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IFWJ ने PTI पर लगाया नेपोटिज़्म का आरोप, कहा- कॉन्ग्रेस के मुखपत्र के रूप में काम करती आई है संस्था, जाँच की माँग

प्रसार भारती द्वारा समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया (पीटीआई) को ‘राष्ट्रीय हितों के अनुरूप काम नहीं’ करने वाला बताते हुए उसकी सेवाएँ लेना बंद करने की चेतावनी दी गई है। प्रसार भारती ने कहा कि पीटीआई से अपने संबंधों को आगे जारी रखने को लेकर समीक्षा कर रहा है।

प्रसार भारती के समर्थन में अब देश के सबसे बड़े पत्रकारों के संगठन आईएफडब्लूजे (इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स) ने भी एक पत्र के जरिए प्रधानमंत्री से पीटीआई की फाइनेंस और कार्यप्रणाली की जाँच की माँग की है और कई अहम खुलासे किए हैं। आईएफडब्लूजे के महासचिव विपिन धुलिया ने एक फेसबुक पोस्ट शेयर करते हुए इसकी सूचना दी है।

विपिन धुलिया ने पीटीआई में होने वाले भाई-भतीजावाद, गलत वित्तीय प्रबंधन और निहित स्वार्थों का खुलासा करते हुए बताया है कि किस प्रकार पीटीआई हमेशा सत्ताधारी पार्टी, मुख्यतः कॉन्ग्रेस के मुखपत्र के रूप में काम करता आया है।

विपिन धुलिया द्वारा शेयर किए गए लेख के अनुसार, इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) ने पिछले कई वर्षों के दौरान भारत सरकार द्वारा प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) को उपलब्ध कराए गए विभिन्न फंड (अनुदान), सब्सिडी, ऋण और वित्तीय मदद की न्यायिक जाँच की माँग की है।

प्रधानमंत्री और सूचना व प्रसारण मंत्री को एक पत्र के जरिए, IFWJ ने अवगत कराया था कि पीटीआई को संसद मार्ग पर आलिशान भवन निर्माण के लिए सब्सिडी वाली रियायती भूमि सहित केंद्र सरकारों से विभिन्न सहायता मिलती आई हैं। यह सब राजकीय खजाने और भारतीय कर दाताओं के रुपयों से किया गया था।

आईएफडब्ल्यूजे ने पीटीआई मैनेजमेंट पर अपने संस्थान के संघ को विभाजित करने, केवल वफादारों का पक्ष लेने और कर्मचारियों को विभिन्न वैधानिक वेतन पुरस्कारों के तहत उनके कानूनी बकाए से वंचित करने जैसे कर्मचारी-विरोधी उद्देश्यों के लिए सरकारी धन के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया है।

IFWJ seeks probe into PTI finances Appeal to Prime Minister NEW DELHI June 30: The Indian Federation of Working…

Vipin Dhuliya द्वारा इस दिन पोस्ट की गई मंगलवार, 30 जून 2020
https://www.facebook.com/story.php?story_fbid=3422835454428537&id=100001063475529

रिपोर्ट के अनुसार, पीटीआई के वर्तमान प्रबंधन ने विधिवत निर्वाचित पदाधिकारियों को रिझाने के लिए एक सेवानिवृत्त कार्यालय के साथ एक समानांतर संघ बनाया था। कोरोना वायरस के कारण जारी वर्तमान लॉकडाउन के दौरान भी प्रबंधन ने कर्मचारियों को उनके आर्थिक अधिकारों से वंचित कर दिया।

जब तक इसके प्रबंधन में पी उन्नीकृष्णन, एनडी प्रभु और के.पी. जैसे काम करने वाले पत्रकार थे, पीटीआई को पेशेवर पैटर्न पर चलाया जाता था। लेकिन जिस क्षण रोजगार की नापाक संविदा प्रणाली और आधिपत्य का शासन शुरू हुआ, समाचार एजेंसी पीटीआई भाई-भतीजावाद यांनी नेपोटिज्म की खान बन गई।

प्रसार भारती द्वारा पीटीआई को सदस्यता की समीक्षा के मुद्दे के साथ प्रेस की स्वतंत्रता को जोड़ने वाले कुछ तत्वों पर टिप्पणी करते हुए, IFWJ ने कहा कि अधिक जरूरी है कि मजदूरों की भूख से मुक्ति की माँग की जाए, क्योंकि उन्हें समाचार पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और समाचार एजेंसियों द्वारा छँटनी समाप्ति, बर्खास्तगी का सामना करना पड़ता है।

आईएफडब्ल्यूजे ने पीटीआई प्रबंधन पर हमेशा बेशर्मी से खुद को सत्ताधारी पार्टी, खासकर कॉन्ग्रेस के मुखपत्र के रूप में बदलने का आरोप लगाया है। संगठन ने आरोप लगाया है कि जब स्वतंत्र बहुभाषी समाचार एजेंसी, यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) में सरकारी मदद की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप पिछले दस वर्षों में यूएनआई कर्मचारियों के पेंडिंग वेतन भुगतान बहुत बढ़ गया है।

यूएनआई के अधिकांश कर्मचारियों को तीन से चार वर्षों में पूर्ण वेतन का भुगतान नहीं किया गया है। दो राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के बीच भेदभाव की इस दुखद स्थिति ने केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पेशेवर अखंडता को बर्बाद कर दिया है। UNI को धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ दिया गया था।

यहाँ तक ​​कि तत्काल ऋण, जो UNI द्वारा अनुरोध किया गया था, मोदी सरकार द्वारा नहीं दिया गया था। आईएफडब्ल्यूजे ने आरोप लगाया कि पीटीआई को 100 करोड़ रुपए का ऋण मिला है, जो इस्तेमाल तक नहीं किया गया।

दूसरी ओर, UNI कर्मचारियों को केंद्र सरकार द्वारा 25 करोड़ रुपए के अल्प ऋण से भी वंचित कर दिया गया था। आईएफडब्ल्यूजे ने चीन के राजदूत के साथ पीटीआई द्वारा विशेष साक्षात्कार का भी उल्लेख किया। यह ऐसे समय में किया गया था जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने मीडिया के माध्यम से वस्तुतः युद्ध की स्थिति घोषित कर दी थी। पीटीआई की कहानी इस प्रकार अपने छिपे हुए एजेंडे के बारे में संदेह पैदा करती है।

