ओडिशा के कंधमाल जिले में रविवार (5 जुलाई, 2020) को सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ में चार नक्सलियों के मारे जाने की खबर है। एनकाउंटर कंधमाल जिले के तुमुदीबांध इलाके में हुआ। एंटी नक्सल स्पेशल ग्रुप के जवान, डिस्ट्रिक्ट वॉलेंट्री फोर्स और ओडिशा पुलिस की स्पेशन सेल के जवान इसमें शामिल थे।
Four Maoists cadres were killed in an encounter with the security personnel in Odisha’s Kandhamal district today morning.
द हिंदू के रिपोर्ट के अनुसार ओडिशा पुलिस ने बताया कि मारे गए नक्सली प्रतिबंधित सीपीआई (नक्सल) ग्रुप के सदस्य थे। ओडिशा पुलिस के महानिरीक्षक (ऑपरेशन) अमिताभ ठाकुर ने बताया कि मुठभेड़ की जानकारी मिलते ही घटनास्थल पर और सुरक्षाकर्मी भेजे गए हैं। इलाके में सर्च ऑपरेशन जारी है।
बता दें, नक्सल विरोधी अभियान के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को इलाके में नक्सलियों के छुपे होने की सूचना मिली थी। इसके बाद पुलिस ने इलाके की घेराबंदी की और समर्पण करने के लिए कहा। लेकिन नक्सलियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग कर दी। जवानों ने भी जवाबी कार्रवाई की और चार माओवादी मारे गए।
गौरतलब है कि बीते गुरुवार को सुरक्षाबलों ने कंधमाल जिले के फिरंगिया ब्लॉक के समरबंध गांव के पास माओवादी शिविर ध्वस्त किया था। यहाँ से 15 किलो विस्फोटक, 28 डेटोनेटर के अलावा टिफिन बॉक्स, जूते, बैग और माओवादी साहित्य को बरामद किया गया था। बता दें कंधमाल-कालाहांडी-नयागढ़ और बौध डिवीजन में सीपीआई (माओवादी) कैडर काफ़ी सक्रिय हैं।
कभी अपने बयानों और कभी अपने अभिनय को लेकर चर्चा में बनी रहने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं। पिछले कई दिनों से उन्होंने बॉलीवुड पर हावी नेपोटिज्म के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इस दौरान कंगना ने तमाम दिग्गज कलाकारों पर आरोप लगाते हुए खुल कर विरोध किया।
कंगना रनौत के निशाने पर इस बार हैं बॉलीवुड की एक और मशहूर अभिनेत्री तापसी पन्नू। कंगना का आरोप है कि कुछ बाहरी लोग भी बॉलीवुड के भीतर मूवी माफिया को बढ़ावा दे रहे हैं।
पिछले कुछ समय में कंगना ने बॉलीवुड से जुड़े तमाम लोगों का नाम लेते हुए उन्हें मूवी माफिया करार दिया था। इसी कड़ी में उन्होंने तापसी पन्नू पर आरोप लगाते हुए कहा कि बाहरी होने के बावजूद वह मूवी माफियाओं का साथ दे रही हैं।
कंगना के ट्वीटर हैंडल ‘टीम कंगना’ से किए गए ट्वीट में यह लिखा था, “बॉलीवुड में बाहर से आए तमाम चापलूस कंगना की शुरू की गई मुहिम को रास्ते से भटकाना चाहते हैं। वह मूवी माफियाओं के पसंदीदा बने रहना चाहते हैं, ऐसे लोग कंगना पर हमले करके फिल्म और पुरस्कार लेते हैं। इतना ही नहीं, वह एक महिला को सार्वजनिक तौर पर परेशान करने में दूसरों की मदद कर रहे हैं। तुम्हें शर्म आनी चाहिए तापसी, तुम कंगना के संघर्षों का फल ले रही हो और उसी के खिलाफ गुटबाज़ी में शामिल भी हो रही हो।”
Many chaploos outsiders consistently try to derail d movements started by Kangana,dey want to b in movie mafia good books,dey gt movies & awards fr attacking Kangana & dey take part in open harassment f a woman,shame on u @taapsee u reap the fruits f hr struggles bt gang up on hr https://t.co/0XZqVLsPok
इसके कुछ ही समय बाद तापसी ने भी अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट किया। ऐसा माना जा रहा है कि कंगना के ट्वीट के ठीक 2 घंटे बाद किए गए इस ट्वीट में तापसी ने उनको ही जवाब दिया है।
तापसी ने अपने ट्वीट में दो मोटिवेशनल संदेश साझा करते हुए लिखा, “कुछ चीज़ें मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ने वाली हैं, विशेष रूप से बीते कुछ महीने। इन्होंने मुझे ज़िंदगी को नए सिरे से देखना सिखाया। जिसकी वजह से मुझे अपनी जिंदगी में काफी शांति और दृष्टिकोण मिला, इसलिए मैं यह साझा कर रही हूँ।”
A couple of things have followed in my life , especially the last few months. Really helped in seeing life in a better light. Brought me a lot of peace n perspective so sharing it. pic.twitter.com/77tyjxvnRv
