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‘ड्रैगन का पैटर्न’: सिर्फ भारत नहीं, इन 20 देशों के साथ भी है चीन का जमीन को लेकर विवाद, डोनाल्ड ट्रम्प ने साधा निशाना

भारत-चीन सीमा विवाद मामले में अमेरिका ने खुले तौर पर अब भारत का समर्थन किया है। यूएस स्टेट सेक्रेट्री माइक पोम्पियो ने तो चीनी आक्रामकता का जवाब देने के लिए एशिया में न सिर्फ अपनी सेना की तैनाती बढ़ाने की चेतावनी दी है, बल्कि वहाँ कई सीनेटरों ने भारत के पक्ष में बिल प्रस्तुत किया है।

इसी कड़ी में गुरुवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से सीमा विवाद को लेकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भारत-चीन सीमा पर चीन का आक्रामक रुख दुनिया के अन्य हिस्सों में चीनी आक्रामकता के पैटर्न के साथ फिट बैठता है। ये कारनामें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की वास्तविक प्रकृति की पुष्टि करती है।

उल्लेखनीय है कि यहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ विवाद में चीन के जिस पैटर्न का उल्लेख किया है। उसके संबंध में बीजिंग वाचर्स में भी चर्चा है। बीजिंग वाचर्स के मुताबिक, चीन पारंपरिक रूप से विदेशियों के खिलाफ ज़ेनोफोबिया से पीड़ित है। अब चूँकि मध्य साम्राज्य की आशंकाएँ पिछली दो शताब्दियों में समाप्त हो गई थीं, उसी के परिणामस्वरूप चीन का मानना रहा कि वह दुनिया की एकमात्र सभ्यता शक्ति है और बाकी या तो सहायक राज्य या बर्बर हैं।

चीन के ऐसे रवैये के कारण उसके जमीनों और समुद्रों को लेकर पूरे 20 अन्य पड़ोसी देशों (भारत छोड़कर) से भी विवाद हैं। आज उन्हीं देशों व उनसे जुड़े विवादों पर हम आपका ध्यान आकर्षित करवा रहे हैं।

चीन- ब्रुनेई : स्प्रैटली नाम के द्वीप समूह के दक्षिणी भाग के लिए चीन अपना दावा करता है। वहीं दूसरी ओर, ब्रुनेई दक्षिण चीन सागर के हिस्से को अपने महाद्वीपीय शेल्फ और विशेष आर्थिक क्षेत्र के हिस्से के रूप में दावा करता है।

चीन-फिलीपींस: चीन और फिलीपींस के बीच दक्षिण चीन सागर के कुछ हिस्सों पर आपसी विवाद है। जिनमें स्प्रैटली द्वीप समूह भी शामिल है। फिलीपींस इस विवाद को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में ले जा चुका है, जहाँ उन्होंने केस भी जीता लेकिन चीनी पक्ष ने फिर आईसीजे के आदेश का पालन नहीं किया। चीन द्वारा दिए गए आर्थिक प्रोत्साहन के बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव जारी है।

चीन- इंडोनेशिया: इंडोनेशिया से चीन का विवाद नटूना सी यानी दक्षिण चीन सागर के उत्तरी क्षेत्र को लेकर भी है। चीन द्वीपों के पास पानी में मछली पकड़ने के अधिकार का दावा करता है। लेकिन इंडोनेशिया सरकार का तर्क है कि 1982 के संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के तहत चीन के दावों को मान्यता नहीं दी जाती है।

चीन-मलेशिया: मलेशिया के साथ चीन विवाद भी चीन सागर के दक्षिणी हिस्सों खासकर स्प्रैटली द्वीप को लेकर ही है। मलेशिया में तीन द्वीपों पर सेना की तैनाती है क्योंकि वह इसे महाद्वीपीय शेल्फ का हिस्सा मानते हैं।

चीन-सिंगापुर: वैसे सिंगापुर दक्षिण चीन सागर विवादों में कोई दावेदार राष्ट्र नहीं है, लेकिन वह संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ करीबी से जुड़ा हुआ है और अपने पानी में अमेरिकी नौसेना बलों की उपस्थिति को अनुमति देता है।

लाओस-चीन: चीन 1271-1368 के दौरान चीन के युआन राजवंश के ऐतिहासिक मिसाल देकर लाओस के बड़े क्षेत्रों का दावा करता है।

कंबोडिया-चीन: चीन समय-समय पर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (1368 से 1644 में चीन के मिग राजवंश) का हवाला देकर कंबोडिया देश के कई हिस्सों पर दावा करता है।

थाईलैंड-चीन: थाईलैंड अपने भू-भाग वाले युन्नान प्रांत से थाईलैंड, लाओस और शेष दक्षिण पूर्व एशिया में बंदरगाहों तक माल ले जाने के लिए 2001 से मेकांग नदी पर चीन का विरोध करता है। खबरों के अनुसार, चीन ने वहाँ मेकांग नदी पर हाइड्रोपावर बाँध बना लिए हैं।

जापान-चीन: जापान का विवाद चीन के साथ पूर्वी चीन सागर में मुख्यत: सेनकाकू द्वीप, रयूकी द्वीप को लेकर है।

वियतनाम-चीन: चीन की विस्तारवादी नीति के चलते उसका वियतनाम से भी विवाद चल रहा है। दोनों देशों के बीच 1979 में युद्ध भी हो चुका है। राजनयिक संबंधों के बावजूद चीन और वियतनाम में समुद्री क्षेत्र को लेकर काफी लंबे वक्त से विवाद है।

नेपाल-चीन: नेपाल और चीन के पास दोलखा में माउंट एवरेस्ट के आसपास के क्षेत्र में सीमा मुद्दे लंबित हैं। हालाँकि, ऐसी खबरें हैं कि चीन ने नेपाल के 12 स्थानों पर रणनीतिक रूप से अवैध रूप से कब्जा कर लिया है।

