चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की सशस्त्र सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। जिसमें हॉलीवुड की फिल्मों के फुटेज को चीन के वायु सेना द्वारा अपनी ट्रेनिंग तौर प्रोपेगेंडा के रूप में पेश किया गया है।
चीनी सशस्त्र बल जो हाल ही में लद्दाख के पास निहत्थे भारतीय सैनिकों के खिलाफ किए गए हिंसक झड़प के लिए जिम्मेदार है। तब से वह दुनिया भर में लोगों के निशाने पर है। चीन खुद को ताकतवर दिखाने के लिए अपने प्रोपेगेंडा वार के तहत उसने 2011 में पीएलए वायु सेना के प्रशिक्षण अभ्यास के नाम से एक वीडियो दिखाया था जो अब वायरल है। असल में वो 1986 में बनी हॉलीवुड की प्रतिष्ठित फिल्म “टॉप गन” के फुटेज थे। जिसमें टॉम क्रूज लीड रोल में थे।
चीनी सरकार का मुखपत्र चाइना सेंट्रल टेलीविज़न, ने 23 जनवरी, 2011 को वायु सेना के प्रशिक्षण अभ्यास का दावा करते हुए एक फुटेज दिखाया था। चाइना सेंट्रल टेलीविज़न (सीसीटीवी) द्वारा शाम को यह रिपोर्ट समाचार के दौरान प्रसारित की गई थी। जिसमें चीनी फाइटर प्लेन के मिसाइल की चपेट में आने के बाद “दुश्मन” जेट एक विशालकाय आग के गोले में बदल गया था।
इस वीडियो सेगमेंट को प्रोपेगेंडा के तौर पर ऑनलाइन पोस्ट किया गया था। जिसके बाद यह जल्द ही वायरल हो गया। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एयर फोर्स ने कथित तौर पर फिल्म के फुटेज को प्रोपेगेंडा के तहत यह दिखाने के लिए जारी किया था कि यह एक J-10 फाइटर प्लेन था जिसने अभ्यास के दौरान दूसरे विमान पर मिसाइल दागी थी।
हालाँकि, सोशल मीडिया यूज़र्स और फिल्म के शौकीनों को यह बताने की देर नहीं लगी कि यह फुटेज वास्तव में हॉलीवुड फिल्म “टॉप गन” का है। इसके साथ उन्होंने पीएलए पर अपने झूठे प्रचार को आगे बढ़ाने के लिए चोरी करने का आरोप लगाया था।
उन्होंने फुटेज देखते ही बताया कि जिस J-10 विमान को नीचे गोली मारते दिखाया गया था, वह दरअसल एक अमेरिकी विमान F-5 था। जिसे फिल्म “टॉप गन” के फुटेज से लिया गया है।
इस मामले को लेकर वॉल स्ट्रीट जर्नल ने सीसीटीवी प्रसारण और टॉप गन के फुटेज की फ्रेम-टू-फ्रेम तुलना भी की थी, जिसके बाद यह निष्कर्ष सामने आया था, कि दोनों वीडियो एक ही थी।
झूठे वीडियो की सच्चाई सामने आने के बाद, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का काफी मजाक बन रहा है और बेहद शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ा। हालाँकि, पकड़े जाने के बाद चीन ने तुरंत उस वीडियो को हटा लिया था।
गौरतलब है कि सच्चाई सामने आने के बाद कई चाइनीज वेबसाइट और न्यूज़ साइट्स ने न्यूज़ रिपोर्ट और फ़िल्म के फुटेज की तुलना करते हुए वीडियो प्रकाशित किए थे। जिसके चलते पीएलए अधिकारियों को पब्लिक में काफी जलील होना पड़ा था।
उत्तर प्रदेश के रामपुर से समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता आजम खान के करीबी सहयोगी और मीडिया सलाहकार फसाहत अली खान उर्फ शानू को पुलिस ने गुरुवार (25 जून, 2020) को गिरफ्तार कर लिया। रामपुर पुलिस ने फसाहत के फार्महाउस से चोरी की गई दो भैंस और सोने, चाँदी आदि के कीमती सामान बरामद किए हैं।
आज़म खान का मीडिया इंचार्ज फसाहत अली हुआ गिरफ्तार, कई मामलों में था फरारhttps://t.co/HQj3q3oiLQ
रामपुर पुलिस के मुताबिक थाना कोतवाली और थाना गंज से वांछित अभियुक्त फसाहत अली को तोपखाना गेट के पास से गिरफ्तार किया गया है। पुलिस रिकॉर्ड में आजम खान के मीडिया प्रभारी पर यतीमखाना प्रकरण सहित कुल 24 मुकदमे दर्ज हैं।
रामपुर के एसपी शगुन गौतम ने कहा, “फसाहत खान ने पूछताछ के दौरान खुलासा किया था कि उसने आजम खान के निर्देश पर यतीम खाना निवासियों के घरों के अंदर से भैंस और अन्य सामान चोरी किया था। अपराध में शामिल अधिकांश अन्य आरोपित पहले से ही जमानत पर हैं, जबकि कुछ अन्य से पूछताछ की जरूरत है।”
फसाहत को बुधवार की देर शाम अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के सामने पेश किया गया और जेल भेज दिया गया।
रामपुर पुलिस ने बताया कि फसाहत की निशानदेही पर लूट और चोरी किए गए कुल 27 हजार रुपए, 2 जोड़ी चाँदी की पायल, 3 सोने के कान के झुमके, सोने के 2 गले के हार, सोने की 1 अँगूठी और 2 भैंसें मिलीं हैं।
आपकों बता दें कि सितंबर 2019 में यतीमखाना बस्ती में कई मकान तोड़े गए थे, लेकिन पीड़ित उस समय अपनी आवाज नहीं उठा पाए थे, लेकिन सत्ता बदलने के बाद पीड़ितों ने आजम खान सहित कई लोगों पर लूटपाट और भैंस चोरी जैसे मुकदमे दर्ज कराए थे।
