दिल्ली के जाफरपुर कलाँ में रविवार (26 अप्रैल 2026) को एक बिहार के खगड़िया के रहने वाले युवक की हत्या के बाद अब पीड़ित परिवार घर के बाहर धरने पर बैठ गया है और प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है। इस बीच अब इस मामले को लेकर सियासत भी तेज हो गई है। पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का भरोसा दिया और भाजपा सरकार पर निशाना साधा।
इस बीच ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के उत्तम नगर के उस प्रजापति कॉलोनी पहुँची, जहाँ मृतक मजदूर पांडव कुमार का परिवार रहता है। हमने देखा कि कॉलोनी में जगह-जगह उठ रहे धुएँ से घुटन के बीच मटके बनाने में लगे हुए हैं। इस बीच रास्ते को रोककर ट्रांसफार्मर के पास जमीन पर मेट बिछा हुआ है। ऊपर धूप से बचने के लिए सफेद चाँदनी लगी थी और उसके नीचे पीड़ित परिजन शोक में बैठे थे। जहाँ पहले से परिवारजनों, रिश्तेदारों, स्थानीय नेताओं और कुछ मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लगा हुआ है।
यहाँ ट्रांसफार्मर के तीन ओर लगी जाली पर मृतक पांडव कुमार के फोटो के साथ कुछ फ्लेक्स लगे थे, जिस पर लिखा था…’क्या बिहारी होना गुनाह है?’ ‘बिहार नाम सुनते ही पुलिस वाले नीरज बल्हारा ने नशे की हालत में गोली मारी’, ‘पांडव तेरे कातिल जिंदा हैं। हम सब शर्मिंदा हैं’। एक दूसरे फ्लेक्स में सबसे ऊपर लिखा था… ‘रक्षक बना भक्षक’।
पांडव के घर के बाहर लगा बैनर (फोटो साभार: ऑपइंडिया)
फर्श पर महिलाओं से घिरी मृतक पांडव की माँ बेसुध बैठी थी जिसे कुछ महिलाएँ संभालने की कोशिश कर रही थीं। हमने उनसे बात करने की कोशिश की। उन्होंने हमें बताया कि घटना के अगले दिन यानी 27 तारीख की सुबह 7:00 बजे मुझे पता चला कि बेटा इस दुनिया में नहीं रहा। माँ बताती हैं, “वह मुझसे कहकर गया था कि मम्मी मैं बर्थडे पार्टी में जा रहा हूँ, मेरे लिए खाना मत बनाना, मैं देर रात को आऊँगा। लेकिन सामने एक मकान में रहने वाले पुलिस वाले पिस्तौल निकालकर मेरे बेटे को गोली मार दी।”
पांडव की माँ ने कहा, “मेरे बेटे के सीने में गोली लगी और पार निकल गई । पीछे बैठे दूसरे लड़के के पेट में गोली लगी वह अस्पताल में भर्ती है।” बेटे की बातों को याद कर माँ फिर से बिलखने लगती है और कहती है, “मुझे बस न्याय चाहिए। मेरा बेटा घर में अकेला कमाने वाला था। अब मेरा कोई सहारा नहीं रहा।”
मृतक पांडव के घर के बाहर बैठे लोग (फोटो साभार: ऑपइंडिया)
पास में बैठी दूसरी महिला ने कहा कि हमें बिहार से होने के कारण बहुत अपमान झेलना पड़ता है। वो कहती हैं, “लोग कहते हैं कि यह बिहारी हैं और बिहार से आकर यहाँ गंदगी फैलाते हैं। हम दो दिन से यहाँ भूखे-प्यासे बैठे हैं लेकिन हमें न्याय नहीं मिल रहा है।” पांडव कुमार की चाची कहती हैं कि हम उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे लेकिन शादी होने से पहले ही उसको मार दिया हम चाहते हैं कि पुलिस वाले को फाँसी हो।
चश्मदीद चचेरे भाई ने क्या बताया?
पांडव कुमार के छोटे भाई दीपक ने बताया कि मुझे रात में नहीं पता चला था लेकिन जब पता चला तो मुझे यकीन नहीं हुआ। पांडव कुमार की बाइक पर बैठे तीसरे युवक यानी चचेरे भाई दीपक ने हमें बताया कि हम करीब 9:30 बजे प्रजापति कॉलोनी से 6 लोग मित्र रुपेश के बेटे की बर्थडे पार्टी में शामिल होने के लिए गए थे लेकिन केक काटने के बाद खाना खाने में टाइम लग गया था और करीब 2:00 बजे हम वहाँ से निकले। कुछ लोग कैब से निकल गए।
दीपक बताते हैं, “हम बाइक से निकल ही रहे थे कि अचानक नशे में घुत एक व्यक्ति हमारे पास आया। हमें गालियाँ देते हुए उसने पूछा कि कहाँ से हो? हमने जब बिहार से होना बताया तो उसने बिहार नाम सुनते ही हमें गालियाँ देना शुरू कर दिया।” वो बताते हैं, “हमने वहाँ से निकलने की भी कोशिश की लेकिन उसने हमारे रास्ता रोककर पिस्तौल तान दी और फिर बातों ही बातों में उसने गोली चला दी। इसके बाद उसने कहा कि एक तो मर गया है दूसरा भी मर जाएगा जाओ ले जाओ इसे बचा लो और फिर वह वहाँ से गाड़ी लेकर फरार हो गया।”
दीपक बताते हैं कि कुछ देर बात तक तो भाई तड़पता रहा लेकिन फिर मेरे हाथों में ही उसने दम तोड़ दिया और मैं कुछ नहीं कर सका। चचेरा भाई दीपक आगे कहता है कि हम दिल्ली में कमाने के लिए आए हैं मुझे यहाँ आए 20 साल हो गए लेकिन हमें आए दिन लोग बिहार के नाम पर गाली देते हैं हमारा अपमान करते हैं।
घटना के समय मौजूद छोटू नाम का युवक कहता है क्या बिहारी होना अब गुनाह हो गया है? या हमें दिल्ली में रहने का अधिकार नहीं है? हम चाहते हैं कि उसे (आरोपित) फाँसी होनी चाहिए।
न्याय नहीं मिला तो करूँगा दिल्ली की सड़कें जाम
पांडव कुमार के दादा कमलेश सिंह बताते हैं कि करीब 15 साल पहले हम यहाँ आए थे और वह यहाँ मजदूरी करते हैं। वो कहते हैं, “पांडव लड़का बहुत अच्छा था आज उसका पोस्टर देखकर हमारा कलेजा फट रहा है। मेरी सरकार से माँग है कि हमारे परिवार को आर्थिक मदद दी जाए और 3 महीने के अंदर आरोपी को फाँसी देकर हमें न्याय दिया जाए।”
वो कहते हैं, “अगर ऐसा नहीं होता है तो मैं खुद सड़कों पर उतर कर रोड को जाम करूँगा।पांडव के दादा अंत में कहते हैं कि बिहारी को मुर्दा ना समझा जाए उसे जिंदा समझा जाए। आज एक पांडव मरा है लेकिन यहाँ हजारों पांडव खड़े हैं।”
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दी 8 लाख की आर्थिक मदद
पांडव कुमार की हत्या पर गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। इसके साथ ही सम्राट चौधरी ने परिवार को 8 लाख की आर्थिक मदद देने की घोषणा की। साथ ही केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी घटना पर दु:ख जताया है। वहीं, मंगलवार को पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए पूर्णिया सांसद पप्पू यादव पहुंचे और उन्होंने परिवार को 50 हजार रुपए की आर्थिक मदद की।
साथ ही, सपा नेता खेसारी लाल निरहुआ, तेजस्वी यादव ने भी इस घटना के बहाने भाजपा सरकार पर निशाना साधा। वहीं देर शाम को खगड़िया लोकसभा सांसद राजेश वर्मा ने भी पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का भरोसा दिया और उन्हें 1 लाख की आर्थिक भी दी।
आपको बता दें कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात हरियाणा निवासी हवलदार नीरज बल्हारा ने नशे की हालत में बिहार के युवकों को गाली देते हुए गोली चला दी थी, जिसमें दो युवकों को गोली लगी थी। पांडव ने सीने में गोली लगने से मौके पर ही दम तोड़ दिया था और पीछे बैठे कृष्णा के पेट में गोली लगी थी जो अभी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपित नीरज बल्हारा को गिरफ्तार कर लिया है, जिसे कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 18 और 19 अप्रैल को ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ The Timothy Initiative (TTI) नाम की एक संस्था से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। ED ने बताया कि वह इस बात की जाँच कर रहा है कि TTI ने कैसे करीब 95 करोड़ रुपए भारत में विदेशी बैंकों के डेबिट कार्ड के जरिए भेजे जबकि FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों को पूरी तरह दरकिनार किया गया है।
ED, Headquarters Office, New Delhi has conducted search operations on 18th and 19th April, 2026 at six locations in multiple states in connection with suspected withdrawal and utilisation of funds by using foreign bank debit cards, bypassing regulatory channels. The investigation… pic.twitter.com/gloGiWyDvQ
गौर करने वाली बात यह है कि TTI FCRA के तहत रजिस्टर्ड नहीं है। इसका मतलब है कि भारत में इस संस्था के किसी भी कार्यक्रम को विदेशी फंडिंग नहीं मिल सकती। इसके बावजूद ED ने बताया कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच विदेशी बैंक डेबिट कार्ड के जरिए करोड़ों रुपए नकद निकाले गए।
ED के मुताबिक, TTI ने एक खास तरीका अपनाया था। अमेरिका के Truist Bank से जुड़े विदेशी डेबिट कार्ड भारत लाए गए और इनका इस्तेमाल कई राज्यों के एटीएम से बार-बार पैसे निकालने के लिए किया गया। बाद में इस पैसे का उपयोग TTI के भारत में चल रहे धर्मांतरण से जुड़े कामों के खर्च के लिए किया गया। इस मामले में ED ने कई राज्यों में कुल 6 जगहों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी के अनुसार, इन छापों में 25 विदेशी बैंक डेबिट कार्ड, 40 लाख रुपए नकद और कई अहम डिजिटल सबूत, डिवाइस और दस्तावेज जब्त किए गए।
इसके अलावा, माइका मार्क (Micah Mark) नाम के एक व्यक्ति के पास 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले। उसे ED द्वारा जारी लुकआउट सर्कुलर के आधार पर बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन ब्यूरो ने रोका था, जब वह ये कार्ड भारत लेकर आ रहा था। ED ने यह भी बताया कि इन कार्ड्स से छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों जैसे धमतरी और बस्तर में संदिग्ध तरीके से भारी मात्रा में नकदी निकाली गई। पिछले कुछ सालों में इन इलाकों से करीब 6.5 करोड़ रुपए निकाले जाने की जानकारी सामने आई है।
एजेंसी के अनुसार, इन कार्ड्स का इस्तेमाल एक सुनियोजित तरीके से बड़ी रकम निकालने के लिए किया जा रहा था, जिससे संगठित नेटवर्क की आशंका जताई जा रही है। ED ने यह भी कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में इस तरह की समानांतर नकद अर्थव्यवस्था का बनना देश की सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है क्योंकि इससे अवैध गतिविधियों के लिए पैसों की आवाजाही आसान हो सकती है।
इसके अलावा, TTI एक ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही थी जिसमें एटीएम से निकाले गए पैसे और उनके इस्तेमाल का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता था। ED के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म को विदेशी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित किया जा रहा था जिससे यह संकेत मिलता है कि यह पूरी प्रक्रिया किसी एक जगह की नहीं बल्कि संगठित और योजनाबद्ध तरीके से चलाई जा रही थी।
क्या है ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’?