इसके कुछ समय पहले भी कंगना रनौत और तापसी पन्नू के बीच विवाद सतह पर नज़र आ चुके हैं। पिछले विवाद में कंगना की बहन रंगोली चंदेल ने तापसी पन्नू को कंगना की ‘सस्ती कॉपी’ कहा था और फिर तापसी ने इसका जवाब दिया था। तब तापसी ने कहा था कि वह ऐसे लोगों और ऐसी बातों का जवाब देकर अपना वक्त नहीं बर्बाद करना चाहती हैं। ऐसे लोगों का जवाब न देने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता है।
पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी ने भारत को लेकर एक बार फिर से ज़हर उगला है। उन्होंने दावा किया है कि भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तानी टीम से माफ़ी माँगा करती थी। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान ने कहा कि उनकी टीम भारत को इतना हराती थी कि भारतीय क्रिकेटर पाकिस्तान से माफ़ी माँगा करते थे। अफरीदी के इस बयान से सोशल मीडिया पर भारतीय प्रशंसक नाराज़ दिखे।
शाहिद अफरीदी ने दावा किया कि उन्हें भारत के खिलाफ खेलना हमेशा से अच्छा लगता रहा है। अफरीदी ने अपने बड़बोलेपन को प्रदर्शित करते हुए भारतीय टीम के बारे में कहा– “उन्हें तो ठीक-ठाक मारा है हमने। इतना मारा है कि कई बार माफियाँ मांगी हैं उन्होंने।” उन्होंने दावा किया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध दबाव ज्यादा रहने से उन्हें खेलने में खूब मजा आता था।
हालाँकि, शाहिद अफरीदी ने ये भी कहा कि भारत व ऑस्ट्रेलिया अच्छी टीमें हैं और बड़ी टीमें हैं। उन्होंने कहा कि इन टीमों के खिलाफ इनके वातावरण में अच्छा परफॉर्म करना बहुत बड़ी बात है। अफरीदी ने यूट्यूब पर ‘क्रीक कास्ट’ शो में ये बातें कहीं। बता दें कि पाकिस्तान और भारत के मैचों में पाकिस्तान 73-55 से आगे है लेकिन इसमें अफरीदी के समय की टीम का कोई कमाल नहीं है।
80 के दशक में पाकिस्तान की टीम भारतीय टीम पर हावी रही थी और इसी कारण पाकिस्तान अब भी कुल हार-जीत के आँकड़ों में ज्यादा जीत के साथ आगे है। जहाँ तक 2000 के बाद हुए मैचों की बात करें तो भारत 25-23 के आँकड़े के साथ पाकिस्तान से आगे है। वहीं 90 के दशक में पाकिस्तान ने 23-10 से बढ़त बनाई हुई थी। लेकिन तब भी आज तक वर्ल्ड कप के एक भी मैच में पाकिस्तान भारत को हरा नहीं पाया है।
वनडे वर्ल्ड कप की बात करें तो अब तक हुए 7 मैचों में ऐसा एक बार भी नहीं हुआ है जब पाकिस्तान ने भारत को हराया हो। वहीं T20 वर्ल्ड कप में भी भारत के साथ हुए 7 मैचों में पाकिस्तान मात्र एक बार ही जीत दर्ज कर सका है। 2010 के बाद तो पाकिस्तानी टीम भारत के सामने कहीं टिकती ही नहीं है। 14 मैचों में से 10 में भारत ने जीत दर्ज की है। पाकिस्तानी टीम और कमजोर ही होती जा रही है।
पूर्व पाक कप्तान शाहिद अफरीदी ने कहा है कि हमने कई बार भारत को बुरी तरह हराया है. मैच हारने के बाद भारतीय खिलाड़ी हमसे माफी मांगते थे.#shahidafridi#Crickethttps://t.co/PbiFm2M5rv
शाहिद अफरीदी ने भारत में भारत के ही खिलाफ बनाए 141 रन को अपनी सबसे बेहतरीन पारी करार दिया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्हें इस टूर में ले जाने की योजना नहीं थी लेकिन उस समय दिग्गज गेंदबाज वसीम अकरम और पाकिस्तान के चयनकर्ताओं के प्रमुख ने उनका समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि ये टूर खासा कठिन और ये पारी भी खास थी। अफरीदी ने 1999 में चेन्नई टेस्ट में ये पारी खेली थी।
इससे पहले अफरीदी ने कहा था कि कोरोना से भी बड़ी बीमारी मोदी (प्रधानमंत्री मोदी) के दिलो-दिमाग में हैं और वह बीमारी मजहब की बीमारी है। पाक अधिकृत कश्मीर में लोगों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मजहब को लेकर वह सियासत कर रहे हैं और हमारे कश्मीरी भाई-बहनों और बुजुर्गों के साथ जुल्म कर रहे हैं। उन्हें इसका जवाब देना होगा। इस पर उनकी तीखी आलोचना हुई थी।
कानपुर एनकाउंटर में आठ पुलिसकर्मियों की मौत को लेकर सांसद और एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि योगी सरकार ने पिछले कुछ समय से जिस तरह ‘ठोक देंगे’ की नीति अपनाई है वह असफल ही साबित हुई है।