ताइवान-चीन: वैसे तो चीन पूरे ताइवान पर ही अपना दावा करता है। लेकिन विशेष रूप से ताइवान का विवाद मैकलेसफील्ड बैंक, पेरासेल द्वीप, स्कारबोरो शोल, दक्षिणी चीन सागर व स्प्रैटली द्वीप को लेकर है।

नॉर्थ कोरिया-चीन: दोनों देशों के बीच माउंट पेकतु और यलू और तुमान नदियों पर विवाद जारी है। चीन ने बाखू पर्वत और जियानडाओ पर भी दावा किया है।

साउथ कोरिया-चीन: साउथ कोरिया और चीन के मध्य विवाद पूर्वी चीन सागर में लेओडो (सोकोट्रा रॉक) को लेकर है।

मंगोलिया-चीन : वैसे मंगोलिया और चीन के बीच का सीमा विवाद अब सुलझ चुका है। लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ (युआन राजवंश 1271-1368) में चीन मंगोलिया पर दावा करता है।

भूटान-चीन विवाद: चीन ने हाल ही में भूटान (Bhutan) की एक नई जमीन पर अपना दावा ठोका है। ग्लोबल इन्वायरमेंट फैसिलिटी काउंसिल की 58वीं बैठक के दौरान बीजिंग ने भूटान के सकतेंग वनजीव अभयारण्य (Sakteng Wildlife Sanctuary) की जमीन को विवादित बताते हुए इसकी फंडिंग का विरोध किया। हालाँकि, भूटान ने चीन की इस चाल पर कड़ा विरोध जताया है। उसका कहना है कि अभयारण्य की जमीन हमेशा से उसकी थी और आगे भी रहेगी।

ताजिकिस्तान-चीन: साल 1884 में दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय विवाद हुआ था। उस समय किंग राजवंश और ज़ारिस्ट रूस के बीच सीमा सीमांकन समझौते ने स्पष्ट परिभाषा के बिना आबादी वाले पूर्वी पामीर में सीमा के बड़े क्षेत्रों को छोड़ दिया था। अब चीन इसपर अपना दावा बताता है।

कजाकिस्तान-चीन : चीन ने कजाकिस्तान के एक क्षेत्र में सेमीराइची से लेकर बाल्ख्श झील तक 34,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करने का दावा किया है। मई 2020 में, एक चीनी वेबसाइट ‘Sohu.com’ ने एक लेख प्रकाशित किया जिसमें दावा किया गया कि कजाकिस्तान उन क्षेत्रों पर स्थित है जो ऐतिहासिक रूप से चीन से संबंधित हैं।

किर्गिस्तान चीन: चीन पूरे किर्गिस्तान क्षेत्र पर दावा करता है। मई 2020 में, चीनी वेबसाइट tutiao.com ने इस तरह के दावे पर एक लेख प्रकाशित किया और तर्क दिया कि हान राजवंश के तहत, रूसी साम्राज्य द्वारा कब्जा करने से पहले पूरा किर्गिज़ क्षेत्र चीनी मुख्य भूमि का हिस्सा था।

रूस-चीन: 1991 और 1994 में द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बावजूद रूस-चीन के बीच कुछ मामले काफी विवादस्पद है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कई समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बावजूद चीन द्वारा 160,000 वर्ग किमी अभी भी एकतरफा दावा किया जाता है।

59 ऐप बैन करने से तिलमिलाया चीन: भारत के चीनी राष्ट्रवादियों को अजीत भारती का जवाब | Ajeet Bharti on India’s war on China

चीनी ऐप टिकटॉक समेत 59 बैन होने के बाद भारत में बैठे चीनी राष्ट्रवादी बोलने लगे कि ऐप बैन करने से क्या होगा? तो बता दें कि इसका इतना बड़ा फर्क पड़ा कि अपनी सेना का गुणगान करने वाले चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स को बयान जारी करना पड़ गया कि यह गंभीर चिंता का विषय है। इसके लिए हम भारत को WTO तक खींच कर ले जाएँगे।

चीन जैसे प्रसारवादी देश के लिए पैसा ही सब कुछ है। सौनिकों के मरने पर कुछ नहीं बोला और ऐप बैन होने पर तिलमिला उठा। सिर्फ ByteDance, जिसका टिकटॉक और हैलो ऐप है, को लगभग 6 बिलियन डॉलर (₹45 हजार 300 करोड़) का नुकसान हुआ है। ByteDance ने भारत में लगभग 7.5 करोड़ रुपए इनवेस्ट किए हैं। यहाँ पर उनकी प्रति दिन की कमाई ₹2.5 करोड़ थी। केवल ByteDance के भारत में 20 करोड़ यूजर्स हैं।

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक कर देखें।

CAA हिंसा के 57 आरोपितों से योगी सरकार वसूलेगी पूरा नुकसान: 5 से की गई ₹1 करोड़ 54 लाख की रिकवरी, दुकानों की हुई कुर्की

पिछले साल दिसंबर महीने में सीएए-एनआरसी के विरोध के नाम पर सड़कों पर हिंसा करने वाले आरोपितों पर योगी सरकार ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। हिंसा में शामिल 57 आरोपितों से लखनऊ जिला प्रशासन ने 1 करोड़ 55 लाख रुपए की रिकवरी का आदेश जारी किया है। मामले में कार्रवाई करते हुए प्रशासन ने गुरुवार (02 जुलाई, 2020) को एक आरोपित की दुकान को कुर्क कर दिया।

