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MOU के बाद भी सुस्ती में रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के ₹29000 करोड़: समझिए कैसे चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में NDA सरकार ला रही बड़े निवेश

आंध्र प्रदेश देश में निवेश के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के ढुलमुल रवैए का फायदा उठाते हुए अब मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने एक और बड़ा दाँव मारा है। यह रफ्तार आगे भी जारी रहने वाली है क्योंकि सरकारी जहाज बनाने वाली कंपनी मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) तिरुपति जिले के दुगराजपटनम में आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित मेगा शिपबिल्डिंग क्लस्टर में 29,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश कर रही है।

मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) नाम की यह बड़ी डिफेंस पीएसयू (PSU) आंध्र प्रदेश के शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट में मुख्य निवेशक बनने के लिए तैयार है, जिसका लक्ष्य 1.2 मिलियन टन सालाना क्षमता का है। इस मेगा प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी जमीन और समुद्री बुनियादी ढाँचे के लिए 5,289 करोड़ रुपए का योगदान देंगे, जबकि मुख्य निवेशक MDL इसमें 23,964 करोड़ रुपए का निवेश करेगा।

मझगांव डॉक लिमिटेड के प्रतिनिधि जल्द ही इस जगह की संभावनाओं का आकलन करने के लिए आंध्र प्रदेश का दौरा कर सकते हैं।

तमिलनाडु की सुस्ती बनी आंध्र प्रदेश के लिए मौका

आंध्र प्रदेश सरकार और MDL के बीच राज्य के प्रस्तावित शिपबिल्डिंग क्लस्टर में भारी निवेश को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले इस डिफेंस पीएसयू ने तमिलनाडु की तत्कालीन द्रमुक (DMK) सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।

सितंबर 2025 में MDL ने ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ के तहत थूथुकुडी में 15,000-18,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से एक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार के साथ समझौता किया था। हालाँकि द्रमुक सरकार ने इसमें ढुलमुल रवैया अपनाया और बाद में MDL के साथ तय प्रक्रिया को छोड़कर दक्षिण कोरिया की एचडी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज (HD Hyundai Heavy Industries) के साथ एक विशेष समझौता कर लिया।

MDL को तमिलनाडु सरकार से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) का इंतजार था, हालाँकि द्रमुक सरकार ने न तो प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और न ही इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर मना किया।

तमिलनाडु सरकार के इस कदम से MDL-थूथुकुडी प्रोजेक्ट अधर में लटक गया और भारत की एक प्रमुख डिफेंस पीएसयू किनारे हो गई। MDL ने आरोप लगाया कि द्रमुक सरकार द्वारा तय चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने का सही मौका नहीं दिया गया। पीएसयू ने पारदर्शिता और जिस तरह से तमिलनाडु सरकार ने एंकर शिपयार्ड का चयन किया, उस पर भी सवाल उठाए।

अब जब MDL के आंध्र प्रदेश में बड़ा निवेश करने की खबरें आ रही हैं, तो तमिलनाडु के कई लोग द्रमुक सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि उनकी वजह से राज्य के हाथ से रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निवेश निकल गया।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बीच रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और बंदरगाह से जुड़े निवेश को लेकर लंबे समय से मुकाबला चल रहा है। दोनों राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए अपने तटीय इलाकों, कुशल कामगारों और रियायतों का इस्तेमाल करते हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) गठबंधन के शासन वाले आंध्र प्रदेश ने ‘बिजनेस करने की रफ्तार’ (speed of doing business) को लेकर बड़े स्तर पर मार्केटिंग की है, जिसमें जमीन की उपलब्धता, नीतिगत स्थिरता और राज्य व केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण केंद्रीय समन्वय को प्रमुखता से दिखाया गया है।

चंद्रबाबू नायडू की NDA सरकार में आंध्र प्रदेश बना उद्योगों के लिए आकर्षक

बीते कुछ महीनों में तमिलनाडु और कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एनडीए शासित आंध्र प्रदेश में कई बड़े निवेशकों का ट्रांसफर देखा गया है।

अगस्त 2025 में तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने थूथुकुडी में दक्षिण कोरिया की ह्वासुंग फुटवियर (Hwaseung Footwear) द्वारा 1,720 करोड़ रुपये के नॉन-लेदर फुटवियर प्लांट की घोषणा की थी, जिससे 20,000 से अधिक नौकरियों का वादा किया गया था। हालाँकि तमिलनाडु सरकार की ओर से हुई देरी और लापरवाही के कारण ह्वासुंग को बेहतर विकल्पों की तलाश करनी पड़ी। नवंबर 2025 तक यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के कुप्पम में शिफ्ट हो गया।

दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्वासुंग ने एनडीए के नेतृत्व वाले राज्य आंध्र प्रदेश में 150 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ अपना नॉन-लेदर स्पोर्ट्स शू मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने ह्वासुंग को 100 एकड़ जमीन आवंटित की। अब यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की विधानसभा सीट कुप्पम में आकार ले रहा है।

मई 2026 में तमिलनाडु के हाथ से प्रस्तावित एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) फ्लाइट टेस्टिंग और इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स डिफेंस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट भी निकल गया और यह आंध्र प्रदेश के पास चला गया। हालाँकि तमिलनाडु सरकार डीआरडीओ (DRDO) से जुड़े इस 15,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को हासिल करने की कोशिश में थी और उसने बेंगलुरु के एयरोस्पेस क्लस्टर के पास होसुर में जमीन और रनवे की पेशकश की थी। लेकिन आंध्र प्रदेश ने तेजी से मंजूरी देने और एक एकीकृत डिफेंस कॉरिडोर के विजन की पेशकश करके यह बाजी जीत ली।

यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के पुट्टपार्थी में गया, और इस साल मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री नायडू ने 600 एकड़ की इस फैसिलिटी का शिलान्यास किया। इस पर केंद्र द्वारा पक्षपात करने के आरोप भी लगे, हालाँकि खबरों में कहा गया कि आंध्र प्रदेश को प्रोजेक्ट सौंपना विभिन्न राज्यों में रक्षा निर्माण क्षमताओं को बाँटने की रणनीति का हिस्सा था।

जहाँ तमिलनाडु ने होसुर में 100 एकड़ जमीन मुफ्त देने की पेशकश की थी, वहीं आंध्र प्रदेश ने पुट्टपार्थी में 650 एकड़ का एक बड़ा डेडिकेटेड हब ऑफर किया।

राज्यों के बीच यह मुकाबला सिर्फ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार कर्नाटक तक भी है। जुलाई 2025 में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को तीन साल से चल रहे किसानों के लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास एक प्लान्ड एयरोस्पेस पार्क के लिए देवनहल्ली में कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के प्रस्ताव को रद्द करना पड़ा था।

राज्य ने पहले इस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट के लिए चन्नरायपटना और देवनहल्ली तालुक के आसपास के गाँवों में 1,777 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन किसानों ने पहले दिन से ही इस कदम का विरोध करते हुए दावा किया था कि यह जमीन उपजाऊ है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

जब कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया, तो आंध्र प्रदेश ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया। राज्य के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक खुला निमंत्रण देते हुए लिखा, ‘प्रिय एयरोस्पेस इंडस्ट्री, इसके (विरोध प्रदर्शन) बारे में सुनकर दुख हुआ। मेरे पास आपके लिए एक बेहतर विचार है। आप इसके बजाय आंध्र प्रदेश को क्यों नहीं देखते? हमारे पास आपके लिए एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से अधिक तैयार जमीन (बेंगलुरु के ठीक बाहर) उपलब्ध है! उम्मीद है कि टेबल पर बैठकर बात करने के लिए आपसे जल्द ही मुलाकात होगी।”

साफ है कि आंध्र प्रदेश की एनडीए सरकार न केवल राज्य को मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए एक आदर्श जगह के रूप में पेश कर रही है, बल्कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे प्रतिस्पर्धी राज्यों में दिक्कतों का सामना कर रहे निवेशकों को भी आक्रामक रूप से अपने साथ जोड़ रही है।

टेक, डेटा सेंटर, एआई (AI) और एयरोस्पेस से लेकर आंध्र प्रदेश ने दूसरे राज्यों से निवेश हासिल किया है और वह इसका दावा करने से पीछे नहीं हटता।

साल 2025 में गूगल (Google) ने भारत के सबसे बड़े एआई और डेटा सेंटर्स में से एक के लिए विशाखापत्तनम में 15 बिलियन डॉलर या 1.25 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का ऐलान किया।

बेंगलुरु के पास आईटी की ताकत और बुनियादी ढाँचा होने के बावजूद गूगल द्वारा इस दौड़ में अपने प्रतिस्पर्धी कर्नाटक के बजाय आंध्र प्रदेश को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को रास नहीं आया। कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे की X पर आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश के साथ तीखी बहस भी हुई थी।

आंध्र प्रदेश सरकार ने 22,000 करोड़ रुपए के बड़े प्रोत्साहन पैकेज की पेशकश करके गूगल का यह निवेश सुरक्षित किया। इस पैकेज में जमीन पर 25% की छूट, पानी के टैरिफ पर 25% की छूट, 100% मुफ्त बिजली ट्रांसमिशन के साथ-साथ स्टेट जीएसटी (SGST) की पूरी प्रतिपूर्ति शामिल थी।

आंध्र प्रदेश ने पिछले साल कर्नाटक की सरला एविएशन के 1,300 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रिक एयर-टैक्सी मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट ‘स्काई फैक्ट्री‘ को भी अपने नाम कर लिया। यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जिले में विकसित किया जाएगा। कर्नाटक की एक कंपनी का अपने गृह राज्य को छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट के लिए दूसरे राज्य को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा गया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश की ‘काम करने की रफ्तार’ का असर कॉन्ग्रेस शासित तेलंगाना पर भी पड़ा है। मार्च 2025 में हैदराबाद की प्रीमियर एनर्जीज (Premier Energies) ने घोषणा की कि वह तेलंगाना के सीतारामपुर से आंध्र प्रदेश के नायडूपेटा में अपना 1,700 करोड़ रुपये का प्रस्तावित 4 GW सोलर फोटोवोल्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शिफ्ट कर रही है। इस प्रोजेक्ट से करीब 3,500 नौकरियाँ पैदा होंगी।

प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में आगे निकलकर एक और प्रोजेक्ट को हासिल करने की जानकारी देते हुए आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने X पर लिखा, “एपी (AP) ने रिकॉर्ड समय में एपीआईआईसी (APIIC) के माध्यम से 269 एकड़ जमीन को तेजी से मंजूरी दी। ये बातचीत अक्टूबर 2024 में शुरू हुई थी और फरवरी 2025 तक जमीन आवंटित कर दी गई। यह जमीन बंदरगाहों के करीब है और सक्रिय प्रोत्साहनों से समर्थित है। यह आंध्र प्रदेश को एक अग्रणी सौर विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करता है, जिससे औद्योगिक विकास और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिसकी क्षमता को 7 GW तक बढ़ाने की योजना है। आंध्र प्रदेश को भारत के दूसरे सबसे बड़े एकीकृत सौर सेल और मॉड्यूल निर्माता का एपी में स्वागत करते हुए गर्व हो रहा है – जो हमारे युवाओं के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन और ग्रीन जॉब्स को बढ़ावा देगा।”

नारा लोकेश के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश ने एनडीए शासन के दो सालों के भीतर लगभग 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है।

मुख्यमंत्री नायडू ने इस बारे में कहा, “कल्याण, विकास और सुशासन प्रदान करने के साथ-साथ एनडीए सरकार विशाखापत्तनम, अमरावती और तिरुपति क्षेत्रों का विकास कर रही है। रायलसीमा में रक्षा, ड्रोन, स्पेस, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों के उद्योग आ रहे हैं। एनडीए शासन के दौरान राज्य ने अब तक 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है। हम हर घर में सोलर रूफटॉप के जरिए बिजली पैदा करने का अवसर दे रहे हैं। रॉयल एनफील्ड तिरुपति में 18 महीनों में एक मोटरसाइकिल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित कर रही है।”

