी है, इसलिए हमें पता था कि वो 1917 के दौर की घटना थी। पटना की प्रसिद्ध सप्त मूर्ति में “भारत छोड़ो” आन्दोलन के दौरान वीरगति को प्राप्त हुतात्माओं की मूर्तियाँ हैं, इसलिए हमें उसका भी पता था। सही जवाब 1906 ही हो सकता था। इसी “स्वदेशी आन्दोलन” की याद में भारत में 7 अगस्त 2015 से “राष्ट्रीय हथकरघा दिवस” भी मनाया जाता है। इस दौर में जब विदेशी कपड़ों का बहिष्कार शुरू हुआ तब अधिकांश भारतीय कैसी स्थिति में रहे होंगे? क्या वो बड़े अमीर थे? नहीं, भारत आर्थिक संकटों, फिरंगी शासन/शोषण, अकाल जैसी अनेकों समस्याओं से जूझ रहा था।

मिल के बने हुए कपड़े उन्हें सस्ते ही मिल जाते, मगर उसका बहिष्कार करके भारतीय लोगों ने स्वदेशी को अपनाया था। इसलिए आज जब कोई तथाकथिक लेखक/लेखिकाएँ कहते हैं कि “जिनकी स्वर्ण खरीदने की औकात ही नहीं, वो तनिष्क का बहिष्कार ना करें” तो भारत की उनकी समझ पर हँसी आती है। बात सिर्फ उनके बोलने तक ही रुकी रहती तो कोई बात नहीं थी। खुद को गाँधी की विरासत ढोने वाली पार्टी कहने वाले कॉन्ग्रेस के नेतागण भी एक अहिंसक सत्याग्रह के खिलाफ उतर आए। ये दोमुँहे साँप बताने लगे कि सही क्या है, गलत क्या है!

ऐसे कमजोर याददाश्त वाले लोगों की याददाश्त को दुरुस्त किया जाना भी जरूरी है। करीब बीस साल पहले (2001 में) एक फिल्म आई थी “गदर: एक प्रेमकथा”। वैसे तो इसे फिल्म के संगीत और बँटवारे पर बनी फिल्म होने के लिए भी याद किया जाता है, लेकिन “बाहुबली” के आने से पहले तक ये भारत में सबसे ज्यादा देखी गई फिल्म भी थी। फिल्म के मुख्य किरदार के रूप में सन्नी देओल का हैण्ड-पंप उखाड़ लेने वाला दृश्य लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा। इस फिल्म की कहानी एक सिख व्यक्ति के अपनी मुस्लिम पत्नी को वापस लाने की जद्दोजहद की कहानी है।

नायक सिख और नायिका सकीना होगी, तो जाहिर है विवाद तो होना ही था! भोपाल में एक स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेता आरिफ मसूद ने पुलिस से मिलकर बताया भी था कि अगर इस फिल्म का प्रदर्शन जारी रहा तो लिली टॉकीज (भोपाल का वो इकलौता सिनेमाघर, जहाँ “ग़दर” दिखाई जा रही थी) को नेस्तोनाबूद कर दिया जाएगा। सिनेमाघर की सुरक्षा के लिए करीब सौ पुलिसकर्मी तैनात थे। उन पर करीब 500 की इस्लामिक भीड़ ने पेट्रोल बम और धारदार हथियारों से लैस होकर हमला कर दिया। वहाँ मौजूद कई वाहन जला दिए गए, एक पुलिसकर्मी का हाथ काट लेने की कोशिश हुई।

इतनी बड़ी, हथियारबंद इस्लामिक भीड़ को काबू में लेना मुश्किल था। आँसू गैस के गोले दागने पर भी पुलिस को पीछे हटना पड़ा। हमलावर इस्लामिक भीड़ को पीछे तब हटना पड़ा, जब सिनेमाघर के अन्दर बाहर चल रहे दंगों से बेखबर लोगों का शो ख़त्म हुआ। ये आठ सौ लोग जब बाहर आए, तब कहीं जाकर इस्लामिक दंगाइयों को खदेड़ा जा सका। मामला सीधे-सीधे दंगे का भी नहीं था। असल में इसका आरोपित आरिफ मसूद स्थानीय आरिफ अकील और पूर्व सांसद गुफरान आलम के हाथ से इस किस्म के हिंसक आंदोलनों की अगुवाई छीनना भी चाहता था

अहमदाबाद और गाँधीनगर में भी इस फिल्म को लेकर दंगे जैसा माहौल तैयार था। इस्लामिक भीड़ के हमले के डर से वहाँ के संगम थिएटर के मालिक ने पुलिस सुरक्षा माँगी। दो दिनों तक संगम थिएटर में फिल्म का प्रदर्शन बंद रहा और पुलिस सुरक्षा मिलने पर इसका प्रदर्शन फिर से शुरू किया जा सका। इस फिल्म के बारे में बोलते हुए लोग कैसे दोहरे मापदंड अपनाते हैं, उसका प्रदर्शन भी ‘इंडिया टुडे’ ने कर डाला था।

करीब-करीब उसी दौर में “फायर” फिल्म पर विवाद हुआ था जिस पर शबाना आज़मी ने कहा था “एक स्वस्थ समाज को विरोधाभासी विचारों का भी स्वागत करना चाहिए”। जब मामला ग़दर का आया तो वो पलट गईं और कहने लगी, “ये अफवाहों को प्रश्रय देती फिल्म है, मगर बन गई है तो दिखा दो”!

