Saturday, September 19, 2020
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विभाजन और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक: कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू और इतिहास से सीखने का वक्त

देश के पहले लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस का चुनावी घोषणा-पत्र खुद जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था। इसे कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने बैंगलोर में 13 जुलाई, 1951 को पारित किया। इस घोषणा-पत्र में कॉन्ग्रेस ने बताया कि साल 1951-52 में विस्थापितों के पुनर्वास और राहत के लिए 140 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे।

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1929 में 14 मॉंगों का एक ज्ञापन तैयार किया था। इसका मकसद एक अलग इस्लामिक देश का गठन करना था। इसका प्रारूप हद से ज्यादा कट्टर और इस्लाम को छोड़कर अन्य धर्मों की भावनाओं को आहत करने वाला था। इसके कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार थे;

  • मुस्लिमों को गौ हत्या की छूट होगी
  • जहॉं मुस्लिम बहुसंख्यक होंगे परिसीमन नहीं होगा
  • वंदेमातरम समाप्त करना होगा
  • तिरंगे में बदलाव किया जाना चाहिए
  • मुस्लिम लीग के झंडे को तिरंगे के बराबर दर्जा मिले

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग अपनी इन सांप्रदायिक मॉंगों पर अड़ गई और भारत का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया गया। हालाँकि, ब्रिटिश संसद ने भारत की जमीनों का बॅंटवारा तो कर दिया लेकिन आधिकारिक तौर पर नहीं बताया गया कि किस धर्म के व्यक्ति को कहॉं रहना है? इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947 की पहली धारा के अनुसार 15 अगस्त 1947 को दो डोमिनियन का गठन किया गया। एक राष्ट्र भारत था, तो दूसरा नया देश पाकिस्तान बनाया गया।

‘मिशन विद माउंटबेटन’ पुस्तक के लेखक एलन कैंपबेल-जोहानसन विभाजन पर लिखते है, “21 सितम्बर, 1947 की सुबह गवर्नर-जनरल के डकोटा हवाई जहाज से माउंटबेटन, इस्में, वेरनों, एलन कैंपबेल-जोहानसन (लेखक), नेहरू, पटेल, नियोगी, राजकुमारी अमृत कौर, जनरल लॉकहार्ट, एचएम पटेल, और वी शंकर ने पूर्वी एवं पश्चिमी पंजाब के दौरा किया।” उन्होंने रावी नदी के आसपास के इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करते हुए बताया कि यह लिखित इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन है।

एक अन्य पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ़ द ब्रिटिश राज’ में लियोनार्ड मोसेली लिखते है, “अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों की विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 6,00,000 लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दिवार से फोड़ दिए गए, बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काट दिए गए और गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।” इन घटनाओं को देखते हुए सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री नेहरू को 2 सितम्बर 1947 को पत्र लिखा, “सुबह से शाम तक मेरा पूरा समय पश्चिम पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू और सिखों के दुख और अत्याचारों की कहानियों में बीत जाता है।”

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हालाँकि, 20 जुलाई 1947 को यह नियम बना दिया गया था कि दोनों देशों द्वारा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की जाएगी। भारत के गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ने इसकी सार्वजानिक घोषणा भी कर दी थी। बावजूद इसके, पाकिस्तान ने इसे नजरंदाज किया और वहां हिन्दुओं और सिखों का नरसंहार जारी रहा। पंजाब के गवर्नर जनरल फ्रांसिस मुडी ने जिन्ना को 5 सितंबर 1947 को पत्र लिखा, “मुझे नहीं पता कि सिख सीमा कैसे पार करेंगे। महत्वपूर्ण यह है कि हमें जल्द से जल्द उनसे छुटकारा पाना होगा।”

पाकिस्तान के सिंध प्रान्त से भी हिन्दुओं पर हमले की ख़बरें लगातार मिल रही थी। प्रधानमंत्री नेहरू ने 8 जनवरी 1948 को बीजी खेर को एक टेलीग्राम भेजा, “स्थितियों को देखते हुए (सिंध में गैर-मुस्लिमों की हत्या और लूट-पाट हो रही थी), सिंध से हिन्दू और सिख लोगों को निकालना होगा।” अगले दिन प्रधानमंत्री ने खेर को एक पत्र भी लिखा, “सिंध में हालात ख़राब है और मुझे डर है कि हमें भारी संख्या में निष्क्रमण देखना होगा। हम उन्हें सिंध में नहीं छोड़ सकते।” पाकिस्तान में हिन्दुओं के नरसंहार को लेकर प्रधानमंत्री परेशान थे और उन्होंने सरदार पटेल को भी वहॉं की स्थितियॉं बताने के लिए 12 जनवरी 1948 को एक पत्र लिखा। सरदार ने पहले ही उनकी सुरक्षा और पुनर्वास के प्रयास शुरू कर दिए थे। उनका स्पष्ट मत था कि पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों का रुकना संभव नहीं है।

