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सोनिया का चीन से रिश्ता क्या: अजीत भारती का सवाल | Ajeet Bharti on Rajiv Gandhi Foundation scam

कॉन्ग्रेस पार्टी ने 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के साथ गुपचुप तरीके से एक समझौता किया। इसमें करार किया गया था कि वो हाई लेवल/महत्वपूर्ण सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगे। जब एक देश की सरकार किसी देश के साथ इस तरह का करार करती है तो समझ में आता है, मगर एक पार्टी ने चीन के साथ ऐसा करार क्यों किया? इसके पीछे कारण क्या है?

सोनिया गाँधी 2007 में बीजिंग गई थी और फिर 2008 में इस डील पर साइन हुआ था। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सोनिया की घंटों बैठक के बाद राहुल गाँधी ने इस पर साइन किया था। इसके बाद भी कई मौकों पर ये चीनी अधिकारी से मिलते रहे हैं, जिसकी सूचना भारत सरकार को नहीं दी जाती। डोकलाम के समय भी राहुल गाँधी चीनी राजनयिकों से मिले थे। राजीव गाँधी फाउंडेशन को एक बार चानी एम्बेसी ने 10 लाख और चीनी सरकार ने 90 लाख रुपए दिए। इसकी चेयरपर्सन सोनिया गाँधी हैं।

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ऑपइंडिया के संपादकों और सीईओ के खिलाफ FIR पर SC की रोक, बंगाल सरकार से माँगा जवाब: मामले की पूरी डिटेल

ऑपइंडिया पर प्रकाशित रिपोर्टों को लेकर पश्चिम बंगाल की सरकार ने चार लोगों पर तीन एफआईआर दर्ज की थी। इन पर शुक्रवार (जून 26, 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी।

जिन पर एफआईआर दर्ज किया गया था, उनमें से तीन ऑपइंडिया से संबद्ध हैं। ये हैं वेबसाइट के सीईओ राहुल रौशन, अंग्रेजी की संपादक नुपूर शर्मा और हिंदी के संपादक अजीत भारती। एफआईआर में वैभव शर्मा का भी नाम है। वे नुपूर शर्मा के पति हैं। लेकिन उनका वेबसाइट से कोई संबंध नहीं है।

जस्टिस संजय किशन कौल और बीआर गवई की अवकाश पीठ ने शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चारों लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया।

इस आदेश के साथ ही पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को भी नोटिस जारी किया। पोर्टल पर पश्चिम बंगाल से संबंधित तीन अलग-अलग समाचार लेखों के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई थी। इन्हें अन्य मीडिया संस्थानों ने भी प्रकाशित किया था। लेकिन ममता बनर्जी सरकार ने रिपोर्टों के लिए विशेष तौर पर केवल ऑपइंडिया को निशाना बनाया।

अपनी याचिका में चारों याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि पश्चिम बंगाल सरकार राज्य पुलिस का दुरुपयोग कर ईमानदार मीडिया समूह को धमकी देकर, डाँट-डपटकर, झूठ बोलकर अवैध सेंसरशिप लगाने की कोशिश कर रही है।

याचिका में कहा गया था, “ राज्य की यथास्थिति को जनता के संज्ञान में लाने वाली मीडिया रिपोर्ट्स को डिलीट करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार और उनकी कोलकाता पुलिस एफआईआर और क्रूर पुलिस शक्तियों का दुरुपयोग करके न केवल पत्रकारों को डराने, धमकाने का काम कर रही है, बल्कि परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को भी डरा धमकाकर शर्मिंदा कर रही है।”

याचिका में कहा गया था कि पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से डराने और परेशान करने के लिए सीआरपीसी की धारा 41 ए का प्रयोग कर उन्हें नोटिस भेजा। इतना ही नहीं, याचिकार्ताओं के कई अनुरोधों के बाद भी पुलिस ने एफआईआर की कॉपी उनके साथ साझा नहीं की और न ही उसे अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया, जो कि सु्प्रीम कोर्ट के नियमों का उल्लंघन है।

इस संबंध में सबसे पहला केस ऑपइंडिया पर 14 मई को प्रकाशित एक खबर को लेकर हुआ था। इसमें भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री देबाश्री चौधरी के बयान का उल्लेख और टीएमसी नेताओं की प्रतिक्रिया थी।

दरअसल , रायगंज की भाजपा नेता व सांसद ने आरोप लगाया था कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को इस्लामिक राज्य में बदलने और बांग्लादेश के साथ विलय करने की योजना बना रही है।

इसी बयान पर ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी और कई मीडिया संस्थानों ने भी इसे कवर किया। लेकिन बंगाल सरकार ने ऑपइंडिया के अंग्रेजी संपादक और उनके पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का फैसला किया, जो कोलकाता के निवासी हैं। इसके बाद वैभव शर्मा को समन भेजकर 16 मई को पुलिस स्टेशन में बुलाया गया।

गौरतलब हो कि वैभव शर्मा का ऑपइंडिया से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन एक फोन नंबर जिसका इस्तेमाल नुपूर करती हैं, वह उनके नाम पर है। केवल इसी फोन नंबर की वजह से पुलिस ने उनसे पूछताछ की।