इसी में आजम खान के मीडिया प्रभारी फसाहत अली शानू के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कराया गया था। इतना ही नहीं एक एफआईआर में एक शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि चोर उसकी चार बकरियाँ, तीन भैंस, एक गाय और एक बछड़ा भी ले गए थे।
गौरतलब है कि इसी साल फरवरी में धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के बाद आज़म खान, उनकी पत्नी और सपा विधायक तनज़ेन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आज़म पहले से ही सीतापुर जेल में बंद हैं।
भाजपा पर निशाना साधने के चक्कर में मध्य प्रदेश के कॉन्ग्रेस नेता जीतू पटवारी खुद विवादों में घिर गए। बुधवार को उन्होंने एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने केंद्र सरकार पर ये कहते हुए निशाना साधा कि केंद्र का प्रयास था कि एक बेटा यानी ‘विकास’ हो। लेकिन उसके बदले 5 बेटियाँ यानी ‘नोटबंदी’, ‘जीएसटी’, ‘महंगाई’, ‘बेरोजगारी’ और ‘मंदी’ पैदा हो गई।
People like him are the reason why girl child is still a non acceptence
अब सोशल मीडिया पर इसी ट्वीट को लेकर उन्हें जमकर खरी-खोटी सुनाई जा रही है। साथ ही कहा जा रहा है कि इन्हीं जैसे लोगों के कारण अब भी समाज में लड़की स्वीकार्य नहीं है।
वहीं भाजपा ने भी जीतू पटवारी के इस ट्वीट पर संज्ञान लिया है। उन्होंने पटवारी को नारी विरोधी बताते हुए कॉन्ग्रेस से उन्हें निकालने को कहा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पटवारी के ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
प्रदेश मुख्यमंत्री ने कहा, “एक ओर तो पूरा देश रानी दुर्गावती के त्याग को याद कर रहा है। जबकि दूसरी ओर कॉन्ग्रेस भारत की बेटियों को अपमानित कर रही है। क्या कॉन्ग्रेस की इसी विकृत मानसिकता की बलि नैना साहनी, सरला मिश्रा, प्रीति मिश्रा जैसी अनेक बेटियाँ चढ़ा दी गईं? धिक्कार है कॉन्ग्रेस की ऐसी निकृष्टम विचारधारा पर!”
आज एक तरफ पूरा देश रानी दुर्गावती के बलिदान को याद कर रहा है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस बेटियों को अपमानित कर रही है।
क्या कांग्रेस की इसी विकृत मानसिकता की बलि नैना साहनी, सरला मिश्रा, प्रीति मिश्रा जैसी अनेक बेटियां चढ़ा दी गईं?
— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) June 24, 2020
इसी प्रकार राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी संबित पात्रा की शिकायत पर जीतू के ट्वीट पे संज्ञान लिया। संबित पात्रा ने जीतू पटवारी के ट्वीट के मद्देनजर रेखा शर्मा को टैग करते हुए लिखा था, “कृपया इस चुने हुए प्रतिनिधि के इस बेहद गलत ट्वीट पर ध्यान दें जो बेटियों को अवांछित और सबसे घटिया तरीके से पेश करता है।”
जिसपर रेखा शर्मा ने कहा, “ये दुखद है कि ऐसी मानसिकता के लोग खुद को नेता कहते हैं। मैं हैरान हूँ। ये लोग अपने समर्थकों को क्या सिखाते होंगें। उनसे इसपर अवश्य स्पष्टीकरण माँगा जाएगा।”
Sad that these people with this kind of mind set are calling themselves leaders. What are they teaching to their followers I wonder. Will ask for an explanation from him for sure. @sambitswarajhttps://t.co/ETanvE65I5
यहाँ बता दें, ट्वीट के कुछ घंटों में ही ढेरों आलोचनाओं का सामना करने के बाद जीतू पटवारी ने अपनी सफाई में देर रात लड़कियों पर एक और पोस्ट डाला। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा, “जहाँ तक बात बेटियों की है तो वो देवीतुल्य हैं। विकास की अपेक्षा के साथ मैंने एक ट्वीट किया है जिसे बीजेपी अपनी कमज़ोरियों को छिपाने के लिए उपयोग कर रही है। मैं अब भी कह रहा हूँ कि ‘विकास’ का पूरे देश को इंतजार है।”
जहां तक बात बेटियों की है तो वो देवीतुल्य हैं।
विकास की अपेक्षा के साथ मैंने एक ट्वीट किया है जिसे बीजेपी अपनी कमज़ोरियों को छिपाने के लिये उपयोग कर रही है।
मैं अब भी कह रहा हूँ कि “विकास” का पूरे देश को इंतजार है।
अपने दूसरे ट्वीट में पटवारी ने लिखा, “मोदी जी ने नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, बेरोज़गारी और मंदी से देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी..! जनता यह सब केवल “विकास” की उम्मीद में सहन करती रही। उपरोक्त आशय के साथ किए गए मेरे ट्वीट से यदि किसी की भावनाएँ आहत हुई हैं तो मैं खेद व्यक्त करता हूँ।”
मोदी जी ने नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, बेरोज़गारी और मंदी से देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी..!