जानकारी के मुताबिक नफीस अहमद नाम के आरोपित पर सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान का 64 लाख 35 हजार रुपए बकाया है। प्रशासन की ओर से जारी किए गए नोटिस के बाद भी आरोपित द्वारा रकम जमा न कराने के बाद प्रशासन ने गुरुवार को उसकी दुकान की कुर्की कर दी। दरअसल, कुर्की की यह कार्रवाई अपर जिलाधिकारी ट्रांस गोमती विश्व भूषण मिश्रा के आदेश पर की गई है। अब तक प्रशासन ने पाँच आरोपितों की संपत्ति को कुर्क किया है। इनकी 16 जुलाई को नीलामी की जाएगी।

सदर तहसीलदार शंभू शरण सिंह ने बताया कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों के मामले में 57 लोगों के खिलाफ वसूली का नोटिस जारी किया गया था। उनमें से हसनगंज इलाके में दो संपत्तियों को मंगलवार (30 जून, 2020) को कुर्क कर दिया गया। साथ ही यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी। उन्होंने बताया कि जिन संपत्तियों को कुर्क किया गया, उनमें एन वाई फैशन सेंटर नाम की कपड़ों की दुकान और एक अन्य दुकान शामिल हैं।

दरअसल एनवाई फैशन सेंटर के सहायक भंडार प्रबंधक धर्मवीर सिंह पर 21 लाख 76 हजार रुपए की आरसी जारी की गई थी। दूसरी ओर माहेनूर चौधरी सीएए विरोधी हिंसा के मामले में आरोपित हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल 19 दिसंबर को सीएए-एनआरसी विरोध के नाम पर हुई हिंसा के मामले में लखनऊ प्रशासन ने 50 आरोपितों को वसूली नोटिस जारी किया था। मार्च में जिला प्रशासन ने आरोपियों के पोस्टर शहर के चौराहों पर लगवाए गए थे, लेकिन कोरोना वायरस महामारी के चलते इलाहाबाद हाईकोर्ट के सुझाव पर लखनऊ जिला प्रशासन ने 20 मार्च को तमाम वसूली और कुर्की की प्रक्रिया को अस्थाई तौर पर रोक दिया गया था।

पुलवामा हमले में जैश आतंकी की मदद करने वाले मो. इकबाल को NIA ने किया गिरफ्तार

पुलवामा हमले की जाँच में जुटी National Investigation Agency को एक बड़ी सफलता मिली है। NIA ने पुलवामा आतंकी हमले के केस में एक और आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। अब तक इस मामले में कुल 6 आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

आरोपित की पहचान मोहम्मद इकबाल राठेर के रूप में हुई है। वो जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ के फुतलीपुरा इलाके का निवासी है। जिसे गुरुवार को जम्मू में एनआईए की विशेष अदालत के समक्ष जेल अधिकारियों द्वारा पेश किया गया और उसके बाद उसे पूछताछ के लिए सात दिनों तक एजेंसी की हिरासत में भेज दिया गया।

NIA द्वारा जारी प्रेस रिलीज के अनुसार, मो इकबाल पर आरोप है कि उसने जैश ए मोहम्मद के आतंकवादी और अहम साजिशकर्ता मोहम्मद उमर फारूक की मूवमेंट में मदद की।

शुरुआती जाँच में पता चला है कि मोहम्मद इकबाल लगातार पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश से मैसेजिंग ऐप के जरिए संपर्क में था। वह JeM के “परिवहन मॉड्यूल” का भी हिस्सा था।

बता दें, साल 2019 में पुलवामा में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने आत्मघाती आतंकी हमलें को अंजाम दिया था। इस हमलें में सीआरपीएफ के 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। भारत ने इस हमले का 14 दिनों के भीतर बदला ले लिया था।

14 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद 26 फरवरी को पाकिस्तान के बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर 1000 किलो का बम बरसाया था, जिससे करीब 200-300 आतंकी मारे गए थे।

दो धर्मों का झगड़ा नहीं था दिल्ली का हिन्दू विरोधी दंगा, ये नक्सली-जिहादी गठजोड़ का एक प्रयोग था

दिल्ली में इस साल के शुरू में हुए दंगों की चार्जशीट का काम अब लगभग पूरा हो चुका है। जाँच में जो बातें मोटे तौर पर सामने आई हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह कोई आम सांप्रदायिक दंगा नहीं था। वास्तव में ये अपनी तरह का पहला दंगा था। जिसकी साजिश रचने वालों को किसी मजहब के खाँचे में नहीं डाला जा सकता। वास्तव में शहरी नक्सली (Urban Naxal) इन दंगों के मास्टरमाइंड थे।

आम तौर पर सांप्रदायिक दंगों के पीछे कोई स्थानीय कारण जिम्मेदार होता है। जो षड़यंत्र होते हैं वो भी बहुत तात्कालिक होते हैं। लेकिन यह संभवत: पहली बार हुआ कि कोई बड़ा स्थानीय कारण दिखाई नहीं देता है। अगर नागरिकता कानून को कारण मान भी लें तो जहाँ दंगे हो रहे थे और जो दंगाई पकड़े गए हैं उनमें से किसी की भी नागरिकता संकट में नहीं थी। नागरिकता कानून बहाना जरूर था, लेकिन निशाना कुछ और था।

दिल्ली दंगों के आरोप पत्रों में बार-बार उन तत्वों की झलक मिलती है जो इसकी भूमिका तैयार कर रहे थे। उन्हें विदेशी शक्तियों से पैसे भी मिल रहे थे। देसी-विदेशी मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग उनके मनमुताबिक माहौल बना रहा था।

एक रणनीति के तहत दिल्ली के समुदाय विशेष बहुल इलाके के लोगों को इस्तेमाल किया गया और सही दिन चुनकर हिंसा कराई गई, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली में थे। दंगों के दौरान मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रयोग की गई शब्दावली भी शहरी नक्सलियों वाली थी। हमलावर होने के बावजूद खुद को पीड़ित की तरह दिखाने में नक्सली माहिर होते हैं।

