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चप्पल उतारीं, सिर झुकाया… फिर तिरंगे को किया सलाम: बुजुर्ग महिला का जज्बा CCTV में कैद, वीडियो वायरल

भारत के आम जनमानस के मन में भारतीय प्रतीक चिह्नों, खासकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा झंडा के लिए जो सम्मान है, वो वामपंथी कभी नहीं समझ सकते। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक महिला किस तरह से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा झंडा के साथ पेश आती हैं, वो देखने लायक है। गौर करने वाली बात है कि उस समय उस महिला को नहीं पता होता है कि उनका वीडियो बनाया जा रहा है।

वीडियो मे देखा जा सकता है कि सड़क से गुजर रही वो महिला जैसे ही तिरंगा झंडा को देखती हैं, वो वहाँ रुक जाती हैं। इसके हाथ में थैला है, जिसे वो जमीन पर ही रख देती हैं और चप्पल खोल कर झंडे की ओर बढ़ती हैं। बता दें कि भारतीय परंपरा में पूजा स्थलों और पवित्र जगहों पर जूते-चप्पल उतार कर ही जाने का रिवाज रहा है। ऐसे में उक्त महिला के मन में तिरंगा झंडा के लिए भी वही सम्मान है, जो देवी-देवताओं के लिए।

इसके बाद वीडियो में महिला को झंडे के पास आकार उस पर मत्था टेकते हुए देखा जा सकता है। साथ ही वो दोनों हाथों से झंडे को प्रणाम करती हैं। महिला तिरंगा झंडा के पास की मिट्टी को छू कर आशीर्वाद लेती हैं। वीडियो में ये सारा दृश्य कैद हो गया, जिसका उस माहिला को पता भी नहीं चला। ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर करते हुए लोगों ने लिखा कि जमात ए लिबरल और जेहादियों के मुँह से भारत माता की जय नहीं बोला जाता लेकिन करोड़ों भारतीय देश को माँ से कम नहीं मानते।

एक तरह से ये बात सही भी है क्योंकि रामायण में ही भगवान श्रीराम ने जन्मभूमि की तुलना माता से कर के ये बता दिया है कि व्यक्ति के लिए राष्ट्र का वही स्थान है, जो उसके घर मे उसकी माँ का। हिन्दू धर्म में बच्चों को शुरू से ही देश और राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों का वैसे ही सम्मान करना सिखाया जाता है, जैसे कि हिन्दू देवी-देवताओं का। दोनों को अलग कर के नहीं देखा जाता। तभी अपने देश को हम भारत माँ कहते हैं।

शनिवार (अगस्त 15, 2020) को पूरे देश में 74वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किला पर झंडा फहराया। इस दौरान दरभंगा और गोपालगंज के स्कूलों में बाढ़ मे डूबे लोग भी अपनी छाती तक पानी में पैठ कर ध्वजारोहण करते नजर आए। तिरंगा के लिए हमारे देश के आम लोगों के मन में जो सम्मान है, वो देश के हर कोने से आई इन घटनाओं से झलक जाता है।

‘भारतीय रास्ते में आने वाले कुत्ते’ और PM मोदी को अपशब्द: जर्मनी में पाकिस्तानियों ने खालिस्तान के लिए किया प्रदर्शन

जर्मनी के प्रान्त हेसेन के सबसे बड़े शहर फ्रैंकफर्ट में भारत विरोधी नारे लगाए गए। साथ ही भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अपशब्द भी कहे गए। ट्विटर पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि वहाँ जमे पाकिस्तानी कट्टरपंथी ‘खालिस्तान ज़िंदाबाद’ और भारत-विरोधी नारा लगा रहे हैं और भारत को खंडित कर के सिखों के लिए अलग मुल्क की माँग कर रहे हैं। फ्रैंकफुर्ट के इस वीडियो की लोग आलोचना कर रहे हैं।

जर्मनी में भारतीय मूल के सिविल इंजीनियर प्रशांत वंगुरलेरकर ने ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर किया। इसमें एक व्यक्ति हाथ में तिरंगा झंडा लिए हुए है और उधर खालिस्तानी गिरोह विरोध प्रदर्शन कर रहा है। उनका भारत विरोधी रवैया देख कर ये शख्स कहता है, “बाप, बाप होता है। बेटा, बेटा होता है।” गौर करने लायक बात ये है कि खालिस्तान के लिए हो रहे इस प्रदर्शन में पाकिस्तानी झंडे लहरा रहे थे।

वीडियो में पाकिस्तानी झंडा लिए लोगों को देखा जा सकता है और सिखों की संख्या न के बराबर है। इससे साफ़ पता चलता है कि खालिस्तान सिख कट्टरवादियों की माँग कम है और पाकिस्तान इसे ज्यादा हवा दे रहा है। साथ ही इस विरोध प्रदर्शन में ‘बन के रहेगा पाकिस्तान’ नारा भी लगाया जा रहा है। साथ ही इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ‘हाय-हाय’ के नारे लगाए जा रहे हैं। अपशब्द भी कहे गए।

फ्रैंकफर्ट के इस वीडियो में देखा जा सकता है कि जैसे ही ये पाकिस्तानी एक भारतीय को वहाँ तिरंगा लिए देखते हैं, वो उग्र हो जाते हैं और भला-बुरा कहने लगते हैं। साथ ही नारेबाजी भी तेज हो जाती है। एक पाकिस्तानी बुजुर्ग उग्र होकर रेलिंग पर चढ़ने का प्रयास करता है, जिसे पुलिस द्वारा हटाया जाता है। उन्होंने दावा किया कि वो सच्चाई पर चलते हैं और साथ ही भारतीयों के लिए ‘रास्ते में आने वाले कुत्ते’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।

इससे पहले पंजाब के मोगा में स्वतंत्रता दिवस समारोह से पहले खालिस्तानी तत्वों ने मुख्य प्रशासनिक भवन के ऊपर ही खालिस्तान का झंडा फहरा दिया था। इतना ही नहीं, खालिस्तान समर्थकों ने वहाँ लगे तिरंगे झंडे को भी हटा दिया था। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस घटना को सख्ती से लिया और जिला प्रशासन को ऐसा करने वाले असामाजिक तत्वों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