ये दोमुँहापन फिल्म इंडस्ट्री और तथाकथित “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के पैरोकारों के लिए कोई नई बात भी नहीं थी। तनिष्क के प्रचार के आने और फिर उसके वापस लिए जाने पर लोग ये भी दिखाने लगे हैं कि इसे बनाने वाले लोग कौन थे। हालाँकि, ये वीडियो अब यूट्यूब से हटा लिया गया है, मगर कई लोगों ने स्क्रीनशॉट सहेज लिए हैं।

संभव है कि इस प्रचार के मुद्दे को, “सांस्कृतिक उपनिवेशवाद” के पैरोकार, भारतीय लोगों को नीचा दिखने के लिए इस्तेमाल किया जाए। इस किस्म के औजारों के बारे में एडवर्ड सेड ने अपनी किताब “ओरिएण्टलिज्म” में विस्तार से लिखा है। लम्बे समय से इस किस्म के हिंसक और बौद्धिक आक्रमण झेलती भारतीय सभ्यता को अब इनका प्रतिरोध करना भी आ गया है।

बाकी विरोध दर्ज करवाना जारी रखिए, अगर खरीदार हम हैं तो व्यापारियों को खरीदारों की पसंद से चलना होगा। ग्राहक को देवता तो गाँधीजी भी कहा करते थे ना?

‘मुस्लिमों को स्वीकारना होगा कि हिन्दू हैं उच्चतर’ – ‘इंडिया टुडे’ को मोहन भागवत पर फेक न्यूज के लिए NCM का नोटिस

‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM)’ द्वारा ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ को नोटिस भेजा गया है। एनजीओ संचालक आरपी सिंह द्वारा की गई शिकायत के आधार पर NCM ने ये कार्रवाई की है। ‘इंडिया टुडे’ ने सरसंघचालक मोहन भागवत के एक बयान को लेकर ट्वीट किया था, जिसे भ्रामक बताते हुए आरपी सिंह ने NCM से शिकायत की थी। अब ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग’ ने इस पर जवाब देने के लिए ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ को 15 दिनों का समय दिया है।

NCM के सदस्य आतिफ रशीद द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ से कहा है कि वो इस मामले में 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपे, ताकि इसे आयोग के समक्ष आगे की कार्रवाई के लिए रखा जा सके। दरअसल, ‘इंडिया टुडे’ ने दावा किया था कि RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि हमारा संविधान ये कभी नहीं कहता है कि भारत में सिर्फ हिन्दू ही रह सकते हैं, इसीलिए यहाँ केवल हिन्दुओं की सुनी जाएगी और अगर मुस्लिम यहाँ रहना चाहते हैं तो उन्हें उच्चतर मानना पड़ेगा।

आरपी सिंह ने इसे फेक न्यूज़ बताते हुए कहा था कि ये खबर सांप्रदायिक सद्भाव को भंग करने वाला है। उन्होंने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी से इस ‘फेक न्यूज़’ को लेकर माफ़ी माँगने को कहा था। हालाँकि, ‘इंडिया टुडे’ ने इस ट्वीट को डिलीट कर दिया है। आरपी सिंह ने जो वीडियो ट्वीट किया, उसमें मोहन भागवत कहते दिख रहे हैं कि भारत का संविधान सबके लिए है।

उन्होंने कहा था कि जब बँटवारा हुआ तो इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान का गठन हो गया लेकिन भारत में ऐसा कुछ भी नहीं था कि यहाँ सब कुछ हिन्दुओं के लिए ही है, यहाँ का संविधान तो सबके लिए था। जबकि ‘इंडिया टुडे’ की खबर में इसके उलट बताया गया था। अब इसकी शिकायत के बाद NCM ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ को नोटिस जारी कर के 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का आदेश दिया है।

‘हाजिर हों वरना सुनाया जाएगा एकपक्षीय फैसला’: सुशांत मामले में करण जौहर व एकता कपूर समेत 7 को कोर्ट नोटिस

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में मुजफ्फरपुर की अदालत ने करण जौहर और एकता कपूर समेत 7 फ़िल्मी हस्तियों को नोटिस जारी किया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश राकेश मालवीय की अदालत ने आदेश जारी किया है कि ये सभी अक्टूबर 21, 2020 तक हाजिर हों, या फिर अपने वकीलों के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराएँ। इन दोनों के अलावा आदित्य चोपड़ा, संजय लीला भंसाली, साजिद नाडियावाला, एकता कपूर, भूषण कुमार और दिनेश विजया को भी नोटिस भेजा गया है।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के 3 दिनों बाद अधिवक्ता सुधीर ओझा ने 17 जून को ही इस मामले में मामला दायर किया था। उन्होंने सलमान खान सहित इन फ़िल्मी हस्तियों को सुशांत की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया था। तब सीजेएम की अदालत ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया था। इसके बाद उन्होंने मुजफ्फरपुर के जिला अदालत में रिवीजन याचिका दायर की, जो स्वीकृत हो गई।

7 अक्टूबर को अभिनेता सलमान खान ने अपने वकील के माध्यम से अदालत में उपस्थिति दर्ज कराई थी। लेकिन, बाकी सातों हस्तियॉं गैर-हाजिर थीं, जिसके लिए उन्हें अब हाजिर होने के लिए कहा गया है। सुधीर ओझा का आरोप है कि इन लोगों ने साजिश के तहत सुशांत की सारी फ़िल्में छीन लीं, जिसके बाद वो अवसादग्रसित हो गए और उन्होंने आत्महत्या कर ली। अधिवक्ता ओझा ने कहा कि सभी आरोपितों को अपना पक्ष रखने के लिए अदालत में हाजिर होना पड़ेगा।

अदालत ने चेताया है कि अगर ये लोग अदालत में हाजिरी नहीं दर्ज कराते हैं तो इस मामले में एकपक्षीय सुनवाई कर के फैसला जारी किया जा सकता है। शिकायतकर्ता ओझा ने भी कहा है कि इनकी या इनके वकीलों की उपस्थिति के बाद ही सुनवाई आगे बढ़ सकेगी। सलमान खान की तरफ से उनके वकील साकेत तिवारी कोर्ट में पेश हुए थे। इन सभी आरोपितों पर सुशांत को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया गया है।

