8 पुलिसकर्मियों की जान लेने वाला कानपुर का दुर्दांत अपराधी विकास दुबे अभी तक फरार है और उत्तर प्रदेश पुलिस को आशंका है कि उसे प्रशासन और राजनीति में पैठ किए लोगों से मदद मिल रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस बात को समझा है और आपराधिक नेटवर्क को जड़ से ख़त्म करने के लिए विकास दुबे को संरक्षण और समर्थन देने वाले हर उस व्यक्ति की सूची बनाई जा रही है, जिसने उसकी मदद की है।
ये मामला मुख्यमंत्री और उनके सरकार की छवि को भी नुकसान पहुँचाने वाला बन गया है, इसीलिए सीएम योगी सख्त हैं। विकास दुबे से जुड़े सारे नेताओं की लिस्ट तैयार की जा रही है, चाहे वो किसी भी राजनीतिक पार्टी में क्यों न हों। इस काम में प्रशासनिक तंत्र के साथ-साथ ख़ुफ़िया विभाग भी लगा हुआ है। यहाँ तक कि भाजपा के भी जिन नेताओं के विकास दुबे से सम्बन्ध हैं, उनका भी ब्यौरा जुटा कर आगे की कार्रवाई तैयार की जा रही है।
इस बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि सब कुछ एकदम गोपनीय तरीके से हो। ‘अमर उजाला’ की ख़बर के अनुसार, जिन भी नेताओं पर शक की सूई घूमेगी, उन्हें स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तलब करेंगे और उनसे स्पष्टीकरण माँगा जाएगा। सरकार के भी एक मंत्री के साथ विकास दुबे की तस्वीर वायरल हो रही है, जिसे लेकर सीएम योगी सख्त हैं। विकास दुबे के संरक्षण गैंग पर पुलिस-प्रशासन की टेढ़ी नज़र है और उन्हें बेनकाब किया जाना है।
इधर विकास दुबे पर इनामी राशि भी बढ़ा दी गई है। उस पर 1 लाख रुपए का इनाम रखा गया है। साथ ही उसके 18 अन्य गुर्गों पर भी 25-25 हज़ार रुपए का इनाम रखा गया है। यह भी पता चला है कि विकास दुबे ने पहले ही पुलिस विभाग को धमकी दी थी, जिसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया। अपनी धमकी में उसने पुलिसिया कार्रवाई के बाद बागी हो जाने की बात कही थी। पुलिस बल में कम ही जवान थे, जिससे उसे फरार होने का मौका मिल गया।
कानपुर मुठभेड़ के आरोपित विकास दुबे को पकड़ने के लिए यूपी पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है और इसमें कई टीमें लगाई गई हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे ‘ब्राह्मण बनाम ठाकुर’ बना कर पेश करते हुए उसके समर्थन में लिख रहे हैं। सोशल मीडिया में लोग पुलिस के जवानों के बलिदान का अपमान करते हुए विकास दुबे के कृत्य को सही ठहरा रहे हैं, जिसके कारण कई केस दर्ज किए गए हैं।
— Reema Kaur Ahluwalia (@Reema_ahluwalia) July 4, 2020
पुलिस गैंगस्टर विकास दुबे के समर्थन में लिखने वालों पर शिकंजा कसने के लिए सोशल मीडिया पर नज़र रख रही है। विकास दुबे के तीन अन्य भाई भी हिस्ट्रीशीटर हैं। साथ ही उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाले राहुल तिवारी भी फरार हैं क्योंकि उनके परिवार को डर है कि विकास उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है। सोशल मीडिया पर इन अपराधियों के समर्थन में लिखने वालों को पुलिस चिह्नित कर रही है।
‘हिंदुस्तान’ की ख़बर के अनुसार, पुलिस एनकाउंटर में मार गिराए गए विकास दुबे के मामा और चचेरे भाई का पुलिस ने पोस्टमार्टम कराया। बताया गया है कि पुलिस ने परिजनों को इसकी सूचना दे दी थी, इसके बावजूद कोई भी नहीं आया। इसके कारण पुलिसकर्मियों ने ही भैरोघाट स्थित विद्युत शवदाह गृह में इन दोनों का अंतिम संस्कार करा दिया। वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया पूरी की गई।
गौरतलब है कि कानपुर में दो जुलाई को हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला किया। हमले में आठ पुलिसकर्मी की मौत हो गई। इस घटना के बहाने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यूपी पुलिस का मजाक उड़ाने की कोशिश की है। विकास दुबे की सपा-बसपा के कई नेताओं से करीबी रही है। उसकी पत्नी सपा के टिकट पर पंचायत चुनाव भी लड़ चुकी है।
वियोन की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस के प्रकोप और भारत के साथ मौजूदा सीमा तनाव के बीच चीन ने अब रूसी शहर व्लादिवोस्तोक पर अपना दावा ठोक दिया है। शुक्रवार को भारत में रूसी दूतावास ने जापान के समुद्र के गोल्डन हॉर्न बे में रूसी सैन्य चौकी व्लादिवोस्तोक को स्थापित करने के बारे में एक वीडियो ट्वीट किया था। ट्वीट में कहा गया है कि इस सैन्य पोस्ट को मई 1880 में एक शहर का दर्जा दिया गया था।
?#OTD, 160 years ago, the Russian military post named #Vladivostok was set up in the Golden Horn Bay of the Sea of Japan. In May 1880, Vladivostok received the status of a city.
ऐसा ही एक बीडियो बीजिंग में रूसी दूतावास द्वारा चीन की माइक्रोब्लॉगिंग साइट वीबो पर पोस्ट किया गया था, हालाँकि, इस पोस्ट को चीन के सोशल मीडिया वेबसाइट वीबो पर कुछ इस तरह से पसंद नहीं किया गया, जिस तरह से चीन के सोशल मीडिया यूजर्स ने रूस के खिलाफ इस अभियान को ऑनलाइन शुरू किया था।
राज्य के स्वामित्व में चलने वाले सीजीटीएन के जर्नलिस्ट शेन सिवई ने कहा कि रसियन दूतावास के द्वारा जो ट्वीट किया गया है उसे ज्यादा लोगों ने पसंद नहीं किया है, क्योंकि व्लादिवोस्तोक शहर पहले चीन के क्षेत्र में आता था। इसे रूस से एकतरफा संधि के जरिए छीन लिया गया था। कुछ इसी तरह की भावनाएँ अन्य चीन के राजदूतों द्वारा व्यक्त की गई, जिनमें पाकिस्तान में चीन के राजनयिक भी शामिल हैं।
This “tweet” of #Russian embassy to #China isn’t so welcome on Weibo “The history of Vladivostok (literally ‘Ruler of the East’) is from 1860 when Russia built a military harbor.” But the city was Haishenwai as Chinese land, before Russia annexed it via unequal Treaty of Beijing. pic.twitter.com/ZmEWwOoDaA
द्वितीय अफीम युद्ध (1856-1860) के दौरान चीन को ब्रिटेन, रूस और फ्रांस के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। युद्ध की समाप्ति के बाद इस पूरे सुदूरवर्ती इलाके को रुस को दे दिया गया था। दरअसल, व्लादिवोस्तोक का क्षेत्र चीन के किंग राजवंश का ही एक हिस्सा था और 1860 में पेकिंग की संधि के तहत से रूस को सौंप दिया गया था।
हालाँकि, यह कानूनी रूप से स्वामित्व में था, लेकिन इसके बाद भी विस्तारवादी नीति पर चल रही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) अब इस संधि को खारिज कर देती है। व्लादिवोस्तोक शहर की तरह ही चीन ने कॉवलून प्रायद्वीप को खो दिया है, जो कि अब ब्रिटेन का हिस्सा है। अब चीन ने सोशल माडिया के माध्यम से 160 वर्ष बाद इस मामले पर अपना आक्रोश जाहिर किया है।
रूस-चीन के बीच संबंधों में उलझन
वुहान शहर से निकले कोरोना वायरस महामारी के कारण चीन के संबंध विश्व शक्तियों के साथ ठीक नहीं चल रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी चीन अपने करीबी सहयोगी रूस के ही खिलाफ खड़ा हो गया है। यह सब तब हुआ है कि जब रूस ने अभी तक चीन को न तो वुहान कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया है और न ही हॉन्गकॉन्ग में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए।