पीटीआई को प्रसार भारती की चेतावनी

उल्लेखनीय है कि हाल ही में प्रसार भारती के अधिकारियों ने पत्रकारों से कहा कि सार्वजनिक प्रसारणकर्ता अपनी अगली बोर्ड बैठक से पहले पीटीआई को एक सख्त पत्र भेज रहा है, जिसमें पीटीआई द्वारा राष्ट्र विरोधी रिपोर्टिंग पर गहरी नाराजगी व्यक्त की गई है।

पीटीआई ने चीन में भारतीय राजदूत विक्रम मिस्री के हवाले से कहा था – “चीन को तनाव कम करने के लिए अपनी जिम्मेदारी समझते हुए लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपनी तरफ वापस जाना होगा।”

पीटीआई के एक अन्य ट्वीट में मिस्री ने कहा – “चीन को एलएसी के भारतीय हिस्से की ओर अतिक्रमण के प्रयास और संरचनाओं को खड़ा करने की कोशिश को रोकना होगा।”

पीटीआई द्वारा शेयर किए गए इस इंटरव्यू में मिस्री के एलएसी पर चीन को लेकर दिए गए बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सर्वदलीय बैठक में दिए उस बयान के विपरीत थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि न कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है। पीएम मोदी ने कहा था कि न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।

ऐसे में पीटीआई द्वारा चीनी राजदूत के बयान को प्रमुखता देने पर प्रसार भारती ने चिंता व्यक्त की थी। प्रसार भारती ने एक पत्र भेजकर कहा था कि पीटीआई की न्यूज़ रिपोर्टिंग राष्ट्र हित में नहीं है। प्रसार भारती का यह भी कहना है कि वह पीटीआई को फ़ीस के रूप में हर साल मोटी रकम देता है और अब तक करोड़ों रुपए उसे दे चुका है।

गौरतलब है कि इससे पहले भी पीटीआई ने भारत में चीन के राजदूत सुन वीदांग का इंटरव्यू लिया था, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ था। चीनी दूतावास ने इस इंटरव्यू का एक छोटा संस्करण अपनी वेबसाइट पर प्रस्तुत किया था, जिसे लेकर पीटीआई की आलोचना भी हुई। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने राजदूत सुन के बयानों पर जवाब दिया था।

इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ)

IFWJ भारतीय वर्किंग पत्रकारों का संगठन है, जिसकी स्थापना अक्टूबर 28, 1950 को नई दिल्ली में की गई थी। 1954 में संघ और राज्य सरकारों ने वर्किंग पत्रकारों के प्रतिनिधि निकाय के रूप में IFWJ को मान्यता दी थी। भारत के हर शहर, कस्बे और प्रकाशन केंद्र में कार्यरत पत्रकारों के एकमात्र पेशेवर निकाय के रूप में, IFWJ की क्षेत्रीय इकाइयों ने प्रेस क्लब, प्रेस अकादमी, संदर्भ पुस्तकालय, प्रशिक्षण संस्थान और अध्ययन मंडल स्थापित किए हैं।

109 ट्रेनों के संचालन के लिए रेलवे ने प्राइवेट सेक्टर को जारी किया आमंत्रण: बढ़ेंगे रोजगार, आएगी आधुनिक तकनीक

भारतीय रेलवे ने पैसेंजर ट्रेन्स के आवागमन के संचालन के लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी हेतु निवेदन जारी किया है। रूट्स के 109 पेयर्स और 151 आधुनिक ट्रेनों के संचालन के लिए ये निवेदन भारतीय रेलवे द्वारा जारी किए गए हैं।

इस प्रोजेक्ट से रेलवे में प्राइवेट सेक्टर से 30,000 करोड़ का निवेश आने वाला है। रेलवे नेटवर्क में पैसेंजर ट्रेनों के संचालन के लिए ऐसा पहली बार हो रहा है, जब निवेश के लिए प्राइवेट सेक्टर को आमंत्रित किया गया हो।

इससे मेंटेनेंस कॉस्ट और ट्रांजिट टाइम घटाने के साथ ही जॉब क्रिएशन के मौके बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। प्राइवेट सेक्टर द्वारा आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण ये सब संभव हो पाएगा।

रेलवे की इस पहल से सुरक्षा में भी मदद मिलेगी और रेलवे यातायात में वैश्विक स्तर की सुविधाएँ भी मिलेंगी। हर एक ट्रेन में 16 कोच होंगे। इनकी अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटे की होगी। इन्हें इसी हिसाब से डिजाइन भी किया गया है।

इस परियोजना के लिए रियायत अवधि (कन्सेशन पीरियड) 35 वर्ष की होगी। निजी इकाई (प्राइवेट सेक्टर) को भारतीय रेल को निश्चित ढुलाई शुल्क, वास्तविक खपत के आधार पर ऊर्जा शुल्क का भुगतान करना होगा और पारदर्शी निविदा प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित सकल राजस्व साझा करना होगा।

इन ट्रेनों को भारतीय रेल के चालक और गार्ड द्वारा परिचालित किया जाएगा। निजी इकाई द्वारा ट्रेनों के परिचालन में समय-पालन, विश्वसनीयता, ट्रेनों के रख-रखाव आदि प्रदर्शन के प्रमुख संकेतकों का ध्यान रखना होगा।

यात्री ट्रेनों का परिचालन और रखरखाव में भारतीय रेल द्वारा उल्लिखित मानकों एवं विनिर्देशों और आवश्यकताओं का ध्यान रखना होगा। जिन्हें अप्लाई करना हो, वो ज्यादा विवरण और क्लस्टर वार जानकारी के लिए ‘केन्‍द्रीय सार्वजनिक खरीद पोर्टल‘ की वेबसाइट के निविदा कॉलम में जा सकते हैं।

