मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध और तेजी से बदलती वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ टैंक और लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रह गया है। लंबी दूरी की मिसाइलें, हाइपरसोनिक हथियार और ड्रोन अब किसी भी देश की सैन्य ताकत का सबसे अहम हिस्सा बन चुके हैं।
इसी बदलते माहौल में भारत भी अपनी सामरिक क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है। इसी कड़ी में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख डॉ समीर वी कामत ने बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि भारत की अगली पीढ़ी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (Intercontinental Ballistic Missile) अग्नि-6 के विकास के लिए संगठन पूरी तरह तैयार है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब केवल केंद्र सरकार की मंजूरी का इंतजार है और अनुमति मिलते ही इस परियोजना पर काम शुरू कर दिया जाएगा। डॉ कामत ने यह भी बताया कि भारत केवल अग्नि-6 ही नहीं बल्कि हाइपरसोनिक ग्लाइड और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों पर भी तेजी से काम कर रहा है।
उनके अनुसार, भारत की नई मिसाइल रणनीति में छोटी, मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों का संतुलित मिश्रण होगा ताकि हर तरह की सामरिक जरूरत को पूरा किया जा सके।
अग्नि-6 आखिर क्यों है इतनी खास?
अग्नि-6 को भारत की अब तक की सबसे उन्नत और सबसे लंबी दूरी तक हमला करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल माना जा रहा है। फिलहाल भारत के पास अग्नि-5 मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 5000 किलोमीटर से अधिक है लेकिन अग्नि-6 उससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली होगी।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इसकी रेंज 10,000 से 12,000 किलोमीटर तक हो सकती है जबकि हल्के पेलोड के साथ यह 14 से 16 हजार किलोमीटर तक भी पहुँच सकती है। इसका मतलब यह है कि भारत की सामरिक पहुँच एशिया से आगे यूरोप, अफ्रीका और कई अन्य हिस्सों तक आसानी से पहुँच जाएगी।
यह क्षमता भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला सकती है जिनके पास इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी ICBM क्षमता मौजूद है। अग्नि-6 केवल लंबी दूरी की मिसाइल नहीं होगी बल्कि इसमें आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा जिससे इसे रोकना बेहद मुश्किल हो सकता है।
माना जा रहा है कि इसमें MIRV यानी मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल तकनीक होगी। इसका मतलब यह है कि एक ही मिसाइल कई अलग-अलग लक्ष्यों पर एक साथ हमला कर सकेगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये मिसाइल एक साथ कई परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम हो सकती है। हर वारहेड अलग दिशा में जाकर अलग लक्ष्य को निशाना बना सकेगा।
अग्नि-5 से कितनी अलग होगी नई मिसाइल?
भारत ने हाल के वर्षों में अग्नि-5 का सफल MIRV परीक्षण किया है। इससे साफ है कि देश अब उन्नत परमाणु प्रतिरोध क्षमता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन अग्नि-6 को अग्नि-5 से भी ज्यादा आधुनिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें नई पीढ़ी की गाइडेंस प्रणाली, बेहतर नेविगेशन तकनीक और लक्ष्य भेदने की अधिक सटीक क्षमता होगी।
इसके अलावा इसमें मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल यानी MaRV तकनीक का उपयोग भी किया जा सकता है। यह तकनीक मिसाइल को वातावरण में दोबारा प्रवेश करने के बाद दिशा बदलने की क्षमता देती है। इससे दुश्मन के रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए इसे रोकना और भी कठिन हो जाता है।
बताया जा रहा है कि अग्नि-6 में रडार से बचने वाली विशेष कोटिंग और डिकॉय सिस्टम भी लगाए जा सकते हैं। डिकॉय यानी नकली लक्ष्य ऐसे उपकरण होते हैं जो दुश्मन के रडार को भ्रमित करते हैं। इससे वास्तविक वारहेड को रोकना मुश्किल हो जाता है। मिसाइल की गति भी बेहद खतरनाक मानी जा रही है।
अनुमान है कि यह लगभग 30 हजार किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल कर सकती है। इतनी तेज गति के कारण लक्ष्य को बचाव का बहुत कम समय मिलेगा।
भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल योजना कितनी आगे पहुँची?
DRDO प्रमुख समीर कामत ने केवल अग्नि-6 की ही चर्चा नहीं की, बल्कि भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल परियोजनाओं को लेकर भी अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत इस समय हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल दो प्रकार की हाइपरसोनिक प्रणालियों पर काम कर रहा है।
कामत के अनुसार, फिलहाल ग्लाइड मिसाइल कार्यक्रम ज्यादा उन्नत स्थिति में है और इसका परीक्षण जल्द हो सकता है। यह मिसाइल शुरुआत में एक बूस्टर की मदद से अत्यधिक गति प्राप्त करती है और फिर बिना इंजन के हवा में ग्लाइड करते हुए लक्ष्य तक पहुँचती है।
दूसरी तरफ हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल स्क्रैमजेट इंजन की मदद से पूरी उड़ान के दौरान शक्ति प्राप्त करती रहती है। दोनों प्रणालियाँ ध्वनि की गति से कई गुना तेज रफ्तार से उड़ान भर सकती हैं। भारत का LR-AShM यानी लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
यह मिसाइल विशेष रूप से नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। इसकी संभावित गति मैक-10 तक हो सकती है, यानी ध्वनि की गति से लगभग 10 गुना तेज। इसकी रफ्तार लगभग 12 हजार किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुँच सकती है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम ऊँचाई पर उड़ान भरते हुए रास्ते में दिशा बदल सकती है। इससे दुश्मन के रडार सिस्टम के लिए इसे पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।
कैसी होगी भारत की नई मिसाइल फोर्स?
भारत अब केवल परमाणु प्रतिरोध तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि पारंपरिक मिसाइल ताकत को भी नई दिशा देने की तैयारी में है। DRDO प्रमुख ने संकेत दिया कि भविष्य में भारत की ‘कन्वेंशनल मिसाइल फोर्स’ में अलग-अलग दूरी और भूमिकाओं के लिए कई प्रकार की मिसाइलें शामिल होंगी।
इसमें कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें, मध्यम दूरी की मिसाइलें, लंबी दूरी की प्रणालियाँ, क्रूज मिसाइलें और हाइपरसोनिक हथियार शामिल किए जा सकते हैं। प्रलय जैसी शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें अब अंतिम परीक्षण चरण में हैं और जल्द सेना में शामिल हो सकती हैं।
इसके अलावा कुछ मौजूदा रणनीतिक मिसाइलों को सामरिक उपयोग के लिए भी बदला जा सकता है। भारत की यह रणनीति एक मल्टी-लेयर्ड यानी बहुस्तरीय मिसाइल नेटवर्क तैयार करने की है, जिसमें हर परिस्थिति के लिए अलग विकल्प मौजूद हों। इससे किसी भी संभावित संघर्ष की स्थिति में भारत की जवाबी क्षमता और अधिक मजबूत होगी।
भारत की सामरिक ताकत को मिलेगा नया आयाम
अग्नि-6 केवल एक नई मिसाइल परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती सामरिक सोच का प्रतीक भी है। दुनिया तेजी से ऐसी सैन्य प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही है जहाँ लंबी दूरी तक तेज और सटीक हमला करने की क्षमता सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।
अगर केंद्र सरकार इस परियोजना को मंजूरी देती है तो भारत की सामरिक क्षमता में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अग्नि-6, हाइपरसोनिक हथियारों और नई मिसाइल फोर्स के साथ भारत उन देशों की कतार में और मजबूती से खड़ा होगा जिनकी सैन्य तकनीक वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालती है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 18 और 19 अप्रैल को ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) नाम के एक संगठन से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी के अनुसार, सिर्फ 6 महीनों में TTI ने विदेशी बैंक डेबिट कार्ड के जरिए अलग-अलग राज्यों से करीब 95 करोड़ रुपए निकाले। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए नक्सल प्रभावित रहे झारखंड से निकाले गए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान TTI ने FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों को दरकिनार किया। खास बात यह है कि यह संगठन FCRA के तहत रजिस्टर्ड भी नहीं है।
ऑपइंडिया खबरों की एक सीरीज कर रहा है कि TTI कैसे काम करता है। अपनी रिसर्च के दौरान ऑपइंडिया को पता चला कि TTI ने 10 किताबें प्रकाशित की हैं जिन्हें उसके सदस्य हिंदुओं और अन्य समुदायों के लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इनमें से 9 किताबों में किसी धर्म का सीधा जिक्र नहीं है लेकिन 10वीं किताब में ‘चर्च प्लांटिंग लीडर्स’ (यानी नए चर्च स्थापित करने वाले नेताओं) के लिए एक ट्रेनिंग गाइड दी गई है। इसमें बताया गया है कि हिंदुओं के पास कैसे पहुँचना है, हिंदू बहुल गाँवों में कैसे प्रवेश करना है और लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कैसे तैयार करना है।
इस किताब के तीसरे अध्याय का शीर्षक ‘वर्ल्ड रिलिजन्स एंड कल्ट्स’ है। इसमें चर्च से जुड़े लोगों को कहा गया है कि वे अलग-अलग धर्मों को ‘स्क्रिप्चर्स’ (धार्मिक ग्रंथों) के आधार पर परखें। किताब में ऐसे सुझाव भी दिए गए हैं कि कैसे बातचीत के जरिए हिंदुओं को ईसाई धर्म की ओर लाया जाए। यह समझना जरूरी है कि इस किताब में हिंदू धर्म को खास तौर पर मुख्य लक्ष्य के रूप में पेश किया गया है। इसमें हिंदू धर्म के बारे में जानकारी किसी अकादमिक या निष्पक्ष तुलना के रूप में नहीं दी गई है बल्कि इसे एक व्यावहारिक गाइड की तरह लिखा गया है। इसका मकसद हिंदुओं के बीच जाकर मिशनरी काम को आगे बढ़ाना है।
हिंदू गाँवों को धर्मांतरण के लिए कैसे टारगेट करता है TTI
