1947 में 15 अगस्त को भारत को सिर्फ आजादी ही नहीं मिली थी, बल्कि विभाजन का एक ऐसा दंश भी मिला था जिससे देश अब तक उबर नहीं पाया है। एक कहानी बेअंत सिंह की भी है, जो मेरठ की गलियों में आपको रिक्शा चलाते दिख जाएँगे। 84 साल के बेअंत सिंह मेरठ के सबसे बुजुर्ग रिक्शा चालक हैं। अब उनके पाँवों ने जवाब देना शुरू कर दिया है, लेकिन वो अभी भी जीविका के लिए रिक्शा चलाते हैं।
‘न्यूज 18’ की खबर के अनुसार, बेअंत सिंह का ब्लड प्रेशर सही नहीं रहता है, उनके फेफड़े अब पहले की तरह नहीं रहे और उनकी आँखों पर सफेद रंग के धब्बे नजर आते हैं। लेकिन, 7 दशक पहले का वो दृश्य उनके सामने ज्यों का त्यों कौंध जाता है, जब उनकी माँ और भाई को उनके सामने ही जला डाला गया था। वह पल आज भी उनकी जेहन में इस तरह कैद है जैसे कल की ही बात हो। उस घटना के बारे में बाते करते हुए वे रो पड़ते हैं।
रिक्शा चालक बेअंत सिंह ने विभाजन को न सिर्फ देखा है. बल्कि उन्होंने और उनके परिवार ने इस त्रासदी को झेला भी था। उनका मानना है कि भारत ने विभाजन की त्रासदी को भुला दिया है। 22 जनवरी 1936 को जन्मे बेअंत सिंह ने जम्मू-कश्मीर में राजा हरि सिंह के राज में अपनी शुरुआती ज़िंदगी बिताई थी। लेकिन आर्थिक संकट और सिखों पर अत्याचार के कारण उनके परिवार को रावलपिंडी शिफ्ट होना पड़ा था।
उस समय के स्वतंत्रता सेनानियों भगत सिंह, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के प्रशंसक रहे छोटे बेअंत अक्सर रेडियो पर इन नेताओं को सुन कर स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहते थे। आजादी तो आई लेकिन इसके लिए न सिर्फ भारत, बल्कि सिंह को भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जब नेहरू आजादी के बाद अपना ऐतिहासिक भाषण दे रहे थे, तब बेअंत सिंह मात्र 11 साल के थे।
जब उनके परिवार पर हमला हुआ था तब वो किसी तरह वहाँ से भागने में कामयाब हुए। इस दौरान उनकी मुलाकात एक सैन्य अधिकारी से हुई जिसने उन्हें अमृतसर की ट्रेन पर बिठा दिया। पाकिस्तान से प्रताड़ित कर भगाए गए शरणार्थियों को अमृतसर में ही रखा जा रहा था। इसके बाद एक भारतीय के रूप में बेअंत सिंह की दूसरी ज़िंदगी शुरू हुई। जब वो दिल्ली पहुँचे तो उन्होंने अजीब ही नजारा देखा।
“It’s as if everyone wants to forget the partition because it makes them uncomfortable.”
Beant Singh, the oldest rickshaw puller in Meerut has been a survivor of the horrors of 1947.@1947Partition#IndiaAt74
उन्होंने देखा कि दिल्ली में विभाजन के बाद काफी बुरी स्थिति थी और लोग नई ज़िंदगी व रोजगार के लिए तरस रहे थे। विभाजन का दंश झेलने वालों का कोई माई-बाप नहीं था। वो कहते हैं कि वहाँ भीड़ ही भीड़ थी, लेकिन करने को कोई काम नहीं था, जिससे जीविका चल पाए। इसके बाद वो रावलपिंडी के अपने पुराने दोस्तों से मिले, जो विभाजन के बाद उत्तर प्रदेश में बस गए थे। उन्होंने ही बेअंत को भोजन और छत दिया, जीविका के लिए रिक्शा दिया।
आज 84 साल के बेअंत सिंह रिक्शा चला कर बचाए गए धन से ही अपना गुजारा चलाते हैं। वो बताते हैं कि शुरुआत में उनके पास लाइसेंस नहीं था तो उन्हें रात के अँधेरे में रिक्शा चलाना पड़ता था। वो कहते हैं कि अगर उनके पास रिक्शा नहीं होता तो पता नहीं आज उनकी क्या स्थिति होती। मेरठ में रहने वाले बेअंत सिंह आजकल की खबरों पर भी नजर रखते हैं और हालिया आपराधिक घटनाओं से नाराज भी हैं।
ज्ञात हो कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों की विस्थापन हुआ था। इस दौरान करीब 6,00,000 लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दीवार से फोड़ दिए गए, बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काट दिए गए और गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किला की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित किया। सम्बोधन की शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कोरोना के इस असाधारण समय में, ‘सेवा परमो धर्म:’ की भावना के साथ, अपने जीवन की परवाह किए बिना हमारे डॉक्टर्स, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, एंबुलेंस कर्मी, सफाई कर्मचारी, पुलिसकर्मी, सेवाकर्मी, चौबीसों घंटे लगातार काम कर रहे हैं।
पीएम मोदी ने 74वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने सम्बोधन के दौरान याद दिलाया कि अगले वर्ष हम अपनी आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर जाएँगे, एक एक बहुत बड़ा पर्व हमारे सामने है। उन्होंने याद किया कि गुलामी का कोई कालखंड ऐसा नहीं था जब हिंदुस्तान में किसी कोने में आजादी के लिए प्रयास नहीं हुआ हो, प्राण-अर्पण नहीं हुआ हो।
उन्होंने कहा कि उस कालखंड में विस्तारवाद की सोच वालों ने दुनिया में जहाँ भी फैल सकते थे, फैलने की कोशिश की। लेकिन भारत का आजादी आंदोलन दुनिया में एक प्रेरणा पुंज बन गया, दिव्य स्तंभ बन गया और दुनिया में आजादी की अलख जगी। पीएम मोदी ने कहा कि आजादी का पर्व हमारे लिए आजादी के वीरों को याद करके नए संकल्पों की ऊर्जा का एक अवसर होता है। ये हमारे लिए नई उमंग, उत्साह और प्रेरणा लेकर आता है।
उस कालखंड में विस्तारवाद की सोच वालों ने दुनिया में जहां भी फैल सकते थे, फैलने की कोशिश की, लेकिन भारत का आजादी आंदोलन दुनिया में एक प्रेरणा पुंज बन गया, दिव्य स्तंभ बन गया और दुनिया में आजादी की अलख जगी। #AatmaNirbharBharatpic.twitter.com/urQXTzbNu2
प्रधानमंत्री ने कहा कि भीषण युद्धों और भयानकता के बीच भी भारत ने आजादी की जंग में कमी और नमी नहीं आने दी। ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते हुए पीएम मोदी ने पूछा कि आखिर कब तक हमारे ही देश से गया कच्चा माल, फिनिश्ड प्रोडक्ट बनकर भारत में लौटता रहेगा? उन्होंने याद किया कि एक समय था, जब हमारी कृषि व्यवस्था बहुत पिछड़ी हुई थी। तब सबसे बड़ी चिंता थी कि देशवासियों का पेट कैसे भरे।
पीएम मोदी ने आश्वासन दिया कि आज जब हम सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों का पेट भर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने समझाया कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब सिर्फ आयात कम करना ही नहीं, हमारी क्षमता, हमारी क्रिएटिविटी और हमारी स्किल्स को बढ़ाना भी है।
उन्होंने अंतरिक्ष सेक्टर को प्राइवेट प्लेयर्स के लिए खोलने की बात करते हुए कहा कि इससे काफी रोजगार पैदा होंगे ।उन्होंने बलिदानियों को नमन करते हुए कहा कि आज जो हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, उसके पीछे माँ भारती के लाखों बेटे-बेटियों का त्याग, बलिदान और माँ भारती को आजाद कराने के लिए समर्पण है।
74वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्बोधन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना महामारी के बीच 130 करोड़ देशवासियों ने आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लिया। आत्मनिर्भर भारत देशवासियों के मन-मस्तिष्क में छाया है। ये आज सिर्फ शब्द नहीं रहा, बल्कि 130 करोड़ देशवासियों के लिए मंत्र बन गया है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत आत्मनिर्भर के सपने को चरितार्थ करके रहेगा। उन्होने देश की प्रतिभा, सामर्थ्य, युवाओं, मातृ-शक्तियों पर भरोसा जताया।
पीएम ने कहा कि मेरा हिंदुस्तान की सोच-अप्रोच पर भरोसा है। इतिहास गवाह है कि भारत एक बार ठान लेता है तो उसे करके रहता है। उन्होंने कहा कि भारत को आधुनिकता की तरफ तेज गति से ले जाने के लिए देश के Overall Infrastructure Development को एक नई दिशा देने की जरूरत है। इसके लिए ‘National Infrastructure Pipeline Project’की घोषणा की गई। प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में कहा:
“आज दुनिया की बहुत बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ भारत का रुख कर रही हैं। हमें ‘Make in India’ के साथ-साथ ‘Make for World’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ना है। वन नेशन-वन टैक्स Insolvency और Bankruptcy Code बैंकों का मर्जर, आज देश की सच्चाई है। इस शक्ति को, इन रिफॉर्म्स और उससे निकले परिणामों को देख रही है। बीते वर्ष भारत में FDI ने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। भारत में FDI में 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ये विश्वास ऐसे ही नहीं आता है। कौन सोच सकता था कि कभी देश में गरीबों के जनधन खातों में हजारों-लाखों करोड़ रुपए सीधे ट्रांसफर हो पाएँगे? कौन सोच सकता था कि किसानों की भलाई के लिए APMC एक्ट में इतने बड़े बदलाव हो जाएँगे। सिर्फ कुछ महीना पहले तक N-95 मास्क, PPE किट, वेंटिलेटर ये सब हम विदेशों से मँगाते थे। आज इन सभी में भारत, न सिर्फ अपनी जरूरतें खुद पूरी कर रहा है, बल्कि दूसरे देशों की मदद के लिए भी आगे आया है।“
स्वतंत्रता दिवस सम्बोधन में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज देश अनेक नए कदम उठा रहा है, इसलिए आप देखिए स्पेस सेक्टर को खुला कर दिया, देश के युवाओं को अवसर मिल रहा है। हमने कृषि क्षेत्र को बंधनों से मुक्त कर दिया। हमने आत्मनिर्भर भारत बनाने का प्रयास किया है। पीएम ने कहा कि आज दुनिया इंटर-कनेक्टेड है, इसलिए समय की माँग है कि विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान बढ़ाना चाहिए, इसके लिए भारत को आत्मनिर्भर बनना ही है।
पीएम मोदी ने देशवासियों से कहा कि जब हमारा अपना सामर्थ्य होगा तो हम दुनिया का कल्याण भी कर पाएँगे। उन्होंने समझाया कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब सिर्फ इंपोर्ट को कम करना ही नहीं है, बल्कि हमारे सामर्थ्य के आधार पर अपने कौशल को बढ़ाना है। आत्मनिर्भर भारत में कई चुनौतियाँ होंगी, लेकिन अगर ये चुनौतियाँ हैं तो देश के पास करोड़ों समाधान देने वाली शक्ति भी है।
उन्होंने कहा कि विकास के मामले में देश के कई क्षेत्र भी पीछे रह गए हैं। ऐसे 110 से ज्यादा आकांक्षी जिलों को चुनकर, वहाँ पर विशेष प्रयास किए जा रहे हैं ताकि लोगों को बेहतर शिक्षा मिले, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलें, रोजगार के बेहतर अवसर मिलें। उन्होंने जानकारी दी कि वोकल फॉर लोकल, Re-Skill और Up-Skill का अभियान, गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों के जीवनस्तर में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का संचार करेगा।
कृषि सेक्टर की बात करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस सम्बोधन में बताया कि आत्मनिर्भर भारत की एक अहम प्राथमिकता है- आत्मनिर्भर कृषि और आत्मनिर्भर किसान। पीएम मोदी ने बताया कि देश के किसानों को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर देने के लिए कुछ दिन पहले ही एक लाख करोड़ रुपए का ‘एग्रीकल्चर इनफ्रास्ट्रक्चर फंड’ बनाया गया है। उन्होंने बताया कि ‘जल जीवन मिशन’ के तहत आज हर रोज एक लाख से ज्यादा घरों को पानी के कनेक्शन से जोड़ने में सफलता मिल रही है।
पीएम मोदी ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में, आधुनिक भारत के निर्माण में, नए भारत के निर्माण में, समृद्ध और खुशहाल भारत के निर्माण में, देश की शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है। इसी सोच के साथ देश को एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति मिली है। उन्होंने कहा कि कोरोना के समय में हमने देख लिया है कि डिजिटल भारत अभियान की क्या भूमिका रही है। अभी पिछले महीने ही करीब-करीब 3 लाख करोड़ रुपए का ट्रांजेक्शन अकेले BHIM UPI से हुआ है।
उन्होंने कहा कि मध्यम वर्ग से निकले प्रोफेशनल्स भारत ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी धाक जमाते हैं। मध्यम वर्ग को अवसर चाहिए, मध्यम वर्ग को सरकारी दखलअंदाजी से मुक्ति चाहिए। ये भी पहली बार हुआ है जब अपने घर के लिए होम लोन की EMI पर भुगतान अवधि के दौरान 6 लाख रुपए तक की छूट मिल रही है। उन्होंने याद दिलाया कि अभी पिछले वर्ष ही हजारों अधूरे घरों को पूरा करने के लिए 25 हजार करोड़ रुपए के फंड की स्थापना हुई है।
इस पर देश 100 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अलग-अलग सेक्टर्स के लगभग 7 हजार प्रोजेक्ट्स को identify भी किया जा चुका है।
प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि साल 2014 से पहले देश की सिर्फ 5 दर्जन पंचायतें ऑप्टिल फाइबर से जुड़ी थीं। बीते 5 साल में देश में डेढ़ लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया है। उन्होंने जानकारी दी कि आने वाले 1000 दिन में देश के हर गॉंव को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा जाएगा। साथ ही बताया कि देश में नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति का मसौदा तैयार कर लिया गया है।
भारत शनिवार (अगस्त 15, 2020) को अपना 74वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार 7वीं बार ध्वजारोहण करेंगे। कोरोना वायरस संक्रमण आपदा के कारण इस बार लाल किले पर होने वाले समारोह में लोगों की उपस्थिति बहुत कम होगी। लाल किले के लाहौर दरवाजे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया।
नीचे आप स्वतंत्रता दिवस समारोह के कार्यक्रम को लाइव देख सकते हैं। कोरोना वायरस के कारण स्कूल-कॉलेज भी बंद हैं और कई जगह जहाँ झंडोत्तोलन होते आ रहे थे, वहाँ इस बार नहीं होंगे। ऐसे में आप घर बैठ कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए जा रहे झंडोत्तोलन का गवाह बनते हुए उनके सम्बोधन को सुन सकते हैं। नीचे हम लाल किले पर होने वाले वार्षिक स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का लाइव वीडियो पेश कर रहे हैं:
देखें प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी के राष्ट्र को सम्बोधन (लाइव)
हालाँकि, इस बार भी अधिकारियों और नेताओं को मिला कर स्वतंत्रता दिवस समारोह में उपस्थित लोगों की संख्या 4000 है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि इस अवसर पर हमें ‘आत्मनिर्भर भारत’ के पीएम मोदी के संकल्प को पूरा करने पर जोर देना चाहिए। राजनाथ सिंह ने भी कहा कि स्वतंत्रता सही मायनों में तभी साकार होगी जब हम पूरी तरह आत्मनिर्भर बन जाएँगे। उन्होंने इसके लिए शपथ लेने की बात कही।
पीएम मोदी ने लाल किले पर झंडा फहराने से पहले राजघाट पर जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को श्रद्धांजलि दी और उनके समाधि की प्ररिक्रमा की। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से भी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी।
वाल्मीकि रामायण से राधेश्याम रामायण तक। लोमश संहिता के रामायण से रामकीर्ति महाकाव्य तक। नेपाल के भानुभक्त कृत रामायण से तुर्की के खोतानी रामायण तक। पूरी दुनिया में 300 से अधिक रामायण हैं। भारत समेत दुनिया के 10 देशों की करीब दो दर्जन भाषाओं में रामायण के 3000 से अधिक संस्करण हैं।
इन सब रामकथाओं के मूल में मानवता, कर्तव्यनिष्ठा, धर्मपरायणता, तितिक्षा और करुणा का वही भाव है, जो सनातन धर्म अपने में समेटे हैं। यह, ‘उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं, वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र संततिः’ के कण-कण में विराजमान है।
A blessed day in Ayodhya.
