मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत अभियान को कुछ कदम आगे बढ़ाते हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने प्लास्टिक कचरे का सदुपयोग करने की पहल शुरू की। जिस प्लास्टिक कचरे को असल स्वरूप में रिसाइकल नहीं किया जा सकता है उसका मंत्रालय सड़क निर्माण में उपयोग कर रहा है। इसके इस्तेमाल से अब तक करीब 1 लाख किलोमीटर सड़क तैयार हो चुकी है। हिन्दुतान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ अगले वित्तीय वर्ष तक सरकार इसकी रफ़्तार दोगुना करने की योजना बना रही है।
सड़कें तैयार करने में प्लास्टिक कचरे के उपयोग का ऐतिहासिक निर्णय सबसे पहली बार साल 2015 में लिया गया था। केंद्र सरकार ने सड़क निर्माण से जुड़े लोगों को अधिसूचना जारी करके यह स्पष्ट कर दिया कि इस काम में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल अनिवार्य होगा। साल 2016 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस आदेश की आधिकारिक तौर पर घोषणा की। तब से लेकर अब तक 11 राज्यों की लगभग 1 लाख किलोमीटर लम्बी सड़कों में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो चुका है।
पिछले दिनों आई रिपोर्ट के अनुसार 1 किलोमीटर सड़क निर्माण के दौरान लगभग 10 टन बिटुमिन की ज़रूरत पड़ती थी। केंद्र सरकार के प्लास्टिक उपयोग करने के आदेश के बाद इस प्रक्रिया में 9 टन बिटुमिन लगता था, यानी हर 1 किलोमीटर सड़क तैयार करने में 1 टन बिटुमिन की बचत होती है। 1 टन बिटुमिन की लागत लगभग 30 हज़ार रुपए तक आती है। इसका मतलब सरकार हर 1 किलोमीटर सड़क निर्माण में लगभग 30 हज़ार रुपए बचा रही है।
प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल करके सड़क बनाने की प्रस्तावना मदुरै के थियागराजार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के प्राध्यापक पद्मश्री राजगोपालन वासुदेवन ने दी थी। उन्हें ‘प्लास्टिक मैन ऑफ़ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है, उनका कहना था कि प्लास्टिक की वजह से सड़क में गड्ढे नहीं होते हैं। यह सामान्य तरीके से बनाई गई सड़कों की तुलना में बाढ़ और अत्यधिक गर्मी झेलने में ज़्यादा कारगर साबित होते हैं।
इसके लिए सबसे पहले एक शहर का नगरीय निकाय पूरे शहर का कचरा इकट्ठा करता है फिर उस प्लास्टिक कचरे को तीन प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है, धुल कर उसकी सफाई, फिर धुलने के बाद उसे सुखाना और अंत में उसका चूरा बनाना। इसमें हर तरह का प्लास्टिक शामिल होता है। प्लास्टिक के कचरे को प्लांट में इतना महीन कर दिया जाता है कि यह 4 एमएम के टुकड़ों में नज़र आने लगता है। फिर प्लास्टिक के यह टुकड़े बिटुमिन के साथ मिलाए जाते हैं, इसके बाद तार और कोल भी मिलाया जाता है। फिर इसे 160 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है। अंत में इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण में किया जाता है।
सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की पहल को मद्देनज़र रखते हुए प्लास्टिक कचरे की मदद से कई बेंच भी तैयार की थी। पिछले साल अक्टूबर महीने में पश्चिम रेलवे ने प्लास्टिक कचरे की मदद से मुंबई के चर्च गेट स्टेशन पर 3 बेंच तैयार की थी। पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक़ भारत में 24,940 टन कचरा प्रतिदिन उत्सर्जित होता है जिसमें से 60 फीसद रिसाइकिल कर लिया जाता है। शेष प्लास्टिक कचरा गड्ढों में दबा दिया जाता है, नालों में बहाया जाता है, समुद्र में जाकर प्रदूषण फैलाता है या जलाया जाता है जिससे वायु प्रदूषण होता है।
दिल्ली की हाईकोर्ट ने देशद्रोही भाषण देने और दंगा भड़काने के आरोपित शरजील इमाम को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने JNU के पूर्व छात्र शरजील इमाम की याचिका को खारिज करते हुए उसे जमानत देने से मना कर दिया। साथ ही निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा जिसे उसने अपनी याचिका में चुनौती दी थी।
दरअसल, ट्रायल कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को शरजील इमाम के खिलाफ UAPA के तहत दर्ज मामले में जाँच पूरी करने के लिए तीन महीनों का और समय दे दिया था। इसके बाद इमाम ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चैलेंज किया था। अपनी याचिका में इमाम ने दावा किया था कि जाँच एजेंसी कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन कर रही हैं और उससे उसकी जमानत का अधिकार छीन रही है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राव ने अपने आदेश में कहा, “मुझे लगता है कि जाँच के विस्तार को मंजूरी देते समय अदालत ने एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के आवेदन और रिपोर्ट से उन कारणों व आधारों के बारे में खुद को संतुष्ट किया है जिनके आधार पर जाँच करने के लिए और समय माँगा गया था। यह अदालत को सही लगता है और जाँच बढ़ाने के लिए उचित आधार है।”
Delhi High Court dismisses the petition filed by Sharjeel Imam (who was arrested for giving seditious speech & abetting riots in Jamia in Dec 2019) challenging trial court’s order of giving more time to the investigation agency to probe him under UAPA without issuing a notice. pic.twitter.com/6uXicQfIPG
वहीं, वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन ने शरजील इमाम की ओर से दलील देते हुए कोर्ट में कहा कि यहाँ ट्रायल कोर्ट के आदेश को अलग रखा जाना चाहिए क्योंकि अभियुक्त / आवेदक को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43 D के तहत आवेदन का नोटिस नहीं दिया गया था।
वकील ने कहा कि CRPC की धारा 167 (2) (बी) के अनुसार आरोपित को बाद में रिमांड के लिए अदालत में पेश नहीं किया गया है, जबकि हर 15 दिन बाद ऐसा करना जरूरी है। रेबेका ने इमाम के बचाव में कहा कि पुलिस द्वारा दिया गया आवेदन ‘असल कारणों’ से रहित है, जिसमें 90 दिनों से अधिक समय तक विस्तार करने पर सफाई देने की आवश्यकता है।
इस दौरान एडिशनल सॉलिस्टर जनरल अमन लेखी ने दिल्ली पुलिस की ओर से बताया कि इस मामले में जाँच कोरोना महामारी के कारण बहुत प्रभावित हुई है। जाँच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए नहीं हो सकती। बरामदगी, पड़ताल, छानबीन लगभग जाँच से जुड़ी हर चीज इस महामारी से प्रभावित हुई है।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद दिल्ली पुलिस को शरजील के ख़िलाफ़ जाँच के लिए तीन महीने का वक्त और मिल गया है। शरजील पर आईपीसी की धारा 153A, 124A और 505 के तहत मामला दर्ज हुआ है। उसे इस साल की 28 जनवरी को बिहार के जहानाबाद से गिरफ्तार किया गया था। उसे जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक देशद्रोही भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
गैंगस्टर विकास दुबे के राइट हैंड अमर दुबे को पुलिस ने 8 जुलाई को मार गिराया था। इसके बाद पुलिस के हाथ उसका पिता संजीव दुबे भी लग गया। संजीव 5 साल से गायब था और परिवार वालों का कहना था कि वह मर चुका है।