16 मई को पूछताछ में पुलिस ने उन्हें धमकाया कि अगर रिपोर्ट डिलीट नहीं की गई, तो वह गिरफ्तार किए जाएँगे। इस बीच पुलिस ने नुपुर शर्मा के 68 वर्षीय पिता से भी बात की और उन्हें भी इसी प्रकार डराया। मगर, इस बीच जब एफआईआर की कॉपी माँगी तो पुलिस उसे देने से इनकार करती रही।

फिर, बंगाल पुलिस ने उसी दिन नुपुर और उनके पति को एक और नोटिस भेजा। इस नोटिस में उनसे 17 मई को प्रकाशित एक रिपोर्ट को लेकर दूसरे पुलिस थाने में हाजिरी लगाने को कहा गया। ये रिपोर्ट भी संडे गार्जियन की रिपोर्ट पर आधारित थी। इसमें दावा किया गया था कि पश्चिम बंगाल सरकार कोरोना से मरने वालों के शव का चुपके-चुपके निपटान कर रही है और वास्तविक आँकड़ों को छिपा रही है।

इसके बाद, पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा कोलकाता में पूछताछ के लिए राहुल रौशन और अजीत भारती को भी नोटिस जारी किए गए। लेकिन चूंकि उस समय लॉकडाउन लागू था और वे बंगाल से बाहर के राज्यों के निवासी थे, इसलिए उन्होंने यात्रा करने में असमर्थता जताई और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा पूछताछ करने का अनुरोध किया। लेकिन पुलिस ने अब तक उनके अनुरोध का जवाब नहीं दिया। साथ ही उन्हें एफआईआर की प्रतियाँ भी उपलब्ध नहीं कराई है।

इतने सब के बाद इसी महीने की 8 तारीख को ऑपइंडिया के खिलाफ एक और मामला दायर किया गया। इस बार यह मामला कोलकाता में दुर्गा पूजा पंडाल में हुई अज़ान पर एक पुरानी रिपोर्ट के लिए किया गया।

यह रिपोर्ट पिछले साल 7 अक्टूबर को प्रकाशित हुई थी। इसे कई राष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया हाउसों द्वारा भी रिपोर्ट किया गया था। इसके अलावा, इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। लेकिन फिर भी इसे लेकर ऑपइंडिया पर निशाना बनाया गया और इस मामले में भी एफआईआर की प्रतियाँ माँगने पर ऑपइंडिया को उपलब्ध नहीं करवाई गई।

लगातार पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा निशाना बनाए जाने के बाद इन चारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया। इसी क्रम में उन्होंने 12 जून को वकील रवि शर्मा के जरिए एफआईआर ख़ारिज करने के लिए याचिका डाली।

याचिका में कहा गया कि उनकी सामग्री केवल इंटरनेट पर प्रकाशित हुई। इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई केवल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 ए के तहत केंद्र सरकार द्वारा की जा सकती है, और राज्य सरकार का उन पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि इंटरनेट से सामग्री को हटाने की माँग करने के लिए पुलिस के पास कानून नहीं है।

इसी पूरे मामले पर आज वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई हुई। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और एफआईआर के लिए आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी। याचिकाकर्ताओं की ओर पैरवी वरिष्ठ एडवोकेट महेश जेठमलानी, संदीप कपूर, सिया चौधरी और मधुलिका राय ने की। सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस भी दिया है। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी।

65 के हैं अब्बा, चौथी बार निकाह कर रहे, हमारी शादी नहीं करा रहे: महमूद की बेटी ने SSP से लगाई गुहार

उत्तर प्रदेश के जिला बरेली से एक अनोखा मामला सामने आया है। 65 साल का एक बुजुर्ग तीन जवान बेटियों को और पत्नी को नजरअंदाज कर चौथी बार निकाह करने की कोशिश में है। बुजुर्ग को रोकने के लिए एसएसपी से उसकी बेटी ने गुहार लगाई है।

जानकारी के मुताबिक मामला बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र का है। 65 वर्षीय चक महमूद की दो पत्नियों की मौत हो चुकी है। इसके बाद महमूद ने 25 वर्षीय बिहार की एक युवती से तीसरा निकाह कर लिया। लेकिन अब वह चौथी शादी करने की फिराक में घूम रहा है।

शिकायत लेकर बरेली एसएसपी दफ्तर पहुँची महमूद की बड़ी बेटी ने बताया कि हम तीन बहनें और दो भाई हैं। सभी शादी योग्य हैं, लेकिन इसके बाद भी अब्बा चौथी शादी करना चाहते हैं। युवती ने बताया कि उसकी माँ की मौत हो चुकी है और उससे पहले सौतेली माँ की भी मौत हो चुकी है।

पिता की उम्र 65 साल है और अब उन्होंने बिहार की 25 साल की महिला से शादी कर ली है। इसके बाद भी पिता अब चौथी शादी करने की कोशिश में हैं।

बुजुर्ग की बेटी ने अपने पिता पर आरोप लगाया कि पिता उसकी और बाकी बहन-भाइयों की शादी नहीं कर रहे हैं और संपत्ति में भी हिस्सा नहीं दे रहे हैं। युवती की शिकायत सुनकर सीओ-2 सीमा यादव ने तत्काल बारादरी इंस्पेक्टर को मामले की जाँच कर कार्रवाई करने के निर्देश दे दिए हैं। इसके बाद थाना पुलिस मामले की जाँच पड़ताल में जुट गई है।

