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चीन ने कभी नहीं सोचा था भारत छोटी सी जमीन के लिए उन्हें कठिन चुनौती दे देगा: चीनी विशेषज्ञ युन सुन

गलवान घाटी में भारत चीन विवाद पर इस समय पूरे देश की एक अलग राय है। हर कोई सिर्फ़ और सिर्फ़ चीन को उसके किए के लिए सबक सिखाना चाहता है। फिर चाहे बात सीमा की हो, या फिर आर्थिक मोर्चे पर उसे चोट पहुँचाने की। भारत का लगभग हर नागरिक इसके लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहा है। ऐसे में चीन की क्या प्रतिक्रिया है? ये किसी से छिपी नहीं है।

आज भले ही चीन ने अपने बॉयकॉट की बात को भारत के लिए नुकसानदायक बताकर पचा ली हो। लेकिन ये सच है कि आज से तीन साल पहले भारत का सख्त रवैया देखकर चीन की हवाइयाँ उड़ गईं थी। चीन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि भारत उसको चुनौती दे सकता है। वो भी भूटान के पास एक छोटी सी जमीन के लिए।

डोकलाम विवाद ने वाकई चीन को हैरत में डाला था। ये कहना हमारा नहीं बल्कि खुद चीन विशेषज्ञ और अमेरिका में स्टिमसन सेंटर में पूर्वी एशिया कार्यक्रम की सह-निदेशक युन सुन का है। जिन्होंने इस बात का खुलासा इंडिया टुडे से बातचीत के दौरान किया। वे कहती हैं कि 2017 में डोकलाम गतिरोध के दौरान, चीन बेहद आश्चर्यचकित था। क्योंकि उसे उम्मीद नहीं थी कि भारत 72-73 दिन तक भूटान के नजदीक एक छोटे से जमीन के टुकड़े के लिए लड़ाई लड़ेगा।

LAC के साथ पूर्वी लद्दाख में चल रही चीनी आक्रामकता के पीछे की प्रेरणा के बारे में पूछे जाने पर, युन सुन ने कहा कि चीनी अधिकारियों का मानना ​​है कि सीमा के पास भारत की गतिविधियों का जवाब देने की आवश्यकता थी।

वे कहती हैं, “अगर आप इस बारे में किसी चीनी अधिकारी से पूछते हैं तो उनका जवाब होगा कि चीन तो सिर्फ़ उन चीजों की प्रतिक्रिया दे रहा था। जो lac पर भारत कर रहा था।” उन्होंने कहा कि यह सर्वविदित है कि जहाँ से lac पास होती है। उन सटीक स्थानों पर एक ऐतिहासिक विवाद है। इसलिए जब चीन को ज्ञात हुआ कि भारत वहाँ पर सड़के बना रहा है। नया इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। तो उनकी चिंता बढ़ गई कि उन्हें कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए।

वे कहती हैं, “चीन को ऐसे हालात देखकर लगा जैसे भारत उनकी पीठ पर छूरा घोंप रहा है। इसी के बाद वो ऐसी स्थिति में आए कि जहाँ उन्हें सिर्फ़ दो विकल्प दिखा। एक तो आक्रमकता के साथ प्रतिक्रिया देना और दूसरा चुप रहकर अपने क्षेत्र को हाथ से जाते देखना।”

युन के मुताबिक चीन की मनोस्थिति को समझना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। क्योंकि चीन की वर्तमान हालत बयान करने के लिए अंग्रेजी मीडिया में बहुत सामग्री है। लेकिन दूसरी ओर चीन की रणनीति और प्रेरणा आदि को समझने के लिए जानकारी केवल चीनी भाषा में ही उपलब्ध है।

साल 2020 में उपजे इस विवाद को युन सुन चीन के लिए अलग तरह से महत्तवपूर्ण बताती हैं। वे समझाती हैं कि चीन के ऊपर इस समय कोरोना महामारी के कारण आतंरिक दबाव बहुत है और बाहर से भी उसपर हमले हो रहे हैं। युन का मानना है कि एशिया में भारत और चीन के बीच शक्ति प्रतिस्पर्धा संघर्ष को जन्म देती है और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करती है।

युन के मुताबिक, भारत के लिए भले ही इस समय सबसे बड़ा खतरा चीन है। लेकिन कोरोना महामारी के बाद अब चीन के लिए सबसे बड़ा खतरा यूएस दिखाई दे रहा है। वे कहती हैं, चीन भारत से मैत्रीपूर्ण संबंध रखना चाहता है। खासतौर पर अमेरिका के संदर्भ में। लेकिन वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता को त्यागने को भी किसी कीमत पर मंजूर नहीं करेगा।

विवाद से उभरने के लिए मुमकिन रास्तों को सुझाने की बात पर युन कहती हैं कि इस समय स्थिति दोनों ओर से साफ है। दोनों ही देश अपनी सेना सीमा पर लगा रहे हैं। अगर भारत दौलत बेग ओल्डी पर रोड बनाता है। तो चीन इसे अपनी सुरक्षा भेद्यता समझेगा और अपने क्षेत्र में सड़क बनाना चाहेगा। इसी प्रकार जब चीन अपने इलाके में कुछ बनाएगा तो भारत रणनीतिक कमजोरी के रूप में अनुभव करेगा और कुछ इसी प्रकार निर्माण करना चाहेगा।

वर्तमान परेशानी के कूटनीटिक हल की वकालत करते हुए युन ने कहा, “आज पैंगोंग लेक में जो हो रहा है वो अतीत में भी हो चुका है। मुझे लगता है दोनों पक्षों के राजनयिक डी एस्केलेशन के लिए एक मार्ग पर बातचीत कर रहे हैं। लेकिन, फिर भी दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व को आगे आना होगा ताकि जमीनी स्तर पर सैनिक कूटनीतिक वार्ता के अनुरूप काम करें।”