लेकिन संजीव दुबे पिछले पाँच साल से गुमनामी की जिंदगी जी रहा था। दरअसल गुरुवार (9 जुलाई, 2020) को बिकरू गाँव में पुलिस ने एक ऑपरेशन चलाया था। बेटे के एनकाउंटर की खबर सुनने के बाद संजीव दुबे अपने ठिकाने से बाहर निकला। इसकी सूचना खबरी ने तत्काल पुलिस को दी। मौके पर मौजूद पुलिसवालों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद पता चला परिवारवालों ने ही पुलिस से बचाने के लिए उसके झूठे मौत की खबर फैलाई थी।
खबरों के अनुसार एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि संजीव दुबे उर्फ संजू पर 12 आपराधिक मामले चौबेपुर थाना में दर्ज थे। इनमें हत्या की कोशिश, ज़मीन पर कब्जा करना, उगाही और लूट जैसे मामले थे। 7 साल पहले वह एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया था। हादसे में सिर्फ उसका पैर कटा था।
कुछ दिन बाद उसने परिजनों से पुलिस को अपनी झूठी मौत की खबर देने को कहा और अंडरग्राउंड हो गया। इसके बाद पुलिस ने उसके खिलाफ चल रहे सारे केस बंद कर दिए।
गौरतलब है कि कानपुर के बिकरु गॉंव में 3 जुलाई को हुए शूटआउट के दौरान अमर दुबे ने ही सीओ को गोली मारने के बाद उसके पैर पर कुल्हाड़ी से वार किया था। अमर को हमीरपुर में 8 जुलाई की सुबह यूपी एसटीएफ और हमीरपुर पुलिस ने एक संयुक्त ऑपरेशन के दौरान मार गिराया था।
अमर दुबे मध्य प्रदेश की सीमा में घुस कर फरार होने की कोशिश में लगा था। पुलिस ने उसे सरेंडर करने का भी मौका दिया था। इसके बावजूद उसने पुलिस पर फायरिंग कर दी थी, जिसमें 2 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।
वारदात के बाद मध्य प्रदेश की सीमा पर यूपी पुलिस की सख्ती और वाहनों की चेकिंग को देखते हुए उसने वहाँ जाने का विचार त्याग दिया। इसके बाद वो हमीरपुर के मौदहा में अपने एक सम्बन्धी के यहाँ जाने की फ़िराक़ में था लेकिन एसटीएफ को उसके इरादों की भनक लग गई। उसके पास से एक बैग और एक ऑटोमॅटिक फायर आर्म बरामद हुआ था।
अमर दुबे के ऊपर 25,000 रुपए का इनाम रखा गया था। 2-3 जुलाई की रात अमर दुबे अपने आका विकास दुबे के घर में ही मौजूद था और पुलिस पर हमले की साजिश रचने और गोलीबारी करने में शामिल था।
अमर दुबे अपनी धाक जमाने के लिए दिखावे का शौक़ीन था और बंदूकें लेकर महँगी गाड़ियों के साथ फोटो क्लिक करवाता था। अमर और उसके साथी बिल्हौर के सीओ देवेंद्र मिश्र को घसीट कर विकास दुबे के मामा प्रेम कुमार पांडे के घर में ले गए और गोलियों से भून दिया था। मिश्र पर धारदार हथियार से भी वार किए थे।
देश के दलितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली अखिल भारतीय परिसंघ ने शुक्रवार (10 जुलाई, 2020) को एक नया विवाद खड़ा कर दिया। जहाँ परिसंघ ने न केवल ब्राह्मणो के खिलाफ घृणित टिप्पणी की बल्कि उनकी तुलना सूअर से कर डाली। इसके साथ ही उन्होंने अपने ट्वीट में देश की न्यायपालिका के खिलाफ भी अपमानजनक टिप्पणी की।
खुद को दलितों का मसीहा बताने वाले इस संगठन का संचालन कॉन्ग्रेस नेता उदित राज करते है। जो अक्सर ब्राह्मणों को निशाना बनाने के लिए उनके खिलाफ अपमानजनक जातिवादी टिप्पणियाँ करते रहते है। इस बार उन्होंने ब्राह्मणों के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अपने इस ट्वीट में सूअर की एक तस्वीर पोस्ट की है। जिसमें सुअर को हिन्दू रीती रिवाजों में प्रयोग में लाए जाने वाले चंदन का टीका लगाया गया व जनेऊ भी पहनाया गया है।
कॉन्ग्रेस नेता उदित राज का यह परिसंघ खुले तौर पर ब्राह्मणों के खिलाफ प्रचार कर उनकी भावनाओं को आहत करने का काम कर रही है। जहाँ एक तरफ उनकी तुलना सूअरों से कर रही, वहीं दूसरी ओर यह दावा भी कर रही है कि भारतीय न्यायपालिका में केवल ब्राह्मण शामिल हैं।
देश की न्यायपालिका के प्रति अपना तिरस्कार व्यक्त करते हुए, दलित संगठन ने दावा किया कि भारतीय न्यायालयों में ब्राह्मण न्यायाधीश केवल अपने समुदाय के लोगों की सिफारिश करते है। जिन्हें उसके बाद ब्राह्मणों के तीसरे समूह द्वारा न्यायाधीश के रूप में चुन लिया जाता है।
इस परिसंघ की यह टिप्पणी न केवल देश के ब्राह्मणों के अपमान के लिए थी, बल्कि इसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी हमला किया है। जातिगत राजनीति करने की जल्दबाजी में कॉन्ग्रेस सदस्य उदित राज द्वारा चलाए जा रहे इस दलित संगठन ने ऊँची जाति के लोगों को ‘सूअर’ के रूप में संदर्भित करने के लिए शर्मनाक तरीका अपनाया है।
कॉन्ग्रेसी उदित राज के संगठन की ब्राह्मण विरोधी बयानबाजी कोई नई घटना नहीं है। पिछले महीने, रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी ने पालघर साधु लिंचिंग मामले को लेकर सोनिया गाँधी की चुप्पी पर सवाल किया था। जिसके बाद अखिल भारतीय परिसंघ कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष के समर्थन में उतर आई थी। और अर्नब गोस्वामी के खिलाफ जातिगत टिप्पणी की थी।
आल इंडिया परिसंघ ने ट्विटर के जरिए कहा था कि, “इतना नीचे कोई ब्राह्मण ही गिर सकता है, जितना अर्नब गोस्वामी गिरा हैं।” वहीं जातिवादी बयानों के बाद, कॉन्ग्रेस प्रवक्ता उदित राज के खिलाफ ब्राह्मणों ने मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था।
तेलंगाना की राज्य सरकार सचिवालय की नई इमारत बनवा रही है। इसके लिए कुछ पुरानी इमारतें और अतिक्रमण हटाने पड़े हैं। इस कोशिश में फिलहाल एक नया विवाद खड़ा हो गया है, क्योंकि पुराने निर्माण हटाने की चपेट में एक मंदिर और मस्जिद भी आ गई। सरकार की इस कार्रवाई के बाद काफी राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने प्रेस वार्ता के दौरान इस मामले से जुड़ी जानकारी साझा की। केसीआर ने कहा सरकार ने एक नए सचिवालय भवन का निर्माण शुरू किया है इसके लिए पुरानी इमारतों को तोड़ना पड़ रहा है। मुझे इस बात की जानकारी मिली है कि इसी दौरान नज़दीक का एक मंदिर और मस्जिद प्रभावित हुए हैं। उनके कुछ हिस्से शायद टूट गए हैं। हम इसके लिए खेद जताते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए था।
केसीआर ने कहा कि सचिवालय भवन के भीतर ही सरकार एक मंदिर और मस्जिद बनवाएगी। पूरा निर्माण सरकारी ख़र्च पर होगा। निर्माण पूरा होने के बाद सरकार मंदिर और मस्जिद संबंधित लोगों को सौंप देगी।
We’ll construct a temple and mosque in Secretariat premises in a more spacious way even it means spending of crores of rupees. We will construct these at the government cost and hand them over the people concerned. This is my promise: Telangana CMO quotes CM KC Rao https://t.co/9jgLNPTHFr
दरअसल सचिवालय भवन के निर्माण के दौरान ऐसे कुल 3 स्थल थे जिनकी वजह से निर्माण कार्य में परेशानी आ रही थी। लेकिन राजनीतिक ज़मीन पर होने वाली हर छोटी बड़ी घटना अपने हिस्से का घर्षण लेकर ज़रूर आती है।
