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नेपाल की ओली सरकार ने ‘विवादित नक़्शे’ के विरोध का सांसद सरिता गिरी को दी सजा: सदन की सदस्यता से किया मुक्त

आख़िरकार नेपाल की समाजवादी पार्टी की पूर्व नेता और सांसद सरिता गिरी को नेपाल के नए नक़्शे का अपने विरोध का नतीजा भुगतना ही पड़ा। उनकी सदन की सदस्यता आधिकारिक तौर पर रद्द कर दी गई है। जिसके साथ ही उनकी लॉ-मेकर की भूमिका भी छीन ली गई है। 

इसके पहले उनके राजनीतिक दल ने उन्हें दल से निकाल दिया था और प्रतिनिधि सदन से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। दल के मुताबिक़ अब पूर्व सांसद सरिता गिरी ने उस संवैधानिक संशोधन का विरोध किया था जिसके तहत नेपाल का नया मानचित्र लागू किया जाना है। 

नेपाल की समाजवादी पार्टी ने संघीय संसद के सचिवालय को एक पत्र लिखकर इस बात का ज़िक्र किया था कि सरिता गिरी को इसकी सूचना दे दी जाए कि उन्हें दल से बाहर निकाल दिया गया है।इसके बाद संघीय संसद के सचिव भरत राज गौतम ने सरिता गिरी को एक अधिसूचना जारी की। उसमें उन्होंने लिखा कि सरिता गिरी को अब लॉ-मेकर की भूमिका से मुक्त कर दिया गया है। फिलहाल यह पद पूर्णतः रिक्त है। 

इस मामले पर अब भारत भी सक्रिय हो चुका है, भारत ने एक कूटनीतिक दाँव खेलते हुए नेपाल के नए मानचित्र के कदम पर विरोध दर्ज कराया है। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने राष्ट्रीय सदन की डेलीगेट, मैनेजमेंट एंड गवर्नमेंट एश्योरेंस कमेटी को भारत द्वारा भेजे गए पत्र के बारे में सूचित किया। जिसके बाद गुरूवार के दिन हुई समिति की बैठक में राम नारायण बिदारी ने संसदीय समिति को भारत के इस कूटनीतिक विरोध के बारे में बताया। 

बिदारी ने कहा, “भारत ने नेपाल के नए मानचित्र पर विरोध दर्ज कराया है, साथ ही भारत ने इस नए मानचित्र में किए गए बदलावों को सिरे से नकारा है।” नेपाल ने राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से परिवर्तित इस मानचित्र को 20 मई के दिन जारी किया था। 

नेपाल सरकार द्वारा जारी किए गए मानचित्र में कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया गया था। वहीं सरिता गिरी ने भारत के कुछ इलाकों को नेपाल में शामिल करने वाले मानचित्र का विरोध किया था। जिसके बाद उनके राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी ने उनकी सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश कर दी थी। 

इसके बाद समाजवादी पार्टी के महासचिव राम सहाय प्रसाद यादव की अगुवाई में दल के एक टास्क फ़ोर्स ने सरिता गिरी की पार्टी सदस्यता और संसदीय सीट समाप्त करने की सिफारिश की। इस टास्क फ़ोर्स के दूसरे सदस्य मोहम्मद इश्तियाक के अनुसार सरिता गिरी ने दल के संसदीय निर्देशों का पालन नहीं किया 

जिसके आधार पर उनके खिलाफ यह माँग उठाई गई है। यह संविधान संशोधन विधेयक कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा समेत मानचित्र में तमाम संशोधन करने के लिए प्रस्तावित किया गया था। जिसका सांसद गिरी ने विरोध किया और यह हमारे दल के निर्देशों का उल्लंघन था।  

सांसद सरिता गिरी का क़सूर केवल इतना था कि उन्होंने नए नक्शे के लिए संविधान में संशोधन के लिए सरकार से सवाल कर दिया। वह केवल इतना जानना चाहती थीं कि किस आधार पर तमाम इलाकों को नेपाल में शामिल करने का दावा किया जा रहा है? उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर दावा करने के लिए सरकार के पास कोई आधार नहीं है। 

इसके बाद वह एक-एक करके लगभग सारे ही राजनीतिक दलों के निशाने पर आ गईं। उन्हें चौतरफा दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, उनके घर पर हमला हुआ और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलने लगी। यहाँ तक कि उन पर खुद की पार्टी के लोग तक तंज कस रहे हैं, उन्हें भारत की भक्त तक कहा जाने लगा। 

रतन लाल की हत्या से पहले इस्लामी भीड़ ने 2 और पुलिसकर्मियों को बनाया था बंधक: दिल्ली दंगों की चार्जशीट

दिल्ली में 24 से 26 फरवरी के बीच बड़े पैमाने पर हुए दंगों के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों ने निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। हिंदुओ में सबसे पहले कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या हुई थी। उन्हें इस्लामी भीड़ ने निर्दयता से मार डाला था। दिल्ली पुलिस के विशेष जाँच दल द्वारा दायर चार्जशीट में रतन लाल की हत्या और आईपीएस अमित शर्मा और आईपीएस अनुज कुमार पर दंगाइयों द्वारा किए गए जानलेवा हमलों में कम से कम 17 आरोपियों का उल्लेख किया गया है।

दिल्ली में हुए दंगों के लगभग 4 से 5 प्रमुख साजिशकर्ता हैं, जिनमें सलीम खान, सलीम मुन्ना और शादाब शामिल हैं। पुलिस ने कहा कि देश की छवि को खराब करने के लिए दिल्ली में हुए दंगों की साजिश रची गई थी। इसमें गौर करने वाली बात यह है कि जिस डीएस बिंद्रा को सीएए विरोधी प्रदर्शकारियों को खाना परोसने के लिए मीडिया ने मसीहा का दर्जा दे दिया था, उसका भी नाम रतन लाल की हत्या में शामिल दंगों के आरोपितों के साथ है।