हालाँकि आंध्र प्रदेश की आक्रामक निवेश रणनीतियों से अन्य राज्य सरकारों का सतर्क होना स्वाभाविक है, लेकिन एनडीए शासित यह राज्य भारत की विकास गाथा में योगदान देने में जितना हो सके आगे रहना चाहता है। आंध्र प्रदेश सरकार वैश्विक और घरेलू कंपनियों को राज्य में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, लैंड बैंक, सब्सिडी और केंद्रीय सहयोग का पूरा इस्तेमाल कर रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ नहीं था लक्षद्वीप, 47 साल बाद सरकार ने बदले शराब के नियम: जानिए क्यों, कभी विकास परियोजनाओं के विरोध में खड़ा था इस्लामी-वामपंथी गैंग

भारत के सबसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में 47 वर्षों बाद शराब नीति में बड़ा बदलाव किया गया है। केंद्र सरकार ने 1979 से लागू शराबबंदी कानून को समाप्त करते हुए नया आबकारी ढाँचा लागू कर दिया है। इसके साथ ही अब लक्षद्वीप में लाइसेंस प्राप्त प्रतिष्ठानों के माध्यम से शराब की नियंत्रित बिक्री का रास्ता खुल गया है।

पहली नजर में यह फैसला केवल शराब से जुड़ा प्रशासनिक निर्णय दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि इसके पीछे के घटनाक्रम को देखा जाए तो यह कदम पर्यटन, निवेश, बुनियादी ढाँचे, राष्ट्रीय सुरक्षा और लक्षद्वीप के भविष्य के विकास मॉडल से जुड़ा हुआ नजर आता है।

पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप को लेकर जिस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया है, उससे स्पष्ट है कि सरकार इस द्वीप समूह को केवल एक दूरस्थ केंद्रशासित प्रदेश के रूप में नहीं बल्कि भारत के भविष्य के प्रमुख समुद्री पर्यटन और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है।

शराब नीति में बदलाव उसी व्यापक रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है। लक्षद्वीप 36 द्वीपों का समूह है, जिनमें से केवल 10 द्वीपों पर आबादी रहती है। अरब सागर में स्थित यह क्षेत्र भारत की समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, समुद्री व्यापार और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्राकृतिक सुंदरता के मामले में इसकी तुलना अक्सर मालदीव से की जाती है। इसके बावजूद दशकों तक यह क्षेत्र पर्यटन और निवेश के मामले में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया।

नए कानून में क्या प्रावधान किए गए हैं?

5 जून 2026 को जारी अधिसूचना के माध्यम से 1979 का कानून समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह लक्षद्वीप आबकारी विनियमन-2026 लागू किया गया। नए नियमों के तहत शराब के निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, खरीद और उपभोग को लाइसेंस आधारित प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित किया जाएगा।

सरकार ने साथ ही यह भी सुनिश्चित किया है कि शराब की उपलब्धता पूरी तरह अनियंत्रित न हो जाए। विदेशी शराब और IMFL पर 400 प्रतिशत तक एक्साइज ड्यूटी लगाई गई है। बीयर पर 200 प्रतिशत तथा वाइन पर 80 प्रतिशत कर लगाया गया है।

21 वर्ष से कम आयु के लोगों को शराब बेचना प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा प्रशासक को विशेष अधिकार दिए गए हैं, जिनके तहत वह किसी भी द्वीप में शराब की बिक्री पर रोक लगा सकता है, खरीद की सीमा तय कर सकता है या आवश्यकता पड़ने पर पुनः प्रतिबंध लागू कर सकता है।

स्पष्ट रूप से सरकार का उद्देश्य शराब को बढ़ावा देना नहीं बल्कि पर्यटन क्षेत्र के लिए नियंत्रित और विनियमित व्यवस्था तैयार करना है।

1979 में शराबबंदी क्यों लागू की गई थी?

लक्षद्वीप में शराबबंदी का इतिहास 1979 से जुड़ा हुआ है। उस समय लक्षद्वीप निषेध विनियमन लागू किया गया था, जिसके तहत शराब के निर्माण, बिक्री और उपभोग पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिया गया। इस निर्णय के पीछे सबसे बड़ा कारण वहाँ की मजहबी संरचना थी। 2011 की जनगणना के अनुसार, लक्षद्वीप की लगभग 97 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है।

यह देश का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला केंद्रशासित प्रदेश है। साथ ही यहाँ की लगभग 95 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग में आती है। चूँकि इस्लाम में शराब के सेवन को निषिद्ध माना जाता है, इसलिए उस समय की सरकारों और प्रशासनों ने यह माना कि उनकी मजहबी परंपराओं के अनुरूप शराबबंदी लागू रहनी चाहिए।

धीरे-धीरे यह कानून लक्षद्वीप की पहचान का हिस्सा बन गया। कई स्थानीय संगठन, धार्मिक समूह और राजनीतिक दल भी इसका समर्थन करते रहे। उनका तर्क था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ और अपराध बढ़ सकते हैं।

क्या लक्षद्वीप पूरी तरह ड्राई क्षेत्र था?

इस्लामी अक्सर लक्षद्वीप को पूर्ण शराबमुक्त क्षेत्र बताते रहे, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग थी। प्रतिबंध लागू होने के बावजूद कुछ पर्यटन स्थलों और रिसॉर्ट्स को विशेष छूट प्राप्त थी। बंगाराम द्वीप जैसे पर्यटन केंद्रों में आने वाले विदेशी और भारतीय पर्यटकों के लिए शराब उपलब्ध कराई जाती थी।

कुछ सरकारी व्यवस्थाओं के तहत भी सीमित स्तर पर शराब की अनुमति थी। यानी स्थानीय के लिए शराबबंदी लागू थी, लेकिन पर्यटन उद्योग के लिए पहले से ही अपवाद मौजूद थे। इसी कारण वर्तमान नीति परिवर्तन को पूरी तरह नई व्यवस्था नहीं माना जा रहा। सरकार ने पहले से मौजूद सीमित छूट को अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और कानूनी ढाँचे में बदल दिया है।

2020 में प्रशासक प्रफुल्ल खोड़ा पटेल की नियुक्ति के बाद लक्षद्वीप में कई प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत हुई। पर्यटन विकास, भूमि उपयोग, स्वास्थ्य सुविधाएँ, स्थानीय प्रशासन, मत्स्य उद्योग और निवेश से जुड़े अनेक प्रस्ताव सामने आए। इन्हीं सुधारों के दौरान शराब नीति में बदलाव की चर्चा भी शुरू हुई।

2021 में पर्यटन प्रतिष्ठानों तक शराब सेवा का विस्तार करने का प्रस्ताव सामने आया। इसके बाद 2023 में नया आबकारी मसौदा जारी किया गया। अंततः 2026 में यह नीति कानून का रूप ले सकी। यानी वर्तमान फैसला अचानक नहीं बल्कि छह वर्षों से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है।

पर्यटन के लिए क्यों जरूरी है यह बदलाव?

मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण पर्यटन को माना जा रहा है। लक्षद्वीप प्राकृतिक सुंदरता, समुद्री जैव विविधता, कोरल रीफ, स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और समुद्री पर्यटन के लिए विश्वस्तरीय क्षमता रखता है। इसके बावजूद दशकों तक यहाँ पर्यटकों की संख्या बेहद सीमित रही।

सरकार का मानना है कि यदि लक्षद्वीप को मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों के समकक्ष खड़ा करना है तो पर्यटन क्षेत्र को आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। आज दुनिया के अधिकांश समुद्री पर्यटन केंद्रों में पर्यटकों के लिए नियंत्रित शराब व्यवस्था मौजूद है। होटल उद्योग और पर्यटन निवेशक भी इसी प्रकार के ढाँचे की अपेक्षा करते हैं।

केंद्र सरकार का तर्क है कि यदि लक्षद्वीप को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करना है तो उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तैयार करना होगा। हालाँकि फैसले के प्रस्ताव से लेकर फैसले पर मुहर लगाने तक इस्लामी-लेफ्ट लेबरल गैंग इसका विरोध ही करते रहे हैं। ये कोई नई बात भी नहीं है यहाँ की मुस्लिम बहुल आबादी विकास के मार्ग में हमेशा बाधा ही बनी है।

लक्ष्यदीप में विकास कार्यों का विरोध करते रहे हैं इस्लामी-लेफ्ट लिबरल गैंग

लक्षद्वीप में शराब नीति में बदलाव की प्रक्रिया 2020 में प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल के कार्यभार संभालने के बाद तेज हुई। प्रशासन का मानना था कि यदि द्वीप समूह को बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना है तो वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े कुछ नियमों में बदलाव आवश्यक होंगे।

इसी सोच के तहत 2021 में आबादी वाले द्वीपों पर स्थित पर्यटन प्रतिष्ठानों में भी शराब परोसने का प्रस्ताव सामने आया। हालाँकि इस प्रस्ताव का स्थानीय वामपंथी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं और द्वीपों की पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है।

हालाँकि वर्ष 2023 में लक्षद्वीप के लिए नए आबकारी ढाँचे का मसौदा जारी किया गया, जिसमें लाइसेंस आधारित व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद फरवरी 2026 में चेतलात और बित्रा द्वीपों पर स्थित सरकारी विश्राम गृहों को ऐसे लाइसेंस प्राप्त परिसरों के रूप में अधिसूचित किया गया, जहाँ निर्धारित नियमों के तहत शराब परोसी जा सकती थी।

शराबबंदी को लेकर होने वाली चर्चा अक्सर मजहबी दृष्टिकोण से जुड़ी रही है, क्योंकि इस्लाम में शराब सेवन की मनाही है। हालाँकि केंद्र सरकार और प्रशासन का तर्क है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शराब की वैधता कोई नई बात नहीं है।

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से शराब की बिक्री कानूनी है, जबकि मालदीव समेत कई मुस्लिम बहुल देशों में भी पर्यटन क्षेत्रों में नियंत्रित तरीके से शराब उपलब्ध कराई जाती है। केंद्र सरकार का मानना है कि पूरी तरह प्रतिबंध की बजाय कड़े नियंत्रण और सख्त नियमों वाली व्यवस्था पर्यटन उद्योग के लिए अधिक व्यावहारिक होगी।

सरकार के अनुसार, नए नियमों का उद्देश्य शराब को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करना है। प्रशासन का कहना है कि इस प्रक्रिया में सभी निर्णय नियंत्रित और विनियमित ढाँचे के भीतर ही लागू किए जाएँगे, फिर भी इसका विरोध जारी ही है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान लक्षद्वीप में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित कई सुधारों और विकास परियोजनाओं का विरोध देखने को मिला है। प्रशासनिक सुधारों, भूमि उपयोग नीति, पर्यटन विस्तार, शराब नीति और रक्षा परियोजनाओं जैसे अनेक मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर विरोध दर्ज किया गया। कई मामलों में कोर्टों का दरवाजा भी खटखटाया गया।

केरल हाई कोर्ट ने 28 मई, 2021 को लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन (एलडीएआर) 2021, असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (PASA) के मसौदे के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। दरअसल लक्षद्वीप प्रशासन ने गोमांस प्रतिबंध सहित अन्य प्रशासनिक उपायों को पेश किया था।

इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा लाए गए सुधारों के खिलाफ कॉन्ग्रेस नेता केपी नौशाद अली ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। कॉन्ग्रेस नेता ने याचिका में दावा किया था कि प्रशासन इस नियम के जरिए अरब सागर में स्थिति इस द्वीप समूह की अनूठी संस्कृति और परंपरा को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है।

कॉन्ग्रेस नेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला बताया और सभी हितधारकों से कोर्ट के साथ अपने विचार साझा करने को कहा। लक्षद्वीप के नए प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल द्वारा नए सुधारों और नए नियमों को लाने का आदेश जारी करने के बाद से इस केंद्रशासित प्रदेश में सियासी भूचाल आ गया था।

लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल खोड़ा द्वारा द्वारा किए जा रहे प्रशासनिक सुधारों का कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया था।

उनका दावा था कि नए नियम द्वीप पर रहने वाली मुस्लिम आबादी की मजहबी भावनाओं को आहत करेंगे। लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल सहित विपक्षी दलों ने दावा किया था कि नए सुधारों का उद्देश्य द्वीपों की ‘अद्वितीय संस्कृति और परंपरा को नष्ट करना’ है। इसी प्रकार बित्रा द्वीप से जुड़ी योजनाओं और अन्य विकास परियोजनाओं पर भी विरोध सामने आया।

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद कैसे बदली तस्वीर?

जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्षद्वीप दौरा इस पूरे अभियान का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। प्रधानमंत्री ने समुद्र तटों, समुद्री गतिविधियों और स्थानीय संस्कृति से जुड़ी तस्वीरें साझा कीं। इसके बाद देशभर में लक्षद्वीप को लेकर जबरदस्त उत्सुकता पैदा हुई। बड़ी संख्या में लोगों ने लक्षद्वीप को पर्यटन स्थल के रूप में देखना शुरू किया।

आँकड़े बताते हैं कि कुछ वर्षों में पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ गई। RTI डाटा के मुताबिक, 2020 में जहाँ लक्षद्वीप में मात्र 3875 पर्यटक आए थे, वहीं 4 साल बाद यानी 2024 में यह संख्या बढ़कर 68328 हो गई। 2023 में यहाँ 46551 पर्यटक आए थे जो एक साल बाद 68328 हो गए यानी करीब 47 फीसदी का इजाफा हुआ।

यह लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि है। सबसे बड़ा उछाल प्रधानमंत्री मोदी के जनवरी 2024 के दौरे के बाद दर्ज किया गया। केंद्र सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई साल पहले से प्रयास शुरू कर दिए थे। केंद्र सरकार ने इसे संकेत के रूप में देखा कि यदि पर्याप्त सुविधाएँ विकसित की जाएँ तो लक्षद्वीप भारत का सबसे बड़ा समुद्री पर्यटन केंद्र बन सकता है।

नए फैसले पर क्या है सरकार का पक्ष?

बता दें कि लक्षद्वीप लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहा। जब भी पर्यटन, निवेश, आधारभूत संरचना या प्रशासनिक सुधारों की बात होती है, तब इस्लामी और लेफ्ट लिबरल गैंग धार्मिक या राजनीतिक विवाद का विषय बनाने की कोशिश करते हैं।

सरकार का पक्ष यह है कि विकास और मजहबी पहचान को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि पर्यटन बढ़ेगा, निवेश आएगा, होटल उद्योग विकसित होगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे तो उसका लाभ सबसे अधिक स्थानीय युवाओं को ही मिलेगा।

केंद्र सरकार यह भी मानती है कि लक्षद्वीप को केवल उसकी मजहबी पहचान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत का एक रणनीतिक, आर्थिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसे देश के अन्य विकसित क्षेत्रों के समान अवसर मिलने चाहिए।

इसी व्यापक सोच के तहत मोदी सरकार पर्यटन विस्तार, रक्षा अवसंरचना, प्रशासनिक सुधार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। 47 साल बाद शराब नीति में किया गया बदलाव भी इसी बड़ी विकास रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

CM योगी ने लॉन्च किया ‘प्रोजेक्ट गंगा’, UP सरकार के साथ काम करेगा हिंदूजा ग्रुप: 20 लाख घरों तक पहुँचेगा हाई-स्पीड इंटरनेट, जानें क्या है युवाओं-महिलाओं के रोजगार से जुड़ा ये मेगा प्लान

उत्तर प्रदेश के गाँवों को इंटरनेट से जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में ‘प्रोजेक्ट गंगा’ की शुरुआत की है। इस योजना के लिए UP सरकार और हिंदूजा ग्रुप की कंपनी के बीच एक बड़ा समझौता हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य शहरों की तरह गाँवों में भी बिना किसी रुकावट के हवा से तेज चलने वाला हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट पहुँचाना है। इस डिजिटल प्रोजेक्ट के शुरू होने से अब उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों की जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी और उन्हें घर बैठे ही बेहतरीन इंटरनेट सुविधाएँ मिल सकेंगी।

क्या है प्रोजेक्ट गंगा और इसका मुख्य लक्ष्य

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का ‘प्रोजेक्ट गंगा’ गाँवों और कस्बों तक तेज इंटरनेट पहुँचाने का एक बड़ा अभियान है। जिस तरह गंगा नदी करोड़ों लोगों को जीवन देती है, उसी तरह यह प्रोजेक्ट भी करोड़ों ग्रामीणों को डिजिटल दुनिया से जोड़कर उनके जीवन को आसान बनाएगा।

इस योजना के तहत राज्य सरकार ने अगले दो से तीन वर्षों के भीतर उत्तर प्रदेश के 20 लाख से अधिक ग्रामीण और अर्ध-शहरी घरों तक हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह योजना केवल इंटरनेट के तार बिछाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गाँवों के भीतर एक आत्मनिर्भर डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करने की बड़ी कोशिश है।

इस इंटरनेट नेटवर्क के माध्यम से UP के सुदूर गाँवों तक टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा (ई-एजुकेशन), ई-गवर्नेंस और ई-कॉमर्स जैसी अत्याधुनिक सेवाएँ बहुत ही आसानी से पहुँच सकेंगी। अब गाँवों के लोगों को छोटी-मोटी सरकारी सेवाओं, इलाज के परामर्श या अच्छी पढ़ाई के लिए बड़े शहरों की तरफ भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी और वे अपने घर बैठे ही डिजिटल सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे।

युवाओं और महिलाओं को मिलेंगे बंपर रोजगार

इस योजना की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि इसके जरिए उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर नए रोजगार के अवसर पैदा होने जा रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन से राज्य में 1 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यह प्रोजेक्ट UP के ग्रामीण युवाओं को उनके अपने ही गाँव और घर के आसपास तकनीकी क्षेत्र में काम करने और आगे बढ़ने का एक शानदार मौका प्रदान करेगा।

इसके साथ ही योगी सरकार ने इस प्रोजेक्ट के तहत महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इस पूरे अभियान में होने वाली कुल नियुक्तियों और सहभागिता में लगभग 50 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को इस डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़कर उन्हें सीधे तौर पर आत्मनिर्भर बनाया जाएगा। इससे गाँव की बेटियाँ और महिलाएँ खुद के पैरों पर खड़ी हो सकेंगी और डिजिटल साक्षरता के इस दौर में मुख्यधारा का हिस्सा बनेंगी।

डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर बनकर कमाएँगे ग्रामीण युवा

प्रोजेक्ट गंगा के तहत न्याय पंचायत स्तर पर स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक विशेष रूपरेखा तैयार की गई है। इस योजना के अंतर्गत पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग 8,000 से लेकर 10,000 स्थानीय युवाओं को ‘डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर’ (DSPs) के रूप में विकसित और तैयार किया जाएगा। ये चयनित युवा अपने-अपने स्थानीय क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड और अन्य डिजिटल सेवाएँ आम जनता तक पहुँचाने का काम संभालेंगे।

इन चयनित युवाओं को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए हिंदूजा ग्रुप की कंपनी द्वारा विशेष और तकनीकी रूप से एडवांस ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके बाद मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के माध्यम से इन युवाओं को अपना खुद का सेंटर स्थापित करने के लिए बिना गारंटी के आसान लोन भी दिलाया जाएगा। इसी सेंटर के माध्यम से गाँवों में ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने, उसकी बिलिंग करने और ऑनलाइन सेवाओं को सुचारू रूप से संचालित करने का सारा काम किया जाएगा। यह स्थानीय स्तर पर युवाओं को बिजनेस मालिक बनने का मौका देगा।

बिना गारंटी के मिलेगा ₹5 लाख तक का लोन

उत्तर प्रदेश के वित्त और संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने इस प्रोजेक्ट को लेकर सरकार की वित्तीय योजनाओं की जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार डिजिटल क्षेत्र में कदम रखने वाले इन युवा उद्यमियों को मजबूत वित्तीय सहायता देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार की एक विशेष योजना के तहत राज्य के युवाओं को अपना खुद का डिजिटल व्यवसाय शुरू करने के लिए 5 लाख रुपए तक का ब्याज-मुक्त और कोलेटरल-फ्री (बिना किसी गारंटी के) लोन दिया जा रहा है।

इस बेहद कल्याणकारी लोन योजना का लाभ अब तक राज्य के 1 लाख से अधिक युवा उठा चुके हैं और वे अपना खुद का सफल रोजगार चला रहे हैं। अब ‘प्रोजेक्ट गंगा’ से जुड़ने वाले नए डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर्स को भी इस ऋण योजना का सीधा लाभ दिया जाएगा। इसके जरिए युवाओं को अपना सेंटर शुरू करने में पैसों की कोई तंगी नहीं आएगी। उन्हें कंपनी की तरफ से आधुनिक नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन तकनीक का सपोर्ट भी मिलेगा, जिससे वे एक टिकाऊ और मजबूत बिजनेस मॉडल खड़ा कर सकेंगे।

एक्सप्रेसवे की तरह ही महत्वपूर्ण हैं डिजिटल हाईवे

स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन (STC) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मनोज कुमार सिंह ने इस प्रोजेक्ट के महत्व को समझाते हुए एक बेहद जरूरी बात कही है। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में जिस प्रकार जमीनी विकास के लिए बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे जरूरी हैं, ठीक उसी प्रकार राज्य की तरक्की के लिए ‘डिजिटल हाईवे’ का निर्माण होना भी बेहद आवश्यक हो गया है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के मजबूत होने से ही गांवों और शहरों के बीच की दूरी को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।

उन्होंने आगे बताया कि इस इंटरनेट क्रांति के आने से गाँवों में ऑनलाइन बिजनेस, डिजिटल स्किलिंग और कंटेंट क्रिएशन जैसे आधुनिक क्षेत्रों का बहुत तेजी से विस्तार होगा। जब गाँवों में तेज इंटरनेट मिलेगा, तो वहाँ के प्रतिभावान युवाओं को अपनी कला और हुनर को पूरी दुनिया के सामने दिखाने का एक बेहतरीन मंच मिलेगा। यह प्रोजेक्ट ग्रामीण इलाकों में ज्ञान और सूचना का एक नया सवेरा लेकर आएगा, जिससे पूरे राज्य के विकास को एक नई और तेज रफ्तार मिलेगी।

शुरुआती चरण में बॉर्डर वाले जिलों पर रहेगा विशेष जोर

योगी सरकार ने इस योजना को बहुत ही सुनियोजित तरीके से पूरे राज्य में लागू करने का फैसला किया है। ‘प्रोजेक्ट गंगा’ के शुरुआती चरण में उत्तर प्रदेश के उन सुदूर और पिछड़े इलाकों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाएगा जो अंतरराष्ट्रीय या अंतरराज्यीय सीमाओं से सटे हुए हैं। सरकार की योजना के मुताबिक, सबसे पहले श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर जैसे बॉर्डर वाले महत्वपूर्ण जिलों में इस हाई-स्पीड इंटरनेट नेटवर्क को पूरी तरह बिछाया जाएगा।