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ भारत-चीन की सेनाएँ स्थिति को भाँपते हुए सीमा पर तैनात हैं। वहीं मंगलवार को 12 घंटे कॉर्प्स कमांडर लेवल के बीच वार्ता हुई। ये बातचीत कल रात 11 बजे खत्म हुई। बैठक में भारत ने फिंगर 4 से फिंगर आठ तक के क्षेत्र से चीन को तत्काल पीछे हटने को कहा ।

एलएसी के निकट चुशूल में भारतीय जमीन पर हुई बैठक में भारत की तरफ से 14वीं कोर के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह और चीन की तरफ से तिब्बत सैन्य जिले के कमांडर मेजर जनरल लिऊ लिन शामिल हुए। जून महीने में इन सैन्य अधिकारियों के बीच यह तीसरे दौर की बैठक हुई है। इस बैठक में सेनाओं के पीछे हटने के तौर तरीकों पर चर्चा हुई है।

खबरों के मुताबिक भारत की तरफ से इस बात को जोरदार तरीके से उठाया गया कि चीन सेना उन इलाकों से तत्काल पीछे हटे जहाँ हाल में उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है ताकि पाँच मई से पहले की स्थिति बहाली की जा सके। इनमें पैंगोग लेक इलाके में फिंगर चार से आठ तक से चीनी सेना को तत्काल हटने को कहा गया है।

गणपति को हीन दिखाने में जुटे राजदीप सरदेसाई, बोला – ‘महामारी के आगे झुकते हैं भगवान भी’

कोरोना महामारी के कारण कई जरूरी काम इस साल स्थगित कर दिए गए। कई त्यौहारों में भी वो रौनक नहीं दिखी, जो पिछले साल तक उत्सवों में थी। इसी क्रम में गणेश चतुर्थी भी अब आने वाली है। लेकिन पूरा महाराष्ट्र उसकी तैयारियों की जगह विश्वव्यापी महामारी से उभरने में लगा हुआ है। जिसके कारण गणेशोत्सव से जुड़ी इस बार मुंबई की 87 साल पुरानी परंपरा भी छूट गई। मगर, उसकी जगह मानवता की मिसाल को कायम करने का फैसला लिया गया।

इस बार कोरोना महामारी के कारण मुंबई में मशहूर लालबागचा राजा यानी लालबाग के राजा गणेश भगवान की मूर्ति नहीं बिठाई जाएगी। आज ही इस समारोह के रद्द किए जाने की घोषणा हुई है। फैसला लिया गया है कि इस बार ब्लड डोनेशन और प्लाज्मा डोनेशन के लिए कैंप आयोजित होंगे। इस खबर के आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया आ रही है। लोग इस फैसले को लेकर अपनी-अपनी राय प्रकट करके समझाने में लगे हुए हैं।

लेकिन, इसी बीच मीडिया गिरोह के कुछ लोग भी हैं, जो अपनी धूर्तता दिखाने से बाज नहीं आ रहे। इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को ही देखिए। राजदीप इस खबर को बताते हुए अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते।

वे लिखते हैं, “इस बार लालबागचा नहीं आएँगे: कोरोना के कारण मुंबई की सालों पुरानी परंपरा भी चली गई। सोचिए भगवान ने भी महामारी के आगे हार मान ली! इस साल लाल बागचा राजा नहीं मनाया जाएगा!”

जी हाँ। सही पढ़ा आपने, राजदीप ने भगवान गणेश के लिए महामारी के सामने ‘हार मानने’ जैसे शब्द का ही प्रयोग किया है। लेकिन ऐसा करते हुए शायद राजदीप भूल गए कि जिन देवाधिदेव गणपति को लेकर वह अपनी टुच्ची मानसिकता को उजागर कर रहे हैं, उन गणपति के प्रति लोगों के मन में इतनी श्रद्धा है कि मात्र एक साल के गैप के कारण वो आने वाले समय में इस परंपरा को खत्म नहीं होने देंगे।

रही बात घुटने टेक देने की या हार मान जाने की, तो राजदीप को यह जानना आवश्यक है कि हिंदू धर्म में, हर शुभ कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए गणपति का स्मरण किया जाता है और माना जाता है कि उनके ध्यान मात्र से आने वाले विघ्नों का हरण होगा। बावजूद उसके कोई काम किसी कारणवश पूरा न हो पाए, या हमारी गलतियों व परिस्थिति के कारण वह अधूरा रह जाए तो ये भूलकर भी नहीं कहा जाता है कि परेशानी इतनी विकराल थी कि गणपति भी उसमें कारगर साबित नहीं हो पाए।

अपने सेकुलर अजेंडे की रोटियाँ सेंकते-सेंकते शायद राजदीप भूल चुके हैं कि धार्मिक भावनाएँ क्या होती हैं? भगवान के प्रति श्रद्धा किसे कहते हैं? उन्हें तो किसी कार्यक्रम के रद्द होने के पीछे सिर्फ़ एक नजरिया दिखता है, जिसमें वो किसी भी प्रकार से हिंदुओं की भावना को ठेस पहुँचाना चाहते हैं। या फिर गणपति भगवान को किसी सरकारी तंत्र या विपक्षी पार्टी की तरह मानते हैं, जिनके घुटने टेकने से राजदीप जैसों में खुशी की लहर दौड़ती है।

खैर! सोशल मीडिया पर राजदीप सरदेसाई के इस घटिया कॉमेंट के लिए उन्हें खूब लताड़ लगाई जा रही है। पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन राजदीप को जवाब देते हुए कहते हैं कि सर्वशक्तिमान कभी घुटने नहीं टेकते। बल्कि वे तो खुश हैं कि उनके भक्त ये जानते हैं कि इस चुनौती का समाधान कैसे करना है।

