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जिसने छोड़ दिया इस्लाम, उस पर भी शरिया कानून क्यों: एक्स मुस्लिम पहुँची सुप्रीम कोर्ट, एकलौती बेटी को भी नहीं दे सकती पूरी प्रॉपर्टी

सुप्रीम कोर्ट में इस्लामी कानून के हिसाब से विरासत को चुनौती देने वाली सफिया ने महिलाओं के अधिकारों के कई सवाल पूछे हैं। सफिया अपनी बेटी को अपनी पूरी सम्पत्ति देना चाहती हैं लेकिन शरिया उन्हें यह करने की इजाजत नहीं दे रहा है।

सफिया ने अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया है। उनका कहना है कि वह इस्लाम को छोड़ चुकी हैं, ऐसे में उनके निजी मामले संविधान के हिसाब से तय होने चाहिए, ना कि शरिया से।

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस याचिका को लेकर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है। केंद्र सरकार को इस विषय में 4 सप्ताह के भीतर अपना जवाब कोर्ट के सामने रखना होगा।

इस मामले की सुनवाई मई माह में अब होगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे एक गंभीर मामला बताया है। वहीं सफिया ने इस बीच महत्वपूर्ण प्रश्न इस्लाम और उसके विरासत को लेकर नियमों पर उठाए हैं।

केरल के अलप्पुझा की रहने वाली सफिया पी एम जन्म से मुस्लिम थीं। लेकिन उन्होंने कुछ वर्षों पहले इस्लाम छोड़ दिया था और ‘एक्स मुस्लिम ऑफ़ केरल’ नाम के एक संगठन की सदस्यता ले ली थी। सफिया का कहना है कि वह इस्लाम में अब विश्वास नहीं रखतीं।

सफिया के पिता भी एक कम्युनिस्ट हैं। सफिया का तलाक हो चुका है। उनके एक 25 वर्ष की बेटी है। सफिया का कहना है कि चाहते हुए भी उनके पिता सम्पत्ति का 50% सफिया को नहीं दे सकते क्योंकि शरिया में मात्र 33% हिस्सा ही बेटी को दिया जा सकता है।

सफिया का कहना है कि वह जब इस्लाम में विश्वास नहीं रखती तो उनके विरासत के मामले क्यों इससे तय किए जाए। उनका कहना है कि इसी शरिया के चलते वह अपनी बेटी को भी अपनी पूरी सम्पत्ति नहीं दे सकतीं।

इस बात को लेकर भी सफिया ने प्रश्न उठाए हैं कि क्यों सम्पत्ति का बाकी हिस्सा रिश्तेदारों को दिया जाना चाहिए, जबकि कोई ऐसा ना करना चाहता हो। सफिया का कहना है कि इस्लाम छोड़ने के बाद तो किसी को सम्पत्ति का कोई हिस्सा ही नहीं मिल सकता।

उन्होंने मीडिया से कहा, “मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है और यह संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। जिस व्यक्ति ने मजहब त्याग दिया है, उसके उत्तराधिकार के मामले भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से तय हों।”

सफिया ने समान नागरिक संहिता (UCC) का भी समर्थन किया है। सफिया ने कहा कि अगर इस कानून से महिलाओं के अधिकार सुरक्षित होते हैं तो वह इसकी पूरी तौर से समर्थक हैं। सफिया के इस मामले ने शरिया कानून की बंदिशों को एक बार फिर सामने ला दिया है।

लिव इन रिलेशन से पैदा बच्चों का पालन-पोषण कौन करेगा, शिक्षा कौन दिलाएगा, सुरक्षा कौन देगा? हाई कोर्ट ने अनिवार्य पंजीकरण का दिया निर्देश, सरकारों को कानून बनाने के लिए भी कहा

राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने बुधवार (29 जनवरी 2025) को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप समझौता करना और उसे पंजीकृत करना अनिवार्य करे। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लिव-इन संबंधों को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाना समय की माँग है।

जस्टिस अनूप कुमार ढाड ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप समझौते को सक्षम प्राधिकारी/ट्रिब्यूनल द्वारा पंजीकृत किया जाना चाहिए, जिसे सरकार द्वारा स्थापित किया जाना आवश्यक है। सरकार द्वारा उचित कानून बनाए जाने तक ऐसे लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण के मामले को देखने के लिए राज्य के प्रत्येक जिले में सक्षम प्राधिकारी की स्थापना की जानी चाहिए।”

जस्टिस ढाड ने कहा कि ये प्राधिकारी ऐसे भागीदारों/दंपत्तियों की शिकायतों का समाधान करेगा, जो इस रिश्ते में रह रहे हैं और उनके बच्चे पैदा हुए हैं। हाई कोर्ट की एकल बेंच ने यह भी कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के कारण इस तरह के रिश्ते से उत्पन्न होने वाले मुद्दों के निवारण के लिए एक वेबसाइट या वेबपोर्टल की भी शुरुआत की जानी चाहिए।

हालाँकि, राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने बुधवार को यह मामला एक बड़ी पीठ को सौंप दिया, ताकि यह तय किया जा सके कि क्या विवाहित व्यक्ति, जो अपनी तलाक बिना किसी दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकता है या नहीं। इसके साथ ही वह अदालत से सुरक्षा आदेश प्राप्त करने का हकदार होगा या नहीं।

कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि जब तक केंद्र और राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाया जाता, तब तक वैधानिक प्रकृति की एक योजना कानूनी प्रारूप में तैयार की जानी आवश्यक है। इनमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए नियम और शर्तें तय होनी चाहिए। न्यायालय ने उचित प्राधिकारी द्वारा एक प्रारूप तैयार करने का निर्देश दिया।

उसमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के इच्छुक जोड़ों/भागीदारों के लिए ऐसे संबंध में प्रवेश करने से पहले निम्नलिखित नियम और शर्तों के साथ प्रारूप भरना आवश्यक हो जाएगा:

(i) ऐसे रिश्ते से पैदा हुए बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पालन-पोषण की जिम्मेदारी वहन करने के लिए बाल योजना के रूप में पुरुष और महिला साझेदारों की जिम्मेदारी तय करना।

(ii) ऐसे सम्बन्ध में रहने वाली गैर-कमाऊ महिला साझेदार तथा ऐसे सम्बन्ध से उत्पन्न बच्चों के भरण-पोषण के लिए पुरुष साझेदार का दायित्व निर्धारित करना।

न्यायालय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दे दी है, फिर भी कई लोगों की नजर में स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा, “हालाँकि लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा को समाज द्वारा अनैतिक माना जाता है और आम जनता भी इसे स्वीकार नहीं करती, लेकिन कानून की नजर में इसे अवैध नहीं माना जाता।”

न्यायालय ने कहा, “ऐसे संबंधों से पैदा हुए नाबालिग बच्चों का भरण-पोषण उनके माता-पिता और विशेष रूप से पिता द्वारा किया जाना अपेक्षित है, क्योंकि ऐसे संबंधों से पैदा हुई महिलाएँ भी अक्सर पीड़ित पाई जाती हैं। हालाँकि, इस संबंध में अधिकार क्षेत्र वाले न्यायालयों द्वारा निर्देश जारी किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसे ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के पुरुष साथी पर नैतिक दायित्व डाला जाना आवश्यक है।”

हाई कोर्ट ने कहा कि इस विषय में किसी विधायी ढाँचे के अभाव में कोर्ट के अलग-अलग दृष्टिकोण एवं फैसलों के कारण कई लोग भ्रमित हो सकते हैं। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव, विधि एवं न्याय विभाग के प्रधान सचिव तथा न्याय एवं समाज कल्याण विभाग, नई दिल्ली के सचिव को भी मामले की जाँच करने और 1 मार्च 2025 तक इसकी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपने के लिए कहा है।

अदालत ने आगे कहा कि संसद और राज्य विधानमंडल को इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए और उचित कानून बनाना चाहिए या कानून में उचित संशोधन करना चाहिए, ताकि ऐसे रिश्ते में रहने वाले जोड़ों को अपने परिवार, रिश्तेदारों और समाज के सदस्यों के हाथों किसी भी तरह के नुकसान और खतरे का सामना न करना पड़े।

अदालत ने कहा कि कभी-कभी ऐसे रिश्तों में महिला साथी को तब तकलीफ होती है, जब ऐसे रिश्ते टूट जाते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसे रिश्ते से पैदा होने वाले बच्चों की सुरक्षा की आवश्यकता है, भले ही ऐसा रिश्ता शादी की प्रकृति का न हो। न्यायालय ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि लिव-इन वाले जोड़ों द्वारा पुलिस सुरक्षा की माँग करने वाली याचिकाओं की बाढ़ आ गई है।

दिल्ली चुनावों से पहले BJP से हारी AAP, हरप्रीत कौर बाबला बनीं चंडीगढ़ की मेयर: जानिए अनिल मसीह प्रकरण से हुई किरकिरी के बाद कैसे पलटी बाजी

दिल्ली विधानसभा चुनाव से कुछ ही दिन पहले आम आदमी पार्टी (AAP) को बड़ा झटका लगा है। चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में AAP को भाजपा ने पटखनी दी है। भाजपा की हरप्रीत कौर बाबला ने AAP की प्रेम लता को चुनाव हरा कर मेयर की सीट कब्जाई है। भाजपा ने यह झटका तब दिया है जब चंडीगढ़ में AAP और कॉन्ग्रेस एक साथ थे।

गुरुवार (30 जनवरी, 2025) को हुई वोटिंग में भाजपा प्रत्याशी हरप्रीत कौर बाबला को 19 वोट मिले जबकि प्रेम लता 17 वोट ही इकट्ठा कर सकीं। यह चुनाव 1 वर्ष के कार्यकाल के लिए हुआ है। इस बार के चुनाव में सीट को महिला के लिए आरक्षित किया गया था। अभी तक AAP का मेयर चंडीगढ़ में था।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि भाजपा प्रत्याशी बाबला को 3 वोट दूसरी पार्टियों को भी मिले हैं। चंडीगढ़ नगर निगम में पार्षद मेयर का चुनाव करते हैं। यहाँ भाजपा के पास 16 पार्षद हैं जबकि AAP के 13 पार्षद हैं। 6 पार्षद कॉन्ग्रेस के हैं। बताया गया कि कॉन्ग्रेस-AAP के तीन लोगों ने क्रॉस वोट किया है।

35 सदस्यों वाले चंडीगढ़ नगर निगम में जीत के लिए 19 वोट चाहिए होते हैं। वोटिंग में चंडीगढ़ का सांसद भी हिस्सा लेता है। वह चंडीगढ़ नगर निगम का पदेन सदस्य होता है। वर्तमान में चंडीगढ़ के सांसद कॉंग्रेस के मनीष तिवारी हैं। हालाँकि, उनके रहने से भी कोई फायदा नहीं हुआ।

AAP और कॉन्ग्रेस ने चुनाव से पहले अपने पार्षदों को शहर के बाहर भी भेज दिया था। इसे कोई फर्क नहीं पड़ा और AAP-कॉन्ग्रेस जीत दर्ज करने में नाकाम रही। इससे पहले 2024 में हुआ चुनाव विवादों में घिर गया था। पहले इसमें भाजपा प्रत्याशी मनोज सोनकर ने जीत हासिल की थी।

बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया था जहाँ पर अनिल मसीह द्वारा बेईमानी किए जाने की बात सामने आई थी। दोबारा हुए चुनाव में AAP के कुलदीप कुमार जीते थे। चंडीगढ़ में AAP एक बार फिर सत्ता से बाहर हो गई है। 2024 में AAP से हारने से पहले भाजपा लगातार 9 बार यहाँ मेयर पद पर काबिज रही थी।

ड्रग्स की गोली दो, फिर मेरे साथ कुछ भी करो… लड़कियों को सेक्स वर्कर बना रहा ‘उड़ता पंजाब’, अनाज मंडी में ‘धंधा’: हाई कोर्ट बोला- नशाखोरी दीमक की तरह खा रहा, क्या जागेगी AAP सरकार?

