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टी-सीरीज ने यूट्यूब पर अपलोड किया पाकिस्तानी सिंगर आतिफ असलम का गाना, विरोध के बाद डिलीट किया, माँगी माफी

म्यूजिक कंपनी टी-सीरीज ने 23 जून को अपने यूट्यूब चैनल पर पाकिस्तानी गायक आतिफ असलम का एक गाना अपलोड कर दिया। अपलोड किया गया गाना, “किन्ना सोना”, इसे मीट ब्रदर्स द्वारा फिल्म मरजावां के लिए सिद्धार्थ मल्होत्रा ​​और तारा सुतारिया द्वारा कंपोज किया गया है।

इस गीत के यूट्यूब पर आते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने टी-सीरीज को अपने निशाने पर ले लिया। गीत अपलोड होने से नाराज नेटिज़न्स ने कई ट्वीट्स में टी-सीरीज़ को टैग किया और आक्रोश व्यक्त किया कि वे अपने सभी प्लेटफार्मों से गीत को हटा दें। इसके बाद टी-सीरीज कंपनी ने आतिफ असलम के गाने को यूट्यूब से हटा दिया है और पाकिस्तानी सिंगर को बढ़ावा देने के लिए माफी भी माँगी।

याद रहे कि कि फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) और ऑल इंडिया सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने पाकिस्तानी कलाकारों के भारत में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम पिछले साल पाकिस्तान सरकार द्वारा अपने देश में भारतीय फिल्मों की रिलीज पर प्रतिबंध लगाने के बाद लिया गया था।

MNS की ओर से दी गई चेतावनी

टी-सीरीज कंपनी से गाने को हटाने की माँग करने के लिए सोशल मीडिया पर हैशटैग #TakeDownAtifAslamSong ट्रेंड करता रहा। इस पर एमएनएस सिनेमा विंग के अध्यक्ष अमेय खोपकर ने नाराजगी व्यक्त करते हुए एक ट्वीट के माध्यम से चेतावनी दी। उन्होंने टी-सीरीज़ से कहा कि वह पाकिस्तानी गायक आतिफ असलम के गाने को तुरंत यूट्यूब चैनल से हटा दें या फिर सख्त कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार रहें।

सोशल मीडिया पर विरोध और एमएनएस की चेतावनी के बाद टी-सीरीज़ ने आतिफ के गीत को हटा दिया और राज ठाकरे को संबोधित मराठी में एक माफी नामा जारी किया। उसमें लिखा “यह हमारे संज्ञान में लाया गया है कि उक्त गीत को आतिफ असलम ने गाया है और यह गीत हमारे एक कर्मचारी द्वारा टी-सीरीज़ के यू-ट्यूब चैनल पर गलती से डाला गया था। उसे अपनी हरकत के बारे में अंदाजा भी नहीं था, जिसके कारण ये गलती हुई।

इसका हमें अफसोस है और इस गलती के लिए हम माफ़ी माँगते हैं। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि इसके बाद हम टी-सीरीज़ के किसी भी मंच पर न तो रिलीज़ करेंगे और न ही गाने को बढ़ावा देंगे। साथ ही बताया कि इस गीत को हमने अपने यू-ट्यूब चैनल से हटा दिया है। हम यकीन दिलाते हैं कि इसके बाद हम किसी भी पाकिस्तानी कलाकार द्वारा किए गए कार्य को न तो जारी करेंगे और न ही बढ़ावा देंगे।

टी सीरीज का विवादों से है पुराना नाता

आतिफ असलम ने पिछले साल धारा 370 को निरस्त करने की निंदा की थी, जिसके कारण भारत में नेटिज़न्स से टकराव हुआ था। हाल के दिनों में टी-सीरीज़ गायक सोनू निगम के साथ विवादों में घिर गई है। निगम ने कंपनी पर बाहरी लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया था।

कंपनी पर फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी, क्योंकि इन एसोसिएशनों ने पाकिस्तानी कलाकारों के भारत में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

देवताओं की मूर्ति के अपमान के बाद ‘फाउंडेशन क्लब’ ने माफी माँगी, हटाई गई भगवान महावीर की प्रतिमा

लास वेगास के फाउंडेशन रूम (Foundation Room), मांडले बे रिज़ॉर्ट और कैसीनो के मालिकों ने घोषणा की है कि वो अपने क्लब में इस्तेमाल की गई देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के अनुचित इस्तेमाल पर आपत्ति के बाद उन मूर्तियों को कार्यक्रम स्थल से हटा देंगे। हालाँकि, इसमें महावीर स्वामी की प्रतिमा का जिक्र तो है लेकिन भगवान गणेश की प्रतिमा को लेकर इसमें कोई जिक्र नहीं किया गया है।

हाल ही में, सोशल मीडिया यूजर्स ने लास वेगास में बज़ी कॉकटेल लाउंज (Buzzy cocktail lounge) की कुछ तस्वीरों को शेयर किया था और लास वेगास में फाउंडेशन रूम के मालिकों द्वारा जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर के प्रति किए गए अनादर पर अपनी निराशा जाहिर की थी।

कुछ ही दिन पहले फाउंडेशन रूम क्लब की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की गई थीं। तस्वीरों में देखा जा सकता है कि इस क्लब को हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से ‘सजाया’ गया था। यही नहीं, इस क्लब में उन प्रतिमाओं के साथ पोल डांस होता है, न्यूडिटी में बार डांसर्स उन प्रतिमाओं पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाती नजर आती हैं और शराब परोसी जाती है।

ऐसी जगह पर महावीर, बुद्ध, गणेश, नटराज आदि सनातन धर्मों से जुड़े कई ईश्वर की प्रतिमाओं को रखा जाना और उनके साथ इस आचरण पर कई लोगों ने अपना रोष प्रकट किया था।

बताया जा रहा है कि इस क्लब की तस्वीरों के सामने आने पर उत्तरी नेवादा के कुछ धर्मगुरुओं द्वारा इस पर आपत्ति जताई गई थी, जिन्होंने मांडले बे में ‘द फाउंडेशन रूम’ से एक धर्म-आधारित प्रतिमा को हटाने का आग्रह किया था।

एक संयुक्त बयान में, धर्मगुरुओं ने कहा- “एक कैसीनो नाइट-क्लब को सजाने के लिए हिंदू और जैन देवताओं की आस्था के प्रतीक रखना बहुत ही अपमानजनक है और इन धर्मों के अनुयायियों के लिए परेशान करने वाला हो सकता है।”

इसके बाद बुधवार (जून 24, 2020) को, ‘फाउंडेशन रूम’ ने एक बयान जारी कर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने पर माफ़ी माँगी और कहा कि वो प्रतिमाओं को हटा देंगे ।

“फाउंडेशन रूम की दो दशकों से लम्बे समय से चली आ रही प्रेम, शांति, सच्चाई, धार्मिकता और अहिंसा के माध्यम से नस्लीय और आध्यात्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने की परंपरा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। हम उन लोगों से माफी माँगते हैं, जो तस्वीरों से नाराज हैं और हम पूरी निष्ठा से इस पर काम करेंगे। हम सुनिश्चित करेंगे कि इस तरह के असंवेदनशील चित्रण फिर से न हों। विशेष रूप से, हम अपने परिसर से महावीर स्वामी की मूर्ती को हटा रहे हैं। हमने हमेशा बातचीत को बढ़ावा देकर मामले सुलझाने का प्रयास किया है और आगे बढ़ने के लिए इस भावना के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

फाउंडेशन रूम द्वारा बयान जारी कर माफ़ी माँगी गई है

हालाँकि, इस ट्वीट में हिन्दू देवता गणेश की मूर्ती के अपमान को लेकर कोई बात नहीं कही गई है।

एंटोनियो माइनो कोई क्वीन विक्टोरिया है क्या? संबित पात्रा ने दरबारी राजदीप की बकैती पर किया सवाल