इन सीमावर्ती जिलों में डिजिटल कनेक्टिविटी मजबूत होने से वहाँ के लोगों को मुख्यधारा से जुड़ने में बहुत आसानी होगी और नए आर्थिक अवसर खुलेंगे। इन जिलों में प्रोजेक्ट को सफलतापूर्वक लागू करने के बाद, इसके अनुभवों के आधार पर बहुत तेजी से इस योजना का विस्तार पूरे उत्तर प्रदेश के सभी जिलों और गाँवों में कर दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि राज्य का कोई भी कोना और कोई भी गाँव इस डिजिटल क्रांति की रोशनी से अछूता न रहे और हर घर तक विकास पहुँचे।

‘ब्रेकथ्रू ब्लास्ट’ से गूँजी दुनिया की सबसे ऊँची और सबसे लंबी सुरंग: जोजिला टनल से अब कश्मीर से लेह के बीच सालभर होगी आवाजाही, जानिए कैसे पाकिस्तान-चीन को काउंटर करने में मिलेगी मदद

13.153 किलोमीटर लंबी जोजिला टनल के आखिरी हिस्से के जुड़ने (ब्रेकथ्रू) के साथ ही भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में नया इतिहास रच दिया है। (9 जून 2026) मंगलवार को ब्रेकथ्रू के मौके पर सड़क निर्माण और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी मौजूद रहे। यह टनल कश्मीर और लद्दाख के बीच हर मौसम में कनेक्टिविटी देगा, चाहे भयानक बर्फबारी हो या बारिश हो, हमेशा आवाजाही होती रहेगी। इससे इलाके का विकास होगा और सीमा की सुरक्षा और मजबूत होगी।

11600 फीट से अधिक की ऊँचाई पर यह दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग है, जिसमें एक ही मार्ग में आने-जाने की सुविधा होगी। यह क्षेत्र हर साल भीषण सर्दी के कारण कई महीनों तक कटा रहता है। इस दृष्टि से यह सुरंग रणनीतिक रूप से काफी अहम है।

यह पाकिस्तान और चीन के साथ लगी सीमा पर सैनिकों के आवाजाही को सुगम, तेज और सुरक्षित बनाएगी। 2020 में भारतीय सेना और चीनी सैनिकों के बीच गलवान में आमने-सामने की लड़ाई हुई थी। उस वक्त ऐसी सुरंग की जरूरत को महसूस किया गया और क्षेत्र में तेजी से बुनियादी ढाँचे के विकास को बढ़ावा दिया गया।

पहाड़ों के रास्ते कश्मीर और लद्दाख को जोड़ा गया

जम्मू और कश्मीर के सोनमर्ग के पास बाल्टल और लद्दाख के द्रास क्षेत्र में मीनामर्ग के बीच जोजिला सुरंग का निर्माण किया जा रहा है । इस परियोजना का उद्देश्य श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग पर हर मौसम में कनेक्टिविटी को बनाए रखना है। यह कश्मीर और लद्दाख के बीच अहम रोड कनक्टिविटी भी है।

साल के करीब 4 महीने भारी हिमपात, बर्फीले तूफान और हिमस्खलन के कारण यह दर्रा बंद हो जाता है। इससे नागरिकों की आवाजाही, व्यापार, पर्यटन और आवश्यक वस्तुओं के परिवहन में बाधा उत्पन्न होती है।

इस सुरंग को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि मौसम की मार का असर आवाजाही पर न पड़े। सालभर सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित हो।

परियोजना के मुख्य सुरंग की लंबाई 13.153 किलोमीटर है। इसके अलावा सहायक सड़कों, पुलों और दूसरे बुनियादी ढाँचे को जोड़ने पर इसकी लंबाई करीब 30.9 किलोमीटर हो जाती है। इसमें 457 मीटर और 1953 मीटर लंबी नीलग्रार जुड़वां सुरंगें, 2.35 किलोमीटर में फैली सात कट-एंड-कवर संरचना, 450 मीटर लंबी स्नो गैलरी और 460 मीटर की तीन अहम पुल भी शामिल हैं।

पहाड़ों में इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना

जोजिला सुरंग महज एक सड़क परियोजना नहीं है। यह हिमालय में अब तक किए गए सबसे जटिल इंजीनियरिंग कारनामों में से एक है।

यह परियोजना मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एमईआईएल) ने राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) के साथ मिलकर कर रही है, जो दुर्गम भूभागों में राजमार्ग विकास के लिए केंद्र सरकार की विशेष एजेंसी है।

इसकी खासियत वेंटिलेशन और सुरक्षा तंत्र है। चूँकि यहाँ कोई अलग से बचाव सुरंग नहीं है, इसलिए इंजीनियरों ने वेंटिलेशन और आपातकालीन स्थिति में यहाँ पहुँचने के लिए तीन विशाल शाफ्ट का निर्माण किया है। सबसे बड़ा शाफ्ट पहाड़ में 474.3 मीटर की गहराई तक जाता है और वर्तमान में भारत का सबसे लंबा शाफ्ट है। अन्य दो शाफ्ट की लंबाई क्रमशः 367.38 मीटर और 213.5 मीटर है।

यह सुरंग न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग तरीका (NATM) का उपयोग करके बनाई गई है, जो हिमालय जैसे पर्वतीय क्षेत्र के लिए सबसे आधुनिक निर्माण तकनीक है। पारंपरिक सुरंग निर्माण के तरीकों से अलग, NATM इंजीनियरों को खुदाई, तत्काल मजबूती और भूवैज्ञानिक निगरानी के माध्यम से चट्टान की बदलती स्थितियों के अनुरूप लगातार ढलने की सुविधा प्रदान करती है।

यह तरीका काफी अहम रहा, क्योंकि जोजिला अलाइनमेंट के साथ की भूविज्ञान संरचना अत्यधिक अप्रत्याशित निकली। इंजीनियरों ने 13 किलोमीटर के इस भूभाग में चट्टान में 67 तरह के परिवर्तन दर्ज किए, जिसके कारण खुदाई और दूसरी रणनीतियों में बार-बार बदलाव करना पड़ा।

इस चुनौती को और भी जटिल बना रहा था यहाँ का जलवायु और मौसम। इस क्षेत्र में तापमान अक्सर -20 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है और सर्दियों में -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। निर्माण दल वर्षों से भारी हिमपात, बर्फीले तूफान और कई हिमस्खलन जैसी घटनाओं के बीच काम करते रहे।

करीब 1200 से अधिक श्रमिकों ने निर्माण कार्य दिनरात जारी रखा। परियोजना को पूरा करने में 10 मिलियन से अधिक घंटे तक श्रमिकों ने काम किया।

सुरंग बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि क्यों है?

जोजिला सुरंग दुनिया के कुछ सबसे दुर्गम भूभागों में बने सुरंगों में एक है। यह परियोजना उन्नत सुरंग निर्माण तकनीक, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के निर्माण की देश की बढ़ती क्षमता को प्रदर्शित करता है। हिमस्खलन-संभावित हिमालयी पहाड़ों के नीचे इतनी बड़ी सुरंग की सफल खुदाई को अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

इस सुरंग से आर्थिक लाभ भी मिलने की उम्मीद है। चालू होने के बाद, इससे बाल्टल और मीनामर्ग के बीच यात्रा का समय कम हो जाएगा। जोजिला दर्रे से होकर यात्रा करने में अब समय मात्र 15 मिनट लगेगा, जो पहले साढ़े तीन घंटे लगते थे।

पूरे साल अब कश्मीर और लद्दाख के बीच लोगों, सामान और सेवाओं की आवाजाही बनी रहेगी। सड़कों के बंद होने के कारण व्यवसाय ठप पड़ जाते थे, लेकिन अब दिक्कत नहीं होगी। सामानों के भंडारण करने की आवश्यकता नहीं होगी। किसानों, व्यापारियों को बाजारों तक पहुँच का लाभ मिलेगा।

पर्यटन के क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सोनमर्ग, द्रास, कारगिल, लेह जैसे पर्यटन स्थल अब केवल गर्मी में नहीं बल्कि पूरे साल पर्यटकों को आकर्षित करेंगे। इससे लोगों की आमदनी बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। पूरे साल स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आवश्यक सेवाएँ लोगों को मिलती रहेगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम सुरंग

श्रीनगर-लेह राजमार्ग भारतीय सशस्त्र बलों के लिए एक महत्वपूर्ण रसद गलियारा है। यह लद्दाख में सैनिकों, उपकरणों, ईंधन की आपूर्ति के लिए सबसे अहम मार्ग है, जो चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

हाल के वर्षों में, भारत ने लद्दाख के ज्यादा ऊँचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्र में सैनिकों की आवाजाही को बढ़ाने के लिए बुनियादी ढाँचे को मजबूत किया है। जोजिला सुरंग इसी व्यापक प्रयास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सैन्य विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह परियोजना जरूरत पड़ने पर सैनिकों और उपकरणों की तेजी से तैनाती की सुविधा देकर परिचालन लचीलेपन में काफी सुधार लाएगी। इससे मौसम के अनुकूल परिस्थितियों और अक्सर लंबे और जोखिम भरे वैकल्पिक मार्गों पर निर्भरता भी कम होगी।

चीन और पाकिस्तान के साथ भारत की सीमाओं पर बढ़ती सैन्य गतिविधियों के संदर्भ में इस सुरंग का रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है। विश्वसनीय, हर मौसम में काम करने वाली कनेक्टिविटी भारत की रसद संबंधी तैयारियों को मजबूत करती है और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति बनाए रखने की उसकी क्षमता को बढ़ाती है।

इस तरह के बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता 1999 के कारगिल युद्ध के समय महसूस किया गया। इसके बाद भारत-चीन सीमा पर तनाव और गलवान झड़प ने लद्दाख तक सड़क संपर्क की सोच को अमली जामा पहनाया।

ट्रंप को अमेरिका की ही अदालत ने दिया झटका, H-1B Visa पर 1 लाख डॉलर वसूलने के फैसले को ‘अवैध’ बता रद किया: जानिए इससे किसको होगा फायदा

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सख्त अप्रवासन नीतियों को न्यायपालिका से एक और बड़ा झटका लगा है। मैसाचुसेट्स के एक फेडरल कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बेहद विवादास्पद फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदनों पर $100,000 (करीब 95 लाख रुपए) की भारी-भरकम सालाना फीस लगाने का ऐलान किया गया था। इस अदालती फैसले को अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक राहत माना जा रहा है।

बोस्टन के अमेरिकी जिला जज (US District Judge) लियो सोरोकिन ने सोमवार (8 जून, 2026) को इस नीति को पूरी तरह से ‘गैरकानूनी’ (Unlawful) करार देते हुए रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट ने अपने 42 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि व्हाइट हाउस के पास अमेरिकी संसद (कॉन्ग्रेस) की मंजूरी के बिना अपने स्तर पर इस तरह का कोई भी भारी टैक्स या फीस थोपने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।

जज सोरोकिन ने अपने आदेश में क्या कहा?