कुल मिला कर देखें तो इस पहल का उद्देश्य कम रखरखाव, कम पारगमन समय, ज्यादा रोजगार सृजन, यात्रियों को ज्यादा सुरक्षा, विश्व स्तरीय यात्रा अनुभव देनने वाली आधुनिक तकनीक से युक्त रेल इंजन और डिब्बों की पेशकश करना तथा यात्री परिवहन क्षेत्र में माँग व आपूर्ति के अंतर में कमी लाना भी है।

केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट के माध्यम से इसकी जानकारी दी है। ऑपइंडिया ने इससे सम्बंधित कुछ सवाल मंत्रालय को भेजे हैं, जिनका जवाब आते ही आपको अवगत कराया जाएगा। अब देखना यह है कि इसमें प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के बाद क्या बदलाव आते हैं और रेलवे में कैसे और ज्यादा सुधार आता है।

TikTok वीडियो बनाने के लिए मंदिर में प्रतिमा को मारी लात, 2 युवकों को राजकोट पुलिस ने किया गिरफ्तार

गुजरात के राजकोट में 2 युवकों को TikTok वीडियो बनाने के लिए हिन्दू आस्थाओं का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक युवक टोपी पहने हुए है और मंदिर के अंदर स्थित प्रतिमा को लात मार कर उसे न सिर्फ अपमानित कर रहा है बल्कि उसे गिरा कर क्षतिग्रस्त भी कर देता है। कई हिन्दुओं ने उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

उक्त युवक यही पर नहीं रुका बल्कि उसने मंदिर के द्वार पर भी जोर की लात मारी। साथ ही एक अन्य आरोपित युवक ने भी TikTok वीडियो बनाते हुए मंदिर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया और उसका अपमान किया। मंदिर की प्रतिमा को अपमानित कर ‘स्टाइलिश पोज’ देने वाले इन युवकों पर शिकंजा कसते हुए राजकोट पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें धर-दबोचा।

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ऑपइंडिया ने जब राजकोट पुलिस को कॉल किया तो उन्होंने भी इस ख़बर की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। दोनों युवकों का नाम जयश और दिनेश है, जिनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा रही है।

बता दें कि हाल ही में लद्दाख में जारी सीमा विवाद के बीच देशभर में चाइनीज उत्पादों के बहिष्कार की आवाज उठनी शुरू हुई हैं। ऐसे में भारत सरकार ने 59 चायनीज ऐप को प्रतिबंधित करने का बड़ा फैसला लिया।

महिला कॉन्स्टेबल ने बताया पुलिस की बर्बरता से कैसे हुई जयराज और बेनिक्स की मौत, रजनीकांत ने कहा- दोषियों को सज़ा दो

तमिलनाडु के सथानकुलम पुलिस स्टेशन में पुलिस की बर्बर पिटाई पिता-पुत्र जयराज और बेनिक्स (फेनिक्स) की मौत के मामले में थाने की एक महिला कॉन्स्टेल ने उस क्रूर रात की दास्ताँ सुनाई है। मद्रास मदुरई बेंच के समक्ष इस मामले की जाँच कर रहे जुडिशल मजिस्ट्रेट ने कहा कि रेवती को डर था कि उसके बयान के बाद उसे धमकियाँ मिल सकती हैं। उधर सुपरस्टार रजनीकांत ने भी इस घटना की निंदा करते हुए दोषियों पर कार्रवाई की माँग की है।

जयराज और बेनिक्स की मौत का मामला मद्रास हाईकोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के बाद सुनवाई चल रही है। उसने मंगलवार (जून 30, 2020) को सीडी-सीआईडी को इस केस की जाँच सौंप दी थी। डीएसपी अनिल कुमार इसकी जाँच कर रहे हैं। कोर्ट ने महिला कॉन्स्टेबल रेवती और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है। रेवती ने बताया कि पुलिस वाले जयराज और बेनिक्स पिता-पुत्र को रात भर लाठियों से पीटते रहे।

रेवती ने बताया कि पीटने के कारण लाठी से लेकर टेबल तक पर खून के धब्बे ही धब्बे नज़र आ रहे थे। उन्होंने कहा कि खून के उन धब्बों का सैम्पल जाँच के लिए जल्द से जल्द लिया जाना चाहिए क्योंकि पुलिस वाले उसे मिटाने की पूरी कोशिश करेंगे। पुलिसकर्मियों ने जुडिशल मजिस्ट्रेट की भी जाँच में सहायता नहीं की और तब तक इस मामले में प्रयोग की गई लाठी वगैरह सबमिट नहीं की, जब तक उन्हें मजबूर नहीं किया गया।

लाठी सबमिट की जाने कि बात सुनते ही एक पुलिसकर्मी तो दीवाल फाँद कर भाग खड़ा हुआ। रेवती तो अपने बयान पर हस्ताक्षर करने तक से भी डर रही थी लेकिन पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिए जाने के बाद ही उन्होंने साइन किया। रविवार (जून 28, 2020) को जेएम थाने में जाँच के लिए रुके लेकिन उन्हें एक भी पुलिसकर्मी ने सहयोग नहीं किया। उन्होंने बताया कि एक ने तो धमकी भरा व्यवहार भी प्रदर्शित किया।

वहीं सुपरस्टार रजनीकांत ने जेराज और बेनिक्स कि हत्या मामले में दोषी पुलिसकर्मियों की निंदा करते हुए कहा कि इस घटना से जुड़े एक-एक दोषी को सजा मिलनी ही मिलनी चाहिए। रजनीकान्त ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने जूडिशल मजिस्ट्रेट के समक्ष पुलिस के व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वो शॉक्ड हैं। उन्होंने इसे ‘हिंसक जानवरों वाली हरकत’ बताते हुए सजा की माँग की।

उधर लोगों ने तमिलनाडु में पटाखे फोड़ कर इस मामले में हुई 5 गिरफ्तारियों के बाद खुशी जताई। तूतीकोरिन की इस घटना के मामले मे बुधवार को सब इन्स्पेक्टर रघु गणेश को बुधवार को धर-दबोचा गया, जिसके बाद इस मामले में न्याय की माँग कर रहे लोग अपनी खुशी का इजहार करने सड़कों पर उतर आए। बता दें कि न सिर्फ़ तमिलनाडु बल्कि पूरे देश में लोग इस हत्याकांड से व्यथित हैं।