गलवान घाटी के विषय पर पीएम मोदी द्वारा सोनिया गाँधी को फ़ोन करने के प्रश्न पर भाजपा पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने राजदीप सरदेसाई से पूछा कि एंटोनियो माइनो (सोनिया गाँधी) कोई क्वीन विक्टोरिया हैं क्या? जिसके जवाब में कार्यक्रम के संचालक राजदीप सरदेसाई सिर्फ मुस्कुराते रह गए।

न्यूज चैनल इंडिया टुडे के एक डिबेट कार्यक्रम में राजदीप सरदेसाई चाहते थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोनिया गाँधी को फ़ोन कर उनसे लद्दाख में चल रहे गतिरोध के बारे में बात करें। जिस पर संबित पात्रा ने सरदेसाई के तथ्यों में कुछ सुधार किया और यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो पड़ा।

लाइव टीवी डिबेट की यह वीडियो क्लिप बुधवार (जून 24, 2020) का है। भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी इस वीडियो को अपने अधिकारिक ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है।

टीवी पर बहस के दौरान राजदीप सरदेसाई ने संबित पात्रा से सवाल किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोनिया गाँधी से बात करने के लिए फोन क्यों नहीं उठाते हैं?

इसके जवाब में संबित पात्रा ने कहा कि तो फिर केंद्र सरकार द्वारा सर्वदलीय बैठक क्यों बुलाई गई थी? भाजपा प्रवक्ता ने आगे कहा कि आप (राजदीप सरदेसाई) कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोनिया गाँधी को फोन कर सकते हैं, क्यों? वो स्पेशल हैं? वो ऑल पार्टी मीटिंग में थीं, क्या वहाँ उन्हें नहीं बुलाया गया था?

संबित पात्रा ने कहा –

“कल वो वहाँ चाय-पानी पीने आई थीं? पीएम मोदी को उन्हें निजी तौर पर फोन क्यों करना चाहिए? एंटोनियो माइनो भारत की विक्टोरिया हैं क्या? प्रधानमंत्री को सभी को निजी तौर पर क्यों फोन करना चाहिए? वो ऑल पार्टी मीटिंग थी। फिर तो प्रधानमंत्री को विक्टोरिया और ‘क्लाउन प्रिंस’ (जोकर युवराज) को भी फोन करना चाहिए। वो भारत के प्रधानमंत्री हैं… वो कोई न्यूज एंकर नहीं हैं। वो किसी न्यूज़ चैनल के गेस्ट कोऑर्डिनेटर नहीं हैं, जो सभी को फोन कर कहे कि आप आ जाओ… छह बजे आ जाओ डिबेट करने के लिए। वो भारत के प्रधानमंत्री हैं।”

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत रविवार (21 जून) को भारत-चीन सीमा तनाव पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में सोनिया गाँधी, TMC लीडर ममता बनर्जी, शरद पवार , अखिलेश यादव सहित कई पार्टियों के नेता शामिल हुए थे।

ज्ञात हो कि अधिकांश पार्टी प्रमुखों ने चीन के विषय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन किया लेकिन कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने इस पर सवाल खड़े किए थे। पीएम मोदी ने इस सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट कहा था कि चीन ने भारत के किसी भी सीमा क्षेत्र पर कब्जा नहीं किया है। यह सर्वदलीय बैठक पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में 15 जून को भारत-चीन की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद बुलाई गई थी।

अध्यक्ष बनने के लिए राहुल गाँधी का हो रास्ता साफ… इसलिए कॉन्ग्रेस कार्य समिति की बैठक में रचा गया ड्रामा

कॉन्ग्रेस पार्टी ने मंगलवार 23 जून, 2020 को कॉन्ग्रेस कार्य समिति (CWC) की बैठक आयोजित की थी। यहाँ राहुल गाँधी को दोबारा से कॉन्ग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाने को लेकर पार्टी के नेताओं को राहुल के गुस्से का सामना करना पड़ा – ऐसी रिपोर्ट आई थी। अब यह बताया जा रहा है कि यह पूरा ड्रामा संभवतः राहुल गाँधी और प्रियंका द्वारा स्क्रिप्ट किया गया होगा।

मंगलवार को सीडब्ल्यूसी की बैठक के दौरान, राहुल गाँधी से जब भारत-चीन गतिरोध को लेकर उनके द्वारा अपनाई गई रणनीति के बारे में सवाल पूछा गया तो वे भड़क गए थे। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गाँधी ने तब उत्तेजना दिखाई, जब आरपीएन सिंह ने राहुल को सुझाव दिया कि गलवान घाटी में हुए हिंसक झड़प के बारे में बात करते हुए उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री पर हमला नहीं करना चाहिए।

इस पर राहुल गाँधी ने आरपीएन सिंह से कहा, “मैं पीएम मोदी से नहीं डरता। वह मेरे साथ कुछ नहीं कर सकते। मैं उनकी आलोचना करना जारी रखूँगा। अगर यहाँ के लोगों को इससे कोई समस्या है, तो सीडब्ल्यूसी मुझे चुप रहने के लिए कहे।” दरअसल, ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गाँधी ने पीएम मोदी की आलोचना के साथ अपने वरिष्ठ नेताओं की तरफ भी इशारा करते हुए आरोप लगाया कि पीएम मोदी से ‘पुराना गार्ड’ डर गया था, जबकि नया गार्ड ”निर्भीक नेता” (जो वह खुद को बता रहे थे) है, जो पीएम मोदी की राजनैतिक क्षमता को भाँप सकता है।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट अनुसार, “राहुल गाँधी ने पहले से ही AICC की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा को अपने समर्थन में तैयार किया था, जिन्होंने कहा कि ‘राहुल जी और कुछ लोगों को छोड़कर’ कॉन्ग्रेस के बाकी नेता पीएम मोदी और अमित शाह की प्रत्यक्ष रूप से आलोचना करने से बचते हैं।

यह नाटक यहीं नहीं रुका। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा, प्रधानमंत्री मोदी को गाली देने के लिए खुद की पीठ खुद से ही थपथपाई। सीडब्ल्यूसी की बैठक में अशोक गहलोत, हरीश रावत और युवा विंग के प्रमुख बीएस श्रीनिवास को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गाँधी की वापसी की माँग करते हुए भी देखा गया।

अब यह बताया जा रहा है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक के दौरान का पूरा एपिसोड राहुल गाँधी-प्रियंका गाँधी वाड्रा की जोड़ी द्वारा एक स्क्रिप्टेड ड्रामा हो सकता है।

इकोनॉमिक टाइम्स की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक के दौरान हंगामा राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा किए जाने की संभावना है। यह कोई रहस्य नहीं है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में राहुल की टीम और सोनिया की टीम अलग अलग बँटी हुई है। ऐसे कई नेता हैं, जो महसूस करते हैं कि केवल सोनिया गाँधी ही कॉन्ग्रेस का नेतृत्व कर सकती हैं, जबकि कुछ अन्य हैं जो मानते हैं कि पार्टी को राहुल गाँधी जैसे नेता की आवश्यकता है।

सीडब्ल्यूसी की बैठक के दौरान, ईटी रिपोर्ट बताती है कि इस ड्रामे की स्क्रिप्ट पर संदेह इसलिए व्यक्त किया जा रहा है, क्योंकि जिन लोगों को सवाल पूछने की अनुमति दी गई थी, वे टीम-राहुल से सावधानीपूर्वक तय किए गए थे। कथित तौर पर, महासचिव केसी वेणुगोपालन ने इस बैठक का समन्वय किया था और फैसला किया था कि सभी को विशेष रूप से राहुल गाँधी से सवाल पूछने की अनुमति दी जानी चाहिए।