—जनता यह सब केवल “विकास” की उम्मीद में सहन करती रही।
उपरोक्त आशय के साथ किये गये मेरे ट्वीट से यदि किसी की भावनायें आहत हुई हैं तो मैं खेद व्यक्त करता हूँ।
उल्लेखनीय है कि, मध्यप्रदेश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा व महिला आयोग के अलावा इसपर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आय़ोग ने भी संज्ञान लिया है। एनसीपीसीआर ने कहा कि इस ट्वीट ने बेटी की बजाय बेटे को प्राथमिकता देने की सदियों पुरानी गलत सोच का न केवल समर्थन किया, बल्कि इसने बच्चियों के प्रति उनकी मानसिकता और रवैये को भी दर्शाया। इसी सोच के कारण देश में कन्या भ्रूण हत्या की दर बढ़ गई है।
आयोग ने पटवारी को भेजे पत्र में कहा कि एक नेता का किसी पर राजनीतिक निशाना साधने के लिए नैतिकता का उल्लंघन करना और इससे समाज को होने वाले नुकसान को नजरअंदाज करना अनुचित है।
पत्र में लिखा गया, “अपने ट्वीट से इस प्रकार की अपमानजनक टिप्पणी करने का धृष्ट कृत्य बेटियों के अस्तित्व का ही अनादर नहीं करता, बल्कि यह हमें दशकों पीछे ले जाता है और लैंगिक समानता एवं बच्चियों के अधिकारों के लिए किए गए अनगिनत संघर्षों एवं बलिदानों पर पानी फेरने का काम करता है।”
गलवान घाटी में चल रहे भारत चीन विवाद के मद्देनजर केरल के एक गाँव ने अपना नाम बदलवाने की माँग की है। गाँव का नाम वर्तमान में चीनी मुक्कु है। ये नाम इस गाँव को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बदौलत मिला था।
मगर, अब यहाँ के स्थानीयों का मानना है कि भारत-चीन के बीच जो कुछ भी हुआ, उसके बाद उनके लिए ये नाम किसी शर्मिंदगी से कम नहीं है। इसलिए उन्होंने अर्जी लगाई है कि कोन्नी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले इस गाँव का नाम परिवर्तित किया जाए। इसे लेकर गाँव के लोगों ने एक प्रस्ताव भी तैयार किया है।
कोन्नी पंचायत के उपाध्यक्ष प्रवीण ने पंचायत को इस संबंध में एक ज्ञापन दिया है। इसमें उन्होंने लिखा, “चीन द्वारा युद्ध जैसी स्थिति बनाने के लिए और भारतीय सैनिकों की शहादत को गौर करते हुए इस नाम को बदला जाना चाहिए। गलवान के बाद यहाँ के लोग इस नाम को नहीं बोलना चाहते। लोग इसे बदलना चाहते हैं।”
इसी प्रकार कोन्नी के पंचायत अध्यक्ष, रजनी ने कहा कि पंचायत इस संबंध में प्रस्ताव को आगे बढ़ाने और इस जगह का नाम बदलने के लिए राज्य सरकार को एक प्रस्ताव भेजने की योजना बना रही है।
उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है सीपीएम सहित कोई भी पार्टी इस प्रस्ताव का ज्यादा प्रतिरोध नहीं करेगी क्योंकि स्थानीय लोग खुद ही जगह का नाम बदलवाना चाहते हैं।”
कैसे पड़ा जगह का चाइना मुक्कु नाम?
कोन्नी में पिछले 23 साल से राजनीति कर रहे कॉन्ग्रेसी नेता अदूर प्रकाश इस संबंध में जानकारी देते हुए बताते हैं कि साल 1952 में जब देश में पहले आम चुनाव हो रहे थे, तब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू केरल में प्रचार के लिए पहुँचे। इसी दौरान वह पथनमथिट्टा जिले में एक इलाके से खुली जीप में गुजर रहे थे।
चारों तरफ सड़कों और लोगों के घरों पर कॉन्ग्रेस के झंडे लगे हुए थे। नेहरू तभी एक ऐसे इलाके में पहुँचे, जहाँ कॉन्ग्रेसी झंडे नहीं बल्कि केवल लाल झंडे दिखने लगे। यह कम्युनिस्ट बहुल इलाका था। इसे देखकर नेहरू ने अपने बगल में बैठे शख्स से पूछा, ‘क्या यह चीन जंक्शन है।’ इसके बाद से ही उस इलाके का नाम चीनी मुक्कू पड़ गया।
उल्लेखनीय है कि इलाके के नाम से चीन जुड़ा होने पर वहाँ के लोग लोग सहज महसूस नहीं कर पा रहे हैं। सीमा पर पड़ोसी देश के साथ तनाव के बाद से ही गाँव का नाम बदलने को लेकर चर्चा चल रही है। पंचायत समिति के वाइस चेयरमैन प्रवीन ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह नाम बदल ही देना चाहिए।
हालाँकि, वर्तमान में, इस नाम के बदले में अभी कोई विकल्प सामने नहीं आया है। लेकिन ये खबर जरूर है कि पंचायत इस संबंध में रेसोल्यूशन पास करेगी और बाद में राज्य सरकार इस मामले पर अंतिम फैसला लेगा। बता दें, पंचायत पैनल में कॉन्ग्रेस यूडीएफ का बहुमत है। 18 में से 13 सदस्य यूडीएफ के हैं जबकि बाकी 5 एलडीएफ के सदस्य हैं।
राजस्थान के अलवर में एक पिता, जो कि मुस्लिम समुदाय के आरोपितों को अपनी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार के आरोप में सजा दिलाने के लिए अदालत में केस लड़ रहे थे, सुनवाई से ठीक पहले पेड़ से लटके हुए मृत पाए गए हैं। यह घटना अलवर के रामगढ़ की है, जो हिन्दू विरोधी घटनाओं के लिए कुख्यात मेवात से सटा है। ख़ास बात यह है कि मीडिया में अभी तक भी रामगढ़ की इस घटना को स्थान नहीं दिया जा रहा है।
In Ramgarh Alwar, Anish Khan raped a minor Hindu girl.