नतीजतन एआईएमआईएम नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी समेत कुछ नेताओं ने यूनाइटेड मुस्लिम फोरम के तहत इस घटना को असंवैधानिक और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। इसके अलावा उनका कहना है कि जिस तरह सरकार द्वारा मस्जिदों को नुक्सान पहुँचाया गया है उसके बाद मुस्लिम समुदाय गुस्से में है।
असदुद्दीन ओवैसी
ओवैसी ने इस घटना पर विरोध जताते हुए कहा की एआईएमआईएम और तेलंगाना राष्ट्र समिति के बीच संबंध अच्छे हैं। लेकिन सरकार नई मस्जिद बनाने में असफल होती है तो उसका दोनों दलों के संबंधों पर असर पड़ेगा। साथ ही मुस्लिम समुदाय इस कदम का विरोध करने के लिए सड़कों पर भी उतरेगा।
कोरोना वायरस के व्याप्त कहर के बीच चीन ने दावा किया है कि कजाकिस्तान से फैल रहा ‘अज्ञात निमोनिया’ कोरोना से भी खतरनाक है। चीन का कहना है कि इस अज्ञात निमोनिया से मरीजों की मृत्यु दर कोविड-19 से बहुत अधिक है।
हालाँकि, कजाकिस्तान ने चीन की इस चेतावनी को गलत बताया है। साथ ही चीनी मीडिया की रिपोर्ट्स को फर्जी भी कहा है।
कजाकिस्तान का कहना है कि यदि चीनी अधिकारियों को निमोनिया के बारे में अधिक जानकारी थी तो इसे अज्ञात कहने का क्या विशेष कारण था। मंत्रालय ने कहा कि बैक्टीरिया, फंगस और वायरस के साथ-साथ निमोनिया इन्फेक्शन WHO के मानकों के अंदर ही हैं।
गौरतलब है कि गुरुवार को अपने वीचैट प्लैटफॉर्म पर कजाकिस्तान के चीनी दूतावास ने जून में निमोनिया से 600 से अधिक लोगों के मरने के बाद एक अज्ञात निमोनिया के बारे में चेतावनी जारी की।
पूर्व सोवियत ब्लॉक में रहने वाले देश में अपने नागरिकों के लिए जारी एक सलाह में चीनी दूतावास ने कहा कि इस नई बीमारी का कोरोना की तुलना में मृत्यु दर “बहुत अधिक” है।
मध्य एशिया के देश कजाकिस्तान स्थित चीन की एम्बेसी ने एक बयान में कहा है कि यहाँ अज्ञात निमोनिया से इस साल के 6 महीने में ही 1772 लोगों की जान चली गई है। सिर्फ जून में 628 लोगों की जान गई। मरने वालों में चीन के नागरिक भी शामिल हैं।
चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने एंबेसी के बयान का हवाला देते हुए शुक्रवार को कहा कि इस बीमारी से मरने वालों की संख्या कोरोना से बहुत अधिक है। एंबेसी ने यह भी कहा, कजाकिस्तान के स्वास्थ्य विभाग समेत कई संगठन इस निमोनिया के वायरस पर अध्ययन कर रहे हैं। लेकिन अभी तक कोई परिणाम नहीं निकल कर आया है।
उन्होंने कहा कि ये भी नहीं पता चला है कि ये कोरोना की वजह से है या किसी और कारण से। चीन के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चीन में इस निमोनिया को फैलने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
यहाँ बता दें कि कजाकिस्तान की सीमा चीन के उत्तर पश्चिम के शिनझिआंग उइगर स्वायत्त प्रांत से लगती है। ऐसे में चीनी एंबेसी कजाकिस्तान में रह रहे चीनी नागरिकों को इस वायरस के प्रसार को रोकने के उपायों के प्रति जागरूक करने के नाम पर ये सब कर रही है। चीन की रिपोर्ट्स में ये बताया जा रहा है कि कजाक देश ने चीनी दूतावास के सवालों का जवाब नहीं दिया है।
दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में मोहनपुरी इलाके में 25 फरवरी 2020 को एक लाश मिलती है। लाश की पहचान परवेज आलम के रूप में होती है। 26 फरवरी को एक FIR लिखी जाती है कि ASI राकेश को फोन के जरिए सूचना मिली कि जीटीबी अस्पताल में एक परवेज नाम का व्यक्ति है, जिसका पता मालूम नहीं, उसे किसी नितेश ने अस्पताल लाया जहाँ वो ‘मृत अवस्था में लाया गया’ घोषित कर दिया गया।
ये घटना 25 फरवरी के शाम सात बजे की है। जाफराबाद पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी में परवेज की जेब से 13 जिंदा कारतूस (गोलियाँ), एक नोकिया फोन और चाभियों का एक गुच्छा बरामद होने की बात है। इसके बाद यह लिखा गया कि इस व्यक्ति को घोंडा चौक से बाबू राम चौक की तरफ जाने वाली सड़क से घायल अवस्था में अस्पताल में दाखिल कराया गया। नितेश की खोज की गई तो वो मिला नहीं, न ही उसके द्वारा लिखवाया गया पता सही पाया गया।
26/02/2020 को ASI राकेश द्वारा दर्ज प्राथमिकी
तीन तरीके, दो जगहें, साहिल परवेज के अलग-अलग बयान
दफनाने से पहले टीवी पर दिया गया बयान
ये सबसे पहली FIR है। जिसमें डॉक्टर ने लिखा है कि मौत का कारण गोली लगना है। इस घटना के बाद, एक टीवी चैनल से बात करते हुए, परवेज के बेटे साहिल परवेज ने पिता को दफनाने से पहले मरने की जगह और कारण बताते हुए जो कहा, वो उनके द्वारा की गई दो FIR बयानों से अलग है। रिपोर्टर से बात करते हुए साहिल ने बताया कि 24 फरवरी को दंगे हुए, लेकिन 25 की सुबह को दोनों मजहब के लोग आपस में मिले और माफी माँगी कि सबको यहीं रहना है फिर झगड़ा क्यों?
आगे साहिल बताते हैं कि उनके पिता मुख्य सड़क से 50 फीट भीतर गली में खड़े थे कि तभी अफरा-तफरी मची। उसी वक्त उनके पिता परवेज घर की सीढ़ियों की तरफ मुड़े और उनकी दाहिनी तरफ फेफड़ों में गोली लगी। मुँह के बल गिरे, खून बहने लगा। फिर साहिल के अनुसार उसने अपने पिता को जीटीबी अस्पताल में दाखिल करवाया, जहाँ बाद में उन्हें बताया गया कि उनकी मौत हो गई है। वीडियो आप नीचे देख सकते हैं:
19 मार्च का पुलिस को साहिल परवेज का लिखा आवेदन पत्र
साहिल ने इसके बाद 19 मार्च 2020 को एक आवेदन पत्र लिखा जो कि भजनपुरा पुलिस स्टेशन के SHO के नाम था और उसकी प्रतियाँ भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, दिल्ली के उपराज्यपाल, मानवाधिकार आयोग, दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत आठ लोगों/संस्थाओं के लिए संलग्न थीं। हर पन्ने पर साहिल के अँगूठे की छाप है।
इस पत्र में साहिल ने जो लिखा है, वो उसके टीवी पर दिए बयान से बिलकुल अलग है। न सिर्फ इस बयान में जगह बदल गया है, बल्कि हत्या की बात में पहचान के साथ सोलह लोगों के नाम बताए गए हैं। इस पत्र में साहिल ने कहा कि उसके पिता और वो, शाम के 7 बजे नमाज पढ़ने निकले और पिछले दिन से ही जो आरोपित उन्हें धमका रहे थे, उन्होंने डंडे, तलवार और बंदूकों से हमला किया। परवेज की हत्या हो गई।
साहिल ने इस पत्र में पुलिस पर भी आरोप लगाया है कि पुलिस ने उन्हें भला-बुरा कहा और मजहबी गालियों से अपमानित भी किया। साथ ही, साहिल ने यहाँ तक कहा कि ड्यूटी पर तैनात पुलिस अफसर ‘हमारे लोगों को मरवा’ रहे हैं। ‘हमारे लोगों’ से तात्पर्य समुदाय विशेष से है। इसके बाद, साहिल ने सुशील जाट का नाम लिखवाते हुए कहा कि उसने पुलिस के सामने ही साहिल को गालियाँ भी दीं।
अगले दिन इसी सुशील जाट और देवेश नाम के दो व्यक्तियों पर (उनके बाकी साथियों के साथ) परवेज की हत्या का आरोप लगाया गया। हत्या के बाद, इस पत्र में साहिल लिखते हैं कि उन्होंने अपने पिता को स्कूटी पर बिठाया और जीटीबी हॉस्पिटल ले गए, जहाँ पुलिस की मौजूदगी में, उन्होंने डॉक्टर को अपना आधार कार्ड आदि दिखाया। वहाँ भी सुशील द्वारा पिता की हत्या की बात करने पर, साहिल के अनुसार, पुलिस ने साहिल को धमकी दी कि ‘ज्यादा बकवास करोगे तो ऐसा हाल करेंगे कि जिंदगी भर याद करोगे’।