शहरी नक्सलियों की खूबी होती है कि वो किसी जगह कुछ समय के लिए अराजकता का माहौल बना सकते हैं। लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींच सकते हैं, लेकिन व्यापक जनसमर्थन न होने के कारण वो कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाते। हालाँकि, षड्यंत्र रचने में उनका कोई तोड़ नहीं होता। उन्हें हमेशा कुछ ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जिन्हें मोहरा बनाया जा सके।

दिल्ली के मामले में समुदाय विशेष का एक बड़ा वर्ग इसके लिए ख़ुशी-खुशी तैयार हो गया। बिना यह सोचे कि मुद्दा क्या है और क्या इससे उनके जीवन पर कोई फ़र्क़ पड़ने वाला है। इस तरह एक गठजोड़ बन गया जो नागरिकता क़ानून के नाम पर न सिर्फ़ मज़हबी नारे लगा रहा था बल्कि देश तोड़ने की बातें भी बड़े सहज रूप से बोली जा रही थीं।

अगर 14 दिसंबर को रामलीला मैदान में सोनिया गाँधी और अगले दिन शाहीन बाग में आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान के भाषणों को सुनें तो दोनों में कमाल की समानता पाएँगे। लगता है मानो दोनों स्क्रिप्ट किसी एक ही व्यक्ति ने लिखी हैं। सोनिया गाँधी ने रैली के मंच से अपील की कि लोग देश की संसद में पास नागरिकता क़ानून के विरोध में सड़कों पर उतरें।

एक दिन बाद उसी बात को अमानतुल्लाह खान ने अपने तरीक़े से कहा। उसने बस यह विस्तार दे दिया कि “अगर सड़कों पर नहीं उतरे तो मस्जिदों से अजान नहीं होगी। औरतों को बुर्का पहनने पर रोक लग जाएगी”। पिछले कुछ समय से अर्बन नक्सली देशभर में अपनी छोटी-छोटी सभाओं, सेमिनारों और मीडिया के माध्यम से यही माहौल बनाने में जुटे थे। 15 दिसंबर की हिंसा, फिर शाहीन बाग़ का चक्का जाम और उसके बाद ट्रंप की यात्रा पर दंगे इसी सोच से संचालित थे।

पुलिस के आरोप पत्रों और निष्पक्ष संस्थाओं की रिपोर्टों से यह समझ में आता है कि एक-एक घटना और हर किरदार पहले से तय था। डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा उनके लिए अवसर था। जब ‘कुछ बड़ा’ करके दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जा सकता था। योजना अर्बन नक्सलियों ने बनाई और उस पर अमल की जिम्मेदारी कट्टरपंथियों को दी गई।

ग्रुप ऑफ इंटलेक्चुअल्स एंड एकेडमीशियन (GIA) ने दंगों की इसी प्लानिंग पर एक विस्तृत रिपोर्ट दी है। जिसमें साफ कहा गया है कि वामपंथी और जिहादी गठजोड़ ने मिलकर इसे अंजाम दिया। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के बाद पूरे देश को इसी तर्ज पर दंगों में झुलसाने की तैयारी थी। यही कारण है कि रिपोर्ट में दंगों की व्यापक साजिश को समझने के लिए एनआईए से जाँच कराने की सिफारिश की गई है। यह एक ऐसा पहलू है जिसे पुलिस की सामान्य कानूनी प्रक्रिया से पकड़ पाना बहुत कठिन है।

फ़िलहाल वही नक्सली-जिहादी गठजोड़ अब दिल्ली दंगों पर चल रही क़ानूनी कार्रवाई को साम्प्रदायिक रंग देने में जुटा है। ताकि पुलिस की जाँच को संदिग्ध ठहरा दिया जाए। यह याद रखना होगा कि शहरी नक्सलियों की योजना दो मजहबों तक ही सीमित नहीं है। वो समाज की कई और दरारों को चौड़ा करने में दिन-रात जुटे हैं। अगड़ा-पिछड़ा, अमीर-गरीब, मालिक-मजदूर, काला-गोरा, स्त्री-पुरुष जैसी ढेरों दरारें उन्होंने खोज रखी हैं। दिल्ली का प्रयोग भले ही बहुत सफल नहीं रहा हो, लेकिन वो हार नहीं मानेंगे और अगला वार भी जल्द करेंगे।

नोट: इस लेख को लिखा है चन्द्रप्रकाश जी ने, जो पेशे से पत्रकार हैं।

मानवाधिकारों के नाम पर मासूम की पहचान उजागर करने वाली एमनेस्टी सिखा रही कश्मीर पुलिस को कानून, लोगों ने खोली पोल

मानवाधिकारों के नाम पर अपनी काली करतूतों को अंजाम देने वाली एमनेस्टी इंडिया नाम की एनजीओ का नया कारनामा उजागर हुआ है। इस बार कानून व मानवाधिकारों की दुहाई इस एनजीओ ने जम्मू-कश्मीर पुलिस को नीचा दिखाने के लिहाज से दी। लेकिन, अफसोस इनका पूरा खेल उलटा पड़ गया और सोशल मीडिया पर लोग इनकी नीयत पर ही सवाल उठाने लगे।

दरअसल, सोपोर में हुए आतंकी हमले के बाद एक तीन साल के मासूम की तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई। लोगों ने बच्चे के साथ अपनी सहानुभूति रखी। मगर, तभी एमनेस्टी इंडिया ने एक ट्वीट किया और दर्शाया कि बच्चे की पहचान का खुलासा करके कश्मीर जोन की पुलिस ने अनुच्छेद 74 जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 का उल्लंघन किया है।

लेकिन, हकीकत तो ये है कि यही एमनेस्टी इंडिया समय दर समय अपना प्रोपगेंडा चलाने के लिए इन्हीं कानूनों को उल्लंघन कर चुका है। जिसके स्क्रीनशॉट एमनेस्टी का असली चेहरा उजागर करने के लिए सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे हैं।