भारत में जियो-ब्लॉक The Timothy Initiative (TTI) की वेबसाइट के अनुसार यह एक वैश्विक ईसाई आंदोलन है जिसका उद्देश्य नए अनुयायी बनाना, चर्च स्थापित करना और धार्मिक नेतृत्व तैयार करना है। ऑपइंडिया द्वारा एक्सेस किए गए इसके दस्तावेजों में कहा गया है कि यह संगठन हर गाँव में एक चर्च स्थापित करने के लक्ष्य के साथ काम कर रहा है। TTI की प्रकाशित सामग्री, उसकी ‘हिस्ट्री’ पेज और प्रचार सामग्री से यह साफ होता है कि चर्च स्थापित करना इसका मुख्य उद्देश्य है।
इसके Kingdom Impact नामक दस्तावेज के अनुसार, साल 2007 से अब तक इस संगठन ने 50 देशों जिसमें भारत भी शामिल है में 2,68,750 से ज्यादा चर्च स्थापित किए हैं। साथ ही, संगठन का दावा है कि 23,92,427 लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया है जिनमें 2,01,954 विधवाएँ और अनाथ भी शामिल हैं। इसे एक गंभीर मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।
फोटो साभार: TTI
TTI का कहना है कि अनुयायियों की संख्या एक अनुमान है जो हर नए बनाए गए चर्च में जुड़ने वाले लोगों के पुराने औसत के आधार पर निकाली गई है। यानी असल संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है।
TTI का पूरा मॉडल बाइबिल की एक पंक्ति ‘2 Timothy 2:2’ पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि जो सीख मिली है, उसे भरोसेमंद लोगों को सिखाओ, ताकि वे आगे और लोगों को सिखा सकें। आसान भाषा में समझें तो यह एक ‘चेन सिस्टम’ की तरह है जिसमें एक व्यक्ति कुछ लोगों को तैयार करता है, वे आगे और लोगों को तैयार करते हैं और इस तरह नेटवर्क लगातार बढ़ता जाता है।
इसे एक तरह से मल्टी लेवल मार्केटिंग (MLM) मॉडल जैसा भी समझा जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें लोग कोई प्रोडक्ट नहीं खरीदते बल्कि ईसाई धर्म में परिवर्तन के जरिए इस नेटवर्क का हिस्सा बनते हैं।
फोटो साभार: TTI
TTI ने अपने एक प्रचार वीडियो में कहा है कि उसका हर काम सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया भर में चर्च बनाने के लिए होता है। यानी प्रशासनिक, लॉजिस्टिक या कल्याण से जुड़े खर्च भी अंततः चर्च स्थापना और धर्म परिवर्तन के लक्ष्य से जुड़े हैं। खास बात यह है कि उसके एक प्रमुख वीडियो में ज्यादातर दृश्य भारत के हैं।
TTI के एक वीडियो में भारत पर केंद्रित विजुअल का स्क्रीनशॉट (साभार: TTI)
TTI के अनुसार उसके काम में 5 स्तर की लीडरशिप होती है- Titus, Timothy, Pauls, master trainers और movement leaders और इनमें से हर स्तर के लिए अलग-अलग फंडिंग की जरूरत होती है। यह मॉडल काफी हद तक MLM जैसा है, जहाँ नीचे लोगों की संख्या के आधार पर ‘स्तर’ तय होते हैं।
Titus स्तर के लोगों को 2 किताबों से ट्रेनिंग दी जाती है जबकि Timothy स्तर के लिए 12 किताबें और हजारों पन्नों की सामग्री होती है। Pauls को मास्टर ट्रेनर मैनुअल, लगातार ट्रेनिंग और यात्रा भत्ता मिलता है।
संगठन के मुताबिक, Master Trainers और Movement Leaders को ट्रेनिंग के दौरान खाने, यात्रा और रहने का खर्च दिया जाता है। साथ ही उन्हें हर महीने एक छोटा स्टाइपेंड भी मिलता है। यानी यह सिर्फ स्वैच्छिक प्रचार नहीं बल्कि इसमें लीडर्स और ट्रेनर्स को आर्थिक सहयोग भी दिया जाता है।
प्रमोशनल सामग्री में यह भी बताया गया है कि डोनर का पैसा ‘विजन कास्टिंग’ जैसे कार्यक्रमों में खर्च होता है, जिनका मकसद नए लोगों को जोड़ना होता है। साथ ही TTI के लोग फील्ड में जाकर यह भी जाँच करते हैं कि चर्च और समूह वास्तव में मौजूद हैं या नहीं यानि ट्रेनिंग के साथ निगरानी और रिपोर्टिंग सिस्टम भी है।
इसके अलावा, फंड का इस्तेमाल नए देशों में विस्तार, ऑफिस खोलने, यात्रा और नई भाषाओं में सामग्री तैयार करने में होता है। संगठन के खर्चों में गाँवों की मैपिंग सॉफ्टवेयर, ट्रेनिंग लॉन्च, रिपोर्टिंग, लीडरशिप डेवलपमेंट, मेंटरिंग, ऑफिस, प्रिंटिंग, नई सामग्री, वीडियो, ऑडियो बाइबल, किताबें, स्टाफ सैलरी, मीटिंग्स और अन्य कई तरह के ऑपरेशनल खर्च शामिल हैं।
संगठन के अनुसार, 2010 में उसने 10 किताबों का एक मुख्य ट्रेनिंग मॉडल बनाया जिसमें लक्ष्य था कि हर प्रशिक्षित व्यक्ति ट्रेनिंग के अंत तक एक चर्च स्थापित करे। 2013 में ‘Disciples Making Disciples (DMD)’ नाम का मल्टीप्लिकेशन मॉडल लागू किया गया। 2020 तक यह 7 लाख गाँवों की मैपिंग की बात कर रहा था और 2021 में ‘Coalition of the Willing’ के जरिए 50 लाख गाँवों की मैपिंग का लक्ष्य बताया गया।
TTI भले ही व्यावसायिक MLM न हो लेकिन इसका चर्च बनाने का सिस्टम मल्टी-लेवल विस्तार मॉडल जैसा है। इसमें अलग-अलग स्तर की लीडरशिप बनाई जाती है, लोगों को तय ट्रेनिंग दी जाती है, लीडर्स और ट्रेनर्स को फंड दिया जाता है, विस्तार को ट्रैक किया जाता है, जमीनी स्तर पर काम की जाँच होती है और सफलता को चर्च और अनुयायियों की बढ़ती संख्या से मापा जाता है।
विदेशी चर्च, भारत पर फोकस और हिंदू बहुल क्षेत्र
TTI से जुड़े पार्टनर्स की सामग्री से संकेत मिलता है कि भारत में इसकी गतिविधियाँ सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स के अनुसार, राजस्थान और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में भी TTI से जुड़ी गतिविधियाँ सामने आई हैं।
एक पोस्ट में बताया गया कि TTI राजस्थान में पादरियों और लीडर्स को ट्रेनिंग देने के मिशन के तहत सक्रिय था। इसमें योजनाबद्ध ट्रेनिंग, अनुयायी तैयार करना और सहयोग देना शामिल था। साथ ही यह भी कहा गया कि यह पहल फैकल्टी बैटिस्टा पियोनेरा और बैपटिस्ट चर्च ऑफ न्यू इंग्लैंड मल्टीप्लिकेशन सेंटर के बीच साझेदारी के माध्यम से संभव हो पाई है। इससे संकेत मिलता है कि राजस्थान में चल रही ट्रेनिंग गतिविधियों से विदेशी चर्च नेटवर्क भी जुड़े हुए थे।
फोटो साभार: इंस्टाग्राम
केंसिंग्टन चर्च की एक अन्य पोस्ट में TTI को एक वैश्विक आंदोलन बताया, जो अनुयायियों, चर्चों और लीडर्स की संख्या बढ़ाने पर काम करता है। पोस्ट के अनुसार, TTI के साथ साझेदारी के जरिए उत्तर भारत, जिसे हिंदू बहुल क्षेत्र बताया गया, में 3000 से ज्यादा हाउस चर्च शुरू किए गए। इसमें यह भी कहा गया कि केंसिंग्टन सहित आठ चर्चों के समूह ने इस क्षेत्र में यीशु का संदेश फैलाने के लिए 10 लाख डॉलर जुटाने का संकल्प लिया।
फोटो साभार: इंस्टाग्राम
ED ने छत्तीसगढ़ के धमतरी और बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में संदिग्ध कैश निकासी का जिक्र किया है। जबकि TTI से जुड़े नेटवर्क का दायरा खासकर हिंदू बहुल क्षेत्रों में राजस्थान और उत्तर भारत तक फैला बताया जा रहा है।
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़, बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों में हालात और गंभीर बताए गए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई गाँवों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं और ईसाई बहुसंख्यक बन चुके हैं। कई जगह ऐसे गाँव हैं जहाँ एक भी मंदिर नहीं है लेकिन 3-4 चर्च मौजूद हैं। साथ ही, पारंपरिक दाह संस्कार की जगह कई स्थानों पर कब्र और क्रॉस के साथ दफनाने की परंपरा बढ़ने का भी जिक्र है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गरीब, बीमार और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों को निशाना बनाया जा रहा है, जहाँ 2-3 पादरी कई गाँवों में सक्रिय हैं। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में 146 NGO FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं, जिनमें 50 मिशनरी संगठन शामिल हैं। इनमें से 30 जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़ और बस्तर जैसे उन्हीं जिलों में काम कर रहे हैं, जहां धर्मांतरण के मामले सबसे ज्यादा बताए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी NGO छत्तीसगढ़ फर्म एंड सोसाइटी में भी रजिस्टर्ड हैं लेकिन इनका सरकारी ऑडिट नहीं होता बल्कि ये खुद ही अपनी ऑडिट रिपोर्ट जमा करते हैं। साथ ही, राज्य सरकार के पास इनके विदेशी फंडिंग को लेकर ठोस जानकारी नहीं होने की बात भी कही गई है।
TTI की टाइमलाइन: कैसे चर्च स्थापना बनी अभियान
TTI की टाइमलाइन के अनुसार, इसकी शुरुआत 2007 में हुई जब इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स एशिया के दौरे पर आए। संगठन के मुताबिक, उन्होंने वहां बहुत सारे मंदिर और मस्जिदें देखीं और पूछा- “चर्च कहाँ हैं?’ इस पर जवाब मिला- “कोई नहीं।” TTI इसी घटना को अपने आंदोलन की “आध्यात्मिक शुरुआत” बताता है जिसका उद्देश्य भारत में हिंदुओं को लक्ष्य बनाकर चर्च स्थापित करना था।
फोटो साभार: TTI
2008 में TTI का कहना है कि डेविड नेल्म्स और स्थानीय लीडर्स जोशुआ विजयकुमार और हर्षा कुमार ने एक चर्च स्थापना प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। संगठन का यह भी कहना है कि इसी के साथ TTI के पहले 3,075 चर्च संस्थापकों की शुरुआत हुई। इससे पता चलता है कि संगठन का प्रारंभिक मॉडल केवल व्यक्तिगत प्रचार या छोटे पैमाने पर संगति कार्य नहीं था बल्कि चर्च संस्थापकों का सुनियोजित प्रशिक्षण था।
2010 में TTI ने 10 किताबों का कोर ट्रेनिंग सिस्टम तैयार किया। इसमें साफ लक्ष्य रखा गया कि हर प्रशिक्षित व्यक्ति ट्रेनिंग के अंत तक एक चर्च बनाए। यानी यहाँ सिर्फ सीखना नहीं बल्कि सीधे चर्च बनाना ही मुख्य उद्देश्य था- ट्रेनिंग और चर्च निर्माण आपस में सीधे जुड़े हुए हैं।
2013 में TTI के अनुसार उसने ‘अनुयायी से अनुयायी बनाने’ (Disciples Making Disciples या DMD) वाला एक नया प्रशिक्षण मॉडल लागू किया। इसी समय यह भी कहा गया कि संगठन 30 देशों में सक्रिय हो गया। इस मॉडल का मतलब साफ है कि एक व्यक्ति सिर्फ अनुयायी बनकर नहीं रहता बल्कि आगे और नए अनुयायी तैयार करता है। यहीं से यह पूरी व्यवस्था एक चेन की तरह काम करने लगती है, जहाँ हर प्रशिक्षित व्यक्ति आगे विस्तार का नया केंद्र बन जाता है।
फोटो साभार: TTI
2014 में TTI ने दावा किया कि उसने 25,000 से ज्यादा चर्च स्थापित कर लिए हैं। यानी कुछ ही सालों में संगठन ने चर्च की संख्या को अपनी उपलब्धि का पैमाना बनाना शुरू कर दिया। इससे साफ होता है कि उसका काम सिर्फ सेवा या कल्याण तक सीमित नहीं बल्कि चर्चों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित है।
