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लव जिहाद: अब्दुल्ला से अमन बने चार बीवियों के अधेड़ शौहर ने किशोरी को प्रेमजाल में फँसाकर किया दुष्कर्म, गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक और लव जिहाद का मामला सामने आया है। चार बच्चों के अब्बू और चार बीबियों के शौहर अब्दुल्ला ने अमन चौधरी बनकर 17 साल की किशोरी को प्रेम जाल में फँसा लिया और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया। 

पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। पीड़ित किशोरी को भी पुलिस ने बरामद कर लिया है। घटना थाना कंकरखेड़ा क्षेत्र की है। जहाँ का रहने वाला अधेड़ अब्दुल्ला ने अमन चौधरी बनकर 17 साल की एक किशोरी को अपने प्रेमजाल में फँसा लिया। अब्दुल्ला से अमन चौधरी बने अधेड़ ने किशोरी को बहला-फुसलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया।

नाबालिग किशोरी 3 सितंबर को गायब होती है और बुधवार (सितंबर 16, 2020) को 13 दिन बाद जब किशोरी को बरामद किया गया तब मामले में सनसनीखेज खुलासा हुआ। किशोरी को प्रेम जाल में फँसाने वाले अधेड़ शख्स की उम्र लगभग 42 साल है। अधेड़ नकली बाल लगाता था जिससे वो जवान दिख सके।

3 सितंबर को अब्दुल्ला उर्फ अमन एक नाबालिग किशोरी को बहला फुसलाकर अपने साथ ले गया था। मामले में अपहरण का मुकदमा दर्ज किया गया था। किशोरी को अगवा करने के बाद आरोपित ने उसे गंगानगर इलाके में रखा था। 13 दिन बाद आरोपित गिरफ्तार हुआ तो उसने खुद ही सारी कहानी बताई। पुलिस ने मामले में अपहरण, बलात्कार और पोस्को एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया है।

अब्दुल्ला अपना नाम अमन बताता था और नकली बाल लगाकर किशोरियों को प्रेम जाल में फँसाता था। इसके बाद आरोपित किशोरियों के साथ घिनौनी वारदात को अंजाम देता था। आरोपित पहले से शादीशुदा है और उसके 4 बच्चे भी हैं। ये भी बताया जा रहा है कि उसकी 4 बीबियाँ भी हैं।

पुलिस मामले की जाँच कर रही है। मामले में एसपी सिटी अखिलेश नारायण ने बताया कि बच्ची को सकुशल बरामद कर लिया गया है और अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसे कोर्ट में पेश किया जा रहा है, जहाँ से उसे जेल भेजने की कार्रवाई होगी।

गौरतलब है कि पिछले दिनों लुधियाना के अंकुजा आनंद नगर की रहने वाली एकता लव जिहाद में मारी गई। उसे मारने वाले शाकिब (Shakib) ने अमन बनकर उसे प्रेमजाल में फँसाया। करीब छह माह प्यार का नाटक किया। उसके बाद मेरठ के दौराला के लोइया गाँव में लाकर स्वजनों के साथ मिलकर एकता को मौत के घाट उतार दिया।

वहीं एक और मामले में पहले नाबालिग लड़की को अगवा कर मेरठ से देवबंद ले जाया गया, फिर वहाँ जबरन मज़हब बदलवाने के बाद उसे प्रयागराज ले जाकर निकाह कर दिया गया। मामला तूल पकड़ने पर पुलिस को किशोरी के साथ ‘शौहर’, शौहर का भाई और जीजा भी बरामद हुए। लड़की चार मई से लापता चल रही थी।

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगो में आरोपित उमर खालिद की गिरफ्तारी की 8 प्रमुख वजहें

जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की साजिश के मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार कर लिया है। उमर खालिद का नाम दिल्ली दंगों की लगभग हर चार्जशीट में दर्ज है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के पहले दिए भाषण, आरोपितों के साथ हुई बातचीत के कॉल रिकार्ड व मीटिंग और आरोपितों के बयानों में साजिशकर्ता बताते हुए उमर खालिद की गिरफ्तारी हुई है।

उमर खालिद की गिरफ्तारी की वजह:-

  1. दिल्ली दंगों में उमर खालिद की भूमिका सबसे पहली बार तब सामने आई जब 20 फरवरी को उस पर विवादित भाषण देने का आरोप लगा। उसने अपने भाषण में कहा मुस्लिमों को डोनाल्ड ट्रंप के सामने यह दिखाना ही होगा कि वह देश की सरकार के विरुद्ध लड़ रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप 24 फरवरी को भारत की यात्रा पर आए थे और इसी दिन से दंगे और हिंसा शुरू हो गई थी।
  2. दिल्ली दंगों के मामले में दायर की गई चार्जशीट में साफ़ लिखा है कि उमर खालिद दंगों के मुख्य आरोपित खालिद सैफी की मदद से ताहिर हुसैन के संपर्क में था। उमर खालिद यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (UAH) का भी हिस्सा रह चुका है, जिसने सीएए के विरोध में PUCL और अन्य के साथ मिल कर अभियान चलाया था।
  3. खालिद सैफी ने 9 जनवरी को ताहिर हुसैन और उमर खालिद के बीच शाहीन बाग़ में बैठक कराई थी। इस मीटिंग में कुछ बड़ा करने का निर्णय लिया गया था, जिससे सरकार हिल जाए।
  4. चार्जशीट के मुताबिक उमर खालिद ने ताहिर से यह भी कहा था कि दंगों के लिए पैसे की चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पॉपुलर फ्रंट और इंडिया (PFI) इसकी फंडिंग करेगा। 
  5. शाहीन बाग में ताहिर हुसैन और खालिद सैफी के साथ मीटिंग के दौरान उमर खालिद लगातार इस बात पर जोर देता रहा कि दंगे तभी होने चाहिए, तब डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर होंगे।
  6. उमर खालिद की गिरफ्तारी के बाद अब स्पेशल सेल के पास चार्जशीट दायर करने के लिए 180 दिन हैं। हालाँकि, कई FIR में खालिद की दंगे में भूमिका स्पष्ट है।
  7. अंकित शर्मा की हत्या में भी ताहिर हुसैन के अलावा उमर खालिद की अहम भूमिका थी।
  8. उमर खालिद के सहयोगी ताहिर हुसैन के जिहादी भीड़ ने अंकित शर्मा की निर्ममता से हत्या कर दी थी। अंकित शर्मा के शरीर को 50 बार चाकू से वार किया गया था।

