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जातिवाद के लिए मनुस्मृति को दोष देना, हिरोशिमा बमबारी के लिए आइंस्टाइन को जिम्मेदार बताने जैसा

अमेरिका के एक गोरे पुलिस ऑफिसर डेरेक शाविन ने 46 वर्षीय अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की निर्मम हत्या कर दी और अमेरिका #BlackLivesMatter की माँग के साथ भड़क उठा। विरोध की आग इतनी भड़की कि कोलंबस और वास्कोडिगामा की मूर्तियों को भी इस आधार पर ध्वस्त किया गया कि इनकी खोजों की वजह से ही दास व्यापार का रास्ता खुला। 

इसी की तर्ज पर भारत की जाति व्यवस्था के लिए महर्षि मनु को दोषी ठहराकर उनका बहिष्कार करने और उनकी मूर्तियों को भंग करने की अपील की जाने लगी। 

कोलंबस और वास्कोडिगामा को दास व्यापार के लिए और मनु को जाति व्यवस्था के लिए दोषी ठहराना ऐसा ही है, जैसे आइंस्टाइन को हिरोशिमा-नागासाकी पर बम बरसाने के लिए उत्तरदायी ठहराना। सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके खोजे फॉर्मूला का इस्तेमाल करके इसे बनाया गया। 

हम सब जानते हैं कि आइंस्टाइन परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के सख्त विरोधी थे। इसलिए परमाणु हमलों की तोहमत उनके सर नहीं मढ़ी जाती और इसलिए भी कि वो अपना दृष्टिकोण रखने के लिए उस समय जीवित थे। काश महर्षि मनु के साथ भी ऐसा ही होता। 

यद्यपि महर्षि मनु हर रचनाकार की तरह अपनी मनुस्मृति के माध्यम से जीवित हैं, किंतु दुर्भाग्य से रामायण-महाभारत-पुराण आदि की तरह मनुस्मृति भी बेशुमार प्रक्षेपों का शिकार हुई है। इन प्रक्षेपों की पहचान होती है इन्हीं ग्रंथों के अंत:साक्ष्यों से। जैसे भारत के संविधान में कोई भी संशोधन संविधान की मूल भावना को दरकिनार करके नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा होता है तो उसकी न्यायिक पुनरीक्षा होगी। वैसे ही किसी भी ग्रंथ में यदि ऐसा परिवर्तन होता है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए। ये समीक्षा दुराग्रह रहित विषय विशेषज्ञों की अदालत ही कर सकती है। 

मनुस्मृति पर इस तरह का काम हुआ भी है। गुरुकल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सुरेन्द्र कुमार एवं संस्कृत शास्त्रों के उद्भट विद्वान आचार्य राजवीर शास्त्री के गहन शोध से विशुद्ध मनुस्मृति का प्रकाशन हुआ। इस लेख में सभी उद्धरण मनुस्मृति के इसी संस्करण से लिए गए हैं। 

इन प्रक्षेपों के लिए कौन उत्तरदायी है? निश्चित रूप से वही जिसको इससे लाभ हो। भ्रष्ट आचरण बड़ी सहजता से हर जगह अपनी पैठ बना लेते हैं। मनुस्मृति जब दंड व्यवस्था का आधार बनने लगी तो प्रभावशाली लोगों ने उसके पर कतरने शुरू कर दिए और इच्छानुरूप मिलावटें शुरू हो गईं। कानून का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों संभव हैं। 

क्या वह मनु ब्राह्मण के लिए आडंबरयुक्त जीवन शैली का उपदेश कर सकता है जिस मनु ने ब्राह्मण के लिए यह नीति वचन लिखा-

सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा।। (मनु.-२.१६२)

अर्थात् ब्राह्मण को सम्मान से वैसे ही परहेज करना चाहिए जैसे कोई विष से परहेज करता है। इसके विपरीत अपनी अवमानना की कामना इतनी उत्सुकता से करनी चाहिए मानो कोई अमृत मिलने वाला हो। ये उसकी मन:साधना के उपाय के रूप में निर्देशित किया गया है। इसे इससे अधिक सख्त तरीके से नहीं कहा जा सकता था। अब आप इस निर्देश को कालांतर में हुए दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तनों से तोल कर देखें और सोचें कि क्या मनु ब्राह्मण समाज के उस आडंबरपूर्ण आचरण के प्रवर्तक हो सकते हैं? 

जहाँ तक वर्णों के बीच भेदभाव पूर्ण आचरण की बात है, मनुस्मृति के इस विधान को देखें-

अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च।। (मनु.-८.३३७)

ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स: ।। (मनु.-८.३३८)

इसका अर्थ है कि चोरी करने पर शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठ गुणा, सौ गुणा या एक सौ अट्ठाईस गुणा दंड हो। यानी जिसका जितना ज्ञान और जितनी अधिक प्रतिष्ठा हो, उसको उतना ही अधिक दंड होना चाहिए। क्या यह विशेषाधिकार की कोटि में आएगा?  

इसके बावजूद वर्तमान जाति व्यवस्था के लिए मनु को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जाति नहीं वर्ण का जिक्र है और उनका मूल वेद हैं, मनुस्मृति मूल नहीं है।

मनु स्वयं कहते हैं- ‘स महाद्युति: पृथक्कर्माण्यकल्पयत्’ अर्थात् उस महातेजस्वी परमात्मा ने वर्णों के पृथक्-पृथक् कर्म बनाए। इसलिए मनु वर्ण व्यवस्था के प्रवर्तक नहीं हैं। उन्होंने तो बस वेद की बात को आगे बढ़ाया। अपने मन से कुछ नहीं कहा।

ऐसे में जातिप्रथा का आरोप मनु पर लगाना उतना ही हास्यास्पद है, जितना साइबर अपराधों के लिए चार्ल्स बैबेज को जिम्मेदार ठहराना (बशर्ते कोई इतनी बेवकूफी करे)। 

मनु ने शूद्रों से पढ़ने का हक़ छीन लिया, यह एक व्यापक आरोप है। मनु ने उनका हक़ नहीं छीना बल्कि जो अवसर मिलने पर भी पढ़ नहीं पाए वो शूद्र कहलाए। मनु के कहने से नहीं, परंपरा से या वेद आधारित समाज व्यवस्था से। तैत्तिरीय ब्राह्मण का वचन है- ‘असतो वा एष संभूतो यत् शूद्र:’ अर्थात् (अनिच्छा या असामर्थ्य किसी भी वजह से) असत: यानी अज्ञान के कारण शूद्र इस स्थिति में है।

स्पष्ट है कि उसे इस दशा में रहने के लिए किसी ने मजबूर नहीं किया है। वो जब चाहे इससे बाहर आ सकता है, योग्यता अर्जित कर सकता है, अन्यों की सेवा करके आजीविका चलाना उसकी जन्मजात मजबूरी नहीं है। ये तो ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब…’ की लोकोक्ति से अलग कुछ है ही नहीं। रही बात शूद्रों के साथ भेदभाव भरे व्यवहार की तो वेद या मनुस्मृति में शूद्र का शोषण करने या उसे अस्पृश्य मानने का कोई आधार नहीं है। वेदों में शूद्र को यज्ञ करने का विधान है- 

पञ्चजना: मम होत्रं जुषध्वम्। (ऋग्वेद-१०.५३.४-५)

निरुक्तकार के अनुसार- ‘पञ्चजना: – चत्वारो वर्णा:, निषाद: पंचम इति औपमन्यव:। (निरुक्त-३.२.७)’। इस प्रमाण से यहाँ ‘पञ्चजना:’ का अर्थ है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निरामिषभोजी निषाद। यज्ञ करने का निर्देश इन सबको है। इसलिए वैदिकी व्यवस्था में भेदभाव या छुआछूत का कोई स्थान नहीं।

