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सख्त नीति, साफ नीयतः ‘जीरो टॉलरेंस’ से UP में स्थापित हुआ कानून का राज, CM योगी आदित्यनाथ ने पूरा किया संकल्प

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर जो बदलाव पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिला है, वह किसी एक फैसले का परिणाम नहीं बल्कि एक स्पष्ट सोच, सख्त नीति और निरंतर क्रियान्वयन का नतीजा है।

प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जीरो टॉलरेंस की नीति को शासन की मूल कार्यशैली के रूप में अपनाया गया, जिसमें अपराध और अपराधियों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी के लिए कोई जगह नहीं रही। यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश में कानून का राज केवल व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि जन-विश्वास का आधार बन चुका है।

जीरो टॉलरेंस: धरातल पर प्रभाव

योगी सरकार ने यह साफ किया कि कानून व्यवस्था केवल नियंत्रण का विषय नहीं, बल्कि राज्य की पहचान का आधार है। इसी सोच के तहत अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को प्राथमिकता दी गई।

पिछले 9 वर्षों में पुलिस मुठभेड़ों में 267 दुर्दांत अपराधी ढेर हो गए। इसके अलावा 10 हजार 990 अपराधियों का घायल होना और 22 हजार 306 इनामी अपराधियों की गिरफ्तारी यह दिखाती है कि कानून व्यवस्था सक्रिय और निर्णायक रूप से लागू है।

इसके साथ ही गैंगस्टर एक्ट के तहत 85,118 अपराधियों पर कार्रवाई और 977 अपराधियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई ने यह स्पष्ट किया कि संगठित अपराध को जड़ से खत्म करने का प्रयास किया गया है।

अपराध की जड़ों पर प्रहार

प्रदेश में जीरो टॉलरेंस का प्रभाव केवल गिरफ्तारी तक ही सीमित नहीं रहा। उत्तर प्रदेश में माफियाओं और अपराधियों द्वारा अर्जित अवैध संपत्तियों पर व्यापक कार्रवाई करते हुए ₹14,580 करोड़ से अधिक की संपत्तियों का जब्तीकरण और ₹4,137 करोड़ से अधिक की संपत्तियों को ध्वस्त या जब्त किया गया।

इसके अलावा, चिन्हित माफियाओं के खिलाफ 1,459 मामलों में कार्रवाई, 875 अभियोग और 638 गिरफ्तारियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि अपराध के संगठित ढाँचे को उसकी जड़ों से उखाड़ने में सफलता मिली है।

केवल धरपकड़ नहीं, न्यायिक सक्रियता भी

कानून व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि न्यायिक परिणाम होता है। प्रदेश में 9 वर्षों ऑपरेशन कन्विक्शन के तहत 1,25,985 अभियुक्तों को सजा दिलाई गई, जिसमें 79 को मृत्युदंड और 10,414 को आजीवन कारावास मिला।

यह दिखाता है कि अब कानून की कार्यप्रणाली केवल अपराधियों के धरपकड़ तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत अंजाम तक भी पहुँचाता है, जिससे अपराध के प्रति निरोधात्मक प्रभाव मजबूत हुआ है।

आंकड़ों में दिखा बदलाव

पिछले 9 वर्षों में अपराध नियंत्रण के प्रयासों का असर आँकड़ों में भी दिखाई देता है। डकैती के मामलों में लगभग 90 प्रतिशत, लूट में 85 प्रतिशत, हत्या में 47 प्रतिशत और दंगों में 70 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।

इसके अलावा फिरौती के लिए अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भी उल्लेखनीय गिरावट आई। ये यह दर्शाती है कि कानून व्यवस्था का सुधार व्यापक और बहु-स्तरीय रहा है।

त्वरित और तकनीक आधारित आधुनिक पुलिसिंग

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू पुलिस व्यवस्था का आधुनिकीकरण रहा है। यूपी-112 सेवा के माध्यम से 9 वर्षों में 3 करोड़ 10 लाख से अधिक कॉल अटेंड की गईं और रिस्पॉन्स टाइम को 1 घंटा 5 मिनट से घटाकर 6 मिनट 41 सेकंड कर दिया गया।

वहीं, साइबर हेल्पलाइन और तकनीक आधारित मॉनिटरिंग ने पुलिस को अधिक प्रभावी और त्वरित बनाया है, जिससे नागरिकों को तत्काल सहायता मिलना सुनिश्चित हुआ।

प्राथमिकता के केंद्र में महिलाओं की सुरक्षा

जीरो टॉलरेंस नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिखाई देता है। मिशन शक्ति के तहत महिलाओं से जुड़े अपराधों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सुरक्षा और सशक्तिकरण दोनों को समान महत्व दिया गया है।

वहीं, महिला हेल्पलाइन, एंटी-रोमियो स्क्वाड और विशेष महिला पुलिस बल की तैनाती ने इस दिशा में ठोस बदलाव सुनिश्चित किया है।

व्यापक और सुदृढ़ सुरक्षा तंत्र

उत्तर प्रदेश में STF और ATS की सक्रियता बढ़ाते हुए संगठित अपराध, साइबर अपराध और आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की गई। STF द्वारा 7,627 अपराधियों की गिरफ्तारी और ATS द्वारा आतंकवादियों व अवैध विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी यह दिखाती है कि सुरक्षा को व्यापक दृष्टिकोण से देखा गया है।

ये कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का पुनर्निर्माण है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि जीरो टॉलरेंस अब केवल एक नीति नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की पहचान बन चुका है, जहाँ अपराधियों में भय और आम नागरिक में सुरक्षा का विश्वास स्थापित हुआ है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली ने यह साबित कर दिखाया है कि जब नीति सख्त हो, नीयत साफ हो और क्रियान्वयन निरंतर हो, तो परिणाम भी स्थायी और दीर्घकालिक होते हैं।

हिंदू की हत्या भूल जाओ, मुस्लिमों को विक्टिम बताओ: ईद से पहले शुरू हुआ ‘हेट स्पीच’ का रोना, जानिए कैसे हर्ष मंदर से जुड़ी संस्था APCR मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने में जुटी

होली के दौरान दिल्ली के उत्तम नगर में 26 साल के तरुण कुमार की बेरहमी से हत्या के बाद, भारत के एक्टिविस्ट- लीगल इकोसिस्टम में एक जाना-पहचाना पैटर्न उभरने लगा है।

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें ईद से पहले मुसलमानों के खिलाफ कथित हेट स्पीच को रोकने के लिए तुरंत दखल देने की माँग की गई है।

याचिका में सांप्रदायिक अशांति की आशंका जताई गई है, जिसमें भड़काऊ नारों, सोशल मीडिया पर लोगों को जुटाने और त्योहार के समय हिंसा की आशंकाओं का हवाला दिया गया है।

ऊपरी तौर पर, यह याचिका संवैधानिक दखल देने के लिए दायर की गई लगती है, जिसका मकसद सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना है। हालाँकि जब उत्तम नगर घटना के तथ्यों और APCR के इतिहास को खंगाला जाए, तो यह कदम एक निष्पक्ष, संवैधानिक अधिकार के तहत दखल देने की माँग करना कम लगती है।

यह कहानी को अपने हिसाब से गढ़ने की एक सोची-समझी कोशिश ज़्यादा लगती है। एक ऐसी कोशिश जो तरुण की लिंचिंग की तरफ से ध्यान हटाकर, मुस्लिम के ‘पीड़ित होने की कहानी’ की तरफ मोड़ने की कोशिश है।

उत्तम नगर हत्या को अलग नजरिए से पेश किया गया

उत्तम नगर घटना के तथ्य न तो अस्पष्ट हैं और न ही उनके अहम पहलुओं पर कोई विवाद है। होली के जश्न के दौरान तरुण कुमार के परिवार की 11 साल की बच्ची ने अपनी छत से पानी का एक गुब्बारा फेंका, जिसका निशाना उसके पिता थे।

गुब्बारा अपने निशाने से चूक गया और पड़ोस के एक मुस्लिम परिवार की महिला पर जा गिरा। इसके बाद शुरू में तो दोनों पक्षों में कहा-सुनी हुई, जो हिन्दू परिवार के माफी माँगने के बाद खत्म हो गई। ये बात पीड़ित परिवार और पुलिस के बयान से भी साफ होता है।

आमतौर पर त्योहार के दौरान होने वाला छोटा-मोटा झगड़ा बहस बाजी के बाद खत्म हो जाता है। लेकिन ये मामला अलग था। शाम होते-होते हालात ने हिंसक मोड़ ले लिया। जब तरुण होली मना कर घर लौट रहे थे, तो पड़ोसी मुस्लिम समुदाय के 15 से 20 लोगों ने उसे रोक लिया। उस पर लोहे की रॉड, ईंटों और पत्थरों से बेरहमी से हमला किया गया।

जब उसके परिवार के सदस्य उसे बचाने दौड़े, तो उन पर भी हमला किया गया। इस झड़प में कई लोग घायल हुए, जिनमें तरुण के पिता और चाचा भी शामिल थे। तरुण को खुद भी गंभीर चोटें आईं और अगले ही दिन उसकी मौत हो गई।

जानकारी के मुताबिक, परिवारों के बीच पहले से कोई दुश्मनी नहीं थी। ऐसे में इस तरह की हिंसक प्रवृति कई सवाल खड़े करता है। यह कोई पुरानी रंजिश नहीं थी जो बेकाबू हो गई हो। यह एक जान-बूझकर लिया गया ‘बदला’ था, जो अचानक हुई और पहले ही सुलझ चुकी घटना के बाद किया गया था। हमले की क्रूरता और इसमें शामिल लोगों की बड़ी संख्या से यह पता चलता है कि यह काम अचानक नहीं, बल्कि पहले से सोच-समझकर किया गया था।

फिर भी, APCR की याचिका में, इस घटनाक्रम की व्याख्या बहुत ही बारीकी से, लेकिन अलग ढंग से की गई है। इस हत्या को एक ‘स्थानीय घटना’ के तौर पर दिखाया गया है, जिसे बाद में विरोध-प्रदर्शनों और आम चर्चाओं के जरिए ‘सांप्रदायिक रंग’ दे दिया गया। ऐसा करके, याचिका हिंसा से ध्यान हटाकर, उसके बाद हुई प्रतिक्रियाओं को ज्यादा तवज्जो देती है। यह नजरिया बदलना कोई इत्तेफ़ाक नहीं है, बल्कि यह इस पूरी कहानी को गढ़ने की बुनियाद है।

हिंसा से ‘हेट स्पीच’ की ओर: एक सोची-समझी रणनीति

APCR की याचिका का जोर तरुण कुमार की हत्या पर नहीं है। इसके बजाय, यह ‘हेट स्पीच’ (नफरत फैलाने वाले भाषण), भड़काऊ नारों और विरोध-प्रदर्शनों पर है। याचिका में दावा किया गया है कि इन घटनाओं ने मुस्लिमों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है, खासकर ईद के वक्त में। इसमें ऐसे नारों का जिक्र किया गया है, जिनके बारे में आरोप है कि वे हिंसा, बहिष्कार और यहाँ तक कि ईद के जश्न में रुकावट डालने की बात करते हैं।

याचिका का यह रुख एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भीड़ द्वारा की गई हत्या से ध्यान भटकाने का तरीका है। बहुसंख्यक समुदाय की ‘आक्रामकता’ की ओर मामले को ले जाने की साजिश है। ऐसा करने पर घटनाक्रम पूरी तरह से उलट जाता है।

हिंसा का शुरुआती काम एक गौण (पृष्ठभूमि का) विवरण बनकर रह जाता है, जबकि उसके बाद हुई प्रतिक्रिया को मुख्य चिंता के तौर पर उभार दिया जाता है।

इस उलटफेर की वजह है अदालत के समक्ष तरुण की हत्या को लेकर मुस्लिमों की आपराधिक जवाबदेही से ध्यान हटाकर तथाकथित घृणास्पद भाषण और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल उठाना। राजनीतिक दृष्टि से, यह अपराधियों से जुड़े समुदाय को खतरे में पड़े समुदाय के रूप में दिखाता है। नेरेटिव रूप में यह घटना अल्पसंख्यकों को ‘पीड़ित’ के रूप को पेश करने की कवायद है।

मुकदमा भी बना रहा नेरेटिव, जनहित याचिकाओं का हो रहा इस्तेमाल

भारत में जनहित याचिकाएँ ऐतिहासिक रूप से अधिकारों के विस्तार और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। हालाँकि इसका उपयोग तेजी से ‘नेरेटिव मुकदमेबाजी’ के रूप में किया जा रहा है, जहाँ उद्देश्य कानूनी राहत से परे जाकर सार्वजनिक विमर्श और संस्थागत धारणा को आकार देना है।

एपीसीआर की याचिका इस ढाँचे में पूरी तरह फिट बैठती है। ‘भड़काऊ सामग्री का समन्वित प्रसार, आर्थिक बहिष्कार, और तत्काल खतरा’ जैसे शब्दों का उपयोग करके, याचिका तात्कालिकता और व्यापकता की भावना पैदा करती है, ताकि न्यायपालिका का ध्यान इस पर जाए। राहत की माँग, एफआईआर का पंजीकरण, सुरक्षा और कार्रवाई के लिए अदालत की शरण में जाना, इसको साबित करती है।

इसे गौर से देखा जाए तो ये समझ में आता है कि इन माँगों में असमानता है। याचिका में जहाँ मुसलमानों के खिलाफ कथित घृणास्पद भाषण और हिंसा की आशंकाओं का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है, वहीं उस हत्या को उतनी अहमियत नहीं दी गई है जिससे घटनाक्रम की शुरुआत हुई। यह चयनात्मक जोर दर्शाता है कि मुकदमा केवल जमीनी स्थिति को बताने के लिए नहीं है, बल्कि न्यायिक कार्यवाही के भीतर ‘एक विशेष कथा’ को स्थापित करने के बारे में है।

APCR का ट्रैक रिकॉर्ड

यह समझने के लिए कि क्या यह कोई अलग-थलग घटना है या किसी बड़े पैटर्न का हिस्सा, APCR के पिछले हस्तक्षेपों की जाँच करना जरूरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद संगठन की रिपोर्ट इस संबंध में काफी कुछ बताती है।

रिपोर्ट में पूरे भारत में मुस्लिम-विरोधी हिंसा में बढ़ोतरी का दावा किया गया था और इसे मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर फैलाया गया था। हालाँकि, रिपोर्ट में जिन मामलों का जिक्र किया गया था, बाद में पता चला कि उन्हें गलत तरीके से पेश किया गया था या उनके जरूरी संदर्भों को हटा दिया गया था।

उदाहरण के लिए, अलीगढ़ में औरंगज़ेब उर्फ ​​फरीद की मौत को हिंदू मॉब लिंचिंग के तौर पर पेश किया गया। हालाँकि, बाद की रिपोर्टों से पता चला कि उसे चोरी की कोशिश के दौरान पकड़ा गया था और उसकी पिटाई की गई थी।

इसी तरह, गुजरात में एक क्रिकेट मैच के दौरान हुई एक मौत को धार्मिक तनाव से उपजी सांप्रदायिक हिंसा के तौर पर पेश किया गया, जबकि पुलिस जाँच से पुष्टि हुई कि यह झगड़ा बाइक पार्किंग को लेकर हुए विवाद के कारण हुआ था। झारखंड और उत्तर प्रदेश की घटनाओं सहित अन्य मामलों को भी जानबूझकर की गई हत्याओं के तौर पर दिखाया गया, जबकि आधिकारिक जाँच में दुर्घटना या गैर-सांप्रदायिक कारणों से हुई मौतें बताया गया था।

ये उदाहरण एक लगातार पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। घटनाओं को इस तरह से चुनकर पेश किया जाता है कि धार्मिक पहचान सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बने। जबकि उन प्रासंगिक विवरणों को छोड़ दिया जाता है जो इस कहानी को जटिल बना सकते हैं। यह केवल व्याख्या के अंतर का मामला नहीं है, यह एक ऐसी कार्यप्रणाली को दर्शाता है जो तथ्यों की पूर्णता के बजाय कहानी की एकरूपता को प्राथमिकता देती है।

संभल रिपोर्ट: गवाही बनाम फोरेंसिक जाँच

APCR का कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ के साथ मिलकर ‘संभल: एक सुनियोजित संकट की पड़ताल’ (Sambhal: Anatomy of an Engineered Crisis) नामक रिपोर्ट तैयार किया। इस रिपोर्ट पर आधारित डॉक्यूमेंट्री में, संभल हिंसा को मुसलमानों के खिलाफ व्यवस्थागत उत्पीड़न और राज्य द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग के मामले के तौर पर गलत तरीके से पेश किया गया था।

खास बात यह है कि रिपोर्ट में हिंसा स्थल से बरामद विदेशी कारतूसों की बरामदगी को कम करके दिखाया गया था। इनमें पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री से जुड़े गोला-बारूद भी शामिल थे। रिपोर्ट में पुलिस की उन जाँच निष्कर्षों पर भी ध्यान नहीं दिया गया, जिनसे पता चला था कि दंगाइयों ने ही कानून का पालन करवाने वालों पर गोलियाँ चलाई थीं और कुछ लोगों की मौत खुद दंगाइयों द्वारा चलाई गई गोलियों से हुई थी।

चुनिंदा गवाही वाले सबूतों को तरजीह देकर और फोरेंसिक डेटा को नजरअंदाज करके, यह रिपोर्ट एक ऐसा नैरेटिव गढ़ती है जो सुनने में तो दमदार लगता है, लेकिन अधूरा है। यह एक पहले से तय नेरेटिव को ही मजबूत करती है, यानी सिर्फ एकतरफ़ा पीड़ित होने के नैरेटिव को। यह उन बातों को छोड़ देती है, जिनसे यह पता चलता है कि संभल मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर हुए सर्वे के बाद जो हिंसा फैली, उसके लिए इस्लामी भीड़ ज़िम्मेदार थी।

वैचारिक माहौल: एक्टिविज़्म, अकादमिक जगत और प्रचार-प्रसार

APCR अकेला नहीं है, यह एक बड़े माहौल का हिस्सा है, जिसमें एक्टिविस्ट, अकादमिक लोग और मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं। ये सब मिलकर कुछ खास नैरेटिव गढ़ते हैं और उन्हें जोर-शोर से फैलाते हैं। इन्हीं लोगों में एक अहम शख्स हर्ष मंदर है, जो लंबे समय से इस्लामी नफरती अपराधों पर पर्दा डालने और इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा भड़काई गई हिंसा के लिए बहुसंख्यक समुदाय को दोषी ठहराने का काम करते रहे हैं।

उनका संगठन ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ कई ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित कर चुका है, जो मुसलमानों को पीड़ित के तौर पर पेश करती हैं और हिंसा की इन घटनाओं में मुस्लिम भीड़ की संलिप्तता से जुड़े कड़वे सच पर पर्दा डालती है।

इस ‘एक्टिविस्ट’ पहलू को दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद जैसे लोगों का ‘अकादमिक’ जुड़ाव और मजबूती देता है। उनकी लेखनी और सार्वजनिक टिप्पणियाँ अक्सर सांप्रदायिक घटनाओं को बहुसंख्यकवादी राजनीति और सरकारी संस्थाओं की व्यापक आलोचना के दायरे में रखकर देखती हैं।

वामपंथी प्रकाशनों में अपनी लगातार टिप्पणियों के लिए मशहूर अपूर्वानंद ने सांप्रदायिकता पर होने वाली बहसों में खुद को बार-बार इस तरह पेश किया है कि वे सरकारी संस्थाओं की आलोचना करते हैं और घटनाओं को बहुसंख्यकवाद के नजरिए से देखते हैं। हालाँकि, उन्हें अक्सर इस बात के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है कि वे चुनिंदा मुद्दों पर ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। बातों को घुमा-फिराकर असल मुद्दे से भटका कर एक चिरपरिचित पैटर्न को अपनाया जाता है।

इसका अच्छा उदाहरण पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब के बारे में उनकी टिप्पणियाँ हैं। अपूर्वानंद ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्ज्वल निकम पर आरोप लगाकर उनकी साख पर सवाल उठाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कसाब के मुकदमे के दौरान की गई टिप्पणियों का मकसद आतंकवादी के खिलाफ ‘दुश्मनी पैदा करना’ था।

जब उन्हें तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा, तो माफी माँगने के बजाय वे अपनी जिद पर अड़ गए। उन्होंने आतंकवादी के अपराधों से ध्यान हटाकर, उसे ‘समाज’ और ‘राजनीतिक नैरेटिव’ की ओर मोड़ दिया। ऐसा करके, उन्होंने एक हत्यारे के खिलाफ जनता के गुस्से को कम करने की कोशिश की।

एक सोची-समझी रणनीति के तहत धोखेबाजी वाला बयान देकर आतंकियों के हमले की गंभीरता को कम करने करने की कोशिश की गई। यह इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे अजमल कसाब जैसे आतंकवादियों और इस्लामी चरमपंथियों को उन लोगों से खुली छूट मिल जाती है जो खुद को ‘कार्यकर्ता’ और ‘शिक्षाविद’ कहते हैं, जबकि उनके गैर-मुस्लिम पीड़ितों को उकसाने वाला और भड़काने वाला करार दिया जाता है।

ये सभी मिलकर एक बहुस्तरीय विमर्श का निर्माण करते हैं जिसमें कार्यकर्ताओं की रिपोर्टों को अकादमिक टिप्पणियों के माध्यम से वैधता दी जाती है और फिर कानूनी हस्तक्षेपों और अनुकूल मीडिया कवरेज के माध्यम से उन्हें और अधिक प्रचारित किया जाता है।