रतनलाल को कट्टरपंथी इस्लामिक भीड़ द्वारा उस समय बेरहमी से मारा गया था, जब वह चांद बाग के वजीराबाद रोड पर अपनी ड्यूटी कर रहे थे। चार्जशीट के अनुसार भीड़ पहले से दंगे को अंजाम देने के लिए तैयार थी।

जैसा कि पहले चार्जशीट में यह उल्लेख किया गया है कि एजेंसियों ने घटनास्थल से बिना इस्तेमाल किए गए कारतूसों को बरामद किया था। इसके साथ उन्होंने इस्तेमाल किए गए कारतूसों को पेट्रोल बम के साथ और मोलोटोव कॉकटेल की बोतलों को आसपास के रिक्शा की दुकानों की छत से बरामद किया था। जाँच के लिए दंगों में इस्तेमाल किए गए ईंट और पत्थरों को भी इकट्ठा किया गया था।

दिल्ली दंगों के समय निर्दयतापूर्वक किए गए रतन लाल की हत्या का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। उस समय यह बात सामने आई थी कि पुलिस ने भीड़ के पास जाकर उनसे बात की थी। पुलिस ने उनसे शांत रहने और उनके द्वारा जारी अवैध मार्च को बंद करने के लिए कहा था। इसके बाद भीड़ भड़क गई और पुलिसवालों पर हमला कर दिया।

रतन लाल की हत्या में दायर चार्जशीट में एक चौकाने वाला तथ्य सामने आया है। चार्जशीट को पढ़ने के बाद ऑपइंडिया ने पाया कि जाँच के दौरान कई गवाहों ने इस बात की पुष्टि की थी कि इस्लामी भीड़ ने रतन लाल की हत्या से पहले, अन्य पुलिस अधिकारी को भी बंधक बनाया था।

बता दें उस क्षेत्र में दो बीट पुलिस इंस्पेक्टर भी मौजूद थे। इन पर क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। भीड़ ने सीएए के विरोध में एक अवैध मार्च निकालने का फैसला किया था। उन्होंने भी इन तथ्यों का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था।

चार्जशीट के अंश

चार्जशीट में में यह बताया गया कि मुख्य आरोपितों में से एक सलीम मुन्ना दंगों से पहले मुस्लिमों को इलाके में जाकर उन्हें “अपनी ताकत दिखाने” के लिए कह रहा था। इसके साथ ही रतन लाल की हत्या से पहले दो पुलिस अधिकारियों ने यह बयान दिया था कि भीड़ पहले से ही लाठी और डंडों से लैस थी। उन्होंने आगे बताया कि वे इस मामले में सलीम मुन्ना से बात करने के लिए विरोध स्थल के तंबू में गए, ताकि भीड़ को इकट्ठा होने से रोका जा सके। अधिकारी प्रदर्शनकारियों से मिलने और उनसे बात करने के लिए कहने गए थे।

हालाँकि उस दौरान दोनों अधिकारियों को भीड़ ने बंदी बना लिया था। बड़ी मुश्किल से वे वहाँ से भागने में सफल हुए। इस बात की गवाही एक मुस्लिम पीड़ित ने भी दी थी, जिसका बयान चार्जशीट में लगाया गया है।

चश्मदीद का बयान

दिसंबर 2019, में कट्टरपंथी इस्लामवादियों की भीड़ ने देश के अलग अलग हिस्सों में दंगों को भड़काया था। तब भी इसी तरह की एक घटना हुई थी।।

उस समय मेरठ पुलिस को एक सूचना मिली थी कि शुक्रवार को विरोध-प्रदर्शन के दौरान चीजें बहुत भयावह हो सकती हैं। शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद, नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू करने के विरोध में दोपहर करीब 2 बजे जामा मस्जिद में काली पट्टी बाँधकर लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हुए थी। जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। इसके बाद 15-20 बदमाश लिसाड़ी गेट चौराहे पर पहुँचे और वहाँ हंगामा करना शुरू कर दिया। जैसे ही वहाँ भीड़ बढ़ती गई, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बलों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।

प्रदर्शन के दौरान दोने तरफ से गोलियाँ भी चली। मौके पर डीएम और एसएसपी को पहुँचना पड़ा। प्रदर्शनकारी इसके बाद हापुड़ रोड पर पहुँच गए। वहाँ लगभग 25-30 आरएएफ पुलिस ट्रेनी को तैनात किया गया था। प्रदर्शनकारी वहाँ पहुँचकर गाड़ियों को तोड़ने फोड़ने लग गए। साथ ही जवानों पर पत्थरबाजी भी की।

पथराव से खुद को बचाने के लिए ट्रेनी पुलिसकर्मी पास के एक दुकान के अंदर घुस गए। लेकिन प्रदर्शनकारी वहाँ भी पहुँच गए। हिंसक प्रदर्शनकारियों ने दुकान का शटर बंद कर उन्हें बंधक बना लिया गया। भीड़ ने दुकान में आग लगाने की भी कोशिश की थी।

दुकान में फँसे हुए पुलिसकर्मियों ने अपने वरिष्ठ पुलिसकर्मियों को इसकी जानकारी दी। इसके बाद नौचंदी पुलिस स्टेशन से एक पुलिस बल उनकी सुरक्षा के लिए रवाना हुई। लेकिन उनके वाहनों को भी रोक दिया गया और प्रदर्शनकारियों द्वारा उन पर पथराव किया गया। हिंसक प्रदर्शनकारियों को काबू करने के लिए पुलिस ने भीड़ पर गोलियाँ चलाईं और किसी तरह फँसे हुए आरएएफ सैनिकों को बचाया। साथ ही स्थिति को भी नियंत्रण में लाया गया।

इस घटनाओं को देखते हुए यह स्पष्ट है, कि रतन लाल की हत्या के ठीक पहले टेंट में फँसे कॉन्स्टेबल बेहद खतरे की स्थिति में थे। तुरंत बाद उसी भीड़ ने कॉन्स्टेबल रतन लाल की निर्दयता से हत्या कर दी और कई अन्य लोगों को घायल कर दिया था।