एक आरोप है कि मनु ने शूद्र और स्त्रियों को बोलने का अधिकार नहीं दिया। यदि किसी श्लोक में ऐसा वर्णित है तो वो उसके प्रक्षिप्त होने, यानी बाद में जोड़े जाने का स्पष्ट प्रमाण है, क्योंकि एक तो मनु जिन वेदों को प्रमाण मान कर प्रवृत्त हो रहे हैं वो स्वयं शूद्रों और अतिशूद्रों को भी वेद पढ़ने का अधिकार देते हैं। यानी वेद की दृष्टि में वेदाध्यन के लिए सिर्फ मनुष्य होना योग्यता है- 

‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:। 
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय..।। (यजु.-२६.२)  

दूसरा स्वयं मनुस्मृति में भी शूद्र के लिए कहा गया है-

‘उत्कृष्टां जातिमश्नुते।‘ (मनु.-९.३३५) 

वह उत्कृष्ट जन्म या द्विजत्व को पा लेता है। इस तरह शूद्र को उत्कृष्ट वर्ण की प्राप्ति का अधिकारी मानना ही यह दर्शाता है कि उसे वेदादि शास्त्र पढ़ने का अधिकार है, क्योंकि न पढ़ने के कारण ही वह शूद्रत्व को प्राप्त हुआ था।

एक आरोप है कि मनु ने स्त्रियों से बोलने और पढ़ने का अधिकार छीन लिया। चलिए देखते हैं मनुस्मृति क्या कहती है- 

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्म: शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वत: ।। (मनु.-२.२४०)

स्त्रियाँ नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ भाषण और विविध शिल्पविद्या सब देश तथा सब मनुष्यों से ग्रहण करें। बोलने के अधिकार के बिना विद्या की प्राप्ति और सुभाषित जिसका अर्थ ही है बोलना, क्या संभव हैं?

इसके अतिरिक्त ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ जैसे कितने ही अन्य श्लोक हैं, जो स्त्रियों का महिमा मंडन करते हैं। जहाँ तक स्त्रियों को पुरुषों के संरक्षण में रखने की बात है, वो उनकी सुरक्षा के लिए बहुत आवश्यक है। यद्यपि बहुत सी नारियाँ बहुत वीरांगनाएँ हुई हैं और अभी भी हैं किंतु यह सामान्य बात नहीं है। महिलाओं में शारीरिक बल आमतौर पर पुरुषों से कम होता है, इसलिए अधिकाँश महिलाएँ अपनी सुरक्षा पूरी तरह से नहीं कर पाती। हम देखते हैं कि ये बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इसलिए इस विषय में मनुस्मृति की दृष्टि व्यावहारिक ही है। किंतु किसी भी प्रसंग में प्रक्षिप्त खंडों का कोई समर्थन नहीं है।

मनु ने शूद्र के अतिरिक्त तीनों वर्णों को द्विज कहा है और शूद्र को एकजाति। द्विज यानी जिसका दोबारा जन्म होता है, एक बार माता की कोख से और दूसरा विद्याध्ययन से परिष्कृत व्यक्तित्व का जन्म। इस दूसरे जन्म के लिए विद्यार्थी विद्याध्यन के लिए गुरुकुल में जाता था, जहाँ उसका उपनयन और वेदारम्भ संस्कार होता था और इसके साथ ही विद्याध्यन का शुभारम्भ हो जाता था।

मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय में उपनयन के समय का उल्लेख करते हुए मनु कहते हैं कि जो ब्रह्मवर्चसकाम हैं, यानी जिनको ईश्वर और विद्या की शीघ्र प्राप्ति की इच्छा है, ऐसे माता-पिता अपने बच्चे का उपनयन संस्कार पाँचवें वर्ष में करा लें। जो बलार्थी यानी बल की कामना वाले हैं, अपने बालक को क्षत्रिय बनाना चाहते हैं, वे छठे वर्ष में तथा जो अर्थी यानी धन की कामना वाले हैं, उन्हें आठवें वर्ष में बालक का उपनयन कराना चाहिए। 

इस निर्धारित समय में जिनका उपनयन नहीं हो पाता उन्हें पढ़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया गया है, बल्कि उपनयन की समय सीमा को पर्याप्त रूप से बढ़ाया गया है और सभी को जब जागे तभी सवेरा का बहुमूल्य अवसर प्रदान किया गया है। इस अंतिम समय सीमा के अनुसार ब्राह्मण वर्ण के इच्छुक अभ्यर्थी को सोलह वर्ष तक, क्षत्रियत्व की कामना वाले को बाइस वर्ष तथा वैश्यवर्ण के इच्छुक को चौबीस वर्ष की आयु तक भी उपनयन कराकर अध्ययन का अवसर प्रदान किया गया है।

इस तरह विद्या रुपी माता जब उन्हें दूसरा जन्म देती है तो वे द्विज बन जाते हैं। जिन्हें इनमें से किसी भी वर्ण की कामना नहीं है, उनका उपनयन संस्कार ही नहीं होता और इस तरह वो द्विज की बजाय एकजाति यानी एक बार जन्म वाले शूद्र कहलाते हैं। फिर चाहे वो ब्राह्मण के घर पैदा हुआ हो, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र किसी के भी।

एक बार द्विज बनने के बाद भी किसी का स्थान स्थायी रूप से पक्का नहीं है। जो अपने वर्ण के निर्धारित कर्मों को नहीं करते उनका वर्ण परिवर्तित भी हो जाता है और वो निचले वर्णों को प्राप्त हो जाते हैं। बस इतनी राहत की बात है कि साँप-सीढ़ी के इस खेल में पासे आपकी मर्जी से डलेंगे-

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वय: ।। (मनु.-२.१६८)

अर्थ यह कि जो द्विज वेदाध्ययन न करके अन्यत्र श्रम करते हैं, वे जीते-जागते अपने परिवार सहित शूद्रपन को प्राप्त हो जाते हैं। जब परिवार का मुखिया ही वेद विमुख है तो संतति से और क्या अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें अध्ययन का अवसर मिलना भी मुश्किल है, क्योंकि अध्ययन के लिए उपनयन तो माता-पिता को ही कराना है। ऐसा ही एक दूसरा प्रसंग है, जहाँ कर्मानुसार वर्ण परिवर्तन की बात कही गई है-

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।। (मनु.-१०.६५)

शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। गुण-कर्मानुसार ब्राह्मण या तो ब्राह्मण ही रह सकता है या फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के गुणों वाला हो तो वो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाता है। वैसे ही शूद्र भी यदि उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। ऐसा ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में है। 

इसके उलट यदि मनु के नाम पर कुछ भी प्रचलित है तो वो झूठ है, क्योकि मनु ने स्वयं वेदों को प्रमाण माना है और इस विषय में वेद का मत हम पहले ही देख चुके हैं, जहाँ उन्हें यज्ञ अनुष्ठान करने और वेदों को पढ़ने का अधिकार दिया गया है। इसलिए शूद्रों और स्त्रियों को बोलने के अधिकार से वंचित रखने का आरोप बिल्कुल गलत है।

मनुस्मृति में शूद्र के कर्तव्य वर्णित हैं-

एकमेव तु शूद्राय प्रभु: कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।। (मनु.-१.९१)

प्रभु ने शूद्र यानी जो अधिक पढ़ा-लिखा नहीं है या जिसमें अध्ययन जन्य अन्य कुशलताओं का अभाव है, उसके लिए बाकी वर्णों की सेवा का कार्य निर्धारित किया है। अब इस बात में आपको याद रखना पड़ेगा कि इसमें कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य का बेटा भी हो सकता है, जो पढ़ नहीं पाया।