This day will remain etched in the memory of every Indian.
May the blessings of Bhagwan Shree Ram always be upon us. May India scale new heights of progress. May every Indian be healthy and prosperous. @ShriRamTeerthpic.twitter.com/4JbHYcTv0b
जाहिर है, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में जो कुछ हुआ वह महज एक पूजा स्थल का शिलान्यास ही नहीं था। इसी तरह 11 अगस्त 2020 की रात बेंगलुरु में जो कुछ हुआ वह केवल एक भीड़ की हिंसा नहीं थी। मंदिर के सामने बनी वह मानव श्रृंखला उतनी ही उदार और निश्चल नहीं थी, जितनी हमारी मीडिया ने हमें बताया।
सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक तरफ है करीब 1000 साल से चल रहा छल, प्रपंच और जोर। दूसरी तरफ है हिंदुओं का वह नैतिक बल, जिसका पहला पड़ाव सोमनाथ का पुनरुद्धार था। वह भारतीय चेतना, जिसकी अप्रतिम ऊर्जा अयोध्या है। वह सनातनी संस्कृति, जिसका प्रकाश पुंज मथुरा-काशी है।
पिलग्रिमेज टू फ्रीडम (Pilgrimage To Freedom) में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने कहा है, “मेरे लिए उस आजादी का कोई मूल्य नहीं है जो मुझे भगवद्गीता से वंचित कर दे या मेरे जैसे लाखों लोगों के मन में मंदिरों के प्रति आस्था को उखाड़ फेंके। मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के सपने को जीने और उसे साकार करने का विशेषाधिकार दिया गया है।”
सोमनाथ पुनरुद्धार को लेकर नेहरू को मुंशी का जवाब
यदि सोमनाथ सनातन सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक था, तो अयोध्या का राम मंदिर सनातन चेतना की स्वतंत्रता का प्रतीक है। जैसा कि पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. डेविड फ्राउली कहते हैं, “5 अगस्त 2020 को राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की नींव 1947 के बाद भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तिथि है। यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिकता की स्वतंत्रता का प्रतीक है।”
सोमनाथ में विध्वंस के अवशेष (1895) साभार: The British Library Board
एक लेख में विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने लिखा है, “अयोध्या में बनने जा रहा मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं होगा, बल्कि यह भारत में रामत्व यानी स्वाभिमान, समरसता, समृद्धि, सुख, शांति और सौहार्द की स्थापना करेगा। यह विशाल मंदिर भारत के विराट स्वरुप का दर्शन भी कराएगा।”
सोमनाथ, सनातन सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक
स्पष्ट है कि अयोध्या का राम मंदिर हिंदुओं के 500 साल के संघर्ष की केवल तार्किक परिणति भर भी नहीं है। यह उस खतरे से मुक्ति का मार्ग है, जिसका जिक्र नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से बरसों पहले किया था। अमेरिका के 9/11 के हमले के बाद ‘इस्लामिक आतंकवाद’ विषय पर एक टीवी डिबेट के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पूरी दुनिया के लिए इस्लाम का एक रोडमैप है। इसके तीन हिस्से हैं;
दारुल अमन
दारुल हरम
दारुल इस्लाम
भारत में पिछले 1000 सालों से जो कुछ हो रहा वह दारुल हरम का हिस्सा है। वरना क्या कारण था कि भारत के शासन सूत्रों पर कब्जा होने के बावजूद इस्लामिक आक्रांताओं ने हमारे मंदिरों का विध्वंस किया? जहाँ पहले से हमारे देवी-देवता विराजमान थे, उन्हीं जगहों को मस्जिद के लिए चुना?
वे तब भी उसी मिशन पर थे, जो कल हमने बेंगलुरु में देखा, परसों कहीं और देखा था, कल कहीं और देखेंगे। इसका स्वरुप अलग हो सकता है पर संदेश हर बार एक ही होता है। वह संदेश है, बुतपरस्ती हराम है। इस्लाम न मानने वाला काफिर है। काफिरों की हत्या जायज है। पूरी दुनिया को दारुल इस्लाम बनाना है।
क्या ‘एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ की संस्कृति केवल दारुल इस्लाम से ही मुकाबिल है?
यकीनन, नहीं। मुकाबला एक चौकड़ी से है। इसमें दारुल इस्लाम की सोच के साथ-साथ वामपंथी इतिहासकारों का फरेब, तुष्टिकरण की राजनीति और ईसाई मिशनरी भी शामिल हैं।
जैसा कि डॉ. फ्राउली कहते हैं, “भारत की प्राचीन और विशाल संस्कृति को वामपंथ के नजरिए से समझना वैसा ही है, जैसे कुएँ के मेढ़क से समुद्र को समझना।” अयोध्या का 500 साल का संघर्ष इसका प्रमाण है। वहाँ राम जन्मभूमि का एक इस्लामी अक्रांता ने विध्वंस किया। लेकिन आजाद भारत में भी उसे जायज ठहराने वाले और राम के अस्तित्व को नकारने वाले वामपंथी इतिहासकार और नेहरू पोषित राजनीति ही थी।
महमूद गजनी ने जब भारत के मंदिरों को लूटा, उनका विध्वंस किया तो उसका जश्न बगदाद के खलीफा और वहाँ के मजहब के समर्थकों ने मनाई थी। उसकी तुलना अरब, सीरिया, ईरान, इराक वगैरह में इसी तरह की फतह हासिल करने वाले नबी के साथियों से हुई। लेकिन, भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने मजहबी उन्माद के विमर्श को ही नेपथ्य में धकेल दिया। हमारी आस्था और हमारे पवित्र जगहों पर प्रहार को ‘लूट’ का नाम दे दिया। कहा कि इन हमलों के पीछे कोई मजहबी मकसद नहीं था। उस समय भारत सोने की खान था, इसके कारण हमला हुआ। सोना मंदिरों में संरक्षित किया जाता था, इसलिए वे निशाना बने।
इंदिरा गाँधी को 1932 में लिखे एक पत्र में नेहरू ने भी इसी सिद्धांत की पैरवी की थी। उनके मुताबिक गजनी वास्तुकला का मुरीद था और उसने मथुरा के मंदिरों की वास्तुकला की बेहद प्रशंसा की थी। लेकिन, नेहरू ने यह नहीं बताया कि इसी गजनी ने सन् 1018 में मथुरा के सारे मंदिरों का ध्वंस कर दिया था। उसके जाने के बाद फिर से मंदिर बने और उनका भी बाद के इस्लामिक अक्रांताओं ने विध्वंस कर दिया। ऐसा ही काशी में हुआ। मथुरा में आज जहाँ शाही ईदगाह मस्जिद खड़ी है, वह श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है। इसी तरह काशी का ज्ञानवापी मस्जिद ध्वस्त किए गए मंदिर पर खड़ा है।
लेकिन नेहरू और वामपंथ पोषित राजनीति और इतिहास की दृष्टि ने स्वतंत्र भारत में भी इस्लाम के नाम पर हर ध्वंस, हर हिंसा को जायज बनाया। जिसने भी इस्लामिक आक्रांताओं के मूर्ति भंजन और हिंदुओं की प्रताड़ना को उजागर किया उसे ‘सांप्रदायिक’ का तमगा दिया गया। धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय अखंडता के लिए खतरा करार दिया गया। सो, ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि आज भी सुनियोजित तरीके से जमा हुए, हिंसा के लिए निकली मजहबी भीड़ को नेपथ्य में धकेल कर बताया जा रहा है कि वह देखो मंदिर बचाने के लिए शांतिप्रिय समुदाय की मानव श्रृंखला।
ऐसे में अयोध्या का राम मंदिर, हिंदू होकर जीने के इस जटिलता से मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता है। जैसा कि पत्रकार ज्ञानेंद्र बरतरिया ने एक लेख में कहा है, “अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का अर्थ है एक युग की समाप्ति और एक नए युग की शुरुआत। यह नया युग भारत के भाग्योदय का है। यह मंदिर ऐसी ऊर्जा पैदा करेगा, जिससे एक नए भारत का निर्माण होगा।”
उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की बाध्यता रहते यह निर्माण अधूरा है।
क्या है प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट?
