सोशल मीडिया पर बीयर के एक मशहूर ब्रांड बडवाइज़र बीयर (Budweiser) को लेकर एक खबर सामने आई है। इस खबर में बताया गया है कि बडवाइज़र बीयर के ही एक कर्मचारी ने कहा कि वो 12 साल से बीयर के टैंक में पेशाब कर रहा था। इस ख़बर ने बडवाइज़र बीयर पीने वाले लोगों को परेशान कर दिया है।
इस खबर का एक नहीं बल्कि कई स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं और कई विदेशी समाचार स्रोत और लाइफ स्टाइल वेब पोर्टल्स इस खबर को प्रकाशित कर रहे हैं। इस खबर की हेडलाइन है – “Budweiser employee acknowledges having been pissing into beer tanks for 12 years.”
दरअसल, एक व्यंग्य वेबसाइट फूलिश ह्यूमर डॉट कॉम द्वारा बनाए गए एक व्यंग्य लेख था, जिसमें कहा गया था कि बीयर ब्रांड बडवाइजर (Budweiser Beer) का एक कर्मचारी 12 साल से बीयर में पेशाब कर रहा है।
हालाँकि, इस व्यंग्य लेख के बजाए लोगों ने कुछ ऐसे स्क्रीनशॉट शेयर किए, जिन्होंने व्यंग्य वेबसाइट को सही मानकर और बिना इसकी जाँच किए ही इसे सनसनीखेज ‘खबर’ के रूप में ही प्रकाशित कर डाला।
ट्विटर पर इस खबर के सामने आते ही एक ओर जहाँ लोग सदमे में नजर आए तो दूसरी ओर बडवाइजर बीयर को लेकर हास्य मीम (MEME) भी खूब शेयर किए जा रहे हैं।
Foolishhumour.com नाम की एक वेबसाइट ने ‘बडवाइजर कर्मचारी ने स्वीकारा कि वह 12 साल से बीयर टैंकों में पेशाब कर रहा है’ हेडलाइन के साथ एक व्यंग्य लेख पोस्ट किया था। इस हास्य लेख में एक काल्पनिक बडवाइज़र कर्मचारी वाल्टर पॉवेल के नाम से लिखा गया था कि वह 12 वर्षों से बडवाइज़र बीयर टैंक में पेशाब कर रहा है।
यही वह हास्य लेख था जिसने बीयर प्रेमियों की नींद हराम कर दी थी। इस लेख के अंत में एक अस्वीकरण भी दिया गया है जिसमें लिखा गया है – “यह वेबसाइट एक हास्य पेज है, जिसका एकमात्र उद्देश्य मनोरंजन है। फूलिश ह्यूमर की सामग्री काल्पनिक है और इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।”
लेकिन कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन में घर पर बैठे बीयर प्रेमी इस खबर की हेडलाइन से ही इतने निराश और उत्तेजित हो गए थे कि उन्होंने इसकी वास्तविकता का पता करना भी जरुरी नहीं समझा। यही वजह है कि बडवाइजर बीयर को लेकर व्हाट्सऐप ग्रुप से लेकर सोशल मीडिया पर लोग एक दूसरे के जमकर मजे भी ले रहे हैं।
वामपंथी मीडिया संस्थान, जो कि वास्तव में मीडिया संस्थान से ज्यादा कॉन्ग्रेस के मुखपत्र हैं, टिकटॉक सहित 59 चायनीज ऐप के प्रतिबंधित होने से इतने व्यथित हैं कि अब व्यंग्य और वास्तविकता में फर्क तक नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे ही कुछ फर्जी नैरेटिव और सत्ता विरोधी प्रपंच करने वाला नाम है ‘द टेलीग्राफ’। टिकटॉक बैन पर ‘द टेलीग्राफ’ ने ट्विटर से एक दक्षिणपंथी सोशल मीडिया इन्फ़्ल्युएन्सर एकाउंट का हास्य व्यंग्य ट्वीट उठाकर पूरी फर्जी घटना को रिपोर्ट की शक्ल में प्रकाशित करने का नायाब कारनामा किया है।
चायनीज ऐप, विशेषकर टिकटॉक पर प्रतिबंध के बाद ‘द टेलीग्राफ’ ही नहीं, बल्कि शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने इस तरह से प्रतिक्रियाएँ दी हैं, जिन्हें देखकर यह कह पाना मुश्किल है कि भारत सरकार ने चायनीज ऐप के साथ ही कहीं कुछ वामपंथी मीडिया संस्थानों को तो नहीं प्रतिबंधित कर दिया है?
द टेलीग्राफ़ ने एक तथाकथित रिपोर्ट में यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार से चायनीज ऐप टिकटॉक को बैन करने से अर्थव्यवस्था को नुकसान होनी वाला है। कुछ ही दिन पहले, जब चायनीज ऐप के बैन होने की घोषणा हुई थी, ट्विटर पर इसे लेकर कई प्रकार के मजाक और व्यंग्य शेयर किए गए। जिनमें से एक व्यंग्य ‘द स्किन डॉक्टर’ ने भी लिखा था।
‘द स्किन डॉक्टर’ ने एक ट्वीट में लिखा था – “अब ऐसी कहानियों के लिए तैयार रहें: मेरी नौकरानी शाज़िया की बेटी एक टिकटॉक इन्फ्लुयेंसर थी और टिकटॉक विज्ञापनों के माध्यम से गरीब परिवार की कमाई में 3000-4000 रूपए प्रतिमाह का योगदान देती थी। टिकटॉक पर प्रतिबंध के साथ, सरकार ने गरीब परिवार को सूली पर लटका दिया है। जैसे कि लॉकडाउन काफ़ी नहीं था!”
Gear up for stories like :
My maid Shazia’s daughter was a small time #TikTok influencer and used to contribute ₹ 3000-4000 a month to the modest family earning through tiktok ads. With tiktok ban, govt has pushed the poor family to the gallows. As if lockdown wasn’t enough!