‘नशा मुक्ति अभियान’ लंबे समय से देश के कोने-कोने में चल रहा है लेकिन इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं है। पंजाब में AAP सरकार जोर-शोर से दावा करती कि वो राज्य से नशे का खात्मा कर देंगे। वहीं दूसरी ओर एक लड़की की आपबीती सामने आती है जो बताती है कि राज्य में नशे के कारण कैसे लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो रही है और उन्हें नशा दे-देकर वेश्यावृत्ति में धेकला जा रहा है।

प्रशासन के लिए अगर उस लड़की की आपबीती एक धक्का है तो सवाल उठता है कि क्या ‘नशा मुक्ति अभियान’ जमीन तक पहुँचा भी है और अगर अधिकारी ऐसी स्थितियों से वाकिफ हैं तो फिर अब तक राज्य में ऐसे हालात क्यों हैं।

लड़की की आपबीती मीडिया में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट बताती हैं कि जिस समय नशा विरोधी कमेटी की टीम मार्च निकाल रही थी तभी उन्हें कोट ईसे खाँ के मसीता रोड पर लड़की सड़क किनारे खाना खाते हुए मिली। लड़की से सवाल-जवाब हुए तो उसने सरेआम जो कहना शुरू किया उससे सभी लोग हिल गए। लड़की ने कहा,

“मुझे बस नशे के लिए छह कैप्सूल चाहिए और उसके बाद कोई मेरे साथ कोई कुछ भी करे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक महिला ने पहले मुझे नशे की लत लगाई और मुझे अब जिस्मफिरोशी में धकेल दिया है। मेरे जैसी कई युवतियों को हवस के भूखे भेड़ियों के समक्ष परोसती है और बदले में 300 रुपए लेती है। आधा हिस्सा 150 रुपए मुझे मिलते हैं। पहले 600-700 रुपए की कमाई होती थी पर अब जो पैसा मिलता है, उससे केवल नशे की पूर्ति हो पाती है।”

लड़की ने इस दौरान ये भी जानकारी दी कि वेश्यावृत्ति का काम अनाज मंडी में होता है। वहाँ लगे कुछ तंबू में जिस्म का सौदा करवाया जाता है लेकिन उससे पहले उन्हें नशे का आदी बनाते हैं। वो खुद जब कैप्सूल नहीं मिलती तो अस्पताल से मिलने वाली ‘बुपरीमार्फिन’ गोली पानी में मिलाकर इंजेक्शन लगा लेती है। युवती के मुताबिक ये इंजेक्शन लगाना भी उसे उसी औरत ने ही सिखाया है जिसने उसे वेश्यावृत्ति में धकेला। वहीं गोली उसे सरकारी अस्पताल के पास वाले मेडिकल स्टोर से मिल जाती है।

बच्ची की आपबीती आने के बाद पुलिस ने इस मामले को दर्ज तो कर लिया है लेकिन इसके बाद पूरे प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं। पूछा जा रहा है कि जब राज्य में नशे की कैप्सूल सब बंद हैं तो इनके पास वो कैसे पहुँच रही है।

नशे से हो रही पंजाब में जिंदगियाँ बर्बाद

ये पहली बार नहीं है जब पंजाब में नशे की लत के कारण किसी की जिंदगी बर्बाद हुई हो। 1 साल पहले एक डांसर की खबर आई थी जिसकी पूरी जिंदगी नशे की लत के कारण खराब हो गई थी।

खुद उसके भाई-बहनों ने उसे पहचानने से मना कर दिया था। इसके अलावा उसका पति भी छो़डकर चला गया था। बाद में उसे घर चलाने के लिए सेक्स वर्कर बनना पड़ा। मगर जब उम्र ढली तो उसे वो काम मिलना भी बंद हो गया।

ऐसे ही एक अन्य खबर बताती है कि कैसे अमृतसर के गाँव में नशे की आदत के कारण 100 से ज्यादा महिलाओं का सुहाग उजड़ गया। रिपोर्ट के अनुसार सभी के पतियों की पिछले तीन से छह साल में नशे के कारण मौत हुई थी।

महिलाओं ने शिकायत में पुलिस पर आरोप लगाया था कि पुलिस इन नशा तस्करों को नहीं पकड़ती। नशे से हमारा भविष्य बर्बाद हो रहा है। कई लोग तो इस क्षेत्र से जा चुके हैं। हाल ऐसे हैं कि अब तो लोग यहाँ मकान खरीदने में भी संकोच करते हैं।

इसी तरह 4 दिन पहले एक खबर पंजाब के फिल्लौर से आई थी। यहाँ नशे की एक्स्ट्रा डोज लेने पर 22 साल के युवक की मौत हो गई। उसका शव पेड़ के पास पड़ा मिला। जवान बेटे की मौत की खबर सुनते ही पूरे परिवार में कोहरा मच गया।

कोर्ट बार-बार लगा चुका है फटकार

पंजाब में नशाखोरी इतने चरम पर है कि कोर्ट तक इस मामले पर राज्य की आलोचना कर चुका है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कहा था कि नशाखोरी देश के भविष्य को दीमक की तरह खा रही है। विशेष रूप से पंजाब में ये बड़ी चिंता का विषय है।