एक मस्जिद को ढाह कर शौचालय, 2 को ढाह कर शराब-सिगरेट की दुकान, जो इस्लाम में हराम: चीन में उइगर की हालत

चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर पर अत्याचार करके उनका अस्तित्व मिटाने का सिलसिला कोरोना महामारी में भी जारी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चीन के इस प्रांत में उइगर के एक मस्जिद को ढहाने के बाद अब उस जगह पर सार्वजनिक शौचालय बना दिया गया है।

रेडियो फ्री एशिया की रिपोर्ट बताती है कि सरकारी प्रशासन की तरफ से आतुश के सुंगाग गाँव में 2016 के दौरान दो मस्जिदों को गिरा दिया गया था और अब इनकी जगह सार्वजनिक शौचालय बना दिया गया है। जिसे चीन द्वारा “मस्जिद सुधार (Mosque Rectification)” का नाम दिया गया।

सुंगाग से Uyghur Neighborhood Committee के चीफ ने आरएफए को बताया कि टोकूल मस्जिद को ध्वस्त किया गया था। इसके बाद इस जगह पर चीनियों ने शौचालय बनवा दिया। वे कहते हैं, “ये सार्वजनिक शौचालय है… उन्होंने अभी इसे खोला नहीं है, लेकिन यह निर्मित हो चुका है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या वहाँ लोगों को सार्वजनिक शौचालय की आवश्यकता थी। तो उन्होंने बताया, “लोगों के घरों में शौचालय बने हुए हैं। तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है।”

उनका कहना है कि उस जगह कोई पर्यटक भी नहीं जाते। चीन ने केवल ध्वस्त किए गए टोकूल मस्जिद के खंडहर को छिपाने के लिए और वहाँ निरीक्षण के लिए जाने वाले समूहों के लिए टॉयलेट बनवाया है।

एक अन्य निवासी ने आरएफए को बताया कि वहाँ दो अन्य मस्जिदें थी, जिन्हें 2019 में गिरा दिया गया और उनकी जगह पर अब एक दुकान खोली गई है, जिसमें शराब और सिगरेट मिलती है, जिनका सेवन करना इस्लाम में हराम माना जाता है।

RFA के मुताबिक राष्ट्रपति शी जिनपिंग के Mosque Rectification अभियान के तहत प्रांत की 70 प्रतिशत मस्जिदें ढहा दी गई हैं। इसके पीछे सामाजिक सुरक्षा को कारण बताया गया है।

गौरतलब है कि चीन में इस्लाम मानने वालों पर अत्याचार का सिलसिला काफी समय से चल रहा है। उनके ख़िलाफ़, उनकी संस्कृति के ख़िलाफ़, चीनी अधिकारी उनको आए दिन यातनाएँ देते हैं। कभी खबर आती है कि वहाँ पर उइगर महिलाओं का रेप और गर्भपात धड़ल्ले से हो रहा है। तो कभी ये पता चलता है कि वहाँ घरों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बदला जा रहा है। अभी पिछले दिनों रोजे के बीच ये खबर आई थी कि चीन ने रमजान में रोजा रखने को भी अतिवाद का चेहरा बता दिया है।

यदि धार्मिक स्थलों पर हमले की बात करें, तो चीन में मुख्यत: ये सिलसिला 17वीं शताब्दी से शुरू हुआ था। करीब एक हजार वर्ष पहले चीन में तंग वंश ने मस्जिदों पर हमला बोला था। इसके बाद से यह सिलसिला अब तक जारी है। चीन की 1966-76 की सांस्कृतिक क्रांति की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान इस प्रांत की कई मस्जिदें और अन्य धार्मिक स्थल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे।

यहाँ बता दें कि इससे पहले पिछले साल वाशिंगटन स्थित उइगर ह्यूमन राइट्स प्रोजेक्ट (UHRP) ने चीनी सरकार के इस अभियान का विवरण देते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि कैसे उइगर के धार्मिक स्थलों और कब्रिस्तानों को तोड़ा जा रह है। जियोलोकेशन और अन्य तकनीकों का उपयोग करते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 2016 से लेकर 2019 के बीच वहाँ 10 से 15 हजार इस्लामी धर्मस्थलों, मस्जिदों को तोड़ा गया था।

अल्पसंख्यक युवाओं की पुलिस में ज्यादा से ज्यादा भर्ती के लिए पहले से ट्रेनिंग: उद्धव सरकार का ऐलान, मिलेंगे रुपए भी

महाराष्ट्र में मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप उद्धव ठाकरे की सरकार पर लग रहा है। राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि वहाँ अल्पसंख्यक युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में पुलिस में उनकी भर्ती हो। महाराष्ट्र की उद्धव सरकार में अल्पसंख्यक विकास और स्किल डेवलपमेंट मामलों के मंत्री नवाब मलिक ने इसकी घोषणा करते हुए इससे जुड़ी जानकारी साझा की।

शरद पवार की एनसीपी के नेता व मंत्री नवाब मलिक ने ट्विटर पर साझा की गई सूचना में बताया है कि पुलिस में भर्ती से पहले अल्पसंख्यक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में अल्पसंख्यक पुलिस में भर्ती हों, इसीलिए उन्हें पहले ही प्रशिक्षित किया जाएगा। बताया गया है कि अभी प्रशिक्षण के लिए उत्सुक अभ्यर्थियों के चयन के लिए 14 जिलों में अभियान शुरू भी कर दिया गया है।

कुछ दिनों बाद डायरेक्ट ट्रेनिंग की शुरुआत कर दी जाएगी। बाकी जिलों में भी ट्रेनिंग जल्द ही शुरू होगी। इस साल के अंत तक राज्य में 12,500 पुलिस कर्मियों की भर्ती करने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा कि इस भर्ती में राज्य में मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी, जैन और यहूदी अल्पसंख्यक समुदायों के अधिक से अधिक उम्मीदवारों को भर्ती के लिए तैयारी करने का अवसर दिया जाएगा।