गौरतलब हो कि इस वर्ष लालाबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल ने इस बड़े समारोह का आयोजन करने की जगह ‘आरोग्य उत्सव’ मनाने का ऐलान किया है। इस आयोजन के तहत वह ब्लड व प्लाज्मा डोनेशन कैंप लगाने जा रहे हैं। ताकि कोरोना महामारी के कारण उपजे हालातों से लड़ने में जरूरतमंदों की मदद हो सके।

लालबाग मंडल के सचिव सुधीर साल्वी ने कहा, “हमने इस साल गणेश उत्सव नहीं मनाने का फैसला किया है। हम इसे हेल्थ फेस्टिवल की तरह मनाएँगे। यह फैसला महामारी के चलते लिया गया है। त्योहार के उन 10 दिनों में हम ब्लड डोनेशन कैंप लगाएँगे, वहीं प्लाज़्मा डोनेशन के लिए लोगों को बढ़ावा देने के लिए जागरूक करेंगे। हम महामारी के चलते अपनी जान देने वाले पुलिसकर्मी और जवानों के परिवारों की भी मदद करेंगे। हम महामारी के लिए मुख्यमंत्री कोष में भी 25 लाख की रकम जमा कर रहे हैं।”

वहीं अधिकांश गणेश मंडल की ओर से भी इस बार तड़कता-भड़कता आयोजन न करने का ऐलान किया गया है। लेकिन बावजूद इन सभी मतों व प्रस्ताव के, राजदीप का इस पक्ष को एकदम नकारना और केवल भगवान का नाम लेकर लोगों को बरगलाने की कोशिश करना, यह बताता है कि उनकी चिंता इस बार लालबागचा का न आना या फिर मुंबई की सालों पुरानी परंपरा को छूटना नहीं है। बल्कि उनका एजेंडा तो यह है कि किस प्रकार से वामपंथी प्रोपेगेंडे को महामारी के समय में हवा देकर हिंदू आस्था को आहत किया जाए।

बता दें कि राजदीप सरदेसाई की इस टिप्पणी ने इस बार शिवसेना नेता प्रियंका चतुर्वेदी तक को आहत कर दिया। जिसके कारण प्रियंका ने राजदीप को आड़े हाथों लेते हुए समझाया- लालबागचा ने महामारी के आगे घुटने नहीं टेके। बल्कि समाज को मार्ग दर्शाया है कि कैसे प्लाज्मा डोनेशन कैंप को आयोजित करके महामारी से लड़ा जा सकता है। प्रियंका चतुर्वेदी लिखती हैं कि राजा और त्यौहार पर आधी जानकारी से भरा ट्वीट उसे भयानक बनाता है।

उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के स्कूलों के बाद अब सरकारी दफ्तरों में भी मराठी किया अनिवार्य, नहीं तो रुकेगा इन्क्रीमेंट

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने गत सोमवार (जून 29, 2020) को सभी विभागों को सरकारी कार्यालय के काम में मराठी को आधिकारिक भाषा के रूप में उपयोग करने का निर्देश दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसने विभागों के बीच लिखित संचार के लिए मराठी का उपयोग अनिवार्य कर दिया है। ऐसा नहीं करने वाले अधिकारी और कर्मचारी का इस साल का इन्क्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोक दिया जाएगा। ज्ञात हो कि यह विभाग फिलहाल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पास है।

अधिसूचना में कहा गया है कि किसी भी सरकारी काम में यदि मराठी का उपयोग करने में विफलता पाई जाती है तो इसका परिणाम यह होगा कि अधिकारियों की वार्षिक वेतन वृद्धि में कटौती की जाएगी। उन्होंने कहा कि ऐसा ना करने पर उनकी गोपनीय सेवा पुस्तिका (कांफिडेंसियल सर्विस बुक) में भी नकारात्मक टिप्पणी दर्ज की जाएगी।

इस नोटिस में लिखा गया है कि अंग्रेजी में आधिकारिक दस्तावेजों और आदेशों के खिलाफ लोगों द्वारा कई शिकायतें उठाई गई हैं। इसने सरकार और आम लोगों के बीच संवाद में दूरी पैदा कर दी है। सर्कुलर के अनुसार, सभी सरकारी दफ्तरों, मंत्रालयों, डिविनजल दफ्तर और निकाय कार्यालयों में आधिकारिक इस्तेमाल के लिए लिखे जाने वाले पत्रों और अन्य संचार माध्यमों में सिर्फ मराठी भाषा का इस्तेमाल करना होगा

सर्क्युलर में कहा गया है कि सरकारी अधिकारी मराठी को अनिवार्य भाषा बनाने के आदेश के बावजूद आंतरिक संचार के लिए अंग्रेजी को प्राथमिकता दे रहे हैं। मामले में दोषी पाए जाने पर कर्मचारी को ठोस वजह के साथ स्पष्टीकरण देना होगा।  

मराठी भाषा विभाग में डेस्क अधिकारी राजश्री बापट द्वारा हस्ताक्षरित इस आदेश में कहा गया है – “यह देखा गया है कि कई वेबसाइट्स केवल अंग्रेजी में हैं। उन अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी जो सरकारी काम में मराठी का उपयोग करने में विफल रहते हैं। वह मराठी भाषा विभाग में डेस्क अधिकारी हैं।”

आदेश में कहा गया है कि मराठी भाषा के उपयोग से आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने में मदद मिलेगी और वे आपदा प्रबंधन सहित विभिन्न विभागों द्वारा जारी सरकारी अधिसूचनाओं को समझने में सक्षम होंगे। आमजन भी सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकेंगे।

विभागों को निर्देश दिया गया है कि वे आधिकारिक पत्राचार और संचार में मराठी का उपयोग करने का आदेश देते हुए वेबसाइट को अंग्रेजी से मराठी में बदलें। बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) जैसे स्थानीय प्रशासन को भी मराठी में सूचनाएँ जारी करने के लिए कहा गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले, महाराष्ट्र सरकार ने सीबीएसई और आईसीएसई से संबद्ध 10वीं कक्षा तक के सभी स्कूलों में मराठी को अनिवार्य विषय बनाया था। इस आदेश का उल्लंघन करने वाले स्कूल से एक लाख रुपए जुर्माना वसूलने का प्रावधान किया गया है। 

