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अल्लाह के हुक्म से ‘पैगंबर’ बना अब्दुल रज्जाक, बनवाई काबा मस्जिद: ‘हज का शबाब’ लेने आती थीं मुस्लिम महिलाएँ, लोगों ने गैर-इस्लामिक बता लगा दी आग

जम्मू कश्मीर के बारामूला में एक ढोंगी पीर पकड़ा गया है। उसने जम्मू कश्मीर में ही सऊदी अरब की काबा मस्जिद जैसी एक इमारत बनवा ली थी। वह खुद को पैगम्बर के रूप में दिखाता था। उसने अपने खेत में एक इमारत बनवा रखी थी जहाँ वह गाँजा-चरस पीता था। उसकी मुरीदों में महिलाओं की बड़ी संख्या थी।

जम्मू कश्मीर पुलिस ने बारामूला से अब्दुल रज्जाक नाम के शख्स को पकड़ा है। अब्दुल रज्जाक खुद को जम्मू कश्मीर के सूफी संत नूरदीन नूरानी का अवतार बताता था। अब्दुल रज्जाक ने यही करके बड़ी संख्या में अपने मुरीद इकट्ठा कर लिए थे। उससे मिलने बड़ी संख्या में महिलाएँ भी आती थीं।

उसने अपने खेत में एक झोपड़ी भी बना ली थी। यहाँ वह लोगों को ताबीज बना कर देता था। वह यहाँ आए लोगों को चरस गांजा पिलाता था और खुद भी पीता था। आसपास के लोगों ने उसे मानसिक रूप से बीमार बताया है। उसकी बीवी तक उसे छोड़ कर चली गई थी।

अब्दुल रज्जाक खुद को पैगंबर तक बताने लगा था। उसने दावा किया था कि अल्लाह ने उसे बारामूला में ही काबा जैसी मस्जिद बनवाने का हुक्म दिया है। काबा वही मस्जिद है जहाँ हर साल करोड़ों मुस्लिम हज और उमरा के लिए जानते हैं। अब्दुल रज्जाक बताता था कि वह डुप्लीकेट काबा मस्जिद गरीबों के लिए बनवा रहा है, जो सऊदी अरब नहीं पहुँच पाते।

उसने इसका निर्माण चालू भी कर दिया था। कुछ ही दिनों में वह इसका उद्घाटन करने वाला था। हालाँकि, इसी बीच इस पूरे कारनामे की खबर किसी ने स्थानीय पत्रकारों को दे दी। वह उसके यहाँ उसके मुरीद बन कर गए और उसकी हरकतों के बारे में जानकारी हासिल की।

इस कथित पैगंबर का उन्होंने वीडियो भी बना लिया और उसकी सच्चाई सोशल मीडिया पर डाल दी। वीडियो वायरल होने पर उसके बारे में लोग जान गए और फिर पुलिस को भी यह सूचना दी गई। उसको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसकी फर्जी काबा मस्जिद भी लोगों ने ध्वस्त कर दी और आग लगा दी। इसके वीडियो भी वायरल हो रहे हैं।

इस मस्जिद को कश्मीर के एक मौलाना ने गैर इस्लामी बताया और कहा कि शरिया में इसकी कोई जगह नहीं है।

UP में वक्फ ने हड़पीं सरकार की 11712 एकड़ जमीन, कुल 57792 प्रॉपर्टी पर किया कब्जा: अयोध्या से लेकर रामपुर तक में जानें ‘मजहबी जमींदारों’ की कितनी संपत्ति, JPC की रिपोर्ट में खुलासा

उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों पर विवाद गहराता ही जा रहा है। इस संबंध में हाल में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की रिपोर्ट आई जिसे लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इसमें विवादित वक्फ संपत्तियों की जानकारी दी गई। बताया जा रहा है कि इस रिपोर्ट मे यूपी की ऐसी 57792 सरकारी संपत्तियों के बारे में बात है जिन पर वक्फ ने अपनी ओर से दावा किया हुआ है। ये संपत्ति 11712 एकड़ में फैली हुई है।

जानकारी के मुताबिक, वक्फ के नाम शाहजहाँपुर में 2589 संपत्तियाँ दर्ज हैं, जिनमें से 2371 सरकारी संपत्तियाँ हैं। रामपुर में 3365 वक्फ संपत्तियाँ हैं, जिनमें से 2363 सरकारी संपत्ति हैं। अयोध्या में 3652 संपत्तियों पर दावा किया जा रहा है, जिनमें से 2116 सार्वजनिक संपत्ति हैं। जौनपुर में 4167 में से 2096 और बरेली में 3499 वक्फ संपत्तियों में से 2000 सरकारी जमीनों पर स्थित हैं।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों जैसे लखीमपुर खीरी (1,792), बुलंदशहर (1,778), फतेहपुर (1,610) आदि में भी वक्फ के दावे देखने को मिले हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन सभी संपत्तियों का राजस्व रिकॉर्ड सार्वजनिक उपयोग वाली श्रेणी में आता है। यूपी सरकार ने जेपीसी को बताया कि इनमें से अधिकांश भूमि वर्ग 5 और वर्ग 6 के तहत आती है जो सरकारी और ग्राम सभा की सम्पत्ति मानी जाती है।

JPC रिपोर्ट में सिफारिश

जेपीसी की रिपोर्ट में वक्फ संपत्तियों की जाँच और उनके निपटारे को लेकर कुछ सिफारिशें की गई हैं। इसमें एक सिफारिश है कि केंद्रीय वक्फ काउंसिल में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा ट्रिब्यूनल के सदस्यों की संख्या और उनकी योग्यता को फिर से निर्धारित करने का सुझाव दिया गया है ताकि मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।