उम्मीदवारों को सामान्य ज्ञान और शारीरिक परीक्षण का प्रशिक्षण दिया जाएगा। वर्तमान में, इच्छुक उम्मीदवारों से वर्धा, गढ़चिरोली, अमरावती, नांदेड़, जालना, पुणे, यवतमाल, परभणी, सोलापुर, औरंगाबाद, बुलदाना, नासिक, बीड और अकोला जिलों में आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं। कहा गया है कि इच्छुक उम्मीदवार उस जिले में प्रशिक्षण के लिए जिला कलेक्टर या चयनित एनजीओ के पास आवेदन करें।

मंत्री नवाब मलिक ने कहा कि शेष जिलों में प्रशिक्षण के लिए गैर सरकारी संगठनों की चयन प्रक्रिया चल रही है और उसके बाद इच्छुक उम्मीदवारों से इन जिलों में भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए जाएँगे। इसके अलावा, प्रत्येक छात्र को ट्रैक-सूट और जूते खरीदने के लिए 1000 रुपए, किताबों की खरीद के लिए 300 रुपए, प्रशिक्षण अवधि के दौरान 300 रुपए प्रति माह और दैनिक भोजन के लिए 1500 रुपए दिए जाएँगे।

बताया गया है कि अल्पसंख्यक युवाओं का प्रशिक्षण दो महीने के लिए होगा। प्रत्येक जिले में अधिकतम 100 छात्रों का चयन और प्रशिक्षण किया जाएगा। प्रत्येक जिले को प्रशिक्षण के लिए लगभग 5.60 लाख रुपए खर्च करने होंगे और इसके लिए प्रावधान किया गया है। कई लोगों का कहना है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए सरकार ऐसा कर रही है क्योंकि अल्पसंख्यकों में उनकी संख्या ही सबसे ज्यादा है।

फेसबुक इंडिया को ‘बीजेपी का वफादार’ बता WSJ ने पूरा किया लिबरल मीडिया का इंतकाम

स्वतंत्रता दिवस की शाम मैंने देखा कि कुछ स्वघोषित लिबरल पत्रकार ट्वीट कर हुए बता रहे थे कि उन्होंने अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया है। मैंने यह सोचकर नजरअंदाज कर दिया कि वे लोग अपनी प्रासंगिकता को बरकरार रखने के लिए इस तरह की फालतू हरकत करते रहते हैं।

मगर आज मैंने फिर से कॉन्ग्रेस पार्टी के ट्रोल को फेसबुक पर हमला करते हुए देखा। वे लोग विशेष रूप से अंखी दास नामक एक वरिष्ठ कर्मचारी को गाली दे रहे थे, जो भारत में कंपनी की शीर्ष सार्वजनिक नीति कार्यकारी हैं। कॉन्ग्रेस ने उन पर ‘भाजपा एजेंट’ होने का आरोप लगाया। वहीं अन्य विपक्षी दलों ने भी उनके लिए गंदी भाषा का प्रयोग किया। उन्हें ‘दलाल’ तक करार दे दिया।

अंखी दास के नाम पर मैं अलर्ट हुआ, इसलिए नहीं कि मैं बड़े कॉरपोरेट घरानों के सभी शीर्ष अधिकारियों पर नज़र रखता हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं फेसबुक की पक्षपाती नीतियों की शिकायतों को लेकर कई बार उन्हें ईमेल कर चुका हूँ। जिसकी वजह से ऑपइंडिया की पहुँच और कमाई पर असर पड़ने की संभावना होती थी।

अच्छा तो क्या अंखी भाजपा का एजेंट थी, इसलिए उन्होंने हमें अपनी नीतियों के कार्यान्वयन से निराश किया। इसका मतलब है कि ऑपइंडिया कॉन्ग्रेस समर्थक है?

खैर, क्या इससे आपको कोई फर्क पड़ता है? मुझे तो नहीं पड़ता।

एक प्रकाशक के तौर पर फेसबुक की अनुचित व्यवहार की वजह से हो रही दिक्कतों को लेकर मैंने 2019 में अंखी दास और फेसबुक के एक अन्य अधिकारी शिवनाथ ठुकराल को ईमेल किया था। मैंने उनके सामने समाधान भी प्रस्तुत किए थे, जैसे नीतिगत मुद्दों के बारे में अधिक पारदर्शिता लाना, प्रकाशकों और प्लेटफॉर्म के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक टीम बनाना और ऐसे ही कई और उपाय। हालाँकि उसे लगभग नजरअंदाज ही किया गया।

2019 में उनको भेजे अपने आखिरी ईमेल में मैंने कहा, “व्यक्तिगत रूप से, यह व्यवहार मेरे लिए बिल्कुल भी आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि मुझे कुछ बेहतर होने की उम्मीद नहीं है। मैं ईमानदारी के अभाव से सबसे अधिक नफरत करता हूँ। आप मुझे केवल यह बताएँ कि आपकी तरफ से कुछ मुद्दों पर जवाब इसलिए नहीं दिया जाता, क्योंकि आपकी नजर में महत्वपूर्ण या वैलिड नहीं होते। आपका इतना बता देना ही मेरे लिए काफी होगा। यह राजनेताओं की तरह लगातार नजरअंदाज करते हुए मुद्दे को खत्म करना प्रोफेशनल्स को शोभा नहीं देता।” इसके बाद मैंने कोई और ईमेल नहीं भेजा।

इन ईमेलों को भेजने से पहले, मैंने कुछ अन्य प्रकाशकों के साथ अंखी दास और शिवनाथ ठुकराल से उनकी नीतियों को समझने के लिए थोड़ी देर की मुलाकात की थी। 15 मिनट के भीतर, मुझे जगह छोड़ने का मन हुआ, क्योंकि वहाँ पर भी लिबरलों के ‘हेट स्पीच’ जैसे बकवास किए गए थे।

इस दौरान अंखी दास ने विशेष रूप से एक व्यक्ति के तर्क का विरोध किया था, जिसने कहा था कि अभद्र भाषा व्यक्तिपरक थी। उन्होंने आपत्ति जताई और कहा कि यह केस नहीं है। हेट स्पीच की पहचान करने के लिए उचित दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

एक सेकेंड के लिए, मैं बस यही तर्क देना चाहता था कि ‘यदि जाति-व्यवस्था के कारण हिंदू धर्म आंतरिक रूप से शोषक हैं’, यह हेट स्पीच नहीं है, तो फिर ‘जिहाद की हिंसक अवधारणा के कारण इस्लाम’ को हेट स्पीच क्यों होना चाहिए?

