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जंतर-मंतर पर खोजने गई थी ‘GenZ’, मिले त्यागराज स्टेडियम में: छी ससुर! ट्रेंड से बाहर नहीं निकल पाए ‘कॉकरोच’, मायूस रही दिल्ली पुलिस की लाठियाँ

जय पद्म श्री दोस्तों,

आपने वीर दास की वो कविता तो सुनी होगी जहाँ वो छाती पीटकर अपने दो तरह के हिंदुस्तान से आने का विलाप सुना रहा था। लेकिन शनिवार (6 जून 2026) को ऐसी ही दो तरह की दिल्ली मैंने एक दिन में देख डाली। अब वैसे तो किसी पर शनि चढ़ जाए तो उसकी लंका लगनी तय समझी जाती है इसीलिए मुझे शनिवार को देखना था कि लंका आज किसकी लगती है, सरकार की या कोकरोचों की।

एक तरफ़ 6 जून को विपक्ष एंजेल प्रिया नाम की दूसरी आईडी से देश के पॉलिटिकल इकोसिस्टम में लॉग इन करना चाहता था और वहीं दूसरी तरफ़ सरकार थी जो ख़ुद को GENZ का बेस्ट फ्रेंड बताने के लिए मोदी सरकार मैदान में Youth For Viksit Bharat नाम के टेंट गाड़कर उतर चुकी थी।

अब आधी दुनिया तो जान ही चुकी थी कि आम आदमी पार्टी के अंडे से निकले कॉकरोच क्या कांड करने वाले थे, लेकिन सरकार ये दिखाना चाहती थी, की Gen Z के तकिए के नीचे आज भी मोदी जी की तस्वीर रहती है।

अब भाई 23-24 मिलियन पेज वाला ट्रेंड, जो किसी बुखार की तरह सोशल मीडिया पर चढ़ा हुआ था। एक ऐसा बवासीर जिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उससे एक्स पर उसकी बकैती करने का हक भी सरकार ने निपटा डाला। सारा देश देखना चाहता था कि ट्विटर के ट्रेंड और इंस्टाग्राम के रील्स से निकलकर जब ये कॉकरोच सड़क पर उतरेंगे तो क्या हाल होगा, क्या कोई दंगा होगा, क्या नेपाल या बांग्लादेश जैसी बड़ी सी पिक्चर का कोई टीजर दिल्ली की सड़कों पर दिखेगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं, छी ससुर !

500 पुलिस वाले, 1000 मेला देखने के मूड से सड़क पर निकले, 400 कंटेन्ट क्रिएटर, 200 मीडिया और यूट्यूबर्स और 300 नेटफलिक्स के सतरंगी कैरेक्टर्स के अलावा यहाँ कुछ नहीं था। लेकिन वहीं दूसरी तरफ जंतर मंतर के पेड तंतर से दूर सोनिया गाँधी के शब्दों में लिखूँ तो ‘लोकतंतर’ की असली आवाज 7 हजार की भीड़ त्यागराज स्टेडियम में बैठी थी।

भाईसाहब जब मैं वहाँ पहुँची तो कदम रखने की जगह नहीं, पता चला कि वहाँ मोदी सरकार ने उन सभी युवाओं को बुलाया हुआ है, जिनकी पटरी देशभक्तों के साथ मैच खाती है। अब वहाँ मौजूद भजन गायकों की टेलर स्विफ्ट मैथिली ठाकुर के भाषण को सुनकर लग रहा था कि ऐसी ही प्रैक्टिस जारी रही तो भाजपा को अगली सुषमा या स्मृति ईरानी तो मिलना तय है।

साबरमती रिपोर्ट और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ गाने के बाद विक्रांत मैसी जितना ज्यादा वामपंथी बिरादरी के निशाने पर आए, ऐसे में उनसे डरने की बजाए डबल अटैक मोड में अब वो पहले से ज्यादा सरकार के साथ उनके कार्यक्रम से लेकर उनकी आवाज बनकर दिखाई देते हैं। ये वाकई आज से पहले मैंने तो कभी नहीं देखा था कि मेन स्ट्रीम बॉलीवुड इस तरीके से सरकार के साथ खड़ा रहता है। 2014 से पहले Startup शब्द न सुनने वाले देश ने पिछले 12 सालों में 2 लाख से ज्यादा Startups देख डाले तो ऐसी कहानियाँ बोट म्यूजिक वाले अमन गुप्ता काहे नहीं आकर कहेंगे।

भाई, उधर जाकर लगा कि इस देश में हर मोर्चे पर वैभव सूर्यवंशी जैसा एक टैलेंट, दमदार काम कर रहा है और सरकार ना सिर्फ़ उनको पहचान दे रही है बल्कि सम्मान भी दे रही है। अब जिस देश को कारगिल युद्ध के टाइम हमारी सेना की लोकेशन बताने वाली पत्रकार बरखा दत्त को पकड़ कर पद्म श्री चिपकाया गया था, उस देश में असली काम करने वाले युवाओं का सम्मान होते देखना अभी न्यू नॉर्मल के ट्रैक पर जा रहा है।

लेकिन कमाल ये नहीं था, कमाल तो तब शुरू हुआ जब भीड़ में शामिल होकर कॉलेज के लड़के-लड़कियों के बीच मैं बैठी रही। मन टटोलने की कोशिश की तो यकीन मानिए मैं भी बाहर निकलते हुए कंविन्स हो चुकी थी कि फ़ॉरेन फंडिंग का पैसा उठाकर ये झोला छाप वामपंथी अपने लिए चरस गांजे के अलावा किसी सही जगह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।

बॉस, जब एक कॉलेज जाने वाली लड़की, जो 2029 में अपना पहला वोट देने वाली है और इजरायल-ईरान से लेकर रूस के तेल तक उसका ज्ञान किसी भी एवरेज JNU के बुढ़ऊ से डबल मिलेगा तो राहुल गाँधी कितनी भी यात्रा कर लें, जमीन पर नतीजे एकदम नहीं बदल सकते हैं।

अब आप ही बताओ जिस जगह की माँग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की होनी थी, वहाँ पर उमर ख़ालिद की क़व्वाली गाने वालों की भीड़ थी। जहाँ बात स्टूडेंट्स के भविष्य की होनी थी, वहाँ भाड़े का झुंड हजारों साल पहले के मनुवाद पर विलाप कर रहा था। जहाँ पर हल्ला देश की दिक्कत को लेकर होना था, वहाँ वही पुराना आजादी वाला नारा गूँज रहा था। लेकिन वहीं त्यागराज में देश का आज बनाने वाले, देश का भविष्य सँवारने वाले युवाओं का सम्मान हो रहा था। वहाँ कोई भारत के टुकड़े-टुकड़े का नारा नहीं चल रहा था।हाँ, मैंने वहाँ ‘भारत माता की जय’ की गूँज ही सुनी थी।

मुझे भीतर गए मुश्किल से 30 मिनट ही हुए थे और मंच से एंकर आवाज लगाने लगी ‘GenZ कहाँ हैं’ और पूरा हॉल गूँज रहा था कि ‘GenZ यहाँ है।’ हाँ, हो सकता है कि ये एक साइलेंट स्टेटमेंट हो सरकार का कि अगर सामने वाला मोर्चा जंतर मंतर के जरिए सोशल मीडिया की थाली में नेगटिव का भरता, प्रोपागैंडा का पराठा और दंगों की दाल परोसने की कोशिश कर रहा था, तो हम भी दिखा देंगे कि देश की युवा शक्ति आज भी मेलोडी खिलाने वाले प्रधानमंत्री के साथ है।

आप ऐसे लीडर से नरेटिव की लड़ाई जीत ही नहीं सकते हैं जो 75 की उम्र में भी 25 के बालक की तरह सोचता हो। प्रधानमंत्री की पढ़ाई भले ही छूटे कई दशक बीत गए हों लेकिन होमवर्क करने की आदत आज भी कायम है। तभी मुझे ऐसा एक बार भी नहीं लगा कि खुद को GenZ बताने वाला एक मास समूह कभी भी उनसे कट्टी करने का मूड रखेगा।

भूतनाथ रिटर्न में एक डायलॉग आता है कि डेमोक्रेसी में कभी भी सही,गलत का चुनाव नहीं होता है, बल्कि कम गलत और ज्यादा गलत का चुनाव होता है। जाहिर सी बात है कि 140 करोड़ कि आबादी में शत प्रतिशत सहमति और संतुष्टि तो किसी सूरत में मिलने से रही। जिस देश में 98 % लाने वाले शर्मा जी के लड़के को भी ये सुनना पड़ता हो कि थोड़ी और मेहनत करते तो 99 आ सकते थे, ऐसी नस्लों के समाज में किसी न किसी चूक पर आक्रोश निकलना तो स्वाभाविक है।

पेपर लीक, सुस्त सिस्टम से युवा नाराज है लेकिन वही युवा ये भी जानता है कि इसका इलाज भी इसी सरकार में संभव है वरना सामने जो निकोबार में समंदर में गधा बनकर मछली के साथ डुबकी मार रहा था, वो हर दूसरे महीने आपको tension में छोड़कर खुद vacation में जाएगा।

तो हाँ, भाई लोग!

दिल्ली के GenZ ने तो आज बता दिया कि तराजू के एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ कोई भी आकर बैठ जाए, वजन हमेशा मोदी जी कि साइड ही रहने वाला है। ऐसे में मेरी आज 2 तरह कि दिल्ली देखने की कहानी यही पूरी हुई।

दिल्ली पुलिस की लाठियाँ मायूस रह गईं, जवान भी हताश होकर घर चले गए। वो वापसी की राह में मन ही मन कहते होंगे कि

आज के लिए फिलहाल इतना ही
आपकी तरह मैं भी मायूस हूँ लेकिन
उम्मीद पर दुनिया कायम है
दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है
और उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है

विकास के लिए मंदिर-गुरुद्वारे-सत्संग भवन भी हटे, पर हर बार मस्जिद-मजार पर ही हल्ला क्यों: जयपुर में इंटरनेट शटडाउन, ‘मुस्लिम विक्टिम’ कार्ड प्ले करने में मीडिया भी पीछे नहीं

भारत में विकास और कानून की राह में अक्सर एक ही तरह का गतिरोध देखने को मिलता है। जब भी प्रशासन किसी शहर को आधुनिक बनाने, सड़कें चौड़ी करने या सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए बुलडोजर निकालता है, तो एक विशेष समुदाय द्वारा इसे ‘मजहब पर हमला’ बताकर शोर मचाया जाने लगता है। जयपुर से लेकर दिल्ली और फरीदाबाद से लेकर वाराणसी तक की घटनाएँ गवाह हैं कि जब मंदिर, गुरुद्वारे या सरकारी भवन टूटते हैं, तो वह ‘प्रगति’ का हिस्सा मान लिए जाते हैं और लोग खुशी-खुशी बलिदान दे देते हैं।

लेकिन, जैसे ही किसी अवैध मस्जिद, मजार या मदरसे की बारी आती है, अचानक इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ जुट जाती है, सुरक्षा बलों पर पथराव होता है और ‘बेचारा’ बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोना रोया जाने लगता है। जबकि सबसे ज्यादा अवैध निर्माण भी उन्हीं की ओर से किए जाते हैं।

जयपुर में नूरानी मस्जिद पर प्रशासन का एक्शन

जयपुर के नंदीपुरी इलाके में सोमवार (8 जून) को जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने अवैध ‘नुरानी मस्जिद’ को जमींदोज किया। यह कार्रवाई जगतपुरा-मालवीय नगर रोड को 30 फीट से बढ़ाकर 80 फीट करने के लिए अनिवार्य थी। प्रशासन ने साफ किया कि इस रास्ते में केवल मस्जिद नहीं, बल्कि दो मंदिर, एक मजार और एक सत्संग भवन भी आ रहे थे। विडंबना देखिए, मंदिरों के हटने पर कोई तनाव नहीं हुआ, लेकिन मस्जिद पर कार्रवाई के लिए प्रशासन को 3000 पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े।

शहर में हाई अलर्ट घोषित कर इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। यह इंटरनेट बैन इसलिए करना पड़ा क्योंकि कट्टरपंथी तत्व सोशल मीडिया का सहारा लेकर भीड़ इकट्ठा करते हैं। वे शहर की शांति भंग करने के लिए भड़काऊ पोस्ट साझा करते हैं। पुलिस ने फ्लैग मार्च किया और चप्पे-चप्पे पर जवान तैनात किए। यह डराने वाली स्थिति केवल इसलिए पैदा हुई क्योंकि एक पक्ष विकास को मजहबी रंग देने पर तुला था।

वाराणसी का मल्टी-मॉडल स्टेशन: रात के अंधेरे में एक्शन

वाराणसी में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के लिए आधी रात को बुलडोजर चला। वहाँ रेलवे की जमीन पर बने एक हनुमान मंदिर और अजगैब शहीद मस्जिद को हटाया गया। प्रशासन ने भारी PAC और RPF तैनात की थी। रेलवे ने साफ किया कि स्टेशन को एयरपोर्ट की तर्ज पर विकसित किया जाना है।

करीब एक घंटे के भीतर सारे अवैध ढांचे जमींदोज कर दिए गए। यह प्रोजेक्ट 336 करोड़ रुपए का है जो लाखों यात्रियों को सुविधा देगा। यहाँ भी मंदिर पक्ष ने कोई बवाल नहीं किया। विकास की इस बड़ी तस्वीर में मजहब को बाधा नहीं बनने दिया गया, जो एक परिपक्व समाज की निशानी है।

दिल्ली का तुर्कमान गेट: अवैध ढांचे पर बवाल और पुलिस पर हमला

एक उदाहरण दिल्ली के तुर्कमान गेट का ही ले लीजिए। इस इलाके में भी जब अवैध ढांचे हटाए गए, तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव किया। दिल्ली हाई कोर्ट ने मस्जिद से सटे दवाघर और बारात घर को अवैध घोषित किया था। जैसे ही अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई, वहां उपद्रवी जमा हो गए। उन्होंने पुलिस को अपना काम करने से रोका और हिंसक हमले किए।

उपद्रवियों ने पत्थर बरसाए जिससे चाँदनी महल थाने के SHO गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। मजे की बात यह है कि कार्रवाई से पहले लोगों को सामान हटाने का समय दिया गया था। फिर भी, अराजकता फैलाना ही एकमात्र उद्देश्य दिखाई दिया। कानून का पालन करने के बजाय, यहाँ वर्दी पर पत्थर मारना अधिक जरूरी समझा गया।

सिखों का बड़प्पन: कश्मीर में 72 साल पुराने गुरुद्वारे का बलिदान

जब बात देश की प्रगति की आती है, तो सिख समुदाय ने हमेशा एक मिसाल पेश की है। कश्मीर में श्रीनगर-बारामूला हाईवे के निर्माण के लिए 72 साल पुराने ‘दमदमा साहिब गुरुद्वारे‘ को हटाने की जरूरत थी। यह गुरुद्वारा 1947 से वहाँ मौजूद था और लंगर के माध्यम से हजारों की सेवा कर रहा था। लेकिन सिखों ने प्रशासन के साथ पूरा सहयोग किया।