Her father refused to withdraw the case.
So Mahmud, Anjum, Taufiq, Umardin gang killed the victim’s father and hanged him from the tree.
Yeh to dare hue Hain. Nahin to ladki Ka dharam badalwa ke nikah bhi Kar Lete! pic.twitter.com/iO9pihHjsH
मृतक के परिजनों का आरोप है कि मंगलवार (जून 23, 2020) देर रात आरोपित उन्हें घर से बुलाकर ले गए थे और उनकी हत्या कर पेड़ से लटका दिया। इस संबंध में सुमराद्दीन, महमूद, अंजुम, तौफीक और अन्य लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करवाया गया है।
पीड़िता के पिता का मृत शरीर पेड़ से लटका हुआ मिला है
बताया जा रहा है कि रामगढ़ के अलवर में अनीश खान ने एक नाबालिग हिंदू लड़की के साथ बलात्कार का प्रयास किया और जब उसके पिता ने केस वापस लेने से इनकार कर दिया तो महमूद, अंजुम, तौफीक, उमरदीन ने पीड़िता के पिता की कथित तौर पर हत्या कर दी और उसे पेड़ से लटका दिया। हालाँकि, इस मामले में पुलिस अभी जाँच कर रही है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बलात्कार पीड़िता के आरोपितों द्वारा उनके परिवार पर केस को वापस लेने और राजीनामे के लिए बार-बार दबाव बनाया जा रहा था। और इसी बीच पीड़िता के पिता का शव उनके घर से महज 500 मीटर दूर पेड़ से लटका हुआ मिला है।
लोगों का कहना है कि पुलिस इस मामले को आत्महत्या बता रही है, जबकि उनके परिवार के सदस्यों ने इसे हत्या बताते हुए 4 नामजद समेत आधा दर्जन लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज की है। पुलिस द्वारा इस मामले में ढील बरते जाने और उनके रवैए को लेकर पीड़िता का परिवार इस से तंग आ चुका था। जिस कारण सम्भव है कि पीड़िता के पिता ने यह कदम उठाया हो।
दरअसल, कुछ ही दिन पहले रामगढ़ में कुछ लोगों ने एक नाबालिग से बलात्कार की कोशिश की थी, जिससे खुद को बचाने के लिए पीड़िता ने कुएँ में छलांग लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश भी की लेकिन तभी ग्रामीणों ने उसे कुएँ से निकाल कर बचा लिया था।
इस घटना के बाद पीड़िता ने रामगढ़ थाने में अनीश, तौफिक और अंजुम के खिलाफ FIR दर्ज करवाई थी। लेकिन पुलिस ने आरोपितों पर मामला दर्ज करने से मना कर दिया और इस मामले में सिर्फ 3 युवकों को शांतिभंग के आरोप में पकड़ लिया।
बाद में इस मामले के मीडिया में सामने आने पर पुलिस ने गत 20 जून रात को FIR दर्ज कर मुख्य आरोपित अनीश खान को POCSO एक्ट में गिरफ्तार किया, जबकि उसका साथ देने वाले अन्य 2 अन्य आरोपित- तौफिक और अंजुम को पुलिस बचाने में लगी रही।
उल्लेखनीय है कि मेवात और इसके पास का क्षेत्र भारत के भीतर ही पाकिस्तान की शक्ल ले रहा है, जहाँ आए दिन मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार, बलात्कार और कई प्रकार के मामले सामने आए हैं और प्रशासन भी इस सम्बन्ध में मूक दर्शक बना हुआ है।
हरियाणा के कैथल से महंत रामभज दास की निर्मम हत्या का मामला का सामने आया है। जहाँ बुधवार (24 जून, 2020) को कुछ लोगों ने मिलकर महंत पर हमला कर दिया। हमलावरों ने गंभीर हालत में उन्हें कलायत के खरकपांडवा गाँव के नजदीक खेतों में फेंक दिया था। महंत रामभज दास षड्दर्शन साधु समाज हरियाणा के उपाध्यक्ष व कैथल के सांघन गाँव स्थित प्राचीन शृंगी ऋषि आश्रम के महंत थे। वे महज 26 साल के थे।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार महंत की गंभीर स्थिति को देखते हुए भानपुरा डेरे के महंत ने उन्हें कैथल के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया था। मगर हालत सामान्य नहीं होने पर डॉक्टर ने उन्हेंं पीजीआइ चंडीगढ़ रेफर कर दिया था। सर पर गहरी चोट लगने की वजह से इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
बता दें महंत के गुजरने से पहले पुलिस ने उनका बयान अस्पताल में दर्ज कर लिया था। जहाँ उन्होंने बताया था कि छविदास नाम के एक शख्स ने उनपर हमला करवाया है। इसके लिए उसने बेलरखां गाँव के कुलदीप और नेहरा नामक दो लोगों का इस्तेमाल किया। जो उन्हें आश्रम के बाहर ले गए थे।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने गाँव में स्थित मंदिर के दो सेवादारों के भी बयान लिए हैं। और आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। घटना की जानकारी देते हुए गाँव के सरपंच सरदार सुरजीत सिंह ने बताया की महंत की हत्या के पीछे एक गहरी साजिश रची गई है। महंत को हमले से पहले करीब रात के 8 बजे बेलरखां गाँव का एक युवक जूस पिलाने के बहाने बाहर ले गया था। उसके कुछ समय बाद ही हमें महंत पर हुए हमले की सूचना मिली थी।
महंत और सरपंच द्वारा मिली सामान्य सूचना के आधार पर पुलिस जाँच में जुट गई हैं। सरपंच ने बताया की महंत का पोस्टमॉर्टम हो गया है। और उनका अंतिम संस्कार गाँव में ही किया जाएगा।