ऐसा कौन सा सिद्धांत है, जो इस्लाम की सभी आलोचनाओं को हेट स्पीच के रूप में प्रदर्शित करता है और हिंदू धर्म को दी जाने वाली गालियों को भी विद्वानों की टिप्पणी के रूप में स्वीकार करता है।

बता दें कि, लेखक और जेएनयू के प्रोफेसर आनंद रंगनाथन को ट्विटर ने कुरान की एक कविता पोस्ट करने पर उसे “घृणित आचरण” करार देते हुए ब्लॉक कर दिया। इस तरह के कई मुद्दों को मैं सामने ला सकता हूँ, मगर मैंने 2016 में ही लिबरलों के साथ बहस करना छोड़ दिया है।

इसलिए मुझे बहुत हँसी आई, जब मुझे पता चला कि वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) ने अंखी दास के बारे में एक लेख प्रकाशित किया। इसके बाद इन्हें भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थक करार दिया गया। उन्हें ‘इस्लामोफोबिया’ का प्रशंसक भी बताया गया।

जब मुझे पता चला था कि अंखी दास जेएनयू से हैं, और संभवत: शीर्ष फेसबुक की नौकरी के पोस्ट पर रहने के दौरान वो एक करोड़ रुपए से अधिक कमा रहे हैं, मैं अलर्ट हो गया। एक सीरियस नोट पर, डब्ल्यूएसजे लेख से केवल यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उदारवादियों ने व्यापक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए और अपना नैरेटिव बनाए रखने के लिए अपने एक हितैषी को कुर्बान करना बेहतर समझा।

हो सकता है कि अंखी दास उनके लिए ‘पर्याप्त लिबरल’ नहीं थे। इन दिनों भी नोम चोम्स्की और जेके राउलिंग को मजाक उड़ाकर ‘निरस्त’ किया जा रहा है। वह निश्चित रूप से उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं था।

लेकिन यह एक व्यक्ति के बारे में नहीं है। यह लगभग 3 वर्षों से हो रहा है। पुराना लिबरल प्रतिष्ठान हताश है। वे अच्छे के लिए वर्ल्ड ऑर्डर इनवर्ट्स पर नियंत्रण हासिल करने की जल्दी में हैं।

वास्तविक प्रतिष्ठान होने के बारे में एकमात्र तरीका सेंसरशिप और सूचना एवं विचार के गेट-कीपिंग के माध्यम से हो सकता है। जिस तरह से माफिया ने मीडिया और शिक्षाविदों पर नियंत्रण किया है, वो भी उसी तरह जनता के सोचने और बोलने पर नियंत्रण रखना चाहते हैं। और यह भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए सच है।

हालाँकि शिक्षाविदों पर उनका नियंत्रण थोड़ा सा भी कमजोर नहीं हुआ है। पारंपरिक मीडिया पर उनका नियंत्रण इंटरनेट प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ फिसलने लगा है। प्रारंभ में उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। अमेरिका में, इंटरनेट अपनाने का चलन काफी पहले से था और उनका डॉट-कॉम बूम पिछली सदी के आखिरी दशक में ही हुआ था। पारंपरिक मीडिया इसके साथ सहज था।

तब इंटरनेट सिर्फ एक तकनीक थी। एक ऐसी तकनीक, जिसने सूचना तक पहुँचना आसान बना दी, और वेबसाइटों और अन्य कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से प्रकाशन को आसान बना दिया। डिजिटल प्रकाशन प्रिंट या प्रसारण जैसे अन्य प्लेटफार्मों पर प्रकाशन की तुलना में कहीं अधिक किफायती और आसान था। हालाँकि, पारंपरिक मीडिया ने शॉट्स को जारी रखा, क्योंकि प्रकाशित सामग्री का वितरण नए या व्यक्तिगत प्रकाशकों के लिए एक चुनौती बना रहा। “ब्लॉगर्स” इतने बड़े खतरे नहीं थे।

उसके बाद फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और व्हाट्सएप आया। फिर सस्ता स्मार्टफोन और तेज मोबाइल डेटा भी आया। इसने लोगों की कंटेंट के इस्तेमाल करने के तरीके को बदल दिया। भारत में, 2009 और 2013 के बीच इंटरनेट को अपनाना विशेष रूप से बहुत तेजी से बढ़ा है, और यह Jio के बाजार में तेजी के साथ तेजी से बढ़ रहा है।

कम से कम भारत में यह वह युग था, जब नैरेटिव वास्तव में लोकतांत्रिक थी। मुख्यधारा की मीडिया की सेंसरशिप और गेट-कीपिंग चली गई थी। वैकल्पिक आवाज और राय को एक दर्शक मिला। उन्हें न केवल दर्शक मिला, बल्कि अपने कंटेट के प्रसार के लिए एक बहुत ही शानदार साधन मिला।

पारंपरिक मीडिया ने पहले इन घटनाओं को अनदेखा करने की कोशिश की, फिर वे “ट्रोल्स” पर हँसे, और अब वो लड़ रहे हैं। पारंपरिक मीडिया पर हावी लेफ्ट-लिबरल (an oxymoron) भीड़ ने चीजों को फिर से वापस अपनी तरफ खींच लिया है। उन्होंने इंटरनेट का उपयोग करना सीख लिया है, और उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में इसका प्रभावी उपयोग किया है। लेकिन उनकी प्रकृति यह है कि वे सेंसरशिप और गेट-कीपिंग के बिना नहीं रह सकते। वे वास्तव में इन प्रक्रियाओं में विश्वास करते हैं और वे उन्हें वापस पाने के लिए कुछ भी करेंगे।