हालाँकि, भारत में रूसी दूतावास द्वारा ट्वीट के माध्यम से व्लादिवोस्तोक के स्थापना दिवस को जश्न के रूप में मनाते हुए बड़ा रणनीतिक संकेत दिया है। इस ट्वीट ने भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद के बीच महत्व भारत और रूस के बीच की रणनीतिक साझेदारी को उजागर किया है।
दरअसल, रूस और चीन 4,209 किमी लंबी सीमा साझा करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, रूस का रक्षा मंत्रालय उन संभावित चुनौतियों को लेकर सतर्क है, जो लंबे समय में चीन द्वारा सीमा पर पैदा की जा सकती हैं। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि रूस के उत्सव पर चीन की आपत्ति सोशल मीडिया से आगे नहीं बढ़ेगी।
दरअसल, 1969 में दोनों देश युद्ध के कगार पर थे, लेकिन 2008 में दोनों देशों के बीच समझौता हो गया था। समझौते के दौरान, रूस ने अमूर और उसुरी नदियों के कुछ द्वीपों को चीन को सौंप दिया। हालाँकि, व्लादिवोस्तोक पर यथास्थिति अपरिवर्तित रही। कथित तौर पर, चीन ने विभिन्न पारस्परिक समझौतों का उल्लंघन करते हुए रूस में लगभग 160,000 वर्ग किमी भूमि पर दावा किया है।
चीन का विस्तारवाद
वियोन की खबर के अनुसार, चीन कम से कम 21 देशों के जमीन पर अवैध रूप से कब्जा किए हुए है। भले ही अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने उसके संदिग्ध दावों को खारिज कर दिया है, मगर फिर भी चीन फिलीपींस में द्वीपों के स्वामित्व पर जोर देता है। यही हाल वियतनाम का है।
कम्युनिस्ट द्वारा संचालित देश ने इंडोनेशियाई क्षेत्र में द्वीपों के पास पानी में मछली पकड़ने के अधिकार पर भी अपना दावा किया है। इसके अलावा चीन का लाओस, कंबोडिया के ऐतिहासिक मिसाल और थाईलैंड के साथ मेकांग नदी को लेकर 2001 से विवाद चल रहा है।
चीन का जापान के साथ सेनकाकू और रयु क्या द्वीप को लेकर विवाद चल रहा है। इसके अलावा, विस्तारवादी देश ने कई बार पूरे दक्षिण कोरिया पर दावा किया है। इसके अलावा, कम्युनिस्ट-नियंत्रित देश का उत्तर कोरिया के साथ पेक-टू और टूमन नदी को लेकर भी विवाद जारी है। इससे पहले, खबरें आईं थी कि चीन ने नेपाल के गोरखा जिले में रुई गाँव पर कब्जा कर लिया था।
चीनी आक्रामकता को समझें
सोनम वांगचुक ने पहले ही बताया था कि चीनी निरंकुश सरकार अपने उन 140 करोड़ लोगों से डरती है, जो सरकार के लिए बंधुआ मजदूरों के रूप में बिना किसी मानवाधिकारों के काम करते हैं। उसे डर है कि लोगों में बढ़ते असंतोष से कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ विद्रोह हो सकता है।
कोरोना वायरस महामारी के बीच, चीन को अपने कारखानों को बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। बेरोजगारी की दर 20% तक बढ़ गई है। इसलिए, पड़ोसी देशों के प्रति चीन का शत्रुतापूर्ण रवैया देश को एकजुट रखने की एक चाल का हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि 1962 का भारत-चीन युद्ध भी तत्कालीन चीनी सरकार द्वारा अपनाई गई उन रणनीतियों का ही हिस्सा था, जिसका उद्देश्य 1957 से 1962 के बीच चले अकाल से निपटने में प्रशासन की विफलता से जनता का ध्यान हटाने का था। वांगचुक ने कहा कि निरंकुश सरकार यह जानती है कि यदि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि या देश की समृद्धि में कमी आती है, तो बड़े पैमाने पर विद्रोह स्वाभाविक है।
भारत-चीन गतिरोध
एक सैन्य अभ्यास की आड़ में लगभग 5000 चीनी सेना के जवानों ने भारत की ओर एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर अपना रुख कर दिया। मौजूदा गतिरोध 5-6 मई को शुरू हुआ था, जो सिक्किम तक जारी है। भारतीय सेना ने उन्हें कई क्षेत्रों में घुसपैठ करने से रोका था।
एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सेनाएं उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों से पूर्वी लद्दाख सेक्टर तक पहुँच गई थीं। 15 जून को एक कर्नल सहित लगभग 20 भारतीय सैनिक उस वक्त वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जब चीनी सैनिकों ने पत्थरों, बल्लों और कांटेदार तारों से उन पर हमला कर दिया था। माना जाता है कि चीन के 43 सैनिक हताहत हुए थे, लेकिन चीन ने अब तक हताहतों की संख्या की पुष्टि नहीं की है।
ऐसा लगता है कि ‘द वायर’ और ‘द हिंदू’ जैसी कुख्यात वामपंथी वेबसाइटों में रोजगार प्राप्त करने की एकमात्र शर्त हिंदूफोबिक विचारों को पोषित और प्रकट करना है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिंदू-विरोधी प्रवृत्ति लंबे समय से इन वेबसाइटों से जुड़े पत्रकारों और लेखकों की पहचान रही है।
हाल ही में द वायर के सुप्रकाश मजूमदार नाम के एक पत्रकार ने भगवान राम के परम भक्त भगवान हनुमान पर तीक्ष्ण हिंदूफोबिक टिप्पणी की। सुप्रकाश मजूमदार ने अपने ट्वीट में आरोप लगाया कि भगवान राम पर भगवान हनुमान का ”गे क्रश” था।
मजूमदार ने ट्विटर पर पूछा, “मुझे लगता है कि हनुमान का राम पर समलैंगिक क्रश था। आपको क्या लगता है?”
साभार: twitter
’द हिंदू’ के एक पत्रकार, सुचित्रा, ने हिंदुओं और हिंदू धर्म का मजाक उड़ाते हुए ट्वीट का जवाब देते हुए दावा किया कि हिंदू अब सबसे आधुनिक और सहिष्णु धर्म होने का दावा करेंगे। इसके साथ ही सुचित्रा ने हिंदुओं पर चुटकी लेते हुए मजूमदार को सलाह दी कि वो इस तरह के तर्क से उन्हें अस्त्र शस्त्र उपलब्ध न करवाएँ।
बता दें कि सुचित्रा इससे पहले कॉन्ग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड में काम कर चुकी है। उन्होंने मजूमदार के ट्वीट का जवाब देते हुए भगवान हनुमान का अपमान किया।
भगवान हनुमान को दो पत्रकारों द्वारा बदनाम करने और हिंदूफोबिक कमेंट करने को लेकर सोशल मीडया यूजर्स का आक्रोश बढ़ गया। उन्होंने हिंदू भावना को ठेस पहुँचाने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की। इसके बाद सुप्रकाश मजूमदार ने अपना ट्विटर अकाउंट डिएक्टिवेट कर लिया।
सुप्रकाश मजूमदार का ट्विटर अकाउंट
वहीं दूसरी तरफ ’द हिंदू’ की पत्रकार सुचित्रा ने अपने ट्विटर अकाउंट में प्रोटेक्शन लगा दिया है, जिससे कि सिर्फ उसके फॉलोवर्स ही ट्वीट देख सकते हैं। सुचित्रा ने संभवतः इस डर से ऐसा किया हो कि उनके द्वारा हिंदू धर्म और हिंदू देवताओं का अपमान वाले ट्वीट को यूजर्स सामने ला सकते हैं।
सुचित्रा का ट्विटर प्रोफाइल
सुचित्रा के ट्विटर बॉयो के अनुसार उन्होंने क्विंट, द सिटिजन, द कारवाँ, कॉन्ग्रेस के मुखपत्र-नेशनल हेराल्ड जैसे मीडिया संगठनों के साथ काम किया था, जिनमें से कई पर हिंदू-विरोधी सामग्री प्रकाशित करने का आरोप लगाया गया है।
भारत के संविधान में निहित अभिव्यक्ति के अधिकार के बहाने हिन्दूपोबिक विचारों को फैलाना द वायर जैसे वामपंथी विचारधारा वाले वेबसाइट में काम करने वाले पत्रकारों का हथकंडा रहा है। इन वेबसाइटों से जुड़े लेखकों और पत्रकारों ने हमेशा ही हिंदुओं के प्रति उपेक्षा दिखाई है।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है कि द वायर से जुड़े पत्रकारों ने हिंदूफोबिक व्यवहार किया है। द वायर ने शरजील इमाम जैसे अपराधी को अपना प्लेटफॉर्म दिया था, जिन्होंने न केवल हिंदूफोबिक उद्घोषणाओं को प्रकट किया था, बल्कि असम और भारत के शेष उत्तर पूर्व को काटने के लिए समुदाय विशेष के लोगों को ‘चिकेन नेक’ काटने के लिए उकसाने वाली देशद्रोही विचारधारा को भी प्रदर्शित किया था। इसके अलावा हिंदुओं के पर्व होली, दिवाली आदि पर भी अपनी घृणा का प्रदर्शन कर चुका है।