पिछले वर्ष अगस्त 2024 भी बठिंडा कोर्ट ने ड्रग तस्करों के खिलाफ सख्त स्टैंड लेने को पुलिस को आदेश दिया था। उन्होंने एक तस्कर की याचिका पर सुनवाई के दौरान पुलिस से कहा था कि वह बताएँ कि राज्य में एनडीपीएस के कितने मामले हैं, जिनमें आरोपी 6 महीने से अधिक समय से फरार हैं। अगर पुलिस द्वारा ड्रग मामलों में आरोपितों को उचित समय अवधि के भीतर गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो ऐसे आरोपितों को तुरंत घोषित अपराधी (पीओ) घोषित किया जाना चाहिए और कानून के प्रावधान के अनुसार बिना किसी देरी के उनकी संपत्ति जब्त की जानी चाहिए।

मार्च 2024 में भी कोर्ट ने पंजाब में पुलिस अधिकारियों से ड्रग तस्करों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी कोर्ट को देने को कही थी। हाईकोर्ट ने पंजाब की जेलों से नशे की तस्करी के बढ़ते मामलों पर टिप्पणी करते हुए इसे एसएसओसी की नाकामी बताई थी। साथ ही कहा था कि इन केसों की जाँच सीबीआई और ईडी द्वारा होनी चाहिए। पंजाब में स्थिति नियंत्रण से बाहर है और जेल अधिकारियों के खिलाफ जँच करने में पंजाब पुलिस सक्षम नहीं है।

इसी प्रकार साल 2023 में भी कोर्ट ने नशे के कारोबार और तस्करी के आँकड़ों को देख इन्हें डराने वाला बताया था। कोर्ट ने कहा था कि नशे की जड़ों को समाज से काटना बहुत जरूरी है। आरोपितों के खिलाफ न केवल एनडीपीएस का बल्कि मनी लॉंड्रिंग का मामला दर्ज होना चाहिए। अपराधियों को कम से कम 10 से 20 साल कैद की सजा सुनाई जानी चाहिए और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

पंजाब की AAP सरकार और उनके नशा मुक्त पंजाब को लेकर वादे

साल 2022 में जब पंजाब में चुनाव थे तब AAP प्रमुख केजरीवाल ने राज्य की जनता से वादा किया था कि AAP की सरकार आने के चार महीने के भीतर नशीले पदार्थ पर अंकुश लगवा देंगे। बाद में साल 2023 में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पटियाला में सभा को संबोधित करते हुए कहा ता कि वह अगले स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 2024 तक पंजाब से चिट्टे के खतरे को खत्म कर देंगे। हालाँकि वो अपना वादा पूरा करने में विफल रहे जिसके कारण विपक्षी पार्टियों ने उन्हें घेरा भी और उनके वादे को महज ‘लॉलीपॉप’ बताया।

अब हर साल-छह महीने पर खबरों में कुछ आँकड़े दिए जाते हैं। बताया जाता है कि एक अवधि में पंजाब में कितने ड्रग तस्कर पकड़े गए, कितनों के मादक पदार्थ जब्त हुए आदि। कभी मुख्यमंत्री घोषणा करते हुए कि जो गाँव नशा मुक्त होगा उन्हें विशेष अनुदान मिलेगा, तो कभी कोई टीम बनाकर नशा रोकने की बात होती है… लेकिन इन घोषणा से ज्यादा जरूरी तो ये है न कि देखा जाए जो प्रयास शुरू हुए उससे जमीनी स्तर पर क्या फर्क पड़ रहा है। अगर इसी चरण पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो ‘100 महिलाओं के विधवा’ होने वाली जैसी खबरें कभी आना बंद नहीं होगीं। लड़कियाँ नशे की लत लगाकर वेश्यावृत्ति में धकेली जाती रहेंगी। ड्रोन तस्करों को पकड़ लेगा लेकिन मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली नशीली दवाइयों पर कार्रवाई नहीं होगी।

कुरान जलाने वाले सलवान मोमिका को घर में घुसकर मारी गोली, हत्या के वक्त टिकटॉक पर थे लाइव: इराक से आ स्वीडन में ली थी शरण, इस्लाम के थे कट्टर आलोचक

स्वीडन में कुरान जलाने वाले सलवान मोमिका की हत्या कर दी गई है। हमलावरों ने एक लाइव स्ट्रीम के दौरान मोमिका को निशाना बनाया और उन्हें गोली मार दी। सलवान मोमिका इस्लाम के धुर आलोचक थे और मूल रूप से इराक के रहने वाले थे। उन्होंने स्वीडन में शरण ली थी। उन्हें इससे पहले भी लगातार धमकियाँ मिल रही थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना स्वीडन के शहर स्टॉकहोम के पास हुई। हमलावर मोमिका के अपार्टमेंट में रात 11 बजे के आसपास आए और उन पर हमला कर दिया। दावा है कि उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई।

इसके बाद पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी गई। पुलिस ने गोलीबारी की घटना की पुष्टि की है। हालाँकि, पुलिस ने इस घटना के विषय में कोई भी आधिकारिक जानकारी देने से मना किया है। पुलिस अभी यह नहीं बता रही कि गोलीबारी में मारा गया शख्स सलवान मोमिका था।

सलवान मोमिका की हत्या की पुष्टि स्वीडन की एक अदालत की कार्यवाही से हुई है। अदालत ने उसने जुड़े एक मामले की सुनवाई आगे बढ़ा दी है। यह मामला मोमिका और उनके एक और साथी सलवान नजेमी के खिलाफ कुरान चलाने के मामले में दर्ज हुआ था। अदालत ने कहा कि मामले में एक व्यक्ति की मौत हो गई है, ऐसे में इसकी सुनवाई स्थगित की जाती है।