यह तंत्र एक हद तक समन्वय के साथ काम करता है, भले ही वह अनौपचारिक हो। रिपोर्टें कथाएँ गढ़ती हैं, शिक्षाविद बौद्धिक मान्यता प्रदान करते हैं और मुकदमेबाजी संस्थागत समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करती है।

विषमता का प्रश्न

इस तंत्र की सबसे ज्यादा आलोचना इस वजह से की जाती है कि इसमें सांप्रदायिक घटनाओं के मूल्यांकन में काफी विषमता है। मुस्लिम अपराधियों द्वारा की गई हिंसा को अक्सर प्रतिक्रियात्मक, परिस्थितिजन्य या उकसावे वाली हिंसा के रूप में देखा जाता है, जबकि हिंदू अपराधियों द्वारा की गई हिंसा को व्यवस्थागत, वैचारिक और व्यापक सामाजिक प्रवृत्तियों का सूचक माना जाता है।

उत्तम नगर मामले में, घटना को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, उसमें यह विषमता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। तरुण कुमार की क्रूरतापूर्ण मॉब लिंचिग, एक स्थानीय विवाद के रूप में मानी जाती है। इसके विपरीत, इस हत्या के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों और कथित नारों को व्यापक सांप्रदायिक शत्रुता और मुस्लिमों के खिलाफ संभावित हिंसा के सबूत के रूप में पेश किया जाता है। जोर देने का यह उलटफेर प्रभावी रूप से चिंता का केंद्र हिंसा की घटना से हटाकर उसके परिणामस्वरूप हुई प्रतिक्रिया पर केंद्रित कर देता है।

इस तरह की विषमता के व्यापक निहितार्थ हैं। यह न केवल सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित करती है, बल्कि पुलिसिंग प्राथमिकताओं और न्यायिक हस्तक्षेपों सहित संस्थागत प्रतिक्रियाओं को भी प्रभावित करती है। जब कथाओं का निर्माण इस तरह से किया जाता है कि लगातार एक दृष्टिकोण को दूसरे पर प्राथमिकता दी जाती है, तो यह समान न्याय के सिद्धांत को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है।

पीड़ित होने की भावना का उपयोग

संरचनात्मक स्तर पर, एपीसीआर की याचिका में परिलक्षित दृष्टिकोण को पीड़ित होने की राजनीति के एक भाग के रूप में समझा जा सकता है। इस ढांचे में, पीड़ित होने की कथाओं का निर्माण और विस्तार समर्थन जुटाने, चर्चा को आकार देने और संस्थानों को प्रभावित करने का एक साधन बन जाता है।

इस प्रक्रिया में आम तौर पर घटनाओं का चयन, असुविधाजनक विवरणों को छिपाना और कथा को बल देने के लिए कानूनी और मीडिया मंचों का रणनीतिक उपयोग शामिल होता है। समय के साथ, एक ऐसी प्रतिक्रिया श्रृंखला बन जाती है जिसमें रिपोर्टें याचिकाओं को सही ठहराती हैं, याचिकाएं रिपोर्टों को प्रमाणित करती हैं, और दोनों का उपयोग एक विशेष विश्वदृष्टि को मजबूत करने के लिए किया जाता है। यद्यपि कमजोर समुदायों की वकालत एक लोकतांत्रिक समाज का अनिवार्य पहलू है, लेकिन यह तथ्यात्मक सटीकता और निरंतरता के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित होनी चाहिए।

APCR कैसे मीडिया, शिक्षा जगत और कानूनी दांव-पेच का इस्तेमाल करके इस्लामी कट्टरपंथ को सही ठहराता है

दिल्ली हाई कोर्ट में APCR की याचिका भारत में सांप्रदायिक घटनाओं के मामले में नैरेटिव पर नियंत्रण को लेकर चल रही एक बड़ी लड़ाई का प्रतीक है। यह नागरिक समाज संगठनों की भूमिका, नैरेटिव गढ़ने के एक औजार के तौर पर कानूनी दांव-पेंच के गलत इस्तेमाल और अलग-अलग दावों के बीच संतुलन बनाने में संस्थाओं की जिम्मेदारियों के बारे में अहम सवाल उठाती है।

कानून-व्यवस्था बनाए रखना, हेट स्पीच (नफ़रत फैलाने वाले भाषण) को रोकना, और सभी समुदायों की सुरक्षा करना जायज और जरूरी मकसद हैं। लेकिन, इन लक्ष्यों को एक संतुलित और सबूतों पर आधारित तरीके से हासिल किया जाना चाहिए। न तो हिंसा की असली वजहों को छिपाए जाए और न ही किसी एक नैरेटिव को दूसरे से ज्यादा तरजीह दी जाए।

इसके बजाय, अपने निजी स्वार्थों के लिए बने कुछ समूह, जो खुद को ‘न्याय चाहने वाले संगठन’ बताते हैं, न्यायपालिका का इस्तेमाल अपने निजी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं। अक्सर इससे हमलावर और पीड़ित की भूमिकाएँ उलट जाती हैं और हिंदू बहुसंख्यक समुदाय को एक ऐसे बदले की भावना रखने वाले समुदाय के तौर पर दिखाया जाता है, जो ‘शांतिप्रिय’ अल्पसंख्यकों से ‘बदला’ लेना चाहता है।

तरुण कुमार की हत्या के मामले में जवाबदेही तय होना अपने आप में एक जरूरी माँग है। इसे किसी ऐसी बड़ी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा बनाकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो असल घटना से ध्यान भटकाती हो। अगर संस्थाओं को जनता का भरोसा बनाए रखना है, तो उन्हें अपनी प्रतिक्रियाएँ तथ्यों, निष्पक्षता और कानून के राज पर आधारित रखनी होंगी और त्रासदियों को नैरेटिव की लड़ाई का हथियार बनाने की कोशिशों का विरोध करना होगा।

(मूलरूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘द्रविड़ और इस्लाम है एक’: DMK के उदयनिधि स्टालिन ने दोनों का ‘सिद्धांत एक ही’ बताकर किया लॉजिक का ‘खतना’

तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के बयान ने देश की सियासत और वैचारिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। स्टालिन का दावा है कि ‘द्रविड़ विचारधारा’ और ‘इस्लाम के सिद्धांत’ एक समान हैं। इस बयान के बाद अब दोनों विचारधाराओं की ‘कुंडली’ मिलाई जा रही है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह समानता वास्तव में सिद्धांतों पर आधारित है या फिर यह केवल ‘सनातन विरोध’ के नाम पर किया गया एक समझौता है। आलोचकों का मानना है कि यह ‘मैच मेड इन फिरदौस’ (स्वर्ग में बनी जोड़ी) असल में हिंदू धर्म के खिलाफ एक सुनियोजित मोर्चाबंदी है।

बुतपरस्ती से नफरत और मूर्तियों का विरोधाभास

द्रविड आंदोलन और इस्लाम के बीच सबसे बड़ा साझा बिंदु ‘मूर्तियों से नफरत’ को बताया जाता है। जहाँ पेरियार ने गणेश जी की मूर्तियाँ तोड़कर इसे ‘अंधविश्वास’ करार दिया, वहीं इस्लाम का आधार ही ‘बुतशिकन’ (मूर्ति तोड़ने वाला) होने पर टिका है।

लेकिन यहाँ एक बड़ा विरोधाभास भी है। पेरियार मूर्ति पूजा के खिलाफ थे, फिर भी आज तमिलनाडु के हर चौराहे पर उनकी अपनी मूर्तियाँ लगी हैं। सवाल यह उठता है कि अगर हिंदू देवी-देवता अंधविश्वास हैं, तो पेरियार की मूर्तियाँ क्या ‘क्रांति’ का प्रतीक हैं? क्या यह केवल अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ा गया तर्क नहीं है?

बिचौलिया हटाओ, नया ठेकेदार लाओ

दोनों विचारधाराएँ दावा करती हैं कि उन्हें भगवान और इंसान के बीच कोई बिचौलिया नहीं चाहिए। द्रविड राजनीति ‘ब्राह्मणवाद’ को कोसती है क्योंकि वह पुरोहित लाता है, वहीं इस्लाम में ‘नौ प्रीस्टहुड’ (कोई पुरोहित वर्ग नहीं) का दावा किया जाता है।

मगर हकीकत इसके उलट है। एक तरफ उलेमा और मौलानाओं के बिना समुदाय का पत्ता नहीं हिलता, तो दूसरी तरफ द्रविड ‘आइडियोलॉग्स’ के बिना राजनीति अधूरी है। ऐसा लगता है कि पुराने बिचौलियों को हटाकर केवल नए ‘ठेकेदार’ बैठा दिए गए हैं।

बराबरी का ‘चाइनीज वर्जन’ और चयनात्मक न्याय

बराबरी और भाईचारे की बातें दोनों तरफ जोर-शोर से की जाती हैं। इस्लाम में ‘उम्माह’ के भीतर सब बराबर हैं और द्रविड़ विचारधारा में ‘गैर-ब्राह्मण’ सब बराबर हैं। लेकिन इस घेरे के बाहर जो है, उसके लिए कोई जगह नहीं है।

बाहर वालों के लिए ‘काफिर’ या ‘आर्य’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) को साजिश बताने वाले लोग अपनी इस ‘एक्सक्यूसिव मेंबरशिप’ को सामाजिक न्याय कहते हैं, जो केवल उनके लिए समूह तक सीमित है।

अभिव्यक्ति की आजादी का ‘मर्डर’ और भाषा फोबिया

इन दोनों ही विचारधाराओं में ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ यानि सवाल उठाने की गुंजाइश खत्म होती दिखती है। इस्लाम में किताब अंतिम सत्य है और द्रविड़ आंदोलन में पेरियार की बातें पत्थर की लकीर। सवाल उठाने पर एक तरफ व्यक्ति ‘संघी’ करार दिया जाता है, तो दूसरी तरफ ‘गुस्ताख’।

साथ ही, दोनों को संस्कृत भाषा से गहरी एलर्जी है। उनके लिए संस्कृत बोलना गुलामी है, लेकिन अरबी या अंग्रेजी को अपना लेना प्रगतिशीलता है। यह मानसिक विरोधाभास उनकी वैचारिक गहराई पर सवाल खड़े करता है।

विक्टिम कार्ड और फेमिनिज्म का दोहरा चेहरा

इन दोनों को जोड़ने वाला सबसे बड़ा गोंद ‘विक्टिम कार्ड’ है। द्रविड़ राजनीति कहती है कि उत्तर भारत ने उन पर जुल्म किया और इस्लाम कहता है कि पूरी दुनिया उनके खिलाफ साजिश कर रही है। सत्ता और संसाधन पास होने के बावजूद खुद को पीड़ित दिखाना इनकी रणनीति का हिस्सा है।

रही बात महिला सशक्तिकरण की, तो द्रविड़ नेता पेरियार के नाम पर मंगलसूत्र तोड़ने की बात तो करते हैं, लेकिन क्या उनमें 7वीं सदी के शरिया कानूनों को चुनौती देने का साहस है? यहाँ आकर इनका ‘फेमिनिज्म’ खामोश हो जाता है।

अंतत: यह स्पष्ट होता है कि यह गठबंधन सिद्धांतों का नहीं, बल्कि ‘सनातन’ के खिलाफ एक ‘ज्वाइंट वेंचर’ मात्र है। स्टालिन के लिए अब एक ही बड़ा सवाल बचाता है कि यदि द्रविड और इस्लाम एक हैं, तो क्या वह इस्लाम की इस बुनियादी आयत से भी सहमत हैं कि ‘अल्लाह के अलावा कोई दूसरा ईश्वर नहीं हैं’? क्या वह अपने सार्वजनिक जीवन में इस कट्टरता को स्वीकार करेंगे?

गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी का समर्थन: वोट बैंक के चक्कर में सनातन आस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं अखिलेश यादव

नवरात्र के पावन पर्व से ठीक पहले वाराणसी की पवित्र गंगा माँ के बीचों-बीच नाव पर इफ्तार पार्टी का आयोजन होना और उसमें चिकन बिरयानी जैसे माँसाहारी व्यंजन परोसना… यह घटना सिर्फ एक सामान्य इफ्तार नहीं, बल्कि सनातन आस्था के साथ सीधा खिलवाड़ है।

गंगा को मोक्षदायिनी माँ मानने वाले करोड़ों हिंदू भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का यह प्रयास स्पष्ट रूप से वोटबैंक की सियासत का नतीजा है। और इस पूरे खेल के केंद्र में हैं समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव। उन्होंने इस घटना को हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाकर तूल देने की कोशिश की, लेकिन इस्लामी विद्वानों ने खुद इसे गैर-इस्लामिक बताकर पल्ला झाड़ लिया। नतीजा? अखिलेश की तुष्टिकरण की राजनीति एक बार फिर बेनकाब हो गई है।

क्या है पूरा मामला, क्यों बढ़ा विवाद

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (17 मार्च 2026) को काशी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया। इसमें रोजेदारों को फल-मेवे के साथ चिकन बिरयानी परोसी गई। ये वीडियो जब सोशल मीडिया पर सामने आया, तो बवाल मच गया।

वीडियो में साफ दिख रहा था कि नाव पर बैठे युवक बिरयानी खा रहे हैं और बची हुए हड्डियाँ-कचरा गंगा में फेंक रहे हैं। हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों ने तुरंत इस घटना पर विरोध जताया और शिकायत दर्ज कराई। जिसके बाद कोतवाली पुलिस ने 14 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। सभी पर धार्मिक भावनाएँ आहत करने, पूजा स्थल की अपवित्रता और गंगा की शुचिता भंग करने के मामले में शिकायत दर्ज हुई है।

ये मामला सामने आया और अखिलेश यादव तुरंत वोटबैंक की रोटी सेंकने में जुट गए। अखिलेश यादव ने लखनऊ में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान कहा कि प्रशासन ऐसी कार्रवाई सरकार को खुश करने के लिए कर रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर उन युवकों ने हथेली गरम कर दी होती, तो शायद उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती।

खैर, इस मामले में कॉन्ग्रेस के कुछ नेता भी उनके साथ जुड़ गए। पूरा प्रयास यह था कि घटना को हिंदू-मुस्लिम दंगा बनाने का रूप दिया जाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई। मुस्लिम समुदाय के कई जानकारों ने खुद इस आयोजन को गैर-इस्लामी करार दिया। उन्होंने कहा कि इफ्तार कोई पिकनिक या प्रदर्शन नहीं है, बल्कि अनुशासित मजहबी कार्य है। नमाज और रोजे की पवित्रता के साथ गंगा जैसी पवित्र नदी में मांसाहार और कचरा फेंकना बिल्कुल गलत है।

अखिलेश यादव को इस घटना से दिलचस्पी क्यों?

अब सवाल उठता है कि आखिर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को इस घटना में इतनी दिलचस्पी क्यों थी? जवाब साफ है- वोटबैंक। समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय से तुष्टिकरण पर टिकी हुई है। अखिलेश यादव हर मौके पर मुस्लिम वोट को लुभाने के लिए सनातन परंपराओं की उपेक्षा करते आए हैं। गंगा माँ सिर्फ पानी की धारा नहीं हैं। वे सनातन हिंदू धर्म की आत्मा हैं। करोड़ों लोग उन्हें माँ कहकर पुकारते हैं। नवरात्र जैसे पर्व के समय जब पूरे देश में माँ दुर्गा की आराधना चल रही हो, उस समय गंगा के बीच मांसाहार का प्रदर्शन करना जानबूझकर भावनाओं को चोट पहुँचाने का काम है।

गंगा की पवित्रता का अपमान कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार बनाना अखिलेश की खासियत है। चूँकि अखिलेश को गंगा की शुचिता से कोई लेना-देना नहीं। उनके लिए गंगा सिर्फ वोट का साधन है। इस बार भी उन्होंने सोचा कि अगर मुस्लिम युवाओं का साथ देकर हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया तो वोट मिल जाएगा।

यह घटना सिर्फ वाराणसी की नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश और देश की आस्था से जुड़ी है। गंगा पूरे भारत की जीवन रेखा है। सनातनी उसे माँ मानते हैं। रामायण-महाभारत से लेकर आज तक गंगा की पवित्रता अटूट रही है। ऐसे में नाव पर बैठकर बिरयानी खाना और अवशेष फेंकना न सिर्फ कानूनी उल्लंघन है, बल्कि नैतिक अपराध भी है।

स्थानीय प्रशासन ने जो कार्रवाई की, वह सराहनीय है। लेकिन अखिलेश ने इसे ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ बता दिया। उनका बयान- ‘डीएम-एसपी को इफ्तारी देनी चाहिए थी’ स्पष्ट रूप से पुलिस को धमकाने वाला है। क्या यह कहना है कि अगर पुलिस को रिश्वत मिल जाती तो गंगा की अपवित्रता को नजरअंदाज कर दिया जाता?

सपा का रहा है हिंदुओं को कुचलने का इतिहास

समाजवादी पार्टी का इतिहास ही तुष्टिकरण का है। मुलायम सिंह यादव के समय से लेकर अखिलेश तक, पार्टी ने हमेशा एक समुदाय को खुश करने की कोशिश की। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे हो या लव जिहाद के मामले, हर जगह अखिलेश ने हिंदू भावनाओं को कुचला। अब गंगा मामला भी उसी सिलसिले की कड़ी है। उन्होंने सोचा कि नवरात्र के समय यह विवाद खड़ा करके हिंदू समाज को बाँट लेंगे और मुस्लिम वोट पक्का कर लेंगे। लेकिन खेल उलटा पड़ता दिख रहा है।

अखिलेश यादव का यह बयान न सिर्फ गलत है, बल्कि खतरनाक भी। वे कह रहे हैं कि गंगा पर इफ्तार क्यों नहीं हो सकता? जवाब है क्योंकि गंगा किसी एक समुदाय की नहीं है। वह पूरी मानवता की है। हिंदू उसे माँ कहते हैं। मुस्लिम भी गंगा के किनारे रहते हैं और उसका सम्मान करते हैं। अखिलेश का पूरा बयान उनकी मानसिकता को दर्शाता है। वे चाहते हैं कि हर मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दिया जाए ताकि उनका वोट बैंक मजबूत रहे।

आज जरूरत है कि हर आयोजन में सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखा जाए। गंगा की पवित्रता, धार्मिक गरिमा और सौहार्द- ये तीनों चीजें समाज की जिम्मेदारी हैं। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी ने इसे राजनीतिक हथियार तो बना लिया लेकिन अब जनता सबकुछ समझ चुकी है। यह घटना साबित करती है कि वोटबैंक की खातिर सनातन आस्था से खिलवाड़ करने वाले नेता अब बेनकाब हो चुके हैं।

न गौरक्षकों ने तोड़ी किसी की हड्डी, न किसी को गंभीर चोट पहुँचाई: 2016 के ऊना कांड में 35 बरी, 5 को सजा; पढ़िए कोर्ट ने क्या कहा

गुजरात के 2016 के चर्चित ऊना कांड में पाँच आरोपितों को दोषी ठहराया गया और उन्हें पाँच साल कारावास की सजा सुनाई गई। कोर्ट ने सबूतों के अभाव में 35 आरोपितों को बरी कर दिया। गिर सोमनाथ जिला न्यायालय ने मंगलवार (17 मार्च 2016) को ये फैसला सुनाया।

इस मामले में कुल 41 आरोपित थे। इनमें से एक की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई। कोर्ट ने पाँच को दोषी पाया गया। इनमें से चार दोषियों ने मुकदमे के दौरान ही पाँच साल से अधिक की सजा काट ली है, जबकि एक दोषी ने चार साल और दो महीने की सजा काटी है।

कोर्ट के फैसले के मुताबिक, 4 दोषियों को जेल से रिहा कर दिया जाएगा और एक को शेष 10 महीनें की सजा पूरी करने के लिए जेल में रहना होगा। कोर्ट ने पाँच व्यक्तियों को IPC की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुँचाना), 324 (हथियार के प्रयोग से चोट पहुँचाना), 342 (अवैध कारावास), 504 (जानबूझकर अपमान करना) और SC/ST अधिनियम की धारा 3(1), (घ), 3(1)(ङ), (आर), (एस), (यू) के तहत दोषी ठहराया।

आरोपितों को दंगा, हत्या के प्रयास, आपराधिक साजिश और महिला अपमान जैसे गंभीर आरोपों से बरी कर दिया गया था, क्योंकि ये आरोप सिद्ध नहीं हुए। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 35 आरोपितों के मुकदमे के दौरान कोई स्पष्ट भूमिका सामने नहीं आई। गवाहों के बयान भी विरोधाभाषी थे, इसलिए सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया। कोर्ट ने दोषियों की सजा कैसे निर्धारित की और आरोपों की पुष्टि तथा बरी करने के कारणों को भी विस्तार से बताया।

आइए विस्तार से समझते हैं कि कोर्ट ने फैसले में क्या कहा, उसे किन आरोपों के तहत दोषी ठहराया गया और संगीन आरोप क्यों हटा दिए गए।

घटना घटी, लेकिन पाँच को छोड़कर बाकी आरोपितों की भूमिका स्पष्ट नहीं – कोर्ट

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि घटना घटी थी। 11 जुलाई 2016 को ऊना के मोटा समाधियाला गाँव में दलित समुदाय के कुछ लोग एक मृत गाय की खाल उतार रहे थे, तभी कुछ आरोपित वहाँ पहुँचे और उनकी बेरहमी से पिटाई कर दी।

इसके बाद पीड़ितों को जबरन एक कार में बैठाकर ले जाया गया, सार्वजनिक रूप से कार से बाँधकर उनके कपड़े उतार दिए गए, उन्हें पीटा गया और घुमाया गया। अंत में उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया।

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश में आक्रोश फैल गया। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए, दलित संगठनों ने धरना दिया और राजनीतिक नेताओं ने ऊना का दौरा शुरू कर दिया।