ओवैसी ने कहा कि हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे की घटना से यह साफ़ हो जाता है कि उत्तर प्रदेश की ‘ठोक देंगे’ पॉलिसी पूरी तरह नाकाम हुई है। हैदराबाद के सांसद ने ट्वीट कर कहा, “विकास दूबे का मामला यह दिखाता है कि कैसे योगी सरकार की ‘ठोक देंगे’ नीति राजनीतिक तौर पर विफल साबित हुई है। आप बंदूक की मदद से एक राज्य में क़ानून का शासन लागू नहीं कर सकते हैं और न ही सही नतीजों की उम्मीद कर सकते हैं। इस तरह की नीति के लिए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ही ज़िम्मेदार हैं।”
ट्वीट के दूसरे हिस्से में ओवैसी ने लिखा, “क़ानूनी कार्रवाई से लोगों का भरोसा बढ़ता है, लोगों के सामने उदाहरण की तरह पेश किया जाता। उस पर मुकदमा चलाया जाता, उसके बाद न्यायिक प्रक्रिया से दंड दिया जाता। पुलिस वालों की दबंगई के बावजूद विकास दूबे को पकड़ा नहीं जा सका। विकास दूबे की घटना योगी आदित्यनाथ के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। योगी सरकार की ठोक देंगे नीति के चलते इस तरह के लोगों और घटनाओं को बढ़ावा मिला है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विकास दूबे को भरपूर राजनीतिक संरक्षण भी मिला था।”
All that macho policing failed to keep Dubey out of the streets. A trial & sentencing will increase faith in criminal justice system. He should be made into an example. Let’s not forget Dubey’s political connections & the Frankenstein’s monster that @myogiadityanath created n/n
ओवैसी के अलावा विपक्ष के तमाम नेताओं ने भी इस मामले पर योगी सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि योगी सरकार के मुठभेड़ का नाटक करने की वजह से इतनी बड़ी घटना हुई है। वहीं प्रियंका गांधी का कहना है कि यह घटना भयावह है और इससे पता चलता है कि प्रदेश में क़ानून व्यवस्था बिगड़ चुकी है। बसपा मुखिया मायावती ने भी इस घटना को शर्मनाक बताया है।
He’s saying “mooh todd jawab”, but to whom?Why so hesitant in taking China’s name?
Today’s show in Leh proves dushman (China) ghar mein ghus ke baitha hai.
Does chowkidar know that we can at best sustain full scale war for only 12 days factoring in current war wastage reserves?
इसके पहले ओवैसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लद्दाख दौर पर भी तंज कर चुके हैं। ट्वीट करते हुए ओवैसी ने लिखा “प्रधानमंत्री जी अच्छा हुआ आप हमारे जवानों से मिलने चले गए और घायल सैनिकों का हालचाल पूछा। इससे फौजियों का हौसला तो बढ़ेगा, चौकीदार ने कहा मुंहतोड़ जवाब, लेकिन किसे? चीन का नाम लेने में संकोच कैसा? प्रधानमंत्री के इस दौरे से साबित होता है कि चीन हमारी सीमा में घुस कर बैठा है। क्या चौकीदार को इस बात का अनुमान है कि फिलहाल के युद्ध भंडार की मदद से हम केवल 12 दिनों तक पूरी लड़ाई लड़ सकते हैं।”
गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में वीरगति को प्राप्त हुए भारतीय जवानों को पूरा देश श्रद्धांजलि दे रहा है। वहीं अब रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने कोविड-19 के इलाज के लिए बने अस्पताल के वॉर्डों का नाम बलिदान सैनिकों के नाम पर रखा है।
DRDO-built Sardar Vallabh Bhai Patel #COVID19 Hospital in Delhi Cantonment, the temporary hospital structure has been erected in 11 days and will have 1,000 beds including 250 ICU beds: DRDO officials pic.twitter.com/QV0vPaJxY6
बता दें कि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने केवल 11 दिनों में राजधानी दिल्ली में कोरोना वायरस के इलाज के लिए 1,000 बेड वाली सुविधा का निर्माण किया है। अस्पताल में अस्थायी संरचना में 250 आईसीयू बेड भी शामिल हैं।
डीआरडीओ ने हाल ही में कहा था कि दिल्ली में नई कोविड -19 फैसिलिटी के विभिन्न वार्डों का नाम चीन के साथ हुए खूनी झड़प में लद्दाख की गलवान घाटी पर बलिदान हुए जवानों के नाम पर रखा जाएगा। जिसमें अस्पताल के आईसीयू और वेंटीलेटर वार्ड का नाम कर्नल बी संतोष बाबू के नाम पर रखा गया है।
खास बात यह है कि कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए इस 1,000 बेड की सुविधा में विशेष आईसीयू बेड भी होंगे। इस नए कोविड-19 अस्पताल का उद्घाटन गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रविवार को करेंगे।