15 जून को पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर चीनी सेना के साथ टकराव हिंसक हो गया था। भारतीय सेना के बहादुरों ने चीनी सेना को मुँहतोड़ जवाब दिया। 16 बिहार रेजीमेंट के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए जिनमें कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) कर्नल संतोष बाबू भी शामिल थे। इन 20 बहादुरों में एक नाम 23 साल के सिपाही गुरतेज सिंह का भी है। गुरतेज सिंह ने बलिदान होने से पहले 12 चीनी सैनिकों को अपने कृपाण से ही ढेर कर दिया।
तीन भाइयों में सबसे छोटे गुरतेज सिंह करीब 2 साल पहले ही फौज में भर्ती हुए थे। फौज में ट्रेनिंग के बाद सिख रेजिमेंट में पहली बार लेह-लद्दाख में ड्यूटी लगी थी।
15 जून की हिंसक झड़प में 16 बिहार, 3 पंजाब रेजीमेंट, दो आर्टिलरी यूनिट और तीन मीडियम रेजीमेंट के अलावा 81 फील्ड रेजीमेंट चीन को जवाब देने में शामिल थी। गुरतेज 3 पंजाब घातक प्लाटून के सिपाही थे। चीनी सैनिक को मुँहतोड़ जवाब देते-देते वो बलिदान हो गए। कुछ दिनों पहले ही उनके बड़े भाई की शादी हुई थी। मगर गुरतेज बॉर्डर पर टेंशन और कोरोना वायरस महामारी के चलते शादी में शामिल नहीं हो सके थे। उन्होंने वादा किया था कि वो जल्द ही भाभी से मिलेंगे और पार्टी देंगे।
बता दें कि 3 पंजाब घातक प्लाटून को रिइनफोर्समेंट के लिए बुलाया गया था। सैनिकों के पास उनके धर्म से जुड़ी कृपाण और डंडे, छड़ें और तेज चाकू ही थी। सिपाही गुरतेज पर पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के चार सैनिकों ने हमला बोला। गुरतेज जरा भी डरे नहीं बल्कि रेजीमेंट का युद्धघोष ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल,’ चिल्लाते हुए उनकी तरफ बढ़े।
गुरतेज ने दो को वहीं ढेर कर दिया जबकि दो ने उन्हें जान से मारने की कोशिश की। गुरतेज उनको पहाड़ी पर खींच कर ले गए और यहाँ से उन्हें नीचे गिरा दिया। गुरतेज भी अपना नियंत्रण खो दिया था और फिसल गए थे। लेकिन वह एक बड़े पत्थर की वजह से अटक गए और उनकी जान बच गई।
हालाँकि, इस दौरान जवान गुरतेज की गर्दन और सिर पर गहरी चोटें आ गई थीं। उन्होंने अपनी पगड़ी को दोबारा बाँधा और फिर से लड़ाई के लिए आगे बढ़ चले। उन्होंने चीनी जवानों का मुकाबला अपनी कृपाण से किया और एक चीनी सैनिक से उसका तेज हथियार भी छीन लिया।
इसके बाद गुरतेज ने सात और चीनी जवानों को ढेर किया। अब तक गुरतेज 11 चीनी जवानों को ढेर कर चुके थे। बलिदान होने से पहले गुरतेज ने अपनी कृपाण से 12वें चीनी सैनिक को भी ढेर किया। गुरतेज अकेले लड़े लेकिन कहते हैं न कि एक-एक अकाली सिख सवा लाख के बराबर होते हैं, गुरतेज ने इसी बात को सही साबित कर दिया।
गुरतेज ने दिसंबर 2018 में आर्मी ज्वॉइन किया था। वह हमेशा से आर्मी में जाना चाहते थे और उनका वह सपना तब पूरा हुआ जब वह सिख रेजीमेंट का हिस्सा बने।
गुरतेज सिंह के पिता विरसा सिंह और माता प्रकाश कौर ने बताया कि गुरतेज फौज में बचपन से ही भर्ती होना चाहते थे। भर्ती के बाद उसने देश के लिए सेवा करने का संकल्प लिया। उनकी गुरतेज के वीरगति को प्राप्त होने के 20 दिन पहले बात हुई थी। उन्होंने बताया कि गुरतेज सिंह के बलिदान होने की खबर उन्हें बुधवार को सुबह 5 बजे फोन पर मिली। उनका कहना है कि गुरतेज उनका ही नहीं देश का बेटा था, जिस पर उन्हें हमेशा गर्व रहेगा।
जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में शनिवार को शुरू हुई सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को मार गिराया। इस दौरान सेना के दो जवान गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल दोनों सेना के जवानों को सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया है। फिलहाल भुठभेड़ चल रही है।
जानकारी के मुताबिक शनिवार (04 जुलाई, 2020) की दोपहर को सुरक्षाबलों को कुलगाम के आरा इलाके में आतंकियों की छिपे होने की सूचना मिली थी। इसके बाद सेना के जवानों ने सूचना के आधार पर इलाके की घेराबंदी करके तलाशी अभियान शुरू कर दिया। इस बीच खुद को घिरता देख आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग शुरू कर दी।
इसके बाद सेना के जवानों ने जवाबी फायरिंग करते हुए दो आतंकियों को मार गिराया। हालाँकि अभी तक मारे गए आतंकियों की पहचान नहीं हो सकी है कि ये आतंकी आखिर किस आतंकी संगठन से जुड़े हुए थे। वहीं इस दौरान घायल हुए दोनों सेना के जवानों को एयरलिफ्ट करके सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वहीं सेना का आतंकियों के खिलाफ अभी ऑपरेशन जारी है।
वहीं दूसरी ओर शनिवार को ही सुरक्षाबलों ने राजौरी जिले के थानामंडी इलाके में मौजूद आतंकी ठिकाने का भंडाफोड़ कर दिया। सुरक्षाबलों ने तलाशी अभियान के दौरान आतंकी ठिकाने से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद किए हैं।
आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के मलबाग क्षेत्र में गुरुवार (2 जुलाई, 2020) देर रात आतंकियों के साथ सुरक्षाबलों की मुठभेड़ हुई थी। इसमें सुरक्षाबलों ने एक आतंकी को ढेर कर दिया था। वहीं मुठभेड़ में घायल दो सीआरपीएफ जवानों में से एक वीरगति को प्राप्त हो गए थे। यह मुठभेड़ कश्मीर विश्वविद्यालय के पीछे के क्षेत्र में हुई थी।
पुलिस के अनुसार एनकाउंटर में मारा गया आतंकी पिछले हफ्ते जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) के एक जवान और 6 साल के बच्चे को मारने वाला जाहिद दास था, जोकि अनंतनाग में सुरक्षाबलों द्वारा घेरे जाने के बाद फरार होने में कामयाब हो गया था।
गौरतलब है कि पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर पुलिस ने डोडा जिले को आतंकियों से पूरी तरह मुक्त घोषित किया था। वहीं इस वर्ष जनवरी से जून तक 118 आतंकी मारे जा चुके हैं। इतना ही नहीं जून महीने में ही सुरक्षाबलों ने 51 आतंकियों को मौत के घाट उतारा है।
बीते कुछ समय से चीन जितनी भी गतिविधियों में शामिल होता है वह सवालों के घेरे में आ ही जाती हैं। चाहे चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस हो या चीन की सेना का भारतीय सेना से हुआ सीमा विवाद हो। हर संदर्भ में चीन की भूमिका संदिग्ध रही है, फिलहाल चीन से शुरू हुई कई तरह की परेशानियों के चलते उसे वैश्विक स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। लद्दाख में चीन और भारतीय सेना के बीच हुए टकराव के बाद भारत को वैश्विक स्तर पर समर्थन मिल रहा है। दुनिया के तमाम देशों ने भारत चीन विवाद पर खुल कर भारत का पक्ष लिया है।
शुक्रवार (जुलाई 3, 2020) के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लद्दाख का दौरा किया और घायल हुए सैनिकों से मिले। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा देश के लोगों और भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाते हुए कई अहम बातें कहीं। प्रधानमंत्री का यह दौरा चीन के लिए साफ़ संदेश था कि भारत किसी भी तरह का विवाद होने पर पीछे नहीं हटेगा। इन बातों के बावजूद यह उल्लेखनीय है कि दुनिया के किन-किन देशों ने भारत का समर्थन करते हुए क्या कुछ कहा है?