मृतक जे बेनिक्स के एक दोस्त राजकुमार ने बताया था– “20 जून को सुबह 7 से 12 बजे के बीच, पिता और पुत्र ने कम से कम सात लुंगियाँ (शरीर के निचले भाग में पहना जाने वाला कपड़ा) बदली थीं, क्योंकि वे अपने मलाशय से खून बहने के कारण गीले हो गए थे।” यह भी दावा किया गया है कि पुलिस हिरासत में उनकी बेरहमी से पिटाई की गई जिससे पिता-पुत्र के जननांग भी क्षतिग्रस्त हो गए थे।

सिर्फ रोटी-कपड़ा-मकान नहीं… रोगजार भी: ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की जिंदगी में ऐसे आया बदलाव

वर्तमान सरकार अनेक कारणों के चलते आलोचना का सामना करती है, भले उन कारणों में तथ्य और तर्क हों या न हों। ऐसा ही एक कारण है ‘ट्रांसजेंडर समुदाय’ के लिए सरकार का रवैया। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए 2014 से PM मोदी की सरकार ने क्या-क्या किया है, लोग शायद भूल गए हैं। लेकिन पिछले 6 वर्षों का काम अब धरातल पर दिखने लगा है।

तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के लिए यह बात स्वीकार करना मुश्किल है कि सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। चाहे परोक्ष रूप से या अपरोक्ष रूप से, गुज़रे कुछ सालों में वर्तमान सरकार ने ऐसे तमाम फैसले लिए हैं, जिनके चलते ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकार बड़े पैमाने पर सुनिश्चित होते हैं। अधिकार ही नहीं इस समुदाय के लोगों के लिए शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसी अहम फायदे भी तय होते हैं।

ट्रांसजेंडर समुदाय समाज का असल वंचित वर्ग है। अब तक जितनी सरकारें भी सत्ता में आई हैं, उनमें वर्तमान सरकार के अलावा किसी दूसरी सरकार की कार्यप्रणाली इनके उत्थान के लिए उल्लेखनीय नहीं रही है। शिक्षा-सुरक्षा-रोजगार हर स्तर पर केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए काम किया है। इनके रोजगार के लिए ही गृह मंत्रालय की ओर से ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए CAPF (Central Armed Police Force) में भर्ती की बात की गई। विभाग अब इस पर मंत्रालय को जवाब देगा।

24 जून 2020 को नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने एक आदेश जारी किया। आदेश के मुताबिक़ सेक्टर 50 मेट्रो स्टेशन ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित होगा। मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर और हाउस कीपिंग सर्विस में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की भर्ती की जाएगी। इस मेट्रो स्टेशन का नाम ‘रेनबो स्टेशन रखा जाएगा। ठीक ऐसे ही पिछले कुछ समय में वैश्विक समूहों से लेकर सरकारी नीतियों तक ट्रांसजेंडरों को काफी प्राथमिकता मिली है। 

ट्रांसजेंडर के लिए विधेयक

सरकार साल 2016 में एक विधेयक लेकर आई थी – ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक! इस क़ानून का उद्देश्य स्पष्ट था – ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करना। इसके बाद रोज़गार मिलने के दौरान उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकना और उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाएँ दिलाना।

भले ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द की नींव 90 के दशक में ही पड़ गई थी लेकिन सरकारों ने इस शब्द के इर्द-गिर्द उतना काम नहीं किया। जहाँ एक ओर दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों में समलैंगिक अधिकारों को मान्यता नहीं मिली है, वहीं हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2018 में धारा 377 को जो पहले आपराधिक था, उसे गैर-आपराधिक बनाया और सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध नहीं माना।     

हालाँकि केवल इतने से देश में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों का विकास सुनिश्चित नहीं होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्ययन के मुताबिक़ देश के 92 फीसदी ट्रांसजेंडर किसी भी तरह के रोज़गार या आर्थिक गतिविधि में शामिल नहीं हैं। इससे भी ज़्यादा हैरान कर देने वाली बात यह है कि जितने गिने-चुने लोग योग्य होते हैं, उन्हें नकार दिया जाता है।

यहाँ समस्या योजनाओं से हट कर आम लोगों के रवैये पर आ जाती है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ देश भर में कुल 4,90,000 ट्रांसजेंडर हैं। सरकारी प्रोत्साहन व न्यायालयों की सख्ती के बाद समय के साथ तमाम बड़े व्यावसायिक समूहों ने ट्रांसजेंडरों के लिए काफी सकारात्मक रुख अपनाया है।

ट्रांसजेंडर व रोजगार

कुछ साल पहले चेन्नई के एक उद्यमी समूह ने 14 महीनों के भीतर कुल 42 ट्रांसजेंडर को प्रशिक्षण पर रखा था। इसके अलावा साल 2017 में कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड ने 23 ट्रांसजेंडर लोगों को रोज़गार दिया था। साल 2017 में ही पश्चिम बंगाल की जोइता मंडल को लोक अदालत में न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

रोजगार सृजन जैसे कामों के अलावा वर्तमान सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इन फैसलों के चलते कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की स्वीकार्यता काफी बढ़ी है। 

साल 2018 में गोदरेज समूह ने एक मैनिफेस्टो जारी किया था, जिसमें इस मुद्दे पर तमाम तथ्य मौजूद थे कि भारतीय कार्य स्थलों पर ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वीकार्यता कैसे बढ़ेगी। इसी साल की शुरुआत में VLCC ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए ‘असिस्टेंट ब्यूटी थेरेपिस्ट’ प्रक्षिक्षण कोर्स तैयार किया थाl। VLCC हैदराबाद शाखा में इस कोर्स के तहत कुल 24 लोगों ने प्रशिक्षण लिया था।