काफी कम उम्र ही महंत रामभज दास ने सन्यासी जीवन को अपना लिया था। उन्होंने एमए तक की शिक्षा प्राप्त की हुई थी। वे पहले काकौत में रहते थे। 4 साल पहले ही वे इस गाँव के मंदिर में आए थे। महंत ने गाँववासियों की मदद के लिए कई काम भी करवाए थे। गाँववालों में साधु की हत्या को लेकर भारी आक्रोश है।
वहीं महंत पर हुए हमले पर साधु संगठनों ने भी नाराजगी जाहिर किया है। इसके साथ षड्दर्शन साधुसमाज हरियाणा के अध्यक्ष महंत परमहंस ज्ञानेश्वर, भारत साधु समाज हरियाणा के अध्यक्ष महंत बंशी पुरी जी महाराज, अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के पूर्व अध्यक्ष पंडित प्रकाश मिश्रा, माँ बनभौरी शक्ति पीठ धाम के महाप्रबंधक सुरेन्द्र कौशिक, उपाध्यक्ष वैद्य पंडित प्रमोद कौशिक, महंत महेश मुनि, महंत दीपक गिरी, महंत वासुदेवानंद गिरी, महंत उत्तम गिरी, महंत बबला दास, महंत शांति दास आदि ने दुःख व्यक्त किया है।
पूर्वी लद्दाख क्षेत्र स्थित गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों और चीन की सेना के बीच जारी गतिरोध के बीच चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) द्वारा कॉन्ग्रेस के साथ गुपचुप तरीके से साइन किए गए MOU और फिर राजीव गाँधी फाउंडेशन की चर्चा में खुलासा हुआ है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने समय-समय पर राजीव गाँधी फाउंडेशन में बहुत बड़ी मात्र में ‘वित्तीय सहायता’ दी थी।
टाइम्स नाउ न्यूज़ चैनल की एक रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड के नाम पर किए गए चीन की सरकार और गाँधी परिवार के बीच अन्य गोपनीय समझौतों के साथ ही यह वित्तीय मदद करीब 300000 अमेरिकी डॉलर (उस समय के एक्सचेंज रेट के हिसाब से करीब 1.5 करोड़ रुपए) के आस-पास है।
#CongChinaFile | China donated to Rajiv Gandhi Foundation. Not just @RahulGandhi-China MoU in 2008, but details of donations to Rajiv Gandhi Foundation are out. Meanwhile, @BJP4India calls it proof of ‘quid pro quo’.
यह सब समझौते चीन के साथ खराब सम्बन्ध होने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने गठबंधन सरकार में रहने के दौरान साइन किए थे और देश से समझौते का ब्योरा छुपाया गया। समझौते के ब्यौरे को सार्वजनिक नहीं किया गया।
चीन की सत्ताधारी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CCP) के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी के साल 2008 में हुए समझौते का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई, जिसमें सीपीसी के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी के हुए समझौते को सार्वजनिक नहीं करने का विषय उठाते हुए उस समझौते की एनआइए या सीबीआई जाँच की माँग की गई है।
टाइम्स नाउ न्यूज़ चैनल द्वारा वर्ष 2010 के पीएचडी रिसर्च ब्यूरो के एक अध्ययन पर आधारित भारत-चीन ट्रेड रिलेशनशिप के बीच यूएस बिलियन डॉलर में हुए ट्रेड रिलेशनशिप को लेकर असंतुलन का खुलासा करते हुए इस समझौते की क्रोनोलोजी को समझाया गया है।
इस शो में बताया गया है कि किस प्रकार CCP यानी चीन की सरकार वर्ष 2005, 2006, 2007 और 2008 में राजीव गाँधी फाउंडेशन में डोनेशन करती है और इसके बाद वर्ष 2010 में एक अध्ययन जारी कर बताया जाता है कि भारत और चीन के बीच व्यापार समझौतों को बढ़ावे की जरूरत है।
कॉन्ग्रेस के चीनी प्रेम और राजीव गॉंधी फाउंडेशन पर सरकारी दरियादिली को लेकर संपादक अजीत भारती का नजरिया
टाइम्स नाउ के अनुसार, यह अध्ययन मोहम्मद साकीब और पूरण चंद राव द्वारा किया गया था, जिसका प्रमुख उद्देश्य भारत और चीन के बीच विभिन्न व्यापार समझौतों का विश्लेषण करना था और दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड अग्रीमेंट में कुल लाभ को समझना था। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि भारत और चीन के बीच व्यापार सम्बन्ध बहुत मजबूत थे लेकिन भारत को अपने प्रोडक्ट्स में विविधता लानी होगी।
इसी विविधता को लाने के लिए कॉन्ग्रेस और चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच MOU (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) भी साइन किया गया था। इसके अध्ययन में पता चलता है कि राजीव गाँधी फाउंडेशन में चीनी दूतावास और चीन की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा राजीव गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ कन्टेम्पररी स्टडीज में डोनेशन किए गए।
2005 से 2008 के बाद राजीव गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ कन्टेम्पररी स्टडीज इस ट्रेड अग्रीमेंट पर अध्ययन जारी करती है और इसमें सुझाव किया गया कि भारत और चीन के बीच फ्री ट्रेड अग्रीमेंट भारत के लिए लाभदायक रहा।