2016 में TTI ने ‘अनरीच्ड पीपल ग्रुप्स’ पर ध्यान देना शुरू किया यानि ऐसे समुदाय जहाँ ईसाई मौजूदगी बहुत कम या नहीं के बराबर है। इससे यह दिखता है कि संगठन खास तौर पर तय किए गए लक्षित समूहों तक पहुँचने पर काम कर रहा था।
2020 में TTI ने ‘हर गाँव में एक चर्च’ के लक्ष्य के साथ एक नया अभियान शुरू किया। संगठन के अनुसार, एशिया के दो देशों में 7 लाख गाँवों का सर्वे और मैपिंग शुरू की गई ताकि हर गाँव में चर्च बनाया जा सके। साथ ही यह दावा भी किया गया कि हर 40 मिनट में एक नया चर्च स्थापित हो रहा था। इस चरण को इसलिए अधिक अहम माना गया है क्योंकि इसमें गाँव स्तर पर पहचान, सर्वे और टारगेटिंग के जरिए विस्तार की योजना साफ दिखती है।
फोटो साभार: TTI
2021 में TTI ने अपने अगले चरण ‘पर्स्यूट’ की शुरुआत बताई। इसके अनुसार, ‘हर गाँव में चर्च’ के लक्ष्य को पाने के लिए साझेदारी जरूरी थी। इसी से ‘कोएलिशन ऑफ द विलिंग’ बना। संगठन का कहना है कि अलग-अलग समूहों ने मिलकर 50 लाख गाँवों की मैपिंग की। इस दौरान यह दावा भी किया गया कि हर 20 मिनट में एक नया चर्च स्थापित हो रहा था।
अपने ‘आज’ (Today) वाले चरण को TTI ‘तेजी’ का दौर बताता है। इसके अनुसार, 2.6 लाख से ज्यादा चर्च स्थापित हो चुके हैं, 23 लाख नए अनुयायी जुड़े हैं और यह 50 देशों तक फैल रहा है। साथ ही यह दावा भी किया गया कि अब हर 11 मिनट में एक नया चर्च बनाया जा रहा है।
मौजूदा नेतृत्व और डॉ. जेरेड नेल्म्स की भूमिका
TTI की वेबसाइट के अनुसार, डॉ. जेरेड नेल्म्स इसके प्रेसिडेंट और सीईओ हैं। उनके प्रोफाइल में कहा गया है कि उनका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के स्थानीय नेताओं को तैयार करना, उनके साथ काम करना और हर जगह तक धार्मिक संदेश पहुँचाना है।
फोटो साभार: TTI
निष्कर्ष
ED की जाँच ने भले ही छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में TTI की गतिविधियों पर ध्यान खींचा है लेकिन संगठन की गतिविधियां सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत तक फैली हुई हैं। इसका मल्टी-लेवल जैसा काम करने का तरीका और सक्रिय सदस्य, जो अलग-अलग जगहों पर जाकर चर्च स्थापित करने और धर्म परिवर्तन से जुड़े काम कर रहे हैं, एक गंभीर मुद्दा है जिस पर गहराई से जाँच किए जाने की जरूरत है।
(यह खबर मूल रुप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
पश्चिम बंगाल में चुनाव और हिंसा जैसे एक ही कहानी के दो हिस्से माने जाते थे। 2021 के विधानसभा चुनावों में हिंसा की तस्वीर आज भी लोगों के जहन में ताजा है, जब TMC ने खुलेआम सड़कों पर उतरकर हिंसा फैलाई थी। लेकिन 2026 का ये चुनाव इस बार उसी पुराने डर को तोड़ता हुआ नजर आ रहा है। चुनाव आयोग ने पहले से ही एहतियात बरतते हुए देशभर से केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की, ताकि मतदान प्रक्रिया को हर हाल में शांतिपूर्ण रखा जा सके।
इसका असर जमीन पर साफ दिख भी रहा है। दो चरणों के मतदान में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जहाँ TMC के गुंडों और दबंगों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की लेकिन केंद्रीय बलों खासतौर पर CRPF ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया। कहीं बूथ कैप्चरिंग की कोशिश नाकाम की गई, तो कहीं वोटरों को डराने-धमकाने वालों को मौके पर ही घसीटा गया।
इसके बावजूद बंगाल की मुख्यमंत्री और भवानीपुर सीट से उम्मीदवार ममता बनर्जी CRPF को ‘अत्याचारी‘ कह रही हैं। उनका आरोप है कि मतदान केंद्रों पर राज्य पुलिस नजर नहीं आ रही और केंद्रीय बलों ने पूरे चुनाव पर कब्जा कर लिया है, यहाँ तक कि वे एक खास राजनीतिक दल के पक्ष में काम कर रहे हैं।
#WATCH | Kolkata: TMC candidate from Bhabanipur and West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee says, "… The CRPF personnel and central observers are beating people; they have not even spared women and children. Since last night, they have started atrocities. How many of our… pic.twitter.com/sb601D14hq
जबकि जमीनी हकीकत है कि हिंसा को काबू में किया जा रहा है। कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें सुरक्षाबल सख्ती से हालात को काबू में करते दिख रहे हैं और यही वजह है कि इस बार बंगाल के चुनाव में हिंसा पर नियंत्रण की एक नई तस्वीर सामने आ रही है।
बंगाल चुनाव में मोर्चा संभालते केंद्रीय बल के वायरल वीडियो
मतदान के दूसरे चरण में सबसे बड़ी घटना दक्षिण 24 परगना जिले के फाल्टा विधानसभा सीट से सामने आई, जहाँ से TMC उम्मीदवार जहाँगीर खान चुनाव लड़ रहा है। इस विधानसभा के बूथ संख्या 144 पर EVM पर BJP के बटन पर टेप लगाया गया। इसका वीडियो सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान करवाया। इस स्थिति का जायजा खुद चुनाव में पुलिस पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए उत्तर प्रदेश के IPS अफसर अजय पाल शर्मा ने लिया।
Diamond Harbour, West Bengal: Election Observer for the West Bengal Assembly elections, Ajay Pal Sharma, reviewed security arrangements and coordinated with paramilitary forces during the second phase of polling pic.twitter.com/kPWT1GYh0m
बता दें कि IPS अफसर अजय पाल पहले भी जहाँगीर खान के समर्थकों को मतदाताओं को डराने-धमकाने के लिए हड़का चुके हैं, जिसके बाद TMC उनके विरोध में उतर गई थी।
एक वीडियो सामने आया, जिसमें CRPF के जवान एक व्यक्ति को लटकाकर ले जा रहे हैं, दावा किया जा रहा है कि यह व्यक्ति मतदान में बाधा डाल रहा था और मतदाताओं को परेशान कर रहा था। वीडियो में दिख रहा यह व्यक्ति TMC समर्थक बताया गया। सुरक्षाबल और पुलिस इस व्यक्ति को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं।
🚨 BIG!
CRPF is pulling out TROUBLEMAKERS trying to create ruckus at polling booths over petty disruptions.
This is exactly the model Bengal needed, immediate removal, zero tolerance and no space for booth-level chaos👏🏽 pic.twitter.com/1OKPSADkEk
— The Analyzer (News Updates🗞️) (@Indian_Analyzer) April 29, 2026
अन्य वीडियो में CRPF के जवान मतदान में भंग पैदा करने की कोशिश करने वाले एक व्यक्ति को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं।
ऐसे ही बंगाल के भंगर में मतदान केंद्र पर ISF उम्मीदवार नौशाद सिद्दीकी के सामने उनके समर्थकों और TMC समर्थकों के बीच झड़प हो गई। इस झड़प में CRPF ने दखल दिया औऱ दोनों तरफ के गुंडों पर लाठीचार्ज कर खदेड़ दिया।
बंगाल के भंगर में आईएसएफ और टीएमसी के बीच खुल्लम खुल्ला फारे खींच गए |
आईएसएफ उम्मीदवार नौशाद सिद्दीकी ने टीएमसी के गुंडों को खदेड़ दिया |
इस बीच केंद्रीय बलों ने मौके पर पहुंच कर दोनों तरफ के गुंडों की लाठीचार्ज कर मरम्मत कर दी | pic.twitter.com/ve8jZHDpxr
CRPF इस तरीके से चुनाव संभाल रही है कि लोगों को ममता बनर्जी की बंगाल पुलिस से ज्यादा सुरक्षाबलों पर भरोसा हो रहा है। BJP नेता सुवेंदु अधिकारी तक भवानीपुर में मतदान केंद्र पर स्थिति बिगड़ने की शिकायत CRPF से करते हैं, उनका कहना है कि पुलिस पर भरोसा नहीं है।
ये वीडियो पहले चरण के मतदान के दौरान का है। जब दार्जीलिंग के एक बूथ के पास कुछ गुंडे मतदान में बाधा डालने के लिए इकट्ठा हुए, तब CRPF के जवानों ने भीड़ को तुरंत खदेड़ दिया और शांतिपूर्ण मतदान कराया।
अगर बंगाल में CRPF तैनात न होती तो क्या इतनी बम्पर वोटिंग हो पाती? बिल्कुल नहीं 🔥
वीडियो दार्जिलिंग का है जहां बूथ के पास कुछ गुंडे मतदान बाधित करने के उद्देश्य से इकट्ठा हुए थे।
यह वीडियो बीरभूम का है, जहाँ पहले चरण में EVM में खऱाबी को लेकर इस्लामी भीड़ ने पुलिस और CRPF पर हमला किया। इस हमले में केंद्रीय बलों के कई जवान घायल हुए, कुछ लोग भी घायल हुए, जिन्हें CRPF के जवान कंधे पर उठाकर सहायता देते नजर आ रहे हैं।
ये बंगाल है या बांग्लादेश!
वीरभूम में कट्टरपंथी ग्रामीणों ने CRPF ओर पुलिस को चारों ओर से घेर लिया और पथराव किया।
यहां तक कि पुलिस को अपनी बंदूकें तक निकालनी पड़ गयी।
दूसरे चरण में हिंसा की कोशिशें, लेकिन CRPF की सख्ती से हालात काबू में
इन वीडियो के अलावा भी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण के मतदान के दौरान 7 जिलों की 142 विधानसभा सीटों पर मतदान के बीच कई जगहों से तनाव और हिंसा की खबरें सामने आईं। नदिया जिले में BJP के एक पोलिंग एजेंट पर TMC के गुंडों ने हमला किया। वहीं आरजी कर रेप और मर्डर केस की पीड़िता की माँ, जो इस चुनाव में BJP उम्मीदवार हैं, उन्होंने भी आरोप लगाया कि TMC समर्थकों ने उनके साथ दुर्व्यवहार और हमला करने की कोशिश की। कई जगहों पर BJP के वाहनों को निशाना बनाने और वोटरों को डराने-धमकाने की घटनाएँ भी सामने आईं।
केंद्रीय सुरक्षाबलों ने बंगाल चुनाव की बदली तस्वीर
आखिर में तस्वीर साफ नजर आती है कि एक तरफ TMC लगातार केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती पर सवाल उठा रही है, उन्हें पक्षपाती बताने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ जमीन पर वही सुरक्षाबल चुनाव को हिंसा से बचाने में जुटे हुए हैं। बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन जिन इलाकों में पहले चुनाव के नाम पर डर और दबाव का माहौल बनता था, वहाँ इस बार सुरक्षाबलों की मौजूदगी ने हालात को काफी हद तक बदल दिया है।
सच्चाई यही है कि पूरे चुनाव के दौरान TMC के गुंडों की हिंसा को जिस तरह से कंट्रोल किया गया, उसने एक अलग ही तस्वीर पेश की है। हर कोशिश को समय रहते रोका गया, वोटरों को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश हुई और चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतरने नहीं दिया गया। ऐसे में विरोध और आरोपों के बीच यह सवाल और गहरा हो जाता है कि अगर सख्ती न होती, तो क्या बंगाल एक बार फिर उसी पुराने हिंसक दौर में लौट जाता?
मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 65 साल से अधिक पुराने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) और ओपेक+ से बाहर निकलने का फैसला किया है। UAE 1 मई 2026 से आधिकारिक तौर पर इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक तेल सप्लाई पहले से दबाव में है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हैं।
इस फैसले से जुड़ी एक और अहम बात जिसे लेकर चर्चा है वो है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की विदेश यात्रा। अपनी 25-26 अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने अबू धाबी में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जाएद से मुलाकात की थी। इस यात्रा के दौरान उनकी कुछ अन्य अहम मीटिंग भी हुईं। इसके 2 दिन बाद ही 28 अप्रैल को UAE ने OPEC छोड़ने का ऐलान कर दिया।
The UAE’s decision to exit from OPEC reflects a policy-driven evolution aligned with long-term market fundamentals. We thank OPEC and its member countries for decades of constructive cooperation. We remain committed to energy security, providing reliable, responsible, and…
ऐसे में UAE का यह कदम सिर्फ एक संगठन से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे तेल की कीमतों, सप्लाई और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। वहीं, भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए इसमें मौके भी छिपे हुए हैं।
ओपेक क्या है और क्यों बना था?
ओपेक (OPEC) यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (Organization of the Petroleum Exporting Countries) एक ऐसा इंटर गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन है जिसे 1960 में पाँच देशों ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर बनाया था।
उस समय तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था और तेल उत्पादक देशों को उचित कीमत नहीं मिल रही थी। ऐसे में इन देशों ने मिलकर एक ऐसा समूह बनाया जिसका उद्देश्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करना, कीमतों को स्थिर रखना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना था।
समय के साथ यह संगठन काफी शक्तिशाली हो गया और वैश्विक तेल बाजार में इसका बड़ा प्रभाव हो गया। बाद में ओपेक+ बना, जिसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक देश भी शामिल हुए, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।
कब जुड़ा UAE और क्या रही उसकी भूमिका?
UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है और इसकी उत्पादन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। UAE 1971 में ओपेक का सदस्य बना, हालाँकि अबू धाबी 1967 से ही इस समूह से जुड़ा हुआ था।
ओपेक के भीतर UAE को एक भरोसेमंद और अनुशासित सदस्य के रूप में देखा जाता था, जो संगठन के फैसलों का पालन करता था। इसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी थी, यानी जरूरत पड़ने पर यह उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बना सकता था। इसी वजह से इसे स्विंग प्रोड्यूसर के रूप में भी देखा जाता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
UAE ने ओपेक क्यों छोड़ा?
UAE ने अपने बयान में कहा है कि यह फैसला उसके राष्ट्रीय हित और लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल पिछले कुछ समय से UAE और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे।
सऊदी अरब चाहता था कि उत्पादन सीमित रखा जाए ताकि कीमतें ऊँची बनी रहें जबकि UAE ज्यादा उत्पादन करना चाहता था ताकि वह अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सके।
UAE ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह इन निवेशों का लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा UAE की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रही है। उसने पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विकास किया है, जिससे वह ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक फैसले लेने की स्थिति में है।
ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को लेकर असंतोष भी एक कारण माना जा रहा है, जिससे UAE ने अपने रास्ते अलग करने का फैसला लिया। UAE के बाहर निकलने के बाद ओपेक में अब कुल 11 सदस्य देश रह जाएँगे।
इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और कांगो गणराज्य शामिल हैं। इससे पहले कतर 2019 में और अंगोला 2024 में इस संगठन को छोड़ चुके हैं। लगातार देशों के बाहर निकालने से यह साफ पता चलता है कि ओपेक की एकजुटता कमजोर हो रही है और भविष्य में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता हैं।
UAE क्या हासिल करना चाहता है?
UAE का मुख्य उद्देश्य अधिक स्वतंत्रता के साथ अपने तेल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है। वह अब ओपेक के उत्पादन कोटा से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन बढ़ाना चाहता है।
इसके जरिए वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहता है। साथ ही, UAE खुद को एक स्वतंत्र ऊर्जा शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से फैसले ले सके। यह कदम उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकता है।
ओपेक पर इसका क्या असर पड़ेगा?
UAE के बाहर निकलने से ओपेक को कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। सबसे पहले संगठन की कुल उत्पादन क्षमता में कमी आएगी, जिससे उसकी बाजार पर पकड़ कमजोर होगी।
दूसरा, तेल की कीमतों को नियंत्रित करना ओपेक के लिए और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अब कम स्पेयर कैपेसिटी होगी। तीसरा, इससे संगठन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद और बढ़ सकते हैं और अन्य देश भी बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं।
इसके अलावा वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि एक कमजोर ओपेक सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखने में पहले जितना सक्षम नहीं रहेगा। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर होगा?
इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा, खासकर तब तक जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुल नहीं जाता। लेकिन लंबे समय में इसका असर जरूर पड़ेगा। UAE के ज्यादा उत्पादन करने से वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
हालाँकि इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता भी बढ़ सकती है, क्योंकि ओपेक की पकड़ कमजोर होगी और तालमेल कम हो जाएगा जिसका असर आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।
क्या भारत को फायदा होगा या नुकसान?
भारत के लिए यह स्थिति ज्यादातर मामलों में फायदेमंद मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करता है और उसमें से एक बड़ा हिस्सा ओपेक देशों से आता है।
UAE भारत का एक अहम सप्लायर है, इसलिए उसके ज्यादा उत्पादन करने से भारत को सस्ता तेल मिल सकता है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और महंगाई पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। अब भारत सीधे UAE के साथ लंबी अवधि के समझौते कर सकता है, जो पहले ओपेक के नियमों के कारण सीमित थे।
कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगर ब्लॉक रहता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।
UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि अब देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए पारंपरिक संगठनों से अलग होने में हिचक नहीं रहे हैं।
इससे जहाँ एक ओर ओपेक की ताकत कमजोर हो सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है, जहाँ वे सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत हासिल कर सकते हैं।
साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 की घोषणा पिछले दिनों हुई, जिसमें हिंदी में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रयागराज (पूर्व इलाहाबाद) के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश को याद करते हुए आया लेकिन इससे जुड़े विमर्श ने फिर से साहित्य अकादमी में वैचारिक प्रभाव और संस्थागत स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोदी सरकार के 11 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई लोग मानते हैं कि अकादमी में वामपंथी-प्रगतिशील प्रभाव का दबदबा अब भी कायम है।
वरिष्ठ पत्रकार तरुण विजय ने इस पुरस्कार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी ने वामपंथियों के यशोगान से पूर्ण एक पुस्तक अभी छापी है जबकि मोदी धरोहर की रक्षा और उनके योगदान पर केंद्रित पुस्तक को सांस्कृतिक सचिव को लौटा दिया गया। यह घटना अकादमी के भीतर वैचारिक असंतुलन को उजागर करती है।
स्वायत्तता या पुरानी लॉबी का चक्रव्यूह?
साहित्य अकादमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था है लेकिन इसका संविधान 1952 के सरकारी प्रस्ताव पर आधारित है, न कि संसदीय कानून पर। सर्वोच्च जनरल काउंसिल में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सरकार के पाँच नामित सदस्य, राज्य प्रतिनिधि और भाषा विशेषज्ञ शामिल होते हैं। पुरस्कार चयन बहु-स्तरीय है-भाषा-विशेष जूरी, एक्जीक्यूटिव बोर्ड की मंजूरी और अंतिम घोषणा।
आउटगोइंग काउंसिल ही इनकमिंग सदस्यों का चयन करती है, जिससे निरंतरता तो बनी रहती है लेकिन गुटबंदी और लॉबिंग की गुंजाइश भी बढ़ जाती है।
प्रधानमंत्री या संस्कृति मंत्रालय सीधे जूरी में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हाल ही में पुरस्कार घोषणा में तीन महीने का विलंब हुआ क्योंकि संस्कृति मंत्रालय ने ‘रिवार्ड स्ट्रक्चरिंग’ के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी थी। वामपंथी लॉबी ने इसे स्वायत्तता पर हमला बताया लेकिन विलंब के बाद घोषणा हुई और ममता कालिया जैसे नाम सामने आए।
यह घटनाक्रम साबित करता है कि सरकार एक झटके में पूरी प्रक्रिया नहीं बदल सकती। संविधान संशोधन के लिए व्यापक विमर्श, कानूनी प्रक्रिया और संसदीय सहमति जरूरी है। बिना इसके नई निर्वाचन प्रक्रिया-जैसे रोटेशन सिस्टम, अधिक पारदर्शी नामांकन और युवा/महिला प्रतिनिधित्व-नहीं लाई जा सकती।
ममता कालिया का मामला: पुरस्कार और वैचारिक असहजता
‘जीते जी इलाहाबाद’ संस्मरण में विभाजन काल के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों पर टिप्पणियाँ, ईद की कुर्बानी और ताजा गोश्त का भावुक वर्णन, कुंभ मेले में स्वच्छता अभियान पर आक्षेप जैसी बातें हैं। उनके परिवार का इलाहाबाद के मुस्लिम बहुल मुहल्ले रानी मंडी से 6 दिसंबर 1992 को भागना भी दर्ज है।
अपने संस्मरण के 159वें पृष्ठ पर कालिया एक प्रसंग दर्ज करती हैं। जिसमें बताती हैं कि जैदी साहब के घर पाँच किस्म का गोश्त बना था। जैदी, इंदिरा और नेहरू के प्रशंसक थे। उनका ही कोई किस्सा छेड़ बैठे थे।
अब आती है सेकुलर किस्म की पंक्ति:- अचानक मेरे जेहन में घंटी बजी। आज कौन वार है? मंगलवार। हे भगवान यह कैसी इम्तहान की घड़ी आ गई।
मैं सोम मंगल का कोई उपवास व्रत नहीं रखती थी। पर न जाने कब से एक रूढ़ि मन में बैठी थी कि आज मंगलवार को मांसाहार नहीं करते। मैने धीरे से रवि से कहा: मेरी प्लेट तुम ले लो। आज मंगल है।
रवि इसमें कहते हैं, बुधवार को खा ले और मंगल को बचे। उसे जबरदस्ती खिलाना चाहिए।
ममता कालिया की पीढ़ी के ‘साहित्यकारों’ के लिए मंगलवार जैसे प्रसंग अपनी कहानी, नाटक, संस्मरण में डालना अनिवार्य होता है। ‘हिन्दू’ साहित्यकार ऐसा लिखकर ही प्रगतिशील हो सकता है। मुसलमानों को पाँच वक्त के नमाज पर सवाल नहीं उठाना पड़ता। प्रगतिशील खेमे में सारी परीक्षा हिन्दुओं को देनी है।
भारत में प्रगतिशील मुसलमान लेखकों ने नासिख-मंसूख (Abrogation) के सिद्धांत पर चुप्पी साधी। पत्नी को पीटने की अनुमति, महिलाओं की गवाही आधी, बाल विवाह या आयशा की उम्र से जुड़े प्रश्नों पर प्रगतिशील ‘स्त्रीवादियों’ ने कुछ कहा ही नहीं। क्या मजबूरी थी?