इसके अलावा, राजीव सातव, सुष्मिता देव और युवा विंग के प्रमुख बी श्रीनिवास ने सबसे पहले राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उनके कठोर और अपमानजनक हमलों को लेकर प्रशंसा की थी। और यह भी कहा कि कैसे बाकि के नेता ऐसा करने से इनकार करते हैं।

ईटी ने कॉन्ग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से कहा, “मैंने स्पष्ट रूप से सोनिया जी को सुष्मिता को संकेत देते हुए देखा था। मैंने यह भी स्पष्ट रूप से देखा कि कैसे रणदीप सिंह सुरजेवाला ड्रामा करते हुए सीडब्ल्यूसी के प्रस्ताव को पढ़ने का नाटक कर रहा था। यह नाटक बहुत ही स्पष्ट था।”

रिपोर्ट के अनुसार देखा जाए तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने पूरे नाटक की स्क्रिप्ट लिखी होगी। अगर शुरुआत से देखा जाए कि जिन लोगों को सवाल पूछने की अनुमति दी गई थी, उन्हें चुना गया था। ऐसा लग रहा था मानों कॉन्ग्रेस पार्टी में हर कोई जानता है कि आरपीएन सिंह राहुल की आलोचना करेंगे। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कॉन्ग्रेस के नेता आरपीएन सिंह, एनडीटीवी के पत्रकार सोनिया सिंह के पति भी हैं।

इसके अलावा, इस ड्रामे से पहले ही राहुल के करीबी विश्वासपात्रों ने उनकी प्रशंसा की थी, जो इस तरफ इशारा करता है कि राहुल का साहसी नेता होने का नैरेटिव बैठक का प्रमुख मुद्दा था।

सीडब्लूसी बैठक में हुआ ड्रामा राहुल प्रियंका द्वारा स्क्रिप्टेड

भारत-चीन गतिरोध के दौरान कॉन्ग्रेस अपने रुख के लिए भारी आलोचना में आई है। पीएम मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश के दौरान राहुल गाँधी ने तथ्यों के बारे में गलत जानकारी देते हुए झूठ बोला और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किया। कई लोगों का मानना ​​है कि कॉन्ग्रेस ने राजनीतिक विरोध और सत्ता हथियाने की कोशिशों में राष्ट्र के हित में काम करना भूल गई है।

राहुल गाँधी द्वारा लिखी गई यह पूरी कहानी न केवल दूसरों को, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों को भी समझाने की कोशिश हो सकती है कि उनकी द्वारा अपनाई गई रणनीति प्रभावी है। जिसके चलते पार्टी के युवाओं द्वारा उनकी सराहना भी की जा रही है।

इसके अलावा, स्क्रिप्टेड ड्रामा का उद्देश्य पार्टी के भीतर होने वाले झगड़े को बढ़ाना भी हो सकता है ताकि राहुल गाँधी को कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के रूप में फिर से स्थापित किया जा सके। बता दें कि 2019 में भी, राहुल गाँधी ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि पार्टी के भीतर, वरिष्ठ नेता सीधे प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की आलोचना करने से कतराते हैं। ऐसे में ये सारा ड्रामा एक बहाना भी हो सकता है कि खुद को पार्टी अध्यक्ष के पद पर दोबारा स्थापित करने का। ताकि वो सबसे यह बोल सकें कि उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी। उनके पार्टी के सदस्य उन्हें वापस चाहते थे।

सलमान खुर्शीद ने फरवरी 2020 में, बिना किसी के नेतृत्व के जूझ रही कॉन्ग्रेस पार्टी को लेकर यह कहा था कि पार्टी अभी ट्रेडिशनल प्रोसेस में है। और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में किसी को कोई परेशानी नहीं थी। दिलचस्प बात यह है कि जब पूछा गया कि क्या राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रूप में वापसी पार्टी के बहुमत का विकल्प है, तो खुर्शीद ने सकारात्मक जवाब में कहा कि “पार्टी के एक बड़े वर्ग के बीच हमेशा से यह भावना रही है”।

इन सभी बातों से लगता है कि कॉन्ग्रेस पूरी कोशिश कर रही है कि राहुल गाँधी को अध्यक्ष के रूप में वापस आने के लिए एक सुरक्षित बहाना मिल जाए। क्यूँकि पहले उन्होंने पद छोड़ते हुए घोषणा की थी कि वह पार्टी अध्यक्ष के रूप में कभी वापस नहीं आएँगे। इसलिए राहुल गाँधी की बयानबाजी और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने की राजनीतिक रणनीति को सही ठहराने के उद्देश्य से स्क्रिप्टेड ड्रामा रचा गया।

‘राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है, लोगों को डरने की जरूरत नहीं’ – यूँ शुरू हुआ था दमन का दौर

भारत में आजकल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हुए वर्तमान सरकार की आलोचना करना जैसे फैशन हो गया है। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को सबसे ज्यादा चोट 25 जून, 1975 को पहुँचाई गई।

इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा लोकतंत्र का सर्वाधिक मखौल उड़ाया गया। भारतवासियों के सभी नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित और नेस्तनाबूद करते हुए पूरे भारत में दहशत फैलाई गई। आपातकाल आजादी के बाद की सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में से एक है।

25 जून, 1975 की रात को देशवासियों पर अचानक और अकारण आपातकाल थोप दिया गया। निश्चय ही, इस दुर्घटना को भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जा सकता है। आपातकाल के दौरान पूरे देश को एक बहुत बड़े जेलखाने में तब्दील कर दिया गया।

25 जून, 1975 की सुबह ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की आवाज में जो संदेश प्रसारित हुआ, उसे पूरे देश ने सुना। इस संदेश में इंदिरा गाँधी ने कहा “भाइयो और बहनो! राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।”

इन चंद अर्थहीन और अनर्गल शब्दों के बाद ही पूरे भारत में आपातकाल का भयावह दौर शुरू हुआ। भारतीय संविधान में आपातकाल लगाए जाने का प्रावधान उन परिस्थितियों के लिए किया गया है, जब देश में आंतरिक अशांति का माहौल हो। ऐसी परिस्थिति आने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश मे शांति की पुनः बहाली के लिए आपातकाल लगाया जा सकता है।

लेकिन 25 जून, 1975 में ऐसी कोई आतंरिक अशांति की स्थिति नहीं थी। वस्तुतः “गरीबी हटाने” वाली इंदिरा गाँधी ने लोकतंत्र हटा दिया। आपातकाल इंदिरा गाँधी ने अपनी गद्दी बचाने के लिए सत्ता मोह में लगाया था l यह ‘इंदिरा इज इंडिया’ जैसी आत्ममुग्ध मानसिकता का दुःखद प्रतिफलन था। आपातकाल के परिणामस्वरूप देश भर में प्रेस सेंसरशिप लगा दी गई।

इंदिरा गाँधी के रेडियो संदेश प्रसारित होने से पहले ही 24 जून की रात को देश में आपातकाल लागू करने और विपक्ष के तमाम नेताओं की गिरफ्तारी का फैसला हो चुका था। आधी रात को ही प्रधानमंत्री ने तत्कालीन ‘रबर स्टैम्प’ राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इस फैसले पर हस्ताक्षर करवा लिए थे।

माहौल इतना डरावना हो चुका था कि इसके खिलाफ कुछ भी बोलते/लिखते ही गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया जाता था। आपातकाल 21 मार्च, 1977 तक जारी रहा। आपातकाल के इन 21 महीनों को भारतीय लोकतंत्र का संकट काल माना जाता है।

आपात काल लागू होने से पहले देश में नाराजगी और राजनीतिक गहमा-गहमी बढ़ती जा रही थी। मसलन, बढ़ती बेरोजगारी, महँगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ तमाम विपक्ष सड़कों पर था। जनता लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पीछे लामबंद हो रही थी। गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन देश भर में फैलने लगा था।

इंदिरा गाँधी के सलाहकारों ने इस आंदोलन से सख़्ती से निपटने की सलाह दी। उनसे कहा गया कि अगर सख़्ती नहीं दिखाई गई तो उनकी सत्ता को खतरा है। सवाल यह उठता है कि ऐसे कौन से कारण थे, जिनकी वजह से भारतीय संविधान को ताक पर रखते हुए आपातकाल की घोषणा की गई थी?