यह किताब हिंदुओं की मूल आस्थाओं को निशाना बनाने की योजना बताती है जिसमें अनेक देवी-देवताओं के अस्तित्व पर भी निशाना साधा गया है। यह किताब यह विचार फैलाती है कि हिंदुओं के सामने ईसा मसीह को एक अवतार के रूप में पेश किया जाए क्योंकि इससे हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के लिए राजी करना आसान हो जाता है। इसके अलावा, किताब में यह भी कहा गया है कि पाप को नैतिक विद्रोह नहीं बल्कि अज्ञान बताया जाए और कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धांतों को इस तरह से समझाया जाए कि हिंदू धीरे-धीरे अपनी खुद की मान्यताओं से दूर होने लगें।
किताब यह भी स्पष्ट रूप से बताती है कि ‘एक हिंदू का अंतिम लक्ष्य’ कर्म और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाना है। साथ ही यह हिंदू धर्मग्रंथों को एक लंबी परंपरा के रूप में प्रस्तुत करती है जिसका केंद्र वेद, उपनिषद और भगवद्गीता हैं। लेकिन यह विवरण केवल शुरुआती हिस्सा है। इसके तुरंत बाद किताब में एक अलग भाग शुरू होता है जिसका शीर्षक है- ‘माफी संबंधी जवाब और धर्म प्रचार के सुझाव’ (Apologetic Responses and Witnessing Suggestions)। इससे यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि किताब का मकसद केवल हिंदू धर्म को समझाना नहीं बल्कि उसमें दखल देना है।
फोटो साभार: TTI
इस किताब की बनावट भी बहुत अहम है यह सिर्फ यह नहीं बताती कि हिंदू क्या मानते हैं, बल्कि यह भी बताती है कि मिशनरियों को उनके विश्वासों का जवाब कैसे देना चाहिए। सीधे शब्दों में कहें तो हिंदू समुदायों को मिशन की जमीन माना गया है और हिंदू आस्था को एक ऐसा क्षेत्र, जिस पर तर्क, समझाने-बुझाने और सोची-समझी रणनीति से काम किया जाए। यह केवल धर्मशास्त्र नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन कराने की एक रणनीतिक गाइड है।
‘प्रवेश से पहले प्रार्थना करो’- हिंदू देवी-देवताओं और स्थानीय मान्यताओं को राक्षसी रूप देना
इस किताब का सबसे आपत्तिजनक हिस्सा वह है जहाँ यह हिंदू आस्थाओं और देवी-देवताओं को दानवी या शैतानी बताती है। किताब में लिखा है, “यह समझो कि अधिकतर हिंदू गाँव बुरी आत्माओं के कब्जे में हैं या किसी हिंदू भगवान की निगरानी में हैं।” इसके बाद किताब यह भी जोड़ती है, “मिशन से जुड़े लोग इसे ‘टेरिटोरियल स्पिरिट’ यानी क्षेत्रीय आत्मा कहते हैं, एक ऐसी शक्ति जिसका असर केवल उसी खास गाँव तक सीमित होता है।” इसके बाद किताब में सीधा निर्देश दिया गया है, “जब भी गाँव में जाओ तो प्रार्थना करो कि पवित्र आत्मा (Holy Spirit) तुम्हें सुरक्षा और शक्ति दे ताकि बुरी आत्माएँ जो भी बाधा डालने की कोशिश करें, उन्हें दूर किया जा सके।”
यह सिर्फ शब्दों का सामान्य इस्तेमाल नहीं है। इस तरह की भाषा से हिंदू गांवों को सिर्फ अलग सोच वाले लोगों की जगह नहीं बल्कि एक ऐसे स्थान के रूप में दिखाया गया है, जहाँ नकारात्मक या अँधेरी शक्तियों का प्रभाव है। खास बात यह है कि ‘बुरी आत्माओं’ और ‘हिंदू भगवानओं’ को एक ही तरह से दिखाया गया है जिसका साफ मतलब है कि उनके लिए हिंदू देवी-देवता ‘राक्षसी शक्तियाँ’ हैं। गाँव को ऐसे स्थान के रूप में दिखाया गया है, जहाँ किसी अलौकिक ताकत का नियंत्रण है और मिशनरी को वहाँ काम शुरू करने से पहले उससे निपटना होगा।
यह सिर्फ इस किताब या TTI तक सीमित नहीं है। कई कट्टर ईसाई और धर्म प्रचारक भी हिंदू देवी-देवताओं को ‘दानव’ बताते हैं। खासकर माँ काली और भगवान शिव के मामले में। यही रवैया कुछ तथाकथित नास्तिकों, पूर्व मुसलमानों और इस्लामवादियों में भी देखने को मिलता है। सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्टें आम हैं जिनमें ईसाई माँ काली को ‘डेमन’ बताते हैं। ये पोस्ट अक्सर प्लेटफॉर्म से हटाए भी नहीं जाते जबकि इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं।
माँ काली को निशाना बनाने वाली अक्टूबर 2025 की एक सोशल मीडिया पोस्ट (साभार: X)
गाँवों में बिना शक पैदा किए घुसने की स्टेप-बाय-स्टेप रणनीति
किताब में साफ लिखा है कि हिंदू बहुल गाँवों में मिशनरियों को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है और उन पर जबरन धर्मांतरण के आरोप लगते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि ‘कई बार जिन लोगों तक आप पहुँचते हैं, वे पढ़-लिख नहीं पाते’। इसके बाद किताब चेतावनी देती है, “कई जगहों पर बाइबिल साथ रखना या ‘जीसस फिल्म’ दिखाना शक पैदा कर सकता है या परेशानी खड़ी कर सकता है’।”
इससे साफ होता है कि TTI से जुड़े लोग यह समझते हैं कि खुले तौर पर ईसाई प्रचार (proselytisation) हर जगह स्वीकार नहीं किया जाता और अगर वे अपने मिशन से जुड़े साधनों को खुले में इस्तेमाल करेंगे तो लोगों में शक या विरोध पैदा हो सकता है।
इस शक को देखते हुए अपने तरीके पर पुनर्विचार करने के बजाय किताब एक दूसरी रणनीति बताती है। इसमें मिशनरियों से कहा गया है कि वे ‘धार्मिक शास्त्रों को याद करें ताकि वे ईश्वर के वचन में मजबूत हो सकें’ और सीधे किताब या फिल्म दिखाने के बजाय बातों के जरिए आगे बढ़ें। सीधे शब्दों में कहें तो, यहाँ सवाल यह नहीं है कि विरोध वाले माहौल में जाना सही है या नहीं बल्कि यह है कि वहाँ कैसे इस तरह काम किया जाए कि कम से कम शक पैदा हो और कम सवाल उठें।
सीधे प्रचार की बजाय सुविधाजनक तरीके: गीत, संबंध बनाना और धीरे-धीरे संदेश देना
किताब में मिशनरियों को यह सलाह दी गई है कि वे ‘अपने दिल और दिमाग में ईश्वर के वचन के साथ प्रचार करें, बाइबल की कहानियाँ सुनाएँ, धर्मग्रंथ के वाक्य बोलें, गाने गाएँ और उनके साथ प्रार्थना करें’। यह साफ तौर पर एक ऐसे तरीके की ओर इशारा करता है जिसमें धार्मिक संदेश को सीधे और खुलकर न रखकर नरम और अप्रत्यक्ष तरीकों से पहुँचाया जाता है। यानी बाइबिल हाथ में लेकर प्रचार करने या फिल्म दिखाने के बजाय कहानियों, गीतों, प्रार्थना और याद किए गए धार्मिक अंशों के जरिए लोगों से जुड़ने की बात कही गई है।
किताब में दिए गए निर्देश दिखाते हैं कि यह रणनीति बहुत सोच-समझकर बनाई गई है। गीत और कहानियाँ सिर्फ इसलिए नहीं सुझाई गई हैं कि वे सांस्कृतिक रूप से सहज या भावनात्मक रूप से जुड़ाव बनाने वाली होती हैं बल्कि इसलिए भी कि सीधे ईसाई सामग्री ले जाना शक पैदा कर सकता है। इस वजह से यह तरीका एक रणनीतिक बदलाव बन जाता है। असल में यह किताब मिशनरियों को यह सिखा रही है कि जब सीधा प्रचार विरोध का सामना करे, तो धीरे-धीरे संदेश देने और लोगों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने का रास्ता अपनाओ।
हिंदू मान्यताओं का खंडन: कर्म, पुनर्जन्म और मूल दर्शन पर निशाना
यह मैनुअल इस मामले में भी बिल्कुल स्पष्ट है कि मिशनरियों को हिंदुओं की आस्था को किस तरह चुनौती देनी है। इसमें कर्म (karma) को एक ऐसे सिस्टम के रूप में समझाया गया है जिसमें कर्म का फल कई जन्मों तक मिलता हैं। इसके बाद इसमें यह तीखी टिप्पणी जोड़ी गई है कि ‘कर्म में माफी की कोई गुंजाइश नहीं है’। कर्म की यही व्याख्या मिशनरियों के लिए संदेश बन जाती है। पुस्तक में कहा गया है कि ईसाई धर्म के अनुसार ईसा मसीह लोगों को ‘शर्म, अपराधबोध और कर्म के कर्ज’ से मुक्त करते हैं।
साभार: TTI
इसके बाद मिशनरियों को निर्देश दिया गया है कि वे इसके विपरीत तर्क दें यानी यह समझाएँ कि पाप ‘निजी’ होता है और यह सिर्फ अज्ञानता नहीं बल्कि ‘आज्ञा का उल्लंघन’ है। इंसान की असली समस्या ‘ईश्वर के साथ टूटा हुआ रिश्ता’ है। इसके बाद अगला कदम बताया गया है कि ईसा मसीह के माध्यम से स्वीकारोक्ति और क्षमा को ही एकमात्र समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यह केवल धर्मों की सामान्य तुलना नहीं है। बल्कि इसमें साफ तौर पर यह दिखता है कि उद्देश्य हिंदू दर्शन की मूल अवधारणाओं को चुनौती देकर उन्हें बदलना है और उनकी जगह ईसाई विचारधारा को स्थापित करना है।
धार्मिक शिक्षा से लेकर धर्मांतरण के संगठित खेल तक
सीधे शब्दों में कहें तो यह किताब और इसमें भी खास तौर पर हिंदू धर्म से जुड़े इसके हिस्से एक ऐसी सोची-समझी योजना की ओर इशारा करते हैं जिसे केवल ईसाई धर्म का प्रचार भर नहीं कहा जा सकता। जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को तैयार किया गया है, उससे साफ पता चलता है कि ‘TTI’ का मकसद अपना काम इस तरह करना है कि वे कानून की नजर में न आएँ और न ही पुलिस के हत्थे चढ़ें।
इन बातों के नतीजे काफी गंभीर हो सकते हैं। यह सिर्फ निजी आस्था का मामला नहीं है बल्कि TTI ने बाकायदा एक ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किया है जिसमें हिंदू समुदायों को धर्मांतरण के ‘मैदान’ की तरह देखा जाता है। वे हिंदुओं के पवित्र स्थानों और आस्थाओं को आध्यात्मिक रूप से ‘अशुद्ध’ बताते हैं। यह किताब मिशनरियों को सिखाती है कि कैसे लोगों के बीच घुलना-मिलना है, उन्हें अपनी बातों में फँसाना है और किसी को शक न होने पाए, इसका ध्यान कैसे रखना है।
TTI की शुरुआत साल 2007 में हुई थी। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स पहली बार 1992 के आसपास भारत आए थे और तब से वे कई बार यहाँ आ चुके हैं। अब उनका बेटा जैरेड नेल्म्स इस संस्था का अध्यक्ष है और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत में चर्च बनाने और ज्यादा से ज्यादा हिंदुओं का ईसाई धर्म में धर्मांतरण कराने के मिशन में जुटा है।
इस सीरीज के आने वाले हिस्सों में हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि यह संस्था कैसे काम करती है और हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के लिए यह अलग-अलग राज्यों में दूसरे मिशनरी कार्यक्रमों के साथ कैसे जुड़ती है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
इंग्लैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बुधवार (29 अप्रैल 2026) की सुबह बड़ी पुलिस कार्रवाई हुई जिसमें 500 से अधिक पुलिस अफसरों ने ‘अहमदी रिलिजन ऑफ पीस एंड लाइट’ (AROPL) नामक मजहबी संगठन के ठिकानों पर एकसाथ छापेमारी की। पुलिस ने तीन अलग-अलग जगहों पर वारंट के तहत तलाशी ली जिसमें चेशायर के क्रू शहर स्थित संगठन का मुख्यालय भी शामिल था।
यह मुख्यालय ‘वेब हाउस’ नाम की एक पुरानी अनाथालय की इमारत में है जो ग्रेड-II सूचीबद्ध ऐतिहासिक इमारत है। छापेमारी के दौरान कम से कम सात वैन और दर्जनों अफसर मौके पर मौजूद थे। गंभीरत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इस दौरान ऊपर से पुलिस का हेलीकॉप्टर भी मंडरा रहा था। इस बीच संगठन के सदस्य काली बीनी टोपियाँ पहने बाहर सड़क पर खड़े नजर आए।
किसे और क्यों गिरफ्तार किया गया?