आतिश तासीर की माँ तवलीन सिंह ने बलिदानी सैनिक की माँ का किया अपमान, कहा- ‘BJP Troll’

लेखक और पत्रकार आतिश तासीर की माँ तवलीन सिंह ने एक बार फिर से अपनी कुत्सित बुद्धि का परिचय दिया है। इस बार तवलीन सिंह ने वीरगति को प्राप्त एक जवान की माँ के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया। बता दें कि ये उसी आतिश तासीर की माँ हैं, जिसका पिछले साल नवंबर में ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) स्टेटस रद्द कर दिया गया था।

भारत सरकार द्वारा सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर 59 चाइनीज ऐप को बैन करने के फैसले के बाद तवलीन सिंह ने इसका मखौल उड़ाते हुए ट्विटर पर लिखा कि क्या इन ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने से चीनी सैनिक हमारे क्षेत्र से पीछे हट जाएँगे।

तवलीन सिंह की इस भद्दी टिप्पणी पर बलिदान हुए एक सैनिक की माँ मेघना गिरीश ने कहा कि चीनी सैनिकों को पीछे खदेड़ने और सीमा की रक्षा के लिए 20 जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। ऐसे में इस तरह की टिप्पणी करना बेहद अपमानजनक है।

इसके बाद तलवीन सिंह ने मेघना गिरीश की देशभक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह उनसे ज्यादा देशभक्त हैं, क्योंकि वो एक सैनिक की बेटी है और आर्मी स्टेशन में पली बढ़ी है। वह देश के लिए जान देने वालों के बारे में जानती है। उन्होंने कहा, “मुझे अपने ट्विटर हैंडल पर अपनी देशभक्ति का जज्बा रखने की जरूरत नहीं है, जैसे बीजेपी ट्रोल करती है।”

मेघना गिरीश की विनम्र असहमति के लिए, तवलीन सिंह ने गाली-गलौच का सहारा लिया और उन पर ‘बीजेपी ट्रोल’ होने का आरोप लगाया।

गौरतलब है कि बेटे आतिश तासीर का OCI कार्ड रद्द होने के बाद से ही तवलीन का इस तरह का रवैया रहा है। गौरतलब है कि 7 नवंबर 2019 को आतिश तासीर का OCI कार्ड रद्द कर दिया गया था। कारण था – भारतीय गृह मंत्रालय से जरूरी सूचनाएँ छिपाना। दरअसल, ब्रिटेन में जन्मे लेखक व पत्रकार आतिश अली तासीर ने भारत सरकार से जो जरूरी सूचना छुपाई, वह यह थी कि उसके पिता पाकिस्तानी मूल के थे।

गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, तासीर ओसीआई कार्ड के लिए अयोग्य हो गए हैं, क्योंकि ओसीआई कार्ड के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में वो असमर्थ रहे। उन्होंने अपने पिता के पाकिस्तानी होने की बात अधिकारियों व सरकारी रिकॉर्ड में छिपाई।

प्रवक्ता ने कहा कि तासीर को उसके पीआईओ/ओसीआई कार्ड के संबंध में अपना जवाब/आपत्ति दर्ज करने का अवसर दिया गया था, लेकिन उसने इस नोटिस पर कोई संज्ञान नहीं लिया। उसने इस पर अपना कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद आतिश अली तासीर का नाम भारतीय नागरिकता कानून, 1955 के तहत ओसीआई कार्ड धारक की सूची से हटा दिया गया।

तब से, माँ-बेटे की जोड़ी ने अपने भाजपा विरोधी और मोदी विरोधी तीखे हमले करने शुरू कर दिए। इतना ही नहीं तवलीन सिंह ने ग्लोबल उम्मा का समर्थन भी किया था और नागरिकता संशोधन अधिनियम के संबंध में अफवाह और झूठ फैलाया था। अब उन्होंने दिखा दिया कि जो भी उनसे सवाल करेगा, वो उनके लिए ‘बीजेपी ट्रोल’ होगा।

बता दें कि मेघना गिरीश, मेजर अक्षय गिरीश कुमार की माँ हैं, जिन्होंने 29 नवंबर 2016 को नगरोटा में खुद को अमर कर लिया था जब आतंकवादियों ने भारतीय सेना के ठिकाने पर हमला किया था। तवलीन सिंह के बेटे आतिश तासीर अपना खाली समय हिंदूफोबिया प्रदर्शित करने और इस्लामवादियों की भाषा बोलने में बिताते हैं। जिसने उनके पाकिस्तानी पिता को ईशनिंदा के आरोप में मार डाला।

TikTok का केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ने से पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का इनकार, कहा – नहीं होंगे भारत सरकार के खिलाफ

सुप्रीम कोर्ट में टिकटॉक की ओर से पैरवी करने के मामले में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल व वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में टिकटॉक के वकील बनकर पेश नहीं होंगे, क्योंकि वह नहीं चाहते कि भारत सरकार के ख़िलाफ़ वो किसी चीनी कंपनी का प्रतिनिधि बनें।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत सरकार द्वारा चीनी कंपनियों के ख़िलाफ सख्त रुख अख्तियार करने के बाद टिकटॉक ने भारत सरकार के फैसले को चुनौती दी है। इसी के मद्देनजर वरिष्ठ वकील का यह बयान आया।

यहाँ बता दें कि टिकटॉक समेत कुल 59 ऐप बैन होने के बाद भारत में स्थित टिकटॉक के हेड निखिल गाँधी ने एक बयान जारी किया था। बयान में दावा किया गया था कि वह अपने यूजर्स का डेटा किसी भी विदेशी सरकार के साथ साझा नहीं करते। चाहे फिर वो चीन सरकार ही क्यों न हो।