सिख समुदाय ने खुद आगे बढ़कर गुरुद्वारे को तोड़ने पर सहमति दी। उन्होंने विकास को प्राथमिकता दी और राजमार्ग का रास्ता साफ किया। इसके बदले में प्रशासन ने उन्हें वैकल्पिक जमीन और सहयोग का प्रस्ताव दिया। वहाँ न तो इंटरनेट बंद हुआ और न ही कोई पथराव। यह दर्शाता है कि एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति देश के विकास को सर्वोपरि मानता है।

झंडेवालान और वारंगल: मंदिर टूटे पर कानून नहीं टूटा

दिल्ली के झंडेवालान में 800 साल पुराने मंदिर परिसर और 100 से ज्यादा घरों को तोड़ा गया। स्थानीय लोगों में गुस्सा और दुख था, लेकिन किसी ने अराजकता नहीं फैलाई। यह परिसर RSS मुख्यालय के पास था, फिर भी लोगों ने कानून को अपने हाथ में नहीं लिया। उन्होंने शांतिपूर्वक विरोध दर्ज कराया और न्याय की गुहार लगाई।

इसी तरह तेलंगाना के वारंगल में काकतीय काल का 800 साल पुराना शिव मंदिर स्कूल बनाने के लिए गिरा दिया गया। लोग नाराज थे, लेकिन उन्होंने सड़कों पर आगजनी नहीं की। अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई और कानूनी रास्ता अपनाया गया। यह हिंदू समाज का धैर्य है कि मंदिर टूटने पर भी वे दंगों की राह नहीं चुनते।

फरीदाबाद का छावनी रूप: जब मंदिर-मस्जिद साथ गिरे

फरीदाबाद के NIT-3 इलाके में कोर्ट और NGT के आदेश पर बड़ी कार्रवाई हुई। वहाँ 2 धार्मिक स्थलों (मस्जिद और मंदिर) समेत 20 अवैध निर्माणों को ध्वस्त किया गया। इस दौरान 1000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात रहे और मोबाइल इंटरनेट बंद किया गया। प्रशासन जानता था कि मस्जिद पर हाथ लगाते ही कुछ तत्व माहौल बिगाड़ सकते हैं।

यह कार्रवाई रेलवे कॉरिडोर और एलिवेटेड रोड के लिए जरूरी थी। मंदिर शांति से हट गया, लेकिन मस्जिद के नाम पर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। प्रशासन को रात 2 बजे से दोपहर 2 बजे तक ऑपरेशन चलाना पड़ा। यह भेदभाव नहीं, बल्कि कानून की एकसमान कार्रवाई थी जिसे केवल एक समुदाय ने पचाने से इनकार किया।

गुजरात मॉडल: जब मोदी सरकार ने गिराए मंदिर

जब हम धार्मिक ढांचे और विकास की बात करते हैं, तो गुजरात का उदाहरण सबसे सटीक है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गाँधीनगर में सड़क चौड़ीकरण के लिए एक महीने में कई मंदिरों को गिराया गया था। प्रशासन ने सरकारी जमीन पर बने हर अवैध ढांचे को हटाने का संकल्प लिया था।

हैरानी की बात यह है कि दिवाली के समय हुई इस कार्रवाई में कहीं कोई हिंसा नहीं हुई। मंदिर रातों-रात हटा दिए गए और जनता ने सहयोग किया। मोदी जी ने खुद कहा था कि ‘राष्ट्र धर्म’ मजहब से बड़ा है। हिंदू संगठनों के कुछ विरोध के बावजूद, सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और गाँधीनगर की सड़कें चौड़ी हो गईं।

प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया था कि अफसर अक्सर नेताओं को डराने के लिए सबसे पहले हनुमान मंदिर तोड़ते हैं। उन्हें लगता है कि इससे तूफान खड़ा होगा और कार्रवाई रुक जाएगी। लेकिन गुजरात में उन्होंने हिम्मत दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा शहर खुश हो गया क्योंकि जाम की समस्या खत्म हो गई थी।

‘लैंड जिहाद’ और मीडिया का चश्मा

यह एक कड़वा सच है कि सार्वजनिक जमीनों पर सबसे ज्यादा अवैध कब्जे मजारों के रूप में होते हैं। इसे अक्सर ‘लैंड जिहाद’ का नाम दिया जाता है क्योंकि ये ढांचे रातों-रात खड़े कर दिए जाते हैं। बाद में इन्हें ‘ऐतिहासिक’ बताकर बचाने की कोशिश होती है। जयपुर की नूरानी मस्जिद को भी 45 साल पुराना बताया गया, लेकिन क्या पुराना होना अवैध कब्जे को वैध बना देता है?

मीडिया का एक धड़ा या कहें वामपंथी गैंग भी केवल मस्जिदों पर कार्रवाई को प्रमुखता से दिखाता है। अपनी खबरों की बड़ी-बड़ी हेडलाइन में अवैध मस्जिदों को ढहाने की बात छापता है।

लेकिन जब मंदिर टूटते हैं, अतिक्रमण हटाया जाता है, तो उसे कहे भी प्रमुखता से दिखाया नहीं जाता है। उसे ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ कहा जाता है। मस्जिदों के टूटने पर उसे ‘मुस्लिमों पर जुल्म’ बता दिया जाता है। यह विमर्श ही कट्टरपंथियों को और अधिक उकसाने का काम करता है।

कानून की नजर में सब बराबर हों

विकास के पहिये किसी का मजहब देखकर नहीं रुकते। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो हर अवैध कब्जे को हटाना होगा। एक समुदाय का यह व्यवहार कि ‘मेरा अवैध निर्माण मजहब का हिस्सा है’, देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। सिखों और हिंदुओं से उन्हें सीखने की जरूरत है कि राष्ट्र निर्माण के लिए त्याग आवश्यक है।

प्रशासन को इंटरनेट बंद करने और हजारों जवानों को तैनात करने पर मजबूर करना यह साबित करता है कि कट्टरपंथ देश की संप्रभुता को चुनौती देता है। जब तक हर नागरिक यह नहीं समझेगा कि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा इबादत नहीं, बल्कि अपराध है, तब तक बुलडोजर की गरज अनिवार्य रहेगी। कानून का शासन ही लोकतंत्र की असली पहचान है।

यात्रा गोरक्षा के लिए, बातें मुलायम-अखिलेश-मुस्लिम की, मंच पर शिवपाल-डिंपल यादव: क्या सपा की चुनावी चाल में फँस गए हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?

सनातन धर्म में संतों का स्थान हमेशा से राजनीति और सत्ता के गलियारों से ऊपर माना गया है। संत का धर्म होता है सत्य की रक्षा, निष्पक्षता और समाज को सही राह दिखाना। लेकिन बीते कुछ दिनों में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की राजनीतिक बयानबाजी और समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रति उनका झुकाव एक नए विवाद को जन्म दे रहा है।

राजनीतिक गलियारों और सनातन प्रेमियों के बीच आज यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सपा की सोची-समझी राजनीतिक चाल को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई और कहानी है? वह रह-रहकर सपा की तारीफ करते हैं, कभी इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो कभी देश में जातियों की राजनीति की बात करने लगते हैं।

अभी इटावा और सैफई में यादव परिवार के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने जो बयान दिए, उसने करोड़ों सनातनी भक्तों को हैरान कर दिया है।

सैफई में मुलायम परिवार की तारीफों के बाँधे पुल, क्या इतिहास भूल गए?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इन दिनों ‘गौ-प्रतिष्ठा आंदोलन’ के तहत देशव्यापी यात्रा पर हैं। लेकिन इस धार्मिक यात्रा के दौरान जब वे इटावा पहुँचे, तो उनका अंदाज पूरी तरह राजनीतिक नजर आया। उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की, बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

हद तो तब हो गई जब उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला।

इस बयान के बाद देश के सनातनी समाज में भारी आक्रोश और असमंजस है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या केवल राजनीतिक गठजोड़ या सपा के तुष्टिकरण के एजेंडे को हवा देने के लिए इतिहास के काले पन्नों को जानबूझकर पलटा जा रहा है? आखिर गौ-रक्षा और सनातन रक्षा की यात्रा में ‘सच्चे हितैषी’ चुनने का स्वामी जी का पैमाना क्या है?

1990 के काले दौर में सनातनियों के खून से लाल हुआ था सरयू का जल

इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर जिस बेरहमी से पुलिस ने गोलियां चलाई थीं, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।

ऐतिहासिक कड़वा सच: मुलायम सरकार के आदेश पर हुई उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्त बलिदान हुए और सरयू नदी का जल लाल हो गया था। बाद में मुलायम सरकार ने रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर से मुकदमे भी वापस ले लिए थे। इसी घटना के बाद उन्हें एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने की राजनीति के कारण ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक मिल गई थी।

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उसी दौर के मुखिया को ‘संत सेवक’ बताकर किसका हित साध रहे हैं? क्या यह उन बलिदानी कारसेवकों के बलिदान का अपमान नहीं है?

गुरु के अपमान और खुद पर हुए लाठीचार्ज को भूल गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस गुरु परंपरा की दुहाई देते हैं, उसी इतिहास का एक पन्ना उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से भी जुड़ा है। मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में ही स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को आजमगढ़ से गिरफ्तार किया गया था, जिसे पूरे देश ने शंकराचार्य पद और सनातन परंपरा का घोर अपमान माना था।

इतना ही नहीं, खुद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अपना अतीत भी सपा के शासनकाल में जख्मी हुआ था-

साल 2015 का वाराणसी कांड: अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल के दौरान वाराणसी के गोदौलिया क्षेत्र में गणेश विसर्जन को लेकर संतों का एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा था। तत्कालीन सपा सरकार की पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके छोटे-छोटे बटुकों (शिष्यों) पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाई थीं। इस लाठीचार्ज में स्वामी जी खुद गंभीर रूप से घायल हुए थे और उन्हें जेल में डाल दिया गया था।

आज सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिनके शासनकाल में खुद स्वामी जी पर और उनके मासूम शिष्यों पर लाठियाँ चलीं, आज सत्ता से बाहर होते ही वही अखिलेश यादव और उनका परिवार स्वामी जी के लिए ‘बड़े दिल वाला’ कैसे हो गया? क्या सपा स्वामी जी के रसूख का इस्तेमाल अपनी मुस्लिम-यादव (MY) और जातीय राजनीति की छवि को सुधारने के लिए नहीं कर रही है?

गो-तस्करी का इतिहास Vs योगी सरकार के सख्त कदम

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस समय गो-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। लेकिन वे उत्तर प्रदेश में गोवंश के इतिहास को लेकर दोहरा रवैया अपनाते दिख रहे हैं।

सपा शासन में गो-तस्करी का ‘खेल’: मुलायम और अखिलेश यादव के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में 1955 का गोवध निषेध अधिनियम सिर्फ कागजों तक सीमित था। चंदौली जिले का सैयदराजा थाना और नौबतपुर चेकपोस्ट पूरे देश में गो-तस्करों के सबसे बड़े गढ़ के रूप में कुख्यात थे।

हालात ये थे कि इन थानों और चेकपोस्टों पर पोस्टिंग पाने के लिए पुलिस अधिकारियों के बीच बोलियाँ लगा करती थीं। यहाँ से होने वाली अवैध गो-तस्करी का पैसा कथित तौर पर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता था। यूपी से गोवंश को बिहार के रास्ते पश्चिम बंगाल और वहां से बांग्लादेश के कत्लखानों में कटने के लिए भेज दिया जाता था।

योगी सरकार का ‘गोरक्षा मॉडल’: सपा शासनकाल के विपरीत साल 2017 में योगी आदित्यनाथ के आते ही सूबे की तस्वीर बदल गई। योगी सरकार ने जो कदम उठाए, वे आज देश के लिए नजीर हैं:

अवैध बूचड़खाने बंद: सत्ता संभालते ही सभी अवैध कत्लखानों पर ताला लगाया गया।
देश का सबसे सख्त कानून (2020): यूपी गोवध निवारण अधिनियम में संशोधन कर 3 से 10 साल की कठोर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया।
कड़ी कार्रवाई: गो-तस्करों पर एनएसए (रासुका) लगाया गया और कई बड़े तस्करों के एनकाउंटर किए गए।
गो-संरक्षण केंद्र: आज उत्तर प्रदेश में 7,000 से अधिक गो-संरक्षण केंद्र चालू हैं, जिनमें 13 लाख से अधिक गोवंश का सरकारी खर्चे पर पालन-पोषण हो रहा है।

सवाल यह है कि जो सरकार गो-माता की रक्षा के लिए इतने ठोस कदम उठा रही है, स्वामी जी उसकी सराहना करने से कतराते हैं। वहीं दूसरी तरफ गो-तस्करी के मूकदर्शक रहे परिवार को वे ‘गोभक्त’ का सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं।

लव जिहाद और धर्मांतरण पर चुप्पी का संरक्षण?

यादव परिवार के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों, अवध क्षेत्र और नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर अवैध धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ के मामले सामने आए थे। विदेशी फंडिंग के दम पर मिशनरी और कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय थीं, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार ने अपने कोर वोट बैंक के खिसकने के डर से इन गतिविधियों पर हमेशा चुप्पी साधे रखी।

यही नहीं, वो गौरक्षा की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रोपेगेंडा को भी बढ़ाते दिख रहे हैं। साफ दिख रहा है कि वो खुद को सनातनी से ज्यादा अब सेकुलर दिखाने का प्रयास करते दिख रहे हैं।

सनातन के शीर्ष पदों पर बैठे संतों का काम इन मुद्दों पर समाज को सचेत करना होता है। लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का सपा के सुर में सुर मिलाकर देश में जातियों की बात करना और इस्लामिस्टों के प्रति नरम रुख दिखाना यह दर्शाता है कि वे अनजाने में ही सही, लेकिन सपा के ‘डिवाइड एंड रूल’ (बाँटो और राज करो) के एजेंडे का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

करोड़ों सनातनियों के साथ विश्वासघात या राजनीतिक भूल?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्वयं को सनातन परंपरा का ध्वजवाहक बताते हैं। ऐसे में उनका यह कर्तव्य बनता है कि वे राजनीतिक स्वार्थ और एजेंडे से ऊपर उठकर केवल और केवल सनातन हितों की बात करें।

इतिहास की कड़वी सच्चाइयों से आँखें मूँदकर रामभक्तों पर गोली चलवाने वालों, संतों का दमन करने वालों और गो-तस्करी को बढ़ावा देने वाली ताकतों को ‘संत सेवक’ बताना देश के करोड़ों सनातनियों की भावनाओं पर नमक छिड़कने जैसा है।

सनातन समाज आज स्वामी जी से यह सवाल पूछ रहा है कि क्या एक संत की गरिमा किसी राजनीतिक दल की ‘कठपुतली’ या उसका ‘चुनावी ढाल’ बनने में है? स्वामी जी को जल्द ही यह समझना होगा कि राजनीतिक चश्मे से सनातन की रक्षा नहीं हो सकती और इतिहास को झुठलाने का प्रयास अंततः संत परंपरा के साथ एक बड़ा विश्वासघात ही साबित होगा।

अखिलेश राज के मुकाबले 7 गुना अधिक सरकारी नौकरी, भर्ती घोटालों का दाग मिटा लाए पारदर्शिता: जानिए कैसे योगी सरकार ने UP के युवाओं को दिया ‘अभ्युदय’