इस्लाम के अंदर मौजूद दंड व्यवस्था, वहाँ मौजूद जिहाद और काफिरों से संबंधित आयतों पर प्रगतिशीलों का कुछ ना लिखना, क्या साबित नहीं करता कि वे कथित धर्मनिरपेक्ष सरकारों के संरक्षण में कट्टरपंथी मुसलमानों को प्रोत्साहित कर रहे थे। खलीफा उस्मान बिन अफ्फान ने कुरान के पाठ में भिन्नता के कारण पैदा हुए विवादों को रोकने और पाठ की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए कुरैश की बोली में एक मानक प्रति (उस्मानी मुस्हफ) तैयार करवाई। इसके बाद, उन्होंने अन्य सभी व्यक्तिगत या कथित गैर-मानक प्रतियों को नष्ट कर दिया, जिससे एकता बनी रहे और पाठ में कोई हेरफेर न हो।
क्या कभी किसी प्रगतिशील लेखक ने यह कहने का साहस जुटाया कि एके रामानुजन, थ्री हंडरेड रामायणा (1987) इसलिए लिख पाए क्योंकि इस देश में संवाद और विमर्श की परंपरा रही है। यहाँ वाल्मिकी रामायण के बाद श्रीराम के नाम पर काल्पनिक और षडयंत्र के हद तक लिखी गई झूठी कथाओं को भी जलाया नहीं गया। वह सब भी संरक्षित रहा। भारतीय परंपरा के इस शुक्ल पक्ष का उल्लेख जलेस और प्रलेस की किसी बैठक की मिनट्स में मिलता है क्या? नहीं मिलेगा?
जलाई गई तो उन लोगों के हाथों ‘मनु स्मृति’ जो चौक चौराहों पर ऊँची आवाज में गा रहे थे, बोल की लब आजाद हैं तेरे। बोल जबाँ अब तक तेरी है। तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा। बोल कि जाँ अब तक तेरी है।
प्रगतिशील लेखक समझते हैं कि उनकी ये टिप्पणियां देश की बहुसंख्यक आबादी को असहज करती हैं, फिर भी ऐसी रचनाओं को चुन चुन कर पुरस्कार दिया जाता है। ममता कालिया के नाम का चयन करने वाली जूरी में अरुण कमल, अनामिका और डॉ. अरविंदाक्षन जैसे सदस्य थे।
अकादमियों में अशोक वाजपेयी के ‘गुरुकुल’ से जुड़े नाम बार-बार दिखते हैं। ये दर्शाते हैं कि निर्णायक मंडल में पुरानी कांग्रेस-वाम मानसिकता का वर्चस्व बरकरार है। आज भी भारत सरकार के तमाम सांस्कृतिक केन्द्रो पर अशोक वाजपेयी एक महत्वपूर्ण नियामक बने हुए हैं। उनकी टीम के लोग सिस्टम में अपना काम करा लेने का हुनर जानते हैं।
राष्ट्रीय विचार को मजबूत बनाने के रास्ते
राष्ट्रीय विचार परिवार को अब विलाप नहीं, ठोस रणनीति चाहिए:
व्यापक विमर्श – अकादमी संविधान की खामियां (आउटगोइंग काउंसिल का स्व-चयन) सार्वजनिक बहस का विषय बनें। लेख, गोष्ठियाँ, सोशल मीडिया से दबाव बने।
अपने लोगों की उपस्थिति – निष्ठावान विद्वानों को राज्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संगठनों में स्थापित करना। वे नामांकन प्रभावित करेंगे।
नई पीढ़ी का निर्माण – युवा लेखकों को प्रोत्साहन, प्रकाशन और मंच। आत्ममुग्धता छोड़नी होगी।
वैकल्पिक संस्थाएँ – राष्ट्रीय विचार आधारित नई पुरस्कार योजनाएँ, साहित्यिक मंच शुरू करें। पुरानी व्यवस्था पर निर्भरता कम करें।
तत्व-निष्ठा – ‘सर्टिफिकेशन’ की लालसा छोड़कर विचार से समझौता न करने वाले नेतृत्व को आगे लाएं।
नैतिक दबाव का हथियार
जहाँ वामपंथियों का ही वर्चस्व है और अकादमी में गैर-वामपंथी विचार के 8-10 सदस्य ही हैं और वे रहकर कुछ नहीं कर पा रहे। यदि वे अकादमी की इस गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से इंकार कर दें, तो फर्क पड़ेगा।
वामपंथियों ने दशकों में नैरेटिव बनाया है कि श्रेष्ठ लेखक वही, जो बीजेपी और आरएसएस से घृणा करे। उनके समूह में अल्पसंख्यक बनकर गलत होते देखते रहें, या सामूहिक त्यागपत्र देकर मनमानी उजागर करें। यदि आप पुरस्कार देने वालों से खुद को अलग नहीं करेंगे, तो शामिल माने जाएंगे। ऐसे में 100 में 8 लोगों का त्यागपत्र भी दबाव का औजार बन सकता है। ‘मूंदहों आँखी कतहूँ कुछ नाहीं’ वाली मानसिकता छोड़नी होगी।
भारत में 2015 का पुरस्कार वापसी अभियान ने दबाव बनाया था, भले एक भी सम्मान न लौटा हो।
अमेरिका के नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के पूर्व निदेशक जोसेफ कैंट ने ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति पर इस्तीफा देकर वैश्विक बहस खड़ी की। उन्होंने लिखा- “मैं आर्मी वेटरन हूं, मेरी पत्नी इजरायल की जंग में शहीद हुई, लेकिन यह युद्ध अमेरिका के हित में नहीं।” जोसेफ कैंट भी सोच सकते थे कि एक इस्तीफे से क्या होगा?
विलाप से संघर्ष की ओर
ममता कालिया का पुरस्कार उदाहरण भर है। पूरे 24 भाषाओं में देखें तो स्थिति स्पष्ट है। साहित्य अकादमी में राष्ट्रीय विचार को शिखर पर पहुँचाने के लिए अब ‘काम खत्म’ वाला फरमान नहीं, निरंतर संघर्ष चाहिए। सरकार एक झटके में प्रक्रिया नहीं बदल सकती, लेकिन विमर्श और दबाव से नई निर्वाचन प्रक्रिया ला सकती है।
राष्ट्रीय विचार के साधकों को एकजुट होकर हर जगह उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। त्यागपत्र, विमर्श, नई संस्थाएँ-ये हथियार हैं। यदि हम ‘बाकी सब ठीक, बस चल रहा है’ वाली लाइन रटते रहे, तो विमर्श की लड़ाई में हार तय है।
समय है कि हम विलाप, प्रलाप और अपलाप से ऊपर उठें। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ राष्ट्र की आत्मा हैं। इन्हें वामपंथी कब्जे से मुक्त कर राष्ट्रीय विचार का सच्चा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना हमारा दायित्व है। ‘सबते भले हैं मूढ जिन्हि न व्यापत जगत गति’– यह मानसिकता अब छोड़नी होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से राज्य के सबसे बड़े एक्सप्रेस-वे ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ का उद्घाटन करेंगे। ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ सिर्फ दूरी कम करने का काम नहीं करेगा बल्कि पूरे राज्य की आर्थिक और तकनीकी तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।
मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह विशाल कॉरिडोर एक साथ सड़क, डिजिटल नेटवर्क, ऊर्जा सप्लाई, सुरक्षा सिस्टम और औद्योगिक विकास का आधार बनने जा रहा है। यही वजह है कि इसे एक ‘नेक्स्ट जेनरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ कहा जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के विकास की रफ्तार को भी तय करेगा।
परियोजना का आकार, लागत और डिजाइन
गंगा एक्सप्रेस-वे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है। इसे छह लेन के एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे के रूप में तैयार किया गया है जिसे भविष्य में आठ लेन तक बढ़ाया जा सकता है। इस पूरी परियोजना पर करीब 36,230 करोड़ रुपए की लागत आई है। इसकी डिजाइन स्पीड 120 किमी प्रति घंटा रखी गई है और अधिकांश संरचनाओं को पहले से ही आठ लेन के हिसाब से बनाया गया है ताकि भविष्य में विस्तार आसान हो।
किन जिलों को जोड़ता है यह एक्सप्रेसवे
यह एक्सप्रेस-वे मेरठ के बिजौली गाँव से शुरू होकर प्रयागराज बाईपास तक जाता है। इसके रास्ते में मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूँ, शाहजहाँपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज कुल मिलाकर 12 जिले आते हैं। यह कॉरिडोर पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश को एक ही हाई-स्पीड मार्ग से जोड़ता है जिससे क्षेत्रीय संतुलन और कनेक्टिविटी मजबूत होगी।
यात्रा समय और कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव
इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने के बाद मेरठ से प्रयागराज तक का सफर जो पहले 10 से 12 घंटे का होता था वो अब घटकर लगभग 6 से 7 घंटे रह जाएगा। इससे न केवल आम यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि माल ढुलाई और औद्योगिक परिवहन भी तेज होगा। यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे और अन्य प्रमुख सड़कों से कई इंटरचेंज के जरिए जुड़ा है जिससे अलग-अलग शहरों तक सीधी पहुँच आसान होगी।
निर्माण मॉडल और इंजीनियरिंग की खासियत
गंगा एक्सप्रेसवे को 12 पैकेज में बाँटकर बनाया गया है जिनमें से बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र, खासकर अदाणी ग्रुप द्वारा तैयार किया गया है। करीब 464 किलोमीटर हिस्से का निर्माण DBFOT (Design, Build, Finance, Operate and Transfer) मॉडल पर किया गया है, जिसमें निर्माण, फाइनेंस और संचालन की जिम्मेदारी निजी कंपनी के पास रहती है। निर्माण के दौरान बड़े पुल, अंडरपास, फ्लाईओवर, रेल ओवरब्रिज और कई इंटरचेंज बनाए गए हैं। गंगा और रामगंगा जैसी नदियों को पार करने के लिए लंबे पुल भी तैयार किए गए हैं।
पर्यावरण और संसाधनों का संतुलन
इस परियोजना के निर्माण में लाखों टन कचरे का उपयोग किया गया है। इससे निर्माण में रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिला है। इसके साथ ही करीब 18 लाख पेड़ लगाए गए हैं जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। यह दिखाता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर बनाए जा सकते हैं।
डिजिटल हाईवे और यूटिलिटी कॉरिडोर
गंगा एक्सप्रेसवे के साथ 2 मीटर चौड़ा यूटिलिटी कॉरिडोर बनाया गया है, जो इसे डिजिटल हाईवे बनाता है। इसके भीतर ऑप्टिकल फाइबर, बिजली की लाइनें और गैस पाइपलाइन बिछाई जा सकती हैं। इस व्यवस्था के कारण सड़क को खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यही नेटवर्क 519 गाँवों तक ब्रॉडबैंड और 5G कनेक्टिविटी पहुँचाने में मदद करेगा और भविष्य में डेटा सेंटर जैसी सुविधाओं के लिए आधार बनेगा।
ऊर्जा कॉरिडोर और गैस सप्लाई
इस एक्सप्रेसवे के साथ ऊर्जा गंगा परियोजना के तहत गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना भी है। इससे रास्ते में आने वाले गाँवों और उद्योगों को PNG और CNG जैसी सस्ती ईंधन सुविधाएँ मिल सकेंगी। इससे न केवल ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी।
स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और सुरक्षा तकनीक
एक्सप्रेसवे पर स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है जो AI और सेंसर तकनीक पर काम करता है। हर 2-3 किलोमीटर पर लगे कैमरे और सेंसर कंट्रोल रूम से जुड़े हैं। अगर कोई वाहन रुकता है, गलत दिशा में चलता है या कोई हादसा होता है, तो तुरंत अलर्ट भेजा जाता है। इससे एंबुलेंस और पेट्रोलिंग टीम तेजी से मौके पर पहुँच सकती है और हादसों में जान बचाने की संभावना बढ़ती है।
इसके अलावा गंगा एक्सप्रेसवे में रिकॉर्ड 24 घंटे के भीतर 10.3 किलोमीटर लंबा कंक्रीट क्रैश बैरियर बिछाया गया है। इसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। ये हादसे के वक्त वाहनों की टक्कर को रोकने में सक्षम होते हैं।
3.5 किलोमीटर लंबी एयरस्ट्रिप