इस मामले को जिग्नेश मेवाणी और उनके साथियों ने भी जोर-शोर से उठाया और विभिन्न जगहों पर रैलियाँ कीं। बाद में पीड़ित वशराम सरवैया की शिकायत पर स्थानीय पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।

जाँच के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों पर लापरवाही और जानबूझकर अनदेखी करने के आरोप लगे, जिसके चलते स्थानीय पुलिस निरीक्षक समेत चार कर्मचारियों को भी आरोपित बनाया गया। सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते जाँच के लिए उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया।

वर्ष 2018 में यह केस गिर सोमनाथ जिला न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया गया, जहाँ करीब आठ साल तक सुनवाई चली और अंततः 16 मार्च 2026 को कोर्ट ने फैसला सुनाया।

कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह स्पष्ट रूप से साबित हो गया है कि पाँचों दोषियों ने पीड़ितों की पिटाई की और जाति के आधार पर उनका अपमान किया। हालाँकि, यह साबित नहीं हो सका कि सभी 41 आरोपितों ने पहले से कोई साजिश रची थी या एक ही मकसद से अलग-अलग जगहों पर दंगा भड़काने के इरादे से यह घटना की गई थी।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि दोषियों के खिलाफ लगाए गए कुछ गंभीर आरोप, जैसे हत्या के प्रयास आदि, सबूतों के अभाव में साबित नहीं हो पाए, इसलिए इन आरोपों को हटा दिया गया।

IPS की धारा 307 (हत्या के प्रयास) को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों को चोटें जरूर आई थीं, लेकिन वे इतनी गंभीर नहीं थीं कि उनसे मौत हो सकती थी। कोर्ट में उन डॉक्टरों के बयान दर्ज किए गए थे, जिन्होंने पीड़ितों का इलाज किया था। डॉक्टरों ने बताया कि पीड़ितों को पाइप और लाठियों से पिटाई के कारण चोटें आई थीं, लेकिन वे जानलेवा नहीं थीं और किसी को भी फ्रैक्चर नहीं हुआ था।

क्यों हटाए गए ‘हत्या की कोशिश’ जैसे गंभीर आरोप

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी बताया कि शिकायतकर्ता वशराम सरवैया समेत चार लोगों को पहले ऊना अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उन्हें जूनागढ़ रेफर किया गया, लेकिन वे वहाँ न जाकर राजकोट अस्पताल पहुँचे।

बाद में वहाँ से छुट्टी मिलने के बाद अगले दिन उन्हें अहमदाबाद सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के बयानों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि चारों में से किसी के शरीर पर ऐसी कोई गंभीर चोट नहीं थी, जिससे मौत हो सकती हो।

कोर्ट ने आगे कहा कि राजकोट और अहमदाबाद के अस्पतालों में इलाज को लेकर जो बातें कही गईं, उनमें ठोस तथ्य नजर नहीं आते। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि ऐसा प्रतीत होता है कि घायलों को इलाज के नाम पर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि उस समय आरोपित न्यायिक हिरासत में थे और जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी।

कोर्ट के अनुसार, संभव है कि कानूनी सलाह के बाद घायलों ने करीब 20 दिनों तक अस्पताल में रहकर यह दिखाने की कोशिश की कि वे गंभीर रूप से घायल हैं, जिससे समाज में चल रहे आंदोलन और प्रदर्शनों को बल मिल सके।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में भर्ती होने के पीछे असली मकसद इलाज कराना नहीं लगता, बल्कि इसका उद्देश्य कुछ और हो सकता है। पीड़ितों ने जिस शारीरिक परेशानी की बात कही थी, वह जाँच में सही नहीं पाई गई।

कोर्ट ने माना कि आरोपितों ने हमले के दौरान हथियारों का इस्तेमाल किया था, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि उस समय बॉम्बे पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत कोई अधिसूचना लागू थी।

इसी कारण से कोर्ट ने इस धारा को हटा दिया। हालाँकि, यह साबित हो गया कि पीड़ितों को कुछ चोटें घातक हथियारों से लगी थीं, इसलिए कोर्ट ने IPC की धारा 324 (हथियार से चोट पहुँचाना) लागू की। साथ ही, चूँकि कुछ चोटें बिना हथियार के भी लगी थीं, इसलिए IPC की धारा 323 (साधारण चोट पहुँचाना) भी आरोपितों पर लागू की गई।

महिलाओं का अपमान करने वाली धारा क्यों हटाई गई?

शिकायत में दलित परिवार की एक महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उसका अपमान किया। इसके आधार पर FIR में IPC की धारा 354 जोड़ी गई थी। हालाँकि, मुकदमे के दौरान इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत सामने नहीं आए, इसलिए कोर्ट ने इस धारा को हटा दिया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के समय शिकायतकर्ता महिला के साथ एक अन्य महिला भी मौजूद थी, लेकिन उसने अपने बयान में ऐसे किसी दुर्व्यवहार का जिक्र नहीं किया। वहीं, महिला के बेटों और पति ने इस संबंध में आरोप लगाए, लेकिन कोर्ट ने माना कि संभव है आरोपों को अधिक गंभीर दिखाने के लिए ऐसा कहा गया हो।

इन्हीं कारणों के चलते कोर्ट ने SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(डब्ल्यू)(1)(2) के साथ-साथ IPC की धारा 354 और 509 को भी निरस्त कर दिया।

दंगे से संबंधित धारा हटाने को लेकर कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने IPC की धारा 146 और 147 (दंगा) को भी खारिज कर दिया। इन धाराओं के तहत अगर कोई भीड़ एक समान उद्देश्य से हिंसा करती है, तो उसमें शामिल हर व्यक्ति को दोषी माना जाता है।

लेकिन कोर्ट ने कहा कि भले ही भीड़ में से कुछ लोगों ने पीड़ितों की पिटाई की, यह साबित नहीं हो सका कि सभी 41 लोगों का एक जैसा इरादा था, जैसे मारपीट करना, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना और उन्हें अर्धनग्न हालत में घुमाना।

कोर्ट ने यह भी बताया कि घटना के दौरान पहले चार लोग पहुँचे थे और बाद में अन्य लोग मोटरसाइकिल से वहाँ आए। यह भी सामने आया कि जीवित गायों के हत्या की खबर फैलने के बाद भीड़ जमा हुई थी और कुछ लोग जुलूस के रूप में इकट्ठा हुए थे। ऐसे में यह साबित नहीं होता कि वहाँ मौजूद सभी लोगों का मकसद दंगा करना ही था।

इसके अलावा, IPC की धारा 505(1)(ख) के तहत जनशांति भंग करने या लोगों में डर फैलाने के इरादे से किया गया कृत्य अपराध माना जाता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि यह माना जा सकता है कि आरोपितों का इरादा गौहत्या जैसे कृत्य करने वालों में डर पैदा करना था।

लेकिन यह साबित नहीं हुआ कि उन्होंने व्यापक स्तर पर जनशांति भंग करने या अलग-अलग जगहों पर दंगे भड़काने के उद्देश्य से यह काम किया। चूँकि अभियोजन पक्ष इस संबंध में ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, इसलिए कोर्ट ने इस धारा को भी हटा दिया।

पुलिस को क्लीन चिट मिल गई

इस मामले में पुलिस पर लापरवाही और पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसके चलते चार पुलिस अधिकारियों को भी आरोपित बनाया गया था। पीड़ितों ने आरोप लगाया था कि पुलिस निरीक्षक और अन्य कर्मचारियों ने राजनीतिक प्रभाव में आकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और ऐसा काम किया जिससे शिकायतकर्ता को नुकसान और आरोपित को फायदा हुआ।

हालाँकि, कोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर पाया कि यह साबित नहीं हो सका कि किसी भी पुलिसकर्मी ने जानबूझकर अपने कानूनी कर्तव्यों की अनदेखी की या किसी को नुकसान पहुँचाने के इरादे से काम किया। साथ ही, यह भी सिद्ध नहीं हुआ कि उन्होंने फर्जी दस्तावेज तैयार किए थे, इसलिए कोर्ट ने IPC की धारा 466 और 177 को हटा दिया।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि घटना के करीब दस दिन बाद, जब पीड़ितों से जाति के नेताओं, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और उनके वकीलों ने मुलाकात की, तब पुलिस के सामने दिए गए बयानों में कई नए और अतिरिक्त आरोप जोड़े गए।

इनके आधार पर पहली बार यह कहा गया कि पुलिस ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया या लापरवाही बरती। इसके बाद सरकार ने मामले की जाँच स्थानीय पुलिस से लेकर DSP को सौंप दी, जिन्होंने अपनी जाँच में निष्कर्ष निकाला कि पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है और न ही उन्होंने अपने कर्तव्यों में लापरवाही बरती या रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की।

इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने IPC की धारा 166A, 167, 177, 204, 294(B), 466 और SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(6) व 3(2)(7) के तहत पुलिस अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया और माना कि अभियोजन पक्ष इन आरोपों को साबित करने में असफल रहा।

41 आरोपितों में से 5 दोषी पाए गए

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पूरे मामले में केवल पाँच आरोपितों की ही सक्रिय भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई है। इन पाँचों के खिलाफ यह साबित हुआ कि उन्होंने पीड़ितों की पिटाई की, उन्हें अधनंगा किया और जातिसूचक शब्दों से उनका अपमान किया।

इसी आधार पर कोर्ट ने उन्हें IPS और अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया। वहीं, बाकी आरोपितों की भूमिका स्पष्ट नहीं हो सकी और उनके खिलाफ अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया, इसलिए उन्हें बरी कर दिया गया।

सजा सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि दोषियों ने दलित समुदाय के लोगों के साथ गंभीर और अमानवीय अत्याचार किया है, जिससे न केवल पीड़ितों बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी मानसिक आघात पहुँचा है।

इसी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने आरोपितों पर किसी तरह की नरमी नहीं दिखाई और अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के तहत अधिकतम पाँच साल की सजा सुनाई।

पीड़ित ने अपने समाज की स्थिति को समझने की कोशिश नहीं की- कोर्ट

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि शिकायतकर्ताओं द्वारा कुछ परिस्थितियों को अलग तरीके से पेश किए जाने से दलित समुदाय में गहरा आक्रोश और पीड़ा पैदा हुई, जिसके गंभीर परिणाम सामने आए।

कोर्ट ने उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता के पिता स्वयं एम्बुलेंस से इलाज के लिए गिरगधा अस्पताल गए थे, लेकिन बाद में दिए गए बयान में उन्होंने कहा कि वे बेहोश हो गए थे और सरकारी अस्पताल में होश में आए, जबकि ऐसा वास्तव में नहीं हुआ था।

कोर्ट ने आगे कहा कि शिकायतकर्ता और उसके भाई की हालत बहुत गंभीर नहीं थी, फिर भी समाज में यह दिखाने की कोशिश की गई कि उनकी स्थिति बेहद नाजुक है और उनकी मृत्यु हो सकती है।

फैसले में यह भी कहा गया कि ठीक होने के बावजूद उन्हें जानबूझकर अहमदाबाद के अस्पताल में भर्ती कराया गया और स्थिति को ज्यादा गंभीर दिखाने के लिए विभिन्न तरीकों से दुष्प्रचार किया गया।

कोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं का असर इतना गहरा था कि दलित समुदाय में भावनात्मक उबाल आ गया और 23 लोगों ने जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की, जिनमें से एक व्यक्ति की मौत भी हो गई।

कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ताओं के इस व्यवहार से समुदाय के लोग भावुक हुए और आत्मघाती कदम उठाने के लिए प्रेरित हुए। इससे एक परिवार को अपने सदस्य की मौत का दुख झेलना पड़ा और इसके बाद अन्य अपराध भी सामने आए। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इस पूरे घटनाक्रम से ऐसा लगता है कि पीड़ित पक्ष ने समुदाय के अन्य लोगों के दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया।

मुकदमे में देरी के लिए दिए गए तर्क भी खारिज कर दिए गए

कोर्ट ने मुकदमे में देरी के आरोपों को भी खारिज कर दिया। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वयं 12 अक्टूबर 2023 को साक्ष्य पेश किए थे और एक अन्य गवाह ने जनवरी 2026 में बयान दिया था, इसके बावजूद शिकायतकर्ता द्वारा विभिन्न मंचों और मीडिया में यह प्रचारित किया गया कि इतने वर्षों के बाद भी उसे न्याय नहीं मिला।

कोर्ट ने माना कि इस तरह के बयानों से न्यायालय की छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की गई। फैसले में देरी के लिए केवल न्यायिक प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)



 


 






कहीं हिंदुओं की हत्या, कहीं बच्चियों का बलात्कार: 50+ घटनाओं से समझिए कितना ‘शांतिपूर्ण’ रहा 2026 का रमजान, इस्लामी मुल्क में कट्टरपंथियों ने मुस्लिमों को भी नहीं छोड़ा

रमजान को इस्लाम में सबसे पाक महीना माना जाता है। मुस्लिम दावा करते हैं कि यह माह इबादत, सब्र, जकात (दान) और सबसे बढ़कर आपसी दुश्मनी भुलाकर भाईचारे से रहने का है। लेकिन बड़ा सवाल यह खड़ा होता है-जब ‘शांति’ और ‘रहमतों’ का यह पाक महीना चल रहा होता है, तब हिंसा, संघर्ष और खून-खराबे की खबरों में मुस्लिमों की संलिप्ता क्यों सामने आती है?

एक तरफ तो मजहबी मंचो से संदेश दिया जाता है कि रमजान में सिर्फ सबाब के काम होने चाहिए वहीं दूसरी तरफ भड़काऊ बयानबाजियों से सोशल मीडिया भरा दिखता है। 2026 में भी यही सब हुआ। इस साल सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों ने ही नहीं, बल्कि इस्लामी मुल्कों ने भी इस महीने का लिहाज नहीं किया। मात्र 30 दिनों में अनगिनत हत्या-लूटपाट-मारकाट-हिंसा-बलात्कार की घटनाएँ घटीं।

आज ऑपइंडिया उन्हीं घटनाओं में से 50 घटनाओं को आपके लिए सूचीबद्ध कर रहा है। इसमें दिल्ली में हुए तरुण की हत्या का केस भी शामिल है और अफगानिस्तान के अस्पताल में मारे गए 400 लोगों की जानकारी भी है। पढ़िए और निर्णय करिए कि रमजान के महीने को क्या वाकई इस्लामी कट्टरपंथी इबादत, सब्र और जकात का माह मानते हैं।

मिडिल ईस्ट: बारूद के ढेर पर रमजान और गहराता मानवीय संकट

रमजान के इस दौर में मिडिल ईस्ट के हालात बेहद नाजुक और तनावपूर्ण बने हुए हैं। विशेषकर ईरान में सत्ता के शीर्ष स्तर पर मची उथल-पुथल और वहाँ हो रहे बड़े हमलों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए भीषण सैन्य प्रहारों ने ईरान के रणनीतिक ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचाया है, जिससे देश के भीतर अस्थिरता का माहौल और गहरा गया है। हैरानी की बात यह है कि शांति के इस महीने में भी हिंसा का चक्र रुकने के बजाय तेज हो गया है।

ईरान ने इन हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर आक्रामक रुख अपनाते हुए जवाबी कार्रवाई की और क्षेत्र के कई देशों पर मिसाइलों व ड्रोनों से हमला बोल दिया। इस जवाबी कार्रवाई की जद में न केवल सैन्य प्रतिद्वंद्वी आए, बल्कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और कुवैत जैसे कई मुस्लिम बहुल देश भी शामिल थे। युद्ध और हमलों के इस दौर ने इस पवित्र महीने (रमजान) के दौरान क्षेत्र में एक गंभीर मानवीय संकट खड़ा कर दिया है, जहाँ आपसी टकराव और सैन्य वर्चस्व की जंग इबादत के सुकून पर भारी पड़ती दिख रही है।

1. कुवैत में कोहराम: दूतावास पर हमला और ईरान का ‘रमजान ऑफेंसिव’

2 मार्च 2026 को कुवैत सिटी उस वक्त दहल गई जब ईरान के तथाकथित ‘रमजान ऑफेंसिव’ के तहत अमेरिकी दूतावास को सीधा निशाना बनाया गया। इस हमले में मिसाइलों और घातक ड्रोनों (UAV) का तालमेल बिठाकर आसमान से मौत बरसाई गई, जिससे शहर का आकाश काले धुएँ के गुबार से भर गया। हालाँकि कुवैत की रक्षा प्रणाली ने मुस्तैदी दिखाते हुए कई ड्रोनों को हवा में ही ढेर कर दिया, लेकिन इसके बावजूद इस भीषण हमले ने एक व्यक्ति की जान ले ली और 32 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

किसी देश के राजनयिक मिशन (Diplomatic Mission) पर इस तरह का सीधा प्रहार न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाता है, बल्कि यह भी साफ करता है कि ईरान अब अपने पड़ोसी अरब देशों में हिंसा फैलाने से गुरेज नहीं कर रहा है। शांति के इस पवित्र महीने (रमजान) में की गई इस सैन्य कार्रवाई ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को एक खतरनाक युद्ध के मैदान में तब्दील कर दिया है।

2. तेल अवीव में कोहराम: रिहायशी इलाकों पर ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों का कहर

1 मार्च 2026 को ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए बड़े पैमाने के बैलिस्टिक मिसाइल हमलों ने क्षेत्रीय संघर्ष की आग को और भड़का दिया है। हालाँकि इजरायल की ‘आयरन डोम’ रक्षा प्रणाली ने कई मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया, लेकिन हमलों की भारी तादाद के कारण एक मिसाइल सुरक्षा घेरे को भेदते हुए सीधे ‘बीट शेमेश’ के रिहायशी इलाके में जा गिरी। इस भीषण धमाके ने पल भर में तबाही मचा दी, जिसमें 9 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और कुल मृतकों का आँकड़ा 12 तक पहुँच गया।

इस हमले की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 150 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। जिस तरह से मिसाइल रिहायशी इलाके में गिरी, वह साफ दर्शाता है कि निशाना सैन्य ठिकाने नहीं बल्कि निर्दोष आम नागरिक थे। रमजान जैसे पवित्र महीने में की गई यह हिंसक कार्रवाई न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती है, बल्कि ईरान द्वारा किए जाने वाले मजहबी और शांति के दावों पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है।

3. खाड़ी देशों में खौफ: ईरान का मिसाइल हमला और संप्रभुता पर चोट

28 फरवरी 2026 को खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख शहरों ‘अबू धाबी, दुबई और दोहा‘ पर ईरान ने एक साथ मिसाइलें दागकर पूरे इलाके को दहला दिया। ईरान के इस ‘मिसाइल ब्लिट्ज’ का निशाना न केवल अमेरिकी सैन्य ठिकाने थे, बल्कि नागरिक और रिहायशी बुनियादी ढाँचों को भी जानबूझकर खतरे में डाला गया। इस हमले की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अबू धाबी में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दुबई के बुर्ज खलीफा जैसे व्यस्त इलाके के पास भी भीषण धमाकों की खबरें आईं।

इन हमलों के कारण पैदा हुए सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए पूरे मिडिल ईस्ट का हवाई क्षेत्र (Airspace) तुरंत बंद करना पड़ा, जिससे अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का पहिया थम गया और दुबई एयरपोर्ट पर भारी अफरा-तफरी का माहौल बन गया। यह घटना स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई में ईरान अब अपने ही मुस्लिम पड़ोसी देशों की सुरक्षा और संप्रभुता को ताक पर रखने से भी पीछे नहीं हट रहा है।

सरहदों पर जंग: रमजान में पाकिस्तान-अफगानिस्तान का खूनी टकराव

दक्षिण एशिया में इस पवित्र महीने (रमजान) के दौरान भी शांति की उम्मीदें तब धराशायी हो गईं, जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव ने एक भीषण सैन्य टकराव का रूप ले लिया। पाकिस्तानी एयरफोर्स के लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान की सीमा के भीतर घुसकर राजधानी काबुल, कंधार और कई अन्य इलाकों में जोरदार हवाई हमले किए। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए आरोप लगाया है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है।

इन हमलों की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि काबुल में एक अस्पताल भी इस बमबारी की चपेट में आ गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस भीषण सैन्य कार्रवाई में अब तक लगभग 400 लोगों की जान जा चुकी है और 250 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। रमजान के पाक दिनों में अस्पतालों और रिहायशी इलाकों पर हुए इन हमलों ने न केवल मानवीय संकट को गहरा कर दिया है, बल्कि दो पड़ोसी मुस्लिम देशों के बीच की कड़वाहट को भी चरम पर पहुँचा दिया है।

4. कराची में कोहराम: ईरान समर्थित भीड़ का कोहराम और दूतावास पर हमला

ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत की खबर के बाद पाकिस्तान के कराची में हिंसा की आग भड़क उठी, जिसने पूरे शहर को अराजकता की चपेट में ले लिया। 1 मार्च 2026 को ईरान समर्थक एक उग्र भीड़ ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास (Consulate) को निशाना बनाने की कोशिश की, जिससे हालात पूरी तरह बेकाबू हो गए। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने न केवल पुलिस चौकियों को आग के हवाले कर दिया, बल्कि कई सरकारी और अंतरराष्ट्रीय राजनयिक संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुँचाया।

हिंसा का यह सिलसिला केवल कराची तक ही सीमित नहीं रहा। स्कार्दू में भी उग्र भीड़ ने संयुक्त राष्ट्र (UN) के दफ्तर में आग लगा दी। इन भीषण झड़पों और हिंसक वारदातों में अब तक 22 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 120 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पवित्र महीने (रमजान) के बीच हुई इस खूनी हिंसा ने सुरक्षा व्यवस्था और कानून के इकबाल पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