मृतक की पहचान सलवान मोमिका के रूप में जज ने की है। पुलिस अब इस मामले जाँच कर रही है। उस बिल्डिंग को भी सील कर दिया गया है, जहाँ पर यह घटना हुई है। पुलिस ने 5 लोगों को पकड़ा भी है। उन्हें अब अदालत में पेश किया गया है। उनकी पहचान सामने नहीं आई है।

सलवान मोमिका हत्या के समय टिकटॉक पर लाइव थे, यह भी सामने आया है। उनका एक वीडियो भी इस संबंध में वायरल हो रहा है। इस वीडियो की जाँच करने की बात भी पुलिस ने कही थी। सलवान मोमिका की चर्चा सबसे अधिक 2023 में हुई थी।

तब सलवान ने 28 जून, 2023 को पैरों तले कुरान को कुचल कर जला दिया था। यह सब उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर एक लाउडस्पीकर के साथ किया था। उन्होंने जहाँ कुरान जलाई थी, वह जगह पाकिस्तान का दूतावास के सामने थी। सलवान के इस एक्शन के बाद दुनिया भर के मुस्लिमों ने खूब हल्ला काटा था।

मोमिका की उम्र 38 साल थी और वो 2018 में इराक़ से भागकर स्वीडन आ गए थे। मोमिका फेसबुक पर खुद को ‘प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ, विचारक, लेखक और एक आजाद नास्तिक’ बताते थे। मोमिका एक ईसाई थे। वह कई सोशल मीडिया साइटों- खासकर टिकटॉक और फेसबुक पर एक्टिव थे।

इससे पहले अप्रैल 2024 में भी सलवान मोमिका के मरने की खबरें चली थी। हालाँकि, तब सलवान मोमिका ने खुद सामें आकर इनका खंडन किया था। सलवान मोमिका की मौत की खबर की पुष्टि इस बार उनके दोस्त और कुरान जलाने में साथ रहे सलवान नाजेमी ने भी की है।

वाजपेयी राज में बना, कॉन्ग्रेस शासनकाल में आया, पर पीएम मोदी ने बनाया काले धन से लड़ने का ‘हथियार’: जानिए कैसे PMLA से कसा शिकंजा, ED ने 20 साल का दिया हिसाब

मोदी सरकार के अंतर्गत प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में काफी तेजी आई है। ED ने 2014 के बाद से भ्रष्टाचार से कमाई गई लाखों करोड़ की सम्पत्ति को सीज किया है और कई मामलों में उन्हें वापस पीड़ितों या एजेंसियों तक पहुँचाया है। ED ने मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत सजा दिलाने में भी बीते सालों में बड़ी सफलता पाई है। इसके कुछ आँकड़े भी सामने आए हैं।

95% प्रॉपर्टी मोदी सरकार में हुई सीज

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2005 में लागू हुए गए धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) कानून के तहत अब तक जाँच एजेंसी ED ₹1.45 लाख करोड़ की सम्पत्ति अटैच कर चुकी है। अकेले 2024 में ही एजेंसी ने ₹21 हजार करोड़ से अधिक सम्पत्ति अटैच की है।

इस ₹1.45 लाख करोड़ में से ₹1.40 लाख करोड़ तो मोदी सरकार के अंतर्गत ही जब्त हुए हैं। इसका अर्थ है कि भ्रष्टाचार की कमाई का 95% जब्तीकरण मोदी सरकार में हुआ है। PMLA के तहत ED ने मात्र सम्पत्तियाँ ही जब्त नहीं की बल्कि लोगों को कानून के घेरे में लाने में भी सफलता पाई है।

ED ने 44 मामलों में 100 लोगो को अब तक PMLA के तहत दोषी करार दिलाया है। इस कार्रवाई में तेजी बीते एक वर्ष में आई है। 100 में से 36 लोग 2024-25 के शुरूआती 9 महीनों में ही दोषी करार दिए गए हैं। ED ने अपनी स्थापना के बाद से अब तक 911 लोगों को गिरफ्तार किया है।

वित्तीय मामलों से जुड़े अपराधों पर काम करने वाली एजेंसी बीते कुछ सालों में बड़े नेताओं, हवाला ऑपरेटरों और नौकरशाहों तक को शिकंजे में लेने में कामयाब रही है। एजेंसी की बीते कुछ वर्षों में कार्य क्षमता भी बढ़ी है। उसे कई नए अधिकारी और कर्मचारी मिले हैं। एजेंसी ने माँग की है कि उसके स्टाफ की क्षमता तीन गुना बढ़ाई जाए।

PMLA लागू कॉन्ग्रेस सरकार में हुआ, उपयोग किया मोदी सरकार ने

PMLA कानून अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने बनाया था। इसे 2002 में संसद ने पास किया था। यह कानून मनी लॉन्ड्रिंग रोकने, इस पैसे से बनाई गई सम्पत्ति को वापस लेने और दोषियों को कठघरे में लाने के लिए बनाया गया था।

इस कानून के प्रावधान काफी कड़े हैं और इसके शिकंजे में आए आरोपित बच नहीं पाते। इसमें बेल मिलना भी कठिन है। इस कानून से पहले भ्रष्टाचार से अर्जित कमाई को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं था। ऐसे में अलग-अलग कानूनों में लूपहोल को ढूंढ कर लोग बच जाते थे।

लेकिन इस कानून के नए के बाद ED की शक्तियां बढ़ गईं। कानून को कॉन्ग्रेस सरकार ने 2005 में लागू किया था। इसमें 2 बार कॉन्ग्रेस सरकार ने संशोधन भी किया। इस कानून के चलते कॉन्ग्रेस सरकार में कुछ कार्रवाई हुई लेकिन ख़ास कोई भ्रष्टाचार के मामलों में फर्क नहीं पड़ा।