किंतु हमारे पूर्वाग्रहों का आलम यह है कि इस बात पर उन लोगों को भी आपत्ति होती है, जिनके कार्यालय में एक व्यक्ति अधिक पढ़ा-लिखा न होने की वजह से चपरासी या सफाई कर्मचारी का कार्य करता है। या कहीं वो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी कहाता है और हम सवाल उस मनु पर उठाते हैं, जिसने शूद्र को शुचि: अर्थात् पवित्र कहा, अछूत नहीं।

इसके अतिरिक्त आप व्हाइट से लेकर ब्लैक कॉलर जॉब्स तक सारा वर्गीकरण देख सकते हैं, जो किसी दुर्भावना से नहीं किया गया। इसलिए वर्गीकरण सदा आपत्तिजनक नहीं हैं। चारों वर्ण इसी प्रकार के विद्वेष रहित वर्गीकरण थे, जो कालांतर में दोषयुक्त हो गए। इसमें मनु का कोई दोष नहीं है। 

मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में व्यक्ति की प्रतिष्ठा का आधार गुणों को माना गया है, जन्म को नहीं-

वित्तं बन्धुर्वय: कर्म विद्या भवति पंचमी।
एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्।। (मनु.-२.१३६)

धन, बंधुत्व, आयु, कर्म, विद्या ये सभी प्रतिष्ठा के आधार हैं और उत्तरोत्तर अधिक वजनदार हैं।

वर्ण व्यवस्था को जन्म की बजाय कर्म पर आश्रित सिद्ध करने के लिए सीधे शब्द प्रमाणों के अलावा अन्य संकेत भी हैं। जैसे मनु ने वर्णों के विभाजन का कारण बताते हुए कहा- ‘लोकानां विवृद्ध्यर्थम् (मनु.-१.३१)’ समाज की वृद्धि के लिए और दूसरा वर्णों के कर्म-निर्धारण का कारण कारण बताते हुए कहा- ‘सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थम् (मनु.-१.१८७)’ इस समस्त जगत की सुरक्षा के लिए कर्मों का निर्धारण आवश्यक है।

इसके लिए व्यक्ति में उन कर्मों की योग्यता का होना आवश्यक है अन्यथा समाज की वृद्धि और संसार की रक्षा न तो सिर्फ उच्च कुल में पैदा होने मात्र से होगी न आरक्षण से। इन कर्तव्यों को करने के सामर्थ्य से ही होगी। यदि जन्म के आधार पर वर्ण होते तो कर्मों के निर्धारण की क्या आवश्यकता थी? 

बाबा साहेब आंबेडकर ने किसी पुस्तक में आक्रोश में मनु और वेदों की भर्त्सना की। इसलिए हम भी वही मानेंगे, चाहे वो शास्त्र का भाव हो या न हो तो यह भी एक दुराग्रह है। अगर आप बाबा साहेब के वाक्य को ब्रह्म वाक्य मानते हैं, उससे टस से मस नहीं हो सकते तो कुछ लोग वेद और मनु को प्रमाण मानते हैं। फिर आपको आपत्ति क्या है? 

अंबेडकर विधिवेत्ता थे, कानून के प्रामाणिक विद्वान थे। इसलिए संविधान के निर्माण में उनके महत्वपूर्ण योगदान को भूरिश: नमन। किंतु कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ होने का दावा नहीं कर सकता। वेदों की व्याख्या के लिए या उसका अभिप्राय बताने के लिए शास्त्रीय योग्यता के अतिरिक्त व्याख्याता को सर्वहितकारी, निष्पक्ष ऋषितुल्य होना चाहिए।

इस योग्यता के बिना जब-जब वेदों का अर्थ किया गया है, अनर्थ ही हुआ है। एक प्रामाणिक व्याख्या के उदाहरण के रूप में आधुनिक युग के भाष्यकारों में महर्षि दयानंद एवं कुछ अन्य विद्वानों के भाष्य को देखा जा सकता है। सार्वभौम, शाश्वत और सनातन प्रगतिशीलता के द्योतक वेदों पर निराधार आरोप लगाना तो उल्टा आरोपकर्ता की समझ पर ही सवाल खड़े करता है। 

गलत व्याख्या तो संविधान की भी की जा सकती है। ऐसी व्याख्या जो संविधान निर्माताओं की विवक्षा के खिलाफ हो, उन्हें अभीष्ट न हो, लेकिन हम सदा संविधान की मूल भावना को सामने रख कर की गई व्याख्या को ही सर्वोपरि और उचित मानते हैं। इसी तरह वेदों की भी सभी व्याख्याएँ स्वीकार्य नहीं हैं। ऊपर दिए गए वेदों के प्रमाणों में जब साफ़-साफ़ शब्दों में शूद्र को बोलने-पढ़ने का अधिकार दिया गया है तो उससे विपरीत व्याख्या कैसे स्वीकार हो सकती है? 

तोड़-मरोड़ कर व्याख्या करना तो चोरों और अपराधियों का काम है। इसलिए जिसने भी वेदों की विपरीत व्याख्या की या मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में प्रक्षेप किया, उन्होंने अपने शास्त्र विरुद्ध कारनामों को शास्त्र सम्मत ठहराने का षड्यंत्र किया। आंबेडकर ने ऐसे ही किसी अनर्थकारी व्याख्याता का अनुगमन किया होगा, वर्ना ये संभव नहीं था, क्योंकि आंबेडकर नि:संदेह विद्वान व्यक्ति थे और विद्वान कभी पूर्वाग्रही नहीं होता।

इसलिए हम सब भी मनु या वेदों के नाम पर हो रहे दुष्प्रचार को यूँ ही स्वीकार न करें। उनको निष्पक्षता और सत्य के आग्रह के साथ फिर से जाँचें। वेद ही सर्वप्रथम ऐसे ग्रंथ हैं, जिनकी शिक्षाएँ और विधान पूर्णत: धर्मनिरपेक्ष हैं और सम्पूर्ण मानवता को संबोधित करके कहे गए हैं। 

चलिए मनुस्मृति के एक सुभाषित के साथ इस चर्चा को विराम दिया जाए-

फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति।। (६.६७)

रीठा यद्यपि जल को शुद्ध करता है, फिर भी उसका नाम लेने मात्र से जल शुद्ध नहीं हो जाता। उसे पीस कर जल में डालने से ही उसकी शुद्धि होती है। वैसे ही व्यक्ति के नाम या उपाधियों के बाहरी दिखावे से ही श्रेष्ठ फल नहीं मिलता, अपितु तदनुकूल आचरण से मिलता है।      

नेपाल के कोने-कोने में होऊ यांगी की घुसपैठ, सेक्स टेप की चर्चा के बीच आज जा सकती है PM ओली की कुर्सी

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के भविष्य का फैसला आज हो सकता है। सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति की होने वाली बैठक में इस संबंध में फैसला होने की उम्मीद है।

भारत विरोधी रुख और चीन के बढ़ते दखल को लेकर ओली के खिलाफ पार्टी के भीतर काफी नाराजगी है। पिछले हफ्ते नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) की स्टैंडिंग कमिटी की बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने साफ शब्दों में ओली से प्रधानमंत्री पद या पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था।

इसके बाद ओली ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की थी, लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। ऐसे में उनके इस्तीफे पर फैसला लेने के लिए बीते गुरुवार को पार्टी की शीर्ष ईकाई स्थायी समिति की बैठक होनी थी, जिसे बाद में शनिवार (4 जुलाई 2020) तक के लिए टाल दिया गया था।

पार्टी के भीतर अपने इस्तीफे की मॉंग उठने के बाद ओली ने इसका ठीकरा भारत पर फोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन प्रचंड ने उनकी इस टिप्पणी को अनुचित करार दिया था।