पाकिस्तान से आने वाले हिन्दुओं और सिखों का भारत में पुनर्वास एक जटिल कार्य था। प्रधानमंत्री नेहरू ने 15 नवंबर 1950 को संसद में यह स्वीकार किया था कि किसी अन्य देश को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा, जैसी विस्थापन की समस्या भारत के सामने थी। देश के पहले लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस का चुनावी घोषणा-पत्र खुद जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था। इसे कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने बैंगलोर में 13 जुलाई, 1951 को पारित किया। इसमें नेहरू लिखते है, “पिछले चार सालों की सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों का पुनर्वास है। जिसपर तात्कालिक और लगातार ध्यान देने की जरूरत है।” इस घोषणा-पत्र में कॉन्ग्रेस ने बताया कि साल 1951-52 में विस्थापितों के पुनर्वास और राहत के लिए 140 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे। इसमें उनके लिए दुकानें और औद्योगिक क्षेत्र के अलावा 86,000 नए घर बनवाना भी शामिल था।

पाकिस्तानी गैर-मुस्लिमों को देशभर में बसाना भारत सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल था। फिर भी, वहाँ बहुत बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम रह गए थे, जिनका बाद में भी विस्थापन जारी रहा। पहली लोकसभा में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य सीपी गिडवानी ने 6 दिसंबर, 1952 को बताया, “हमारा सिन्धी का एक अखबार है जो बम्बई से निकलता है। उसने लिखा है कि परसों एक जहाज कराची से आया, उसमें 23 हिन्दू आए। उसमें से एक ने बयान दिया है कि एक हिन्दू किसी गाँव में जा रहा था, उसका क़त्ल करके उसकी लाश को एक बोरी के अन्दर डाल दिया गया। इसलिए विवश होकर हमें यहाँ आना पड़ा।”

भारत सरकार ने लोकसभा में 1959 में एक ब्यौरा दिया। इसके अनुसार राजस्थान, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मणिपुर, मध्य प्रदेश, बिहार, असम और अंडमान निकोबार में पाकिस्तानी गैर-मुस्लिमों को बसाया गया था। तीसरी पंचवर्षीय योजना में इस पुनर्वास कार्यक्रम का पूरा विवरण दिया गया था। इसमें बताया गया है कि पाकिस्तान से 89 लाख धार्मिक प्रताड़ित गैर-मुस्लिम भारत आए, जिसमें से 47 लाख पश्चिम पाकिस्तान और शेष पूर्वी पाकिस्तान से थे। साल 1947-48 और 1960-61 के बीच कुल 239 करोड़ रुपए इन विस्थापितों के पुनर्वास के लिए तय किए गए थे। इसमें से 133 करोड़ पश्चिम पाकिस्तान और 106 करोड़ पूर्वी पाकिस्तान के लिए आवंटित किए गए थे। पहली पंचवर्षीय योजना से पहले 70.87 करोड़, पहली पंचवर्षीय योजना में 97.55 करोड़ और दूसरी पंचवर्षीय योजना में 70.32 करोड़ रुपए की राशि खर्च की गई। यही नहीं, इस दौरान सरकार ने 33,000 परिवारों को अस्थायी तंबुओं से निकालकर जमीनें वितरित की थी। लगभग 1,10,000 लोगों को व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा भी दी गई थी।

आज कॉन्ग्रेस नागरिकता (संशोधन) कानून का विरोध कर रही है। इसका कोई आधार नहीं है। वास्तव में उनके नेताओं को अपने इतिहास को जानने और समझने की जरूरत है। उस दौर में प्रधानमंत्री नेहरू के केंद्रीय मंत्रिमंडल में राहत और पुनर्वास के लिए एक अलग से मंत्रालय भी बनाया गया था। इसका कभी किसी ने विरोध नहीं किया और विश्व के सबसे बड़े विस्थापन को नियमित किया गया था। वर्तमान भारत सरकार ने इसी प्रक्रिया का सरलीकरण किया है।

नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?

मरीचझापी में जिन 7000 शरणार्थियों का संहार हुआ वे भी दलित थे, जय भीम-जय मीम का नया छलावा है ‘रावण’

‘अगर पाकिस्तान के मुस्लिम भारत आकर रहेंगे, तो विभाजन का क्या मतलब, पूरे को हिन्दुस्तान घोषित कर दो’

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Devesh Khandelwal
Devesh Khandelwal is an alumnus of Indian Institute of Mass Communication. He has worked with various think-tanks such as Dr. Syama Prasad Mookerjee Research Foundation, Research & Development Foundation for Integral Humanism and Jammu-Kashmir Study Centre.

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