जब इस सवाल का जवाब खोजा जाता है तो हमें उन असंख्य राजनीतिक गाँठों को खोलना पड़ता है, जो तमाम सुविधाभोगी बुद्धिजीवियों द्वारा लगाई गई हैं। इन पेचीदगियों को इस पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है- आपातकाल से पहले 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी रायबरेली सीट से निर्वाचित हुई थीं। इस चुनाव में इंदिरा गाँधी ने विपक्ष के उम्मीददवार और मुख्य प्रतिद्वन्द्वी राजनारायण को पराजित किया था। चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप के साथ राजनारायण अदालत गए।

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गाँधी का निर्वाचन रद्द करते हुए उनके अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। अन्ततः मामला सुप्रीम कोर्ट गया और 24 जून को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन रद्द करने के फैसले को सही ठहराया। लेकिन इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दी। वह संसद की कार्यवाही में भाग ले सकती थीं, लेकिन वोट नहीं कर सकती थीं।

जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण ने ऐलान किया कि अगर 25 जून, को इंदिरा गाँधी अपना पद नहीं छोड़ेंगी, तो अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन किया जाएगा। दिल्ली के रामलीला मैदान की विशाल जनसभा में जेपी ने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ”सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” को नारे की तरह इस्तेमाल किया।

उन्होंने कहा, “मुझे गिरफ्तारी का डर नहीं है। मैं इस रैली में भी अपने आह्वान को दोहराता हूंँ ताकि कुछ दूर संसद में बैठे लोग भी सुन लें। मैं आज एक बार फिर सभी पुलिसकर्मियों और जवानों का आह्वान करता हूँ कि इस सरकार के आदेश को नहीं मानें क्योंकि इस सरकार ने शासन की अपनी वैधता खो दी है।”

इंदिरा गाँधी ने अपने सलाहकारों से आपातकालीन मंत्रणा के बाद आंतरिक उपद्रव की आशंका की आड़ लेकर आपातकाल लगाने का फैसला किया। आधी रात को ही तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आंतरिक आपातकाल लागू करने का फरमान जारी करवा लिया गया।

25 जून की शाम को तमाम अखबारों की बिजली काट दी गई। इसके 21 महीने बाद यानी 21 मार्च, 1977 को आपातकाल हटाया गया। आपातकाल लागू करने का फैसला कॉन्ग्रेस के लिए इस कदर घातक साबित हुआ कि इसके बाद हुए चुनाव में कॉन्ग्रेस की तब तक की सबसे बुरी हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली बार गैर कॉन्ग्रेसी सरकार बनी। आपातकाल की घोषणा के बाद इसका नकारात्मक प्रभाव सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में देखने को मिला।

आपातकाल की घोषणा के बाद देश में मीसा एक्ट लागू किया गया। सरकार ने मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत नेताओं को बंदी बनाया। इस एक्ट के अंतर्गत विरोधी दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों पर नज़रबंद या जेलबन्द कर दिया गया।

विपक्ष के सभी मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस और जय प्रकाश नारायण जैसे शीर्षस्थ नेताओं को भी जेल भेज दिया गया। चंद्रशेखर जो कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य थे, को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

इस दौरान ऐसा कानून बनाया गया, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत माँगने का अधिकार नहीं था। नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना उनके रिश्तेदारों, मित्रों और सहयोगियों को भी नहीं दी गई। जेल में बंद नेताओं को किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थीl उनकी डाक तक सेंसर होती थी। इस दौरान पुरुष और महिला बंदियों के साथ अमानवीय अत्याचार किया गया।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी को सबसे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का निपटारा करना था। इसलिए इन फैसलों को पलटने वाला कानून लाया गया। इसके लिए संविधान को संशोधित करने की भी कोशिश की गई।

आपातकाल के दौरान ही संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करने और उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुँचाने तथा सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश की गई । आपातकाल की शुरुआत में ही संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया। मसलन कानून की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को स्थगित कर दिया गया l

जनवरी, 1976 में अनुच्छेद 19 को भी निलंबित कर दिया गया। इसके जरिए (अभिव्यक्ति की आजादी, प्रकाशन करने, संघ/संगठन बनाने और सभा करने की आजादी) को भी छीन लिया गया।

आपातकाल लगते ही अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई। अखबारों और समाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया। सरकार ने चारों समाचार एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती को खत्म कर एक नई समाचार एजेंसी बना दी। इसके साथ ही प्रेस के लिए “आचार संहिता” की घोषणा कर दी गई।

कई संपादकों को सरकार विरोधी लेख लिखने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। इतना ही नहीं मनोरंजक कार्यक्रमों और कार्टून आदि के माध्यम से सरकार पर कटाक्ष करने वालों को भी उत्पीड़ित किया जाने लगा। फिल्मों, गानों और ऐसे तमाम कार्यक्रमों और माध्यमों पर रोक लगा दी गई थी।

आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की फिल्म “किस्सा कुर्सी का” को जब्त कर लिया गया। किशोर कुमार जैसे गायकों को काली सूची में डाल दिया गया और ‘आँधी’ फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई। आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलों और जजों को भी नहीं बख्शा गया।

आर्थिक मोर्चे पर भी आपातकाल का काफी नकारात्मक असर पड़ा। इस दौरान आर्थिक नीतियों में मनचाहे परिवर्तन और श्रमिक कानूनों को कमजोर करके उनके बुनियादी अधिकारों को कम करने की कोशिश की गई। जहाँ कहीं भी मज़दूरों की हड़ताल हुई, वहीं उसे कुचलने की कोशिश की गई।

जबरन नसबंदी आपातकाल के दुःस्वप्नों में से एक थाl जबरिया “परिवार नियोजन” के लिए अध्यापकों और छोटे कर्मचारियों पर काफी सख्ती की गई। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर लोगों की निर्ममतापूर्वक नसबंदी की गई।

परिवार नियोजन, नगरों के सुंदरीकरण और सुधारीकरण के नाम पर आम लोगों, दुकानदारों और व्यापारियों का अत्यधिक उत्पीड़न हुआ। आपातकाल में अफसरशाही और पुलिस को जो अनियंत्रित अधिकार मिले थे, उनका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया। हालाँकि, इस दौरान प्रचार यह किया गया कि आपातकाल के दौरान भ्रष्टाचार कम हुआ है। लोगों में अनुशासन आया है और समय पर काम होने लगे हैं। रेलें समय पर चलने लगीं हैं।

प्रोपेगेंडा ही सर्वप्रमुख राजनीतिक एजेंडा था। लेकिन दो-तीन महीने बाद ही हालात पहले से भी कहीं ज्यादा खराब हो गए। आपातकाल ने आम लोगों के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया। आपातकाल के विरोध में लोगों का गुस्सा फूटा और 1977 के आम चुनाव में जनता ने एकजुट होकर इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस को हराकर लोकतंत्र में अपनी गहरी आस्था का सबूत दे दिया।

1975 में आपातकाल लागू होने के बाद संविधान में ऐसे संशोधनों का दौर शुरू हो गया, जिन्होंने नवोदित भारतीय गणतंत्र का गला घोंट कर रख दिया। आपातकाल और इसको लागू करने के संबंध में भारतीय संविधान में अलग से प्रावधान किया गया है। भारतीय संविधान के भाग-18 में अनुच्छेद 352 से लेकर 360 के बीच आपातकाल की चर्चा की गई है। संविधान में उल्लेखित आपातकालीन शक्तियों का बहुत अधिक दुरुपयोग किया गया।

आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गाँधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किए। मसलन, जुलाई 1975 में 38वें संविधान संशोधन के जरिए न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया। 2 महीने बाद ही किए गए 39वें संविधान संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया।

40वें और 41वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान के कई अन्य प्रावधानों को बदलने के बाद 42वाँ संविधान संशोधन भी किया गया। 42वें संविधान संशोधन के जरिए एक प्रकार से पूरे संविधान का पुनरीक्षण किया गया और संविधान में बहुत से मूलभूत बदलाव किए गए।

42वें संविधान संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था – मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता दिया जाना। इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों तक से वंचित किया जा सकता था। इस संशोधन ने न्यायपालिका को पंगु कर दिया और विधायिका को असीमित शक्तियाँ प्रदान कर दीं।

दूसरा बदलाव यह किया गया कि अब केंद्र सरकार को यह अधिकार था कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी। इसके साथ ही राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया।

तीसरा 42वें संविधान संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया गया कि संसद द्वारा किए गए संविधान संशोधन को किसी भी आधार पर न्यायपालिका में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार ने मानो पूरे संविधान की ही कमर तोड़कर रख दी थी। इसलिए 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की आवश्यकता महसूस की गई।

44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के जरिए आपातकालीन प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की गई। इसलिए कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को संविधान में शामिल किया गया, जिससे कि भविष्य में कोई अन्य सरकार संविधान की आत्मा को आहत ना कर सके।

इन प्रावधानों में 44वें संविधान संशोधन के द्वारा आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर रोक लगाई गई। 42वें संविधान संशोधन का प्रभाव कम किया गया। संविधान को फिर से अपने मूल रूप में लाया गया। संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर वैधानिक अधिकार बना दिया गया। इस प्रकार 44वें संविधान संशोधन ने ऐसे कई बदलाव किए, जिससे आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न ना हो।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र के लिए कहा जाता है कि लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, और जनता द्वारा चलाया जाने वाला शासन है। लेकिन जब जनता द्वारा चुनी गई सरकार ही निरंकुश हो जाए और सारे संवैधानिक उपायों को ताक पर रख कर अधिनायकवादी बन जाए तो लाजिमी है कि देश में अराजकता और अंधेरगर्दी आ ही जाएगी।

भारत में 1975 में ऐसा ही हुआ, जब सत्ता न छोड़ने के लोभ और खुद को सबसे ताकतवर मानने के भ्रम में इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। यह भारत के युवा लोकतंत्र की बुनियाद पर सबसे गहरी चोट थी।

भारत की भावी पीढ़ियों के लिए आपातकाल को याद रखना जरूरी है ताकि उन्हें यह मालूम रहे कि कैसे संविधान को ही हथियार बनाकर जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया गया और अन्ततः कैसे संविधान ने ही इस स्थिति से भारतवासियों को बचाया।

साथ ही, आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की दुहाई देने वालों के डीएनए में मौजूद अधिनायकवादी प्रवृत्तियों और तानाशाही तत्वों की पहचान करके उनके पाखण्ड का पर्दाफाश किया जा सके।

चीनी सेना ने किया नेपाल के कोडारी गाँव का अतिक्रमण, नेपाली संसद में चीन के खिलाफ प्रस्ताव

अपनी विस्तारवादी नीतियों के लिए कुख्यात चीन की कम्युनिस्ट सरकार अब धीरे-धीरे नेपाल की सीमाओं में भी घुसपैठ करने का प्रयास कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो तिब्‍बत से सटे नेपाली गाँव कोडारी के पास ग्रामीणों के साथ चीनी सैनिक भिड़ गए और वहाँ के ग्रामीणों को वापस जाने के लिए कहा।

रिपोर्ट के अनुसार, चीनी सेना ने नेपाल के कोडारी गाँव में घुसकर गाँव के लोगों के साथ हिंसा की और उन्‍हें डराया-धमकाया। चीनी सेना ने उनसे यह भी कहा कि उनका कोडारी गाँव चीन के झांगमू प्रांत का हिस्‍सा है, जो कि तिब्‍बत (टीएआर) में आता है।

चीन झांगमू प्रांत के हिस्से के रूप में तिब्‍बत-चीन सीमा पर स्थित कोडारी पर अपना दावा करता है। इससे पहले चीन ने नेपाल के रुई गाँव पर कब्ज़ा कर लिया था। नेपाल के विपक्ष ने प्रधानमंत्री केपी ओली से कहा है कि वो चीन को गाँवों पर कब्‍जा करने से रोकें।

नेपाल-चीन बॉर्डर पर बसा कस्बा कोडारी

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल की विपक्षी पार्टी नेपाली कॉन्ग्रेस ने चीन द्वारा अतिक्रमित नेपाली भूमि पर नेपाली संसद के निचले सदन में एक प्रस्ताव रखा।

नेपाली कॉन्ग्रेस के सांसद देवेंद्र राज कांडेल, सत्य नारायण शर्मा खनाल और संजय कुमार गौतम ने केपी शर्मा ओली की अगुवाई वाली सरकार के सामने प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव के अनुसार, चीन द्वारा नेपाल के दोलखा, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासभा, गोरखा और रसुवा जिलों में 64 हेक्टेयर क्षेत्र में अतिक्रमण किया गया है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि पिलर 35 को सीमा पर स्थानांतरित कर दिया गया है, जिसके कारण उत्तरी गोरखा का रुई गाँव अब चीन के तिब्बत क्षेत्र में चला गया है।

इसके अनुसार, गोरखा के रुई गाँव के 72 घर और दारचुला के 18 घर चीनी क्षेत्र में हैं। चीन ने वर्तमान में चीन-नेपाल सीमा पर 11 स्थानों का अतिक्रमण किया है। वहीं, नेपाल की ओली सरकार ने इस मुद्दे पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए चुप्पी साध रखी है।

गोरखा जिले के आने वाले रूई गाँव पर चीन पिछले 6 दशकों, से अपना नियंत्रण स्थापित किए हुए है। रूई गाँव पर चीन का प्रशासनिक अधिकार है और अब चीन इसे तिब्‍बत ऑटोनोमॉस रीजन (टीएआर) का हिस्‍सा बताने लगा है।

नेपाल के जरिए अपनी भू-राजनीतिक सीमा का विस्तार कर रहा है चीन

हाल ही में नेपाल द्वारा भारत के अधिकार तहत आने वाले कुछ क्षेत्रों पर दावा करते हुए एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी करने के लिए ऐसा समय चुना, जब भारत लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ सैन्य गतिरोध में शामिल है।

उत्तराखंड की सीमा से लगे लिपुलेख से धारचूला तक सड़क का उद्घाटन होने के बाद से नेपाल दावे कर रहा है कि कालापानी क्षेत्र (पिथौरागढ़ जिला) पर नेपाल का ‘निर्विवाद रूप से’ हक है। इसके मद्देनजर उसने नया नक्शा भी पास कर दिया।

साल 2011 में चीन ने नेपाल में एक ‘फ्रेंडशिप पुल’ का निर्माण किया और व्यापार के नाम पर चीनियों द्वारा यहाँ की दैनिक आमद शुरू हो गई। अब चीन इस कोडारी कस्बे पर अपना दावा करते हुए इसे अपनी सीमा के भीतर झांगमू शहर का हिस्सा बताता है और नेपाल सरकार इसके आगे लाचार और बेबस नजर आती है।

दरअसल, कोडारी पर चीन की नजर तभी से थी, जब उसने नेपाल में व्यापार के लिए अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने शुरू कर दिए थे। भारत ने पहले भी इस पर चिंता व्यक्त की थी। तिब्बत की राजधानी ल्हासा से नेपाल बॉर्डर पर झांगमू (जिसे कि नेपाल में ‘खासा’ कहते हैं) और कोडारी तक आने वाली 800 किलोमीटर लम्बी सड़क ‘चीन-नेपाल फ्रेंडशिप हाईवे’ चीन और नेपाल के बीच व्यापार का मुख्य ज़रिया है।