उल्लेखनीय है कि हाल में नेपाल ने एक नया नक्शा पास किया है। इसमें भारत के कुछ इलाकों को शामिल कर लिया गया है। दूसरी ओर, नेपाल के कुछ इलाकों पर चीन द्वारा अतिक्रमण करने की भी खबरें आई है।

नेपाल के भारत विरोधी एजेंडे के लिए होऊ यांगी जिम्मेदार बताई जा रही हैं। होऊ यांगी नेपाल में चीन की राजदूत हैं। पहले नेपाल के नए नक्शे के पीछे उनका ही हाथ बताया गया था। अब कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि होऊ यांगी की दखल नेपाल के आर्मी हेडक्वार्टर से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक है।

नेपाली सेना के प्रमुख जनरल पूर्णचंद्र थापा का दफ्तर हो या पीएम ओली का कार्यालय, बताया जाता है कि चीनी राजदूत नेपाल के किसी भी क्षेत्र में बेरोकटोक आ-जा सकती हैं।

मॉडल की तरह दिखने वाली होऊ यांगी के रसूख का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी उनके लिए विशेष भोज की मेजबानी करती हैं। ओली कैबिनेट के सदस्य उनके साथ तस्वीरें खिंचवाकर खुद को धन्य समझते हैं। होऊ यांगी भी नेपाल के वरिष्ठ नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें आए दिन सोशल मीडिया में शेयर करती रहती हैं।

यहॉं तक कि ओली और प्रचंड के बीच तनाव की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने भी सुलह की कोशिशें की थी। इस क्रम में उन्होंने प्रचंड से भेंट कर उन्हें आपस में नहीं लड़ने की सलाह दी थी। कुर्सी बचाने की कोशिशों के बीच प्रचंड और ओली ने राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भी मुलाकात की है।

बताया जाता है कि चीन के साथ-साथ पाकिस्तान भी ओली की कुर्सी बचाने के लिए सक्रिय है। इकोनॉमिक्स टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस क्रम में ओली मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कॉन्ग्रेस के संपर्क में भी हैं। दिलचस्प यह है कि नेपाल में तैनाती से पहले होऊ यांगी तीन साल पाकिस्तान में भी काम कर चुकी हैं।

हालॉंकि जानकारों का मानना है कि शायद ही ओली कुर्सी बचाने में कामयाब रहें। बताया जाता है कि 44 सदस्यीय स्थायी समिति में केवल 13 सदस्य ही ओली के पक्ष में हैं। पिछले सप्ताह हुई बैठक में प्रचंड ने ओली पर निशाना साधते हुए कहा था कि वे नेपाल को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे।

उन्होंने कहा था, “हमने सुना है कि सत्ता में बने रहने के लिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश मॉडल पर काम चल रहा है। लेकिन इस तरह के प्रयास सफल नहीं होंगे। भ्रष्टाचार के नाम पर कोई हमें जेल में नहीं डाल सकता है। देश को सेना की मदद से चलाना आसान नहीं है और ना ही पार्टी को तोड़कर विपक्ष के साथ सरकार चलाना संभव है।”

तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच ओली को चीन द्वारा हनी ट्रै​पिंग में फॅंसाने की अफवाहें भी पिछले कई दिनों से चल रही है। मेजर गौरव आर्या ने भी पिछले दिनों इस संबंध में ट्वीट किया था। हालॉंकि ओली के सेक्स टेप को लेकर सोशल मीडिया में अब तक किए गए दावे निराधार ही साबित हुए हैं।

सेक्स टेप की चर्चा अभी तक निराधार ही साबित हुई है

मारा गया मौलाना मुजीब: मुंबई हमलों में था शामिल, कश्मीर में दहशतगर्दी के लिए तैयार करता था आतंकी

पाकिस्तान के कराची शहर में मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिद सईद के करीबी मौलाना मुजीब उर रहमान जमुरानी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मौलाना मुजीब मुंबई हमले में भी हाफिज सईद के साथ शामिल था।

उसे गुरुवार को गोली मारी गई। लेकिन मीडिया में यह खबर आज आई है।

हाफिज सईद का दायाँ हाथ माने जाने वाले मौलाना मुजीब पर कराची में गुरुवार देर शाम को अज्ञात लोगों ने हमला किया था। मौलाना मुजीब बलूचिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के साथ ही जमात-उद-दवा के लिए काम करता था और उसे कई बलूचों की हत्या में भी शामिल बताया गया है।

एनबीटी की खबर के मुताबिक उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आतंकी के रूप में पहचान मिली गई थी। वर्तमान में वह बलूचिस्तान के मकरान क्षेत्र में लश्कर-ए-तैयबा का का मुखिया था। उसके तार इस्लामिक स्टेट से भी जुड़े हुए बताए जाते हैं। आरोप है कि वह भारत में जम्मू-कश्मीर में हमलों के लिए भी आतंकियों को ट्रेनिंग देता था।

वहीं टीवी-9 से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार आदित्य राज कौल ने बताया कि यह पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि पाकिस्तान का ISI जमुरानी से जुड़ा हुआ था। उन्होंने बताया कि भारत के लिए बड़ी बात इसलिए है कि जमुरानी जो पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर के लिए आतंकी आते थे, उन्हें बलूचिस्तान में ट्रेनिंग देता था। पत्रकार कौल ने बताया कि जमुरानी जम्मू-कश्मीर के खिलाफ बलूचिस्तान में रैलियों का आयोजन करता था।

वहीं टीवी-9 से बात करते हुए पाकिस्तानी लेखक तारेक फतेह ने बताया कि यह बलूचिस्तान के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने वाले लोगों के लिए राहत की खबर है और ये पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका भी है।

गौरतलब है कि लश्कर का सह-संस्थापक और जमात-उद दावा का चीफ हाफिज सईद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी घोषित हो चुका है। मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले के पीछे भी हाफिज सईद की हाथ था। मुंबई हमले में 166 लोगों ने अपनी जान गवांई थी। हाफिज पर अमेरिका ने 2012 में 1 करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है।

योगी राज में विकास दुबे के पीछे पड़ी पुलिस, जंगलराज में खाकी पर गोलियाँ बरसा भी खुल्ला घूमता रहा शहाबुद्दीन

कानपुर में खुद को पकड़ने आई पुलिस टीम के 8 लोगों की हत्या कर विकास दुबे का नाम गैंगस्टर चर्चा में है। सपा-बसपा के नेताओं का करीबी रहा विकास करीब 60 मामलों में वांछित है। इसमें 53 मामले हत्या और हत्या के प्रयास से जुड़े हैं। इसी तरह 90 के दशक में बिहार में बाहुबली से सांसद बने शहाबुद्दीन ने पुलिस पर हमला कर अपनी हनक कायम की थी।

सिवान से सांसद रह चुके मोहम्मद शहाबुद्दीन 40 से ज्यादा मामलों में आरोपित है। कभी उसका ऐसा दबदबा था कि सिवान में उसके शब्द को ही आखिरी कानून माना जाता था। जो इससे इनकार करते थे, उन्हें अंजाम भुगतना पड़ता था।

ये सिलसिला लंबे समय तक सिवान में चला। 1996 में संसदीय चुनाव के दौरान एक दिन ऐसा आया कि एसके सिंघल नाम के एसपी को शहाबुद्दीन और उसके गोलियाँ दागते हुए करीब आधे किलोमीटर तक खदेड़ा था। हालॉंकि सिंघल बाल-बाल बच गए थे। इस मामले में उसे बाद में 10 साल की सजा हुई।

1996 वही साल था जब शहाबुद्दीन को लालू ने लोकसभा का टिकट दिया और वह जीता भी। 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद की का एकछत्र राज कायम होने के बाद से उसकी ताकत में लगातार इजाफा होता गया।

