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राजस्थान के ‘सबसे जाँबाज’ SHO विष्णुदत्त विश्नोई की आत्महत्या: एथलीट से कॉन्ग्रेस MLA बनी कृष्णा पूनिया पर उठी उँगली

राजस्थान में एक एसएचओ की हत्या के बाद सियासत गरमा गई है। आरोप है कि कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के दबाव में आकर राजगढ़ पुलिस थाने के एसएचओ विष्णुदत्त विश्नोई ने आत्महत्या कर ली। वे एक हत्याकांड की जाँच कर रहे थे, जिस कारण उन्हें रात के 3 बजे थाने आना पड़ा था। इसके बाद वो थाने स्थित क्वार्टर के कमरे में सोने चले गए थे। शनिवार (मई 23, 2020) सुबह 9 बजे भी वो बाहर नहीं निकले तो शक हुआ।

उनके कुक कन्हैयालाल ने इसकी सूचना थाने को दी। जब दरवाजा तोड़ा गया तो विश्नोई फंदे से लटके मिले। कमरे में दो सुसाइड नोट मिले। एक एसपी को सम्बोधित था तो दूसरा माता-पिता को। सुसाइड नोट में विश्नोई ने लिखा है कि उनके चारों तरफ इतना दबाव बना दिया गया था कि वो झेल नहीं सके। उन्होंने ख़ुद के तनाव में होने की बात कही। वकील को मैसेज भेज कर उन्होंने लिखा कि उन्हें गन्दी राजनीति के भँवर में फँसा दिया गया है।

इसी मैसेज में उन्होंने बताया था कि वे रिटायर होना चाहते हैं। उन्होंने लिखा था कि थाना भवन के निर्माण में उन पर 3.5 करोड़ रुपए का गबन का आरोप मढ़ा जा रहा है। जैसे ही ये चीजें वायरल हुईं, थाने के बाहर नेताओं और आमजनों का जमघट लग गया। नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ और बसपा के पूर्व विधायक मनोज नांग्याल अलग-अलग स्थानों पर धरने पर बैठ गए। सीबीआई जाँच की माँग करते हुए काफ़ी देर तक पुलिस को शव भी नहीं उठाने दिया गया।

सांसद राहुल कस्वां सहित कई अन्य नेताओं ने आरोप लगाया है कि एक ईमानदार छवि का अधिकारी इस तरह से आत्महत्या कर ले तो उसके पीछे ज़रूर राजनितिक दबाव रहा होगा। वहीं कृष्णा पूनिया ने कहा है कि विश्नोई से 5-7 बार बैठक में ही उनकी मुलाकात हुई थी। विधायक ने बताया कि उन्होंने विश्नोई के बारे में सुन रखा था, लेकिन कभी अकेले में मुलाक़ात नहीं हुई।

विश्नोई के मित्र वकील गोवर्धन सिंह ने कहा कि अगर वे मैसेज मिलने के तुरंत बाद राजगढ़ चले गए होते तो शायद ये घटना नहीं होती। उन्होंने कहा कि वे ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएँगे। उन्होंने कहा कि ये दिखने में भले आत्महत्या लगे, लेकिन ये सोच-समझ कर की गई हत्या है। इसकी सच्चाई सीबीआई जाँच के बिना सामने नहीं आएगी। 21 साल से सेवारत विश्नोई वरिष्ठ अधिकारियों के भी चहेते थे।

विश्नोई के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि वो अपने थाने के कुछ पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किए जाने से नाराज़ थे। आरोप है कि विधायक पूनिया ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बात कर ऐसा कराया था। अब तक 13 थानों में रह चुके विश्नोई की आत्महत्या के मामले में लॉरेंस विश्नोई गैंग का नाम भी सामने आ रहा है, क्योंकि वो जिस मर्डर केस की जाँच कर रहे थे, उसके तार इसी गैंग से जुड़े थे।

वहीं डीजीपी भूपेंद्र सिंह ने कहा है कि उनकी नज़र में विष्णुदत्त राज्य के शीर्ष 10 एसएचओ में शामिल थे। बकौल डीजीपी, पुलिसकर्मियों के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आपराधिक दबाव आम बात है, जो भर्ती होते ही शुरू हो जाता है। उन्होंने कहा कि सभी क्षेत्रों के वरिष्ठ अधिकारी सिफारिश करते थे कि अपराध को नियंत्रित करने के लिए उनके इलाक़े में विष्णुदत्त की पोस्टिंग की जाए।

चूरू के राजगढ़ में भी अपराध नियंत्रण के लिए ही विष्णुदत्त की पोस्टिंग की गई थी। डीजीपी भूपेंद्र सिंह का कहना है कि वहाँ उन्होंने अच्छा काम किया था, लेकिन आत्महत्या के पहले कैसी परिस्थितियाँ बनीं, ये जाँच का विषय है। उन्होंने कहा कि विष्णुदत्त विश्नोई ऐसे अधिकारियों में से थे, जो हमेशा ईमानदारी से काम करते थे। उन्होंने कहा कि किसी भी अनुसन्धान के दौरान दोनों पक्ष दबाव बनाने के लिए तिकड़म आजमाते हैं और पुलिस को निष्पक्ष कार्रवाई करने की चुनौती रहती है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट

राजगढ़ में इस घटना के बाद चौक-चौराहे पर ड्यूटी करते पुलिसकर्मी भी रोते हुए नज़र आए। उन्होंने कहा कि अब पुलिस नौकरी करना मुश्किल हो गया है, क्योंकि वर्दी पर राजनीति हावी हो रही है। विश्नोई को दबंग और कर्मठ अधिकारी के रूप में सबने याद किया। लोगों की माँग है कि उनके सुसाइड नोट को सार्वजनिक किया जाए और उसके आधार पर ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए। वे अपने पीछे एक बेटे और एक बेटी को छोड़ गए हैं। दोनों ही छात्र हैं।

विष्णुदत्त विश्नोई, राजस्थान
राजस्थान में पुलिस इंस्पेक्टर विष्णुदत्त विश्नोई के सुसाइड पर उठे सवाल