यह पिछले 3 वर्षों से हो रहा है। ‘हेट स्पीच’ के खिलाफ लड़ने और ‘सुरक्षित स्थान बनाने’ के नाम पर पारंपरिक मीडिया पर शासन करने वाली विचारधारा, बड़ी टेक कंपनियों के प्लेटफ़र्म पर सेंसरशिप और गेट-कीपिंग का पावर पाने के लिए काफी हाथ-पाँव मार रही है।

इस विचारधारा का समर्थन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति- चाहे वह पत्रकार हो, या फेसबुक कर्मचारी, या राजनीतिक कार्यकर्ता- इस सामान्य उद्देश्य में एकजुट है- नैरेटिव पर नियंत्रण वापस पाने के लिए।

और इसके लिए, अगर उन्हें किसी को निशाने पर लेने की आवश्यकता होगी, तो यह जायज है। दरअसल, यह दूसरों के लिए भी एक चेतावनी की तरह है कि यदि आप आत्मसमर्पण नहीं करते हैं और हमसे जुड़ते हैं, तो हम आपकी प्रतिष्ठा और करियर को नष्ट कर देंगे।

(अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित इस लेख को यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

वर्ल्ड में नंबर 3, इंडिया में नंबर वन: महेश भट्ट की सड़क-2 का ट्रेलर ने बनाए डिसलाइक के नए रिकॉर्ड

फिल्म ‘सड़क 2’ का ट्रेलर दुनिया में तीसरा सबसे ज्यादा नापसंद किया जाने वाला वीडियो है। यह भारत में यूट्यूब पर सबसे अधिक डिसलाइक किया जाने वाला वीडियो बन गया है। 1.1 करोड़ से अधिक डिसलाइक के साथ ‘सड़क 2’ तीसरे पायदान पर है। दूसरे नंबर पर 1.16 करोड़ डिसलाइक के साथ साल 2010 में आया पॉप स्टार जस्टिन बीबर का गाना ‘बेबी’ शामिल है। पहले नंबर पर 1.82 करोड़ डिसलाइक के साथ स्वयं यूट्यूब द्वारा पोस्ट किया गया ‘2018 रीवाइंड वीडियो’ है।

12 अगस्त को जारी किए गए ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को नेपोटिज्म को बढ़ावा दिए जाने के चलते सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा ट्रोल किया गया। जून में बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से यह मुद्दा चर्चा में है। महेश भट्ट की इस फिल्म में उनकी दोनों बेटियाँ आलिया भट्ट और पूजा भट्ट हैं। इनके साथ संजय दत्त और निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर के छोटे भाई आदित्य रॉय कपूर भी हैं।

महेश भट्ट द्वारा निर्देशित और निर्मित फिल्म का ट्रेलर 12 अगस्त को जारी किया गया था। फिल्म के ट्रेलर को रिलीज़ होने के 48 घंटों के भीतर लगभग 90 लाख डिसलाइक मिली थी।

हालाँकि यह YouTube पर तीसरा सबसे अधिक नापसंद किया गया वीडियो है, मगर यह पहले से ही डिसलाइक शेयर में नंबर बन गया है। कुल लाइक और डिसलाइक में से, ट्रेलर का डिसलाइक शेयर 95% है, जबकि बाकी 5% ने इसे लाइक किया है। इसकी तुलना में, YouTube 2018 वीडियो की डिसलाइक शेयर 86% है, और जस्टिन बीबर के वीडियो के लिए 45% है, जिसका अर्थ है कि इसे डिसलाइक की तुलना में लाइक अधिक है।

गौरतलब है कि सड़क 2 आलिया भट्ट की पहली होम प्रोडक्शन फिल्म है और उनके पिता महेश भट्ट की 21 साल बाद निर्देशक के रूप में वापसी भी है। फिल्म 28 अगस्त को रिलीज होगी।

वीएचपी नेता विजय शंकर तिवारी ने फिल्म ‘सड़क-2’ को लेकर हिन्दू आस्था को अपमानित करने का आरोप लगाया था। ‘सड़क-2’ के बारे में कहा गया कि महेश भट्ट एक ऐसी कहानी लेकर आ रहे हैं, जिसमें एक साधु को बुरा दिखाया जाएगा और उसके काले कृत्यों का खुलासा किया जाएगा।

वीएचपी नेता विजय शंकर तिवारी ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “महेश भट्ट के निर्देशन में बनी फिल्म सड़क 2 में एक बार फिर हिन्दू आस्था को अपमानित किया गया है, जिसे हॉटस्टार में दिखाया जाएगा। फिल्म में केवल नेपोटिज्म के प्रोडक्ट्स भरे पड़े हैं, जिन्हें महेश भट्ट आगे बढ़ा रहे हैं। केन्द्र सरकार इस पर कार्यवाही करे।”

उन्होंने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा था, “सुनील दत्त के बेटे हैं संजय दत्त, महेश भट्ट की बेटियाँ हैं पूजा और आलिया, सिद्धार्थ रॉय कपूर के भाई हैं आदित्य, इन सबकी फिल्म है सड़क-2। अब महेश भट्ट को बताना होगा कि तुम्हारा और तुम्हारी फिल्म का हश्र खान ब्रदर्स जैसा ही होगा। यही नेपोटिज्म है।”

तुर्की की फर्स्ट लेडी से मिले आमिर खान, शान में पढ़े कसीदे: भारतीय मुस्लिमों को कट्टर बनाने में लगा है पाक का नया यार

भारत के खिलाफ जहर उगलने और मुस्लिमों का मसीहा बनने की कोशिश में लगे तुर्की की प्रथम महिला एमीन एर्दोगन से बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने शनिवार (अगस्त 15, 2020) को मुलाकात की। इस्तांबुल के ह्यूबर मेंशन के राष्ट्रपति निवास में यह मुलाकात हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, आमिर खान ने मुलाकात का अनुरोध किया था। वे वाटर फाउंडेशन के काम के बारे में एर्दोगन को जानकारी देना चाहते थे। बता दें कि यह एक गैर-लाभकारी संगठन है, जिसकी स्थापना आमिर खान और उकी पत्नी किरण राव ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पानी पहुँचाने के लिए की है।