2001 में राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए पीपुल्स यूनियन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि राजद सरकार कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही थी। हालात ये हो चली थी कि लोग उसे कानून का पर्याय मानने लगे थे।

पुलिस भी उसकी आपराधिक गतिविधियों पर अपना आँख बंद करने लगी थी। उसका कहर इस तरह बढ़ रहा था कि लोगों में उसके ख़िलाफ़ गवाही देने की हिम्मत तक नहीं होती थी।

साल 2001 तक स्थिति ऐसी बन पड़ी कि मानो वो सिवान में कोई समानांतर सरकार चला रहा हो। साल 1996 की घटना के बाद यह दूसरा मौका था जब वह खाकी पर झपटा। उसने एक पुलिस अधिकारी को थप्पड़ मार दिया, और उसके लोगों ने पुलिसकर्मियों को बुरी तरह पीटा।

संजीव कुमार नाम के अधिकारी की गलती केवल इतनी थी कि वह राजद के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट तामील करने अपनी टीम के साथ पहुँचे थे। मगर, शहाबुद्दीन ने गिरफ्तारी के लिए पहुँचे संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया और अपने आदमियों की मदद से पुलिस वालों को जमकर पीटा।

इस प्रकरण के बाद पुलिस थोड़े सकते में आई और उसके ख़िलाफ़ एक्शन लेने की ठानी। शहाबुद्दीन पर कार्रवाई करना इतना आसान काम नहीं था। इसके लिए बिहार पुलिस की टुकड़ियों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद भी ली गई थी।

एसपी बीएस मीणा की अगुवाई में पुलिस टीम ने उसके घर पर दबिश दी। लेकिन बावजूद इतनी तैयारियों के पुलिस को 6 घंटे तक फायरिंग का सामना करना पड़ा। कथित तौर पर शहाबुद्दीन खुद एके-47 से पुलिसकर्मियों पर फायरिंग कर रहा था। इस घटना में 14 लोग मारे गए, जिसमें से 2 पुलिसवाले भी थे।

शहाबुद्दीन के गुर्गों ने इस दौरान पुलिस के वाहनों को फूंक दिया। पुलिस ने शहाबुद्दीन के घर से एक AK-47 राइफल, दो ग्रेनेड, दो 9 mm पिस्टल आदि बरामद किए थे। लेकिन, लालू के संरक्षण में पलने वाले इस हिस्ट्रीशीटर को वह दबोच नहीं पाई। शहाबुद्दीन गोलियॉं बरसाकर मौके से निकल गया।

ये पहली बार था जब पुलिस प्रशासन ने सिवान के बाहुबली के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी। इस एक्शन ने न केवल स्थानीयों को चौंकाया था, बल्कि शहाबुद्दीन को देश के हर कोने की चर्चा में भी शामिल कर दिया था। लेकिन इससे शहाबुद्दीन को फर्क नहीं पड़ा। उसने इस कार्रवाई के बाद पुलिस को खुलेआम चुनौती देते हुए मीणा के लिए कहा था, “वह कहीं भी हो मैं उसे मार डालूॅंगा। उसे कोई नहीं बचा सकता।”

शहाबुद्दीन जैसों के कारनामों की वजह से ही बिहार में उस दौर को जंगलराज कहा जाता है। जब तक लालू की राजनीतिक हनक बनी रही, शहाबुद्दीन भी कानून की जकड़ में आने से बचता रहा। लेकिन लालू के अवसान के साथ ही उसका सितारा भी डूब गया।

साल 2004 के चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन का बुरा वक्त शुरू हो गया था। इस दौरान शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए। साल 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई और एक मामले में आजीवन कारावास की सजा हुई।

शहाबुद्दीन के सिवान और आज के उत्तर प्रदेश में भले ही आरोपित का बैकग्राउंड एक जैसा हो। लेकिन हालात बिलकुल अलग हैं। ये योगी का यूपी है। इसलिए विकास दुबे की तलाश में 7000 पुलिसकर्मी लगाए गए हैं।

खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि डीजीपी सहित शीर्ष अधिकारी कानपुर में कैंप कर रहे हैं। जब तक विकास दुबे पकड़ा नहीं जाता या फिर मुठभेड़ में मार नहीं गिराया जाता, शीर्ष अधिकारी यहॉं से लौटेंगे नहीं।

दिल्ली से अफगानिस्तान गए सिख को गुरुद्वारे से अगवा करने वाले हथियारबंद कौन? परिवार ने भू-माफिया का हाथ बताया

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान से एक सिख व्यक्ति के अपहरण से जुड़ी एक जानकारी सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि यह अपहरण स्थानीय माफिया की करतूत हो सकती है। इसमें तालिबान शामिल नहीं है, जैसा कि पहले आरोप लगाया गया था।

पीड़ित सिख व्यक्ति के परिवार द्वारा एक स्थानीय भू-माफिया पर अपहरण में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। दरअसल सिख व्यक्ति को पक्तिया प्रांत में अफगानिस्तान के चामकनी जिले में थाला श्री गुरु नानक साहिब गुरुद्वारे से हथियारबंद लोगों द्वारा अगवा कर लिया गया था।

अगवा किए गए सिख व्यक्ति का नाम निधान सिंह सचदेवा (55) है। वे दीर्घकालिक वीजा पर दिल्ली में रहने वाले अफगानी थे। मार्च में गुरुद्वारे में सेवा करने और वार्षिक मेले में भाग लेने के लिए वे अफगानिस्तान की यात्रा पर गए थे।

सिख व्यक्ति के परिवार के अनुसार उन्हें 17 जून की रात को गुरुद्वारे से ‘हथियारबंद लोगों’ द्वारा अपहरण कर लिया गया था और तब से उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है। अब परिवार ने चिंता व्यक्त करते हुए पीएम मोदी को पत्र लिखकर सिख व्यक्ति की रिहाई में हस्तक्षेप करने और भारतीय नागरिकता देने की माँग की है।

निदान सिंह के अपहरण के लिए स्थानीय भू-माफिया जिम्मेदार

दिल्ली में रहने वाले निधान सिंह के चचेरे भाई चरण सिंह सचदेवा के अनुसार, परिवार को पता चला है कि सिख व्यक्ति का अपहरण तालिबान ने बल्कि स्थानीय भू-माफिया ने किया है। उन्होंने कहा कि अपहरणकर्ताओं ने पहले तस्वीरें और वीडियो व्हाट्सएप पर भेजे थे, तब से अपहरणकर्ताओं के साथ कोई बातचीत नहीं हुई। सचदेवा ने कहा कि निधान सिंह डायबिटीज के मरीज हैं और उन्हें उचित देखभाल की बेहद जरूरत है।

इसके अलावा, सचदेवा ने कहा कि माफियाओं ने गुरुद्वारा की जमीन पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि लोग वार्षिक मेला यात्रा के लिए मुश्किल ही वहाँ जाते हैं।

सचदेवा ने कहा कि निदान जमीन पर वापस नियंत्रण पाने की कोशिश में लगे हुए थे। जमीन अफगानिस्तान में सिख समुदाय की है और हमारा परिवार इस गुरुद्वारे की देखभाल करता है। यह गुरुद्वारा पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित है और कोई सिख वहाँ मुश्किल ही रहता है।

सिंह के अपहरण की योजना उस समय बनी जब 25 मार्च को काबुल में गुरुद्वारा हर राय साहिब में इस्लामिक स्टेट द्वारा एक भीषण हमला किया गया था, जिसमें 25 सिख समुदाय के लोग मारे गए थे।