इस पूरी कार्रवाई में 6 पुरुष और 3 महिलाओं समेत कुल नौ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार लोगों में दो अमेरिकी पुरुष और एक अमेरिकी महिला, दो मैक्सिकन पुरुष, एक इतालवी महिला, एक स्पेनिश पुरुष, एक स्वीडिश महिला और एक मिस्री पुरुष शामिल हैं। यानी यह संगठन पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप का है।
चेशायर पुलिस के अनुसार, इन सभी गिरफ्तारियों की वजह एक महिला की शिकायत है जो कभी इस संगठन की सदस्य थी। उस महिला ने मार्च 2026 में पुलिस से संपर्क करके बताया कि साल 2023 में उसके साथ गंभीर यौन अपराध, जबरन विवाह और आधुनिक दासता जैसे अपराध किए गए। पुलिस ने बताया कि यह सभी गिरफ्तारियाँ उसी महिला की शिकायत से जुड़ी हैं।
पुलिस का बयान और संगठन की प्रतिक्रिया
चेशायर कांस्टेबुलरी के मुख्य अधीक्षक गैरेथ रिगले ने कहा कि यह कार्रवाई एक विस्तृत और ठोस जाँच के बाद की गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी मजहब की जाँच नहीं है बल्कि उन गंभीर आरोपों की जाँच है जो पुलिस को बताए गए हैं।
उन्होंने आम नागरिकों को भरोसा दिलाया कि इस मामले से व्यापक समुदाय को कोई खतरा नहीं है और स्थानीय लोगों को आश्वस्त करने के लिए गश्त बढ़ा दी गई है। दूसरी तरफ AROPL संगठन ने मीडिया के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। हालाँकि, संगठन के वकीलों ने ‘द गार्जियन’ अखबार को बताया कि उनका मुवक्किल किसी भी गलत काम से पूरी तरह इनकार करता है।
कौन है यह संगठन और इसका इतिहास
अहमदी मजहब: शांति और प्रकाश (AROPL) एक नया मजहबी आंदोलन है जिसकी जड़ें शिया इस्लाम (खास तौर पर बारह इमामों को मानने वाले) से जुड़ी हैं। इस संगठन के लोग भी शिया मुसलमानों की तरह मानते हैं कि बारहवें इमाम (मुहम्मद अल-महदी) की मृत्यु नहीं हुई है। उनका विश्वास है कि वे ‘ओकल्टेशन’ यानी छुपी हुई अवस्था में हैं और आखिरी समय यानी कयामत के दौर में वापस आएँगे।
Religion Media Centre के मुताबिक, AROPL की मान्यता इससे आगे जाती है। इनके अनुसार, अब वही आखिरी समय आ चुका है और बारहवें इमाम पहले ही वापस आ चुके हैं। इस आंदोलन की किताबों में कहा गया है कि यही वह नया मजहब है जिसके बारे में पैगंबर मुहम्मद के परिवार ने पहले से भविष्यवाणी की थी। AROPL खुद को एकमात्र सच्चा और पूरी दुनिया के लिए बना धर्म मानता है और इसके अनुयायी खुद को ईश्वर द्वारा चुना हुआ मानते हैं।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि AROPL का पाकिस्तान में मौजूद अहमदिया मुस्लिम कम्युनिटी या भारत के अहमदियों से कोई संबंध नहीं है। दोनों पूरी तरह अलग संगठन हैं। इस संगठन की शुरुआत इराक में हुई थी और अब यह करीब 40 देशों में सक्रिय है। अनुमान है कि लगभग 7,000 लोग इस आंदोलन से जुड़ चुके हैं या इसके संपर्क में आ चुके हैं। 2018 में इसका मुख्यालय स्वीडन में था लेकिन 2021 से इसे इंग्लैंड में स्थानांतरित कर दिया गया।
कैसे शुरू हुआ यह आंदोलन?
AROPL की शुरुआत 1990 के दशक के अंत में बसरा (इराक) से हुई। सन् 1999 में इसके संस्थापक अहमद अल-हसन ने यह दावा किया कि उनकी मुलाकात बारहवें इमाम मुहम्मद अल-महदी से हुई है और इमाम ने उन्हें एक विशेष मजहबी मिशन सौंपा है। इसी के बाद से इस आंदोलन की नींव पड़ी और धीरे-धीरे लोग उनके आसपास जुड़ने लगे।
अहमद अल-हसन को उनके अनुयायियों ने ‘यमानी’ मानना शुरू कर दिया। शिया मान्यता के अनुसार ‘यमानी’ वह व्यक्ति होता है जो महदी के आने से पहले लोगों को तैयार करता है और उन्हें एकजुट करता है ताकि वे महदी का स्वागत कर सकें। सन् 2002 आते-आते अहमद अल-हसन ने दूसरी शिया संस्थाओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। उन्होंने ईरान और इराक के शिया संस्थानों को भ्रष्ट बताया। इसके बाद वे अचानक सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। आखिरी बार उन्हें 2007 में इराक में देखा गया था और उसके बाद से उनका कोई स्पष्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है।
उनके गायब होने के बाद उनके अनुयायी एकजुट नहीं रह सके और कई अलग-अलग गुटों में बँट गए। समय के साथ 2015 के बाद AROPL सबसे बड़ा गुट बनकर सामने आया जिसे ‘ब्लैक बैनर्स ऑफ द ईस्ट’ भी कहा जाता है। एक दूसरा गुट ‘व्हाइट बैनर्स’ या ‘नजफ का दफ्तर’ के नाम से जाना जाता है। इन दोनों गुटों के बीच गहरे मतभेद हैं, जहाँ AROPL का आरोप है कि दूसरा गुट इराकी सरकार के प्रभाव में है जबकि ‘व्हाइट बैनर्स’ AROPL को ही मजहब से बाहर मानते हैं।
इन सब के बीच AROPL का नेतृत्व अब अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक के हाथ में है। हाशम का जन्म अमेरिका में 1983 में हुआ था। उन्होंने 2015 में यह दावा किया कि अहमद अल-हसन ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी है कि वे दुनिया को बताएँ कि महदी के प्रकट होने का समय आ चुका है। AROPL में उन्हें ‘काइम’ कहा जाता है। ‘काइम’ का मतलब होता है वह व्यक्ति जो ईश्वर के आदेश पर खड़ा होता है और उसे आगे बढ़ाता है। हाशम का दावा है कि वे चाँद को गायब कर सकते हैं और घातक बीमारियाँ ठीक कर सकते हैं। हाशम पहले एक डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार थे जो UFO आधारित धर्म ‘रायलिज्म’ पर काम कर चुके थे।
यह आंदोलन अपने दावों के समर्थन में एक दस्तावेज का भी हवाला देता है जिसे पैगंबर मुहम्मद की ‘वसीयत’ कहा जाता है। इस दस्तावेज के अस्तित्व को सुन्नी मुसलमान स्वीकार नहीं करते लेकिन AROPL के अनुसार इसमें 12 इमामों और 12 महदियों के नाम लिखे हुए हैं। उनके मुताबिक, पहले दो महदियों के नाम ‘अहमद’ और ‘अब्दुल्लाह’ हैं जिन्हें वे अहमद अल-हसन और अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक से जोड़ते हैं।
अहमद अल-हसन (फोटो साभार: The Ahmadi Religion)
एलियंस और इलुमिनाटी जैसी मान्यताएँ
AROPL के सदस्य अपनी मान्यताओं का आधार ‘The Goal of the Wise: The Gospel of the Riser of the Family of Mohammed’ नामक किताब को मानते हैं। यह किताब 2022 में प्रकाशित हुई थी और इसमें अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक की शिक्षाएँ और उनके ‘रहस्योद्घाटन’ (revelations) लिखे हैं। उनके अनुसार, इनमें से कई बातें उन्हें अहमद अल-हसन ने सिखाईं हैं।
इस आंदोलन की एक बड़ी मान्यता “सात वाचाओं” की है। इनके अनुसार ईश्वर ने समय-समय पर सात अलग-अलग लोगों के साथ समझौते (वाचा) किए- आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा, मुहम्मद और अहमद अल-हसन। उनका कहना है कि हर नई वाचा पिछली से बेहतर होती गई क्योंकि इंसानों ने पुरानी वाचाओं को तोड़ा जिसके बाद सजा मिली और फिर नई वाचा आई।
इस आंदोलन में कुछ रहस्यमय मान्यताएँ भी हैं। इसमें सपनों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उनके अनुसार सपनों के जरिए भविष्य की झलक, ईश्वर के संदेश या चेतावनियाँ मिल सकती हैं। सपनों की सही व्याख्या करना वे ईश्वर के दूत की पहचान मानते हैं।
इसके अलावा, AROPL के सदस्य पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। वे मानते हैं कि शिया विचार ‘रजआ’ (जिसमें महदी के आने के बाद कुछ मृत लोग वापस जीवित होते हैं) और पुनर्जन्म असल में एक ही बात है। उनका यह भी मानना है कि कई लोग असल में पुराने पैगंबरों के आध्यात्मिक रूप में दोबारा जन्म लेते हैं।
कुछ मान्यताएँ ऐसी भी हैं जिन्हें आम तौर पर षड्यंत्र सिद्धांत माना जाता है। AROPL के अनुसार, इंसान की शुरुआत आदम से हुई और विकासवाद का सिद्धांत इबलीस ने फैलाया। वे यह भी मानते हैं कि धरती पर ऐसे प्राणी मौजूद हैं जो इंसान और एलियन का मिश्रण हैं और अपना रूप बदल सकते हैं। इसी तरह ‘हयतान’ नाम की एक वानर जैसी प्रजाति के होने का भी दावा किया जाता है।
उनकी एक और मान्यता यह है कि जॉर्ज वॉशिंगटन असल में एडम वाइशाउप्ट थे जिन्हें इलुमिनाटी का संस्थापक माना जाता है और आज भी अमेरिकी सरकार पर उसी गुप्त संगठन का नियंत्रण है। वे कहते हैं कि अमेरिकी नोट और विज्ञापनों में दिखने वाली ‘एक आँख’ इसी का प्रतीक है। आर्थिक व्यवस्था को लेकर भी उनका अलग नजरिया है। AROPL के अनुसार, आज की मुद्रा प्रणाली एक धोखा है और जब उनका ‘दिव्य न्यायपूर्ण राज्य’ बनेगा तो पैसे की जरूरत खत्म हो जाएगी। उस व्यवस्था में हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा और अपनी जरूरत के अनुसार चीजें पाएगा।
भविष्य के राज की कल्पना
AROPL के अनुसार, अब सातवीं वाचा के बाद एक ‘दिव्य न्यायपूर्ण राज्य’ बनेगा और यही इस आंदोलन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। उनका मानना है कि इस राज्य में दुनिया के सभी धर्म एक हो जाएँगे और वहाँ एक ईश्वर द्वारा चुना गया राजा शासन करेगा, न कि लोकतंत्र। हालाँकि, वे लोकतंत्र को सही व्यवस्था नहीं मानते फिर भी चुनी हुई सरकारों का सम्मान करते हैं और उन्हें गिराने की कोशिश नहीं करते।
इस राज्य की कल्पना प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक The Republic में बताए गए आदर्श राज्य जैसी बताई जाती है, जहाँ ‘दार्शनिक राजा’ शासन करता है। AROPL के अनुसार, यह भूमिका मुहम्मद अल-महदी निभाएँगे। उनका यह भी मानना है कि यह राज्य पहले दुनिया के किसी एक हिस्से में बनेगा और धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल जाएगा। इसके लिए इराक, मिस्र, तुर्की, जर्मनी और स्वीडन को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस राज्य की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी बताई जाती है क्योंकि इसे वे सबसे आसान भाषा मानते हैं। ब्रिटेन में रहने वाले उनके अनुयायी इसी आने वाले राज्य की तैयारी के रूप में जीवन जीते हैं।
मुख्य इस्लाम से कैसे अलग हैं परंपराएँ
AROPL खुद को बाकी इस्लामी परंपराओं से काफी अलग मानता है। उनका दावा है कि लगभग हर मजहब यहाँ तक कि इस्लाम भी 99% तक गलत हो चुका है। वे खुद को ‘सच्चा इस्लाम’ और एक सार्वभौमिक मजहब बताते हैं।
इसी वजह से वे यह भी कहते हैं कि कुरान समय के साथ बदल (भ्रष्ट) हो गई है जो कि मुख्यधारा मुस्लिम मान्यताओं से बिल्कुल अलग बात है। AROPL की एक और अलग मान्यता काबा को लेकर है। जहाँ पूरी मुस्लिम दुनिया काबा (मक्का, सऊदी अरब) को सबसे पवित्र स्थल मानती है तो वहीं AROPL का मानना है कि असली काबा पेट्रा (जॉर्डन) में है।