शाहजहाँपुर जिले में गंगा एक्सप्रेसवे पर 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन लैंडिंग सुविधा (एयरस्ट्रिप) का निर्माण किया गया है। इसे खास तौर पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि जरूरत पड़ने पर यहाँ वायुसेना के विमान लैंडिंग और टेक-ऑफ कर सकें। इस एयरस्ट्रिप की उपयोगिता को परखने के लिए भारतीय वायुसेना द्वारा यहां ट्रायल लैंडिंग भी की जा चुकी है।
परियोजना से जुड़े विवरण के अनुसार, इस एयरस्ट्रिप का निर्माण एक्सप्रेसवे के उसी ढाँचे के भीतर किया गया है, लेकिन इसकी सतह को सामान्य सड़क की तुलना में ज्यादा मजबूत बनाया गया है। इसके साथ ही इस एयरस्ट्रिप पर करीब 250 कैमरे लगाए गए हैं, जिससे इसकी निगरानी लगातार की जा सके और इसे एक्सप्रेसवे के समग्र सुरक्षा सिस्टम से जोड़ा जा सके।
टोल सिस्टम और आर्थिक असर
गंगा एक्सप्रेसवे की एक बड़ी खासियत इसकी टोलिंग और ट्रैफिक फ्लो सिस्टम में छिपी है। इसमें ‘क्लोज्ड टोलिंग सिस्टम’ लागू किया गया है यानी वाहन चालक को सिर्फ एंट्री और एग्जिट पर ही रुकना होगा और दूरी के हिसाब से भुगतान करना होगा।
इससे बार-बार ब्रेक लगाने और गति बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे ईंधन की बचत होगी और सफर ज्यादा स्मूथ बनेगा। इस पूरे कॉरिडोर में 2 मुख्य टोल प्लाजा मेरठ और प्रयागराज में बनाए गए हैं जबकि 19 रैम्प टोल प्लाजा अलग-अलग एंट्री-एग्जिट पॉइंट्स पर होंगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार के लिए संभावित टोल दर लगभग 2.55 रुपए प्रति किलोमीटर हो सकती है जिससे पूरे एक्सप्रेसवे का सफर करीब 1500 रुपए में पूरा हो सकता है। हालाँकि, अंतिम दर सरकार तय करेगी। इसके अलावा 18 एक्सेस नोड्स बनाए गए हैं, जहाँ यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे और प्रमुख जिला सड़कों से जुड़ता है जिससे कनेक्टिविटी का जाल और मजबूत होता है।
इसके अलावा रास्ते में कई लॉजिस्टिक और औद्योगिक कॉरिडोर विकसित किए जाएँगे जिससे रोजगार, निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। किसानों को भी सीधे बाजार तक पहुँच मिलने से बेहतर कीमत मिल सकेगी।
मुंबई के मीरा रोड इलाके में धर्म पूछकर जैब जुबैर अंसारी ने दो सिक्योरिटी गार्डों सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा पर चाकू से हमला कर दिया। जुबैर ने दोनों गार्डों को ‘कलमा’ सुनाने को भी कहा और ऐसा न करने पर उसने जान से मारने की कोशिश की। आरोपित जुबैर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जाँच एजेंसियाँ इसे ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के तौर पर देख रही हैं।
पूरा मामला 27 अप्रैल 2026 को मीरा रोड के नया नगर इलाके स्थित निर्माणाधीन इमारत ‘अस्मिता ग्रांड मैन्सन’ का है, जहाँ सुरक्षा में दो सिक्योरिटी गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा तैनात थे। पुलिस के मुताबिक, तड़के सुबह 3 बजे आरोपित जुबैर अंसारी ने पहले गार्ड सुब्रतो सेन से मस्जिद का रास्ता पूछा। एक घंटे बाद वापस आया और धर्म पूछने लगा। पुलिस का कहना है कि आरोपित जुबैर ने दूसरे गार्ड राजकुमार मिश्रा से कलमा भी पड़वाया और जब वह कलमा नहीं पढ़ पाए तो चाकू से हमला कर दिया।
हमले में दोनो गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा गंभीर रूप से घायल हुए है, जिनका इलाज जारी है। डॉक्टर्स के अनुसार, सुब्रतो सेन खतरे से बाहर हैं जबकि राजकुमार मिश्रा की हालत गंभीर बनी हुई है। वहीं पुलिस ने 31 साल के आरोपित जैब जुबैर अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है।
पीड़ित गार्ड का बयान
इलाज के बाद खतरे से बाहर गार्ड सुब्रतो सेन ने पुलिस को बयान दिया है। सेन ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि घटना लगभग सुबह 3 बजे की है, जब वह ड्यूटी पर थे। जुबैर अंसारी उनके पास आया और पूछा कि यहाँ कोई मस्जिद है क्या? इस पर सेन ने जवाब दिया कि दाएँ हाथ पर एक मस्जिद है, लेकिन उन्हें नाम नहीं मालूम। जुबैर ने गार्ड सेन से आगे पूछा, “क्या तुम हिंदू हो?” सेन ने हामी भरी। इसके बाद जुबैर वहाँ से चला गया। लेकिन सेन ने बताया कि वह आसपास सड़क पर घूमता रहा।
सेन ने आगे बताया, ” मैं लगभग 4 बजे मैं राजज सिनेमा के पास एक ईरानी चाय की दुकान पर चाय पीने गया। तब वहाँ मुझे वही आदमी (जुबैर अंसारी) दिखा। चाय पीने के बाद मैं 4.30 बजे अपनी ड्यूटी वाली जगह पर वापस आ गया। वही आदमी मेरे पास आया और कहने लगा- तुम हिंदू हो, है न? उसने फिर मेरे दाएँ हाथ को पकड़ा और चाकू से हमला कर दिया। मैंने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसने चाकू मेरी पींठ पर घोंप दिया।”
(फोटो साभार: IANS)
सेन ने आगे बताया, “मैं जैसे-तैसे उसके हमले से बचकर सुपरवाइजर के केबिन में पहुँचा और सारा मामला बताने लगा। तभी जुबैर अंसारी वहाँ पहुँच गया औऱ सुपरवाइजर से भी वही पूछा- तुम भी हिंदू हो, है न?अगर नहीं हो तो कलमा पढ़कर सुनाओ। जब मिश्रा कलमा नहीं पढ़ सके, तो जुबैर ने उनको चाकू से गोद डाला। डर के मारे मैं वहाँ से भाग गया और इमारत के पीछे जाकर छिप गया। 5-7 मिनट बाद जब मुझे कोई हलचल सुनाई नहीं दी, तब मैंने मिश्रा सर को फोन किया। उस समय मिश्रा सर रो रहे थे और उन्होंने मुझसे कहा- मैं मर जाऊँगा। मैं केबिन में पहुँचा तो दो और गार्ड मौके पर मौजूद थे। वे मिश्रा सर और मुझे अस्पताल ले गए।”
90 मिनट के जुबैर गिरफ्तार, फोन में मिला कट्टरपंथी कंटेन्ट
सूचना मिलते ही महाराष्ट्र पुलिस की एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने CCTV की मदद से आरोपित जुबैर अंसारी की पहचान की और 90 मिनट के भीतर उसके मीरा रोड ईस्ट के नया नगर इलाके स्थित घर से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गार्ड सुब्रतो सेन की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई।
पुलिस ने बताया कि आरोपित जुबैर अंसारी मूलरूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला था। वह साइंस से ग्रेजुएट है और 2010 से 2019 तक अमेरिका में भी रह चुका है। नौकरी नहीं मिली तो वह वापस भारत लौट आया और मीरा रोड में अकेले रहने लगा। यह भी बताया गया कि वह केमिस्ट्री की ऑनलाइन कोचिंग पढ़ाता था।
महाराष्ट्र ATS ने जुबैर के घर की छापेमारी
मामला गंभीर होने के चलते अब इसकी जाँच महाराष्ट्र ATS को सौंपी गई है। जाँच एजेंसियाँ इस हमले को संभावित ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के रूप में देख रही हैं। ATS ने आरोपित जुबैर अंसारी के किराए घर पर छापेमारी की। छापेमारी में जुबैर के घर से हाथ से लिखे गए कुछ नोट्स बरामद हुए। जाँच एजेंसियों के अनुसार, नोट्स में ISIS में भर्ती होने की इच्छा जताई गई थी और गार्ड पर हमले को इस ओर अपना पहला कदम बताया गया था।
Maharashtra Anti-Terrorism Squad (ATS) has launched an investigation into the attack on two security guards near the Asmita Grand Mansion in the Naya Nagar area of Mira Road on 27th April. Security agencies are treating it as a possible "lone wolf" terror attack. The accused,…
जाँच एजेंसियों मान रही हैं कि कि वह एकांतवास में रहता था इसीलिए इंटरनेट कट्टरपंथी विचारधारा का कंटेन्ट देखता था, जिससे प्रभावित होकर उसने यह हमला किया। फिलहाल उसके मोबाइल फोन और लैपटॉप की फोरिंसिक जाँच की जा रही है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि वह किसी विदेशी आतंकी नेटवर्क या हैंडलर के संपर्क में था या नहीं।
क्या है ‘लोन वुल्फ’ हमला?
मुंबई में हिंदू गार्ड पर धर्म पूछकर और कलमा न सुनाने पर चाकू से किए गए इस हमले को जाँच एजेंसियाँ ‘लोन वुल्फ‘ आंतकी हमले के रूप में देख रही हैं। यानी वो आतंकी हमला, जिसमें कोई अकेला व्यक्ति किसी बड़े आतंकी संगठन के सीधे आदेश या मदद के बिना अकेले ही हमला करता है। ऐसा हमलावर अक्सर इंटरनेट, सोशल मीडिया या कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर खुद ही योजना बनाता है और उसे अंजाम देता है।
चूँकि इसमें कोई बड़ा नेटवर्क या कोई बड़ा संगठन शामिल नहीं होता, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के लिए ऐसे हमलों का पहले से पता लगाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि ‘लोन वुल्फ’ आज दुनिया भर में सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। मुंबई में गार्ड पर हमला भी इसी तरह प्लान किया गया था, यहाँ आरोपित इंटरनेट से कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था और वह हिंदुओं से नफरत करने लगा इसीलिए उसने पीड़ितों से धर्म पूछकर उनपर हमला किया।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपर्णा यादव को लेकर उठा ताजा विवाद महज एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के भीतर वर्षों से सुलग रहे सत्ता संघर्ष की एक और खुली परत है। मामला तब भड़का जब भाजपा के विरोध प्रदर्शन के दौरान अपर्णा यादव भी सड़कों पर उतरीं और सपा-कॉन्ग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए उनके झंडे जलाए गए।
यही वह बिंदु था जिसने सपा कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के भीतर आक्रोश पैदा किया और अपर्णा के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया शुरू हुई। लेकिन यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है – क्योंकि इस विरोध के बीच शिवपाल यादव ने इसे ‘परिवार’ का मामला बताते हुए सार्वजनिक प्रतिक्रिया से बचने की सलाह दी जबकि अखिलेश यादव ने इस लाइन को खारिज कर दिया।
यहीं से साफ हो गया कि यह टकराव अपर्णा के विरोध से ज्यादा उस नियंत्रण की लड़ाई है, जो सपा की राजनीति का स्थायी चरित्र बन चुकी है।
अपर्णा के बहाने फिर उठा पुराना सवाल
अपर्णा यादव का विरोध किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं बल्कि उनके राजनीतिक रुख से उपजा। भाजपा के प्रदर्शन में शामिल होकर सपा और कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी करना और झंडे जलाने जैसी घटनाओं ने सपा के भीतर स्वाभाविक आक्रोश पैदा किया।
यह सिर्फ एक राजनीतिक असहमति नहीं थी बल्कि इसे सपा के खिलाफ ‘खुले मोर्चे’ के रूप में देखा गया। ऐसे में पार्टी के भीतर प्रतिक्रिया आना तय था। लेकिन यहीं पर शिवपाल यादव का ‘परिवार’ वाला तर्क और अखिलेश यादव का ‘पार्टी लाइन’ वाला रुख आमने-सामने आ गया।
यह वही बिंदु है जहाँ सपा के भीतर वर्षों पुराना सवाल फिर खड़ा हो गया है- क्या पार्टी में फैसले रिश्तों के आधार पर होंगे या एक केंद्रीकृत नेतृत्व के हिसाब से?