गौरतलब है कि दिल्ली में कोरोना वायरस की रोकथाम को लेकर अब केंद्र गृहमंत्री अमित शाह ने खुद मोर्चा सँभाल लिया था। वहीं अमित शाह के निर्देश पर कुछ दिन पहले ही आईटीबीपी की टीम ने नई दिल्ली स्थित राधास्वामी व्यास छतरपुर में 10,000 से भी ज्यादा बिस्तरों वाले प्रस्तावित कोविड केयर सेंटर को संचालन करने के लिए नोडल एजेंसी के तौर पर कार्यभार संभाल लिया था।
आईटीबीपी के अनुभवी डॉक्टरों और प्रशासकों की टीम ने 24 जून को नई दिल्ली के राधा स्वामी ब्यास छतरपुर में आकर तैयारियाँ युद्ध स्तर पर प्रारंभ कर दी थी। इसके साथ आइटीबीपी की टीमों ने दिल्ली सरकार और जिला प्रशासन के अधिकारियों और आश्रम के विभिन्न अधिकारियों के साथ लगातार बैठकें भी कीं थी।
यह भवन भारत की सबसे बड़ी कोविड केयर फैसीलिटी है। कोरोना वायरस मरीजों के लिए समर्पित इस केयर सेंटर में फिलहाल 2000 बेड उपलब्ध हैं। बताया जा रहा है कि जल्द ही इसमें 10,000 बेड की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस केयर सेंटर में डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य सीएपीएफ सहित 1000 से अधिक आईटीबीपी कर्मियों को तैनात किया जाएगा।
कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों को बेरहमी से मारने वाला विकास दुबे अभी भी फरार है। पुलिस उससे जुड़ी हर चीज की जाँच पड़ताल कर रही है। सिर्फ कानपुर ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस इस वक़्त हाई अलर्ट पर है। वहीं अब मुड़भेड़ की रात से जुड़े नए तथ्य भी सामने आ रहे हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला है कि कुख्यात बदमाश विकास दुबे और उसके साथी बदमाशों ने माओवादियों की तरह पुलिस पर हमला किया था।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार बदमाशों ने DSP देवेंद्र मिश्रा पर सिर्फ गोली ही नहीं चलाई बल्कि उनका सर और पाँव भी कुल्हाड़ी से काट दिया था, उनकी लाश को क्षत-विक्षत भी किया था। वहीं एक सब इंस्पेक्टर को पॉइंट ब्लैक रेंज से गोलियों से छलनी कर दिया। और एक कॉन्स्टेबल पर एके-47 से गोलियों की बौछार की गई थी। विकास दुबे के सभी आदमी आधुनिक हथियारों से लैस थे।
एसटीएफ यूनिट और फॉरेंसिक एक्सपर्ट ने बताया कि गैंगेस्टर विकास दुबे के साथ लगभग 60 लोग थे। ये सभी पुलिस पर हमला करने के लिए पहले से घात लगाए बैठे थे। जिस तरह से उन लोगों ने हमला किया है, ऐसे हमले अक्सर माओवादियों और नक्सलियों को करते हुए देखा गया है।
ऑटोप्सी रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टरों ने सब-इंस्पेक्टर अनूप सिंह के शरीर से सात गोलियाँ निकालीं। इसके अलावा शिवराजपुर के स्टेशन अधिकारी महेश यादव के चेहरे, सीने और कंधे पर गोलियाँ लगी थीं। फॉरेंसिक एक्सपर्ट ने बताया कि कॉन्स्टेबल जितेंद्र पाल के शरीर पर एके-47 की गोलियों से घातक हमला किया गया था, जिससे उनका शरीर फट गया था। वहीं राहुल, बबलू और सुल्तान पर .315 बोर राइफल की गोलियों से बौछार की गई थी।
नक्सलियों की तरह पुलिसकर्मियों के शव के साथ दुर्व्यवहार करने वाले बदमाश सिर्फ़ इतने पर ही नहीं रुके। वे शव के ऊपर शव रख कर उसे जलाने की तैयारी में भी जुटे थे। पुलिस की दूसरी टीम जिस समय घटनास्थल पर पहुँची, ये बदमाश शव को जलाने के लिए घर में मौजूद ट्रैक्टर से डीजल निकाल रहे थे। मगर मौके पर पहुँची पुलिस को देख कर सभी भाग खड़े हुए।
आजतक के रिपोर्ट के अनुसार विकास दुबे सरेआम आठों पुलिसवालों के शवों को गाँव के चौराहे पर जलाना चाहता था। और इस घिनौने करतूत में उसका साथ गाँव वाले दे रहे थे। गाँव वाले विकास दुबे के ख़ौफ के नीचे वर्षों से दबे हुए हैं।
विकास दुबे ने कानपुर में इतनी दहशतगर्दी मचा रखी है कि अभी भी कोई उसके खिलाफ अपना मुँह खोलने को तैयार नहीं। पुलिसवालों के पूछने के बाद भी किसी ने कुछ भी उस रात की घटना या विकास से जुड़ी जानकारी उनसे साझा नहीं की। प्रशासन की तरफ से विकास के घर को तोड़ते वक्त भी कोई गाँव वाला घर से बाहर निकल कर देखने नहीं आया। इतने बड़े हत्याकांड पर भी इलाके के सभी लोगों ने चुप्पी साधी हुई है।