चीन से संपर्क वाला यह हाईवे कोडारी गाँव से होकर नेपाल से जुड़ जाता है। नेपाल ने सफाई देते हुए कहा था कि नेपाल भारतीय सीमाओं से घिरा देश है और चीन के साथ कोडारी-हाईवे का समझौता केवल भारत पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से लिया गया था। लेकिन यह निर्माण नेपाल की ओर से समझौता कम और नेपाल की मजबूरी ज्यादा बताया जाता है। शायद तब भी नेपाल चीन की विस्तारवादी नीतियों से अवगत नहीं था।

सियाचिन से सेना हटाकर ‘शांति का पहाड़’ बनाना चाहती थी मनमोहन सरकार, Pak से किया था समझौता: पूर्व सेना प्रमुख जेजे सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्व के सबसे ऊँचे सामरिक क्षेत्र सियाचिन से सेना हटाने के लिए पाकिस्तान से समझौता किया था। पूर्व सेना प्रमुख जेजे सिंह ने खुलासा किया है कि सियाचिन पर ‘समझौता’ करने के लिए पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली UPA सरकार पर संभवतः अमेरिका का ‘दबाव’ था।

इस सिलसिले में यूपीए सरकार ने भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को साथ लेकर पाकिस्तान सरकार से बातचीत का सिलसिला शुरू किया था। हालाँकि, रिपब्लिक न्यूज़ चैनल पर ही पूर्व सेना प्रमुख जेजे सिंह ने कहा कि भारतीय सेना इसके पक्ष में नहीं थी लेकिन नई दिल्ली में तब इस पर चर्चा जोरों पर थी।

कॉन्ग्रेस द्वारा भारत के लिए सामरिक उद्देश्य से महत्वपूर्ण सियाचीन ग्लेशियर को पाकिस्तान के साथ समझौता करने की खबर ऐसे समय में फिर चर्चा में आई है, जब कॉन्ग्रेस यह दावा करते हुए प्रवचन दे रही है कि वर्तमान केंद्र सरकार पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में गलवान घाटी में चीन की सेना के सामने ‘समर्पण’ कर रही है और राहुल गाँधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘सरेंडर मोदी’ तक कहते देखे जा रहे हैं।

यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आजकल ‘दहाड़’ लगाते देखे जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चीन के मुद्दे पर सोच-समझ कर बोलना चाहिए। हालाँकि, कॉन्ग्रेस के यह दावे वास्तविकता के धरातल से कितने दूर हैं, इस बात को विपक्षी दल शायद ही स्वीकार करना चाहे।

रिपब्लिक टीवी के प्रमुख संपादक अर्नब गोस्वामी से बात करते हुए, जनरल सिंह ने कहा, “उस समय (2006) की सरकार पर सियाचिन मुद्दे को निपटाने के लिए कुछ दबाव बनाया जा रहा था, यह अमेरिका के दबाव में हो सकता है, जो तब पाकिस्तान के ज्यादा करीब था। मनमोहन सिंह की टीम, जिसमें पूर्व विदेश सचिव श्याम शरण, एनएसए और अन्य शामिल थे, उन्होंने कहा कि हम सियाचिन को ‘शांति का पहाड़’ बनाना चाहते हैं। उस दौरान नई दिल्ली में इस तरह की चर्चा जोरों पर थी।”

भारत की सेना और सामरिक विषयों के प्रमुख तब ‘सियाचीन में शांति’ के तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के दृष्टिकोण के विरोध में थे। वे चाहते थे कि ऐसा करने से पहले पाकिस्तान घुसपैठ को रोक दे, आतंकी शिविरों को बंद कर दे, सियाचिन पर आगे बढ़ने से पहले अपनी धरती पर भारत से शत्रुता करने वाले आतंकवादी समूहों पर शिकंजा कस दे।

सियाचिन के महत्व के बारे में बात करते हुए, जनरल सिंह ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह ग्लेशियर आर्कटिक के अलावा सबसे लंबा ग्लेशियर है और 76 किमी लंबा है। यह इंदिरा कॉल से शुरू होता है और नीचे श्योक नदी से मिलता है। यह उत्तर और इसके पूर्व में काराकोरम पर्वत श्रृंखला से घिरा हुआ है। पश्चिम में, यह साल्टोरो रिज से घिरा हुआ है, जो क्षेत्र में भारतीय और पाकिस्तानी सेना की स्थिति को विभाजित करता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि समुद्र तल से 21,000 फीट ऊपर सियाचिन, दुनिया का सबसे बड़ा पर्वत ग्लेशियर होने के साथ ही विश्व का सबसे ऊँचा युद्ध का मैदान है और भारत का एक संप्रभु क्षेत्र है, जिसमें पाकिस्तान द्वारा बेबुनियाद क्षेत्रीय दावे किए जाते हैं।

अप्रैल 13, 1984 को भारत ने ऑपरेशन मेघदूत के रूप में ग्लेशियर पर सफलतापूर्वक अपना अधिकार स्थापित कर लिया था, जिससे पाकिस्तान को एक बड़ा रणनीतिक नुकसान हुआ था। पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल अतहर अब्बास ने 14 अप्रैल को ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ को बताया था कि सियाचिन में 1984 से अब तक लगभग 3,000 पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो चुकी है, जिनमें से लगभग 90% मौत मौसम संबंधी कारणों से हुई थी।

भारत ने 70 किलोमीटर से अधिक लंबे ग्लेशियर के साथ ही सियारो ला, बिलाफोंड ला और ग्योंग ला सहित ग्लेशियर के पश्चिम में सभी मुख्य दर्रे, सहायक नदियों और ऊँचाइयों पर अपना नियंत्रण पा लिया था।

‘हम मरें या जिएँ… चीन को कोई परवाह नहीं’ – चायनीज कब्जे वाले देश मंचूरिया की आजादी के दीवाने की कहानी

लद्दाख की गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच हुए खुनी संघर्ष के बाद, इंटरनेट पर चीन का वास्तविक नक्शा सामने आया है। नक्शे में दिखाया गया कि चीन ने उन क्षेत्रों और नस्लों पर भी जबरदस्ती कब्जा कर लिया है जो असल में चाइनीज नहीं हैं, लेकिन चीन उन्हें एक बेतुकी ‘वन चाइना पॉलिसी‘ के तहत अपना बनाने पर तुला है।

हम में से कई लोग तिब्बत, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और कुछ हद तक, पूर्वी तुर्केस्तान के चीनी कब्जे के बारे में जानते हैं। हालाँकि, हम कभी भी चीन के उत्तर-पूर्वी हिस्से, मंचूरिया के बारे में नहीं सुनते हैं। ज्यादातर हम इस शब्द के बारे में चाइनीज रेस्टोरेंट के मेनू में गोभी/चिकन मंचूरियन के रूप में जानते हैं।

मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मंचूरिया कभी एक स्वतंत्र राष्ट्र था और इसकी अपनी समृद्धशाली भाषा और लिपि थी। उनकी अपनी एक अलग संस्कृति भी थी। खास बात यह कि इनकी संस्कृति चीनियों की विस्तारवादी नीति के आस-पास भी नहीं थी। मंचूरिया के बारे में और अधिक जानने की कोशिश करते हुए, मुझे एक निर्वासित मंचूरियन स्वतंत्रता कार्यकर्ता, बर्नहार्ट सिलेर्गी से मिलाया गया, जो फिलहाल म्यूनिच (जर्मनी) में रहते हैं और आंदोलन के लिए लोगों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऑपइंडिया ने उनसे बातचीत की और मंचूरिया तथा उसके लोगों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर जानकारी ली। यहॉं उनसे की हुई कुछ बातों हम आपके सामने रखेंगे। (उनका पूरा इंटरव्यू लेख के अंत में है।)

ऑपइंडिया: जब हम चीन की विस्तारवादी नीतियों और इसके जबरदस्ती कब्जे में ली गई जगहों के बारे में बात करते हैं, तो हम शायद ही कभी मंचूरिया के बारे में सुनते हैं। इंटरनेट पर भी, मंचूरिया से संबंधित जानकारी सीमित मात्रा में उपलब्ध है। क्यों?