यूपी के मदरसों में हरेक मौलवी के कागज की होगी जाँच: योगी सरकार ने दिए आदेश

उत्तर प्रदेश के कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय में ‘अनामिका शुक्ला’ का मामला उजागर होने के बाद अब सरकारी स्कूलों से लेकर मदरसों तक के शिक्षकों के सभी दस्तावेजों की तेजी से जाँच शुरू हो गई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दफ्तर की तरफ से आए नए आदेश में राज्य सरकार द्वारा अनुदानित सभी अरबी-फ़ारसी मदरसों के मौलवियों के प्रमाण-पत्रों की जाँच करने के आदेश दिए गए हैं।

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के निदेशक जेपी सिंह ने मदरसा शिक्षा परिषद के रजिस्ट्रार आरपी सिंह को पत्र लिखकर प्रदेश के 558 मदरसों की जाँच के लिए कार्ययोजना बनाकर शासन को उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं।

कुल मिलाकर भ्रष्टाचार से लड़ने की अपनी मुहिम के तहत अब योगी सरकार ने ऐसे शिक्षकों पर कार्रवाई का मन बनाया है जिनके तार फर्जीवाड़ा गैंग से जुड़े हैं।

वहीं, योगी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रज़ा ने बताया है कि उत्तर प्रदेश के मदरसों में हुई नियुक्तियों की भी जाँच होगी

उन्होंने कहा कि राज्य के मदरसों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने वाले लोगों के खिलाफ कार्य योजना बनाकर रिपोर्ट भेजी जाएगी। अनामिका शुक्ला प्रकरण के सामने आने के बाद योगी सरकार उत्तर प्रदेश के सभी स्कूलों में मौजूद स्टाफ के दस्तेवाजों की भी जाँच करवा रही है।

इसके अलावा मोहसिन रज़ा ने समाजवादी पार्टी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सपा ने वोट बैंक के लिए मदरसों में भारी भ्रष्टाचार किया और अपने करीबियों को अनुचित लाभ पहुँचाया। दस्तावेजों की जाँच में दोषी पाए जाने वालों को सख्त सजा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर  मदरसे में नौकरी करने वालों के विरुद्ध काफी शिकायतें मिल रही थीं। अब मदरसों में नियुक्त सभी कर्मचारियों के सेवा संबंधी अभिलेखों की जाँच कराने का फैसला योगी सरकार ने लिया है।

गौरतलब है कि योगी सरकार ने यूपी में सत्ता सँभालने के बाद से लगातार मदरसों में पढ़ रहे छात्रों के उज्जवल भविष्य के लिए कई कदम उठाएँ। ये कदम भी उसी दिशा में है।

इससे पहले योगी सरकार ने मदरसों के आधुनिकरण पर अपना फैसला सुनाया था। वहीं ये भी ऐलान किया था कि योगी सरकार मदरसों के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें सम्मानित करेगी और टॉपर्स को 5-5 हजार रुपए का इनाम देगी।

इसके अतिरिक्त यूपी सरकार ने पिछले दिनों मदरसों में उच्च शिक्षा को लेकर एक एडवाइजरी भी जारी की थी। इस एडवाइजरी में बताए गए नियम के मुताबिक फैसला किया गया था कि अब मदरसे में में गैर उर्दू भाषी भी अब मदरसे में टीचर बन सकेंगे।

पाकिस्तानी वीजा मिलने के बाद कश्मीर के 218 युवा गायब, भारत में आतंकी हमले के लिए कर रहा तैयार: रिपोर्ट्स

जम्मू-कश्मीर के 200 से अधिक ऐसे युवा गायब हैं जिन्हें पाकिस्तानी उच्चायोग की ओर से वीजा जारी किया गया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह जानकारी सामने आते ही खुफिया एजेंसियॉं अलर्ट हो गई हैं।

आशंका जताई जा रही है कि ये युवा पाकिस्तान के कब्जे में हैं और इन्हें जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए वह प्रशिक्षित कर रहा है।

खुफिया सूत्रों ने कहा है, “पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के युवाओं को फरवरी 2019 के पुलवामा हमले की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षित कर रहा है।” खबरों के मुताबिक 2017 से पाकिस्तान उच्चायोग ने जम्मू-कश्मीर के 399 युवाओं को पाकिस्तानी वीजा जारी किया है। इनमें से 218 के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

इसी प्रकार अमेरिकी विदेश विभाग की ‘ट्रेफिकिंग इन पर्सन्स’ की 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है कि 14 वर्ष तक के बच्चों का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में आतंकी संगठनों कर रहे हैं। कई मामलों में 12 वर्ष के बच्चों को हथियार उठाने और आईईडी थामने को मजबूर किया गया। यह रिपोर्ट गुरुवार को जारी की गई।

नई दिल्ली के पाकिस्तान उच्चायोग की करतूतें

सूत्रों ने बताया कि नई दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायोग में कर्मचारियों की आधे से कम संख्या करने के पीछे का एक कारण यह भी था कि अधिकारियों द्वारा आतंकवादी गतिविधियों के लिए कथित तौर पर जम्मू-कश्मीर के युवकों की भर्ती करने का प्रयास किया जा रहा था।