5. अफगानिस्तान के खोस्त और पक्तिका पर पाकिस्तानी हवाई हमले

28 फरवरी 2026 को पाकिस्तान एयरफोर्स के लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान की सीमा लांघकर खोस्त और पक्तिका प्रांतों में भीषण बमबारी की। पाकिस्तान ने इन हमलों को आतंकी ठिकानों के खिलाफ की गई कार्रवाई बताया, लेकिन इसकी भारी कीमत निर्दोष लोगों को चुकानी पड़ी। इस सैन्य ऑपरेशन में कम से कम 8 आम नागरिकों की जान चली गई, जिनमें महिलाएं और मासूम बच्चे भी शामिल हैं।

इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया है; अफगान तालिबान ने इसे अपनी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन करार देते हुए जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। रमजान के इस पवित्र महीने में छिड़ी इस जंग ने सीमावर्ती इलाकों में भारी तबाही मचाई है, जिसके कारण हजारों परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए घर-बार छोड़कर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा है।

6. रमजान की शुरुआत और सरहद पर मातम: नंगरहार-पक्तिका में पाकिस्तानी सैन्य प्रहार

रमजान के पवित्र महीने के शुरुआती दिनों में, जहाँ दुनिया शांति की उम्मीद कर रही थी, वहीं 22 फरवरी 2026 को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के नंगरहार और पक्तिका प्रांतों में एक और बड़ा सैन्य अभियान चलाकर तनाव को चरम पर पहुँचा दिया। पाकिस्तान ने इन हमलों को आतंकवाद के खिलाफ एक जरूरी कार्रवाई करार दिया, लेकिन इस सैन्य ऑपरेशन की भारी कीमत आम जनता को चुकानी पड़ी।

इस भीषण हमले में 17 अफगान नागरिकों की जान चली गई, जिससे दोनों पड़ोसी देशों के बीच पहले से मौजूद कड़वाहट और ज्यादा बढ़ गई है। इबादत और बरकत के इन शुरुआती दिनों में हुई इस खूनी घटना ने शांति की तमाम उम्मीदों को तोड़ दिया है और सीमावर्ती इलाकों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।

7. बागलकोट में बवाल: शिवाजी जयंती के जुलूस पर मस्जिद से पथराव

कर्नाटक के बागलकोट से सांप्रदायिक तनाव की एक भयावह घटना सामने आई है, जिसने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के उपसाक्ष्य में निकाले जा रहे गौरवशाली जुलूस को उस वक्त निशाना बनाया गया, जब वह ‘पंका मस्जिद’ के सामने से गुजर रहा था। आरोप है कि वहाँ मौजूद कट्टरपंथियों ने मस्जिद की ओर से जुलूस पर अचानक चप्पलें और पत्थर बरसाने शुरू कर दिए, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।

इस हमले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उपद्रवियों ने ड्यूटी पर तैनात जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) सिद्धार्थ गोयल तक को नहीं बख्शा। हमले में उनके सिर और गर्दन पर चोटें आईं। उनकी वर्दी पर लगे खून के धब्बे इस बात की गवाही दे रहे थे कि हमलावरों के मन में न तो प्रशासन का कोई खौफ है और न ही कानून का सम्मान। शांतिपूर्ण जुलूस पर हुए इस सुनियोजित हमले ने एक बार फिर बढ़ते कट्टरपंथ और बिगड़ते सामाजिक सद्भाव की चिंताजनक तस्वीर पेश की है।

8. जबलपुर में तनाव: मंदिर की आरती और कट्टरपंथी हमला

मध्य प्रदेश के जबलपुर की संवेदनशील सिहोरा तहसील से कट्टरपंथी मानसिकता की एक बेहद चिंताजनक घटना सामने आई। 19 फरवरी 2026 की रात, जब हिंदू समाज अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा मंदिर में शाम की आरती कर रहा था, उसी दौरान पास की मस्जिद में नमाज का समय भी था। शांतिपूर्ण माहौल तब अचानक तनाव में बदल गया जब एक युवक ने कथित तौर पर मंदिर की ग्रिल को नुकसान पहुँचाया। यह केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि सीधे तौर पर हिंदुओं की धार्मिक आस्था और श्रद्धा पर किया गया प्रहार था।

जैसे ही स्थानीय लोगों ने इस हरकत का विरोध किया, वहाँ मौजूद कट्टरपंथी समूह ने हिंसक रुख अपनाते हुए भारी पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस अचानक हुए हमले ने पूरे इलाके को सांप्रदायिक तनाव की आग में झोंक दिया। मंदिर परिसर में हुई इस तोड़फोड़ और उसके बाद शुरू हुई हिंसा ने स्थानीय प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी, जो स्पष्ट रूप से एक सुनियोजित कट्टरपंथी सोच का परिणाम नजर आती है।

9. हैदराबाद में तनाव: शिवाजी जयंती के नारों पर अंबरपेट में भारी बवाल

हैदराबाद के अंबरपेट इलाके से भी कट्टरपंथी मानसिकता का भी मामला है, जहाँ शिवाजी जयंती के जुलूस को निशाना बनाया गया। विवाद तब शुरू हुआ जब शोभायात्रा एक स्थानीय मस्जिद के पास से गुजर रही थी और वहाँ मौजूद कट्टरपंथी तत्वों ने बज रहे संगीत और ‘मंदिर बनाएँगे’ जैसे गानों पर कड़ी आपत्ति जताई। देखते ही देखते यह विरोध तीखी बहस और फिर हिंसक धक्का-मुक्की में बदल गया, जिससे पूरे क्षेत्र में डर का माहौल पैदा हो गया।

अक्सर देखा गया है कि ‘प्रार्थना में खलल’ का तर्क देकर हिंदू सांस्कृतिक और धार्मिक अभिव्यक्ति को दबाने की कोशिश की जाती है, और यहाँ भी वही पैटर्न नजर आया। स्थिति को बेकाबू होते देख प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप करना पड़ा और इलाके में अगले चार दिनों के लिए धारा 144 (कर्फ्यू जैसी पाबंदी) लागू कर दी गई। पुलिस ने इस मामले में 8 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक उत्सव को मजहबी कट्टरता के जरिए सांप्रदायिक तनाव में झोंक दिया गया।

10. महबूबनगर में खौफनाक वारदात: सोशल मीडिया पोस्ट पर हिंदू युवक को मॉब लिंचिंग की कोशिश

तेलंगाना के महबूबनगर जिले से कट्टरपंथी हिंसा की एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने सबको झकझोर कर रख दिया है। यहाँ संतोष नामक एक हिंदू युवक पर करीब 20-25 लोगों की उग्र भीड़ ने सिर्फ इसलिए जानलेवा हमला कर दिया क्योंकि उसने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत से जुड़ी एक पोस्ट सोशल मीडिया पर साझा की थी। 1 मार्च को डाली गई यह स्टोरी स्थानीय ग्रुप्स में वायरल हो गई, जिससे नाराज होकर कट्टरपंथी रात करीब 9 बजे संतोष की दुकान पर जा पहुँचे और उसे लात-घूंसों से बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया।

पीड़ित संतोष का कहना है कि भीड़ ने उसे जमीन पर गिराकर कुचलने की कोशिश की और अगर सामने वाले दुकानदार ने हिम्मत दिखाकर उसे बाहर न निकाला होता, तो उसकी जान भी जा सकती थी। हमलावरों का दुस्साहस इतना था कि वे आधी रात के बाद भी उसे दोबारा मारने के इरादे से उसकी दुकान के आसपास चक्कर काट रहे थे। इस मामले में पुलिस ने 11 लोगों को आरोपित बनाया गया, जिनमें से 9 को गिरफ्तार किया था, हालाँकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी।

11. बेंगलुरु में सनसनीखेज वारदात: रमजान के दौरान मंगेतर की गला काटकर हत्या

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से भी रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात सामने आई, जहाँ रमजान के पवित्र महीने के बीच 20 वर्षीय मोहम्मद सबील ने अपनी ही नाबालिग मंगेतर जोया की बेरहमी से हत्या कर दी। यह खौफनाक वारदात डीजे हाली इलाके में 16 मार्च 2026 की सुबह करीब 6 बजे हुई। पुलिस के अनुसार, जोया के नाबालिग होने के बावजूद दोनों की सगाई हो चुकी थी और वे जल्द ही निकाह करने वाले थे। घटना वाले दिन सबील जोया को अपने एक रिश्तेदार के घर ले गया था, जहाँ किसी बात को लेकर दोनों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।

विवाद इतना बढ़ा कि सबील ने आपा खो दिया और गुस्से में एक धारदार हथियार से जोया की गर्दन काट डाली, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। वारदात को अंजाम देकर सबील तुरंत वहाँ से फरार हो गया। करीब एक घंटे बाद जब सबील के रिश्तेदार घर लौटे, तो उन्हें जमीन पर जोया का खून से लथपथ शव मिला। परिवार की सूचना पर पहुँची पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की और फरार आरोपित सबील की सरगर्मी से तलाश की। पवित्र महीने (रमजान) में हुई इस क्रूर हत्या ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है।

12. दिल्ली में होली पर खूनी खेल: गुब्बारे के मामूली विवाद में तरुण की पीट-पीटकर हत्या

देश की राजधानी दिल्ली के उत्तम नगर (हस्तसाल पुनर्वासित कॉलोनी) से एक दिल दहला देने वाली घटना हुई, जहाँ होली की खुशियाँ मातम में बदल गईं। विवाद की शुरुआत एक बेहद मामूली बात से हुई, जब हिंदू पीड़ित तरुण के परिवार की 11 साल की बच्ची छत से होली खेल रही थी। उसने नीचे खड़े अपने पिता की ओर पानी का गुब्बारा फेंका, जो गलती से सड़क पर गिर गया और उसका पानी पड़ोस की एक मुस्लिम महिला पर जा गिरा। परिवार का कहना है कि उन्होंने तुरंत माफी भी माँगी, लेकिन मुस्लिम समुदाय की उस महिला और उसके परिवार ने बात सुनने के बजाय झगड़ा शुरू कर दिया और अपने रिश्तेदारों को बुला लिया।

घटना के करीब एक घंटे बाद, जब 26 वर्षीय तरुण अपने दोस्त के साथ होली खेलकर बाइक से घर लौट रहा था, तभी 15-20 लोगों की इस्लामी उग्र भीड़ ने उसे रास्ते में घेर लिया। भीड़ ने तरुण पर लोहे की रॉड, ईंटों और पत्थरों से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। तरुण के दादा मान सिंह ने रुंधे गले से बताया कि हमलावरों ने उसे बेरहमी से पीटा और जब वह अधमरा होकर सड़क पर गिर गया, तब उसके सीने पर एक भारी पत्थर दे मारा। अस्पताल में इलाज के दौरान तरुण ने दम तोड़ दिया। एक छोटे से गुब्बारे से शुरू हुआ यह विवाद कट्टरपंथी मानसिकता के कारण एक हँसते-खेलते युवक की जान ले बैठा।

13. एटा में होली पर खूनी संघर्ष: रंग गिरने के बहाने दलित युवक को मरणासन्न किया

दिल्ली के उत्तम नगर जैसी ही एक और हृदयविदारक घटना उत्तर प्रदेश के एटा जिले से सामने आई थी, जहाँ होली की खुशियों के बीच कट्टरपंथी हिंसा ने एक दलित युवक के परिवार को निशाना बनाया। 4 मार्च 2026 की रात करीब 8 बजे 22 वर्षीय आकाश अपने घर के बाहर होली खेल रहा था। इसी दौरान मोहल्ले के तीन सगे भाई ‘अरबाज, शाहबाज और मुस्तफा’ वहाँ से गुजरे और उनके कपड़ों पर गलती से रंग गिर गया। इस मामूली बात पर तीनों ने आकाश की माँ और बहन को भद्दी गालियाँ देना शुरू कर दिया। जब आकाश ने विरोध किया, तो आरोपितों ने उसे जमीन पर गिराकर लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया।

हमले की क्रूरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अरबाज ने अपने पास मौजूद तमंचे (पिस्तौल) की बट से आकाश के सिर पर जोरदार प्रहार किया, जिससे वह लहूलुहान होकर गिर पड़ा। जब आकाश की बहन बीना और भाभी वर्षा उसे बचाने दौड़ीं, तो मुस्तफा और अरबाज ने उनके साथ भी मारपीट की। जाते-जाते आरोपितों ने पीड़ित परिवार को जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और जान से मारने की धमकी देते हुए कहा कि ‘तुम्हें यहाँ रहने नहीं देंगे।’

14. दिल्ली में दरिंदगी: हलाल मीट शॉप के शटर के पीछे मासूम से हैवानियत

देश की राजधानी दिल्ली के द्वारका इलाके से रमजान के दौरान ही इंसानियत को तार-तार कर देने वाली एक जघन्य घटना सामने आई। गोयला डेयरी के पास एक 65 वर्षीय मुस्लिम व्यक्ति ने 6 से 9 साल की एक मासूम हिंदू बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। वारदात 16 मार्च 2026 को हुई, जब बच्ची अपनी छोटी बहन के साथ स्कूल के पास खेल रही थी। तभी पास में हलाल मीट की दुकान चलाने वाले इस आरोपित ने बच्ची को कुछ देने के बहाने फुसलाया और अपनी हलाल मीट शॉप के भीतर ले गया। वहाँ दुकान का शटर गिराकर उसने मासूम के साथ दरिंदगी की।

इस खौफनाक घटना का खुलासा तब हुआ जब बच्ची की माँ और एक रिश्तेदार ने आरोपित को रंगे हाथों पकड़ा, जिसके बाद इलाके में भारी हंगामा और हाथापाई शुरू हो गई। बच्ची ने रोते हुए यह भी बताया कि उस मुस्लिम शख्स ने पहले भी उसके साथ गलत काम किया था। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद पुलिस ने उसको गिरफ्तार किया।

15. रायसेन किले पर अराजकता: ऐतिहासिक तोप चलाकर लगाए ‘ईरान’ के समर्थन में नारे

मध्य प्रदेश के रायसेन किले से एक विवादित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ मुस्लिम युवक ऐतिहासिक किले की पहाड़ी पर खड़े होकर ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाते और ‘हम ईरान का साथ देने जा रहे हैं‘ जैसी बातें कहते हुए दिखाई दे रहे हैं। हद तो तब हो गई जब इन युवकों ने कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए किले की एक प्राचीन तोप में माचिस से आग लगा दी। आग लगते ही एक जोरदार धमाका हुआ और पूरा इलाका धुएँ से भर गया, जबकि वीडियो में नीचे पूरा शहर साफ नजर आ रहा था।

इस घटना को सोशल मीडिया पर एक खास उकसावे वाले संदेश के रूप में पेश किया गया, जिससे स्थानीय लोगों में रोष फैल गया। रायसेन के पटेल नगर निवासी बृजेश चावरिया की शिकायत पर पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया और मामले की गंभीरता को देखते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पकड़े गए युवकों की पहचान रायसेन के शादाब कुरैशी और भोपाल के यूसुफ शेख, वसीम मोहम्मद व पप्पू उर्फ सलमान कुरैशी के रूप में हुई है। ऐतिहासिक धरोहर के साथ खिलवाड़ और इस तरह की भड़काऊ नारेबाजी ने इलाके में सांप्रदायिक तनाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है।

16. रायपुर में बवाल: मरही माता मंदिर पर पथराव और रंजिश की खूनी जंग

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का मौदहापारा इलाका 16 मार्च 2026 को हिंसा और पत्थरबाजी की चपेट में आया। विवाद की शुरुआत दो पक्षों के बीच टकराव से हुई, जिसने देखते ही देखते उग्र रूप ले लिया और मरही माता मंदिर के पास जमकर ईंट-पत्थर चले। सोशल मीडिया पर वायरल दावों के अनुसार, इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने देर रात मंदिर को निशाना बनाकर पथराव किया, जिससे इलाके में भारी सांप्रदायिक तनाव फैल गया। इस घटना के विरोध में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में मौदहापारा थाने का घेराव किया और स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि मंदिर पर हमला करने वाले दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका मुँहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रायपुर में हिंसा का यह दौर केवल पत्थरबाजी तक सीमित नहीं रहा, पिछले 24 घंटों के भीतर चाकूबाजी की भी चार अलग-अलग वारदातें सामने आई हैं। पुलिस जाँच में पता चला है कि मौदहापारा की इस हिंसा की जड़ में पुरानी रंजिश थी। पिछले साल अल्ताफ और राशिद नामक युवकों ने रवि रक्सेल पर हमला किया था, जिसके बाद से दोनों गुटों में ठनी हुई थी।

17. गंगा की पवित्रता पर प्रहार: वाराणसी में चलती नाव पर ‘बिरयानी पार्टी’ और 14 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी से आस्था को ठेस पहुँचाने वाली एक घटना सामने आई, जहाँ पवित्र गंगा नदी के बीचों-बीच नाव पर इफ्तार पार्टी करने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। 16 मार्च 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम में मुस्लिम युवकों की एक टोली ने न केवल रोजा इफ्तार किया, बल्कि चलती नाव पर बड़े भगोने से ‘चिकन बिरयानी’ परोसकर दावत भी उड़ाई। इन मुस्लिम युवकों ने मांसाहार करने के बाद जूठी हड्डियाँ सीधे माँ गंगा की पावन धारा में फेंक दीं, जिससे सनातन धर्म की मान्यताओं और नदी की शुचिता का अपमान हुआ है।

इस घटना के सामने आते ही स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों में भारी आक्रोश फैला। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए वाराणसी पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की और इस ‘फ्लोटिंग पार्टी’ में शामिल 14 लोगों को गिरफ्तार किया। धार्मिक नगरी में मर्यादाओं के इस उल्लंघन ने एक बार फिर सांस्कृतिक सम्मान और आपसी सद्भाव के बीच गहरी लकीर खींच दी है।

18. रामपुर में नाबालिग हिंदू लड़की का अपहरण-धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के पटवाई क्षेत्र से 22 फरवरी 2026 को एक गंभीर मामला सामने आया। यहाँ एक नाबालिग हिंदू लड़की के अपहरण और उसे बंधक बनाकर जबरन धर्मांतरण की कोशिश की। इस घटना के सामने आते ही पीड़ित परिजनों और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ताओं में भारी रोष फैल गया। संगठनों ने तुरंत पटवाई थाने पहुँचकर लिखित शिकायत दर्ज कराई और पुलिस प्रशासन से लड़की की सुरक्षित व जल्द बरामदगी की पुरजोर माँग की।

मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब घटना के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी लड़की का कोई सुराग नहीं मिला, जिसके बाद हिंदू संगठनों ने पुलिस को सख्त अल्टीमेटम दिया। शिकायत के अनुसार, दो मुस्लिम युवकों ने लड़की को अगवा किया और उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाया। इस मामले में कार्रवाई करते हुए पुलिस ने फिलहाल गाँव के प्रधान को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है।

19. पहचान छिपाकर दरिंदगी: मेहसाणा में ‘राहुल पटेल’ बनकर मोहम्मद जावेद ने की ब्लैकमेलिंग

गुजरात के मेहसाणा जिले के खेड़ालू कस्बे से पहचान छिपाकर हिंदू लड़की के शोषण मामला सामने आया। 22 फरवरी 2026 को उजागर हुई इस घटना के अनुसार, मोहम्मद जावेद नाम के एक व्यक्ति ने खुद को ‘राहुल पटेल’ बताकर हिंदू लड़की से दोस्ती की और उसे अपने झांसे में ले लिया। आरोपित ने न केवल लड़की का विश्वास जीता, बल्कि उसकी कुछ निजी तस्वीरें भी ले लीं, जिनका इस्तेमाल वह बाद में उसे ब्लैकमेल करने के लिए करने लगा।

पीड़िता ने आरोप लगाया कि जावेद उसे बहला-फुसलाकर एक गेस्ट हाउस में ले गया, जहाँ उसने उसके साथ दुष्कर्म (रेप) करने की भी कोशिश की। जैसे ही इस घिनौनी करतूत की भनक परिजनों और ग्रामीणों को लगी, उन्होंने तुरंत मौके पर पहुँचकर आरोपित को रंगे हाथों पकड़ा। सूचना मिलते ही पुलिस ने कार्रवाई शुरू की और पीड़िता की शिकायत के आधार पर मोहम्मद जावेद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर उसे हिरासत में ले लिया है।

20. गाजियाबाद में हनुमान चालीसा बजाने पर हिंदू घर में घुसकर हथौड़े से वार

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित नंदग्राम इलाके से 10 मार्च 2026 को एक विचलित कर देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ लाउडस्पीकर पर हनुमान चालीसा बजाने को लेकर एक हिंदू परिवार को हिंसक भीड़ का शिकार होना पड़ा। पीड़ित रितिक सिंह के अनुसार, विवाद की शुरुआत तब हुई जब पड़ोस में रहने वाले कुछ मुस्लिम परिवारों ने डीजे पर बज रही हनुमान चालीसा पर आपत्ति जताई। यह मामूली कहासुनी देखते ही देखते तब खूनी संघर्ष में बदल गई जब ताहिर, राशिद और सलमान अपने कई अज्ञात साथियों के साथ जबरन रितिक के घर में घुस आए।

पीड़ित परिवार की सदस्य पूजा ने बताया कि हमलावरों ने पहले उनके पति को निशाना बनाया जब वे पास की दुकान पर गए थे, और फिर पूरे लाव-लश्कर के साथ घर में हंगामा किया। आरोप है कि इस दौरान हमलावरों ने क्रूरता की हदें पार करते हुए पूजा की मासूम बेटी पर हथौड़े से हमला कर उसे लहूलुहान कर दिया। परिवार का दावा है कि उन्हें सरेआम जान से मारने की धमकियाँ भी दी गईं। नंदग्राम थाने के SHO उमेश कुमार ने मुख्य आरोपितों ‘ताहिर, राशिद और सलमान’ को पुलिस ने हिरासत में लिया।