सिलेर्गी: देखिए, हमारे पास एक इतिहास है। हमारे पास एक संस्कृति थी। कभी हम चीन के उत्तर-पूर्वी हिस्से में रहने वाले शांतिप्रिय लोग थे। किंग डायनेस्टी के पतन के बीस साल बाद, मंचूरिया ने 1932 में जापान की मदद से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। हालाँकि, 1945 में, सोवियत ने हमारी भूमि पर आक्रमण किया, और एक साल बाद इसे चीन को दे दिया।

तभी से हम आजाद होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालाँकि, चीन ने हमारी आवाज को दबाने और हमारे अस्तित्व को खत्म करने के लिए सब कुछ किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, मंचूरिया का उल्लेख भी अस्तित्व में नहीं रहा। इसलिए, किसी को भी इसके बारे में पता नहीं है। हम चीनी नहीं हैं। हमारी एक अलग संस्कृति, भाषा और पहचान है। हम वह वापस चाहते हैं।

ऑपइंडिया: आमतौर पर, जब हम क्षेत्रीय स्वतंत्रता या सेल्फ-गवर्नेंस की बात करते हैं, तो इसमें दो चीजों के बारे में पता चलता है: किसी के कब्जे से मुक्त होने का विचार, या उत्पीड़न के अत्याचार से दूर होना। मंचूरिया चीन से मुक्त क्यों होना चाहता है?

सिलेर्गी: जैसा कि मैंने पहले कहा, हम अपनी पहचान वापस पाना चाहते हैं। तिब्बत और पूर्वी तुर्केस्तान ने इन सभी दशकों में किसी न किसी तरह संघर्ष कर अपनी संस्कृति, भाषा और पहचान को संरक्षित किया है। हमारे पास ऐसा नहीं है। हमारे लोगों को चीनी बना दिया गया है, जबकि हम नहीं हैं। हमारे लिए यहाँ हमारी आत्म-पहचान का मुद्दा मुख्य है।

सांस्कृतिक पहचान के साथ, ऐतिहासिक रूप से, चीन ने हमारे विकास को अनदेखा किया है। आप इन बड़े शहरों और उज्ज्वल रोशनी को देखते हैं, लेकिन इनमें कोई भी मंचूरिया से नहीं हैं… हमारी जमीन पर उद्योग स्थापित किए गए और हमारे लोगों के साथ बुरा व्यवहार किया गया था। उन्होंने हमारे यहाँ का तेल लिया, हमारे संसाधनों का शोषण किया और हमें कुछ नहीं दिया।

साफ शब्दों में, हम जियें या मरें, चीन इस बात की परवाह नहीं करता है। वे सभी हमारे संसाधन को चाहते हैं। चीन की पहचान सिर्फ मुर्ख बनाने के लिए एक फरेब है। चीन एक राष्ट्र के रूप में, नकली राष्ट्र है। इसके शाही इतिहास को देखें तो यह क्षेत्रों को हड़पता है और वहाँ के लोगों का शोषण करता है। हमें चीन का विरोध करने की जरूरत है।

ऑपइंडिया: हम वापस से मंचूरिया की स्वतंत्रता और आपकी सक्रियता पर आते हैं, आप कितने संगठित हैं? आप लोग मिलते कैसे हैं? और आप लोग प्रदर्शनों का आयोजन कैसे करते हैं… जैसे की तिब्बतियों में सरकार का निर्वासन है…

सिलेर्गी: अभी तक, हम उतनी संख्या में नहीं हैं। स्वतंत्रता की यह पूरी धारणा और मंचूरियन स्वतंत्रता का संघर्ष अपेक्षाकृत नया है। हम एक बच्चे की तरह अभी एक-एक कदम उठा रहे हैं, हम लोगों को बता रहे हैं कि अभी हम जिन्दा हैं और हमें एक साथ होने की जरूरत है। वर्तमान में, हमारा उद्देश्य ऑनलाइन माध्यम से मंचूरिया के लिए अभियान चलना और इस कार्य को आगे बढ़ाने वाले लोगों का समर्थन जुटाना है।

तिब्बती, पूर्वी तुर्किस्तान, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग के लोग हमारे सहयोगी हैं। वे हमारा दर्द जानते हैं। वे हमारे संघर्ष को महसूस करते हैं। अभी के लिए, हम चाहते हैं कि दुनिया यह जाने कि ‘एक चीन’ नाम की कोई चीज नहीं है, यह एक अवैध रूप से कब्जा किया गया क्षेत्र है।

ऑपइंडिया: इस समय जो चल रहा है, इस संबंध में आप चीनी विस्तारवादी नीतियों को कैसे देखते हैं। जब दुनिया गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच टकराव पर नजर बनाए हुए है, चीन ने 33 हेक्टेयर नेपाली जनीम पर कब्जा कर लिया।

सिलेर्गी: यह कोई नई बात नहीं है। चीन साम्राज्यवाद के दिनों से ही दूसरे के क्षेत्रों को हथियाने की इस नीति पर चल रहा है। अब उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद भी उसकी यह आदत नहीं गई। उन्हें लगता है कि यह अधिकार जताने का तरीका है। चीन ने यूरोप और यूएसए के साथ आर्थिक अतिक्रमण करने की कोशिश की क्यूँकि वे उनकी जमीन नहीं हड़प सकते थे।

लेकिन इस बार रणनीति अलग थी। वे चाहते थे कि वे उन पर निर्भर रहें। वास्तव में ऐसा हुआ लेकिन अब अमेरिका दूर होने की कोशिश कर रहा है। हो सकता है यूरोपीय संघ अपने कारण की वजह चीन के खिलाफ नहीं जाना चाहता है, लेकिन आप देख सकते हैं कि अब राष्ट्र अपने व्यवसायों को चीन से बाहर स्थानांतरित कर रहे हैं। यह वियतनाम, भारत और अन्य देशों की तरफ जा रहा है।

सभी राष्ट्रों ने महसूस किया है कि चीन बहुत ही खतरनाक और तानाशाही है। चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए नए अंतरराष्ट्रीय समूह बनाए जा रहे हैं। और इसकी आवश्यकता भी है, अन्यथा वे अपना विस्तार करने के लिए कुछ भी करेंगे और उन चीजों पर भी अपना दावा करेंगे, जो उनका नहीं है।

ऑपइंडिया: आप शी जिनपिंग के नेतृत्व को कैसे देखते हैं…

सिलेर्गी: ओह! वह एक तानाशाह है, जिसने कोई भी युद्ध नहीं देखा है। इसलिए, वह नहीं जानता कि युद्ध की कीमत क्या है। वह सिर्फ किसी बड़े नेता के रूप में नजर आने की कोशिश कर रहा है, मगर कोई भी उसे पसंद नहीं करता है। चीन कम्युनिस्ट पार्टी के अपने मुद्दे हैं। शी जिनपिंग चीन में नेताओं की दूसरी पीढ़ी से आते हैं, जो संघर्ष और जमीनी हकीकत नहीं जानते हैं।

यही कारण है कि वह लोगों को सिर्फ धमकाने का काम कर रहा है और नेपाल में भी जमीन हथियाने की उसे कोई परवाह नहीं है। मेरा कहने का मतलब है, नेपाल में कुछ हेक्टेयर जमीन लेने का क्या फायदा है? फिर भी, वह ऐसा करता है। तो यह उसकी एक विफलता है।