बता दें कि इधर फ़िल्मी दुनिया से जुड़े 34 फिल्म निर्माताओं जिसमें अभिनेता और निर्देशक भी शामिल हैं, इन्होंने 4 पत्रकारों के विरुद्ध दिल्ली की उच्च न्यायालय में याचिका दर्ज कराई है। याचिका मीडिया वालों द्वारा बॉलीवुड पर अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी करने के चलते दायर की गई थी। याचिका दर्ज कराने वालों में शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, करण जौहर, फरहान अख्तर, अजय देवगन, अक्षय कुमार, अनिल कपूर, ज़ोया अख्तर, आदित्य चोपड़ा, सोहेल खान, विशाल भारद्वाज, विनोद चोपड़ा, रोहित शेट्टी, राकेश ओम प्रकाश मेहरा, कबीर खान, साजिद नाडियावाला, अरबाज़ खान समेत अन्य के बैनर शामिल हैं।

हिन्दुओं को कोने में ढकेलना बंद करो, 101वीं गलती पर सुदर्शन चले तो तहजीब की गजलें मत गाना

पाकिस्तान को ले कर एक छद्मयुद्ध नीति की बात कई बार सुनाई देती है: ‘ब्लीड इंडिया विद अ थाउजेंड कट्स’। इसका मतलब यह है कि इस्लामी पाकिस्तान के बापों के बूते में कभी नहीं था कि वो भारत को किसी पारम्परिक युद्ध में हरा दें, तो उन्होंने नायाब तरकीब निकाली कि इनके सैनिकों, नागरिकों और संस्थाओं को एक-एक कर, हर महीने, दो महीने पर आतंकी हमलों से, स्लीपर सेल को क्रियान्वित कर के अपने निशाने पर रखना। ये नीति काफी हद तक सफल भी रही क्योंकि हमारे नेताओं को ये लगता रहा कि पाकिस्तान को जवाब देने से मजहब विशेष वाला भारतीय वोट बैंक नाराज हो जाएगा।

अब इसी छद्मयुद्ध नीति को आप भारत के स्कोडा-लहसुन तहजीब वाली नौटंकी में उर्दू अनुवाद कर दीजिए। गजवा-ए-हिन्द का सपना पाले कितने मुल्ले-मौलवी मस्जिदों में, कितने दशकों से खास समुदाय के भीतर जहर घोल रहे हैं, ये भी कुछ छुपा नहीं है। जिहाद की अलग-अलग वरायटी आ गई है जिसमें कल तक का ‘लव जिहाद’ अब एक चरण ऊपर बढ़ कर ‘रेप जिहाद’ का रूप ले चुका है।

‘लव जिहाद’ में हिन्दू लड़कियों को व्यवस्थित और संस्थागत तरीकों से फँसाना, मतपरिवर्तन कराना और एक समय के बाद उन्हें छोड़ देना, एक तय तरीका हुआ करता था। अब ‘रेप जिहाद’ में प्रेम के नाम पर हिन्दू लड़की को फँसाना, उसे विश्वास दिलाने के बाद कहीं अकेले में बुलाना, दोस्तों को साथ सामूहिक बलात्कार करवाने से ले कर, निकाह के बाद अपने बाप, भाई, चाचा आदि के साथ सोने को मजबूर करना आम बात हो चुकी है।

इसके बाद हिन्दू लड़की न तो अपने पिता के घर वापस जा सकती है, न उस पूर्णकालिक बलात्कारी परिवारी में ठहर सकती है। पहला परिवार उसके इसी कृत्य से समाज से बहिष्कृत या तिरस्कृत हो चुका होता है, और वापस आने की संभावना पर तत्क्षण ही ताला लग जाता है। बाद में, लड़की के पास आत्महत्या के अलावा और कोई राह नहीं दिखती। इससे एक समुदाय अपने लक्ष्य को हर दिन एक कदम बढ़ा पाते हुए देखता है।

यह तो एक बिंदु है इस सर्वकालिक मजहबी छद्मयुद्ध का। आप गौर कीजिए कि ये घटनाएँ सामूहिक तौर पर नहीं होतीं, ये छिट-पुट होती हैं। हम और आप किसी अखबार में या पोर्टल पर तीन सौ शब्दों की एक खबर या दस शब्दों की हेडलाइन पढ़ कर दुखी हो लेते हैं। लगता है कि ‘कहीं हुआ है, गलत हुआ है।’ इसके आगे हम जाते नहीं, या जरूरत नहीं समझते।

इसी संदर्भ में दूसरी तरह की घटनाएँ जो सामने आती हैं वो हैं हिन्दुओं की भीड़ हत्या, यानी लिंचिंग की। दुर्भाग्य से इस देश में लिंचिंग के नाम पर अखलाक और तबरेज ही याद आते हैं, जबकि स्वतंत्र समूहों द्वारा इकट्ठे आँकड़ों की बात करूँ तो पिछले पाँच सालों में सिर्फ दिल्ली में छः लिंचिंग हो चुकी हैं जिसमें हाल का राहुल हत्याकांड, ध्रुव त्यागी की क्रूर हत्या, अंकित सक्सेना की नृशंस हत्या, ई-रिक्शाचालक रविन्दर, डॉक्टर नारंग की लिंचिंग आदि शामिल है। पूरे देश की बात करें तो पिछले कुछ सालों में यह आँकड़ा 70 से ज्यादा बताया जाता है।

इन आँकड़ों में पालघर के साधु भी हैं, अयोध्या के साधु हैं, तमिलनाडु के वी रामालिंगम हैं, इन्स्पेक्टर सुबोध सिंह हैं, मथुरा के लस्सी विक्रेता भारत यादव हैं, गौतस्करों द्वारा की गई बीस से ज्यादा हिन्दुओं की हत्याएँ हैं। हर हत्या के पीछे हिन्दूघृणा के अलावा और कोई कारण नहीं। बीफ माफिया ने लगातार गाय-बछड़ों की तस्करी की राह में आने वाले पुलिसकर्मियों और हिन्दू गौरक्षकों की हत्याएँ की हैं।

लेकिन ये सारी खबरें अंतरराष्ट्रीय खबरें नहीं बनतीं। ये खबरें ऑपइंडिया जैसी गिनती की तीन-चार संस्थाएँ प्रमुखता से चलाती हैं। जब आप इन मृत हिन्दुओं की लाशें गिनेंगे, और आतंकी हमलों या मुठभेड़ों में बलिदान हुए सैनिकों के आँकड़े गिनेंगे तो यह संख्या मजहबी दंगों में हुई मौतों और भारत-पाकिस्तान युद्ध में हुई मौतों से ज्यादा हैं।

कमाल की बात यह है कि इनके छिटपुट होने के कारण, कोई इसका निहितार्थ नहीं समझ पाता। सबको लगता है कि ये सामाजिक अपराध है, जबकि ये विशुद्ध मजहबी अपराध है क्योंकि हर बार मारने वाली भीड़ मजहबी होती है, मरने वाला हिन्दू। हर बार मारने वाले आतंकी पाकिस्तान समर्थक समुदाय विशेष वाले होते हैं, और मरने वाले भारतीय सैनिक। आप सोचिए कि युद्धकाल से ज्यादा लोग शांतिकाल में बलिदान हो रहे हैं!