‘जातिवादी योगी विकास दुबे को नहीं मारेंगे’: एनकाउंटर से पहले और बाद में कैसे बदलता गया ‘द वायर’ का एजेंडा

मध्य प्रदेश के उज्जैन से गिरफ्तार किया गया कुख्यात गैंगस्टर, विकास दुबे, शुक्रवार (जुलाई 10, 2020) की सुबह मुठभेड़ में मारा गया था। पुलिस के अनुसार, जब गैंगस्टर विकास दुबे को उत्तर प्रदेश ले जाया जा रहा था उसी समय काफिले के साथ एक गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हुई।

इस दुर्घटना में जब पुलिस अधिकारी घायल हुए, तो विकास दुबे ने उनके हथियार छीनने और भागने की कोशिश की। उसे रोकने के प्रयास में वह पुलिस की गोली का शिकार हुआ और विकास दुबे की मौत हो गई।

गैंगस्टर विकास दुबे की मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर सोशल मीडिया में कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। एक ओर कुछ लोगों का कहना है कि आठ पुलिसकर्मियों को मारने वाले गैंगस्टर विकास दुबे के साथ यही होना चाहिए था जबकि कुछ ने कथित तौर पर उत्तर प्रदेश पुलिस को कानून अपने हाथों में लेने पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि उन्हें इस एनकाउंटर की विश्वसनीयता पर संदेह है और यह जानबूझकर किया गया।

हालाँकि, केवल एक दिन पहले ही, प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ विकास दुबे के फरार होने से लेकर उसकी गिरफ्तारी पर पूरी तरह से अलग ही दावे और काल्पनिक थ्योरी को गढ़ रहा था।

इसी ‘द वायर’ में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि योगी आदित्यनाथ ‘जातिवादी’ थे, क्योंकि उनके ‘एनकाउंटर राज’ में, एक नामी ‘ब्राह्मण गैंगस्टर’ को कभी भी एनकाउंटर नहीं किया जाएगा या फिर पकड़ा नहीं जाएगा।

‘द वायर’ के लेख की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक पुराने कथन से होती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा था कि अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति पर नकेल कसी जाएगी और अपराधी ‘ठोके जाएँगे।’

सबको याद है कि वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उत्तर प्रदेश में अपराधी या तो जेल जाएँगे या मुठभेड़ों में मारे जाएँगे। इसके बाद द वायर के इस लेख में योगी आदित्यनाथ ही नहीं, बल्कि राज्य के पुलिसकर्मियों के कई कठोर बयान भी दिए गए हैं।

बदमाश और अपराधियों के प्रति यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के सार्वजनिक नजरिए के बारे में विस्तार से लिखते हुए ‘द वायर’ ने एक बेहद भ्रामक एजेंडा शुरू किया। द वायर ने इसमें लिखा –

“इन बयानों और प्रोत्साहनों ने पुलिस को राज्य में मुठभेड़ों के पिछले कई रिकॉर्ड तोड़ने को उकसाया और गणतंत्र दिवस, 2019 पर, आदित्यनाथ ने दावा किया कि 3,000 से अधिक मुठभेड़ों में 60 से अधिक अपराधी मारे गए थे। राज्य के मुख्य सचिव ने तुरंत आदेश जारी किए कि सभी जिला मजिस्ट्रेटों को सरकार की उपलब्धियों के रूप में इन तथ्यों को सक्रिय रूप से और व्यापक रूप से प्रचारित करना चाहिए।”

द वायर की इस रिपोर्ट में आगे लिखा गया है – ” कुछ लोगों ने देखा कि मुठभेड़ों में मारे गए और घायल हुए जिन अपराधियों के नाम हर थाने में चलाए जा रहे हैं उन लोगों की सूची में राज्य के 25 मोस्ट वांटेड अपराधी शामिल नहीं थे।”

द वायर के लेख का हिस्सा

यहाँ पर लगभग ऐसा प्रतीत होता है कि ‘द वायर’ यह तय कर पाने में असमर्थ है कि क्या वे अतिरिक्त-न्यायिक मुठभेड़ों का समर्थन करते हैं, चाहे वे परिस्थितियों का परिणाम हों या अन्यथा। या फिर क्या वे इसे मानवाधिकार उल्लंघन मानते हैं?

किसी भी तरह से, ‘द वायर’ का कहना है कि राज्य में एनकाउंटर किए गए अधिकांश लोग ‘छोटे-मोटे अपराधी’ हैं और राज्य में अब तक मोस्ट वांटेड वांछित अपराधियों में से कोई भी नहीं मारा गया।

इसी रिपोर्ट में ‘द वायर’ ने अपने प्रोपेगेंडा को और दिशा देते हुए लिखा है – “इन मुठभेड़ों के बारे में एक बात सामने आती है कि मारे गए लोगों में से आधे समुदाय विशेष से

हैं, जबकि अन्य सभी दलित और ओबीसी हैं।”

यहाँ पर ‘द वायर’ तीन बातें स्पष्ट रूप से कहता नजर आता है –

  1. योगी आदित्यनाथ सरकार का विकास दुबे के एनकाउंटर का कोई इरादा नहीं था।
  2. योगी आदित्यनाथ की सरकार सिर्फ खास समुदाय और दलितों के पीछे थी।
  3. योगी आदित्यनाथ की सरकार छोटे अपराधियों के पीछे थी, न कि जो बड़े नामी अपराधियों के।

ऐसे में ‘द वायर’ के इस एजेंडा से लेख का पूरा आधार ही तहस-नहस हो गया है। इस कथित लेख का आधार यह है कि योगी सरकार खास समुदाय और दलितों को ही निशाना बनाती है। हालाँकि, द वायर के दावे के विपरीत, अगर योगी सरकार का गैंगस्टर विकास दुबे से कोई मतलब नहीं होता, तो उत्तर प्रदेश पुलिस उसके अड्डे पर छापे भी क्यों मारती या उसके ठिकानों पर बुलडोजर क्यों चलवाती?