उनकी धार्मिक प्रथाएँ भी अलग हैं। जहाँ इस्लाम में दिन में पाँच वक्त की नमाज अनिवार्य मानी जाती है तो AROPL के अनुसार प्रार्थना एक लगातार चलने वाली अवस्था है जिसमें इंसान हर समय दिल से ईश्वर से जुड़ा रह सकता है। इसी तरह रमजान को वे पारंपरिक इस्लामी कैलेंडर के बजाय दिसंबर में मनाते हैं। कुछ मान्यताएँ और भी ज्यादा विवादित हैं। उदाहरण के तौर पर, उनका कहना है कि जन्नत में जो पेड़ था वह दरअसल फातिमा का पिछला जन्म था। कई देशों, खासकर तुर्की में इस तरह की बात को ईशनिंदा (ब्लासफेमी) माना जाता है।
सामाजिक मुद्दों पर भी उनका नजरिया अलग है। AROPL में महिलाओं के लिए हिजाब या दुपट्टा अनिवार्य नहीं है। समलैंगिकता को वे बढ़ावा नहीं देते लेकिन LGBTQI+ लोगों को स्वीकार करते हैं और उनके अधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन भी कर चुके हैं। शराब को लेकर भी उनका रवैया पारंपरिक इस्लाम की तुलना में ज्यादा उदार माना जाता है।
इन्हीं अलग मान्यताओं और प्रथाओं की वजह से AROPL को कई मुस्लिम-बहुल देशों में विवादास्पद माना जाता है। कई जगह उनके अनुयायियों को विरोध और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा है क्योंकि उनकी बातें मुख्यधारा इस्लामी विश्वासों से काफी अलग और टकराव वाली मानी जाती हैं।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल 2026) को 29 वर्षीय शरद कलास्कर को नास्तिक, तर्कवादी और अंधविश्वास-विरोधी ‘एक्टिविस्ट’ डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में जमानत दे दी। गौरतलब है कि कोर्ट ने कलास्कर की लंबी कैद और हमलावरों में से एक के रूप में उनकी पहचान को लेकर प्रथम दृष्टया संदेह जताते हुए यह कदम उठाया है।
कलास्कर को 50,000 रुपए का जमानत बांड जमा करने का निर्देश दिया गया है। यह फैसला जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रणजीतसिंह भोंसले की डिवीजन बेंच ने सुनाया। CBI ने इस फैसले पर 4 हफ्ते की रोक लगाने की माँग की लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
जस्टिस गडकरी ने कहा, “चूँकि हमने पहले ही कालस्कर की हमलावर के रूप में पहचान पर संदेह जताया है, इसलिए इस आदेश पर रोक लगाने का कोई प्रश्न नहीं उठता।”
जाँच में खामियों की ओर कोर्ट का इशारा
कोर्ट ने अभियोजन के एक प्रमुख गवाह किरण कांबले की गवाही का उल्लेख किया, जिन्होंने बताया था कि उन्हें पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी थी लेकिन जिरह के दौरान गोलियों के बीच के अंतराल को लेकर अनिश्चितता व्यक्त की। ट्रायल कोर्ट ने भी दर्ज किया कि वह ‘सेकंड और मिनट’ के बीच स्पष्ट नहीं थे।
खंडपीठ ने बताया, “एक बात रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की गई है, जैसे कि ‘उसने पुलिस को बताया था कि पटाखों जैसी आवाज सुनकर उसका ध्यान उस ओर गया। मैंने यह भी बताया था कि दोनों लड़कों में से एक लंबा था और दूसरा थोड़ा छोटा।’ गोलियों के बीच का समय अंतराल एक से दो मिनट या एक से दो सेकंड था।”
अदालत ने कहा कि पुलिस ने कांबले को सिर्फ वही स्केच नहीं दिखाया था जो उसके बताए हुलिए के आधार पर बनाया गया था बल्कि कुछ और लोगों के स्केच भी दिखाए थे। कांबले ने यह भी माना कि उसे याद नहीं है कि 2 सितंबर 2013 को उसे वह स्केच दिखाया गया था या नहीं। सबसे अहम बात यह रही कि उसे एक और स्केच भी दिखाया गया लेकिन उसने कहा कि वह स्केच उसके बताए गए हुलिए से बने स्केच जैसा नहीं था।
उनका बयान ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के समक्ष 12 अप्रैल 2019 को दर्ज किया गया। इसके बाद उन्हें पुणे के पुलिस आयुक्त कार्यालय में घटना के संबंध में जानकारी देने के लिए बुलाया गया। कोर्ट ने उल्लेख करते हुए कहा, “उस समय उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्होंने उक्त घटना के बारे में कुछ नहीं देखा था।”
साफ खामियों ने खींचा कोर्ट का ध्यान
दूसरे प्रमुख गवाह विनय केलकर को खड़की स्थित CBI कार्यालय में बुलाया गया, जहाँ उन्हें कई तस्वीरें दिखाई गईं। उन्होंने 10 से 12 तस्वीरों के समूह में से 2 तस्वीरें चुनीं, जिन्हें उन्होंने घटना के समय देखे गए व्यक्तियों की तस्वीरें बताया। उन्होंने आश्वासन दिया कि तस्वीरों में चेहरे 80 से 85% तक मेल खाते हैं।
जिरह के दौरान उन्होंने बताया कि घटना के दिन ही पुलिस ने उनके सहयोग से व्यक्तियों के स्केच बनाए थे। हालाँकि केलकर को यह याद नहीं था कि 30 जनवरी 2015 को उनके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दूसरा स्केच बनाया गया था या नहीं। लगभग एक वर्ष बाद उन्हें मीनानाथ नामक व्यक्ति के साथ खड़की स्थित CBI कार्यालय में बुलाया गया, जहाँ उन्हें कुछ स्केच दिखाए गए।
उनके हस्ताक्षर कागजों के पीछे लिए गए और केलकर ने कहा कि समानता 70 से 80% के बीच थी। फिर भी, उन्होंने खुलासा किया कि स्केच उनके द्वारा दिए गए विवरण को सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता था। 20 अगस्त 2013 को उनके द्वारा वाहन चला रहे व्यक्ति के विवरण के आधार पर एक चित्र बनाया गया था।
कोर्ट ने कहा, “इस गवाह ने यह स्वीकार किया है कि CBI अधिकारी द्वारा पूछताछ के दौरान ऐसा नहीं हुआ कि उसने बताया हो कि स्केच में दिखाया गया व्यक्ति वाहन चला रहा था और वह उसके घर के सामने से गुजरा था।”
4 सितंबर 2016 को जाँच एजेंसी को दिए गए बयान को पढ़कर सुनाया गया और उन्होंने जवाब दिया कि वह गलत था। इसके अलावा वह 2015-2016 से पढ़ने के लिए चश्मा उपयोग कर रहे हैं और घटना के लगभग 20 से 25 मिनट बाद स्नान करने के बाद घटनास्थल पर गए। वह अपने घर के पास स्थित कार्यालय जाने की योजना बना रहे थे।
कोर्ट ने कहा, “उन्होंने यह देखने के लिए इंतजार नहीं किया कि कोई घायल की मदद कर रहा है या नहीं। उन्होंने तुरंत घर में किसी को घटना के बारे में नहीं बताया। इस गवाह ने स्वीकार किया कि स्नान करने के बाद वह कार्यालय जाने की तैयारी में घर से बाहर आए थे।”
केलकर बालकनी में उसी स्थिति में थे जब हमलावर उनकी ओर आए और दोपहिया वाहन स्टार्ट किया। बेंच ने घटना के बाद तुरंत प्रतिक्रिया न देने को अनुचित बताया। यह दोहराया गया कि उन्होंने घटना को अपनी बालकनी से लगभग 500 मीटर की दूरी से देखा।
कोर्ट ने 27 दिसंबर 2018 को दिए गए उनके बयान का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने कहा था, “मैं, विनय केलकर, यह घोषित करता हूँ कि हत्या की घटना 5 वर्ष पहले हुई थी और वह स्थान मुझसे काफी दूर था। मैं घोषित करता हूँ कि संदिग्धों के चेहरे अपराधियों से मिलते-जुलते हैं, हालाँकि मैं उन्हें पूरी तरह पहचान नहीं सकता।”
कोर्ट ने CBI को लगाई फटकार और आवेदक के पक्ष में दिया फैसला
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने हमलावर के रूप में उसकी पहचान स्थापित करने के लिए मुख्य रूप से दो प्रत्यक्षदर्शियों पर भरोसा किया, जो आवेदन में एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनकी गवाही और जिरह की सावधानीपूर्वक समीक्षा करने के बाद उन्हें ऐसे ‘संयोगवश गवाह’ बताया गया जिनका कथित रूप से घटना देखने के बाद का व्यवहार सामान्य मानवीय व्यवहार से मेल नहीं खाता।
बेंच ने कहा, “हालाँकि उन्होंने मृतक दाभोलकर पर हुए भयानक हमले को देखा, फिर भी दोनों गवाहों ने पहले अपने दैनिक कार्यों को प्राथमिकता दी और उसके बाद आराम से पुलिस के पास जानकारी देने गए। हमारे अनुसार इन दोनों गवाहों का व्यवहार सामान्य समझ वाले व्यक्ति का नहीं है और यह कोर्ट के मन में इस बात पर संदेह उत्पन्न करता है कि क्या उन्होंने वास्तव में घटना देखी थी।”
यह बताया गया कि हत्या 20 अगस्त 2013 को हुई थी, जबकि कालस्कर को 3 सितंबर 2018 को गिरफ्तार किया गया। कोर्ट ने CBI के उस प्रयास की भी आलोचना की जिसमें पहचान स्थापित करने के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के बजाय फोटो पहचान का उपयोग किया गया।
कोर्ट ने कहा, “हालाँकि जाँच एजेंसी के पास कालस्कर की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड कराने का पूरा अवसर था लेकिन जाँच अधिकारी ने उसकी पहचान स्थापित करने के लिए उसके फोटो गवाहों को दिखाए, जबकि वह पहले से ही हिरासत में था।” कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसी पहचान अपनी विश्वसनीयता खो देती है।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा, “पहचान परेड अनिवार्य नहीं है, न ही आरोपित इसे अपने अधिकार के रूप में माँग सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जाँच सही दिशा में चल रही है और बाद में कोर्ट में दी जाने वाली गवाही को समर्थन प्रदान करना है। यदि आरोपित गवाह या पीड़ित के लिए पूरी तरह अजनबी है, तो पहचान परेड वांछनीय होती है, जब तक कि गवाह ने उसे कुछ समय तक देखा न हो।”
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कालस्कर 3 सितंबर 2018 से जेल में है और उसने प्री-ट्रायल और पोस्ट-कन्विक्शन दोनों चरणों में 7.5 वर्ष से अधिक का कारावास झेला है। साथ ही अपीलों के चलते उसके मामले की अंतिम सुनवाई जल्द होने की संभावना कम है।
बेंच ने कहा, “आवेदन के समग्र दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, हमारा मत है कि अपील लंबित रहने के दौरान उस पर लगाई गई वास्तविक सजा को निलंबित किया जा सकता है और आवेदक को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।”
मामले की पृष्ठभूमि
67 वर्षीय डॉ नरेंद्र दाभोलकर, जो महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति चलाते थे, को पुणे में सुबह की सैर के दौरान दो बाइक सवार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। CBI ने सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर को आरोपित बताया। 2014 में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला CBI को सौंपा गया था, इससे पहले इसकी जाँच पुणे पुलिस कर रही थी।
10 मई 2024 को पुणे सत्र कोर्ट ने दोनों को आजीवन कारावास और 5 लाख जुर्माने की सजा सुनाई। हालाँकि डॉ वीरेंद्रसिंह तावड़े, विक्रम भावे और संजीव पुनालेकर को घटना से जोड़ने के लिए पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया गया।
इसके बाद कालस्कर ने 2024 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर फैसले को चुनौती दी और अंतिम सुनवाई तक जमानत की माँग की। यह उल्लेखनीय है कि पूरे मामले पर लगातार मीडिया ट्रायल हावी रहा, जिसमें आशीष खेतान द्वारा किया गया स्टिंग ऑपरेशन और दाभोलकर की आत्मा से संपर्क करने के उद्देश्य से प्लांचेट सत्र जैसी बातें भी शामिल थीं।
सनातन संस्था मीडिया ट्रायल का मुख्य केंद्र बन गया क्योंकि उसने 2003 के उस अंधविश्वास विरोधी विधेयक का विरोध किया था, जिसका उद्देश्य काला जादू, बलि और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में वर्गीकृत कार्यों को अपराध घोषित करना था।