गौरतलब है कि उमर खालिद का नाम सबसे पहली बार चर्चा में आया 2016 के ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ प्रकरण के बाद। 9 फरवरी 2016 को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकवादी अफज़ल गुरु की बरसी के मौके पर विरोध-प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शन की वजह थी आतंकवादी अफज़ल गुरु का पुण्य स्मरण (टुकड़े टुकड़े गैंग के लिए)। उस प्रदर्शन के दौरान ऐसे कई नारे लगाए गए जो डरावने और हैरान करने वाले थे, उन नारों में सबसे ज़्यादा विवादित थे भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशाअल्लाह, इंशाल्लाह और भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी। 

युद्ध पिपासु शी जिनपिंग: इतनी जल्दी नहीं मानेगा हार, देश को रहना होगा कठिन दिनों के लिए तैयार

महाभारत के वनपर्व में यक्ष का प्रश्न था कि इस सृष्टि में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर ने यक्ष को उत्तर दिया कि इस धरती पर निरंतर मौत का नृत्य देखते रहने के बावजूद व्यक्ति ऐसा आचरण करता है कि वह कभी यहाँ से जाएगा ही नहीं।

“अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥”

युधिष्ठिर का यक्ष को दिया गया ये उत्तर शी जिंगपिंग सहित विश्व के सभी तानाशाहों पर एकदम सटीक बैठता है। विश्व को बलपूर्वक अपने कब्ज़े में करने की पिपासा अनंतकाल से धरती पर युद्धों का कारण रही है।

शी जिनपिंग इन दिनों इतिहास में अमर होने की अपनी चाह में युद्ध पिपासु बन बैठे हैं। कभी वह हॉन्ग कॉन्ग में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर दमन करते हैं, तो कभी ताइवान पर धावा बोल देते हैं। दक्षिण चीन सागर के तटवर्ती देशों से वे रोज़ पन्गा लेते हैं तो कभी वे सुकेकु द्वीपों को लेकर जापान पर चढ़ बैठते हैं।

दुनिया के तकरीबन हर देश से चीन की तकरार हो रही है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय देशों यहाँ तक कि चेकोस्लोवाकिया तक को चीन के मंत्री और राजदूत अभद्र अराजनयिक भाषा में धमकियाँ देते हैं।

भारत के साथ तो लद्दाख में नियंत्रण रेखा पर चीन की ज़ोर जबरदस्ती ने युद्ध की स्थिति पैदा कर दी है। प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका ‘न्यूज़वीक’ के अनुसार भारत के साथ इस संघर्ष की पटकथा व्यक्तिगत रूप से खुद राष्ट्रपति शी जिंगपिंग ने ही लिखी है।

अन्य कई सूत्र भी इसी तरफ संकेत करते हैं कि शी जिनपिंग ही खुद भारत के साथ इस संघर्ष के जनक है। ये अलग बात है कि अभी तक शी जिंगपिंग ने जैसा चाहा था, वैसा हो नहीं पाया है।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ के तकरीबन हर लेख में भारत को याद दिलाया जाता है कि उसे 1962 को नहीं भूलना चाहिए। चीनी मामलों की जानकार तथा फाउंडेशन फॉर डिफेंस डेमोक्रेसी की विशेषज्ञ क्लियो पास्कल के अनुसार चीन ने सोचा था कि 1962 की हार के बाद से भारतीय नेतृत्व और फौज ‘मानसिक रूप से कमज़ोर और रक्षात्मक’ होंगी।

वे इसके लिए अंग्रेज़ी में ‘psychologically paralysed’ उद्धरण का प्रयोग करती हैं। इसलिए चीन ने गलवान में भारत को ललकारने का दुस्साहस किया। वे कहती हैं कि भारत ‘मानसिक रूप से कमज़ोर नहीं निकला’ बल्कि उसने चीन को मुँहतोड़ जबाव दिया। उनके अनुसार, 15 जून की इस लड़ाई में भारत का हाथ ऊपर रहा और इसमें चीन के 60 सैनिक मारे गए।

इससे शी जिंगपिंग आगबबूला है। उनकी रणनीति तो थी कि वे इस संघर्ष में जीत हासिल करके दुनिया और चीन की जनता को बता देंगें कि एशिया में अब सिर्फ एक ही ताकत है, वह है चीन। दरअसल यहाँ शी जिंगपिंग की मानसिकता को समझने की ज़रूरत है।

उनके दो लक्ष्य साफ़ दिखाई देते हैं। पहला तो चीन में अपने राज को स्थाई बनाना। और दूसरा चीन को विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में स्थापित करना।

बड़े ही अमानुषिक रूप से उन्होंने कोरोना की मानवीय त्रासदी (जो चीन की ही देन है) और अमरीकी चुनावों की आपाधापी का समय चुना। इन दोनों ही लक्ष्यों की पूर्ति के लिए शी जिंगपिंग समझते हैं कि उन्हें दुनिया को अपनी सामरिक ताकत का दबदबा दिखाना ज़रूरी है। भारत उनके इन उद्देश्यों में आड़े आता है।

2012 में शी जिंगपिंग के सत्ता सँभालने के बाद से ही चीन की सेना भारत की सीमा पर बेजा हरकतें करती आई है। डोकलाम इसी कड़ी का एक हिस्सा था। याद कीजिए, शी जिंगपिंग जब सितम्बर 2014 में भारत आए थे, तो उस समय सीमा पर चुमार में भी चीन की तरफ से अतिक्रमण हुआ था।

चीन ने अपनी तरफ के क्षेत्रों में सड़क और पुलों तथा अन्य रक्षा ढाँचे का लगातार निर्माण किया है। लेकिन भारत ने भी पिछले कई साल में रक्षात्मक तौर-तरीके छोड़ कर सड़क, पुल तथा अन्य निर्माण का काम तेज़ किया है। इससे जब चीन ने मई के महीने में लद्दाख में बदनीयती से फौजें और भारी असला जमा करना शुरू किया तो भारत ने भी उसके मुकाबिल अपनी फौजें तैनात कर दीं।

चीन इस दौरान लगातार भारत को गीदड़ भभकियाँ भी देता रहा। ये सही है कि चीन भारत से आर्थिक और सामरिक रूप से ताकतवर दिखता है। चीन की ताकत को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का काम भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में उसके वामपंथी हितैषी करते आए हैं। पर ये कागज़ पर ही ज़्यादा है।