2017 से पहले उत्तर प्रदेश में या तो सरकारी भर्तियाँ नहीं ही होती थीं और अगर होती भी तो प्रतियोगी परीक्षाएँ अक्सर नकारात्मक कारणों से सुर्खियों में रहती थीं जैसे- पेपर लीक, नकल माफिया, कोचिंग माफिया, भर्ती घोटाले और परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था। 2017 के बाद आई योगी सरकार ने परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया है, नकल माफियाओं पर कार्रवाई हुई है और सरकारी नौकरियों की संख्या भी खूब बढ़ी है।

योगी सरकार ने 2024 कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले में तुरंत एक्शन लेते हुए पूरी परीक्षा रद्द कर दी। STF जाँच शुरू हुई। सरकार ने सख्ती बरतते हुए ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ की। इस दौरान कई राज्यों तक फैला नेटवर्क सामने आया। इतना ही नहीं 48 लाख उम्मीदवारों को फिर से परीक्षा देने का मौका दिया ताकि किसी के साथ अन्याय न हो। दूसरे पेपर लीक के मामले में भी योगी सरकार का एक्शन सख्त रहा।

मुलायम सिंह सरकार और अखिलेश सरकार में ऐसा नहीं हुआ। दोनों ही मामलों में जब सरकार बदली तब एक्शन हुए। पुलिस भर्ती को लेकर 2007 का विवाद हो या 2017 का। दोनों में भर्ती प्रक्रिया में धाँधली के आरोप लगे। मेरिट लिस्ट में हेराफेरी से लेकर फर्जी प्रमाण पत्र रिकॉर्ड बदलने के प्रमाण मिले। यहाँ तक कि यूपी लोकसेवा आयोग पर भी गंभीर सवाल उठे। यहाँ तक कहा गया कि समाजवादी पार्टी के मुखिया का पूरा कुनबा घोटाले में शामिल है। पहले देखते हैं सपा के शासन काल में हुए कुछ पेपर लीक और प्रक्रिया में धाँधली में प्रमुख मामले कौन से रहे।

UPCPMT 2014 (Uttar Pradesh Combined Pre-Medical Test)– यह मामला काफी दिलचस्प था, क्योंकि शुरुआत में इसे ‘पेपर लीक‘ कहा गया और परीक्षा रद्द कर फिर से परीक्षा ली गई। इस दौरान केजीएमयू के एक शिक्षक समेत कई नाम सामने आए लेकिन जाँच में तस्वीर कुछ अलग निकली।

दरअसल 22 जून 2014 को परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले गाजियाबाद में दो बैंकों- SBI और इलाहाबाद बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम में रखे प्रश्नपत्र बॉक्सों की सील टूटी हुई या छेड़छाड़ की स्थिति में मिली। इसके बाद करीब 1.1 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा तत्काल रद्द कर दी गई। प्रशासन को लगा कि प्रश्नपत्र बाहर निकाले गए होंगे। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दिए। STF और प्रशासनिक जाँच भी शुरू हुई। दो एफआईआर दर्ज हुए।

सरकार और KGMU ने यह तर्क दिया कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में थोड़ी भी आशंका पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता खत्म कर सकती है। सुरक्षा प्रणाली में इतनी बड़ी सेंध लगी थी कि परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, इसलिए ‘संदेह का लाभ’ छात्रों को देने के बजाय परीक्षा रद्द कर दोबारा कराई जाए। फिर रिएग्जाम जुलाई 2014 में आयोजित हुई।

उत्तर प्रदेश ग्रामीण विकास अधिकारी (VDO) भर्ती 2013-14– यह मामला ‘कैश फॉर जॉब’ यानी नौकरी के बदले घूस विवाद के रूप में चर्चा में आया था। यह मामला लगभग 3002 ग्रामीण विकास अधिकारी पदों की भर्ती से जुड़ा था।

मार्च–मई 2014 में पोर्टल Cobrapost ने एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए दावा किया कि भर्ती प्रक्रिया में कुछ राजनीतिक बिचौलिए, विधायक और सत्ता से जुड़े लोग शामिल हैं, जो उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे माँग रहे हैं।

स्टिंग के अनुसार, उम्मीदवारों से ₹8 लाख से ₹13 लाख तक की माँग की जा रही थी। कई लोगों ने कथित तौर पर कुल रकम का आधा हिस्सा ‘टोकन मनी’ के रूप में माँगा गया। दावा किया गया कि चयनित उम्मीदवारों की सूची ‘ऊपर’ से जिलाधिकारियों को भेजी जाएगी।

Cobrapost ने अपने स्टिंग में कुछ तत्कालीन राज्य मंत्री स्तर के पदाधिकारियों, सत्तारूढ़ दल के विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों के नाम लिए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई लोगों ने अपने राजनीतिक संपर्कों के आधार पर भर्ती कराने का भरोसा दिया।

लेकिन जाँच में यह बात कभी सामने नहीं आया और न ही कोर्ट का कोई आदेश आया। यह सिर्फ राजनीतिक विवाद बन कर रह गया। कोई यह नहीं साबित कर पाया कि 3002 VDO पदों की भर्ती रिश्वत लेकर की गई थी।

UPPCS-2015 पेपर लीक और चेयरमैन का मामला

मार्च 2015 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से पहले व्हाट्सएप पर वायरल हो गया था। जाँच में पाया गया कि लीक हुआ पेपर और वास्तविक प्रश्नपत्र काफी हद तक मेल खाते थे। इसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और एसटीएफ जाँच शुरू की गई। कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं। इस दौरान जो भर्ती हुई उसे ‘यादव भर्ती’ भी कहा जाता है। आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। आयोग के खिलाफ व्यापक छात्र आंदोलन हुए।

अभ्यर्थियों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष जिलों और जातियों के उम्मीदवारों को अनुचित तरीके से लाभ पहुँचाया गया। चयन सूची में असामान्य पैटर्न होने के आरोप अदालतों तक पहुँचे।

दरअसल तत्कालीन अखिलेश सरकार ने 2013 में अनिल कुमार यादव को यूपीपीएससी का चेयरमैन बनाया था और उनके कार्यकाल में पीएससी, पीएससी जे, मेडिकल अधिकारी समेत कई एंट्रेस टेस्ट हुए, जिसमें घोटाले के आरोप लगे। उन पर यादवों को लाभ पहुँचाने के आरोप भी लगे। चयन प्रक्रिया में पैटर्न के बदलने को लेकर भी उम्मीदवारों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। UPPCS-2015 पर्चा लीक मामले में लोक सेवा आयोग को क्लीनचिट दिए जाने के अखिलेश सरकार के फैसले का जमकर विरोध हुआ था। कहा गया कि जब जाँच जारी है, तो फिर क्लीन चिट देने की इतनी जल्दबाजी क्यों है सरकार को?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में हुए अनिल कुमार यादव की यूपीपीएससी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को ‘अवैध’ और ‘मनमानी’ करार दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने उनकी नियुक्ति करते समय उनकी योग्यता, ईमानदारी और जरूरत की पर्याप्त जाँच नहीं की। इसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

यूपी जल निगम भर्ती घोटाला 2016-17– यूपी जल निगम भर्ती घोटाला मुख्य रूप से 2016-17 में हुई भर्तियों से जुड़ा था, जब राज्य में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार थी। बाद में 2017 में सरकार बदलने के बाद इसकी जाँच शुरू हुई। इस दौरान जल निगम में करीब 1300 नियुक्तियाँ की गई थीं, जिनमें 122 सहायक अभियंता, 853 जूनियर इंजीनियर और 325 क्लर्क शामिल हैं।

योगी सरकार ने जब जाँच शुरू की, तो SIT ने कई गंभीर अनियमितताओं की जानकारी दी। इसमें बताया गया कि भर्ती प्रक्रिया असामान्य तेजी से पूरी की गई। इसके विज्ञापन से लेकर नियुक्ति पत्र तक की प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी हुई।

सरकारी नियमों का पालन नहीं हुआ। उत्तर पुस्तिकाओं और मूल्यांकन पर सवाल उठे। कुछ चयनित अभ्यर्थियों के सही और गलत उत्तरों का पैटर्न एक जैसा पाया गया। कुछ मामलों में गलत उत्तरों पर भी अंक दिए गए थे। ऐसे विषयों में भर्ती की गई, जिनमें पद ही नहीं थे। SIT ने परीक्षा आयोजित करने वाली निजी कंपनी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।

सरकार ने पहले 122 सहायक अभियंताओं की नियुक्तियाँ रद्द की, बाद में करीब 1300 कर्मचारियों की नियुक्तियाँ निरस्त कर दी गई। इस मामले में आजम खान का नाम भी सामने आया, जो उस वक्त शहरी विकास मंत्री थे। उन पर FIR दर्ज किए गए।

हालाँकि, समाजवादी पार्टी ने तर्क दिया कि भर्ती प्रक्रिया विभागीय स्तर पर हुई थी और राजनीतिक नेतृत्व की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। वहीं जांच एजेंसियों और योगी सरकार ने भर्ती नियमों के व्यापक उल्लंघन की बात कही।

यूपी जल निगम भर्ती घोटाला उन मामलों में गिना जाता है, जिनमें जाँच के बाद सिर्फ आरोप नहीं लगे, बल्कि बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ भी रद्द की गईं। जाँच में भर्ती प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली, पदों की स्वीकृति और परीक्षा संचालन में गंभीर अनियमितताओं की बात सामने आई, जिसके बाद लगभग 1300 नियुक्तियाँ रद्द कर दी गईं और कई लोगों के खिलाफ जाँच और मुकदमे चले।

मुलायम सिंह यादव के राज में हुए घोटाले

मुलायम सिंह यादव के 2003–2007 कार्यकाल को लेकर सबसे बड़ा और सबसे अधिक चर्चित उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती घोटाला (2005–06) माना जाता है। उनके राज में ‘परिवहन भर्ती घोटाला’ भी सामने आया था। हालाँकि इसका उतना कागजात और प्रमाण नहीं मिलते जितना पुलिस भर्ती घोटाले को लेकर दिया गया।

पुलिस भर्ती घोटाला (2005–06)- 2007 में मायावती सरकार के सत्ता में आने के बाद पुलिस भर्ती की जाँच कराई गई। जाँच के बाद पाया गया कि 2004–06 के दौरान हुई भर्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुईं।

जाँच रिपोर्ट में कहा गया कि फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया गया। आंसर शीट में कथित तौर पर फेरबदल किया गया। चयन में बदलाव कर कुछ उम्मीदवारों को फायदा पहुँचाया गया। पुलिस वैरिफिकेशन प्रक्रिया में भी अनियमितता पाई गई। यहाँ तक कि अंकों और रिकॉर्ड में भी हेरफेर हुए।

इसको देखते हुए 2007 में मायावती सरकार ने पहले चरण में 6504 पुलिसकर्मियों की भर्ती रद्द की। 12 वरिष्ठ IPS अधिकारियों को निलंबित कर दिया। इसके अलावा जाँच के बाद हजारों भर्तियाँ भी निरस्त की गई। मायावती सरकार ने 3964 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की नियुक्तियाँ भी रद्द कर दी। कुल मिलाकर 10000 से अधिक भर्तियाँ मायावती के नेतृत्व वाली सरकार ने निरस्त की।

सरकारी जाँच समिति ने दावा किया कि 2004–06 के बीच 20000 से अधिक पुलिस भर्ती में गंभीर अनियमितताएं थीं। कुछ जगह उत्तर पुस्तिकाएं दोबारा लिखे जाने तक के आरोप लगे। हैंडराइटिंग विशेषज्ञों की रिपोर्ट का हवाला दिया गया।

उस समय BSP सरकार ने कहा था कि यदि जाँच में राजनीतिक दबाव या नेताओं की भूमिका साबित होती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी। हालाँकि इसे किसी नेता के खिलाफ अनियमितता को प्रमाणित नहीं किया जा सका।

2003–2007 के दौरान कुछ भर्ती परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को लेकर प्रश्नपत्र लीक होने और धाँधली के आरोप लगते रहे, लेकिन उस दौर में पुलिस भर्ती में कथित चयन अनियमितता का विवाद सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा।

परिवहन विभाग भर्ती विवाद– UPSRTC (रोडवेज) में भी समय-समय पर भर्ती और नियुक्तियों को लेकर आरोप लगे। विशेष रूप से ड्राइवर और कंडक्टर की भर्तियों में कथित अनियमितताओं, भाई-भतीजावाद और नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियों को लेकर काफी विवाद हुआ। लेकिन ये मामला पुलिस भर्ती घोटाले के सामने कुछ नहीं था, क्योंकि पुलिस भर्ती घोटाले में कार्रवाई भी सरकार बदलने पर की गई।

कोचिंग माफियाओं का तंत्र जिसे योगी सरकार ने ‘अभ्युदय’ से तोड़ा

समाजवादी पार्टी की सरकार में नकल और पेपर लीक कोई अलग-अलग समस्याएँ नहीं थीं बल्कि एक संगठित इकोसिस्टम था। इस इकोसिस्टम की शुरुआत स्कूलों से होती थी। बोर्ड परीक्षाओं में नकल कराई जाती थी, जिसके जरिए बड़ी संख्या में ऐसे छात्र अच्छे अंकों के साथ पास हो जाते थे और यही स्थिति विश्वविद्यालयों तक में जारी रहती।

विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इन्हीं छात्रों को कोचिंग माफिया अपने नेटवर्क में शामिल करते थे। दूसरी तरफ भर्ती आयोगों में बैठे भ्रष्ट अधिकारी इस नेटवर्क को संरक्षण देते थे। दोनों के बीच ऐसी साँठगाँठ बन गई थी जिसमें पेपर लीक होना आम बात बन गया था। रिपोर्ट्स सामने आईं कि कुछ कोचिंग सेंटर के छात्रों को पेपर में अनुचित लाभ मिलता है। इसका सीधा फायदा पैसा वालों को मिल जाता और गरीब छात्र मुँह ताकते रह जाते।

योगी सरकार ने यह संगठित नेटवर्क तोड़ दिया। अब छात्रों को फ्री कोचिंग के लिए सरकार ने अभ्युदय जैसी स्कीम लॉन्च की है। ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ की शुरुआत 16 फरवरी 2021 को बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से की गई थी। इसका मकसद ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों को मुफ्त कोचिंग देना है, जो आर्थिक कमजोरी या संसाधनों की कमी के कारण निजी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। इसमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं के साथ साक्षात्कार की तैयारी शामिल है। इसके अलावा JEE और NEET जैसी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाता है। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं से जुड़ी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधा भी इस योजना में उपलब्ध है।

सरकारी नौकरी देने में मीलों आगे योगी सरकार

आज अखिलेश यादव आए दिन सरकारी नौकरी को लेकर सवाल उठाते रहते हैं लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान सरकारी नौकरी मिलना युवाओं के लिए लगभग असंभव सा था। एक तो नौकरियाँ निकलती नहीं थी और जो निकलती भी थीं तो वे भ्रष्टाचार और माफियाओं की भेंट चढ़ जाती थीं। योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने विधानसभा में बताया था कि अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान 2012 से 2017 के बीच केवल 1.38 लाख नौकरी दी गईं।