अयोध्या से रामलला को बेदखल करने के नेहरू के प्रयासों से आप परिचित हैं। जब राम मंदिर का आंदोलन अपने चरम पर था तो कॉन्ग्रेस ने 1991 के चुनावी घोषणा-पत्र में अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के तहत एक कानून का वादा किया। इसका मकसद उन पवित्र भूमि पर हिंदुओं का दावा खत्म करना था, जिसका विध्वंस इस्लामिक अक्रांताओं ने किया था। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि जब घोषणा-पत्र में यह वादा किया गया था, तब राजीव गाँधी कॉन्ग्रेस के सर्वेसर्वा थे। उनकी हत्या चुनाव प्रचार के दौरान हुई थी।
चुनावों के बाद जब 1991 में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी तो मॉनसून सत्र में एक बिल लाया गया। तब के गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण ने लोकसभा में बहस के दौरान इस बिल को भारत के प्रेम, शांति और आपसी भाईचारे के महान संस्कारों का सूचक बताया था। 18 सितंबर 1991 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह बिल कानून बन गया। इसे ही हम आज प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट या उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 के नाम से जानते हैं।
अदालत में होने के कारण अयोध्या विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। यही कारण है कि बीते साल इस मामले में तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट फैसला दे पाई। लेकिन, मथुरा-काशी की राह में यह कानून बड़ी अड़चन है। इस कानून के अनुसार 15 अगस्त 1947 को देश में धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी, वही बनी रहेगी।
हम, ‘एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ को मानने वाले लोग हैं। बहुसंख्यक होते हुए भी अपनी आस्था थोपने वाले लोग नहीं हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन करने वाले लोग हैं। ऐसा नहीं होता तो बेंगलुरु की सड़कों पर हमें होना था, क्योंकि फेसबुक पोस्ट हमारी आस्था को चोट कर किया गया था। लेकिन, सुनियोजित तरीके से उतरे जिहाद में यकीन करने वाले वे लोग जिनके लिए कथित तौर पर इस पोस्ट के जवाब में एक कमेंट किया गया था। ऐसे में हमारे पास अपनी पवित्र भूमि को इस्लामिक अताताइयों की छाया से मुक्त कराने का मार्ग कानूनी रास्ते से ही निकलेगा। इसके लिए जरूरी है, प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की वैधता का खत्म होना।
कैसे खत्म होगा कानून?
सुप्रीम कोर्ट के वकील शशांक शेखर झा ने ऑपइंडिया को बताया, “झूठे सेकुलरिज्म के नाम पर आए इस कानून का काम है कि देश इस्लामिक आक्रांताओं को भूल जाए। सभी दंश भूल जाए। कभी भी उन मंदिरों पर अपना दावा ना करे जो एक समय मे हिंदुओं के पूजनीय स्थल थे और इस्लामिक आक्रमणकारियों ने बल व छल से जिन पर कब्जा कर लिया।”
उन्होंने कहा, “कायदे से होना तो यह चाहिए था कि देश स्वतंत्र होने के बाद ऐसे सभी जगहों को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए था। लेकिन वोट बैंक के लालच में इस कंलकित कानून को संसद से पास कर दिया गया।” झा ने बताया कि अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि 1991 का उपासना स्थल अधिनियम साफ करता है कि 15 अगस्त 1947 के दिन तक जिस भी पूजा स्थल की जो भी स्थिति है, उसमें कोई धार्मिक बदलाव की इजाजत नहीं है। इसलिए इन मामलों से जुड़े सभी मुकदमे अब खत्म माने जाएँगे।
उन्होंने कहा, “स्पष्ट है कि इस कानून के रहते मथुरा-काशी की यथास्थिति नहीं बदली जा सकती, जबकि इस कानून की नींव ही गलत है। संघीय ढाँचे के अनुसार भी यह कानून अनैतिक है। कानूनन तीर्थ स्थल, शमशान घाट व अन्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उनके कानून राज्य ही बना सकता है।” उन्होंने बताया कि यदि मोदी सरकार चाहे तो इस अनैतिक कानून को खत्म कर सकती है। इसके लिए उसके पास लोकसभा में बहुमत है। राज्यसभा में बीजेडी, एआईडीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से वह ऐसा कर सकती।
कानूनी जानकारों अनुसार सरकार चाहे तो अध्यादेश के जरिए भी अल्पकालिक तौर पर इस कानून की बाध्यता खत्म कर सकती है। लेकिन इसमें उसे मुश्किल हो सकती है क्योंकि उसे यह भी बताना होगा कि अध्यादेश लाना जरूरी था और विलंब नहीं किया जा सकता था। ऐसे में संसद के जरिए पूर्ण रूप से इस कानून को हटाना सबसे बेहतर विकल्प है।
मथुरा-काशी यानी बचे-खुचे वामपंथ का पिंडदान
मथुरा-काशी भी अयोध्या की तरह महज एक मंदिर नहीं हैं। यही कारण है कि तीनों भूमि की मुक्ति का खाका भी एक साथ ही खींचा गया था। जिस दिन मथुरा-काशी मुक्त होगी, उस दिन बचे खुचे वामपंथ का भी पिंडदान हो जाएगा। वैसे भी राम, कृष्ण और महादेव का नाम मनुष्य की चेतना को मुक्त करता है। उसे बाँध कर कुंठित नहीं करता। इसी से फैज जैसों की मुक्ति का मार्ग भी निकलेगा, जो कहते हैं कि राम हमारे पूर्वज थे।
इसके लिए जरूरी है कि हम आप भी सिकुलर और लिबरल बहस के झाँसे में न आएँ। जो विचार सनातन आस्था और संस्कृति में यकीन नहीं करता, वह भारत के भौगोलिक अस्तित्व के लिए भी उतना ही खतरनाक है, जितना हमारे अस्तित्व के लिए।
यदि हम ऐसा नहीं कर पाए तो वे हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी संस्कार, साहित्य और मानवता बाबर के मार्फत सिखलाते रह जाएँगे।
याद रखिएगा, गोस्वामी तुलसीदास विनय पत्रिका में लिखकर गए हैं;
जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि प्रेम सनेही।।
शनिवार (अगस्त 15, 2020) को भारत अपना 74वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से इस बार अन्य सालों के मुकाबले जश्न कुछ फीका है। इससे एक दिन पहले पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया था।
अब आप सोच रहे होंगे कि भला पाकिस्तान हमसे पहले क्यों आज़ाद हो गया, या फिर पाकिस्तान के प्रति ब्रिटिश ज्यादा मेहरबान थे? जैसा कि हमें पता है, भारत की आज़ादी से पहले ही ‘पाकिस्तान मूवमेंट’ शुरू हो गया था, जिसमें इस्लाम मानने वालों के लिए एक अलग मुल्क पाकिस्तान की माँग की गई थी। ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ ने मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में देश भर में इसके लिए अभियान चलाया था।