विष्णुदत्त रोज अपने माता-पिता से बातचीत करने के बाद ही ड्यूटी के लिए निकलते थे। वे ख़ुद अकेले रहते थे और पत्नी एवं दोनों बच्चों को उन्होंने पढ़ाई के लिए बीकानेर छोड़ रखा था। एक कॉन्स्टेबल ने बताया कि वो शुक्रवार को तनाव में लग रहे थे। एक अन्य पुलिसकर्मी से पूछने पर पता चला था कि वे मर्डर केस को लेकर तनाव में हैं। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि विष्णुदत्त विश्नोई ऐसे अधिकारी थे जिनकी पोस्टिंग पब्लिक डिमांड पर होती थी। जब उनका तबादला होता था तो वहॉं के लोग इसके विरोध में आंदोलन करने लगते थे।

सैनिटरी पैड्स पर आदित्य ठाकरे की फोटो, कोरोना संकट में शिवसेना के प्रचार का तरीका: MNS ने जताया विरोध

महाराष्ट्र में शिवसेना के कार्यकर्ताओं द्वारा आदित्य ठाकरे की तस्वीर वाली सैनिटरी पैड्स वितरित किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया है। सैनिटरी पैड्स के पैकेट्स पर राज्य के पर्यावरण एवं पर्यटन मंत्री उद्धव ठाकरे की तस्वीर होने के कारण मनसे ने शिवसेना पर जम कर निशाना साधा। आदित्य, उद्धव ठाकरे के बेटे हैं और महाराष्ट्र सरकार में ख़ासी दखल रखते हैं। वो पहले भी विपक्ष के निशाने पर रहे हैं।

गुरुवार (मई 21, 2020) को वरिष्ठ मनसे नेता संदीप देशपांडे ने कहा कि ओल्ड मुंबई के कोलाबा में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने 500 सैनिटरी नैपकिन्स बाँटे। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं के बीच वितरित किए गए इन सभी सैनिटरी नैपकिन्स के पैकेट्स पर ‘युवा सेना’ के अध्यक्ष आदित्य ठाकरे की तस्वीर थी। मुंबई में कोरोना वायरस लॉकडाउन के बीच किए जा रहे राहत-कार्य के दौरान ऐसा किया गया

बता दें कि महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के अब तक 47,190 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 32,209 मामले अभी भी सक्रिय हैं। कुल 13,404 लोग ठीक हो चुके हैं, वहीं 1577 ने इस ख़तरनाक संक्रमण के कारण अपनी जान गँवाई है। महाराष्ट्र में कुल कोरोना केसेज में से 61% अकेले मुंबई से आए हैं। महानगर में कोरोना मरीजों की संख्या 29,000 के पार हो गई है। मरने वालों में भी 60% राजधानी से ही हैं।

उधर आदित्य ठाकरे ने कहा है कि टूरिज्म के मामले में उनकी सरकार महाराष्ट्र को ग्लोबल स्टेज पर ले जाने के लिए काम कर रही है। उन्होंने दावा किया कि होटल इंडस्ट्री के लिए फ़ैसले लेने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य होगा। इसके लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया गया है। उन्होंने दावा किया कि सरकार विभिन्न प्रयास कर के ये सुनिश्चित करना चाहती है कि प्रत्येक पर्यटक राज्य के किसी भी शहर में कम से कम 36 घंटे रुकें।

वहीं सैनिटरी नैपकिन्स पर आदित्य के फोटो को लेकर शिवसेना की तरफ से कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। आदित्य ठाकरे पर  CAA, NRC विरोधी छात्र परिषद लिखा हुआ है। और नीचे पोस्टर में उमर खालिद, ऋचा सिंह, AMUSU अध्यक्ष सलमान इम्तियाज, जावेद अख्तर, जामिया छात्र नेता हम्मादुररहमान, सादिया शेख जैसे लोगों के साथ मंच साझा करने का आरोप भी लग चुका है। पत्रकार अंजना ओम कश्यप ने उन्हें ‘पप्पू’ कहा था।

‘दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगे’ को भड़काने वाली ‘पिंजरा तोड़’ की एक्टिविस्ट निकली ‘द वायर’ और ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ की कॉलम‌निस्‍ट‌

कल दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नताशा नरवाल और देवांगना कलिता नाम की दो महिलाओं को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे के मामले में गिरफ्तार किया था। दोनों महिलाएँ लेफ्ट एक्टिविस्ट ग्रुप पिंजरा तोड़ की सदस्य हैं।

पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने 22 फरवरी की शाम को नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के लिए स्थानीय निवासियों को भड़काया और उन्हें जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर इकट्ठा होने के लिए कहा। जानकारी के अनुसार “22 फरवरी की रात 10 बजे मेट्रो स्टेशन पर सीएए के खिलाफ विरोध करने वाले प्रदर्शनकारी एकत्र हुए। हमने सोचा कि वे सीलमपुर सर्विस लेन पर पुरानी साइट पर इकट्ठा होंगे, जो लगभग एक किलोमीटर दूर है।”

अब यह पता चला है कि दिल्ली के दंगों को भड़काने के लिए गिरफ्तार की गई दोनों महिलाएँ लेफ्ट ग्रुप पिंजरा तोड़ की संस्थापक सदस्य थीं जिसे 2015 में स्थापित किया गया था। पिंजरा तोड़ को मुख्य रूप से दिल्ली के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हॉस्टल कर्फ्यू के विरोध में शुरू किया गया था, हालाँकि, इस संगठन का मक़सद असल में अपनी लेफ्टिस्ट विचारधारा को आगे बढ़ाना है।

पिंजरा तोड़ के सह-संस्थापक “नताशा नरवाल” जिसे दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों को उकसाने के लिए गिरफ्तार किया गया है, वो पहले कई वामपंथी झुकाव वाले ऑनलाइन पोर्टल्स की कॉलम‌निस्‍ट‌ भी रह चुकी है।

नताशा नरवाल ने वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ के लिए तीन लेख लिखे थे।

नफरत से भरी और हिंदूपोबिया की शिकार, नताशा नरवाल ने फिल्म पैडमैन की रिलीज के दौरान न्यूज़लॉन्ड्री के लिए भी लेख लिखा था।