वहीं, योगी सरकार ने इस परिपाटी को बदला है और मुख्यमंत्री खुद बता चुके हैं कि उनकी सरकार आने के बाद से 9 वर्षों में 9 लाख लोगों को सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं। यह अखिलेश के काल में दी गईं नौकरियों से 7 गुना अधिक है। योगी सरकार ने केवल प्रक्रिया नहीं बदली है बल्कि सरकारी भर्ती की इस पूरी मशीनरी को दुरुस्त किया है। इसके बाद यह मशीनरी और तेज गति से काम करने लगी है।

उमर खालिद की फैन, हिंदुओं की ‘दुश्मन’: जानें- कौन है वामपंथी कल्पना विल्सन, जिसने लंदन में CJI सूर्यकांत को किया परेशान

4 जून 2026 को लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के व्याख्यान के दौरान ‘ श्रोताओं के शर्मनाक हरकत’ की निंदा की। मुख्य न्यायाधीश को परेशान करने वाले लोगों के वीडियो सामने आने के बाद दूतावास ने ये बयान जारी किया।

आधिकारिक बयान में भारतीय उच्चायोग ने कहा, “4 जून 2026 को, भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश ने आयोजकों के निमंत्रण पर लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक स्थित कॉलेज के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। इसमें उन्हें ‘एआई और अंतर्राष्ट्रीय कानून’ पर लेक्चर देना था।”

उनके भाषण के बाद एक अच्छी चर्चा हुई। इस दौरान एक व्यक्ति ने कार्यक्रम में बाधा डालने की कोशिश की। दर्शकों का ऐसा अशोभनीय व्यवहार अस्वीकार्य है और मर्यादा के विपरीत है। मतभेद एक लोकतांत्रिक समाज का स्वाभाविक हिस्सा हैं, हालाँकि इसे सभ्य और सम्मानजनक तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए।

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक प्रतिभागी भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति को लेकर सवाल उठाते हुए दिखाई दे रहा है। मुख्य न्यायाधीश लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक कॉलेज में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतर्राष्ट्रीय कानून’ पर लेक्चर देने के लिए गए थे।

वहाँ मौजूद एक महिला ने पहले मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों का जिक्र किया और फिर उनसे असहमति के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, “ माननीय न्यायाधीश ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में लोकतंत्र की रक्षा के भारतीय इतिहास के बारे में कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें कही हैं। लेकिन, हमें देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कानूनी विशेषज्ञों से पता चल रहा है कि भारत में ‘असहमति ‘ को लेकर काफी चिंता है। और ऐसा लगता है कि यह ‘चिंता’ कुछ हद तक माननीय न्यायाधीश के भाषण में भी झलकती है।” इससे पहले कि वह अपना प्रश्न पूरा कर पातीं, मंच पर मौजूद मॉडरेटर ने प्रश्न को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह चर्चा के विषय से संबंधित नहीं था।

बाद में महिला की पहचान अमृत विल्सन की बेटी कल्पना विल्सन के रूप में हुई। कल्पना बिरबेक विश्वविद्यालय में भूगोल की प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

कल्पना विल्सन कौन हैं?

बिरबेक विश्वविद्यालय में कल्पना विल्सन के प्रोफाइल के अनुसार , वे सामाजिक विज्ञान विषय में सीनियर प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं और उनका कार्य अंतरराष्ट्रीय विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में रिसर्च पर है। उन्होंने नस्ल/लिंग, श्रम, नव-उदारवाद और प्रजनन अधिकारों एवं न्याय से संबंधित विषयों पर शोध किया है, जिसमें विशेष रूप से दक्षिण एशिया और उसके प्रवासी समुदायों पर ध्यान दिया गया है।

कल्पना ने ससेक्स विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में बीए (ऑनर्स) और एरिया स्टडीज (दक्षिण एशिया) में एमए किया है। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के एसओएएस से राजनीतिक अर्थशास्त्र में पीएचडी भी की है। बिरबेक कॉलेज ज्वाइंन करने से पहले, वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और एसओएएस में कार्यरत थीं। हालाँकि उनकी अकादमिक उपलब्धियाँ भारत-विरोधी गतिविधियों को छिपा नहीं सकतीं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनके बायो से पता चलता है कि वे ‘नस्लवाद और अंतरराष्ट्रीय विकास, लिंग, नवउदारवाद, साम्राज्यवाद और हिंदुत्व फासीवाद’ के बारे में लिखती हैं और खुद को ‘मार्क्सवादी नारीवादी’ बताती हैं। कल्पना ने सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से हुई है। उनकी एक बेटी अनन्या है।

वामपंथी और भारत-विरोधी नेटवर्कों के साथ उनका जुड़ाव

कल्पना विल्सन का वामपंथी और भारत-विरोधी नेटवर्कों से जुड़ाव केवल अकादमिक लेखन तक सीमित नहीं है। वह नियमित रूप से ऐसे मंचों और अभियानों में शामिल होती रही हैं, जो भारत, भाजपा, आरएसएस और हिंदू संगठनों को फासीवादी, बहुसंख्यकवादी और दमनकारी के रूप में चित्रित करते हैं। साथ ही राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों और इससे जुड़े आरोपितों का समर्थन भी करती हैं।

लेस्टर हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराना

2022 में कल्पना विल्सन और उनकी मां अमृत विल्सन के साथ-साथ उनसे जुड़े ग्रुप ने ब्रिटेन के लीसेस्टर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराया। शहर में हिंदुओं के साथ हुई टारगेटेड हिंसा और धमकियों को मानने के बजाय, तनाव के लिए ‘हिंदुत्व’ को जिम्मेदार माना। उन्होंने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर भी प्रदर्शन किया, जिसे उन्होंने ब्रिटेन की राजनीति में हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव के रूप में वर्णित किया। लीसेस्टर हिंसा पर OpIndia की विस्तृत रिपोर्ट यहाँ देखी जा सकती है।

भारत से जुड़े मुद्दों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

यही नेटवर्क भारत से जुड़े कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल रहा है। उन्होंने पाकिस्तान का कर्ज माफ करने, भारत में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ, फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसे उन्होंने “त्रासदी को प्रचार में बदलना” बताया, भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया और 2002 के गुजरात हिंसा के विरोध में एक कैंडल मार्च निकाला, जिसे उन्होंने मोदी विरोधी नजरिए से पेश किया।

साम्यवादी राजनीति और पूँजीवाद पर हमले

कल्पना विल्सन की वैचारिक स्थिति ने भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर उनके लेखन को भी प्रभावित किया है। एक कम्युनिस्ट मार्क्सवादी के रूप में, उन्होंने भारत में पूँजीवाद का विरोध किया है और बड़े औद्योगिक घरानों पर असमानता फैलाने और हिंदुत्व के विकास में योगदान देने का आरोप लगाया है। उन्होंने आरएसएस, भाजपा और अन्य हिंदू समूहों को ‘पूँजीवादी समर्थक’ बताया है। उनके लेख कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, मार्क्सवादी लेनिनवादी मुक्ति (सीपीआई (एमएल)) की वेबसाइट पर प्रकाशित हुए हैं, जो वामपंथी राजनीतिक नेटवर्कों के साथ उनके संबंधों को और भी स्पष्ट करते हैं।

कर्नाटक में हिजाब विवाद पर क्या बोली कल्पना

कर्नाटक में हिजाब विवाद के दौरान, कल्पना विल्सन ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह मुस्लिम लड़कियों को केवल इसलिए कॉलेजों में दाखिले से वंचित कर रही है, क्योंकि वे हिजाब पहनकर अपनी आस्था व्यक्त करती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि मुस्लिम छात्राओं को इस्लाम विरोधी गिरोह तंज कसते हैं। मुस्लिम छात्राओं को परेशान किया जा रहा था। विवाद को लेकर उन्होंने जो लिखा, उसमें एक बार फिर भारत को अल्पसंख्यकों के प्रति शत्रुतापूर्ण देश के रूप में चित्रित करने की कोशिश की गई, जबकि बहस के कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया गया। कर्नाटक हिजाब विवाद का विस्तृत विवरण यहाँ देखा जा सकता है।

स्टेन स्वामी का समर्थन किया कल्पना ने

कल्पना विल्सन ने भी स्टैन स्वामी का समर्थन किया। स्टैन पर एनआईए ने प्रतिबंध लगा दिया था। सीपीआई (माओवादी) से जुड़ा जेसुइट पादरी है। स्वामी को एल्गर परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था और उन पर एक बड़े माओवादी षड्यंत्र का हिस्सा होने का आरोप लगा था। विल्सन का स्वामी को समर्थन करना उस व्यापक वामपंथी अभियान के अनुरूप था, जिसमें उन्हें मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पेश किया गया था। इस दौरान जाँच एजेंसी ने जो पादरी स्ट्रैन पर गंभीर आरोप लगाए, उसे कम करके आंका गया।

भारत-यूरोपीय यूनियन शिखर सम्मेलन में शामिल हुई

2021 में कल्पना विल्सन AIMC और द लंदन स्टोरी फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में वक्ताओं में से एक थीं। पैनल में आनंद ग्रोवर, क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलॉट, प्रद्युम्न जयराम, नोदीप कौर, रविंदर कौर, इंडियन काउंसिल ऑफ इंटरनेशनल मुस्लिम्स के उमैर खान, सीपीआई (एमएल) सदस्य कविता कृष्णन, हर्ष मंदर, निखिल मंडलपार्थ और हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की श्राव्या ताडेपल्ली, द लंदन स्टोरी फाउंडेशन की रितुम्ब्रा मनुवी, रकीब हामिद नाइक, करुणा नंदी, आकार पटेल, पामेला फिलिपोस, एन राम, मनु सेबेस्टियन, प्रतीक सिन्हा, अशोक स्वैन, ऑड्रे ट्रुश्के और रिचर्ड विल्सन सहित कई जाने-माने भारत-विरोधी वक्ता शामिल थे।

‘भारत नरसंहार के कगार पर: नरसंहार की रोकथाम’ पर चर्चा

कल्पना “भारत नरसंहार के कगार पर: नरसंहार की रोकथाम” शीर्षक वाले कार्यक्रम में एक वक्ता भी थीं। इस कार्यक्रम में ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन्स पार्टी के सदस्य डेविड शूब्रिज, जेनेट राइस और ली रियानन, द ह्यूमनिज्म प्रोजेक्ट के हारून कासिम, कंचा इलाइया शेफर्ड, सीपीआई (एमएल) सदस्य कविता कृष्णन, मैसी विश्वविद्यालय के मोहन दत्ता, पीटर फ्रेडरिक, आम आदमी पार्टी से जुड़े पूर्व आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार, तीस्ता सेतलवाद, आईएएमसी के राशिद अहमद, दिल्ली दंगों की आरोपी सफूरा जरगर, द पोलिस प्रोजेक्ट की सुचित्रा विजयन, आकार पटेल, रकीब हामिद नाइक, ऋतुम्ब्रा मनुवी, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की सुनीता विश्वनाथ और अंगना चटर्जी शामिल थे।

‘हिंदू विरोध’ को किया खारिज

एक दूसरे कार्यक्रम में कल्पना विल्सन और केवल भारडिया ने ‘हिंदू-विरोधी मिथक का पर्दाफाश, फासीवाद-विरोधी एकजुटता का निर्माण’ वाले टॉपिक में हो रही चर्चा में भाग लिया। इस दौरान, विल्सन ने कहा कि बांग्लादेश में मंदिरों पर हुए हमलों और हत्याओं को हिंदू-विरोधी भावना कहना ‘सही नहीं’ है। उन्होंने दावा किया कि दक्षिण एशिया में औपनिवेशिक काल से ही सांप्रदायिक और धार्मिक हिंसा होती है और भारत में हिंदुत्व के उदय और अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से हवा मिल गई है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि हिंदुओं पर हमले मुसलमानों और यहूदियों पर हमलों की तरह वैश्विक नहीं हैं।

विश्व स्तर पर हिंदुत्व के खिलाफ सम्मेलन का समर्थन किया

विल्सन ने ‘वैश्विक हिंदुत्व विघटन’ सम्मेलन का भी समर्थन किया, जो एक विवादास्पद आयोजन था और जिसने हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच अंतर करने का दावा किया। इसमें कई लोगों ने हिंदुत्व का विरोध करने की आड़ में हिंदू पहचान, हिंदू संगठनों और हिंदू सभ्यतागत दावों को प्रभावी ढंग से टारगेट करने वाले तर्क दिए।

‘वैश्विक हिंदुत्व का विघटन’ एक तीन दिवसीय सम्मेलन था, जिसे 45 से अधिक विश्वविद्यालयों के 60 से अधिक विभागों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इनमें से अधिकांश अमेरिका के थे। यह सम्मेलन सितंबर 2021 में आयोजित हुआ था। सम्मेलन से कई हिंदू विरोधी तत्व जुड़े हुए थे, जिनमें ऑड्रे ट्रुश्के , आनंद पटवर्धन और नंदिनी सुंदर शामिल थे।

द पोलिस प्रोजेक्ट और भारत-विरोधी कश्मीरी विचारों का संबंध

2019 में द पोलिस प्रोजेक्ट के साथ एक बातचीत में कल्पना विल्सन ने ‘हिंदू फासीवाद’ और हिंदुत्व विचारधारा के बारे में बात की। द पोलिस प्रोजेक्ट अपने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इसकी सह-संस्थापक सुचित्रा विजयन कश्मीर पर अलगाववादी विचारों का समर्थन करती रही हैं और ऐसे मंचों पर दिखाई देती रही हैं, जहाँ पाकिस्तान समर्थित भारत-विरोधी आवाजें भी मौजूद रही हैं। इंटरव्यू में विल्सन ने अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने का विरोध किया और दावा किया कि संवैधानिक परिवर्तनों के बाद बाहरी लोग जमीन खरीदकर कश्मीर को लूट रहे हैं।

अनुच्छेद 370, कोविड लॉकडाउन और फासीवाद के आरोप

कश्मीर पर उनके विचार अलगाववादियों और वामपंथी संगठनों की ‘आवाज’ लग रहे थे। उनके शब्दों और भाषा काफी मिलते-जुलते लग रहे थे। 2020 में भारत में कोविड लॉकडाउन के वक्त उन्होंने ‘अधिकारों का दमन, नफरत को बढ़ावा: भारत में फासीवाद और कोविड-19’ शीर्षक से एक लेख लिखा।

इसमें विल्सन ने मोदी सरकार पर महामारी का इस्तेमाल धार्मिक और जाति आधारित नफरत को भड़काने के लिए करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करके, भारत इजरायली शैली के ‘बस्तीवादी उपनिवेशवाद’ के माध्यम से कश्मीर पर ‘कब्जा’ कर रहा है और आंशिक इंटरनेट बंद करके कश्मीरियों को आधारभूत जानकारियों से भी महरूम किया जा रहा है।

मोदी सरकार पर बार-बार हमले

उनके लेखन में बार-बार मोदी सरकार को फासीवादी और हिंदू वादी बताया गया। अपने लेख में उन्होंने दावा किया कि भारत में महामारी ने वामपंथियों के बीच पहले से मौजूद इस धारणा की पुष्टि कर दी है कि यह शासन फासीवाद का एक ऐसा रूप है जिसमें हिंदू वर्चस्ववाद और नवउदारवाद आपस में जुड़े हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि महामारी के दौरान मोदी सरकार का मुख्य उद्देश्य वायरस को अपने वैचारिक अभियान के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना था।