मजहबी जमींदर बना वक्फ

बता दें कि जिस वक्फ ने मजहब के नाम पर भारत में इतनी संपत्ति पर कब्जा किया हुआ है उसके बारे में सुनकर आपको शायद हैरानी होगी कि वक्फ का कॉन्सेप्ट इस्लामी देशों तक में नहीं है। फिर वो चाहे तुर्की, लिबिया, सीरिया या इराक हो। लेकिन भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते आज हालात ऐसे हैं कि इन्हें देश में तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बताया जाता है। इनके पास अकूत संपत्ति है। अल्पसंख्यक मंत्रालय के अनुसार वक्फ बोर्ड के पास पूरे देश भर में 8,65,646 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं। इनमें से 80 हजार से ज्यादा संपत्ति वक्फ के पास केवल बंगाल में हैं। इसके बाद पंजाब में वक्फ बोर्ड के पास 70,994, तमिलनाडु में 65,945 और कर्नाटक में 61,195 संपत्तियाँ हैं। देश के अन्य राज्यों में भी इस संस्थान के पास बड़ी संख्या में संपत्तियाँ हैं।

न विज्ञापन पर उड़ाए रुपयों की दी डिटेल, न मंत्रियों-विधायकों का खर्चा बताया: पंजाब की AAP सरकार को HC ने फटकारा, अस्पतालों का पैसा ना देने पर अदालत ने पूछे थे सवाल

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार को लताड़ा है। हाई कोर्ट ने कहा है कि AAP सरकार खर्चों के बारे में पूछी गई जानकारी नहीं देना चाहती। हाई कोर्ट ने AAP सरकार से विज्ञापन और गाड़ियों समेत कई कामों का खर्च माँगा था। हाई कोर्ट ने इस मामले में पंजाब सरकार के कोर्ट की अवमानना करने की बात कही थी।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस कुलदीप तिवारी ने इस मामले में दाखिल किए गए पंजाब सरकार के हलफनामे पर कहा, “हलफनामे में दिए गए कारणों से तो लगता है कि सरकार का हमारे निर्देश का पालन करने का कोई इरादा नहीं है।” हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार से पूछा है कि क्या वह सही में अपने खर्च बताने की इच्छा भी रखती है या नहीं।

कोर्ट ने इस बात को लेकर नया हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इस मामले की सुनवाई अब 14 फरवरी 2025 को होने वाली है। हाई कोर्ट ने सितम्बर, 2024 में आदेश दिया था कि पंजाब सरकार अपने विज्ञापनों, नई गाड़ियों, मंत्री-विधायको के आवास पर होने वाले खर्च और दिल्ली की अदालतों में केस मुकदमे लड़ने के लिए खर्च का ब्योरा दे।

हाई कोर्ट ने यह ब्यौरा कई अस्पतालों की याचिकाओं की सुनवाई पर माँगा था। अस्पतालों ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार के पैसा देने के बावजूद पंजाब की भगवंत मान की सरकार उनका ₹500 करोड़ का बकाया भुगतान नहीं कर रही है। यह पैसा आयुष्मान योजना का था और अस्पतालों को मरीजों के इलाज के एवज में मिलना था।

हाई कोर्ट में पंजाब सरकार पैसा ना देने के मामले पर साफ जवाब नहीं दे पाई थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि सारे खर्चों का एक विस्तृत ब्यौरा उसे दिया जाए। हालाँकि, पंजाब सरकार ने यह दाखिल नहीं किया। इस मामले में जब 23 जनवरी, 2025 को सुनवाई हुई तो कोर्ट ने कहा कि पंजाब सरकार ने रिकॉर्ड ना देकर अवमानना की है।

इसके बाद हुई सुनवाई में उसने पंजाब सरकार की मंशा पर ही प्रश्न उठा दिए। हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है, जब पंजाब सरकार से उसके विज्ञापन जैसे खर्चों का रिकॉर्ड माँगा गया हो। इससे पहले हाल ही में फॉरेंसिक सुविधाओं के लिए जब पंजाब ने पैसा ना होने की बात कही थी, तो भी हाई कोर्ट ने यही जानकारी माँगी थी।

बांग्लादेश में कट्टरपंथी भीड़ का बवाल… आवामी लीग वालों के घर हमला, आलोचना करने पर अभिनेत्री गिरफ्तार: भारत ने यूनुस सरकार को फटकारा, शेख मुजीबुर के घर ढहाने को कहा- बर्बरता

भारत ने ढाका में बांग्लादेश के राष्ट्रपिता बंगबंधु मुजीबुर रहमान का घर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा ढहाए जाने की आलोचना की है। भारत ने इसे बर्बरता का कृत्य बताया है। भारत ने इसको लेकर कड़ा रुख जताया है। वहीं बांग्लादेश की सरकार शेख हसीना के भारत से ऑनलाइन रैली को लेकर खीझ गई है। उसने भारतीय हाई कमिश्नर को तलब किया है। इस बीच बांग्लादेश के कट्टरपंथी देश भर में आवामी लीग के कार्यालय धाने और शेख हसीना से जुड़े लोगों के घरों को तोड़ने में जुटे हैं।

भारत ने ढाका में बंगबंधु मुजीबुर रहमान के घर ‘धानमंडी 32’ को ढहाए और जलाए जाने के बाद बयान जारी किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, “यह काफी दुखद है कि शेख मुजीबुर रहमान का ऐतिहासिक निवास, जो गुलामी और प्रताड़ना की ताकतों के खिलाफ बांग्लादेश के लोगों के प्रतिरोध का प्रतीक है, 5 फरवरी, 2025 को ढहा दिया गया।”

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, “वे सभी लोग जो उस स्वतंत्रता संग्राम को महत्व देते हैं, जिसने बांग्ला पहचान के गौरव को बढ़ाया। वे बांग्लादेश की राष्ट्रीय चेतना के लिए इस घर के महत्व को जानते हैं। बर्बरता के इस कृत्य की कड़ी निंदा होनी चाहिए।”