इस बीच जाँच के दौरान कई त्रुटियाँ सामने आईं, जैसे साक्ष्यों का गलत प्रबंधन और एजेंसी द्वारा अपने मैनुअल के अनुसार आवश्यक पहचान परेड न कराना। इसी तरह कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह गए क्योंकि जाँचकर्ताओं ने कई सुरागों और साक्ष्यों को गलत तरीके से संभाला या नजरअंदाज किया।
मामले में पहली दो गिरफ्तारियाँ विकास खंडेलवाल और मनीष नागोरी की थीं, जिन्हें बैलिस्टिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था, जो कथित तौर पर हत्या में इस्तेमाल हथियार से जुड़े थे। हालाँकि बाद में यह विकास निर्णायक नहीं माना गया और घटनास्थल पर मौजूद गवाह उन्हें पहचानने में असफल रहे, जिसके कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।
इसी तरह घटनास्थल पर विदेशी सामग्री की रहस्यमयी मौजूदगी और हत्या में इस्तेमाल हथियार के अंतिम निपटान को लेकर भी कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल सका। जाँच में महत्वपूर्ण खामियाँ थीं, जो संकेत देती हैं कि या तो अयोग्यता थी या जानबूझकर बाधा डाली गई।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
यूरोपियन यूनियन यानी EU दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक और आर्थिक समूहों में से एक है। 27 देशों का यह समूह साथ मिलकर व्यापार, कानून, मानवाधिकार और कई बड़े फैसलों पर एक साथ काम करते हैं। लेकिन इन दिनों यह रेप के कानून को लेकर चर्चा में है।
हाल ही में यूरोपियन पार्लियामेंट ने एक अहम प्रस्ताव पास किया है, जिसमें ‘Yes Means Yes’ (‘हाँ का मतलब हाँ’) यानी स्पष्ट सहमति को रेप की परिभाषा का आधार बनाने की बात कही गई है। आसान भाषा में समझें तो अब सवाल यह नहीं होगा कि पीड़िता ने ना कहा था या नहीं बल्कि यह होगा कि क्या उसने साफ तौर पर हाँ कहा था। अगर स्पष्ट सहमति नहीं है, तो उस स्थिति को अपराध माना जाएगा।
यह बदलाव इसलिए ऐतिहासिक कहा जा रहा है क्योंकि यह कानून के नजरिए को पूरी तरह बदल देता है। पहले जहाँ जोर इस बात पर होता था कि क्या जबरदस्ती हुई, अब फोकस इस पर है कि क्या दोनों पक्षों की सहमति साफ और स्पष्ट थी।
EU का ऐतिहासिक फैसला
‘हाँ का मतलब हाँ’ यानी ‘Yes Means Yes’ मॉडल पहली नजर में बहुत सीधी बात लगती है लेकिन असल में यह कानून के नजरिए में एक बड़ा और बुनियादी बदलाव है।
इस मॉडल का मतलब यह है कि किसी भी तरह के शारीरिक संबंध के लिए दोनों लोगों की साफ, स्पष्ट और अपनी मर्जी से दी गई सहमति होना जरूरी है। यहाँ सहमति का मतलब सिर्फ चुप्पी या विरोध न करना नहीं है बल्कि सामने वाले व्यक्ति का सक्रिय रूप से हाँ कहना या ऐसा व्यवहार दिखाना है जिससे उसकी मर्जी साफ समझ आए।
पहले कई देशों में कानून इस बात पर ज्यादा निर्भर करता था कि क्या पीड़िता ने ना कहा था, क्या उसने विरोध किया था या क्या उस पर शारीरिक जबरदस्ती की गई थी। लेकिन व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो हर स्थिति में कोई व्यक्ति विरोध नहीं कर पाता। कई बार डर, सदमे या स्थिति की गंभीरता के कारण व्यक्ति प्रतिक्रिया ही नहीं दे पाता। ऐसे में पुराने कानूनों में कई मामले कमजोर पड़ जाते थे, क्योंकि वहाँ फोर्स या विरोध को साबित करना जरूरी होता था।
नया ‘Yes Means Yes’ मॉडल इसी सोच को बदलता है। यह कहता है कि अगर साफ और स्पष्ट हाँ नहीं है, तो उसे सहमति नहीं माना जाएगा। यानी अब फोकस इस बात से हटकर कि ना कहा गया था या नहीं, इस बात पर आ जाता है कि क्या स्पष्ट रूप से हाँ दी गई थी या नहीं। इससे कानून यह मानकर चलता है कि सहमति एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसे हर कदम पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इस बदलाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह जिम्मेदारी को भी नए तरीके से तय करता है। अब यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति यह सुनिश्चित करे कि सामने वाला व्यक्ति पूरी तरह से सहज और सहमत है।
पुराने कानून vs नया स्टैंडर्ड
अब तक कई यूरोपीय देशों में ‘नो मीन्स नो’ या फोर्स बेस्ड कानून लागू थे। यानी अगर किसी केस में यह साबित नहीं हो पाता था कि पीड़िता ने विरोध किया या उसके साथ जबरदस्ती हुई, तो केस कमजोर हो जाता था। कई बार अदालत में यह सवाल उठता था कि पीड़िता ने आवाज क्यों नहीं उठाई या उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया।
यहीं पर Yes Means Yes मॉडल पूरी तस्वीर बदल देता है। अब यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि पीड़िता ने कितना विरोध किया। बल्कि यह देखा जाएगा कि क्या स्पष्ट सहमति थी। इस बदलाव से न्याय प्रणाली का नजरिया ही बदल जाता है, अब ध्यान इस पर है कि क्या संबंध दोनों की सहमति से बनाया गया था, न कि इस पर कि विरोध कितना हुआ।
इस नए दृष्टिकोण का सबसे बड़ा असर पीड़ितों पर पड़ेगा। पहले उन्हें अदालत में यह साबित करना पड़ता था कि उनके साथ जबरदस्ती हुई, जो कि मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद मुश्किल होता था। कई बार ट्रॉमा की वजह से पीड़िता विरोध नहीं कर पाती, लेकिन कानून इसे समझने में पीछे रह जाता था।
अब नए मॉडल में यह दबाव कम हो सकता है। पीड़िता को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि उसने कितना संघर्ष किया। बल्कि सवाल यह होगा कि क्या उसने सहमति दी थी। इससे न्याय पाने की प्रक्रिया कुछ हद तक आसान और संवेदनशील बन सकती है।
हाई-प्रोफाइल केस का असर
इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए फ्रांस के चर्चित पेलिकोट केस को थोड़ा विस्तार से समझना जरूरी है। इस मामले में आरोप था कि पीड़िता को पहले नशीला पदार्थ दिया गया, जिससे वह अपनी स्थिति को समझने या विरोध करने की हालत में नहीं रही।
इसके बाद उसके साथ कई लोगों ने रेप किया। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं था बल्कि इसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति होश में ही नहीं है, तो उसकी ना या हाँ का सवाल ही कैसे उठ सकता है।
जब यह मामला सामने आया, तो पूरे यूरोप में लोगों के बीच गुस्सा और चिंता दोनों देखने को मिले। लोगों ने सवाल उठाना शुरू किया कि क्या मौजूदा कानून ऐसे मामलों को सही तरीके से कवर करते हैं, जहाँ जबरदस्ती सीधे तौर पर दिखाई नहीं देती, लेकिन सहमति पूरी तरह गायब होती है।
इस केस ने यह दिखाया कि कई बार अपराधी शारीरिक हिंसा के बजाय ऐसी स्थितियाँ पैदा करते हैं, जहाँ पीड़ित विरोध ही नहीं कर पाता। इसी के बाद फ्रांस में फ्रेंच रेप लॉ रिफॉर्म 2025 की दिशा में बदलाव शुरू हुआ, जहाँ सहमति को ज्यादा स्पष्ट तरीके से कानून का आधार बनाने की कोशिश की गई।
महिला अधिकार समूहों का दबाव
इन घटनाओं के बाद महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने जोरदार आवाज उठाई। उनका कहना है कि यह अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हैं। अगर कानून नहीं बदला गया, तो ऐसे अपराधों को रोकना मुश्किल होगा।
NGOs लगातार EU स्तर पर एक समान कानून की माँग कर रही हैं, ताकि सभी सदस्य देशों में एक जैसी कानूनी परिभाषा लागू हो सके। उनका मानना है कि जब तक कॉन्सेंट को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक न्याय अधूरा रहेगा।
इस पूरे मुद्दे की गंभीरता हम आकड़ों से समझ सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक EU में हर 6 में से 1 महिला ने किसी न किसी रूप में सेक्शुअल वाइअलन्स का सामना किया है। वहीं हर 10 में से 1 महिला अपने जीवन में रेप का शिकार होती है।
ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं बल्कि एक बड़ी सामाजिक सच्चाई को दिखाते हैं। इसका मतलब है कि यह समस्या बहुत व्यापक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह समाज, कानून और सिस्टम तीनों के लिए एक चेतावनी है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल जो प्रस्ताव पास हुआ है, वह एक रेजोल्यूशन है, यानी यह अभी कानून नहीं बना है। इसे लागू करने के लिए EU के सभी सदस्य देशों को इसे अपने-अपने राष्ट्रीय कानून में शामिल करना होगा। अगर यह बदलाव लागू होता है, तो यह पूरे यूरोप में रेप लाॅ की दिशा बदल सकता है।
भारत में सहमति का कानून: वर्तमान स्थिति क्या कहती है?
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में रेप को धारा 63 में परिभाषित किया गया है जबकि इसके लिए सजा धारा 64 में दी गई है। यह पहले की IPC धारा 375 और 376 के समान है। इस धारा के अनुसार, यदि किसी महिला की इच्छा के खिलाफ या उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाया जाता है, तो वह अपराध की श्रेणी में आता है।
कानून में कन्सेंट को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि सहमति स्वतंत्र और स्वेच्छा से दी गई होनी चाहिए। यदि सहमति डर, दबाव, धोखे या नशे की हालत में ली गई हो, तो उसे वैध नहीं माना जाता।
साल 2013 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के जरिए कानून में बड़े बदलाव किए गए। यह संशोधन निर्भया केस के बाद लाया गया था। इसके तहत रेप की परिभाषा को विस्तृत किया गया और कॉन्सेंट को लेकर कानूनी भाषा को अधिक स्पष्ट बनाया गया। साथ ही यह भी जोड़ा गया कि ना का मतलब ना ही होता है।
भारतीय कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि महिला बेहोशी, नशे या मानसिक रूप से असमर्थ स्थिति में है, तो उस स्थिति में दी गई सहमति मान्य नहीं होगी। अदालतों में मामलों की सुनवाई के दौरान सहमति का सवाल प्रमुख होता है और साक्ष्यों, परिस्थितियों और गवाही के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
आग लगे चाहे बस्ती में, अजीत जी तो डूबे कैमरे की मस्ती में…। तो ऐसा परिचय देने के पीछे वजह यह है कि गाजियाबाद के गौर ग्रीन एवेन्यू अपार्टमेंट में भयानक आग लगी और इसकी चपेट में 8 फ्लोर आ गए। जिन फ्लैटों में आग लगी, उनके ठीक सामने वाले टावर मे प्रोपेगेंडा पत्रकार और यूट्यूबर अजीत अंजुम का भी फ्लैट है। तो अजीत अंजुम भी लग गए इस आपदा को ‘अवसर’ बनाने। ‘अवसर’ बनाना तो था पड़ोसी की मदद करने का, लेकिन उन्होंने इस आपदा को प्रचार का ‘शो’ बना लिया।
तभी तो अजीत अंजुम को राहत और बचाव के बीच भी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि फ्रेम सही आ रहा है या नहीं। पड़ोसी मुसीबत में थे, लोग घबराए हुए थे, लेकिन अजीत जी का ध्यान था- ‘कैमरामैन, जल्दी फोकस करो।’ अब इसी लाइन पर उनके वीडियो एडिट कर मीमर मजे ले रहे हैं। अजीत जी, ये पत्रकारिता थी, राहत कार्य था या फिर ‘कंटेंट क्रिएशन’ का नया एपिसोड?