गौरतलब है कि इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस को आशंका है कि उसे प्रशासन और राजनीति में पैठ किए लोगों से मदद मिल रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस बात को समझा है और आपराधिक नेटवर्क को जड़ से ख़त्म करने के लिए विकास दुबे को संरक्षण और समर्थन देने वाले हर उस व्यक्ति की सूची बनाई जा रही है, जिसने उसकी मदद की है।
ये मामला मुख्यमंत्री और उनके सरकार की छवि को भी नुकसान पहुँचाने वाला बन गया है, इसीलिए सीएम योगी सख्त हैं। विकास दुबे से जुड़े सारे नेताओं की लिस्ट तैयार की जा रही है, चाहे वो किसी भी राजनीतिक पार्टी में क्यों न हों। इस काम में प्रशासनिक तंत्र के साथ-साथ ख़ुफ़िया विभाग भी लगा हुआ है। यहाँ तक कि भाजपा के भी जिन नेताओं के विकास दुबे से सम्बन्ध हैं, उनका भी ब्यौरा जुटा कर आगे की कार्रवाई तैयार की जा रही है।
इस बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि सब कुछ एकदम गोपनीय तरीके से हो। जिन भी नेताओं पर शक की सूई घूमेगी, उन्हें स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तलब करेंगे और उनसे स्पष्टीकरण माँगा जाएगा। सरकार के भी एक मंत्री के साथ विकास दुबे की तस्वीर वायरल हो रही है, जिसे लेकर सीएम योगी सख्त हैं। विकास दुबे के संरक्षण गैंग पर पुलिस-प्रशासन की टेढ़ी नज़र है और उन्हें बेनकाब किया जाना है।
इधर विकास दुबे पर इनामी राशि भी बढ़ा दी गई है। उस पर 1 लाख रुपए का इनाम रखा गया है। साथ ही उसके 18 अन्य गुर्गों पर भी 25-25 हज़ार रुपए का इनाम रखा गया है। यह भी पता चला है कि विकास दुबे ने पहले ही पुलिस विभाग को धमकी दी थी, जिसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया। अपनी धमकी में उसने पुलिसिया कार्रवाई के बाद बागी हो जाने की बात कही थी। पुलिस बल में कम ही जवान थे, जिससे उसे फरार होने का मौका मिल गया।
कानपुर मुठभेड़ के आरोपित विकास दुबे को पकड़ने के लिए यूपी पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है और इसमें कई टीमें लगाई गई हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे ‘ब्राह्मण बनाम ठाकुर’ बना कर पेश करते हुए उसके समर्थन में लिख रहे हैं। सोशल मीडिया में लोग पुलिस के जवानों के बलिदान का अपमान करते हुए विकास दुबे के कृत्य को सही ठहरा रहे हैं, जिसके कारण कई केस दर्ज किए गए हैं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक खबर है। जीव-जंतुओं के हितों के लिए काम करने वाली संस्था PETA को खुद का लगाया हुआ एक पोस्टर यहाँ हटाना पड़ गया। सवाल है कि पोस्टर में ऐसा क्या था जिसके चलते उसे हटाना पड़ा? पोस्टर में एक बकरी/बकरे की तस्वीर थी, और उसकी हत्या न करने की अपील भी थी, जिसका एक सुन्नी धर्मगुरु ने विरोध किया और विरोध के बाद पोस्टर हटा दिया गयाl
इस्लामिक सेंटर ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मौलाना ख़ालिद राशिद फिरंगी महली ने पोस्टर पर आपत्ति जताते हुए शहर के मंडलायुक्त को ईमेल किया था। साथ ही पोस्टर को हटाने की माँग भी की थी।
मौलाना महली का कहना था कि जब बक़रीद का त्यौहार नज़दीक है, ऐसे में बकरी की तस्वीर लगाने का क्या मतलब? उनके मुताबिक़ बक़रीद 31 जुलाई को मनाई जाएगी। उसके कुछ ही दिन पहले पोस्टर में बकरी की तस्वीर ही क्यों लगाना है?
पोस्टर हटाने के लिए लखनऊ के कैसरबाग थाने में दो अलग-अलग शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं। जिस पोस्टर पर बवाल हुआ है, उसे आप नीचे देख सकते हैं, जिस पर लिखा है – “मैं जीव हूँ मांस नहीं, मेरे प्रति नज़रिया बदलें, वीगन बनें”:
लखनऊ में PETA द्वारा लगाया गया पोस्टर
PETA ने इस तरह के पोस्टर पूरे देश की अलग-अलग जगहों पर लगाया है। PETA मूल रूप से जीव जंतुओं के लिए ही काम करती है।
इसके अलावा सेंटर ऑफ़ ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक अतहर हुसैन ने भी इस मामले में एक पत्र लिखा था। उनका कहना था, “मुस्लिम इस त्यौहार के मौके पर कुर्बानी देते हैं, यह पोस्टर बहुत गलत संदेश देता है। यह पूरी तरह आपत्तिजनक है, हमारा समुदाय इसका विरोध करता है। इसे जल्द से जल्द हटाया जाना चाहिए।”
आज रविवार (जुलाई 5, 2020) को गुरु पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जा रहा है। लेकिन क्यों? हमें यह भी जानना चाहिए कि इसके पीछे के कारण क्या हैं। दरअसल, ये महर्षि वेद-व्यास के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। वही महर्षि वेद-व्यास, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया और महाभारत जैसे महान ग्रन्थ की रचना की। वो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं लेकिन अब तक आपने उनके बारे में जनश्रुतियों में ही सुना होगा।