1947 में 14 अगस्त के दिन रमज़ान महीने के 26वाँ दिन था। रमजान के 27वें दिन के पहले की शाम और रात को इस्लाम में काफी पवित्र माना गया है। इसके पीछे कहा गया है कि इसी दिन अल्लाह ने फ़रिश्ते गेब्रियल के जरिए पैगम्बर मुहम्मद को कुरान का ज्ञान दिया था, इसीलिए इसे ‘लायलत-अल-कद्र’, अर्थात प्रकाश और सौभाग्य वाली रात करार दिया गया। इस्लाम के शिया और अहमदिया सेक्ट के लोगों को प्रताड़ित करने वाले पाकिस्तान में तभी से सुन्नियों का वर्चस्व रहा है।
सुन्नी ही इस दिन को सबसे ज्यादा पवित्र मानते हैं, क्योंकि धरती पर कुरान का ज्ञान आने के लिए इस्लाम के अलग-अलग पंथों में अलग-अलग तारीखों को पवित्र माना जाता है। अगस्त 14, 1947 को वही शाम थी जब ब्रिटिश ने पाकिस्तान नाम के एक अलग मुल्क को औपचारिक रूप से सत्ता हस्तांतरित की, लेकिन इस दिन समारोह हुआ था जो माउंटबेटन की मज़बूरी थी। वहीं भारत को सत्ता हस्तांतरित करने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन ने अगस्त 15,1947 का दिन मुक़र्रर किया।
दरअसल, इस दिन 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसी दिन जापान ने आत्मसमर्पण किया था, इसीलिए ब्रिटिश को ये दिन खासा प्रिय था। जापान के सम्राट द्वारा आत्मसमर्पण की घोषणा के बाद ही द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति की ओर चल निकला था। हालाँकि, इस पर औपचारिक हस्ताक्षर सितम्बर 2, 1945 को हुई थी। अमेरिका और ब्रिटिश ने चीन के साथ मिल कर जापान के आत्मसमर्पण की शर्त रखी थी और जापान की नौसेना भी किसी बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने में अक्षम नज़र आ रही थी।
एक और कारण ये है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पहले पाकिस्तान के गठन एवं स्वतंत्रता का निर्णय इसीलिए लिया क्योंकि वो दोनों ही देशों के समारोहों में हिस्सा लेना चाहते थे और एक ही दिन में ऐसा करना संभव नहीं था। इसीलिए उन्होंने दो अलग-अलग दिन मुक़र्रर किया। लेकिन, यहाँ एक और पेंच है। दरअसल, अगर आप ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947’ को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि भारत और पकिस्तान, दोनों की आज़ादी की आधिकारिक तारीख अगस्त 15, 1947 ही है।
इसमें लिखा है कि इसी दिन भारत और पाकिस्तान नाम के दो Dominions का जन्म हुआ। पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी जब अपने मुल्क को सम्बोधित किया तो उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि संप्रभु एवं आज़ाद मुल्क पाकिस्तान का जन्मदिन 15 अगस्त को मनाया जाएगा। इस तरह से देखा जाए तो पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस गलत तारीख पर मनाता आ रहा है, क्योंकि अपने भाषण में जिन्ना ने स्पष्ट रूप से इस तारीख का जिक्र किया था। आधिकारिक रूप से 15 अगस्त ही वो तारीख है।
दरअसल, इंडियन इंडिपेंडेंस बिल को ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई को पेश किया गया था। इसे 15 जुलाई को क़ानून का रूप दिया गया एवं 14-15 की अर्द्धरात्रि से भारत एवं पाकिस्तान की आज़ादी की घघोषणा की गई। पेंच ये था कि लॉर्ड माउंटबेटन को व्यक्तिगत रूप से दोनों देशों के समारोहों में उपस्थित रह कर औपचारिक रूप से सत्ता का हस्तांतरण करना था और क़ानूनी रूप से वो 15 अगस्त को दिल्ली में ऐसा करने के बाद कराची जाकर ये काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि तब तक वो ‘डोमिनियन ऑफ इंडिया’ के गवर्नर जनरल बन गए होते।
ब्रिटिश संसद में पारित ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ में दर्ज है 15 अगस्त की तारीख
ब्रिटिश ने ‘डोमिनियन ऑफ इंडिया’ और ‘डोमिनियन ऑफ पाकिस्तान’ के रूप में विभाजन और आज़ादी की घोषणा की थी, जो बाद में क्रमशः ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ और ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ बना। बंगाल और पंजाब जैसे बड़े प्रदेशों को दोनों देशों के बीच बाँट दिया गया। इसी एक्ट में अंग्रेजों ने गवर्नर जनरल के पद के गठन की घोषणा की और दोनों देशों के बीच संपत्ति के बँटवारे का ऐलान किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ ली।
इसके अलावा और भी कई सबूत हैं जो बताते हैं कि पाकिस्तान का असली स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को है। जिन्ना पाकिस्तान की आज़ादी के 13 महीने बाद ही चल बसे थे। 1948 में भी पाकिस्तान ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस मनाया था, जो जिन्ना के जीवनकाल का भी आखिरी था। साथ ही पाकिस्तान का पहला कमेमोरेटिव स्टाम्प भी 15 अगस्त की ही बात करता है। हर साल 14 अगस्त को वहाँ जिन्ना का रेडियो मैसेज चलाया जाता है, लेकिन उसमें तारीख 15 अगस्त बताई जाती है।
यहाँ बात पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के तारीख को लेकर हो रही है लेकिन जब भी विभाजन की बात आएगी तो 20 लाख लोगों की मौत की भी बात की जाएगी, जो सांप्रदायिक दंगों में मारे गए। साथ ही क़रीब 2 करोड़ लोग विस्थापित हुए। महात्मा गाँधी ने ऐसे समय में सक्रियता दिखाने की बजाए बंगाल जाकर बैठना उचित समझा था। नेहरू और जिन्ना जैसे नेता अपने-अपने देशों में सांप्रदायिक दंगों को रोकने में पूरी तरह असफल रहे। इधर दोनों देशों की राजधानियों और कुछ इलाक़ों में जश्न चल रहा था, वहीं अधिकतर क्षेत्रों में खून बह रहा था।
हालाँकि, पाकिस्तान के गठन की माँग और इसके लिए हिन्दुओं के नरसंहार की धमकी तो 30 के दशक से ही दी जा रही थी, लेकिन लाहौर में 22-24 मार्च, 1940 को हुए ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ के सेशन में इस्लाम मानने वालों के लिए औपचारिक रूप से अलग देश की माँग करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे ‘लाहौर रिजॉल्यूशन’ नाम दिया गया। इसीलिए, 1956 में पकिस्तान जब डोमिनियन से गणतंत्र बना, तो उसने इसके लिए 23 मार्च का दिन चुना और इसे ‘पाकिस्तान डे’ घोषित किया।