चीन की सेना ने कोई भी बड़ा युद्ध जीता नहीं है। 1979 में वियतनाम की सेना तक ने उसका घमंड तोड़ दिया था। जबकि भारत की सेना को तो सियाचिन की बर्फीली घाटियों से लेकर कारगिल की उँचाइयों को जीतने का महारत हासिल है। हमारी सेना जम्मू कश्मीर में लगातार पाकिस्तान और उसके जिहादियों से युद्ध कर ही रही है।

क्लियो पास्कल कहती हैं कि खुली ज़मीन पर कब्ज़ा करने में तो चीन की सेना यानी पीएलए को महारत हासिल है, पर जब उसके सामने कोई दूसरी सेना अड़ जाए तो वह पीछे हट जाती है। पास्कल ने पिछले दिनों भारतीय सेना द्वारा ऊँची चोटियों पर कब्ज़ा करने का उदाहरण इसी सन्दर्भ में दिया। उनका मानना है कि पिछले पचास वर्षों में ऐसा जोरदार रक्षात्मक प्रत्याक्रमण भारत ने कभी नहीं किया। इससे पीएलए का नेतृत्व हतप्रभ है।

शी जिंगपिंग क्या इतनी जल्दी हार मानेगें?

2022 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में वे अपने को देश का चेयरमेन घोषित करना चाहते हैं। चीन में माओ के बाद ये पद खत्म कर दिया गया था। उनकी मंशा खुद को आजीवन चेयरमेन घोषित कर एकछत्र राज करने की है।

शी जिंगपिंग की आलोचना के लिए हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी से निष्काषित बीजिंग की प्रोफेसर काई शिया तो यहाँ तक कहती हैं कि शी जिंगपिंग ‘एक माफिया बॉस’ की तरह इन दिनों अपने देश को चला रहे हैं। उनसे अलग राय रखने वालों को तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

न्यूज़वीक के अनुसार गलवान की अपमानजनक हार की खिसियाहट में शी जिंगपिंग अपनी सेना के कई अफसरों की बलि चढ़ा सकते हैं। लेकिन साथ में ये चेतावनी भी दी कि झल्लाहट में वे सीमा पर बड़ा कारनामा करने की भी सोच सकते हैं।

भारत और चीन के विदेश मंत्रियों ने तनाव घटाने के लिए जो पाँच सूत्रीय फार्मूला दिया है, वह शी जिंगपिंग कितना मानेंगे? भारत के लिए यही यक्ष प्रश्न है।

यक्ष को तो धर्मराज युधिष्ठिर ने प्रश्नों के तर्कसंगत और बुद्धियुक्त उत्तर से शांत कर के सरोवर का जल पी लिया था। पर जब सामने सत्ता और ताकत के नशे में चूर शी जिंगपिंग जैसा क्रूर, निर्मम, दमनकारी और घोर विस्तारवादी तानाशाह हो तो फिर शांति की आशा करना अपने को धोखा देना होगा। कोरोना के इस घनघोर संकट के बीच भारतीय सेना और देश को कठिन दिनों के लिए तैयार रहना होगा।

हिंदू धार्मिक पुस्तक को टॉयलेट पेपर बनाना अपराध नहीं: पुलिस के एक्शन पर लोगों ने पूछा – ‘कुरान होता तो?’

सोशल मीडिया पर पिछले दिनों हरतालिका तीज व्रत कथा की पवित्र पुस्तक को ‘टॉयलेट पेपर’ के रूप में प्रयोग करने वाली पत्रकार सुष्मिता सिन्हा के ख़िलाफ़ हिंदू आईटी सेल के एक सदस्य ने दिल्ली के गोविंदपुरी थाने में शिकायत दर्ज करवाई थी। मगर, दिल्ली पुलिस ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।

दिल्ली पुलिस के गोविंदपुरी थाने से इसके बदले हिंदू आईटी सेल के सदस्य को एसएचओ से जवाब मिला कि सुष्मिता ने धार्मिक पुस्तक को टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल करके कुछ भी गलत नहीं किया है।

सोमवार को इस मामले में साकेत डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के समक्ष एक्शन टेकन रिपोर्ट दायर की गई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित करने के मामले में पत्रकार के खिलाफ अदालत में दायर शिकायत में कोई अपराध नहीं पाया गया है।

यह रिपोर्ट मेट्रोपॉलिटियन मेजिस्ट्रेट जीतेंद्र प्रताप सिंह के समक्ष गोविंदपुरी पुलिस थाने के एसआई द्वारा दायर की गई। कोर्ट ने इस एटीआर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई की तारीख 23 अक्टूबर को तय की। जहाँ शिकायतकर्ता को अपनी दलील रखने का मौका दिया जाएगा।

इस खबर पर हिंदू आईटी सेल ने ट्वीट करके पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा,” हिंदू आईटी सेल के सदस्य आशुतोष द्वारा सुष्मिता सिन्हा के ख़िलाफ़ शिकायत में एसएचओ का कहना है कि हमारी धार्मिक पुस्तक का इस्तेमाल टॉयलेट पेपर के रूप में करके उसने कुछ गलत नहीं किया है। तो क्या पुलिस सोचती है कि हिंदुओं का अपमान करना उचित है?”

विकास पांडे पूछते है, “हमारे वकील मुकेश शर्मा, सुष्मिता सिन्हा के ख़िलाफ़ अदालत पहुँचे क्योंकि उसने हमारी पवित्र किताब का अपमान किया। दिल्ली पुलिस ने अपने रिप्लाई में लिखा है कि उनकी पड़ताल में कोई दण्डनीय अपराध नहीं किया गया। क्या वह ये सब तब भी कहते, जब कुरान के साथ ऐसा होता? या ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि यह हिंदुओं के साथ हुआ है?”

वो लिखते हैं, “लेकिन हमें हारना नहीं है। हम कानूनी लड़ाई लड़ेंगे आखिरी तक। मुझे विश्वास है माननीय अदालत हमारी याचिका पर सुनवाई करेगी और पुलिस को उसका काम गंभीरता से करने को कहेगी।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों अपने यूट्यूब चैनल पर बनाए गए विवादित वीडियो के कारण सुष्मिता सिन्हा चर्चा में आई थी। इस वीडियो में वह हरतालिका तीज की पुस्तक को हाथ में लेकर कहती दिखी थी कि उन्होंने इस ‘रद्दी’ के लिए पूरे 15 रुपए खर्च किए हैं और अब इसका क्या प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके बाद उन्होंने कहा था कि तीज की कथा वाली पुस्तक को वो टॉयलेट पेपर बनाएँगी या टिश्यू पेपर, इस सम्बन्ध में उन्हें सलाह चाहिए।