2012 में सत्ता के साथ बदला संतुलन
अखिलेश और शिवपाल में टकराव काफी पहले से रहा है। 2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तब यह सिर्फ एक राजनीतिक बदलाव नहीं था बल्कि सपा के भीतर शक्ति संतुलन के बदलने की शुरुआत भी थी।
एक ओर युवा चेहरा था, जिसे आगे बढ़ाया गया, वहीं दूसरी ओर संगठन और जमीन पर पकड़ रखने वाले शिवपाल यादव थे। शुरुआत में यह द्वंद्व दबा रहा लेकिन जैसे-जैसे फैसलों पर नियंत्रण का सवाल उठा, यह टकराव खुलने लगा। टिकट वितरण, प्रशासनिक हस्तक्षेप और संगठनात्मक निर्णयों में बढ़ती खींचतान ने दोनों खेमों को अलग-अलग ध्रुवों में बदल दिया।
2016 का विस्फोट: जब चाचा-भतीजे आमने-सामने आ गए
2016 में कौमी एकता दल के विलय को लेकर विवाद ने इस संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया। अखिलेश यादव ने इस विलय को सिरे से खारिज किया जबकि शिवपाल यादव इसके समर्थन में थे। इसके बाद घटनाएँ तेजी से बढ़ीं- मंत्रालय छीने गए, पद बदले गए और अंततः बर्खास्तगी तक की नौबत आ गई।
यह टकराव इतना गहरा था कि पार्टी दो हिस्सों में बँटती नजर आई और मामला चुनाव आयोग तक पहुँच गया। 2017 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे साफ हो गया कि अब सपा में अंतिम निर्णय का केंद्र बदल चुका है।
परिवार में दखल का नैरेटिव: प्रतीक-अपर्णा प्रकरण की चर्चा
सपा की राजनीति में यह नैरेटिव भी लंबे समय से चलता रहा है कि प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के निजी संबंधों में आई खटास तक में राजनीतिक प्रभाव की भूमिका रही। यह आरोप और चर्चाएँ भले ही आधिकारिक रूप से स्थापित न हों लेकिन यह धारणा जरूर बनी कि सत्ता के समीकरणों का असर परिवार के निजी दायरे तक पहुँच गया था।
यहाँ यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि जब शिवपाल यादव ‘परिवार’ की मर्यादा की बात करते हैं, तो वह सिर्फ एक रिश्ते की रक्षा नहीं बल्कि उस पूरे ढाँचे की बात कर रहे होते हैं जिसे धीरे-धीरे राजनीतिक नियंत्रण के आगे कमजोर किया गया।
शिवपाल का असंतोष और मुलायम का कड़ा आकलन
शिवपाल यादव का असंतोष कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है और समय-समय पर उनके बयानों में यह झलकता भी रहा है कि उन्हें पार्टी के भीतर अपेक्षित सम्मान और भूमिका नहीं मिल रही।लेकिन करहल में दिया गया वह चर्चित बयान, जिसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना एक गलती थी, पूरे विवाद को एक अलग ही गंभीरता देता है।
यह महज एक राजनीतिक तंज नहीं बल्कि उस पीढ़ीगत और नेतृत्वगत टकराव का संकेत माना गया, जो वर्षों से सपा के भीतर पनपता रहा है। आज जब शिवपाल खुद को ‘मामूली सिपाही’ बताते हैं, तो यह उसी लंबे असंतोष और हाशिए पर चले जाने की भावना का विस्तार प्रतीत होता है।
‘औरंगजेब’ से तुलना और सत्ता का चरित्र
उल्लेखनीय है कि अमर सिंह ने एक समय दावा किया था कि मुलायम सिंह यादव ने खुद उनसे कहा था कि अखिलेश यादव का व्यवहार औरंगजेब जैसा है। यह आरोप भले ही राजनीतिक विवाद का हिस्सा रहा ह, लेकिन इसने उस धारणा को मजबूत किया कि सपा में सत्ता संघर्ष ने रिश्तों की सीमाओं को कई बार पीछे छोड़ दिया। सार्वजनिक मंचों पर टकराव, माइक को लेकर धक्का-मुक्की जैसी घटनाएँ भी इसी तनाव की झलक देती रही हैं।
मजबूरी की सुलह, मगर दरार कायम: 2022 के बाद अब तक की स्थिति
मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव ने एक बार फिर परिवार को साथ खड़ा किया लेकिन यह एक भावनात्मक और राजनीतिक मजबूरी ज्यादा लगी। शिवपाल यादव ने समर्थन दिया और सपा में वापसी भी हुई लेकिन घटनाओं की हालिया कड़ी यह दिखाती है कि अंदरूनी दरार खत्म नहीं हुई। अपर्णा यादव के मुद्दे पर सामने आया ताजा टकराव इसी बात की पुष्टि करता है।
चुनावी असर: क्या फिर दोहराएगा इतिहास?
चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में इस तरह का टकराव सपा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती है, कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होता है और विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है।
सबसे अहम यह कि जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पार्टी अपने ही भीतर संतुलन नहीं बना पा रही।ऐसे में, पूरे घटनाक्रम को अगर एक रेखा में समझा जाए तो स्पष्ट होता है कि अपर्णा यादव इस कहानी का कारण नहीं, बल्कि एक ट्रिगर हैं।
असली कहानी वही पुरानी है- सत्ता, नियंत्रण और वर्चस्व की। एक तरफ शिवपाल यादव हैं, जो परिवार और परंपरा की बात करते हैं, दूसरी तरफ अखिलेश यादव हैं, जो केंद्रीकृत नियंत्रण के साथ पार्टी को चलाना चाहते हैं।
जब तक यह टकराव बना रहेगा, तब तक हर नया विवाद, चाहे वह अपर्णा का हो या किसी और का, सपा के भीतर इस संघर्ष को फिर से सतह पर लाता रहेगा। यही इस पूरी कहानी का सार है, और यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी है।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश के चर्चित IPS अफसर अजय पाल शर्मा को बंगाल चुनाव में पर्यवेक्षक बनाए जाने के बाद सियासी बवाल मच गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता उन्हें धमकाने लगे हैं। बंगाल में बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण का विधानसभा चुनाव होना है। जिन इलाकों में दूसरे चरण का चुनाव हो रहा है, उन्हें पारंपरिक रूप से TMC का गढ़ माना जाता रहा है।
इन इलाकों में मतदाताओं पर दबाव की कोशिशें ना हों और चुनाव निष्पक्ष रहे इसके लिए चुनाव आयोग ने सख्त रणनीति अपनाई है और कई सख्त अधिकारियों को पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है। इसी कड़ी में अजय पाल शर्मा की भी दक्षिण 24 परगना का ऑब्जर्वर बनाया गया है। हालाँकि, अजय पाल को लेकर विवाद शुरू हो गया है और TMC व समाजवादी पार्टी ने उन पर सवाल उठाए हैं।
जहाँगीर को ‘चेतावनी’ देने पर शुरू हुआ विवाद
अजय पाल शर्मा को लेकर विवाद TMC के उम्मीदवार जहाँगीर को चेतावनी देने से शुरू हुआ। अजय पाल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें वह TMC प्रत्याशी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले जहाँगीर खान के घर पर जाकर उनके ‘गुंडों’ को सख्त चेतावनी देते दिख रहे हैं।
बीजेपी की आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने भी X पर यह वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में अजय पाल कह रहे हैं, “जहाँगीर के घरवाले भी खड़े हैं। उसको बता देना कायदे से, बार-बार जो खबरें आ रही हैं कि उसके लोग धमका रहे हैं। तो फिर अच्छे से खबर लेंगे, बाद में रोना पछताना मत।”
अमित मालवीय ने लिखा, “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और यूपी पुलिस के सिंघम अजय पाल शर्मा को दक्षिण 24 परगना में पुलिस पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात किया गया है। उन्होंने तुरंत ही अपना रुख स्पष्ट कर दिया और अभिषेक बनर्जी के करीबी सहयोगी जहाँगीर खान के परिवार को कड़े शब्दों में चेतावनी दी।” मालवीय ने लिखा, “यह साफ संदेश है कि धमकियों और मनमानी का दौर खत्म हो गया है। कानून व्यवस्था कायम रहेगी और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।”
Ajay Pal Sharma, the encounter specialist and “Singham” of UP Police, has been deployed as Police Observer in South 24 Parganas.
He wasted no time in setting the tone, firmly reading the riot act to the family members of Abhishek Banerjee’s close aide, Jehangir Khan.
अजय पाल शर्मा की सख्त चेतावनी सुन TMC बौखला गई और अजय पाल शर्मा के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। TMC के प्रवक्ता रिजू दत्ता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “साफ-साफ शब्दों में अजय पाल शर्मा को बताना चाहता हूँ। आपके ऊपर हमारी नजर है। आप जो गैर-कानूनी काम कर रहे हैं, रात के अँधेरे में रेड कर रहे हैं। महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार कर रहे हैं।”
रिजू दत्ता ने कहा, “अपने बीजेपी के मालिकों के निर्देश पर जो असंवैधानिक काम आप कर रहे हैं। मैं आपको बता देना चाहता हूँ 4 तारीख को नतीजे आने के बाद आप जहाँ भी भाग जाएँ, आप छिप नहीं पाएँगे।”
रिजू दत्ता ने अजय पाल शर्मा को धमकाते हुए कहा, “आपको ऐसा लगता होगा कि दूसरे राज्य में हमारे बीजेपी के मालिक हमें बचा लेंगे। मैं सीधे तौर पर कहना चाहता हूँ कि आपके खिलाफ FIR होगी, चार्जशीट होगी और आपको घसीटकर कोर्ट में लाया जाएगा, जहाँ पर कानून सख्त-से-सख्त कार्रवाई आपके खिलाफ करेगा। कोई बीजेपी का मालिक आपको बचा नहीं पाएगा।”
TMC की राज्यसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने X पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए पोस्ट लिखा। महुआ ने लिखा, “मेरे फेयर & लवली बबुआ अजय पाल- हम तो वो लोग हैं जो कायदे से आपके छोटे फैंटा और बड़े फैंटा का भी इलाज कर लेते हैं। हीरो गिरी थोड़ा संभाल कर कीजिए।”
Mera Fair & Lovely babua @DripsAjaypal – Hum toh woh log hai joh kaidey se apke Chhota Fanta aur Bada Fanta ka bhi ilaaj kar lete hai!! Herogiri thoda samhaal ke kijiye. pic.twitter.com/eLOrg5bQOi
अजय पाल को लेकर बौखलाहट सिर्फ TMC तक ही सीमित नहीं रही बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी बौखला गए और अजय पाल पर आरोप लगाने लगे। उन्होंने X पर IPS अधिकारी का एक वीडियो शेयर कर लिखा, “प. बंगाल में भाजपा ने ऑब्जवर के नाम पर रामपुर व संभल में टेस्ट किये हुए अपने एजेंट भेजे हैं लेकिन इनसे कुछ होने वाला नहीं। दीदी हैं, दीदी रहेंगी!”