21. हैदराबाद में कट्टरपंथ: ‘जय श्री राम’ के स्टिकर पर कैब ड्राइवर की बेरहमी से पिटाई

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के जेबी नगर इलाके से धार्मिक असहिष्णुता की एक विचलित कर देने वाली घटना सामने आई। 26 फरवरी 2026 की देर रात, एक हिंदू कैब ड्राइवर सुरेश गौड़ को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उनकी गाड़ी के पीछे ‘जय श्री राम’ का स्टिकर लगा हुआ था। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुस्लिमों के एक उग्र समूह ने उनकी कैब को बीच रास्ते में रोक लिया और स्टिकर को लेकर विवाद शुरू कर दिया, जो देखते ही देखते हिंसक हमले में बदल गया।

आरोप है कि करीब 25-30 इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने सुरेश गौड़ को घेर लिया और उन्हें जबरन वाहन से बाहर खींचकर उनके साथ मारपीट की। हमलावरों ने न केवल ड्राइवर को चोट पहुँचाई, बल्कि उनकी कैब में भी जमकर तोड़फोड़ की, जिससे गाड़ी के शीशे चकनाचूर हो गए और वाहन को भारी नुकसान पहुँचाया।

22. कोडागु में सांप्रदायिक झड़प: धार्मिक घोषणा के दौरान हिंदू युवक पर हमला

कर्नाटक के कोडागु जिले के नापोक्लू कस्बे में 3 मार्च 2026 को एक धार्मिक आयोजन की सूचना देना हिंसा का कारण बना। घटना उस समय हुई जब कुछ हिंदू युवक एक वाहन पर लाउडस्पीकर के जरिए आगामी धार्मिक कार्यक्रम की घोषणा की। इसी दौरान स्थानीय मुस्लिम युवकों ने इस पर आपत्ति जताई, जिससे शुरू हुई मामूली कहासुनी देखते ही देखते हिंसक मारपीट में बदल गई। इस हमले में गौतम नामक एक हिंदू युवक गंभीर रूप से घायल हुआ।

इस घटना के बाद हिंदू संगठनों ने दोषियों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की और राशिद, सिद्दीक, सुहैल और रफी के खिलाफ नामजद FIR दर्ज की है। इनमें से एक मुख्य आरोपित सुहैल को हिरासत में ले लिया था।

23. छिंदवाड़ा में दुस्साहस: इंस्टाग्राम पोस्ट पर हिंदू युवती को ‘पठान’ बनकर रेप की धमकी

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथी धमकी और मानसिक उत्पीड़न का मामला सामने आया। घटना की शुरुआत 24 फरवरी 2026 को हुई, जब एक 22 वर्षीय हिंदू युवती ने इंस्टाग्राम पर एक हिंदू नेता का बयान साझा किया। इस पोस्ट से तिलमिलाए बिलाल, दिलावर और सलमान नाम के तीन युवकों ने हिंदू युवती को निशाना बनाया। उन्होंने न केवल फोन कॉल के जरिए युवती पर पोस्ट हटाने का दबाव बनाया, बल्कि उसे डराने के लिए मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।

हिंदू युवती को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए आरोपितों ने बेहद आपत्तिजनक और हिंसक भाषा का इस्तेमाल किया। बातचीत के दौरान एक आरोपित ने अपनी पहचान का रौब झाड़ते हुए कहा, “मैं पठान हूँ, सच में रेप करता हूँ,” जबकि दूसरे ने युवती को नीचा दिखाने के लिए दावा किया कि उसके समाज की चार लड़कियाँ उसकी ‘गर्लफ्रेंड’ हैं। इन खौफनाक धमकियों से घबराने के बजाय हिंदू युवती ने साहस दिखाया और तुरंत अपने परिवार को सूचित कर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। छिंदवाड़ा पुलिस ने तीनों आरोपितों ‘बिलाल, दिलावर और सलमान’ को गिरफ्तार किया।

24. देहरादून में होली पर बवाल: गुब्बारा फटने के विवाद में हिंदू युवकों पर जानलेवा हमला

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से होली के उल्लास के बीच कट्टरपंथी हिंसा की एक विचलित कर देने वाली घटना सामने आई। 2 मार्च 2026 को चकराता रोड स्थित आरजीएम प्लाजा के पास चिराग आनंद और उनका दोस्त आनंद होली खेल रहे थे, तभी एक पानी से भरा गुब्बारा बिजली के तार में फँसकर फट गया। इस गुब्बारे का पानी पास खड़े साहिल धीमान के कपड़ों पर गिर गया, जो देखते ही देखते एक खूनी संघर्ष की वजह बन गया।

मामूली सी बात पर नाराज होकर साहिल ने अपने साथियों को बुला लिया और देखते ही देखते 20 से अधिक इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने लाठी-डंडों के साथ चिराग पर हमला बोल दिया। हमलावरों ने क्रूरता दिखाते हुए चिराग के सिर और पीठ पर गंभीर चोटें पहुँचाईं, जिससे बचने के लिए उन्हें पास की एक गली में छिपकर अपनी जान बचानी पड़ी। आरोप है कि भीड़ यहीं नहीं रुकी, बल्कि पत्थरों और ईंटों से हमला करने के बाद वे पीड़ित के घर तक जा पहुँचे, जहाँ उन्होंने चिराग की माँ के साथ भी धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार किया।

25. राजकोट में होलिका दहन पर उपद्रव: पूजा के दौरान स्टंट और महिलाओं से अभद्रता

गुजरात के राजकोट स्थित भगवतीपारा इलाके में 2 मार्च 2026 को होलिका दहन के पावन अवसर पर उस समय भारी तनाव फैल गया, जब श्रद्धा और भक्ति के माहौल में विघ्न डालने की कोशिश की गई। घटना के वक्त बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाएँ और बच्चे होलिका की पूजा और परिक्रमा कर रहे थे। इसी बीच, बाइक सवार दो मुस्लिम युवक अचानक वहाँ पहुँचे और भीड़ के बीच खतरनाक स्टंट करने लगे, जिससे अफरा-तफरी मच गई।

जब वहाँ मौजूद लोगों ने इस असुरक्षित और आपत्तिजनक व्यवहार का विरोध किया, तो मुस्लिम युवक एक बार तो चले गए, लेकिन कुछ ही देर बाद अपने साथ अन्य साथियों की इस्लामी भीड़ लेकर वापस लौटे। देखते ही देखते यह विवाद एक हिंसक झड़प में बदल गया। आरोप है कि उपद्रवियों ने न केवल हंगामा किया, बल्कि वहाँ मौजूद महिलाओं के साथ गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार भी किया, जिससे स्थिति और अधिक बिगड़ गई। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए शांति व्यवस्था भंग करने के आरोप में कुछ संदिग्धों को हिरासत में लिया।

26. रामपुर में धार्मिक परंपरा से खिलवाड़: समय से पहले होलिका दहन पर भारी बवाल

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बाजिदपुर गाँव में 2 मार्च 2026 को होलिका दहन के पावन पर्व पर उस समय तनाव फैल गया, जब एक मुस्लिम युवक ने हिंदुओं की धार्मिक मान्यताओं के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की। परंपरा के अनुसार, सैकड़ों हिंदू परिवार, महिलाएँ और बच्चे चंद्र ग्रहण समाप्त होने के बाद निर्धारित शुभ मुहूर्त में होलिका दहन और परिक्रमा के लिए एकत्रित हुए थे। अभी लोग पूजा की तैयारी कर ही रहे थे कि इसी बीच एक मुस्लिम युवक ने तय समय से पहले ही चुपके से होलिका में आग लगा दी।

इस घटना से वहाँ मौजूद ग्रामीणों में भारी आक्रोश फैल गया, क्योंकि इसे उनकी सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का सीधा उल्लंघन माना गया। देखते ही देखते मौके पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई और होलिका दहन की प्रक्रिया बाधित हो गई। पुलिस ने तुरंत आरोपित युवक को हिरासत में लिया।

27. चंदौली में खूनी होली: रंग पड़ने के विवाद में ई-रिक्शा सवार ने साथियों संग किया जानलेवा हमला

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के दुधारी-तेंदुहान गाँव में 5 मार्च 2026 को होली की खुशियाँ उस वक्त मातम में बदल गईं, जब एक मामूली बात पर हिंसक संघर्ष छिड़ गया। गाँव के हिंदू युवक पारंपरिक गीतों पर थिरकते हुए एक-दूसरे को रंग-अबीर लगा रहे थे, तभी वहाँ से ई-रिक्शा पर गुजर रहे खुर्शीद नाम के व्यक्ति पर गलती से थोड़ा रंग गिर गया। इस छोटी सी बात को लेकर खुर्शीद आगबबूला हो गया और उसने तुरंत अपने गाँव के अन्य साथियों को मौके पर बुला लिया।

देखते ही देखते विवाद ने इतना उग्र रूप ले लिया कि हमलावरों ने लाठी-डंडों, हॉकी स्टिक और धारदार हथियारों से लैस होकर होली खेल रहे युवकों पर धावा बोल दिया। हद तो तब हो गई जब हमलावर एक हिंदू युवक के घर के भीतर तक घुस गए और वहाँ मौजूद लोगों के साथ बेरहमी से मारपीट की। इस सुनियोजित हमले में करीब आधा दर्जन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया।

28. टोंक में होली की पूर्व संध्या पर पथराव: नमाज से लौटते ही विवाद, पिता-पुत्री लहूलुहान

राजस्थान के टोंक जिले में होली के उल्लास से ठीक एक दिन पहले, 3 मार्च 2026 की रात को सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की खबर सामने आई, जहाँ एक पुराने विवाद ने अचानक हिंसक रूप ले लिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक मुस्लिम परिवार नमाज अदा कर घर लौटा और उनका स्थानीय हिंदू परिवारों के साथ झगड़ा हो गया। देखते ही देखते यह तकरार इतनी बढ़ गई कि दोनों ओर से लाठी-डंडे चलने लगे और भारी पथराव शुरू हो गया, जिससे पूरे इलाके में दहशत और अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

इस खूनी झड़प में एक हिंदू पिता और उनकी बेटी गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें आनन-फानन में टोंक के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए टोंक के डिप्टी एसपी मृत्युंजय मिश्रा ने मोर्चा संभाला और सिटी कोतवाली, पुराना टोंक व सदर थाने की पुलिस के साथ ‘राजस्थान आर्म्ड कांस्टेबुलरी’ के जवानों को चप्पे-चप्पे पर तैनात कर दिया है।

29. बांग्लादेश में बर्बरता: हिंदू व्यक्ति का सिर काटकर ईंट-भट्ठे के पास फेंका

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश के पीरोजपुर जिले में 45 वर्षीय हिंदू व्यक्ति गोपाल चंद्र दास की अत्यंत क्रूरता से हत्या की गई। 13 मार्च 2026 को लापता हुए गोपाल का सिर और कटा हुआ शव अगले दिन नेसराबाद उपजिला में एक सुनसान ईंट-भट्ठे के पास नदी किनारे बरामद हुआ। शव की वीभत्स हालत देख पूरे इलाके में सनसनी फैल गई और स्थानीय हिंदू समुदाय में भारी दहशत का माहौल बन गया। पुलिस के अनुसार, शव मामून मियाँ के ईंट-भट्ठे परिसर के पास मिला था, जिसका सिर गायब होना इस बात का पुख्ता सबूत है कि हत्यारों ने बेइंतहा दरिंदगी को अंजाम दिया।

परिजनों ने इस जघन्य हत्याकांड का सीधा आरोप मोहम्मद सम्राट और मोहम्मद राजू नामक दो व्यक्तियों पर लगाया। शुरुआती जाँच और परिवार के बयानों से संकेत मिले कि गोपाल चंद्र दास का पहले अपहरण किया गया और फिर उन्हें किसी सुनसान जगह ले जाकर मौत के घाट उतार दिया गया। पुलिस ने आरोपित मोहम्मद सम्राट को गिरफ्तार किया, जबकि दूसरा आरोपित मोहम्मद राजू फरार बताया गया।

30. मुंगेर में होली पर उपद्रव: रंग लगाने के विवाद में पथराव

बिहार के मुंगेर जिले के जमालपुर इलाके में 4 मार्च 2026 को होली की खुशियाँ तनाव में बदली, जब सदर बाजार और रामपुर कॉलोनी को जोड़ने वाले रेलवे पथ के पास हिंसक झड़प हुई। यहाँ स्थानीय लोग पारंपरिक उत्साह के साथ एक-दूसरे को गुलाल लगा रहे थे, तभी रंग डालने की बात को लेकर मुस्लिम पक्ष ने विवाद शुरू किया। देखते ही देखते विवाद इतना गहरा गया कि स्थानीय मुस्लिमों की भीड़ ने वहाँ मौजूद हिंदू लोगों पर पथराव किया।

इस अचानक हुए हमले में एक हिंदू व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुआ, जबकि कई अन्य लोगों को भी चोटें आईं। पुलिस इस मामले में कार्रवाई करते हुए पाँच संदिग्धों को हिरासत में लिया और पूरे मामले की गहन जाँच की, ताकि दोषियों को सख्त सजा मिले।

31. उज्जैन में बवाल: भारत की वर्ल्ड कप जीत के जश्न पर पथराव और हमला

मध्य प्रदेश के उज्जैन में 8 मार्च 2026 की रात खुशियाँ उस वक्त मातम और खौफ में बदली, जब भारत की ICC मेन्स टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में ऐतिहासिक जीत का जश्न मना रहे एक हिंदू परिवार पर हमला किया। यह घटना चिमनगंज मंडी थाना क्षेत्र की राज रॉयल कॉलोनी की है, जहाँ रमजान के दौरान ही कट्टरपंथी हिंसा की तस्वीर सामने आई। परिवार अपने घर के बाहर पटाखे फोड़कर देश की जीत की खुशियाँ मना रहे थे, तभी पड़ोस के कुछ मुस्लिमों ने पटाखों पर आपत्ति जताते हुए विवाद शुरू किया।

देखते ही देखते यह सामान्य बहस एक हिंसक झड़प में तब्दील हो गई और मुस्लिम भीड़ ने परिवार के साथ बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी। इस अचानक हुए हमले में परिवार के कई सदस्य घायल हुए। पीड़ित पक्ष की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई की गई है। पुलिस ने वाहिद खान, जाकिर, सुल्तान, शादाब और अन्य आरोपितों को हिरासत में लिया।

32. रमजान में राजस्थान में खौफ: बुमराह के विकेट का जश्न मनाने पर हिंदू परिवार पर हमला

राजस्थान के अलवर जिले (खैरथल-तिजारा क्षेत्र) के किशनगढ़ बास थाना अंतर्गत बधोड़ा घुमक्कड़ गाँव में 8 मार्च 2026 की रात क्रिकेट का रोमांच उस वक्त खूनी संघर्ष में बदल गया, जब भारत की जीत की खुशी मनाना एक हिंदू परिवार को भारी पड़ गया। रमजान के इस महीने में घटी यह घटना तब शुरू हुई जब एक हिंदू परिवार अपने घर की छत पर भारत और न्यूजीलैंड के बीच चल रहे मैच का आनंद ले रहा था। जैसे ही भारतीय गेंदबाज जसप्रीत बुमराह ने एक ओवर में लगातार दो विकेट झटके, परिवार के सदस्यों ने उत्साह में तालियाँ बजाकर खुशी जाहिर की।

मैच के इस जश्न पर पड़ोस में मौजूद कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने आपत्ति जताते हुए गाली-गलौज शुरू कर दी। देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ा कि करीब 15 से 20 इस्लामी भीड़ ने लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से लैस होकर हिंदू परिवार पर धावा बोला। इस दौरान न केवल भारी पथराव हुआ, बल्कि एक हमलावर ने दुस्साहस दिखाते हुए छत पर चढ़कर फायरिंग भी की। इस जानलेवा हमले में 30 वर्षीय महिला भजनो बाईवास के सिर में गंभीर चोट आई और वे लहूलुहान हुई।

33. रमजान के दौरान भिवंडी में ‘निकाह’ की साजिश: नाबालिग से दरिंदगी

महाराष्ट्र के भिवंडी में 20 वर्षीय अरमान शेख को एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म, ब्लैकमेलिंग और जबरन निकाह के लिए दबाव बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया। रमजान के इस पवित्र महीने के दौरान उजागर हुई यह घटना 6 मार्च 2026 की है। पुलिस जाँच में पता चला है कि इन दोनों की मुलाकात साल 2024 में सोशल मीडिया के जरिए हुई। उस समय लड़की नाबालिग थी और अरमान करीब 18 वर्ष का था। आरोप है कि अरमान ने लड़की की मासूमियत और कम उम्र का फायदा उठाते हुए पिछले दो वर्षों तक उसका लगातार यौन शोषण किया।

हद तो तब हो गई जब लड़की के 18 वर्ष के होते ही अरमान उस पर निकाह के लिए दबाव बनाने लगा। आरोपित की ब्लैकमेलिंग और धमकियों से डरकर लड़की निकाह के लिए भिवंडी पहुँच गई, जहाँ निकाह की पूरी बिसात बिछाई गई थी। काजी से लेकर गवाह तक सब मौजूद थे। ऐन वक्त पर लड़की के परिजनों की सूचना पाकर एक हिंदू संगठन के सदस्य मौके पर पहुँचे और लड़की को वहाँ से सुरक्षित निकाला। पीड़िता की आपबीती सुनने के बाद पुलिस ने अरमान शेख गिरफ्तार किया।

34. रमजान के दौरान लखनऊ में दरिंदगी: हिंदू युवती का धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक 23 वर्षीय हिंदू युवती को प्यार के जाल में फँसाकर न केवल उसका शारीरिक शोषण किया, बल्कि उसे धर्मांतरण के लिए मजबूर किया। ये सब रमजान के दौरान हुआ। पीड़िता ने फरहीन खान नामक युवक पर गंभीर आरोप लगाए कि उसने पहले शादी का झाँसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और फिर यह झूठ बोला कि यदि वह पहले निकाह करेगी, तो बाद में वह हिंदू रीति-रिवाजों से भी शादी करेगा। इसी धोखे के जाल में फँसाकर निकाहनामे पर युवती के हस्ताक्षर ले लिए गए।

निकाह के बाद फरहीन हिंदू युवती को अपने घर ले जाने के बजाय किराए के कमरे में रखा और लगातार उस पर कलमा पढ़ने व इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया। जुल्म की इंतहा तब हो गई जब युवती गर्भवती हुई और फरहीन ने उसके पेट पर लात मारी, जिससे उसका गर्भपात हुआ। विरोध करने पर फरहीन ने युवती को जान से मारने, कहीं बेच देने की धमकी दी।

35. रमजान के दौरान केरल में धर्मांतरण: हिंदू महिला और बच्चे पर इस्लाम अपनाने का दबाव

केरल के कोझिकोड जिले में एक 21 वर्षीय हिंदू महिला ने अपने ही पति पर गंभीर आरोप लगाए हैं। रमजान के इस महीने में उजागर हुई इस घटना के अनुसार, महिला को पहले प्रेम जाल में फँसाया गया और फिर आरोपित शाहुल हमीद ने उसके साथ गुरुवायूर मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की। शादी के बाद दोनों साथ रहने लगे और महिला ने एक बच्चे को जन्म भी दिया।

हिंदू पीड़िता का कहना है कि विवाह से पहले धर्मांतरण जैसी कोई बात नहीं हुई थी, लेकिन जैसे ही वे साथ रहने लगे, शाहुल और उसके परिवार का असली चेहरा सामने आया। हिंदू पीड़िता का आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद ही उसे और उसके मासूम बच्चे पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाया। अपनी और अपने बच्चे की सुरक्षा को खतरे में देख पीड़िता पुलिस के पास पहुँची। तिरुवम्बाडी पुलिस ने शाहुल हमीद को हिरासत में लिया।

36. रमजान के दौरान शिर्डी में दुस्साहस: नाबालिग को ‘निकाह’ के लिए दबाव

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शिर्डी थाना क्षेत्र से एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की के उत्पीड़न का बेहद गंभीर मामला सामने आया। रमजान के इस महीने में उजागर हुई इस घटना के अनुसार, इरफान शेख नामक युवक ने इंस्टाग्राम के जरिए नाबालिग से संपर्क साधा और धीरे-धीरे उसे बुरी तरह परेशान करना शुरू किया। इरफान न सोशल मीडिया और असल जिंदगी में भी हिंदू लड़की का पीछा किया और उसे ‘निकाह’ करने के लिए दबाव बनाया।

जाँच में सामने आया कि इस घिनौनी साजिश में इरफान अकेला नहीं था, बल्कि उसके परिवार के कुछ सदस्य भी शामिल थे जो नाबालिग पर मानसिक दबाव बना रहे थे। लगातार हो रहे इस उत्पीड़न से तंग आकर बहादुर नाबालिग ने अपने परिजनों को पूरी सच्चाई बताई और थाने में शिकायत दर्ज कराई। फिर पुलिस ने मुख्य आरोपित इरफान शेख को गिरफ्तार किया।

37. रमजान के दौरान चिक्कमगलूरु में ‘मोरल पुलिसिंग’: दलित हिंदू किशोर को मुस्लिम भीड़ ने घेरा