साल 2018 के ही जुलाई महीने में ऊबर इट्स ने चेन्नई में कई ट्रांसजेंडर को डिलीवरी एजेंट के तौर पर रखा था। इसी तरह कुछ साल पहले FICCI और CII ने एक कॉन्क्लेव का आयोजन कराया था। इसमें एक पैनल में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल थे।

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की अर्थव्यवस्था में भागीदारी न होने से भारत को हर साल करोड़ों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है। सरकार इस खाई को भरने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। पहले उन्हें उनके अधिकार मिले और उसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी मिले। ऐसे में यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आम लोग इस तरह के नीति-निर्देशों में सरकार का पूरा साथ दें।     

इस तरह की नीतियों और आँकड़ों से हट कर ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों के नज़रिए में इस समुदाय के प्रति सकारात्मकता बनी रहे। क्योंकि एक सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश में सभी लोगों को बराबरी से जीने का अधिकार है। ऐसे में जब तक आम लोग ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को सामान नज़रिए से नहीं देखेंगे तब तक सामाजिक खाई बनी रहेगी।

इस मामले में सरकारी ढाँचा और क़ानून व्यवस्था एक हद तक ही अपनी भूमिका निभा सकती है। अंतिम ज़िम्मेदारी आम लोगों के कन्धों पर ही आती है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने ‘थर्ड जेंडर’ शब्द देकर ही अपना मत स्पष्ट कर दिया था। बचा हुआ काम हमारा है कि हम इस आदेश को किस हद तक बढ़ावा देते हैं।  

स्वरा भास्कर की एडल्ट कॉमेडी ‘रसभरी’ IMDb पर भी फुस्स, लेकिन जीरो नहीं हो पाएगी रेटिंग

अमेज़न प्राइम वीडियो पर स्वरा भास्कर की हाल ही में रिलीज़ हुए एडल्ट कॉमेडी वेब सीरीज़ ‘रसभरी’ की IMD रेटिंग बुरी तरह से गिरकर 2.6 पर आ गई है। हालाँकि, स्वरा भास्कर के लिए अच्छी खबर यह है कि IMD पर किसी भी फिल्म को ‘जीरो’ रेटिंग नहीं दी जा सकती है, चाहे वह कितनी ही वाहियात और घटिया क्यों ना हो।

IMD पर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से गिर रही ‘रसभरी’ की रेटिंग

यह खबर इस कारण चर्चा का विषय है क्योंकि इस वेब सीरीज में इन्टरनेट पर ऊल-जुलूल ट्वीट कर चर्चा में बनी रहने वाली ‘इंटरनेट वोक-लिबरल’ स्वरा भास्कर मुख्य भूमिका में हैं। आठ एपिसोड की यह वेब सीरीज़ एक तरह की एडल्ट कॉमेडी है। स्वरा भास्कर ने रसभरी में एक ‘हॉट’ अंग्रेजी शिक्षक की भूमिका निभाई है।

गत बृहस्पतिवार को ही अमेज़ॅन प्राइम वीडियो पर ‘रसभरी’ की स्ट्रीमिंग शुरू हुई है। इसमें मेरठ की रहने वाली एक इंग्लिश टीचर शानू (स्वरा) की कहानी बताई गई है, जिसके सपने उसके छात्र, उनके माता-पिता और शहर का लगभग हर आदमी देखता है। इस वेब सीरीज को शांतनु श्रीवास्तव ने लिखा है और निखिल नागेश भट्ट द्वारा निर्देशित किया गया है।

स्वरा भास्कर अपनी हरकतों के कारण ट्विटर पर लगभग हर रोज ही लोगों के निशाने पर रहती हैं और अब मानो उन्होंने यह विवाद ही अपनी पहचान बना डाली है। यही कारण है कि उनकी इस वेब सीरीज के चर्चा में आते ही लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और इसकी IMD रेटिंग गिरा दी। नतीजा यह हुआ कि इस वेब सीरिज के कथानक पर चर्चा की जगह स्वरा भास्कर पर मीम (MEME) बनाए जाने लगे।

हालाँकि, कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने स्वरा भास्कर की यह वेब सीरीज देखी और कहा कि वेब सीरीज पर बनाया जाने वाले ऐसे वाहियात कूड़े को रेटिंग घटाकर बताने की जरूरत नहीं होती कि वह कितनी वाहियात है।

IMDb एक तरह का फिल्म और सिनेमा का डाटाबेस उपलब्ध कराने वाला प्लेटफॉर्म है। IMD पर लोग अक्सर फिल्मों की क्वालिटी देखने के लिए आते हैं जहाँ पर IMDb पर एक से दस के बीच एक रेटिंग प्रणाली है। यहाँ पर किसी फिल्म को 10 स्टार मिलने का मतलब बेहतरीन या सर्वश्रेष्ठ और 1 स्टार का मतलब घटिया होता है।

स्वरा भास्कर की ‘रसभरी’ वेब सीरीज की रेटिंग फिलहाल 2.6 है, जिसका मतलब है कि यह किसी भी समय 1 हो सकती है। यह घटिया साबित होने से अब बस कुछ ही दूर है। यहाँ पर स्वरा भास्कर के लिए अच्छी खबर यह है कि IMDb पर किसी भी फिल्म को जीरो रेटिंग नहीं दी जा सकती है, चाहे वह कितनी ही वाहियात और घटिया क्यों ना हो। इसलिए यह हर हाल में स्वरा भास्कर की ही जीत मानी जा सकती है।

शिवराज सरकार के सौवें दिन हुआ मंत्रिमंडल का विस्तार, 28 विधायकों ने ली मंत्री पद की शपथ, सिंधिया भी रहे मौजूद

कोरोना काल में मध्य प्रदेश के सीएम पद की शपथ लेने वाले शिवराज सिंह चौहान की सरकार के 100 दिन पूरे होने पर एक बार फिर मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। इस बार शिवराज के मंत्रिमंडल में 28 विधायकों को मंत्री बनने का अवसर मिला है।