इससे पहले ढाका में भारतीय हाई कमिश्नर को गुरुवार (6 फरवरी, 2025) को यूनुस सरकार ने तलब किया। बांग्लादेश ने शेख हसीना की की ऑनलाइन रैली को लेकर निंदा की और भारत से इसको लेकर कड़ा प्रतिरोध जताया। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यह रैली नई दिल्ली से ऑनलाइन माध्यम से की थी।

बांग्लादेश ने कहा कि शेख हसीना ने नई दिल्ली में बैठ कर भड़काने वाला बयान दिया और झूठे आरोप लगाए। शेख हसीना ने ऑनलाइन रैली में कहा था कि मोहम्मद यूनुस उनकी हत्या करवाना चाहते थे। शेख हसीना ने कहा था कि यूनुस पैसे की ताकत का इस्तेमाल करके और कई लोगों की लाशों पर कदम रखकर सत्ता में आए हैं।

गौरतलब है कि हसीना की इस रैली के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने शेख हसीना के पैतृक निवास को ढाका के भीतर ढहा दिया था। यह वही घर था जहाँ से शेख हसीना के पिता और बंगबंधु मुजीबुर रहमान ने पकिस्तान के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन चलाया था।

शेख हसीना की रैली के जवाब में कट्टरपंथी हथौड़े और बुलडोजर लेकर पहुँचे थे। उन्होंने इस घर को पहले आग लगाई और फिर इसे तोड़ दिया। इस बीच मोहम्मद यूनुस की पुलिस और बांग्लादेशी सेना मूकदर्शक बनी खड़ी रही। उसने इन आताताइयों को रोकने की एक भी कोशिश नहीं की।

इस घर के अलावा शेख हसीना के खुद के घर ‘सुधा सदन’ को भी जमींदोज कर दिया गया। बांग्लादेश में आवामी लीग के कई कार्यालय भी जला और तोड़ दिए गए गए। इस पूरे काम में पुलिस चुप रही। यहाँ तक कि शेख हसीना के रिश्तेदारों तक के घरों को भी नहीं छोड़ा गया।

मोहम्मद यूनुस ने भी इस ऐतिहासिक इमारत को ढहाने जाने की आलोचना की लेकिन इस कृत्य का जिम्मेदार शेख हसीना को ही ठहरा दिया। यूनुस सरकार ने बांग्लादेश में हो रही हिंसा की आलोचना करने वाली अभिनेत्री मेहर अफरोज को भी गिरफ्तार कर लिया। उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया।

अफरोज की माँ दो बार शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग से सांसद रही है जबक उनके पिता भी एक बार चुनाव लड़ चुके हैं। उनके घर को भी सिलहट में ‘धानमंडी 32’ की तरह ही जला और तोड़ दिया गया। उनको अभी जेल में रखा गया है।

PM मोदी ने यूँ ही नहीं कहा- ‘शाही परिवार’ की नीतियों से भारत हुआ बदनाम, जानिए कैसे ‘नेहरू विकास दर’ ने देश का किया बेड़ा गर्क

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के आर्थिक कुप्रबन्धन और परमिट राज लाने को लेकर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला है। पीएम मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर भारत की बदनामी करवाने के लिए गाँधी परिवार को दोषी ठहराया है। पीएम मोदी ने अर्थव्यवस्था को लेकर भारतीयों की हुई बदनामी पर भी कॉन्ग्रेस को घेरा।

राज्यसभा में गुरुवार (6 फरवरी, 2025) को प्रधानमंत्री मोदी बजट अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर बोल रहे थे। पीएम मोदी ने इस दौरान कॉन्ग्रेस की तमाम नीतियों की आलोचना के साथ जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान धीमी पड़ी अर्थव्यवस्था को लेकर बात की।

पीएम मोदी ने कहा, “शाही परिवार के आर्थिक कुप्रबन्धन और गलत नीतियों के चलते पूरे समाज में भारतीयों को दोषी ठहराया गया और बदनाम किया गया। जबकि इतिहास देखें तो भारत के समाज में स्वभाव में लाइसेंस और परमिट नहीं थी। हम खुले समाज में विश्वास करते थे। हम दुनिया भर में मुक्त व्यापार और फ्री ट्रेड करते थे।”

पीएम मोदी का यह हमला कॉन्ग्रेस राज के दौरान भारत की धीमी विकास दर और ‘लाइसेंस राज’ के चलते देश के औद्योगिकिकीकरण में हुई बाधा को लेकर था। गौरतलब है कि भारत आजाद होने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था को बंद किए हुए था और स्थिति काफी खराब होने के बाद इसमें 1991 में सुधार किया गया।

जिस आर्थिक कुप्रबन्धन और उससे हुई बदनामी की बात प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं, उसका एक बड़ा उदाहरण ‘हिन्दू विकास दर’ शब्द है। कॉन्ग्रेस राज की नीतियों के चलते भारत की धीमी विकास दर को ‘हिन्दू विकास दर’ कहा जाने लगा था। नेहरू और इंदिरा सरकार की विफलता को छुपाने के लिए यह शब्द कम्युनिस्ट अर्थशास्त्रियों ने गढ़ा था।

कई दशकों की सरकार की विफलता को बताने की जगह तब ‘हिन्दू विकास दर’ कह कर पूरे भारत को धीमा और हिन्दुओं को आलसी बताने का प्रयास किया गया था। देश के आर्थिक विकास की जिम्मेदारी का पूरा ठीकरा हिन्दुओं पर रख दिया गया था। यह शब्द जब तब अब भी चर्चा में आता है।