कर्नाटक के चिक्कमगलूरु जिले के मलाड टाउन से ‘मोरल पुलिसिंग’ और दलित उत्पीड़न का एक गंभीर मामला सामने आया। रमजान के इस महीने में घटी यह घटना 26 फरवरी 2026 की है, जब एक 17 वर्षीय दलित हिंदू नाबालिग लड़का अपनी एक मुस्लिम सहेली के साथ बाइक पर जा रहा था। इसी दौरान मार्केट रोड स्थित ज्योति सर्कल के पास मुस्लिम युवकों के एक कट्टरपंथी समूह ने उन्हें जबरन रोका। इस्लामी भीड़ ने किशोर से उसकी सहेली के साथ होने को लेकर सवाल पूछे और बुरी तरह डराया-धमकाया।

हैरानी की बात यह है कि मामला सड़क पर शांत होने के बाद भी खत्म नहीं हुआ। उसी रात आरोपित युवक उस दलित किशोर के घर तक जा पहुँचे और कथित तौर पर जबरन घर में घुसकर पूरे परिवार के साथ गाली-गलौज की। हमलावरों ने किशोर और उसके परिजनों को जान से मारने की धमकी दी। इस घटना के बाद पुलिस ने कुल आठ लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की और तीन आरोपितों को हिरासत में लिया।

38. रमजान में शाहजहाँपुर में सुनियोजित हमला: रंग डालने के विवाद में हिंदू बस्ती पर पथराव

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के मऊ रसूलपुर गाँव में होली का उल्लास सांप्रदायिक तनाव में बदला। रमजान के इस महीने में घटी यह घटना 4 मार्च 2026 को शुरू हुई, जब होली खेलते समय एक हिंदू युवक ने एक मुस्लिम व्यक्ति पर रंग डाल दिया। उस वक्त तो मौके पर पहुँची पुलिस ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर मामला शांत करा दिया था, लेकिन उसी रात गुपचुप बैठक कर हमले की पूरी साजिश रची गई और अगली सुबह बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने पूरी तैयारी के साथ हिंदू बस्ती पर हमला किया

भीड़ ने हिंदू ग्रामीणों पर पथराव किया, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस ने जायद अली, शाहीद अली, अकील अहमद, अजीम, सोहेल, आमिर, महकू और हसरत समेत करीब 100 अज्ञात दंगाइयों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा किया।

39. रमजान के दौरान रुद्रपुर में खूनी संघर्ष: होली के जश्न में मुस्लिम भीड़ का पथराव और फायरिंग

उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर से होली के पर्व पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। 5 मार्च 2026 की देर रात, जब भूतबंगला इलाके में स्थानीय लोग पारंपरिक उत्साह के साथ होली का कार्यक्रम मना रहे थे, तभी एक मुस्लिम युवक के दुस्साहस ने माहौल बिगाड़ा। रमजान के इस महीने में घटी इस घटना के अनुसार, वह युवक बार-बार अपना ई-रिक्शा जबरन भीड़ और कार्यक्रम के बीच से निकालने की कोशिश कर रहा था। जब मौजूद लोगों ने उसे टोकते हुए ऐसा करने से मना किया, तो वह अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए वहाँ से चला गया।

आरोप है कि वह मुस्लिम युवक थोड़ी ही देर बाद अपने साथ दर्जनों साथियों की उग्र भीड़ लेकर आया और होली मना रहे निहत्थे लोगों पर हमला किया। इस दौरान इस्लामी भीड़ ने पत्थरबाजी की और लाठी-डंडों से हिंदू लोगों को पीटा। चश्मदीदों के मुताबिक, हमले के दौरान गोलियाँ चलने की आवाजें भी सुनी गईं। इस अचानक हुए सुनियोजित हमले में एक दर्जन से अधिक लोग घायल हुए।

40. रमजान के दौरान बाराबंकी में खूनी होली: रंग डालने के विवाद में हिंदू परिवारों पर हमला

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में होली के दौरान सांप्रदायिक हिंसा हुई। 4 मार्च 2026 को देवा थाना क्षेत्र के टिकरिया गाँव में होली का उल्लास उस वक्त मातम और दहशत में बदल गया, जब रंग खेलने को लेकर उपजा एक मामूली विवाद हिंसक संघर्ष में तब्दील हुआ। रमजान के इस महीने में घटी इस घटना के अनुसार, गाँव के हिंदू परिवार और युवक पारंपरिक रूप से होली खेल रहे थे, तभी स्थानीय मुस्लिमों के एक समूह ने इस पर आपत्ति जताई और हंगामा किया।

इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने लाठी-डंडों, लोहे की रॉड और चाकू से लैस होकर निहत्थे हिंदुओं पर हमला किया। इसमें 11 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हमलावरों ने लोगों के घरों के घुसकर परिवार के सदस्यों को बेरहमी से पीटा और जो भी बीच-बचाव करने आया, उसे भी निशाना बनाया। घटना की सूचना पर पुलिस ने FIR दर्ज की।

41. रमजान के दौरान बागपत में ‘दावत’ के बहाने हत्या

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के तित्रोड़ा गाँव में 4 मार्च 2026 को होली का पर्व मातम में बदला। रमजान के इस महीने में घटी इस घटना के अनुसार, अमृत शर्मा नामक एक हिंदू युवक की महज एक मामूली कहासुनी के बाद बेरहमी से चाकू मारकर हत्या की। अमृत अपने परिचित समीर के बुलावे पर होली की दावत में शामिल हुआ था। इसी दौरान वह गाँव में स्थित साजिद नामक व्यक्ति की चिकन की दुकान पर पहुँचा, जहाँ किसी बात को लेकर वहाँ मौजूद कुछ युवकों से उसकी बहस हुई।

विवाद इतना बढ़ा कि दुकान पर मौजूद सुहैल, अनस, शौकीन और चिंकू ने आव देखा न ताव और अमृत पर चाकुओं से ताबड़तोड़ हमला किया। हमलावरों ने अमृत के सीने, पेट और कमर पर कई वार किए, जिससे अत्यधिक खून बह जाने के कारण उसकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हुई। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चारों नामजद आरोपितों ‘सुहैल, अनस, शौकीन और चिंकू’ के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया।

42. रमजान के दौरान लखीमपुर में पलायन: मंदिर में मांस फेंका

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के मोहम्मदपुर गाँव में सांप्रदायिक कट्टरता और लगातार हो रही हिंसा के चलते एक हिंदू परिवार को अपना पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा। रमजान के इस महीने में घटी यह घटना 4 मार्च 2026 की है, जब पीड़ित प्रदीप वर्मा ने अपने पड़ोसियों के जुल्मों से तंग आकर परिवार सहित गाँव से पलायन किया। प्रदीप का आरोप है कि उनका पड़ोसी इस्माइल अली और उसका परिवार लंबे समय से उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहा था।

साजिश के तहत आरोपितों ने कई बार स्थानीय शिव मंदिर और प्रदीप के घर के सामने स्थित कुएँ में मांस के टुकड़े और हड्डियाँ फेंकीं। 4 मार्च को मंदिर परिसर को अपवित्र किया गया, तो प्रदीप ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। विरोध करने पर इस्माइल, वारिश अली, तहबान अली और इश्तियाक ने अपने परिवार की महिलाओं के साथ मिलकर प्रदीप वर्मा पर हमला किया और बेरहमी से पीटा। लगातार हो रहे इस अपमान और असुरक्षा के माहौल से टूटकर प्रदीप ने गाँव छोड़ा।

43. रमजान के दौरान गया में बवाल: बच्चों की गेंद लगने पर गर्भवती हिंदू महिला समेत कई पर पथराव

बिहार के गया जिले के बेलागंज क्षेत्र में रमजान के दौरान 5 मार्च 2026 को मामूली बात खूनी संघर्ष में तब बदली, जब खेल रहे बच्चों की एक गेंद गलती से एक मुस्लिम व्यक्ति को लगी। इस बात पर उस व्यक्ति ने कड़ी आपत्ति जताई, जिससे बहस शुरू हुई। देखते ही देखते यह विवाद इतना गरमाया कि कुछ ही देर में बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ इकट्ठा हो गई और उन्होंने हिंदू घरों पर अंधाधुंध पथराव किया।

इस अचानक हुए हमले और पत्थरबाजी से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई मकानों को भारी नुकसान पहुँचा। हिंसा की इस चपेट में आकर कई लोग लहूलुहान हुए, जिनमें 21 वर्षीय गर्भवती महिला ललिता देवी को गंभीर चोटें आई। स्थानीय लोगों के अनुसार, गाँव में तनाव की जड़ें पुरानी थीं, करीब एक सप्ताह पहले अखंड कीर्तन के दौरान निकाली गई कलश यात्रा को लेकर भी दोनों पक्षों में विवाद हुआ था।

44. रमजान के दौरान वाराणसी में दरिंदगी: अस्सी घाट से हिंदू नाबालिग को नशीली दवा पिलाकर रेप

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट में रमजान के महीने में एक हिंदू नाबालिग लड़की को ‘लव जिहाद’ और बर्बरता का शिकार बनाया गया। चंदौली के बाबुरी थाना क्षेत्र की रहने वाली यह किशोरी 7 मार्च 2026 को अपने भाई के साथ अस्सी घाट घूमने पहुँचीं, जहाँ से नबी रसूल उर्फ जावेद नाम के व्यक्ति ने उसे किडनैप किया। अपहरण के बाद जावेद ने हिंदू लड़की के पिता को फोन कर न केवल उसे अपनी हिरासत में होने की बात कुबूल की, बल्कि उसे धर्मांतरण कराकर जबरन निकाह करने की खौफनाक धमकी दी।

होश खोने के बाद जब 8 मार्च की सुबह आरोपित युवती को बेहोशी की हालत में उसके गाँव के पास छोड़कर फरार हुआ, तब इस पूरी साजिश का खुलासा हुआ। पीड़िता ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि उसे बंधक बनाकर नशीली दवाएँ दी गईं और उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया गया। दरिंदगी की हद पार करते हुए जावेद ने उसके अश्लील वीडियो और तस्वीरें भी बनाईं ताकि उसे ब्लैमेल किया जा सके। भेलूपुर पुलिस ने मुख्य आरोपित नबी रसूल को गिरफ्तार किया।

45. रमजान के दौरान कनाडा के स्कूल में गैर-मुस्लिम बच्चों के खाना खाने पर पाबंदी

कनाडा के कैलगेरी स्थित ‘फेयरव्यू स्कूल’ में समावेशी बनने की कोशिश में स्कूल प्रशासन ने एक ऐसा फैसला किया, जिससे गैर-मुस्लिम छात्रों की मुश्किलें बढ़ी। रमजान के इस महीने में स्कूल ने रोजा रखने वाले बच्चों के प्रति सम्मान दिखाने के नाम पर अपने कैफेटेरिया (भोजनालय) में खाना खाने पर ही पाबंदी लगाई। स्कूल के आधिकारिक ईमेल के अनुसार, लंच एरिया को ‘फूड फ्री’ यानी भोजन मुक्त क्षेत्र घोषित किया। इस तुगलकी फरमान के कारण जो बच्चे रोजा नहीं रख रहे थे, उन्हें भी लंच के समय भूखा रहना पड़ा और कड़ाके की ठंड में दूसरी जगह तलाशने पड़ी।

स्कूल के इस नियम के कारण कक्षा 4 से 6 तक के नन्हे बच्चों (लगभग 9 साल की उम्र) को भूखा रहना पड़ा। वहीं, कक्षा 7 से 9 तक के छात्रों के लिए स्थिति और भी बदतर हुई, उनके लिए पूरे एक घंटे के ब्रेक के दौरान लंच रूम के अंदर भोजन करने पर पूरी तरह बैन किया गया। गौर करने वाली बात यह है कि आमतौर पर इस्लाम में रोजा 13-14 साल की उम्र से अनिवार्य होता है, लेकिन स्कूल ने इसे छोटे बच्चों पर भी थोप दिया था।

46. रमजान के दौरान अमेरिका में आतंकी हमला: ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे के साथ गोलीबारी

अमेरिका के वर्जीनिया स्थित ओल्ड डोमिनियन यूनिवर्सिटी (ODU) में 12 मार्च 2026 को एक पूर्व सैन्यकर्मी ने बिजनेस स्कूल की इमारत में घुसकर अंधाधुंध फायरिंग की। रमजान के इस महीने में हुई इस भीषण घटना में 36 वर्षीय मोहम्मद बैलोर जल्लोह हमलावर ने क्लासरूम में दाखिल होते ही ‘अल्लाहू अकबर’ का नारा लगाया और गोलियाँ बरसानी शुरू की। इस हमले में लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रैंडन शाह की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि दो अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

हैरानी की बात यह है कि हमलावर जल्लोह कोई साधारण अपराधी नहीं था। वह पूर्व आर्मी नेशनल गार्ड सदस्य था जिसे 2016 में खूंखार आतंकी संगठन ISIS की मदद करने का दोषी पाया गया था। वह समय से पहले रिहा होकर निगरानी (सर्विलांस) पर था। जिस समय उसने हमला किया, वहाँ मौजूद छात्र मिलिट्री ऑफिसर बनने की ट्रेनिंग ले रहे थे। इन जांबाज छात्रों ने बिना डरे आतंकी का मुकाबला किया और उसे दबोच लिया। एफबीआई (FBI) के अनुसार, छात्रों ने आत्मरक्षा में जल्लोह को चाकुओं से गोदकर ढेर कर दिया।

47. रमजान के दौरान नाइजीरिया में कत्लेआम: मैदुगुरी में आत्मघाती धमाके, 23 की मौत

नाइजीरिया के मैदुगुरी शहर में रमजान के महीने के बीच भीषण आत्मघाती हमला हुआ। 16 मार्च 2026 की रात को संदिग्ध हमलावरों ने उत्तर-पूर्वी नाइजीरिया के इस प्रमुख शहर को निशाना बनाकर सिलसिलेवार बम धमाके किए। नाइजीरियाई पुलिस की पुष्टि के अनुसार, इन आत्मघाती विस्फोटों में कम से कम 23 निर्दोष लोगों की मौत हुई, जबकि 100 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हिंसा प्रभावित बोर्नो राज्य की राजधानी में हुए इस हमले को हाल के वर्षों के सबसे घातक आतंकी हमलों में से एक माना जा रहा है। इस हमले की किसी भी आतंकी समूह ने अधिकारिक तौर पर जिम्मेदारी नहीं ली थी, लेकिन इस्लामी आतंकी गुटों पर शक था।

48. रमजान के दौरान लंदन में कट्टरपंथ: हैरो में होलिका दहन के कार्यक्रम पर हमला

ब्रिटेन की राजधानी लंदन के हैरो (Harrow) इलाके में रमजान के महीने में 4 मार्च 2026 को जब स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग पूरी वैधानिक अनुमति के साथ ‘होलिका दहन‘ का पावन पर्व मना रहे थे, तब उत्सव के माहौल को इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंसा में बदला। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में हिंदू परिवार, महिलाएँ और मासूम बच्चे शामिल थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पास की एक मस्जिद से आए कुछ लोगों ने अचानक आयोजन में खलल डाला। हमलावरों ने न केवल वहाँ लगे साउंड सिस्टम को उखाड़कर फेंका, बल्कि उत्सव में शामिल लोगों को धमकाया।

हैरानी की बात यह है कि शुरूआती विवाद के बाद यह समूह कुछ देर के लिए वहाँ से गया, लेकिन थोड़ी ही देर में करीब 20 अन्य कट्टरपंथियों के साथ वापस लौटा और दोबारा हमला किया। यह सब तब हुआ जब कार्यक्रम स्थल पर स्थानीय मेयर, हैरो काउंसिल के प्रतिनिधि और लेबर पार्टी के बड़े नेता मौजूद थे। इतने वीआईपी (VIP) चेहरों की मौजूदगी के बावजूद हमलावरों ने उत्पात मचाया।

49. रमजान के दौरान बुर्किना फासो में अल-कायदा का उत्पात: 50+ हत्याएँ

अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में रमजान के महीने के दौरान अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन जेएनआईएम (JNIM) ने भीषण कत्लेआम मचाया, जिससे पूरा इलाका दहल उठा। 27 फरवरी 2026 को उत्तरी इलाकों में हुए एक बड़े हमले में आतंकियों ने बर्बरता की सारी हदें पार करते हुए 50 से अधिक सैनिकों और आम नागरिकों की हत्या की।

सितंबर 2022 से इब्राहिम ट्रोरे के सैन्य शासन के अधीन चल रहे इस देश में जिहादी हमलों की यह बाढ़ नई नहीं है, लेकिन इस बार आतंकियों ने क्रूरता दिखाते हुए न केवल लोगों की जान ली, बल्कि अनाज के भंडारों को आग के हवाले कर दिया और खाने-पीने का सामान लूट लिया, जिससे स्थानीय आबादी के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है। इस आतंकी गुट ने घातक हमले की जिम्मेदारी ली।

50. रमजान के दौरान मॉस्को में आतंकी विस्फोट: कट्टरपंथियों की क्रूरता और मासूमों का खून

रूस की राजधानी मॉस्को में 24 फरवरी 2026 को रमजान के दौरान आईएसआईएस (ISIS) से जुड़े एक आतंकी ने रेलवे स्टेशन को निशाना बनाकर खुद को विस्फोट से उड़ा लिया, जिसमें ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी की मौके पर ही मौत हो गई और कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर इन घटनाओं को अंजाम देने वाले कट्टरपंथी इस महीने को ‘इबादत और पवित्रता’ का समय बताते हैं, वहीं धरातल पर वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। इस रिपोर्ट में दर्ज 50 घटनाएँ तो महज एक बानगी भर हैं, जबकि ऐसी सैकड़ों वारदातें और भी हो सकती हैं जो शायद कभी दुनिया के सामने ही नहीं आ पाईं। महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले जघन्य दुष्कर्म, मासूमों की हत्या और बेगुनाह लोगों का खून बहाकर फैलाई गई यह अशांति इन कट्टरपंथियों के दोहरे चरित्र को उजागर करती है।

अन्य घटनाओं की लिस्ट यहाँ साझा की गई है।

अब ऑयल वॉर में बदला मिडिल ईस्ट वॉर, पेट्रोल-डीजल ही नहीं गैस के मोर्चे पर भी जंग: जानें- मोदी सरकार ने सप्लाई मेनटेन करने के लिए उठाए कौन से कदम

मिडिल ईस्ट की जंग मार्च 2026 में अब पूरी तरह से ‘ऑयल वॉर’ में बदल गई है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ी तनाव के बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। यह संकरी जलडमरूमध्य दुनिया के 20-25% तेल और 20% LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) का रास्ता है। कतर के रास लाफान प्लांट पर हमले के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LNG उत्पादक कतर ने उत्पादन पूरी तरह रोक दिया। कतर एनर्जी और भारत की पेट्रोनेट LNG ने फोर्स मेज्योर नोटिस जारी कर दिया। इसका नतीजा है- वैश्विक तेल बाजार में अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई शॉक।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, यह 1973 के यॉम किप्पूर वॉर या 2022 के यूक्रेन युद्ध से भी बड़ा संकट है। रोजाना करीब 8-10 मिलियन बैरल तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हो रही है। टैंकर ट्रैफिक 86% गिर गया। सैकड़ों जहाज अटके हुए हैं। तेल की कीमतें 80-100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। LNG की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।

अब सवाल यह है कि भारत पर इसका कितना असर पड़ रहा है? खासकर तेल के साथ-साथ LNG और PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस) पर।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। रोजाना 5.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल खपत करता है। इसमें 85-88% आयात पर निर्भर है। पहले मिडिल ईस्ट (सऊदी, इराक, UAE, कुवैत) से 50% से ज्यादा तेल आता था। इनमें से 40-50% यानी 2-2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन होर्मुज से गुजरता था। लेकिन अब सरकार का दावा है कि 70% आयात होर्मुज के बाहर के रास्तों से आ रहा है। रूस से आयात बढ़कर 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया है। अमेरिका, वेस्ट अफ्रीका और सऊदी-यूएई के पाइपलाइन रूट (यानबू और फुजैराह) का इस्तेमाल बढ़ा दिया गया है।

सरकार के मुताबिक, स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) और कमर्शियल स्टॉक मिलाकर 40-74 दिन का बफर है। पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने कहा, “हमने होर्मुज से आने वाली मात्रा से ज्यादा तेल सुरक्षित कर लिया है।” फिर भी कीमतें बढ़ने से आयात बिल पर 10-15% अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। छोटे रिफाइनरी और पेट्रोल-डीजल की कीमतें थोड़ी बढ़ सकती हैं। लेकिन कुल मिलाकर कच्चे तेल की मात्रा में बहुत बड़ी कमी नहीं आई है। रूस और दूसरे स्रोतों से भरपाई हो रही है।

असली समस्या LNG और PNG क्षेत्र में है। भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा LNG आयातक है। 2025 में 24-27 मिलियन टन LNG आयात किया। कुल गैस खपत 189 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन (MMSCMD) है। इसमें घरेलू उत्पादन 97.5 MMSCMD और बाकी आयातित LNG से आता है। कतर से 40-50% LNG आता है (लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट में पेट्रोनेट अकेले 8.5 मिलियन टन सालाना लेता है)। कतर और UAE से आने वाले 50-55% LNG होर्मुज से गुजरता है।

कतर के प्लांट पर ड्रोन हमले के बाद 2-3 मार्च 2026 से उत्पादन बंद हो गया है। रास लाफान (77 मिलियन टन सालाना क्षमता) दुनिया का सबसे बड़ा प्लांट है। यहाँ से जहाज नहीं निकल पा रहे है। जिसके बाद पेट्रोनेट LNG ने कतर एनर्जी को और अपने ऑफटेकर्स (GAIL, IOC, BPCL) को फोर्स मेज्योर नोटिस दे दिया। इसका मतलब है कि हम अभी सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि परिस्थितियाँ विपरीत हैं।

इसका नतीजा भारत में ये हुआ कि औद्योगिक क्षेत्र में 20-40% सप्लाई की कटौती करनी पड़ी। इन कटौतियों के चलते गुजरात गैस ने इंडस्ट्रीज को गैस देना रोक दिया है। वहीं, प्राइवेट कंपनी अडानी टोटल गैस ने इंडस्ट्रियल क्लाइंट्स को कीमतें बहुत बढ़ा दीं हैं। इसकी वजह भी यही है कि अगर ये संकट लंबे समय तक चले, तो घरेलू उपभोक्ताओं की माँग को पहले संभाला जाए। चूँकि सप्लाई की मात्रा एक बराबर नहीं है, ऐसे में ONGC पेट्रो एडिशंस का दाहेज प्लांट भी कम क्षमता पर चल रहा है।

इस बीच उद्योगों के लिए GAIL भी सप्लाई कटौती पर विचार कर रहा है। इस कदम की वजह से फर्टिलाइजर कंपनियाँ (IFFCO, KRIBHCO) भी प्रभावित हो रही हैं। इस एनर्जी पर चलने वाले स्टील यूनिट्स में भी प्रोडक्शन घट गया है। कुल मिलाकर 47.4 MMSCMD गैस प्रभावित हुई है, जो कुल खपत का 25% है।

समस्या यह है कि LNG का कोई स्ट्रैटेजिक रिजर्व नहीं है। टर्मिनल्स पर सिर्फ 1-2 हफ्ते का स्टॉक रहता है। कतर से सस्ता गैस (लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट) बंद होने पर स्पॉट मार्केट से महँगा LNG लाना पड़ रहा है। कीमतें दोगुनी हो गई हैं। हालाँकि मोदी सरकार ने कई वैकल्पिक व्यवस्थाएँ की हैं, जिसमें वैकल्पिक स्रोतों से सरकार ने सप्लाई बढ़ाई है। जानें- कैसे भारत इस समस्या से प्लानिंग के साथ निपट रहा है।

सरकार ने क्या कदम उठाए?