इससे पहले यह संदेह था कि सिंह के अपहरण में तालिबानी शामिल हो सकते हैं, लेकिन गुरुद्वारा दशमेश पीता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी सिंह सभा काबुल परवाण के प्रबंध समिति के सदस्य छबोल सिंह ने पुष्टि की कि सिंह का अपहरण स्थानीय भू-माफिया द्वारा किया गया है। भू-माफिया गुरुद्वारा की भूमि पर नज़र गड़ाए हुए हैं।

निदान सिंह के परिवार ने पीएम मोदी को लिखा पत्र

इस बीच निधान सिंह के परिवार ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर अपहृत व्यक्ति की रिहाई में हस्तक्षेप करने की माँग की है। निदान की पत्नी महरवंती ने लिखा कि उनके पति का पक्तिया के चंपकनी स्थित गुरुद्वारा थाला साहिब से अपहरण कर लिया गया है।

वह अपने भारतीय दीर्घकालिक वीजा को नवीनीकृत करवाने और इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा को व्यवस्थित करने के लिए इस साल मार्च में अफगानिस्तान की यात्रा पर गए थे। पक्तिया हमारे परिवार के पूर्वजों का सम्मान है।

निदान सिंह की पत्नी ने पत्र में लिखा कि मैंने और मेरे परिवार के सदस्यों ने मेरे पति से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। हम उनको लेकर बेहद चिंतित हैं, क्योंकि वह मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। अपहरणकर्ताओं ने अपनी पहचान का खुलासा नहीं किया है। उन्होंने वॉयस मैसेज और व्हाट्सएप पर पति के और खुद के फोन नंबर से उनकी फोटो भेजी है।

निदान सिंह की पत्नी महरवंती ने अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा की ओर पीएम मोदी का ध्यान आकर्षित किया। महरवंती ने लिखा, “अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों पर गंभीर अत्याचार किए जाते हैं और उनकी सुरक्षा की किसी प्रकार की कोई गारंटी नहीं है। भारत सरकार से अनुरोध है कि वह हमें उपयुक्त सहायता प्रदान करे और उचित कार्यवाही करे।”

पत्र में कहा गया है कि निदान सिंह की जल्द से जल्द सुरक्षित रिहाई के लिए हमारी अपील को उच्चतम स्तर पर संबंधित समकक्षों तक पहुँचाई जाए। कृप्या उनकी रिहाई के तुरंत बाद उन्हें नई दिल्ली वापस भेज दें और हमें जल्द से जल्द भारतीय नागरिकता प्रदान करें।

राहुल गाँधी के ‘आम आदमी’ निकले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता, PM को झूठा बताने वाले Video की खुली पोल

भारत-चीन मसले का हवाला देकर राहुल गाँधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लेह दौरे के बाद राहुल एक बार फिर ये दावा कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने जनता से सीमा मुद्दों पर झूठ बोला है।

हालाँकि, भारत सरकार ये साफ कर चुकी है कि उन्होंने सेना को स्पष्ट आदेश दिए हैं कि चीनी सेना किसी भी सूरत में भारत की सीमा में दाखिल न होने पाएl लेकिन राहुल गाँधी सरकार की इस बात का यकीन नहीं कर पा रहे। वो लगातार बस ये दावा कर रहे हैं कि चीन ने लद्दाख के कई हिस्से पर कब्जा कर लिया है।

अपने इसी झूठ को विस्तार देते हुए राहुल गाँधी ने आज अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक वीडियो साझा किया। वीडियो में इस बात का दावा किया जा रहा है कि चीन ने लद्दाख के कई इलाकों पर अवैध रूप से निर्माण कर लिया हैl हालाँकि, वीडियो में नजर आ रहे लोग, जिनके बयान पर राहुल प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साध रहे हैं, उनकी मौजूदगी से ही राहुल के प्रोपगेंडे का खुलासा होता है।

दरअसल, जिन लोगों को ‘आम आदमी’ बता राहुल गाँधी ने शेयर किया है, वास्तविकता में वे सब कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता या फिर कॉन्ग्रेस नेता ही हैं। इसके अलावा वीडियो में कुछ लोग ऐसे भी है जो लद्दाख से संबंध ही नहीं रखते। लेकिन फिर भी बयानबाजी कर रहे हैं।

पॉलिटिकल कीड़ा द्वारा शेयर की गई वीडियो में हम देख सकते हैं कि जो व्यक्ति राहुल गाँधी के वीडियो में मोदी सरकार आरोप लगा रहे हैं, उनका सीधा संबंध कॉन्ग्रेस से है।

वीडियो में नजर आने वाला पाँचवा व्यक्ति सचिन मिरुपा है, वह NSUI का मुख्य सचिव है। वो लद्दाख का नहीं, हिमाचल प्रदेश का रहने वाला है। वीडियो में एक तुंडुप नुबु चीता नाम के व्यक्ति को भी हम देख सकते हैं। वह लेह में यूथ कॉन्ग्रेस का का मुख्य सचिव है और वीडियो में दावा कर रहा है कि मीडिया सीमा मुद्दों पर जनता को बरगला रही है। वह कहता है कि पीएम मोदी का यह दावा कि चीन ने भारतीय जमीन पर कब्जा नहीं किया, बिलकुल गलत है।

इसी प्रकार दोर्जोय ग्याल्टसन है नाम का व्यक्ति जो वीडियो में दिख रहा है, वो लेह जिले में यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर काम करता है। फिर नामग्याल डुरबुक, जिसके बयान को कई मीडिया संस्थान लंबे समय से चल रहे हैं और जिसका दावा है कि सीमा पर भारत सरकार झूठ बोल रही है, उसे हम बरखा दत्त के साथ एक अन्य वीडियो में देख सकते हैं। इसमें उसकी पहचान पूर्व कॉन्ग्रेसी पार्षद के रूप में बताई गई है। इसके अलावा कई अन्य लोग भी हैं जो वीडियो में नजर आ रहे हैं और उनका संबंध कॉन्ग्रेस पार्टी से है या वे उसके नेता हैं। मसलन, अंगड़ू सोनम, जो लद्दाख के ठिकसे गाँव का सरपंच हैं।

कानपुर पहुँच बोले CM योगी- बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, डीजीपी ने कहा- विकास दुबे की तलाश में लगाए गए हैं 7000 पुलिसकर्मी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को कानपुर पहुॅंचे। उन्होंने पुलिस लाइन पहुॅंचकर गुरुवार रात जान गॅंवाने वाले पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि दी।

हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम के आठ लोगों की कानपुर स्थित चौबेपुर के बिकरू गाँव में हुए हमले में मौत हो गई थी।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने वीरगति प्राप्त हुए पुलिसकर्मियों को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस घटना के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिसकर्मियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने बताया कि कानपुर में डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी के साथ ही शीर्ष पुलिस अधिकारी तैनात हैं। दोषियों की धर पकड़ के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि जब तक विकास दुबे पकड़ा या मुठभेड़ में मार गिराया नहीं जाता है तब तक शीर्ष अधिकारी कानपुर से नहीं लौटेंगे।

सीएम योगी ने मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए सभी पुलिसकर्मी के परिवारों को एक करोड़ रुपये दिए जाने की घोषणा की है। साथ ही परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी और पेंशन भी दिए जाने की बात कही है।

वहीं घटना के बाद यूपी के डीजीपी हितेशचन्द्र अवस्थी ने घटनास्थल का मुआयना किया। डीजीपी ने कहा कि मैं पुलिस परिवार का मुखिया हूँ। यह हमारे परिवार पर हमला है और हमारे परिवार के 8 लोग बलिदान हुए हैं। 24 से 48 घंटे में ऑपरेशन में लगी टीमें अपने अंजाम पर होंगी।