‘हिंदू विकास दर’ शब्द साल 1978 में तथाकथित अर्थशास्त्री राज कृष्ण द्वारा गढ़ा गया था। यह उन्होंने साल 1950 से 1980 तक जीडीपी वृद्धि दर का उल्लेख करने के लिए तैयार किया था। ‘हिंदू विकास दर’ पूरी तरह से एक गलत शब्द है, क्योंकि उस समय और बाद में भी देश की अर्थव्यवस्था में हिंदुओं का सबसे बड़ा योगदान था।

1950-80 के दशक तक देश के विकास को लेकर कई प्रयास किए जा रहे थे। हालाँकि इसके बाद भी विकास कमोबेश स्थिर रहा। वास्तव में उस दौरान विकास दर करीब 3.5% थी। इसलिए उस समय स्थिर विकास दर को ‘हिंदू विकास दर’ कहते हुए एक गलत शब्द के प्रयोग की शुरुआत की गई।

इस हिन्दू विकास दर को असल में अर्थशास्त्रियों को नेहरू विकास दर कहना चाहिए था। जवाहर लाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। वह 1964 तक पद पर बने रहे। अधिकांश आर्थिक नीतियाँ नेहरू द्वारा तय या बनाई गई थीं। इसलिए, उनके शासन के दौरान और उसके बाद के वर्षों के आर्थिक विकास के लिए ‘नेहरू विकास दर’ शब्द सही प्रतीत होता है।

नेहरू समाजवाद के प्रति इतने जुनूनी थे कि भारत सरकार होटल भी चलाती थी। उस समय बिड़ला और टाटा जैसे मेहनती व्यक्तियों को अपने व्यवसाय का विस्तार करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई थी। नेहरू की इस अदूरदर्शी दृष्टि को विकास की धीमी दर के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। पीएम मोदी ने संसद में इसी बात को दोहराया है।

नेहरूवादी नीतियों को उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने भी आगे बढ़ाया। इंदिरा गाँधी ने बैंकिंग, कपड़ा, कोयला, इस्पात, ताँबा जैसे क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इसके चलते इस ‘हिन्दू विकास दर’ का दंश देश कई दशकों तक झेलता रहा था। ऐसे में पीएम मोदी का यह कहना एकदम सही है कि शाही परिवार ने भारत की वैश्विक मंच पर बदनामी करवाई।

जंगल, नदी, पहाड़ों में 10 दिन तक भटकना, ₹1 करोड़ तक का खर्च… कैसा है ‘डंकी रूट’ जिससे अमेरिका में घुसते हैं भारतीय: पंजाब-हरियाणा में सबसे ज्यादा क्रेज

अमेरिका में अवैध रूप से घुसे 104 भारतीय वापस भारत आ गए हैं। इन्हें अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार करने के बाद भारत वापस भेजा। इन्हें अमृतसर में अमेरिकी सेना का प्लेन लेकर आया। अमेरिका से वापस भेजे जाने वाले भारतीय पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं। इसको लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। इसी के साथ ही विदेश जाने की ललक और इसके लिए अपनाए जाने वाले तरीकों को लेकर भी बात हो रही है। इस बीच ‘डंकी रूट’ फिर से चर्चा में आया है।

क्या होती है डंकी?

‘डंकी’ शब्द पंजाबी भाषा में उपयोग होता है। डंकी का अर्थ एक जगह से उछल कर दूसरी जगह जाना है। लेकिन बीते कुछ समय में डंकी शब्द का अर्थ बदल गया है। ‘डंकी रूट’ नाम उस रास्ते को दे दिया गया है, जिससे कोई भी व्यक्ति अवैध तरीके से भारत छोड़ कर दूसरे देश को जाता है। यह शब्द हालिया समय में अमेरिका जाने के अवैध रास्ते का नाम हो गया है। इस नाम से रील्स बनती हैं, वीडियो बनते हैं, फिल्म तक बनाई गई है। इसका अपना एक ‘पॉप कल्चर’ (संस्कृति) है।

कैसे काम करता है ‘डंकी रूट’

डंकी रूट के जरिए भारतीयों को कई एजेंट विदेश भेजने का वादा करते हैं। जो लोग डंकी का रास्ता चुनते हैं, सबसे पहले उनका पासपोर्ट और वीजा तैयार करवाया जाता है। डंकी का काम करने वाले एजेंट पैसा लेकर किसी यूरोपियन या फिर लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीजा तैयार करवाते हैं। अधिकांश मौकों पर यह टूरिस्ट वीजा होता है। इसी के सहारे डंकी वालों को भारत से निकाला जाता है। इनको नेपाल, दुबई और किसी अन्य देश में कुछ दिन यात्रा करवा कर इनकी एक यात्रा की पूरी कहानी तैयार करवाई जाती है।

इसके बाद डंकी रूट का सहारा लेने वाले की लैटिन अमेरिकी देश पहुँचते हैं। इन देशों में भारतीय डंकी एजेंटों के सहायक होते हैं, जो डंकी रूट लेने वालों को रास्ता बताते हैं और यहाँ अवैध तरीके से उनकी मदद करते हैं। कई बार यह लोग आपराधिक गैंग से जुड़े होते हैं। यह लोग इन्हें अमेरिका सीमा तक की यात्रा करवाते हैं। यह यात्रा जंगल, नदी और पहाड़ों से होकर गुजरती है। 40-50 किलोमीटर तक पैदल चलना भी पड़ता है। अमेरिका में घुसने के लिए सीमा लांघनी पड़ती है।

क्या है अमेरिका में घुसने का रास्ता?

अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले लोग सबसे पहले किसी लैटिन अमेरिकी देश में हवाई यात्रा के जरिए पहुँचते हैं। यह देश ब्राजील, वेनेज़ुएला, बोलिविया, पेरू, कोलंबिया, निकारागुआ समेत कोई भी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति ब्राजील पहुँचा है तो उसे यहाँ से सीमा पर करके कोलंबिया पहुँचना होगा। इसके लिए कभी कभार मानव तस्करी करने वाले गाड़ी उपलब्ध करवाते हैं। फिर उस व्यक्ति को पनामा में घुसाया जाता है। पनामा में अधिकांश लोगों को चुपके से जंगल पार करना होता है।

इसके बाद निकारागुआ और गुआटेमाला होते यह लोग मेक्सिको पहुँचते हैं। मेक्सिको और अमेरिका आपस में सीमा साझा करते हैं। मेक्सिको की सुरक्षा एजेंसियों से बचते हुए यह यहाँ इकट्ठा होते हैं। अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर वर्तमान में ऊँची लोहे की बाड़ लगी हुई है। इसे पार करने के लिए रस्सियों का सहारा लिया जाता है। डंकी रूट लेने वाले लोग अमेरिकी सीमा फांद लेना एक उपलब्धि की तरह लेते हैं। इसकी फोटो भी सोशल मीडिया पर साझा होती है। इसका जश्न मनता है।

इस बीच इन्हें कई बार पहाड़, नदी तक पार करने होते हैं। डंकी रूट से गए एक व्यक्ति ने बताया, “हमने 17-18 पहाड़ियाँ पार कीं। अगर कोई फिसल जाता, तो उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। अगर कोई घायल हो जाता, तो उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता। हमने लाशें देखीं।” एक और व्यक्ति ने बताया कि उन्हें नाव की 10-15 घंटे तक की यात्रा करनी पड़ी। यात्रा में आने वाली इन कठिनाईयों के वीडियो भी अक्सर सामने आते हैं।

अमेरिका में घुसने के बाद क्या होता है?

अमेरिका से वापस भेजे गए भारतीय बताते हैं कि डंकी रूट के सहारे जो लोग घुसने में कामयाब हो जाते हैं, वह शरणार्थी का दर्जा पाने का प्रयास करते हैं। सीमा पार करते समय अगर किसी शरणार्थी को अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियाँ पकड़ लेती हैं, तो वह अपना रटा हुआ वर्जन उन्हें बताते हैं। वह दावा करते हैं कि भारत में उनके साथ उत्पीड़न हो रहा है और वह खाने-पीने तक को मोहताज हैं। वह दावा करते हैं कि शरण लेने के लिए अमेरिका पहुँचे हैं। डंकी रूट लेने वालों को यह पूरी स्क्रिप्ट पहले ही रटा दी जाती है।

अमेरिका में पकड़े जाने वाले यह लोग वकील की सहायता लेते हैं और मुकदमा लड़ कर शरणार्थी का दर्जा पाने का प्रयास करते हैं। जो लोग पकड़े नहीं जाते, वह उन लोगों के साथ घुल मिल जाते हैं, जो पहले इसी तरीके से अमेरिका पहुँच चुके हैं। कई मामलों में लोगों को वापस भारत भेज दिया जाता है। कई मामलों में अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियाँ इनके पैर में एक ट्रैकर लगा का छोड़ देती हैं, जिन्हें यह बाद में काट कर फेंक देते हैं।

कौन करता है डंकी रूट का इस्तेमाल?

डंकी रूट बीते कुछ सालों में काफी पॉपुलर हुआ है। इसका प्रभाव सबसे पहले पंजाब और हरियाणा में आया। इसकी उन युवाओं में खासी पकड़ है, जो वैध तरीकों से विदेश जाने में अक्षम हैं। सामान्य तौर पर विदेश जाने के लिए वीजा लेना होता है। काम करने के लिए वीजा मिलने की प्रक्रिया काफी कठिन है। इसके लिए कई टेस्ट भी होते हैं। पढ़ाई में औसत छात्र इन्हें नहीं पार कर पाते। ऐसे में वह डंकी रूट को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। वर्तमान में हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से और गुजरात आदि में इसका काफी क्रेज है।

जो बायडेन के अमेरिका के राष्ट्रपति रहते हुए डंकी का इस्तेमाल काफी बढ़ गया था। लोगों ने समझा कि बायडेन प्रशासन इन अवैध प्रवासियों के प्रति नरम है, ऐसे में अमेरिका जाना कोई बुरा सौदा नहीं है। एक रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में अमेरिका में 7.25 लाख भारतीय अवैध रूप से रह रहे हैं।

कितना पैसा लगता है?

डंकी रूट को लेकर अब तक सामने आई अधिकांश रिपोर्ट में बताया गया है कि इस काम में ₹30 लाख से ₹50 लाख का निवेश होता है। गुजरात से जाने वाले एक परिवार ने दावा किया है कि उनसे इस काम के ₹1 करोड़ तक लिए गए। पंजाब और हरियाणा से सामने आए डंकी के मामलों में देखा गया है कि युवा अपने खेत-जमीन बेच कर इन पैसों का इंतजाम करते हैं। कई रिश्तेदारों से भी उधार लेकर अमेरिका को जाते हैं।

डंकी रूट लेकर जाने वालों को उम्मीद होती है कि एक बार अमेरिका में पहुँचने के बाद वह महीने का ₹3 लाख तक बचा सकते है। ऐसे में उन्हें डंकी रूट पर खर्च होने वाली यह धनराशि बहुत छोटी लगती है। सारे कष्ट उठा कर भी इसी लिए हरियाणा के कई जिलों से युवा अमेरिका जाते हैं। कई मौकों पर इनसे डंकी के नाम पर ठगी भी हो जाती है। डंकी वाले एजेंटों का यह जाल हरियाणा पंजाब के गाँव-गाँव तक फ़ैल चुका है। सपने दिखाए जाने के बाद लोग अपना पैसा लगाने से नहीं डरते।

अब क्या बदलाव आया है?