  • दो LNG कार्गो वैकल्पिक स्रोतों (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) से रवाना हो चुके हैं।
  • घरेलू गैस और RLNG को प्राथमिकता सेक्टर (घरेलू PNG, CNG, फर्टिलाइजर) में डायवर्ट किया जा रहा है।
  • रूस और अमेरिका से ज्यादा क्रूड और LNG खरीदने की कोशिश।
  • लंबे समय में ओमान-UAE से अंडरसी पाइपलाइन (MEIDP) प्रस्ताव तेज किया जा रहा है।

हालाँकि थोड़े समय के लिए दिक्कत बनी रह सकती है, लेकिन सरकार जिस तरह से कदम उठा रही है, उसके चलते आम लोगों को बहुत परेशान नहीं होना पड़ेगा।

कुल मिलाकर, कच्चे तेल में मात्रा की कमी 5-10% से ज्यादा नहीं होगी क्योंकि रूस और दूसरे रूट काम कर रहे हैं। लेकिन LNG और PNG में 20-40% तक कमी आ सकती है, खासकर इंडस्ट्री में। घरेलू उपभोक्ता सुरक्षित रहेंगे लेकिन कीमत बढ़ेगी। यह संकट भारत को याद दिलाता है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए विविधीकरण और घरेलू उत्पादन बढ़ाना कितना जरूरी है।

हालाँकि इसके लिए मोदी सरकार समय से कदम उठा रही है। बहुत हद तक संभव है कि भारत अपने हितों की रक्षा करेगा और इंडस्ट्री को भी बराबर एनर्जी सप्लाई मिलती रहेगी।

₹27000 करोड़ का निवेश, 27000 नौकरियाँ: जानें- कैसे सिर्फ असम ही नहीं, पूरे भारत की किस्मत से जुड़ा है टाटा का ये सेमीकंडक्टर प्लांट

21वीं सदी को तकनीकी क्रांति का दौर माना जा रहा है और इस क्रांति की रीढ़ हैं सेमीकंडक्टर चिप्स। हमारे हाथों के स्मार्टफोन से लेकर अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले उपग्रहों तक, आधुनिक जीवन का हर पहलू इन छोटी-सी दिखने वाली चिप्स पर निर्भर है। 5G संचार से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा प्रणालियों तक, सेमीकंडक्टर चिप्स आज वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण घटक बन चुके हैं।

ऐसे समय में जब दुनिया सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने की दिशा में सोच रही है, भारत ने खुद को एक उपभोक्ता के साथ-साथ एक वैश्विक निर्माता के रूप में भी स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इसी महत्वाकांक्षी यात्रा में एक नया अध्याय जुड़ रहा है, और वह है पूर्वोत्तर भारत के असम में सेमीकंडक्टर उद्योग का उदय।

असम के जागीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा लगभग ₹27,000 करोड़ के निवेश से विकसित की जा रही सेमीकंडक्टर परियोजना भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। यह एक OSAT (आउटसोर्स सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट) सुविधा है, जहाँ सेमीकंडक्टर वेफर्स को काटने, पैकेजिंग और परीक्षण का काम किया जाएगा।

यह विनिर्माण प्रक्रिया का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है, जो चिप्स को अंतिम उपयोग के लिए तैयार करता है। एक अनुमान के अनुसार इस परियोजना की क्षमता प्रतिदिन लगभग 48 मिलियन (4.8 करोड़) चिप्स को प्रोसेस करने की है। यह आँकड़ा अपने आप में इस परियोजना के पैमाने और इसके वैश्विक प्रभाव की क्षमता को दर्शाता है।

यह परियोजना संपूर्ण औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का आधार है। इससे लगभग 27,000 लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलने की संभावना है। इसके आसपास इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और रखरखाव सेवाओं जैसे सहायक उद्योगों का एक व्यापक जाल विकसित होगा।

यह स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मल्टीप्लायर इफेक्ट पैदा करेगा, जिससे छोटे और मझोले उद्यमों को बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्र में कौशल विकास के नए अवसर खुलेंगे। यह पूर्वोत्तर भारत के औद्योगिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है, जिसे लंबे समय से आर्थिक विकास की मुख्यधारा से दूर माना जाता था।

इस परियोजना की सफलता के पीछे निश्चित रूप से माननीय प्रधानमंत्री की नीयत, निर्णय और नीति जिम्मेदार हैं। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में, भारत सरकार ने सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ और ‘सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम’ जैसी दूरदर्शी पहलों के माध्यम से, देश में सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देने और वैश्विक निवेश को आकर्षित करने का एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया गया है। इन नीतियों को जमीन पर उतारने के लिए आवश्यक संसाधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी दिखाई गई।

इसी कड़ी में, असम में इस परियोजना को मूर्त रूप देने में असम के जनप्रिय मुख्यमंत्री श्री हिमंत बिस्वा सरमा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनकी सरकार ने निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भूमि आवंटन से लेकर आवश्यक प्रशासनिक स्वीकृतियों में तेजी लाने तक, हर कदम पर सक्रिय और दूरदर्शी प्रशासनिक रवैया देखने को मिला। यह सार्वजनिक-निजी भागीदारी का एक आदर्श उदाहरण है, जहां केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति, राज्य सरकार की उत्सुकता और एक निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी के सामर्थ्य ने मिलकर एक ऐतिहासिक परियोजना को जन्म दिया।

इस परियोजना का एक और प्रेरणादायक पहलू यह है कि यह उसी स्थान पर विकसित की जा रही है, जहाँ कभी नागाँव पेपर मिल हुआ करती थी। वर्षों से बंद पड़ी इस औद्योगिक इकाई की जमीन अब एक अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर प्लांट का घर बन रही है। यह परिवर्तन केवल भूमि के उपयोग में बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक युगांतरकारी बदलाव का प्रतीक है। यह असम के औद्योगिक इतिहास के एक अध्याय के समापन और एक नए, उज्ज्वल अध्याय के आरंभ का प्रतीक है।

असम की भौगोलिक स्थिति इस परियोजना को एक अतिरिक्त रणनीतिक लाभ प्रदान करती है। दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित होने के कारण, असम भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का एक स्वाभाविक प्रवेश द्वार है। उन्नत कनेक्टिविटी और बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ, यह क्षेत्र भविष्य में वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है। यह न केवल निर्यात के नए रास्ते खोलेगा, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग को भी बढ़ावा देगा।

वैश्विक स्तर पर भी इस परियोजना की पहुंच बढ़ रही है। अमेरिकी सेमीकंडक्टर दिग्गज क्वालकॉम के साथ संभावित सहयोग की पहल, इस परियोजना को अंतरराष्ट्रीय तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ती है। इस तरह की साझेदारियां उन्नत इलेक्ट्रॉनिक और ऑटोमोटिव मॉड्यूल के निर्माण को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे भारत न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकेगा, बल्कि वैश्विक बाजार में भी एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर सकेगा।

असम के जागीरोड में बन रहा यह सेमीकंडक्टर प्लांट एक औद्योगिक परियोजना से कहीं बढ़कर है। यह नए भारत के निर्माण की उस सोच का प्रतिबिंब है, जो क्षेत्रीय असमानताओं को मिटाकर पूरे देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने का सपना देखती है। यह परियोजना इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि सही नीति, ईमानदार नीयत और प्रभावी निष्पादन के साथ चलने पर विकास न केवल संभव है, बल्कि वह तीव्र गति से और व्यापक पैमाने पर होता है।

यह पूर्वोत्तर के युवाओं के लिए नए सपने देखने और उन्हें साकार करने का एक मंच तैयार कर रहा है। यदि यही गति और प्रतिबद्धता बनी रही, तो आने वाले वर्षों में असम न केवल पूर्वोत्तर बल्कि संपूर्ण भारत का एक प्रमुख तकनीकी केंद्र और वैश्विक सेमीकंडक्टर मानचित्र पर एक चमकता सितारा बनकर उभरेगा। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की उस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो देश को तकनीकी आत्मनिर्भरता और आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा रही है।

ईरान-गाजा पर बिलखने वालों को पाकिस्तान की हरकत पर सूँघा साँप: स्वरा से लेकर आरफा अफगनिस्तान पर खामोश, तरुण की हत्या पर भी नहीं फूटा था एक बोल

हमेशा सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किस घटना पर आवाज उठी बल्कि यह भी होता है कि कब-कब खामोशी चुनी गई और यह खामोशी कहीं मूक समर्थन तो नहीं थी। आज के दौर का सबसे बड़ा पाखंड ये ‘चुनी हुई चुप्पियाँ’ ही हैं। आज खामोशी की बात इसलिए क्योंकि कुछ दिनों पहले ईरान में अस्पताल में हमले पर छाती पीट रहा लेफ्ट-लिबरल गिरोह अफगानिस्तान में अस्पताल पर हमले पर खामोश है। वो हमला पाकिस्तान ने किया है, शायद खामोशी की वजह भी यही है। गाजा में भी यह गिरोह छाती बिलखता नजर आता है।

यह चुप्पी केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। कुछ दिनों पहले दिल्ली में होली पर हिंदू युवक तरुण की हत्या कर दी गई थी, तब इस गिरोह ने सुविधाजनक चुप्पी को चुना। क्यों? क्योंकि हत्या मुस्लिम कट्टरपंथियों ने की थी। अब जब लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, कई लोग उग्र बयानबाजी कर रहे हैं तो यह गिरोह एक्टिव हो गया है। यह गिरोह अब उस बयानबाजी की आड़ में हिंदुओं पर ही सवाल उठाने लगा है।

अगर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ घटना हो तो यह गिरोह तुरंत एक्टिव हो जाता है। बयान आने लगते हैं, हैशटेग चलने लगते हैं और उसे ट्रेंडिंग टॉपिक बना दिया जाता है लेकिन जब हिंदुओं के खिलाफ हिंसा होती है तो वही चेहरे या तो चुप रहते हैं या फिर मुद्दे को किनारे कर देते हैं। असल में सवाल ये नहीं है कि किसके लिए आवाज उठी बल्कि सवाल ये है कि इस गिरोह की आवाज हर किसी के लिए बराबर क्यों नहीं उठती?

यह गिरोह कई चेहरे, कई रूपों में नजर आता है। खुद को पत्रकार बताने वाली आरफा खानम शेरवानी हों, RJ सायमा हों या स्वरा भास्कर और राजदीप सरदेसाई जैसे लोग हैं। इनका विलाप, इनकी चुप्पी एक तरफा है और यह ‘राजनीतिक लाभ’ और ‘एजेंडे’ से तय होते हैं।

इनके लिए इंसाफ का मतलब सबके लिए एक जैसा नहीं है। ये न्याय को धर्म और राजनीति के चश्मे से देखते हैं। जब भी इस्लामी कट्टरपंथ का कोई मामला आता है, तो ये एकदम चुप हो जाते हैं लेकिन जैसे ही इन्हें ‘हिंदू विरोध’ का मौका मिलता है, ये तुरंत शोर मचाना शुरू कर देते हैं।

पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष: एजेंडे के कारण चुप्पी

इन कथित पत्रकारों और एक्टिविस्टों की एक बड़ी खासियत यह है कि जब संघर्ष ‘मुस्लिम बनाम मुस्लिम’ होता है तो इनका ‘मानवाधिकार’ सो जाता है। पिछले काफी समय से पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर युद्ध जैसे हालात हैं, तालिबान और पाकिस्तानी फौज के बीच झड़पें हो रही हैं, मासूम मारे जा रहे हैं। लेकिन आरफा, सायमा, स्वरा या राजदीप ने इस पर कोई बड़ा कैंपेन नहीं चलाया।

इसका कारण साफ है- यहाँ कोई ‘हिंदू’ एंगल नहीं है, यहाँ ‘मोदी विरोध’ की गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही इस्लामिक मुल्क हैं, इसलिए वे समझ नहीं पाते कि किसका पक्ष लेने से उन्हें पब्लिसिटी मिलेगी या उनके एजेंडे को ‘प्रॉफिट’ होगा। जहाँ कट्टरपंथ को ‘विक्टिम कार्ड’ बनाकर पेश नहीं किया जा सकता, वहाँ ये लोग चुप्पी साधे रहते हैं।

ईरान के लिए ‘दिल’ और इजरायल के लिए ‘पत्थर’

पिछले कुछ समय से मिडिल ईस्ट (ईरान, अमेरिका और इजरायल) के बीच जंग जैसे हालात बने हुए हैं। इन ‘एजेंडा’ चलाने वाले पत्रकारों का सोशल मीडिया पेज देखें तो ऐसा लगता है जैसे ये पूरी तरह ईरान के साथ खड़े हैं और इजरायल-अमेरिका को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। राजदीप सरदेसाई और आरफा खानम जैसे लोगों के लिए ईरान एक ‘बेचारा’ देश बन गया है।

राजदीप सरदेसाई अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इस जंग को पूरी तरह ‘गलत’ और ‘अन्याय’ बताते हैं। उन्होंने तो यहाँ तक पूछ लिया कि ‘क्या इजरायल और अमेरिका मिलकर यह गलत लड़ाई नहीं लड़ रहे?’

लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जब ईरान परमाणु बम बनाने की कोशिश करता है या हमास जैसे उग्रवादी संगठनों को बढ़ावा देता है, तब राजदीप को कुछ भी ‘गलत’ नजर नहीं आता। उनकी चिंता और उनके ट्वीट केवल तब जागते हैं, जब उन्हें मिडिल ईस्ट के बहाने भारत सरकार पर निशाना साधने का मौका मिलता है।

आरफा खानम तो खुलेआम ईरान को ‘पूरी मुस्लिम दुनिया का सबसे बड़ा नेता’ बताने में जुट गई हैं। उन्होंने लिखा कि ‘यह समय ईरान का है और आज उसे जो सपोर्ट मिल रहा है, उसने उसे निर्विवाद लीडर बना दिया है।’ हैरानी की बात यह है कि आरफा ईरान की गुंडागर्दी और वहाँ की महिलाओं पर हो रहे जुल्मों को तो छिपा जाती हैं, लेकिन जैसे ही इजरायल कोई कदम उठाता है, वह उसे ‘बच्चों का कातिल’ बताने लगती हैं।

वहीं, एक वीडियो में जब उत्तम नगर के एक दुकानदार से तरुण मामले पर सवाल हुआ, तो उसने इसे ‘स्मॉल केस’ बताया। आरफा ने तरुण की मौत पर दुख जताने के बजाय हिंदुओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।

सबसे बड़ी विडंबना तो देखिए, जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान आपस में लड़ते हैं, तब ये सारे पत्रकार एकदम चुप हो जाते हैं। वजह साफ है, वहाँ दोनों तरफ मुस्लिम मुल्क हैं, इसलिए इसलिए वहाँ ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने या ‘हिंदू-मुस्लिम’ विवाद पैदा करने का कोई मौका नहीं मिलता। ये समझ नहीं पाते कि किसका पक्ष लें जिससे उन्हें फायदा या पब्लिसिटी मिले। जहाँ राजनीति करने का मौका नहीं मिलता, वहाँ इनका दर्द भी गायब हो जाता है।

तरुण की हत्या पर सन्नाटा, लेकिन ईद पर ‘होली’ के नाम पर बवाल

दिल्ली के उत्तम नगर में हिंदू युवक तरुण की सरेआम और बहुत बेरहमी से हत्या कर दी गई। कैमरे की फुटेज में साफ दिख रहा था कि उसे कितनी क्रूरता से मारा गया, लेकिन खुद को ‘इंसानियत का रखवाला’ कहने वाले इन पत्रकारों ने तरुण के लिए एक ट्वीट तक नहीं किया। हैरानी की बात तो यह है कि जब प्रशासन ने कानून के तहत हत्यारों के घरों पर बुलडोजर चलाया, तब इन लोगों को अचानक ‘कानून और दर्द’ की याद आने लगी और वे उसके खिलाफ बोलने लगे।

आरजे सायमा ने तो तरुण की मौत पर दुख जताना भी जरूरी नहीं समझा। इसके बजाय उन्होंने सोशल मीडिया से वो वीडियो ढूँढ निकाले जिनमें कुछ लोग गुस्से में ‘ईद’ को लेकर बयानबाजी कर रहे थे। उन्होंने फौरन दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय को टैग करना शुरू कर दिया और लिखा कि ‘ईद पर कुछ भी गलत हुआ तो यह सिस्टम की हार होगी।’ सायमा का पूरा ध्यान इस बात पर था कि ‘रिजवान’ नाम का लड़का कहाँ गायब है, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि तरुण के हत्यारों को सजा मिले या नहीं। उन्होंने तो उन पोस्ट्स को भी सपोर्ट किया जो हत्यारों का बचाव कर रहे थे।

वहीं आरफा खानम ने तरुण की मौत के बाद लोगों के गुस्से वाले एक वीडियो को शेयर करते हुए ताना मारा कि ‘मुबारक हो! भारत के हिंदू अब पूरी तरह कट्टरपंथी बन चुके हैं।’ आरफा को उस वीडियो में बोल रहे बच्चे के भविष्य की तो बहुत चिंता हुई, लेकिन उन्हें उस तरुण की कोई फिक्र नहीं थी जिसका भविष्य कट्टरपंथियों ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया। ऐसा लगता है कि इनके लिए ‘आजाद ख्याल’ होने का मतलब सिर्फ हिंदू समाज को बुरा-भला कहना और दूसरी तरफ की कट्टरपंथियों की गलतियों पर पर्दा डालना ही रह गया है।

स्वरा भास्कर: चुनिंदा सहानुभूति की ‘क्वीन’

एक्ट्रेस से समाज सेवा (एक्टिविस्ट) की ओर मुड़ीं स्वरा भास्कर का सोशल मीडिया पेज किसी ‘एजेंडा मशीन’ की तरह काम करता है। दिल्ली के उत्तम नगर मामले में उन्होंने तरुण की मौत को नाम मात्र के लिए ‘दुखद’ तो कहा, लेकिन तुरंत सारा दोष हिंदुओं पर मढ़ दिया और उन पर ‘नफरत फैलाने’ का आरोप लगा दिया। उन्होंने पुराने मामलों का नाम लेकर डराना शुरू कर दिया कि अब दंगे हो सकते हैं, जबकि उन्हें उस हिंदू लड़के (तरुण) की हत्या करने वालों के खिलाफ सख्त लहजे में कुछ भी कहते नहीं देखा गया।

स्वरा ने इजरायल की सेना पर लगे आरोपों की लंबी-चौड़ी रिपोर्ट शेयर की और गंदे शब्दों का इस्तेमाल करके नफरत फैलाने की कोशिश की। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब ईरान में सरेआम महिलाओं को फाँसी दी जाती है या हिजाब न पहनने पर उन्हें बेरहमी से पीटा जाता है, तब स्वरा की ‘महिला सुरक्षा’ वाली बातें कहीं गायब हो जाती हैं। वहाँ हो रहे जुल्म पर उन्हें ‘सांप सूंघ जाता है’ और वह पूरी तरह खामोश रहती हैं।

स्वरा का दोहरापन तब और भी साफ दिखा जब आगरा के आदर्श कुमार की गिरफ्तारी हुई। उन्होंने तुरंत उसे उसके ‘हिंदू धर्म’ से जोड़ दिया और तंज कसा कि ‘कोई उसके धर्म को बुरा नहीं कहेगा क्योंकि वह मुस्लिम नहीं है।’ लेकिन जब भी किसी मुस्लिम अपराधी का नाम सामने आता है, तो वह उसे ‘गरीबी’ या ‘पैसों का आपसी विवाद’ बताकर बचाने की कोशिश करने लगती हैं। चाहे वह नूँह की घटना हो या कोई और मामला, उनके ट्वीट सिर्फ यह साबित करने के लिए होते हैं कि भारत में एक खास धर्म के लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, जबकि वह दूसरे पक्ष के पीड़ितों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती हैं।