नई दिल्ली में एक सूत्र ने पुष्टि की थी कि खुफिया एजेंसियों द्वारा की गई जाँच से संकेत मिले हैं कि पाकिस्तान दिल्ली में अपने उच्चायोग का इस्तेमाल न केवल अपनी सैन्य जासूसी एजेंसी के नेटवर्क चलाने के लिए कर रहा था, बल्कि आतंकवादियों की भर्ती भी कर रहा था।

पाकिस्तान में भारतीय राजनयिकों के साथ हुई बदसलूकी और पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अपहरण कर लिए जाने के कारण भारत ने 23 जून को पाकिस्तानी उच्चायोग से 7 दिनों के अंदर अपने कर्मचारियों की उपस्थिति आधा करने को कहा साथ ही भारत भी इसी अनुपात से पाकिस्तान स्थित उच्चायोग से अपने कर्मचारियों की उपस्थिति कम करेगा।

विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त सैयद हैदर शाह को समन जारी किया और उन्हें मिशन के अधिकारियों के जासूसी में शामिल रहने और आतंकी संगठनों से जुड़ी गतिविधियों पर भारत की चिंता के बारे में बताया।

पाक उच्चायोग का आतंकी हमलों और आतंकी फंडिंग से संबंध

पिछले दिनों पाकिस्तान से आतंकवाद का प्रशिक्षण प्राप्त कर भारत में घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों द्वारा कई हमले किए गए थे। इन आतंकियों को दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग द्वारा वीजा जारी किया गया था।

जम्मू-कश्मीर के निलंबित डीएसपी देवेन्दर सिंह, जिसे 11 जनवरी को हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकी नवेद बाबू और आसिफ राठर के साथ गिरफ्तार किया गया था, के मामले की जाँच एनआईए कर रही है। इस मामले में एनआईए ने हाल ही में खुलासा किया था कि पाकिस्तान उच्चायोग में सहायक के तौर पर तैनात शफाकत नाम का व्यक्ति देवेन्दर सिंह के संपर्क में था।

31 मई को नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के दो अधिकारियों को दिल्ली पुलिस ने जासूसी करते हुए पकड़ा था। इन दोनों अधिकारियों पर फर्जी पहचान के साथ अपनी सीमा से बाहर के स्थानों पर घूमने का आरोप लगा था।

कथित तौर पर आबिद हुसैन और ताहिर हुसैन नाम के दोनों अधिकारी नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के वीजा अनुभाग में काम करते थे। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दोनों आरोपितों को फर्जी पहचान के साथ जासूसी करते रंगे हाथ दबोचा था। दोनों आधिकारिक तौर पर उच्चायोग के वीजा विभाग में काम करते थे, लेकिन वे वास्तव में आईएसआई के जासूस थे।

आपको बता दें कि 5 अप्रैल को भारतीय सेना द्वारा मार गिराए गए पाँच आतंकियों में से तीन आतंकी जम्मू-कश्मीर से थे। जानकारी के मुताबिक मारे गए आतंकी आदिल हुसैन मीर, उमर नजीर खान और सज्जाद अहमद हुर्रा ने अप्रैल 2018 में नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग द्वारा जारी किए गए वीजा पर पाकिस्तान की यात्रा की थी।

जम्मू-कश्मीर आतंकी फंडिग मामले में एनआईए ने जाँच के दौरान पाकिस्तानी मिशन के मुदस्सर इकबाल चीमा का नाम आया था। चीमा सितंबर 2015 से नवंबर 2016 तक मिशन में था। उसने इस मामले के मुख्य आरोपी जहूर अहमद शाह वटाली को दो किस्तों में सत्तर लाख रुपये दिए थे। दरअसल पाकिस्तानी उच्चायोग से हुर्रियत नेताओं को पैसा भेजने वाला वटाली मुख्य सरगना था।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के 15 जून, 2020 को जम्मू-कश्मीर के शोपियॉं में आतंकी ठिकाने से भारी मात्रा में कंडोम, वियाग्रा, गर्भनिरोधक गोलियॉं और पोर्न बरामद किया गया था। इससे पता चलता है कि कश्मीर में इस्लाम के नाम पर जारी ‘जिहाद’ की आड़ में सेक्सुअल टेरर को अंजाम दिया जा रहा है। इतना ही नहीं आतंकी कश्मीरी महिलाओं का यौन शोषण भी करते हैं।

चीन के झाँसे में उलझा पाक: भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई से घबराकर, अस्‍पतालों में दिए आधे बेड खाली रखने के आदेश

लद्दाख की गलवान घाटी में चीन से भारत की झड़प और जवाबी कार्रवाई से पाक घबरा गया है। भारत-चीन सीमा पर बढ़ते तनाव और युद्ध की आशंकाओं के बीच घबराई पाकिस्‍तानी सेना भी पीएलए के साथ साजिशों में जुट गई है। मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया जा रहा है कि इन्हीं वजहों से शायद नियंत्रण रेखा से सटे क्षेत्रों में पाकिस्तान ने भी ऑपरेशनल तैयारियों को तेज कर दिया है।

भारत से हर बार पराजित होने वाली पाकिस्तानी सेना में खौफ इतना ज़्यादा है कि बेतहासा फैले कोरोना संक्रमण के बाद भी पाकिस्‍तानी सेना ने Pok के अस्पतालों में 50% बेड सेना के लिए आरक्षित रखने का निर्देश दे दिया गया है।