2008 में बीजिंग में हुए समझौते के तहत एमओयू में तय हुआ है कि दोनों पार्टी एमओयू के तहत क्षेत्रीय, द्वीपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मसले पर एक दूसरे से बात करेंगे। टाइम्स नाउ द्वारा दिखाई गई रिपोर्ट में इस अध्ययन का एक हिस्सा दिखाया गया है, जिसमें चाइनीज अम्बेसडर राजीव गाँधी फाउंडेशन के वार्षिक समारोह में मौजूद रहे।
2006 में चीन की सरकार द्वारा राजीव गाँधी फाउंडेशन में 10 लाख रूपए की वित्तीय मदद
एक और खुलासे में गाँधी परिवार के चीन के साथ अपने गोपनीय संबंधों के दावों को और मजबूती मिलती है। नए खुलासे से पता चलता है कि चीनी सरकार ने वर्ष 2006 में ‘राजीव गाँधी फाउंडेशन’ को ‘वित्तीय सहायता’ के लिए 10 लाख रुपए दान दिए थे।
चीनी दूतावास पर उपलब्ध एक दस्तावेज़ के अनुसार, भारत में तत्कालीन चीनी राजदूत सुन युक्सी (Sun Yuxi) ने राजीव गाँधी फाउंडेशन को 10 लाख रुपए दान दिए थे, जो कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़ा हुआ है और कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा चलाया जाता है।
मनमोहन मल्होत्रा, जो उस समय राजीव गाँधी फाउंडेशन के महासचिव थे, ने सोनिया गाँधी द्वारा नियंत्रित राजीव गाँधी फाउंडेशन की ओर से यह वित्तीय मदद प्राप्त की थी।
राजीव गाँधी फाउंडेशन
ध्यान देने की बात यह है कि यह कोई और नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष स्वयं सोनिया गाँधी ही इस राजीव गाँधी फाउंडेशन की प्रमुख हैं। सोनिया गाँधी के साथ-साथ राहुल गाँधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और प्रियंका गाँधी भी फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं।
राजीव गाँधी फाउंडेशन, जो 1991 में स्थापित किया गया था, साक्षरता, स्वास्थ्य, विकलांगता, वंचितों के सशक्तीकरण, आजीविका और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन सहित कई मुद्दों पर काम करने का दावा करता है।
यह सब डोकलाम विवाद के दौरान घटित हो रहा था। यानी एक ओर जहाँ सीमा पर भारतीय सेना और चीन की सेना आमने-सामने थीं, तब राहुल गाँधी चीन की सरकार के साथ लंच करते हुए सीक्रेट समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे थे।
इसमें राहुल गाँधी को आमंत्रित किया गया था, उनके साथ गुपचुप लंच आयोजित किए गए। जबकि आज के समय पर वो गलवान घाटी में चल रहे घटनाक्रम पर यह साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि चीन ने भारत की जमीन हड़प ली है और केंद्र सरकार ने यह जेमीन चीन को दे दी है।
2008 में साइन किया गया यह MOU बेहद गोपनीय तरीके से साइन किया गया था, जिसके बारे में किसी को शायद ही भनक लग पाई हो यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी कमिटी तक को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि यदि यह डोनेशन और समझौते दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड अग्रीमेंट के लिए थे तो फिर इन्हें सार्वजानिक करने में कॉन्ग्रेस को क्या समस्या थी?
कॉन्ग्रेस चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करती है। डोकलाम मुद्दे के दौरान, राहुल गाँधी गुपचुप तरीके से चीनी दूतावास जाते हैं। नाजुक स्थितियों के दौरान, राहुल गाँधी राष्ट्र को विभाजित करने और सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने की कोशिश करते हैं। इन सबके बीच गाँधी परिवार और चीन की सरकार के बीच साइन किए गए एमओयू की भूमिका को देखा जाना चाहिए है।
राजीव गाँधी फाउंडेशन में चीन की सरकार की वित्तीय मदद, गाँधी परिवार के साथ रेगुलर मीटिंग, इंडिया-चीन स्टडी आदि घटनाक्रमों का अर्थ यह लगाया जा सकता है कि चीन की सरकार गुपचुप तरीके से राजीव गाँधी फाउंडेशन में वित्तीय मदद के नाम पर गाँधी परिवार के खतों में पैसे भेज रही थी? चीन की सरकार और गाँधी परिवार के बीच गुपचुप तरीकों से किए गए यह समझौते कई प्रकार के सवाल खड़े करते हैं।
वर्ष 2008 में साइन किए गए इस एमओयू पर राहुल गाँधी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के मंत्री वांग जिया रुई ने हस्ताक्षर किए थे। इस मौके पर सोनिया गाँधी और चीन के तत्कालीन उपराष्ट्रपति शी जिनपिंग भी उपस्थित थे।
कॉन्ग्रेस के इस गोपनीय समझौते का आधार व्यापार को बढ़ावा देना बनाया गया, वास्तव में यह भारत के खिलाफ ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यह भी देखा जाना चाहिए कि दोनों देशों के बीच सप्लाई चेन से लेकर कई ऐसी जगहों पर चीन को आधार दिया गया कि आज के समय में चीन के बहिष्कार कर पाना लगभग नामुमकिन हो चुका है। यानी कॉन्ग्रेस नहीं चाहती कि चीन की भारतीय अर्थव्यवस्था से घुसपैठ दूर हो और वह निरंतर भारतीय बाजार का अहम् हिस्सा बना रहे, जिसके लिए वह सत्ता में रहते हुए पूरी तैयारी भी कर चुके थे?