वीडियो देखने के बाद ‘हिन्दू आईटी सेल’ ने इसका विरोध किया था। अपने ट्वीट में ‘हिन्दू आईटी सेल’ ने जानकारी दी थी कि सुष्मिता सिन्हा ने अपने इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी लगाई, जिसमें उन्होंने दिखाया कि हरतालिका तीज व्रत कथा की पुस्तक उनके टॉयलेट में ‘टॉयलेट पेपर’ की जगह टँगी हुई है।

सुष्मिता सिन्हा के बारे में बताया गया कि वो ‘बोलता हिंदुस्तान’ के लिए काम करती हैं, जो मोहम्मद रहमान के स्वामित्व में है। वैसे ये पहली बार नहीं है, जब उन्होंने इस तरह की हरकत की हो। उन्होंने राम मंदिर भूमिपूजन के अगले दिन 6 अगस्त को एक फोटो शेयर करते हुए लिखा कि जो ज़िंदा हैं, उन्हें तो नहीं मिला घर, लेकिन एक पत्थर को मिल गया।

‘हिन्दू आईटी सेल’ ने तब कहा था कि वामपंथियों को सीधे-सादे हिन्दुओं और उनके देवी-देवताओं को गाली देने में खासा मजा आता है।

बता दें कि उत्तर भारत में तीज का पर्व महिलाओं के बीच खासा लोकप्रिय है और उस दिन वो अपने परिवार के सुखद भविष्य के लिए उपवास करती हैं और पूजा करती हैं।

जया बच्चन का कुत्ता टॉमी, देश के आम लोगों का कुत्ता कुत्ता: बॉलीवुड सितारों की कहानी

अगर बात बदनामी की ही है, तो आतंकियों से सम्बन्ध रखने, उनकी मदद करने से ज्यादा बदनामी की बात क्या होगी? बॉलीवुड के जाने-माने नाम महेश भट्ट और उनके परिवार के सदस्यों पर यही आरोप था। मुंबई हमलों (26/11) की साजिश रचने वाले डेविड हेडली ने स्वीकारा था कि उसने भट्ट को 26/11 को दक्षिणी मुंबई की तरफ ना जाने की सलाह दी थी।

डेविड हेडली को मुंबई घुमा-घुमा कर दिखाने का आरोप महेश भट्ट के बेटे पर ही रहा है। मगर नहीं इनसे तो बदनामी नहीं होती, बदनामी तो तब होती है जब कोई इस बारे में बोल बैठे?

आतंकियों से सम्बन्ध रखने का ये पहला मामला भी नहीं था। फ़िल्मी सितारों में से कइयों की तस्वीरें भारत से भागे हुए आतंकी दाउद इब्राहीम के साथ दिखी थीं। दाउद के दिए हुए एके 56 के साथ ही संजय दत्त पकड़ा गया था।

इससे क्या बदनामी हुई? नहीं, बिलकुल नहीं। बल्कि उल्टा बॉलीवुड के सितारे प्ला-कार्ड लिए हुए संजय दत्त के समर्थन में खड़े नजर आए। उस पर फिल्म बनाने वाले राजकुमार हिरानी ने इंडिया टुडे के साथ एक इंटरव्यू में बताया था कि संजय दत्त 308 लड़कियों को अपने बिस्तर तक ले जाने के लिए एक अनोखा तरीका इस्तेमाल करता था। वो एक नकली कब्र पर उन्हें ले जाता और कहता कि वहाँ वो उन्हें अपनी माँ से मिलवाने लाया है! ऐसी चीज़ों को जब फिल्मों में दिखाया गया, तब भी बदनामी नहीं हुई थी।

बॉलीवुड के एक दूसरे पोस्टर-बॉय पर तो तारिकाओं से मारपीट करने का अभियोग लगातार लगता रहा है। खुद जया बच्चन की बहु, ऐश्वर्या राय बच्चन भी उसकी शिकार हो चुकी हैं।

इसके अलावा सलमान पर काले हिरण मारने का अभियोग रहा। बिश्नोई लोगों का विरोध ना झेलना पड़ता, तो अपने कुकृत्य में वो कामयाब भी होते। मुंबई में, संभवतः नशे में धुत्त होकर गाड़ी फुटपाथ पर सोए अल्पसंख्यक समुदाय के मजदूरों पर चढ़ा देने का भी उस पर मामला रहा है। पत्रकारों से मारपीट तो सलमान के लिए आम बात है, लेकिन इन सब से बदनामी कहाँ होती है? बदनामी तो तब होती है जब कोई इस बारे में बोल बैठे!

कुछ वर्षों पहले जिया खान नाम की एक युवा अभिनेत्री की आत्महत्या का मामला आया था। ऐसा तो बिलकुल नहीं है कि आत्महत्या बॉलीवुड के लिए कोई नई बात हो, मगर ये मामला इसलिए प्रकाश में आया क्योंकि जिया खान अपना लम्बा सा सुसाइड नोट छोड़ गई थी। इस नोट में आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली का नाम साफ़-साफ़ आता है।

लेकिन किसी को आत्महत्या की कगार तक पहुँचा देना भी कोई बदनामी की बात थोड़ी है? वैसे इस मामले में भी जिया खान की माँ ने आरोप लगाए थे कि महेश भट्ट ने जिया खान को अवसाद ग्रस्त और मानसिक समस्याओं से पीड़ित स्वीकारने के लिए धमकाया था।

बॉलीवुड में “कास्टिंग काउच” पर एक स्टिंग ऑपरेशन हुआ था, जिसे कई लोगों ने देखा होगा। इस मामले में जाने-माने खलनायक शक्ति कपूर भी फँसे थे। मगर इसके उजागर होने पर मामला थमा हो, “कास्टिंग काउच” बंद हो गया हो, ऐसा भी नहीं। जानी-मानी हस्ती सरोज खान ने इस मसले पर कहा था “वो कम से कम रोटी तो देती है। रेप करके छोड़ तो नहीं देते?”