अमेरिका
अमेरिकी समाचार समूह द वाशिंगटन में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका ने साफ़ शब्दों में इसके लिए चीन के रवैये को ज़िम्मेदार ठहराया है। व्हाईट हाउस की मीडिया सचिव कायले मेक्नेनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान का ज़िक्र करते हुए कहा “भारत चीन सीमा पर चीन का घटिया रवैये और दुनिया के तमाम देशों के साथ उसका व्यवहार लगभग एक जैसा है, चीन की हरकतों से यह साफ़ हो जाता है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का असल उद्देश्य और स्वभाव क्या है।”
इसके अलावा अमेरिका के स्टेट सेक्रेटरी माइक पोमियो ने भारत के 59 चीनी एप्लीकेशन पर लगाए प्रतिबंध के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा चीन के अधिकांश एप्लीकेशन कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ख़ुफ़िया तौर पर जासूसी का काम करते हैं।
फ्रांस
फ्रांस के रक्षा मंत्री ने गलवान घाटी में वीरगति को प्राप्त हुए 20 भारतीय सैनिकों के लिए अफ़सोस जताते हुए भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा “यह हमला सैनिकों, उनके परिवार वालों और देश के हर नागरिक पर थाl। ऐसे मुश्किल समय के दौरान हम पूरी फ्रांस की सेना की तरफ से दुःख जताते हैं और हर हालातों में भारत के साथ हैं।”
साथ ही फ्रांस भारत के 36 रफायल जेट समय रहते उपलब्ध कराने के निवेदन पर भी विचार कर रहा है। कुल 4 रफायल जेट का पहला बैच जिसमें मीटीयोर एयर टू एयर मिसाइल और स्कैल्प क्रूज़ मिसाइल इस महीने अंत तक भारत आ जाएगा।
जापान
जापान ने भी इस मामले में पूरी तरह भारत का समर्थन किया है। जापान के भारत में राजदूत सतोशी सुजुकी ने बताया कि उनकी भारत के विदेश सचिव हर्ष वी श्रृंगला से इस बारे में चर्चा हुई थी। सतोशी सुजुकी ने ट्वीट कर कहा, “मेरी विदेश सचिव श्रृंगला से अच्छी बातचीत हुई है। एलएसी पर श्रृंगला की ओर से दी गई जानकारी की और भारत सरकार के शांतिपूर्व समाधान के प्रयासों की मैं प्रशंसा करता हूँ। जापान आशा करता है कि इस विवाद का शांतिपूर्वक समाधान होगा। जापान यथास्थिति को बदलने की किसी भी कार्रवाई का विरोध करता है।”
इसके अलावा जापान सरकार के विदेश मंत्रालय ने भी हाल ही में इस मामले पर अपना मत रखा था। मंत्रालय ने एक बयान में कहा था कि वह इस मामले पर शुरू से निगाह रखे हुए है, क्योंकि ऐसी घटनाओं का सीधा असर क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है।
Had a good talk with FS Shringla. Appreciated his briefing on the situation along LAC, including GOI’s policy to pursue peaceful resolution. Japan also hopes for peaceful resolution through dialogues. Japan opposes any unilateral attempts to change the status quo.
इसी कड़ी में ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन का खुल कर विरोध किया है। ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में भारत के साथ साझा सैन्य समझौते पर सहमति जताई है जिससे आने वाले समय में दोनों देशों के बीच समबन्ध और बेहतर होंगे। इस समझौते की जानकारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन के बीच हुई वर्चुअल समित के बाद साझा की गई थी।
ऑस्ट्रेलिया इंडिया म्युचुअल लोजिस्टिक्स सपोर्ट नाम के इस समझौते के बाद भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच कई चीज़ें आसान हो जाएँगी। वहीं ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच रिश्ते उस समय से ही गड़बड़ हैं जब ऑस्ट्रेलिया ने खुले तौर पर चीन के वुहान से शुरू हुए कोरोना वायरस के स्रोत की जाँच की जाए। इसके बाद चीन ने ऑस्ट्रेलिया से आने वाली जौ पर अतिरिक्त कर लगा दिया था और ऑस्ट्रेलियाई बीफ पर प्रतिबंध। ऑस्ट्रेलियाई सरकार का यह भी कहना था कि चीन दुनिया के तमाम बड़े देशों पर होने वाले साइबर अटैक के लिए भी ज़िम्मेदार है।
ब्रिटेन
ब्रिटेन ने भी भारत – चीन सीमा विवाद पर अपना मत रखते हुए कहा कि हिंसा से किसी का भला नहीं होने वाला है। ब्रिटेन और चीन के बीच पिछले काफी समय से नेशनल सेक्योरिटी एक्ट पर विवाद चल रहा है, जिसके चलते हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता खतरे में आ गई। ब्रिटेन का कहना है कि चीन ने उस कानून का साफ़ तौर पर उल्लंघन किया है जिसके आधार पर 1977 में हॉन्गकॉन्ग चीन के हवाले किया गया था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इस मामले पर कहा था, “भारत और चीन को इस मामले का हल बातचीत से निकालना चाहिए।”
आसियान
इन सारे देशों के अलावा आसियान (ASEAN) ने भी भारत चीन सीमा विवाद के बीच चीन का खुल कर विरोध किया है।साथ ही लद्दाख में भारत और चीन की सेना के बीच बने हालातों के लिए पूरी तरह चीन को ज़िम्मेदार ठहराया है। हाल ही में 10 देशों के इस समूह ने चीन द्वारा दक्षिणी चीन सागर पर किए गए दावे को भी सिरे से खारिज किया है। समूह के देशों का यह कहना है कि 1982 में हुई यूएन ओशियन ट्रीटी के आधार पर कोई देश के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता है जबकि चीन ने ऐसा कई बार किया है।
पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के पीएम मोदी को झूठा बताने की कोशिश के बाद अब कॉन्ग्रेस नेताओं ने पीएम नरेंद्र मोदी की लेह-लद्दाख यात्रा को लेकर झूठ फैलाने की कोशिश की गई है। इस झूठ का हर बार की तरह ही कुछ भाजपा विरोधी लोगों ने बड़े पैमाने पर प्रचार करना शुरू कर दिया है।
दरअसल विरोधियों द्वारा फैलाए जा रहे प्रोपेगेंडा में दावा किया गया कि लेह के सैन्य अस्पताल में घायल सैनिकों के साथ पीएम की बैठक का मंचन किया गया था।
पीएम की यात्रा के दौरान की तस्वीरों को पोस्ट करते हुए कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक दत्त ने शुक्रवार (03 जुलाई, 2020) को दावा किया कि यह एक अस्पताल की तरह नहीं दिखता है, क्योंकि अस्पताल में ना तो कोई ड्रिप है, बेड के पास कोई दवा नहीं है, और डॉक्टरों के बजाय वहाँ फोटोग्राफर हैं।
पर यह हॉस्पिटल लग कहा से रहा हैं – ना कोई ड्रिप , डॉक्टर के जगह फोटोग्राफर ,बेड के साथ कोई दवाई नहीं , पानी की बोतल नहीं ? पर भगवान का शुक्रिया की हमारे सारे वीर सैनिक एक दम स्वस्त हैं ।।।।। भारत माता की जय ।।।। pic.twitter.com/rLY7aoC4Hu
— Abhishek Dutt (अभिषेक दत्त) (@duttabhishek) July 3, 2020
इस ट्वीट के सामने आते ही सैकड़ों कॉन्ग्रेस समर्थकों और सोशल मीडिया यूजर्स ने दावा किया कि पीएम द्वारा अस्पताल का वास्तव में मंचन किया गया था, कुछ ने यह भी दावा किया कि तस्वीरों में दिखाई देने वाले मरीज सैनिक नहीं, बल्कि एक्टर हैं।
Nearly 3 weeks have passed – Look at the number of Indian soldiers are still being treated in a hospital in Leh, who were injured in the clash with Chinese troops. For Modi’s ‘photo shoot’, their number and identity get exposed! pic.twitter.com/qatQHwFNyJ
दूसरों ने दावा किया कि पीएम मोदी की तस्वीरें लेने के लिए एक कॉन्फ्रेंस हॉल को अस्पताल में तब्दील कर दिया गया था। इसमें बीजेपी विरोधी जाने माने ट्विटर हैंडल @RealHistoryPic और तथाकथित स्वास्थ्य पत्रकार विद्या कृष्णन जैसे लोग शामिल हैं, जो देश में कोरोना वायरस महामारी के दौरान फर्जी खबरें फैलाने में सबसे आगे रहे हैं।
A Good Photographer always choose a good set/studio to take photographs, here A conference room is converted into a hospital to take memorable photographs however Munnabhai forgot to arrange dustbin, Drip and oxygen stand to give a perfect look to fool his parents.(2020) pic.twitter.com/FEUHsSwonC
Did the PM’s Office ask for a hospital ward to be staged… with soldiers being made to fake injury… so our PM can get a feel good photo op? https://t.co/posz3q0Dbh
कई लोगों ने क्रिकेटर लेफ्टिनेंट कर्नल एमएस धोनी की एक पुरानी तस्वीर भी पोस्ट की, जिसमें वो एक हॉल में कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे। धोनी के कार्यक्रम का हॉल और पीएम मोदी ने जिस अस्पताल का दौरा किया था, उसका अंदरूनी हिस्सा लगभग समान है। लोगों ने इस फोटो को शेयर करते हुए दावा किया कि हॉल को फोटो-ऑप के लिए जल्दबाजी में अस्पताल में बदल दिया गया। ट्विटर यूजर ने यह भी दावा किया कि रूम में सीलिंग माउंटेड प्रोजेक्टर और व्हाइट स्क्रीन है, यानी कि यह एक कॉन्फ्रेंस रूम है, जिसे फर्जी अस्पताल बनाया गया है।