मुलाकात के दौरान दोनों ने एक-दूसरे की प्रशंसा की। बॉलीवुड स्टार ने महिलाओं और बच्चों की शिक्षा के संबंध में कई मानवीय परियोजनाओं का समर्थन करने के लिए एर्दोगन की प्रशंसा की, जबकि तुर्की की पहली महिला ने अभिनेता को उनकी फिल्मों में ‘सामाजिक समस्याओं’ को उठाने के लिए सराहा।

गौरतलब है कि फ़िलहाल भारत विरोधी रुख को लेकर तुर्की चर्चा में है। हाल में यह बात सामने आई थी कि तुर्की की तरफ से भारत के मुस्लिमों को कट्टर बनाने की भरपूर कोशिशें हो रही है। वह कट्टर मुस्लिमों को और कट्टर बना कर उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करना चाहता है।

बता दें कि अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर तुर्की ने पाकिस्तान की बातों का समर्थन किया था। इसके बाद वह भारत विरोधी गतिविधियों का गढ़ बन चुका है। तुर्की में पनप रहे इस नए तरह के आतंकवाद को कोई और नहीं बल्कि वहाँ की एर्दोगन सरकार खुद बढ़ावा दे रही है।

पिछले दिनों खबर आई थी कि आमिर खान अपनी अगली फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ की शूटिंग के लिए तुर्की गए हैं। तुर्की की मीडिया का कहना है कि आमिर खान वहाँ की तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर, सिनेमा के लिए एडवांस फ़ैसिलिटी और वर्कफोर्स कैपेसिटी से खुश हैं। इससे पहले उन्होंने वहाँ के दौरों मे इन चीजों को देखा था। तुर्की का पर्यटन मंत्रालय उनकी सहायता कर रहा है।

ऐसे में, तुर्की जाने और एर्दोगन से मुलाकात करने को लेकर सोशल मीडिया में आमिर खान की तीखी आलोचना हो रही है। एक यूजर ने लिखा है, “आमिर खान इजरायल के पीएम से मिलने से बचते रहे, लेकिन उन्होंने भारतीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में तुर्की के राष्ट्रपति से मुलाकात की और तथाकथित शांतिप्रिय राष्ट्र के लिए मानवीय और सामाजिक परियोजनाओं के बारे में बताया। अब कुछ बोलूँगा तो उनकी पत्नी को असुरक्षा महसूस होगा। फिर असहिष्णुता वाला नाटक शुरू होगा।”

एक अन्य यूजर ने लिखा कि आमिर खान तुर्की में शूटिंग कर रहे हैं। उन्हें शर्म आनी चाहिए कि जो देश कश्मीर के खिलाफ बोलता है, वहाँ पर जाकर उसकी तारीफ करते हैं। यही देश हमारा फायदा उठाती है।

एक यूजर लिखता है, आमिर खान तुर्की गए और एर्दोगन से मिले। आमिर खान अच्छी तरह से जानते हैं कि एर्दोगन ने भारत विरोधी और कश्मीर विरोधी स्टैंड को बढ़ावा दिया है और कश्मीर के छात्रों को विभिन्न प्लेटफॉर्म पर भारत के खिलाफ बोलने के लिए वित्त पोषित किया है। ऐसे में उनसे मुलाकात क्यों?

बता दें कि जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत आए थे तब तीनों खान ने उनका बहिष्कार किया था। कई बॉलीवुड हस्तियों को उनसे मिलने के लिए आमंत्रण दिया गया था, लेकिन आमिर खान सहित तीनों खान नहीं पहुँचे। समुदाय विशेष के कई लोगों ने तब ‘असली हीरो’ कह कर उनकी तारीफ की थी।

दिल्ली: शाहीन बाग के सामाजिक कार्यकर्ता शहजाद अली BJP में शामिल, कहा- CAA पर साथ मिलकर करेंगे काम 

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन और विरोध का मुख्य केंद्र रहे शाहीन बाग के सामाजिक कार्यकर्ता शहजाद अली रविवार (अगस्त 16, 2020) को बीजेपी में शामिल हो गए। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्ता और श्याम जाजू ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई। 

इस मौके पर शहजाद अली ने कहा, “मैं भाजपा में शामिल हुआ हूँ, ताकि हमारे समुदाय के उन लोगों को गलत साबित किया जा सके, जो सोचते हैं कि भाजपा हमारी दुश्मन है। हम सीएए के मुद्दे पर साथ मिलकर बैठकर बात करेंगे।”

आदेश गुप्ता ने कहा, “आज सैकड़ों भाई इस बात को महसूस करने के बाद पार्टी में शामिल हुए हैं कि हमारे साथ कोई भेदभाव नहीं है और हम उन्हें विकास की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। मैं उन सभी महिलाओं को बधाई देना चाहता हूँ, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ट्रिपल तालक मामले में उठाए गए कदमों को देखने के बाद पार्टी में शामिल हुई हैं।”

वहीं श्याम जाजू ने कहा, “जब सीएए के बारे में बात की गई थी, तो कुछ राजनीतिक दलों ने समुदाय विशेष को गुमराह करने की कोशिश की थी। लेकिन अब देश के हर मुस्लिम भाई को पता चल गया है कि कुछ भी साबित करने की आवश्यकता नहीं है। किसी को भी वोट और राष्ट्रीयता के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा। यह महसूस करने के बाद कि उन्हें इस पार्टी के माध्यम से ही न्याय मिलेगा, शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन में उपस्थित भारी संख्या में इस्लाम को मानने वाले आज पार्टी में शामिल हुए हैं।”

बता दें कि शहजाद अली कुछ दिनों पहले तक भाजपा के मुखर विरोधी थे और शाहीन बाग में सरकार के खिलाफ बुलंद आवाज करने वालों में से एक थे। शाहीन बाग में धरना खत्म होने के बाद से ही उनका रुख बदला-बदला नजर आ रहा था। उन्होंने सोशल मीडिया पर सरकार का पक्ष लेना शुरू कर दिया था।

गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश भर में विरोध हो रहा था। इस दौरान शाहीन बाग इस विरोध का केंद्र बनकर सामने उभरा था। यहाँ महिलाओं ने लगभग 3 महीने तक धरना दिया। इस दौरान पूरे देश से इसका विरोध करने वाले यहाँ जुटते रहे। शहजाद अली भी काफी ऐक्टिव थे और सीएए के विरोध में अपनी बात रखते थे। इससे पहले भी वह बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ बोलते रहे हैं।