इन स्क्रीनशॉट्स में हम देख सकते हैं कि एक ओर तो ये एनजीओ पुलिस को कानून की बातें पढ़ा रही है। वहीं दूसरी ओर एक 19 महीने की बच्ची की पहचान उसके नाम समेत उजागर कर रही है। इस दूसरे स्क्रीनशॉट में हम देख सकते हैं कि कैसे केवल एक ट्वीट में एमनेस्टी इंडिया बच्ची का नाम, उसका चेहरा, उसकी उम्र, उसका पता सब बताती है।

इन्हीं दोनों ट्वीट के स्क्रीनशॉट्स को शेयर करके एमनेस्टी इंडिया के पाखंड पर लोग सोशल मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि एमनेस्टी बहुत भयानक तरह से झूठ फैलाता है। इसी मामले में देखिए कैसे खुद को पाक साफ दिखाकर दूसरे की गलती बता रहे हैं।

कुछ लोगों का इन दोनों ट्वीट को देखकर ये भी कहना है कि एमनेस्टी इंडिया को जल्द से जल्द बंद कर देना चाहिए। अपने ही संगठन के बारे में इनके पास घटिया जानकारी है। आज उस बच्ची की तस्वीर ट्विटर पर तैर रही है। जिसका इन्होंने अपने लिए इस्तेमाल किया था।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इस एनजीओ ने कश्मीर के संबंध में अपना प्रोपगेंडा फैलाने की कोशिश की। पिछले साल भी ये एनजीओ कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक पटल पर ले जाने की कोशिश कर रहा था।

सोचिए जिस मुद्दे को देश का आंतरिक मामला कह कहकर पाकिस्तान को हड़काया जा रहा था और अमेरिका को मध्यस्तथा करने से रोका जा रहा था। उसी मुद्दे को आधार बनाकर एमनेस्टी एनजीओ ने ग्लोबल कैंपेन शुरू करने की बात की थी।

तमिलनाडु में 7 वर्षीय दलित बच्ची की रेप के बाद की गई जघन्य हत्या: आरोपित ने किया गुनाह कबूल, गिरफ्तार

तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई जिले में एक 7 वर्षीय दलित बच्ची के साथ बलात्कार किया गया। इसके बाद आरोपित ने बच्ची को बेरहमी से पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। इस मामले में पुलिस ने राजा नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। अब इस घटना से गुस्साए लोग आरोपितों के लिए सजा-ए-मौत की माँग कर रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक पुदुक्कोट्टई जिले की 7 वर्षीय एक दलित लड़की 30 जून को अपने अपने घर के बाहर से खेलने के दौरान अचानक से गायब हो गई थी, लेकिन इसके बाद 1 जुलाई की शाम को बच्ची का शव गाँव के पास के जंगलों में पड़ा हुआ मिला।

लड़की के शरीर पर चोट के निशान पाए गए और शरीर से उसके कपड़े भी अस्त-व्यस्त पाए गए। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए राजा नाम के आरोपित को गिरफ्तार कर लिया, जो कि लड़की का पड़ोसी है।

जिले के एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक पूछताछ के दौरान 25 वर्षीय आरोपित राजा ने स्वाकीर किया कि उसने लड़की के साथ यौन उत्पीड़न किया था और फिर उसकी हत्या कर दी। पुलिस अधिकारी ने बताया कि अब इस मामले में आगे की जाँच की जा रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद ही साफ तौर पर कुछ कहा जा सकता है।

टीएनएम की खबर के मुताबिक पुलिस अधिकारी ने बताया कि एफआईआर में आरोपित के खिलाफ हत्या का मामला शामिल किया गया है। इसमें पॉस्को एक्ट शामिल करने के लिए हम पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।

दरअसल, 30 जून की शाम करीब 4 बजे लड़की अपने घर के बाहर खेल रही थी और इसी बीच वह गायब हो गई। लड़की के माता-पिता ने बच्ची के लापता होने की शिकायत उसी शाम को करीब 7 बजे पुलिस थाने में कराई। इसके बाद से ही परिजन लड़की को खोजने में लगे हुए थे।

वहीं परिजनों को नाबालिग लड़की का शव 1 जुलाई की शाम को उनके गाँव के पास के ही जंगलों में पड़ा हुआ मिला। शव के कपड़े अस्त-व्यस्त थे और उसका चेहरा बुरी तरह से जख्मी था।

जिले के एक अधिकारी के मुताबिक “लड़की के चेहरे पर लाठियों से वार किया गया है, जिसकी चोटें साफ दिखाई दे रही हैं। हालाँकि, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। उन्होंने बताया कि आरोपित पड़ोसी ने बुधवार को नाबालिग को इलाके में घूमते हुए देखा था और इसी अकेलेपन का आरोपित के द्वारा फायदा उठाया गया।

कॉन्ग्रेस नेता के अस्पताल में नहीं मिला डॉक्टरों को 16 महीने से वेतन, राजदीप कर रहे मोदी सरकार की आलोचना

कोरोना महामारी के बीच एक ओर जहाँ हर किसी का ध्यान इन हालातों से उबरने पर है। वहीं मीडिया गिरोह के लोग इस समय भी कोई न कोई जुगाड़ करके प्रोपगेंडा चलाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। राजदीप सरदेसाई इस कड़ी में सबसे सक्रिय नाम हैं।

राजदीप ने कल गणपति पर अपमानजनक ट्वीट किया था। अब उनका एक अन्य ट्वीट उनकी फजीहत का कारण बन गया है। दरअसल, राजदीप ने 1 जुलाई को अपने इस ट्वीट में कर्नाटक के दावणगेर जिले में स्थित एक अस्पताल में स्वास्थ्य कर्मचारियों को 16 महीने से वेतन न मिलने का मुद्दा उठाया। इसके बाद वह इस पूरे मामले को भी मोदी सरकार की आलोचना पर ले आए।