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन सभी वर्षों में, जबकि समाजवादी पार्टी के शासन में विकास दुबे ने बड़े अपराध किए और उसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। योगी आदित्यनाथ के शासनकाल के दौरान ही एक छापेमारी की गई थी जिसमें दुबे को पकड़ने का प्रयास किया गया था। इस प्रक्रिया में, 8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या कर दी गई और उसके बाद विकास दुबे पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है।

इसके अलावा, विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद, ‘द वायर’ का पूरा प्रपंच, जिसमें कि यह आरोप लगाने का प्रयास किया गया था कि ‘जातिवादी योगी आदित्यनाथ’ विकास दुबे को एनकाउंटर में नहीं मारेंगे या उसे गिरफ्तार नहीं करेंगे, पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

वास्तविकता यह है कि ‘द वायर’ को विकास दुबे की मौत, उसकी गिरफ्तारी, या फिर उसके जीवित होने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका उद्देश्य सिर्फ योगी सरकार के विरुद्ध अपना एजेंडा विकसित करना है, फिर चाहे वो किसी अपराधी की मौत पर चलाए जाए या उसके फरार होने पर।

अगर विकास दुबे बच निकलने या जिंदा रहने में कामयाब होता, तो ‘द वायर’ को भगवा पहने योगी के खिलाफ एक और लंबे समय तक चलने वाली खुराक मिल जाती। वे इस बात को दोहराते कि योगी आदित्यनाथ एक जातिवादी सीएम हैं, जिन्होंने सीएए विरोधी दंगों के दौरान खास समुदाय के खिलाफ कार्रवाई की थी, लेकिन एक गैंगस्टर, जो ‘ब्राह्मण’ था, को बस यूँ ही जाने दिया।

इसके अलावा, द वायर के पास यह घिसा-पिटा नेरेटिव तो था ही कि दुबे को ‘भागने की अनुमति’ थी क्योंकि वह राजनीतिक वर्ग के बारे में कई रहस्य जानता था और इसलिए यूपी सरकार ने उसे हिरासत में भी नहीं लिया था।

द वायर यह तथ्य भूल जाना चाहता है जो विकास दुबे की माँ ने कहा था। महज एक दिन पहले ही, विकास दुबे की माँ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि विकास दुबे समाजवादी पार्टी का हिस्सा था। वास्तव में, उसकी पत्नी भी समाजवादी पार्टी का हिस्सा थी और भाजपा से उसका कभी भी कोई सीधा संबंध नहीं रहा।

अगर विकास दुबे फरार होने में सफल रहता तो अब तक यही ‘द वायर’ इस तरह के तथ्यों को छुपाकर हर सम्भव प्रयास करता कि गैंगस्टर विकास दुबे किसी तरह भाजपा से जुड़े।

मुठभेड़ों में बदमाशों को मारने के सिद्धांत में कोई विश्वास करता है या नहीं, एनकाउंटर पर किसी को यूपी पुलिस के बयान पर विश्वास है या नहीं, लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बात साबित हुई है कि योगी आदित्यनाथ की अपराध के खिलाफ लड़ाई किसी व्यक्ति की आस्था या जाति पर निर्भर नहीं है। और यह प्रेरणा निश्चित रूप से इस बात से प्रभावित होनी भी नहीं चाहिए कि ‘द वायर’ के एजेंडाबाज लोग क्या चाहते हैं।

प्रधानमंत्री ने देश को समर्पित किया 750 मेगावाट का रीवा सौर ऊर्जा प्लांट, दिल्ली के मेट्रो को भी मिलेगा इसका लाभ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए देश को मध्य प्रदेश के रीवा में 750 मेगावाट का अल्ट्रा मेगा सौर परियोजना समर्पित किया है। वीडियो कॉन्फ्रेंस में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत तमाम केंद्रीय मंत्री भी शामिल हुए थे। इस सौर ऊर्जा पावर प्लांट पर बात करते हुए नरेन्द्र मोदी ने इससे जुड़ी कई अहम बातें भी बताई। 

उन्होंने सबसे पहले कहा कि जैसे-जैसे भारत विकास के नए शिखर की तरफ बढ़ रहा है, हमारी आशाएँ-आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं। वैसे-वैसे हमारी ऊर्जा की, बिजली की ज़रूरतें भी बढ़ रही हैं। ऐसे में आत्मनिर्भर भारत के लिए बिजली की आत्मनिर्भरता बहुत आवश्यक है। 

अल्सौट्ररा मेगा सौर परियोजना का शिलान्यास

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि सौर ऊर्जा केवल आज की नहीं बल्कि पूरी 21वीं सदी की ऊर्जा से संबंधित ज़रूरतों का माध्यम बनेगी। क्योंकि इसका स्वभाव ही है श्योर, प्योर और सेक्योर (आश्वस्त, शुद्ध और सुरक्षित)। यह परियोजना प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश को लाभ पहुँचाएगी।    

इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा रीवा में मौजूद इस सौर ऊर्जा प्लांट से सिर्फ यहाँ मौजूद औद्यगिक इकाइयों को फ़ायदा नहीं मिलेगा। बल्कि दिल्ली की मेट्रो रेल को भी इस परियोजना से लाभ मिलेगा। साथ ही रीवा के अलावा शाजापुर, नीमच और छतरपुर में भी सौर ऊर्जा पावर प्लांट पर काम जारी है।  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना था कि आज रीवा जैसे शहर ने इतिहास रच दिया है। रीवा की पहचान माँ नर्मदा के नाम और सफ़ेद बाघ से रही है। अब इसमें एशिया के सबसे बड़े सोलर पावर प्रोजेक्ट का नाम भी जुड़ गया है, बेशक यह देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा।   

जब हम विकास और आत्मनिर्भरता की बात करते हैं तब अर्थव्यवस्था एक अहम मुद्दा साबित होता है। पिछले कुछ वर्षों में नीतियाँ तैयार करने वालों के लिए यह चुनौती उभर कर आई है कि पर्यावरण के बारे में सोचा जाए या अर्थव्यवस्था।