हाल ही में भारत की वायु सेना से डरकर कराची में ब्लैकआउट घोषित करने वाली पाक आर्मी, इस बार चीन सीमा पर उपजे तनाव के बीच युद्ध की आशंका के मद्देनजर अपने वायुसेना के तीन एयरबेस को भी अलर्ट रहने को कह दिया है।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीनी वायुसेना के अधिकारियों की एक टीम ने भी कथित तौर पर पाकिस्तानी एयरबेस का जायजा लिया है। दूसरी तरफ लद्दाख सीमा पर भारतीय सेना भी पहले से ही सजग है और चीन-पाक की हर नापाक साजिश का करारा जवाब देने के लिए चौकसी बनाए हुए है।

कई मीडिया रिपोर्ट में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह भी दावा किया जा रहा है कि 14-15 जून को चीन और भारत के बीच हुए खूनी हिंसक संघर्ष की साजिश पहले से ही रची जा चुकी थी। उसी के तहत एलएसी के उल्लंघन की रणनीति चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर बनाई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दावा यह भी है कि 1996 के एक समझौते के अनुसार, चूँकि एलएसी पर दोनों देशों के सिपाही हथियार का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। इसलिए अब चीन छद्म युद्ध के लिए अपने सैनिकों को तिब्बती लड़ाकों से ट्रेनिंग दिलवा रहा है। साथ ही उन्हें भी सेना में शामिल कर रहा है।

मीडिया सूत्रों के अनुसार यह भी दावा किया जा रहा है कि मई के महीने में जब चीन की हरकतें शुरू हुईं थी, उस समय चीन के कुछ PLA सैनिक 10-12 दिन तक Pok में ठहरे हुए थे। कहा जा रहा है कि जहाँ रुक कर उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों की चौकियों, एयरबेस और आतंकी केम्पों का जायजा भी लिया था।

जब तक चीन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में था तब तक वहाँ के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाओं को भी बंद रखा गया था। गौरतलब है कि Pok के जिन हिस्सों में इंटरनेट सेवाएँ बंद थी, उसी क्षेत्र से पिछले दो माह में कई बार भारतीय ठिकानों पर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर फायरिंग में बढ़त भी देखने को मिली थी।

वहीं अब कहा जा रहा है कि गलवान में हुए झड़प पर भारत द्वारा चीन के PLA सैनिकों के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई को देखते हुए पाकिस्तान बुरी तरह डर गया है। और इस डर की वजह है भारतीय सैनिकों द्वारा 40 से अधिक PLA सैनिकों के मारे जाने का दावा। जिसने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। एक तरफ जहाँ पाकिस्तान आतंक को पूरी तरह संरक्षण देने में जुटा है तो वहीं भारतीय सेना द्वारा जम्मू कश्मीर में आतंकियों को लगातार निशाना बनाया जाना भी उसकी परेशानी की दूसरी बड़ी वजह है।

वहीं सीमा पर भी चीन और पाक की हर धोखेबाजी और कपट भरी दुस्साहस का भारतीय सेना डट कर मुकाबला कर रही है। मौजूदा हालात को देखते हुए पाकिस्‍तान को डर है कि कहीं लाइन ऑफ एक्‍चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर तनाव का असर कहीं लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) पर न पड़ जाए। जिसके चलते और भारत की पाक के प्रति विगत कार्रवाइयों को देखते पाक आर्मी ने ऐहतियातन पीओके के अस्‍पतालों में सैनिकों के लिए लगभग आधे बेड रिजर्व करा दिए हैं।

इसी सन्दर्भ में मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि खुद जनरल कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्‍तान के कब्‍जे वाले कश्‍मीर यानी पीओके के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री को पत्र लिखकर यह कहते है, “कृपया सारे अस्‍पतालों में 50 पर्सेंट बेड आर्मी के लिए रिजर्व रखे जाएँ। इसके साथ इमरजेंसी सिचुएशन के लिए 50 प्रति‍शत ब्‍लड सप्‍लाई को भी पाकिस्‍तानी सैनिकों के लिए रिजर्व रखने को कहा गया है।”

यह लेटर ऐसे समय में लिखा गया जब भारत चीन के खिलाफ अपनी जवाबी कार्रवाई में लगा है। यह भारत के वैश्विक दबाव का ही नतीजा है कि एक तरफ चीन जहाँ अब घुटने टेकने को मजबूर है तो वहीं घबराया हुआ पाक एक बार फिर किसी झड़प या हार के डर से अपने तीन बड़े एयरबेस खंडवारी, रहीम यारखान और सक्खर को अलर्ट रख दिया है।

चीन के साथ पाकिस्तान की गतिविधियों को देखते हुए रक्षा से जुड़े कई विशेषज्ञ बताते हैं कि पाकिस्तानी सेना की हरकतों को दो तरीके से लिया जा सकता है। पहला पाकिस्तान यह सोच रहा है कि भारत किसी भी समय पीओके को भारत में शामिल करने के लिए हमला कर सकता है। या फिर भारत पुनः आतंकी संगठनों को ध्वस्त करने की तैयारी में है।