लेकिन ऐसी ही भावुक एवं मार्मिक कहानियों की तलाश में बैठे रहने वाले प्रपंचकारी मीडिया गिरोह यह नहीं समझ सके कि स्किन डॉक्टर एकाउंट द्वारा द टेलीग्राफ़ जैसे मीडिया गिरोहों पर ही यह व्यंग्य किया गया था और उन्होंने यह कारनामा सही भी साबित कर दिया। ‘द टेलीग्राफ’ ने इस ट्वीट को ठीक इसी तरह से अपनी रिपोर्ट का हिस्सा बना लिया और यह तक देखना जरुरी नहीं समझा कि यह घटना वास्तव में हुई भी है या यह एक व्यंग्य है।
वहीं शेखर गुप्ता का ‘द प्रिंट’ भी टिकटॉक पर प्रतिबंध लगने के बाद एक मुस्लिम परिवार की कहानी शेयर करते हुए देखा गया जिसका शीर्षक था – “मोदी सरकार द्वारा ‘टिकटॉक’ पर बैन की खबर सुनते ही ‘मेरी पत्नियाँ रोने लगीं’ – टिकटोक स्टार ने सुनाई दास्ताँ”
यही नहीं, ऐसे मीडिया संस्थान रोज ही एक ऐसी मार्मिक किन्तु फर्जी घटनाओं पर ‘मार्मिक साहित्य’ लिखने के लिए घात लगाए बैठे हैं। लेकिन इन्हीं मीडिया गिरोहों की मेहरबानी है कि ऐसी कहानियाँ अब किसी को शायद ही विचलित कर पाती हों।
द टेलीग्राफ को वास्तव में लॉकडाउन और टिकटॉक के कारण हुई काल्पनिक बेरोजगारी की संख्या गिनाने के बजाए अपनी उन तमाम फर्जी रिपोर्ट्स को गिनना चाहिए, जिन्हें वो पूरी बेशर्मी के साथ इस कोरोना वायरस की महामारी और अब चायनीज ऐप पर प्रतिबन्ध के बाद रच रहे हैं।
भारत और चीन के बीच चल रहे तनाव का असर चीन पर दिखना शुरू हो गया है। भारत को जिस तरह से हर एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर तगड़ा समर्थन मिल रहा है, वो अप्रत्याशित नहीं है लेकिन चीन को जो झटके लग रहे हैं, वो ज़रूर उसे परेशान करने वाले हैं। चाहे अमेरिका हो या ऑस्ट्रेलिया, या फिर यूएन के अन्य देश ही क्यों न हों, चीन के खिलाफ गोलबंदी में भारत को कैसे सफलता मिली है, ये आपको समझना चाहिए।
यूएन में चीन जिस तरह से घिरा है, उसमें पाकिस्तान में हुए आतंकी हमले ने कैसे रोल प्ले किया, वो भी जानने लायक है। कराची के ‘पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज’ पर हमला किया, जिसमें 11 लोग मारे गए। कहा जा रहा है कि ये हमला ‘बलूच लिबरेशन आर्मी’ द्वारा किया गया था। सोमवार (जून 29, 2020) को हुए इस हमले के बारे में कहा जा रहा है कि आतंकी किसी बड़े ऑपरेशन की तैयारी में थे।
UNSC में घिरा चीन: जर्मनी और अमेरिका ने किया पस्त
संयुक्त राष्ट्र ने इस हमले को ‘घृणित और कायराना’ करार देते हुए इसकी निंदा की। लेकिन, सुरक्षा परिषद के इस बयान को जारी करने में काफी देरी हुई, जिसकी वजह चीन था। दरअसल, इस बयान को चीन ने ही जारी किया था। UNSC के इस ड्राफ्ट प्रेस स्टेटमेंट को चीन ने ही तैयार किया था और इसीलिए जर्मनी व अमेरिका इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर रहे थे। पहले जर्मनी ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, फिर अंत में अमेरिका भी इसमें कूद पड़ा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया है। स्पष्ट है बयान जारी करने में देरी और यूएस व जर्मनी का इस पर हस्ताक्षर न करना इस बात की गवाही देता है कि सुरक्षा परिषद में भारत के लिए समर्थन मौजूद है जो खुल कर सामने आ रहा है। जर्मनी और अमेरिका शक्तिशाली राष्ट्र हैं, जिनका समर्थन भारत के लिए ख़ासा मायने रखता है।
जिस तरह से भारत ने चीन की कायराना हरकत के कारण वीरगति को प्राप्त हुए 20 जवानों के बदले बहादुरी से चीन के 43 जवानों को मार गिराया, उससे ये सन्देश चला गया है कि भारत अब अपनी एक-एक इंच जमीन के साथ-साथ अपनी सम्प्रभुता और सम्मान के लिए भी गंभीर है। अब कोई इसे गीदड़-भभकी देकर डरा नहीं सकता। दुनिया भर में भारत के इस कड़े रुख का सन्देश गया है कि हम शान्ति के उपासक हैं पर जबरदस्ती झुकाने की कोशिश करने वालों को जवाब देना भी जानते हैं।
अमेरिका पूरी तरह भारत के साथ: चीन के खिलाफ कूटनीतिक कामयाबी
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत रहीं निक्की हेली के बयान से आप इस समीकरण को समझिए। उन्होंने माना कि भारत TikTok का सबसे बड़ा बाजार था और सरकार ने 59 चीनी एप्स को प्रतिबंधित करके एकदम सही क़दम उठाया है। उन्होंने कहा कि भारत लगातार ये दिखा रहा है कि वो चीन की आक्रामकता के आगे झुकने वालों में से नहीं है। लम्बे समय तक यूएन में कार्यरत रहीं निक्की के बयान से आप भारत को मिल रहे समर्थन का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
Good to see India ban 59 popular apps owned by Chinese firms, including TikTok, which counts India as one of its largest markets. India is continuing to show it won’t back down from China’s aggression. https://t.co/vf3i3CmS0d
अमेरिका ने आधिकारिक रूप से भी भारत के इस क़दम का स्वागत किया है। अमेरिका के स्टेट सेक्रेटरी माइक पोम्पियो ने उन एप्स को चीन की कमूयनिस्ट पार्टी के ख़ुफ़िया तंत्र का एक अंग करार देते हुए भारत के निर्णय का स्वागत किया। इससे पहले उन्होंने यूरोप से अपनी सेनाओं में कटौती कर के उसे चीन के पड़ोसी मुल्कों में तैनात करने की घोषणा की थी। यानी, चीन को घेरने के लिए अमेरिका ने योजना तैयार कर ली है।