सच क्या है
कल पहला मौका नहीं था कि जब लेह मिलिट्री हॉस्पिटल में सैनिकों के ठीक होने की तस्वीरें सार्वजनिक की गई हों। 23 जून को पीएम मोदी की यात्रा से 10 दिन पहले भी सेना के प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने सैनिकों से मिलने के लिए अस्पताल का दौरा किया था। इस दौरान उनकी तस्वीरें सेना के सोशल मीडिया द्वारा शेयर की गई थीं। यात्रा की तस्वीरें और वीडियो भी मीडिया द्वारा प्रकाशित किए गए थे।
तस्वीरों में देखा जा सकता है कि यह पीएम मोदी द्वारा दौरा किया गया वही कमरा है। इसलिए इससे यह साफ होता है कि पीएम मोदी के अस्पताल दौरा का मंचन नहीं किया गया था बल्कि गलवान घाटी में हुए संघर्ष में घायल हुए सैनिकों का वास्तव में वहाँ इलाज किया जा रहा है।
सेना प्रमुख एमएम नरवणे द्वारा किया गया अस्पताल का दौरा
अब अगर इस दावे की बात करें कि पीएम मोदी ने जिस अस्पताल का दौरा किया वह अस्पताल जैसा दिखाई नहीं दे रहा है तो ऐसा इसलिए है कि यह वास्तव में एक कॉन्फ्रेंस हॉल है, जिसे अस्पताल के वार्ड में बदल दिया गया है। इस बीच हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कोरोना वायरस महामारी के बीच में पूरी दुनिया और सभी प्रकार की सार्वजनिक सुविधाओं को कोरोना मरीजों के इलाज के लिए अस्थायी अस्पतालों में बदला जा रहा है।
यहाँ तक कि बड़े-बड़े होटल, हॉस्टल, आश्रम, स्कूल और रेलवे के कोचों को भी कोरोना मरीजों के इलाज के लिए सुविधाओं में बदल दिया गया है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक कॉन्फ्रेंस हॉल का उपयोग घायल सैनिकों के इलाज के लिए किया जा रहा है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि यह कोई मंचन और फर्जी है।
इसके अलावा लेह सैन्य अस्पताल का दौरा करने वाले लोगों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि कॉन्फ्रेंस हॉल वास्तव में फिलहाल एक अस्पताल है, जिसे पिछले महीने चीनी घुसपैठियों के साथ बहादुरी से लड़ने के दौरान घायल हुए सैनिकों के इलाज के लिए एक भर्ती वार्ड में बदल दिया गया था।
Sorry to burst your bubble but I have in fact been to the Leh Hospital. This is a seminar room converted into a recuperation ward for mental well-being. And even hotel rooms are at times used for the purpose of isolation etc, would you call that fake too?https://t.co/wrQUPk1xcj
वार्ड में ड्रिप जैसे चिकित्सा उपकरणों के अभाव की बात करें तो अस्पताल में भर्ती सभी लोगों को इन सभी सुविधाओं की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा दो सप्ताह से सैनिकों का इलाज किया जा रहा है, इसलिए यह संभव है कि उनकी चोटें ज्यादातर ठीक हो गई हैं और इसीलिए उनके पास बैंडेज आदि नहीं हैं। पूर्व सैन्य आरक्षक नवदीप सिंह भी बताते हैं कि वार्ड में दिख रहा है कि चिकित्सा सुविधाओं की कमी है।
उनका कहना है कि शायद वार्ड में सैनिकों की चोटें मामूली थीं, इसलिए ऐसा है, लेकिन उन्हें उस रात के कष्टदायक अनुभव से बचने के लिए आराम और शांतिपूर्ण वातावरण में रखा गया है।
The injuries could be minor but soldiers are kept in a relaxed & congenial environment, away from fellow patients & troops, for recuperation & debriefing purposes, after every such incident, not only for physical purposes but mental well being & security.https://t.co/UhtHNm3Eez
दरअसल युद्ध के दौरान ड्यूटी पर तैनात सैनिकों के लिए शारीरिक चोट एकमात्र चिंता का विषय नहीं होता, उनका मानसिक रूप से स्वस्थ्य होना भी उतना ही जरूरी होता है, जितना कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होना। युद्ध की स्थितियों में शामिल होने के बाद सैनिक अक्सर पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से गुजरते हैं, और उन्हें उसी के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से उबरने की आवश्यकता होती है।
तस्वीरों में दिखाई दे रहे सैनिक शायद उसी दौर से गुज़र रहे होंगे, और जब वे अपने कर्तव्यों में शामिल होने से पहले वे डीब्रीफिंग प्रक्रिया से गुजरेंगे तो उन्हें थोड़ा आराम मिल सकता है।
Guys, Relax. This is the Same Hospital COAS had visited 10 Days back. Check the Bed and Curtains. So this was not staged for Modi Visit and those on the bed are real soldiers, not ANI Employees pic.twitter.com/R1j8saS53r
इन सभी के बावजूद भी कॉन्ग्रेस नेता और भाजपा विरोधी यूजर्स दावा कर रहे हैं कि यह एक फर्जी अस्पताल है। हालाँकि, काफी लोग इसका विरोध कर रहे हैं, इसमें कुछ कॉन्ग्रेसी विचारधारा के लोग भी शामिल हैं। ऐसे ही एक चर्चित भाजपा विरोधी ट्विटर यूजर के मित्र ने अपने दोस्तों से कहा कि वे इसका फर्जी दावा करना बंद कर दें, क्योंकि पीएम मोदी द्वरा इसका मंचन नहीं किया गया था, क्योंकि सीओएएस ने भी 10 दिन पहले उसी जगह का दौरा किया था।
इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पीएम मोदी के साथ फोटो-ऑप के लिए नकली सैनिकों वाला एक फर्जी अस्पताल का दावा पूरी तरह से निराधार है। वे लेह आर्मी अस्पताल के कॉन्फ्रेंस हॉल में इलाज कराने वाले असली भारतीय सेना के जवान थे, जिसका 10 दिन पहले सीओएएस ने भी दौरा किया था।
अस्पताल के कॉन्फ्रेंस हॉल को मामूली चोटों वाले सैनिकों के लिए अस्पताल में बदल दिया गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसका मंचन करने के लिए यह सब किया गया था।
दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगे हाल के दिनों में इस्लामिक मॉब द्वारा प्रदर्शित हिंसा के क्रूर और वीभत्स प्रदर्शनों में से एक रहे हैं। दंगों में दोनों समुदायों में से दंगों में 50 से अधिक लोग मारे गए।
दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों से जो सबसे भयावह मामले सामने आए, उनमें आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा और मिठाई की दुकान के कर्मचारी दिलबर नेगी की हत्याएँ थीं। दिलबर नेगी को जिंदा जलाकर मार दिया गया था, तो वहीं अंकित शर्मा को AAP नेता ताहिर हुसैन की अगुवाई में भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर चाँद बाग के नाले में फेंक दिया गया।
अंकित शर्मा की हत्या के मामले में दायर चार्जशीट में, दिल्ली क्राइम ब्रांच ने पाया कि ताहिर हुसैन ने जनवरी में शाहीन बाग में खालिद सैफी और उमर खालिद से मुलाकात की थी। यहीं पर तीनों के बीच दंगे की योजना तैयार की गई थी। चार्जशीट से यह भी पता चला है कि खालिद सैफी ने मलेशिया में इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक से दंगों के लिए फंडिंग की माँग की थी। इसके अलावा, यह बात भी सामने आई है कि ताहिर हुसैन को शेल अकाउंट में पैसा मिला था, जो हिंदू विरोधी दंगों के लिए इस्तेमाल किया गया था।
अब तक, ताहिर हुसैन की भागीदारी चाँद बाग में हिन्दू विरोधी दंगों की योजना बनाने और दंगों को फंडिग करने की बात सामने आई थी। मगर अब यह भी पाया गया कि वह ‘काफिरों’ (हिंदुओं) के ऊपर पत्थर, एसिड की बोतलों आदि को फेंकने के लिए भीड़ को उकसा रहा था।
अंकित शर्मा हत्याकांड मामले में दायर चार्जशीट में अब खुलासा हुआ है कि ताहिर हुसैन ने न केवल दंगों की योजना बनाई और भीड़ को उकसाया, बल्कि वो खुद भी चाँद बाग के हिंदुओं के ऊपर छत से पत्थर और एसिड बरसा रहा था।
ताहिर हुसैन चार्जशीट
प्रदीप कुमार वर्मा, एक हिंदू जिसके गैरेज में ताहिर हुसैन और उसके घर पर इकठ्ठा हुई भीड़ द्वारा आग लगा दी गई थी, ने पुलिस को बताया कि पहले, शाह आलम, गुलफाम, रियासत अली और अन्य ने उसकी पार्किंग का शटर तोड़ा, फिर उसे जलाया। जिसमें गैरेज में रखे सभी वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। दंगाइयों ने उनका 20-22 हजार रुपए कैश भी लूट लिए।
जब ऐसा हुआ था, तब ताहिर हुसैन और लियाकत अली जैसे अन्य पार्किंग लॉट की ओर पत्थर फेंक रहे थे और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए उकसा रहे थे। प्रदीप ने इससे पहले भी पत्रकारों से कहा था कि उन्होंने दंगाइयों की भीड़ को ये कहते हुए सुना था, “हिंदू है, मारो।”
Parking space gutted by Tahir Hussain and his mob Parking space gutted by Tahir Hussain and his mob