उमर खालिद के लिए समर्थन और यूएपीए को खत्म करने की माँग

कल्पना विल्सन ने 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के आरोपित उमर खालिद का समर्थन किया । खालिद को अदालतों ने जमानत देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि अदालतों ने पूर्व नियोजित साजिश और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के दौरान अशांति फैलाने के प्रयास का हवाला दिया है।

विल्सन ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम को निरस्त करने की मांग की है और उमर खालिद समेत तथाकथित राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की है। बड़े षड्यंत्र में उमर खालिद की भूमिका का विवरण यहां देखा जा सकता है और 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों का विवरण यहां देखा जा सकता है ।

स्वच्छ भारत अभियान पर हमला

भारत सरकार के कल्याणकारी और विकास योजनाओं पर भी कल्पना विल्सन ने हमला किया था। 2017 में उन्होंने लिंचिंग, विकास और स्वच्छ भारत अभियान के बीच एक अजीबोगरीब तुलना की और दावा किया कि स्वच्छ भारत मिशन गरीबों के साथ क्राइम था। यह टिप्पणी स्वच्छता और जन कल्याणकारी योजनाओं पर उनकी सोच को दर्शाता है।

एसएएसएफ पैनल और कश्मीर को ‘आजाद’ करने की पैरवी

CPI(ML) ने लंदन के SOAS में दक्षिण एशिया एकजुटता समूह (SASG) द्वारा आयोजित “फासीवाद का प्रतिरोध, एकजुटता का निर्माण, भारत-कश्मीर और उससे आगे” शीर्षक वाली एक चर्चा में हिस्सा लिया था। 2019 में आयोजित इस कार्यक्रम में कविता कृष्णन, दिब्येश आनंद, अमृत विल्सन, कल्पना विल्सन, सतपाल मुमा, सज्जाद हसन, राजरत्न अंबेडकर, निताशा कौल समेत कई लोगों ने भाग लिया। CPI(ML) के लेख में कश्मीर को ‘आजाद’ करने की वकालत की गई। विल्सन को एक बार फिर उस तंत्र में शामिल किया गया, जो नियमित रूप से भारत के आंतरिक मामलों का अंतर्राष्ट्रीयकरण करता है और अलगाववादी विचारों को बढ़ावा देता है।

चंदन गुप्ता हत्याकांड के फैसले में एनआईए की अदालत ने एसएएसजी की निंदा की। कोर्ट ने एलायंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी (न्यूयॉर्क), सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (मुंबई), इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (वाशिंगटन डीसी), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (नई दिल्ली), रिहाई मंच (लखनऊ), साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप (लंदन) और यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (नई दिल्ली) सहित कुछ गैर-सरकारी संगठनों के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की।

कोर्ट ने कहा, “सांप्रदायिक भावना वैचारिक स्तर पर सूक्ष्म रूप से घुसपैठ करती है और अक्सर ऐसे गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्टों और हस्तक्षेपों के माध्यम से प्रकट होती है। इस अदालत ने अक्सर देखा है कि जब राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपियों को मुकदमे के लिए लाया जाता है, तो इन गैर-सरकारी संगठनों से कथित तौर पर जुड़े कुछ वकील वकालतनामा लेकर उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए पहले से ही मौजूद होते हैं।” अदालत ने इन गैर-सरकारी संगठनों के फंडिंग पर भी सवाल उठाए।

सीपीआई (एमएल) की प्रशंसा और एनआईए पर आरोप

2014 में द गार्जियन में छपे लेख में कल्पना विल्सन ने बिहार के एक गाँव में CPI(ML) की चुनाव में जीत की प्रशंसा की। इसका शीर्षक था ‘सिर्फ भारत के मध्यम वर्ग को ही नरेंद्र मोदी से समस्या नहीं है ‘। लेख में उन्होंने पटना विस्फोटों के बाद मोदी की रैली के दौरान हुई गिरफ्तारियों के संबंध में भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) पर गंभीर आरोप लगाए। इसमें दावा किया गया कि मुस्लिम युवकों को हिरासत में लेकर उनसे झूठे बयान निकलवाने के लिए उन्हें प्रताड़ित किया गया। ये आरोप बिना किसी विश्वसनीय सबूत के लगाए गए थे।

कम्युनिस्ट वेबसाइट के लिए लेखन

कम्युनिस्ट वेबसाइट सैल्वेज के लिए ‘हेज फंड, प्रचार और हिंदू फासीवाद’ शीर्षक से लिखे एक लेख में विल्सन ने आरएसएस, गौ संरक्षण समूहों, जाति व्यवस्था, गुजरात 2002 की घटना, गरीबी, कुपोषण, पूंजीवाद और ब्रिटिश उपनिवेशवाद को जोड़कर हिंदुत्व पर हमला किया। इसी लेख में उन्होंने हिंदुत्व को औपनिवेशिक, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक और पुरुषवादी बताया और दावा किया कि यह हिंदू धर्म को एकरूप करने का प्रयास है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदुत्व में उन हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों को नष्ट करना शामिल है, जिनकी उत्पत्ति स्वदेशी धर्मों या दलितों द्वारा पूजे जाने वाले धर्मों से हुई है।

भारत के खिलाफ अभियानों पर हस्ताक्षर किया था विल्सन ने

कल्पना विल्सन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों और कर्मचारियों पर कथित हमलों की निंदा करने वाले पत्रों पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक हैं। उन्होंने रोहित वेमुला मामले का मुद्दा उठाया और महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को लेकर केन्द्र सरकार की आलोचना की। उनकी सक्रियता, लेखन और सार्वजनिक भागीदारी भारत, मोदी सरकार, हिंदू संगठनों और हिंदुत्व के विरुद्ध है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे वामपंथी, इस्लामी विचारधारा से जुड़े और भारत विरोधी संगठनों के साथ एकजुटता दिखाती हैं।

कल्पना विल्सन की मां का ओसीआई कार्ड रद्द, दिल्ली उच्च न्यायालय से कोई राहत नहीं

कल्पना विल्सन की मां अमृत विल्सन के भारत विरोधी रुख के कारण ओसीआई विशेषाधिकार खत्म हो गए थे। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोर्ट ने इस मामले में यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि न्यायालय देश को बदनाम करने की इजाजत नहीं दे सकता। विल्सन ने भारत सरकार की नीतियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है।

उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का विरोध किया है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की कड़ी आलोचना की है। अक्सर उन्हें फासीवादी कहा है।

गौरतलब है कि एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी या एनपीआर के कार्यान्वयन के लिए कोई परिचालन नियम अधिसूचित नहीं किए गए। घरेलू राजनीति की आलोचना के अलावा, विल्सन ने अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में भी भाग लिया है जहाँ भारत के विधायी उपायों को इस्लामोफोबिक और ‘जातीय सफाई’ की दिशा में उठाया गया कदम बताया गया।

उन्होंने लीसेस्टर में हुई अशांति के संबंध में भी बयान दिए। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस समर्थकों को हिंसा भड़काने और हिंदुओं को पीड़ित के रूप में पेश करने की कहानी को मजबूत करने के लिए वहाँ भेजा गया था। इन दावों का कई संगठनों और लेखकों ने कड़ा विरोध किया। साथ ही, हिंदू घरों और मंदिरों पर इस्लामी भीड़ के हमले को सबूत के तौर पर पेश किया।

विल्सन ब्रिटेन स्थित दक्षिण एशिया एकजुटता समूह से जुड़ी रही हैं। इसने भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन किए और सोशल मीडिया पर भाजपा और आरएसएस की आलोचना की। इस समूह ने कश्मीर में हो रहे घटनाक्रमों को अलगाववादी विचारों से मेल खाने वाले नजरिए से पेश किया है और भारत को ‘आक्रामक देश’ के रूप में पेश करने की कोशिश की।

अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद अलगाववादी अभियानों से जुड़े प्रतीकात्मक चित्रों का उपयोग करके उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी। इस तरह से देखा जाए तो माँ और बेटी दोनों का भारत विरोधी गतिविधियों का लंबा इतिहास रहा है।

मुख्य न्यायाधीश के प्रति नाराजगी को एक अलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। कल्पना की उपस्थिति ही उनके इतिहास और पूर्व बयानों को देखते हुए उनके इरादों को बयाँ करती हैं।

(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया लेख है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ममता बनर्जी का ‘दारू घोटाला’: 55 होलसेलर बाहर, चुनिंदा बिचौलियों की एंट्री; पढ़ें- कैसे WBSBCL मॉडल ने पैदा किया ‘शराब सिंडिकेट’

दिल्ली की पूर्व केजरीवाल सरकार की शराब नीति के बाद अब पश्चिम बंगाल की 2017 में लागू नई आबकारी नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है। राज्य की तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) का गठन किया गया।

एजेंसी ने राज्य के सभी 55 प्राइवेट शराब होलसेलर्स की जगह लेकर शराब वितरण पर सीधा राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इसने वितरण और थोक विक्रेता दोनों के रूप में काम करने की कोशिश की, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुआ। खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वसूले गए।

दरअसल टीएमसी सरकार के कार्यकाल में हुए राज्य में शराब व्यापार से जुड़ी एक रिपोर्टें सामने आई है। इसमें उत्पाद शुल्क विभाग के एक गोपनीय दस्तावेज से पता चलता है कि शराब वितरण नेटवर्क का इस तरह से पुनर्गठन किया गया था, जिससे कुछ खास प्राइवेट शराब विक्रेताओं को लाभ हुआ और इस तरह सिस्टम काम कर रहा था, जिससे उनका एकाधिकार स्थापित हुआ।

रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 में शराब वितरण नीति में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारे पर ये बदलाव किए गए।

ऑपइंडिया को एक रिपोर्ट की कॉपी मिली है, जिसमें दावा किया गया है कि नए सिस्टम में धीरे-धीरे थोक वितरण के पुराने मॉडल को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह ऐसी व्यवस्था की गई जिससे चुनिंदा बिचौलियों की शराब वितरण के सिस्टम में एकाधिकार हो गया।


इससे पता चलता है कि जिसे आधिकारिक तौर पर शराब वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह वास्तव में निजी बोतलबंद शराब विक्रेताओं और शराब निर्माताओं से पैसा वसूलने का एक सिस्टम बन गया।

आबकारी विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें इन बदलावों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लागू हुए राज्य की नई आबकारी नीति के बाद शराब निर्माताओं से उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीका बदल गया। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मुक्त प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत वितरण के पारंपरिक सिद्धांतों को एक कड़े नियंत्रण वाले नेटवर्क से बदल दिया गया, जिसने कुछ चुनिंदा वितरकों के हाथों में पूरा सिस्टम आ गया।

टीएमसी ने शराब वितरण की पूरी प्रक्रिया को सेंट्रलाइज कर दिया

रिपोर्ट में एक चार्ट दिखाया गया है, जो बताता है कि शराब उत्पाद पारंपरिक रूप से बाजार में कैसे पहुँचते थे और पिछली ममता सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में यह प्रणाली कैसे विकसित हुई।

(रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट)

यह चार्ट निर्माता के गोदाम यानी ‘मदर गोदाम’ से शुरू होता है, जहाँ से उत्पाद कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी (C&FA) को भेजे जाते हैं। C&FA माल को सिस्टम में आगे बढ़ने से पहले भंडारण और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में कार्य करती है।

वहाँ से उत्पाद आमतौर पर वितरकों या सुपर स्टॉकिस्टों को आपूर्ति किए जाते हैं। ये वितरक कंपनी के अधिकृत व्यावसायिक भागीदार होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं तक कैसे पहुँचे।

यह चार्ट दर्शाता है कि वितरक, निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे बिक्री टीमों का प्रबंधन करते हैं, बाजार से ऑर्डर प्राप्त करते हैं, स्टॉक की आवाजाही को संभालते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद सभी खुदरा दुकानों पर उपलब्ध हों। कई उद्योगों में, वितरक खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं को लोन भी मुहैया कराते हैं, जिससे बाजार में नकदी की कमी नहीं होती है।

थोक विक्रेता इस सिस्टम में एक और अहम कड़ी हैं। वे वितरकों से थोक में उत्पाद खरीदते हैं और फिर उनको खुदरा विक्रेताओं तक छोटी-छोटी खेप में पहुँचाते हैं। छोटे विक्रेताओं का लाभ खरीद मूल्य और उपभोक्ताओं को बेचने के मूल्य में अंतर से मिलता है।

एक बाजार के निर्माण में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। कई बार वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा भी बाजार को मिलता है।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में किए गए बदलावों ने वितरण व्यवस्था पर एक छोटे- से ग्रुप का कब्जा हो गया। प्रतिस्पर्धा कम हो गया और उनका एकाधिकार होने से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का उन्हें अवसर मिला। इसकी वजह से पारंपरिक बाजार सिद्धांतों को काफी नुकसान हुआ।

वितरक और थोक विक्रेता क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रिपोर्ट में वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच अंतर को विस्तार से बताया गया है। वितरक आम तौर पर निर्माताओं के साथ समझौते करते हैं और आधिकारिक चैनल पार्टनर के रूप में कार्य करते हैं। वितरक न केवल उत्पादों की बिक्री के लिए बल्कि उनकी मार्केटिंग, आपूर्ति नेटवर्क के रखरखाव और बाजार तक पहुँच के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। वे आमतौर पर बड़े क्षेत्रों में काम करते हैं और खुदरा विक्रेताओं, थोक विक्रेताओं और कभी-कभी सीधे उपभोक्ताओं से भी संपर्क करते हैं।

दूसरी ओर, थोक विक्रेता मुख्य रूप से बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदते हैं और उन्हें खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं। वे मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं ,जिनका उद्देश्य भंडारण, प्रबंधन और थोक खरीद के माध्यम से लाभ कमाना होता है। वितरक आमतौर पर वितरण से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को वहन करते हैं, जबकि थोक विक्रेता माल की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लागू किए गए शराब वितरण सुधारों ने इन भेदों को धुंधला कर दिया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जो स्थापित व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

2017 में सरकार द्वारा नियंत्रित वितरण संरचना में बदलाव

2017 को पश्चिम बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीएसबीसीएल) का गठन हुआ, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी थी और जिसने राज्य में पैकेटबंद शराब के थोक वितरण का कार्यभार संभाला। डब्ल्यूबीएसबीसीएल के माध्यम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने शराब के कारोबार में कदम रखा।

(रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉर्ट)

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अस्तित्व में आने से पहले, थोक वितरण का काम बड़े पैमाने पर 1909 के बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत संचालित निजी लाइसेंस धारकों द्वारा किया जाता था। ये निजी थोक विक्रेता निर्माताओं से उत्पाद खरीदते थे और उन्हें पूरे राज्य में खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति करते थे।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन के बाद निगम शराब खरीदने वाला और वितरण करने वाला दोनों बन गया। इसने पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से शराब खरीदना शुरू किया और इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 5200 खुदरा दुकानों को बेचना शुरू किया।

बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 20 के तहत शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन विदेशी शराब क्षेत्र के कई आपूर्तिकर्ता कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं के बजाय केवल पंजीकृत ब्रांड मालिक या आयातक के रूप में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें निगम को उत्पाद बेचने और बिल जारी करने की अनुमति दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जो अधिनियम की भावना के विपरीत थी।

खुदरा विक्रेताओं और निर्माताओं ने शिकायत क्यों की?