₹1000 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग, चीनी शेल कंपनियों के नाम पर अकाउंट, जासूसी नेटवर्क: चार्ली पेंग की दलाई लामा पर भी थी नजर

1000 करोड़ रुपए के हवाला घोटाले के आरोपित चार्ली पेंग के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है। चार्ली पेंग चीन का रहने वाला है और उसका असली नाम लुओ सैंग है। जाँच एजेंसियों को पता चला है कि चार्ली पेंग दिल्ली में कुछ लामाओं के संपर्क में था। पेंग के मामले की जाँच कर रही एजेंसियों को शक है कि वह बौद्ध धर्म के सर्वोच्च गुरु दलाई लामा और उनके सहयोगियों की जानकारी जुटा रहा था।

शुरुआती जाँच में पता चला है कि चार्ली पेंग ने दिल्ली में मजनू का टीला में कुछ लामाओं और अन्य व्यक्तियों को पैसे दिए थे। निगरानी से बचने के लिए, पेंग ने बातचीत करने के लिए चीनी एन्क्रिप्टेड एप्लिकेशन ‘वी चैट’ का इस्तेमाल करता था। 29 जुलाई को भारत सरकार ने सुरक्षा और गोपनीयता के मुद्दों का हवाला देते हुए 59 चीनी एप्स को प्रतिबंधित कर दिया था। 

भारत में रहकर हवाला रैकेट चला रहा चार्ली पेंग एक जासूसी नेटवर्क का भी हिस्‍सा था। उसने अन्‍य चीनी नागरिकों के साथ मिलकर चीनी शेल कंपनियों के नाम से बैंक खाते खोले और करीब 1000 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग की। 

फिलहाल इनकम टैक्‍स डिपार्टमेंट से लेकर कई एजेंसियाँ उससे पूछताछ कर रही हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूछताछ में पेंग ने खुलासा किया है कि चीनी खुफिया एजेंसियों ने उसके जरिए दिल्‍ली में निर्वासन में रह रहे तिब्‍बतियों को घूस देने की कोशिश की।

चीनी एजेंसियों के निशाने पर मजनू का टीला में रहने वाले लामा और भिक्षु थे। पेंग ने सीधे पैसा नहीं दिया लेकिन अपने ऑफिस स्‍टाफ के जरिए रकम भिजवाता रहा। जिन लोगों को पैसा दिया गया, उनकी पहचान अभी नहीं हो सकी है। पेंग का दावा है कि उसके स्‍टाफ ने जिन पैकेट्स में पैसे दिए, उनमें 2 से 3 लाख रुपए थे। 2014 के बाद से पेंग ने दिल्‍ली और हिमाचल प्रदेश में दलाई लामा की टीम में भी घुसपैठ करने की कोशिश की थी।

पेंग ने पूछताछ में बताया कि उसने पहली बार 2014 में भारत में कदम रखा था। चार्ली पेंग ने दिल्ली में सबसे पहले नूडल्स का कारोबार शुरू किया और इसमें आगे बढ़ते हुए बड़े हवाला रैकेट तक जा पहुँचा। पेंग को पहली बार साल 2018 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था। हालाँकि कुछ दिन बाद वह जमानत पर रिहा हो गया था। इस बार उसे फिर गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में पुलिस को जानकारी मिली है कि चार्ली पेंग 2009 में 6 तिब्बतियों के साथ पैदल नेपाल गया था। नेपाल में वह 2009 से 2014 तक काठमांडू के पास गेलुग मठ में रहा। पेंग ने वहाँ अपना औषधि और जड़ी-बूटियों का कारोबार शुरू किया था। इस काम में उसे अच्छी कमाई हुई। मठ में रहने के दौरान वहाँ के कुछ लोगों ने उसे भारत जाने का सुझाव दिया। उसे सुझाव में बताया गया कि वहाँ वह अच्छा पैसा कमा सकता है।

इसके बाद चार्ली पेंग साल 2014 में बस से काठमांडू से नई दिल्ली के मजनू का टीला आ गया। मजनू का टीला इलाके में वह पंजाबी बस्ती में रहा। नेपाल मठ और वहाँ के दस्तावेजों के आधार पर उसने तिब्बती आई कार्ड हासिल कर लिया था।

चार्ली पेंग का दिल्ली में धीरे-धीरे कारोबार बढ़ा और उसने द्वारका में एक फ्लैट ले लिया। इसके बाद एक दलाल के माध्यम से उसने भारतीय आधार कार्ड और पैन कार्ड भी बनवा लिए। बाद में चार्ली पेंग द्वारका से गुरुग्राम शिफ्ट हो गया। अब हवाला नेटवर्क का पता चलने के बाद पुलिस उससे और भी कई मामलों में पूछताछ कर रही है।

AAP की आरती ने ‘नाजी सैल्यूट’ से की ‘वन्दे मातरम्’ की तुलना: CM केजरीवाल के हाथ नहीं उठाने पर भड़के BJP नेता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 74 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किला पर ध्वजारोहण किया और उसके बाद देश को सम्बोधित किया। इस दौरान केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई सदस्यों के साथ-साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी वहाँ उपस्थित थे। भाजपा नेताओं का आरोप है कि जब पीएम मोदी ने जब ‘वन्दे मातरम्’ का उद्घोष किया तो, केजरीवाल ने न इसे दोहराया और न हाथ उठाया।

आदेश गुप्ता, मीनाक्षी लेखी, तजिंदर बग्गा, कपिल मिश्रा, मनोज तिवारी और प्रवेश साहिब सिंह वर्मा जैसे नेताओं ने इस आरोप को आगे बढ़ाया और भाजपा के दिल्ली व बिहार के आधिकारिक ट्विटर हैंडलों से इसे ट्वीट किया गया। अब खुद आम आदमी पार्टी (AAP) ही इसकी पुष्टि कर रही है कि दिल्ली सीएम ने उस समय बाकियों से अलग रुख अपनाया, जिसका अर्थ है कि उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ को न तो दोहराया और न ही हाथ उठाया।