लेकिन, हमारी अति-प्राचीन पुस्तकें क्या कहती हैं? दरअसल, अच्छे से समझाने के लिए हमें कहानी तब से शुरू करनी पड़ेगी, जब महाराज शांतनु के दोनों बेटे विचित्रवीर्य और चित्रांगद की मृत्यु हो गई थी। चूँकि, हमेशा राज्य के प्रति वफादार रहने और आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर के देवव्रत भीष्म ने अपने पिता का सत्यवती से रिश्ता कराया था, ऐसे में उन्होंने राजा बनने से इनकार कर दिया। कुछ समय पहले भीष्म ने जो सब त्यागा वो उनके सामने फिर से खड़ा था।
माँ सत्यवती की बातों को भी भीष्म ने प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण मानने से इनकार कर दिया, जिससे समस्या आ गई कि अब कुरुवंश का राजा कौन होगा? विचित्रवीर्य और चित्रांगद की पत्नियाँ अम्बिका और अम्बालिका विधवा हो चुकी थीं। मनुस्मृति ने ऐसे समय में ‘नियोग विधि’ का प्रावधान समझाया था, जो कलियुग में इसीलिए लागू नहीं होता क्योंकि लोग अधिक भ्रष्ट और कामातुर हो चुके हैं।
नियोग विधि से उन दोनों से संतान उत्पन्न करने के लिए किसी ज्ञानी व्यक्ति की आवश्यकता थी। ठीक इसी समय सत्यवती ने अपने सौतेले बेटे भीष्म को बताया कि उनका एक और बेटा है, जो विवाह के पूर्व ही उत्पन्न हुआ था। ज्ञान, तपस्या, वेद-वेदांग और नीति-नियमों, सब में निपुण। जिन्होंने जन्म के साथ ही अपने पिता से सारी शिक्षाएँ प्राप्त कर ली थीं। सत्यवती ने कहा कि उन्हें बुला कर संतान उत्पन्न करने की प्रक्रिया अपनाई जाए।
भारतीय सनातन धर्म , संस्कृति और राष्ट्रनिर्माण में हजारों ऋषि-मुनि का अमूल्य योगदान रहा है यह सभी गुरू के समान पूज्य है। फिर भी भगवान् वेदव्यास , आचार्य चाणक्य , आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद इन चारों का योगदान अविस्मरणीय है । आज गुरू पूर्णिमा को सभी को शत शत नमन !! pic.twitter.com/eebITatOB7
इस कहानी को और अच्छे से जाने के लिए थोड़ा और पीछे चलते हैं। सत्यवती चूँकि मछली के पेट से निकली थीं, उनमें वैसी ही दुर्गन्ध थी लेकिन सुंदरता बेमिसाल थी। निषादराज की पुत्री थीं और वो नाव भी चलाया करती थीं। इसी दौरान एक बार महर्षि पराशर उनकी नौका पर बैठे और मोहित हो गए। सत्यवती ने लोक-लाज के डर से पूछा कि यमुना नदी के बीच में स्थित नौका में प्रेम-विहार करने से चारों तरफ से लोग देखेंगे, उनका क्या?
महर्षि पराशर ने तत्क्षण कोहरा उत्पन्न किया और उसी नौका पर उन दोनों का समागम हुआ। इसके बाद जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कृष्ण द्वैपायन। चूँकि वह साँवले थे, इसीलिए कृष्ण। और उनका जन्म यमुना के एक द्वीप पर हुआ था, इसीलिए द्वैपायन। यही श्री कृष्ण द्वैपायन बाद में वेद-व्यास की पदवी को प्राप्त हुए और वेदों का विभाजन किया। ध्यान दीजिए, रचना नहीं की क्योंकि वेद आदिकाल से हैं, ऐसा माना जाता है।
दरअसल, वेद-व्यास एक पदवी ही है और हर मन्वन्तर के एक व्यास होते हैं जो वेदों का विभाजन के साथ-साथ धर्म का पाठ पढ़ाते हैं। पहले मन्वन्तर में ख़ुद ब्रह्मा ही वेद-व्यास हुए थे। इसी तरह वर्तमान मन्वन्तर में कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास हैं। क्या आपको पता है कि अगले मन्वन्तर में कौन वेद-व्यास होंगे? अश्वस्थामा। प्रायश्चित और तपस्या से दग्ध होकर अपने पापों को धो कर वो इस पदवी को प्राप्त होंगे।
अब वापस लौटते हैं वहाँ, जहाँ सत्यवती ने भीष्म को अपने बेटे के बारे में बताया। निर्णय हुआ और वेद-व्यास का स्मरण करते मात्र वो प्रकट हुए। माँ को संकट में देख नियोग विधि से संतान उत्पन्न करने की बात कही और साथ ही कुरुकुल का अंश होने से बचाया। चूँकि वो भयंकर रूप लेकर समागम हेतु पहुँचे थे, अम्बिका ने आँखें बंद कर लीं और उनके पुत्र धृतराष्ट्र अंधे ही पैदा हुआ। अब अँधा व्यक्ति राज कैसे चलाएगा, इसीलिए उन्होंने अम्बालिका के साथ ‘नियोग विधि’ का पालन किया।
वेद-व्यास के बिना महाभारत की कल्पना ही नहीं हो सकती (साभार: एपिक चैनल)