गुरुवार (2 जुलाई, 2020) को मध्य प्रदेश की राज्यपाल (अतिरिक्त प्रभार) आनंदी बेन पटेल ने राजभवन में कुल 28 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई, जिसमें 20 कैबिनेट मंत्री, 8 राज्य मंत्री शामिल हैं। इन मंत्रियों में गोपाल भार्गव, विजय शाह, यशोधरा राजे सिंधिया समेत कई बड़े नेताओं का नाम प्रमुख रूप से शामिल है। शपथ ग्रहण के दौरान कॉन्ग्रेस से बीजेपी में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद रहे।

दरअसल, कॉन्ग्रेस की कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने 23 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, इसके कुछ दिनों के बाद ही 5 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं। इस लिहाज से अधिकतम 35 विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है। वहीं गुरुवार को 28 मंत्रियों के शपथ ग्रहण के साथ अब शिवराज के मंत्रिमंडल में 34 मंत्री हो गए हैं।

मंत्री बनाए गए विधायकों के नाम और उनके बारे में जानकारी:

  • 1.गोपाल भार्गव (कैबिनेट), पिछली शिवराज सरकार में सामाजिक न्याय पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री थे।
  • 2. विजय शाह (कैबिनेट) बीजेपी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री थे।
  • 3. जगदीश देवड़ा (कैबिनेट) दो बार देवड़ा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं।
  • 4. प्रेम सिंह पटेल (कैबिनेट) प्रेम सिंह पटेल भी शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं।
  • 5. यशोधरा राजे (कैबिनेट) मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रही है। जीवाजी राव सिंधिया और स्वर्गीय राजमाता राजे सिंधिया की बेटी है।
  • 6.भूपेन्द्र सिंह (कैबिनेट) भूपेन्द्र आईटी और परिवहन विभाग के लिए मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं।
  • 7.अरविंद सिंह भदोरिया (कैबिनेट)
  • 8. एदल सिंह कसाना (कैबिनेट)
  • 9.ओपी सकलेचा (कैबिनेट मंत्री)
  • 10:बृजेंद्र प्रताप सिंह (राज्य मंत्री) प्रताप सिंह को अक्टूबर 2009 में शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में किसान कल्याण एवं कृषि विकास राज्यमंत्री के रूप में शमिल किया गया था।
  • 11.विश्वास सारंग (कैबिनेट मंत्री) मध्य प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे।
  • 12.ऊषा ठाकुर (राज्य मंत्री)
  • 13.मोहन यादव (कैबिनेट मंत्री)
  • 14.भारत सिंह कुशवाह (राज्य मंत्री)
  • 15.इंदर सिंह परमार (राज्य मंत्री)
  • 16.रामखिलावन पटेल (राज्य मंत्री)
  • 17.हरदीप सिंह डांग (राज्य मंत्री)
  • 18.रामकिशोर कांवरे (राज्य मंत्री)
  • 19.राज्यावर्धन दत्तीगांव (राज्य मंत्री)
  • 20.प्रभुराम चौधरी (कैबिनेट) प्रभु राम चौधरी पिछली कॉन्ग्रेस सरकार की कमलनाथ में शिक्षा मंत्री थे।
  • 21.इमरती देवी (कैबिनेट) कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई इमरती देवी पिछली कॉन्ग्रेस सरकार में भी मंत्री रही हैं।
  • 22.प्रद्युमन सिंह तोमर (कैबिनेट) तोमर ने कमलनाथ सरकार में 25 दिसंबर 2018 को मंत्री पद की शपथ ली थी।
  • 23.महेंद्र सिसोदिया (कैबिनेट) सिसोदिया पिछली मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार में श्रम मंत्री रह चुके हैं।
  • 24..बृजेन्द्र यादव (राज्य मंत्री)
  • 25.सुरेश धाकड़ (राज्य मंत्री)
  • 26. ओपी भदौरिया (राज्य मंत्री)
  • 27.बिसाहू लाल सिंह (कैबिनेट)
  • 28. गिर्राज दंडोतिया

वामपंथी मीडिया गिरोह आतंकियों को क्लीन चिट देने के लिए 3 साल के बच्चे का इस्तेमाल कर रहा है

कश्मीर घाटी में इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकवादियों को निर्दोष और मजबूर साबित करने का जो काम इतने वर्षों तक बॉलीवुड की फिल्में किया करती थीं, वही जिम्मेदारी अब वामपंथी मीडिया गिरोहों ने सम्भाल ली है।

इनका पहला कर्तव्य यह साबित करना तो है ही कि कश्मीर घाटी में सुरक्षबलों द्वारा मारे जाने वाले आतंकवादी निर्दोष होते हैं। साथ ही आतंकवादियों के ‘मानवीय’ चेहरे के नैरेटिव को दिशा देने का काम भी वामपंथी मीडिया संगठनों द्वारा किया जा रहा है।

इसका सबसे ताजा उदाहरण कल ही कश्मीर के सोपोर में आतंकवादियों की गोली से मारे गए 65 वर्षीय बशीर अहमद का मामला है। बुधवार (जुलाई 01, 2020) की सुबह सोपोर में आतंकवादियों द्वारा घात लगाकर CRPF के एक गश्ती दल पर हमला कर दिया गया। इस हमले में दोनों ओर से गोलियाँ चलीं, जिसमें सीआरपीएफ के एक जवान की मौत हो गई और दो घायल हो गए। 

सीआरपीएफ के एडीजी जुल्फिकार हसन ने बशीर अहमद को गोली लगने को लेकर कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। उन्होंने कहा – “मुझे लगता है कि कुछ लोगों ने यह कहकर एक स्पिन देने की कोशिश की है कि सीआरपीएफ ने एक नागरिक को वाहन से बाहर निकाला और गोली मार दी। यह पूरी तरह से असत्य है।”

दरअसल, आतंकियों की गोली से 65 वर्षीय बुजुर्ग की भी मौत हुई है। जब यह हादसा हुआ, उस समय 65 वर्षीय बशीर अहमद खान अपने 3 साल के नाती के साथ बाजार जा रहे थे।

गोलियों की आवाज से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। मुस्तफाबाद एचएमटी श्रीनगर निवासी ठेकेदार बशीर अहमद खान भी अपने नाती को लेकर कार से बाहर निकले और भागने लगे, लेकिन आतंकियों द्वारा की जा रही फायरिंग की चपेट में आ गए और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