लेकिन मोदी सरकार ने 2014 के बाद इस कानून का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल चालू किया है। इसी का परिणाम है कि 2005-14 के बीच जहाँ ₹5 हजार करोड़ की कालेधन से कमाई गई सम्पत्ति जब्त हुई थी तो वहीं मोदी सरकार में यह आँकड़ा लगभग 28 गुने बढ़ गया।

सिर्फ जब्त करने के मामले में ही नहीं बल्कि उन्हें वापस पीड़ितों को दिलाने में भी ED बड़ी सफलता पा रही है। 2024 में ही ED ₹7 हजार करोड़ की सम्पत्ति को पीड़ितों या फिर बैंकों को वापस दिया है। ऐसे में जो पैसा भ्रष्टाचार से कमाया गया है, उसकी वसूली भी हुई है।

ED ने मेहुल चौकसी, नीरव मोदी और सारदा चिट फंड जैसे घोटालों में पैसा वापस दिलाने में सफलता पाई है। इन मामलों में आम जनता और बैंकों को लंबा चूना लगाया गया था। ED की कार्रवाई के चलते अब राज्यों की पुलिस भी कई आर्थिक अपराधों में उनकी सहायता ले रही हैं।

हिंदू बीवी को बनाना चाहता था मुस्लिम, इनकार करने पर देता था जाति की गाली; छोड़ने को भी नहीं था तैयार: हाई कोर्ट ने कहा- धर्मांतरण के लिए मजबूर करना क्रूरता, तलाक पर लगाई मुहर

मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अंतर-धार्मिक विवाहों में एक पति या पत्नी को धर्मांतरण करने के लिए मजबूर करना क्रूरता है। फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने तलाक की इजाजत दे दी। अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाली हिंदू पत्नी ने अपने मुस्लिम पति पर इस्लाम में धर्मांतरण करने के लिए दबाव डालने और मारपीट करने का आरोप लगाया था।

जस्टिस एन शेषासायी (अब सेवानिवृत) और जस्टिस विक्टोरिया गौरी की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि धर्मांतरण के लिए मजबूर करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने कहा, “किसी के धर्म का पालन करने के अधिकार से वंचित करना और दूसरे धर्म में धर्मांतरण के लिए मजबूर करना पीड़ित को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करेगा।”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि जब किसी अपना धर्म स्वतंत्रता के साथ पालन करने की अनुमति नहीं दी जाती है तो यह उसके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। इससे उसकी जिंदगी गरिमाहीन हो जाती है। जब किसी को अपने विवाह को बचाने के लिए ऊपरवाले के नाम पर धर्मांतरण के लिए मजबूर किया जाता है तो वह विवाह नाम की संस्था की नींव को हिला देता है।

अदालत ने कहा, “हर व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह की संस्था दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। विवाह प्रणाली को पवित्र माना जाता है और इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।” इसके बाद हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए उसे अपने मुस्लिम पति से तलाक की इजाजत दे दी। फैमिली कोर्ट ने यही निर्णय दिया था, जिसके खिलाफ मुस्लिम पति ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

पत्नी ने फैमिली कोर्ट में याचिका डालकर अपने मुस्लिम पति से तलाक की माँग की थी। इसके लिए उसने क्रूरता और परित्याग का आधार बताया था। पत्नी ने कहा था कि उसका मुस्लिम पति उसे धर्मांतरण करके इस्लाम अपनाने के लिए लगातार मजबूर कर रहा है। जब वह मना करती है तो उसे उसकी जाति को लेकर उसका पति उसे गाली देता है। पत्नी ने बताया कि वह अनुसूचित जाति की हिंदू महिला है।

पति ने तर्क दिया कि यह मामला किसी उद्देश्य से दर्ज किया गया है। पति ने कहा कि उसकी पत्नी ने दावा किया कि उसे बेरहमी से पीटा गया और उसने इलाज करवाया था, लेकिन इसको साबित करने के लिए उसने कोई दस्तावेजी सबूत नहीं पेश किया। पति ने यह भी तर्क दिया कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि उसके पत्नी को मुस्लिम बनने के लिए मजबूर किया था।

कोर्ट ने माना कि दोनों ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत प्रेम विवाह किया था, लेकिन उसे धर्मांतरण के लिए शारीरिक एवं मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया। कोर्ट ने यह भी माना कि पति ने अपनी पत्नी का हिंदू नाम भी बदल दिया था। इतना ही नहीं, पति अपनी बीवी को छोड़कर पिछले दो साल से वह अपनी बहन के पास रह रहा था। इसको कोर्ट ने क्रूरता बताते हुए तलाक के लिए पर्याप्त आधार माना।

‘यमुना में जहर’ का दावा कर चौतरफा घिरे केजरीवाल, हरियाणा की अदालत ने हाजिर होने का भेजा नोटिस: ‘जनहित’ वाले जवाब से चुनाव आयोग भी संतुष्ट नहीं, कहा- सबूत दो

आम आदमी पार्टी (AAP) संयोजक अरविन्द केजरीवाल हरियाणा यमुना में ‘जहर मिलाने’ के आरोप पर फंस गए हैं। उन्हें हरियाणा की एक अदालत ने हाजिर होने का आदेश दिया है। यह आदेश हरियाणा सरकार की तरफ से दाखिल एक मुकदमे में दिया गया है।

वहीं चुनाव आयोग भी इस मामले पर केजरीवाल के जवाब से संतुष्ट नहीं है। उसने केजरीवाल से उनके ‘जहर मिलाने’ के दावे के सबूत देने को कहा है। केजरीवाल ने अपने जवाब में अमोनिया की मात्रा ज्यादा होने को बयान का आधार बताया था।