ब्लीडिंग हिन्दूज़ विद थाउजेंड कट्स

भारत के भीतर इस्लामी कट्टरपंथियों की यही नीति ‘ब्लीडिंग इंडिया विद थाउजेंड कट्स’, ‘ब्लीडिंग हिन्दूज़ विद थाउजेंड कट्स’ में बदल जाता है। इस्लामी कट्टरपंथियों के बारे में कहा जाता है कि वो तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जीतेंगे नहीं, और आप यहाँ सोच रहे हैं कि दस साल अगर यह सरकार रही तो इस पर लगाम लग जाएगा। नहीं! वो संभव ही नहीं। ये समस्या ही अलग है जो कि सरकार के वश की नहीं है क्योंकि सरकारों के बदलने में मात्र पाँच साल लगता है।

मोदी के आते ही पाकिस्तानी हमलों का जवाब मिलने लगा, और तब यहाँ की लिब्रांडू लॉबी सबूत माँगने लगी। अचानक से हर महीने होने वाले सीरियल ब्लास्ट, मार्केट के ब्लास्ट, मंदिरों के धमाके कैसे खत्म हो गए? ये खत्म नहीं हुए हैं, भारत में बसे मिनी पाकिस्तानों ने थोड़े समय के लिए सुसुप्तावस्था को चुना है। वो जानते हैं कि कभी तो दूसरी सरकार आएगी, तब पाकिस्तान का अजेंडा बम फोड़ कर चलाएँगे।

और, जब तक मन की सरकार नहीं आती, तब तक लव और रेप जिहाद से, मॉब लिंचिंग से इनका मतलब सधता जा रहा है। मीडिया का एक हिस्सा ही नहीं, मीडिया का लगभग हर हिस्सा हिन्दुओं की हत्या पर चुप रहता है। इसके उलट, कई बार फेक न्यूज पर भी मीडिया के वही लोग इतना बवाल कर देते हैं कि भारत दुनिया का रेप कैपिटल कहा जाने लगता है।

इनकी जड़ें गहरी भी हैं, इन्टरकॉन्टिनेन्टल भी हैं, और मीडिया में इन्होंने अपने लिए सहानुभूति वाले लोग भी पाल रखे हैं। सहानुभूति दर्शाने वाले ये वो दोगले हैं जो गोमांस खा कर, सोशल मीडिया पर फोटो लगा कर शेयर करते हैं, लेकिन किसी ने चाँद-तारा पर कुछ कह दिया, किसी ने कहा कि तब्लीगी जमात ने भारत में कोरोना फैलाया है, तो इनकी अधोजटाएँ सुलगने लगती हैं और स्थान विशेष से धुँआ निकलने लगता है।

हिन्दू की बहू-बेटियों को छेड़ना, जहाँ भी ये बहुसंख्यक हैं, वहाँ हिन्दुओं का जीना हराम कर देना, कश्मीर से कैराना, मेवात से ले कर दिल्ली के मोहनपुरी तक इन्होंने हिन्दुओं को इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया है। लोग अपने घरों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिख कर जा रहे हैं। सरकार ऐसे मामलों में ‘पुनर्वास’ योजना बना सकती है, लेकिन इस कट्टरपंथी मानसिकता से निपटना तो उन्हें ही है, जिन्हें वहीं रहना है।

इनके छोटे-छोटे हजार घाव की रणनीति बहुत सही रंग ला रही है। जानकारों से बात करने पर पता चलता है कि जिन इलाकों में इनका वर्चस्व ज्यादा है, वहाँ के स्थानीय प्रशासन को ये इतना पैसा खिला देते हैं कि थानों में कर्मचारियों के हिन्दू होने का बाद भी, और अपराध के बिलकुल ही हिन्दू-विरोधी होने के बाद भी, वही थानाध्यक्ष कोई एक्शन नहीं लेता।

न तो इस देश में अल्पसंख्यक की डुगडुगी के नाम पर किसी सरकार में इतनी कुव्वत हुई है कि बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में बलात्कार के आरोपितों के धर्म-मजहब के आँकड़े दें। जबकि, संस्थागत बलात्कारों में ‘मौलवी ने किया मदरसे में रेप’ की खबरें इतनी आम हैं कि लोग पढ़ते भी नहीं। जब पीड़िता की जाति बताई जा सकती है कि वो सवर्ण है कि दलित, तो फिर अपराधी की जाति और मजहब क्यों नहीं बता सकते?

कम से कम, समाजशास्त्रियों के पास इन आँकड़ों को पढ़ने के बाद इस समस्या से निपटने के लिए कोई तरीका तो निकल पाएगा। हाल ही में, दो साल पुराना एक वीडियो दोबारा चर्चा में आया जहाँ एक छोटा बच्चा बता रहा था कि मदरसे में मौलवी सारे बच्चों को किस तरह से हिन्दू बच्चियों के साथ छेड़-छाड़ और ‘गलत काम’ करने के लिए उकसाता है। वीडियो की तारीख से फर्क नहीं पड़ता, फर्क इससे पड़ता है कि इन्हीं मदरसों को सरकारी फंड मिलते रहे हैं।

कितने मदरसों की ऑडिट होती है? कितने मदरसों के बच्चों से पूछा जाता है कि वहाँ उनका यौन शोषण होता है कि नहीं? कितनी बच्चियों से पूछा जाता है कि मदरसे का मौलवी उसके साथ किस तरह की हरकतें करता है? क्या ऐसी कोई व्यवस्था है?