बशीर अहमद का लहूलुहान शरीर गोली लगने के बाद वहीं सड़क पर गिर पड़ा और उनका 3 साल का नाती उनके शव के ऊपर बैठा रहा। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत शेयर की जा रही है।

CRPF के जवानों ने तीन साल के बच्चे को आतंकवादियों की गोलियों से बचाया और सुरक्षित घर ले आए। यहाँ से वामपंथी मीडिया गिरोहों ने अपनी पोजिशन संभाली और इसका नतीजा हम देख रहे हैं कि बशीर अहमद की मौत के लिए CRPF को ही दोषी ठहराने का कारनामा किया जा रहा है।

जब वामपंथी मीडिया समेत तमाम उदारवादी विचारकों को इस्लामी आतंकवादियों द्वारा भरे बाजार में नागरिकों की हत्या पर चर्चा कर उसे धिक्कारने का काम करना था, तब मीडिया ने वास्तविक समस्या को नजरअंदाज कर, उसे आवरण देते हुए एक बेहद फर्जी नैरेटिव को उछालना जरूरी समझा।

मीडिया गिरोह प्रमुख ‘द वायर’ का कहना है कि तीन साल के बच्चे ने कहा कि उसने देखा कि पुलिस ने उनके नाना को गोली मारी। यहाँ पर सबसे पहली और बेहद अमानवीय बात तो यही है कि द वायर ने तीन साल के एक बच्चे से यह उम्मीद की है कि वो पुलिस और आतंकवादियों में स्पष्ट रूप से फर्क कर सकता है।

वह भी तब, जब कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब कश्मीर घाटी में आतंकियों को पुलिस की यूनिफॉर्म में ही कई बार पकड़ा जा चुका है। ऐसे में भारतीय सुरक्षाबलों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बयानों को दरकिनार कर तीन साल के एक बच्चे के बयान को आधार बनाना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वामपंथी मीडिया का पहला मकसद क्या है।

सत्ता विरोध के लिए वामपंथ ने आतंकवादियों को सुरक्षाकवच देना और षड्यंत्रों के माध्यम से उन्हें क्लीन चिट देने के अपने अभियान को कई समय से जर्नलिज़्म का नाम दिया है। जबकि वास्तविकता सिर्फ यह है कि उन्हें न ही आतंकियों की गोली से मारे गए बशीर अहमद की मौत से फ़र्क़ पड़ता है, न ही शव के ऊपर बैठकर रो रहे तीन साल के बच्चे की विभत्स तस्वीर से फ़र्क़ पड़ता है।

मीडिया और प्रपंचकारियों का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है और वो यह कि सत्ता और संस्थाओं को बदनाम कर किसी तरह से प्रासंगिक बना रहा जाए।

₹45300 करोड़ रुपए का घाटा TikTok वाली कम्पनी को, सभी 59 चायनीज ऐप के लिए भारत था सबसे बड़ा मार्केट

लद्दाख स्थित गलवान घाटी में चीन के सैनिकों की करतूतों के कारण भारतीय सेना से हिंसक झड़प के बाद भारत-चीन के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया। भारत ने हाल ही में चीन के 59 एप को बैन करने का निर्णय किया, जिससे चीनी कंपनियों को तगड़ा झटका लगा है।

भारत के इस फ़ैसले के बाद से ही चीन की परेशानी साफ़ झलक रही है। चीन के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अब माना है कि भारत में प्रतिबंधित किए जाने के बाद TikTok की पैरेंट कंपनी Bytedance को 600 करोड़ डॉलर (मतलब आज की करेंसी एक्सचेंज के अनुसार लगभग 45300 करोड़ रुपए) का नुकसान हो सकता है। 

चीन सरकार के अनाधिकारिक प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले और भारत को समय-समय पर झूठी गीदड़ भभकी देने वाले अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने ट्वीट कर के बताया है कि पिछले महीने लद्दाख में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हिंसक संघर्ष के बाद भारत सरकार की तरफ से चीन के 59 एप पर प्रतिबन्ध लगाने से TikTok की पैरंट कंपनी बाइटडांस को 6 अरब डॉलर (45,300 करोड़ रुपए) का बड़ा नुकसान हो सकता है। 

बता दें कि प्रतिबंधित किए जाने से पहले टिकटॉक भारत में काफी मशहूर वीडियो एप्लिकेशन था, जिसकी पहुँच सुदूर गाँवों तक थी। इस एप के लगभग 20 करोड़ यूजर्स अकेले भारत में थे, जो इस एप पर शॉर्ट वीडियोज अपलोड कर के मनोरंजन करते थे।

टिकटॉक के अलावा अन्य प्रतिबंधित चायनीज एप की बात करें तो डॉक्यूमेंट स्कैनर ‘कैमस्कैनर’ के भी भारत में 10 करोड़ यूजर थे। हालिया जून में ही 40 लाख लोगों ने इसे इनस्टॉल किया था। इसने अब तक 19.49 लाख डॉलर सिर्फ यूजरों द्वारा एप पर खर्च की गई राशि से बनाए थे। इसमें एडवरटाइजमेंट और अन्य राजस्व शामिल नहीं है। इससे आप इसकी कमाई का अंदाज़ लगा सकते हैं।

जहाँ तक यूसी ब्राउज़र की बात है, पूरी दुनिया में इसके 43 करोड़ यूजर हैं और उनमें से 13 करोड़ तो अकेले भारत में हैं। इसे भी सरकार ने बैन किया है। भारत में ये इतना हावी है कि गूगल क्रोम के बाद सबसे बड़ा बाज़ार इसका ही है। 14.5% मार्किट शेयर के साथ ये भारतीय बाजार पर कब्जा किए बैठा था। अकेले जून 2020 में 61 लाख लोगों ने इसे इनस्टॉल किया था।

बिंगो लाइव भी एक वीडियो स्ट्रीमिंग एप है, जिसने सलमान खान फिल्म्स के साथ मिल कर ‘दबंग 3’ का प्रमोशन किया था। Likee को जून में 61 लाख नए इनस्टॉल मिले थे और बिंगो लाइव को 21 लाख नए इनस्टॉल मिले थे। इसी तरह Helo एप के भी भारत में 5 करोड़ यूजर थे।