राजदीप ने लिखा, “कर्नाटक के दावणगेर अस्पताल में कुछ डॉक्टर्स को 16 महीने से वेतन नहीं मिला। बिलकुल 16 महीने। यहाँ थाली बजाकर कोरोना वॉरियर्स को सैल्यूट करने की कोई बात ही नहीं है अगर उन्हें उनका मेहनताना समय से न दिया जाए। ये समय बात करने का है।”

इसके बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने राजदीप के ट्वीट मे उल्लेखित अस्पताल से जुड़ी जानकारी निकाली। पता लगाया गया कि जिस अस्पताल में डॉक्टरों से होते अत्याचार के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उसकी हकीकत क्या है।

इसी खोजबीन में यह पाया गया कि राजदीप जिस अस्पातल के नाम पर अपना प्रोपगेंडा चलाने की कोशिशों में जुटे थे। वो अस्पताल जेजेएम मेडिकल कॉलेज है। जिसका नाम तक राजदीप ने बताना जरूरी नहीं समझा। लेकिन जब इसके बारे में जानकारियाँ जुटाई गईं तो ज्ञात हुआ कि इसके चेयरमैन तो कॉन्ग्रेस विधायक शमनूर शिवशंकरप्पा हैं। जो कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। मगर, राजदीप को इन तथ्यों से क्या? उन्हें तो खुद को कायम रखने के लिए सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर इन्हीं पब्लिक स्टंट का सहारा है।

खैर! राजदीप के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ हैं। कुछ लोगों का कहना है कि डॉक्टरों को 16 महीने से वेतन नहीं दिया गया। जबकि भाजपा सरकार तो वहाँ केवल 11 महीने से है। क्या कॉन्ग्रेस बता सकती है कि उससे पहले से डॉक्टरों को उनकी सैलरी क्यों नहीं मिल रही थी।

कुछ लोग ऐसे भी है। जो कर्नाटक के अस्पताल के हालातों के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं को जिम्मेदार बता रहे हैं। एक यूजर लिखता है- “अधिकांश मेडिकल व डेंटल कॉलेज कॉन्ग्रेस और उनके नुमाइंदो ने खरीदे। इन्होंने लगातार फ्रॉड किया। अब समय आ गया है इनके ख़िलाफ़ जाँच की जाए।”

इसके अलावा कुछ यूजर्स, डॉक्टरों को वेतन न दिए जाने पर राजदीप सरदेसाई की तरह मोदी सरकार को जिम्मेदार मान रहे हैं। वहीं, कुछ प्रमाण के साथ ये दावा कर रहे हैं कि येदियुरप्पा सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों को उनका बकाया वेतन लौटाने के लिए निर्देश दे दिए हैं।

सरकार ने पैसेंजर ट्रेन में प्राइवेट भागीदारी क्यों आमंत्रित की? टिकट के पैसे बढ़ेंगे? नौकरियाँ जाएँगी?

निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारतीय रेलवे ने आज (जुलाई 2, 2020) 109 जोड़ी रूटों के लिए 151 आधुनिक ट्रेनों को लेकर प्राइवेट कंपनियों से आवेदन माँगा है। इस परियोजना की शुरुआत के लिए प्राइवेट कंपनियों की तरफ से 30 हजार करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा। पिछले साल इसी क्रम में IRCTC ने देश की पहली निजी ट्रेन लखनऊ दिल्ली तेजस एक्सप्रेस की शुरुआत की थी।

अब भारतीय रेलवे के इसी फैसले ने लोगों के मन में कई तरह के सवालों को जन्म देना शुरू कर दिया है। वहीं दूसरी ओर राहुल गाँधी जैसे विपक्षी पार्टियों के नेता भी इस मौके पर आम जनता को बरगलाने से नहीं चूक रहे।

इसीलिए जरूरी है कि सरकार के इस फैसले के पीछे निहित उद्देश्य को लेकर लोगों को स्पष्ट किया जाए। जिससे भ्रम की स्थिति पैदा न हो और आम जनता सरलता से यह समझ सके कि भारतीय रेलवे ने प्राइवेटाइजेशन की ओर क्यों रुख किया और इससे आम जनता की जेब पर सफर के दौरान क्या असर पड़ेगा।

निजीकरण का नाम लेकर सबसे पहले लोगों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि मोदी सरकार सबकुछ प्राइवेट कंपनियों को बेच रही है। ऐसे में आने वाले समय में रेलवे की टिकट बढ़ जाएँगी और निजी कंपनियाँ मनमाना किराया वसूल करेंगी। साथ ही लोगों को नौकरी के अवसर कम मिलेंगे।

लेकिन यहाँ आपको बता दें कि मंत्रालय ने ये फैसला लेते हुए स्पष्ट किया है कि टिकट उपलब्धता पर इस फैसले से कोई असर नहीं पड़ेगा और न ही दूसरी ट्रेनों के किराए इससे प्रभावित होंगे। इसके बाद, ये सवाल कि अगर यही सब हुआ तो सरकारी नौकरियाँ तो प्राइवेट खिलाड़ियों के हाथ में चली जाएँगी। इससे सरकारी क्षेत्र में नौकरी के अवसर घट जाएँगे? तो बता दें, जब सरकार के फैसले पर अमल होगा, तो ट्रेनों में नया स्टॉफ आएगा, उससे रोजगार में वृद्धि होगी न कि कटौती। इसके अलावा रेल में कैटरिंग की सुविधा भी अच्छी होगी और स्वच्छता व रखरखाव सुविधाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा।

इसके बाद कुछ लोगों के मन में केवल इसी फैसले के आधार पर ये सवाल भी उठने लाजमी है कि क्या मोदी सरकार धीरे-धीरे सारे विभागों को प्राइवेट लोगों के हाथों बेच देगी? अगर नहीं, तो फिर भारतीय रेलवे के मामले में ये कदम उठाने के पीछे क्या उद्देश्य है? क्या जो काम प्राइवेट कंपनियाँ ट्रेन के लिए करेंगी, वो सरकार अपने बूते पर नहीं सकती है?