रिपोर्ट में नए मॉडल से उत्पन्न होने वाले कई परिचालन और वित्तीय गड़बड़ियों के बारे में बताया गया है।

एक अहम शिकायत ऋण सुविधाओं के अभाव से संबंधित थी। पूर्व की निजी थोक प्रणाली के तहत खुदरा विक्रेताओं को अक्सर उधार पर उत्पाद प्राप्त होते थे। इससे उन्हें बड़ी अग्रिम राशि का भुगतान किए बिना स्टॉक बनाए रखने की सुविधा मिलती थी।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अधिग्रहण के बाद खुदरा विक्रेताओं को कथित तौर पर खरीद की पूरी लागत अग्रिम रूप से चुकानी पड़ी। चूँकि शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का लगभग 70-80% हिस्सा करों और शुल्कों का होता है, इसलिए इससे खुदरा विक्रेताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इस बदलाव के कारण सप्लाई चेन में पूँजी की कमी हुई। छोटे खुदरा विक्रेता विशेष रूप से प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें अब लोन से मदद नहीं मिल रही थी, बल्कि ज्यादा निवेश करना पड़ रहा था। इसकी वजह से बाजार में कथित तौर पर गिरावट आई और राजस्व प्रभावित हुआ।

भंडारण से जुड़ी समस्या

रिपोर्ट में निगम के भंडारण और लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढाँचे को लेकर सवाल किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, WBSBCL राज्य भर में दर्जनों डिपो संचालित करता था, जिनमें देसी शराब, विदेशी शराब और बीयर के डिपो शामिल थे। हालाँकि इनमें से कई डिपो अस्थायी थे और उनमें अग्नि सुरक्षा सहित दूसरी सुविधाएँ नहीं थी।

माल लादने और उतारने का काम अक्सर स्थानीय मजदूर करते थे, जिससे लागत में अंतर और परिचालन में दिक्कत होती थीं। रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि स्थानीय गिरोह इन गतिविधियों पर ‘नजर’ रखते थे।

इन्वेंट्री प्रबंधन भी एक प्रमुख मुद्दा बन गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम अक्सर ‘फर्स्ट इन, फर्स्ट आउट’ (एफआईएफओ) सिद्धांत का पालन करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप स्टॉक पुराना हो गया और भंडारण संबंधी जटिलताएँ पैदा हुईं।

गोदामों में जगह की कमी के कारण आपूर्ति की मंजूरी पर प्रतिबंध लग गए, खासकर त्योहारों और ऐसे वक्त पर जब शराब की खपत आमतौर पर बढ़ जाती है।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि प्रतिस्पर्धी निजी वितरण नेटवर्क के दौरान ऐसी दिक्कत पैदा नहीं होती थी। डब्ल्यूबीएसबीसीएल ने एक साथ वितरक और थोक विक्रेता दोनों के रूप में कार्य करने का प्रयास किया। रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि सरकारी निगम की संरचना व्यावसायिक नहीं थी।

जाँच के निष्कर्ष में ये बताया गया है कि डब्ल्यूबीएसबीसीएल ने वितरक और थोक विक्रेता दोनों के रूप में एक साथ काम करने का प्रयास किया, जबकि उसने इन दोनों भूमिकाओं से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को नहीं उठाया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि चूँकि निगम निजी वितरक की तरह शराब को बढ़ावा नहीं दे सकता था, इसलिए निर्माताओं को अलग-अलग प्रचार एजेंटों को नियुक्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसी प्रकार, उन्हें माल के लिए स्वतंत्र ट्रांसपोर्ट एजेंटों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसमें निर्माता कई ऐसी संस्थाओं पर निर्भर थे, जो न तो वितरण चैनल से जुड़ी हुई थी और न ही पारंपरिक शराब व्यापार ढाँचे के तहत सीधे तौर पर जवाबदेह थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सप्लाई चेन को आसान बनाने के बजाय इस सिस्टम ने और इसे जटिल बना दिया।

मोनोपॉली की शुरुआत

रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूबीएसबीसीएल के आने से हालात बदल गए। नई नीति के माध्यम से टीएमसी सरकार ने शराब निर्माताओं और बॉटलर्स को बाध्य किया कि वे केवल WBSBCL के नियुक्त वितरकों के माध्यम से ही व्यापार करें। व्होलसेलर्स की जगह आए नए वितरकों पर आरोप लगे कि वे बॉटलर्स से अनुचित दरें वसूलते थे। प्रत्येक क्रेट पर गोडाउन रेंटल (₹4) और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट (₹3) के नाम पर भारी रकम वसूली गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वितरकों को मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा राज्य के राजस्व खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर टीएमसी नेताओं को जाता था। रिपोर्ट के हवाले से आरोप लगाए गए कि यह पूरी अवैध वसूली सिंडिकेट के जरिए सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के करीबी परिसरों, जैसे- 9, कैमक स्ट्रीट, कोलकाता तक पहुँचाई जाती थी।

रिपोर्ट के अनुसार, “विकेंद्रीकृत व्यवसाय, निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और बहु-आपूर्ति बिंदुओं की अवधारणा ने एकाधिकारवादी व्यवसाय मॉडल को जन्म दिया।”

बोतल बनाने वाली कंपनियों पर सिस्टम में शामिल होने का दबाव

रिपोर्ट और संबंधित विवरणों में यह भी दावा किया गया है कि नई व्यवस्था का विरोध करने वाले बोतल निर्माताओं को काफी दबाव का सामना करना पड़ा। इसका उदाहरण अक्सर आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के रूप में दिया जाता है। कंपनी ने उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को कई पत्र लिखकर गैरकानूनी हस्तक्षेप और दबाव को लेकर चिंता व्यक्त की।

एक पत्र में, कंपनी ने कहा कि उसने ‘कुछ उत्पाद शुल्क अधिकारियों द्वारा अवैध हस्तक्षेप’ के संबंध में बार-बार चिंता व्यक्त की थी, जो उनसे गैरकानूनी माँग पूरा नहीं करने पर परेशान कर रहे थे।

कंपनी ने आगे अनुरोध किया कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाए और कार्रवाई की जाए।

कंपनी ने लिखा, हमें पूरा विश्वास है कि आपने उठाए गए मुद्दों पर आवश्यक जाँच की होगी। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि कृपया जाँच में मिले तथ्यों और इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को हमारे साथ साझा करें।

पत्र में लिखा था, “इसके अतिरिक्त, हम आपके ध्यान में लाना चाहेंगे कि हमारे पूर्व पत्रों में उठाए गए मुद्दों और जैसा कि पहले ही सूचित किया जा चुका है, यह व्यवस्था पूरी तरह से आपके निर्देशों के आधार पर की गई है, और जिसके तहत हमें इस संबंध में आपके द्वारा की गई गतिविधियों के बारे में नई सरकार को सूचित करने के लिए कदम उठाने पड़े हैं,”

रिपोर्ट में उन 5 अधिकारियों के नाम बताए गए हैं जो डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन की दिशा में नीतिगत ढाँचे को तैयार करने में शामिल थे। इनमें पूर्व विशेष आयुक्त (राजस्व) और महाप्रबंधक (संचालन) गौतम घोष, वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त शांतनु आचार्य, उपायुक्त संचयन गांगुली, अतिरिक्त आयुक्त राजर्षि चक्रवर्ती और विशेष आयुक्त कुनास बिस्वास शामिल थे।

इन अधिकारियों ने नई नीति संरचना को तैयार करने और उसे मंजूरी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रिपोर्ट में सबसे गंभीर आलोचना दो स्तरीय उत्पाद शुल्क संग्रह प्रणाली की शुरुआत से जुड़ा है।

पहले, शुल्क का संग्रह मुख्य रूप से विनिर्माण चरण में होता था, जिसे आम तौर पर राजस्व संग्रह का सबसे सुरक्षित और सबसे कुशल तरीका माना जाता है। नए मॉडल में शुल्क संग्रह को विनिर्माण चरण और वितरक चरण के बीच विभाजित किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप राजस्व प्राप्ति में देरी हुई और वितरण नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हुआ, क्योंकि वितरक अक्सर अतिरिक्त शुल्क वक्त पर जमा करने में विफल रहते थे। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे न केवल प्रणाली जटिल हो गई बल्कि राजस्व दक्षता भी कमजोर हो गई।

दरअसल आबकारी विभाग की गोपनीय रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में शराब वितरण नेटवर्क के विकास का विस्तृत और विवादास्पद विवरण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे 2017 के बाद पूर्व टीएमसी सरकार के शासनकाल में प्रतिस्पर्धी थोक मॉडल से यह एक कड़े नियंत्रण वाली प्रणाली में परिवर्तित हो गया।

रिपोर्ट के निष्कर्षों के केंद्र में एकाधिकार, अत्यधिक नियंत्रण, परिचालन संबंधी अक्षमता और निर्माताओं और बोतलबंद विक्रेताओं से जबरन वसूली करने वाली वसूली शामिल है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन ने पारंपरिक वितरण चेन को बदल दिया गया, जिससे विकेंद्रीकृत प्रतिस्पर्धा की जगह एक ऐसी संरचना बन गई, जिसने शक्ति को कुछ बिचौलियों के हाथों में केंद्रित कर दिया।

इसमें आगे कहा गया है कि इस मॉडल ने न केवल व्यवसायों और खुदरा विक्रेताओं के लिए लागत बढ़ाई, बल्कि शराब व्यापार पर राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप के अवसर भी पैदा किए।

(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चाँदनी कुरैशी के ‘जिम जिहाद’ का शिकार बना करोड़पति हिंदू कारोबारी का बेटा: रहमान बना किया निकाह, पीड़ित पिता बोले- पूरे परिवार को मुस्लिम नहीं बनने पर हत्या की दे रहे धमकी

उत्तर प्रदेश के शामली जिले से धर्म परिवर्तन और ‘जिम जिहाद’ का मामला सामने आया है। यहाँ जिम ट्रेनर चाँदनी कुरैशी ने करोड़पति दवा कारोबारी के 27 साल के बेटे को ब्रेनवॉश कर धर्म परिवर्तन करवा दिया। जाट परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवक आयुष मलिक को मुस्लिम बना दिया गया। उसका नाम बदलकर रहमान रख दिया और हुलिया भी मुस्लिम जैसा करवा दिया गया। अब आयुष की दाढ़ी बढ़ी हुई है, वह सफेद टोपी पहनने लगा है। आसपास के लोगों का कहना है कि अब वह नमाज अदा भी करता है।

इस मामले में आयुष के पिता दवा कारोबारी देवराज मलिक ने पुलिस से शिकायत की है। शिकायत में बताया कि पिछले 5 साल से लगातार आयुष से चाँदनी और उसका परिवार भी आयुष से मोटी रकम हड़प चुका है, इसी पैसों से वो अपना घर भी बनवा चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साजिश के तहत कारोबारी के बेटे आयुष को फँसाया गया है, इसके पीछे पाकिस्तानी कनेक्शन भी सामने आया है। मामले का खुलासा बघरा स्थित योग साधना यशवीर आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज के वीडियो के बाद हुआ है।

स्वामी यशवीर महाराज की वीडियो के बाद हिंदू संगठन ने विरोध शुरू किया। हिंदू संगठन ने दवा कारोबारी देवराज मलिक के घर जाकर मामले का संज्ञान लिया। इस पर देवराज मलिक ने बताया कि उनका परिवार सनातनी है और हिंदू रीति-रिवाज ही मानता है। उन्होंने बताया कि लेकिन उनके बेटे को जिम ट्रेनर चाँदनी ने फँसाकर मुस्लिम बना दिया है। फिर हिंदू संगठन की सहायता से उन्होंने शनिवार (06 जून 2026) को पुलिस थाने में 3 मौलवियों समेत 10 लोगों पर FIR दर्ज करवाई। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है।

जिम में कारोबारी के बेटे को साजिश के तहत प्रेमजाल में फँसाया

यह मामला शामली के सदर कोतवाली क्षेत्र का है। यहाँ दयानंद नगर में रहने वाले दवा कारोबारी और जिला केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष देवराज मलिक अपने परिवार के साथ रहते हैं। परिवार में एक बेटी की शादी नोएडा में हुई है। वहीं 27 साल के इकलौते बेटे आयुष मलिक ने ‘बी-फार्मा’ की पढ़ाई कर अपना मेडिकल स्टोर चलाता है।

पाँच साल पहले आयुष ने ‘कुरैशी प्लस’ जिम जाना शुरू किया। इसी जिम में कुरैशी बस्ती की रहने वाली 25 साल की चाँदनी कुरैशी ट्रेनर है। आयुष के पिता देवराज ने FIR में बताया कि चाँदनी ने साजिश के तहत उनके बेटे को प्रेमजाल में फँसाया और फिर धर्म परिवर्तन के लिए ब्रेनवॉश किया। पिता ने कहा कि बेटे को मुस्लिम बनने के लिए मजबूर किया गया।

फर्जी निकाहनामा दिखाकर कारोबारी के बेटे से मोटी रकम हड़पी

आयुष के पिता का आरोप है कि करीब 4 साल पहले चाँदनी और उसके परिवार ने चोरी-छिपे आयुष से निकाहनामा पढ़वा लिया था। इसके बाद आयुष का नाम बदलकर ‘रहमान’ रख दिया गया। पिता देवराज ने इस निकाहनामे को फर्जी बताया है और कहा कि इसे दिखाकर आरोपितों ने उनके बेटे से मोटी रकम हड़पी है और ब्लैकमेल कर अपनी बातें मनवाई हैं।

(फोटो: FIR की कॉपी)

पिता ने आरोप लगाया कि चाँदनी और उसका परिवार पिछले 5 सालों से उनके बेटे की कमाई ऐंठ रहे हैं और उस पैसे से अपना घर भी बना चुके हैं। पिता का कहना है कि बेटे के पैसों से चाँदनी और उसका परिवार ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहे हैं।

दाढ़ी बढ़वाई और सफेद टोपी पहनी, आयुष ने रखा रहमान वाला हुलिया

पिछले 6 महीनों से आयुष का रहन-सहन ‘रहमान’ जैसा हो गया है। वह मुस्लिम तौर-तरीकों को मानने लगा है। यहाँ तक कि वह अपना हुलिया भी मुस्लिम की तरह बना चुका है। आयुष ने दाढ़ी बढ़वा ली है। उसको सफेद टोपी और कुर्ता-पायजमा पहनकर देखा गया है। इसी हुलिये में वह मेडिकल स्टोर पर बैठता है।

आयुष की एक तस्वीर भी सामने आई है। इसमें वह मस्जिद में नमाज पढ़ते नजर आ रहा है। मेडिकल स्टोर की भी एक तस्वीर देखी गई है, जिसमें वह सफेद टोपी और कुर्ता-पायजामा पहने हुए हैं। आयुष के बदलते व्यवहार से परिजन परेशान हैं। आयुष के पिता ने कहा है कि बेटे को मानसिक रूप से प्रभावित किया गया है।

धर्म परिवर्तन के मामले में ‘पाकिस्तानी कनेक्शन’

पुलिस की जाँच में पूरे मामले का पाकिस्तानी कनेक्शन भी सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, आयुष का ब्रेनवॉश करने के लिए उसे इस्लामी कट्टरपंथ से जोड़ा गया था। उसके मोबाइल पर कट्टरपंथी वक्ता डॉ. इसरार अहमद के यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब कराया गया था। आयुष को लगातार डॉ. इसरार अहमद का कट्टरपंथी जहर सुनाया जाता था, जिससे उसकी सोच इस्लाम के प्रति प्रभावित होने लगी।