वैसे तो जिस्म बेच कर रोटी का इंतजाम करना भारतीय कानूनों के हिसाब से वेश्यावृति होगा लेकिन संविधान और कानूनों को मान लें तो फिर बॉलीवुड का सेलेब्रिटी कैसा? और हाँ, ध्यान रहे कि इनसे भी कोई बदनामी नहीं होती।

असली मामला तो “तुम्हारा कुत्ता कुत्ता और मेरा कुत्ता टॉमी” वाला है। इस देश में रहकर, यहीं के नागरिकों द्वारा सर पर बिठाए जाने के कारण जो लोग खुद को सेलेब्रिटी मानते हैं, वो जब इसी देश के बारे में कहते हैं कि यहाँ रहने में डर लगता है, या ये कि यहाँ असहिष्णुता का माहौल है, तब तो वो “जिस थाली में खाया, उसी में छेद करना” भी नहीं होता। जिस थाली में खाया, उसी में छेद करना तब हो जाता है, जब बॉलीवुड में काम कर चुका कोई बोल दे कि यहाँ नशे के व्यापार और अपराधी-आतंकी तत्वों से जान पहचान रखने वालों का बोलबाला है।

बाकी हमें उम्मीद है कि जया बच्चन जी के घर में आइना भी होगा। कभी सजते-संवरते उसमें अपनी आँखों से आँखे मिला कर देखिएगा। हो सकता है कुछ शर्म बाकी हो तो वो आँखों में उतर आए। देश का क्या है, तुम्हारा कुत्ता कुत्ता और हमारा कुत्ता टॉमी सुनने के बाद भी जिस थाली में खाया उसमें छेद करने वालों को ढूँढ ही लेगा।

मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास और उमर भी अपराधी घोषित, सरकारी जमीन कब्जा कर बनवाई थी मस्जिद

उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्यनाथ के निर्देशों के बाद माफिया मुख्तार अंसारी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। खबर है कि यूपी पुलिस ने अंसारी की संपत्ति पर ताबड़तोड़ कार्रवाई करने के बाद उसके दोनों बेटों अब्बास और उमर को अपराधी करार देते हुए उन पर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया है।

इससे पहले पिछले साल भी लखनऊ पुलिस ने अब्बास अंसारी के घर पर छापेमारी की थी। उस समय उसके घर से 6 बंदूक और 4,431 कारतूस बरामद हुए थे। हालाँकि, ताजा कार्रवाई लखनऊ पुलिस ने मुख्तार और उसके बेटों पर डालीबाग में सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण कराने के मुकदमे में की है। इसके संबंध में जियामऊ के लेखपाल सुरजन लाल ने शिकायत दर्ज कराई थी

अपनी शिकायत में सुरजन लाल ने आरोप लगाया था कि जिस जमीन पर मुख्तार के बेटों ने टावर बनवाए थे, वह मोहम्मद वसीम की थी। वसीम 1952 में पाकिस्तान चले गए तो संपत्ति निष्क्रांत के रूप में दर्ज हो गई। उक्त जमीन के फर्जी दस्तावेज बनाकर मुख्तार के बेटों ने वहाँ कब्जा करके दो टावर का निर्माण करवा लिया और जमीन पर एक मस्जिद भी बना ली।

पुलिस कमिश्नर की ओर से जारी आदेश के मुताबिक मुख़्तार अंसारी के बेटों उमर और अब्बास पर 25-25 हज़ार रुपए का इनाम घोषित किया गया है। दोनों के खिलाफ कुछ दिन पहले अवैध कब्जे के मामले में एफआईआर हुई थी। लखनऊ में उनके अवैध कब्जे वाली दो इमारतों को ढहा भी दिया गया था।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से यूपी प्रशासन लगातार मुख्तार अंसारी के रसूख को खत्म करने के लिए उसकी संपत्ति और उसके करीबियों की संपत्तियों पर कार्रवाई कर रहा है। 27 अगस्त से लेकर 9 अगस्त यानी मात्र 12 दिनों में मुख्तार अंसारी पर 4 बड़ी कार्रवाई कर चुकी है।

सबसे पहले प्रशासन ने 27 अगस्त को माफिया मुख्तार अंसारी की डालीबाग कॉलोनी में स्थित अवैध संपत्ति को ध्वस्त किया और ऐलान किया कि इमारत ध्वस्त करने में जो खर्चा आया है वह भी मुख्तार अंसारी से वसूला जाएगा। इसके बाद 28 अगस्त को मऊ में उसके करीबी रईस कुरैशी के बूचड़खाने पर प्रशासन ने कार्रवाई की और बुलडोजर चला कर उसे गिरा दिया। खबरों में इस बूचड़खाने की कीमत 40 लाख बताई गई।

फिर 3 सितंबर को मऊ में ही प्रशासन ने अंसारी के वसूली गैंग के गुर्गे सुरेश सिंह की अवैध रूप से कमाई संपत्ति पर शिकंजा कसा और उसकी 1 करोड़ 5 लाख 40 हजार मूल्य की संपत्ति जब्त की गई। इसमें कई वाहन शामिल थे। 9 सितंबर की खबर के मुताबिक ताबड़तोड़ कार्रवाई के चलते उसे 25 वाहन सीज किए जा चुके थे। सभी वाहनों की कीमत 4. 29 करोड़ थी।

बॉलीवुड की पार्टी में पार्टनर बदलने से ले कर ड्रग्स लेना आम बात है: पत्रकार रेनिल का वीडियो में खुलासा

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जब कंगना रनौत बॉलीवुड का काला सच दुनिया के सामने लेकर आईं, तब उनकी आलोचना कई बड़े अभिनेताओं से लेकर राजनेताओं ने की। हालाँकि, इस बीच कई कलाकार उनके समर्थन में आवाज उठाते रहे।

अब सोशल मीडिया पर बॉलीवुड की काली दुनिया का सच उजागर करते एक ऐसे पत्रकार की पुरानी वीडियो सामने आई है, जिसने पहले ही एक शो में बात करते हुए बता दिया था कि बॉलीवुड की पार्टियों में न केवल ड्रग्स लेना आम बात है बल्कि एक ही रात में एक पार्टनर को बदलकर दूसरे पार्टनर के साथ जाना भी आम बात है।

सोशल मीडिया पर वायरल होती यह वीडियो जर्नलिस्ट रेनिल अब्राहिम की है। उन्होंने पिछले साल द रणवीर शो में इन बातों का खुलासा किया था। यूट्यूब पर यह वीडियो 6 सितंबर 2019 को ‘बीयर बाइसेप्स’ चैनल पर अपलोड हुई थी।

इसमें एक जगह रेनिल कहते सुने जा सकते हैं कि उनके लिए बॉलीवुड पार्टियों में यह सब देखना बेहद आम बात है। वो कहते हैं कि ऐसी पार्टियाँ कभी घर में तो कभी क्लब में होती हैं। और उनके कई ऐसे जानकार हैं, जो ऐसी पार्टियों में एक रात में ही एक पार्टनर से दूसरे पार्टनर पर शिफ्ट हो जाते हैं।