वैसे अजीत जी ने अपनी खिल्ली भी खुद ही उड़वाई है। क्यों आग बुझाते वीडियो के बीच कैमरा अड़ाया? क्यों पाइप को सिर पर टाँगकर पानी डालने का दिखावा किया? और जब कैमरे का फोकस खुद पर से हटा तो क्यों उनको इतनी मिर्ची लगी? क्योंकि ये तो वही अजीत जी हैं न, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कैमरे पर वीडियोज बनाते थे। क्यों है न, अजीत जी? खुल गई न पोल।
अजित अंजुम ने पड़ोसी की आग बुझाते-बुझाते अपने कैमरामैन को हड़का कर क्यों कहा – 'कैमरामैन, जरा जल्दी फ़ोकस करो' pic.twitter.com/QcuNs3pl1F
जब आदत ही हर जगह फेम खाने की हो, तो कोई कैसे खुद को रोक सकता है। सामने आग लगी हो, लोग अफरा-तफरी में हो, लेकिन अजीत अंजुम जैसे लोग कैमरे में एंट्री मिस नहीं कर सकते। ये तो वही मीम हो गया, कैमरा ऑन होते ही गरीब को रोटी दी, कैमरे बंद होते ही वो भी छीन ली। क्योंकि हमें क्या पता आपने कैमरे के पीछे कितनी मदद की? क्योंकि हमने जो देखा वो आपका और कैमरे का प्रेम था।
क्या पता कैमरा बंद होते ही पाइप भी नीचे, और खुद भी नीचे, अरे नीचे यानी फ्लैट से नीचे उतरकर भीड़ में खड़े हो गए। ये मैं नहीं कह रही, ये वो लोग सोच रहे हैं जिन्होंने आपदा के बीच में आपका और कैमरे के बीच का प्रेम देखा।
एक बार को अजीत अंजुम के ‘कैमरा-प्रेम’ पर लिखने से मैं खुद को रोक भी लेती। लेकिन जैसे ही प्रोपेगेंडाबाज और यूट्यूब रवीश कुमार ने अजीत जी को ट्रोल करने पर उनकी साइड ली। तब मैं समझ गई। बोलना तो पड़ेगा। वरना रवीश कुमार तो लंबा-चौड़ा निबंध लिखकर इसे भी मोदी की ही गलती करार देंगे। कहीं उनकी अगली यूट्यूब वीडियो का टाइटल भी यही न हो- पीएम मोदी और उनके कैमरे के रिश्ते ने अजीत अंजुम को बनाया कैमरा-प्रेमी।
दरअसल, राजनीति और पत्रकारिता में एक पुरानी कहावत है- जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदता है, कभी-कभी उसी में कैमरा लेकर खुद उतर जाता है। अजीत अंजुम के साथ भी ऐसा ही हुआ। पीएम मोदी के कैमरे पर सवाल करते-करते खुद कैमरा लेकर उतर गए। अब झेलिए मीम की बारिश, खुद पर। क्योंकि मीम बनाने वालों को छाता तो आपने ही दिया है न? इस पूरी कंट्रोवर्सी से अजीत जी को एक सीख तो मिली होगी कि पड़ोसी के घर में आग लगने पर जो लोग कैमरा लेकर खड़े होते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर हवा बदल गई तो उनके अपने घर भी नहीं बचेंगे।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली नरसिंह (नृसिंह) जयंती हिंदू धर्म में आस्था, शक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार के रूप में नरसिंह स्वरूप धारण किया था।
यह अवतार जितना अद्भुत है, उतना ही गूढ़ और रहस्यमय भी है, क्योंकि इसमें भगवान न तो पूर्ण रूप से मनुष्य थे और न ही पूर्ण रूप से पशु बल्कि आधे सिंह और आधे मानव के रूप में प्रकट हुए। यह रूप किसी संयोग का परिणाम नहीं था बल्कि एक अत्यंत विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिया गया था।
नरसिंह अवतार की पूरी कथा केवल एक दैत्य-वध की कहानी नहीं, बल्कि भक्ति, अहंकार, शक्ति-संतुलन और दिव्य लीला का विस्तृत दर्शन कराती है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि नरसिंह अवतार के साथ ही भगवान शिव ने भी एक अवतार लिया था। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा और मान्यताएँ।
हिरण्यकश्यप का वरदान और नरसिंह अवतार
इस कथा की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं जब असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे ऐसा वरदान दिया, जिससे वह लगभग अमर हो गया।
वह न मनुष्य से मारा जा सकता था, न पशु से, न दिन में उसकी मृत्यु हो सकती थी, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर, न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से, न धरती पर और न आकाश में।
इस वरदान ने उसके भीतर अहंकार को जन्म दिया और उसने स्वयं को भगवान मानना शुरू कर दिया। उसने देवताओं को पराजित कर दिया और पूरे ब्रह्मांड में अत्याचार फैलाने लगा। लेकिन उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था।
हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई बार मारने की कोशिश की लेकिन हर बार वह भगवान विष्णु की कृपा से बच गया। जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है और स्तंभ पर प्रहार किया, तब उसी स्तंभ से भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए।
उन्होंने संध्या समय, महल की दहलीज पर, अपनी गोद में बैठाकर और नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया। इस प्रकार उन्होंने वरदान की हर शर्त को तोड़ते हुए धर्म की स्थापना की।
AI द्वारा प्रतीकात्मक चित्र
नरसिंह का अनियंत्रित क्रोध और शिव का शरभ अवतार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका उग्र रूप इतना भयानक हो गया कि देवता, ऋषि और समस्त लोक भयभीत हो उठे। यहाँ तक कि प्रह्लाद, जिनके लिए भगवान प्रकट हुए थे, वे भी उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाए।
इस स्थिति में सभी देवता पहले ब्रह्मा के पास गए लेकिन समाधान नहीं मिला। अंततः सभी भगवान शिव के पास पहुँचे। भगवान शिव, जिन्हें संहार और संतुलन का देवता माना जाता है, उन्होंने पहले अपने गण वीरभद्र को भेजा लेकिन वे भी नरसिंह को शांत करने में असफल रहे।
इसके बाद भगवान शिव ने एक अत्यंत अद्भुत और शक्तिशाली रूप धारण किया, जिसे शरभ अवतार कहा जाता है। इस रूप में वे सिंह, पक्षी और मनुष्य के मिश्रण के रूप में थे और अत्यंत बलशाली थे। शरभ और नरसिंह के बीच भयंकर संघर्ष हुआ, जिसकी कथाएँ विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूप में मिलती हैं।
कुछ परंपराओं में कहा गया है कि शरभ ने नरसिंह को अपनी शक्ति से नियंत्रित कर उनका क्रोध शांत किया। वहीं वैष्णव परंपरा में यह मान्यता है कि नरसिंह ने एक और शक्तिशाली रूप धारण कर इस चुनौती का सामना किया। अंततः जब नरसिंह को यह आभास हुआ कि उनका उद्देश्य पूर्ण हो चुका है, तब उनका क्रोध शांत हुआ।
श्रीलंका के मुन्नेस्वरम मंदिर में शरभ के रूप में भगवान शिव (फोटो साभार: wikimedia commons)
यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखने के लिए देव शक्तियों के बीच भी जटिल और गूढ़ लीलाएँ होती हैं।
नरसिंह का अद्भुत स्वरूप और उनके अनेक रूप
शास्त्रों में भगवान नरसिंह को भगवान के छहों ऐश्वर्यों- शक्ति, धन, वैराग्य, तेज, ऊर्जा और ज्ञान से पूर्ण रूप से युक्त बताया गया है। पद्म पुराण में कहा गया है कि नरसिंह, राम और कृष्ण इन तीनों अवतारों में भगवान के सभी गुण पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं। भगवान कृष्ण या नारायण को सभी दिव्य रूपों का मूल माना जाता है।
नारायण से वासुदेव प्रकट होते हैं और वासुदेव से संकर्षण का प्रादुर्भाव होता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान नरसिंह, संकर्षण के अंश रूप हैं। जिस प्रकार संकर्षण सृष्टि का संहार करते हैं, उसी प्रकार भगवान नरसिंह अज्ञान और शरीर, मन तथा वाणी से उत्पन्न सभी पापों का नाश करते हैं।
भगवान नरसिंह के अनेक स्वरूपों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। पाञ्चरात्र आगम के विहगेन्द्र संहिता में नरसिंह के सत्तर से भी अधिक रूपों का उल्लेख है। इन रूपों में अंतर उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र, उनकी मुद्रा, आसन और अन्य सूक्ष्म भेदों के आधार पर होता है।
इन अनेक रूपों में से नौ रूप विशेष रूप से प्रसिद्ध माने जाते हैं, जिन्हें नव-नृसिंह कहा जाता है। ये हैं- उग्र नरसिंह, क्रुद्ध नरसिंह, वीर नरसिंह, विलंब नरसिंह, कोप नरसिंह, योग नरसिंह, अघोर नरसिंह, सुदर्शन नरसिंह और लक्ष्मी नरसिंह। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम क्षेत्र में भी भगवान नरसिंह के नौ प्रमुख स्वरूपों की पूजा होती है।
इनमें छत्रवत नरसिंह, योगानंद नरसिंह, करंज नरसिंह, उह नरसिंह, उग्र नरसिंह, क्रोड नरसिंह, मलोल नरसिंह, ज्वाला नरसिंह और पावन नरसिंह शामिल हैं। इन सभी रूपों का अपना अलग महत्व और कथा है, जैसे मलोल नरसिंह में देवी लक्ष्मी उनके साथ विराजमान होती हैं, जबकि ज्वाला नरसिंह अत्यंत उग्र रूप में स्तंभ से प्रकट होते हैं।
इसके अलावा भगवान नरसिंह के कई अन्य रूपों का भी वर्णन मिलता है, जैसे स्तंभ नरसिंह जो स्तंभ से प्रकट होते हैं, स्वयं नरसिंह जो स्वयं प्रकट होते हैं, ग्रहण नरसिंह जो राक्षस को पकड़ते हैं, विदारण नरसिंह जो उसका पेट फाड़ते हैं और संहार नरसिंह जो उसका वध करते हैं।
उनके उग्र स्वरूपों में घोर नरसिंह, उग्र नृसिंह, चंड नरसिंह और ज्वाला नरसिंह का उल्लेख किया गया है। वहीं लक्ष्मी नरसिंह रूप में देवी लक्ष्मी उन्हें शांत करती हैं और प्रसाद या प्रह्लाद-वरद नरसिंह रूप में वे भक्त प्रह्लाद को आशीर्वाद देते हैं। छत्र नरसिंह रूप में वे पाँच फनों वाले सर्प की छाया में बैठे होते हैं, जबकि योग नरसिंह ध्यान मुद्रा में होते हैं।
आवेश नरसिंह अत्यंत उन्मत्त रूप को दर्शाते हैं और अट्टहास नरसिंह वह रूप है जिसमें वे भयानक गर्जना करते हुए अधर्म का नाश करते हैं। चक्र नरसिंह रूप में उनके हाथ में केवल सुदर्शन चक्र होता है। कुछ रूपों में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूपों से जोड़ा गया है, जबकि कुछ रूप पंचतत्वों, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि और अमृत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
पुष्टि नरसिंह की पूजा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए की जाती है। भगवान नरसिंह के असंख्य रूप उनकी अनंत शक्ति, विविधता और दिव्यता को दर्शाते हैं। यह सभी रूप इस बात का प्रमाण हैं कि उनका अवतार केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक आध्यात्मिक सत्य है, जो अज्ञान के नाश और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट हुआ।
नरसिंह से जुड़ी रहस्यमयी मान्यताएँ और लोककथाएँ
नरसिंह अवतार से जुड़ी अनेक ऐसी मान्यताएँ हैं, जो इसे और भी रहस्यमय बनाती हैं। आंध्र प्रदेश का अहोबिलम क्षेत्र वह स्थान माना जाता है, जहाँ भगवान स्तंभ से प्रकट हुए थे। वहाँ एक विशेष चट्टान को उसी स्तंभ का प्रतीक माना जाता है, जिसे उग्र स्तंभ कहा जाता है।
कुछ मंदिरों में भगवान को गुड़ से बना पेय अर्पित किया जाता है, जिसे पानकम कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान उसका कुछ भाग स्वयं स्वीकार करते हैं, जो उनके क्रोध को शांत करने का प्रतीक माना जाता है। आदि शंकराचार्य से जुड़ी कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें संकट के समय उन्होंने नरसिंह का स्मरण किया और उन्हें दिव्य सहायता प्राप्त हुई।
इसके अलावा भारत के विभिन्न हिस्सों में ऐसे स्थानों की मान्यता है, जहाँ भगवान के प्रकट होने या उनसे जुड़ी घटनाओं के प्रमाण माने जाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी इस अवतार से जुड़ी लोककथाएँ प्रचलित हैं, जो इस कथा को और व्यापक बनाती हैं।
सिंहाचलम मंदिर और नरसिंह भक्ति की परंपरा
आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम के पास स्थित सिंहाचलम मंदिर नरसिंह भगवान के प्रमुख तीर्थों में से एक है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है और इसकी वास्तुकला द्रविड़ शैली की है। यहाँ भगवान के वराह और नरसिंह के संयुक्त रूप की पूजा की जाती है।
सिम्हाचलम मंदिर, विशाखापत्तनम (फोटो साभार: vizagtourism.org)