आयुष के कारोबारी पिता ने बाहरी सहायता के लगाए आरोप, संपत्ति हड़पने की जताई चिंता

कारोबारी पिता ने यह भी कहा कि आरोपितों ने आयुष के साथ-साथ उनके परिवार के अन्य सदस्यों का भी धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया। पुलिस से शिकायत में पिता ने चिंता जताई है कि भविष्य में आरोपितों द्वारा उनकी संपत्तियों पर कब्जा किया जा सकता है। इतना ही पिता ने आरोप लगाया कि उन्हें इन इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा जान से मारने की धमकियाँ दी गईं इसीलिए उन्हें और उनके परिवार को जान का भी खतरा बना हुआ है।

(फोटो: FIR की कॉपी)

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चाँदनी और उसका परिवार अकेला नहीं है। इस हरकत में पूरा नेटवर्क जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि उन्हें बाहरी लोगों से सहायता मिल रही है। हालाँकि, कारोबारी पिता ने किसी भी अन्य संगठन का नाम नहीं लिया है। पुलिस से शिकायत करते हुए पिता ने आरोपितों से सुरक्षा और सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग की है।

3 मौलवियों समेत 10 लोगों के खिलाफ FIR

आपबीती सुनाते हुए कारोबारी देवराज मलिक ने मुस्लिम बन चुके बेटे आयुष के लिए न्याय की माँग की है। इसी के साथ उन्होंने काजीवाड़ा मोहल्ले की रहने वाली जिम ट्रेनर चाँदनी कुरैशी, उसकी बहन राहिल कुरैशी, सुमाईला कुरैशी, राबिया कुरैशी, भाई आस मोहम्मद, हुमा कुरैशी, उसके अब्बा इस्लाम कुरैशी, मौलवी सलीम, मुनव्वर और एक अज्ञात के खिलाफ FIR दर्ज करवाई है।

(फोटो: FIR की कॉपी)

पिता ने कहा कि वह सनातनी हैं और उनका पूरा परिवार हिंदू धर्म ही मानता है। उनका कहना है कि वे रोजाना हनुमान मंदिर में पूजा करने भी जाते हैं। लेकिन इन लोगों ने उनके बेटे आयुष को बहला-फुसलाकर मुस्लिम बना दिया और अब इन लोगों के खिलाफ पुलिस से कार्रवाई की माँग की है।

पुलिस ने नामजद लोगों के खिलाफ धर्मांतरण, धोखाधड़ी, जालसाजी, जबरन वसूली, संगठित अपराध, आपराधिक धमकी के आरोपों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 318(4), 336(3), 338, 61(2), 351(3), 308(5),3, 5(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है।

पुलिस ने चाँदनी और उसके अब्बा इस्लाम कुरैशी को भेजा जेल

पूरे मामले में शामली के पुलिस अधीक्षक (SP) एनपी सिंह ने बताया कि पीड़ित परिवार की शिकायत के आधार पर धर्मांतरण, अवैध वसूली और धमकी देने सहित विभिन्न धाराओं में कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपित चाँदनी और उसके पिता इस्लाम कुरैशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

पुलिस ने बताया कि इस साजिश में आजाद चौक स्थित कादियां मस्जिद के पास के मौलवी मुनव्वर और अज्ञात की भूमिका की भी जाँच की जा रही है। फिलहाल चाँदनी का भाई और बहन फरार चल रहे हैं, जिनकी गिरफ्तारी के लिए टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए एसपी ने SIT का गठन किया है।

स्वामी महाराज ने उठाया था पूरा विवाद

यह पूरा मामला बघरा स्थित योग साधना यशवीर आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज के वीडियो के बाद सामने आया है। कुछ दिनों पहले स्वामी यशवीर महाराज ने वीडियो जारी कर चिंता जताई थी कि मेडिकल स्टोर संचालक आयुष मलिक को मुस्लिम युवती चाँदनी कुरैशी ने फँसा लिया है, और उनकी मुस्लिम पहचान बना दी है।

तब स्वामी महाराज ने आरोप लगाया कि युवक का धर्मांतरण दबाव में कराया गया और इस पूरे प्रकरण में शामिल लोगों की भूमिका की जाँच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि युवक के माता-पिता के धर्मांतरण की सूचनाएँ भी उन्हें मिली हैं। हालाँकि, FIR में आयुष के पिता ने साफ कर दिया कि उनका पूरा परिवार सनातनी है।

स्वामी यशवीर महाराज ने उत्तर प्रदेश सरकार और शामली पुलिस प्रशासन से मामले की जाँच कर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो इस मुद्दे को लेकर आंदोलन और धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। इसके बाद हिंदू संगठन ने इसका विरोध किया और फिर आयुष के पिता ने पुलिस थाने में जाकर FIR दर्ज करवाई।

‘राम मंदिर का चढ़ावा हुआ चोरी’: अखिलेश यादव ने किया दावा, सपा प्रवक्ता ऑपइंडिया से बोले- कोई सबूत नहीं, सूत्रों के आधार पर टहल रही है यह बात

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रविवार (7 जून 2026) को X पर एक सनसनीखेज दावा किया। अखिलेश यादव ने राम मंदिर में चढ़ावा चोरी होने की बात कहते हुए लिखा, “समस्त विश्व में भगवान राम के उपासकों के लिए ये एक बेहद संवेदनशील समाचार है कि ‘राम मंदिर’ के चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पायी गई है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये मंदिर ट्रस्ट के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है। कोई भी सफाई देने के लिए सामने नहीं आना चाहता है। न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेने की माँग है क्योंकि इसका सीधा संबंध वैश्विक स्तर पर समस्त सनातनी समाज की प्रभु राम में गहरी आस्था से जुड़ा है। सरकार की चुप्पी संदिग्ध है।”

अखिलेश यादव का ट्वीट

सपा सरकार में मंत्री रहे और पार्टी के प्रवक्ता पवन पांडेय ने भी X पर अखिलेश के इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “हे राम मंदिर मे भी डकैती।” पवन पांडेय 2012-2017 के बीच अयोध्या से विधायक रहे हैं।

पवन पांडेय का ट्वीट

चोरी का कोई सबूत नहीं: ऑपइंडिया से बोले सपा प्रवक्ता पवन पांडेय

इस मामले को लेकर जब ऑपइंडिया ने सपा के प्रवक्ता पवन पांडेय से बात की तो उन्होंने चढ़ावे की चोरी का सबूत ना होने की बात कही। हमने पूछा कि क्या उन्हें इस संबंध में कोई शिकायत मिली है या उनके पास कोई प्रमाण है तो उनका कहना था, “यह बात पूरे फैजाबाद शहर में सूत्रों के आधार पर टहल रही है, चार दिनों से। इसका कोई ठोस सबूत नहीं है, लिखा-पढ़ी वाला सबूत नहीं है।” जब हमने उसने पूछा कि क्या ऐसी चर्चा सुनकर उन्हें दावा किया है तो उनका जवाब था, “हाँ, यही समझ लीजिए।”

इसके बाद वे हमसे कहने लगे, “आप चंपत राय से पूछिए कि वे इसका जवाब दें।” उल्लेखनीय है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव हैं। हमने इस मामले को लेकर चंपत राय से भी बात करने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं हो पाई। उनसे बात होने के बाद हम इस खबर को अपडेट करेंगे।

बातचीत के दौरान हमने उनसे कहा कि ‘ट्रस्ट के लोगों से हमने बात की है तो उन्होंने इस चोरी के सबूत माँगे हैं’ तो इस पर सपा प्रवक्ता पवन पांडेय ने कहा, “इस मामले पर चंपत राय 4 दिन से क्यों नहीं बोल रहे हैं। हम बता रहे हैं कि चोरी हुई है। हम लोगों थोड़े ही जाएँगे ये हमारा काम नहीं है।” हालाँकि, वह बार-बार सबूत ना होने की बात कहते रहे। उन्होंने कहा कि विवाद हुआ होगा तभी यह बात बाहर आई है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, पवन पांडेय ने उनसे बातचीत में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी 5 से 7.50 करोड़ रुपए तक की चोरी होने की बात कही है। साथ ही, उन्होंने कहा है कि अगर चोरी नहीं हुई है तो चंपत राय प्रभु श्रीराम की कसम खाकर कहें कि सबकुछ झूठ है।

कैसे होती है चढ़ावे की गिनती?

राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गिनती एक तय और पारदर्शी व्यवस्था के तहत की जाती है। दान राशि की गणना बैंक कर्मचारियों द्वारा ट्रस्ट प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की जाती है और पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी के दायरे में रहती है।

गिनती के बाद दान में प्राप्त रकम का विवरण रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इसके बाद राशि को मंदिर परिसर में बने सुरक्षित लॉकर में रखा जाता है, जिसे अगले दिन बैंक में जमा कर दिया जाता है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का मुख्य बैंक खाता अयोध्या धाम स्थित भारतीय स्टेट बैंक में संचालित होता है।

चढ़ावे की राशि के ऑडिट और वित्तीय निगरानी का कार्य TCS (टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज) की देखरेख में किया जाता है। मंदिर में प्राप्त कुल चढ़ावे की जानकारी ट्रस्ट की बैठकों में साझा की जाती है।

दिल्ली दंगों में इस्लामी कट्टरपंथियों को दी क्लीन चिट, कुंभ और राम मंदिर को लेकर हिंदुओं को घेरा: जानें- कौन हैं CJP प्रदर्शन में दिखीं Guardian की पत्रकार हन्ना एलिस

सोशल मीडिया से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ तिलचट्टों के साथ प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए CJP के संस्थापक और पूर्व AAP कार्यकर्ता अभिजीत दिपके अमेरिका से भारत पहुँचे थे।

सरकार से CBSE और NEET विवाद को लेकर जवाब माँगने के नाम पर आयोजित इस प्रदर्शन में कई ऐसे लोग भी शामिल हुए, जो खुद को निष्पक्ष बताने का ढोंग करते हैं लेकिन उनके राजनीतिक मकसद साफ नजर आ रहे थे। इसी दौरान प्रदर्शन स्थल पर मौजूद एक विदेशी महिला ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

अधिकांश प्रदर्शनकारियों के बीच सुनहरे बालों वाली इस महिला को देखकर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठने लगे। एक सोशल मीडिया यूजर ने पूछा कि आखिर यह विदेशी महिला प्रदर्शन में क्या कर रही है, क्योंकि टूरिस्ट वीजा पर इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं होती।

उसने दिल्ली पुलिस से कार्रवाई करने और उसका वीजा रद्द कर उसे देश से बाहर भेजने की माँग भी की। कुछ ही समय बाद उस महिला की पहचान सामने आ गई। वह महिला ब्रिटिश अखबार The Guardian की दक्षिण एशिया संवाददाता हन्ना एलिस-पीटरसन (Hannah Ellis-Petersen) थीं, जो इस प्रदर्शन को कवर करने के लिए वहाँ मौजूद थीं।

कौन हैं हन्ना एलिस-पीटरसन? जानिए उनके बारे में सबकुछ

हन्ना एलिस-पीटर्सन का लव जिहाद के मामलों को कमतर करके दिखाने और कथित ‘ऑनर किलिंग’ के मामलों को इससे गलत तरीके से जोड़ने का इतिहास रहा है। जनवरी 2020 में जब देशभर में CAA विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे, तब वह द गार्जियन के पाठकों के सामने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भ्रम फैलाने में जुटी थीं।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत में अवैध रूप से रह रहे अल्पसंख्यकों को तेजी से नागरिकता देने के कानून के उद्देश्य को बताने के बजाय, उन्होंने दावा किया कि इस मानवीय कानून के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन, मोदी की हिंदुत्व राजनीति की कथित ‘टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी’ के खिलाफ एक जवाबी कहानी है।

हन्ना एलिस-पीटरसन के ट्वीट्स का स्क्रिनशॉट्स

उन्होंने फरवरी 2020 में दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार इस्लामी कट्टरपंथियों को भी क्लीन चिट देने की कोशिश की और हिंदू विरोधी हिंसा को केवल ‘हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झड़प’ बताकर पेश किया।

हन्ना एलिस-पीटर्सन ने यह अफसोस भी जताया था कि इन दंगों का भारत-अमेरिका संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा और इसके बजाय अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा की।

इस ‘पत्रकार’ ने कर्नाटक के स्कूलों में बुर्का पहनने पर लगी पाबंदियों को दक्षिण भारत में ‘हिजाब बैन’ के रूप में पेश किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि हिंदू मंदिरों के ऊपर बने विवादित ढाँचों को वापस हासिल करने की प्रक्रिया, ‘हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा भारत का इतिहास दोबारा लिखने’ की कोशिश है।

हन्ना एलिस-पीटरसन के ट्वीट्स का स्क्रिनशॉट्स

हन्ना एलिस-पीटर्सन ने द गार्जियन के लिए कई ऐसे लेख भी लिखे, जिनमें उन्होंने राम जन्मभूमि फैसले और राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर हिंदुओं को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने भव्य हिंदू मंदिर के स्थान पर पहले मौजूद विवादित ढाँचे का बार-बार उल्लेख कर इन घटनाओं के महत्व को कम करके दिखाने का भी प्रयास किया।

इसके अलावा इस प्रोपेगेंडा पत्रकार ने 2022 में इंग्लैंड के लीसेस्टर शहर में हुई हिंसा को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ से जोड़ दिया, जबकि इसके समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं था।

वास्तव में सेंटर फॉर डेमोक्रेसी, प्लूरलिज्म एंड ह्यूमन राइट्स (CDPHR) ने अपनी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में बताया था कि लीसेस्टर में इस्लामी कट्टरपंथियों ने गलत सूचनाओं को हथियार बनाया, हिंदुओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और जातीय सफाए की कोशिश की, जिसके चलते कई हिंदू परिवारों को अस्थायी रूप से अपना घर छोड़ना पड़ा।

रिपोर्ट में कहा गया था, “लीसेस्टर हिंसा को लेकर BBC और द गार्जियन की रिपोर्टिंग का जब सत्यापित पुलिस रिपोर्टों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और विभिन्न थिंक टैंकों की पुष्ट रिपोर्टों से तुलना की गई, तो संस्थागत हिंदूफोबिया और पक्षपात स्पष्ट रूप से सामने आया।”

हन्ना एलिस-पीटर्सन का प्रोपेगेंडा केवल हिंदुओं को बदनाम करने या इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों को कम करके दिखाने तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने ऐसे लेख भी लिखे, जिनमें कुंभ मेले में भाग लेने वाले हिंदुओं को ‘कोविड सुपरस्प्रेडर’ बताया गया, जबकि उनके इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं था।

इस ‘पत्रकार’ ने कोविड-19 के वास्तविक सुपरस्प्रेडर माने जाने वाले तबलीगी जमात के सदस्यों को भी क्लीन चिट देने की कोशिश की थी। जबकि एक समय ऐसा था जब देश में सामने आए कुल कोरोना मामलों में लगभग 30 प्रतिशत मामले तबलीगी जमात से जुड़े पाए गए थे।