यहाँ साहिल यह भी लिखता है कि उसे बाद में पता चला कि पुलिस ने उसका नाम और पता गलत लिखवा दिया और बताया कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है। साथ ही, साहिल के परिवार को और उसे क्राइम ब्रांच ही धमकी दे रहा था, ऐसा पत्र में लिखा गया है। पत्र में यह भी लिखा गया है कि सुशील और सोनू नामक लड़कों ने उसे रास्ते में कई बार धमकाया कि अगर उसने मुँह खोला, तो उसे भी मार दिया जाएगा क्योंकि ‘पूरा पुलिस डिपार्टमेंट उनके साथ है’।
19/03/2020 को साहिल परवेज द्वारा भजनपुरा पुलिस को लिखा गया आवेदन
3 अप्रैल को पुलिस द्वारा दर्ज किया गया बयान
3 अप्रैल 2020 को साहिल परवेज के बयान को पुलिस ने लिखा है। साहिल ने इतने लम्बे समय के अंतराल के कारण का जिक्र करते हुए लिखा कि पिता की मौत के सदमे, डर और अपनी माताजी की बीमारी के कारण उसे बयान दर्ज करवाने में देरी हुई क्योंकि उसका ज्यादातर समय उसके पैतृक गाँव ‘खुड्डा’ में ही बीता।
यहाँ पर साहिल ने हत्या की जगह उसी सड़क पर बताई है जो कि उसके घर से थोड़ी ही दूरी पर है। यह सड़क बाबू राम चौक की तरफ जाती है। हत्या के बाद का तरीका यहाँ बदल गया है। यहाँ हत्यारा सुशील ही है, और उसके साथी दंगाइयों को भी साहिल ने नामित किया है, लेकिन यहाँ पर भीड़ ने परवेज पर गोलियाँ चलाई, और यह कहा कि यही सारे फसाद की जड़ है।
उसके बाद, जहाँ 19 मार्च के पत्र में साहिल अपने पिता को गोली लगते ही, दूर जान बचाने के लिए छुप जाता है, और बाद में पिता को घसीट कर घर लाया, स्कूटी पर बिठा कर अस्पताल ले गया, वहीं 3 अप्रैल के बयान में उसने मोटरसायकिल से, अपने किराएदारों की मदद से अस्पताल जाने की बात की है। आगे, वह अपने मित्र शाहरुख की स्कूटी का इस्तेमाल करने की बात करता है और बताता है कि गलती से उसके नाम की जगह किसी नितेश का नाम दर्ज है, और पता भी कोई और है।
मैंने जब उस इलाके में पूछताछ की तो उक्त पते पर कोई नितेश नहीं मिला। यही बात सबसे पहली प्राथमिकी में ASI राकेश ने भी लिखा है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि दंगे के समय लोग पुलिस-कानून से बचने के लिए कुछ भी नाम लिखवा देते हैं। दूसरा कारण, साहिल ने एक जगह यह बताया कि पुलिस ने ही जानबूझकर गलत नाम और पता लिखवाया। दूसरी जगह, साहिल ने यह लिखा है कि शाहरुख ने नाम लिखवाया लेकिन वो गलत लिख दिया गया।
03/04/2020 को पुलिस को दिए गए बयान का एक हिस्सा
तीन तरीके से लाए गए परवेज, कौन-सा सही?
बात यह है कि परवेज की हत्या हुई, यह एक सत्य है। लेकिन पुत्र साहिल ने तीन जगह अलग-अलग बातें बोली हैं कि उसके पिता को अस्पताल ले कर कौन गया, किसने नाम लिखवाया और यह भी कि हत्या वास्तव में कहाँ हुई? घर के सामने पर परवेज को गोली मारी गई, यह हत्या के अगले दिन की ही बात है जो टीवी पर होशो-हवास में साहिल कह रहा है।
करीब 20 दिन बाद के आवेदन में उसने सारा आरोप सुशील और पुलिस की मिलीभगत पर डाला है और स्वयं ही पिता को स्कूटी पर अस्पताल ले जाने की बात करता है। उसके 14 दिन बाद के बयान में पिता को गली से लाने, और फिर अपने मोटरसायकिल से ले जाने, और शाहरुख नामक मित्र द्वारा दाखिल कराने की बात कहता है।
आखिर, एक दिन बाद के बयान में, जहाँ हत्या घर के सामने हुई है, और बीस दिन बाद के बयान में आरोपितों को नाम से पहचानने, उन्हें पिछली शाम भी दंगों के दौरान देखने, और धमकी देने की बात कहने वाले साहिल ने टीवी पर दिए बयान में इन लोगों का जिक्र क्यों नहीं किया?
क्या कहते हैं आरोपितों के परिजन और दंगों के चश्मदीद
चश्मदीदों के अनुसार (आरोपितों के परिजन विक्रान्त त्यागी, शशि मिश्रा, चंद्रप्रकाश माहेश्वरी, निशा, श्रीमती चावला) मोहनपुरी इलाके में जो भी होना था, वो सब 24 फरवरी को हो चुका था। मजहबी भीड़ ने ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाते हुए त्यागी परिवार के घर में पेट्रोल बम फेंके, मोटरसायकिल को आग लगा दी, और गेट को तोड़ने की कोशिश की।
मुख्य सड़क पर 16 आरोपितों में से कइयों के दुकान आदि थे, जिन्हें बुरी तरह से तोड़ा गया, आग लगाई गई। लोगों में डर इतना ज्यादा था कि घरों में दुबके ये लोग ईश्वर से अपने बचने की प्रार्थना कर रहे थे और लगातार पुलिस को कॉल कर रहे थे। पुलिस ने बार-बार दिलासा दिया कि पुलिसकर्मी सीनियरों से बात करने के बाद भेजे जाएँगे। परिजनों के पास 100 नंबर पर कॉल के बाद जो रेफरेंस नंबर मिलता है, वो मौजूद थे, जो क्रमशः 919744, 919838, 920064 हैं जो कि 24 फरवरी की रात 7:50, 7:56, और 8:18 मिनट के हैं।
दंगे के दिन पीसीआर को किए गए फोन का रेफरेंस नंबर
ख़ैर, यह सब उस समय तक खत्म हो चुका था। इसके बाद सीधे 8 अप्रैल 2020 को 16 आरोपितों को पुलिस ने नोटिस भेज कर द्वारका स्थित क्राइम ब्रांच में पूछताछ के लिए बुलाया। इसके बाद, फिर अगले दिन भी इन्हें बुलाया और, चूँकि इन्होंने कुछ अपराध किया नहीं था, तो ये पुलिस के साथ जाँच में सहयोग देने की इच्छा से अपनी गाड़ियों में वहाँ गए। परिजन बताते हैं कि वहाँ से रात को फोन आया कि सारे लोग गिरफ्तार हो गए हैं। तब से आज तक परिजनों को न तो मिलने दिया गया, न बातचीत हुई।
चश्मदीदों ने बताया कि अगले दिन इलाका शांत था और कोई भी दुर्घटना नहीं हुई। परवेज की हत्या की खबर भी इन्हें तब ही मिली जब इन्हें नोटिस दे कर पुलिस ने बुलाया। मतलब, 25 फरवरी को सारे लोग अपने-अपने घरों में किसी भी अनहोनी से बचने और डर के कारण घरों में बंद थे। पुलिस ने इसी बात को आधार बनाते हुए कि इन सबके मोबाइल फोन के लोकेशन, घटना के दिन 500 मीटर के दायरे में बता रहे थे, कह कर गिरफ्तार किया। जबकि, इसके अलावा पुलिस ने कोई भी दूसरा साक्ष्य अपने पास होने की बात नहीं की है।
इन्सपेक्टर ऑफ पुलिस रिचपाल सिंह द्वारा भेजे गए कुछ नोटिस
सुशील के साथ देवेश का नाम
अब, इस मोड़ पर FIR में नामित एक व्यक्ति जिसने कथित तौर पर न सिर्फ घायल परवेज को लात मारी, बल्कि उसकी जेब से कुछ लूट भी लिया, उस देवेश को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया। क्यों? क्योंकि उनके फोन की लोकेशन उस समय मोहनपुरी में नहीं मिली। हमने देवेश से बात की तो उन्होंने बताया कि वो अपनी पुत्रवधु को लाने इटावा गए हुए थे। उन्होंने अपने गाड़ी द्वारा टोल के भुगतान की रसीद हमें दिखाई जो 23 फरवरी के जाने और 27 फरवरी के आने की है।
देवेश की कार (नंबर 1487) के द्वारा विभिन्न टोल भुगतानों की रसीदें
एक और बात पर चश्मदीदों ने हमारा ध्यानाकर्षण किया कि 24 फरवरी के दंगों के दौरान लगभग सारी स्ट्रीट लाइट्स तोड़ी जा चुकी थीं, और इलाके में अंधेरा था। सर्दियों में अंधेरा जल्दी होता है और जिस समय परवेज की हत्या हुई, उस समय तक तो काफी अंधेरा हो चुका था। ऐसे में, हत्या के अगले दिन सीढ़ियों पर मुँह के बल गिरे पिता की लाश को सँभालने वाला साहिल, इस अंधेरे में पिता के हत्यारों को 19 मार्च और 3 अप्रैल को, घर से पचास फीट दूर सड़क पर देखता है, उसके कपड़े का रंग बताता है, और यह भी कि कुल 16 लोगों को वह याद कर पाया।
नमाज पढ़ने जाते पिता की जेब में गोलियाँ और रिवॉल्वर?