इस मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि भगवान की प्रतिमा को साल भर चंदन के लेप से ढका जाता है और केवल अक्षय तृतीया के दिन ही उसका वास्तविक स्वरूप दर्शन के लिए खोला जाता है। इस अवसर को चंदनोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
वैसे तो भगवान नरसिंह के कई मंदिर भारत में हैं। लेकिन इस मंदिर को उनका निवास स्थान माना जाता है और यह कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं प्रह्लाद ने करवाया था। मंदिर का इतिहास भी काफी प्राचीन है और विभिन्न राजाओं द्वारा इसके जीर्णोद्धार की कथाएँ जुड़ी हुई हैं।
यह स्थान केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नरसिंह अवतार की कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष, भक्ति की शक्ति और ईश्वर की लीला का गहरा संदेश देती है।
यह अवतार यह दर्शाता है कि जब अन्याय और अत्याचार अपनी सीमा पार कर जाते हैं, तब ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट होकर संतुलन स्थापित करते हैं। इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण और रोचक पहलू यह है कि भगवान शिव को भी हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने अपने शरभ अवतार के माध्यम से नरसिंह के क्रोध को शांत किया।
यह घटना दर्शाती है कि सृष्टि के संचालन में सभी दिव्य शक्तियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। नरसिंह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि यह विश्वास का प्रतीक है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर हर युग में उपस्थित रहते हैं और अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं।
नेपाल में बालेन शाह की सरकार बनने के बाद एक और भारत-विरोधी कारनामे सामने आ रहे हैं। अब नेपाल एयरलाइंस ने नक्शा (मैप) जारी किया, जिसमें पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का और पूरे नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाया गया है। भारत के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एयरलाइन से जवाबदेही माँगी, तब जाकर एयरलाइन ने ऐसा भ्रामक नक्शा दिखाने के लिए माफी माँगी है।
दरअसल, नेपाल की ‘नेपाल एयरलाइंस’ ने 29 अप्रैल 2026 ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट पर अपने फ्लाइट नेटवर्क को दिखाते हुए पूरी दुनिया का एक नक्शा पोस्ट किया। इस नक्शे में सबसे आपत्तिजनक बात थी कि इसमें भारत के अधिकतर हिस्सों को चीन और पाकिस्तान के नक्शे में दिखाया गया।
नक्शे में खासकर पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया, जिस पर भारत के नेटिजन्स भड़क गए। इतना ही नहीं भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे सिक्किम, दार्जीलिंग समेत पूरे नॉर्थ ईस्ट को भी चीन के हिस्से में दिखाया गया। यह देखकर भारत के नेटिजंस और ज्यादा गुस्सा गए।
नेपाल एयरलाइंस पर भारत के नेटिजन्स का फूटा गुस्सा
इस हरकत के बाद नेपाल एयरलाइंस भारत के नेटिजन्स के निशाने पर आ गया। लोगों ने नेपाल एयरलाइंस से जवाबदेही माँगी। ‘एक्स’ पर #NepalAirlines और #JammuKashmir से जुड़े हैशटैग के साथ पोस्ट वायरल होने लगे, जिसमें यूजर्स ने इसे भारत-विरोधी और जानबूझकर किया गया गलत काम बताया।
दिव्या गंडोत्रा टंडन नाम की यूजर ने लिखा, “भारत ने दशकों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। खुली सीमा से लेकर लाखों नेपाली नागरिकों को रोजगार देने तक, व्यापार के लिए भारत के बंदरगाह उपलब्ध कराने से लेकर ईंधन पाइपलाइन, बिजली परियोजनाएँ, आपदा के समय मदद, बुनियादी ढाँचे का निर्माण, स्कॉलरशिप और सैन्य सहयोग तक, भारत हमेशा नेपाल के साथ खड़ा रहा है।”
India has kept Nepal’s economy breathing for decades… open borders, jobs for lakhs of Nepalis, trade access via Indian ports, fuel pipelines, power projects, disaster relief, infrastructure, scholarships, even military cooperation.
— Divya Gandotra Tandon (@divya_gandotra) April 29, 2026
उन्होंने आगे लिखा, “लेकिन ऐसे में नेपाल एयरलाइंस की ओर से जारी एक फ्लाइट नेटवर्क मैप ने हैरान कर दिया। इस मैप में जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के साथ दिखाया गया। यह कोई साधारण डिजाइन की गलती नहीं लगती, बल्कि एक गंभीर और संवेदनशील मामला है। जब भारत आज भी नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साझेदार है, तब एक राष्ट्रीय एयरलाइन से ऐसी लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती। यह केवल एक नक्शा नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है, जो कई सवाल खड़े करता है।”
असम के वोकेशनल टीचर्स एसोसिएशन के आधिकारिक हैंडल ने भी आपत्ति जताते हुए लिखा, “भारत कई दशकों से नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साथी रहा है। ऐसे में नेपाल एयरलाइंस द्वारा अपने फ्लाइट मैप में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। यह एक गंभीर गलती है, जिसे सुधारा जाना चाहिए।”
India has been Nepal’s biggest lifeline for decades, from open borders, lakhs of jobs, trade routes, fuel, power, disaster aid, infrastructure & more. Yet Nepal Airlines casually displays Jammu & Kashmir as part of Pakistan on its flight map.
— Vocational Teachers’ Association of Assam NSQF (@VTAA_NSQF) April 29, 2026
ऐसे ही भोजपुरी स्टार और RJD नेता खेसारी लाल यादव ने भी लिखा, “कोई बता पाएगा की क्या सोच के नेपाल एयरलाइंस भारत के नक्शे में ऐसा छेड़ छाढ़ किया है और वो भी जम्मू कश्मीर को लेकर? ये मामूली बात नहीं है, जानबूझकर किया हुआ काम लगता हैं। इसको चिढ़ाना बोलते हैं।”
कोई बता पाएगा की क्या सोच के नेपाल एयरलाइंस भारत के नक्शे में ऐसा छेड़ छाढ़ किया है और वो भी जम्मू कश्मीर को लेकर ?
ये मामूली बात नहीं है, जानबूझकर किया हुआ काम लगता हैं। इसको चिढ़ाना बोलते हैं। https://t.co/d1R5ZzzeSq
— Khesari Lal Yadav (खेसारी) (@khesariLY) April 29, 2026
‘द दार्जीलिंग क्रोनिकल’ नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “नेपाल एयरलाइंस की नजर में दुनिया कुछ अलग ही है। उनके नक्शे को देखें तो ऐसा लगता है कि भारत का पूरा उत्तर-पश्चिम, पूरा उत्तर-पूर्व, दार्जिलिंग, सिक्किम और यहाँ तक कि म्यांमार का हिस्सा भी चीन में शामिल कर दिया गया है। काठमांडू में आजकल लोग क्या फूँक रहे हैं?”
DFQ – The world according to Nepal Airlines
Seems like for them most of North West and all of North East India, including Darjeeling, Sikkim and Mayanmar are part of China
— The Darjeeling Chronicle (@TheDarjChron) April 29, 2026
नेपाल एयरलाइंस ने माँगी माफी
भारत के यूजर्स की कड़ी आलोचना के बाद नेपाल एयरलाइंस ने आखिरकार सार्वजनिक तौर पर माफी माँगी। एयरलाइन ने कहा कि वे अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर हाल ही में साझा किए गए फ्लाइट नेटवर्क मैप में हुई गलती के लिए दिल से माफी माँगते हैं।
We sincerely apologize for error in the network map recently shared on our social media channels. The map contained significant cartographic inaccuracies regarding international boundaries that do not reflect the official stance of Nepal or Nepal Airlines. pic.twitter.com/E5MZSS8CjQ
यह भी कहा कि इस नक्शे में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लेकर गंभीर त्रुटियाँ थीं, जो नेपाल सरकार या नेपाल एयरलाइंस की आधिकारिक स्थिति को बिल्कुल भी नहीं दर्शाती है।
नेपाल का भारत-विरोधी रुख और बालेन शाह सरकार में उथल-पुथल
बता दें कि नेपाल में नई बालेन शाह सरकार बनने के बाद से ही नेपाल का भारत-विरोधी रुख सामने आता जा रहा है। हाल ही में बालेन शाह सरकार नई भंसार नीति लाई थी, जिसके तहत भारत से लाए जाने वाले 100 से अधिक नेपाली रुपये (लगभग ₹63) के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाई थी, जिसके बाद भी बालेन शाह सरकार का विरोध हुआ था।
और यह भी किसी से नहीं छिपा कि बालेन शाह सरकार अपने ही फैसलों से गतिरोध का सामना कर रही है, उनके बड़े-बड़े मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिसके बाद उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ा। कुल मिलाकर नई बालेन शाह सरकार देश को चलाने में असमर्थ साबित हो रही है।
दिल्ली के जाफरपुर कलाँ में रविवार (26 अप्रैल 2026) को एक बिहार के खगड़िया के रहने वाले युवक की हत्या के बाद अब पीड़ित परिवार घर के बाहर धरने पर बैठ गया है और प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है। इस बीच अब इस मामले को लेकर सियासत भी तेज हो गई है। पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का भरोसा दिया और भाजपा सरकार पर निशाना साधा।
इस बीच ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के उत्तम नगर के उस प्रजापति कॉलोनी पहुँची, जहाँ मृतक मजदूर पांडव कुमार का परिवार रहता है। हमने देखा कि कॉलोनी में जगह-जगह उठ रहे धुएँ से घुटन के बीच मटके बनाने में लगे हुए हैं। इस बीच रास्ते को रोककर ट्रांसफार्मर के पास जमीन पर मेट बिछा हुआ है। ऊपर धूप से बचने के लिए सफेद चाँदनी लगी थी और उसके नीचे पीड़ित परिजन शोक में बैठे थे। जहाँ पहले से परिवारजनों, रिश्तेदारों, स्थानीय नेताओं और कुछ मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लगा हुआ है।
यहाँ ट्रांसफार्मर के तीन ओर लगी जाली पर मृतक पांडव कुमार के फोटो के साथ कुछ फ्लेक्स लगे थे, जिस पर लिखा था…’क्या बिहारी होना गुनाह है?’ ‘बिहार नाम सुनते ही पुलिस वाले नीरज बल्हारा ने नशे की हालत में गोली मारी’, ‘पांडव तेरे कातिल जिंदा हैं। हम सब शर्मिंदा हैं’। एक दूसरे फ्लेक्स में सबसे ऊपर लिखा था… ‘रक्षक बना भक्षक’।
पांडव के घर के बाहर लगा बैनर (फोटो साभार: ऑपइंडिया)
फर्श पर महिलाओं से घिरी मृतक पांडव की माँ बेसुध बैठी थी जिसे कुछ महिलाएँ संभालने की कोशिश कर रही थीं। हमने उनसे बात करने की कोशिश की। उन्होंने हमें बताया कि घटना के अगले दिन यानी 27 तारीख की सुबह 7:00 बजे मुझे पता चला कि बेटा इस दुनिया में नहीं रहा। माँ बताती हैं, “वह मुझसे कहकर गया था कि मम्मी मैं बर्थडे पार्टी में जा रहा हूँ, मेरे लिए खाना मत बनाना, मैं देर रात को आऊँगा। लेकिन सामने एक मकान में रहने वाले पुलिस वाले पिस्तौल निकालकर मेरे बेटे को गोली मार दी।”
पांडव की माँ ने कहा, “मेरे बेटे के सीने में गोली लगी और पार निकल गई । पीछे बैठे दूसरे लड़के के पेट में गोली लगी वह अस्पताल में भर्ती है।” बेटे की बातों को याद कर माँ फिर से बिलखने लगती है और कहती है, “मुझे बस न्याय चाहिए। मेरा बेटा घर में अकेला कमाने वाला था। अब मेरा कोई सहारा नहीं रहा।”
मृतक पांडव के घर के बाहर बैठे लोग (फोटो साभार: ऑपइंडिया)
पास में बैठी दूसरी महिला ने कहा कि हमें बिहार से होने के कारण बहुत अपमान झेलना पड़ता है। वो कहती हैं, “लोग कहते हैं कि यह बिहारी हैं और बिहार से आकर यहाँ गंदगी फैलाते हैं। हम दो दिन से यहाँ भूखे-प्यासे बैठे हैं लेकिन हमें न्याय नहीं मिल रहा है।” पांडव कुमार की चाची कहती हैं कि हम उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे लेकिन शादी होने से पहले ही उसको मार दिया हम चाहते हैं कि पुलिस वाले को फाँसी हो।
चश्मदीद चचेरे भाई ने क्या बताया?