इसके बावजूद 2021 में भारत की कोविड-19 स्थिति को लेकर उनकी निराशाजनक रिपोर्टिंग और डर का माहौल बनाने वाली प्रस्तुतियों की प्रशंसा ‘पत्रकार’ से ‘दस्तावेज काट-छाँट करने वाले’ बने एन राम ने की थी, जो राफेल सौदे को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाने के आरोपों के कारण चर्चित रहे हैं।

मार्च 2024 में ऑपइंडिया ने हिंदू कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी के खिलाफ हन्ना एलिस-पीटरसन की कथित हिट-जॉब की कोशिश को विफल कर दिया था। इसके एक महीने बाद उन्होंने एक विवादित लेख का सह-लेखन किया, जिसका शीर्षक था- ‘भारतीय सरकार ने पाकिस्तान में हत्याओं का आदेश दिया, खुफिया अधिकारियों का दावा।’

लेख की शुरुआत में ही पाकिस्तान के आतंकवादियों को केवल ‘व्यक्तियों’ के रूप में बताया गया, जिनकी कथित तौर पर भारतीय सरकार द्वारा हत्या करवाई गई थी।

इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से गुमनाम स्रोतों, खासकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के दावों का सहारा लिया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘सीमा पार हत्याओं’ को बढ़ावा देने वाले नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। हालाँकि द गार्जियन ने अनजाने में उन्हें बाहरी खतरों से भारत की सुरक्षा करने वाले नेता के रूप में भी स्वीकार कर लिया।

द गार्जियन के आर्टिकल का स्क्रिनशॉट

दिलचस्प बात यह है कि हन्ना एलिस-पीटरसन ने ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा द्वारा दिए गए लाइवस्ट्रीम बहस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हालाँकि वह एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा जरूर बनीं, जिस पर हिंदुओं और भारत के बारे में भ्रामक जानकारी फैलाने का आरोप लगाया गया था।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

चीन-जापान की राह पर भारत, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जन्म दर: पढ़ें- क्या होता है TFR, क्यों घट रही है जन्म दर और आने वाले दशकों में कितना बड़ा होगा संकट

लंबे समय तक दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में गिना जाता रहा भारत अब एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shift) के दौर में जा रहा है। दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत में अब जन्म दर उस स्तर से नीचे चली गई है जिसे किसी भी देश की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

ताजा सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.9 पर पहुँच गई है। यह पहली बार है जब यह आँकड़ा ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ यानी 2.1 से नीचे गया है। इस मुद्दे ने केवल भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आबाद से जुड़ी चर्चाओं को जन्म दिया है।

अमेरिकी अरबपति उद्योगपति और टेस्ला तथा स्पेसएक्स के प्रमुख एलन मस्क ने भी भारत की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताई है। भारत की आबादी को लेकर अब तक होने वाली बहस अब तक आमतौर पर जनसंख्या विस्फोट को लेकर होती रही हैं लेकिन नए आँकड़े संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में भारत के सामने चुनौती उल्टी भी हो सकती है यानी कम होती जन्म दर, वृद्ध होती आबादी और घटता कार्यबल।

मस्क ने क्या कहा?

एलन मस्क लंबे समय से दुनिया के कई देशों में गिरती जन्म दर को लेकर चिंता जताते रहे हैं। वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि घटती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। अब भारत को लेकर भी उन्होंने इसी चिंता को दोहराया।

AF Post द्वारा भारत की घटती प्रजनन दर से जुड़े आँकड़े साझा किए जाने के बाद मस्क ने X पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर चुकी है। सबसे अधिक शिक्षित वर्गों के बीच यह गिरावट कई वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी।”

मस्क का तर्क है कि जब किसी देश में लंबे समय तक जन्म दर कम रहती है, तो धीरे-धीरे वहाँ युवाओं की संख्या कम होने लगती है। इसका असर उद्योगों, अर्थव्यवस्था, श्रम शक्ति और पेंशन व्यवस्था पर पड़ता है। जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों को वे इसी संकट का उदाहरण बताते रहे हैं।

भारत के नए आँकड़े क्या बता रहे हैं?

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर यानी TFR अब 2.1 से घटकर 1.9 बच्चों प्रति महिला रह गई है। सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि औसतन भारत में एक महिला अपने जीवनकाल में अब दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है।

यह गिरावट अचानक नहीं हुई है बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि भारत में वर्ष 1950 में कुल प्रजनन दर 6.18 थी। लेकिन भारत ने आजादी के बाद से ही जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय शुरू कर दिए गए थे।

भारत 1950 के दशक में राज्य द्वारा प्रायोजित परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाने वाले पहले विकासशील देशों में से एक बन गया था। 1952 में जनसंख्या नीति समिति और 1956 में केंद्रीय परिवार नियोजन बोर्ड की स्थापना की गई थी। 1976 में भारत ने पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की थी। इसका असर भी दिखा और 1980 में जन्म दर 4.60 पहुँच गई।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गय उपायों से भारत की TFR में लगातार कमी होती रही। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2015-16 के मुताबिक, भारत में TFR 2.2 हो गया था। अगले कुछ वर्षों में इसमें और भी कमी हुई और NFHS, 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में TFR 2.0 पर पहुँच गया जो प्रतिस्थापन स्तर से भी कम था। अब यह पहली बार उस स्तर से नीचे पहुँच गई है जिसे किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है।

अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक भारत की TFR 1.29 तक पहुँच जाएगा और 2100 तक इसके 1.04 तक पहुँचने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव भारत में शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और परिवार नियोजन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

2021 और 2100 में भारत की TFR का तुलनात्मक अध्ययन (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या होता है ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

‘रिप्लेसमेंट लेवल’ या Replacement Fertility Rate का अर्थ समझना इस पूरी बहस को समझने के लिए बेहद जरूरी है। यह वह औसत संख्या होती है जितने बच्चे एक महिला को जन्म देने चाहिए ताकि एक पीढ़ी की जनसंख्या अगली पीढ़ी में बराबर बनी रहे।

आमतौर पर यह संख्या 2.1 मानी जाती है। यानी औसतन हर महिला को दो बच्चे पैदा करने होंगे ताकि माता-पिता की जगह अगली पीढ़ी ले सके। इसमें अतिरिक्त 0.1 इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि कुछ लोग बीमारी, दुर्घटना या अन्य कारणों से प्रजनन आयु तक नहीं पहुँच पाते।

यदि किसी देश की जन्म दर लंबे समय तक 2.1 से नीचे बनी रहती है तो धीरे-धीरे वहाँ जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। कुछ दशकों बाद कुल आबादी स्थिर होने लगती है और फिर घट भी सकती है। यही वजह है कि जनसंख्या विशेषज्ञ भारत के इस बदलाव को एक बड़े संकेत के रूप में देख रहे हैं।

दिल्ली की TFR फिनलैंड से भी कम लेकिन किन राज्यों में अब भी बच्चे पैदा हो रहे ज्यादा?

भारत का TFR (राष्ट्रीय औसत) अब 1.9 तक पहुँच गया है लेकिन पूरे देश की तस्वीर एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में अब भी जन्म दर राष्ट्रीय औसत से अधिक बनी हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहाँ प्रजनन दर अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से ऊपर है। इन राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जन्म दर के कारण देश का औसत कुछ हद तक संतुलित बना हुआ है।

इन राज्यों में ग्रामीण आबादी अधिक है, कम उम्र में विवाह अपेक्षाकृत ज्यादा होते हैं और कई सामाजिक-आर्थिक कारणों से परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक बनी रहती है। दूसरी ओर दक्षिण भारत, पश्चिम भारत और बड़े महानगरों वाले राज्यों में जन्म दर तेजी से घटी है। इन इलाकों में छोटे परिवार अब सामान्य बात बन चुके हैं।

रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आँकड़ों में दिल्ली का नाम सामने आया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रजनन दर सिर्फ 1.2 दर्ज की गई है, जो देश में सबसे कम है। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली की यह दर यूरोपीय देशों के बराबर या कई मामलों में उनसे भी कम है। दिल्ली की जन्म दर फिनलैंड से भी नीचे पहुँच गई है।

विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं। बड़े शहरों में जीवनयापन की बढ़ती लागत, छोटे घर, करियर का दबाव, देर से शादी, महिलाओं का नौकरियों में बढ़ता योगदान और बच्चों की परवरिश का महँगा होना प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

आज के शहरी परिवार पहले की तरह तीन या चार बच्चों की जगह एक या दो बच्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई दंपति तो केवल एक बच्चा रखने या बिल्कुल बच्चा न पैदा करने का निर्णय भी ले रहे हैं।

आखिर भारत में जन्म दर इतनी तेजी से क्यों घट रही है?

भारत में जन्म दर कम होने के पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव एक साथ काम कर रहे हैं।

सबसे बड़ा कारण शिक्षा को माना जा रहा है। खासकर महिलाओं की शिक्षा बढ़ने के बाद शादी और माँ बनने की औसत उम्र बढ़ी है। पहले जहाँ कम उम्र में शादी होना आम बात थीं, वहीं अब महिलाएँ उच्च शिक्षा और नौकरी को प्राथमिकता देने लगी हैं।

इसके अलावा शहरीकरण ने भी परिवारों की सोच बदल दी है। शहरों में महँगी शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और सीमित संसाधनों के कारण परिवार छोटे रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

महिलाओं की नौकरी और आर्थिक स्वतंत्रता भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज बड़ी संख्या में महिलाएँ करियर और पेशेवर जीवन पर ध्यान दे रही हैं जिससे परिवार नियोजन के फैसले वो ले रही हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच और गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता ने भी जन्म दर को नियंत्रित करने में मदद की है।

संयुक्त राष्ट्र ने भारत को लेकर क्या कहा है?

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में माना है कि भारत की प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुँच चुकी है। UNFPA की 2025 की रिपोर्ट में भारत का TFR 1.9 माना गया। हालाँकि एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की आबादी तुरंत कम होने लगेगी।

UNFPA के अनुमान के अनुसार, अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो साल 2100 तक भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.78 तक पहुँच सकती है। साथ ही देश की औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) करीब 79 वर्ष होने का अनुमान जताया गया है। यह तस्वीर भारत के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर कई बड़े सवाल खड़े करती है।

कम जन्म दर के कारण युवा आबादी का हिस्सा सिकुड़ता दिखाई देता है जबकि बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ने की संभावना है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत धीरे-धीरे ‘युवा देश’ से ‘एजिंग सोसाइटी’ की तरफ बढ़ सकता है।

2100 को लेकर UNFPA का अनुमान

हालाँकि, भारत की कुल आबादी अभी भी 140 करोड़ से अधिक है और बड़ी संख्या में लोग युवा आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले कुछ दशकों तक जनसंख्या बढ़ सकती है लेकिन उसकी रफ्तार पहले जैसी नहीं रहेगी।

UNFPA का कहना है कि भारत में जनसंख्या का पैटर्न एक जैसा नहीं है। अलग-अलग राज्यों में सामाजिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य सुविधाएं, महिलाओं की स्थिति और विवाह की औसत उम्र अलग-अलग होने के कारण जन्म दर में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।

दुनिया भर में आने वाला है कम होती आबादी का संकट

आबादी का कम होने का संकट सिर्फ भारत के लिए ही चुनौती नहीं बनने वाला है बल्कि दुनिया के बहुत बड़े हिस्से के लिए यह संकट जल्द ही दिखना शुरू हो जाएगा। ‘द लैंसेट’ ने 204 देशों का अध्ययन किया और बताया कि 204 देशों और क्षेत्रों में से 103 देश (50.5%) ऐसे थे जहाँ 2018 तक TFR पहले ही ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ से नीचे पहुँच चुकी थी। यह अध्ययन 2024 में प्रकाशित हुआ था।

शोध के अनुसार, 2050 तक लगभग 100 देश (49%) ऐसे हो जाएँगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि उन देशों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या, मरने वाले लोगों की संख्या से कम हो जाएगी। शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक 155 देश और क्षेत्र (76%) रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे की प्रजनन दर पर पहुँच जाएँगे। वहीं, 2100 तक यह संख्या बढ़कर 198 देश (97.1%) हो सकती है। इनमें से 178 देश (87.3%) ऐसे होंगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक होगी।

विभिन्न देशों में 2100 तक TFR का आँकड़ा (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या भारत भी जापान और चीन जैसी स्थिति में पहुँच सकता है?

यह सवाल अब तेजी से पूछा जाने लगा है कि क्या भारत भी भविष्य में जापान, दक्षिण कोरिया या चीन जैसी स्थिति का सामना करेगा? जापान और दक्षिण कोरिया में जन्म दर कई वर्षों से बेहद कम बनी हुई है। वहाँ बड़ी समस्या यह हो गई कि काम करने वाली युवा आबादी घटती चली गई जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी। इससे पेंशन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया।

चीन को भी इसी समस्या के कारण अपनी ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ तक खत्म करनी पड़ी और अब वहाँ सरकार ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन दे रही है। दुनिया के कई देशों में जनसंख्या को बढ़ाने के लिए अलग-अलग उपाय किए जा रहे हैं।

भारत फिलहाल उस स्थिति से दूर है क्योंकि यहाँ अभी भी युवा आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है। ‘पॉपुलेशन मोमेंटम’ (Population Momentum) के चलते अभी भारत को कोई दिक्कत नहीं होगी। पॉपुलेशन मोमेंटम का मतलब यह है कि किसी देश की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाने के बाद भी उसकी आबादी कुछ समय तक बढ़ती रह सकती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगर किसी देश में युवा आबादी (खासतौर पर 15 साल से कम उम्र के लोग) बड़ी संख्या में मौजूद है, तो वे आगे चलकर प्रजनन आयु में पहुँचते हैं और बच्चे पैदा करते हैं। इसलिए जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या तुरंत घटनी शुरू नहीं होती।

अध्ययन बताते हैं कि जब किसी देश की TFR (कुल प्रजनन दर) 2.1 से नीचे जाती है, तब भी आबादी की प्राकृतिक वृद्धि दर के नकारात्मक होने में लगभग 30 साल का अंतर आ सकता है। यानी जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या कुछ दशकों तक बढ़ सकती है।

हालाँकि, अगर अगले कई दशकों तक जन्म दर लगातार कम बनी रही, तो भारत को भी भविष्य में श्रमिकों की कमी, वृद्ध आबादी और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। और विभिन्न रिपोर्ट्स में यह अनुमान साफ-साफ नजर आ रहा है।

अब भारत के लिए चिंता ‘जनसंख्या विस्फोट’ नहीं बल्कि ‘घटती जनसंख्या’ होगी

एक समय भारत में सबसे बड़ी चिंता तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर थी। सरकारें परिवार नियोजन अभियान चलाती थीं और जनसंख्या नियंत्रण को बड़ा मुद्दा माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी। बहुत ज्यादा आबादी भी चुनौती है और बहुत कम जन्म दर भी भविष्य में गंभीर समस्या बन सकती है।

भारत फिलहाल उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसंख्या वृद्धि धीमी हो रही है लेकिन युवा आबादी अभी भी बड़ी ताकत बनी हुई है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय ताकत को आर्थिक अवसर में बदल पाता है या नहीं।

स्पष्ट है कि भारत में जन्म दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ा बड़ा बदलाव है, जिसके असर आने वाले दशकों में साफ दिखाई दे सकते हैं।