इसमें देवेश ने कथित तौर पर उसकी पिता के शरीर पर लात मारा और जेब से सामान निकाल लिया। आगे, बिना यह बताए कि देवेश ने क्या निकाला, साहिल बयान देता है कि उसके पिता की लाइसेंसशुदा रिवॉल्वर गायब है, मिली नहीं। जिस तरह से साहिल ने हत्या की जगह पुलिस के द्वारा दर्ज 26 फरवरी की FIR से बाद में मिला लिया, उसी तरह जेब में 13 गोलियों के होने की बात को, इस रिवॉल्वर के गायब होने से जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
साहिल ने दो बार बताया कि हत्या के समय वो अपने पिता के साथ नमाज पढ़ने जा रहा था। साहिल ने इनमें से एक बयान में रिवॉल्वर के गायब होने की बात की है। पुलिस ने लाश की जेब से तेरह जिंदा कारतूस के होने की बात अपनी प्राथमिकी में दर्ज की है। अब साहिल को यह बताना चाहिए कि क्या मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते हुए गोली और पिस्तौल रखना किस हिसाब से सही है?
अगर उसके पिता कंबल बाँटा करते थे, बच्चों को पढ़ने में आर्थिक मदद देते थे, तो उनकी जेब में दंगों के अगले दिन (जब इलाका शांत हो चुका था), इतनी सारी गोलियाँ क्यों थी? हत्या के दूसरे दिन, बहुत ही आराम से पुलिस से अपील करने वाला नवयुवक, बिल्कुल अच्छे से यह बताने वाला नवयुवक की पिता वस्तुतः कहाँ खड़े थे, गली की सड़क से मेन रोड की दूरी कितनी फीट थी, उन्हें गोली कब लगी, किस तरफ मुड़ रहे थे, किस जगह पर और कैसे लगी… बीस दिन बाद पुलिस की FIR में दर्ज जगह को अपने बयान में क्यों ले आता है?
उसके बाद, पुलिस को बहुत ही स्पष्ट शब्दों में धमकाने, गाली देने, सुशील के साथ मिले होने की बात लिखने वाला नवयुवक, इसके 14 दिन बाद उसी ‘ड्यूटी पर हमारे लोगों को मार रही है’ वाली पुलिस को अपने बयान से गायब क्यों कर देता है? इस बयान में उसे ‘यही फसाद की जड़ है’ की याद आती है, शाहरुख की स्कूटी है, और यहाँ पुलिस ने शाहरूख का नाम नितेश नहीं लिखावाया (जैसा कि पहले आवेदन पत्र में है) बल्कि वो गलती से लिख दिया गया!
कौन हैं ये 16 लोग?
साहिल ने अपने 3 अप्रैल वाले बयान में कुल 16 लोगों पर आरोप लगाए हैं: सुशील, जयबीर, सुप्रीम, पवन, अतुल चौहान, वीरेन्द्र चौहान, सुरेश पंडित, अमित, नरेश त्यागी, उत्तम त्यागी, दीपांशु, राजपाल त्यागी, अखिल चौधरी, उत्तम मिश्रा, हरिओम मिश्रा, संदीप चावला। हत्या की वारदात 25 फरवरी को हुई, और इन सबको नोटिस 8 अप्रैल को मिले। उसके बाद इन्हें एक दिन द्वारका क्राइम ब्रांच में बुलाया गया और गिरफ्तारी हुई।
‘संघ और विहिप से जुड़े होने का कारण फँसाया गया’
चंद्रप्रकाश माहेश्वरी जिनके युवा बेटे पर है आरोप
इनके परिजनों में से कुछ लोगों से ऑपइंडिया ने बातचीत की तो पता चला कि पुलिस ने गिरफ्तारी की सूचना देने के बाद इन्हें परिजनों से किसी भी तरह से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी है। इन सारे लोगों में एक ही समानता है कि अधिकतर लोग हिन्दू धर्म से जुड़ी संस्थाओं (राष्ट्रीय स्वयंसेवक, विश्व हिन्दू परिषद आदि) से जुड़े हुए थे और अपने-अपने परिवारों के कमाने वाले अकेले सदस्य थे।
सुप्रीम के पिता चंद्रप्रकाश माहेश्वरी ने हमसे बात करते हुए कहा, “हमें सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि हम हिन्दू हैं और धार्मिक विचारधारा को ले कर अपना कार्य करते हैं। हमने कभी किसी दूसरे का अहित नहीं किया है। सारे लोग छोटे व्यापारी हैं, या अपना कुछ कार्य करते हैं। एक तय तरीके से हमारे परिवारों को तोड़ने की साजिश है ये।”
“हम कहाँ किसी को मारेंगे! जिस तरह से एक मजहबी भीड़ दंगा कर रही थी, हम तो तीन दिन तक घर से बाहर निकलना तो छोड़िए डर से देखा तक नहीं। 38 सालों से यहाँ हूँ। कभी नहीं सोचा था कि ये दिन भी देखना पड़ेगा। मेरा लड़का मेरे साथ दुकान पर हाथ बँटाता था, उसका नाम डाल दिया FIR में! एक दिन बुलाया और अगले दिन अरेस्ट कर लिया! मिलने की तो छोड़िए, बात तक नहीं करने दे रहे। हम करें तो क्या करें!”
उत्तम मिश्रा की 19-वर्षीय बच्ची क्षमा सदमे से चल बसी!
पिता की गिरफ़्तारी के सदमे को नहीं झेल सकी 19 साल की बिटिया क्षमा, पूरी बातचीत में माता शशि मिश्रा जी की आँखें नम थीं
शशि मिश्रा, जो कि उत्तम मिश्रा की पत्नी हैं, उन्होंने रोते हुए हमसे अपनी व्यथा बताई, “मेरी छोटी सी दुकान है, पति के साथ दुकान भी चलाती थी, घर भी देखती थी। बच्चों को भी देखती हूँ। मेरी 19 साल की जवान बच्ची चली गई। मेरी बिटिया… क्षमा मिश्रा… हँसती-खेलती बच्ची इस सदमे से ऐसी बीमार हुई कि किसी दवा ने काम नहीं किया। पापा-पापा ही कहती गई। वो यही कहती थी कि पापा घर आ जाएँ, वो ठीक हो जाएगी। दुकान जला दी गई, वो बहुत डरी हुई थी।”
“हमने कभी सोचा नहीं था कि ये लोग हम पर हमला करेंगे, दुकानों को आग लगाएँगे। हम तो भाईचारा समझते रहे। हमारे साथ ऐसा होगा ये कभी सोचा ही नहीं। अस्थियाँ रखी हैं मेरी बच्ची की, एक महीने हो गए। इस बात पर भी बेल नहीं मिली। छः घंटे दे रहे हैं हमें… आप ही बताइए कि कोई छः घंटे में हरिद्वार जा कर, विधि-विधान से अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित कर के, पूजा आदि करने के बाद इतने कम समय में कैसे लौट आएगा? मैंने अकेले अपनी बेटी का दाह संस्कार किया…”
500 मीटर के दायरे में मोबाइल, दंगों के बाद से डरे लोग
विक्रान्त त्यागी जिनके दो चाचा हैं गिरफ्तार
इतना कहने के बाद शशि जी की स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं उनसे कुछ भी पूछ पाता। एक माँ है जो अपने बच्चों को पढ़ा रही है, पाल रही है, पिता को पुलिस ले जाती है क्योंकि उनका मोबाइल उस वक्त घटना के 500 मीटर के दायरे में था। विक्रान्त त्यागी, जिनके दो चाचा गिरफ्तार हैं, हमसे कहने लगे, “500 मीटर के दायरे में तो हजारों लोग रहते हैं, क्या सिर्फ इसी को आधार बना कर किसी को जेल में डाल दिया जाएगा!”