बुधवार (29 जनवरी, 2025) को हरियाणा के सोनीपत में कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा, “अरविंद केजरीवाल को 17 फरवरी, 2025 के लिए नोटिस जारी किया जाता है। उन्हें निर्देश दिया जाता है कि अगर उन्हें कुछ कहना है तो वे अगली सुनवाई की तारीख को इस अदालत के सामने हाजिर हों।”

अदालत ने कहा, “यदि वह अगली सुनवाई की तारीख को इस अदालत के सामने हाजिर नहीं होते तो यह माना जाएगा कि उन्हें कुछ नहीं कहना। ऐसे में आगे की कार्यवाही कानून के अनुसार की जाएगी।” सोनीपत की अदालत ने यह आदेश हरियाणा सरकार द्वारा दायर किए गए एक केस में दिया गया है।

हरियाणा सरकार ने हरियाणा राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकार (HSDMA) के माध्यम से यह केस दायर किया है। हरियाणा सरकार ने कहा है कि केजरीवाल ने यमुना में जहर मिलाने को लेकर झूठे दावे किए और लोगों को भ्रम में डाला। इसके बाद सोनीपत के कुछ गाँव वालों ने भी इस पर प्रश्न उठाए।

जब गाँव वालों से प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने केजरीवाल के उस वीडियो का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि हरियाणा सरकार यमुना में जहर मिलाकर दिल्ली में भेज रही है। केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि हरियाणा की भाजपा सरकार दिल्ली के निवासियों का नरसंहार करना चाहती थी और इसे दिल्ली जल बोर्ड ने रोक लिया।

उनके इस बयान पर सीएम नायब सिंह सैनी ने मानहानि का मुकदमा करने का ऐलान किया था। इस मामले में चुनाव आयोग ने भी केजरीवाल से जवाब माँगा था कि आखिर उन्होंने जहर मिलाने की बात किस आधार पर कही थी। केजरीवाल ने अपने जवाब में दावा किया कि उन्होंने यह बयान ‘जनहित’ में दिया था।

केजरीवाल ने दावा किया कि हरियाणा से आने वाले पानी में अमोनिया की मात्रा ज्यादा थी, ऐसे में उन्होंने लोगों को चेताने को यह बयान दिया था। उनके इस जवाब से चुनाव आयोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि चुनाव आयोग ने केजरीवाल से कहा है कि वह ‘जहर मिलाने’ का सबूत पेश करें।

यमुना के पानी में जहर… दावे पर घिरने के बाद फर्जीवाड़े पर उतरी AAP, केजरीवाल ने एडिटेड वीडियो किया शेयर: हरियाणा के CM ने खुद पीकर दी ‘शुद्धता’ की गारंटी, देखिए Video

दिल्ली आने वाली पानी में जहर मिलाने के आरोप के बाद हरियाणा की एक अदालत ने दिल्ली के पूर्व सीएम और आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल को नोटिस भेजा है। केजरीवाल ने दावा किया था कि दिल्ली जल बोर्ड (DJB) ने ज़हर का पता लगाकर पानी को दिल्ली पहुँचने से रोक दिया। हालाँकि, DJB ने इससे इनकार किया है। इससे पहले चुनाव आयोग ने भी केजरीवाल को नोटिस दिया था। उन्होंने अब सीएम सैनी को लेकर झूठ फैलाया है।

हालाँकि, अरविंद केजरीवाल अपने बेबुनियाद आरोप से पीछे नहीं हट रहे हैं। वहीं, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने केजरीवाल के आरोपों को नकारते हुए दिल्ली में यमुना का पानी पीते हुए वीडियो जारी किया था। अब यमुना की पानी का घूँट लेते हुए सीएम सैनी का एक एडिटेड वीडियो पोस्ट करते हुए केजरीवाल ने दावा किया है कि सीएम ने पानी पीने का नाटक किया था। वास्तव में उन्होंने पानी नहीं पी थी।

अरविंद केजरीवाल का दावा है कि सीएम सैनी ने पानी पीने का नाटक किया और फिर मुँह में लिए पानी को वापस यमुना में थूक दिया। केजरीवाल ने सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी जी ने यमुना का पानी पीने का ढोंग किया… और फिर वही पानी वापस यमुना में थूक दिया।”

अरविंद केजरीवाल ने आगे दावा किया, “जब मैंने कहा कि अमोनिया की मिलावट के कारण यमुना का पानी दिल्लीवालों की जान के लिए ख़तरा हो सकता है तो इन्होंने मुझ पर FIR करने की धमकी दी। जिस ज़हरीले पानी को ये खुद नहीं पी सकते, वही पानी दिल्ली की जनता को पिलाना चाहते हैं। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूँगा।

हालाँकि, केजरीवाल ने इस वीडियो का एक छोटा सा हिस्सा एडिट करके डाला है। यह वीडियो केजरीवाल द्वारा पोस्ट की गई वीडियो से चार गुना अधिक लंबी है। ANI द्वारा जारी ऑरिजिनल वीडियो में देखा जा सकता है कि सीएम सैनी ने नदी से पानी का एक घूँट लिया और फिर उसे थूक दिया। संभवत: वे अपना मुँह धो रहे थे। इसके बाद उन्होंने एक अंजुली पानी मुँह में लेकर उसे पी लिया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सीएम सैनी दिल्ली के पल्ला गाँव में यमुना नदी के किनारे गए था। वहाँ उन्होंने अरविंद केजरीवाल के पानी में जहर मिलाने के दावे को गलत साबित करने के लिए नदी का पानी पीया। अरविंद केजरीवाल के इस दावे के बाद उनके खिलाफ हरियाणा के सोनीपत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई गई है। कोर्ट ने केजरीवाल को 17 फरवरी को पेश होने के लिए कहा है।