एक और बात नोटिस करने लायक है कि गलवान वैली के हमारे बलिदानी जवानों को कई देशों ने श्रद्धांजलि दी और अपनी सान्त्वनाएँ प्रकट की। फ्रांस और जापान तक ने भी उन जवानों के बलिदान पर शोक जताया। मालदीव और जर्मनी ने भी भारत के पक्ष में बयान जारी किया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोलबंदी करने और समर्थन जुटाने में काफ़ी मजबूत हो गया है। निश्चित ही ये बदलाव 2014 के बाद से आना शुरू हुआ।
हॉन्गकॉन्ग में तानाशाही रवैया अपना कर किरकिरी करवा रहा चीन
हॉन्गकॉन्ग में तानाशाह चीन की ज्यादतियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोर्रिसन ने हॉन्गकॉन्ग के पीड़ितों को अपने देश में रहने के लिए सुविधाएँ देने का वादा किया है। चीन द्वारा थोपे गए ‘नेशनल सिक्योरिटी लॉ’ के कारण वहाँ से आने वाले नागरिकों को ऑस्ट्रेलिया शरण देगा। ठीक इसी तरह का ऑफर ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन दे चुके हैं। ब्रिटेन ने तो हॉन्गकॉन्ग के 30 लाख लोगों की रेजीडेंसी राइट्स 5 वर्ष के लिए बढ़ा दी है।
इस दौरान वो सभी यूके में रह सकते हैं और काम कर सकते हैं। अब ऑस्ट्रेलिया वहाँ आने वाले हॉन्गकॉन्ग के लोगों को ‘टेम्पररी प्रोटेक्शन वीजा’ देने पर विचार कर रहा है। इससे शरणार्थी वहाँ 3 सालों तक रह सकेंगे। कई देशों ने हॉन्गकॉन्ग के अधिकारों का समर्थन किया है क्योंकि चीन ने अपना क़ानून थोपने के लिए वहाँ की लेजिस्लेटिव काउंसिल को बाईपास कर दिया। ये चीन की सबसे कमजोर कड़ी साबित होने वाला है।
भारत ने अब तक हॉन्गकॉन्ग के विषय पर चुप्पी ही साध रखी थी लेकिन अब चीन द्वारा थोपे गए तानाशाही क़ानून पर कडा रुख अख्तियार कर लिया है। जेनेवा में यूएन मानवाधिकार काउंसिल में कहा कि ‘हॉन्गकॉन्ग स्पेशल एडमिनिस्ट्रेशन रीजन ऑफ़ चाइना’ में चल रहे घटनाक्रम पर भारत की नज़र है क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय के लोग रहते हैं। भारत ने कहा कि वहाँ जो भी हो रहा है, उस पर सभी द्वारा जाहिर की जा रही चिंताओं को भारत सुन रहा है।
#Breaking | India has raised the issue of Hong Kong & says it is ‘ keeping a close watch’.
यूएन में भारत के स्थाई प्रतिनिधि राजीव चन्दर ने कहा कि सभी पक्ष इस मुद्दे को उचित रूप से, गम्भीरतापूर्वक और निष्पक्ष तरीके से सुलझाएँगे। दुनिया भर में मानवाधिकार पर हो रही चर्चाओं के बीच भारत ने ऐसा कहा। सबसे ख़ास बात ये है कि पहली बार भारत ने हॉन्गकॉन्ग के मुद्दे को उठाया है। 27 देशों ने चीन द्वारा हॉन्गकॉन्ग पर थोपे गए ‘नेशनल सिक्योरिटी लॉ’ के ख़िलाफ़ बयान दिया और उसे वापस लेने को कहा है।
जहाँ चीन अक्सर पाकिस्तान का साथ देता है और जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर भारत-विरोधी रुख अख्तियार करता रहा है, ऐसे में भारत ने अगर हॉन्गकॉन्ग के बाद तिब्बत में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन और ताइवान में चीन की तानाशाही पर आगे बयान दे दिया तो इसका बहुत बड़ा असर होना तय है। फ़िलहाल भारत की नज़र चीन को आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचाने में है, साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों को अपना पक्ष समझाने में।
चीनी कंपनियों को लग रहे झटके पर झटके: नहीं चलेगी चालाकी
चीन दुनिया भर के देशों में अपनी टेलीकम्युनिकेशन कंपनियों के माध्यम से ख़ुफ़िया तंत्र का जाल बिछा रहा है। इसीलिए अमेरिका ने Huawei और ZTE के लिए फंड्स रोकते हुए उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा करार दिया है। भारत भी इन कंपनियों के खिलाफ कुछ ऐसा ही क़दम उठा सकता है। दोनों कम्पनियाँ अपने ग्राहकों की जासूसी कर के चीन को डेटा शेयर करती हैं और इस तरह चीन दुश्मन देशों पर नज़र रखता है।
अमेरिका की FCC के अध्यक्ष अजीत पाई ने सीधा कहा कि इन कंपनियों का चीन की सेना के साथ सीधा सम्बन्ध है। चीन के नियम-क़ानूनों को मानना इनके लिए बाध्यता है और इसके लिए ये वहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि वो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को अमेरिका के कम्युनिकेशन नेटवर्क की कमजोरियों का फायदा उठाने और संचार संरचना को चोट पहुँचाने की अनुमति नहीं दे सकते।
कुल मिला कर देखें तो भारत ने अपने कूटनीतिक रणनीतियों में धार दी है, जिससे पाकिस्तान के खिलाफ भी उसे पूरी दुनिया का समर्थन मिलता है। अब जब चीन ने उलझने की ठानी है, जहाँ उसका मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स सोशल मीडिया पर रोना चालू किए हुए हैं, भारत ने ज़मीन पर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर के अपनी रणनीति तैयार की है। चीन घिर चुका है, ट्रेड वॉर ने पहले ही उसकी हालत पस्त कर रखी थी।
भारत में चीनपरस्ती: असली दिक्कत घर के गद्दारों से
भारत के साथ दिक्कत है कि यहाँ देश के अंदर भी चीनी एजेंट भरे पड़े हैं। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई ने तो अपने बयान में चीन द्वारा हमारे 20 सैनिकों को धोखे से मार डालने के बावजूद उसकी निंदा में एक शब्द भी नहीं कहे। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने उलटा अमेरिका को दोषी ठहरा दिया और कहा कि उसके हाथों में खेलने से भारत को बचना चाहिए। क्या भारत की सम्प्रभुता से उनका विश्वास उठ चुका है?