“चार्जशीट में पुलिस कहती है कि उनके पास मोबाइल फोन के लोकेशन के अलावा और कोई सबूत नहीं हैं। ये चार्जशीट ऐसा है कि कोई लॉ इंटर्न भी कोर्ट में जाएगा तो बेल मिल जाएगी। कोरोना के कारण सेशन जज के न होने के कारण हमें कई परेशानियाँ हो रही हैं, हमारे घरों को इस कारण टार्गेट किया गया क्योंकि हम संघ से जुड़े हैं और हर घर से कमाने वाला बस एक वही व्यक्ति है अधिकांश मामले में।”
विक्रान्त ने आगे बताया कि भीड़ को यह पता नहीं था कि उनका परिवार घर पर नहीं है। वहाँ उनकी चाची और बहन ही थीं। बाकी लोग सगाई और शादी के दो अलग समारोह में अलग-अलग जगहों पर थे। यहाँ जब दंगे हुए तो इनके घर के गेट को तोड़ने की कोशिश हुई, बाहर से मोटरसायकिल से पेट्रोल निकाल कर उसमें आग लगा दी गई, और एक पेट्रोल बम भीतर फेंक दिया गया। उन्होंने हमें वीडियो दिखाए जिसमें यह सब साफ दिख रहा था।
डर का आलम यह है कि कई लोगों ने अब दुकान ही नहीं, अपने घरों में भी सीसीटीवी कैमरे और मॉनिटर लगवा रखा है जो बाहर की गली और मुख्य सड़क पर देख रहे होते हैं। ऐसा अपने बचाव के लिए उन्होंने किया है ताकि कल कोई भीड़ दोबारा उनके घरों पर हमला करने आए, तो वो जान बचा कर सुरक्षित भाग सकें।
हत्या के मुख्य आरोपित सुशील की बहन निशा का बयान
मुख्य आरोपित सुशील की बहन निशा
सुशील पर परवेज ने अपने पिता को गोली मारने का आरोप लगाया है। जबकि उनकी बहन निशा का कहना है कि सिर्फ फोन के उस दायरे में होने से उसका अपराध साबित नहीं होता। उन्होंने कहा, “बिना किसी सही सूचना के उसे पुलिस ने बुलाया और उधर ही बंद कर दिया। जब हमारा घर गली नंबर छः में है तो अपने घर से बंदा कहाँ जाएगा? उन्होंने हमारी गली में पेट्रोल बम फेंके, गोलियाँ चलाईं। बिलकुल अंधेरा, आग की लपटें दिख रही थीं।”
“सुशील मेरे बुजुर्ग पिताजी के साथ भैंस पालते हैं और दूध का कारोबार है। घर में बस एक कमाने वाला। अपने बड़े भाई के परिवार को भी वही देखते थे। बड़े भाई कुछ समय पहले चल बसे। घर में कोई भी ऐसा नहीं जो हमारा ख्याल रखे, सब बंद है। जिस व्यक्ति पर इतनी ज़िम्मेदारियाँ हैं, वो क्या मर्डर करता फिरेगा?”
जेवर बेच कर चला रही हूँ परिवार: संदीप जी की पत्नी
संदीप चावला जी की धर्मपत्नी
संदीप चावला की पत्नी ने बात करते हुए, बाकी लोगों की ही तरह, साहिल परवेज के बदलते बयानों पर ध्यान दिलाया, “परवेज के जो बेटे हैं साहिल परवेज… वो एक-एक मिनट में बयान बदलते फिर रहे हैं। शाम का समय था, स्ट्रीट लाइट सारी टूट चुकी थी, अंधेरा हो चुका था। ऐसे में संभव ही नहीं कि कोई लोगों को देख ले। इतनी दूर से गोलियों के चलने पर, कोई कैसे पहचान लेगा। बिना बात के सोलह लोग फँसा दिए। कल तीन महीने पूरे हो जाएँगे। कोई फोन नहीं, मिलने नहीं दे रहे।”
“प्राइवेट जॉब करते हैं। कोरोना में वैसे ही परेशानी थी, और इनको जेल में डाल दिया। तीन बच्चे हैं, पढ़ाई कर रहे हैं। स्कूलों की फीस तो जा ही रही है। ये सब कहाँ से आएगा? आदमी ही नहीं है, तो पैसे कहाँ से आएँगे। मैं अपने गहने बेच कर किसी तरह गुजारा कर रही हूँ। लोकेशन के नाम पर फँसा दिया है। 15-20 साल से यहाँ रह रहे हैं। दंगे होंगे तो आदमी घर में रहेगा। तो फोन की लोकेशन से क्या होता है? वो तो वहीं का ही दिखाएगा। अब कोई वहाँ किसी को मार दे तो हमें फँसा देंगे?”
पुलिस ने क्या किया है अब तक?
विक्रान्त त्यागी ने अपने लैपटॉप पर हमें अपने और बाकी आरोपितों के दुकानों के सीसीटीवी फुटेज दिखाए जिसमें एक मजहबी भीड़ जिसका नेतृत्व हाजी इस्लाम नामक व्यक्ति करता दिख रहा था, वो लोगों के दुकान तोड़ रही थी, आग लगाई जा रही थी, धड़ल्ले से गोलियाँ चलाई जा रही थी।
बातचीत के दौरान चंद्रप्रकाश माहेश्वरी ने हमें सीसीटीवी के कुछ स्क्रीनशॉट्स के प्रिंटआउट दिखाए जिन पर हर व्यक्ति का नाम आदि लिखा हुआ था। मुझे आश्चर्य हुआ कि एक प्राइवेट व्यक्ति, इतनी गहन छानबीन क्यों कर रहा है?
“हमारे पास और कोई चारा ही नहीं। पुलिस सुन ही नहीं रही। तब हमने अपने-अपने सीसीटीवी के फुटेज देखे, वहाँ से लोगों को पहचाना और फिर एक फाइल बनाई। इसके साथ ही, हमने वीडियो भी इकट्ठा किए। सबको एक पेन ड्राइव में डाल कर जाफराबाद पुलिस स्टेशन को दिया। उन्होंने तो हमारी FIR तक नहीं लिखी। हमारे पास बस एक शिकायत की रिसीविंग है, FIR नहीं हुई, न कोई जाँच।”
बकौल विक्रान्त, “पुलिस से जब हमने कहा कि 24 फरवरी के दंगों को देखिए, हम आपको नाम पता सब दे रहे हैं। सारे साक्ष्य दिए कि कौन, कब, क्या कर रहा था। पुलिस ने सीधा कहा कि उन्हें 24 से मतलब ही नहीं क्योंकि हत्या तो 25 को हुई है। एक तरफ बार-बार बयान बदलने वाले लड़के की बात मानी जा रही है, और हम यहाँ सबूत दे रहे हैं तो हमारी सुनी ही नहीं जा रही।”
सिर्फ रेफरेंस के लिए हम चार तस्वीरों का कोलाज लगा रहे हैं, तस्वीरें पचास से ज्यादा हैं
आगे की क्या है योजना?