डीजीपी ने बताया कि प्रदेश के 7000 पुलिसकर्मीयों को इस ऑपरेशन में लगाया गया है। 24 से 48 घंटे के भीतर मुख्य आरोपी को पकड़कर कानूनी कार्यवाही अमल में लाएँगे। इस दौरान उन्होंने कहा कि गाँव के लोगों को अपराधियों का साथ नहीं देना चाहिए, यह उनके लिए आगे घातक साबित हो सकता है।

गाँव के यदि किसी व्यक्ति के अपराधियों से संबंध सामने आते हैं तो उन पर भी कार्रवाई की जाएगी। ऑपरेशन को अंजाम तक पहुँचाने के लिए जिले की सभी सीमाओं को सील कर दिया गया है। साथ ही सीमाओं पर वाहनों की सघन चेकिंग की जा रही है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के आठ कर्मियों की गुरुवार रात कानपुर के बिकरू गाँव में हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद से हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे चर्चा में है। पुलिस की टीम ने उसे गिरफ्तार करने के लिए आधी रात दबिश दी थी। लेकिन, विकास और उसके गुर्गों ने टीम पर अंधाधुंध फायरिंग की।

विकास पर कम से कम 60 मामले दर्ज हैं। इनमें 53 हत्या और हत्या के प्रयास से जुड़े हैं। उस पर राजनाथ सिह की सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा रखने वाले संतोष शुक्ला की थाने में घुसकर हत्या करने का भी आरोप है। हालॉंकि इस मामले में कोई गवाह नहीं मिलने पर उसे बरी कर दिया गया था।

विकास दुबे राजनीति में भी ​सक्रिय रहा है। सपा और बसपा के कई नेताओं से उसकी करीबी रही है। उसकी पत्नी सपा के टिकट पर पंचायत का चुनाव भी लड़ चुकी है।

गणित शिक्षक रियाज नायकू की मौत से हुआ भयावह नुकसान, अनुराग कश्यप भूले गणित

अनुराग कश्यप ट्विटर पर गणित कर रहे हैं। इस गणित के मिले-जुले परिणाम मिल रहे हैं। अभी रियाज नायकू को जन्नत पहुँचे दो माह भी पूरे नहीं हुए थे कि बुतपरस्तों के मुल्क में अनुराग कश्यप जैसे गणितज्ञों की शक्ल में इसके भयावह नतीजे सामने आने लगे।

वही रियाज नायकू, जो पिछले माह ही भारतीय सेना की गोली से बिना ‘एक, दो, तीन’ की उल्टी गिनती गिने ही ‘चल दिए’ थे। जिनके जाते ही पता चला था कि वो तो गणित के महान शिक्षक थे और अगर सेना द्वारा मारे ना जाते तो उस काल अवधि की गणना अवश्य कर लेते, जब बॉलीवुड निर्देशक अनुराग कश्यप बिना सस्ता नशा किए कोई ट्वीट करते।

हिजबुल मुजाहिदीन के शीर्ष कमांडर और महान गणितज्ञ रियाज नाइकू की अल्पायु में मौत के दो दुष्परिणाम सामने आए हैं – पहला यह कि अनुराग कश्यप अब उस काल घड़ी को जान ही नहीं पाएँगे जब उन्हें अपने होशोहवास में सोशल मीडिया इस्तेमाल करना था, और दूसरा यह कि इसी बात का फायदा उठाकर वो अपनी नशीली गणित से ट्विटर पर बेख़ौफ़ लोगों की नींद उड़ाते जा रहे हैं।

ट्विटर पर वोक-लिबरल्स ने इसे ‘प्रगतिशील गणित’ का नाम दिया है। उनका कहना है कि आज तक वो सिर्फ प्रोफ़ेसर कुणाल कामरा से ही इतिहास, राजनीतिशास्त्र और दर्शन शास्त्र पढ़ते आ रहे थे, लेकिन अब उन्हें एक गणित का भी टीचर मिल गया है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के लिए वो आज भी कामरान अकमल पर निर्भर हैं। और बाकी सभी विषयों में वोलेंटियर ध्रुव राठी उनकी मदद करते आए हैं।

पिता-पुत्र संवाद के एक कालजयी दृश्य में महान राजनेता रामधीर सिंह ने अपने प्रिय पुत्र को कहा था कि वो सिर्फ इस कारण ज्यादा ज़िंदा रह सके, क्योंकि वो सिनेमा नहीं देखते थे। इसी तर्ज पर अब सोशल मीडिया यूजर्स की चाह है कि वो भी किसी दिन अनुराग कश्यप को अपने पास बिठाकर उन्हें बता सकें कि वो लोग सिर्फ इस कारण जिन्दा हैं, क्योंकि उन्होंने कभी अनुराग कश्यप से गणित नहीं पढ़ी।

दरअसल, अनुराग कश्यप ने आज एक मार्मिक और भावुक ट्वीट करने के लिए गणित का सहारा लेते हुए बताया कि सत्या फिल्म को बाईस और गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के आठ साल पूरे होने के कारण वो अब तीस साल के हो गए हैं। अनुराग कश्यप के इस ट्वीट के बाद लोग एक दूसरे को चूंटी काट रहे हैं और अपने जिन्दा होने का सबूत फैज की किसी नज़्म में तलाश रहे हैं।

यूनेस्को ने दिया ‘विश्व की बेस्ट गणित’ का खिताब

समाचार लिखे जाने तक यूनेस्को ने भी अनुराग कश्यप की गणित को विश्व की बेस्ट गणित घोषित कर दिया है लेकिन गोदी मीडिया यह बात छुपा रहा है। यूनेस्को ने कहा है कि फासिज़्म और पैट्रीआर्की के समूल विनाश से पहले ही इसे विश्व धरोहर में सूचीबद्द किया जाएगा। यह समय कब आएगा, इसकी गणना की जिम्मेवारी भी अनुराग कश्यप को ही दी गई है।

वहीं, अनुराग कश्यप से जब फैक्ट चेकर ‘फ़ॉल्टन्यूज’ ने इस बाबत सम्पर्क किया तो कश्यप ने बताया कि उन्हें यह बताने में कोई झिझक नहीं है कि उन्होंने यह गणित नेहरू जी द्वारा बनाए गए विश्वविद्यालयों में सीखी थी ना कि किसी आरएसएस के विद्यालय में।

राहुल गाँधी को भी अनुराग कश्यप द्वारा इजाद की गई इस गणित की जब सूचना दी गई तो पहले उनके माथे पर यह सोचकर पसीना आ गया कि कहीं अब अनुराग कश्यप नेहरू और इंदिरा गाँधी कि कुल उम्र को जोड़कर उनके युवा रहने की समयवधि ना निकाल लें। लेकिन जब उन्हें लगा कि अनुराग कश्यप ऐसा कभी नहीं करेंगे तो उन्हें अनुराग कश्यप को सलाह दी कि उन्हें पूरे जोश के साथ ये मजा पूरे देश को देना चाहिए।

कुछ लोगों ने यह भी माँग की है कि अनुराग कश्यप की गणित की इस प्रतिभा का खुलासा होने के बाद अब लद्दाख स्थित गलवान घाटी में चायनीज दुश्मनों को गंदी मौत देने के लिए और उन्हें कड़ा सबक सिखाने के लिए अनुराग कश्यप को उन्हें गणित पढ़ाने के लिए भेजा जाना चाहिए।

अनुराग कश्यप इसके लिए सिर्फ इस शर्त पर तैयार हुए हैं कि उन्हें वहाँ पर सस्ते गाँजे की सप्लाई में कोई कमी नहीं होनी चाहिए और अगर ऐसा हुआ तो वो मानवाधिकार वालों को सूचित कर देंगे। स्वरा भास्कर ने इसके लिए ट्विटर पर एक ऑनलाइन कैम्पेन भी शुरू कर दिया है।