अब, इन्हीं सवालों के जवाब देते हुए मंत्रालय ने अपनी ओर से जारी बयान में इस पहल को लेकर कहा है कि इसका उद्देश्य कम रखरखाव, कम पारगमन समय, ज्यादा रोजगार सृजन, यात्रियों को ज्यादा सुरक्षा, विश्व स्तरीय यात्रा अनुभव देने वाली आधुनिक तकनीक से युक्त रेल इंजन और डिब्बों की पेशकश करना तथा यात्री परिवहन क्षेत्र में माँग व आपूर्ति के अंतर में कमी लाना है।

परियोजना के तहत चलने वाली ट्रेनों की खासियत क्या होगी? सर्वप्रथम यह जानना जरूरी है कि यह ट्रेनें मेक इन इंडिया योजना के तहत बनाई जाएँगी। जिसका उद्देश्य भारत को मजबूत बनाना है। इसके बाद इन ट्रेनों के वित्तपोषण, खरीद, परिचालन और रखरखाव के लिए निजी ईकाई ही जिम्मेदार होगी। इन ट्रेनों को अधिकतम 160 किमी प्रति घंटा की गति के लिए डिजाइन किया जाएगा। इससे यात्रा में लगने वाले समय में खासी कमी आएगी।

इतना ही नहीं, इन ट्रेनों को भारतीय रेल के चालक और गार्ड द्वारा ही परिचालित किया जाएगा। जबकि निजी इकाई द्वारा ट्रेनों के परिचालन में समय-पालन, विश्वसनीयता, ट्रेनों के रखरखाव आदि प्रदर्शन के प्रमुख संकेतकों का ध्यान रखना होगा। वहीं यात्री ट्रेनों का परिचालन और रखरखाव में भारतीय रेल द्वारा उल्लिखित मानकों एवं विनिर्देशों और आवश्यकताओं का ध्यान रखना होगा।

गौरतलब है कि आज राहुल गाँधी समेत कई विपक्षी नेता रेलवे मंत्रालय के इस फैसले को लेकर उनपर निशाना साध रहे हैं। लेकिन ये गौर करने वाली बात है कि मोदी सरकार के नेतृत्व में रेलवे ने नए आयाम हासिल किए हैं। अपने नाम नए रिकॉर्ड बनाए हैं।

ताजा कामयाबी में 1 जुलाई को हासिल की गई। जब भारतीय रेल ने करीब 201 ट्रेन ऑपरेट की और एक के बाद एक करके सभी अपने गंतव्य स्थान पर बिना किसी देरी के पहुँचती गई। कुल मिलाकर टाइमिंग के मामले में रेल विभाग ने 100% सफलता हासिल की।

कई जानकारों का मनना है कि भारतीय इतिहास में अब तक रेलवे को इस तरह की सफलता नहीं मिली थी। हालाँकि, 23 जून को भी रेलवे ने लगभग सभी ट्रेनों को समय पर ही संचालित किया था। लेकिन उस दिन कुछ दशमलव के फर्क से भारतीय रेल यह रिकॉर्ड अपने नाम नहीं कर पाई। मगर, 1 जुलाई को ऐसा संभव हुआ।

उल्लेखनीय है कि टाइमिंग को लेकर भारतीय रेलवे का नाम हमेशा ही खराब रहा है। ज्यादातर ट्रेनों का लेट होना देश में आम बात हो गई है। लेकिन पिछले कुछ सालों ने रेलवे विभाग ने अपने इस लेट-लतीफी को कम करने के लिए खूब मेहनत की है। पिछले कुछ महीनों में रेलवे अपनी टाइमिंग को लेकर भी पाबंद है। ट्रेनों के लेट होने के घंटों में लगातार गिरावट देखी गई है।

तबलीगी जमात ने पर्यटक वीजा पर मज़हबी काम के लिए भारत में प्रवेश कर सिस्टम को दिया धोखा: गृह मंत्रालय के हलफनामें में कई खुलासे

तबलीगी जमात के 10 सदस्यों ने कोरोनो वायरस महामारी के बाद उनके वीजा को रद्द करने पर मोदी सरकार के कदम को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। 34 विभिन्न देशों के 34 व्यक्तियों ने गृह मंत्रालय के 2,500 विदेशी नागरिकों को भारत में ब्लैक लिस्ट करने के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तबलीगी जमात की गतिविधियों में उनकी कथित संलिप्तता के लिए भारत में यात्रा करने से 10 वर्ष की अवधि के लिए रोक लगाई गई थी।

मौलाना आला हद्रमी एक फ्रांसीसी नागरिक है, जिसने सुप्रीम कोर्ट में आदेश को चुनौती दी है। अब, मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूछे गए प्रश्नों का जवाब गृह मंत्रालय ने दिया था।

फ्रांसीसी याचिकाकर्ता ने गृह मंत्रालय को चुनौती देने के लिए भारतीय संविधान का जिक्र किया था। हैदरी ने अपनी याचिका में कहा कि लगभग 40 अलग-अलग देशों के 2500 से अधिक विदेशियों को प्रथम दृष्ट्या खुद को बचाने का कोई अवसर दिए बिना कथित रूप से भारत में ब्लैक लिस्टेड करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का ज़बरदस्त उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत से लगभग 3,500 विदेशी नागरिकों को ब्लैकलिस्ट करने के गृह मंत्रालय के आदेशों को अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए रद्द करने का आग्रह किया है। उन्होंने अदालत से अपने देशों में वापस जाने की अनुमति माँगी है।