ऑपइंडिया: अपने मंचूरियन लोगों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे।

सिलेर्गी: हम सभी को एकजुट होने की जरुरत है। हमें इकट्ठा होकर एक संयुक्त चेहरे को प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। आइए हम ट्विटर और फेसबुक के जरिए @ManchuUnion हैंडल का साथ देते हैं। आप ट्विटर पर @silergi के जरिए मुझसे जुड़ सकते हैं। यह शुरुआत है। आइए हम एक साथ खड़े होते हैं और इसके लिए काम करें। आइए हम दुनिया को हमारी सामूहिक दुर्दशा से अवगत कराते हैं। ये अभी छोटे कदम हैं, लेकिन हमें एक शुरुआत करने की जरूरत है।

ऑपइंडिया और सिलेर्गी के पूरे इंटरव्यू को यहाँ देखें :

अमेरिका ने जियो को ‘क्लीन टेलिकॉम कम्पनी’ लिस्ट में डाला, एक भी चायनीज सामान नहीं होता प्रयोग

लद्दाख क्षेत्र स्थित गलवान घाटी में हुई भारतीय और चीनी सैनिकों की झड़प के बाद देशभर में चाइनीज प्रॉडक्ट के बहिष्कार की आवाज उठ रही है, लेकिन क्या आप यह बात जानते हैं कि रिलायंस जियो दुनिया का एकमात्र ऐसा नेटवर्क है, जो एक भी चीनी उपकरण का उपयोग नहीं करता है।

यह भी एक संयोग ही है कि आज ही अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने रिलायंस जियो को हुवाई जैसी चीनी कंपनियों के साथ व्यापार ना करने के लिए दुनिया के ‘क्लीन टेल्कोस‘ (Clean Telecos) के रूप में शामिल किया है।

दरअसल, इस बात की जानकारी रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के अध्यक्ष मुकेश अंबानी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को गत फरवरी माह में उनके भारत दौरे के समय ही दे दी थी। यह दिलचस्प बात है कि उस समय भारत में चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर ख़ास माहौल भी नहीं था।

दरअसल, फरवरी माह में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत आए थे, तब उन्होंने मुकेश अंबानी से पूछा था, ‘आप 4G पर काम कर रहे हैं। क्या आप 5G पर भी जाने की तैयारी कर रहे हैं?’

इसके जवाब में आरआईएल के अध्यक्ष मुकेश अंबानी ने ट्रम्प से कहा था कि हम 5G में भी जाने की तैयारी कर रहे हैं और रिलायंस जियो दुनिया में अकेला ऐसा नेटवर्क हैं, जिसमें किसी चीनी कंपोनेंट का यूज नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि चीन के साथ आर्थिक सम्बन्धों को लेकर अमेरिका का हमेशा से ही कठोर रुख रहा है। यही वजह थी कि अमेरिका ने तब भारत पर यह दबाव भी बनाने का प्रयास किया था कि वह 5G तकनीक के लिए चीन के ‘हुवाई’ (Huawei) कम्पनी को बाहर रखे।

अमेरिका ने हमेशा ही इन चीनी कम्पनियों को सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक बताया है। अमेरिका का मानना है कि चीन की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा इन कम्पनियों का इस्तेमाल जासूसी में किया जाता है।

एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसे भारतीय टेलीकॉम अपने वर्तमान नेटवर्क में चीनी हुवाई के साथ काम कर रहे हैं, जबकि ज़ीटीई (ZTE) सरकार द्वारा संचालित बीएसएनएल के साथ काम करता है।

अमेरिका ने जियो को किया ‘क्लीन टेल्कोस’ में शामिल

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने आज बुधवार (जून 24, 2020) को रिलायंस जियो को हुवाई जैसी चीनी कंपनियों के साथ व्यापार ना करने के लिए दुनिया के ‘क्लीन टेल्कोस‘ (Clean Telecos) के रूप में सूचीबद्ध किया है।

अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पियो ने एक ट्वीट में कहा – “माहौल हुवाई से दूर होकर भरोसेमंद 5G विक्रेताओं की ओर रुख कर रहा है। दुनिया की प्रमुख टेलीकॉम कम्पनियाँ – टेलिफोनिका, ऑरेंज, जियो, टेल्स्ट्रा, और कई और ‘क्लीन टेल्को’ बन रहे हैं। वे ‘सीसीपी’ (CCP) के ‘जासूसी राज्य’ के साथ व्यापार करने से इनकार कर रहे हैं।”

सीमा पर चीन के साथ हो सकती है एक और झड़प, खासकर पैंगोंग त्सो क्षेत्र में: पूर्व सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर

पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारत और चीनी सेना के बीच तनाव जारी है। इस बीच भारतीय सेना के पूर्व सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों, खासकर पैंगोंग त्सो क्षेत्र में एक बार फिर से तनाव की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना है। हालाँकि, भारतीय सेना पूरी तरह से तैयार है। बता दें कि इससे पहले 15 जून को गलवान घाटी पर भारत और चीनी सेना के बीच हिंसक झड़प हुई थी।

इस संभावना को दोहराते हुए कि निकट भविष्य में युद्ध संभव है, पूर्व सेना प्रमुख जनरल कपूर ने कहा कि वह लोगों की इस धारणा से असहमत थे कि चीन के साथ युद्ध आसन्न है। हालाँकि उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि 15 जून की तरह एक बार फिर से LAC के पास दूसरे क्षेत्र में हिंसक झड़प हो सकती है। जनरल कपूर ने विशेष रूप से पैंगोंग त्सो क्षेत्र में हिंसक झड़प होने की आशंका जताई।

जनरल कपूर ने कहा कि वह चीनी विश्वासघात से बिल्कुल भी आश्चर्यचकित नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं इन चीनी दाँव पेंच से हैरान नहीं हूँ। जब तक हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, दोनों पक्ष सहमत होते हैं और सभी तथ्यों को सत्यापित किया जाता है, तब तक हमें चीनी पक्ष की तरफ से किसी भी गतिविधियों के लिए तैयार रहना होगा, चाहे वह गलवान सेक्टर, डेपसांग सेक्टर, चुमार सेक्टर, डोंगचोंग क्षेत्र, सिक्किम हो या फिर अरुणाचल सेक्टर की तरफ हो।”

पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में हिंसक झड़प के बाद इंडिया टुडे के पत्रकार शिव अरूर ने कहा कि अब फोकस पैंगोंग त्सो क्षेत्र की तरफ स्थानांतरित कर दिया गया है, जहाँ घुसपैठ करने वाले चीनी सैनिक अपने भारतीय समकक्षों के साथ दो-चार करने की स्थिति में हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में 62 नई चीनी पोजीशन और लगभग 300 संरचनाएँ जैसे शिविर और ऑब्ज़र्वेशन पोस्ट पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) द्वारा बनाए गए हैं।

गौरतलब है कि 15 जून को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़पों में कमांडिंग ऑफिसर सहित कम से कम 20 भारतीय सैनिकों ने शहादत प्राप्त की थी। सेना ने शुरू में दावा किया था कि झड़पों में एक कमांडिंग अधिकारी सहित 3 सैनिक मारे गए थे, लेकिन बाद में शाम को भारतीय सेना ने 20 सैनिकों की बलिदान की पुष्टि की।

हालाँकि, बीजिंग इस हिंसक झड़प में हताहत हुए लोगों की संख्या बताने पर चुप्पी साधे रखी, लेकिन भारत सरकार ने कहा कि चीनी पक्ष ने करीब 43-45 पीएलए सैनिक या तो गंभीर रूप से घायल हुए या मारे गए। अब, यूएस की एक इंटेलिजेंस रिपोर्ट में कहा गया है कि कम से कम 35 चीनी सैनिक गलवान घाटी में मारे गए हैं।