अपनी नफरत को दिखाते हुए, नताशा नरवाल ने अपने ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ के लेख में पैडमैन के लॉन्च से ठीक पहले एबीवीपी द्वारा आयोजित मैराथन के बारे में लिखा था जिसे अक्षय कुमार ने हरी झंडी दिखाई थी। कथित तौर पर इस मैराथन में भारत सरकार से सैनिटरी पैड पर जीएसटी को हटाने की माँग की गई थी।

अपने लेख में, अपनी अज्ञानता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित करते हुए, नताशा ने लिखा था:

“सशक्तीकरण के लिए आरएसएस से जुड़े संगठन का कदम हिंदू राष्ट्र की अपनी कल्पनाओं के साथ है, जिसमें एक महिला की भूमिका उसके सदस्यों (“बेटों”) के बायोलॉजिकल रिप्रोडूसर तक सीमित हो जाती है; सुरक्षा की आवश्यकता में माताओं / पत्नियों / बहनों तक सीमित; सांस्कृतिक भूमिकाओं में शामिल हैं जो सांस्कृतिक सीमाओं / मतभेदों के मार्कर और रिप्रोडूसर हैं; और उन आकृतियों में मूर्तिमान है जिनकी बहादुरी को आत्म-बलिदान के माध्यम से महसूस किया जाता है। राष्ट्र की इस कल्पना में, महिलाएँ हर दिन अपना बोझ ढोती हैं, विभिन्न प्रकार के नियमों और प्रतिबंधों में बंधी होती हैं जो उन्हें उनकी स्वायत्तता और स्वतंत्रता को शासन में बांधती और पिंजरे में रखती हैं, उसे इन चीज़ों का विरोध करना पड़ता है, और यहाँ तक ​​कि हर दिन खुद से कई समझौते करने पड़ते हैं।”

दिलचस्प बात यह है कि नताशा अपनी दोनों लेख में हिंदुओं और उनकी परंपराओं के प्रति काफी घृणा प्रदर्शित करती हैं, यहाँ तक ​​कि हिंदू समाज में महिलाओं का स्थान को लेकर गलत बयानबाजी और झूठ बोलती है। उसके लेखों से ऐसा लगता है कि वे इस्लाम और मुस्लिम समुदाय में महिलाओं के साथ क्या होता है इस बारे में नहीं जानती है।

दिल्ली पुलिस ने भेजा नोटिस

इससे पहले, दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी के 50 सदस्यों, छात्र संघ के कॉन्ग्रेस के पूर्व पदाधिकारियों, नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया, वामपंथी संगठन पिंजरा तोड़ को दंगाई और आपराधिक षड़यंत्र के साथ उनके कथित संबंधों के लिए नोटिस जारी किया था। गौरतलब है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और 400 से अधिक घायल हो गए थे।

पिछले रिपोर्ट में यह बताया गया था कि पुलिस का कहना ​​है कि पिंजरा तोड़ के कार्यकर्ता 22 फरवरी की शाम सीलमपुर-जाफराबाद इलाके में मौजूद थे और धरना स्थल पर सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को भड़काया कि वे अपने इस विरोध प्रदर्शन में जाफराबाद मेट्रो स्टेशन रोड को ब्लॉक करके और अधिक अधिक प्रभावशाली बना दें। रिपोर्ट के अनुसार, यह वही घटना थी जिसकी वजह से दूसरी तरफ से भी शक्ति प्रदर्शन की बात कही गई थी। जिसके बाद ही दिल्ली में दंगे भड़के थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में, पुलिस अधिकारी ने बताया कि जफराबाद के छोटे धरने से एन्टी सीएए महिला प्रदर्शनकारियों को शिफ़्ट करने के पीछे दो कारण हो सकते हैं। एक शाहीन बाग में धरना समाप्त करने के लिए उच्चतम न्यायालय के आने की आशंका में एक वैकल्पिक विरोध स्थल बनाने का प्रयास और दूसरा अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे में भारत की नकारात्मक छवि बनाने के लिए।

पुलिस को यह भी लगता है कि पिंजरा तोड़ के कार्यकर्ता न केवल प्रदर्शनकारी महिलाओं के साथ एकजुटता व्यक्त करने में शामिल थे, बल्कि विरोध प्रदर्शन को भड़काने और आगे बढ़ाने में भी बढ़-चढ़कर शामिल थे। पुलिस सूत्रों ने यह भी कहा है कि पिजरा तोड़ के इन कार्यकर्ताओं के उस तनावपूर्ण स्थिति में इनकी पहले से भागीदारी को संदेह के रूप में देखा जा रहा है और इस संदर्भ में आगे की जाँच की जा रही है।

द वायर का कॉलम‌निस्‍ट‌ शरजील इमाम

गौरतलब है कि इससे पहले, द वायर के साथ एक अन्य ˈकॉलम‌निस्‍ट, शरजील इमाम द्वारा लोगों को ‘हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों’ के लिए उकसाया गया था। दिल्ली में दंगे भड़काने से पहले शरजील इमाम ने द वायर में अपने जहरीले इस्लामिक कट्टरवाद के बारे में लिखा था। जहाँ उसने द वायर के लिए अपने लेख में जिन्ना की प्रशंसा की थी।

200 कॉन्ग्रेस नेता BJP में शामिल, शिवराज ने कहा- कमलनाथ सरकार ने 15 माह में किए हज़ारों करोड़ के घोटाले

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शनिवार (मई 23, 2020) को लगभग 200 कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने सीएम चौहान की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की, जिनमें कई बड़े नेता भी शामिल हैं। कहा जा रहा है कि इनमें से अधिकतर ग्वालियर राजघराने के वफादार हैं, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के पीछे कॉन्ग्रेस छोड़ कर आए हैं। भाजपा मुख्यालय में सिंधिया समर्थक लगातार पहुँचते रहे हैं।