दूसरा, चीन के साथ भारत के गतिरोध को देखते हुए पाकिस्तान इस सिचुएशन का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाह रहा है। पाकिस्तान अक्सर चीन के कहने पर भारत के खिलाफ कार्रवाई करता आया है। ऐसे में कहीं अगर दोबारा चीन और भारत के बीच युद्ध की स्थिति उत्पन होती है तो पाकिस्तान चीन को Pok स्थित अस्पताल, पाकिस्तान के एयरबेस और सेना के माध्यम से सहायता करेगा। इसके अलावा यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि पाकिस्तान गुपचुप तरीके से अचानक भारत पर हमला कर कारगिल युद्ध को दोहराने का मंसूबा भी पाल रहा है।

इस्तीफे के डर से नेपाल के PM ओली ने पार्टी बैठक से किया किनारा, चीन से साँठगाँठ पर घर में ही घिरे

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली अपने घर में ही घिर गए हैं। हालत यह हो गई है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी की बैठक से शुक्रवार को किनारा कर लिया।

काठमांडू पोस्ट के अनुसार ओली ने शुक्रवार को सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। माना जा रहा था कि आज पार्टी उनसे इस्तीफा देने को कह सकती है।

हालॉंकि ओली के मीडिया सलाहकार सूर्या थापा ने दावा किया है कि पहले से कार्यक्रम तय होने के कारण प्रधानमंत्री बैठक में नहीं गए। उन्होंने इसके बारे में पार्टी को सूचित किया था।

हाल ही में देश को विवादित नक्शा देकर उसमें भारतीय इलाकों को शामिल करने वाले ओपी पर चीन से सॉंठगॉंठ करने के आरोप हैं। इसको लेकर उनके पार्टी के भीतर भी काफी नाराजगी है। यहॉं तक कि कई नेपाली इलाकों पर चीन के कब्जा कर लेने की खबरें भी हाल में सामने आई है।

अरसे बाद बुधवार से शुरू हुई तो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) की स्टैंडिंग कमिटी की बैठक में इसका असर भी दिखा। ओली की पार्टी के सह अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड से इस मसले पर तीखी तकरार हुई।

प्रचंड ने साफ़ शब्दों में ओली से ‘त्याग’ के लिए तैयार रहने को कहा। रिपोर्ट के मुताबिक दहल ने ओली पर आरोप लगाया कि वह पार्टी को अपनी मर्जी के मुताबिक चला रहे हैं, जबकि उन्होंने पार्टी कामकाज में उन्हें (दहल) अधिक अधिकार दिए जाने की बात स्वीकार की थी।

पार्टी के एक नेता के मुताबिक प्रचंड ने ओली से कहा, ”या तो हमें रास्ते अलग करने होंगे या हमें सुधार करने की जरूरत है। चूँकि अलग होना संभव नहीं है, इसलिए हमें अपने तरीके में बदलाव करना होगा, जिसके लिए हमें ‘त्याग’ करने के लिए तैयार रहना चाहिए।”

दहल ने यह भी कहा था कि अगर सरकार समाजवाद हासिल करने के अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाती है, तो पार्टी को अगले चुनावों में असफलता देखनी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार और पार्टी दोनों संकट में हैं। दूसरी ओर ओली ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि प्रशासन देशहित में जुटा हुआ है और सत्ताधारी पार्टी के नेता ही विपक्ष की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

रिपोर्ट्स की मानें तो प्रचंड ने दो टूक कहा है कि वे नेपाल को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे। उन्होंने कहा, “हमने सुना है कि सत्ता में बने रहने के लिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश मॉडल पर काम चल रहा है। लेकिन इस तरह के प्रयास सफल नहीं होंगे। भ्रष्टाचार के नाम पर कोई हमें जेल में नहीं डाल सकता है। देश को सेना की मदद से चलाना आसान नहीं है और ना ही पार्टी को तोड़कर विपक्ष के साथ सरकार चलाना संभव है।”

खबरें इस ओर इशारा भी कर रही हैं कि ओली अपनी ही पार्टी में पूरी तरह अलग-थलग हो गए हैं। 44 सदस्यीय स्थायी समिति में ओली के पक्ष में केवल 13 सदस्य हैं।

यहाँ बता दें, इससे पहले खबर आई थी कि प्रधानमंत्री ओली ने गुरुवार को प्रचंड को अपने निवास पर बुलाया था। साथ ही शर्मिंदगी से बचने के लिए उनके साथ समझौता करने की कोशिश की। पर प्रचंड ने इसके लिए साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वह या उनके पक्ष के लोग अपने मत में कोई बदलाव नहीं करेंगे।

कहाँ से शुरु हुआ भारत-नेपाल विवाद

अभी हाल में भारत ने लिपुलेख से धारचूला तक सड़क बनाई थी। इसका उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया। इसके बाद ही नेपाल की सरकार ने विरोध जताते हुए 18 मई को नया नक्शा जारी किया था। भारत ने इस पर आपत्ति जताई थी।

पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने संसद में घोषणा की कि भारत के कब्जे वाले कालापानी क्षेत्र (पिथौरागढ़ जिला) पर नेपाल का ‘निर्विवाद रूप से’ हक है। इसलिए इस क्षेत्र को पाने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक कदम उठाने जा रही है। 

ओली की कैबिनेट ने नेपाल का एक नया राजनीतिक मानचित्र पेश किया है, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया। 13 जून को नक्शे में बदलाव से जुड़ा बिल पास कर दिया गया। 