बायडेन के खिलाफ चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प ने इन अवैध प्रवासियों को एक बड़ा मुद्दा बनाया था। ट्रम्प का कहना था कि लगातार अवैध रूप से घुस रहे प्रवासी अमेरिका के संसाधनों का गलत फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने वादा किया था कि अमेरिका का राष्ट्रपति बनने पर अवैध प्रवासियों पर वह कड़ा एक्शन लेंगे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद तेजी से अमेरिका में इन अवैध तरीके से घुसने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। कई देशों के अवैध अप्रवासी वापस भेजे जा रहे हैं। इसी कड़ी में भारत में भी पहली खेप के रूप में 104 लोग आए हैं।

दावा- विकास और मानवता के लिए काम करने का, पर लश्कर जैसा आतंकी संगठन को भी देता था पैसा: क्या है USAID जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने कर दिया बंद

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार सत्ता में आने के बाद एक के बाद एक चौंकाने वाले फैसले ले रहे हैं। हाल में उन्होंने अमेरिका की सरकारी एजेंसी यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) को बंद करने का आदेश दिया है। उनके इस निर्णय से अमेरिकी रिपब्लिकन जहाँ खुश हैं तो वहीं पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के लिए ये बड़ी चिंता की बात हो गई है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये संगठन आतंकी समूह लश्कर-ए-तैयबा को फंडिंग दे चुका है और एलन मस्क तक इसके खिलाफ आवाज उठा चुके हैं।

क्या है USAID

1960 में राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा शुरू की गई अमेरिकी एजेंसी USAID का पूरा नाम ‘यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ है। कहने को अमेरिकी की सरकारी एजेंसी के तौर पर काम कर रहा यूएसएड अंतरराष्ट्रीय विकास और मानवीय सहायता के लिए जिम्मेदार है।

इसे लेकर मौजूद जानकारी बताती है कि ये विभिन्न देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कार्यक्रम चलाता है और इसका इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में गरीबी को कम करना, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और मानवता की भलाई के लिए काम करना है। दुनिया भर में इसके क़रीब 10,000 कर्मचारी हैं और इसका सालाना बजट क़रीब 40 अरब डॉलर है।

आतंकी संगठनों को देता है फंडिंग

इस संगठन को लेकर पड़ताल करने पर पता चलता है कि मानव विकास की दिशा में काम करने वाली ये एजेंसी उन आतंकी समूहों को भी पैसे देता था जिन्हें अमेरिका तक में टेरर ऑर्गनाइजेशन माना गया है।

इनमें हाफिज सईद का लश्कर-ए-तैयबा तो है ही, इसके अलावा फलाह-ए-पाकिस्तान जैसे संगठन भी हैं जिसे यही आतंकी चैरिटी संगठन के तौर पर चलाते हैं और इनके जरिए मदद प्राप्त करके अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक फलाह-ए-पाकिस्तान का सीधा कनेक्शन आतंकी हाफिज सईद से है। साल 2010 में अमेरिकी विभाग उसे आतंकी संगठन भी घोषित कर चुका है, लेकिन बावजूद इसके USAID इतने समय से उसे फंड देने में लगा था। 2019 में आतंकी संगठन को यूएसएड ने 110,000 डॉलर की मदद दी थी।

एजेंसी ने साल 2021-23 से USAID ने हेल्पिंग हैंड फॉर रिलीफ एंड डेवलपमेंट (HHRD) को भी फंडिंग की है। HHRD, एक मिशिगन स्थित पाकिस्तानी संगठन है, जो लश्कर-ए-तैयबा और जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा हुआ है।

LGBTQ के विकास के लिए फंड

ये संगठन कुछ अन्य कार्यों के लिए भी विभिन्न देशों को मदद मुहैया कराता है। एलन मस्क की टाइमलाइन पर साझा ट्वीट के अनुसार इसने ग्वाटेमाला में सेक्स परिवर्तन और ‘एलजीबीटीक्यू एक्टिविज्म’ के लिए 2 मिलियन डॉलर की मदद की, जमाएका मे LGBT के कार्यों को सफल कराने के लिए 1.5 मिलियन डॉलर (13,13,61,049) दिए, अमेरिका में ही उद्यमों के जरिए LGBTQ समाज को समानता दिलाने के लिए 2 मिलियन डॉलर दिए और युगांडा में भी इन्हीं काम के लिए 5.5 मिलियन डॉलर दिए गए।

क्यों नाराज हो रहे अधिकारी

रिपोर्ट्स बताती हैं कि यूएसएड कार्यक्रम के तहत करीबन 120 देशों में विभिन्न योजनाएँ चल रही हैं। साल 2023 में इस एजेंसी के कार्यक्रमों के तहत विभिन्न देशों और संस्थाओं को 72 अरब डॉलर की मदद की थी। इसके बंद होने की सूचना पाने के बाद पूर्व राष्ट्रपति बाइडन, ओबामा के प्रशासन में काम करने वाले अधिकारियों ने चिंता जाहिर की। तर्क दिया गया कि ये फैसला अमेरिका के लोगों के लिए नुकसान दायक होगा। इससे कई देशों को मदद मिलती है वो बंद हो जाएगी।

संस्थान के कर्मचारियों को घर लौटने का नोटिस

उल्लेखनीय है कि ट्रंप के इस फैसले के बाद यूएसएड में काम करने वालों को कार्यालय में घुसने से पहले ही वापस भेज दिया था और उनके लॉग-इन आईडी से उनका एक्सेस ले लेकर कहा गया शहर में एजेंसी के कार्यालय सप्ताह के शेष दिनों के लिए बंद रहेंगे। थोड़ी समय बाद यूएसएड की साइट भी ऑफलाइन हो गई। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक संस्थान में काम करने वालों को एक नोटिस देकर घर लौटने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था।