मध्य प्रदेश में उपचुनाव होना है। ऐसे में पार्टी के नेता अब पदाधिकारियों से नजदीकी बढ़ाने में लग गए हैं। हाल ही में पूर्व मंत्री तुलसी सिलावट ने समर्थकों सहित भाजपा ज्वाइन की थी। अब पूर्व मंत्री डॉक्टर प्रभुराम चौथरी के कई समर्थक भाजपा में शामिल हुए। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने उन्हें सदस्यता दिलाई। भाजपा ने बताया कि कार्यक्रम में सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन किया गया।

वहीं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का आरोप है कि कार्यक्रम में सामाजिक दूरी की धज्जियाँ उड़ाई गईं। भाजपा में शामिल होने वालों में ज्यादातर साँची और रायसेन नगर के थे। डॉक्टर चौधरी के समर्थकों में कई कॉन्ग्रेस कमिटी के सदस्य, जिलाध्यक्ष, पूर्व जिलाध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष, यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और सरपंच सहित कई नेता शामिल थे। सीएम चौहान ने कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं की पार्टी है और सब मिल कर इसे और मजबूत करेंगे। उन्होंने कहा:

“कमलनाथ सरकार के दौरान वल्लभ भवन दलालों का अड्डा बन गया था। कॉन्ग्रेस सरकार का एक ही लक्ष्य था कि किस तरह लूट-खसोट को अंजाम दिया जाए। कमलनाथ सरकार ने मात्र 15 महीने के दौरान ही हजारों करोड़ के घोटाले किए। ग़रीबों के हक़ पर डाका डालने का काम किया गया। सिंधिया जी और उनके समर्थकों ने एक मिसाल पेश की है। उन्होंने जनता की भलाई के लिए ये फ़ैसला लिया। डॉक्टर चौधरी ने प्रदेश को बचाने के लिए त्याग का अनुपम उदाहरण पेश किया है। उन्होंने मंत्रीपद त्याग कर सत्य का साथ दिया है।”

सीएम चौहान ने कहा कि मध्य प्रदेश बड़े लक्ष्य के लिए परिवर्तित हुआ है और सब वैसे ही मिल कर काम करेंगे, जैसे दूध में शक्कर मिल जाता है। प्रदेश अध्यक्ष वीडी गुप्ता ने कार्यकर्ताओं को साँची विजय अभियान में जुट जाने का आग्रह किया और कहा कि भाजपा में हर एक व्यक्ति कार्यकर्ता होता है, चाहे वो मुख्यमंत्री हो या प्रदेश अध्यक्ष। उन्होंने कॉन्ग्रेस के आरोप-प्रत्यारोप का मुखरता से जवाब देने की अपील की।

वहीं इस कार्याक्रम से भड़के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सवाल किया कि क्या शारीरिक दूरी के नियम सिर्फ़ आमजनों के लिए हैं? उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि क्या आपकी पार्टी के लिए ये नियम-क़ानून लागू नहीं होते? उन्होंने आरोप लगाया कि भीड़भाड़ वाले इस कार्यक्रम में सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन नहीं किया गया। उन्होंने साथ ही दोषियों पर कार्रवाई की माँग की। उन्होंने आरोप लगाया कि तय संख्या से अधिक लोग जुटे थे।

ईद में चाँद देखने के लिए न हों इकट्ठा: SA मुस्लिम परिषद ने किया आग्रह, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लगाया था प्रतिबंध

दक्षिण अफ्रीका की मुस्लिम न्यायिक परिषद (MJCSA) ने यह कहते हुए मुस्लिम समुदाय को पारंपरिक सभाओं और समारोहों में शामिल होने के लिए सचेत किया है कि अगर इस ईद में दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जाएगा तो संभावित रूप से यह महामारी दोगुनी गति से फैल सकती है।

परिषद ने कहा कि इस महामारी के चलते समुदाय के सदस्यों को खुले स्थानों पर नमाज पढ़ने के लिए मिलना और परिवार-दोस्तों के साथ कब्रिस्तान की यात्रा जैसी सामान्य प्रथा को त्यागना होगा।

बयान में कहा गया है, “ईद संभावित रूप से एक सुपर-स्प्रेडिंग इवेंट बन सकता है, जिसके परिणामस्वरूप कई और लोगों की जानें जा सकती है। ऐसे में अगर लोग लॉकडाउन नियमों की अवहेलना करते हैं और एक-दूसरे के घर जाना शुरू कर दें तो यह अपना प्रभाव खो देगा। इसलिए कृपया शारीरिक रूप से एक साथ रहने से बचें क्योंकि यह आपके और आपके परिवार को जोखिम में डालता है।”

रिपोर्टों के अनुसार, इस देश में 27 मार्च से लॉकडाउन है। दक्षिण-अफ्रीका के राष्ट्रपति ने अंतिम महीने में लॉकडाउन के पाँचवें चरण के योजना की घोषणा की थी, जिसमें कुछ छूट शामिल थी।

बता दें कि रमज़ान के अंत और अगले दिन ईद के आगमन का संकेत देने तथा चंद्रमा को देखने के लिए दक्षिण अफ्रीका में मुस्लिम बड़ी संख्या में समुद्र तट पर इकट्ठा होते हैं। अब एमजेसीएसए ने दूसरी बार परंपरा शुरू होने के बाद लोगों को दूरी बनाए रखने और घर में रहने का आदेश दिया है। पहली बार उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रतिबंधित किया गया था।

कथित तौर पर, केप टाउन कोरोनो वायरस के प्रकोप का केंद्र बना हुआ है। एमजेसीएसए ने कहा, “पश्चिमी केप इस वक़्त संक्रमण के चरम पर है, जिसमें कोविड-19 मामलों और मौतों की संख्या सबसे अधिक है और कुछ अस्पतालों में गंभीर रूप से बीमार कोविड-19 मामलों के तेजी से भरने की खबरें भी हैं। हमने यहाँ अंतरराष्ट्रीय आँकड़ो की तुलना में लोगों को मरते हुए देखा है।”

इसमें आगे कहते हुए इसीलिए एमजेसीएसए सभी से अनुरोध करता है कि समुदाय को प्रथागत चाँद दिखने वाले स्थानों पर इकट्ठा नहीं होना चाहिए। वो सलाह देते हैं कि सारे परिवार ईद के दिन घर पर ही रहें और अपने रिश्तेदारों से मिलने न जाएँ। ”