इसी तरह भारत ने 1950 में 26 जनवरी की तारीख को गणतंत्र दिवस के रूप में अपनाया। आज गलत दिन पर स्वतंत्रता दिवस मनाने वाले पाकिस्तान की स्थिति ये है कि वो कंगाल हो चला है और चीन की कृपा से सऊदी का लोन सधा रहा है, वहीं भारत दिन पर दिन उन्नति की नई गाथा लिख रहा है। पाकिस्तान अभी भी कश्मीर लेने के सपने देख रहा है, जबकि भारत सही मायनों में स्वतंत्रता के ध्येय को साकार करने की ओर बढ़ चला है।
चीन के साथ अपने संबंधों की सच्चाई का खुलासा होता देख, कॉन्ग्रेस लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भाजपा पर चीन से जुड़े होने के आरोप लगा रही है। अपनी इन कोशिशों में उसकी लगातार फजीहत भी हो रही है। हालिया मामले में भाजपा को निशाना बनाने के लिए कॉन्ग्रेस ने एक वीडियो शेयर किया। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के पीएम शिंजो आबे के साथ नजर आ रहे थे।
हास्यस्पद बात ये है कि अपने ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि चीन ने भारतीय सीमा पर कब्जा कर लिया है और भाजपा चीन के साथ याराना दिखा रही है। इस ट्वीट में कॉन्ग्रेस की ओर से यह भी दावा किया गया कि भारतीय माता की आजादी के हजारों-लाखों बलिदान हुए हैं। मगर आजादी के संघर्ष से दूरी बनाने वाले लोग इसकी अहमियत कैसे समझेंगें।
चीन के साथ भाजपा नेताओं के रिश्तों पर निशाना साधते हुए इस वीडियो में कॉन्ग्रेस ने जापानी प्रधानमंत्री और भारतीय पीएम की मुस्कुराती फोटो के नीचे कैप्शन लिखा कि भाजपा की चुनावी प्रचार के लिए चीनी कंपनियों को करोड़ों रुपया दिया गया।
हालाँकि, इस ट्वीट पर जैसे ही कॉन्ग्रेस की फजीहत होना शुरू हुई, उन्होंने इसे डिलीट कर दिया। लेकिन ये ध्यान रखने वाली बात है कि भाजपा पर निशाना साधने की होड़ में ऐसी जगहँसाई कॉन्ग्रेस की पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस नेता निखिल अल्वा ने प्रधानमंत्री की ऐसी तस्वीर शेयर की थी, जिसमें पीएम मोदी किर्गिस्तान के राष्ट्रपति जेनबकोव के साथ थे। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता ने उस तस्वीर को लेकर दावा किया कि भाजपा के सीसीपी के साथ संबंध हैं।
यहाँ बता दें कि LAC पर भारतीय-चीन सेना के बीच तनाव बढ़ने के बाद से कॉन्ग्रेस अपने बयानों और चीन के साथ संबंधों को लेकर चर्चा में है। पहले तो उसके साल 2008 में चीन के साथ हुए गुप्त समझौते का खुलासा हुआ। फिर राजीव गाँधी फाउंडेशन के कारण उसकी भद पिटी। मालूम चला कि राजीव गाँधी फाउंडेशन को सिर्फ़ चीन के एंबेसी से पैसा नहीं मिला, बल्कि चीन की सरकार भी उसे पैसे देती थी।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद अब बॉलीवुड नेक्सस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए जिया खान की माँ राबिया खान ने सुशांत मामले में सीबीआई जाँच का समर्थन किया है। साथ ही महेश भट्ट को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया है कि जिया के अंतिम संस्कार के समय में महेश भट्ट ने उन्हें धमकाने की कोशिश की थी।
इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में राबिया खान ने बताया जिया के अंतिम संस्कार पर भट्ट ने उनको कहा कि उनकी बेटी (जिया) डिप्रेशन में थी। उन्होंने इसका खंडन किया। लेकिन भट्ट ने उनसे कहा, “तुम चुप हो जाओ वरना तुम्हें भी इंजेक्शन देकर सुला देंगे।”
बता दें जिया खान की मौत 3 जून 2013 को हुई थी। उनकी मौत के बाद साल 2016 में बॉम्बे कोर्ट में सुनवाई के दौरान उनकी मौत को आत्महत्या करार कर दिया गया था। हालाँकि राबिया खान इसे हमेशा हत्या बताती रहीं और सूरज पंचोली पर इल्जाम मढ़ती रहीं। साल 2018 में इसके बाद मुंबई की एक अदालत में सूरज पर आत्महत्या का आरोप लगा। ये मामला आज भी सुलझा नहीं है।
अपने हालिया साक्षात्कार में राबिया खान ने महेश भट्ट की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उनकी निंदा की है और बताया है कि जिया ने भट्ट के लिए 16 साल की उम्र में काम करना शुरू किया था और तब भी भट्ट ने उनसे जिया को अकेले छोड़ने को कह दिया था।
अपने इंटरव्यू में उन्होंने जिया के ब्वॉयफ्रेंड सूरज पंचोली को मतलबी बताया और ये भी कहा कि उसने जिया को वैलेंटाइन डे पर मारा भी था। जिसे जानने के बाद उन्होंने जिया को भारत लौटने से मना किया। पर सूरज ने बरगला कर उसे वापस मुंबई बुला लिया।
राबिया कहती हैं कि उन्होंने जिया की मौत के बाद उसे इंसाफ दिलाने के लिए बहुत प्रयास किए। वे लंदन से हर महीने आती थीं। लेकिन सूरज कोर्ट में टाइम से नहीं जाता था और जब उससे सवाल पूछा जाता था तो वह ऐसे बर्ताव करता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं। साक्षात्कार में उम्मीद जताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान जिया को न्याय जरूर दिलाएँगे, उन्हें पूरा यकीन है।
उनका कहना है कि सुशांत और जिया के मामले में कई समानताएँ हैं। उनके मुताबिक, जिया के केस में जैसे उनकी मौत को आत्महत्या बताया गया। वैसे ही सुशांत के केस में भी हुआ।
राबिया खान ने सुशांत मामले में सीबीआई जाँच को लेकर अपना पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग करते हुए कहा कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव के कारण सच सामने नहीं आ पाएगा।
सोशल मीडिया पर शेयर पोस्ट में जिया की माँ ने लिखा, “सुंशात को जिया की तरह मरता देखने के बाद मुझे इससे ज्यादा मजबूर, बेबस और उदास कभी महसूस नहीं हुआ। दोनों सुशांत और जिया को पहले झूठा अटेंशन और प्यार दिया गया। जब दोनों उनके नार्सिस्टि साइकोपैथिक गैस लाइटिंग पार्टनर्स के जाल में फँस गए तो उन्हें शारीरिक तौर पर नुकसान पहुँचाया गया और उन्हें गाली दी गई।”
उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों कलाकारों का साथ पैसों के लिए इस्तेमाल किया गया और उन्हें परिवार-चाहने वालों से दूर कर दिया गया। जिया और सुशांत दोनों को मानसिक तौर पर डिसेबल करार दिया गया और उन्हें काम ना होने की वजह से डिप्रेस्ड कहा गया। जब पार्टनर्स अपना कंट्रोल खोते गए तो उनके होमिसाइडल डेथ को सुसाइड कहा गया।