एलन मस्क ने किया एजेंसी बंद करने का समर्थन

विदेशों में मदद करने के नाम पर चल रहा ये संगठन पिछले काफी दिनों से एलन मस्क के निशाने पर था। उन्होंने साफतौर पर इसे आपराधिक संगठन बताया था और इसकी तमाम खामियों को उजागर करते हुए कहा था कि ये ‘कट्टर वामपंथी सनकियों’ द्वारा संचालित किया जाता है।

इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा था कि इस संस्था के जरिए अमेरिकी करदाताओं का पैसा बर्बाद किया जा रहा है, साथ ही साथ भ्रष्टाचार भी हो रहा है। अब जब डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर ताला लगा दिया है तो मस्क इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं

कॉन्ग्रेस का एक ही मॉडल- फैमिली फर्स्ट: राज्यसभा में PM मोदी ने दिखाया आईना, कहा- जातिवाद का जहर फैला रही ये पार्टी, बाबा साहेब को नहीं दिया ‘भारत रत्न’

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर राज्यसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार की नीतियों एवं योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया। इसके साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस पर भी जमकर निशाना साधा। पीएम मोदी ने कहा कि इतना बड़ा दल एक परिवार को समर्पित हो गया है। उनके लिए ‘सबका साथ, सबका विकास’ संभव ही नहीं है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने एक ऐसा मॉडल तैयार कर लिया था जिसमें झूठ, फरेब, भ्रष्टाचार, परिवारवाद… सबका घालमेल था। जहाँ सबका घालमेल होता है, वहाँ विकास हो ही नहीं सकता है। वहाँ सबका साथ, सबका विकास हो ही नहीं सकता है। कॉन्ग्रेस का एक ही मॉडल है- ‘फैमिली फर्स्ट’। हमारे लिए है- ‘नेशन फर्स्ट’।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारी प्राथमिकता सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास है, जबकि कॉन्ग्रेस का मॉडल फैमिली फर्स्ट का रहा है, लेकिन हमारा मॉडल नेशन फर्स्ट है। जनता ने हमारे विकास के मॉडल को मंजूरी दी है। 5-6 दशक तक देश के सामने अल्टरनेट मॉडल नहीं था। देश को 2014 के बाद एक नया मॉडल मिला। हमने तुष्टिकरण पर नहीं, संतुष्टिकरण पर फोकस किया।”

पीएम मोदी ने कहा कि लोगों की आँखों को पट्टी बाँधकर राजनीति चलाना कॉन्ग्रेस की आदत है, ताकि चुनावों के समय वोट की खेती हो सके। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस से ‘सबका साथ, सबका विकास’ की अपेक्षा करना बहुत बड़ी गलती है। ये उनकी सोच-समझ के बाहर है। ये उनके रोडमैप में भी शूट नहीं करता।” प्रधानमंत्री मोदी ने कॉन्ग्रेस को दलित विरोधी बताया।

पीएम ने कहा, “कॉन्ग्रेस को मजबूरी में ‘जय भीम’ बोलना पड़ रहा है, लेकिन जय भीम बोलने में कॉन्ग्रेस का मुँह सूख जाता है। इन्होंने (कॉन्ग्रेसियों ने) कभी बाबा साहेब को भारत रत्न के योग्य नहीं समझा। कॉन्ग्रेस रंग बदलने में माहिर है। कॉन्ग्रेस दूसरों की लकीर छोटी करने में लगी रहती है। अगर ये खुद की लकीर लंबी करने की कोशिश करती तो उसकी ये दशा कभी नहीं होती।”

नरेंद्र मोदी ने कॉन्ग्रेस पर जातिवाद की आग भड़काने का आरोप लगाते हुए कहा कि तीन दशक तक दोनों सदनों में सभी दलों के OBC सांसद सरकारों से माँग करते रहे थे कि OBC आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाए। उन्होंने कहा कि इन सांसदों की माँग को ठुकरा दिया गया, क्योंकि उस समय कॉन्ग्रेस की राजनीति को ये शूट नहीं करता होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारी सरकार ने SC-ST एक्ट को मजबूत बनाया और दलित एवं आदिवासी समाज के सम्मान एवं सुरक्षा को बढ़ाया। हमारी सरकार ने सबका साथ, सबका विकास की प्रेरणा से सामान्य वर्ग के गरीब को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया, वो किसी से छीने बिना। यही कारण है कि इसका SC-ST और OBC समुदाय ने भी स्वागत किया।”

नया नहीं है अमेरिका से भारतीयों को वापस भेजा जाना, एस जयशंकर ने संसद में बताया कब कितने भेजे गए: कहा- दुर्व्यवहार न हो यह सुनिश्चित करने का सरकार कर रही प्रयास

अमेरिका की डोनाल्ड ट्रंप सरकार द्वारा 104 भारतीयों को वापस भेजने के बाद सदन में विपक्ष हंगामा कर रहा है। इसको लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार (6 फरवरी 2025) को बयान दिया और कहा कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। उन्होंने साल 2009 से लेकर 2025 तक आँकड़े दिए और बताया कि कब-कब अमेरिका ने भारतीयों को वापस भेजा है।

राज्य सभा में जयशंकर ने कहा, “हम अमेरिकी सरकार से यह सुनिश्चित करने के लिए संपर्क कर रहे हैं कि निर्वासितों के साथ किसी भी तरह का दुर्व्यवहार न हो। साथ ही, सदन इस बात की सराहना करेगा कि हमारा ध्यान अवैध आव्रजन उद्योग के खिलाफ कड़ी कार्रवाई पर होना चाहिए। निर्वासितों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ ​​एजेंटों और ऐसी एजेंसियों के खिलाफ आवश्यक, निवारक और अनुकरणीय कार्रवाई करेंगी।”