एक अन्य गवाह, सुरेंद्र सिंह, जो कि प्रदीप के पार्किंग लॉट पर मौजूद थे, ने भी पुलिस को दिए अपने बयान में इन घटनाओं की पुष्टि की। साथ ही उन्होंने भी ताहिर हुसैन द्वारा पार्किंग लॉट पर पथराव और पेट्रोल बम बरसाने की बात कही।
ताहिर हुसैन चार्जशीट
एक दूसरे गवाह ने भी पुलिस से यही बात कही।
ताहिर हुसैन चार्जशीट
चार्जशीट में दर्ज गवाह के बयानों ने ताहिर हुसैन के लिए कट्टरपंथी और वामपंथियों द्वारा उस रक्षा को पूरी तरह से चकनाचूर कर दिया, जब उसकी छत पर चलने के वीडियो दिल्ली दंगों के दौरान सामने आए थे।
वामपंथी प्रचार पोर्टल द वायर के साथ एक तथाकथित ’एक्सक्लूसिव’ साक्षात्कार में ताहिर हुसैन का दावा है कि वह “निर्दोष है और खुद सांप्रदायिक हिंसा का शिकार है”। उन्हें ट्विटर पर द वायर द्वारा प्रसारित की गई वीडियो क्लिप में यह कहते हुए सुना गया कि उन्हें उनके मजहब के कारण निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और उन्होंने दावा किया कि न्याय किया जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि ताहिर हुसैन ने कोर्ट में आत्मसमर्पण करने से ठीक पहले इंडिया टुडे के साथ एक अन्य ‘एक्सक्लूसिव’ इंटरव्यू में भी ऐसी ही अपील की थी।
कई इस्लामवादियों ने ताहिर हुसैन की वकालत की थी और दावा किया था कि वह निर्दोष था। असल में उसने दिल्ली दंगों के दौरान खुद के दंगाइयों से बचाने के लिए पुलिस को बुलाया था।
हालाँकि, अब चार्जशीट में जो विवरण सामने आए हैं, वे साबित करते हैं कि न केवल ताहिर हुसैन योजना बना रहे थे और चाँद बाग में हुए दंगों में शामिल थे, बल्कि हिंदुओं पर पत्थर और पेट्रोल बम भी फेंक रहे थे, जिन्हें वह ‘काफिर’ मानते हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR), भारत बायोटेक द्वारा बनाई गई देश की पहली कोरोना वायरस वैक्सीन की मानव परीक्षण करने की योजना बना रही है। इस बीच विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के वरिष्ठ नेता डॉ सुरेंद्र जैन ने कोरोना वैक्सीन के मानवीय परीक्षण के लिए खुद को प्रस्तुत करने का निवेदन किया है।
विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने इस संबंध में रोहतक स्थित पंडित भागवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति को लिखा है, जो उन अस्पतालों में से एक है, जिसके प्रमुख को आईसीएमआर के डीजी बलराम भार्गव ने कोरोना वायरस वैक्सीन का क्लीनिकल परीक्षण इंसानों पर शुरू करने के लिए पत्र लिखा है।
पत्र में सुरेंद्र जैन ने लिखा है, “कोरोना महामारी की चुनौती का सामना करने में आपके विश्वविद्यालय का बहुत योगदान रहा है। अब आपको कोरोना वैक्सीन के मानवीय परीक्षण करने का सौभाग्य मिला है। मैं, डॉ सुरेंद्र जैन, अपने आपको इस वैक्सीन के मानवीय परीक्षण के लिए प्रस्तुत करता हूँ। जब भी आप मुझे इस परीक्षण के लिए बुलाएँगे, मैं प्रस्तुत हो जाऊँगा। आशा है आप मुझे यह सौभाग्य अवश्य देंगे।”
Dr. Surendra jain @drskj01 , joint Gen Secretary VHP today offers himself for the human trial of the Corona vaccine. He wrote a letter in this regard to the VC of Pt. BDS University of health sciences Rohtak. We salute his courage to save the humanity. pic.twitter.com/40lFhrysix
— Vishva Hindu Parishad -VHP (@VHPDigital) July 4, 2020
विश्व हिंदू परिषद ने ट्विटर पर डॉ सुरेंद्र जैन का पत्र शेयर करते हुए उनके इस कदम का स्वागत किया और कहा कि वो मानवता को बचाने के उनके साहस को सलाम करते हैं।
गौरतलब है कि ICMR ने गुरुवार (जुलाई 2, 2020) को कुल 12 संस्थानों को वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल को फास्ट ट्रैक करने के लिए कहा था। बता दें कि देश का पहला कोरोना वायरस वैक्सीन – COVAXIN को हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक (BBIL) के साथ ICMR द्वारा विकसित किया गया है। संभावना जताई जा रही है कि इसे 15 अगस्त तक मानव परीक्षणों के पूरा होने के बाद सार्वजनिक उपयोग के लिए जारी किया जा सकता है।
हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने ICMR और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) के सहयोग से सफलतापूर्वक COVAXIN विकसित किया। SARS-CoV-2 स्ट्रेन, जिसके कारण COVID -19 संक्रमण होता है, को आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी), पुणे में आइसोलेट कर दिया गया था और मई में भारत बायोटेक में स्थानांतरित कर दिया गया।
भारत बायोटेक और मेडिकल कॉलेजों के प्रमुख जाँचकर्ताओं को लिखे पत्र में, ICMR के प्रमुख बलराम भार्गव ने कहा था कि BBIL लक्ष्य को पूरा करने के लिए तेजी से काम कर रहा है। हालाँकि, अंतिम परिणाम इस परियोजना में शामिल सभी क्लीनिकल ट्रायल साइटों के सहयोग पर निर्भर करेगा।
ICMR के महानिदेशक (डीजी) डॉ बलराम भार्गव ने चयनित किए गए संस्थानों को लिखा है, “यह भारत द्वारा विकसित किया जा रहा पहला स्वदेशी वैक्सीन है और सर्वोच्च प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में से एक है, जिसकी निगरानी सरकार द्वारा शीर्ष स्तर पर की जा रही है। सभी परीक्षणों (क्लिनिकल ट्रायल्स) के पूरा होने के बाद 15 अगस्त तक सार्वजनिक स्वास्थ्य उपयोग के लिए वैक्सीन लॉन्च करने की उम्मीद जताई गई है।”
आज आदिवासी समाज को विदेशी सत्ता के दमनकारी शासन के खिलाफ एकजुट करने वाले दक्षिण भारत के महान क्रांतिकारी अल्लुरी सीताराम राजू ( Alluri Sitarama Raju) की जयंती है। राजू ने 1921 के असहयोग आंदोलन के बाद ब्रिटिश विरोधी भावना पर जोर दिया और बाद में क्षेत्र में स्थित औपनिवेशिक ताकतों और उनके सहयोगियों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का आह्वान किया।
अल्लूरी को सबसे अधिक अंग्रेजों के खिलाफ रम्पा विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिशर्स के खिलाफ विद्रोह करने के लिए विशाखापट्टनम और पूर्वी गोदावरी जिलों के आदिवासी लोगों को संगठित किया था।
सशस्त्र क्रांतिकारी बनने से पहले, अल्लुरी सीताराम राजू ने असहयोग और सविनय अवज्ञा के गाँधीवादी तरीकों का प्रयोग करते हुए 1882 वन अधिनियम के निरसन का प्रयास किया था। उन्होंने आदिवासी आबादी से वन उपयोग के अधिकार को जब्त करने के विरोध में 1922 में रम्पा विद्रोह (Rampa Rebellion) की शुरुआत की।
रम्पा विद्रोह 1922 और 1924 के बीच लड़ा गया था। अल्लुरी और उनके लोगों ने कई पुलिस स्टेशनों पर हमला किया और कई ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला और उनकी लड़ाई के लिए हथियार और गोला-बारूद चुरा लिया। लोगों ने उन्हें ‘मान्यम वीरुडू’ नाम से सम्मानित किया, जिसका अर्थ है- ‘जंगलों का नायक’।
1986 में, इंडिया पोस्ट ने अल्लूरी सीताराम राजू के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया
अल्लूरी सीताराम राजू भारत के आदिवासी क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ हथियार उठा लिए थे। राजू के विद्रोह का मुख्य कारण 1882 का मद्रास वन अधिनियम था, जिसने संसाधनों के इस्तेमाल करने से वनवासियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। विद्रोह बाद में क्षेत्र में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ पूर्ण सशस्त्र संघर्ष में बदल गया।
आज सबसे महान भारतीय क्रांतिकारियों में से एक, अल्लूरी सीता राम राजू की जयंती है, जिन्होंने महज 27 की उम्र में सीमित संसाधनों के साथ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया और गरीब, अनपढ़ आदिवासियों को शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रेरित किया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कुछ ऐसे महान किन्तु उपेक्षित आंदोलनों में से एक ब्रिटिश शासन के खिलाफ विभिन्न आदिवासी विद्रोह थे। दरअसल, इस कानून के जरिए आदिवासियों को जलावन लकड़ी के लिए पेड़ काटने से मना कर दिया गया था, उनकी पारंपरिक पोडू की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
आदिवासियों का अक्सर उन ठेकेदारों द्वारा शोषण किया जाता था, जो उन क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण के लिए श्रम के रूप में उनका इस्तेमाल करते थे। पूर्वी भारत के आदिवासी इलाकों में कई विरोध प्रदर्शन हुए, विशेष रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिमी ओडिशा, बंगाल में। इनमें से जो सबसे प्रसिद्ध थे वह थे बिरसा मुंडा!