अम्बालिका का डर के मारे शरीर ही पीला पड़ गया और इसीलिए उनके पुत्र पाण्डु पीलिया ग्रसित ही पैदा हुए। उनका शरीर पीला ही था। हालाँकि, पाण्डु बाद में आगे चल कर चक्रवर्ती राजा हुए और भरतखण्ड का विस्तार किया। माँ सत्यवती ने फिर से संतान उत्पन्न करने को कहा। इस बार अम्बालिका ने अपनी जगह किसी दासी को भेज दिया, जिन्होंने वेद-व्यास की खूब सेवा की और डरी भी नहीं।
इस बार महात्मा विदुर पैदा हुए। उनका मन धर्म में हमेशा लगा रहता था और आज भी विदुर-नीति वैसे ही विख्यात है, जैसे चाणक्य नीति। इसी तरह धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर वेद-व्यास के ही संतान हुए। उनसे ही कौरव और पांडवों का जन्म हुआ, जिनका युद्ध महभारत नाम से प्रसिद्ध हुआ। वेद-व्यास अमर हैं। उस समय भी उन्होंने सब कुछ देखा-सुना था, इसीलिए महाभारत को उन्होंने इतिहास बताया है।
जाते-जाते एक बात बता दें कि शांतनु की पहली पत्नी गंगा से उनके पुत्र भीष्म हुए थे। बाद में उन्होंने सत्यवती से शादी की। सत्यवती से उनके पुत्र विचित्रवीर्य और चित्रांगद हुए। शादी से पहले सत्यवती और महर्षि पराशर के संगम से वेद-व्यास का जन्म हुआ था। जिनका जन्मदिवस गुरु पूर्णिमा बना। इस तरह भीष्म और वेद व्यास भाई हुए क्योंकि वेद-व्यास की माँ भीष्म की सौतेली माँ थीं।
भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की बहादुरी और नेतृत्व क्षमता से पूरा देश परिचित है। उनका सैन्य करियर 40 साल तक चला और उन्होंने 5 युद्ध में भारत की तरफ से दुश्मनों के दाँत खट्टे किए। सैम मानेकशॉ का एक वीडियो मेजर जनरल हर्ष काकर (रिटायर्ड) ने ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने अपने पाकिस्तान यात्रा से जुड़ा एक किस्सा सुनाया था। उनके इंटरव्यू में कही गई इन बातों को आज भी लोगों को जानना चाहिए।
2002 के इस इंटरव्यू में सैम मानेकशॉ ने बताया था कि वो भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के 2 महीने बाद ही पाकिस्तान गए थे। बता दें कि 1971 में उनके नेतृत्व में ही भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर के बांग्लादेश नामक नए मुल्क के गठन का रास्ता साफ़ किया था। मानेकशॉ ने बताया कि पाकिस्तान में उनका काफी जोर-शोर से स्वागत किया गया था। लाहौर में पाकिस्तानी गवर्नर ने उन्हें लंच के लिए भी आमंत्रित किया था।
वीडियो में मानेकशॉ बताते हैं कि उन्हें गवर्नर ने लंच से पहले मार्टिनी कॉकटेल पीने के लिए दिया। इसके अलावा उन्हें वाइन भी पेश किया गया। लंच के दौरान ही गवर्नर ने पूछा कि जनरल, क्या आप मेरी सहायता कर सकते हो? इस पर फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने जवाब दिया कि अगर उनसे हो सकेगा तो वो ज़रूर करेंगे। मानेकशॉ ने समझा कि गवर्नर अपने किसी रिश्तेदार को लेकर उनसे कुछ सहायता माँगेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।
गवर्नर ने कहा कि बाहर उनके कुछ स्टाफ खड़े हैं, जो मानेकशॉ से मिलकर बात करना चाहते हैं। सैम मानेकशॉ ने देखा कि वो सभी उनसे मिलने के लिए एक लाइन में खड़े थे। जब वो सभी से एक-एक कर मिल रहे थे तो 11वें व्यक्ति ने अचानक से अपनी पगड़ी निकाल दी और उनके पाँव पर रख दिया। मानेकशॉ ने जल्दी से उसकी पगड़ी को उठा कर उसे सौंपा और पूछा कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहा है? उसने जो जवाब दिया, वो जानने लायक बात है।
उस व्यक्ति ने कहा- “साहब, आपने हम सबको बचा लिया।” उस व्यक्ति के 5 बेटे पाकिस्तानी फ़ौज में शामिल थे। उन्हें भारत-पाकिस्तान युद्ध में बंदी बना लिया गया था। उक्त पाकिस्तानी व्यक्ति ने बताया कि अपनी चिट्ठियों में उसके बेटों ने बताया था कि उन सबको भारतीय सेना की तरफ से कुरानशरीफ दिया गया था। उस पत्र में बताया गया था कि उनके सोने की व्यवस्था बैरकों में की गई थी, जबकि भारतीय सेना के जवान ख़ुद बाहर सोते थे।
Worth listening, even for my Pak bots. This is the Indian army from the mouth of a simple Pak soldier. Listen to the end pic.twitter.com/0LT1DHyYLy
— Maj Gen Harsha Kakar (@kakar_harsha) July 4, 2020