इसके बाद आते हैं TikTok के पैरवीकार जो उसके बैन होने के बाद से ही रोना मचाए हुए हैं। कोई कह रहा है कि करोड़ों लोग बेरोजगार हो जाएँगे तो कोई कह रहा है कि पीएम केयर्स में दिए गए उसके 30 करोड़ रुपए लौटा दो। अगर इतने लोग रोजगार में थे तो फिर बेरोजगारी का रोना क्यों रोया जा रहा था? अगर किसी ने रुपए दान दे दिए तो क्या उसे देश में अपनी मनमानी चलाने का हक़ मिल गया?
कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी भारत सरकार का साथ देने की बजाए ऐसी घड़ी में भी राजनीति करने की ठानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत आक्षेप डाले। जब मायावती जैसी धुर-विरोधी नेता भी स्थिति की संवेदनशीलता को समझते हुए सरकार के साथ खड़ी हैं, कॉन्ग्रेस ने गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया। अब देखना ये है कि देश से बाहर चीन को अलग-थलग करने वाला भारत अंदर के गद्दारों से निपटने के लिए क्या करता है।
भारत चीन विवादों के मद्देनजर आज (जुलाई 2, 2020) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच फोन पर बातचीत हुई। इस फोन वार्ता के कुछ देर बाद दोनों देशों के बीच हुए रक्षा सौदों की जानकारी मीडिया में साझा की गई। इसमें रक्षा मंत्रालय ने रूस से 33 फाइटर जेट खरीदने का ऐलान किया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय ने रूस से 33 नए फाइटर जेट खरीदने को मंजूरी दे दी है। इसमें 12 सुखोई-30 विमान और 21 मिग-29 भी शामिल हैं। इसके साथ ही पहले से मौजूद 59 मिग-29 को अपग्रेड भी करवाया जाएगा। इस पूरे प्रोजेक्ट की कुल लागत 18,148 करोड़ रुपए बताई गई है।
Defence Ministry approves proposal to acquire 33 new fighter aircraft from Russia including 12 Su-30MKIs and 21 MiG-29s along with upgradation of 59 existing MiG-29s. The total cost of these projects would be Rs 18,148 crores: Defence Ministry pic.twitter.com/nMvZvBn37Y
रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना और नौसेना के लिए 248 एस्ट्रा बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर टू एयर मिसाइलों को खरीदने को भी मंजूरी दी है।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारी का कहना है कि DRDO द्वारा एक नई 1,000 किलोमीटर की स्ट्राइक रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल के डिजाइन और अन्य जरूरतों की भी मंजूरी दी गई है।
इसके अलावा रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 38,900 करोड़ रुपए के प्रस्तावों को मंजूरी दी, जिसमें से 31,130 करोड़ रुपए की खरीदारी भारतीय उद्योग से होगी।
गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख में भारत चीन सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद पिछले महीने सेना के लड़ाकू विमानों को हासिल करने के लिए एक प्रस्ताव सरकार के पास भेजा गया था।
इसमें भारतीय वायुसेना ने जिन 21 मिग-29 का अधिग्रहण करने की योजना बनाई, वे रूस के हैं। रूस ने वायुसेना को नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करने के लिए इन विमानों को बेचने की पेशकश की।
यहाँ बता दें कि LAC पर चीन के साथ उपजे विवाद के बीच फ्रांस से 6 राफेल लड़ाकू विमानों के 27 जुलाई को भारत पहुँचने की भी संभावना है। ये विमान पहले मई में भारत पहुँचने वाले थे, लेकिन कोरोना वायरस के कारण ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया। पर, अब अंबाला के एयरबेस पर एक साथ 6 लड़ाकू विमान आएँगे।
फ्रांस की रक्षा मंत्री ने देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पिछले दिनों बातचीत के दौरान आश्वासन दिया था कि कोरोना वायरस महामारी के बावजूद राफेल विमान तय समय के अनुसार भारत पहुँचाए जाएँगे।
भारत और चीन की सेना के बीच हुए सीमा विवाद के बाद भारत सरकार ने चीन के प्रति अपना रवैया साफ़ कर दिया है। फिलहाल पूरे देश में चीन को लेकर नाराज़गी का माहौल है, जिसके बाद लोगों ने हर मोर्चे पर चीन का बहिष्कार करने का फैसला लिया। उत्पादों से शुरू हुए बहिष्कार की अगुवाई अब सरकार कर रही है। सरकार ने कुछ दिनों पहले चीन की 59 एप्लीकेशन पर प्रतिबंध लगा दिया था। विरोध की यह पहल सिर्फ इतने तक ख़त्म नहीं होती है, बहिष्कार की इस मुहिम से अब औद्योगिक घराने के लोग भी जुड़ चुके हैं।
जेएसडब्ल्यू सीमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर पार्थ जिंदल ने इस मुद्दे पर ट्वीट करते हुए गुस्सा जताया। ट्वीट में उन्होंने एलएसी में 20 भारतीय जवानों के मारे जाने वाली घटना पर भी गुस्सा जताया। ट्वीट में उन्होंने लिखा कि चीनी सैनिकों का बिना कारण भारतीय सैनिकों पर किया गया हमला हमारी आँखें खोलने के लिए बहुत है।
चीन के इस कृत्य के बाद जेएसडब्ल्यू समूह इस बात की शपथ लेता है कि आने वाले 2 सालों में चीन से होने वाले $400 मिलियन आयात को पूरी तरह ख़त्म कर देगा। दरअसल, जेएसडब्ल्यू समूह सीमेंट बनाने के लिए चट्टान और धातुमल का आयात चीन से ही करता है जिसकी मदद से सीमेंट बनाई जाती है।
The unprovoked attack by the Chinese on Indian soil on our brave jawaans has been a huge wake up call and a clarion call for action – we @TheJSWGroup have a net import of $400mn from China annually and we pledge to bring this down to zero in the next 24 months #BoycottChina