अल्लूरी सीताराम राजू के बारे में ट्विटर पर ‘हिस्ट्री अंडर युअर फ़ीट’ एकाउंट ने विस्तार से लिखा है –
Today is the Jayanti of #AlluriSitaRamaRaju one of the greatest Indian revolutionaries, who at 27 led an armed uprising with limited resources and motivating the poor, illiterate tribals against the mighty British empire.#AlluriSeetharamarajupic.twitter.com/jj6X1TLj1Q
— History Under Your Feet (@HUFToday) July 4, 2020
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को कवर करने वाला एजेंसी क्षेत्र, पूर्वी घाट के साथ ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र की सीमा से लगे दोनों राज्यों के उत्तरी भागों के आदिवासी इलाकों को दिया गया नाम है।
आंध्र प्रदेश में विजाग, विजयनगरम, श्रीकाकुलम, पूर्व और पश्चिम गोदावरी, और तेलंगाना के खम्मम, वारंगल, आदिलाबाद, करीमनगर के जिलों को कवर करने वाला एक विशाल क्षेत्र है, जहाँ पहाड़ियों, घाटियों, घने जंगलों के बीच आदिवासी रहते हैं।
1882 का दमनकारी मद्रास वन अधिनियम, इस एजेंसी क्षेत्र के आदिवासियों के लिए एक अभिशाप था, जिन्हें जलाऊ लकड़ी के लिए पेड़ों को काटने और उनके पारंपरिक व्यवसायों को करने से रोक दिया गया था।
ऐसे समय में, अल्लूरी सीताराम राजू एजेंसी क्षेत्र में आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने के लिए सामने आए, और उन्हें सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया। मात्र 27 वर्ष की अल्पायु में, वह सीमित संसाधनों के साथ सशस्त्र विद्रोह को बढ़ावा देने और गरीबों, अंग्रेजों के खिलाफ अनपढ़ आदिवासी को प्रेरित करने में कामयाब रहे।
4 जुलाई का दिन था, जब अमेरिका ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हो गया। उसी वर्ष रामाराजू का जन्म 1897 में विशाखापत्तनम जिले के पांडरंगी में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज मूल रूप से पूर्वी गोदावरी जिले के राजोलु से थे।
उनके माता-पिता वेंकटरामा राजू और सूर्यनारायणम्मा, मूल रूप से पश्चिम गोदावरी जिले के मोगल्लू के रहने वाले थे। उनकी एक बहन सीताम्मा और एक भाई सत्यनारायण राजू थे। उनका असली नाम श्रीरामराजू था, जो कि उनके नाना के नाम पर था।
जब राजू सिर्फ 6 साल के थे, तभी उन्होंने अपने पिता को खो दिया और आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसके परिवार को बहुत नुकसान उठाना पड़ा था। उनके चाचा रामकृष्ण राजू ने परिवार की आर्थिक मदद करने के साथ-साथ राजू की शिक्षा में भी मदद की।
1909 में वे भीमावरम में मिशन हाई स्कूल में शामिल हो गए जहाँ वो कोवाड़ा से रोजाना पैदल ही जाते। उन्होंने अपने दोस्त से चिनचिनदा से नरसापुर के पास एक छोटे से गाँव में घुड़सवारी सीखी। उन्होंने बाद में राजमुंदरी, रामपचोदावरम, काकीनाडा के विभिन्न स्कूलों में अध्ययन किया।
वर्ष 1918 में, जब उनका परिवार तुनी में रहता था, राजू पास की पहाड़ियों, घाटियों का दौरा करते थे, जहाँ वह वहाँ रहने वाले आदिवासियों के संपर्क में आते थे, और उनकी स्थिति देखते थे।
कम उम्र से ही उनके मन में राष्ट्रवादी भावनाएँ थीं, और वे ईश्वर पर गहरा विश्वास करते थे। वह नियमित रूप से देवी पूजा करते, साथ ही लंबे समय तक ध्यान में बिताते थे।
विशाखापत्तनम जिले में अल्लूरी सीताराम राजू की मूर्ति
उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब वे 1916 में उत्तर के दौरे पर गए। वह कुछ समय के लिए सुरेंद्रनाथ बनर्जी के साथ रहे, और लखनऊ में कॉन्ग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। उन्होंने वाराणसी प्रवास के दौरान संस्कृत सीखी, उज्जैन, हरिद्वार, इंदौर, बड़ौदा, अमृतसर भी गए।
यह उनके लिए सीखने का दौर था, जब उन्होंने दवा, पशु प्रजनन पर किताबें पढ़ीं, और इन विषयों पर खुद भी लिखने लगे। 1918 में वह फिर एक बार उत्तर भारत के दौरे पर गए। इस बार कृष्णादेवी पेटा लौटने से पहलेउन्होंने नासिक, पुणे, मुंबई, बस्तर, मैसूर का दौरा किया।
विभिन्न मार्शल आर्ट, आयुर्वेद में अपने कौशल के साथ, राजू तुनी, नरसीपट्टनम के आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक नेता और प्रेरणास्रोत बन गया। उन्होंने मान्याम क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की, और शराबबंदी, जातिवाद के खिलाफ भी अभियान चलाया।
बहुत से आदिम क्षेत्र में आदिवासियों की दयनीय दशा थी। इन सभी जगहों पर अंग्रेज हर प्रकार का शोषण क्र रहे थे। आदिवासियों का प्रयोग मजदूरों के रूप में किया जाता था, उनकी भूमि पर कब्जा कर लिया जाता था और उनकी महिलाओं का भी यौन शोषण किया जाता था।
उन्होंने पोडू (खेती को स्थानांतरित करने) और वन उपज बेचने के लिए लोगों का जीवन नारकीय बना दिया था और औपनिवेशिक शोषण ने आदिवासियों की हालत और भी बदतर बना दी। ठेकेदारों के सहयोग से, आदिवासियों को सड़कों के निर्माण के लिए कुली के रूप में काम करवाया जाता, और बदले में उनकी सेवाओं के लिए भुगतान भी नहीं किया जाता था।
ठेकेदार आदिवासियों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार करते, उन्हें कड़ी मेहनत करने पर विवश करते, उन्हें भुगतान नहीं करते, और निर्दयता से मारते थे। आदिवासियों को ठेकेदारों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए इस्तेमाल किया गया, उनकी महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता रहा। यह सब देखना राजू के लिए वास्तव में दयनीय और कष्टदायक था।
आदिवासियों के दुख और शोषण को देखते हुए, उन्होंने आदिवासियों के साथ खड़े होने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला किया। उन्होंने उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना शुरू किया। उनके साहस और दृढ़ संकल्प को प्रभावित किया और उन्हें उनके साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया।
बदले में आदिवासियों ने मार्गदर्शन और सलाह के लिए उसकी ओर रुख किया और वह जल्द ही वहाँ के 30-40 आदिवासी गाँवों के लिए एक नेता बन गया। उसने उन्हें ताड़ी (स्थानीय शराब) पीने की आदत छोड़ने की राय दी, उन्हें गुरिल्ला युद्ध और युद्ध अभ्यास सिखाए।
गामा बंधु गैंटम डोरा और मल्लू डोरा, कांकिपति पडालु, अगीराजू उनके कुछ भरोसेमंद ‘लेफ्टिनेंट’ बन गए। यह सब देख बस्तियन, चिंतपूर्णी डिवीजन के तहसीलदार (अब विजाग जिले में) सभी ब्रिटिश अधिकारियों में से सबसे ज्यादा नाराज थे।
वह नरसीपट्टनम से लाम्बासिंगी तक सड़क के निर्माण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आदिवासी कूलियों के शोषण के लिए कुख्यात था। अधिक वेतन की माँग करने वाले आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया जाता था। उच्च अधिकारियों से इस बारे में राजू ने शिकायतें की लेकिन उनकी एक भी नहीं सुनी गई।
बदले में अधिकारियों ने बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों की भनक लगी। जिस कारण नरसीपट्टनम, अडेटेगैला में राजू की जासूसी शुरू कर दी गईं और कुछ समय तक राजू को पकड़े जाने के भय से निर्वासन में रहना पड़ा।