ये जहर जब बचपन से भरा जा रहा है, तो वो लड़का हिन्दू लड़कियों से प्रेम कहाँ से करेगा? उसके लिए तो हर लड़की बलात्कार के योग्य है। इसलिए, वो चाहे प्रेम करे, निकाह करे, या राह चलते मदद की पेशकश, करेगा तो वो बलात्कार ही। वही सीखा है उसने। इसीलिए, जब चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी वहाँ के कट्टरपंथियों के लिए ‘री-एजुकेशन’ की बात करती है, तो लगता है कि सही काम हो रहा है, बाकी देशों को भी इस कैंसर के बारे में आधारभूत स्तर पर ऐसी ही नीति लानी चाहिए। चीन तो खुल कर कहता है कि ये मजहब एक रोग है, और इसका उपचार अत्यावश्यक है।

गंगा-जमुनी तहजीब का ढकोसला

आज के समय में जब लव और रेप जिहाद एक वास्तविकता है, तनिष्क जैसे ब्रांड आज भी स्कोडा-लहसुन तहजीब के नाम पर एक मजहबी परिवार में एक हिन्दू लड़की की गोदभराई की रस्म निभाते दिखा रहे हैं। जबकि कठोर सत्य यह है कि सिवाय सामूहिक बलात्कार और काले बुर्के के हिन्दू लड़कियों को ऐसे कट्टरपंथी परिवारों में और कुछ भी नहीं मिलता। कभी सर्फ एक्सेल होली पर हिन्दुओं को ज्ञान दे देता है, कभी कोई चाय का ब्रांड ऐसे समभाव पर विज्ञापन बनाता है जिसकी धरातली वास्तविकता उतनी ही संदिग्ध है जितना धरती का चपटा होना।

ये तहजीब ऐसा फरेब का जाल है जिसके बारे में किसी से पूछो कि ये क्या नौटंकी है, तो बोल देगा, “ऐसे ही, बोलने में सेक्सी लग रहा था।” इसके आगे उनके पास एक ऐसा उदाहरण नहीं होगा जहाँ इस तहजीब की बत्ती इन मजहबी कट्टरपंथियों ने बनाई हो। जब गंगा और जमुना दोनों हमारी हैं, तो तुम्हारा योगदान इसमें है क्या? तुमने तो और जमुना को रेंट पर ले कर उसको सुखा दिया जहर बहा-बहा कर। हम प्रयागराज संगम में इसको जीवित करने का हर प्रयास करते रहे लेकिन तुमने दिल्ली से ले कर उत्तर प्रदेश तक इसमें अंकित शर्मा, रतनलाल, दिनेश खटीक, राहुल सोलंकी, कमलेश तिवारी जैसों की लाशें बहाई हैं।

इनके रक्त की धारा पहली लाश से निकल कर, यमुना की विशाल धारा में भले ही खो जाएँगीं, लेकिन उसमें तो इन्होंने जगह-जगह हिन्दुओं की लाशों के बूचड़खाने बना रखे हैं। पानी डाल्यूट अवश्य करता है लेकिन जब जल से ज्यादा रक्त की मात्रा हो जाए, ऊपर से तुम्हारा मजहबी जहर कभी हिन्दुओं के बलात्कार तो कभी लव जिहाद के रूप में रिसता रहे, तो तहजीब का आधा हिस्सा तो मृतप्राय ही होगा ना। तो, तुमने तो हमसे जमुना उधार ले कर, उसको बर्बाद कर दिया। हम क्यों ढोते रहें तुम्हारी हिन्दूघृणा को?

रेगिस्तान में जन्मे, हिन्दुस्तान में डर के मारे कन्वर्ट हुए लोग मुगलई व्यंजनों की दुहाई देते हैं। जिसने बाप जनम में चावल देखा न हो, लौंग और इलायची का नाम न सुना हो, वो भारत को बिरयानी दे कर गए हैं! जब इस्लाम और ईसाईयत पत्थर और भालों से अपने मजहबी उन्माद में सर काट रहे थे, तब हमारे यहाँ विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दी जा रही थी। मतलब, भारत के मंदिरों के एक पिलर जितनी नक्काशी किसी भी चोर मुगलिया ढाँचे में नहीं दिखती, लेकिन ‘मुगल नहीं होते तो ताजमहल नहीं होता’ की दुहाई दे कर आहें भरने वालों की कमी नहीं।

लुटेरे, बलात्कारियों, हत्यारों, बच्चाबाजों को आदर्श मानने वालों से और आशा भी क्या की जा सकती है! जहाँ संभव होता है, वहाँ से हिन्दुओं को ‘परोक्ष आक्रात्मकता’ दिखा कर, भगा देते हैं। आप सोचिए कि जहाँ इनकी आबादी ज्यादा है, वहाँ ये खुल्लमखुल्ला हिन्दुओं की बहू-बेटियों को छेड़ते हैं, नंगे हो कर भद्दे इशारे करते हैं, कहते हैं कि मंदिर में हनुमान चालीसा मत बजाओ… ये हाल दिल्ली का है, जहाँ मैं खुद लोगों से मिल कर, बात कर के आया हूँ।

लेकिन हिन्दू कब तक सहेगा?