इसके ठीक पहले चीन के मीडिया समूह ‘ग्लोबल टाइम्स’ के संपादक हू जिजिन (Hu Xijin) ने भारत सरकार के 59 चीनी एप्लीकेशंस पर प्रतिबंध लगाने के फैसले का ट्वीट करके मज़ाक उड़ाया था।
उन्होंने ट्वीट में कहा कि चीन के लोग भारतीय उत्पादों का बहिष्कार चाह कर भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि बाज़ार में भारतीय उत्पाद मिलते ही नहीं है। फिर इसका जवाब देते हुए महिंद्रा समूह के मुखिया आनंद महिंद्रा ने कहा, “यह टिप्पणी भारतीय व्यावसायिक समूहों के लिए सबसे प्रभावी और प्रेरणात्मक कारण साबित हो सकता है। इस तरह से भड़काने के लिए शुक्रिया, यह हमारे लिए और कारगर साबित होगाl”
I suspect this comment might well be the most effective & motivating rallying cry that India Inc. has ever received. Thank you for the provocation. We will rise to the occasion…?? https://t.co/LZbQhS8xVW
हाल ही में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुए विवाद के बाद भारत सरकार ने चीन की कुल 59 एप्लीकेशंस पर पाबंदी लगाने का फैसला लिया था। जिसमें टिकटोक जैसी एप्लीकेशन भी शामिल थी। इसके अलावा भारतीय रेलवे ने भी चीन के साथ हुए 471 करोड़ रूपए का करार ख़त्म कर दिया था।
बीएसएनएल ने भी ऐलान किया था कि वह चीन को 4 जी सेवाएँ देने वाला अनुबंध भी रद्द कर देंगे। साथ ही दूरसंचार विभाग ने भी चीन की कंपनी हुआवे को 5जी स्पेक्ट्रम से बाहर रखने का फैसला किया है। इसके पहले केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा था कि भारत में राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का ठेका चीनी कंपनी को नहीं दिया जाएगा।
हिंदुस्तान टाइम्स (HT) की पत्रकार सृष्टि जसवाल के खिलाफ भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करने के लिए भाजपा नेता गौतम अग्रवाल ने शिकायत दर्ज कराई है। HT की पत्रकार सृष्टि जसवाल ने भगवान श्रीकृष्ण का खुलेआम अपमान किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को व्यभिचारी, F#ckboy और फोबिया ग्रसित पागल (उन्मत्त) करार दिया था। HT की सृष्टि जसवाल का कहना है कि भगवान श्रीकृष्ण के बारे में ये सब उन्होंने हिन्दू माइथोलॉजी में पढ़ा है।
भाजपा नेता गौतम अग्रवाल ने ट्विटर पर सृष्टि के खिलाफ शिकायत दर्ज कराए जाने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि HT की पत्रकार ने भगवान श्रीकृष्ण का अपमान कर के हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, इसीलिए उन्होंने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। साथ ही उन्होंने सृष्टि जसवाल के ट्विटर प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया, जहाँ उन्होने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ का लिंक दे रखा है।
साथ ही गौतम ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से पूछा है कि क्या वो सृष्टि जसवाल की आपत्तिजनक टिप्पणियों को देखते हुए उनके खिलाफ एक्शन लेंगे? साथ ही उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा कि वो इस ट्वीट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, ताकि सृष्टि की इन अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ आवाज़ उठे। साथ ही गौतम ने अपनी शिकायत की प्रति भी सोशल मीडिया पर शेयर की और सृष्टि की ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी डाला।
Filed complaint against @08srijas for her derogatory Tweet against Lord Krishna & hurting #Hindu sentiments
अपनी शिकायत में खुद को हिन्दू आईटी सेल का सदस्य बताते हुए गौतम ने लिखा कि सृष्टि जसवाल HT से जुडी हुई हैं, जो देश-विदेश में लाखों लोगों पर प्रभाव डालता है। साथ ही उनकी ट्वीट को ‘भड़काऊ और आपत्तिजनक’ करार दिया। उन्होंने अंदेशा जताया कि ऐसे बयानों को सोशल मीडिया में डालने से सांप्रदायिक द्वेष और मजहबी दुश्मनी को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की माँग की।
बकरीद पर जानवरों की बलि से एक और वायरस के फैलने का खतरा है। इस वायरस से क्रीमियन-कॉन्गो रक्तस्रावी बुखार (CCHF: Crimean-Congo Hemorrhagic Fever) होता है। अफसोस कि अभी तक इसका भी कोई वैक्सिन नहीं बना है।
पाकिस्तान के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH: National Institute of Health) ने बकरीद पर जानवरों की बलि प्रथा को लेकर लोगों को आगाह किया है। NIH के अनुसार बलि के दौरान इंसान और जानवर में संपर्क बढ़ जाता है। जिसके कारण क्रीमियन-कॉन्गो रक्तस्रावी बुखार के प्रसार का जोखिम रहता है।
NIH ने यह भी बताया कि महामारी काल में बकरीद एक नई मुसीबत तो ला ही सकता है। साथ ही भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने और संक्रामक सामग्रियों तथा जानवरों के साथ सीधे संपर्क में आने से COVID-19 ट्रांसमिशन के और अधिक फैलने का जोखिम भी रहेगा।
नए वायरस के संक्रमण और COVID-19 ट्रांसमिशन के और फैलने वाले खतरे को देखते हुए NIH ने रोकथाम और नियंत्रण के लिए समय पर कदम उठाने की सलाह वहाँ की सरकार को दी है।
पाकिस्तान के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने बकरीद पर बलि के दौरान पूरी बाजू के कपड़े, हल्के रंग के कपड़े, दस्ताने, फेस मास्क और हैंड सेनिटाइज़र का प्रयोग करने की सलाह जारी की है। इसके अलावा जानवरों या उनके रक्त के संपर्क में आने के बाद साबुन से हाथ धोने को आवश्यक बताया है।