नेपाली नेताओं ने भी किया विरोध

पीएम ओली द्वारा नक्शा लाए जाने का नेपाल के विधायकों और कुछ नेताओं ने खुलकर विरोध किया था। नेपाल के मर्चवार क्षेत्र से कॉन्ग्रेसी विधायक अष्टभुजा पाठक, भैरहवां के विधायक संतोष पांडेय व राष्ट्रीय जनता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता महेंद्र यादव ने कहा कि नेपाल की संसद ने नक्शे में बदलाव के लिए पहाड़ पर खींची जिस नई लकीर पर मुहर लगाई है, वह देश के मैदानी इलाकों में दरार का कारण बन रही है।

त्रिपुरा में हस्तनिर्मित बाँस के उत्पाद लोगों के रोजगार का अहम साधन, वन धन विकास योजना से मिले बेहतर अवसर

देश का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी आमदनी के लिए कुटीर उद्योगों पर आधारित है। विशेषकर पूर्वोत्तर भारत के राज्य अपने रोजगार के लिए वन सम्पदा पर निर्भर रहते हैं। बाँस इस क्षेत्र के लोगों के दैनिक जीवन से हर तरह से जुड़ा है, जैसे- भोजन, कृषि, रोजगार आदि।

लेकिन एक पहलू यह भी है कि जनजातीय इलाकों में रहने वाले लोगों और आदिवासियों का यह वर्ग अक्सर वनों में उगाई जाने वाली उत्पादों का उचित मूल्य हासिल नहीं कर पाते। ऐसे में ना तो समूचे वनों में उगाई जाने वाली चीजों को ठीक से इस्तेमाल हो पाता था और ना ही इन लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई विशेष बदलाव देखा गया। ऐसे में केंद्र सरकार की वन धन योजना का आगाज किया गया था। जिसने देश के बड़े हिस्से की आबादी को लाभान्वित किया है।

जनवरी 2020 में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब (Biplab Kumar Deb) ने राज्य में प्रधानमंत्री वन धन विकास योजना का शुभारंभ किया और इस योजना को शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते हुए कहा था कि यह योजना राज्य के लोगों की आजीविका में सुधार लाने पर केंद्रित है।

सोशल मीडिया पर बाँस से निर्मित ऐसी ही कुछ दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के प्रदर्शनी की तस्वीरें शेयर करते हुए त्रिपुरा कैडर के आईएफएस अधिकारी प्रसादा राव ने लिखा है – “बाँस से निर्मित पानी पीने के बर्तन को दुनिया में पेश करने पर त्रिपुरा को गर्व है, जो कारीगरों के हाथों से बना एक अनोखा फैंसी उत्पाद है। यह उत्पाद निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा के साथ-साथ राज्य को अच्छी सफलता दिलाने में सक्षम है।”

आईएफएस प्रवीण कुसवान ने ट्विटर पर हाथ से निर्मित ऐसे ही एक अन्य उत्पाद की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है कि ये खूबसूरत है जो कि त्रिपुरा के स्थानीय कलाकारों द्वारा बनाया गया है। इसके डिजाइन और गुणवत्ता की तारीफ करते हुए उन्होंने लिखा है कि यह पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद होने के साथ ही लोगों को आजीविका भी प्रदान करते हैं।

इस योजना के उद्घाटन के अवसर पर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देब ने कहा, “केंद्र ने इस योजना के तहत कुल 9 परियोजना के लिए 1,21,90,000 रुपए प्रदान किए हैं। त्रिपुरा सरकार ने PMVDY योजना के तहत कुल 11 परियोजनाएँ भेजी, जिनमें से 9 परियोजनाओं को राज्य में लागू करने के लिए मंजूरी दी गई है।”

उन्होंने कहा, “यह योजना जनजातीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन के माध्यम से जनजातीय आय में सुधार करने के लिए बनाई गई है। यह वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन, संग्रह, पैकेजिंग और मार्केटिंग पर आधारित है।”

उल्लेखनीय है कि वन धन योजना जनजातीय मामलों के मंत्रालय और TRIFED की एक पहल है। यह भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अप्रैल 14, 2018 को लॉन्च किया गया था।

जनजातीय मामलों के मंत्रालय के माध्यम से इस योजना को राज्य स्तर पर राज्य नोडल विभाग के रूप में लागू किया जाएगा और जिला कलेक्टरों को जमीनी स्तर पर योजना के कार्यान्वयन में एक निर्णायक भूमिका निभाने के लिए परिकल्पित किया गया है।

मुझे शाहरुख भाई पर गर्व है, वह मुजाहिद की तरह लड़ा, वही हमारा हीरो है: न्यूजलॉन्ड्री का शरजील उस्मानी

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान दिनदहाड़े पुलिस पर बंदूक तानने वाला शाहरुख पठान अब न्यूजलॉन्ड्री के शरजील उस्मानी के लिए हीरो बन गया है। इस बात को उस्मानी ने खुद ट्विटर पर बताया है।

न्यूजलॉन्ड्री के लिए लिखने वाले शरजील उस्मानी ने इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर को शेयर करते हुए लिखा, “मुझे शाहरुख भाई पर गर्व है। वे उस समय समुदाय के लिए लड़े, जब पूरी स्टेट मशीनरी और हिंदुत्व सेना हमारे समुदाय को मारने और लूटने में शामिल थी। वे हमारे हीरो हैं।”