मगर, बावजूद इस दावे के, भारत सरकार ने टिकटॉक की सर्विस को देश में दोबारा रेज्यूम नहीं किया। इसीलिए इस कंपनी ने अपना मसला सुप्रीम कोर्ट में उठाया। लेकिन देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल ने चीन ऐप की पैरवी करने से इंकार कर दिया।

गौरतलब है कि गूगल प्ले स्टोर पर अब चायनीज मोबाइल ऐप TikTok पूरी तरह से बंद हो गई है। यानी, अब भारत में ना ही टिकटॉक को यूजर्स अब डाउनलोड कर सकते हैं और ना ही इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत सरकार द्वारा 59 चायनीज ऐप प्रतिबंधित करने के बाद भी यह ऐप मोबाईल में काम कर रही थी लेकिन अब इस पर वीडियो स्ट्रीमिंग बंद हो चुकी है।

याद दिला दें कि भारत सरकार के इस कड़े फैसले से कुछ दिन पहले ही भारतीय खुफिया एजेंसियों ने सरकार को 52 एप्स को लेकर अलर्ट जारी किया था और देश के नागरिकों को भी इन एप्स को इस्तेमाल करने से मना किया था। खुफिया एजेंसियों के इस अलर्ट के बाद सरकार ने इन 52 एप्स समेत 59 एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। सरकार ने इन चाइनीज एप्स को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बताया है।

नाबालिग बहन से मेहताब ने किया था रेप, बदला लेने के लिए प्लानिंग के साथ तिहाड़ जेल जाकर चाकू से मार डाला

दिल्ली की तिहाड़ जेल से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। वहाँ एक कैदी ने अपनी बहन के साथ दुष्कर्म का बदला लेने के लिए दूसरे कैदी को धारधार हथियार से वार करके मार डाला। मृतक कैदी की पहचान मोहम्मद मेहताब के रूप में हुई जबकि हत्या को अंजाम देने वाले दोषी का नाम जाकिर है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पूरी घटना को अंजाम देने के लिए जाकिर ने एक गहरी साजिश रची थी। वह 2018 में तिहाड़ में रेप के आरोप में बंद हुआ था। इसके बाद से ही वो किसी तरह मेहताब के पास जाने की जुगत में जुटा हुआ था।

अपने इरादों को अंजाम देने के लिए उसने अपने साथी कैदियों से बेवजह लड़ाइयाँ कीं। जिसके कारण जेल प्रशासन ने अंत में परेशान होकर उसे जेल नंबर 8 के उसी वार्ड में शिफ्ट कर दिया, जहाँ पहले तल पर मेहताब कैद था।

इसके बाद 29 जून की सुबह जाकिर ने जेल में मेटल जैसी चीज से खुद एक चाकू नुमा हथियार बनाया, और मेहताब पर हमला कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया। बाद में डीडीयू अस्पताल में मेहताब को भर्ती कराया गया। लेकिन वहाँ उसने दम तोड़ दिया।

पुलिस का कहना है कि 21 साल के जाकिर ने बीते सोमवार की सुबह 6 बजे के करीब मेहताब के पेट और गले पर कई वार करके उसकी हत्या की। पुलिस की मानें तो जाकिर बहुत लंबे समय से मेहताब से बदला लेने की कोशिशों में जुटा हुआ था।

मीडिया खबरों के अनुसार, साल 2014 में दिल्ली के आंबेडकर नगर इलाके में रहने वाले जाकिर की नाबालिग बहन के साथ मेहताब नाम के शख्स ने दुष्कर्म किया था। जिसके बाद पीड़िता ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी।

इस घटना ने जाकिर को झकझोर कर रख दिया था। जाकिर, तब से हर हाल में सिर्फ़ अपनी बहन के रेप का बदला लेना चाहता था, लेकिन आरोपित रेप के मामले में तिहाड़ जेल जा चुका था। इसी कारण उसने बदला लेने के लिए ये पूरी साजिश रची।

पुलिस उपायुक्त ने इस संबंध में बताया कि जब सोमवार को सुबह करीब छह बजे अन्य कैदी प्रार्थना के लिए बाहर आए तभी आरोपित ऊपर की मंजिल पर गया और मेहताब पर चाकू जैसी वस्तु से हमला कर दिया। उन्होंने बताया कि ज़ाकिर के खिलाफ हरी नगर पुलिस थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है।

बहन! मैंने राखी का वायदा पूरा किया पर Pak का अंतिम टैंक नहीं उड़ा सका: ‘परमवीर’ अब्दुल हमीद

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में हुए युद्ध के बलिदानी अब्दुल हमीद को उनकी वीरता और साहस के लिए याद किया जाता है। अब्दुल हमीद को उनके वीरगति को प्राप्त होने के उपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया था। अगस्त 2019 में उनकी पत्नी रसूलन बीबी का निधन हुआ था, जो 95 वर्ष की थीं। अब्दुल हमीद गाजीपुर जिले के धामूपुर गाँव के निवासी थे। सितम्बर 2020 में वीर अब्दुल हमीद के बलिदान को 55 वर्ष हो जाएँगे। यहाँ आगे हम बताएँगे कि कैसे उन्होंने अपनी ‘बहन’ से किया राखी का वादा निभाया।

जब सितम्बर 10, 2017 में भारतीय सेना के तत्कालीन प्रमुख (अब सीडीएस) जनरल विपिन रावत ने रसूलन बीबी के पाँव छूकर आशीर्वाद लिया था उन्होंने कहा था कि रावत उनके बेटे की तरह हैं। आज भी अब्दुल हमीद को जब उनकी वीरता के लिए याद किया जाता है तो उन लोगों को उनके बारे में याद दिलाना ज़रूरी है जो समुदाय विशेष को गुमराह करने के लिए राजनीति करते हैं।