अगर, मेवात से गाँव के गाँव हिन्दूविहीन कर दिए जाएँगे, कैराना जैसी दीवारें दिल्ली के मोहनपुरी में दिखने लगेंगी तो हिन्दू करेगा क्या? चूँकि हमारी जनसंख्या अधिक है इसलिए जवाहर जैसे लोगों ने हिन्दुओं को स्वतः दुष्ट मान कर अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था कर दी। बीच में मनमोहन काल में मजहबी दंगों में अल्पसंख्यकों को गिरफ्तारी से पूरी छूट की व्यवस्था सोनिया की अध्यक्षता में ड्राफ्ट किए गए ‘कम्यूनल वायलेंस बिल’ में कर दी गई थी।

आप यह सोचिए कि अगर 2011 मे यह विधेयक कानून बन जाता तो, दिल्ली दंगों का पूरा भार उन्हीं हिन्दुओं के ऊपर आता जिन्हें मारने की योजना दिसंबर 2019 से बन रही थी, और उत्तर-पूर्व दिल्ली के भजनपुरा, मौजपुर, जाफराबाद, चाँदबाग आदि इलाकों में घरों की छतों पर पेट्रोल बम, ईंट-पत्थर, एसिड की बोतलें, आग लगाने के लिए गुलेल की व्यवस्था थी।

जब पूरा तंत्र एक समुदाय की सहिष्णुता का फायदा उठाने लगता हो, इतिहास बदल देता हो, उनके ऊपर किए अपराधों की उपेक्षा करता हो, और चोरों की पिटाई को अंतरराष्ट्रीय खबर बना देता हो, तब सहिष्णुता भी अपनी सीमा तो तलाशेगी ही। हो सकता है कि हिन्दू अभी भी न जगे, प्रतिकार न करे, लेकिन उसे यह याद रखना चाहिए कि उसी के 59 बंधु-बांधवों को एक मजहबी भीड़ ने जिंदा जला दिया, फिर दंगे भी किए, और हिन्दुओं की जानें ली… मन नहीं भरा तो दंगों का अपराध भी हिन्दुओं के ही सर मढ़ दिया।

यही दुष्कृत्य दोबारा दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों के समय दोहराने की कोशिश हुई, लेकिन जागरूक लोगों ने इसका सामना किया और आज तमाम दंगाइयों पर केस चल रहे हैं।

लाशें गिनोगे तो बेशक एक मजहब के लोगों की लाशें ज्यादा मिलेंगी। उसका एक ही कारण है, कि भले ही एक छोटे इलाके में दंगा करने वाले मजहबी कट्टरपंथी को लगता है कि उन्होंने हिन्दुओं को घेर रखा है, लेकिन वो यह भूल जाते हैं कि उनका छोटा इलाका भी किसी बड़े इलाके के बीच में ही है। इसीलिए, हर दंगे में तैयारी तो उनकी बहुत ही सूक्ष्म स्तर तक की होती है, पहले दो दिन उत्पात भी वही मचाते हैं लेकिन अंततः विशुद्ध संख्याबल के कारण हिन्दू उठता है, आत्मरक्षा के लिए बाहर निकलता है और दंगों को खत्म करता है।

इन दंगों से अगर एक सीख और उम्मीद दिखती है तो वो यही है कि ऐसी तैयारी के बावजूद मजहबी दंगों का खात्मा यही सहिष्णु समाज करता है क्योंकि विधर्मियों के दंगे न सिर्फ प्रायोजित होते हैं, बल्कि वो दंगों की आड़ में भी अपनी काम-वासना का प्रदर्शन करना नहीं भूलते। हत्या करना तो सिर्फ एक तह है, क्रूर हत्या के माध्यम से संदेश देना, बलात्कार करना इनके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में उतरा हुआ है। इसलिए, इनके द्वारा किए गए दंगों में भी विसंगतियाँ और विकृतियाँ दिखती हैं जिसे देख कर सामान्य व्यक्ति सोचता है कि दंगे हुए हैं या फिर चिह्नित कर के अपना जहर फैलाया गया है?

हिन्दुओं के घरों, दुकानों, और बैंग्लोर दंगों को याद करें तो कारों तक की, जानकारी लेने के बाद, तकनीक के उपयोग के साथ इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ें हिन्दुओं को काटने उतरती हैं। फिर ये ह्यूमन चेन की नौटंकी करते हैं कि मंदिर बचा रहे हैं। अबे साले! माफ कीजिएगा, गुस्से में इधर-उधर निकल जाता हूँ… जिनके पूर्वजों ने 40,000 से ज्यादा बड़े मंदिर गिराए हैं, जिन्हें बचपन से ही हिन्दूघृणा सिखाई जाती है, वो मंदिर की रक्षा करेंगे? #₹& समझ रखा है क्या?

समय वह नहीं रहा कि कन्याकुमारी में किसी मूर्ति को ढक देने पर कश्मीर के हिन्दू को फर्क नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि समय वह है कि फिलिस्तीन के समर्थन में न होने पर हिन्दुस्तान का ‘शांतिप्रिय’ बिलबिला जाता है। ये असंतुलित व्यवस्था घातक है। कोई ‘उम्माह’ के लिए हमेशा संगठित रहता है और हम पालघर के साधुओं को भी न्याय नहीं दिला पाते।

हमें हर मरते हिन्दू की लाश पर हर शहर में प्रदर्शन करना होगा। हमें हर लव-जिहाद के मामले में ऐसे अपराधियों को परिवार सहित, उसी ‘परोक्ष आक्रात्मकता’ से उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना पड़ेगा। हमें हर बलात्कार पीड़िता हिन्दू के घावों की चिकित्सा करनी होगी। क्योंकि न तो आपको खबरों की खबर रहती है, न आपके पास कैंडल ले कर अपने शहर में एक लाख की संख्या जुटाने की आदत है, न आपको अपने सनातनी भाइयों की लिंचिंग पर आक्रोश प्रदर्शित करने आता है। और हाँ, मीडिया कभी भी आपके साथ नहीं होती।

हिन्दुओं को भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए कि वो चाहते तो महाभारत एक क्षण में निपटा देते, लेकिन उन्होंने इस धर्म और अधर्म की लड़ाई होने दी ताकि यह संदेश जाए कि सिर्फ अधर्मियों का ही नहीं, बल्कि उनके साथ खड़े लोगों के लिए भी इस भारतभूमि पर जगह नहीं है। उन्होंने भी शिशुपाल की सौ गलतियाँ ही माफ की थी। यहाँ तो सैकड़ों सालों से लाखों गलतियाँ हो चुकी हैं। इसलिए, सरकारों की राह देखने की जगह, स्वयं को सशक्त बनाओ, संगठित रहो, हर ऐसे अपराध को ले कर स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाओ ताकि एक भी हिन्दू पर कट्टरपंथियों का अत्याचार न हो। सुदर्शन चक्र की क्षमता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

यहाँ तो आवश्यकता पड़ने पर ऋषियों ने शस्त्र उठाए हैं, तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो?