शरजील आगे लिखता है, “जनता, इन गाँधीवादी लोगों को खुद को बेवकूफ मत बनाने दो। ये लोग आपके लिए नहीं लड़ रहे थे। शाहरुख लड़ रहा था। ये गाँधीवादी चाहते तो अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करके आपकी जान बचा सकते थे। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया। शाहरुख एक मुजाहिद की तरह लड़ा। वही हमारा हीरो है। “

गौरतलब है कि ये पहली दफा नहीं है जब दिल्ली में दंगों के बाद शरजील उस्मानी चर्चा में आया है। इससे पहले भी वह अपने कुछ ट्वीट के कारण चर्चा में रहा था। इन ट्वीट में उसने देश के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा फैलाने की बात खुलेआम कही थी।

उसने कहा था कि वह दो दोस्तों के साथ मिलकर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हो रहे घृणित अपराधों को सबटाइटल देगा, ताकि वे वीडियो विश्व के कोने-कोने तक जाए और लोग जान पाएँ कि भारत में क्या हो रहा है।

इसके बाद शरजील उस्मानी को आयशा रेन्ना का समर्थन मिला था। आयशा रेना वही कट्टरपंथी लड़की है, जिसे जामिया हिंसा में पोस्टर गर्ल बनाकर उभारा गया था और इसने व उस्मानी जैसे कइयों ने शरजील इमाम के समर्थन में पोस्ट लिखा था।

लाठी, रॉड, नुकीली तार के इस्तेमाल से छद्म युद्ध की तैयारी में लगा है चीन, भाड़े के लड़ाके दे रहे ट्रेनिंग: रिपोर्ट्स

गलवान घाटी पर 14-15 जून को भारत-चीन सेना के बीच हुई झड़प के बाद लोगों के मन में कई सवाल हैं। एकतरफ सीमा पर शांति बनाने के लिए लगातार प्रयास चल रहा है। तो वहीं युद्ध की स्थिति को भाँपते हुए भारतीय सेना भी पूरी तैयारी से LAC पर तैनात है।

इसी बीच खबर आई है कि चीन अब भी अपनी हरकतों से बाज आने का नाम नहीं ले रहा। चीन लगातार सीमा पर फौजियों का जमावड़ा बढ़ा रहा है। साथ ही अपने सैनिकों को हैवान बनाने के लिए उसने एक नया तरीका ढूँढ निकाला है।

दरअसल, 1996 के एक समझौते के अनुसार, एलएसी पर दोनों देशों के सिपाही हथियार का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। इसलिए अब चीन एक्शन लेने के लिए अपने सैनिकों को तिब्बती लड़ाकों से ट्रेनिंग दिलवा रहा है। साथ ही उन्हें भी सेना में शामिल कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तिब्बत के लड़ाके लाठी-भाले, डंडा और रॉड के जरिए युद्ध करने में माहिर होते हैं। इसलिए इन्हीं के भरोसे अब चीन भारत से छद्म युद्ध करने की कोशिशों में जुटा है। तिब्बत के पठारी इलाके में रहने वाले ये लड़ाके ही चीनी सेना को नुकीली चीज या फिर लाठी व डंडों से लड़ने की ट्रेनिंग दे रहे हैं।

मतलब साफ है कि अपनी विस्तारवादी नीति को बढ़ावा देने के लिए चीन छद्म युद्ध की तैयारियों में जुटा है। जिसके लिए वह भाड़े के लड़ाकों की मदद तक ले रहा है।

याद दिला दें कि 14-15 जून को भारतीय सैनिकों पर जो चीन सेना ने धोखे से हमला किया था, उसमें भी उन्होंने लाठी-डंडे-कंटीली तारों का प्रयोग ही किया था। भारतीय सेना ने सोशल मीडिया पर एक वैसे ही हथियार की वायरल तस्वीर की सच्चाई बताते हुए ये भी स्पष्ट किया था कि भले ही ये हथियार वो नहीं है, जिससे हमला हुआ। लेकिन ये सच है इसी तरह के हथियारों से चीन ने भारतीय सैनिकों पर वार किया।

गौरतलब है कि साल 1996 और 2005 में भारत और चीन के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के मुताबिक ये तय हुआ कि दोनों देशों के सैनिक गश्त के दौरान आमने-सामने आने पर एक दूसरे पर गोली नहीं चला सकते। इसके अलावा एलएसी के 2 किमी के दायरे में गश्त के दौरान अपने रायफल के बैरल को भी जमीन की ओर झुकाकर रखेंगे। साथ ही बिना सूचना के LAC के 10 km के भीतर सैन्य विमान भी नहीं उड़ाएँगे।

मगर, साल 2020 में चीन ने इस समझौते का उल्लंघन किया, जिसके कारण भारत को भी प्रभावी कदम उठाने पड़े। अब भारत ने चीन की नीयत को भाँपते हुए कमांडर्स को सीमा पर स्थिति देखते हुए हथियारों का इस्तेमाल करने की आजादी दे दी है। दूसरी ओर चीन ने सीमा पर भारी हथियारों, तोप और टैंको को तैनात कर दिया है।