अदालत ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि भले ही इस राशि को ‘नियामक भुगतान’ या ‘फीस’ का नाम दिया गया हो, लेकिन इसके पीछे का असल मकसद और इसका प्रभाव एक अनधिकृत टैक्स (Unauthorised Tax) की तरह है। जज सोरोकिन ने लिखा कि अमेरिकी संविधान के मुताबिक देश में किसी भी तरह का टैक्स लगाने का विशेष अधिकार सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी कॉन्ग्रेस (संसद) के पास सुरक्षित है, राष्ट्रपति इसे अपनी मर्जी से अकेले लागू नहीं कर सकते।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ट्रंप प्रशासन इस नीति को लागू करने से पहले देश के उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ने वाले असर का सही आकलन करने में विफल रहा जो पहले से ही श्रम की भारी कमी से जूझ रहे हैं। यह नियम देश के स्वास्थ्य क्षेत्र, उच्च शिक्षण संस्थानों और ग्रामीण इलाकों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा था, जहाँ डॉक्टरों, नर्सों और योग्य शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए विदेशी पेशेवरों की मदद ली जाती है।

यह कानूनी चुनौती कैलिफोर्निया समेत 20 ऐसे अमेरिकी राज्यों के कड़े विरोध के बाद सामने आई थी, जहाँ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारें हैं। इन राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने अदालत में दलील दी थी कि राष्ट्रपति ने इस नीति के जरिए ‘इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट’ के तहत मिले अपने कानूनी दायरे का खुलेआम उल्लंघन किया है। उनका तर्क था कि इतनी भारी फीस से राज्य की अर्थव्यवस्थाओं, यूनिवर्सिटीज और स्टार्टअप्स को गंभीर नुकसान पहुँच रहा था।

ट्रंप सरकार का क्या था तर्क और फीस का पुराना ढाँचा?

डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल सितंबर 2025 में एक राष्ट्रपति उद्घोषणा (Presidential Proclamation) के जरिए इस $100,000 की भारी फीस की घोषणा की थी। यह उनकी ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ नीति और कानूनी अप्रवासन पर कड़े प्रतिबंध लगाने के अभियान का हिस्सा था। ट्रंप प्रशासन का दावा था कि इस कड़े कदम से अमेरिकी कंपनियाँ विदेशों से सस्ते श्रम को बुलाने के बजाय स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को नौकरियों पर रखने के लिए मजबूर होंगी और इस कार्यक्रम के दुरुपयोग पर रोक लगेगी।

इस नए नियम के आने से पहले का ढांचा बेहद अलग और किफायती था। अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को एक सामान्य H-1B वीजा आवेदन के लिए सरकारी फाइलिंग फीस के रूप में आमतौर पर केवल $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 लाख से 4.2 लाख रुपये) के बीच ही भुगतान करना होता था। ट्रंप सरकार ने इसे अचानक 20 से 50 गुना तक बढ़ा दिया, जिससे छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों के लिए विदेशी टैलेंट को काम पर रखना पूरी तरह से नामुमकिन हो गया था।

व्हाइट हाउस के अधिकारी और कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लुटनिक लगातार यह दलील दे रहे थे कि अगर बड़ी टेक कंपनियों को वास्तव में वैश्विक प्रतिभाओं की इतनी ही आवश्यकता है, तो वे इतनी कीमत चुकाने में सक्षम हैं। ट्रंप प्रशासन का आरोप था कि H-1B कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर शोषण करके अमेरिकी कामगारों को कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों से बदला जा रहा है, जिससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के बाजार में असमानता पैदा हो रही थी।

टेक कंपनियों और आईटी उद्योग पर अब क्या पड़ेगा फर्क?

फेडरल कोर्ट के इस फैसले से सिलिकॉन वैली और वैश्विक तकनीकी उद्योग ने राहत की सांस ली है। अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, और मेटा जैसी दिग्गज अमेरिकी टेक कंपनियाँ हर साल हजारों की संख्या में कुशल पेशेवरों को H-1B वीजा के जरिए अपने साथ जोड़ती हैं। अकेले 2025 की पहली छमाही में ही अमेज़न के लिए 10,000 से अधिक और माइक्रोसॉफ्ट व मेटा के लिए 5-5 हजार से ज्यादा वीजा स्वीकृत किए गए थे। ऐसे में इस भारी फीस के हटने से इन कंपनियों पर पड़ने वाला अरबों डॉलर का वित्तीय बोझ टल गया है।

न्यायालय के इस आदेश से बाजार में अनिश्चितता का माहौल खत्म होगा और कुशल पेशेवरों की नियुक्ति की प्रक्रिया में एक बार फिर पारदर्शिता और स्थिरता आएगी। इमिग्रेशन एडवोकेसी ग्रुप (FWD.us) के अनुसार, इस अत्यधिक शुल्क ने अमेरिकी रोजगार और मजदूरी के विकास को गंभीर नुकसान पहुँचाया था। अब कंपनियों के लिए वैश्विक स्तर पर उपलब्ध बेहतरीन टैलेंट को बिना किसी भारी वित्तीय जुर्माने के अपने साथ जोड़ना और अमेरिकी नवाचार (Innovation) की रफ्तार को बनाए रखना संभव हो सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल बड़ी कंपनियों, बल्कि अमेरिका के उन छोटे स्टार्टअप्स और अकादमिक संस्थानों के लिए जीवनदान साबित होगा, जो $100,000 की फीस का खर्च वहन करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। स्टैनफोर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा जैसे प्रमुख संस्थान जो हर साल सैकड़ों विदेशी शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों को अपने यहाँ लाते हैं, अब बिना किसी आर्थिक संकट के अपनी रिसर्च को आगे बढ़ा सकेंगे।

अमेरिका में कंपनियों से अब तक कितनी हुई थी वसूली?

अदालत के दस्तावेजों और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट से सामने आए आँकड़े यह बताते हैं कि ट्रंप प्रशासन की यह नीति कितनी व्यावहारिक रूप से विफल साबित हुई थी। $100,000 की भारी-भरकम राशि के डर से अमेरिकी नियोक्ताओं ने नए कर्मचारियों के लिए आवेदन करना लगभग बंद ही कर दिया था। भारी माँग वाले इस वीजा कार्यक्रम में आवेदन करने की दर ऐतिहासिक रूप से गिर गई थी।

आधिकारिक कोर्ट फाइलिंग के अनुसार, यह नियम लागू होने के बाद से लेकर मध्य फरवरी (2026) तक अमेरिकी नागरिकता और अप्रवासन सेवा (USCIS) को देश भर की कंपनियों से इस भारी फीस के रूप में केवल 85 भुगतान (85 Payments) ही प्राप्त हुए थे। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका ने कंपनियों से इस योजना के तहत केवल $8.5 मिलियन (लगभग 71 करोड़ रुपए) की ही कुल वसूली की थी, जो यह दिखाता है कि कंपनियों ने विदेशी पेशेवरों को बुलाने के बजाय अपने हाथ पूरी तरह पीछे खींच लिए थे।

यह मामूली संख्या साफ करती है कि इस नीति ने रोजगार बढ़ाने के बजाय योग्य श्रम की आवक को पूरी तरह से ठप कर दिया था। केवल कुछ बहुत ही संपन्न और बेहद जरूरी मामलों वाली कंपनियों ने ही यह भारी रकम चुकाई, जबकि बाकी सभी नियोक्ताओं ने अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार करना या नई नियुक्तियों को टालना ही बेहतर समझा।

भारतीयों को इस फैसले से क्या होगा फायदा?

H-1B वीजा कार्यक्रम कुशल विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण जरिया है, जो विशेष रूप से टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों के लिए जारी किया जाता है। अमेरिका हर साल कुल 65,000 सामान्य H-1B वीजा जारी करता है, जबकि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर या पीएचडी जैसी एडवांस डिग्री हासिल करने वाले छात्रों के लिए 20,000 का अतिरिक्त कोटा आरक्षित होता है।

इस पूरे कार्यक्रम में भारतीय प्रोफेशनल्स का दबदबा जगजाहिर है। हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा में से लगभग 70 फीसदी हिस्सा अकेले भारतीय नागरिकों के खाते में जाता है। यही वजह है कि ट्रंप के इस फैसले से भारत का आईटी सेक्टर और वहाँ जाने का सपना देख रहे हजारों युवा सबसे ज्यादा चिंतित थे।

फीस रद्द होने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारतीय इंजीनियरों और टेक विशेषज्ञों के लिए अमेरिकी कंपनियों में नौकरी पाने के रास्ते में खड़ा हुआ सबसे बड़ा वित्तीय रोड़ा अब हट गया है।

वर्तमान में अमेरिका के भीतर लगभग 7,30,000 H-1B वीजा धारक रह रहे हैं, जिनके साथ उनके करीब 5,50,000 आश्रित (पति/पत्नी और बच्चे) भी वहाँ मौजूद हैं।

हालाँकि भारतीय पेशेवरों के लिए एक चिंता का विषय यह भी है कि अमेरिकी जाँच एजेंसियाँ भारत से गलत या फर्जी तरीकों से वीजा हासिल करके अमेरिका आने वाले कुछ संदिग्ध मामलों की कड़ाई से जाँच कर रही हैं। लेकिन वैध और उच्च कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए फेडरल कोर्ट का यह फैसला उनकी नौकरी की सुरक्षा और नए अवसरों के लिहाज से एक बड़ी जीत है।

ट्रंप प्रशासन के पास अब भी कानूनी लड़ाई का रास्ता, फिलहाल वसूली रुकी

जज सोरोकिन के इस फैसले ने भले ही इस विवादास्पद फीस पर देशव्यापी रोक लगा दी हो, लेकिन इस मामले में कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस नीति को लेकर अमेरिकी न्यायपालिका में एक दिलचस्प कानूनी विभाजन (Legal Split) की स्थिति बन गई है। इससे पहले वॉशिंगटन की एक अन्य फेडरल कोर्ट ने यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा दायर एक अलग मुकदमे में ट्रंप सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे बाद में ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई थी।

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने अदालती आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ट्रंप प्रशासन को पूरा भरोसा है कि ऊपरी अदालत में अपील करने पर इस फैसले को पलट दिया जाएगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति के पास देश के हितों की रक्षा के लिए किसी भी श्रेणी के विदेशियों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का स्पष्ट संवैधानिक अधिकार है।

कानूनी विशेषज्ञों और अप्रवासन वकीलों (Immigration Lawyers) को पूरी उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ ‘यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फर्स्ट सर्किट’ का दरवाजा खटखटाएगा। सरकार कोर्ट से यह माँग भी कर सकती है कि जब तक यह मुकदमा उच्च न्यायालयों में लंबित है, तब तक इस फीस को अंतरिम रूप से लागू रहने की अनुमति दी जाए। ऐसे में आने वाले हफ्तों में यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँच सकता है, लेकिन फिलहाल के लिए कंपनियों को इस भारी टैक्स से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है।

अंबेडकर नगर के मंदिर में चल रही थी शिव चर्चा, इस्लामी कट्टरपंथी फैलाने लगे गंदगी: हिंदुओं ने विरोध किया तो जान से मारने की दी धमकी, पढ़िए FIR की डिटेल

उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले से गंभीर मामला सामने आया। यहाँ के अकबरपुर कोतवाली इलाके में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर परिसर में कचरा फेंकने और गंदगी फैलाने को लेकर भारी बवाल हो गया। इस घटना में एक मुस्लिम परिवार और उनके साथ आए दर्जनों इस्लामिक भीड़ पर शिव मंदिर परिसर को अपवित्र करने और विरोध करने पर एक हिंदू युवक पर तलवार से जानलेवा हमला करने का आरोप लगा है।

इस पूरी वारदात के कई Videos सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। घटना की जानकारी मिलते ही उत्तर प्रदेश पुलिस तुरंत एक्शन लिया और 2 आरोपितों को गिरफ्तार किया। इस पूरे मामले की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

मंदिर परिसर में कचरा फेंकने से शुरू हुआ विवाद

पूरा मामला अंबेडकर नगर के अकबरपुर कोतवाली क्षेत्र का बताया जा रहा है। FIR के मुताबिक, मीरानपुर लालाघाट निवासी उमेश सोनकर शिव मंदिर में पूजा-पाठ और शिव कथा में शामिल थे। इसी दौरान मोहल्ले के कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी वहाँ पहुँचे और मंदिर परिसर के बाहर गंदगी फैलाने लगे।