उन्होंंने आगे पोस्ट में लिखा कि जिया खान और सुशांत के नार्सिस्टिक क्रिमिनल पार्टनर्स ताकतवर बॉलीवुड माफियाओं और नेताओं से जुड़े हुए हैं, इसलिए उन्होंने इनका सपोर्ट ले रखा है, क्योंकि उन्हें पता है कि ये बॉलीवुड माफिया और नेता के पास क्रिमिनल्स के बिहेवियर को जानने की ताकत है।
वे लिखती हैं कि मुंबई पुलिस राजनीतिक दबाव के कारण सबके सामने सच नहीं ले पा रही और उन्होंने बस अपना समय सबूत मिटाने व इस केस को होमिसाइडल डेथ करार देने में बिताया।
आगे राबिया खुले तौर पर बॉलीवुड माफिया से जुड़े लोगों को सजा दिलाने की बात कहती हैं। वे बताती हैं कि सीबीआई को इन मामलों में तह तक जाकर अपराधियों को सजा दिलवानी चाहिए। वरना ये लोग हैवान बन जाएँगे और मासूमों को मारते रहेंगे।
राबिया खान ने टाइम्स नाऊ को दिए अपने इंटरव्यू में भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नेता पुलिस पर दबाव डालते हैं कि इस मामले की जाँच मत करना और पुलिस ऐसा ही करती है। देश में रोज़ लोगों के मर्डर होते हैं। क्या ये नेता हर मर्डर के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं? तब कोई नेता आवाज़ नहीं उठाता।
वे पूछती हैं, “अब क्यों नेता इस केस में इन्वॉल्व हो गए हैं, क्योंकि उनके अपने लोग इसमें फँस रहे हैं। ज़िया और सुशांत के केस में इसलिए नेता शामिल हुए क्योंकि उनके अपने लोग फँस रहे। वे उन्हें बचाना चाहते हैं।”
बेंगलुरु में एक फेसबुक पोस्ट में पैगंबर मुहम्मद के ख़िलाफ़ टिप्पणी पढ़कर आहत हुई मुस्लिम भीड़ ने अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर के नारों के बीच पथराव और आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्होंने इस हिंसा में कॉन्ग्रेस विधायक के घर को जलाया और 60 से अधिक पुलिस वालों को घायल भी किया।
अब ऐसी स्थिति में कोई भी यही समझेगा कि इस घटना के बाद मीडिया जाहिर तौर पर इस्लामिक भीड़ के ख़िलाफ़ सख्त रुख अख्तियार करेगी और इस बात का विश्लेषण करेगी कि कैसे मुस्लिम समुदाय के लोग जरा सी बात पर दंगों के लिए तैयार हो जाते हैं। खासतौर पर ईशनिंदा के आरोपित कमलेश तिवारी की हत्या के बाद से तो यह उम्मीद मीडिया से की ही जा रही थी कि वह निष्पक्ष होकर सच्चाई बोले।
हालाँकि, मीडिया ने इस बार भी ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने फेसबुक पोस्ट करने वाले कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे नवीन को अपना निशाना बना लिया। डेक्कन हेराल्ड ने नवीन के ख़िलाफ़ एक ऐसी रिपोर्ट लिखी जिसमें उसे serial offender बताया गया है। रिपोर्ट में लिखा गया कि नवीन की यह आदत है कि वह पैगंबर मुहम्मद का अपमान करता है और उन्हें लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग भी करता है।
डेक्कन हेराल्ड ने अपने सूत्रों का हवाला देते हुए कि विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति का भतीजा नवीन का ऐसा इतिहास है जिसमें वह लगातार आपत्तिजनक कंटेंट डालकर नफरत फैलाने की कोशिश करता है। उन्होंने 5 अगस्त को पदराणयपुर की घटना के बारे में अपमानजनक सामग्री पोस्ट की थी।
पदरायणपुर हिंसा के बारे में याद दिला दें कि ये हिंसा 19 अप्रैल को भड़की थी, जब कोरोना संक्रमित के संपर्क में आने वाले अन्य लोगों ने क्वारंटाइन होने से मना कर दिया था और हंगामा भी किया था। इस पूरी हिंसा में पुलिस ने 119 लोगों को गिरफ्तार किया था।
दिलचस्प बात ये हैं कि डेक्कन हेराल्ड कहता है कि इन दोनों घटनाओं में नवीन ने भावनाओं को आहत किया। जबकि वास्तविकता ये है कि चाहे पदरायणपुर की हिंसा हो या नवीन के पोस्ट के बाद भड़की हिंसा, हर जगह मुस्लिम समुदाय के लोग उसमें शामिल रहे। लेकिन, तब भी मीडिया संस्थान ने हिंसा का विरोध नहीं किया, बल्कि नवीन को लगातार अपराध दोहराने वाला बताया।
यहाँ ये बात गौर करने वाली है कि एक ओर जहाँ हजारों लोगों की भीड़ ने एक मात्र फेसबुक पोस्ट पर इतनी हिंसा भड़का दी और डेक्कन हेराल्ड तब भी नवीन को जिम्मेदार बताता रहा। तो आखिर पाठक कैसे इस बात को समझेगा कि मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी कैसे काम करते हैं और कैसे एक-दूसरे को समर्थन के नाम पर बढ़ावा देते हैं। मीडिया संस्थान की यह कोशिशें बिलकुल ऐसी हैं, जैसे वह जिहादियों को उनके उद्देश्य को पूरा करने के निर्देश दे रहे हो।
मुख्यधारा का मीडिया भी वैसे तो हमेशा सच्चाई बताने की बातें करता है। लेकिन जब भी ऐसे कोई भी मौके आते हैं तो वह इनसे खुद को अलग कर लेता है। वास्तविकता में ये सब इसलिए नहीं होता कि वह इंसान के दुश्मनों की छवि निर्माण चाहते हैं। बल्कि इसलिए होता है क्योंकि संस्थान खुद को इस तरह ढाल लेते हैं कि वह अपनी निष्ठाओं को ही धोखा देने लगते हैं।
ये भी ध्यान रखने की बात है कि मुस्लिम समुदाय के सबसे घटिया तत्वों के लिए मुख्यधारा का मीडिया प्रचार तंत्र में बदल गया है। उनकी रिपोर्टें में इस बात का खास तौर पर ध्यान दिया जाता है कि वह मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों के मनमुताबिक हो और इसके लिए वह पूर्ण रूप से अपनी सारी कोशिश करते हैं।
इस संबंध में हमें याद रखना चाहिए कि आलोचकों की हत्यााओं का सिलसिला खुद पैगंबर मुहम्मद के समय से चला आ रहा है। ट्रिब्यूट, स्पॉइल्स एंड रुलरशिप (किताब अल-खराज, वाल-फे ‘वाल-इमराह में) में इस्लाम के पैगंबर के समय के दौरान एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया गया है।
साभार Sunnah.com
इसमें बताया गया है कि काब बिन अल अशरफ एक ऐसा व्यक्ति था जो पैगंबर मोहम्मद पर व्यंग्य करता था और पैगंबर और उनके अनुयायियों को आहत करता था। जब उसने नबी के अपमान को न करने की बात पर इनकार किया तो मोहम्मद ने उसकी हत्या का आदेश दिया।
व्यंग्यकार को मारने के लिए मुहम्मद बिन मसमल्लाह को भेजा गया। इस घटना के बाद से यहूदियों और बहुदेववादियों को डर लग गया और वह नबी से मिलने आए। फिर एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए कि गैर मुस्लिम कभी भी पैगंबर का अपमान नहीं करेंगे।