आम आदमी पार्टी की नेशनल सोशल मीडिया टीम का हिस्सा आरती चड्ढा ने ट्विटर पर भारत के राष्ट्रगीत के उद्घोष की तुलना जर्मनी में नाजी युग के सैल्यूट यानी हैल हिटलर (Heil Hitler) के साथ की। उन्होंने दो तस्वीरें साझा की जिसमें एक जर्मनी का है और जहाँ सारे लोग ‘हैल हिटलर’ पर हाथ उठा कर सम्मान देते हुए नज़र आते हैं, वहीं एक व्यक्ति है जो भीड़ में खड़ा है, कोई मूवमेंट नहीं कर रहा। इसकी तुलना आरती ने कल के केजरीवाल के वायरल फोटो के साथ की।

यानी, आरती का कहना है कि जिस तरह नाजी जर्मनी में ‘ हैल हिटलर’ पर हाथ उठा कर सम्मान नहीं दिया, ठीक वैसा ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में ‘वन्दे मातरम्’ के साथ किया। साथ ही आरती ने ये भी लिखा कि एक ऐसा व्यक्ति को बाकियों से अलग खड़ा होने की हिम्मत रखता है। आरती ने अरविन्द केजरीवाल को जन्मदिन विश करते हुए ऐसा कहा।

केजरीवाल की पार्टी ही इसकी पुष्टि कर रही है कि उन्होंने हाथ नहीं उठाया

अब पूरा माजरा समझते हैं। सबसे पहले भाजपा नेता तजिंदर बग्गा ने ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री की आलोचना की। दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता तजिंदर बग्गा द्वारा शेयर किए गए वीडियो में दिख रहा है कि जब पीएम मोदी ‘वन्दे मातरम्’ का उद्घोष करते हैं तो वहाँ उपस्थित सभी लोग अपने दोनों हाथ उठा कर इसे दोहराते हैं, लेकिन अरविन्द केजरीवाल चुपचाप मास्क लगा कर बैठे हुए हैं और उन्होंने कोई मूवमेंट नहीं की।

भाजपा नेता ने ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर करते हुए आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो से पूछा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के आतंकवादियो के लिए तो आपके हाथ बड़ी जल्दी खड़े हुए थे, सर्जिकल स्ट्राइक के समय सेना से सबूत माँगने के लिए तो आपके हाथ बड़ी जल्दी खड़े हुए थे, तो आज आपको कौन सी बीमारी हो गई कि आपने ‘वन्दे मातरम्’ पर आपने हाथ खड़े करने से मना कर दिया?

तजिंदर बग्गा ने केजरीवाल से यह भी पूछा कि क्या ‘वन्दे मातरम्’ का सम्मान करने से उनका वोट-बैंक नाराज़ हो जाएगा? सोशल मीडिया पर इस ट्वीट की रिप्लाई में कई लोग भी दिल्ली सीएम से नाराज़ दिखे और लोगों इसका कारण पूछा कि आखिर उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गीत से लिए गए उद्घोष का सम्मान नहीं किया? जबकि उनके आसपास बैठे बाकी सभी लोगों ने इस उद्घोष को पूरे जोश में दोहराया।

वहीं पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि 0.01% ऐसे रह जाते हैं, जो डिटॉल से भी नहीं जाते। वहीं अरविन्द केजरीवाल ने जब खुद झंडा फहराया तो उन्होंने अपने मंच से ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के साथ-साथ ‘वन्दे मातरम्’ का नारा भी लगवाया। इस पर भाजपा सांसद मिनाक्षी लेखी ने कहा कि जब पीएम मोदी ने ये उद्घोष किया तो केजरीवाल शांत बैठे रहे और जब उन्होंने खुद ये नारा लगाया तो उनके पार्टी के नेताओं ने इसे नहीं दोहराया।

वहीं सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा कि ‘सड़ जी’ के वंदे मातरम कहने पर उनके पार्टी के मंत्री-कार्यकर्ता चुप्पी लगा गए। साथ ही उन्होंने ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए’ वाली कहावत का जिक्र करते हुए पूछा कि कैसे लोग हैं ये? उन्होंने कहा कि जब यही नारा पीएम मोदी ने लगवाया तो केजरीवाल के मुँह से कुछ नहीं फूटा। वहीं बिहार भाजपा ने भी चुटकी लेते हुए कहा, “पहले लगा था कि केजरीवाल बिहार से दिल्ली जाने वाले श्रमिकों के खिलाफ हैं, लेकिन ये तो ‘वंदे मातरम’ बोलने के भी खिलाफ हैं जी!“

दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी इस वीडियो को ट्वीट करते हुए कहा कि आज लाल किले की प्राचीर से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी ने भारत माँ का जयघोष करवाया, लेकिन पता नही इस एक शख़्स को भारत माता की जय से क्या तकलीफ है? इसके बाद उन्होंने पूछा कि कहीं ये आप तो नहीं अरविन्द केजरीवाल जी? वहीं दिल्ली में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदेश कुमार गुप्ता भी नाराज़ नज़र आए।

आदेश गुप्ता ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ‘वन्दे मातरम्’ ना बोलकर कौन सी धर्मनिरपेक्ष होने की राजनीति कर रहें हैं, ऐसा करके किसे खुश करना चाहते हैं? हर एक दिल्लीवासी आपकी इस राजनीति को देखकर दुखी होगा। इसके बाद उन्होंने पूछा कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश ‘वन्दे मातरम्’ के नारे से गूँज रहा है तो केजरीवाल खामोश क्यों हैं? कई लोग भी इससे नाराज़ नज़र आए।

हालाँकि, ऑपइंडिया भाजपा नेताओं के इन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है, क्योंकि लाइव प्रसारण के दौरान केजरीवाल का चेहरा लम्बे समय तक केंद्रित नहीं था, इसीलिए पूरा फुटेज देखे बिना हम इसकी पुष्टि नहीं कर सकते। ऊपर से इस पर पार्टी का कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। लेकिन, अब आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय सोशल मीडिया टीम की सदस्य आरती ने ही इसकी पुष्टि कर दी है।