इन समझौतों के जरिए चीन की कम्पनियों को बड़े स्तर पर भारत में स्थापित करने का अवसर मिला और आज के समय में यह भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद बन चुके हैं खासकर इलेक्ट्रोनिक्स और फर्मास्युटीकल सेक्टर में चीन की पैठ आज भारत के लिए बड़ा सरदर्द बन गया है।
पश्चिम बंगाल में TMC नेता समेत दो दरिंदों से अपनी बेटी को छुड़ाने की कोशिश में एक महिला की मौत हो गई। घटना बंगाल के हावड़ा जिले में मंगलवार को घटी। यहाँ दोनों आरोपितों ने महिला को सीढ़ियों से धक्का दे दिया। बाद में अस्पताल ले जाने के दौरान उनकी मौत हो गई।
इस संबंध में पुलिस ने स्थानीय टीएमसी नेता कुश बेरा व उसके साथी को गिरफ्तार किया। पीड़ित लड़की ने घटना की जानकारी देते हुए बताया, “मंगलवार को मैं रात करीब 11:30 बजे छत पर गई। तभी किसी ने मेरा पैर पकड़ लिया और मुझे छत पर गिरा दिया। दूसरे व्यक्ति ने अपने हाथों से मेरा मुँह बंद कर दिया। किसी तरह मैंने अपने मुँह से उसका हाथ हटवाया और मदद के लिए चिल्लाई।”
Trying to save her daughter from molesters, including a TMC leader, a woman died after she was pushed off the staircase in Kolkata.https://t.co/LWK9Y64V37
— The New Indian Express (@NewIndianXpress) June 25, 2020
लड़की कहती है कि उसकी आवाज सुनकर उसकी माँ भागते हुए छत पर आईं। मगर तभी उनमें से एक ने उसकी माँ को धक्का दे दिया। जिससे वे गिरी और बेहोश हो गई। बाद में दोनों छत से कूदकर भाग गए।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मामले के संबंध में पुलिस ने बताया कि शुरुआती जाँच में ये पता चला है कि दोनों युवक जानते थे कि लड़की छत के ऊपर अपने फोन में वीडियो गेम खेलने जाने वाली है। इसलिए वे पहले से पेड़ पर चढ़कर उसकी छत पर पहुँच गए थे।
यहाँ बता दें, लडकी के साथ बदसलूकी करने के आरोप में टीएमसी के किसी नेता का नाम पहली दफा सामने नहीं आया है। इससे पहले भी पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के माणिकतला में एक कार्यक्रम में परफॉर्म कर रही महिला के साथ तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता भानु पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे।
मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि महिला सिंगर माणिकतला के मुरारीपुकुर क्लब में आयोजित प्रोग्राम में बैंड के साथ परफॉर्म करने पहुँची थी। आधी रात में ब्रेक लेने के लिए वह स्टेज से सटे ग्रीन रूम में गई। इसी दौरान भानु के साथ ही क्लब के कुछ मेंबर भी अंदर घुस आए और गायिका से बातचीत करने की कोशिश की।
पीड़िता ने बताया कि पहले उन लोगों ने किडनी की बीमारी से जूझ रहे उसके पिता के इलाज के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही। फिर उनलोगों ने ग्रीन रूम से सभी कालाकारों को बाहर निकाल दिया। एक कलाकार को तो धक्का भी दे दिया। इसके बाद बंदूक की नोंक पर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया।
इसी प्रकार कुछ समय पहले बंगाल के नॉर्थ 24 परगना जिले के बासंती थाने इलाके में TMC कार्यकर्ता की पत्नी से गैंगरेप और बाद में हत्या करने के आरोप में तृणमूल के तीन नेताओं पर मामला दर्ज हुआ था। इन नेताओं की पहचान जफर शेख, अब्दुल शेख और सफीक लश्कर के रूप में हुई है।
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए पतंजलि द्वारा निर्मित कोरोनिल को लेकर उपजे विवाद के बाद अब गाज फेयर एंड लवली (Fair & Lovely) पर गिरी है। खबर ये है कि सोशल मीडिया पर कोरोनिल के समर्थन में लोगों ने फेयर एंड लवली की बिक्री और गोरा करने वाले दावों पर सवाल किया।
इसके बाद खबर आई कि अब हिंदुस्तान यूनिलीवर ने फैसला लिया है कि वे अपने 45 साल पुराने प्रॉडक्ट का नाम बदल देंगे।
Babaramdev is being accused by so many people for making Coronil But may of them using Fair and lovely from last 20 year in the hope of getting fair Skin and some celebs has endorse such things without asking for scientific proof For coronil they are asking proof @ashish9722
दरअसल, पतंजलि के समर्थक सोशल मीडिया पर कोरोनिल पर विवाद बढ़ने के बाद सवाल उठा रहे थे कि आखिर जो लोग 20 साल से फेयर एंड लवली का इस्तेमाल गोरा होने के लिए कर रहे हैं, वो आज कोरोनिल पर इसलिए सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि उसे कोरोना वायरस का उपचार बताया जा रहा है। क्या इन लोगों ने कभी फेयर एंड लवली को इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिक प्रमाण माँगा?