आरोप है कि हाजी गयास, अरमान, अबरार, राजा और उनके साथ आए 20 से 25 अन्य इस्लामिक कट्टरपंथियों ने वहाँ कचरा फेंकना शुरू कर दिया। शिकायत में कहा गया है कि आरोपितों ने पहले नगर पालिका का डस्टबिन तोड़ा और फिर मंदिर के आसपास गंदगी फैलाने लगे।

विरोध करने पर धारदार हथियारों से बोला धावा

जब हाजी गयास, अरमान, अबरार और राजा नाम के युवक मंदिर के पास गंदगी फैलाने लगे, तो वहाँ मौजूद उमेश सोनकर और मोहल्ले के अन्य लोगों ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। हिंदुओं ने बेहद शालीनता और शांति से उन्हें समझाया कि यह आस्था का केंद्र है और यहाँ कचरा न फेंके।

लेकिन इतना सुनते ही आरोपित पक्ष अचानक उग्र हो गया। उन्होंने तुरंत अपने अन्य साथियों को वहाँ बुला लिया। देखते ही देखते हाजी गयास, अरमान, अबरार और राजा के साथ 20 से 25 अज्ञात लोग लाठी-डंडे और धारदार तलवार लेकर मौके पर धमक पड़े। इन सभी लोगों ने एक राय होकर हिंदू श्रद्धालुओं को घेर लिया।

मस्जिद की जमीन बताकर किया जानलेवा हमला

इस्लामिक कट्टरपंथियों ने मंदिर परिसर के सामने खड़े होकर हिंदुओं को गंदी-गंदी गालियाँ देना शुरू कर दिया। उन्होंने चीखते-चिल्लाते हुए हिंदुओं को जान से मारने की धमकी दी। आरोपितों का कहना था कि यह जमीन मंदिर की संपत्ति नहीं है बल्कि यह मस्जिद की जमीन है। इसी बात को लेकर उन्होंने डस्टबिन तोड़ दिया और विवाद को आगे बढ़ाया।

इसके बाद आरोपितों ने हथियारों से लैस होकर उमेश सोनकर और अन्य लोगों पर जानलेवा हमला बोल दिया। इस अचानक हुए हमले में उमेश सोनकर को गंभीर चोटें आई हैं। हमलावरों ने मंदिर की पवित्रता को भंग करने की पूरी कोशिश की और वहाँ मौजूद श्रद्धालुओं में दहशत फैला दी।

पुलिस का त्वरित एक्शन और 2 आरोपित गिरफ्तार

इस घटना के बाद पीड़ित उमेश सोनकर ने तुरंत अकबरपुर कोतवाली में तहरीर देकर न्याय की गुहार लगाई। पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बिना किसी देरी के हाजी गयास, अरमान, अबरार, राजा और 20-25 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ सुसंगत और गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।

FIR कॉपी की एक प्रति

अंबेडकर नगर पुलिस ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया है कि पीड़ित की तहरीर के आधार पर तत्काल केस दर्ज किया गया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस मामले में नामजद दो आरोपितों को धर-दबोचा है। इलाके में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है और बाकी फरार आरोपितों की तलाश में छापेमारी की जा रही है।

हर कब्र-दरगाह वक्फ की प्रॉपर्टी नहीं: मद्रास हाई कोर्ट, कहा- सिर्फ इस्लाम से जुड़े होने के कारण बोर्ड नहीं कर सकता कब्जा; जानिए क्या है मामला

मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।

240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।

न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।

कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।

240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख

ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।

लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।

कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।

कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”

वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है

INDI गठबंधन की बैठक में आई पार्टियाँ बजा रही थी अपनी ढपली अपना राग, उधर एक झटके में 21 सांसद हो गए कम: जानें किस मजबूरी में एकजुटता का करना पड़ रहा दिखावा

नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में जब ‘इंडी गठबंधन’ (INDIA Bloc) के नेता एक बार फिर मेज के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुए, तो कैमरों की चमक और मुस्कुराते चेहरों के पीछे एक ऐसी राजनीतिक बेबसी और कड़वाहट साफ नजर आ रही थी जिसे छिपाना नामुमकिन था। मंच पर एकजुटता के कसीदे पढ़े जा रहे थे, लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत यह थी कि इस गठबंधन में शामिल हर दल अपनी ढपली पर अपना ही राग अलाप रहा था।

यह बैठक किसी दूरगामी नीति या भविष्य के सुनहरे रोडमैप के लिए नहीं, बल्कि हालिया चुनावी शिकस्तों से सहमे क्षेत्रीय क्षत्रपों की ‘अस्तित्व बचाने’ की एक सामूहिक छटपटाहट मात्र थी। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका तब लगा जब दिल्ली में विपक्षी एकजुटता का दिखावा चल रहा था और ठीक उसी वक्त कोलकाता से लेकर दिल्ली तक अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पैरों के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक चुकी थी।

ममता बनर्जी का ‘यू-टर्न’ और एक झटके में बिखराव की कहानी

इस बैठक की सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी तस्वीर ममता बनर्जी की मौजूदगी थी। राजनीति में अवसरवादिता और मजबूरियों का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों के नतीजे नहीं आए थे, तब तक ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस इस इंडी गठबंधन को ठेंगा दिखा रही थी।

सीटों के तालमेल से लेकर साझा रैलियों तक दीदी ने कॉन्ग्रेस और अन्य सहयोगियों को भाव देना भी मुनासिब नहीं समझा था। लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल में मिली करारी चुनावी हार ने उनके तेवर ढीले कर दिए। जो ममता कल तक गठबंधन से दूरी बना रही थीं, वो हार के तुरंत बाद दिल्ली की बैठक में शामिल होने दौड़ पड़ीं।

मगर नियति का खेल देखिए जिस वक्त ममता बनर्जी दिल्ली में इंडी गठबंधन की बैठक में मंच साझा कर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रही थीं, ठीक उसी समय उनकी अपनी पार्टी में एक ऐतिहासिक बगावत हो चुकी थी। लोकसभा में तृणमूल कॉन्ग्रेस के 20 सांसदों ने एकमत होकर पार्टी आलाकमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और खुद को एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंप दिया। इसके साथ ही राज्यसभा के भी एक सांसद ने सांसदी और अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

यानी एक तरफ दीदी दिल्ली में विपक्षी एकता की नई स्क्रिप्ट लिख रही थीं, तो दूसरी तरफ एक ही झटके में उनके 21 सांसद कम हो चुके थे। पार्टी का यह अंदरूनी बिखराव यह बताने के लिए काफी है कि जो दल खुद को नहीं संभाल पा रहे, वे देश को विकल्प देने का दावा कर रहे हैं।

अतीत के पन्ने, संयोजक पद का विवाद और बर्बादी की शुरुआत

इंडी गठबंधन के इस ताजा तमाशे को समझने के लिए थोड़ा फ्लैशबैक में जाना जरूरी है। इस गठबंधन की बुनियाद में ही महत्वाकांक्षाओं का जो बारूद भरा था, उसने इसकी बर्बादी की पटकथा बहुत पहले लिख दी थी। जब जनता दल यूनाइटेड (JDU) के तत्कालीन नेता नीतीश कुमार को इस गठबंधन का संयोजक बनाने की बात चल रही थी, तब तृणमूल कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) ने मिलकर इसका तीखा विरोध किया था।

ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल की जोड़ी नहीं चाहती थी कि गठबंधन की कमान किसी ऐसे नेता के हाथ में जाए जो उनके अपने राष्ट्रीय उभार के आड़े आए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उसी अहं और आपसी खींचतान के बिंदु से इंडी गठबंधन के पतन और बर्बादी की शुरुआत हो गई थी, जो आज तक थमने का नाम नहीं ले रही है।

डीएमके और आप की बेरुखी, धोखे और मजबूरी का गणित

इस बार की बैठक में कुछ चेहरों की गैरमौजूदगी ने भी गठबंधन के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया। द्रमुक (DMK) और आम आदमी पार्टी (AAP) इस बैठक से पूरी तरह नदारद रहीं। तमिलनाडु में डीएमके और कॉन्ग्रेस का रिश्ता अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ केवल औपचारिकताएँ बची हैं। दरअसल तमिलनाडु के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में कॉन्ग्रेस ने जिस तरह तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के प्रति अपनी नजदीकियाँ बढ़ाईं, उसे डीएमके ने एक बड़े धोखे के रूप में देखा।

दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस ने जिस टीवीके के चक्कर में अपनी पुरानी सहयोगी डीएमके को नाराज किया या धोखा दिया, उसे इस बैठक में आमंत्रित तक नहीं किया गया। जब सवाल उठा तो बेहद लचर बहाना बनाया गया कि टीवीके के पास कोई सांसद नहीं है, इसलिए उन्हें नहीं बुलाया गया।

वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने भी इस बैठक से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा। चुनावी मैदान में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकने और फिर दिल्ली में आकर गले मिलने की इस नौटंकी से अब ये दल खुद भी असहज होने लगे हैं।

हेमंत सोरेन की दूरी और केरल का ‘एजेंट’ विवाद

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीति भी इस बैठक में ढुलमुल ही नजर आई। उन्होंने खुद इस बैठक में शामिल होने के बजाय अपनी जगह एक प्रतिनिधि को भेजकर केवल कोरम पूरा किया। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि अब क्षेत्रीय दलों को भी इस बात का अहसास हो चुका है कि इंडी गठबंधन के मंच से उन्हें केवल नुकसान ही होना है।

इससे भी ज्यादा कड़वाहट वामपंथियों और कॉन्ग्रेस के बीच देखने को मिली। सीपीआई(एम) (CPI-M) ने खुलकर आरोप लगाया कि इस गठबंधन में उनके नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की घोर बेइज्जती की गई है। यह वही गठबंधन है जहाँ चुनावी रैलियों में खुद राहुल गांधी ने अपने ही सहयोगी दल के नेता को बीजेपी का ‘एजेंट’ तक करार दे दिया था।

हालाँकि केरल की राजनीतिक जमीन पर ये दोनों पार्टियाँ (कॉन्ग्रेस और वामदल) हमेशा से आमने-सामने रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती का जो ढोंग ये रचते हैं, उसकी कलई विजयन और राहुल गांधी के बयानों से बार-बार खुल जाती है। सीपीआई(एम) के नेताओं ने इस बैठक में भी कॉन्ग्रेस से इस अपमान पर स्पष्टीकरण की मांग की, जिससे बैठक का माहौल और तनावपूर्ण हो गया।

हार के मलबे पर खड़ी पार्टियों का जमावड़ा

अगर इस बैठक में शामिल हुए दलों के ट्रैक रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो यह साफ हो जाता है कि यह कोई वैचारिक गठबंधन नहीं, बल्कि पराजित और कमजोर हो चुके दलों का एक शेल्टर होम (आश्रय स्थल) बन चुका है। शरद पवार की राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) का हश्र किसी से छिपा नहीं है, पार्टी पहले ही टूट चुकी है और लगभग बर्बाद होने की कगार पर है। बैठक में पहुँचे अन्य दल भी किसी न किसी बड़ी चुनावी शिकस्त का दंश झेलकर ही वहाँ पहुँचे थे।

चाहे महबूबा मुफ्ती की पीडीपी (PDP) हो, अरविंद केजरीवाल की आप (AAP) हो या फिर बिहार में सत्ता से बेदखल हुई आरजेडी (RJD) इन सभी पार्टियों के पास न तो आज कोई ठोस राष्ट्रीय नीति बची है और न ही कोई स्पष्ट भविष्य नजर आ रहा है।

इन क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जब ये अपने-अपने राज्यों में मजबूत होते हैं, तो कॉन्ग्रेस और इस गठबंधन को ठेंगा दिखाते हैं, और जैसे ही जनता इन्हें नकार देती है, ये अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए ‘संविधान और लोकतंत्र’ के नाम पर दिल्ली में एकजुट होने का स्वांग रचने लगते हैं।