सोमवार को ए एम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और संजीव खन्ना की पीठ ने यह जानने की कोशिश की कि क्या वीजा रद्द करने और उन्हें ब्लैक लिस्ट करने के सामान्य दिशानिर्देश हैं या प्रत्येक व्यक्तिगत मामले में आदेश पारित किया गया था।

अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि अगर उनके वीजा को रद्द कर दिया गया तो इन विदेशियों को वापस क्यों नहीं भेजा गया। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने तब्लीगी जमात के सदस्यों के वीजा को रद्द करने और उनकी वापसी से संबंधित कई बिंदुओं को स्पष्ट किया है।

सबसे पहले, सरकार ने कहा है कि विदेशी भारतीय वीजा प्राप्त करने के हकदार नहीं हैं, साथ ही इन परिस्थितियों में उन्हें अनुच्छेद 21 का हवाला देने का कोई अधिकार नहीं है।

तब्लीगी जमात मामले में एमएचए की प्रतिक्रिया

गृह मंत्रालय ने कहा कि एक विदेशी को भारतीय वीजा प्राप्त करने या रद्द किए गए वीजा पर यहाँ रहने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। वीजा प्रदान करना एक लागू करने योग्य अधिकार नहीं है। गृह मंत्रालय का यह भी कहना है कि याचिकाकर्ता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि यह कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन है और इस प्रकार यह याचिका बनाए रखने योग्य नहीं है।

गृह मंत्रालय की प्रतिक्रिया से स्पष्ट होता है कि वीजा मैनुअल में, विशिष्ट प्रावधानों का हवाला दिया गया है जो 2003 से 2019 तक “तबलीगी जमात के काम” को नियंत्रित करता है। गृह मंत्रालय के बयान में वीज़ा मैनुअल के नियमों का हवाला दिया गया था कि यदि कोई विदेशी तबलीगी काम के लिए भारत का दौरा करता है, तो उसका उल्लेख करना जरूरी है।

तब्लीगी जमात मामले में एमएचए की प्रतिक्रिया
तब्लीगी जमात मामले में एमएचए की प्रतिक्रिया

गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक, तबलीगी जमात के सदस्य पर्यटक वीजा पर भारत में आए थे और उन्होंने तबलीगी जमात में शामिल होने वाले किसी भी व्यक्ति के प्रवेश के लिए निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन किया।

तब्लीगी जमात मामले में एमएचए की प्रतिक्रिया

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि टूरिस्ट वीज़ा पर तबलीगी जमात की गतिविधियों में भाग लेना, वीज़ा मैनुअल 2019 के प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है और यह धारा 13 और 14 या विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत अपराध है। इसको देखते हुए आव्रजन ब्यूरो को 02.04.2020 को इन विदेशियों को श्रेणी ए के तहत भविष्य में भारत में प्रवेश करने से रोकने के लिए ब्लैकलिस्ट करने को निर्देशित किया गया था।

ध्यान रहे कि द हिंदू के अनुसार, इस मामले के बाद गृह मंत्रालय ने तबलीगी जमात की गतिविधियों में लिप्त होने को एक विशिष्ट वीज़ा उल्लंघन के रूप में शामिल किया, जिसमें $500 के जुर्माने का प्रावधान रखा गया। इसमें एक नई श्रेणी जोड़ दी गई है, जिसमें भारतीय वीजा से संबंधित सामान्य दिशानिर्देशों में तबलीगी जमात में शामिल होने को प्रतिबंधित गतिविधियों में रखा गया है।

संशोधित दिशानिर्देश में कथित तौर पर, “भारत के किसी भी प्रकार के वीजा पर विदेशी नागरिकों और प्रवासी नागरिक (ओसीआई) कार्डधारकों को तबलीगी जमात में खुद को शामिल करने की अनुमति नहीं दी है। धार्मिक स्थानों पर जाने और धार्मिक प्रवचनों में शामिल होने जैसी सामान्य धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। हालाँकि, धार्मिक विचारधाराओं का प्रचार करना, धार्मिक स्थानों पर भाषण देना, ऑडियो या दृश्य प्रदर्शन / धार्मिक विचारों से संबंधित पैम्फलेट का वितरण, धर्मांतरण फैलाना आदि की अनुमति नहीं दी जाएगी।”

गृह मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दी गई प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि तबलीगी जमात के सदस्यों ने अपने भारत आने के कारणों की गलत जानकारी दी। पर्यटक वीजा के तहत, भारत में विशिष्ट उद्देश्य के लिए केवल स्थानों पर घूम सकते हैं, मगर तबलीगी जमात जैसे किसी भी मज़हबी गतिविधि में शामिल नहीं हो सकते हैं।

इसलिए, तबलीगी जमात के सदस्यों ने टूरिस्ट वीजा पर भारत का दौरा किया और आवश्यक जानकारी देने से बचने के लिए सिस्टम को धोखा देकर मज़हबी गतिविधियों में शामिल हुए।

गृह मंत्रालय द्वारा दी गई प्रतिक्रिया में आगे निम्नलिखित जानकारी दी गई:

  1. 979 ओसीआई कार्ड धारकों समेत 2679 विदेशियों के वीजा को मामले के आधार पर अब तक रद्द कर दिया गया है।
  2. तबलीगी जमात के किसी भी सदस्य को अब तक नहीं वापस नहीं भेजा गया है क्योंकि उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही चल रही है।
  3. लुकआउट नोटिस जारी करने और उनकी ब्लैकलिस्टिंग से पहले, भारत में 227 विदेशी तबलीगी सदस्य शेष थे।

जब से तबलीगी जमात के कारनामों का भंडाफोड़ किया गया है तब से उन्होंने इस देश के कानूनों के खिलाफ जिहाद शुरू कर दिया है। इसके सदस्यों ने नर्सों का उत्पीड़न किया, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए मुश्किल खड़ी की और आपदा के समय भी प्रशासन का सहयोग करने से इनकार कर दिया।