रेनिल इन सब चीजों को सामान्य बताते हैं और कहते हैं कि ये सब वो हस्तियाँ भी करती हैं, जिनकी शादी हो चुकी है या वह एक 5-6 साल की मजबूत रिलेनशिप में हैं। वो आगे ऐसी पार्टियों में ड्रग्स सेवन पर भी खुलासा करते हैं। वह कहते हैं कि ऐसा होता जरूर है। लेकिन इसे हर कोई नहीं करता। मगर कुछ लोग हैं, जो ऐसा जरूर करते हैं।

इसके बाद वह एक वाकये का जिक्र करते हुए कहते हैं कि एक पार्टी में बहुत ज्यादा कोकिन शामिल की गई थी। उस पार्टी के लिए महिला यूएस से आई थी और उसने उनके साथ बैठी एक महिला एक्टर को देखकर यह कह दिया था कि तुम एक्टर क्यों हो? तुम और भी ‘बहुत कुछ’ कर सकती थी।

वह इस शो में एक बड़े स्टार के बेटे का नाम लिए बिना कहते हैं कि एक बार उन्होंने सेंटर टेबल पर चढ़कर लड़ाई शुरू कर दी थी। जिसे देख कर पत्रकार को भी लगा था कि आखिर ये सब क्या हो रहा है।

वीडियो जर्नलिस्ट रेनिल अब्राहिम बताते हैं कि बॉलीवुड की युवा जेनरेशन सोशल मीडिया पर अपनी छवि को लेकर बहुत सजग रहती है। एक तरह से उन्हें डर रहता है कि सोशल मीडिया के जरिए कुछ भी बाहर जा सकता है, इसलिए वह सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं करते।

शो में वह एक एक्टर के लड़के का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि उन्हें ये बात कई लोगों से सुनने को मिली है कि कोई पहचान न होने के बावजूद भी उस एक्टर का लड़का फीमेल ब्लॉगर और मॉडल्स को मैसेज करता है और जब कोई उसके साथ सोने से मना कर देता है तो वो इस बात को अपने अपमान की तरह लेता है।

सोशल मीडिया पर इस क्लिप को शेयर करके दावा किया जा रहा है कि वह लड़का जरूर अनिल कपूर का बेटा और सोनम कपूर का भाई हर्षवर्धन ही है।

यहाँ बता दें कि इस पूरे शो को सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड में यह सब इतना आम है कि एक पत्रकार अब इन चीजों को लेकर सहज हो गया है। वह ड्रग्स सेवन को आम बताता है और पार्टनर बदलने को उनकी चॉइस कहता है।

CM गहलोत जी… अपने ‘सबसे भ्रष्ट मंत्री, भ्रष्टाचार के माफिया’ को बर्खास्त करें: कॉन्ग्रेसी विधायक की चिट्ठी, मजे ले रही BJP

राजस्थान की राजनीति में उठा पटक भले ही टीवी में दिखनी बंद हो गई हो, मगर अंदरुनी गहमागहमी अभी भी चालू है। ताजा खबर है कि कोरोना वायरस को शराब से खत्म करने का दावा करने वाले राज्य के वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी विधायक भरत सिंह कुंदनपुर ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिख कर सबसे भ्रष्ट मंत्री को कैबिनेट से हटाने की बात कही है। साथ ही उस मंत्री को भ्रष्टाचार का माफिया भी बताया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भरत सिंह ने अपने पत्र में लिखा, “समाचार पत्रों में पढ़ा है कि आपने (सीएम अशोक गहलोत) प्रभारी मंत्रियों के जिलों में फेरबदल किया है। इसका कितना लाभ होगा, उसको परखने में समय लगेगा। इस बात की आवश्यकता है कि जनता में संदेश देने के लिए आप अपने मंत्रिमंडल के सबसे भ्रष्ट मंत्री को बर्खास्त करें। एक बार पहले भी आप मुख्यमंत्री रहते उनको हटा चुके हैं। यह मंत्री भ्रष्टाचार के माफिया हैं। इनका नाम लिखना आवश्यक नहीं समझता हूँ, गंदगी की बदबू नजदीक के लोगों को ज्यादा दुर्गंध देती है।”

14 सितंबर 2020 को भरत सिंह का लिखा पत्र

पत्र देख कर भाजपा नेताओं ने ली सीएम गहलोत की चुटकी

मुख्यमंत्री को लिखे हालिया पत्र के बाद भाजपा नेता इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर शेयर करके सीएम गहलोत को घेर रहे हैं। सतीश पुनिया ने पत्र साझा करते हुए लिखा, “यह लो जी, एकदम ताजा है और पक्का। जिम्मेदारी से कह सकता हूँ कि यह पत्र बीजेपी राजस्थान ने नहीं लिखवाया है, माखन चुराया किसने? कब? फिर भी बने हुए हैं, बनाए हुए हैं। अशोक गहलोत जी, इश्क के इम्तिहां और भी हैं…।”

वहीं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी इसे लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर निशाना साधा। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “लगता है मुख्यमंत्री जी द्वारा कृत फिल्म नकारा निकम्मा का भाग-2 ही जल्द ही रिलीज होने वाला है।”

पिछले साल भी भरत सिंह ने लिखा था पत्र

बता दें कि भले ही भरत सिंह ने अपने पत्र में किसी नेता का नाम न लिया हो। लेकिन उनके इशारों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह प्रमोद जैन भाया को मंत्रिमंडल से हटाने की बात कर रहे हैं। चूँकि प्रमोद जैन ही ऐसे पार्टी के राजनेता हैं, जिन्हें पिछली बार भी कैबिनेट से हटाया गया था।

राजस्‍थान कांग्रेस, राजस्‍थान कांग्रेस में सिर-फुटौव्‍वल, विधायक ने मंत्री पर लगाया भ्रष्‍टाचार का आरोप
पिछले साल सीएम गहलोत को लिखा पत्र

इसके अलावा उन्हीं पर भरत सिंह अक्सर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते रहते हैं। इससे पहले भी भरत सिंह ने सीएम अशोक गहलोत को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में भी उन्होंने प्रमोद जैन भाया पर इशारों में भ्रष्टाचार के आरोप मढ़े थे। साथ ही खनिज विभाग में होने वाले भ्रष्टाचार के मामले में खनिज मंत्री यानी प्रमोद जैन को भ्रष्टाचार की गंगोत्री बताया था।

शराब से होगा कोरोना खत्म

याद दिला दें, सांगोद के विधायक भरत सिंह कुंदनपुर कॉन्ग्रेस के वही वरिष्ठ नेता हैं, जो मई में भी चर्चा में आए थे। उन्होंनें कोरोना वायरस के बीच प्रदेश में शराब की दुकानें खोलने की अपील सीएम गहलोत से की थी। उन्होंने इसके लिए सीएम को पत्र भी लिखा था। कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा था कि जब कोरोना वायरस हाथों को अल्कोहल से धोने पर साफ हो सकता है तो इसे पीने से गले का वायरस भी जरूर साफ हो जाएगा।