केवल दिखावे की डोर से बंधी एकजुटता

पॉलिटिकल कमेंट्री के नजरिए से देखें तो यह बैठक विपक्षी राजनीति के उस संकट को दर्शाती है जहां नीतियां गौण हैं और सिर्फ निजी व दलीय अस्तित्व को बचाए रखने की मजबूरी सर्वोपरि है। तृणमूल कॉन्ग्रेस का 21 सांसदों के नुकसान के बावजूद इस बैठक में बैठना, वामदलों का अपमान का घूँट पीकर भी हाजिरी लगाना और प्रमुख दलों का इस बैठक से कन्नी काट जाना… यह सब इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि ‘इंडी गठबंधन’ आज अपनी ही अंतर्विरोधों की ढपली और अपने ही स्वार्थों के राग में उलझकर रह गया है।

जनता के सामने विकल्प पेश करने का दावा करने वाले इन नेताओं के पास अपनी ही पार्टियों के बिखराव को रोकने का कोई फॉर्मूला नहीं है, ऐसे में यह तथाकथित एकजुटता केवल एक राजनीतिक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं दिखती।

बंगाल में CAA-विरोधी दंगों की जाँच के आदेश, UP स्टाइल में होगी वसूली: पढ़ें ममता सरकार ने इस्लामी कट्टरपंथियों को कैसे दी थी रेलवे की संपत्तियों को तबाह करने की छूट

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के 15 साल के शासन के दौरान कई बार हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं। चुनाव बाद हुई हिंसा, CAA विरोधी दंगे और वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं को लेकर विपक्ष लगातार राज्य सरकार पर सवाल उठाता रहा।

अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 2019 में CAA के विरोध में हुए दंगों की जाँच कराने का फैसला किया है, जिनमें रेलवे की संपत्तियों को भारी नुकसान पहुँचा था। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस महानिदेशक सिद्ध नाथ गुप्ता को निर्देश दिया है कि 2019 के CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से जुड़े सभी मामलों की समीक्षा की जाए।

खास तौर पर रेलवे की संपत्तियों को हुए नुकसान की जाँच की जाएगी। इसके लिए एक विशेष पुलिस सेल बनाई जाएगी, जो सत्यापित मामलों की जाँच करेगी। सरकार का दावा है कि मुर्शिदाबाद, हावड़ा और अन्य इलाकों में हुए दंगों के कारण रेलवे को करीब 93 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।

जाँच के बाद इस नुकसान की भरपाई दंगों में शामिल लोगों से कराने की भी कोशिश की जाएगी। यह फैसला केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ हुई बैठक के बाद लिया गया है।

पश्चिम बंगाल में CAA-विरोधी दंगे और TMC सरकार का परोक्ष समर्थन

12 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पारित किया गया था। इस कानून का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी समुदाय के उन लोगों को भारतीय नागरिकता देने की प्रक्रिया आसान बनाना था, जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आ चुके थे।

हालाँकि CAA में मुस्लिमों को शामिल नहीं किए जाने को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विपक्षी दलों और कई संगठनों ने आरोप लगाया कि यह कानून भेदभावपूर्ण है। यह भी दावा किया गया कि CAA को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) से जोड़कर लागू किया जाएगा और इससे भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है।

इन दावों के बाद देशभर में CAA विरोधी प्रदर्शन तेज हो गए। उस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार CAA के खिलाफ रैलियाँ और प्रदर्शन कर रही थीं। विरोध प्रदर्शनों के बीच कई राज्यों में हालात तनावपूर्ण हो गए और कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कई सभाओं में CAA का विरोध करते हुए कहा था कि यह कानून उनकी लाश पर ही लागू हो सकेगा। 16 दिसंबर 2019 को उन्होंने एक रैली में कहा था, “अगर CAA लागू करना है तो मेरी लाश पर करना होगा।” इसी दौरान 14 दिसंबर 2019 को पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हिंसा भड़क उठी।

मुस्लिम भीड़ ने लालगोला और कृष्णापुर रेलवे स्टेशनों पर खड़ी पाँच खाली ट्रेनों में आग लगा दी। सूती इलाके में रेलवे ट्रैक को नुकसान पहुँचाया गया, जबकि बेलडांगा रेलवे स्टेशन को भी निशाना बनाया गया। मुर्शिदाबाद जिले में कई रेलवे स्टेशनों पर तोड़फोड़ की गई और एक टोल प्लाजा में भी आगजनी की घटना सामने आई।

2019 में CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भीड़ ने ट्रेनों, रेलवे काउंटरों, कोचों और रेलवे की बड़ी संपत्तियों को पहुँचाया था नुकसान

CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा केवल मुर्शिदाबाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि हावड़ा जिले में भी कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएँ सामने आईं। उलूबेरिया रेलवे स्टेशन पर दंगाईयों ने रेलवे ट्रैक जाम कर दिए, जिससे ट्रेन सेवाएँ प्रभावित हुईं। इस दौरान स्टेशन परिसर और कुछ ट्रेनों में भी तोड़फोड़ की गई तथा पथराव की घटनाएँ हुईं।

अधिकारियों के अनुसार, पथराव में एक ट्रेन चालक घायल हो गया था। हिंसा का असर पूर्व रेलवे के सियालदह मंडल की रेल सेवाओं पर भी पड़ा। इसके अलावा पूर्व रेलवे के मालदा मंडल के अंतर्गत आने वाले सुजनीपाड़ा रेलवे स्टेशन पर भी हमला किया गया।

हावड़ा जिले के सांकराइल रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर को निशाना बनाया गया और स्टेशन परिसर में आग लगा दी गई। वहीं निमतीता रेलवे स्टेशन पर भी प्रदर्शनकारियों ने रेलवे संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और पथराव किया। इन घटनाओं के कारण कई इलाकों में रेल सेवाएँ बाधित हुईं और रेलवे को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

हिंसा के दौरान रेलवे ट्रैक पर टायर जलाकर ट्रेनों का संचालन रोक दिया गया। कई जगहों पर पथराव की घटनाएँ भी हुईं। स्थिति को नियंत्रित करने पहुँची पुलिस की एक गाड़ी को भी आग के हवाले कर दिया गया। हालात बिगड़ने के बाद एहतियात के तौर पर कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा।

वहीं कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अफवाहों को रोकने के लिए राज्य के छह जिलों में इंटरनेट सेवाएँ भी अस्थायी रूप से बंद कर दी गई थीं।

CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मुस्लिम भीड़ ने रेलवे की संपत्ति को पहुँचाया था निशान

12 से 16 दिसंबर 2019 के बीच पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, बीरभूम और उत्तर 24 परगना समेत कई जिलों में CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं। दक्षिण 24 परगना जिले में नुंगी और आक्रा रेलवे स्टेशनों के बीच दंगाईयों द्वारा रेलवे ट्रैक जाम किए जाने से रेल सेवाएँ बुरी तरह प्रभावित हुईं।

आक्रा रेलवे स्टेशन में तोड़फोड़ की गई और बाद में उसमें आग लगा दी गई। इसके अलावा टिकट काउंटर में रखी नकदी भी लूट लिए जाने की खबरें सामने आईं। उस समय ऑपइंडिया ने पश्चिम बंगाल में जिहादी दंगों के दौरान एक स्थानीय बंगाली, शंखदीप शोम के भयावह अनुभव पर रिपोर्ट की थी।

एक फेसबुक पोस्ट में शोम ने बताया कि वह यूपी हावड़ा-चेन्नई सेंट्रल कोरोमंडल एक्सप्रेस में सवार थे, जो शुक्रवार को दोपहर लगभग 3:20 बजे हावड़ा-खड़गपुर खंड पर उलुबेरिया स्टेशन पर पहुँची थी।

उन्होंने बताया कि स्टेशन से सटी एक मस्जिद में जुम्मे की नमाज के बाद करीब 500-700 उपद्रवियों की एक बड़ी भीड़ निकली, जिन्होंने स्टेशन के बाहर लेवल क्रॉसिंग के पास रेलवे लाइन को जाम कर दिया, जिसके कारण ट्रेन सेवाएँ प्रभावित हुईं और यात्रियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

ट्रेनों में तोड़-फोड़-स्टेशनों पर आगजनी, लेकिन राजनीति करने और जिहादी हिंसा को कमतर दिखाने में व्यस्त थीं ममता सरकार

जब बंगाल जल रहा था, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आग में घी डालने और खुद को ‘धर्मनिरपेक्षता’ का रक्षक बताने वाली अपनी छवि को चमकाने के तरीके ढूँढ रही थीं।

याद दिला दें कि पश्चिम बंगाल में विरोध-प्रदर्शनों के बीच, तत्कालीन गवर्नर जगदीप धनखड़ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस विज्ञापन को असंवैधानिक बताया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि NRC और नागरिकता संशोधन कानून लागू नहीं किए जाएँगे।

गवर्नर ने कहा था कि सरकार के प्रमुख के तौर पर ममता बनर्जी ऐसे विज्ञापनों के लिए सरकारी फंड का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। इस बीच बीजेपी ने आरोप लगाया था कि सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम भीड़ हिंदू घरों पर हमले कर रही थी।

13 से 17 दिसंबर 2019 के बीच कई जगहों पर TMC कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर मुस्लिम दंगाइयों ने 19 से ज्यादा रेलवे स्टेशनों और 20 ट्रेनों में तोड़-फोड़ की या उन्हें आग के हवाले कर दिया। दंगाइयों ने गुजरती ट्रेनों पर पत्थर भी फेंके, टिकट बुकिंग काउंटरों में तोड़-फोड़ की, पैसे चुराए और रेल की पटरियों को घेर लिया।

रेलवे को हुआ भारी नुकसान, करोड़ों की संपत्ति नष्ट, सैकड़ों ट्रेनें करनी पड़ीं रद्द

परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में रेल मंत्रालय को लगभग 655 ट्रेनें रद्द करनी पड़ीं। रेलवे परिसर में दंगे और आगजनी के कई मामलों में लगभग 17 FIR दर्ज की गईं। पूर्वी रेलवे (ER) ने कथित तौर पर 127 मेल/एक्सप्रेस ट्रेनें, 190 यात्री ट्रेनें और 290 उपनगरीय ट्रेनें रद्द कीं।

दक्षिण-पूर्वी रेलवे के खड़गपुर डिवीजन को अकेले जिहादी भीड़ की हिंसा के कारण लगभग 16 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, क्योंकि 13 से 17 दिसंबर 2019 के बीच 48 ट्रेनें रद्द की गईं, छह स्टेशनों में तोड़फोड़ की गई, पाँच ट्रेनों में आग लगा दी गई और RPF टीमों पर दंगाइयों ने हमला किया।

हालाँकि तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्होंने कई मौकों पर यह दावा किया था कि वह काफिर नहीं हैं और वह काफिरों से लड़ती हैं, ने मुस्लिम भीड़ हिंसा की घटनाओं को ‘छोटी-मोटी घटनाएँ’ कहकर खारिज कर दिया। ममता यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने खुद को पीड़ित बताते हुए भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को खलनायक के रूप में पेश किया।

उन पर पश्चिम बंगाल में जानबूझकर ट्रेनें रद्द करने का आरोप लगाया ताकि राज्य और उनकी सरकार को बदनाम किया जा सके। यह अपमानजनक और द्वेषपूर्ण बयान तब आया जब रेल मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में मौजूदा तनाव, नाकाबंदी, हमलों और TMC सरकार द्वारा दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफलता के कारण सुरक्षा जोखिमों का हवाला देते हुए सेवाएँ निलंबित कर दीं।

इतना ही नहीं जब रेलवे अधिकारियों को मुस्लिम भीड़ से बचने के लिए भागना और छिपना पड़ा, तब ममता बनर्जी ने यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि रेलवे अधिकारियों और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा राज्य सरकार का काम नहीं है।