परिजनों ने सीधा कहा कि उनमें से बहुतों को कानून की कोई जानकारी नहीं। वकील की व्यवस्था तो है लेकिन कोरोना के कारण कोर्ट भी उस तरीके से काम नहीं कर रहे कि जल्द सुनवाई हो। सारे लोग एक दूसरे का ढाढ़स बँधाते रहे कि भगवान जो भी करेगा, अच्छा ही करेगा क्योंकि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है।
जिस समय मैं त्यागी परिवार की बैठक में लोगों से बात कर रहा था, उसी समय उनके वकील इसी मामले पर लोगों के बेल के लिए कार्य कर रहे थे। जिस तरह से एक फोन लोकेशन जैसी कमजोर कड़ी को आधार बना कर क्राइम ब्रांच ने इन 16 लोगों को पूछताछ के लिए बुला कर गिरफ्तार कर लिया है, ऐसा लगता तो नहीं कि न्यायिक प्रक्रिया में यह दलील किसी भी कोर्ट में ठहर पाएगी।
इस आशा के साथ कि साहिल परवेज के पिता परवेज आलम का असली हत्यारा पकड़ा जाए और निर्दोष लोग छूटें, न्याय अपना कार्य अवश्य करेगा। इस देश में आतंकवादियों के लिए 22 साल के ट्रायल के बाद भी दो बजे रात में कोर्ट ने दरवाजे खोले हैं, यहाँ तो फिर भी निर्दोष लोग हैं जो इन हिन्दू-विरोधी दंगों के दौरान जान बचाने के लिए घरों में बैठे थे, और उसी को आधार बना कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है।
फिर भी सोचने लायक बात यही है कि आखिर साहिल परवेज ने तीन बार में तीन अलग-अलग बातें क्यों बोलीं? उसके पिता की हत्या घर के गेट के पास हुई या फिर बाबू राम चौक पर? उसे अस्पताल ले जाने वाला नितेश कौन है? साहिल अपने पिता को स्कूटी पर ले गया था, या उसका दोस्त शाहरुख? 19 मार्च के आवेदन में पुलिस को हर तरह से हत्यारा और साज़िशकर्ता बताने वाले साहिल के 3 अप्रैल वाले बयान में वो एंगल गायब कैसे है? उसके पिता की जेब में 13 गोलियाँ क्यों थी? वो आत्मरक्षा के लिए थीं या फिर दूसरे की हत्या के लिए?
सवाल बहुत हैं, लेकिन साहिल परवेज, अपने नाम के विपरीत तथ्यों के बहाव को समेटने और सघन करने की जगह, किनारों से बाहर जाता दिखता है।
उत्तर प्रदेश के कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के मामले में आरोपित गैंगस्टर विकास दुबे शुक्रवार (जुलाई 10, 2020) सुबह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। दो जुलाई से हुए अब तक के इस घटनाक्रम में विकास दुबे लगातार पुलिस के साथ आँख मिचौली खेल रहा था, लेकिन आखिरकार वह बृहस्पतिवार को उज्जैन के महाकाल मंदिर में पुलिस के हाथ आया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, गैंगस्टर विकास दुबे के परिजनों ने शव को लेने से इनकार कर दिया है। विकास दुबे के परिजन पोस्टमॉर्टम हाउस भी नहीं पहुँचे।
आज शुक्रवार (जुलाई 10, 2020) कि सुबह ही एसटीएफ गैंगस्टर विकास को लेकर कानपुर जा रही थी। इसी दौरान तेज बारिश और तेज रफ्तार की वजह से गाड़ी पलट गई। गाड़ी पलटने पर विकास दुबे ने घायल पुलिसकर्मियों से हथियार छीनकर भागने की कोशिश की जिसके बाद पुलिस ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया। इस एनकाउंटर में 2 इंस्पेक्टर समेत 4 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
पुलिस ने बताया कि गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे एक पुलिसकर्मी की 9 एमएम की पिस्टल लेकर भागा। उसने पुलिस पर पलटकर गोलियाँ चलाई जिसके जवाबी फायरिग में विकास दुबे को चार गोलियाँ लगीं। मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर आरबी कमल ने बताया कि गैंगस्टर विकास दुबे के सीने में तीन गोलियाँ लगी हैं, जबकि एक गोली उसके हाथ में लगी थी। फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल पर पहुँचकर साक्ष्य एकत्रित किए हैं।
प्रशांत कुमार, यूपी एडीजी (कानून-व्यवस्था) ने कहा कि कानपुर मुठभेड़ में कुल 21 अभियुक्त नामजद थे और 60 से 70 अन्य अभियुक्त थे। जिसमें से अब तक 3 लोग गिरफ्तार हुए हैं, 6 मारे गए हैं और 120बी के अंदर 7 लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया है। 12 इनामी बदमाश वांछित चल रहे हैं।
नहीं बदली गई थी विकास दुबे की गाड़ी
विकास दुबे के एनकाउंटर पर IG मोहित अग्रवाल ने स्पष्ट किया है कि मोस्टवांटेड गैंगस्टर विकास दुबे की गाड़ी नहीं बदली गई थी। दरअसल, विकास दुबे की मौत के बाद से ही मीडिया द्वारा तरह-तरह की अटकलें व्यक्त की जा रही थीं और कहा जा रहा था कि रास्ते में विकास दुबे को दूसरी गाड़ी में बिठाया गया था।
IG अग्रवाल ने कहा कि उज्जैन से उसे एक ही गाड़ी में लाया गया था और उसी गाड़ी में एक्सीडेंट भी हुआ था। विकास दुबे के एनकाउंटर पर आईजी मोहित अग्रवाल ने कहा कि कानपुर पुलिस ने बहुत ही साहसिक काम किया है, उन्होंने नजीर पेश की है।
वहीं, गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर पर झांसी में बलिदानी सिपाही सुल्तान सिंह वर्मा के पिता ने खुशी जताई है। उनके पिता का कहना है कि एसटीएफ ने ऐसे बड़े अपराधी को मारकर बहुत अच्छा काम किया है और उनके परिवार के साथ पूरा गाँव विकास दुबे की मौत से खुश है।
सहयोगी के घर से मिले 7 जिन्दा बम
विकास दुबे की मौत के बाद उसके ग्राम बिकरू थाना चौबेपुर में विकास दुबे के नौकर और सहयोगी साथी दयाशंकर अग्निहोत्री के घर पुलिस तलाशी लेने पहुँची, जहाँ उन्हें 7 जिंदा देशी बम बरामद हुए हैं।
गैंगस्टर की मौत पर गाँव वालों में ख़ुशी की लहर
विकास दुबे के मारे जाने की खबर सुनकर उसके गाँव के लोग बेहद खुश हैं। ग्रामीणों का कहना है कि एक आतंकी चला गया। विकास दुबे के गाँव के लोगों का कहना है कि कुख्यात गैंगस्टर का पिछले 25 साल से बस यही काम था- दूसरों की जमीनों पर कब्जा करना और किसी को भी उठा लेना।
ज्ञात हो कि कानपुर के चौबेपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत बिकरू गाँव में 2-3 जुलाई की रात पुलिस कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे को पकड़ने गई थी। टीम की कमान बिठूर के सीओ देवेंद्र मिश्रा के हाथ में थी और उनके साथ तीन थानों की फोर्स मौजूद थी।
ठीक तभी विकास दुबे के गैंग ने पुलिस टीम पर हमला बोल दिया। डीएसपी देवेंद्र मिश्रा, एसओ शिवराजपुर महेंद्र सिंह यादव, चौकी प्रभारी मंधना अनूप कुमार सिंह समेत 8 पुलिसकर्मियों ने अपनी जान गंवा दी। सभी को गोलियों से छलनी किया गया और क्रूरतापूर्वक पीट-पीटकर धारदार हथियारों से हमला कर उनकी हत्या की गई थी। इसके बाद से ही विकास दुबे फरार हो गया था।
कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे को आज (10 जुलाई, 2020) यूपी पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया है। मध्य प्रदेश से पुलिस उसे गाड़ी से कानपुर ला रही थी। इस दौरान गाड़ी पलट गई। मौके का फ़ायदा उठाते हुए विकास दुबे ने पुलिसकर्मियों का हथियार छीनकर भागने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया।
हादसे में चार पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबर है। कानपुर के लाला लाजपत राय अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।
Kanpur: According to police, 4 policemen were injured after a car from UP STF convoy bringing back #VikasDubey from Madhya Pradesh, overturned today morning. pic.twitter.com/rI0RMpWXwz