लॉरा लुमर का जवाब और आरफा की तिलमिलाहट

अभी हाल ही में जब विदेशी पत्रकार लॉरा लुमर ने राजदीप सरदेसाई को टोकते हुए साफ कह दिया कि ‘इस्लाम से डरना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक हकीकत है और इसे गलत कहना बेवकूफी है,’ तो यह सुनकर आरफा खानम आगबबूला हो गईं। आरफा ने फौरन उनके खिलाफ पोस्ट किया और लिखा कि ‘भारत कभी हिंदू राष्ट्र नहीं था और न ही कभी बनेगा।’ उन्होंने तो उस न्यूज चैनल (इंडिया टुडे) की भी जमकर बुराई की जिसने लॉरा को बोलने का मौका दिया था।

यह बात साफ तौर पर दिखाती है कि ये लोग अपने से अलग राय रखने वालों को बिल्कुल भी झेल नहीं पाते। इनके लिए ‘लोकतंत्र’ और ‘अपनी बात कहने की आजादी’ का मतलब सिर्फ तब तक है, जब तक सब इनके हिसाब से बोलें। जैसे ही कोई इनके एजेंडे के खिलाफ सच बोल देता है, ये उसे दबाने और चुप कराने की कोशिश में जुट जाते हैं।

सुनील शेट्टी बनाम बॉलीवुड का सन्नाटा

जहाँ स्वरा और आरफा, सायमा, जैसे लोग गाजा और ईरान के लिए रोते हैं, वहीं बॉलीवुड अभिनेता सुनील शेट्टी ने एक अलग स्टैंड लिया। उन्होंने काबुल में हमले पर लिखा, “जो काबुल में हुआ वह विनाशकारी है। सभी युद्ध रुकने चाहिए। हम मानवता के साथ खड़े हैं। भारत शांति के साथ खड़ा है”

सुनील शेट्टी का यह पोस्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जहाँ स्वरा भास्कर और उनका गिरोह केवल एकतरफा पोस्ट करता है, वहीं सुनील शेट्टी ने उस अफगानिस्तान के लिए आवाज उठाई है। यह दिखाता है कि बॉलीवुड में भी कुछ लोग सचमुच ‘शांति’ चाहते हैं, जबकि स्वरा जैसे ‘इडियट्स’ केवल सिलेक्टिव आउटरेज (चुनिंदा नाराजगी) के भूखे हैं।

पत्रकारिता के नाम पर समाज के साथ विश्वासघात

इन ‘एजेंडा’ चलाने वाले पत्रकारों का पूरा काम ‘चुनिंदा हमदर्दी’ पर टिका है। ये असल में पत्रकार नहीं हैं, बल्कि एक खास सोच को बेचने वाले सेल्समैन की तरह काम करते हैं। राजदीप सरदेसाई के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सरकार का विरोध करना रह गया है, चाहे इसके लिए उन्हें देश की अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों को डराना ही क्यों न पड़े।

आरफा खानम और आरजे सायमा के लिए मानवाधिकारों का मतलब सिर्फ एक खास समुदाय के हितों तक सीमित है। उनके लिए तरुण जैसे हिंदू युवक की जान की कोई कीमत नहीं है, लेकिन अगर मामला ‘रिजवान’ का हो, तो वे पूरा आसमान सिर पर उठा लेते हैं।

वहीं स्वरा भास्कर जैसी हस्तियाँ केवल आग में घी डालने का काम करती हैं। वे हर अपराध को धर्म के चश्मे से देखती हैं और समाज को आपस में बाँटने की कोशिश करती हैं।

इनकी असलियत यह है कि ये एक पूरे सिस्टम (इको-सिस्टम) के इशारे पर चलते हैं। इन्हें ईरान में हो रहे अत्याचारों में ‘बहादुरी’ दिखती है, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर हिंदू युवाओं की बेरहमी से हत्या होने पर इन्हें कोई दुख नहीं होता। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि समाज के खिलाफ एक छिपी हुई जंग है, जिसका मकसद सिर्फ पब्लिसिटी पाना और विदेशी एजेंडे को बढ़ावा देना है।

उठना-बैठना-बोलना-मिलना… सबकी मिलती है प्रॉपर ट्रेनिंग: मिस्टर फैजू ने ‘The 50’ में खोला जो राज, उससे बीवी को धर्मान्तरित करने वाला अदनान कर पाया हिन्दू लड़की से बात

मैं कभी-कभी ‘द 50’ नाम का एक रियलिटी शो देखता हूँ, जिसमें इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटी अलग-अलग टास्क करते हैं। वे यह सब अपने लिए नहीं, बल्कि अपने फैंस के लिए पैसे जीतने के उद्देश्य से करते हैं। यह ऐसा कार्यक्रम नहीं है जिसे बौद्धिक रूप से समृद्ध होने के लिए देखा जाए। ज्यादातर समय यह सिर्फ हल्का-फुल्का, बिना दिमाग लगाए देखने वाला मनोरंजन होता है, जिसे लोग दिनभर की थकान के बाद आराम करने के लिए देखते हैं।

यह वही तरह का शो है जिसे आप तब लगाते हैं जब आप थोड़ी देर के लिए अपने दिमाग को आराम देना चाहते हैं। हालाँकि, कई बार ऐसा साधारण मनोरंजन भी अनजाने में कुछ कहीं ज्यादा असहज और चिंताजनक बातें सामने ला देता है।

बातचीत के दौरान फैजल शेख, जिन्हें लाखों लोग ‘मिस्टर फैजू’ (Mr Faisu) के नाम से जानते हैं, उसने अन्य प्रतिभागियों के साथ अपनी लोकप्रियता और एक इन्फ्लुएंसर के रूप में अपनी यात्रा पर चर्चा करते हुए अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद किया और बताया कि शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स के लोकप्रिय होने के बाद चीजें कैसे बदलीं।

उसी बातचीत में उन्होंने एक ऐसी बात कही जो मेरे मन में रह गई। उन्होंने बताया कि जिस कंपनी के साथ उन्होंने समझौता किया था, उसने उनके ग्रूमिंग पर काफी खर्च किया था। उनके अनुसार, वे ऐसी कक्षाओं में शामिल हुए जहाँ उन्हें सही तरीके से खाना, बैठना, सार्वजनिक जगहों पर व्यवहार करना और खुद को एक सज्जन के रूप में प्रस्तुत करना सिखाया गया।

पहली नजर में यह सिर्फ सोशल मीडिया की हस्तियों के लिए ट्रेनिंग जैसा लगता है। यहाँ तक कि सेलिब्रिटीज और कुछ अमीर परिवारों के बच्चे भी ऐसी ट्रेनिंग लेते हैं। ये लोग अक्सर एक प्रतियोगी माहौल में काम करते हैं, जहाँ प्रस्तुति का महत्व कंटेंट जितना ही होता है। इस नजरिए से देखें तो ग्रूमिंग, खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा भर है।

हालाँकि, जितना अधिक मैंने उस बात के बारे में सोचा, उतना ही यह विचार असहज लगने लगा। क्योंकि ग्रूमिंग सिर्फ खाने-पीने के तौर-तरीकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह एक व्यक्तित्व गढ़ने की प्रक्रिया होती है।

इन्फ्लुएंसर की ग्रूमिंग और एक आदर्श पब्लिक इमेज का निर्माण

फैजल के बयान में एक छोटी-सी बात खास ध्यान देने लायक है। जब उसने ग्रूमिंग क्लासेस का जिक्र किया, तो उसने खुद के लिए मैं नहीं, बल्कि बार-बार ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल किया। यानी यह ट्रेनिंग सिर्फ उनकी ही नहीं हुई थी, बल्कि एक पूरे समूह के साथ हुई थी और वह समूह था प्रसिद्ध सोशल मीडिया कलेक्टिव ‘टीम 07’, जो टिकटॉक, इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स के जरिए साथ-साथ लोकप्रिय हुआ।

अगर उनके समूह को इस तरह ग्रूम किया गया था, तो यह मानना गलत नहीं होगा कि और भी निवेशक दूसरे इन्फ्लुएंसर्स या उनके समूहों को इसी तरह तैयार कर रहे होंगे। समय के साथ हमने यह भी देखा है कि ये इन्फ्लुएंसर्स कुछ साल पहले जैसे होते हैं, कुछ समय बाद ये उससे काफी अलग हो जाते हैं। उन्हें कैसे बैठना है, खाना है और सज्जन की तरह व्यवहार करना है सिखाने वाली ये क्लासेस दरअसल पूरे इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम को एक खास तरीके से ढालने की सुनियोजित कोशिश का हिस्सा होती हैं।

सिर्फ एक इन्फ्लुएंसर होने के नजरिए से देखें, तो अच्छे व्यवहार सीखने में कोई बुराई नहीं है। बल्कि ऐसे समय में, जब कई ऑनलाइन हस्तियाँ सस्ती लोकप्रियता और अश्लीलता के सहारे आगे बढ़ती हैं, अनुशासन और शालीनता का विकास सकारात्मक भी लग सकता है।

लेकिन ग्रूमिंग का एक दूसरा पहलू भी है यह एक सोच-समझकर बनाई गई सार्वजनिक छवि तैयार करती है। एक ऐसा इन्फ्लुएंसर जो विनम्र, सम्मानजनक और अनुशासित दिखाई देता है, वह स्वाभाविक रूप से लोगों की प्रशंसा हासिल करता है।

इसमें शारीरिक फिटनेस, करिश्मा और सोशल मीडिया की बड़ी पहुँच जुड़ जाए, तो इसका असर और भी गहरा हो जाता है। ऐसे लोग प्रेरणादायक बन जाते हैं, लोग उन्हें पसंद करते हैं, उनकी नकल करते हैं और उन पर भरोसा भी करने लगते हैं।

‘द 50’ देखते हुए यह साफ नजर आता है कि यह व्यक्तित्व कैसे सामने आता है। अन्य प्रतिभागी फैजल के व्यवहार और अनुशासन की तारीफ करते हैं। वह टास्क अच्छे से करते हैं, आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं और उनका व्यक्तित्व संतुलित व नियंत्रित लगता है। यह समझना आसान है कि खासकर युवाओं के बीच उनकी इतनी बड़ी फैन फॉलोइंग क्यों है।

फिर भी, इस तरह की सुनियोजित ग्रूमिंग एक अहम सवाल खड़ा करती है, जब किसी व्यक्तित्व को जानबूझकर इतना प्रभावशाली और भरोसेमंद बनाया जाता है, तो उसका अपने फॉलोअर्स पर असल में कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है? और अगर, जैसा कि हम शब्द से संकेत मिलता है, यह प्रक्रिया पूरे समूह पर लागू होती है, तो इसका असर सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे कहीं ज्यादा व्यापक हो जाता है।

अदनान शेख और रिद्धि जाधव की कहानी

‘टीम 07’ और ‘द 50’ शो से जुड़ा एक और नाम अदनान शेख है। फैजल (फैजू) की तरह ही वह भी सोशल मीडिया के जरिए प्रसिद्ध हुआ और दोनों ने लगभग साथ ही लोकप्रियता हासिल की। अदनान की भी सोशल मीडिया पर अच्छी-खासी फॉलोइंग है। शो में उन्होंने अपने निकाह के बारे में कोई चर्चा नहीं की, लेकिन फैजू के साथ उनकी नजदीकियों ने मुझे उनके बारे में थोड़ा और खोजने के लिए मजबूर किया।

दिलचस्प बात यह है कि अदनान की कहानी सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। उनकी बीवी पहले रिद्धि जाधव के नाम से जानी जाती थीं, जो एक हिंदू महिला और एक इन्फ्लुएंसर थीं। बाद में उन्होंने इस्लाम कबूल लिया और अदनान से निकाह के बाद अपना नाम आयशा शेख रख लिया।

हाल ही में यह अदान और उसकी बीवी को ईद से पहले खरीदारी करते हुए सार्वजनिक रूप से देखा गया। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो में रिद्धि उर्फ आयशा बुर्का पहने हुए दिखीं। जिसके बाद एक बार फिर उनके धर्म परिवर्तन और निकाह को लेकर चर्चाएँ तेज हो गईं।

रिपोर्ट्स में पहले यह भी सामने आया था कि रिद्धि का परिवार अदनान से निकाह को लेकर कभी राजी नहीं था और इसीलिए दोनों के निकाह में रिद्धी के परिवार से कोई भी शामिल नहीं हुआ। यह मामला 2024 में उनके निकाह के दौरान भी विवाद का कारण बना था, जब अदनान की बहन के आरोपों के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई थी।

इंटरव्यू में अदनान ने इस विवाद पर अपनी सफाई देते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन आयशा का व्यक्तिगत निर्णय था। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में धर्म की स्वतंत्रता है और किसी को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

पहली नजर में तो यह स्पष्टीकरण सीधा और स्पष्ट लगता है। लेकिन इस कहानी में एक और दिलचस्प पहलू है, जिसका जिक्र खुद अदनान ने पहले किया था। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उन्होंने रिद्धि को पहली बार कई साल पहले देखा था, जब वह खालसा कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं। उनके अनुसार, शुरुआत में रिद्धि ने उन पर ध्यान नहीं दिया। अदनान ने कहा कि उन दिनों वह उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए उनके आसपास बाइक से स्टंट किया करते थे।

कई सालों बाद दोनों ने निकाह कर लिया। निकाह से पहले रिद्धि ने इस्लाम धर्म अपनाया और एक नई मजहबी पहचान स्वीकार की। अदनान का एक और बयान भी ध्यान देने योग्य है, उन्होंने खुलकर कहा है कि उनके जीवन में धर्म सबसे पहले आता है।

जब हम सभी परिस्थितियों और तथ्यों को एक साथ रखते हैं, तो यह मामला उतना सरल नहीं दिखता, जितना सार्वजनिक चर्चाओं में व्यक्तिगत पसंद के रूप में पेश किया जाता है। इसके बजाय यह एक कहीं अधिक जटिल तस्वीर सामने लाता है।

दिलचस्प बात यह है कि विवाद के बाद अदनान ने टेली रिपोर्टर को बताया कि उनकी बीवी का चेहरा सोशल मीडिया पर नहीं दिखाया जाता, क्योंकि यह उनके मजहबी विश्वासों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इसे अपनी इस्लामी रसूल से प्रेरित एक व्यक्तिगत निर्णय बताया।

जब प्रशंसा बन जाती है प्रभाव

आधुनिक इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था भावनात्मक जुड़ाव पर टिकी होती है। फॉलोअर्स को ऐसा महसूस होता है जैसे वे जिन लोगों को ऑनलाइन देखते हैं, उन्हें वास्तव में जानते हैं। वे उनके लाइफस्टाइल, व्यक्तित्व और उनके व्यवहार करने के तरीके की सराहना करते हैं।

समय के साथ यह सराहना अक्सर भरोसे में बदल जाती है। और एक बार भरोसा बन जाए, तो प्रभाव डालना लगभग तय हो जाता है। यहीं से यह चर्चा एक बड़े सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ने लगती है, जो हाल के वर्षों में बार-बार सामने आया है।

भावनात्मक रिश्तों के जरिए धर्म परिवर्तन की कथाएँ अलग-अलग संदर्भों में उभरी हैं, जिनमें लोकप्रिय संस्कृति भी शामिल है। ‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्मों ने एक ऐसे पैटर्न को दिखाने की कोशिश की, जिसमें युवा महिलाओं को रिश्तों के जरिए धीरे-धीरे वैचारिक प्रभाव में लाया जाता है और अंततः धर्म परिवर्तन तक बात पहुँचती है। कोई इस फिल्म के चित्रण से सहमत हो या नहीं, लेकिन इसका मूल विचार सरल था भावनात्मक संबंध कभी-कभी प्रभाव और मनाने का माध्यम बन सकते हैं।

फिल्म में यह दिखाया गया कि हिंदू महिलाओं को बार-बार हिंदू धर्म के खिलाफ बातें कहकर प्रभावित किया गया और अंततः उन्हें धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए मजबूर किया गया। पहले जो ब्रेनवॉशिंग छोटे तौर से होती थी, आज के समय में वह कहीं अधिक खुलकर सामने आने लगी है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इसे और आसान बना दिया है।

दोस्ती और प्रेम संबंध किसी व्यक्ति के विचारों और पहचान को इस तरह प्रभावित कर सकते हैं, जिसे वह उस समय पूरी तरह समझ भी नहीं पाता। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के दौर में, जहाँ व्यक्तित्व को जानबूझकर आकर्षक, अनुशासित और प्रभावशाली बनाने के लिए तैयार किया जाता है, इस तरह के प्रभाव का दायरा और भी बढ़ जाता है।

सराहना से भावनात्मक जुड़ाव बनता है, भावनात्मक जुड़ाव से भरोसा पैदा होता है और भरोसा अक्सर गहरे प्रभाव में बदल जाता है। हालाँकि, यह कहना कि यह प्रभाव अधिकतर मामलों में किसी खास धर्म में धर्म परिवर्तन की ओर ही ले जाता है, एक सामान्यीकरण है ऐसे मामलों को हर परिस्थिति पर लागू करना सही नहीं माना जा सकता।

हिंदू समाज के भीतर असहज अंतर

शायद इस पूरी चर्चा का सबसे असहज पहलू व्यक्तियों के एक्शन में नहीं, बल्कि उस समाज की स्थिति में छिपा है जो इन्हें देख रहा है। कई आधुनिक हिंदू परिवार धीरे-धीरे धर्म पर सार्थक चर्चा से दूर होते गए हैं। आस्था अक्सर त्योहारों, रस्मों और कभी-कभार मंदिर जाने तक सीमित रह गई है।

बच्चे परंपराएँ तो मनाते हुए बड़े होते हैं, लेकिन उन्हें उनके पीछे की दार्शनिक और सांस्कृतिक आधार की गहरी समझ शायद ही दी जाती है। धर्म एक गहराई से समझी जाने वाली चीज के बजाय सिर्फ एक प्रतीक बनकर रह जाता है।

इसी दौरान, युवा एक ऐसे माहौल में रहते हैं जहाँ अन्य समुदायों में धार्मिक पहचान अक्सर ज्यादा स्पष्ट और साफतौर पर दिखाई देती है। यह अंतर एक सूक्ष्म असंतुलन पैदा कर सकता है। जिस युवा को अपने ही विश्वास और पहचान की स्पष्ट समझ नहीं होती, वह भावनात्मक रिश्तों के प्रभाव में आकर किसी अन्य विचार या विश्वास को आसानी से अपना सकता है।

ऐसे वातावरण में करिश्माई व्यक्तित्व और प्रभावशाली लोग बहुत बड़ा सांस्कृतिक प्रभाव डाल सकते हैं। जब किसी व्यक्ति को अपनी पहचान के बारे में स्पष्टता नहीं होती, तो उसकी प्रशंसा आसानी से वैचारिक प्रभाव में बदल सकती है।

इसलिए मुद्दा केवल अंतरधार्मिक रिश्तों का नहीं है। भारत हमेशा से एक ऐसी सभ्यता रहा है जहाँ अनेक धर्मों ने साथ-साथ संवाद और सह-अस्तित्व का रास्ता अपनाया है। असल सवाल यह है कि क्या लोग इन रिश्तों में अपनी पहचान की स्पष्ट समझ के साथ प्रवेश करते हैं या नहीं।

एक रियलिटी शो से असहज सबक

ये सभी विचार मुझे फिर से याद आए, जब मैं ‘द 50’ का वह सामान्य सा एपिसोड देखता रहा। ऑफिस में टीम के साथ हुई एक चर्चा के दौरान यह बात सामने आई और मुझे लगा कि कभी-कभी छोटी-छोटी बातें भी मायने रखती हैं।

इन्फ्लुएंसर ग्रूमिंग पर एक साधारण बातचीत अचानक एक बहुत बड़े तंत्र की झलक जैसी लगने लगी। फैजू की ग्रूमिंग को लेकर कही गई बातों ने यह दिखाया कि किस तरह इन्फ्लुएंसर्स की पर्सनैलिटी को बेहद सावधानी से गढ़ा जा सकता है। शिष्टाचार, अनुशासन और प्रस्तुति पर जोर देकर ऐसे व्यक्तित्व तैयार किए जाते हैं, जो लाखों दर्शकों को प्रभावशाली और भरोसेमंद लगते हैं।

वहीं, अदनान की कहानी यह दिखाती है कि एक आकर्षक व्यक्तित्व और व्यक्तिगत रिश्ते किस तरह पहचान, विश्वास और धार्मिक प्रतिबद्धता जैसे मुद्दों से जुड़कर गहरी बहस को जन्म दे सकते हैं।

ये सिर्फ दो इन्फ्लुएंसर हैं एक ने बताया कि वह आज जो है, वह कैसे बना और दूसरे की कहानी में यह दिखा कि उनकी बीवी रिद्धि से आयशा कैसे बनी। हालाँकि, ऐसे व्यक्तिगत मामलों को व्यापक निष्कर्षों से जोड़ते समय सावधानी जरूरी होती है, क्योंकि हर व्यक्ति और परिस्थिति अलग होती है।

शायद असली सवाल फैजू या अदनान जैसे व्यक्तियों के बारे में नहीं है, बल्कि उस समाज के बारे में है जो उन्हें देख रहा है। कभी-कभी एक साधारण सा शो भी हमारे आसपास हो रही जटिल सच्चाइयों की झलक दिखा देता है। लेकिन यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि किसी एक उदाहरण के आधार पर पूरे समाज या किसी विशेष समुदाय के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)