NIH ने महामारी फैलाने वाले संक्रामक रोगों के लिए एक लेटर भी जारी किया है। इसमें हैजा, कोरोनावायरस रोग (COVID-19), CCHF, डेंगू, लीशमैनियासिस, मलेरिया, खसरा, पोलियो और टाइफाइड एक्सडीआर सहित उच्च प्राथमिकता वाले संचारी रोगों के पैटर्न को लेकर सतर्क रहने को कहा गया है।
भारत में दिखा चुका है असर
जनवरी 2011 में भारत में इस वायरस ने 3 लोगों की जान ली थी। गुजरात के अहमदाबाद के पास सानंद में इस घातक क्रीमियन-कॉन्गो रक्तस्रावी बुखार (CCHF) के केस मिले थे। पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) ने इसकी पुष्टि की थी।
सानंद के पास कोलाट गाँव की अमीना मोमिन इसका पहला शिकार बनी थीं। उनकी मौत के बाद अहमदाबाद के शाल्बी अस्पताल के डॉ गगन सेनके और एक नर्स की मौत हुई थी। ये दोनों अमीना का इलाज कर रहे थे।
तब NIV ने सानंद के आस-पास 50 नमूनों का परीक्षण किया था और गुजरात सरकार को संभावित संक्रमण की चेतावनी दी थी। संक्रमण से बचने के लिए 16,000 ग्रामीणों की स्क्रीनिंग की गई थी।
क्या है क्रीमियन-कॉन्गो रक्तस्रावी बुखार यानी CCHF
CCHF नैरोवायरस समूह का एक वायरल रक्तस्रावी बुखार है। यह एरोसोल मार्ग से फैलता है। इसके लक्षणों में तेज बुखार और प्लेटलेट काउंट में गिरावट शामिल है। इसका संक्रमण बहुत घातक है क्योंकि इसमें मृत्यु दर 90 प्रतिशत तक हो सकती है।
गलवान घाटी में उपजे विवाद के बाद चीन अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा। ताजा खबर के मुताबिक भारत में अशांति फैलाने के लिए चीन अब आतंकवादियों का सहारा ले रहा है।
स्थानीय लाइसस (licas) समाचार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन म्यांमार के आतंकी संगठनों को पैसे और अत्याधुनिक हथियार की आपूर्ति कर रहा है। इसके अलावा उसका इरादा जम्मू कश्मीर में हिंसा फैलाने के लिए पाक के आतंकी संगठन अल बद्र को सक्रिय करना भी है।
China in talks with Islamic terror group Al Badr as it moves 20,000 soldiers along the LAC, Pakistan deploys two divisions along PoK: Reportshttps://t.co/F5MQ7aoDYG
रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि चीन के द्वारा नयपिटाव आतंकवादी समूह अराकान सेना को मदद की जा रही है। खुद दक्षिण-पूर्व एशिया की जानकारी रखने वाले एक सैन्य सूत्र ने इसकी पुष्टि की है।
उन्होंने बताया कहा कि चीन अराकान सेना के खर्चे का लगभग 95 प्रतिशत तक दे रहा है। उन्होंने कहा कि अराकान सेना के पास लगभग 50 MANPADS (मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम) यानी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें हैं।
जानकारी के मुताबिक, चीन की यह रणनीति अपने प्रभाव को अपनी सीमा के दक्षिण में अच्छी तरह से धकेलने के लिए है। अराकान सेना को समर्थन देने की इस रणनीति ने चीन को पश्चिमी म्यांमार यानी भारत-म्यांमार सीमा की ओर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने में सक्षम बनाना है।
एक ऑस्ट्रेलियाई बुद्धिजीवी के अनुसार, “चीन दक्षिण एशिया में एक बहुआयामी खेल-खेल रहा है। चीन भारत को कमजोर करना चाहता है। भारत का पाकिस्तान से संबंध अच्छे नहीं हैं और म्यांमार को नया दुश्मन बनाना चाहता है।”
इसी प्रकार एक भारतीय सूत्र के मुताबिक, चीन नहीं चाहता है कि म्यांमार में भारतीय प्रभाव बढ़े। वह एकाधिकार चाहता है। म्यांमार में भारत के खिलाफ अराकान सेना का चीन का समर्थन स्पष्ट रूप से काफी प्रभावी रहा है।
इसे समझने के लिए पिछले दिनों का ही एक वाकया देखिए। साल 2017 के जून माह में भारत के सी एंड सी कंस्ट्रक्शन को 220 मीलियन डॉलर के सड़क निर्माण का ठेका मिला था। लेकिन म्यांमार सरकार ने जनवरी 2018 तक मंजूरी में देरी कर दी। इसके बाद जब निर्माण कार्य शुरु हुआ, तो अराकान सेना ने भारतीय नागरिकों, अग्निशामकों सहित चालक दल, म्यांमार के संसद सदस्य का अपहरण कर लिया।
सुबीर भौमिक के एक लेख के अनुसार, चीन से हाल ही में हथियारों की डिलीवरी की गई है। इस खेप में 500 असॉल्ट राइफल, 30 यूनिवर्सल मशीन गन, 70,000 गोला-बारूद थे, जो समुद्र के रास्ते पहुँचाया गया। फरवरी के तीसरे सप्ताह में म्यांमार और बांग्लादेश के तटीय जंक्शन से ज्यादा दूर मोनाखली समुद्र तट पर हथियारों को उतार दिया गया था।
इतना ही नहीं लेख के अनुसार, अराकान आर्मी के करीब सूत्रों ने यह भी दावा किया था कि इस डिलीवरी में एफएन-6 मैनपैड भी शामिल थे।
वहीं, क्षेत्र के एक राजनयिक ने इस संबंध में कहा था कि मयांमार में अराकान सेना सहित सात विभिन्न समूहों को चीनी हथियार और समर्थन प्राप्त हुआ। उनके मुताबिक चीन का उद्देश्य हमेशा से खराब मानवीय रिकॉर्ड के साथ म्यांमार को कमजोर और सीमित रखकर पश्चिम को म्यांमार से दूर रखना रहा है।
यहाँ बता दें अराकान सेना म्यांमार के राखीन राज्य में सबसे बड़ा विद्रोही समूह है और राजनीतिक दल, यूनाइटेड लीग ऑफ़ अराकान का सशस्त्र विंग है। 23 मार्च को म्यांमार सरकार ने उनमें डर व्याप्त करने के लिए आतंकी संगठन घोषित कर दिया था। 2019 में इस समूह ने 4 पुलिस थानों पर हमला बोला था। जिसमें 20 से अधिक जवान हताहत हो गए थे।