राजू ने एक बार फिर 1922 में फाजुल्ला खान की मदद से मानतम क्षेत्र में प्रवेश किया। फजुल्ला खान पोलावरम के उप-शासक थे जो कि आदिवासियों से सहानुभूति रखते थे। 2 साल के करीब, राजू अंग्रेजों के खिलाफ सबसे भयानक विद्रोह का नेतृत्व करते रहे और उन्होंने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी।
मल्लू डोरा, गैंटम डोरा, पडालु, अगीराजू के साथ, वह अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में वे लगभग 150 सेनानियों की एक टीम का नेतृत्व कर रहे थे। अगस्त 22, 1922- मान्यम विद्रोह (Manyam rebellion) अल्लूरी सीताराम राजू ने शुरू किया था, जिसमें रामपछोड़ावरम एजेंसी में चिंतपल्ली पुलिस स्टेशन पर पहला हमला किया गया।
300 विद्रोहियों के साथ, राजू ने स्टेशन पर हमला किया। वहाँ मौजूद अभिलेखों को फाड़ दिया, और हथियारों और गोला-बारूद को वहाँ से हटा दिया। 11 बंदूकें, 5 तलवारें, 1390 कारतूस वहाँ से निकाल लिए गए थे। यह जानकारी खुद अल्लूरी सीताराम राजू ने व्यक्तिगत रूप से रजिस्टर में दर्ज की थी।
यह गुरिल्ला हमले बढ़ते गए। इसके बाद कृष्णदेवपेट्टा पर अगला हमला हुआ और वहाँ से हथियार ले लिए गए। 24 अगस्त को, राजवोमाँझी पर हमला किया गया था, और वहाँ की पुलिस के कुछ प्रतिरोध के बाद उसे काबू कर लिया गया था। वेरय्या डोरा, जो कि वहाँ एक कैदी था, उसे मुक्त कर दिया गया और वह भी राजू के साथ विद्रोह में जुड़ गया।
अंग्रेजों ने कैबार्ड और हैटर (Cabard and Haiter) को वापस भेज दिया, जिन्होंने राजू और उसके सहयोगियों के साथ चिंतपल्ली क्षेत्र में हमले करने शुरू कर दिए थे। इसका नतीजा यह हुआ कि राजू द्वारा किए गए छापामार हमले में वे दोनों मारे गए, और पार्टी के बाकी सदस्यों को पीछे हटना पड़ा।
जनता अब इस जीत के साथ पूरी तरह से राजू और उनकी क्रांतिकारियों की टीम के समर्थन में आ गई थी। राजू द्वारा किए गए कुछ सबसे साहसिक हमले में से एक अट्टेतेगला पुलिस स्टेशन (Addateegala police station) पर किया गया हमला था, जिस पर अंग्रेजों द्वारा कड़ी सुरक्षा का बन्दोबस्त किया गया था।
राजू ने अपने साथियों के साथ इस स्टेशन पर हमला किया और वहाँ की पुलिस पर हावी हो गए। उन्होंने सभी हथियार छीन लिए। यह मनम क्षेत्र में ब्रिटिश आधिपत्य के लिए बहुत बड़ा आघात था।
रामपचोड़वरम पुलिस स्टेशन पर 19 अक्टूबर को हमला किया गया था, और इसे खत्म करने के बाद, वहाँ के लोग राजू को बधाई देने के लिए भारी संख्या में बाहर निकले। अल्लूरी सीताराम राजू अब तक मनम में एक लोक नायक बन गए थे।
वह अब अंग्रेजों के लिए टेढ़ी खीर बन गए थे। यही वजह थी कि उन्हें पकड़ने के लिए सांडर्स को कमान सौंपी गई और बड़े सैन्य बल के साथ सांडर्स के नेतृत्व में भेजा गया। इस लड़ाई में राजू ने इन सेनाओं को हराया और सांडर्स को मुँह की खानी पड़ी।
जब भी राजू और उनके साथ किसी भारतीय पुलिसकर्मियों को पकड़ते तो वे उन्हें मारते नहीं बल्कि उन्हें जाने के लिए कहते। हालाँकि, अंग्रेजों ने इसके बाद जासूसों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और साथ ही राजू के कुछ साथियों को भी लालच दिया, जिन्हें राजू को पकड़ने का प्रलोभन दिया जाता था।
राजू को पहला झटका दिसंबर 06, 1922 को लगा, जब पेद्दागडेपलेम में एक लड़ाई में अंग्रेजों ने अपनी सेना के साथ तोपों का इस्तेमाल किया। उस लड़ाई में राजू के करीबियों में से 4 की मौत हो गई, और अंग्रेजों के सेना ने कुछ हथियारों पर कब्जा कर लिया।
एक और छापे में ब्रिटिश सेना के द्वारा राजू के 8 और लोग भी मारे गए। कुछ समय के लिए यह अफवाह भी फैली थी कि राजू की भी मृत्यु हो गई है, लेकिन अफवाहों के बावजूद भी अंग्रेज उन पर नज़र रखते थे।
आख़िरकार अप्रैल 17, 1923 को राजू को फिर से अन्नवरम में देखा गया, जहाँ लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया। राजू को पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार पहले से कहीं अधिक दृढ़ थी। उन्हें पकड़ने के लिए जासूसों का इस्तेमाल किया गया। राजू और उनके समर्थकों पर नज़र रखने वाले लोगों के बीच नियमित झड़पें होने लगीं।
इसी क्रम में राजू के भरोसेमंद लेफ्टिनेंट मल्लू डोरा को पकड़ लिया गया। हालाँकि, अंग्रेज राजू के ठिकाने का पता नहीं लगा सके। उन्हें पकड़ने के लिए अब ब्रिटिश सैनिक आदिवासियों पर अत्याचार करने लगे और कहीं अधिक हिंसक हो गए थे।
मान्यम क्षेत्र में स्पेशल कमिश्नर रदरफोर्ड को राजू को पकड़ने के लिए नियुक्त किया गया। सशर्त विद्रोह के दमन के लिए रदरफोर्ड का खूब नाम था। राजू के सबसे बहादुर लेफ्टिनेंट में से एक अगीराजू को भीषण मुठभेड़ के बाद पकड़ लिया गया और अंडमान में भेज दिया गया।
रदरफोर्ड ने एक आदेश भेजा, कि यदि राजू ने एक हफ्ते में आत्मसमर्पण नहीं किया, तो मान्यम क्षेत्र के लोगों को सामूहिक रूप से मार दिया जाएगा। राजू उस समय मम्पा मुंसब के घर में रह रहे थे, और जब उन्हें पता चला कि आदिवासियों को उनके ठिकाने का पता लगाने के लिए परेशान किया जा रहा है, तो उनका दिल पिघल गया। वह नहीं चाहते थे कि आदिवासी उसकी खातिर पीड़ित हों और उन्होंने सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया।
लेकिन सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाए मई 07, 1924 को उन्होंने सरकार को एक सूचना भेजी, कि वह कोइयूर में हैं, और उन्हें वहाँ से गिरफ्तार करने के लिए कहा। मई 07, 1924 को राजू को पुलिस ने पकड़ लिया, और एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी गुडाल ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। यह आत्मसमर्पण के बदले अंग्रेजों द्वारा किया गया स्पष्ट विश्वासघात था।
सशस्त्र संघर्ष के बाद चिंतपल्ली के जंगलों में ब्रिटिश सेना द्वारा राजू को पकड़ लिया गया। वह क्रूर तरीके से मारे गए, उनके शरीर को कोयुरी गाँव में एक पेड़ से बाँध दिया गया और उनपर गोलियाँ चलाकर उन्हें मारा गया। राजू का दुर्ग कृष्णा देवी पेटा गाँव में स्थित है।
चित्र साभार- सोशल मीडिया
मात्र 27 साल की उम्र में ही अल्लूरी सीताराम राजू वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन इससे पहले उन्होंने मान्यम क्षेत्र में ब्रिटिश साम्राज्य को बड़ी चुनौती दी। अफसोस की बात है कि सीताराम राजू को राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस से कभी भी कोई समर्थन नहीं मिला। बजाए समर्थन के, उन्होंने ब्रिटिशर्स द्वारा रामपा विद्रोह का दमन और राजू की हत्या का स्वागत किया।
स्वातंत्र्य साप्ताहिक पत्रिका ने यहाँ तक दावा किया कि अल्लूरी सीताराम राजू जैसे लोगों को मार दिया जाना चाहिए, और कृष्ण पत्रिका ने यहाँ तक कहा कि पुलिस को लोगों को क्रांतिकारियों से खुद को बचाने के लिए अधिक हथियार दिए जाने चाहिए।
यह अलग बात है कि उनकी मृत्यु के बाद उन्हीं पत्रिकाओं ने राजू की प्रशंसा ‘एक और शिवाजी’ और राणा प्रताप के रूप में की, जबकि सत्याग्रही ने उन्हें ‘एक और जॉर्ज वाशिंगटन’ कहा था।
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने राजू को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था – “मैं राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अल्लूरी सीताराम राजू की सेवाओं की प्रशंसा करना अपना सौभाग्य मानता हूँ। भारत के युवाओं को उन्हें एक प्रेरणा के रूप में देखना चाहिए।”