जयशंकर ने कहा कि सभी देशों की ज़िम्मेदारी है कि अगर उनके नागरिक विदेश में अवैध रूप से रह रहे हैं तो उन्हें वापस लिया जाए। अपने अवैध नागरिकों को वापस लेना हर देश की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि अवैध रूप से रहने वाले लोगों को निर्वासित करने की प्रक्रिया नई नहीं है। अमेरिका से भारतीयों को डिपोर्ट करने की प्रक्रिया कई सालों से चल रही है।

उन्होंने बताया कि अमेरिका से साल 2009 में 734, साल 2010 में 799, साल 2011 में 597, साल 2012 में 530, साल 2013 में 550, साल 2014 में 591, साल 2015 में 708, साल 2016 में 1303, साल 2017 में 1024, साल 2018 में 1180, साल 2019 में 2042, साल 2020 में 1889, साल 2021 में 805, साल 2022 में 862, साल 2023 में 670, साल 2024 में 1368 और साल 2025 में 104 लोग भारत भेजे गए।

जयशंकर ने कहा कि अमेरिका की ओर निर्वासन की प्रक्रिया और क्रियान्वयन आव्रजन तथा सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) द्वारा किया जाता है। ICE द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले विमानों में निर्वासन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) है, जिसमें प्रतिबंधों के उपयोग (हथकड़ी और बेड़ी पहनाने) का प्रावधान है। हालाँकि, महिलाओं और बच्चों को इस तरह से नहीं बाँधा जाता है।

विदेश मंत्री जयशंकर ने यह भी कहा कि सभी देशों के लिए यह जरूरी है कि वे अवैध प्रवास को हतोत्साहित करें और कानूनी तरीकों से लोगों की आवाजाही को बढ़ावा दें। उन्होंने कहा कि यह सभी देशों की ज़िम्मेदारी है कि अगर उनके नागरिक विदेश में अवैध रूप से रह रहे हैं तो वह उन्हें वापस ले।  

‘दिल्ली में होगा खून-खराबा, कश्मीर को भारत से करेंगे अलग’: हमास का टेरर प्लान आया सामने, PoK में पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर और जैश से मिलाए हाथ

इजरायल में आतंकी हमला करने वाले हमास ने 5 फरवरी को कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे इस्लामी संगठनों से हाथ मिला लिया। रावलकोट के शहीद साबिर स्टेडियम में आयोजित ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ और ‘हमास ऑपरेशन अल अक्सा फ्लड कॉन्फ्रेंस’ नामक कार्यक्रम में जैश-ए-मोहम्मद के एक आतंकी ने मंच से इसकी घोषणा की।

जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ने धमकी देते हुए कहा, “फिलिस्तीन के मुजाहिदीन और कश्मीर के मुजाहिदीन अब एक हो गए हैं। दिल्ली में खून-खराबा करने और कश्मीर को भारत से अलग करने का समय आ गया है।” इस कार्यक्रम में जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के भाई तल्हा सैफ, जैश कमांडर असगर खान कश्मीरी और मसूद इलियास और लश्कर के शीर्ष नेता शामिल हुए थे।

ईरान में आतंकी संगठन हमास के प्रतिनिधि डॉक्टर खालिद अल-कदौमी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुआ था। यह हमास नेता की पहली कश्मीर यात्रा थी। इसके अलावा, इस कार्यक्रम में कई फिलिस्तीनी नेताओं ने भी भाग लिया। बता दें कि पाकिस्तान 5 फरवरी को ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ मनाता है। इसके साथ ही वह ऐसी गतिविधियाँ करता है, जो भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं।

इस तरह के आयोजनों के जरिए इस्लामी आतंकी संगठन भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाने की कोशिश करते हैं। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों ने भारत पर कई आतंकवादी हमले किए हैं। इनमें साल 2001 का संसद हमला, साल 2008 का मुंबई हमला और साल 2019 का पुलवामा बम धमाका प्रमुख है।

हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इज़रायल के इतिहास का सबसे भयानक हमला किया था। फिलिस्तीनी आतंकियों ने गाजा पट्टी से इजरायल में सैकड़ों रॉकेट दागे थे। साथ ही हमास के सैकड़ों आतंकवादियों ने इज़रायली क्षेत्र में घुसपैठ की और अंधाधुन फायरिंग करके 1300 से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी और 250 से अधिक महिला, बुजुर्ग एवं बच्चों को बंधक लिया था।

हमास (Hamas) का पूरा नाम ‘हरकत अल-मुकावामा अल-इस्लामिया’ है। इसका अर्थ है ‘इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन’। हमास की स्थापना मिस्र में रहने वाले फिलिस्तीनी मौलवी शेख अहमद यासीन ने 1987 में की थी। काहिरा में इस्लामी पढ़ाई करने के बाद वह आतंकी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की स्थानीय शाखाओं से जुड़ गया था। साल 1960 के दशक में यासीन ने वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में तकरीर दी।

इसके बाद दिसंबर 1987 में यासीन ने गाजा में मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक शाखा के रूप में हमास की स्थापना की। यह पहले ‘इंतिफादा’ यानी वेस्ट बैंक, गाजा और पूर्वी यरुशलम में कथित अत्याचारों के लिए इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी हमले पर आधारित था। साल 1993 से हमास आत्मघाती हमले कर रहा है। सन 1997 में संयुक्त राष्ट्र ने हमास को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठन घोषित कर दिया।

साल 2004 में एक हवाई हमले में इजरायल ने मौलवी शेख अहमद यासीन को मार गिराया। साल 2006 से हमास ने गाजा पट्टी पर कब्ज़ा कर रखा है। उस समय इसने अपने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल फतह को चुनावों में हराया था। बाद में हमास ने वहाँ कोई चुनाव नहीं कराया। आतंकी संगठन हमास के कई बड़े नेता तुर्की मे बैठकर गाजा पट्टी में आतंकी गतिविधियों को संचालित करते रहे हैं।