अखिलेश ने आगे लिखा, “सही समय आने पर भाजपा और उनके संगी-साथियों के इन जैसे ‘एजेंडों के एजेंटों’ की सारी आपराधिक करतूतों की गहरी जाँच होगी और बेहद सख्त दंडात्मक कार्रवाई भी। ये सब अधिकारी के रूप में अनरजिस्टर्ड लोगों के अनरजिस्टर्ड अंडरग्राउंड सदस्य हैं। हम न इन्हें भागने देंगे, न भूमिगत होने देंगे। ये खोज के लाए जाएँगे, खोद के लाए जाएँगे और अपने कुकृत्यों के लिए कानूनी सजा भी पाएँगे।”
प. बंगाल में भाजपा ने ऑब्जवर के नाम पर रामपुर व संभल में टेस्ट किये हुए अपने एजेंट भेजे हैं लेकिन इनसे कुछ होने वाला नहीं। दीदी हैं, दीदी रहेंगी!
सही समय आने पर भाजपा और उनके संगी-साथियों के इन जैसे ‘एजेंडों के एजेंटों’ की सारी आपराधिक करतूतों की गहरी जाँच होगी और बेहद सख़्त… pic.twitter.com/MlQuCiSn3p
TMC की बौखलाहट यूँ ही नहीं है। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा होना लंबे समय से आम रहा है, नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा वोट के लिए लोगों को धमकाना। यहाँ तक की हत्या और बमबाजी की खूब घटनाएँ सामने आती रही हैं। हालाँकि, इस बार चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी सूरत में चुनावी हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेगा। चुनाव आयोग ने बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की है और पुलिस अधिकारियों के भी लगातार तबादले किए हैं।
भयमुक्त चुनाव के लिए बंगाल में करीब 2,400 अर्धसैनिक बलों की कंपनियाँ तैनात की गई हैं जिनमें लगभग 2,40,000 जवान शामिल हैं। चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव भयरहित, हिंसारहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ और सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे। बंगाल में बीजेपी के आक्रामक प्रचार और प्रबंधन के चलते TMC को इस बार सत्ता जाने का डर सता रहा है। इन चुनावों का दूसरा चरण ही TMC को अपने लिए राहत लग रहा है क्योंकि यहीं से उसे अधिक सीटें मिलने की उम्मीद है।
हालाँकि, चुनाव में वोटरों पर किसी भी तरह का दबाव ना बन पाए इसलिए चुनाव आयोग ने बाहरी अधिकारियों को भी पर्यवेक्षक बनाकर तैनात किया है। अजय पाल शर्मा जैसे ये पर्यवेक्षक चुनावों में किसी भी तरह की धमकी-हिंसा को रोकने के लिए जमीन पर लगातार काम कर रहे हैं। TMC से जुड़े लोगों द्वारा किसी भी तरह का दबाव ना बनाया जा सके इसकी पूरी तैयारी की जा रही है। इन अधिकारियों का यही आक्रामक रवैया TMC की आँख की किरकिरी बन गया है। वो अजय पाल पर निजी हमले से लेकर उन्हें धमकाने तक पर उतर आए हैं।
कौन हैं एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अजय पाल शर्मा?
2011 बैच के IPS अधिकारी अजय पाल शर्मा को उत्तर प्रदेश पुलिस में एक सख्त और तेज-तर्रार अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनकी कार्यशैली और अपराधियों के प्रति कड़े रुख के कारण उन्हें अक्सर ‘यूपी का सिंघम’ और ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ कहा जाता है।
26 अक्टूबर 1985 को लुधियाना में जन्मे अजय पाल शर्मा ने 19 दिसंबर 2011 को भारतीय पुलिस सेवा जॉइन की। हाल ही में उन्हें पदोन्नति देकर DIG बनाया गया है और इस समय वे प्रयागराज में जॉइंट पुलिस कमिश्नर के रूप में तैनात हैं। खास बात यह है कि IPS बनने से पहले उन्होंने डेंटल साइंस की पढ़ाई की थी और वह पेशे से डॉक्टर भी रह चुके हैं।
शिक्षा के मामले में भी उनका रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा है। उन्होंने UPSC की तैयारी 2008 में शुरू की थी। 2009 में प्रारंभिक सफलता मिलने के बावजूद इंटरव्यू पार नहीं कर सके लेकिन हार नहीं मानी और बाद में ऑल इंडिया 17वीं रैंक हासिल कर आईपीएस बने। स्कूल के दिनों में भी वह टॉपर रहे और हाईस्कूल में राज्य स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल किया। साथ ही हिंदी, अंग्रेजी और गणित में पूरे 100 अंक प्राप्त किए।
उनकी पहली पोस्टिंग सहारनपुर में हुई जिसके बाद उन्होंने मथुरा, नोएडा, जौनपुर सहित कई जिलों में काम किया। 16 मार्च 2018 से 7 जनवरी 2019 तक वह गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के SSP रहे, जहाँ उन्होंने अपराध के खिलाफ सख्त अभियान चलाया। उनके कार्यकाल में कई इनामी बदमाश इलाके छोड़कर भाग गए। उनके खौफ से अपराधियों ने खुद थाने जाकर सरेंडर करना शुरू कर दिया था। अपराधी तख्ती लटकाकर थाने जाते और सरेंडर कर देते।
साल 2019 में उनका नाम पूरे प्रदेश में तब चर्चित हुआ जब रामपुर में छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोपित को मुठभेड़ में गिरफ्तार किया गया। इस कार्रवाई के बाद उनकी छवि और भी सख्त अधिकारी के रूप में स्थापित हुई। इसके अलावा कैराना पलायन से जुड़े आरोपित की गिरफ्तारी भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।
अजय पाल शर्मा ने अपने करियर में 5 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक के कई इनामी अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की और कई को मुठभेड़ों में ढेर किया। खनन माफिया पर एनएसए लगाने जैसे कड़े कदम भी उठाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी नीति भी स्पष्ट रही, उन्होंने 63 से अधिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करवाई, यहाँ तक कि नोएडा में एक इंस्पेक्टर पर उसी के थाने में केस दर्ज कराया।
कुल मिलाकर अजय पाल शर्मा की पहचान एक ऐसे पुलिस अधिकारी की है जो फिटनेस, अनुशासन और अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के लिए जाने जाते हैं। उनकी यही नीति अब बंगाल में TMC के लिए सिरदर्द बन रही है।
जम्मू-कश्मीर के इमाम साहिब शोपियां स्थित राज्य के सबसे बड़ा मदरसा ‘दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम’ पर आतंकी गतिविधियों के चलते ताला लग गया है। मदरसे को प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी ने खड़ा किया था, जिससे कई आतंकी निकले थे। पुलवामा हमले का आतंकी सज्जाद अहमद भट ने भी इसी मदरसे से तालीम ली थी।
मदरसे पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गैर कानूनी गतिविधियों के चलते UAPA एक्ट, 1967 के तहत कारवाई की है। प्रशासन का कहना है कि मदरसे से आतंकी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए फंडिंग की जा रही थी। प्रशासन को मदरसे की फंडिंग और खर्च में बड़ा अंतर मिला, जिसके कारण मदरसे को सील कर दिया गया।
वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की चीफ महबूबा मुफ्ती ने मदरसे पर सील लगाने को लेकर विरोध किया है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर महबूबा मुफ्ती ने लिखा, “दारुल उलूम जामिया सिराज उल उलूम को UAPA के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित करना बेहद अन्यायपूर्ण फैसला है। इस संस्थान ने ऐसे कई डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर तैयार किए हैं, जिन्होंने देश की ईमानदारी और समर्पण के साथ सेवा की है।”
Every single day the j&k government acts as a mute bystander & a timid enabler of vicious assaults on J&Ks identity & dignity. Declaring Dar Ul Uloom Jamia Siraj Ul Uloom as an unlawful entity under UAPA is a flagrant injustice to the poor underprivileged sections of society.… pic.twitter.com/kkkvWNSQWA
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम नाम से यह मदरसा लगभग 25 साल पुराना है, जिसे जमात-ए-इस्लामी ने विदेशी फंडिंग जुटाकर खड़ा किया था। यह मदरसा 15 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है और इसके साथ 5 एकड़ का एक बाग भी है। मदरसे को सील करने से पहले इसमें लगभग 500 छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे।
मदरसे पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप लगे। विभिन्न राष्ट्रीय जाँच एजेंसियों ने इन आरोपों की जाँच की तो सही पाया। मदरसे के कई मौलवियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब मदरसे में ताला लगा हुआ है। मदरसे के दरवाजे पर सील के पोस्टर लगे हैं और बाहर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है।
मदरसे से तालीम लेकर निकला पुलवामा का आतंकी सज्जाद भट्ट
मदरसे को सील करने की वजह इसके आतंकी गतिविधियों से जुड़ा होना है। ये वही मदरसा है जहाँ से 2019 के पुलवामा आतंकी हमले का आरोपित सज्जाद भट ने भी तालीम ली थी, इस हमले में CRPF के 40 जवानों ने बलिदान दिया था।
फिर जब इस हमले की जाँच हुई, तो मदरसे ने खुद कबूला कि इस मदरसे से 11 छात्र आतंकी बने हैं। इनमें PhD आतंकी के नाम से कुख्यात मोहम्मद शफी बट और कुख्यात आदिल अहमद भी शामिल थे। हालाँकि, ये सभी एनकाउंटर में मारे गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस मदरसे के अधिकतर छात्र पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े थे।
मदरसे के मौलवी भी निकले आतंकी और OGW
इतना ही नहीं इस मदरसे से आतंकी की मदद करने वाले ओवर ग्राउंड वर्कर यानी OGW भी निकले हैं। साल 2020 में ही जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शोपियां से 3 ओवर ग्राउंड वर्कर गिरफ्तार किए थे। तब पूछताछ में सामने आया था कि ये तीनों जमात-ए-इस्लामी के लिए काम करते थे और शोपियां के इसी मदरसे से पढ़कर निकले थे।
इस मदरसे के न सिर्फ छात्र बल्कि पढ़ाने वाले मौलवी भी आतंकी गतिविधियों में शामिल रह चुके हैं। इसी मदरसे में पढ़ाने वाला शौकत अहमद शेख LeT से जुड़ा था और लश्कर के लिए आतंकियों की भर्ती करता था। शौकत को NIA ने गिरफ्तार किया था। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, शौकत ने 20 छात्रों का ब्रेनवॉश कर उन्हें आतंकी बनाया था।
मदरसे पर कार्रवाई
आतंकी गतिविधियों में लिप्त मदरसे पर कश्मीर के मंडलायुक्त अंशुल गर्ग ने UAPA अधिनियम की धारा 8(1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसे प्रतिबंधित संस्थान घोषित किया है। उन्होंने यह कार्रवाई शोपियां के SSP द्वारा जारी किए गए डोजियर और मदरसे पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साक्ष्यों के आधार पर की है।
SSP के डोजियर में साफ कहा गया कि मदरसा बाहर से मजहबी तालीम की जगह लगता है। लेकिन इसके कामकाज और पैसों के हिसाब में बड़ी गड़बड़ियाँ हैं। यह कई गैरकानूनी कामों में भी शामिल है। इसका रजिस्ट्रेशन नहीं है। इसने सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया है। और कानून से बचने के लिए यह तरह-तरह के तरीके अपनाता है।