उन बंदी बनाए गए पाकिस्तानी सैनिकों के सोने के लिए गद्दों की व्यवस्था की गई थी जबकि भारतीय जवान ख़ुद ज़मीन पर सोते थे। ये सब भारतीय सेना के जवानों ने ही किया था। उस व्यक्ति ने सैम मानेकशॉ को बताया कि आप सभी के साथ हाथ मिलाते हो और आपने पकिस्तानी फौजियों के साथ लंगड़ में भी खाया। इसके बाद गवर्नर के सामने ही उसने कहा- “साहब, हम ये कभी नहीं मान सकते कि हिन्दू ख़राब होते हैं।“
जबकि सैम मानेकशॉ ने बताया कि उन्हें अपने ही देश में परेशानियों का सामना करना पड़ा क्योंकि ब्यूरोक्रेट्स और मंत्रियों को उनसे शिकायत थी। बकौल सैम मानेकशॉ, उन लोगों का कहना था कि जनरल पाकिस्तानी फौजियों के साथ ऐसे व्यवहार कर रहे हैं, जैसे वो उनके दामाद हों। एक कैबिनेट बैठक में उन लोगों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से सैम मानेकशॉ की शिकायत कर दी।
सैम मानेकशॉ ने इंटरव्यू में सुनाए अपने अनुभव (देखें 12:00 के बाद)
इसके बाद मानेकशॉ ने इंदिरा गाँधी से कहा कि पाकिस्तानी के फौजी भी सैनिक हैं, उन्होंने भी युद्ध लड़ा और काफी अच्छी तरह से लड़ा। मानकेशॉ ने इंदिरा से कहा कि भले ही पाकिस्तानी फौजी जंग हार गए हों लेकिन उन्हें बंदी बनाए जाने के बावजूद वो पाकिस्तानियों की नहीं बल्कि सैनिकों की देखभाल कर रहे हैं, सैनिकों के साथ उसी तरह का व्यवहार कर रहे हैं। मानेकशॉ इंदिरा गाँधी के सामने भी अपनी बात रखने से नहीं हिचकिचाते थे।
जम्मू-कश्मीर में बीते एक हफ्ते से डोमिसाइल सर्टिफिकेट बॉंटा जा रहा है। अब तक करीब 6600 लोगों को प्रमाण-पत्र दिया जा चुका है। इस प्रक्रिया को 15 दिनों में पूरा किया जाना है।
आर्टिकल 370 के समाप्ति के बाद केंद्र शासित प्रदेश में वर्षों से रह रहे लोगों को स्थायी निवास का प्रमाण-पत्र देने का रास्ता खुला था। जम्मू-कश्मीर नागरिक सेवा अधिनियम, 2010 के नियमों के तहत डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किया जा रहा है।
अब तक जिन लोगों को स्थायी निवास का प्रमाण-पत्र दिया गया है उनमें ज्यादातर वाल्मीकि, रिटायर्ड गोरखा सैनिक और केंद्र शासित प्रदेश में सालों से तैनात सरकारी कर्मचारी हैं। जम्मू के अतिरिक्त उपायुक्त (राजस्व) विजय कुमार शर्मा ने बताया कि लगभग 700 निवास प्रमाण-पत्र कश्मीर के लिए जारी किए गए हैं।
अब तक करीब 33,000 लोगों ने डोमिसाइल सर्टिफिकेट के लिए अप्लाई किया है। हर दिन लगभग 200 लोग निवास प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन कर रहे है।
जम्मू में बाहु के तहसीलदार डॉ. रोहित शर्मा ने बताया कि उनके क्षेत्र में करीब 3500 लोगों ने डोमिसाइल के लिए आवेदन किया था। इनमें से करीब 2500 ऐसे लोगों को सर्टिफिकेट दिया गया है जो गोरखा हैं। अन्य लोग दलित समुदाय से हैं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया को 68 वर्षीय प्रेम बहादुर ने बताया कि उनके पिता हरक सिंह ने जम्मू-कश्मीर में तब के शासक महाराजा हरि सिंह की सेना में नौकरी की थी। इसके बाद उनके भाई ओमप्रकाश और उन्होंने गोरखा राइफल्स ज्वाइन की। डोमिसाइल सर्टिफिकेट मिलने पर प्रसन्नता जताते हुए उन्होंने कहा कि अब वे शांति से मर सकेंगे।
गौरतलब है कि यह प्रक्रिया शुरू होने के बाद नवीन चौधरी जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासी बनने वाले दूसरे प्रांत के पहले शख्स हैं। आईएएस नवीन चौधरी मूल रूप से बिहार के दरभंगा के रहने वाले हैं।
हालॉंकि केंद्र शासित पदेश की पार्टियॉं इसका विरोध कर रही हैं। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP), नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) और अलगाववादी अमलगाम हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियों ने इसे जनसांख्यिकी में बदलाव की साजिश करार दिया है। साथ ही उनका कहना है कि आरएसएस के इशारे पर सरकार ऐसा कर रही है।
इस प्रक्रिया के तहत वाल्मीकि और गोरखा समुदाय के जिन लोगों को फायदा हुआ है वे पश्चिमी पाकिस्तान से आए हैं। कुछ 1947 में देश के विभाजन के बाद यहॉं आए थे तो कुछ 1957 में पंजाब से सफाई के कार्य के लिए लाकर बसाए गए थे।
नए नियमों के मुताबिक जो लोग 15 साल से जम्मू-कश्मीर में रह रहे हैं या 7 साल तक यहॉं पढ़ाई की है, वे स्थायी निवासी बन सकते हैं। केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारी और बैंक कर्मचारी जिन्होंने 10 साल तक जम्मू-कश्मीर में काम किया है वो भी स्थायी निवासी बन सकते हैं।