संघियों ने अपनी गणित का प्रमाण दे कर की वोक शिक्षक अनुराग से डिग्रियाँ लेने की कोशिश

अनुराग कश्यप की इस कालजयी गणित से प्रभावती होकर कुछ संघियों ने भी वोक-शिक्षक अनुराग से डिग्रियाँ लेने की कोशिश की और अपनी गणित के प्रमाण पेश किए। ऐसे ही कुछ अनुभवों पर एक नजर –

इस प्रकार की गणित जब सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार के संज्ञान में आई तो वो बस यही कह पाए –

सैफ अली खान ने खुद को बताया नेपोटिज्म का शिकार: सोशल मीडिया पर लोगों ने जम कर उड़ाई खिल्ली, मिम्स की बौछार

बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगौर और दिवगंत एक्टर मंसूर अली पटौदी के बेटे सैफ अली खान ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में खुद को नेपोटिज्म का शिकार बताया था। नवाब कहे जाने वाले सैफ अली खान के इस बयान पर सोशल मीडिया यूज़र्स ने जम कर मजे लिए हैं। यहाँ तक कि कई यूज़र्स तरह-तरह से मीम्स बना कर उन्हें ट्रोल कर रहें है।

गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत के सुइसाइड के बाद नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद को लेकर लोगों ने कई बड़े फ़िल्मी सितारों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। वहीं कुछ सेलेब्रिटीज़ ने खुल कर इस मुद्दे पर अपनी बात भी रखी है। मगर सैफ अली खान जिन्होंने गरीबी, मजबूरी, सैक्रिफाइस जैसे शब्दों को सिर्फ अपनी जिंदगी में सुना भर होगा उनके द्वारा खुद को नेपोटिज्म का शिकार बताना लोगों को रास नहीं आया।

यही वजह रही कि उनके ऐसा कहते ही सोशल मीडिया यूजर ने अपने ही अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है। जिसका लब्बोलुआब उनके इस कथन का माखौल उड़ाना ही है। आप नीचे दिए गए कई प्रतिक्रियाओं पर नजर डालिए माजरा समझ आ जाएगा।

दरअसल, सैफ ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि “नेपोटिज्म एक ऐसी चीज है जिसका शिकार मैं खुद भी हो चुका हूँ। मैं यहाँ किसी का नाम नहीं लूँगा, लेकिन एक बार किसी के पिता ने फोन कर कहा था कि सैफ को इस फिल्म में मत लो, फिल्म में इसे लो। यह सब कुछ होता है और यह मेरे साथ भी हो चुका है।”

उनके इस बयान पर एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “मुझे लगता है कि उन्हें शायद नेपोटिज्म का मतलब भी पता नहीं है, कोई उन्हें इसका मतलब समझाओ।”

सैफ के बयान को लेकर ट्विटर पर वायरल हो रहें मीम्स, जिसे हमने आपकी सुविधा के लिए यहाँ प्रस्तुत किया है।

सैफ अली खान पर तंज कसते हुए एक यूजर ने लिखा- क्या ये मजाक चल रहा है।

वहीं जनियस अभी नाम के यूजर ने सैफ के बयान का मजाक बनाते हुए इसकी तुलना अरविंद केजरीवाल, राहुल गाँधी, सोनम कूपर और एनडीटीवी से भी कर दी।

एक यूजर ने तो एक मीम्स के जरिए उनके नवाबों की जिंदगी के बारे में बताते हुए यह भी कह दिया कि इनके हाथ में सोने का कटोरा भी दे दो फिर भी ये भीख माँगेंगे।

वहीं, करण जौहर की फ़ोटो का इस्तेमाल करते हुए, परीक्षित सिंह नाम के एक यूजर ने सैफ और करण दोनों पर निशाना साधा।

प्रिंसी नाम से एक यूजर ने ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ फ़िल्म में सैफ की एक्टिंग को बकवास बताते हुए कहा कि यह फ़िल्म सैफ को सिर्फ नेपोटिज्म के चक्कर में ही मिली थी।

और भी कई यूज़र्स ने बाकायदा एक से बढ़कर एक मिम्स सैफ के बयान पर बनाएँ हैं।

गौरतलब है कि एक्टर सुशांत सिंह के आत्महत्या ने लोगों के मन में गहरा प्रभाव छोड़ा है। वहीं उनकी मौत ने फ़िल्मी दुनिया में पर्दे के पीछे स्ट्रगल कर रहे छोटे शहर से आए एक्टर्स की जिंदगी को सामने ला दिया है। जिसके चलते बॉलीवुड में प्रचलित नेपोटिज्म, खेमेबाजी और बुलिंग पर जोरों से चर्चाएँ हो रहीं हैं।

करण जौहर, महेश भट्ट, सलमान खान और अब सैफ के साथ कई स्टार किड्स जैसे सारा अली खान, सोनाक्षी सिन्हा, अनन्या पांडे, आलिया भट्ट, सोनम कपूर जैसे कई फ़िल्मी सितारें इस वक़्त निशाने पर है। लोग एक तरफ सुशांत की मौत पर सीबीआई जाँच की माँग कर रहे। तो वहीं नेपोटिज्म को बढ़ावा दे रहे सेलेब्रिटीज़ का बहिष्कार भी कर रहें है।

भारत के साथ जापान, LAC पर चीन की हरकतों का किया विरोध

गलवान में चीनी सेना के धोखे से किए गए वार के बाद से दुनिया के कई देश खुलकर भारत के साथ खड़े हुए हैं। जापान भी अब इन देशों में शामिल हो गया है।

भारत का समर्थन करते हुए उसने कहा है कि वह नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति को बदलने वाली किसी भी एकतरफा प्रयास का विरोध करता है। भारत की सराहना करते हुए मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद जताई है।

जापान के भारत में राजदूत सतोशी सुजुकी ने बताया कि उनकी भारत के विदेश सचिव हर्ष वी श्रृंगला से इस बारे में चर्चा हुई थी। सतोशी सुजुकी ने ट्वीट कर कहा, “मेरी विदेश सचिव श्रृंगला से अच्‍छी बातचीत हुई है। एलएसी पर श्रृंगला की ओर से दी गई जानकारी की और भारत सरकार के शांतिपूर्व समाधान के प्रयासों की मैं प्रशंसा करता हॅं। जापान आशा करता है कि इस विवाद का शांतिपूर्वक समाधान होगा। जापान यथास्थिति को बदलने की किसी भी कार्रवाई का विरोध करता है।”

जापान की तरफ से यह प्रतिक्रिया तब आई है जब उसने एक विधेयक में संशोधन किया है। इसके बाद वह भारत, ऑस्ट्रेलिया और यूके के साथ भी डिफेन्स इंटेलिजेंस साझा कर पाएगा। इस विधेयक के लागू होने से पहले तक जापान केवल अमेरिका के साथ डिफेन्स इंटेलिजेंस साझा कर सकता था।

इसके अलावा जापान सरकार के विदेश मंत्रालय ने भी हाल ही में इस मामले पर अपना मत रखा था। मंत्रालय ने एक बयान में कहा था कि वह इस मामले पर शुरू से निगाह रखे हुए है, क्योंकि ऐसी घटनाओं का सीधा असर क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है।  

इसके पहले 19 जून को भी सतोशी सुजुकी ने सीमा पर चीन और भारत की सेना के बीच हुई हिंसक झड़प में सैनिकों के बलिदान पर संवेदना जताई थी। उन्होंने कहा था, “हम भारत के नागरिकों और गलवान घाटी में अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए बलिदान होने वाले सैनिकों के परिजनों के लिए गहरी संवेदना जताते हैं।”