अपने पत्र में उन्होंने अवैध शराब के बढ़ते धंधे का मुद्दा उठाते हुए और लॉकडाउन के कारण होते आर्थिक घाटे का हवाला देते हुए सलाह दी थी कि सरकार शराब की दुकानें खोल दे। इस फैसले से पीने वालों को शराब मिलेगी और सरकार को राजस्व मिलेगा। उन्होंने कहा था, “जब अल्कोहल से हाथों को धोने से कोरोना वायरस साफ हो सकता है, तो शराब पीने से निश्चित रूप से गले का वायरस साफ हो जाएगा। अवैध शराब पीकर जान गँवाने से तो ये कहीं अच्छा है।”

मार्क्स चचा नहीं जानते थे कि पुलिस की लाठी से नास्तिक वामपंथियों का मजहब बाहर निकल आएगा

ऑन डिमांड एथीस्टों और पार्ट टाइम वामपंथियों से कार्ल मार्क्स चचा निराश हैं। मार्क्स चचा का कहना है कि वामपंथ और नास्तिकता ही इस सदी का सबसे बड़ा स्कैम है। कॉमरेड जब तक क्रांति-क्रांति चिल्लाता तब तक मार्क्स चचा को यकीन था कि यह आज नहीं तो कल आएगी। लेकिन एक सुबह क्रांतिकारी कॉमरेड का जो निकला, वह क्रांति नहीं बल्कि उसका मजहब था।

एक दिन कॉमरेड ‘अल्हम्दुलिल्लाह’ चिल्लाने लगा तो मार्क्स चचा के मुँह से भी अपशब्द निकल पड़े। लेकिन मार्क्स चचा का सवाल आज भी यही है कि क्रांति की बातें करता युवा पुलिस और दंगों की जाँच का नाम आते ही मुस्लिम क्यों बन जाता है? पुलिस की लाठी में ऐसी कौन सी ताकत है, जो उसे देखते ही क्रांतिकारियों का मजहब बाहर निकल आता है।

मार्क्स चचा का कहना है कि जमानत के लिए किसी कॉमरेड को गर्भ ठहरना, मुस्लिम बन जाने से श्रेयस्कर है। मगर मार्क्स चचा को क्या पता था कि सर पर ओले पड़ते ही वामपंथ को ‘गुड बाय’ कहने की बारी हर वक्त किसी पितृसत्ता से लड़ती वोक-महिला की नहीं होगी। जब कोई उमर खालिद UAPA के तहत गिरफ्तार होगा तो उसके पास जमानत के लिए उसकी प्रेग्नेंसी रिपोर्ट उसका दीन ही होगा।

याद कीजिए वह समय जब जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर, और ऑन डिमांड एथीस्ट, जिस पर चंदा भक्षी होने के भी आरोप रहे। शेहला रशीद ने जब शाह फैजल के साथ जम्मू एंड कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट को ज्वाइन किया था, तो अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही उन्होंने इस्लामी नारे से की थी।

जब तक ये क्रांतिजीव जेएनयू जैसे संस्थान में फ़्रीलांस और ‘आजाद’ प्रोटेस्टर के रूप में पहचानी जाती है, तब तक ये वामपंथी स्वरुप में रहती है। ये जेएनयू में रहते वक़्त ‘अकेली, आवारा और आजाद’ है, लेकिन जम्मू कश्मीर पहुँचते ही हिजाब और बुर्क़े में नजर आई। और देखते ही देखते एक वामपंथन मुस्लिम बन गई।

दुर्भाग्यवश शेहला का राजनीतिक जीवन महज 7 माह ही चला लेकिन यह एक अच्छा उदाहरण था यह साबित करने के लिए कि एक वामपंथी होने से पहले और बाद भी एक मुस्लिम के भीतर उसका मजहब जिंदा रहता है।

यह वही शेहला रशीद थी, जो खुद को वामपंथन कहती रही। मगर जिस वामपंथ में धर्म-मजहब की कोई पहचान है ही नहीं, वो शेहला रशीद शाहीन बाग़ में नागरिकता कानून विरोधी रैलियों में, मुस्लिमों के मजहबी उन्मादी नारों की बात करते हुए कहती रही कि अगर आप उनसे शर्मिंदा हैं तो आप हमारे सहयोगी नहीं हैं। अगर आपको इन नारों से दिक्कत है, तो आप भी समस्या का ही हिस्सा हैं।

और इनके वो मजहबी नारे क्या थे? वो नारे थे: हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर, तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह…

यही शेहला रशीद के सहयोगी और छात्र नेता उमर खालिद के साथ भी हुआ है। वह उमर खालिद, जो हमेशा से ही पोटेंशियल वामपंथी और पोटेंशियल मुस्लिम बना रहा, UAPA के तहत गिरफ्तारी होते ही पूरा मुस्लिम निकल आया।

नागरिकता कानून के विरोध से शुरू हुआ यह खेल हमेशा से ही मजहबी था। यहाँ तक कि शशि थरूर तक इस बात से नाराज थे और उन्होंने कहा था कि मुस्लिमों को समझना चाहिए कि CAA/NRC के प्रदर्शन में ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ जैसे नारों की जगह नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह को लाया जा रहा है। ये बात कई मुस्लिमों को नहीं पची क्योंकि उनके लिए हर प्रदर्शन विशुद्ध रूप से मजहबी है क्योंकि उनके लिए पहचान का मतलब भारतीयता, नागरिकता और सामान्य बातों से परे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है, उम्माह है, कौम है।

आश्चर्य यह है कि ‘एंटी एस्टेब्लिशमेंट’ की रोटियाँ सेकने वाले ये गिरोह, ‘हम लड़ेंगे साथी’ की कसमें खाने वाले ये गिरोह ‘आजादी की चिलम फूँकते इन गिरोहों का पुलिस और संस्थाओं का नाम आते ही सबसे पहले मजहब क्यों बाहर निकल आता है?