ममता ने 17 दिसंबर 2019 को दक्षिण कोलकाता के जादवपुर में एक रैली में कहा, “कुछ जगहों पर कुछ छोटी-मोटी घटनाएँ हुईं। लेकिन उन्होंने (केंद्र सरकार ने) लगभग रेल सेवाएँ ठप कर दीं। ट्रेनों के मनमाने ढंग से रद्द होने के कारण लोगों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। रेलवे की सुरक्षा करना हमारी जिम्मेदारी नहीं है, लेकिन हमने यथासंभव उनकी मदद करने की कोशिश की। ट्रेनों और स्टेशनों की सुरक्षा के लिए उनके पास अपनी पुलिस फोर्स, RPF है।”

TMC सुप्रीमो का यह कहना कि रेलवे की संपत्ति और अधिकारियों की सुरक्षा करना उनकी सरकार का काम नहीं था, एक तरह से यह स्वीकार करने जैसा था कि उन्होंने जिहादियों को दंगे करने और विशेष रूप से केंद्र सरकार की संपत्तियों को निशाना बनाने की अनुमति दी ताकि दबाव बनाया जा सके और यह सब एक ऐसे कानून के लिए किया गया जिसका किसी भी भारतीय नागरिक से कोई लेना-देना नहीं था।

दंगों में हुए नुकसान की कीमत उपद्रवियों से वसूलने में भी TMC ने नहीं दिया केंद्र सरकार का साथ

ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार ने न सिर्फ़ दंगाईयों को परोक्ष रूप से समर्थन दिया और जवाबदेही से बचने की कोशिश की, बल्कि 2019 में CAA-विरोधी प्रदर्शनों और हिंसा के दौरान रेलवे की संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई को भी असल में रोक दिया।

CAA-विरोधी दंगों के कुछ दिनों बाद रेलवे बोर्ड के चेयरमैन वीके यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पश्चिम बंगाल में ट्रेनों, स्टेशनों, पटरियों और दूसरी संपत्तियों के नष्ट होने से भारतीय रेलवे को 80-93 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है।

मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि वे रेलवे संपत्ति को नष्ट करने में शामिल पहचाने गए दंगाइयों से लागत वसूलने के लिए राज्य अधिकारियों के साथ समन्वय करेंगे। हालाँकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है, लेकिन TMC ने दंगाइयों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए कोई प्रयास नहीं किए और ना अपराधियों के खिलाफ मुआवजे की कार्यवाही में सहायता की।

रेल मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल लोक व्यवस्था रखरखाव (संशोधन) अधिनियम, 2017 (सामूहिक मुआवजे की अनुमति देने वाला) और सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, 1984 (अनिवार्य दंड और वसूली) का हवाला देते हुए TMC सरकार से सहयोग माँगा था। हालाँकि ममता बनर्जी के असहयोग के कारण कोई सार्थक वसूली कार्रवाई नहीं की जा सकी।

2026 में नई सरकार के लिए छह साल बाद 2019 के CAA विरोधी हिंसा की नए सिरे से, समयबद्ध जाँच का आदेश देना आवश्यक होना, ममता के नेतृत्व वाली TMC सरकार की जानबूझकर की गई निष्क्रियता, दस्तावेजी रूप से दर्ज आगजनी और हिंसा को व्यवस्थित रूप से कम आँकने और केंद्र सरकार के साथ असहयोग करने के बारे में बहुत कुछ कहता है।

मूल रुप से यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कभी अयोध्या की जमीन, कभी मुहूर्त तो कभी चढ़ावा चोरी… बार-बार राम मंदिर पर बेतुके विवाद खड़े कर रही सपा, क्या सत्ता में लौटने पर सरकारी कब्जे की है साजिश?

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का जो दावा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने रविवार (8 जून 2026) को किया था वो ऑपइंडिया की पड़ताल में कहीं टिक नहीं पाया। अखिलेश ने X पर लिखा चढ़ावे में करोड़ों की चोरी हुई लेकिन जब हमने सपा के पूर्व मंत्री रहे और पार्टी प्रवक्ता पवन पांडेय से बात की तो उन्होंने कह दिया कि यह बस सुनी सुनाई बात है।

इस बीच सोशल मीडिया पर यह बात आग की तरह फैल गई। लोगों ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से जवाब देने को कहा। वो सामने आए और बताया कि ऐसी कोई बात नहीं सामने आई है। धीरे-धीरे कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में चंदा चोरी को लेकर कुछ लोगों की गिरफ्तारी की खबरें भी तैरने लगीं। हालाँकि, कुछ वक्त बाद ही पुलिस ने साफ कर दिया कि कोई गिरफ्तारी नहीं है। यानी राम मंदिर के नाम पर जो इतना वितंडा खड़ा किया गया वो केवल सनसनी फैलाने के लिए था।

राम मंदिर के नाम पर भ्रम फैलाने का लंबा इतिहास

यह पहला मौका नहीं है जब राम मंदिर के इर्द-गिर्द भ्रम फैलाने की कोशिश की गई हो। समाजवादी पार्टी ने कई बार अयोध्या में राम मंदिर के आसपास जमीन खरीद और कथित जमीन घोटाले का मुद्दा उठाया। अखिलेश यादव ने आरोप लगाए कि अयोध्या में कुछ लोगों ने जमीन खरीद-फरोख्त में फायदा उठाया और सरकार को जवाब देना चाहिए। SP नेताओं ने इसे ‘राम के नाम पर भ्रष्टाचार’ का मुद्दा बनाया। मंदिर के ट्रस्ट पर ही सवाल उठाए गए लेकिन जाँच में कभी उल्टा सपा पर ही उँगलियाँ उठीं।

सपा जमीन घोटाले की आड़ में राम मंदिर परियोजना की छवि खराब करने की कोशिशों में जुटी रही। रिपोर्ट्स में सामने आया कि जिस जमीन को लेकर ट्रस्ट पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है, उसे 2011 में समाजवादी पार्टी के नेता सुल्तान अंसारी ने 2 करोड़ रुपए में खरीदा था।

राम मंदिर के नाम पर राजनीतिक चमकाने की कोशिश कर रहे अखिलेश यादव वहीं सज्जन हैं जो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का न्यौता मिलने के बाद भी कार्यक्रम में शामिल होने नहीं पहुँचे थे। उन्होंने थोड़े दिनों बाद वहाँ जाने की बात कहकर बात को टाल दिया और आज तक भी वो राम मंदिर में नजर नहीं आए हैं।

अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव का राम भक्तों पर गोली चलवाने का इतिहास रहा है तो उनके चाचा राम गोपाल यादव ने भी राम मंदिर को लेकर बदजुबानी की थी। मई 2024 में रामगोपाल यादव ने राम मंदिर पर बयान देते हुए कहा है कि ‘वो मंदिर बेकार है, मंदिर ऐसे नहीं बनते। राम मंदिर का नक्शा ठीक नहीं बना है, ये वास्तु के हिसाब से ठीक नहीं बनाया गया है।’

सिर्फ मंदिर ही नहीं अयोध्या में विकास से जुड़े खर्चों को लेकर भी सपा के नेता आए दिन बीजेपी पर सवाल उठाते रहे हैं। दीपोत्सव जैसे भव्य कार्यक्रमों की आलोचना की जाती रही है। खुद अखिलेश यादव तक यह कह चुके हैं कि दीयों पर पैसे क्यों खर्च करने हैं।

मंदिर के पैसे पर सपा की नजर?

राम मंदिर को लेकर समय-समय पर पैदा किए जाने वाले भ्रम के बीच एक सवाल अक्सर सामने आता है कि क्या मंदिर प्रबंधन, चढ़ावे या ट्रस्ट को लेकर लगातार शंकाएँ खड़ी करने के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक उद्देश्य हो सकता है? यह तर्क भी दिया जाता है कि यह भविष्य की सत्ता-राजनीति की जमीन तैयार करने की कोशिश हो रही है। जब बार-बार यह भ्रम फैलाया जाता है तो धीरे-धीरे एक ऐसा नैरेटिव बनाया जा सकता है कि राम मंदिर ट्रस्ट खुद अपने संसाधनों का प्रबंधन नहीं कर पा रहा है।

अगर कभी सपा सत्ता में लौटती है तो यही भ्रम एक संगठित नैरेटिव बनकर सरकारी हस्तक्षेप या नियंत्रण की माँग का आधार बन सकता है। यानी अगर कभी राजनीतिक समीकरण बदलें, तो राम मंदिर को भी ‘बेहतर निगरानी’ और ‘पारदर्शिता’ जैसे बहानों के नाम पर सरकारी नियंत्रण के दायरे में लाने की बहस खड़ी की जा सकती है।

फिर इस पैसे का इस्तेमाल किस तरह होगा और किस तरह पैसे की बंदरबाँट हो सकता है इसको लेकर तमाम तरह के सवाल होंगे। क्या उस पैसे को कोई और सरकार सरकारी योजनाओं के नाम पर मंदिर से डायवर्ट कर देगी या उस पैसे का इस्तेमाल राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए किया जाएगा। मंदिर पर पैदा किए जाने वाले भ्रम के बीच यह सवाल भी लोगों को ध्यान में रखने की जरूरत है।

राम मंदिर के पास कितना पैसा है और कितना आता है दान?

राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि मंदिर ट्रस्ट के पास आखिर कितना पैसा है, हर साल कितना दान आता है और उसका इस्तेमाल कैसे होता है।

13 दिसंबर 2025 को हुई श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक में बताया गया था कि ट्रस्ट को अब तक कुल 4,575 करोड़ रुपए मिले हैं। यह पैसा दान, ब्याज और अन्य माध्यमों से मिला है। ट्रस्ट के मुताबिक, मंदिर निर्माण, श्रीराम जन्मभूमि परिसर के विस्तार, जमीन और भवनों की खरीद समेत कई दूसरे कामों पर करीब 2,475 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यानी उस समय ट्रस्ट के पास लगभग 2,100 करोड़ रुपए की राशि बची हुई थी।

वहीं, राम मंदिर की वार्षिक रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2024-25 का पूरा हिसाब दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस एक साल में ट्रस्ट की कुल आय 327 करोड़ रुपए रही। इसमें से 153 करोड़ रुपए सीधे दान के रूप में आए जबकि 173 करोड़ रुपए बैंक में जमा रकम पर मिले ब्याज से आए। यानी मंदिर की आमदनी सिर्फ चढ़ावे से नहीं बल्कि जमा फंड पर मिलने वाले ब्याज से भी होती है।

अगर 153 करोड़ रुपए के सालाना दान को रोज के हिसाब से देखें तो औसतन करीब 42 लाख रुपए प्रतिदिन मंदिर में चढ़ावे के रूप में आए। हालाँकि त्योहारों, खास मौकों और वीकेंड पर यह राशि सामान्य दिनों से ज्यादा होती हैं। राम मंदिर में रोजाना करीब 70 हजार से 80 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। त्योहारों और छुट्टियों के दौरान यह संख्या दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है।

दान की व्यवस्था भी कई स्तरों पर की गई है। मंदिर के गर्भगृह के पास ‘दर्शन पथ’ में चार बड़े दान पात्र (बक्से) रखे गए हैं, जिनमें श्रद्धालु नकद चढ़ावा डालते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन दान की सुविधा भी है और मंदिर परिसर में 10 कंप्यूटरीकृत काउंटर बनाए गए हैं, जहाँ लोग रसीद के साथ दान दे सकते हैं।

चढ़ावे की गिनती भी तय प्रक्रिया के तहत होती है। इसके लिए 14 लोगों की एक टीम बनाई गई है, जिसमें 11 बैंक कर्मचारी और ट्रस्ट के 3 सदस्य शामिल होते हैं। यही टीम दान बक्सों में जमा रकम की गिनती करती है।