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स्व-घोषित बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों ने सरकार को ऐसे सुझाव दिए हैं जो मेरे भतीजे का हाई स्कूल ग्रुप भी दे सकता है

हाई स्कूल याद है आपको? अब जरा उन निबंधों को याद करें, जिसका विषय होता था, “अगर मैं भारत का प्रधानमंत्री होता तो…” मौजूदा हालातों को देखकर ऐसा लगता है कि हमारे देश के ‘बुद्धिजीवियों’ और ‘अर्थशास्त्रियों’ ने 14 साल के बच्चों से प्रेरणा ली है और कोरोना वायरस महामारी की वजह से उत्पन्न हुए आर्थिक संकट से कैसे निपटा जाए, इसके लिए 7 सूत्रीय एजेंडे को लेकर आए हैं।

आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व सदस्य योगेन्द्र यादव ने शुक्रवार (मई 22, 2020) को उस सूची को साझा किया। ये सुझाव ऐसा था, जिसे मेरे भतीजे का हाई स्कूल ग्रुप भी ला सकता था।

आइए हम इन 7 सुझाओं का एक-एक कर विश्लेषण करते हैं।

10 दिनों में प्रवासियों को वापस लाएँ

प्रवासियों को 10 दिनों में घर वापस लाने की माँग, इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे भारत के बुद्धिजीवियों और मेनस्ट्रीम मीडिया के अधिकतर पत्रकारों ने गणित और तर्क की भारी अवहेलना करते हुए उसे ताक पर रख दिया। वे इस 10 दिनों में कैसे पहुँचे यह एक रहस्य बना हुआ है।

उन्होंने एक पखवाड़ा (दो सप्ताह) जैसा भी कुछ नहीं कहा। उन्होंने सटीक 10 दिन कहा। क्या वे प्रवासियों की कुल संख्या जानते हैं और उन तक पहुँचने के लिए परिवहन संसाधनों की पर्याप्तता का आकलन किया? क्या कुछ सांख्यिकीय मॉडलिंग के कारण वायरस प्रसार की भविष्यवाणी में 10 दिनों का लक्ष्य निर्धारित किया गया? कोई नहीं जानता, सिवाय 10 दिनों के।

COVID मरीजों और फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ खड़े रहें

प्रतिभावान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले इसका आह्वान किया था, तब उनके इस अभियान का इन्हीं बुद्धिजीवियों ने मजाक उड़ाया था। पीपीई, वेंटिलेटर और इस तरह की महामारी से लड़ने के लिए अन्य आवश्यक वस्तुओं के निर्माण के मामले में सरकार ने आत्मनिर्भर बनने के लिए कई कदम उठाए हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में चीनी कोरोना वायरस के कारण होने वाली आर्थिक मंदी से निपटने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। ये बात सभी लोग मानते हैं कि फिलहाल देश के समक्ष बहुत सारी चुनौतियाँ हैं, लेकिन इसे जानने के लिए इन बुद्दिजीवियों की तो कतई आवश्यकता नहीं है।

कोई भी खाली पेट न रहे

यह संवेदनहीन लग सकता है मगर इस प्वाइंट से ऐसा लग रहा है जैसे पहले भारत यूटोपियन राज्य था, जहाँ लॉकडाउन से पहले कोई भी भूखा नहीं रहता था। भारत में यह समस्या आजादी के पहले से रही है और आजादी के बाद भी ढाँचागत समस्याओं के कारण यह बरकरार रही।

यह समस्या इतनी विकराल थी कि इंदिरा गाँधी ने 1971 के आम चुनाव में पहली बार ‘गरीबी हटाओ’ का चुनावी नारा दिया था और फिर 2019 के चुनावों के दौरान उनके पोते राहुल गाँधी ने भी इस नारे का इस्तेमाल किया। दुर्भाग्य से भारत में गरीबी महज एक चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है। बहरहाल, बुद्धिजीवी यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि भूख से जुड़ा हर मामला लॉकडाउन की वजह से है।

लॉकडाउन की घोषणा के तुरंत बाद, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने विभिन्न कदम उठाए ताकि गरीब और कमजोर वर्ग को नुकसान न हो। उन्हें राशि और भोजन प्रदान किया गया। केंद्रीय कैबिनेट ने हाल ही में आत्मनिर्भर भारत अभियान को मंजूरी दी, जिसमें फँसे प्रवासियों के लिए खाद्यान्न आवंटित किया गया था। इससे विभिन्न राज्यों में रहने वाले लगभग 8 करोड़ लोगों को लाभ होने की उम्मीद है।

सभी के लिए नौकरियाँ

केवल ‘बुद्धिजीवी’ ही इतने बुद्धिमान होते हैं कि वे अपना होमवर्क करने से पहले इस तरह के मिस इंडिया टाइप भाषण लिखते हैं। विभिन्न राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार पहले से ही इस बारे में ब्योरा दे रही है कि रोजगार के अवसरों को कैसे आगे बढ़ाया जाएगा।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने पहले ही अधिकारियों को अगले 6 महीनों में 15 लाख रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए विवरण देने का निर्देश दिया है। केंद्र सरकार ने अपनी आत्मानिर्भर भारत अभियान आर्थिक पैकेज घोषणा में नौकरी के अवसर पैदा करने के लिए विभिन्न उपायों और वित्तीय प्रोत्साहन को लेकर जानकारी दी।

सभी के लिए आय

इतने बड़े राष्ट्र में कुछ भी पर्याप्त नहीं है। और क्या हमें सच में इन बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों के साथ आने की जरूरत है? बिना किसी विवरण के आँकड़ों को पेश कर दिया गया है। वो कैसे पहुँचेंगे या फिर धन कहाँ से आएगा, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है। दरअसल ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आत्मनिर्भर भारत अभियान की घोषणा के बाद ‘बुद्धिजीवियों’ ने कुछ नोटों की स्क्रूटनी की और जो कुछ भी पहले ही घोषित किया गया था, उन्होंने उसमें से सारांश लिया और फिर मनमाने ढंग से अपने अनुरूप उन्हें पेश किया।

उदाहरण के लिए, योगेंद्र यादव के बुद्धिजीवियों के गिरोह ने हॉकर्स, विक्रेताओं, छोटे दुकानदारों को अपने कारोबार को फिर से शुरू करने के लिए 10,000 रुपए की एकमुश्त सब्सिडी देने की बात की। पिछले हफ्ते, सीतारमण ने 50 लाख स्ट्रीट वेंडर्स को समर्थन देने के लिए राहत उपायों की घोषणा की। स्ट्रीट वेंडर्स के लिए, सरकार ने 10,000 रुपए की शुरुआती पूँजी के साथ 5000 करोड़ रुपए की विशेष क्रेडिट सुविधा की घोषणा की है।

इसके साथ ही मोदी सरकार ने यह भी घोषणा की कि वह एक महीने के भीतर एक विशेष योजना की शुरुआत करेंगे, जिससे स्ट्रीट वेंडर आसानी से ऋण ले सकेंगे। इसका उद्देश्य 5,000 करोड़ रुपए का नकद प्रदान करना है।

अर्थव्यवस्था सुधरने तक कोई ब्याज नहीं

यह आश्चर्यजनक है कि कैसे योगेंद्र यादव के गिरोह के अर्थशास्त्रियों का अर्थशास्त्र के साथ एक मुश्किल भरा रिश्ता है। NPA, कृषि ऋण माफी आदि के कारण बैंक पहले से ही तनावग्रस्त हैं। लगभग सभी बैंक परिसंपत्तियों पर कोई ब्याज नहीं – ऋण उनके लिए संपत्ति है – इसका मतलब है कि बैंक आगे भी दबाव में आएँगे।

बैंक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। जब यादव और उनके मित्रों ने यह व्यापक सुझाव दिया, तो उन्होंने इसका एक भी समाधान नहीं दिया किया बिना ब्याज के बैंक कैसे चलेंगे। इसका एक ही उपाय हो सकता है कि RBI द्वारा करेंसी छापकर मुफ्त में लोगों में बाँट दिया जाए, ताकि वो अपनी आवश्यकतानुसार उसे खर्च कर सकेंं। उफ! क्या मैंने आगे अम्फान के बाद 11 सूत्रीय एजेंडे के साथ आगे आने के लिए एक सुझाव दे दिया?

नागरिकों के पास मौजूद सभी संसाधनों को राष्ट्रीय संसाधन माना जाए

अब निबंध “अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो…” के बारे में याद कीजिए, जिसके बारे में हमने पहले बातें की थी। इस पर निबंध लिखने वाले जिस बच्चे को A+ मिलता था, वो इसलिए मिलता था क्योंकि उसने अपने लेख में सभी ‘दिल छू लेने वाली और आदर्शवादी’ बातें लिखा था। लेकिन असल जिंदगी में वो बातें अव्यवहारिक ही होती थी।

ये बुद्धिजीवी और अर्थशास्त्री चाहते हैं कि आपके पास जो भी चीज हो, वो राष्ट्रीय संपत्ति हो, फिर वो आपका अंडरविअर ही क्यों न हो।

अब मैं नेटिजन्स के माध्यम से यह समझाने का प्रयास करती हूँ कि कोई भी तार्किक, सामान्य और समझदार इंसान इसके बारे में कैसा महसूस करेगा। खैर, सरकार को सभी तरफ से आने वाली सहायता को मना कर देना चाहिए और जिन लोगों ने पत्र पर दस्तखत किए हैं, उनकी संपत्ति को सार्वजनिक संपत्ति मानकर इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे एक बॉलीवुड फिल्म में विलेन कहता है, सब का सारा माल हड़प लो।

Smart Boy Ajit ready to take over the ‘maal’

केजरीवाल सरकार ने ​सिविल डिफेंस वालंटियर्स की भर्ती का निकाला विज्ञापन, सिक्किम को आजाद देश बताया

अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चाओं में रहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने फिर से एक विवाद को जन्म दे दिया है। शनिवार (23 मई, 2020) को अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम को एक स्वतंत्र देश बता दिया। इसे लेकर विवाद पैदा होना स्वाभाविक है।

दिल्ली सरकार ने विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में सिविल डिफेंस वालंटियर्स की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया। दिल्ली सरकार का यह विज्ञापन करीब 200 वालंटियर्स की भर्ती के लिए है। बहरहाल, इस विज्ञापन में सिक्किम को एक अलग इकाई बताते हुए भूटान और नेपाल की तरह ही संप्रभु देशों की श्रेणी में रखा गया है।

नीचे दिए गए विज्ञापन में आवेदन के लिए पात्रता बताई गई है। पात्रता मानदंड में कहा गया है कि भारतीय नागरिक या सिक्किम, भूटान, नेपाल और दिल्ली के लोग आवेदन कर सकते हैं।

दिल्ली सरकार द्वारा जारी विज्ञापन

सिक्किम 1975 में भारत का अभिन्न हिस्सा बना था। पूरी तरह से भारत में विलय होने के बाद यह देश का 22 वाँ राज्य बना। यह देश का दूसरा सबसे कम आबादी वाला राज्य है और पूर्वोत्तर में स्थित है।

जानें किस तरह हुआ भारत में सिक्किम का हुआ विलय

भारत ने 1947 में स्वाधीनता हासिल की। इसके बाद पूरे देश में सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में अलग-अलग रियासतों का भारत में विलय किया गया। इसी क्रम में 6 अप्रैल, 1975 की सुबह सिक्किम के चोग्याल राजा को अपने राजमहल के गेट के बाहर भारतीय सैनिकों के ट्रकों की आवाज़ सुनाई दी।

भारतीय सेना ने राजमहल को चारों तरफ़ से घेर रखा था। सेना ने राजमहल पर मौजूद 243 गार्डों पर तुरंत काबू पा लिया। इसके बाद चोग्याल को उनके महल में ही नज़रबंद कर दिया गया। फिर सिक्किम में जनमत संग्रह कराया गया। जनमत संग्रह में 97.5 फीसदी लोगों ने भारत के साथ जाने की वकालत की। इसके बाद सिक्किम को भारत का 22वाँ राज्य बनाने का संविधान संशोधन विधेयक 23 अप्रैल, 1975 को लोकसभा में पेश किया गया।

उसी दिन इसे 299-11 के मत से इसे पास कर दिया गया। राज्यसभा में यह बिल 26 अप्रैल को पास हुआ और 15 मई, 1975 को जैसे ही राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने इस बिल पर हस्ताक्षर किए, चोग्याल राजवंश का शासन समाप्त हो गया।

‘सभी निजी संपत्ति को राष्ट्रीय समझा जाए’ योगेंद्र यादव के 7-पॉइंट एक्शन प्लान का मजाक बनने के बाद रामचंद्र गुहा ने बनाई दूरी

पूर्व आप नेता और वर्तमान में स्वराज पार्टी के नेता द्वारा 7-पॉइंट एक्शन प्लान ट्वीट किया गया। जिसका उद्देश्य कोरोनावायरस महामारी से लड़ने में मदद करने के लिए था। इस एक्शन प्लान को ‘प्रमुख अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों’ द्वारा स्पष्ट रूप से समर्थन का दावा भी किया गया।

हालाँकि, ऑपइंडिया ने इन सातों एक्शन पॉइंट पर कहा था कि ये सभी योजनाएँ ऐसी हैं जिन्हें 14 वर्षीय बच्चें द्वारा भी लिखा जा सकता था और इसमें कई दिक्कतें थीं। इनमें से एक खंड था, 7.1 जिसमें कहा गया था कि सभी निजी संपत्ति, जिसमें बॉन्ड, सोना, संपत्ति आदि शामिल हैं उन्हें महामारी से लड़ने के लिए राष्ट्रीय संसाधन के रूप में माना जाना चाहिए।

उन बुद्धिजीवियों में से एक थे रामचंद्र गुहा जिन्होंने इस बचकाने ‘7 पॉइंट योजना’ का समर्थन किया था। हालाँकि, बाद में इस योजना का सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ने के बाद गुहा ने यू-टर्न ले लिया और खुद को एक्शन प्लान से दूर कर लिया।

बाद में रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर खंड 7.1 का जिक्र करते हुए कहा कि जो खंड चर्चा के दौरान प्रस्तुत किया गया था वह छपे हुए खंड से काफी अलग था।

गुहा ने कहा कि, उन्होंने जब मिशन के बयान को मंजूरी दी थी, तो खंड 7.1 में लिखा था, “राष्ट्र के भीतर सभी संसाधन राष्ट्रीय संसाधन हैं, इस मिशन के लिए उपलब्ध हैं।”

गुहा ने आगे कहा कि इस प्रकाशित संस्करण में कई हस्ताक्षरकर्ताओं की स्वीकृति नहीं है और उन्होंने “प्रस्तावित स्टेटमेंट में किए गए कई आवश्यक सुझावों पर ध्यान नही दिया है।”

उल्लेखनीय है कि यद्यपि राम चंद्र गुहा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह खंड सही मायने में ठीक नहीं है, उन्होंने इस योजना से खुद को पूरी तरह से दूर करने से परहेज किया है। वो अभी भी बयान में कहे किए गए बाकी सुझावों का समर्थन करते है। योजना में किए गए कुछ अन्य सुझाव जिसमें ‘सभी के लिए रोजगार’, ‘सभी के लिए आय’ और ‘अर्थव्यवस्था के सही होने तक कोई इंटरेस्ट नही’।

तथाकथित प्रमुख ‘बुद्धिजीवियों’ द्वारा सुझाए गए उपाय अकल्पनीय हैं और इनमें से कई बुद्धिजीवी सोनिया गाँधी के नेशनल एडवाइजरी कॉउन्सिल में भी थे, जो यह सुनिश्चित करने के लिए राज्य में ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे हैं ताकि वे निजी संसाधनों को अपने खजाने में भर सके।

सहिष्णुता यहीं है, क्योंकि विश्वबंधुत्व, उदारता और बड़प्पन की मिट्टी से बना है हिंदुत्व

वो आज अचानक सर पर एक किताब लिए शहर की सड़कों पर खुशी से नाच रहा है। वो घोर निराशावादी जिसे किसी ने हँसते हुए भी मुश्किल से देखा होगा, आज वो इतना खुश है तो ज़रूर कोई ख़ास बात होगी।

कौन है ये आदमी? शोपनहावर। और ये सर पर कौन सी किताब रखी है? ‘गीता’। दार्शनिक ने जवाब दिया, इसे गीता कहते हैं। बड़ी विचित्र पुस्तक है। आज मुझे एक ऐसी किताब मिली जिसमें कोई विरोध का स्वर नहीं है, कोई खंडन की बात ही नहीं लिखी। वास्तव में शोपनहावर के लिए ये एक अजूबा था, क्योंकि सारे धर्मों की पुस्तकें पढ़ने के बाद उसने तो यही निष्कर्ष निकाला था कि वो सब आपस में लड़ने की ही शिक्षा देती हैं। लेकिन ये तो सचमुच कमाल की पुस्तक है।

वस्तुत: भारतीय ऋषियों ने जिस सामासिकता के प्रवाह से सदियों से इस धरा को सिंचित किया है, उसी का सारतत्व है गीता। सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय समावेशी होने पर बल देता है। वेद ने कभी नहीं कहा कि तुम हिंदू बनो या कुछ और बनो। वेद यही कहते हैं कि तुम जो हो वही ठीक से बन जाओ- ‘मनुर्भव’ अर्थात मनुष्य बनो।

इस धरा पर विचारों की सहिष्णुता पनपी है। नवीन व प्रगतिशील विचारों पर Heresy और Blasphemy के आरोप लगाकर किसी के प्राणहरण करना निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति व सभ्यता का हिस्सा नहीं है। ये इसका इतिहास नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यहाँ विचारकों को विशेष सुरक्षा प्राप्त थी। ब्रह्महत्या को पाप माना जाता था।

ब्राह्मण, यानी विचारक। नव विचारों के प्रवर्तक होते थे, इसलिए विरोधियों को उनकी हत्या की सहज इच्छा हो सकती थी, किन्तु उनकी हत्या के कृत्य को जघन्य अपराध घोषित कर उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया। हमारे यहाँ किसी भी बड़े विचारक को ज़िंदा नहीं जलाया गया, बल्कि हमने तो घोर नास्तिक चार्वाक को भी ऋषि का दर्जा दिया।

यही कारण है कि आज भारतभूमि में उत्पन्न हुए मत पंथों की किसी भी शाखा को उठाकर देख लें, कालांतर में पनपी कुछ एक कमियों के बावजूद उनमें समन्वय और सामंजस्य का गुण कभी धूमिल नहीं हुआ। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श को ध्वस्त करने वाली कोई बात इस पर हावी नहीं हुई। हमने कभी किसी को अपने लिए खतरा नहीं माना और इस आधार पर किसी पर हमला नहीं किया कि उनकी मान्यता हमसे अलग है।

मन में असुरक्षा का भाव न रखना ही वस्तुत: ताकतवर होने की निशानी है, जो हमें सिर्फ शक की बिनाह पर अन्यों को प्रताड़ित करने की कायराना हरकत से बचाती है।

अगर आपको अपनी स्कूली पढ़ाई याद हो तो जैसे भूगोल की कक्षा में एक आम पंक्ति हुआ करती थी ‘भारत एक कृषि प्रधान देश है’, वैसे ही इतिहास में भी एक बात सभी भारतीय राजाओं के बारे में आमतौर पर लिखी होती थी और प्रत्येक विद्यार्थी की जुबान पर रहती थी- ‘उसने अपने राज्य में धार्मिक सहिष्णुता की नीति को अपनाया। वह स्वयं अमुक धर्म को मानने वाला था, किंतु उसके साम्राज्य में सभी धर्मों को समान रूप से राज्य का आश्रय प्राप्त था।’

यानी धर्मनिरपेक्षता भारत के DNA में है। इसके बावजूद भारत के मूल धार्मिक मंतव्यों को जिन्हें हम आज हिंदुत्व के नाम से जानते हैं, उस हिंदुत्व को साम्प्रदायिकता के नोबेल से नवाजा जाता है। जिन लोगों का ईश्वर ही निरपेक्ष है उनको भला पंथ सापेक्ष होकर करना ही क्या था। उपासना का मतलब है अपने उपास्य के गुणों को धारण करना। अथर्ववेद का मंत्र कहता है- ‘अकामो धीरो अमृत: स्वयंभू:’ वह उपास्य ईश्वर अकाम यानी निरपेक्ष है। उस निरपेक्ष और अकाम ईश्वर के उपासक पंथ निरपेक्ष न होकर साम्प्रदायिक हो जाते ये कैसे संभव था?

यजुर्वेद से एक विचार उठाकर देख लीजिए- ‘मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामाहे।’ मैं सभी को मित्र की दृष्टि से देखूँ और न केवल मैं बल्कि हम सब यानी वो पूरा समुदाय जिसका मैं हिस्सा हूँ वो अन्यों को मित्र की दृष्टि से देखे। वेदों में समन्वयपरक ऋचाओं की कोई कमी नहीं है। समन्वय की इतनी प्रबल प्रेरणा के बाद स्वाभाविक है कि हम सबको साथ लेकर चलने वाला समुदाय ही होते न कि विघटनकारी, लेकिन न जाने लोगों ने आज कल कैसी कला सीख ली है, वो शीशे में अपना मुँह देखते हैं और कमियाँ हमारे चेहरे में गिनाते हैं।

जब कहा कुछ जाए और किया कुछ जाए तो उसे पाखंड कहते हैं। हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता का पाखंड आजादी के बाद से ही चल रहा है। उसके साथ-साथ उदारवाद का एक सहायक पाखंड अखंड रूप से ध्वन्यमान है। ये तथाकथित उदारवाद धर्म निरपेक्षता के और धर्म निरपेक्षता उदारवाद के कंधे पर एक साथ सवार होने का प्रयास करते-करते आपस में इतने गड्डमड्ड हो गए हैं कि जागृत जनमानस का एक सजग आघात इसे लुढ़का कर पातालगामी बनाने के लिए पर्याप्त है। किंतु कुछ लोगों का अज्ञान और कुछ की धूर्तता इसे संभव ही नहीं होने देती।

‘सत्य का आग्रह रखना’ और ‘असत्य-अन्याय का प्रतिकार करना’ इन शब्दों का यदि कोई अर्थ हो तो उसी अर्थ का मान रखते हुए साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, उदारता, सहिष्णुता, असहिष्णुता को नापने के दोहरे मापदंडों के बारे में यहाँ कुछ विचार रखने का मन है।   

वास्तव में भारत अब विविधताओं के साथ-साथ विरोधाभासों का देश भी बनता जा रहा है। धर्म के नाम पर देश का बँटवारा करने वाले उदार हैं और उस बँटवारे को झेलने वालों और सालों धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुए हिंदुओं को सत्तर साल बाद थोड़ी सी राहत पहुँचाना भी साम्प्रदायिकता है।

एक ही स्थल यरुशलम से निकले अलग-अलग धर्मों को दुनिया भर के कितने ही देशों में राजकीय धर्म का दर्जा हासिल है। सदियों देश-देशांतर की ख़ाक छानने और शरणार्थियों जैसा जीवन बिताने के बाद यहूदी बंधुओं भी को अपना अलग देश मिल जाता है, जो वास्तव में खुशी की बात है। लेकिन इस धरती के विस्तृत भूभाग पर शासन कर चुके और अभी भी बड़ी संख्या में विद्यमान आर्य या हिंदू दुनिया के नक़्शे में किसी एक देश पर उंगली रखकर दावा नहीं कर सकते कि ये उनका है। वो इसलिए कि हिंदुओं का ऐसा करने का कोई मकसद ही नहीं रहा। वो तो स्वयं शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को गढ़ने वाले हैं। धरती के हर कोने से जो भी आया हमने ‘अतिथि देवो भव’ की भावना से उसे गले लगाया।

क्या ये उदारता बरतने के लिए हिंदुओं को अतिरिक्त तनख्वाह दी जाती है? नहीं, बल्कि वही अतिथि हमारे ही घर में रहकर हम पर जजिया लगाता है, खराज और ख़ुम्स की लूट मचाई जाती है। आप कहेंगे कि ये तो पुरानी बात हो गई। इसका जिक्र तो बस एक सिलसिला याद दिलाने के लिए है, वरना आज की बातों में पुरानी बातों से कम दम नहीं है।

आजकल एक महा बेतुका सवाल भी चल पडा है- ‘हिन्दुस्तान तुम्हारे बाप का है क्या?’ इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज करते हुए कि जो सवाल कर रहा है और जिससे सवाल किया जा रहा है उन दोनों का बाप एक ही है। लेकिन धर्म के नाम पर जो बाप को भी बाँट दे उन्हें रोकने वाला कोई नहीं, उनकी तो हर जगह हरी झंडी ही है। लाल बत्ती तो बाकियों के लिए बनी है। धर्मनिरपेक्षता खुद को शीशे में देखने जाए तो पहचान भी न पाए।

कोरोना के संकट में लगातार सेवा कार्यों में लगे RSS के जवानों को आतंकवादी कहना और संक्रमण को जान-बूझकर फैलाने वालों के खिलाफ एक शब्द भी न बोलना, उल्टा उनका बचाव करना आजकल घनघोर उदारवाद की श्रेणी में आते हैं। वो बम फोड़कर भी सिर्फ हेडमास्टर के बेटे और और गणित के टीचर हैं। गजब बातें हैं इस देश में, यहाँ आतंकवादी रोटियाँ बाँटते हैं और शान्तिधर्मी बम फोड़ते हैं।

अब देखिए, हमने सुना था भावनाएँ कोमल होती हैं। फिर पता चला कि कुछ धार्मिक भावनाएँ हैं जो बिहारी की नायिका से भी ज्यादा सुकोमल होती हैं। इसलिए वही सबसे अधिक आहत होती हैं। फिर वही सुकोमल भावनाएँ आहत होने के नाम पर इतनी दहशतगर्द कैसे हो जाती हैं कि इंसानी जान की प्यासी हो जाती हैं? जिस मानवता की रक्षा के लिए उन सुकोमल धार्मिक भावों का अस्तित्व था, कैसे वो उसी मानवता को तबाह करने पर आमादा हो जाती हैं? फिर उन नृशंस पापों के बदले जन्नत में सुकोमल हूरें मिलती हैं? इस खोजबीन भरे अनुत्तरित जिज्ञासा भाव की व्यर्थ कवायद को शांत करने के घोर मानसिक प्रयास में वो याद आया जो महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा था- ‘और अधिक सवाल मत करो गार्गी, तुम्हारा सिर फट जाएगा।’ क्योंकि यहाँ तो सवाल पर सवाल हैं और जवाब पर बवाल है। अस्तु।

आपने बहुत से ऐसे बच्चे देखे होंगे जो दूसरों को पीट कर खुद रोने लगते हैं। बड़े लोग समझ नहीं पाते हैं कि ऐसे में किसका पक्ष लें। चिंटू ने पिंटू की गर्दन दबोच ली, कसकर उसका मुँह भी दबा दिया। जब दम घुटने लगा तो पिंटू ने किसी तरह अपनी गर्दन छुड़ाई। अभी खडा होकर हाँफ ही रहा था कि चिंटू ने रो-रोकर बुरा हाल मचा दिया कि देखो पिंटू ने मेरा हाथ मरोड़ दिया, इस पर लाल निशान हो गए और अब वो मुझे जोर-जोर से धमका भी रहा है। अरे भाई वो धमका कहाँ रहा है वो तो बस जोर-जोर से अपनी हाँफ उतार रहा है। लेकिन अब ऐसी सफाइयों का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि कैमरा बिल्कुल सही समय पर पहुँच गया था।

जब मस्जिद ने मंदिर को अपने नीचे कुचल कर दबाया तब किसने देखा? आज जब उसने अपनी दबोची हुई गर्दन को बाहर निकाला तो कैमरा ऑन था। अरे! इसने अपनी गर्दन बाहर कैसे निकाल ली? देखो इसने अपनी गर्दन बचाने के चक्कर में चिंटू को कितनी खरोंचें मार दीं। सांप्रदायिक है ये। असहिष्णु है। इतना भी सहन नहीं कर सकता? देखो चिंटू कितना डरा हुआ है। इतने में कोरोना की बीमारी आ धमकी। आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई। अब चिंटू को पैसों की ज़रूरत पड़ी। उसने पिंटू से पैसे माँगने में एक सेकेण्ड भी बर्बाद नहीं किया। क्यों भई, अब पिंटू ये भी तो कह सकता है कि ये मेरे खून पसीने की कमाई है, अब इसे मैं ही इस्तेमाल करूँगा। जब मस्जिद के आगे वितरण किए जाने वाले, खाने को लेने आए हिंदू को दुत्कार कर पंक्ति से अलग किया जा सकता है तो फिर मंदिरों की संपत्ति के इस्तेमाल में ये क्यों संभव नहीं है? ओहो ये क्या बात कर रहे हो? घोर साम्प्रदायिक!!! शान्तं पापम्, शान्तं पापम्!!! कब्जे के लिए मस्जिद, दान के लिए मंदिर। उदारवाद जिंदाबाद।

आतंकी वारदातों को अंजाम देते हुए जो आतंकी स्पष्ट रूप से मजहबी नारे बुलंद करते हैं, उनके आतंक का कोई धर्म नहीं होता। वहीं बिना किसी सबूत के किसी आतंक का रंग भगवा कर दिया जाता है। कहते हैं कि रेत से तेल नहीं निकलता, लेकिन इतना सुस्पष्ट और विशुद्ध दोगलापन तो किसी रेत से निकले तेल को पीकर ही आ सकता है।

हिंदुओं ने धार्मिक विद्वेष के परिणामस्वरूप बड़े-बड़े कत्लेआम सहे हैं। इस विषय में बहुत सा साहित्य और शोध मौजूद है जिसे आप स्वयं पढ़ सकते हैं। उन्नीसवीं सदी के महान समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में हिन्दुओं सहित सभी मतों की कुछ अनपेक्षित व हानिकारक बातों का प्रतिकार किया। किंतु विरोध के सुर ग्रंथ के केवल उस खंड पर उठे जिसमें इस्लाम की आलोचना की गई थी और सदा की तरह ही ये एक प्राणघातक विरोध था।

ऐसे ही न जाने कितने विचारकों को इस धार्मिक उन्माद ने समय से पहले हमसे निर्दयता से छीना है। हर युग की यही कहानी है। किंतु असहिष्णुता का अवॉर्ड किसे दिया जाता है? इस असहिष्णुता के अवॉर्ड को बनाने की विधि भी बहुत विचित्र है। कुछ अति सहिष्णु लोग इधर से अपना वो अवॉर्ड डालते हैं, जो उन्हें किसी न किसी सहिष्णुता के नाम पर मिलता है और उधर से ये असहिष्णुता का अवॉर्ड बाहर आता है। फिर वो समग्र हिंदुत्व को समर्पित कर दिया जाता है।

ये सब बातें भड़काने या सांप्रदायिक सद्भाव को ख़त्म करने के लिए नहीं हो रही हैं। हिंदुत्व तो बना ही विश्वबंधुत्व, उदारता और बड़प्पन की मिट्टी से है। यदि वो अन्याय का शिकार हो रहा है तो प्रतिकार के लिए उसकी धार्मिक भावनाओं को भड़काने की ज़रूरत नहीं है। वो आँख खोल कर देश के संविधान से ही अपने ऊपर हो रहे अन्यायों के विरुद्ध उपचार ले सकता है। इसके लिए छाती पर बम बाँधकर निर्दोष लोगों को विस्फोट से उड़ाने का अमानवीय कृत्य करने की जरूरत नहीं है।

भारत की महान धरोहर की रक्षा इन छिछले उपायों से संभव भी नहीं है, क्योंकि ये उसकी मूल शिक्षाओं के विरुद्ध है। ये सब लिखना तो बस धर्मनिरपेक्षता के उलटे पहाड़े को सीधा करके समझने का एक छोटा सा प्रयास है।

सच तो ये है कि घनघोर साम्प्रदायिकता की ईंटों से चिने महल पर सेक्युलरिज़म का पेंट चढ़ाकर अपने उदारवाद का झंडा बुलंद करने वालों को अगर तर्क की एक खरोंच भी तबियत से लग जाए तो विद्वेष की बदरंग परतें बाहर निकल आती हैं। ये परतें उन लोगों को तो साफ़ नज़र आती हैं जो अपनी आँख से देखते हैं किंतु जिन दर्शकों को उस पेंट के ही रंग वाला चश्मा बेचा गया है, उन्हें नज़र नहीं आती। उनके चश्मे का ख़ास रंग उस खुली पोल को स्वत: ढक लेता है। ऐसे लोगों को याद रखना चाहिए कि जब जनमानस अंगड़ाई लेता है तो आप उसकी इस दृष्टि से या उस दृष्टि से बस व्याख्या ही कर सकते हैं, उसे बदल नहीं सकते।

आज भारत की संस्कृति ने फिर से अपनी पहचान बनानी शुरू की है, क्योंकि हमने उस पर बिना किसी झेंप के गर्व करना सीख लिया है। और वो गर्व करने योग्य है। वरना अपनी चीज़ पर सिर्फ अपना होने की वजह से गर्व किया जाए तो ये वजह तो सभी के पास मौजूद है, किंतु उसकी विशेषताओं को पहचानकर उस पर गर्व करना उस गर्व की परिपक्वता और दीर्घजीविता के लिए अत्यंत आवश्यक है। आइए भय, पूर्वाग्रह और तुष्टिकरण के परदे से बाहर निकल कर खुली आँखों से सत्य के प्रकाश का अवलोकन करें।

पुलिस ने किया इनकार तो मुंबई में फँसे बंगाली मुस्लिमों की मदद के लिए सामने आई RSS

पश्चिम बंगाल की एक एनजीओ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की तारीफ़ की है। संघ की जनकल्याण समिति मुंबई में काफ़ी अच्छा काम कर रही है। संस्था द्वारा बुजुर्गों, गरीबों और महिलाओं की मदद की जा रही है। साथ ही संस्था उन मजदूरों की भी सहायता कर रही है, जो लॉकडाउन के बीच इधर-उधर फँसे हुए हैं। इस मामले में वो न तो जाति-संप्रदाय देख रही है और न ही धर्म-मजहब। सभी वर्ग के लोगों को सहायता पहुँचाई जा रही है।

संस्था के लोगों ने बताया कि वो स्वामी विवेकानंद के कथन को लेकर जनता की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि आप जिसकी भी सहायता करते हैं, उसके प्रति एहसानमंद रहिए क्योंकि उसके भीतर भगवान का वास होता है। बंगाली मुस्लिमों की जिस तरह से मदद की जा रही है, उससे वहाँ के लोग गदगद हैं। जिस तरह से संघ को बदनाम करने के लिए मुस्लिम विरोधी बताया जाता है, ऐसे लोगों के मुँह पर ये चाँटा के समान है।

संघ को इस्लामोफोबिया से ग्रसित भी बताया जाता है। ‘आर्किड फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष सोहैल राना आलम की कहानी ऐसे सभी प्रोपेगंडा को धता बताती है। उन्होंने बताया कि किस तरह से संघ ने मुस्लिमों की मदद की है। उन्होंने लिखा, “मैं न तो भाजपा समर्थक हूँ और न ही RSS के सभी एजेंडे का समर्थन करता हूँ। लेकिन हाँ, मैं बस सच्चाई बयान कर रहा हूँ।” उन्होंने इसके लिए एक घटना का उदाहरण दिया।

दरअसल, मुंबई के धारावी में बंगाल स्थित मुर्शिदाबाद के 5-6 मजदूर फँसे हुए थे। इसके अलावा घाटकोपर में बाँकुरा और अन्य जिलों के 7-8 मजदूर कई दिनों से फँस गए थे। इसके बाद सोहैल राना ने उनके बारे में घाटकोपर के एसीपी को बताया। एसीपी ने उन्हें कण्ट्रोल रूम का नंबर दिया। इसके बाद उन्हें संघ के पदाधिकारी महेश कुलकर्णी का नंबर मिला। कण्ट्रोल रूम से उन्हें ये नंबर मिला था। तब उन्हें नहीं पता था कि वो RSS से जुड़े हैं, उन्हें किसी एनजीओ का बता कर दिया गया था।

सोहैल ने सुनाया अपना अनुभव

सोहैल के मन में संघ को लेकर कुछ शंकाएँ थीं, इसीलिए उन्होंने पहले ही कहा कि वो एक मुस्लिम हैं और मुस्लिमों के लिए ही मदद चाहते हैं। महेश ने उन्हें बताया कि संघ के कार्यकर्ता मानवता में विश्वास रखते हैं और बाकी चीजों को इससे नीचे रखते हैं। इसके तुरंत बाद महेश और आरएसएस ने उन मजदूरों तक मदद पहुँचाई। सोहैल का कहना है कि उन्होंने कभ RSS के इस पक्ष के बारे में कभी नहीं।

इससे पहले सोहैल ने धारावी डीसीपी अकबर पठान और पुलिस स्टेशन से भी सम्पर्क किया लेकिन उन्हें बार-बार मदद करने से मना कर दिया। सोहैल ने लिखा कि उन्होंने ज़िंदगी भर RSS की आलोचना की लेकिन आज RSS ने जिस तरह से वहाँ फँसे मुस्लिमों की मदद की है, इससे वो काफ़ी प्रभावित और गदगद हैं। आरएसएस के गणेश पांडी ने भी उनकी मदद की। उन्होंने आरएसएस की जम कर तारीफ की।

‘न्यूजलॉन्ड्री! तुम पत्रकारिता का सबसे गिरा स्वरुप हो’ कोरोना संक्रमित को फ़ोन कर सुधीर चौधरी के विरोध में कहने को विवश कर रहा NL

जी न्यूज (zee news) के 29 कर्मचारी पिछले दिनों कोरोना संक्रमित पाए गए थे। इसके बाद सोशल मीडिया पर वर्ग विशेष की कुत्सित मानसिकता दिखी थी। ये कर्मचारी फिलहाल अस्पताल में हैं। लेकिन मीडिया गिरोह का प्रमुख सदस्य न्यूजलॉन्ड्री इनके पीछे लगा हुआ है। उन्हें परेशान कर रहा है। जी न्यूज और उसके एडिटर इन चीफ के खिलाफ बोलने को उकसा रहा है।

न्यूजलॉन्ड्री की कुत्सित मानसिकता की पोल जी न्यूज के HR प्रवीण श्रीवास्तव ने ट्विटर पर खोली है। बकौल प्रवीण वे संक्रमित हैं और अस्पताल में हैं। लेकिन, न्यूजलॉन्ड्री के एक पत्रकार ने उन्हें फोन कर लगातार परेशान कर रखा है।

प्रवीण के खुलासे पर गौर करने से पहले एक नजर ख़बरों की धुलाई का दावा करने वाली प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘न्यूजलॉन्ड्री’ के चरित्र पर डाल लेते हैं। यह पोर्टल हीनभावना से ग्रस्त अजेंडाबाज अभिनंदन सेखरी की देखरेख में चलता है। इसने कुछ ऐसे लोगों को काम पर रखा है जो दूसरे संस्थान के लोगों का पीछा करते हैं। मनगढ़ंत आरोप लगाते है और फिर अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या करते हैं। हालाँकि यह भी एक तथ्य है कि हर बार खुद ‘न्यूजलॉन्ड्री’ वाले अपनी धुलाई करवाकर अपने आकाओं के पास लौट जाते हैं।

जी न्यूज़ के प्रवीण श्रीवास्तव ने आखिरकार ट्विटर पर न्यूजलॉन्ड्री के एक स्टाफ की पोल खोलते हुए लिखा है;

और कितना नीचे गिरोगे न्यूज़लौंड्री। ऐसे वक्त में जब मैं कोरोना से जंग लड़ रहा हूँ। एक बुरे मानसिक तनाव का सामना कर रहा हूँ, अस्पताल में हूँ। आपके पत्रकार बसंत कुमार मुझे फोन और वॉट्सएप पर परेशान कर रहे हैं, ताकि मैं सुधीर चौधरी औऱ जी न्यूज़ के खिलाफ बोलूँ।

न्यूजलॉन्ड्री में काम करने वाले बसंत कुमार की इस गिरी हरकत से तंग आकर प्रवीण श्रीवास्तव ने दूसरे ट्वीट में लिखा;-

और आपके झूठ का एजेंडा आगे बढाऊँ। अगर यही आपकी पत्रकारिता है, तो ये पत्रकारिता का सबसे गिरा स्वरुप है। अगर आप ‘सच’ के लिए मेरा पक्ष जानने को इच्छुक हैं तो मेरे वीडियो को अपनी खबर में डालें। लेकिन आप वो नहीं करेंगे, क्योंकि उससे आपका एजेंडा पंक्चर हो जाएगा।

इस ट्वीट को सुधीर चौधरी ने भी रीट्वीट किया है।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब न्यूजलॉन्ड्री ने निम्नस्तरीय सूझबूझ और सतही व्यावाहारिक और व्यावसायिक ज्ञान वाले अपने लोगों का इस्तेमाल कहानी गढ़ने के लिए किया है। इससे पहले न्यूजलॉन्ड्री के इसी बसंत कुमार ने ऑपइंडिया हिंदी के सम्पादक अजीत भारती को पत्रकारिता के नियम और मूल्यों पर ज्ञान देने का प्रयास किया था और उनके हिस्से का बयान छुपाकर एक कहानी तैयार कर सस्ती लोकप्रियता जुगाड़ने का प्रयास किया था।

यही नहीं बसन्त कुमार ने अपनी ‘स्वघोषित रिपोर्ट’ पर ऑपइंडिया हिंदी के सम्पादक अजीत भारती के आपत्ति जताने के बाद भी अपने दावे के समर्थन में कोई प्रमाण सामने नहीं रखा। पत्रकारिता में नैतिकता और आदर्शों की बात करते हुए अजीत भारती से बसंत ने बातचीत तो की लेकिन रिपोर्ट में वही लिखा जो उसे लिखना था, या लिखने को बोला गया था। हालाँकि, रिपोर्टर ने न तो रिपोर्ट की लिंक भेजी (ताकि यह देखा जा सके कि जो कहा है वही रिपोर्ट हुई है या फिर कुछ और), न ही फोन की बातचीत की रिकॉर्डिंग (जो कहा था कि भेजेगा)। जाहिर सी बात है कि आप इन सब चीजों को तभी छुपाते हैं जब आपको न तो पत्रकारिता की नैतिकताओं का ख्याल हो, न ही समझ।

वही कारनामा बसंत ने दूसरी बार की बातचीत में भी किया। ये जानते हुए न्यूजलॉन्ड्री का कलाकार पत्रकार दोबारा वही करेगा, दूसरी बार भी अपना पक्ष रखने के लिए बसंत के प्रश्नों का जवाब दिया और आगाह भी किया कि पिछली बार की धूर्तता न करे। न्यूजलॉन्ड्री की पत्रकारिता का आदर्श ही गंदे कपड़ों के मैल की तरह त्याज्य तरीके की रिपोर्टिंग है जो उसने इस बार भी किया है।

बसंत कुमार पत्रकारिता की सड़ांध उसी न्यूजलॉन्ड्री की खोज है, जो ख़बरों को मनचाहा स्वरुप देने के लिए बयान और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए कुख्यात है। लेकिन बसंत कुमार अकेले इस रवैए के लिए दोषी नहीं कहे जा सकते। न्यूजलॉन्ड्री के अकाउंट पर नजर डालने से पता चलता है कि उसने हाल ही में अलग-अलग लोगों को ऐसी कहानी तैयार करने के लिए विवश किया होगा, जिनके माध्यम से वो यह झूठ स्थापित कर सकें कि जी न्यूज़ के संस्थापक सुधीर चौधरी अपने स्टाफ को धमका रहे हैं।

19 मई की न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में सुधीर चौधरी पर लगे आरोप को 22 मई को खुद ज़ी न्यूज़ का स्टाफ बेहद काल्पनिक और मनगढ़ंत बताता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब न्यूजलॉन्ड्री अपनी ही खबर की धुलाई करने का जोखिम उठाएगा? या फिर न्यूजलॉन्ड्री जानता है कि उसे सत्य, वास्तविकता, इंसानियत और तर्क से मुँह मोड़कर ही अपनी कूपमंडूकता पर अडिग रहना है?

इसी फर्जीवाड़े पर सुधीर चौधरी ने कुछ दिन पहले ही खुद भी प्रशांत भूषण के ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा, “सुप्रीम कोर्ट को ऐसे वकीलों के ख़िलाफ़ स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए जो ऐसे संकट के दौर में FAKE NEWS फैलाकर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं। देश के तो ये कभी भी नहीं थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का भी दुरुपयोग करते हैं। जिस खबर को ये सब लोग मिलकर फैला रहे हैं वो ग़लत है।”

गोरखपुर में चौथी के बच्चों ने पढ़ा- पाकिस्तान हमारी प्रिय मातृभूमि है, पढ़ाने वाली हैं शादाब खानम

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के जीएन नेशनल पब्लिक स्कूल से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। स्कूल के बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए बने व्हाट्सएप ग्रुप में कक्षा 4-ए की क्लास टीचर शादाब खानम ने संज्ञा (Noun) समझाते-समझाते पाकिस्तान प्रेम का पाठ पढ़ा डाला।

शिक्षिका ने अपने मोबाइल नंबर से व्हाट्सएप ग्रुप पर जो पीडीएफ फाइल उपलब्ध कराई थी, उसमें पाकिस्तान से संबंधित तीन अलग-अलग उदाहरण दिए गए थे। पहले में पाकिस्तानी आर्मी ज्वाइन करने का उदाहरण था, तो दूसरे में पाकिस्तान को मातृभूमि बताया गया। तीसरे उदाहरण में पाकिस्तानी पायलट राशिद मिन्हास की बहादुरी का बखान किया गया था। तीनों उदाहरण इस तरह थे- पाकिस्तान हमारी प्रिय मातृभूमि है, मैं पाकिस्तानी सेना में शामिल होऊँगा और रशीद मिन्हास एक बहादुर सैनिक था।

जैसे ही इस पोस्ट की जानकारी अभिभावकों को हुई तुरन्त हंगामा खड़ा हो गया। अभिभावकों ने तत्काल इसकी जानकारी स्कूल प्रबंधन को दी। अभिभावकों का आरोप है कि शिक्षिका के जरिए पाकिस्तान के पक्ष में बच्चों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है। कई अभिभावकों का आरोप है कि संज्ञा पढ़ाने के जरिए शिक्षिका ने उनके बच्चों के अंदर राष्ट्र विरोधी मानसिकता पैदा करने का प्रयास किया गया है। 

जानकारी के अनुसार, इस व्हाट्सएप ग्रुप में 40 से 50 बच्चे जुडे़ हैं। ग्रुप की एडमिन शादाब खान ही हैं। अभिभावकों का कहना है बच्चों का मन बेहद कोमल होता है, उनके अंदर राष्ट्र विरोधी मानसिकता पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने माँग की है कि शिक्षिका शादाब खानम को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाना चाहिए, क्योंकि यह कृत्य राष्ट्रदोह की श्रेणी में आता है।

मामले पर सफाई देते हुए शादाब खानम ने कहा, “पढ़ाई के लिए अध्ययन सामग्री और उदाहरण को इंटरनेट से कॉपी करके बच्चों के लिए व्हाट्सएप ग्रुप पर डाल दिया था। सिर्फ मानवीय भूल के चलते ऐसा हुआ। मेरी मंशा बच्चों के मन में राष्ट्र विरोधी मानसिकता को बढ़ाने की नहीं थी और न कभी रहेगी। यहीं पैदा हुई, यहीं पली बढ़ी हूँ। भारतीय होने पर गर्व है। 11 साल से स्कूल में पढ़ा रही हूँ। उदाहरण के लिए अध्ययन सामग्री को कॉपी करके डाला जरूर, लेकिन उसे नहीं देख सकी। यही सबसे बड़ी गलती थी। क्लास के लिए लेट हो रहा था। व्हाट्सएप ग्रुप पर सबसे माफी माँग ली है।”

वहीं जीएन नेशनल स्कूल के डायरेक्टर गोरख सिंह ने बताया कि शिक्षिका को तत्काल नोटिस जारी किया गया है, उनका जितना वेतन बनेगा, उसका भुगतान करके स्कूल से बर्खास्त किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बच्चों के कोमल मन में जहर घोलने वाले किसी शिक्षक के लिए विद्यालय में कोई जगह नहीं है। शिक्षिका गलती भी मान रही हैं, लेकिन इससे  गलत काम सहीं नहीं हो जाता है।

वहीं भाजपा नेता देशबंधु शुक्‍ल ने कहा कि शादाब खान नामक महिला शिक्षक से यही उम्‍मीद की जा सकती है। उनके जेहन में पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तानी ही हैं। भारत और भारतवासी नहीं है। वह और उनके जैसे लोग इस तरह की शिक्षा दे रहे हैं तो कोई आश्‍चर्यजनक नहीं है। वह अपने मकसद में कामयाब हैं। 

21 दिन में 3 चीनी बैंकों को देने होंगे ₹5448 करोड़: अनिल अंबानी के लिए लंदन से आई मुसीबत

रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी को ब्रिटेन की अदालत से झटका मिला है। उन्हें 21 दिन के भीतर चीन के तीन बैंकों को 717 मिलियन डॉलर (करीब 5448 करोड़ रुपए) देने का आदेश दिया है। लंदन के हाईकोर्ट ऑफ इंग्लैंड ऐंड वेल्स के कमर्शल डिविजन के जस्टिस नीगेल टीयरे की अदालत ने कहा कि अनिल अंबानी ने पर्सनल गारंटी दी थी। लिहाजा उन्हें यह पैसा चुकाना होगा।

अंबानी के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस मामले में कानूनी सलाह ली जा रही। साथ ही एक बयान में कहा गया है, “जहाँ तक ब्रिटेन की अदालत के फैसले का सवाल है, निकट भविष्य में भारत में इसके प्रवर्तन की कोई संभावना नहीं है।” कहा कि यूके के आदेश का रिलायंस समूह की अन्य कंपनियों, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस पावर और रिलायंस कैपिटल के परिचालन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

हालाँकि कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि अगर अंबानी अगले 21 दिनों में भुगतान नहीं करते हैं, तो ऋणदाताओं के पास इस आदेश के प्रवर्तन के लिए सभी उपलब्ध विकल्पों को आगे बढ़ाने का विकल्प होगा।

बता दे इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ़ चाइना लिमिटेड, चाइना डेवलपमेंट बैंक और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ़ चाइना ने अंबानी पर ब्याज सहित 708 मिलियन डॉलर का ऋण चुकाने में विफल होने के लिए मुकदमा दायर किया था। यह ऋण उनकी कंपनी, Reliance Communications द्वारा लिया गया था। बैंकों के अनुसार ऋण के लिए उन्होंने पर्सनल गारंटी दी थी।

फरवरी में इन बैंकों के समर्थन में सशर्त आदेश जारी किया गया था। ब्रिटेन की अदालत ने अंबानी को छह सप्ताह में $ 100 मिलियन का भुगतान करने का निर्देश दिया था। तब अनिल अंबानी ने कोर्ट से कहा था कि इस समय उनकी नेटवर्थ जीरो हो चुकी है और परिवार उनकी मदद नहीं कर रहा है। ऐसे में वह 100 मिलियन डॉलर का भुगतान करने में सक्षम नहीं हैं।

एनबीटी ने अनिल अंबानी के प्रवक्ता के हवाले से बताया है कि यह मामला रिलायंस कम्युनिकेशन लिमिटेड द्वारा 2012 में कॉर्पोरेट लोन से जुड़ा है। हालॉंकि बयान में कहा गया है कि लोन अनिल अंबानी ने व्यक्तिगत रूप से नहीं ली थी।

जयपुर से लापता पीयूष सिंह निजामुद्दीन के मरकज में मिला: आधार नंबर वही, लेकिन नाम हो गया मोहम्मद अली, पता मेरठ का

जयपुर का रहने वाला पीयूष सिंह (Piyush Singh) बीते 20 मार्च को लापता हो गया था। हाल ही में वह​ दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज (Nizamuddin Markaz) में मिला। चौंकाने वाली बात यह है कि यहाँ तबलीगी जमात की लिस्ट में उसका नाम पीयूष सिंह नहीं, बल्कि मोहम्मद अली (Mohammad Ali) पाया गया है।

पीयूष के पिता का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है कि आखिर उसका मरकज पहुँचने के पीछे क्या कारण हो सकता है या फिर वो किन लोगों से मिल रहा था।

कुछ दिनों से घर पर नमाज पढने लगा था पीयूष

पीयूष के पिता ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से उनका बेटा घर पर नमाज पढ़ रहा था और इस्लाम की बातें किया करता था। पिता ने यह भी बताया था कि उनका बेटा किसी से बात नहीं कर रहा था, उसका व्यवहार अजीबोगरीब था और अपने में ही खोया रहता था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि उसके लापता होने के 7 दिन बाद 27 मार्च को पिता अनूप सिंह ने जयपुर के सदर थाना में शिकायत दर्ज कराई थी। सदर थाना एसएचओ राजेंद्र सिंह शेखावत ने इस बात की पुष्टि की है। जयपुर पुलिस की एक टीम पीयूष को बुधवार (मई 20, 2020) को मरकज से वापस लेकर आई।

एक ही है ‘पीयूष’ और ‘अली’ का आधार नम्बर

जाँच में पता चला है कि पीयूष का आधार नंबर वही है, जो तबलीगी जमात के सदस्यों की सूची में मोहम्मद अली का है। इस सूची में अली का पता मेरठ दिखा रहा है। 19 अप्रैल को अली उर्फ पीयूष को क्वारंटाइन में रहने की सलाह दी गई थी।

वह दिल्ली के सुल्तानपुरी पुलिस स्टेशन में था। अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि उसके कोरोना जाँच के नमूने तीन बार लिए गए थे और हर बार नकारात्मक नतीजे ही आए।

पुलिस का एक दल दिल्ली गया और बुधवार (मई 20, 2020) को उसे वापस जयपुर ले आया। एसएसओ शेखावत ने बताया कि अली उर्फ़ पीयूष वह वापस नहीं आना चाह रहा था और वहीं रहना चाहता था।

नाम मोहम्मद अली रखने के बारे में एसएचओ ने बताया, “उसने शायद खुद ही इस नाम से अपना पंजीकरण कराया होगा। अगर वह यह चाहता कि उसे रॉबिनहुड के नाम से जाना जाए, तो अधिकारी उसका नाम रॉबिनहुड ही लिखते। वह स्वेच्छा से वहाँ रह रहा था।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, पीयूष उर्फ़ मोहम्मद अली के पिता का इस बारे में कुछ और ही कहना है। पीयूष के पिता ने कहा कि उन्हें महज 10 दिन पहले ही इस बात की सूचना मिली कि उनका बेटा मरकज में है।

युवक के पिता ने कहा कि पुलिस के प्रयास द्वारा उसे वापस लाया जा सका। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि दिल्ली मरकज से लौटने के बाद उनके बेटे पीयूष की मानसिक स्थिति अस्थिर है और वह अपने आप में खोया हुआ रहता है, ना ही किसी से बात करता है।

पीयूष उर्फ़ मोहम्मद अली के पिता का कहना है कि उनके बेटे ने बीसीए की पढ़ाई की है और MCA के लिए तैयारी कर रहा है। कुछ समय बाद जब हालात सामान्य होंगे तब वो उससे पूछेंगे कि वो आखिर मरकज पहुँचा कैसे?

ब्राह्मणों को कुत्ता बताने वाले सांसद को बेल, दलितों पर टिप्पणी को लेकर हुई थी आरएस भारती की गिरफ्तारी

दलित समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में गिरफ्तार कॉन्ग्रेस के सहयोगी दल द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) के राज्यसभा सांसद आरएस भारती को अंतरिम जमानत दे दी गई है। भारती के वकील शनमुगासुंदरम ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने आरोप लगया कि गिरफ्तारी का एकमात्र कारण मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराना था।

बता दें कि पुलिस ने आज (मई 23, 2020) सुबह आरएस भारती को चेन्नई से गिरफ्तार किया था। उन्हें 14 फरवरी 2020 को आपत्तिजनक टिप्पणी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। भारती के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

जानकारी के मुताबिक आदि तमिल मक्कल काची के प्रमुख कल्याण कुमार की शिकायत के बाद पुलिस ने ये कार्रवाई की। चेन्नई पुलिस ने भारती को अलंदुर स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया था। शिकायतकर्ता ने भारती पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने भाषण से न केवल न्यायमूर्ति वरदराजन का अनादर किया, बल्कि पूरी अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के लोगों के लिए घृणास्पद टिप्पणी की।

गिरफ्तारी से कुछ मिनट पहले ही पत्रकारों से बात करते हुए भारती ने कहा था कि उनके भाषण को संदर्भ से बाहर ले जाया गया। उन्होंने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता ने भाषण से कुछ लाइनों को निकाला और कहने के मतलब को अलग तरह से पेश किया।

भारती उसी भाषण की बात कर रहे थे, जिसे लेकर उनकी गिरफ्तारी की गई है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो क्लिप में भारती ने दलित जजों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। भारती ने भी अपनी गिरफ्तारी को सत्ताधारी AIDMK की साजिश बताया था। सांसद ने कहा था कि शुक्रवार शाम को उन्होंने मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में शिकायत दर्ज कराई थी, इसीलिए अचानक उनकी गिरफ्तारी की गई।

उन्होंने यह भी कहा था कि एक समूह द्वारा सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम करने के लिए कैंपेन चलाया जा रहा है। इसमें उनके एक भाषण का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। गौरतलब है कि भारती ने मीडिया कंपनियों की तुलना रेड लाइट एरिया से की थी, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ था। इसके अलावा उन्होंने ब्राह्मणों को ‘कुत्ता’ कहा था। DMK नेता के खिलाफ चेन्नई के दो पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज है।