इस्लामिक उलेमाओं काब बिन अल अशरफ को भी सीरियल ऑफेंडर के तौर में पेश करते हैं। वे इस कहानी को ऐसे समझाते हैं कि कैसे अल्लाह ने मुहम्मद के अपमान पर शुरू में उन्हें धैर्य रखने व क्षमा करने का आदेश दिया। लेकिन जब उस समय भी उसने इस बात को नहीं माना तो उन्होंने उसे मार दिया।अब बेंगलुरु पर डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट भी बिलकुल इसी तरह है।
21वीं सदी में आने के बाद भी पैगंबर के अपमान पर भयानक हिंसा की प्रथा आज भी चालू है। ऐसे में कोई मुख्यधारा मीडिया से उम्मीद की जा सकती है कि वह हिंसा की संस्कृति को खत्म करने की बात करें, जो एक समुदाय में बढ़ती ही जा रही है। लेकिन नहीं, वह तो अब भी उन लोगों की छवि निर्माण करते हैं जिन्होंनें हिंसा को जन्म दिया।
जब डेक्कन हेराल्ड ने नवीन को serial offender बताया तो यह सर्वविदित है कि आगे क्या परिणाम होंगे। कमलेश तिवारी के साथ जो हुआ इसके बाद कोई इनसे इनकार नहीं कर सकता। लेकिन तब भी ये ऐसा करने को आगे आए और ऐसा किया भी। जब बात आगे बढ़ जाएगी तो कोई भी मीडिया संस्थान के इन निष्कर्षों को दोष नहीं दे पाएगा कि ये लोग मानते थे कि पैगंबर पर बोलने के लिए नवीन को मौत की सजा हो।
एक ओर जहाँ इस पूरे मामले पर मेनस्ट्रीम मीडिया बोलने से बचती रही। वहीं डेक्कन हेराल्ड ने सभी सीमाओं को लांघ दिया है। उन्होंने नवीन को serial offender कहकर हिंसा को वाजिब ठहराया है। जिसके कारण आगे कई अनहोनी हो सकती हैं और तब मीडिया ऐसी घटनाओं पर पछतावा करने को आगे आएगा।
कर्नाटक कॉन्ग्रेस के दलित विधायक आर मूर्ति के भतीजे नवीन का सिर काटने पर 51 लाख रुपए का इनाम घोषित करने वाले पूर्व सपा नेता शाहबेज रिजवी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसकी जानकारी भाजपा के प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी ने अपने ट्विटर हैंडल से दी है।
त्रिपाठी ने ट्विटर पर शाहजेब की हालिया तस्वीर शेयर की। इसमें वह पुलिस की हिरासत में नजर आ रहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “ज़्यादा दूर भाग नहीं पाया, यूपी पुलिस ने धर दबोचा !!”
गौरतलब है कि बेंगलुरु में इस्लामिक भीड़ का भयावह चेहरा देखने के बाद भी 13 अगस्त को शाहजेब रिजवी ने एक वीडियो जारी किया था। इस वीडियो में उसने कहा था, “फेसबुक पोस्ट के माध्यम से नवीन ने हुजूर के शान में जो गुस्ताखी की है, मैं उसकी कड़ी शब्दों में निंदा करता हूँ। इस युवक का जो सर कलम करके लाएगा उसे मैं 51 लाख का नगद ईनाम दूँगा।” इसके लिए रिजवी ने संप्रदाय विशेष के लोगों से मिलकर 51 लाख रुपए जमा करने की भी अपील की थी।
दलित विधायक के भतीजे के सिर पर 51 लाख के ईनाम का ऐलान करने वाला शाहबेज फिलहाल UP पुलिस के ताबड़तोड़ छापों के बाद ग़ायब है और अपनी ज़मानत के इंतज़ाम के लिए चंदा जुटा रहा है। pic.twitter.com/jN8pwKyTWS
इस वीडियो के वायरल होने के बाद यूपी के मेरठ में जिला पंचायत चुनाव लड़ चुके पूर्व सपा नेता शाहजेब रिजवी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। 13 अगस्त की देर रात को मेरठ पुलिस द्वारा फलावदा पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 153A, 505(2) के तहत केस दर्ज हुआ था।
दूसरी ओर मेरठ एसएसपी अजय साहनी ने वीडियो का संज्ञान लेते हुए मामले की जाँच के आदेश दिए थे। लेकिन जब पुलिस ने रिजवी के घर दबिश दी, तो वो फरार मिला। इसके बाद से पुलिस लगातार उसे ढूँढने का प्रयास कर रही थी।
शाहजेब रिजवी उत्तर प्रदेश के मेरठ में फलावदा थाना क्षेत्र के रसूलपुर गाँव के रहने वाला हैं। वह पहले समाजवादी पार्टी का अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश सचिव रह चुका है। लेकिन इस वक्त वह सपा में सक्रिय नहीं हैं। पिछली बार जिला पंचायत के चुनाव में वह हार गया था। वर्तमान में वह अपने आप को सामाजिक कार्यकर्ता बताता है।
बेंगलुरु में हुई हिंसा के बाद सुवर्णा न्यूज 24×7 ने एडिटर्स गिल्ड के फेक न्यूज की पोल खोली है। न्यूज चैनल ने अपना बयान उस समय दिया है जब एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने हाल में दिल्ली और बेंगलुरु में मीडिया कर्मियों पर हुए हमले की निंदा की।
सुवर्णा न्यूज ने इस बात को स्पष्ट किया कि उनके पत्रकारों पर पुलिस ने कोई हमला नहीं किया, बल्कि वह तो उपद्रवी भीड़ का शिकार हुए थे।
बता दें कि बेंगलुरु में एक फेसबुक पोस्ट के बाद भड़की हिंसा में उपद्रवियों ने कई वाहनों को आग के हवाले कर, कई पुलिसकर्मियों पर हमला बोला था। इसी बीच कुछ मीडियाकर्मी भी घायल हुए थे। लेकिन एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान में हिंसक भीड़ का समर्थन करने के लिए सारा इल्जाम पुलिस पर मढ़ दिया।
बयान में कहा गया, “बेंगलुरु में उस दिन इंडिया टुडे, द न्यूज मिनट और सुवर्णा न्यूज के 4 पत्रकारों पर कथित तौर पर हमला किया गया। ये पत्रकार उस समय ड्यूटी पर थे और शहर में हिंसा के मद्देनजर नुकसान और पुलिस गोलीबारी पर रिपोर्ट कर रहे थे।”
एडिटर्स गिल्ड के इस बयान को पूर्ण रूप से खारिज करते हुए सुवर्णा न्यूज ने कहा कि उनके पत्रकारों पर बेंगलुरु पुलिस ने हमला नहीं बोला था। संस्थान ने पत्रकारों के लिए दिखाई चिंता पर एडिटर्स गिल्ड का धन्यवाद दिया। साथ ही यह समझाया कि गिल्ड ने हमलावरों को पहचानने में गलती की।
अपने बयान में सुवर्णा न्यूज ने लिखा, “हालाँकि, हम स्प्ष्ट करना चाहेंगे कि हमारे पत्रकारों पर हमला भीड़ द्वारा किया गया था, न कि बैंगलोर सिटी पुलिस ने, जैसा 13 अगस्त को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा जारी बयान में संकेत दिया गया।”
चैनल ने यह भी बताया कि भीड़ ने उनके तीन पत्रकारों को मारा। इनमें से एक को चोट भी आई। इसके अलावा हिंसक भीड़ ने मीडिया हाउस के एक कैमरा और दो खबर एकत्रित करने वाले वाहन को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। चैनल ने बाद में इस संबंध में उपद्रवियों के ख़िलाफ़ बेंगलुरु सिटी पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई।
सुवर्णा न्यूज के इस बयान से साफ होता है कि उनके पत्रकारों को भीड़ ने नुकसान पहुँचाया। लेकिन एडिटर्स गिल्ड ने इसका आरोप भीड़ को देने की बजाय उस बेंगलुरु पुलिस को हमले का जिम्मेदार ठहराया, जो खुद उस हिंसक भीड़ के निशाने पर थे।