अब हिंदुस्तान यूनिलीवर कंपनी के इस फैसले के पीछे पतंजलि समर्थकों के सवाल कितने उत्तरदाई है? ये कहना मुश्किल काम है। लेकिन बता दें, फेयर एंड लवली के नाम और दावों को लेकर बवाल पिछले काफी समय से चल रहा था।
कई महिला संगठनों ने इसके विरोध में कहा था कि किसी महिला की खूबसूरती उसके रंग से नहीं आँकी जानी चाहिए।
संगठनों का आरोप था कि क्रीम में गोरापन शब्द को जिस तरह से इस्तेमाल किया जाता है उससे ये प्रतीत होता है कि सिर्फ गोरी महिलाएँ ही खूबसूरत होती हैं।
अब इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए हिंदुस्तान यूनिलीवर ने एक बयान जारी किया है। बयान में कहा गया है कि वे अपने 45 साल पुराने ब्रांड का नाम बदल देंगे।
कंपनी की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि नया ब्रांड का नाम सभी मंजूरी के बाद लॉन्च किया जाएगा। कंपनी ने फेयर एंड लवली (Fair & Lovely) से फेयर शब्द को हटाने की बात कही है। नए अवतार में आने वाला फेयर एंड लवली ब्रांड अलग-अलग स्किन टोन वाली महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर ज्यादा केंद्रित होगा।
We’re committed to a skin care portfolio that’s inclusive of all skin tones, celebrating the diversity of beauty. That’s why we’re removing the words ‘fairness’, ‘whitening’ & ‘lightening’ from products, and changing the Fair & Lovely brand name.https://t.co/W3tHn6dHqE
यहाँ बता दें कि पिछले दिनों न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने भी बताया था कि दक्षिण एशिया में यूनीलीवर स्किन लाइटनिंग क्रीम की मार्केटिंग में बदलाव की तैयारी कर रही है। क्योंकि सोशल मीडिया और अन्य जगहों पर गोरा बनाने वाली क्रीम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कंपनी के इस फैसले के पीछे विशेषज्ञों का मानना है कि ये फैसला कंपनी के लिए बेहद टेंशन भरा होगा। इस कदम से फेयर एंड लवली की सेल्स पर असर पड़ेगा। जिसके कारण बिक्री गिरने के अनुमान हैं। कुल मिलाकर इसका नेगेटिव असर ही पड़ेगा। मगर लांग टर्म में यह फैसला कंपनी के हित में होगा।
भारत चीन विवाद को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हैं। हर व्यक्ति इस घड़ी अपनी जानकारी के मुताबिक स्थिति का आँकलन कर रहा है। मगर, इस बीच कुछ बुद्धिजीवी लोग वो भी हैं, जो 1962 के युद्ध में मिली हार की दुहाई दे देकर भारत का मनोबल गिराने में जुटे हैं।
ऐसे समय में पूर्व एयर मार्शल डेंजिल कीलोर का बयान 1962 के युद्ध पर बेहद प्रासंगिक है। जिसे उन्होंने वाइल्डफिल्म्स इंडिया से बातचीत के दौरान दिया और बताया कि आखिर उस समय भारत के हार की मुख्य वजह क्या थी?
पूर्व एयर मार्शल डेंजिल कीलोर दो टूक कहते हैं कि 1962 का युद्ध भारत केवल पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कारण हारा। उन्होंने उस समय एयरफोर्स का समर्थन नहीं किया। न ही सेना के जवानों को गर्म कपड़े उपलब्ध कराए। भारत यदि हारा तो उसकी वजह नेहरू थे।
पूर्व एयर मार्शल के इस बयान की वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है। इस वीडियो में वे बताते हैं, “1962 के युद्ध में सेना के हाथ में कुछ नहीं था। वो युद्ध बेहद राजनीतिक था, जिसे नेहरू ने हारा। शुरू भी उन्होंने किया और हारे भी वे। उन्होंने केवल कूटनीति पर भरोसा किया और सेना की उपेक्षा की। हमारे पास सर्दी के कपड़े तक नहीं थे। जब हमें पहाड़ों में धकेला गया।”
वे आगे बताते हैं, “एयरक्राफ्ट को संचालित करने की अनुमति नहीं थी। हम उसे चीन तक ले जा सकते थे। लेकिन उन्होंने सारी चीजों को उलझा दिया और हमें इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी। मगर, हमने उस समय उन चीजों से सीखा। अगर ये सब नहीं हुआ होता तो मुमकिन है हमारे लिए 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में चीजें सहज होतीं।”
इतिहास की कड़वी सच्चाई बताते हुए पूर्व एयर मार्शल 1962 के युद्ध के संदर्भ में कहते हैं, “वो राजनीतिक लोग ही थे, जो ये सब नहीं चाहते थे। उसमें खासकर कॉन्ग्रेस थी, जो उस हार के पीछे की कड़वी सच्चाई लोगों को नहीं बताना चाहती थी। जिसका खामियाजा हमारी सेना ने भुगता।”
गौरतलब है कि भले ही इतिहास के पन्नों में भारत चीन युद्ध का साल 1962 कहा जाता हो। लेकिन सच तो ये है कि भारत चीन युद्ध की शुरुआत 28 जुलाई, 1959 से हो गई थी। जब चीन ने विस्तारवादी नीतियों को बढ़ाते हुए उत्तरी पूर्वी लद्दाख में अपनी घुसपैठ की और इस आहट को उस समय की हमारी सरकार समझ न सकी।
इसके बाद चीन ने कई बार नापाक हरकतें की। लेकिन नेहरू सरकार इन सबमें दिलचस्पी दिखाने से बचती रही। नतीजतन सितम्बर 1962 में प्रधानमंत्री नेहरू को जानकारी मिली कि लद्दाख की गलवान नदी तक के इलाके तक चीनी सेना अवैध कब्जा जमा चुकी है।
एक महीने बाद दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे के सामने थीं। लगभग एक महीने चले इस युद्ध में चीन ने गलवान नदी तक अपनी स्थिति को बरकरार रखा। मगर, बाद में प्रधानमंत्री नेहरू ने भी इस इलाके को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।