जिस तरह से भारत में सौर ऊर्जा पर काम हो रहा है आगे चल कर दुनिया में इस पर चर्चा बढ़ने ही वाली है। इस तरह के प्रयासों के चलते भारत स्पष्ट और स्वच्छ ऊर्जा के लिए उपयुक्त बाज़ार साबित हो रहा है।

2 गज की दूरी, चेहरे पर मास्क और 20 सेकेंड तक हाथ धुलना। इन नियमों का पालन हमेशा करना है। जब हम नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की तरफ बढ़ रहे हैं तब हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि स्वच्छ ऊर्जा के प्रति हमारा समर्पण जीवन के हर पहलुओं में नज़र आने चाहिए। हमारी कोशिश है कि इसका फ़ायदा देश के हर कोने में पहुँचना चाहिए।

इंडिया टुडे के पत्रकार अशरफ़ वानी ने सेना की गोली से घाटी में महिला की मौत का किया झूठा दावा, सामने आया सच

गुरुवार के दिन कुछ पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामी आतंकवादियों ने अवंतिपुरा के पम्पोर में भारतीय सेना के काफ़िले पर हमला किया था जिसमें एक सैनिक और एक महिला घायल हो गई थी। पम्पोर के लाडो इलाके में हुए इस हमले के दौरान महिला को कुछ चोटें आई थीं जिसके बाद उसे एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कुछ समय बाद उसे अस्पताल से छोड़ भी दिया गया था। 

महिला को चोट उस वक्त आई जब सेना के जवानों और आतंकवादियों के बीच गोलीबारी हुई थी। यह घटना उस इलाके में स्थित एक मस्जिद के पास हुई थी। जैसे ही इस घटना से जुड़ी तमाम जानकारी सामने आई उसके कुछ ही देर बाद कश्मीर का झूठी और भ्रामक ख़बरें फैलाने वाला गिरोह सक्रिय हो गया। इस गिरोह ने तुरंत दावा ठोंक दिया कि महिला, भारतीय सेना द्वारा चलाई गई गोली से घायल हुई है।

इतना होने के बाद इंडिया टुडे के पत्रकार अशरफ वानी ने ट्विटर पर ट्वीट करते हुए यह कहा कि, कुछ युवा पत्थर चला रहे थे, जिसके बाद भारतीय सेना ने उन पर गोली चलाई। सेना द्वारा चलाई गई गोली में महिला की मौत हो गई। 

इसके बाद पत्रकार आदित्य राज कौल ने इस घटना से जुड़ा हुआ एक ट्वीट करके मामले का असली पक्ष बताया। उन्होंने ट्वीट में लिखा घायल महिला अब पूरी तरह ठीक है और प्राथमिक उपचार मिलने के बाद अब अस्पताल से ठीक होकर अपने घर भी जा चुकी है। पम्पोर स्थित एक मस्जिद के पास आतंकवादियों द्वारा भारतीय सेना पर हुए हमले के दौरान हुई गोलीबारी में फँस गई थी। किसी बेवकूफ व्यक्ति द्वारा चलाई गई झूठी खबर पर भरोसा मत करिए । 

यह बात उल्लेखनीय है कि इंडिया टुडे के पत्रकार अशरफ वानी ने केवल ऐसी मौत का दावा ही नहीं किया जो असल में हुई नहीं है बल्कि भारतीय सेना के खिलाफ एक फेक नैरेटिव स्थापित करने का प्रयास भी किया है। उसने कहा कि सेना ने ऐसे युवाओं पर गोली चलाई जो पत्थर चला रहे थे, यानी किसी भी तरह सेना को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास। अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि भी की है कि गोली पत्थर चलाने वाले युवाओं पर नहीं बल्कि सेना पर चली है। 

यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं है जब इंडिया टुडे के पत्रकार ने घाटी में आतंकवादी हमलों को लेकर सोशल मीडिया पर इस तरह का एजेंडा चलाने का प्रयास किया है। इसके पहले अशरफ वानी ने एक लड़के का वीडियो साझा किया था जिसके 64 वर्षीय पिता की सोपोर में हुए आतंकवादी हमले में मौत हो गई थी। वीडियो में ऐसा दावा किया गया था कि पिता को पहले केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवान लेकर गए थे। 

अशरफ उस वीडियो के सहारे यह नैरेटिव चलाना चाहता था कि सीआरपीएफ के जवान पिता को उठा कर ले गए थे जो बाद में आतंकवादियों के हमले में मारे गए थे। जबकि सीने पर बैठे उस लड़के को बाद में केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवानों ने ही बचाया था। अशरफ वानी द्वारा साझा किया गया वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था, ख़ासकर पड़ोसी मुल्क के प्रति संवेदना रखने वाले लोगों के बीच। 

UP: पुलिस मुठभेड़ में मारा गया ₹50,000 का इनामी पन्ना यादव उर्फ डॉक्टर, 3 दर्जन से ज्यादा संगीन मामलों में था आरोपित

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का ₹50000 का इनामी अपराधी पन्ना यादव उर्फ सुमन यादव उर्फ़ ‘डॉक्टर’ बहराइच जिले के हरदी इलाके में एसटीएफ व पुलिस की संयुक्त मुठभेड़ में मारा गया है।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने शुक्रवार (जुलाई 10, 2020) को बहराइच जिले में एक मुठभेड़ में पन्ना यादव के मारे जाने की सूचना दी। पन्ना यादव की पुलिस मुठभेड़ के दौरान पुलिस द्वारा अपने बचाव में की गई फायरिंग में गोली लगने से मृत्यु हो गई। पुलिस के साथ हुई इस मुठभेड़ के दौरान देशी राइफल 315 बोर, एक बंदूक देसी 12 बोर, देसी पिस्टल और तमंचा भी बरामद किए गए।

बहराइच पुलिस द्वारा जारी एक प्रेस नोट के अनुसार, ₹50000 का इनामी बदमाश पन्ना यादव पुत्र समई यादव निवासी मंगलपुर थाना गुलरिया जनपद गोरखपुर, बीती रात बहराइच के थाना हरदी क्षेत्र में अहिरन पुरवा मौजा गलकारा में एसटीएफ एवं हरदी पुलिस के संयुक्त मुठभेड़ में पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ चलाई गई गोली से गंभीर रूप से घायल हुआ है, जिसे उपचार हेतु PHC से जिला चिकित्सालय रेफर किया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