जिस तरह से पूर्वोत्तर दिल्ली इस साल की शुरुआत में ही हिन्दू-विरोधी दंगों से दहक उठी, वह मुगलकालीन दौर की याद दिलाता है। इस्लामी नारे सड़कों पर थे। लोगों ने खुलकर स्वीकार किया कि शाहीनबाग़ पूरी तरह से मजहबी आंदोलन है। इस शाहीनबाग़ की पटकथा में जो कुछ घटित हुआ वह सब कुछ ही समय सबके सामने आ गया।

दिल्ली पुलिस ने दंगों की जाँच की तो इसमें सिमी और पीएफआई की फंडिंग से लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए। इसी में यह तथ्य भी सामने आया कि जेएनयू के ये कथित छात्रनेता दिल्ली दंगों की साजिशकर्ताओं के प्रत्यक्ष सम्पर्क में थे और इनके बीच दंगों, विरोध प्रदर्शनों को लेकर बन्द कमरों में रणनीति बना करती थी। यही उमर खालिद तब दिल्ली दंगों के प्रमुख आरोपित ताहिर हुसैन के भी सम्पर्क में था।

कुछ ही वर्ष पूर्व उमर खालिद को लेकर उसके कम्युनिस्ट साथियों ने दावे किए थे कि उमर खालिद मुस्लिम नहीं बल्कि, अन्य कॉमरेड्स की ही तरह सच्चा कम्युनिस्ट है। लेकिन जब-जब उमर खालिद विवादों में घिरा है और उसकी गिरफ्तारी की बात आई हैं, सबसे पहले उमर खालिद के भीतर का मजहब ही सामने रखा गया। इस बार फिर यह उमर खालिद इस्लाम का अनुयायी बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि दिल्ली दंगों में उसे उसके मजहब के कारण घसीटा जा रहा है।

खास बात यह है कि जब आम आदमी पार्टी का नेता ताहिर हुसैन पर दिल्ली पुलिस का शिकंजा कसा जाने लगा, तब उसका भी सबसे पहले मजहब ही बाहर निकल आया था और समुदाय विशेष द्वारा खुद को अल्पंसख्यक बताकर निशाना बनाए जाने का पारंपरिक विक्टिम कार्ड खेला गया। जिस अमानतुल्लाह खान की पूरी सर्दियाँ शाहीनबाग़ के मंच से भड़काऊ इस्लामी नारे लगाते हुए गुजरी, वह भी यही कहता मिला कि ताहिर हुसैन को उसके मजहब की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। और कुछ ही दिन में खुद ताहिर हुसैन ने स्वीकार किया कि वो हिंदुओं को सबक सिखाना चाहता था।

वामपंथ की दयनीय मृत्यु

मार्क्सवाद खालिस अर्थशास्त्र से पैदा होकर एक अलग धर्म बनकर तैयार हुआ। ये कूप-मंडूक कम्युनिस्ट मार्क्सवादी किसी कट्टरपंथी मजहबी से भी ज्यादा उच्चकोटि के कट्टरपंथी हैं। खुद को विचारों का पुरुष सूक्त (पुरुषसूक्त, ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख सूक्त यानि मंत्र संग्रह) मानने वाले वामपंथ की यह वैचारिक मृत्यु दयनीय है।

कहाँ इस कॉमरेड को ‘आर्यों’ को विदेशी साबित करने में अपनी शक्ति का निवेश करना था और कहाँ वह अपने मजहब के प्रमाण पत्र बटोरता नजर आ रहा है। इन सब कॉमरेडों ने घोषणापत्र, यानी मेनिफेस्टो में धर्म को वामपंथ की परिधि से बाहर करने वाले कार्ल मार्क्स चचा की आत्मा को ठेस लगाई है। इनसे बेहतर तो शरजील इमाम था। सफूरा जरगर भी थी, लेकिन उसके नाम में उसका मजहब था और हाथों में प्रेग्नेंसी रिपोर्ट! मगर शरजील ने ना ही नास्तिकता का ढोंग किया और न ही कोई वामपंथ का मुखौटा चुना। उसने राजद्रोह के केस और गिरफ्तारी के बाद भी खुलकर अपने शब्दों को चुना और गर्व से कहा कि यह सब प्रगतिशील वामपंथ नहीं बल्कि इस्लामियत ही थी।

वामपंथ खुद को तार्किक बताता फिरता है, उसने ‘अन्धविश्वास’ से अपने हर संबंध को हमेशा नकारा है। लेकिन आज देखने को मिलता है कि आज क्रांतिजीव को वाद-विवाद, तर्क, अर्थशास्त्र, विज्ञान कुछ नहीं चाहिए, उसे अगर कुछ चाहिए तो सिर्फ क्रांति! यही क्रांति इसका धर्म है, यही कट्टरता ही इसका स्वभाव है और मौकापरस्ती ही इसका आखिरी ‘-इज़्म’ है।

BJP सांसद साध्वी प्रज्ञा को जिस कॉन्ग्रेसी MLA ने जिंदा जलाने की दी थी धमकी, कोरोना वायरस से हुई मौत

मध्य प्रदेश के कॉन्ग्रेस विधायक गोवर्धन डांगी का गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में देहांत हो गया। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने ट्वीट किया कि ब्यावरा के विधायक गोवर्धन डांगी ने कोरोनो वायरस संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया।

मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता सैद जाफ़र ने कहा,

“डांगी कुछ दिन पहले कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए थे। उन्हें भोपाल के चिरायु मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। तबीयत खराब होने के बाद उन्हें गुरुग्राम के एक अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया था। मंगलवार (15 सितंबर, 2020) सुबह उनका निधन हो गया।”

साध्वी प्रज्ञा को जिंदा जलाने की धमकी दी

दिवंगत कॉन्ग्रेस विधायक गोवर्धन डांगी ने भारतीय जनता पार्टी की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को जिंदा जलाने की खुलेआम धमकी दी थी। नवंबर 2019 में पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को ‘आतंकवादी’ कहे जाने के एक दिन बाद, ब्यावरा कॉन्ग्रेस के विधायक, गोवर्धन डांगी ने भोपाल के सांसद को धमकी देते हुए कहा था कि वह उन्हें जिंदा जला देंगे।

ब्यावरा के विधायक गोवर्धन डांगी ने तब कहा था:

“अगर वो मध्य प्रदेश की धरती पर कदम रखेंगी तो हम सिर्फ उनका पुतला नहीं जलाएँगे… हम उन्हें भी जिंदा जलाएँगे।”

इस धमकी के बाद, भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा भोपाल में एक पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठी थीं। उनकी माँग थी कि कॉन्ग्रेस के विधायक गोवर्धन डांगी के खिलाफ FIR दर्ज की जाए। लेकिन तब राज्य में कमलनाथ की सरकार थी और सांसद की माँग को थाने में अनसुना कर दिया गया था।