उधर, चुनाव आयोग ने भी अरविंद केजरीवाल से नोटिस भेजकर इस बुधवार (29 जनवरी 2025) की शाम 8 बजे तक जवाब माँगा था। केजरीवाल के बयान पर आयोग ने कहा था कि इस तरह के आरोपों से क्षेत्रीय समूहों के बीच दुश्मनी, पड़ोसी राज्यों के निवासियों के बीच तनाव और पानी की कमी को लेकर कानून-व्यवस्था की समस्याएँ हो सकती हैं।

नोटिस में विभिन्न निर्णयों और कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया गया था। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि राष्ट्रीय एकता और सार्वजनिक सद्भाव के खिलाफ भ्रामक बयान देने के लिए केजरीवाल को तीन साल तक की जेल हो सकती है। वहीं, अपने जवाब में केजरीवाल ने कहा कि हाल के दिनों में बीजेपी शासित हरियाणा से मिल रहा पानी अत्यधिक दूषित और जहरीला रहा है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

महाकुंभ में 30 श्रद्धालुओं की मौत पर CM योगी हुए भावुक, न्यायिक जाँच के साथ किया ₹25-25 लाख की मदद का ऐलान: मेला क्षेत्र में VVIP और वाहनों के प्रवेश पर रोक, 5 विशेष सचिव करेंगे देखरेख

प्रयागराज महाकुंभ में मंगलवार-बुधवार (28-29 जनवरी) की रात हादसे में 30 लोगों की मौत हो गई है। वहीं, 60 लोग घायल हैं। प्रशासन ने इसकी जानकारी दी है। इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गला रूंध गया। उन्होंने मृतकों के परिजनों को 25-25 लाख रुपए के मुआवजे की घोषणा की। साथ ही न्यायिक जाँच के आदेश भी दिए। हादसे के बाद उन्होंने कुंभ क्षेत्र में बदलाव के जरूरी निर्देश भी दिए हैं।

इस घटना को सबक बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “सरकार ने फैसला लिया है कि घटना की न्यायिक जाँच कराई जाएगी। इसके लिए हमने जस्टिस हर्ष कुमार की अध्यक्षता में पूर्व DG वीके गुप्ता और रिटायर्ड IAS डीके सिंह वाली 3 सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है।” उन्होंने कहा कि मेला क्षेत्र में जितनी भी व्यवस्थाएँ की जा सकती हैं, सबको तैनात किया गया है।

हादसे के बाद पूरे कुंभ मेला क्षेत्र को ‘नो-व्हीकल जोन’ घोषित किया गया है। क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वाहन को अंदर जाने की अनुमति नहीं होगी। सारे VVIP पास भी रद्द कर दिए गए हैं। किसी तरह के पास के जरिए वाहन को कुंभ क्षेत्र में प्रवेश नहीं मिलेगा। इसके अलावा, सभी रास्तों को वन-वे बना दिया गया है। यानी किसी रास्ते पर श्रद्धालुओं के आने और जाने, दोनों काम नहीं होगा। इनमें से सिर्फ एक होगा।

इसके अलावा, बाहर से आने वाले वाहनों को प्रयागराज की सीमा पर ही रोका जाएगा। उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं होगी। चार फरवरी तक शहर में चार-पहिया वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। VVIP स्नान और एस्कॉर्ट की गाड़ियों के काफिले पर रोक लगाई गई है। सिर्फ बाइक, एंबुलेंस, नगर निगम और फायर की गाड़ियाँ ही अंदर चलेंगी। सड़कों पर रेहड़ी-पटरी लगाने वालों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जाएगा, ताकि जाम आदि ना लगे।

भीड़ को देखते हुए सीएम ने परिवहन निगम की अतिरिक्त बसें चलाने, लोगों को ठहरने और उनके भोजन-पानी की व्यवस्था करने के भी निर्देश दिए हैं। साथ ही बिजली आपूर्ति भी सुनिश्चित करने को कहा है। इसके साथ ही भीड़ वाली जगहों पर पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। अयोध्या और वाराणसी में भी व्यवस्था को सुचारू और भीड़ को नियंत्रित करने का आदेश दिया गया।

योगी आदित्यनाथ ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से महाकुंभ मेला की व्यवस्थाओं की समीक्षा करने को कहा है। इसके साथ ही उन्होंने कुंभ 2019 के दौरान प्रयागराज के संभागीय आयुक्त रहे आशीष गोयल और एडीए के पूर्व उपाध्यक्ष भानु गोस्वामी को व्यवस्थाओं को और मजबूत करने के लिए तैनाती का आदेश दिया है। संचालन की देखरेख के लिए पाँच विशेष सचिव स्तर के अधिकारियों को नियुक्त किया जा रहा है। ये सभी अधिकारी 12 फरवरी तक कुंभ क्षेत्र में रहेंगे।

भगदड़ की घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी ने प्रयागराज और उसके आसपास के जिलों- कौशांबी, वाराणसी, अयोध्या, मिर्जापुर, बस्ती, जौनपुर, चित्रकूट, बांदा, अंबेडकरनगर, प्रतापगढ़, संत कबीर नगर, भदोही, रायबरेली, गोरखपुर सहित कई जिलों के DM और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों एवं अन्य अधिकारियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देर रात को बात की।

सीएम योगी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर 30 जनवरी को प्रस्तावित दिल्ली की सभा को भी टाल दिया है और वे कुंंभ की व्यवस्था के साथ-साथ अयोध्या एवं वाराणसी में व्यवस्था की निगरानी कर रहे हैं। माना जा रहा है कि दिल्ली में उनकी 30 जनवरी वाली रैली को 31 जनवरी को आयोजित किया जा सकता है।