इनमें से कुछ की चोट लगने के कारण मौत भी हो गई थी। लेकिन, इतने के बावजूद भी चीन ने इस घटना का विरोध नहीं किया था। बल्कि अपने बयान में यह कह दिया था कि म्यांमार की हर पार्टी को चीन का समर्थन है। जानकारी के अनुसार, चीन सिर्फ़ वहाँ हथियार सप्लाई नहीं करती। बल्कि म्यांमार में हिंसा भड़काकर पैसे भी कमाती है।
प्रसार भारती द्वारा समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया (पीटीआई) को ‘राष्ट्रीय हितों के अनुरूप काम नहीं’ करने वाला बताते हुए उसकी सेवाएँ लेना बंद करने की चेतावनी दी गई है। प्रसार भारती ने कहा कि पीटीआई से अपने संबंधों को आगे जारी रखने को लेकर समीक्षा कर रहा है।
प्रसार भारती के समर्थन में अब देश के सबसे बड़े पत्रकारों के संगठन आईएफडब्लूजे (इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स) ने भी एक पत्र के जरिए प्रधानमंत्री से पीटीआई की फाइनेंस और कार्यप्रणाली की जाँच की माँग की है और कई अहम खुलासे किए हैं। आईएफडब्लूजे के महासचिव विपिन धुलिया ने एक फेसबुक पोस्ट शेयर करते हुए इसकी सूचना दी है।
विपिन धुलिया ने पीटीआई में होने वाले भाई-भतीजावाद, गलत वित्तीय प्रबंधन और निहित स्वार्थों का खुलासा करते हुए बताया है कि किस प्रकार पीटीआई हमेशा सत्ताधारी पार्टी, मुख्यतः कॉन्ग्रेस के मुखपत्र के रूप में काम करता आया है।
विपिन धुलिया द्वारा शेयर किए गए लेख के अनुसार, इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) ने पिछले कई वर्षों के दौरान भारत सरकार द्वारा प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) को उपलब्ध कराए गए विभिन्न फंड (अनुदान), सब्सिडी, ऋण और वित्तीय मदद की न्यायिक जाँच की माँग की है।
प्रधानमंत्री और सूचना व प्रसारण मंत्री को एक पत्र के जरिए, IFWJ ने अवगत कराया था कि पीटीआई को संसद मार्ग पर आलिशान भवन निर्माण के लिए सब्सिडी वाली रियायती भूमि सहित केंद्र सरकारों से विभिन्न सहायता मिलती आई हैं। यह सब राजकीय खजाने और भारतीय कर दाताओं के रुपयों से किया गया था।
आईएफडब्ल्यूजे ने पीटीआई मैनेजमेंट पर अपने संस्थान के संघ को विभाजित करने, केवल वफादारों का पक्ष लेने और कर्मचारियों को विभिन्न वैधानिक वेतन पुरस्कारों के तहत उनके कानूनी बकाए से वंचित करने जैसे कर्मचारी-विरोधी उद्देश्यों के लिए सरकारी धन के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया है।
IFWJ seeks probe into PTI finances Appeal to Prime Minister
NEW DELHI June 30: The Indian Federation of Working…
रिपोर्ट के अनुसार, पीटीआई के वर्तमान प्रबंधन ने विधिवत निर्वाचित पदाधिकारियों को रिझाने के लिए एक सेवानिवृत्त कार्यालय के साथ एक समानांतर संघ बनाया था। कोरोना वायरस के कारण जारी वर्तमान लॉकडाउन के दौरान भी प्रबंधन ने कर्मचारियों को उनके आर्थिक अधिकारों से वंचित कर दिया।
जब तक इसके प्रबंधन में पी उन्नीकृष्णन, एनडी प्रभु और के.पी. जैसे काम करने वाले पत्रकार थे, पीटीआई को पेशेवर पैटर्न पर चलाया जाता था। लेकिन जिस क्षण रोजगार की नापाक संविदा प्रणाली और आधिपत्य का शासन शुरू हुआ, समाचार एजेंसी पीटीआई भाई-भतीजावाद यांनी नेपोटिज्म की खान बन गई।
प्रसार भारती द्वारा पीटीआई को सदस्यता की समीक्षा के मुद्दे के साथ प्रेस की स्वतंत्रता को जोड़ने वाले कुछ तत्वों पर टिप्पणी करते हुए, IFWJ ने कहा कि अधिक जरूरी है कि मजदूरों की भूख से मुक्ति की माँग की जाए, क्योंकि उन्हें समाचार पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और समाचार एजेंसियों द्वारा छँटनी समाप्ति, बर्खास्तगी का सामना करना पड़ता है।
आईएफडब्ल्यूजे ने पीटीआई प्रबंधन पर हमेशा बेशर्मी से खुद को सत्ताधारी पार्टी, खासकर कॉन्ग्रेस के मुखपत्र के रूप में बदलने का आरोप लगाया है। संगठन ने आरोप लगाया है कि जब स्वतंत्र बहुभाषी समाचार एजेंसी, यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) में सरकारी मदद की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप पिछले दस वर्षों में यूएनआई कर्मचारियों के पेंडिंग वेतन भुगतान बहुत बढ़ गया है।
यूएनआई के अधिकांश कर्मचारियों को तीन से चार वर्षों में पूर्ण वेतन का भुगतान नहीं किया गया है। दो राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के बीच भेदभाव की इस दुखद स्थिति ने केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पेशेवर अखंडता को बर्बाद कर दिया है। UNI को धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ दिया गया था।
यहाँ तक कि तत्काल ऋण, जो UNI द्वारा अनुरोध किया गया था, मोदी सरकार द्वारा नहीं दिया गया था। आईएफडब्ल्यूजे ने आरोप लगाया कि पीटीआई को 100 करोड़ रुपए का ऋण मिला है, जो इस्तेमाल तक नहीं किया गया।
दूसरी ओर, UNI कर्मचारियों को केंद्र सरकार द्वारा 25 करोड़ रुपए के अल्प ऋण से भी वंचित कर दिया गया था। आईएफडब्ल्यूजे ने चीन के राजदूत के साथ पीटीआई द्वारा विशेष साक्षात्कार का भी उल्लेख किया। यह ऐसे समय में किया गया था जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने मीडिया के माध्यम से वस्तुतः युद्ध की स्थिति घोषित कर दी थी। पीटीआई की कहानी इस प्रकार अपने छिपे हुए एजेंडे के बारे में संदेह पैदा करती है।
पीटीआई को प्रसार भारती की चेतावनी
उल्लेखनीय है कि हाल ही में प्रसार भारती के अधिकारियों ने पत्रकारों से कहा कि सार्वजनिक प्रसारणकर्ता अपनी अगली बोर्ड बैठक से पहले पीटीआई को एक सख्त पत्र भेज रहा है, जिसमें पीटीआई द्वारा राष्ट्र विरोधी रिपोर्टिंग पर गहरी नाराजगी व्यक्त की गई है।