हिस्ट्रीशीटर था पन्ना यादव

गौरतलब है कि पन्ना यादव उर्फ़ ‘डॉक्टर’ के खिलाफ़ गोरखपुर जिले के विभिन्न थानों में हत्या, जानलेवा हमला, रेप, लूट आगुंडा एक्ट, आर्म्स एक्ट आदि धाराओं में दर्जनों मुकदमे दर्ज थे। एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रशांत कुमार ने कहा, “पन्ना यादव उर्फ ​​सुमन यादव को हरदी क्षेत्र के अहिरनपुरवा गाँव में एसटीएफ और स्थानीय पुलिस की एक टीम ने घेर लिया जहाँ उसकी मौत हो गई।”

उन्होंने कहा कि पन्ना यादव हत्या, लूट, डकैती, गैंगस्टर एक्ट सहित तीन दर्जन से अधिक संगीन मामलों में वांछित था। उन्होंने कहा कि पन्ना यादव के खिलाफ महराजगंज, गोरखपुर, बाराबंकी, आजमगढ़ और लखीमपुर जिलों में ये मामले दर्ज किए गए थे। एडीजी ने बताया कि पन्ना यादव एक बार गोरखपुर जेल से भी भाग निकला था और एक जेलर की भी पिटाई की थी।

कम्युनिस्ट PM ओली के ‘हनीट्रैप’ की खबरों से परेशान नेपाल ने किए DD के अलावा सभी भारतीय समाचार चैनल बैन

ऐसे समय में जब नेपाल राजनीतिक अशांति से गुजर रहा है और भारत-नेपाल संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं, काठमांडू ने भारत सरकार के ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन को छोड़कर बाकी सभी भारतीय समाचार चैनलों पर प्रतिबंध लगा दिया है।

समाचार एजेंसी एएनआई ने नेपाली केबल टीवी प्रदाताओं के हवाले से खबर दी है कि देश में भारतीय समाचार चैनलों के लिए सिग्नल बंद कर दिए गए हैं। ‘द हिमालयन टाइम्स’ के अनुसार, यह कदम कुछ भारतीय टीवी चैनलों द्वारा नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और चीनी दूत नेपाल होउ यांकी के बारे में ‘अपमानजनक’ रिपोर्ट के प्रसारण के बाद आया है।

नेपाल के सूचना और प्रसारण मंत्री युबा राज खातीवाड़ा ने इसकी घोषणा करते हुए बताया कि नेपाल के नेताओं के चरित्र हनन में लिप्त कुछ चैनलों के कारण यह फैसला लिया गया है।

नेपाली प्रकाशन ‘हिमालयन टाइम्स’ के अनुसार – “ये फैसला उन घटनाओं के फलस्वरूप लिया गया है, जिनमें एक भारतीय समाचार चैनल, ज़ी हिंदुस्तान ने एक काल्पनिक और अपमानजनक कार्यक्रम प्रसारित किया, जिसमें पीएम ओली को नेपाल के चीनी राजदूत होउ यांकी (Hou Yanqi) के साथ जोड़ा गया है।”

नेपाल द्वारा भारतीय मीडिया को प्रतिबंधित करने के फैसले के पीछे यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि यह प्रतिबंध न्यूज़ चैनल ‘टीवी9 भारतवर्ष’ के एक इंटरव्यू के कारण लिया गया है।

दरअसल, ‘टीवी9 भारतवर्ष’ को दिए एक इंटरव्यू में नेपाल के पूर्व डिप्टी पीएम उपेंद्र यादव ने नेपाली पीएम ओली के चीनी राजदूत द्वारा ‘हनीट्रैप’ किए जाने की अफवाहों पर मुहर लगाई थी।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में नेपाल की आंतरिक राजनीति में चीनी राजदूत होउ की भागीदारी को भारतीय मीडिया में व्यापक रूप से प्रकाशित किया गया है। खबर है कि चीनी राजदूत होउ यांकी और नेपाल के शीर्ष नेताओं के बीच बैठकों का दौर बढ़ता जा रहा है। चीनी राजदूत ने बृहस्पतिवार (जुलाई 09, 2020) को नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के चेयरमैन पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड से मुलाकात की।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपनी पार्टी एनसीपी में अकेले पड़ गए हैं लेकिन इस्तीफ़ा देने को तैयार नहीं हैं। वहीं, उनके मुख्य विरोधी प्रचंड, ओली के इस्तीफे से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं।

हाल ही में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दो गुटों के बीच मतभेद नेपाल के प्रधानमंत्री ओली द्वारा द्वारा एकतरफा रूप से संसद के बजट सत्र को आगे बढ़ाने और सरकार द्वारा COVID-19 महामारी और उसकी एकतरफा कार्रवाइयों की कमज़ोर प्रतिक्रिया पर निर्णय लेने के बाद से ही तेज हो गए हैं।

पत्नी ऋचा से पुलिस ने कानपुर में की पूछताछ: विकास दुबे ने उज्जैन में बताया था वारदात वाली रात की हैवानियत, खुल सकते हैं कई राज

कानपुर का दुर्दांत अपराधी गैंगस्टर विकास दुबे शुक्रवार (10 जुलाई,2020) सुबह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। यूपी एसटीएफ की टीम उसे उज्जैन से ट्रांजिट रिमांड पर कानपुर ले जा रही थी। अचानक पुलिस गाड़ी पलटने के बाद विकास ने पुलिस की पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश की थी। तभी पुलिस ने उसे एनकाउंटर में ढेर कर दिया। जिसकी पुष्टि यूपी पुलिस ने कर दी है।

वहीं कल (9 जुलाई, 2020) की रात विकास दुबे की पत्नी को पुलिस ने लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया। उसके साथ उसका बेटा भी मौजूद था।

उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने विकास दुबे की पत्नी ऋचा दुबे और बेटे को लखनऊ के कृष्णा नगर से पकड़ा था। खबरों के अनुसार वहाँ के स्थानीय लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी थी। गुरुवार को ऋचा अपने इंद्रलोक कॉलोनी वाले मकान में छुपने पहुँची थी। जहाँ पहले से मौजूद पुलिस को देख वो वहाँ से वापस लौट रही थी। एसटीएफ टीम रात में ही उसे कानपुर पूछताछ के लिए ले गई थी। जहाँ महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में उससे वारदात और विकास से संबंधित जानकारियाँ पूछी गई थी।

गौरतलब है कि ऋचा दुबे और उसके बेटे को हिरासत में लिए जाने के बाद सोशल मीडिया पर विकास के नाबालिक बेटे को लेकर तरह-तरह की बयानबाजी चल रही थी। लोग पुलिस के कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहे थे। लेकिन पुलिस ने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि उसका बेटा नाबालिक है। इसलिए उससे किसी भी तरह का सवाल जवाब नहीं किया गया। वह सिर्फ अपनी माँ के साथ था।

विकास दुबे की पत्नी और बेटे के साथ पुलिस ने उसके एक नौकर को भी गिरफ्त में लिया था। जो घटना वाले दिन के बाद से ऋचा के साथ था। मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि पुलिस बाकी के सवाल विकास और उसकी पत्नी को आमने सामने रख कर पूछना चाहती थी।

विकास दुबे की पत्नी पर आरोप

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ऋचा दुबे भी अपने पति की तरह राजनीति में सक्रिय हैं। इस समय वह जिला पंचायत सदस्य भी है। ऋचा दुबे पर अपने पति के साथ आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का भी आरोप है। इसके साथ ही वह विकास दुबे के सभी कारनामों में बढ़-चढ़कर साथ देती थी। कानपुर में हुए वारदात की जानकारी भी ऋचा को पहले से ही थी। इस वजह से घटना के तुरंत बाद वह भी फरार हो गई थी। पंचायत सदस्य होने के नाते गाँव की हर एक गतिविधियों पर भी उसकी नजर हमेशा रहती थी।

विकास ने बताया वारदात के रात की हैवानियत

रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि विकास को उज्जैन में गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उससे पूछताछ भी की थी। जहाँ विकास ने अपनी हैवानियत को उजागर करते हुए बताया कि किस तरह उसने पुलिसवालों को जलाने के लिए उनके शवों को एक के ऊपर एक रख जलाने की कोशिश की थी। जिसके लिए उसने 50 लीटर के गैलन में तेल भर कर रखा था। ताकि अन्य पुलिसबल के आने से पहले सारे सबूतों को मिटा दिया जाए। मगर उससे पहले ही पुलिस वहाँ आ गई। जिसके बाद उन्हें भागना पड़ा।

इसके साथ ही 8 पुलिसकर्मियों की हत्या को लेकर उसने बताया कि उसकी सीओ देवेंद्र मिश्र नहीं बनती थी। कई बार हमारा आमना सामना हो चुका था। उसने मुझे धमकियाँ भी थी। और मुझे गिरफ्तार करने के हमेशा ताक में रहता था। सीओ देवेंद्र मिश्र के बारे में मुझे विनय तिवारी ने भी आगाह किया था। और जिस तरह से वह मेरे पीछे पड़ा था, मैं उससे काफ़ी तंग आ चुका था। दबिश के वक्त सीओ की मेरे घर के सामने मेरे आदमियों ने उसकी हत्या की थी। जब वो हमें पकड़ने के लिए एक मकान के अंदर कूदा था। वो मकान मेरे ही मामा का था।

सीओ के पैर को इसलिए काटा क्योंकि वो मेरे पैर को लेकर टिप्पणी करता था। उसमें गड़बड़ी बताता था। तंज कसते हुए हमेशा कहता था कि उसके दूसरे पैर को भी में ठीक कर दूँगा। और सीओ का चेहरा इसलिए फट गया था क्योंकि हमने उसके सर पर गोली मारी थी। और गोली की वजह से उसका गला भी फट गया था।

गौरतलब है कि बीती 2 जुलाई की रात कानपुर के बिकरु गाँव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने का आरोपित और उत्तर प्रदेश का मोस्ट वांटेड गैंगस्टर विकास दुबे भागने की कोशिश करते हुए पुलिस एनकाउंटर में मारा गया है।

झाँसी में रात करीब 3:15 बजे रक्सा बार्डर से एसटीएफ की टीम विकास दुबे को लेकर कानपुर के लिए रवाना हुई। लेकिन रास्ते में अचानक उत्तर प्रदेश एसटीएफ के काफिले की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। इस काफिले में कल ही मध्य प्रदेश के उज्जैन में गिरफ्तार मोस्ट वांटेड गैंगस्टर विकास दुबे सवार था।

रिपोर्ट के अनुसार, जिस गाड़ी में विकास दुबे सवार था, वह हादसे का शिकार हुई है। यह घटना बर्रा थाना क्षेत्र के पास की है। हादसे में कार पलट गई है। गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने घायल यूपी एसटीएफ के पुलिसकर्मियों की पिस्टल छीन कर भागने की कोशिश की। जवाबी फायरिंग में गोली लगने से बुरी तरह घायल विकास दुबे की मौत हो गई।

बता दें कि विकाश दुबे कल सुबह ही उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में मिला था। 6 दिन की तलाश के बाद मध्य प्रदेश पुलिस उसे गिरफ्तार करने में कामयाब रही थी।

एनकाउंटर में मारा गया गैंगस्टर विकास दुबे: STF की गाड़ी पलटने के बाद दुबे ने की थी पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश, देखें वीडियो

बीती 2 जुलाई की रात कानपुर के बिकरु गाँव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने का आरोपित और उत्तर प्रदेश का मोस्ट वांटेड गैंगस्टर विकास दुबे (Vikas Dubey) शुक्रवार (जुलाई 10, 2020) सुबह भागने की कोशिश करते हुए पुलिस एनकाउंटर में मारा गया।