सम्मानित दिवंगत पत्रकार शिवकुमार गोयल अपनी पुस्तक ‘जवानों की गाथाएँ‘ में वीर अब्दुल हमीद की वीरता का वर्णन सबसे अलग तरीके से करते हैं। वो चौथी ग्रेनेडियर्स के कम्पनी क्वार्टर मास्टर हवलदार थे, जिन्होंने लाहौर के कुसूर क्षेत्र से भी आगे तक पाकिस्तानी सेना को घर में घुस कर खदेड़ा था। ये सितम्बर 17, 1965 की बात है, जब पाकिस्तान की सेना अपने पैटन टैंकों के साथ आगे बढ़ रही थी। उनके दस्ते में अच्छी-ख़ासी संख्या में जवान थे।

यही वो जगह थी, जहाँ पाकिस्तानी सेना और वीर अब्दुल हमीद के जवानों के बीच जबरदस्त युद्ध हुआ। हवलदार अब्दुल हमीद अपनी जीप पर आरसीएल गन लेकर तैनात थे और उन्होंने उसी से टैंकों वाली सेना के छक्के छुड़ा दिए। उन्होंने उन टैंकों के साए में जाकर उससे मात्र 150 गज की दूरी पर स्थित होकर युद्ध किया था। अब्दुल हमीद का निशाना इतना अचूक था कि उस पराक्रमी जवान ने अपने पहले ही गोले में पाकिस्तानी टैंक को धूल में मिला दिया था।

जिस साहस के साथ वो पाकिस्तानी टैंकों पर गोले बरसा रहे थे, वो देखने लायक था। उन्होंने दूसरा गोला दागा और इसे बाद एक और पाकिस्तानी पैटन टैंक ध्वस्त हो गया। इस वीर जवान ने तीसरे पाकिस्तानी टैंक को भी लगभग उड़ा ही दिया था लेकिन वो वीरगति को प्राप्त हुए। हालाँकि, वो टैंक भी क्षतिग्रस्त ज़रूर हो गया था। उन्हीं टैंकों में से एक का गोला उनके पास आकर गिरा और उन्होंने देश के लिए अपना बलिदान दिया।

इस दौरान एक और वाकए का जिर्क करना आवश्यक है। बलिदानी वीर अब्दुल हमीद के पॉकेट से एक चिट्ठी भी निकली थी, जिसमें लिखा था- “बहन! मैंने राखी के तुम्हारे वायदे को पूरा किया। मैंने दुश्मन के दो पैंटन टैंकों को तबाह कर दिया है लेकिन तीसरे को नहीं कर सका। इसके लिए माफ़ करना- तुम्हारा भाई अब्दुल हमीद।” दरअसल, इस चिट्ठी के पीछे भी एक कहानी है, जिसका जिक्र शम्भूनाथ पांडेय ने अपनी पुस्तक ‘प्रेरक कथाएँ‘ में किया है। हालाँकि, उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ कुल मिला कर 6 पाकिस्तानी टैंकों को धूल में मिला दिया था।

दरअसल, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय देशप्रेम का जज्बा अपने पूरे शबाब पर था। यहाँ तक कि देश का एक-एक बच्चा ख़ुद को सैनिक ही समझ रहा था। सब ने किसी न किसी रूप में योगदान दिया था। अब्दुल हमीद की टुकड़ी भी जब आगे बढ़ रही थी तो उनका जगह-जगह पर लोगों द्वारा अभिवादन किया जा रहा था। ये दिखाता है कि सेना को लेकर लोगों के मन में कितना सम्मान था, आज भी है।

इसी क्रम में हुआ यूँ कि अब्दुल हमीद की टुकड़ी जब तक पंजाब पहुँचती, तब तक रक्षाबंधन की तारीख पास आ गई। मोर्चा संभालने जा रहे जवानों की बहनों को उनकी याद आनी स्वाभाविक थी, ठीक इसी तरह इन जवानों को भी अपनी बहनों की याद आई ही होगी। पंजाब की ही एक महिला ने इस दौरान अबुल हमीद को राखी बाँधी। जैसा कि हर भाई का कर्त्तव्य होता है, अब्दुल हमीद ने भी कुछ भेंट निकाल कर अपनी उस ‘बहन’ को देनी चाही।

लेकिन उस महिला ने वीर सैनिक से कुछ भी लेने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि आप युद्ध-क्षेत्र में दुश्मन के छक्के छुड़ा देना, मेरे लिए राखी की सच्ची भेंट यही होगी। अब्दुल हमीद को बलिदान के समय भी थी। उस वीर सैनिक के मन में देशभक्ति के अलावा राखी का ‘कर्ज’ उतारने की बात चल रही थी। जहाँ राखी बँधवाने समय उनके मन में अपार हर्ष था, बलिदान के वक़्त एक दुर्लभ संयम।

वीर अब्दुल हमीद के बारे में कुछ और जान लेते हैं। उनका जन्म जुलाई 1, 1933 को हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की उम्र में देश के लिए अपना बलिदान दिया। दुशमन की गोलीबारी के बीच जब वो घायल हो गए थे, तब भी उनके मुँह से बार-बार यही शब्द निकल कर गूँज रहे थे- ‘आगे बढ़ो।‘ ऐसा नहीं है कि उन्होंने सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान के युद्ध में ही अपना शौर्य दिखाया था। इससे पहले 1962 भारत-चीन युद्ध में उन्होंने चीन के भी दाँत खट्टे किए थे।

उस समय वो नेफा मोर्चे पर तैनात थे, जहाँ चीन से भीषण युद्ध हुआ था। उन्हें परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित करते हुए उल्लेख किया गया कि वीर अब्दुल हमीद ने ‘अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना निष्ठापूर्वक कर्त्तव्य पालन’ करते हुए ‘सर्वश्रेष्ठ वीरता’ का प्रदर्शन किया। तत्कालीन यूपी सरकार की तरफ से उनके परिवार को 10 हजार रुपए की सहायता दी गई और खेती-बारी के लिए परिवार को भूमि उपलब्ध कराई गई थी।