दक्षिण अफ्रीका में मुस्लिम समुदाय ईद के दिन लोगों को से कब्रिस्तान से दूर रहने का आग्रह करते रहे हैं। साथ ही लोगों से यह भी आग्रह किया गया है कि वे दोपहर और रात के खाने के लिए सामाजिक समारोहों में न शामिल हों और एक-दूसरे को दूर से बधाई देने का सुझाव दें।

रिपोर्टों के अनुसार, सभी धर्मों के कई धार्मिक नेताओं ने गुरुवार (21मई,20) को सिरिल रामाफोसा से मुलाकात की और उनसे सख्त दिशा-निर्देशों के साथ धार्मिक स्थानों को खोलने का आग्रह किया। इस मामले में अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

‘CM योगी को बम ब्लास्ट में मार डाला जाएगा’ – धमकी देने वाला कामरान धराया, मुंबई में हुई गिरफ्तारी

महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धमकी देने वाले शख्स को गिरफ़्तार कर लिया है। 25 वर्षीय कामरान अमीन ख़ान ने सीएम योगी आदित्यनाथ को जान से मारने की धमकी देने की बात स्वीकार कर ली है। तकनीकी और ग्राउंड इंटेलिजेंस की मदद से कामरान को ईस्टर्न मुंबई स्थित चूनाभट्टी क्षेत्र के म्हाडा कॉलोनी से गिरफ़्तार किया गया। उसने यूपी सोशल मीडिया डेस्क को व्हाट्सप्प कर के सीएम योगी को जान से मार डालने की धमकी दी थी।

उसने शुक्रवार को एक मोबाइल फोन के जरिए ये हरकत की थी। उसने कहा था कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक बम ब्लास्ट में मार डाला जाएगा। इसके बाद लखनऊ के गोमती नगर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज किया गया था और साथ ही यूपी स्पेशल टास्क फोर्स ने इस सम्बन्ध में जाँच शुरू कर दी थी। महाराष्ट्र एटीएस के कालाचौकी यूनिट को यूपीए एसटीएफ से जो जानकारी मिली, उस आधार पर कार्रवाई की गई

डंप डेटा और ह्यूमन इंटेलिजेंस की मदद से आरोपित के लोकेशन को ट्रेस किया गया। उसने धमकी देने के बाद अपना मोबाइल फोन स्विच ऑफ कर लिया था लेकिन जैसे ही उसने इसे ऑन किया, पुलिस को भनक लग गई। उसे गिरफ्तार कर यूपी एसटीएफ को सौंप दिया गया है। कामरान को रविवार (मई 24, 2020) को कोर्ट में पेश किया जाएगा। एसटीएफ आगे की जाँच के ट्रांजिट रिमांड की माँग करेगी।

कामरान साउथ मुंबई के नल बाजार का निवासी है। इसके बाद वो चूनाभट्टी में शिफ्ट हो गया था, जहाँ उसके घर में रिपेयर का काम चल रहा था। इससे पहले वो साउथ मुंबई के ज़ावेरी बाजार में बतौर सिक्योरिटी गार्ड काम कर चुका है। 2017 में स्पाइन सर्जरी होने के बाद उसने कोई जॉब नहीं की। एटीएस अधिकारियों ने बताया है कि कामरान के पिता एक टैक्सी ड्राइवर थे, जिनकी मौत 2 महीने पहले हुई थी।

कामरान की माँ के अलावा उसके घर में एक भाई और एक बहन है। वो ड्रग एडिक्ट भी था। उसने सीएम योगी को मुस्लिम समुदाय का दुश्मन बताते हुए जान से मारने की धमकी दी थी। यूपी पुलिस के 112 (Uttar Pradesh Police Emergency Management System) मुख्यालय में गुरुवार की देर रात क़रीब 12:30 बजे एक व्हाट्सप्प मेसेज आया था। सोशल मीडिया डेस्क के नंबर 7570000100 पर ये धमकी भरा मैसेज भेजा गया था। 10 मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज कर ली गई थी।

नाटक कर रहे हैं राहुल गाँधी, मजदूरों की दुर्दशा के लिए कॉन्ग्रेस जिम्मेदार: मायावती

यूपी सरकार से बसों का किराया माँगने पर राजस्थान सरकार को निशाने पर लेने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने राहुल गाँधी की एक वीडियो पर एक बार फिर कॉन्ग्रेस को अपने निशाने पर लिया है। इतना ही नहीं राहुल गाँधी के वीडियो को नाटक करार देते हुए मायावती ने प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा के लिए कॉन्ग्रेस को ही कसूरवार ठहराया है।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए ट्वीट किया और लिखा, “आज पूरे देश में कोरोना लॉकडाउन के कारण करोड़ों प्रवासी मजदूरों की जो दुर्दशा दिख रही है। उसकी असली कसूरवार कॉन्ग्रेस है, क्योंकि आजादी के बाद इनके लम्बे शासनकाल के दौरान अगर रोजी-रोटी की सही व्यवस्था गाँव/शहरों में की होती तो इन्हें दूसरे राज्यों में क्यों पलायन करना पड़ता?”

मायावती ने एक दूसरे ट्वीट में राहुल गाँधी को अपने निशाने पर लिया और लिखा, “वैसे ही वर्तमान में कॉन्ग्रेसी नेता द्वारा लॉकडाउन त्रासदी के शिकार कुछ मजदूरों के दुःख-दर्द बाँटने सम्बंधी जो वीडियो दिखाया जा रहा है। वह हमदर्दी वाला कम व नाटक ज्यादा लगता है। कॉन्ग्रेस अगर यह बताती कि उसने उनसे मिलते समय कितने लोगों की वास्तविक मदद की है तो यह बेहतर होता।”

वहीं राहुल गाँधी की मजदूरों के साथ डॉक्यूमेंट्री पर बीजेपी ने भी पलटवार किया है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि राहुल गाँधी सॉल्यूशन नहीं पॉल्यूशन कर रहे हैं।

दरअसल राहुल गाँधी ने हाल ही में प्रवासी मजदूरों से दिल्ली के सुखदेव विहार में मुलाकात की थी। इस दौरान राहुल ने मजदूरों से उनका हाल-चाल लिया था। इसके बाद मुलाकात की एक वीडियो को राहुल गाँधी ने शनिवार(23 मई, 2020) को सोशल मीडिया पर शेयर किया।

आपको बता दें कि इससे पहले बीते शुक्रवार(22 मई, 2020) को बसपा सुप्रीमो मायावती ने कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान सरकार को अपने निशाने पर लिया था और ट्वीट करते हुए लिखा था, “राजस्थान की कॉन्ग्रेसी सरकार द्वारा कोटा से करीब 12000 युवा-युवतियों को वापस उनके घर भेजने पर हुए खर्च के रूप में यूपी सरकार से 36.36 लाख रुपए और देने की जो माँग की है, वह उसकी कंगाली व अमानवीयता को प्रदर्शित करता है। दो पड़ोसी राज्यों के बीच ऐसी घिनौनी राजनीति अति-दुखद है।”

महिलावादी संगठन ‘पिंजरा तोड़’ की 2 कार्यकर्ता गिरफ्तार: ‘दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगों’ में था हाथ

दिल्ली पुलिस ने महिलावादी संगठन ‘पिंजरा तोड़’ की दो महिला कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया है। उन दोनों का नाम नताशा और देवांगना है। अभी तक उनके बारे में अधिक सूचना नहीं मिल पाई है। कहा गया है कि इन दोनों का दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को भड़काने में हाथ था। पत्रकार राजशेखर झा ने इस सम्बन्ध में ट्वीट कर जानकारी दी। ‘पिंजरा तोड़’ पहले भी इन कारणों से बदनाम रहा है।

बता दें कि कुछ प्रबुद्ध सामाजिक वर्ग के लोगों और ‘पिंजरा तोड़’ जैसे कथित सामाजिक संगठनों के कारण दिल्ली यमुना के आसपास रहने वाले लोग ख़ासी परेशानी में थे। यहाँ के सभी स्थानीय लोग पीड़ित और दुःखी महसूस कर रहे थे। चारों तरफ़ भगदड़ का माहौल था। ये संगठन और कथित प्रबुद्ध जन प्रतिदिन हिंसा भड़काने के काम में लगे रहते हैं और उन्होंने आज जाफराबाद मेन रोड को ही जाम कर दिया था। इससे राहगीरों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।

दरियागंज दिल्ली गेट पर इसी ‘पिंजरा तोड़’ के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने पुलिस के साथ झड़प की थी लेकिन इनमें से किसी एक को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया था। वो सभी हिंसक हरकतें कर के भाग खड़े हुए थे। फँस गए स्थानीय लोग। स्थानीय लोगों में से कई आज भी पुलिस केस और अदालती कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं। करनी उनकी और भुगतना हमें पड़ रहा है।

थम गया रा’फेल’ का राग, नहीं चला ‘न्याय’ का लालच: जब बिल में घुसे ‘इंडिया शाइनिंग’ का तंज कसने वाले

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को दोबारा ऐतिहासिक जीत दर्ज किए 1 साल हो गए और इसके साथ ही जिस तरह से भारतीय राजनीति में बदलाव का जो दौर 2014 में पहली मोदी सरकार के साथ शुरू हुआ था, उस पर जनता ने दोबारा प्रचंड बहुमत से 2019 में मुहर लगा दी। 2019 में भाजपा की सीटों की संख्या में 2014 के मुकाबले वृद्धि हुई और वोट शेयर में भी बड़ा उछाल आया। जिस राजनीतिक दल को कभी अछूत माना जाता था, उसके साथ दर्जनों पार्टियाँ जुड़ीं।

इसके साथ ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रूप में एक ऐसा रणनीतिकार मिला, जिसने वाजपेयी के दौर में हुई ग़लती को समझते और परखते हुए क़दम बढ़ाए। सत्ता का दोबारा शुभारम्भ हुआ और शाह ने केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में शपथ ली। उसके बाद जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने से लेकर सीएए लाने तक जो भी हुआ, उसे पूरे देश ने देखा। सरदार पटेल के बाद शाह शायद सबसे ज्यादा कड़े फ़ैसले लेने वाले गृहमंत्री के रूप में गिने जाने लगे।

2019 में राफेल से लेकर 3 राज्यों की हार तक: क्या थी स्थिति?

सबसे पहले समझते हैं कि आखिर चुनाव से ठीक 2-3 महीने पहले तक की स्थिति क्या थी। कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गाँधी राफेल का राग अलाप रहे थे। प्रियंका गाँधी यूपी की जिम्मेदारी मिलने के बाद पहली बार किसी चुनावी संग्राम में बतौर पार्टी नेता हिस्सा ले रही थीं। वो अलग बात है कि मतगणना के बाद अमेठी का वो किला भी उजड़ गया, जहाँ से राजीव गाँधी ने लगातार 4 बार और उनके पुत्र राहुल ने लगातार 3 बार जीत दर्ज की थी।

2019 में राहुल गाँधी अपने हर भाषण में मोदी सरकार को घेरने के लिए राफेल सौदे का मुद्दा उछाल रहे थे। सोचिए, अगर नवंबर 2019 की जगह चुनावों से पहले ही इस मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिली होती तो नतीजे और भी जोरदार हो सकते थे या नहीं। कॉन्ग्रेस के भीतर राहुल के हारने का डर पहले से था, इसीलिए उन्हें केरल में मुस्लिमों के प्रभाव वाले वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ाया गया। दिग्विजय सिंह वर्षों बाद चुनावी मैदान में भोपाल से उतरे।

वहीं से भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को उतारा, जो इस चुनाव में काफ़ी चर्चा का विषय बनीं। कॉन्ग्रेस के काल में उन पर हुए अत्याचार की कहानियाँ लोगों ने सुनीं और ‘हिन्दू आतंकवाद’ वाला काण्ड लोगों के जेहन में ताज़ा हो गया। यूपीए काल के दौरान गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम ने ‘भगवा आतंकवाद’ की नकली थ्योरी गढ़ी थी। ये चुनाव मोदी सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों के साथ-साथ कई अन्य मुद्दों पर भी लड़ा गया।

2018 के अंत में हुए चुनावों में भाजपा को हार मिली थी। मध्य प्रदेश में पार्टी सरकार नहीं बना पाई। राजस्थान में उसे कॉन्ग्रेस ने पटखनी दे दी। छत्तीसगढ़ में तो एकतरफा हार मिली। विपक्ष के बीच नई ऊर्जा का संचार हुआ था और वो इसे मोदी के ख़िलाफ़ जनमत मान बैठे। आंध्र प्रदेश के तत्कालीन सीएम चंद्रबाबू नायडू को अपना किला बचाना था लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में किंगमेकर बन कर उभरने के चक्कर में वो लगातार ममता और केजरीवाल से मिल रहे थे। दिल्ली में धरने दे रहे थे।

वो अलग बात है कि नायडू चुनाव बाद न घर के रहे और न घाट के। जगन मोहन रेड्डी से पटखनी मिलने के बाद आंध्र की राजनीति में भी लोगों ने अब उन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है। ममता बनर्जी ने कोलकाता में शक्ति प्रदर्शन कर के विपक्षी नेताओं का जुटान कराया था। बंगाल में भाजपा मेहनत कर रही थी क्योंकि उसे पता था कि हिंदी पट्टी में हुए सीटों के नुकसान की भरपाई बंगाल, नार्थ-ईस्ट और दक्षिण से की जा सकती है।

लेकिन, जहाँ तीनों राज्यों में हुए चुनावों ने विपक्ष को ये भरोसा दिलाया कि मोदी-शाह की जोड़ी अपराजेय नहीं है, वहीं भाजपा की संगठनात्मक रणनीति और कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय की तुलना कॉन्ग्रेस कभी नहीं कर पाई। माहौल बनाने के प्रयास में फेसबुक-ट्विटर पर प्रचार अभियान चला रहे विपक्षी नेता ये भूल गए कि सोशल मीडिया में भाजपा मजबूत है ही लेकिन ये बूथ स्तर का कैडर है, जो उसमें हमेशा जान फूँके रहता है।

‘इंडिया शाइनिंग’ वाला डर अभी भी ज़िंदा था, फिर भी लौटी मोदी सरकार

एक डर तो था। भाजपा समर्थकों के बीच 2004 के ‘इंडिया शाइनिंग’ प्रचार अभियान के फेल होने की यादें ताज़ा थीं। जिस चमक-दमक के साथ मोदी सरकार अपनी योजनाओं और कार्यों के लिए गोलबंदी कर रही थी, उससे लोगों के मन में 2004 की यादें ताज़ा हो गईं। कहते हैं, ‘इंडिया शाइनिंग’ के पीछे वाजपेयी के सर्वमान्य चेहरे के साथ-साथ प्रमोद महाजन जैसे नेताओं की रणनीति भी थी, जिससे ये अभियान सबसे अलग प्रतीत होता है।

बावजूद इसके कॉन्ग्रेस ने यूपीए के नेतृत्वकर्ता के रूप में सत्ता में वापसी की थी। कहते हैं कि ‘इंडिया शाइनिंग’ में शहरी लोगों को लुभाने के लिए जान लगा दी गई थी जबकि मोदी सरकार का पूरा जोर कृषकों और ग़रीबों पर था। भाजपा नेता सुधांशु मित्तल कहते हैं कि 2009 का चुनाव प्रचार अभियान आज किसी को याद नहीं, यही बताता है कि परिणाम सुखद न आने के बावजूद ‘इंडिया शाइनिंग’ सफल रहा था।

मित्तल ने प्रमोद महाजन के अंतर्गत काम किया था। वो कहते हैं कि प्रमोद महाजन इससे अंतरराष्ट्रीय निवेश का ध्यान खींचना चाहते थे। वो भाजपा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा दिलाना चाहते थे, जिसमें वो कामयाब रहे। दरअसल, भाजपा ने यही गलती दोहराने की गलती नहीं की। पार्टी ने किसानों और महिलाओं को फोकस में रखा और हर एक रैली में मोदी सरकार के उज्ज्वला, सौभाग्य और आयुष्मान भारत जैसे योजनाओं का जिक्र किया गया।

अमित शाह ने जहाँ उत्तर प्रदेश में फिर से पूरा जोर लगाया, वहीं उत्तर-पूर्वी राज्यों में हुए विकास कार्यों की धमक वहाँ भी सुनाई दी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को घेरा गया। एक तरह से देखा जाए तो भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले 21 सीटों का फायदा हुआ और पश्चिम बंगाल में अकेले 16 सीटों की उछाल आई। यही कारण है कि ममता बनर्जी आज भी भाजपा व मोदी सरकार से तिलमिलाई रहती हैं।

सुरक्षा, हिंदुत्व और विकास: जनता के मन की बात

कुल मिला कर 10 ऐसे राज्य रहे, जहाँ 2019 में सारी की सारी सीटें भाजपा ने झटकीं। अब बात करते हैं कि एक आम आदमी के मन में मोदी सरकार को लेकर क्या बातें चल रही थीं, जब वो 2019 में ईवीएम का बटन दबाने गया था? उसी वर्ष जनवरी में आतंकी हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों का बलिदान हुआ था। उसके बाद जिस तरह से मोदी सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए बालाकोट में एयर स्ट्राइक किया, उससे जनता के मन में मोदी सरकार के प्रति विश्वास का भाव बैठा।

विपक्षी दलों ने इस बार सबूत नहीं माँगे क्योंकि वो पिछली बार ऐसा कर के जनाक्रोश भुगत चुके थे। और भाजपा सरकार ने उरी हमले के बाद भी सर्जिकल स्ट्राइक किया था, इसीलिए लोगों को उन नेताओं की सच्चाई भी पता चल गई, जो इसे चुनावी दाँव बोल कर अपनी नासमझी का परिचय दे रहे थे। कहीं न कहीं पिछले 5 साल में देश के बड़े शहरों में एक भी आतंकी हमले की साजिश सफल न होने की बात ने भी लोगों के भीतर सुरक्षा की भावना पैदा की।

उज्ज्वला योजना से करोड़ों महिलाओं को गैस चूल्हे दिए गए, जो मिट्टी के चूल्हे में धुएँ के बीच खाना बनाने को मजबूर थी। देश के सभी गाँवों में बिजली पहुँची, ये ऐसा काम था जो कई दशकों से पेंडिंग था। जिस तरह से पीएम मोदी ने कई देशों में सभाएँ कर के भारतीय प्रवासी समुदाय के भीतर एकता की भावना पैदा की, उससे उनमें से कई यहाँ वोट डालने आए और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार किया।

वहीं दूसरी तरफ एक पूरा का पूरा गिरोह बैठा हुआ था। स्वरा भास्कर नई-नई साड़ियाँ सिला कर प्रचार कर रही थीं। कन्हैया कुमार को लेकर बड़ा हाइप बनाया गया था। रवीश जैसों ने बेगूसराय जाकर ग्राउंड रिपोर्टिंग की थी। प्रकाश राज तो ख़ुद बेंगलुरु से मैदान में थे। राजदीप और बरखा जैसे पत्रकार स्टूडियो से माहौल बनाने में लगे हुए थे। कुणाल कामरा ट्विटर पर और ध्रुव राठी यूट्यूब पर सक्रिय थे। इस गैंग को लोगों ने फिर से 5 साल रोने को मजबूर कर दिया।

कुल मिला कर देखें तो 2019 में जनता ने ये बता दिया कि वो मोदी के साथ है। देश की सुरक्षा से लेकर महिलाओं की उन्नति के मसले तक, जनता को सरकार के कामकाज इतने पसंद आए कि राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस की मुफ्त में रुपए देने की योजना को भी नकार दिया गया। कर्जमाफी के ब्लंडर को जनता देख चुकी थी। ऐसे में कॉन्ग्रेस ये भूल कर बैठी कि शायद वो राजस्थान और मध्य प्रदेश वाला फॉर्मूला देश में भी अपना ले।

पाकिस्तान के दबाव में अब्दुल्ला और मुफ़्ती ने किया था J&K पंचायत चुनाव का बहिष्कार: राज्यपाल का खुलासा

वर्तमान में गोवा के और पूर्व में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक ने अपने सफल कार्यकाल को याद करते हुए एक बड़ा खुलासा किया है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि पाकिस्तान के दवाब में आकर उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने राज्य में पंचायत के चुनाव कराने से इंकार कर दिया था।

इतना ही नहीं, आतंकवादियों ने चुनावों को लेकर धमकी भी दी थी।

गोवा के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने शनिवार (23 मई, 2020) को अपना बयान जारी करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने कहा था कि हम जम्मू और कश्मीर में पंचायत चुनाव कराएँगे। मैंने प्रोटोकॉल तोड़ा और उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के घर पहुँच गया, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के दबाव में आकर पंचायत चुनाव में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया।

इस बीच आतंकवादियों ने धमकी भी दी थी, लेकिन चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए। हुर्रियत ने चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की, लेकिन कुछ जगहों को छोड़कर रिकॉर्ड वोटिंग के साथ चुनाव संपन्न हुए और चुनाव में कहीं भी हिंसा नहीं हुई।

उन्होंने अपने बयान में आगे कहा कि उस समय प्रशासन इसलिए ऐसा कर पाया, क्योंकि केंद्र शासित प्रदेश के लोगों ने सिस्टम को स्वीकार किया था, क्योंकि उन्हें इससे फायदा मिल रहा था। इसका एक उदाहरण देते हुए मलिक ने कहा, ”हमने एक जाँच कराई तो पता चला कि राज्य में 50 हजार सरकारी पद खाली हैं। हमने घोषणा की कि 50 हजार कश्मीरी युवाओं को नौकरी देंगे। मुझे उम्मीद है कि सरकार जल्द ही इन लोगों को नौकरी देगी।”

जम्मू-कश्मीर में अपने कार्यकाल के दौरान का एक दूसरा उदाहरण देते हुए सत्यपाल मलिक ने कहा, ”जब मैं जम्मू-कश्मीर का गवर्नर था तो मैंने राजभवन को सबके लिए खोल दिया था। मेरे सभी सलाहकारों को सप्ताह में एक दिन लोगों की समस्याएँ सुनने का काम दिया गया तो मेरे दफ्तर को 95 हजार शिकायतें मिली थीं। गोवा आने से पहले मैंने 93 हजार का समाधान किया था। इसलिए लोगों ने सहज महसूस किया। उन्हें लगा कि यह उनकी सरकार है। इसलिए लोगों में नाराजगी कम थी।”

मलिक ने एक आँकड़ा पेश करते हुए बताया कि हमने एक साल में 51 डिग्री कॉलेज, 8 मेडिकल कॉलेज, 282 जूनियर स्कूलों को हायर सेकेंड्री में बदला था।

आखिर में गोवा में पर्यटन उद्योग की मंदी को लेकर राज्यपाल ने कहा कि यह लंबे समय तक नहीं रहने वाला है, क्योंकि घरेलू टूरिस्टों के लिए इसे खोल दिया जाएगा। बाद में विदेशी सैलानी भी आने लगेंगे। मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि गोवा कोरोना मुक्त है इसलिए यहाँ घरेलू टूरिस्ट आएँगे। विदेशी सैलानियों की वापसी में अभी वक्त लगेगा, लेकिन जल्द ही उनके वापस आने का रास्ता साफ हो जाएगा। इसलिए लंबे समय तक पर्यटन उद्योग को घाटा नहीं होने वाला।

आपको बता दें कि सत्यपाल मलिक अक्टूबर 2019 तक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे थे। इसके बाद उन्होंने गोवा के राज्यपाल के रूप में शपछ ग्रहण की थी। गौरतलब है कि सत्यपाल मलिक अपनी बेबाक राय को लेकर पहचाने जाते हैं। इन्हीं के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद- 370 को मोदी सरकार ने खत्म किया था।