एनकाउंटर में गंभीर रूप से घायल विकास को पुलिस अस्पताल लेकर गई है। जिसके बाद उसकी मौत हो गई। पुलिस की ओर से इसकी पुष्टि कर दी गई है।

गौरतलब है कि झाँसी में रात करीब 3:15 बजे रक्सा बार्डर से एसटीएफ की टीम विकास दुबे को लेकर कानपुर के लिए रवाना हुई। लेकिन रास्ते में अचानक उत्तर प्रदेश एसटीएफ के काफिले की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। इस काफिले में कल ही मध्य प्रदेश के उज्जैन में गिरफ्तार मोस्ट वांटेड गैंगस्टर विकास दुबे (Vikas Dubey) सवार था।

रिपोर्ट के अनुसार, जिस गाड़ी में विकास दुबे सवार था, वह हादसे का शिकार हुई है। यह घटना बर्रा थाना क्षेत्र के पास की है। हादसे में कार पलट गई है जिसके बाद विकास दुबे ने भागने की कोशिश की और पुलिस एनकाउंटर में मारा गया।

गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने घायल यूपी एसटीएफ के पुलिसकर्मियों की पिस्टल छीन कर भागने की कोशिश की। जवाबी फायरिंग में गोली लगने से बुरी तरह घायल विकास दुबे की मौत हो गई।

बता दें कि विकाश दुबे कल सुबह ही उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में मिला था। 6 दिन की तलाश के बाद मध्य प्रदेश पुलिस उसे गिरफ्तार करने में कामयाब रही थी।

MLA कृष्णा पूनिया को जेड सिक्योरिटी: खाकी को दबाने का आरोप, अब 2 SI सहित 35 पुलिसकर्मी करेंगे सुरक्षा

राजस्थान से कॉन्ग्रेस की विधायक कृष्णा पूनिया फिर चर्चा में हैं। उन्हें जेड सुरक्षा देने की प्रदेश सरकार के फैसले पर सोशल मीडिया में लोग आपत्ति जता रहे हैं।

सादुलपुर की विधायक पूनिया की भूमिका को लेकर पिछले दिनों विष्णुदत्त विश्नोई के सुसाइड के बाद सवाल उठे थे। विश्नोई राजगढ़ थाने के एसएचओ थे। सुसाइड के बाद पूनिया पर दबाव बनाने के आरोप लगे थे।

राजगढ़ थाने के पुलिसकर्मियों ने बीकानेर रेंज के आईजी को पत्र लिख सामू​हिक तबादले की गुहार लगाई थी। पत्र में पूनिया पर पुलिसकर्मियों की उच्च अधिकारियों से झूठी शिकायतें करने का आरोप लगाया गया था। साथ ही थाने में तैनात कुछ लोगों को लाइन हाजिर करने के पीछे भी उन्हें वजह बताया गया था।

बताया जा रहा ही कि सीआईडी (CID) की सूचना के आधार पर पूनिया को Z सेक्योरिटी प्रदान की गई है। गहलोत सरकार ने कॉन्ग्रेस विधायक को मिल रही धमकियों के मद्देनजर यह फैसला लिया है।

राज्य सरकार के निर्देशों पर, चुरू की एसपी तेजस्विनी गौतम ने पूनिया की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की विस्तृत जानकारी जारी की है। इस जानकारी के अनुसार 2 एसआई (सब इंस्पेक्टर) सहित 35 पुलिसकर्मी पूनिया की सुरक्षा के लिए तैनात किए जाएँगे।

राज्य सरकार के इस फैसले के बाद सादुलपुर विधायक कृष्णा पूनिया राजस्थान में दूसरी ऐसी विधायक बन गई हैं जिन्हें अभी तक जेड सुरक्षा मिली। इससे पूर्व केवल कॉन्ग्रेस विधायक सचिन पायलट को ये सुरक्षा प्रदान की गई थी। अब इस निर्देश के बाद 2 एसआई समेत सभी पुलिसकर्मी कृष्णा पूनिया के घर पर शनिवार से तैनात होंगे।

इस निर्देश के तहत 2 सुरक्षागार्ड विधायक के पति व द्रोणाचार्या कोच वीरेंद्र पूनिया के भी साथ रहेंगे। तैनात किए गए सभी सुरक्षा गार्डों का वेतन और सुरक्षा लिहाज से विधायक को प्रदान की गई कारों को सारा खर्चा मिलाकर हर माह 20 लाख रुपए का खर्चा आएगा। जबकि सुरक्षागार्डों के वेतन पर हर महीने कुल 16.5 लाख का खर्चा है।

राजस्थान सरकार के इस फैसले के बाद सादुलपुर की विधायक को लेकर दोबारा से सोशल मीडिया पर चर्चाएँ शुरू हो चुकी हैं। लोगों का गहलोत सरकार से पूछना है कि आखिर गहलोत ये सुविधा देकर क्या दिखाना चाहते है?

गौरतलब है कि पिछले दिनों विष्णुदत्त बिश्नोई की आत्महत्या के बाद ये खबर आई थी कि कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के दबाव में आकर राजगढ़ पुलिस थाने के एसएचओ ने ऐसा कदम उठाया। इस संबंध में एथलीट से विधायक बनने वाली कॉन्ग्रेस नेता पर खूब आरोप लगे थे।

अब हाल में इसी संबंध में हरियाणा के गैंगस्टर लॉरेंस विश्नोई के नाम पर एक फेसबुक पेज बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से पूनिया को मारने की धमकी दी गई थी। धमकी में कहा गया था कि एसएचओ विष्णुदत्त विश्नोई की मौत के पीछे जिन लोगों को हाथ था उन्हें परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। दिलचस्प यह है कि विष्णुदत्त विश्नोई मामले में भी लॉरेंस विश्नोई का नाम सामने आया था।

कृष्णा पूनिया का कहना है कि उन्हें धमकियाँ फोन पर नहीं मिली। लेकिन सीआईडी की सूचना पर राज्य सरकार ने जेड कैटेगरी की सुरक्षा दी है।