केंद्र सरकार ने बीते दिनों इस एप पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद लिबरल गिरोह आग-बबूला हो उठा। इसके अलावा हेलो, यूसी न्यूज, यूसी ब्राउजर समेत 58 और चीनी ऐप को प्रतिबंधित कर दिया था। 

इधर वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार (जुलाई 1, 2020) को कहा कि वो चीनी ऐप टिकटॉक की तरफ से कोर्ट में पैरवी नहीं करेंगे। सिंघवी ने बताया कि टिकटॉक के लिए उन्होंने एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की थी और वे जीते भी थे। हालाँकि, इस बार वो कोर्ट में चीनी ऐप के लिए खड़े नहीं होंगे।

इससे पहले देश के शीर्ष वरिष्ठ अधिवक्ताओं में शुमार पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी चीनी ऐप टिकटॉक का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। रोहतगी ने बुधवार को कहा कि वह एक चीनी ऐप के लिए भारत सरकार के खिलाफ अदालत में खड़े नहीं होंगे। 

जहाँ एक तरफ भारत में कुछ प्रपंची वामपंथी और विपक्षी नेता ये कह रहे थे कि मोदी सरकार द्वारा 59 चीनी एप्लिकेशंस को बैन करने से चीन का क्या बिगड़ जाएगा, वहीं दूसरी तरफ चीन भारत के इस क़दम से बौखला गया है और उसने अपने बयान में कहा है कि वो जल्द ही इसकी पूरी समीक्षा कर के आगे क़दम उठाएगा। चीन ने कहा है कि वो भारत सरकार के इस क़दम से ख़ासा चिंतित है।

जिनके प्रभारी रहते राहुल गाँधी ने गँवाई अमेठी की सीट, अब वो करेंगी लखनऊ से राजनीति

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा को मिले आदेश के मुताबिक़, उन्हें सरकारी घर खाली करना है। लगभग साल भर पहले उनकी एसपीजी सुरक्षा भी वापस ली गई थी, इन दो घटनाओं के बाद राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा हो रही है।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अब वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की ओर रुख कर सकती हैं। साल 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं और यहाँ कॉन्ग्रेस पहले ही बहुत बेहतर स्थिति में नहीं है। 

साल 2019 के दौरान हुए आम चुनावों में प्रियंका गाँधी वाड्रा को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था। प्रदेश में प्रचार से लेकर पार्टी की नींव मज़बूत करने तक सारी ज़िम्मेदारी प्रियंका गाँधी की थी। लेकिन नतीजा यह निकला कि राहुल गाँधी परिवार की सुरक्षित सीट अमेठी तक गँवा बैठे।

प्रियंका गाँधी के उत्तर प्रदेश प्रभारी रहते हुए अमेठी की तुलना में केरल का वायनाड ज़्यादा बेहतर विकल्प साबित हुआ। वायनाड के सहारे राहुल गाँधी कम से कम संसद तक पहुँच गए, नहीं तो वहाँ भी अपनी मौजूदगी नहीं दर्ज करा पाते।

2019 के आम चुनावों में कॉन्ग्रेस कुछ इस हद तक बैकफुट पर आ गई कि उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में केवल 2 सीटें ही जीत पाई। एक सीट रायबरेली से सोनिया गाँधी ने जीती थी और वह भी कॉन्ग्रेस की सुरक्षित सीट ही मानी जाती है।

कॉन्ग्रेस का नेतृत्व ऐसा मानता है कि प्रियंका गाँधी वाड्रा में तमाम गुण उनकी दादी इंदिरा गाँधी जैसे हैं। कॉन्ग्रेस से जुड़े लोगों के मुताबिक़ अगर पार्टी को कोई मज़बूत कर सकता है तो वह प्रियंका ही हैं, जबकि बुनियादी स्तर पर उनकी रणनीतियों का असर कम ही देखने को मिलता है।

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की हालत सुधारने की कोशिश में अक्सर वह आम लोगों के सामने झूठे तथ्य, गलत ख़बरें और गलत जानकारियाँ रखती हैं। कोरोना वायरस का प्रभाव बढ़ने के बाद प्रियंका ने योगी सरकार को मज़दूरों के मुद्दे पर घेरने का पूरा प्रयास किया था।

इस मुद्दे पर प्रियंका ने वादा किया था कि वह मज़दूरों को घर वापस भेजने के लिए बस की व्यवस्था कराएँगी लेकिन उनका यह वादा बहुत भरोसेमंद साबित नहीं हुआ। उनके द्वारा दी गई तमाम गाड़ियों का पंजीयन तक ख़त्म हो चुका था। इतना ही नहीं, कुछ गाड़ियाँ तो दो पहिया और तीन पहिया वाहन थे। काफी विवाद होने के बाद उन्हें अपने वाहन वापस बुलाने पड़े थे।

प्रियंका गाँधी वाड्रा साल 1997 से सरकारी बंगले में रह रही थीं। इसके अलावा उन्हें एसपीजी की विशेष सुरक्षा भी मिली हुई थीl यह भी उल्लेखनीय है कि उन्हें इस तरह की तमाम सुविधाएँ तब मिली हुई थीं, जबकि वह किसी सरकारी या प्रशासनिक पद पर भी नहीं थीं।

कुछ समय पहले कॉन्ग्रेस के एक नेता ने सुझाव दिया था कि वह राज्यसभा की सदस्य बन कर सरकारी सुविधाओं का लाभ ले सकती हैं। हालाँकि फिलहाल जिस तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं उनके हिसाब से प्रियंका गाँधी अब उत्तर प्रदेश में ही रहने वाली हैं। ज़्यादा संभावनाएँ हैं कि वह कौल आवास में रह सकती हैं, जो कि इंदिरा गाँधी की मामी शीला कॉल का हैl वह भी कॉन्ग्रेस की सदस्य थीं। अभी यह तय नहीं है कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा और बच्चे उनके साथ जाएँगे या नहीं।