दिनकर ने लिखा है:

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों? जागो,
कुछ नई आग, नूतन ज्वाला की सृष्टि करो।
शीतल प्रमाद से ऊँघ रहे हैं जो, उनकी
मखमली सेज पर चिंगारी की वृष्टि करो।

3 टीचर (उलेमा), 13 आतंकी और एक मदरसा: PSA के तहत मामला दर्ज, पुलवामा हमले से भी है कनेक्शन

दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ जिले के CBSE संबद्ध मदरसे के 3 उलेमाओं (शिक्षक) को PSA के तहत मामला दर्ज करके सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को गिरफ्तार किया गया। इन पर 13 आतंकियों को तैयार करने का इल्जाम है।

इस मदरसे का नाम सिराज-उल-उलूम है।  इसे कश्मीर के बड़े मदरसों में गिना जाता है। बीते कुछ समय से यह हिंसक घटनाओं और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के सिलसिले में किसी न किसी तरीके से सुर्खियों में था। 

पुलिस की नजर भी इस पर काफी दिनों से थी। इसके तार प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी से जुड़े बताए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त पुलवामा में शामिल आतंकी सज्जाद भट्ट भी इसी मदरसे का छात्र रह चुका है।

कश्मीर रेंज के आईजी विजय कुमार का कहना है कि पुलिस की काफी समय से इस स्कूल पर नजर थी। अब पुलिस की तरफ से कानूनी कार्रवाई के तहत तीन अध्यापकों पर मामला दर्ज किया गया है। 

इन तीनों की पहचान अब्दुल अहाद भट्ट, रौफ भट्ट और मोहम्मद यूसुफ वानी के रूप में हुई है। पीएसए के अलावा इनके ख़िलाफ़ शांति का उल्लंघन करने के आरोप में सीआरपीसी की धारा 107 के तहत मामला दर्ज हुआ है।

आईजीपी ने इस संबंध में बताया कि मदरसे के 5-6 अन्य शिक्षक भी निगरानी में हैं। वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जा रहा है। मगर, आगे आवश्यकता पड़ी तो स्कूल के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होगी।

मदरसे के संस्थापक मोहम्मद यूसुफ माटू ने तीन गिरफ्तारियों पर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इन तीनों में से कोई भी उनके मदरसे में टीचर नहीं है। माटू ने कहा कि सज्जाद जैसे पूर्व छात्रों के कारण पूरे संस्थान को दोष नहीं दिया जाना चाहिए।

मदरसे के अध्यक्ष कहना है, “हमारी इसमें कोई भूमिका नहीं है। सज्जाद, जिसे लेकर पुलिस का कहना है कि वह पुलवामा हमले में शामिल था, वह यहाँ केवल कुछ महीनों के लिए पढ़ा था। वह आतंकी बनने से पहले मेकैनिक का काम करता था। कैसे सोचा जा सकता है कि हमने उसे ऐसा बनाया है?”

यूसुफ पुलिस को चुनौती देते हैं कि वह सभी आरोपों को सिद्ध करके दिखाएँ। वह कहते हैं, “हमारा संस्थान जम्मू कश्मीर सरकार से संबद्ध है। यहाँ NCERT का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। यह ओरियंटल कॉलेज कश्मीर यूनिवर्सिटी से जुड़ा है। हम हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं। कोई भी मीडिया समूह आ सकता है और हमारे पढ़ाने के तरीके और अन्य चीजों को जाँच सकता है। हमारे वित्तीय व पाठ्यक्रम स्रोत भी जाँचे जा सकते हैं। हम आयकर विभाग के साथ पंजीकृत हैं।”

गौरतलब है कि हाल ही में पुलिस को अपनी जाँच के दौरान मालूम चला था कि इस स्कूल से शिक्षा हासिल कर चुके 13 बच्चे आतंकवाद से जुड़े हैं जोकि इस समय अलग अलग आतंकी संगठनों में काम कर रहे है। इनमें से कई मारे भी जा चुके हैं।

इस मामले पर संबधित अधिकारियों ने बताया कि सिराज-उल-उलूस में कुलगाम, पुलवामा और अनतंनाग समेत पूरे प्रदेश से छात्र पढ़ने आते हैं। उत्तर प्रदेश, केरल और तेलंगाना के कई छात्र भी यहाँ दाखिला ले चुके हैं। सिर्फ सज्जाद भट्ट ही नहीं, इसी साल अगस्त में मारा गया अल-बदर का आतंकी जुबैर नेंगरु भी इसी मदरसे की पैदावार है।

इसके अतिरिक्त आतंकी नाजमीन डार और एजाज अहमद पाल भी यहीं से निकले हैं। पिछले दिनों जिहादी बनने वाला उत्तरी कश्मीर के बारामुला का एक युवक भी इसी संस्थान का छात्र है।

बता दें कि शोपियाँ के मदरसे से जुड़े छात्रों के आतंकी संगठनों में शामिल होने की घटना सामने आने के बाद वहाँ के कुछ अन्य धार्मिक संस्थान केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं। इलाके में आसपास कई ऐसे संस्थान बताए जा रहे हैं, जो जमात विचारधारा से प्रेरित हैं। माना जा रहा कि इन्हें पाक समर्थित संगठनों से पैसा मिलता है और एक बार बंद किए जाने के बाद इन्हें अलग नाम से संचालित किया जाने लगता है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इन पर नजर बनाए रखने का काम टेरर मॉनीटररिंग ग्रुप के तहत कई केंद्रीय एजेंसियाँ कर रही हैं। इनका (टेरर मॉनिटरिंग ग्रुप) उद्देश्य इस तरह की गतिविधियों के वित्तीय स्रोत को खंगालकर उस पर प्रहार करना है। इन टीमों में सीबीआई, एनआईए, ईडी, सीबीडीटी और सीबीआईसी शामिल हैं।

याद दिला दें कि पिछले वर्ष राज्य प्रशासन ने ‘फलाह-ए-आम ट्रस्ट’ से जुड़े कई स्कूलों को नोटिस जारी किया गया था और उन्हें बंद करने का आदेश दिया गया था। दरअसल FAT पहले जमात-ए-इस्लामी का ही हिस्सा हुआ करता था, लेकिन बाद में दोनों अलग हो गए। अब जमात और FAT के ग्राउंड वर्कर का डेटा तैयार करके इनकी गतिविधियों को खंगाला जा रहा है, ताकि पता लगे कि प्रतिबंध के बाद ये किन संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं।

Tanishq विज्ञापन में हिंदू लड़का-मुस्लिम लड़की होती तो… बम फेंका जाता, शहर जलते… बॉम्बे फिल्म याद है न!