अब्दुल हमीद 1954 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे। दरअसल, 1965 में वो पंजाब के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में ही तैनात थे। सितम्बर 8 की रात जब पाकिस्तान ने हमला किया था तब उनके पास पाकिस्तानी सेना को रोकने की चुनौती थी। पाकिस्तान के पास जो पैटन टैंक थे, वो उसे अमेरिका से मिले थे। रक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि अब्दुल हमीद की ‘गन मॉउंटेड जीप’ उन टैंकों के सामने खिलौना भर ही थी।

नानाजी के शव पर बैठे बच्चे को सुरक्षाबल के जवान ने बचाया… सोपोर में आतंकी ने गोली मार दी

जम्मू कश्मीर के सोपोर में आतंकियों ने एक व्यक्ति को गोली मार दी। अपने नानाजी की लाश के पास ही फँसे उसके 3 साल के बच्चे को सीआरपीएफ (CRPF) के जवान और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अपनी जान पर खेल कर बचाया। जम्मू कश्मीर में अब आतंकी आम नागरिकों को निशाना बना रहे हैं क्योंकि भारतीय सशस्त्र बल उनका तेज़ी से सफाया कर रहे हैं। इसी बीच CRPF के गश्ती दल पर हमला हुआ, जिसमें एक आम नागरिक की मौत हो गई।

लेकिन, इस दौरान उनके 3 साल के बच्चे को आतंकियों की गोलियों की बौछाड़ के बीच बचाना चुनौती भरा काम था, जिसके लिए CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी। वायरल तस्वीरों में उक्त बच्चे को अपने नानाजी की लाश पर बैठा देखा जा सकता है। उसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक जवान की गोद में रेस्क्यू किए गए बच्चे को देखा जा सकता है। लोग इसके लिए सुरक्षाबलों की तारीफ कर रहे हैं।

मासूम बच्चे को तो शायद पता भी नहीं था कि उसके निर्दोष नानाजी की कायर आतंकियों द्वारा बेरहमी से हत्या कर दी गई है। CRPF और आतंकियों के बीच हो रही मुठभेड़ के बीच वो अपने नानाजी की लाश पर बैठ कर ही खेल रहा था। CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान उसे रेस्क्यू कर जल्द सुरक्षित स्थान पर लेकर गए। जम्मू कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन पूरी तेज़ी से चल रहा है, जिससे वो कुछ ज्यादा ही बौखलाए हुए हैं।

बता दें कि इस साल जम्मू कश्मीर में अब तक 135 आतंकियों को मार गिराने में सुरक्षा बलों ने सफलता पाई है। अब आतंकियों को ‘नायक’ बना कर पेश किए जाने के चलन और उनकी ‘अंतिम यात्रा’ के नाटक पर रोक लगाते हुए उनके शवों को दफ़न किया जा रहा है। इससे जम्मू कश्मीर के एक्टिविस्ट्स और आतंकी बौखलाए हुए हैं। इसीलिए वो खुन्नस में निर्दोष नागरिकों और बच्चों को निशाना बना रहे हैं।

जब ताइवान कवरेज पर चीन जताता रह गया आपत्ति और दूरदर्शन ने तिब्बत पर भी चला दिया प्रोग्राम

साल 2020 के जनवरी माह में दूरदर्शन ने ताइवान राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन पर अपना एक स्पेशल शो ऑन एयर किया था। इस शो में उनसे जुड़ी कई बातें बताई गईं थी। इसी शो में यह भी बताया गया था कि त्साई ने चीन के ‘एक देश, दो सिस्टम’ मॉडल को खारिज कर दिया और अपनी जीत के बाद भाषण देते हुए अपने विरोध को दोहराया भी था।

13 जनवरी को हुए इस प्रोग्राम में दूरदर्शन ने ताइवान के प्रतिनिधि तीन चुंग-क्वांग को भी भारत आमंत्रित किया था। जिन्होंने ताइवान की स्वतंत्रता पर बात की और चीन के एक देश दो सिस्टम वाले मॉडल को खारिज किया। उन्होंने कहा कि चीन का सुझाया यह मॉडल कभी भी ताइवान के लोग नहीं स्वीकार करेंगे।

अब इसी बात से नाराज भारत में मौजूद चीनी एंबेसी ने दूरदर्शन को पत्र लिखा और प्रोग्राम प्रसारण पर अपना असंतोष जताया। सूत्रों के मुताबिक, भारत के चीनी एंबेसी ने 16 जनवरी 2020 को अपने एक ईमेल में दावा किया कि ताइवान की स्वतंत्रता को मंच प्रदान करके दूरदर्शन ने वन चाइना पॉलिसी का उल्लंघन किया है।

इस दौरान चीनी दूतावास ने दावा किया कि दुनिया में केवल एक चीन है और चीन की मुख्यभूमि और ताइवान दोनों ही चीन से संबंधित हैं। लेकिन चीनी दूतावास के असंतुष्ट होते हुए भी दूरदर्शन ने ताइवान पर अपना प्रसारण जारी रखा। फरवरी में दूरदर्शन ने चीन की आपत्ति जानने के बाद भी ताइवान के खास त्यौहार पर अपना प्रोग्राम किया। और फिर मार्च के बाद तिब्बत पर भी अपना एक विशेष कार्यक्रम चला दिया।

अपने तिब्बत वाले शो में दूरदर्शन ने भारत में निर्वासित तिब्बतियों पर कार्यक्रम किया। इस शो में उन्होंने भारत में तिब्बतियों का जीवन और अन्य राजनीतिक निहितार्थ बताए।

गौरतलब है कि ताइनवान पर कवरेज से बौखलाया चीन तिब्बत पर कुछ नहीं बोल पाया। ये दोनों ही यह वो क्षेत्र है, जिन पर चीन अपना दावा करता है। लेकिन तिब्बत के लोग और ताइवान के लोग उसे नहीं स्वीकार करना चाहते।