पीटीआई ने चीन में भारतीय राजदूत विक्रम मिस्री के हवाले से कहा था – “चीन को तनाव कम करने के लिए अपनी जिम्मेदारी समझते हुए लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपनी तरफ वापस जाना होगा।”
पीटीआई के एक अन्य ट्वीट में मिस्री ने कहा – “चीन को एलएसी के भारतीय हिस्से की ओर अतिक्रमण के प्रयास और संरचनाओं को खड़ा करने की कोशिश को रोकना होगा।”
पीटीआई द्वारा शेयर किए गए इस इंटरव्यू में मिस्री के एलएसी पर चीन को लेकर दिए गए बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सर्वदलीय बैठक में दिए उस बयान के विपरीत थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि न कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है। पीएम मोदी ने कहा था कि न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।
ऐसे में पीटीआई द्वारा चीनी राजदूत के बयान को प्रमुखता देने पर प्रसार भारती ने चिंता व्यक्त की थी। प्रसार भारती ने एक पत्र भेजकर कहा था कि पीटीआई की न्यूज़ रिपोर्टिंग राष्ट्र हित में नहीं है। प्रसार भारती का यह भी कहना है कि वह पीटीआई को फ़ीस के रूप में हर साल मोटी रकम देता है और अब तक करोड़ों रुपए उसे दे चुका है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी पीटीआई ने भारत में चीन के राजदूत सुन वीदांग का इंटरव्यू लिया था, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ था। चीनी दूतावास ने इस इंटरव्यू का एक छोटा संस्करण अपनी वेबसाइट पर प्रस्तुत किया था, जिसे लेकर पीटीआई की आलोचना भी हुई। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने राजदूत सुन के बयानों पर जवाब दिया था।
इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ)
IFWJ भारतीय वर्किंग पत्रकारों का संगठन है, जिसकी स्थापना अक्टूबर 28, 1950 को नई दिल्ली में की गई थी। 1954 में संघ और राज्य सरकारों ने वर्किंग पत्रकारों के प्रतिनिधि निकाय के रूप में IFWJ को मान्यता दी थी। भारत के हर शहर, कस्बे और प्रकाशन केंद्र में कार्यरत पत्रकारों के एकमात्र पेशेवर निकाय के रूप में, IFWJ की क्षेत्रीय इकाइयों ने प्रेस क्लब, प्रेस अकादमी, संदर्भ पुस्तकालय, प्रशिक्षण संस्थान और अध्ययन मंडल स्थापित किए हैं।
भारतीय रेलवे ने पैसेंजर ट्रेन्स के आवागमन के संचालन के लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी हेतु निवेदन जारी किया है। रूट्स के 109 पेयर्स और 151 आधुनिक ट्रेनों के संचालन के लिए ये निवेदन भारतीय रेलवे द्वारा जारी किए गए हैं।
इस प्रोजेक्ट से रेलवे में प्राइवेट सेक्टर से 30,000 करोड़ का निवेश आने वाला है। रेलवे नेटवर्क में पैसेंजर ट्रेनों के संचालन के लिए ऐसा पहली बार हो रहा है, जब निवेश के लिए प्राइवेट सेक्टर को आमंत्रित किया गया हो।
इससे मेंटेनेंस कॉस्ट और ट्रांजिट टाइम घटाने के साथ ही जॉब क्रिएशन के मौके बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। प्राइवेट सेक्टर द्वारा आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण ये सब संभव हो पाएगा।
रेलवे की इस पहल से सुरक्षा में भी मदद मिलेगी और रेलवे यातायात में वैश्विक स्तर की सुविधाएँ भी मिलेंगी। हर एक ट्रेन में 16 कोच होंगे। इनकी अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटे की होगी। इन्हें इसी हिसाब से डिजाइन भी किया गया है।
इस परियोजना के लिए रियायत अवधि (कन्सेशन पीरियड) 35 वर्ष की होगी। निजी इकाई (प्राइवेट सेक्टर) को भारतीय रेल को निश्चित ढुलाई शुल्क, वास्तविक खपत के आधार पर ऊर्जा शुल्क का भुगतान करना होगा और पारदर्शी निविदा प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित सकल राजस्व साझा करना होगा।
इन ट्रेनों को भारतीय रेल के चालक और गार्ड द्वारा परिचालित किया जाएगा। निजी इकाई द्वारा ट्रेनों के परिचालन में समय-पालन, विश्वसनीयता, ट्रेनों के रख-रखाव आदि प्रदर्शन के प्रमुख संकेतकों का ध्यान रखना होगा।
Railways invites Request for Qualifications for private participation for passenger train operations on 109 pairs of routes through 151 modern trains.
This initiative will boost job creation, reduce transit time, provide enhanced safety & world-class facilities to passengers. pic.twitter.com/uG2dhdbG3b
यात्री ट्रेनों का परिचालन और रखरखाव में भारतीय रेल द्वारा उल्लिखित मानकों एवं विनिर्देशों और आवश्यकताओं का ध्यान रखना होगा। जिन्हें अप्लाई करना हो, वो ज्यादा विवरण और क्लस्टर वार जानकारी के लिए ‘केन्द्रीय सार्वजनिक खरीद पोर्टल‘ की वेबसाइट के निविदा कॉलम में जा सकते हैं।
कुल मिला कर देखें तो इस पहल का उद्देश्य कम रखरखाव, कम पारगमन समय, ज्यादा रोजगार सृजन, यात्रियों को ज्यादा सुरक्षा, विश्व स्तरीय यात्रा अनुभव देनने वाली आधुनिक तकनीक से युक्त रेल इंजन और डिब्बों की पेशकश करना तथा यात्री परिवहन क्षेत्र में माँग व आपूर्ति के अंतर में कमी लाना भी है।
केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट के माध्यम से इसकी जानकारी दी है। ऑपइंडिया ने इससे सम्बंधित कुछ सवाल मंत्रालय को भेजे हैं, जिनका जवाब आते ही आपको अवगत कराया जाएगा। अब देखना यह है कि इसमें प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के बाद क्या बदलाव आते हैं और रेलवे में कैसे और ज्यादा सुधार आता है।