आईजी कानपुर मोहित अग्रवाल ने बताया, “गैंगस्टर विकास दुबे पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया है। चार पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। घायल कर्मियों का फिलहाल इलाज चल रहा है।”
कानपुर के एलएलआर अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ.आरबी कमल का कहना है कि एनकाउंटर के दौरान घायल हुए तीन पुलिसकर्मियों की हालत स्थिर है। इनमें से दो को गोली छूकर गई। वहीं विकास दुबे की छाती में तीन और हाथ में गोली लगने का एक घाव मिला है।
The condition of the 3 injured police personnel is stable; bullets brushed by two of them. #VikasDubey had 3 bullet injuries on the chest and one on his arm: Dr RB Kamal, Principal, LLR Hospital, Kanpur pic.twitter.com/sdvUqgO8TH
तीन जुलाई को कानपुर के बिकरु गॉंव में हुए शूटआउट में जान गॅंवाने वाले पुलिसकर्मी जितेंद्र सिंह के पिता ने कहा, “मैं उत्तर प्रदेश प्रशासन को धन्यवाद करता हूँ। मैं आज बहुत खुश हूँ। मुझे गर्व है कि मेरे बेटे का बलिदान खाली नहीं गया। आज मेरे बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी।”
I am very proud of UP Police. Whatever they have done today has brought solace to my soul. I thank the administration & Yogi govt: Tirath Pal, father of constable Jitendra Pal Singh who lost his life in an encounter at Bikru village in Kanpur on July 3#vikasDubeyEncounterhttps://t.co/fRaeVgBM36pic.twitter.com/1KrSj2bmGY
वहीं शूटआउट में बलिदान हुए कॉन्स्टेबल सुल्तान सिंह की पत्नी उर्मिला वर्मा ने विकास दुबे के एनकाउंटर पर कहा, “मैं संतुष्ट हूँ। लेकिन अब यह कैसे सामने आएगा कि कौन उसे (विकास दुबे) सपोर्ट कर रहा था? उससे पूछताछ करके यह खुलासा नहीं किया जा सका।”
I’m satisfied. But now how will it come into fore as to who were backing him (Vikas Dubey)? It could have been unraveled by questioning him: Urmila Verma, wife of constable Sultan Singh who lost his life in an encounter at Kanpur’s Bikru village on July 3#vikasDubeyEncounterpic.twitter.com/Y1jCFHPO1X
गौरतलब है झाँसी में रात करीब 3:15 बजे रक्सा बार्डर से एसटीएफ की टीम विकास दुबे को लेकर कानपुर के लिए रवाना हुई। लेकिन रास्ते में अचानक उत्तर प्रदेश एसटीएफ के काफिले की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस काफिले में कल ही मध्य प्रदेश के उज्जैन से गिरफ्तार मोस्टवांटेड गैंगस्टर विकास दुबे सवार था।
जिस गाड़ी में विकास दुबे सवार था, वह हादसे का शिकार हुई। यह घटना बर्रा थाना क्षेत्र के पास की है। हादसे में कार पलट गई। गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने घायल यूपी एसटीएफ के पुलिसकर्मियों की पिस्टल छीन कर भागने की कोशिश की। जवाबी फायरिंग में गोली लगने से बुरी तरह घायल विकास दुबे की मौत हो गई।
बता दें कि विकास दुबे कल सुबह ही उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में मिला था। 6 दिन की तलाश के बाद मध्य प्रदेश पुलिस उसे गिरफ्तार करने में कामयाब रही थी।
विकास दुबे के बाद मध्यप्रदेश की पुलिस ने शहडोल से यूपी के एक और कुख्यात बदमाश को गिरफ्तार किया है। बदमाश की पहचान शूटर मोहम्मद अख्तर के रूप में हुई है। खबर है कि ये बदमाश अतीक अहमद गैंग से जुड़ा हुआ था। यूपी पुलिस को मोहम्मद अख्तर की तलाश लंबे समय से थी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहडोल पुलिस ने यूपी के इलाहाबाद के प्रयागराज जिला अतासुइया थाना क्षेत्र के रहने वाले शूटर मो अख्तर को जिले के सोहागपुर थाना क्षेत्र से पकड़ा है। यह यूपी के नामी बदमाश अतीक अहमद गैंग का हिस्सा है। इसके ख़िलाफ़ करीब 10 से 12 संगीन अपराध दर्ज हैं।
शहडोल पुलिस के अनुसार, उन्हें सूचना मिली थी कि उत्तरप्रदेश का ये बदमाश शहडोल में आया हुआ है। इसके बाद उन्होंने इसकी धड़पकड़ के लिए कोनी में स्थित एक घर में दबिश दी। जहाँ से इसे गिरफ्तार किया गया। ये घर अख्तर के भाई शफीक का था। पूछताछ में अख्तर ने बताया कि उसके तार अतीक अहमद गैंग से जुड़े हैं।
अब पुलिस मुख्यत: इस बात की जाँच कर रही है कि आखिर शहडोल से उसका क्या कनेक्शन है? और वो यूपी से वहाँ क्यों गया? अभी तक की पड़ताल में पुलिस ने पाया है कि शूटर मो अख्तर उर्फ बालम यूपी के गैंगस्टर अतीक का खास आदमी है। उसका शहडोल से पुराना नाता रहा है।
एसपी का कहना है कि मो अख्तर के ख़िलाफ़ स्थानीय स्तर पर कोई अपराध दर्ज नहीं है। लेकिन यूपी पुलिस से संपर्क किया जा रहा है। यदि यूपी में कोर्ट के आदेश पर छूटा हुआ है तो कहीं भी आने जाने की मनाही नहीं है। यदि यूपी के किसी भी जिले में अपराध पेंडिंग होंगे तो वहाँ की पुलिस को सौंपने की कार्रवाई की जाएगी।
गौरतलब है कि पिछले दिनों बिकरु गाँव में हुई वारदात के बाद से यूपी पुलिस के निशाने पर कई ऐसे शातिर अपराधी हैं जिन्हें पकड़ने के लिए पुलिस अब पूरी तरह एक्शन में आ गई है।
पुलिस इस समय उन सभी गिरोहों का पता लगा रही है, जिन्होंने हत्या, लूट, छिनैती करने वालों के साथ भू-माफिया, गोहत्या व गौतस्करी जैसे अपराधों को अंजाम दिया। इस बीच उनके निशाने पर खासतौर पर अतीक अहमद की गैंग है। जिसके चलते गैंग से जुड़े सभी लोगों पर निगरानी बढ़ा दी गई है।
इसके अतिरिक्त मुकदमे में जमानत पर जेल से बाहर घूमने वाले और घटनाओ को अंजाम देने वालो की जमानत निरस्त करने की बात भी पिछले दिनों मीडिया में आई है। पुलिस रिकार्ड में पूर्व सांसद अतीक अहमद का इंटर स्टेट यानी आइएस-227 सबसे बड़ा गैंग है। इसमें उसके भाई पूर्व विधायक खालिद अजीम उर्फ अशरफ समेत कुल 121 सदस्य हैं।
कौन है अतीक अहमद?
यहाँ बता दें, इलाहाबाद पश्चिम से 5 बार विधायक रह चुके अतीक अहमद को पिछले साल अहमदाबाद के साबरमती सेंट्रल जेल में शिफ्ट किया गया था। उसने पिछले साल वाराणसी से पीएम मोदी के ख़िलाफ़ ताल ठोकने का मन बनाया था। लेकिन अंतिम समय में अपने पाँव पीछे खींच लिए। अतीक फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के टिकट पर सांसद भी रह चुका है। 2016 में कृषि विश्वविद्यालय (SHUATS) के कर्मचारियों की उसने बुरी तरह पिटाई की थी। इस घटना के बाद अखिलेश सरकार की ख़ूब भद्द पिटी थी। अभी अतीक अहमद गुजरात जेल में है। उसके खिलाफ 1979 से 2019 तक कुल 109 केस लंबित है।
उस पर आरोप है कि दिसंबर 2018 में देवरिया जेल में बंद रहने के दौरान अतीक ने अपने साथियों के द्वारा लखनऊ के आलमबाग क्षेत्र के निवासी मोहित जायसवाल का अपहरण करवा लिया और फिर जेल में ले जाकर उसके साथ मारपीट की गई। मोहित का आरोप था कि इस दौरान उनसे संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी करा लिए गए। राज्य सरकार ने भी इस घटना की पुष्टि की थी और कहा था कि उस दिन जेल में लगे सीसीटीवी कैमरों के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी।