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बरेली में मजार पर अवैध निर्माण, कब्रिस्तान में खड़ी हुई 20 फीट ऊँची बिल्डिंग: BJP सांसद की शिकायत के बाद 100 पर FIR, डर से स्थानीय मुस्लिमों ने खुद तोड़ी छत और पिलर

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक मजार पर अवैध पक्का निर्माण करवा दिया गया। रातों रात यहाँ पर सीमेंट का लेंटर डाल दिया गया। जब इस मामले में बरेली के सांसद ने शिकायत की तो प्रशासन ने जाँच करके नोटिस भेज दिया। इसके बाद मुस्लिमों ने अवैध मजार को खुद तोड़ना चालू कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स अनुसार, बरेली के शाही थाना क्षेत्र में गणेशपुर में गाँव में यह घटना हुई। यहाँ एक कब्रिस्तान के भीतर एक पुरानी मजार बनी हुई थी। यह मजार लगभग 30-40 साल पुरानी है। यहाँ के मुस्लिमों ने इसके चारों तरफ से 20 फीट ऊँचे पिलर रातों रात खड़े किए।

इस पर जनवरी, 2025 में ही रातों-रात छत डाल गई। इस निर्माण कार्य के लिए ना प्रशासन की कोई अनुमति ली गई और ना ही उसे सूचना दी गई। यह पूरा मामला तब खुला जब बरेली के सांसद छत्रपाल सिंह गंगवार इस गाँव के पास से गुजरे। उन्होंने इस जगह को देख कर जानकारी इकट्ठा की।

इसके बाद उन्होंने प्रशासन से विषय में शिकायत की। एसडीएम ने इसके बाद मामले की जाँच के आदेश दिए। प्रशासन जब जाँच की तो निर्माण अवैध निकला। इसके बाद तुंरत इस निर्माण को तोड़ने के आदेश दिए गए। लेकिन यहाँ निर्माण को तोड़ने के लिए प्रशासन कोई कार्रवाई करता इससे पहले ही लोग तोड़ने लगे।

मुस्लिमों ने यहाँ निर्माण में लगी बाँस-बल्ली हटा कर सीमेंट के पिलर और छत तोड़ने चालू कर दिए। मुस्लिमों ने कहा कि उन्होंने पुरानी मजार की हिफाजत के लिए यह नया निर्माण किया था। हालाँकि, इस संबंध में कोई कागज प्रशासन की जाँच पर नहीं दिखाए गए।

पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए गाँव के 100 लोगों पर शांतिभंग की धाराओं में FIR दर्ज की है। इनको 5 लाख के मुचलके पर छोड़ा गया है। पुलिस ने कहा है कि मजार तोड़ने को लेकर कोई विवाद नहीं है।

संभल दंगों के बीच वकील विष्णु जैन की हत्या करने का था प्लान, गोली पुलिस पर चलानी थी: गिरफ्त में आए वारिस ने कबूला- ‘नईम, कैफ को मैंने ही मारा’, ऑडियो वायरल

संभल में दंगाई हिंसा के दौरान एडवोकेट विष्णु जैन की हत्या करना चाहते थे। इसके लिए हथियार भी दंगाइयों के बीच बाँटे गए थे। यह साजिश शारिक साठा ने रची थी। उसी के गुर्गे मुल्ला अफरोज ने हथियार दिए थे। यह सारे खुलासे शारिक साठा के एक और गुर्गे की गिरफ्तारी से हुए हैं। संभल पुलिस ने दंगाई वारिस को गिरफ्तार किया है। वारिस ने दंगे के दौरान 2 युवकों की हत्या भी कर दी थी। वह पुलिस को भी निशाना बना रहा था।

वारिस को पुलिस ने शनिवार (25 जनवरी, 2025) को पकड़ा। वह मोहल्ला खग्गूसराय का रहने वाला है। उसने पुलिस पूछताछ में खुलासा किया है कि हिंसा के बाद वह दिल्ली में छिपा था। वारिस ने पुलिस को बताया है कि शारिक साठा गैंग ने कथित तौर पर नबी की शान में गुस्ताखी करने वाले एडवोकेट विष्णु शंकर जैन की हत्या के लिए हथियार बाँटे थे।

शारिक साठा गैंग ने कहा था कि उन्हें ‘मस्जिद की हिफाजत’ करनी है और सर्वे के दौरान हत्या करनी है। विष्णु शंकर जैन शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर विवाद में हिन्दू पक्ष के वकील हैं। वारिस ने यह खुलासा भी किया है कि हिंसा के दौरान उसने गोली चलाई जिससे कैफ और नईम नाम के युवक मारे गए। वारिस ने बताया है कि उसे हथियार मुल्ला अफरोज ने दिए थे। मुल्ला पहले ही गिरफ्तार हो चुका है।

वारिस का एक ऑडियो भी वायरल हुआ था। इसमें उसने हिंसा के दौरान ‘सामान’ लाने को कहा था। पुलिस ने कहा है कि ‘सामान’ का मतलब हथियार ही थे। उसका साथी पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। वारिस के पास से पुलिस को एक तमंचा,कारतूस, नाल में फंसा एक कारतूस और दो मोबाइल बरामद किए हैं।

वारिस ने बताया है कि शारिक साठा का गैंग इन हत्याओं से देश भर में दंगे भड़काना चाहता था। वारिस की गिरफ्तारी के साथ ही हिंसा में हुई 4 मौतों का मामला सुलझ गया है। इनमें से 2 हत्याएँ मुल्ला अफरोज और 2 वारिस ने की थी। पुलिस ने एक और दंगाई को भी संभल से गिरफ्तार किया है। उसका नाम मोहम्मद निहाल है।

 

‘RIMS में नहीं होगी सरस्वती पूजा, जाकर हॉस्टल में मनाओ’: झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने कानून-व्यवस्था का दिया था हवाला, विरोध के बाद फैसला वापस

झारखंड के राँची में स्थित राजेन्द्र इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में सरस्वती पूजा के आयोजन पर रोक लगा दी गई। कई दशकों से होते आ रहे इस आयोजन को रद्द करने को कहा गया। छात्रों को सभी तैयारियाँ बंद करने और चंदे का पैसा वापस करने का आदेश RIMS प्रशासन ने जारी किया। RIMS के ही एक बड़े डॉक्टर समेत बाकी लोगों ने जब मामला उठाया तो RIMS को पीछे हटना पड़ा और उसने अनुमति दी।

RIMS में हर साल सरस्वती पूजा का आयोजन छात्र मिल कर करते हैं। यह आयोजन MBBS के दूसरे वर्ष के छात्र करते हैं। इस बार की सरस्वती पूजा आयोजन के लिए छात्रों ने लाखों का चंदा इकट्ठा करके सारे इंतजाम कर लिए थे। लगभग 70% काम हो चुका था। कई वेंडरों को भी पैसा दिया जा चुका था। हालाँकि, इसी बीच RIMS प्रशासन ने सरस्वती पूजा पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

RIMS की डीन शशिबाला सिंह ने शनिवार (25 जनवरी, 2025) को एक आदेश जारी करके पूजा को निरस्त करने को कहा। इस आदेश में RIMS में मारपीट की एक घटना का हवाला दिया गया। यह घटना शुक्रवार (24 जनवरी, 2025) को घटी थी जिसमें छात्र और कुछ बाहरी लोग आपस में भिड गए थे। RIMS प्रशासन के इस आदेश पर छात्रों ने नाराजगी जताई।

RIMS में न्यूरो सर्जन डॉक्टर विकास कुमार ने भी इस आदेश को लेकर आवाज उठाई। उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर RIMS प्रशासन को निशाने पर लिया। डॉक्टर विकास ने कहा, “लगता है रिम्स में बैठे बड़े पद वालो से RIMS संभल नहीं रहा है और अपनी कमी को छुपाने के लिए इस देश की सांस्कृतिक परंपराओं पर सीधा आघात किया जा रहा है, जो हर दृष्टि से निंदनीय है।”

सोशल मीडिया पर इसको लेकर भाजपा ने भी सरकार को निशाने पर लिया। भाजपा झारखंड के मुखिया बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य मंत्री इरफ़ान अंसारी की साम्प्रदायिक सोच के चलते यह रोक लगी है। उन्होंने इसे धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देने वाला बताया।

वहीं स्वास्थ्य मंत्री इरफ़ान अंसारी ने इसे बाद दावा किया कि रोक कानून व्यवस्था को देखते हुए लगाई गई है। उन्होंने कहा कि छात्र हॉस्टल में ही सरस्वती पूजा मनाएँगे। मंत्री अंसारी ने आरोप लगाया कि बाबूलाल मरांडी भाईचारे को तोड़ रहे हैं। हालाँकि, सोशल मीडिया पर काफी विरोध के बाद RIMS ने रोक का फैसला वापस ले लिया।

इसकी जानकारी डॉक्टर विकास कुमार ने दी। विकास कुमार ने लिखा, “सरस्वती पूजा की परमिशन मिल गई है ,प्रबंधन ने अपनी रोक को वापस ले लिया है। इस छात्रों में खुशी की लहर है।”

गौरतलब है कि 2022 में रांची में हुए दंगों के दौरान 2 मुस्लिम पुलिस फायरिंग में मारे गए थे। इरफ़ान अंसारी ने इन्हें शहीद का दर्जा, 50 लाख रुपए का मुआवजा और उसके परिजनों को सरकारी नौकरी देने की माँग की थी। 

‘बाहर फेंको भगवान की मूर्ति, ईसाई बन जाओ’ : UP के लखीमपुर में मिशनरियाँ खुलेआम करवा रहीं दलितों का धर्मांतरण, एक बोरी चावल और 1 बोतल पानी में सौदा

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में ईसाई मिशनरियाँ धर्मांतरण में सक्रिय हैं। वो लोगों को चंगाई, लालच और डर दिखाकर ईसाई बना रही हैं और धर्मांतरण का प्रयास कर रही हैं। ताजा मामला नीमगाँव थाना इलाके के बेजहम गाँव का है, जहाँ ईसाई मिशनरी से जुड़े 2 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। यहाँ लोगों को ‘जमजम पानी’ पिलाकर और 1 बोरी चावल के दम पर ईसाई बनाया जा रहा था। हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने मिशनरियों के खेल को उजागर किया और पुलिस को सूचित किया। इस मामले की एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

एफआईआर के मुताबिक, नीमगाँव थाना इलाके के बेजहम गाँव में बाबूराम नाम के व्यक्ति के घर में ईसाई धर्मांतरण का काम किया जाता है। जहाँ बाबूराम ने रविवार (26 जनवरी 2025) को धर्मांतरण की नीयत ये काफी लोगों को अपने घर पर बुलाया था। उसके घर पर प्रमोद कुमार बाल्मीकि नाम का पादरी भी मौजूद था। बाबूराम शिकायतकर्ता युवक को ये कह कर अपने घर ले गया था कि उसकी तबियत ठीक हो जाएगी, क्योंकि उसके पास विशेष दवा है।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि वहाँ पहुँचने के बाद बाबूराम और प्रमोद कुमार बाल्मीकि ने माथे से तिलक हटाने और अपने घर से देवी-देवताओं की मूर्तियों को हटाने की बात कही। दोनों लोगों पर ईसाई मजहब अपनाने का भी दबाव डाल रहे थे। वहाँ लोगों को एक बोतल पानी, एक बोरी चावल और और तेल देकर धर्मांतरित कराया जा रहा था। हमारे साथ भी ऐसी ही कोशिश हुई। इसके बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत की।

इस मामले में नीमगाँव की एसओ सुनीता कुशवाहा, डायल 112 पुलिस और बेहजम चौकी प्रभारी सिद्धांत पवार मौके पर पहुँचे और छापेमारी की। मौके पर दर्जनों लोग मौजूद मिले और शुरुआती जाँच में आर्थिक प्रलोभन देकर धर्मांतरण की भी पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस ने 2 आरोपितों को हिरासत में ले लिया।

घटना का खुलासा करने वाले हिन्दू कार्यकर्ता सूर्यमणि मिश्र ने बताया, “हमें लम्बे समय से यहाँ धर्मांतरण की शिकायत आ रही थी, पता चला था कि यहाँ गरीब लोगों को झांसा देकर ईसाई बनाया जा रहा है। सूचना मिलने पर अमन रस्तोगी समेत तमाम हिन्दू कार्यकर्ताओं ने इस घटना का खुलासा किया और आरोपितों पर कार्रवाई करवाई।”

क्या होता है अखाड़ा, क्या है महामंडलेश्वर बनने का विधान, कैसा होता है उनका जीवन, क्यों ममता कुलकर्णी की संन्यास दीक्षा पर हो रहा विवाद: सारे सवालों का जवाब एक साथ

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जारी महाकुंभ में बॉलीवुड अभिनेत्री ममता कुलकर्णी ने 24 जनवरी 2025 को गृहस्थ जीवन का त्याग करते हुए संन्यास ले लिया था। इसके बाद किन्नर अखाड़े में उन्हें महामंडलेश्वर बनाया गया। संन्यास के बाद ममता कुलकर्णी ने अपना नया नाम श्री यमाई ममतानंद गिरि रखा लिया। अब ममता कुलकर्णी के महामंडलेश्वर बनाने पर विवाद खड़ा हो गया है। इससे कई संत नाराज हैं।

ममता कुलकर्णी ने तब कहा था कि यह कदम उन्होंने दो साल की तपस्या के बाद और महादेव एवं महाकाली के आदेश पर उठाया है। साल 2013 में स्थापित किन्नर अखाड़े से जुड़ीं महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरि ने कहा था कि ममता कुलकर्णी ने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया है और अब अपना जीवन धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यों में समर्पित करेंगी। हालाँकि, कई संत इनसे इत्तेफाक नहीं रखते।

ममता कुलकर्णी के विरोध में आए संत

नाराज संतों में से एक शांभवी पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि ममता कुलकर्णी का बहुत बड़ा नाम है और किन्नर अखाड़े को लोग उनके नाम पर व्यापार करेंगे। उन्होंने कहा कि ममता का विषय बहुत घातक और धर्म के खिलाफ है। किन्नर अखाड़े को मान्यता देकर पिछले कुंभ में महापाप हुआ था। अब कुंभ का मजाक बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि जिस प्रकार की अनुशासनहीनता हो रही है, वो बहुत घातक है। उन्होंने इसे सनातन धर्म के साथ छल बताया। उन्होंने कहा, “मैंने ममता से कहा कि इन लोगों (किन्नर अखाड़ा) के जाल में मत पड़ो। स्त्री के लिए संन्यास नहीं है। ऐसी तमाम परंपरा है, जिसमें तुम विरक्त होकर रह सकती हो। ऐसी जगह (किन्नर अखाड़ा में) ना गिरो कि लोग तुम्हारे ऊपर थूकें।”

स्वामी आनंद स्वरूप ने आगे कहा, “इस अखाड़े को लोग मजाक में ले रहे हैं। वहाँ ज्ञान-भक्ति की बात नहीं हो रही।”

ममता कुलकर्णी के पक्ष में भी खड़े हुए संत

हालाँकि, कुछ संत ममता कुलकर्णी और किन्नर अखाड़े के पक्ष में खड़े हो गए हैं। इनमें अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी और भैरव अखाड़ा कहलाने वाला श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि भी शामिल हैं। अखाड़ा परिषद ने ही साल 2019 में

रवींद्र पुरी ने कहा, “वैराग्य कभी भी आ सकता है। मैं चाहूँगा कि सही मायने में महामंडलेश्वर का जो अर्थ है, अगर ममता जी उसके अनुसार चलेंगी तो पूरे देश में हमारी अध्यात्म परंपरा उच्च शिखर पर पहुँचेगी। वैराग्य किस पर आए, यह कोई नहीं कह सकता। हमारी परंपरा में कई बड़े-बड़े ऋषि रहे, जो डाकू थे, वो बहुत बड़े संत हो गए। ममता जी को आध्यात्मिक जगत में प्रवेश बहुत अच्छी बात है।”

उन्होंने कहा कि महामंडलेश्वर का अर्थ है ‘मंडल का ईश्वर’… एक मंडल लेकर उनको चलना है। उनके साथ सैकड़ों संत होने चाहिए। वो धर्म का प्रचार-प्रसार करें। ममता पर ड्रग्स के आरोपों को लेकर रवींद्र पुरी ने कहा, “इससे पूर्व में वो क्या थीं, वो जानने की आवश्यकता नहीं है। उन पर पूर्व में जो भी आरोप लगे, वो सिद्ध नहीं हो पाए। देश में जितनी बड़ी हस्तियां हैं, उन पर आरोप लगते रहते हैं।”

वहीं, जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि ने कहा कि संन्यास लेने का अधिकार सबको है। उन्होंने कहा, “अपनी मोह-माया और हर प्रकार की सांसारिकता त्याग कर कोई व्यक्ति श्रेष्ठ कार्यों के लिए, लोक कल्याण के लिए, परमार्थ के कार्य करने के लिए आना चाहता है तो उसका स्वागत है।”

जूना अखाड़े के प्रवक्ता नारायण गिरी ने कहा, “फिल्म अभिनेत्री बनना कोई दोष नहीं है। हमारे यहाँ एक वेश्या को भी गुरु बनाया गया था। योग्यता से किसी को भी महामंडलेश्वर बनाया जा सकता है। इसमें कोई भी पुरुष, महिला या किन्नर कोई भी पदवी प्राप्त कर सकते हैं।” उन्होंने कहा कि देश के विद्वान, राष्ट्रहित में कार्य करने वाले, आध्यात्मिक या सामाजिक कार्यकर्ता को महामंडलेश्वर की उपाधि देते हैं।

उन्होंने आगे कहा, “किन्नर अखाड़ा 2019 में रजिस्टर्ड हुआ था। वो जूना अखाड़े की एक शाखा है। किन्नरों को हिंदू परंपरा से जोड़ने के लिए श्री महंत जी महाराज ने अखाड़े में शामिल किया था। जब कोई अखाड़ा पूर्ण रूप से बन जाता है तो उसे अधिकार है कि वो किसी को महंत, साध्वी या महामंडलेश्वर बनाएँ। हर अखाड़े के अपने मापदंड होते हैं और वे फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं।”

कैसे बनते हैं महामंडलेश्वर

अखाड़ों में महामंडलेश्वर का पद प्रभावशाली माना जाता है। हर अखाड़े में महामंडलेश्वर बनाने की प्रक्रिया अलग-अलग है। महामंडलेश्वर छत्र-चंवर लगाने और चाँदी के सिंहासन बैठने का अधिकारी होता है। महामंडलेश्वर की इस सिंहासन पर बैठाकर छत्र-चंवर के साथ सवारी निकाली जाती है। यह पदवी पाने के लिए पाँच स्तर पर जाँच होती है। इसके साथ ही ज्ञान-वैराग्य की परीक्षा में खरा उतरना पड़ता है।

अगर कोई व्यक्ति संन्यास या महामंडलेश्वर पद के लिए किसी अखाड़े के लिए संपर्क करता है तो उसे अपना नाम, पता, शैक्षिक योग्यता, सगे-संबंधियों का ब्योरा और नौकरी-व्यवसाय की जानकारी देनी होती है। इसके बाद अखाड़े से जुड़े थानापति के जरिए उस व्यक्ति की पृष्ठभूमि और जानकारी की पड़ताल कराई जाती है। थानापति की रिपोर्ट पर अखाड़े के सचिव और पंच अलग-अलग जाँच करते हैं। 

अखाड़े से जुड़े व्यक्ति के स्थान पर जाकर परिजनों एवं रिश्तेदारों से संपर्क कर जानकारी को सत्यापित करते हैं। उस व्यक्ति की शिक्षा को सत्यापित करने के लिए स्कूल-कॉलेज में जाकर पड़ताल भी की जाती है। इसके स्थानीय थाने में जाकर उस व्यक्ति की जाँच की जाती है कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला तो नहीं दर्ज है। जाँच के बाद अखाड़े के सभापति को रिपोर्ट दी जाती है।

इसके बाद सभापति अपने स्तर से जाँच करवाते हैं। इसके बाद अखाड़े के पंच उनके ज्ञान की परीक्षा लेते हैं। इसमें सफल होने पर महामंडलेश्वर की पदवी दी जाती है। हालाँकि डॉक्टर, पुलिस-प्रशासन के अधिकारी, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिवक्ता और नेता को महामंडलेश्वर बनाने में संन्यास की उम्र की छूट दी जाती है। दो-तीन साल के संन्यास में भी उन्हें महामंडलेश्वर बना दिया जाता है।

महामंडलेश्वर पद के लिए सामान्य तौर पर शास्त्री, आचार्य होना जरूरी है, जिसने वेदांग की शिक्षा हासिल कर रखी हो। ऐसी डिग्री ना हो तो व्यक्ति को कथावाचक या स्थानीय मठ से जुड़ा होना जरूरी है। यह भी देखा जाता है कि मठ द्वारा सनातन धर्मावलंबियों के लिए विद्यालय, मंदिर, गोशाला आदि का संचालन होना चाहिए।  

नागा परंपरा में थानापति, कोतवाल, कोठारी, भंडारी, कारोबारी सहित कई पद होते हैं। नागा संन्यासियों की योग्यता और उनके स्तर को देखते हुए उन्हें पद सौंपे जाते हैं। साधारण संत को महामंडलेश्वर जैसे पद पर पहुँचने के लिए योग्य होना जरूरी है। उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें पदवी दी जाती है। यह पद सर्वोच्च आचार्य महामंडलेश्वर से नीचे होता है। ये साधुओं के एक मंडल के अधिपति होते हैं।

महामंडलेश्वर पद बनाने को लेकर जूना अखाड़े के प्रवक्ता नारायण ने कहा कि सबसे पहले अखाड़े में महापुरुष, अवधूत, महंत, श्री महंत बनता है। फिर उस व्यक्ति का राष्ट्र एवं धर्म में योगदान देखा जाता है। उस आधार पर आगे फैसला लिया जाता है। कोई व्यक्ति आए, संन्यासी बनने की घोषणा करे और अखाड़ा उसे महामंडलेश्वर बना दे, ऐसी परंपरा जूना अखाड़े की नहीं है।

जिस व्यक्ति को महामंडलेश्वर का पद दिया जाता है, उसे दीक्षा दी जाती है। वह अपना वस्त्र त्यागकर अखाड़े से मिले पीले या भगवा वस्त्र को धारण करता है। इसके बाद वह अपना पिंडदान करता है। पिंडदान के बाद उस व्यक्ति का पट्टाभिषेक किया जाता है। इस दौरान वह व्यक्ति अपना बाल काटता, विधि-विधान से पूजा-पाठ करता है। इसके बाद उसे दूध से स्नान कराया जाता है और पट्टा पहनाया जाता है। इस दौरान उसे दंड-कमंडल दिया जाता है। इसे पंचकर्म कहा जाता है।

महामंडलेश्वर की पदवी मिलने के बाद कुछ प्रतिबंधों के साथ से जीना पड़ता है। इनमें घर-परिवार से दूरी, चारित्रिक दोष नहीं लगना चाहिए, आपराधिक छवि के लोगों से दूरी, भोग-विलासिता के जीवन दूसरी, दूसरों की जमीन-संपत्ति पर कब्जा की नीयत से दूरी, मांस-मदिरा दूरी शामिल है। इन सबकी अनदेखी करने पर किसी भी व्यक्ति को अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है।

महामंडलेश्वर पद की जिम्मेदारियाँ

किसी अखाड़े में महामंडलेश्वर दूसरा सर्वोच्च पद होता है। इसलिए उनकी जिम्मेदारियाँ भी बड़ी होती हैं। अखाड़े के धार्मिक और आध्यात्मिक नेता होने के नाते महामंडलेश्वर साधुओं और अनुयायियों को धर्म का पालन और समाज कल्याण के लिए प्रेरित करते हैं। इसके साथ महामंडलेश्वर समाज में धर्म और संस्कृति का प्रचार करते हैं। वे प्रवचन, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का नेतृत्व करते हैं।

महामंडलेश्वर अखाड़े के संगठन का काम, संपत्तियों का प्रबंधन और प्रशासन का काम भी देखते हैं। इसके साथ ही वे अखाड़े के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन, अखाड़े से संबंधित धर्मशाला और आश्रमों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे कुंभ, अर्ध कुंभ और महाकुंभ मेले और अन्य धार्मिक आयोजनों में अखाड़े का नेतृत्व करते हैं।

अमृत स्नान के दौरान निकाली जाने वाली शोभायात्रा का महामंडलेश्वर नेतृत्व भी करते हैं। इसके अलावा, कुंभ में संतों को नागा साधु या संन्यासी बनने की दीक्षा दी जाती है, उस दौरान अनुष्ठान का संचालन एवं नेतृत्व भी महामंडलेश्वर ही करते हैं। धर्म आदि का प्रचार-प्रसार भी इनका प्रमुख कार्य होता है। इसके अलावा भी इनके कई कार्य होते हैं।

क्या होता है अखाड़ा

अखाड़ा साधु-संतों का एक समूह होता है। वे शास्त्र एवं शस्त्र में निपुण होता है। कहा जाता है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द निकला है। पहले अखाड़ा को साधुओं का बेड़ा कहा जाता था। यह भी कहा जाता है कि मुगल काल में अखाड़ा शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा। अखाड़ा शब्द कुश्ती के लिए इस्तेमाल होने वाले मैदान के लिए भी किया जाता है। यह भी संन्यासियों के लिए मोह-माया त्याग के लिए संघर्ष का स्थान है।

देश में अभी कुल 13 अखाड़े हैं। ये सभी अलग-अलग परंपरा से जुड़े हैं। इनमें 7 अखाड़े शैव संन्यासी संप्रदाय के हैं, जबकि 3-3 अखाड़े वैरागी और उदासीन परंपरा के साधुओं के हैं। हर अखाड़े में अलग-अलग तरह से दीक्षा दी जाती है। जैसे कुछ अखाड़ों में महिला साध्वियों को भी दीक्षा दी जाती है और कुछ अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते है।

कुछ अखाड़े 8 से 12 साल तक के बच्चों को दीक्षा दी देते हैं तो कई अखाड़े कुश्ती पर जोर देते हैं। हर अखाड़े के अपना ईष्टदेव और ईष्टदेवी होती हैं। वे अपना ध्वज भी रखते हैं। इसके अलावा, उनमें सर्वोच्च पद में भी अंतर होता है। जैसे शैव अखाड़े में आचार्य महामंडलेश्वर का पद सर्वोच्च होता है। वहीं, वैष्णव अखाड़े में श्रीमहंत का पद सर्वोच्च होता है।

पंजाब की आर्थिक सेहत सबसे बुरी, केरल-पश्चिम बंगाल भी अत्यंत बीमार: नीति आयोग ने जारी किया 18 राज्यों का आँकड़ा, दनदना रहे हैं ओडिशा-गुजरात जैसे प्रदेश

नीति आयोग ने 18 प्रमुख राज्यों का वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक (Fiscal Health Index) जारी किया। शुक्रवार (24 जनवरी 2025) को जारी, यह सूचकांक राज्यों की जीडीपी में हिस्सेदारी, जनसांख्यिकी, सार्वजनिक खर्च, राजस्व और वित्तीय स्थिरता के आधार पर रैंकिंग करता है। वित्तीय वर्ष 2022-23 के विश्लेषण पर आधारित इस सूचकांक में पंजाब सबसे नीचे स्थान पर है। अन्य निचले पाँच राज्यों में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल और हरियाणा शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब व्यय की गुणवत्ता, वित्तीय अनुशासन और ऋण सूचकांक के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करता है, जबकि राजस्व संग्रह और ऋण स्थिरता में थोड़ा बेहतर है। वहीं, ओडिशा ने ऋण सूचकांक और ऋण स्थिरता में सबसे ऊँची रैंकिंग प्राप्त की।

यह सूचकांक पाँच प्रमुख संकेतकों पर आधारित है: व्यय की गुणवत्ता, राजस्व संग्रह, वित्तीय अनुशासन, ऋण सूचकांक और ऋण स्थिरता। डेटा मुख्य रूप से नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) से लिया गया है। ओडिशा ने 67.8 अंकों के साथ शीर्ष स्थान हासिल किया है, जबकि पंजाब केवल 10.7 अंकों के साथ सबसे निचले स्थान पर रहा। शीर्ष पाँच राज्यों में ओडिशा के बाद छत्तीसगढ़, गोवा, झारखंड और गुजरात शामिल हैं। वहीं, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश भी टॉप परफॉर्मर्स में हैं।

नीति आयोग ने कहा कि ओडिशा ने निम्न वित्तीय घाटे, अच्छी ऋण प्रोफाइल और मजबूत पूंजीगत व्यय अनुपात बनाए रखा है। दूसरी ओर, पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को कमजोर राजस्व संग्रह, उच्च ऋण और बड़े ब्याज भुगतान जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि ओडिशा, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्य लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल पिछले नौ वर्षों से खराब वित्तीय स्थिति में हैं।

गाजा से लेकर बांग्लादेश तक ट्रंप ने शुरू किया ‘सफाई अभियान’: युनुस सरकार को मिल रही अमेरिकी खैरात USAID पर रोक, फिलिस्तीनियों को जॉर्डन-मिस्र में बसाने का जताया इरादा

अमेरिका में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद डोनाल्ड ट्रंप लगातार कड़े फैसले लेते दिख रहे हैं। खासकर उन क्षेत्रों को लेकर जो इस्लामी कट्टरपंथियों के आतंक से प्रभावित क्षेत्र हैं। हाल में उन्होंने गाजा को साफ करने की बात कही है और साथ ही बांग्लादेश की युनुस सरकार को झटका देते हुए अमेरिका से भेजी जाने वाली मदद पर 90 दिन के लिए रोक लगा दी है।

सामने आई मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, ट्रंप ने पूरे गाजा को खाली कराकर वहाँ रह रहे लोगों को कहीं और बसाने की बात कही। उन्होंने जॉर्डन और मिस्र जैसे देशों से अपील की कि वह गाजा के युद्ध ग्रस्‍त क्षेत्र में फँसे लोगों को वो ज्‍यादा से ज्‍यादा संख्‍या में शरण दें ताकि वहाँ परिस्थिति को सुधारा जा सके।

ट्रंप ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मिस्र और जॉर्डन ज्यादा से ज्यादा गाजा के लोगों को स्वीकार करें। आप शायद 15 लाख लोगों की बात कर रहे हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि पूरे इलाके को साफ किया जाए और हम कह सकें कि युद्ध खत्म हो गया है।”

फिलीस्तीनियों को शरण देने के नाम पर उन्होंने कहा, “यह अस्थायी या दीर्घकालिक हो सकता है। गाजा संघर्ष का सामना कर रहा है। कुछ तो किया ही जाना चाहिए। यह क्षेत्र अभी पूरी तरह से विध्वंस स्थल में बदल चुका है। लगभग सब कुछ तबाह हो चुका है और लोग मर रहे हैं।”

ट्रंप ने अपील की, “मैं कुछ अरब देशों के साथ मिलकर उनके (गाजा पट्टी के लोगों) लिए एक अलग जगह पर आवास बनाने का आह्वान करना चाहूँगा, जहाँ वे शांति से रह सकें।”

वहीं बांग्लादेश को लेकर बात करें तो खबर ये हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएआईडी) ने बांग्लादेश में अनुबंधों, कार्य आदेशों, अनुदानों, सहकारी समझौतों या अन्य सहायता या खरीद उपकरणों के तहत किसी भी कार्य को तत्काल बंद या निलंबित करने की घोषणा की है।

अमेरिकी एजेंसी ने शनिवार (25 जनवरी) को इस संबंध में परियोजना कार्यान्वयन साझेदारों को एक संदेश भेजा, जिसमें तत्काल निलंबन की बात कही गई।

मालूम हो कि ट्रंप का ये कदम बांग्लादेश के लिए बड़ा झटका इसलिए भी है क्योंकि ट्रंप सरकार से पूर्व बाइडेन सरकार ने बांग्लादेश की यूनुस सरकार को पूर्ण समर्थन देने का आश्वासन दिया था। बाइडेन और यूनुस के बीच हुई मुलाकात संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान न्यूयॉर्क में हुई थी। इस बैठक में बाइडेन ने कहा कि अमेरिका बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के सुधार एजेंडे का समर्थन करेगा।

चाहे इस्लामी आतंकवाद का गढ़ हो या वामपंथी आतंक का… हर जगह 26 जनवरी पर लहराया तिरंगा, तुमलपाड़ में ग्रामीणों और जवानों ने पहली बार किया झंडोत्तोलन: आतंकियों के परिजन बोले- जय हिंद

भारत का तिरंगा अब उन इलाकों में भी शान से लहरा रहा है, जहाँ कभी हिंसा और आतंकवाद का साया हुआ करता था। बात चाहे माओवादी-नक्सली हिंसा से जूझ रहे छत्तीसगढ़ की हो या आतंकवाद से जूझ रहे कश्मीर की।

जम्मू-कश्मीर में जहाँ कभी घर-घर से अफजल जैसे आतंकी निकलते थे, अब उन्हीं घरों में तिरंगा लहराया जा रहा है। 26 जनवरी के मौके पर कश्मीर के शोपियाँ जिले से नई तस्वीरें सामने आई। यहाँ आतंकियों के परिवार वाले भी गणतंत्र दिवस पर तिरंगे के साथ खड़े नजर आए। यह तस्वीर इस बात का सबूत है कि अब घाटी बदल रही है।

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, दशकों तक आतंकवाद की चपेट में रहे इस इलाके में भारत के संविधान और तिरंगे के प्रति प्यार ने एक नई कहानी लिखी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब शांति और विकास का माहौल है। यह बदलाव अनुच्छेद 370 हटने के बाद तेजी से नजर आया है। शोपियाँ में आतंकियों के परिवार वाले न केवल तिरंगा फहरा रहे हैं, बल्कि ‘जय हिंद’ के नारे भी लगा रहे हैं।

शोपियाँ में पूर्व आतंकियों के परिजनों ने लहराया तिरंगा (फोटो साभार : न्यूज 18)

वहीं, छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में भी एक नई शुरुआत देखने को मिली। नक्सल प्रभावित इलाकों में पहली बार तिरंगा फहराया गया। CRPF की 74वीं बटालियन के जवानों और गाँववालों ने मिलकर तिरंगा फहराया। कभी नक्सलियों के गढ़ रहे सुकमा के तुमलपाड़ गाँव में अब विकास और शांति की बयार बह रही है। इस कार्यक्रम में CRPF कमांडेंट हिमांशु पांडे भी शामिल हुए।

दोनों घटनाएँ इस बात का प्रतीक हैं कि आतंकवाद और नक्सलवाद से जूझ रहे भारत के ये इलाके अब अमन-चैन की ओर बढ़ रहे हैं। घाटी और नक्सल प्रभावित इलाकों में तिरंगे का लहराना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि बदलते भारत की तस्वीर है।

बता दें कि साल 2023 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कश्मीरी आतंकियों के परिवारों से जुड़े लोगों ने अपने घरों पर तिरंगा लहराया था, जिसके वीडियो भी वायरल हुए थे। उस समय हिज्बुल मुजाहिद्दीन के सक्रिय रहे आतंकी जावेद मट्टू के भाई रईस तिरंगा लहराते दिखे थे।

केंद्र सरकार देगी अधिक हिस्सा, महंगाई का रखेगी ख्याल, न्यूनतम पेंशन की होगी गारंटी: 1 अप्रैल से लागू होगा UPS, जानिए NPS और OPS से कैसे अलग है यह स्कीम

बजट से पहले केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को न्यू पेंशन स्कीम (NPS) के तहत यूनिफाइड पेंशन स्‍कीम (UPS) का विकल्प पेश क‍िया है। सरकार ने इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी है। UPS सरकार की नई स्‍कीम है और यह 1 अप्रैल 2025 से लागू हो जाएगी। सरकार ने अगस्त 2024 में UPS को पेश किया था, जो सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद गारंटेड पेंशन प्रदान करेगी।

UPS स्कीम को ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) और NPS के फायदों को मिलाकर लाया गया है। इसमें OPS की तरह गारंटेड पेंशन का प्रावधान है। यूनिफाइड पेंशन स्कीम केंद्र सरकार के ऐसे कर्मचारियों पर लागू होगी, जो कि NPS के तहत आते हैं और UPS का विकल्प चुनते हैं। UPS में सरकार का अंशदान कर्मचारी की बेसिक सैलरी का 18.5 प्रतिशत होगा।

इस योजना के कारण सरकारी खजाने पर पहले साल 6,250 करोड़ रुपए का बोझ बढ़ेगा। इसका फायदा 23 लाख कर्मचारियों को मिलेगा। नोटिफिकेशन के अनुसार, पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) ये तय करेगा कि UPS चुनने वाले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को NPS के तहत मिलने वाली राशि के मुकाबले कितनी अतिरिक्त राशि दी जाएगी।

क्या है यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS)

UPS के तहत सरकारी कर्मचारियों के 12 महीने की औसत बेसिक सैलरी का 50 प्रतिशत हिस्‍सा उनकी रिटायरमेंट के बाद उन्हें जीवन भर दिया जाएगा। इसके लिए कर्मचारियों को न्यूनतम 25 साल सेवा देनी होगी। इस पेंशन में समय-समय पर महंगाई भत्ता (DR) का लाभ भी जोड़ा जाएगा। UPS के तहत ग्रैच्‍युटी के अलावा रिटायरमेंट पर एकमुश्‍त राशि भी दी जाएगी।

ग्रैच्युटी हर 6 महीने के मूल वेतन और महंगाई भत्ता का 10वाँ हिस्‍सा होगा। इस स्कीम के तहत मिलने वाली ग्रैच्‍युटी की राशि ओल्ड पेंशन स्कीम यानी OPS से मिलने वाली राशि से कम हो सकती है। सेवानिवृत सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार के किसी एक योग्‍य सदस्‍य को उस पेंशन का 60 प्रतिशत हिस्‍सा दिया जाएगा।

अगर कर्मचारी ने बिना किसी दंड के सिर्फ 10 साल या उससे अधिक समय तक सेवा दी है तो उसे कम-से-कम 10,000 रुपए का पेंशन दिया जाएगा। हालाँकि, इस्तीफा, बर्खास्तगी या सेवा से हटाने के मामलों में यह भुगतान लागू नहीं होगा। UPS चुनने वाले सरकारी कर्मचारी किसी अन्य पॉलिसी रियायत, पॉलिसी चेंज, वित्तीय लाभ के हकदार नहीं होंगे।

UPS चुनने वाले कर्मचारियों के रिटायरमेंट फंड में दो हिस्से होंगे। एक व्यक्तिगत फंड होगा और दूसरा पूल फंड। व्यक्तिगत फंड में कर्मचारी और सरकार का योगदान शामिल होगा, जो एक समान होगा। वहीं, दूसरे पुल फंड में सरकार का अतिरिक्त योगदान होगा। इसमें कर्मचारी का योगदान उनकी बेसिक सैलरी का 10 प्रतिशत होगा, जबकि सरकार का अंशदान 18.5 प्रतिशत रहेगा।

OPS और NPS से किस तरह अलग है UPS (साभार: पत्रिका)

न्यू पेंशन स्कीम (NPS)

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार एनपीएस लेकर आई थी। इसे OPS की जगह लागू किया गया था। न्यू पेंशन स्कीम यानी NPS में सरकारी कर्मचारियों को अपनी बेसिक सैलरी का 10 प्रतिशत अंशदान करना होता है। इसके अलावा, इसमें सरकार 14 प्रतिशत का अंशदान करती है। साथ में इसमें महंगाई से सुरक्षा भी नहीं है। कर्मचारियों से अंशदान लेने के कारण इस योजना का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ।

दरअसल, NPS में सरकारी कर्मचारी की बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता का 10 प्रतिशत हिस्सा कटता है। इस राशि को पेंशन फंड में डाला जाता है, जिसका इस्तेमाल सेवानिवृत्ति के बाद कर्माचारी को पेंशन देने के लिए किया जाता है। NPS शेयर मार्केट से लिंक होता है। इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता है। इसके साथ ही इसमें आयकर का भी प्रावधान किया गया है।

NPS में रिटायरमेंट पर पेंशन पाने के लिए एनपीएस फंड का 40 प्रतिशत निवेश करना होता है। इसके बाद रिटायरमेंट के बाद इस योजना के तहत पेंशन के रूप में निश्चित राशि की गारंटी नहीं होती है। इस योजना को अपनाने वाले सरकारी कर्मचारियों को छह महीने बाद मिलने वाले महंगाई भत्ता (DA) का प्रावधान नहीं है। NPS सरकारी और निजी क्षेत्र, दोनों तरह के कर्मचारियों के लिए उपलब्ध है।

ओल्ड पेेंशन स्कीम (OPS)

OPS एक पुरानी पेंशन योजना है। इसमें सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद उनकी आखिरी सैलरी का एक निश्चित प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलता है। इस योजना में सरकारी कर्मचारियों को पेंशन में अंशदान नहीं करता होता है। यानी पेंशन का सारा खर्च सरकार उठाती था। साल 2004 में केंद्र सरकार ने इसे खत्म करके इसकी जगह NPS लाई थी।

OPS में रिटायरमेंट के समय कर्मचारी के वेतन की आधी राशि पेंशन के रूप में दी जाती थी। इसमें जनरल प्रोविडेंट फंड यानी GPF का भी प्रावधान था। इसमें लाभार्थी कर्मचारियों को 20 लाख रुपए तक ग्रैच्युटी मिलती है। सेवानिवृत कर्मचारी की मृत्यु पर मृतक के परिजनों को पेंशन की राशि मिलती रहती थी। इस योजना में छह महीने बाद मिलने वाले DA का प्रावधान किया गया था।

हालाँकि, केंद्रीय और कुछ राज्यों के सरकारी कर्मचारी इसे लागू करने की माँग करते रहते हैं। इसको लेकर तमाम तरह के विरोध प्रदर्शन भी हुए। वोट बैंक की राजनीति को देखते हुए राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार और झारखंड की हेमंत सोरेने की सरकार ने पुरानी OPS को दोबारा लागू किया है। दरअसल, OPS की माँग करने वाले कर्मचारी अपने वेतन से अंशदान देने को तैयार नहीं हैं।

घर में आए नईम और सलमान, चाय पीने के बाद पूरे परिवार का गला काट डाला: एनकाउंटर के बाद सामने आया मेरठ में हुई 5 (3 बच्चे) हत्याओं का राज

मेरठ के लिसाड़ी गेट क्षेत्र में एक भयानक हत्याकांड ने सभी को दहला दिया था। 8 जनवरी 2025 की रात, सुहेल गार्डन कॉलोनी में मोईन (52), उनकी पत्नी आसमा (45) और तीन मासूम बेटियों अक्शा (8), अजीजा (4) और अलइफ्शा (1) की हत्या कर दी गई। इस घटना को मोईन के सौतेले भाई नईम और उसके साथी सलमान ने अंजाम दिया। संपत्ति के विवाद और 5-6 लाख रुपये की उधारी ने इस खौफनाक वारदात की नींव रखी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नईम को मेरठ पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया, और सलमान फरार हो गया। हालाँकि एक दूसरे एनकाउंटर में वो घायल हो गया और पुलिस ने उसे पकड़ लिया। पुलिस ने उसका इलाज कराया और फिर पूछताछ की, जिसके बाद सलमान ने 8 जनवरी की रात का खौफनाक घटनाक्रम बताया।

सलमान ने बताया कि मोईन के घर दोनों गए थे। नईम और सलमान ने पहले मोईन के घर में बैठकर चाय पी और बातों में उलझाया। तभी नईम ने लोहे की रॉड से मोईन के सिर पर वार किया। जब आसमा जागी और विरोध किया, तो नईम ने उसके सिर पर भी हमला कर दिया। कई बार हमला किया, जिससे खोपड़ी चकनाचूर हो गई।

दोनों हत्यारों ने मासूम बच्चियों पर भी दया नहीं दिखाई। दोनों बच्चियों के भी सिर पर वार करके उन्हें मार डाला गया, एक बच्ची की गला दबाकर हत्या की गई। सलमान ने पुलिस को बताया कि लोहे की रॉड से प्रहार करने के बाद गले पर भी धारदार हथियार चलाया है, ताकि कोई भी जिंदा न बचे। इसके बाद 4 शव बेड में छिपा दिए और 1 शव चादर में लपेटकर रख दिया। वारदात के बाद दोनों हत्यारे पूरे घर में जेवर और नकदी ढूँढते रहे। फिर सुबह 5 बजे दोनों फरार हो गए।

नईम ने यह हत्या संपत्ति हड़पने की साजिश के तहत की थी। वह पहले भी 8 हत्याएँ कर चुका था और हर वारदात के बाद नाम और पहचान बदलकर फरार हो जाता था। बताया जा रहा है कि नईम और सलमान ने कई शहरों में शादियाँ भी की हैं।

एसएसपी मेरठ डॉ. विपिन ताडा ने खुलासा किया कि नईम पर 50 लाख का ईनाम था। पुलिस मुठभेड़ में नईम मारा गया, जबकि सलमान घायल होकर पकड़ा गया। पूछताछ में पता चला कि दोनों आरोपित वारदात के बाद अजमेर, दिल्ली और महाराष्ट्र में फरारी काटते रहे।