बता दें कि 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद चीन ने ताइवान पर नियंत्रण कर लिया था। हालाँकि, ताइवान ने इस दौरान चीनी नियमों को मानने से इंकार किया। लेकिन फिर भी चीन ने ताइवान पर अपना नियंत्रण जारी रखा। इसी प्रकार तिब्बत की बात करें तो चीन इसके पश्चिमी और मध्य भाग को नियंत्रित करता है, लेकिन तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

मार डाले गए आतंकियों की लाश घर वालों को दफनाने के लिए भी नहीं, ‘ह्यूमन ट्रैजडी’ कह रो रहे एक्टिविस्ट्स

मोदी सरकार ने आतंकियों की ‘अंतिम यात्रा’ के नाम पर उन्हें हीरो बनाने के चलन पर रोक तो पहले ही लगा दी थी, अब इसके अमल में आने के बाद से इसका प्रभाव भी दिखना शुरू हो गया है। आतंकियों के परिवार और जम्मू कश्मीर के कई लोगों का कहना है कि मारे गए आतंकियों का इस्लामी और स्थानीय रीति-रिवाजों के हिसाब से ‘अंतिम संस्कार’ किया जाना चाहिए। आतंकियों को ‘ठीक तरीके से दफन करने’ की माँग जोर पकड़ रही है।

‘डेक्कन क्रोनिकल’ की ख़बर के अनुसार, जम्मू कश्मीर मे आइएस विंग के आतंकी शकूर फारूकी के मारे जाने के बाद उसके पिता फारूक अहमद लंगू ने इसे ‘जुर्म और ज्यादती’ बताया है। आतंकी फारूकी को कश्मीर के जोनिमार मे सशस्त्र बलों के साथ हुए मुठभेड़ में मार गिराया गया था। अहमद नगर में एक मोटरसाइकल बम से हमला किया गया था, जिसमें फारूकी का हाथ था। इसमें बीएसएफ के दो जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

जून 21 को हुई मुठभेड़ मे बीएसएफ जवानों से लूटे गए राइफल को भी बरामद किया गया। अहमद फारूक का कहना है कि पुलिस ने शाम 5 बजे उसके बेटे की बॉडी देने कि बात कही थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसका चाचा मुहम्मद मकबूल भी पुलिसकर्मियों के ‘व्यवहार’ से नाराज है। उसने कहा कि परिवार को उसकी ‘जिम्मेदारी’ निभाने देना चाहिए क्योंकि उनके ‘बच्चे’ को कैसे दफनाया जा रहा है, ये देखना उनका हक है।

सबसे मजाकिया बात ये है कि आतंकी का चाचा इसे ‘ह्यूमन ट्रैजडी’ भी करार देता है। आतंकी को उसका परिवार उसके घर के पास वाले कब्रगाह मे दफनाना चाह रहा था। डीजीपी दिलबाग सिंह कहते हैं कि शकूर को तो आत्मसमर्पण करने का मौका भी दिया गया था। लेकिन वो नहीं माना। इस साल अब तक 135 आतंकियों का सफाया किया जा चुका है। डीजीपी ने कहा कि अब ग्राउन्ड पर शांति बनाए रखने की कोशिशें करते हुए आतंकियों का सफाया हो रहा है।

साथ ही आतंकियों के शवों को उनके परिवार को सौंपने के बजाए चुपचाप दफनाया जा रहा है ताकि उन्हें ‘नायक’ बना कर पेश करने और ‘अंतिम यात्रा’ मे हजारों के जुटान को रोका जा सके। जम्मू कश्मीर में आतंकियों के हावी होने के बाद पिछले 31 सालों में यह पहला मौका है, जब इस तरह कि रणनीति अपनाई जा रही है। अप्रैल में बारामुला में एक आतंकी को दफन किए जाने समय हजारों लोग जमा हो गए थे।

कम से कम कोरोना वायरस आपदा के समय तक तो परिवारों को शव नहीं ही सौंपे जाएँगे क्यों भीड़ जुटने से लोगों की जान को खतरा हो सकता है। जम्मू कश्मीर में कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इसका रोना रो रहे हैं। वो जेनेवा कन्वेन्शन की दुहाई देकर सरकार का विरोध कर रहे हैं। यहाँ तक कि जम्मू कश्मीर यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि आपदा का पुलिस गलत फायदा उठा रही है।

ज्ञात हो कि लिबरलों द्वारा गणित का शिक्षक बताए जाने वाले रियाज नायकू के मारे जाने के बाद सेना ने केवल ये कहा था कि दो आतंकवादी मारे गए हैं। सेना के अधिकारियों ने बताया था कि उनकी नजर में कोई बड़ा आतंकवादी या टॉप कमांडर नहीं होता हैं, सारे आतंकवादी केवल एक आतंकी की श्रेणी में आते हैं। यहाँ तक कि सेना के किसी भी ट्वीट में रियाज नायकू के नाम का कोई जिक्र नहीं किया गया था। ये सेना की बदली हुई नई रणनीति थी, जिसकी शुरुआत लॉकडाउन के दौरान ही की गई थी। 

हाल ही में मंगलवार (जून 30, 2020) को सेना ने बताया था कि 2 आतंकी मार गिराए गए हैं। ये वही थे, जिन्होंने अनंतनाग के बिजबेहड़ा में पिछले शुक्रवार (जून 26, 2020) को सीआरपीएफ की पार्टी पर हमला किया था। उस अटैक में सीआरपीएफ का एक जवान वीरगति को प्राप्त हो गए और 5 साल के बच्चे की मौत हो गई थी। इससे पहले सोमवार (जून 29, 2020) को आर्मी और पुलिस ने जॉइंट ऑपरेशन में अनंतनाग जिले के खुलचोहर इलाके में 3 आतंकियों को ढेर कर डोडा जिले को आतंकवाद मुक्त घोषित कर दिया था।