तनिष्क के विज्ञापन ने सोशल मीडिया पर बड़ी बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि अपने प्रचार के जरिए तनिष्क ने लव जिहाद को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। इस वीडियो को देखकर लोगों का सवाल है कि इसमें आखिर क्यों हिंदु युवती की ही गोद भराई मुस्लिम परिवार में हो रही है, क्या ऐसी कल्पना भी मुस्लिम महिला को केंद्र में रख कर की जा सकती है।

कई स्वघोषित सेकुलर इस पर अपने सवाल खड़े कर रहे हैं। इनका पूछना है कि आखिर तनिष्क को इतना क्यों घेरा जा रहा है? क्या ऐसा तब भी होता जब प्रचार में धर्म को रिवर्स कर दिया जाता?

शायद ऐसे लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि बीते समय में जब भी ऐसी कोशिशें हुईं तो ‘नाराज’ मजहबी भीड़ ने शहर के शहर जला डाले और अपना गुस्सा घरों पर बम फेंक कर निकाला है।

मणि रत्नम की बॉम्बे फिल्म

साल 1995 में फिल्म निर्माता मणिरत्नम ने अरविंद स्वामी और मनीषा कोएराला के साथ अपनी फिल्म ‘बॉम्बे’ बनाई थी। यह फिल्म साल 1992 में बाबरी घटना के बाद हुए दंगों पर आधारित थी। स्वामी ने इसमें हिंदू पत्रकार का रोल अदा किया था और मनीषा गाँव की एक मुस्लिम लड़की बनी थी। दोनों की प्रेम कहानी और उसके कारण उपजे पारिवारिक विरोध को इस फिल्म के जरिए दिखाया गया था।

इसमें बताया गया था कि दोनों एक दूसरे से शादी करके मुंबई आते हैं। वहाँ उनके दो बच्चे होते हैं और उन्हें दोनों धर्मों के मुताबिक पाला जाता है। कई भावनात्मक क्षणों के बाद यह फिल्म ह्यूमन चेन के साथ समाप्त होती है। कुल मिलाकर यदि लिबरल नजरिए से देखें तो इस फिल्म की भी पर्फेंक्ट सेकुलर एंडिंग होती है। मगर, वास्तविकता में समुदाय विशेष के बीच में संदेश वैसा नहीं जाता जिसे फिल्म निर्माता ने देने की कोशिश की।

समुदाय का विरोध और बॉम्बे फिल्म

रजा अकादमी के मुस्लिम नेता, जो आजाद मैदान में हुए दंगों के आरोपित हैं, उन्होंने इस फिल्म की रिलीज के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था। हालत ऐसी हो गई थी कि फिल्म को आधिकारिक तौर पर रिलीज किए जाने से पहले उसकी स्पेशल स्क्रीनिंग हुई। मुस्लिम नेताओं ने आरोप लगाया कि ऐसी प्रेम कहानी दिखा कर उनकी संस्कृति और मजहब का अपमान किया जा रहा है। रजा अकादमी के मुख्य सचिव इब्राहिम ताय ने ऐसी हिंदू मुस्लिमों की शादियों को ‘नाजायज’ तक कहा था।

गौर दीजिए कि जावेद अख्तर जो अपने आप को नास्तिक बताते हैं, वह भी फिल्म में बदलाव लाने के समर्थन में खड़े हुए थे और कहा था, “मुझे लगता है कि सेंसर द्वारा पास की गई कोई भी फिल्म को रिलीज किया जाना चाहिए। लेकिन ठाकरे द्वारा सेंसर किए जाने के बाद रत्नम ने इस पर से अपना अधिकार खत्म कर दिया है। इसलिए वह कुछ मुल्लों के द्वारा भी इसे सेंसर करवा सकते हैं।”

दरअसल इस फिल्म में एक कैरेक्टर था, जो शिवसेना के बाल ठाकरे से जुड़ा था और अन्य फिल्मों की भाँति जरूरी था कि ठाकरे और शिवसेना को उस फिल्म को दिखाया जाए। इसमें दर्शाया गया था कि जो व्यक्ति पहले दंगों को भड़काता है, वह बाद में उसका पश्चताप करता है। पर, चूँकि बाल ठाकरे को अपने किए का पछतावा नहीं था और कथित तौर पर उन्होंने कहा भी था कि उन्हें किसी तरह का खेद नहीं है तो उन्होंने उस सीन को फिल्म से अल्टर करवा दिया था। इसी आधार पर जावेद ने अपना बयान दिया था।

उल्लेखनीय है कि इस फिल्म के खिलाफ़ प्रदर्शन केवल मुंबई और महाराष्ट्र में ही नहीं हुआ था । ठाणे, भोपाल, हुबली, मेरठ में भी इसका एक रूप देखने को मिला था। मणिरत्नम के घर तक पर बम फेंका गया था, जिसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था। बाद में पता चला कि हिंदू नेताओं पर हमला करने वाले अल उम्माह नाम का मुस्लिम समूह इस पूरे अटैक के पीछे था।

तो, शायद इस उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है कि तथाकथित सेकुलर जिस ‘रिवर्स’ की बात कर रहे हैं, वो केवल सोशल मीडिया तक की बातें हैं, वास्तविकता में उतरते ही इनका भयानक रूप समय समय पर देखने को मिलता रहा है।