पांडव कुमार के छोटे भाई दीपक ने बताया कि मुझे रात में नहीं पता चला था लेकिन जब पता चला तो मुझे यकीन नहीं हुआ। पांडव कुमार की बाइक पर बैठे तीसरे युवक यानी चचेरे भाई दीपक ने हमें बताया कि हम करीब 9:30 बजे प्रजापति कॉलोनी से 6 लोग मित्र रुपेश के बेटे की बर्थडे पार्टी में शामिल होने के लिए गए थे लेकिन केक काटने के बाद खाना खाने में टाइम लग गया था और करीब 2:00 बजे हम वहाँ से निकले। कुछ लोग कैब से निकल गए।
दीपक बताते हैं, “हम बाइक से निकल ही रहे थे कि अचानक नशे में घुत एक व्यक्ति हमारे पास आया। हमें गालियाँ देते हुए उसने पूछा कि कहाँ से हो? हमने जब बिहार से होना बताया तो उसने बिहार नाम सुनते ही हमें गालियाँ देना शुरू कर दिया।” वो बताते हैं, “हमने वहाँ से निकलने की भी कोशिश की लेकिन उसने हमारे रास्ता रोककर पिस्तौल तान दी और फिर बातों ही बातों में उसने गोली चला दी। इसके बाद उसने कहा कि एक तो मर गया है दूसरा भी मर जाएगा जाओ ले जाओ इसे बचा लो और फिर वह वहाँ से गाड़ी लेकर फरार हो गया।”
दीपक बताते हैं कि कुछ देर बात तक तो भाई तड़पता रहा लेकिन फिर मेरे हाथों में ही उसने दम तोड़ दिया और मैं कुछ नहीं कर सका। चचेरा भाई दीपक आगे कहता है कि हम दिल्ली में कमाने के लिए आए हैं मुझे यहाँ आए 20 साल हो गए लेकिन हमें आए दिन लोग बिहार के नाम पर गाली देते हैं हमारा अपमान करते हैं।
घटना के समय मौजूद छोटू नाम का युवक कहता है क्या बिहारी होना अब गुनाह हो गया है? या हमें दिल्ली में रहने का अधिकार नहीं है? हम चाहते हैं कि उसे (आरोपित) फाँसी होनी चाहिए।
न्याय नहीं मिला तो करूँगा दिल्ली की सड़कें जाम
पांडव कुमार के दादा कमलेश सिंह बताते हैं कि करीब 15 साल पहले हम यहाँ आए थे और वह यहाँ मजदूरी करते हैं। वो कहते हैं, “पांडव लड़का बहुत अच्छा था आज उसका पोस्टर देखकर हमारा कलेजा फट रहा है। मेरी सरकार से माँग है कि हमारे परिवार को आर्थिक मदद दी जाए और 3 महीने के अंदर आरोपी को फाँसी देकर हमें न्याय दिया जाए।”
वो कहते हैं, “अगर ऐसा नहीं होता है तो मैं खुद सड़कों पर उतर कर रोड को जाम करूँगा।पांडव के दादा अंत में कहते हैं कि बिहारी को मुर्दा ना समझा जाए उसे जिंदा समझा जाए। आज एक पांडव मरा है लेकिन यहाँ हजारों पांडव खड़े हैं।”
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दी 8 लाख की आर्थिक मदद
पांडव कुमार की हत्या पर गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। इसके साथ ही सम्राट चौधरी ने परिवार को 8 लाख की आर्थिक मदद देने की घोषणा की। साथ ही केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी घटना पर दु:ख जताया है। वहीं, मंगलवार को पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए पूर्णिया सांसद पप्पू यादव पहुंचे और उन्होंने परिवार को 50 हजार रुपए की आर्थिक मदद की।
साथ ही, सपा नेता खेसारी लाल निरहुआ, तेजस्वी यादव ने भी इस घटना के बहाने भाजपा सरकार पर निशाना साधा। वहीं देर शाम को खगड़िया लोकसभा सांसद राजेश वर्मा ने भी पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का भरोसा दिया और उन्हें 1 लाख की आर्थिक भी दी।
आपको बता दें कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात हरियाणा निवासी हवलदार नीरज बल्हारा ने नशे की हालत में बिहार के युवकों को गाली देते हुए गोली चला दी थी, जिसमें दो युवकों को गोली लगी थी। पांडव ने सीने में गोली लगने से मौके पर ही दम तोड़ दिया था और पीछे बैठे कृष्णा के पेट में गोली लगी थी जो अभी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपित नीरज बल्हारा को गिरफ्तार कर लिया है, जिसे कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 18 और 19 अप्रैल को ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ The Timothy Initiative (TTI) नाम की एक संस्था से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। ED ने बताया कि वह इस बात की जाँच कर रहा है कि TTI ने कैसे करीब 95 करोड़ रुपए भारत में विदेशी बैंकों के डेबिट कार्ड के जरिए भेजे जबकि FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों को पूरी तरह दरकिनार किया गया है।
ED, Headquarters Office, New Delhi has conducted search operations on 18th and 19th April, 2026 at six locations in multiple states in connection with suspected withdrawal and utilisation of funds by using foreign bank debit cards, bypassing regulatory channels. The investigation… pic.twitter.com/gloGiWyDvQ
गौर करने वाली बात यह है कि TTI FCRA के तहत रजिस्टर्ड नहीं है। इसका मतलब है कि भारत में इस संस्था के किसी भी कार्यक्रम को विदेशी फंडिंग नहीं मिल सकती। इसके बावजूद ED ने बताया कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच विदेशी बैंक डेबिट कार्ड के जरिए करोड़ों रुपए नकद निकाले गए।
ED के मुताबिक, TTI ने एक खास तरीका अपनाया था। अमेरिका के Truist Bank से जुड़े विदेशी डेबिट कार्ड भारत लाए गए और इनका इस्तेमाल कई राज्यों के एटीएम से बार-बार पैसे निकालने के लिए किया गया। बाद में इस पैसे का उपयोग TTI के भारत में चल रहे धर्मांतरण से जुड़े कामों के खर्च के लिए किया गया। इस मामले में ED ने कई राज्यों में कुल 6 जगहों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी के अनुसार, इन छापों में 25 विदेशी बैंक डेबिट कार्ड, 40 लाख रुपए नकद और कई अहम डिजिटल सबूत, डिवाइस और दस्तावेज जब्त किए गए।
इसके अलावा, माइका मार्क (Micah Mark) नाम के एक व्यक्ति के पास 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले। उसे ED द्वारा जारी लुकआउट सर्कुलर के आधार पर बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन ब्यूरो ने रोका था, जब वह ये कार्ड भारत लेकर आ रहा था। ED ने यह भी बताया कि इन कार्ड्स से छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों जैसे धमतरी और बस्तर में संदिग्ध तरीके से भारी मात्रा में नकदी निकाली गई। पिछले कुछ सालों में इन इलाकों से करीब 6.5 करोड़ रुपए निकाले जाने की जानकारी सामने आई है।
एजेंसी के अनुसार, इन कार्ड्स का इस्तेमाल एक सुनियोजित तरीके से बड़ी रकम निकालने के लिए किया जा रहा था, जिससे संगठित नेटवर्क की आशंका जताई जा रही है। ED ने यह भी कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में इस तरह की समानांतर नकद अर्थव्यवस्था का बनना देश की सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है क्योंकि इससे अवैध गतिविधियों के लिए पैसों की आवाजाही आसान हो सकती है।
इसके अलावा, TTI एक ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही थी जिसमें एटीएम से निकाले गए पैसे और उनके इस्तेमाल का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता था। ED के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म को विदेशी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित किया जा रहा था जिससे यह संकेत मिलता है कि यह पूरी प्रक्रिया किसी एक जगह की नहीं बल्कि संगठित और योजनाबद्ध तरीके से चलाई जा रही थी।
क्या है ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’?
भारत में जियो-ब्लॉक The Timothy Initiative (TTI) की वेबसाइट के अनुसार यह एक वैश्विक ईसाई आंदोलन है जिसका उद्देश्य नए अनुयायी बनाना, चर्च स्थापित करना और धार्मिक नेतृत्व तैयार करना है। ऑपइंडिया द्वारा एक्सेस किए गए इसके दस्तावेजों में कहा गया है कि यह संगठन हर गाँव में एक चर्च स्थापित करने के लक्ष्य के साथ काम कर रहा है। TTI की प्रकाशित सामग्री, उसकी ‘हिस्ट्री’ पेज और प्रचार सामग्री से यह साफ होता है कि चर्च स्थापित करना इसका मुख्य उद्देश्य है।
इसके Kingdom Impact नामक दस्तावेज के अनुसार, साल 2007 से अब तक इस संगठन ने 50 देशों जिसमें भारत भी शामिल है में 2,68,750 से ज्यादा चर्च स्थापित किए हैं। साथ ही, संगठन का दावा है कि 23,92,427 लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया है जिनमें 2,01,954 विधवाएँ और अनाथ भी शामिल हैं। इसे एक गंभीर मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।
फोटो साभार: TTI
TTI का कहना है कि अनुयायियों की संख्या एक अनुमान है जो हर नए बनाए गए चर्च में जुड़ने वाले लोगों के पुराने औसत के आधार पर निकाली गई है। यानी असल संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है।
TTI का पूरा मॉडल बाइबिल की एक पंक्ति ‘2 Timothy 2:2’ पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि जो सीख मिली है, उसे भरोसेमंद लोगों को सिखाओ, ताकि वे आगे और लोगों को सिखा सकें। आसान भाषा में समझें तो यह एक ‘चेन सिस्टम’ की तरह है जिसमें एक व्यक्ति कुछ लोगों को तैयार करता है, वे आगे और लोगों को तैयार करते हैं और इस तरह नेटवर्क लगातार बढ़ता जाता है।
इसे एक तरह से मल्टी लेवल मार्केटिंग (MLM) मॉडल जैसा भी समझा जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें लोग कोई प्रोडक्ट नहीं खरीदते बल्कि ईसाई धर्म में परिवर्तन के जरिए इस नेटवर्क का हिस्सा बनते हैं।
फोटो साभार: TTI
TTI ने अपने एक प्रचार वीडियो में कहा है कि उसका हर काम सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया भर में चर्च बनाने के लिए होता है। यानी प्रशासनिक, लॉजिस्टिक या कल्याण से जुड़े खर्च भी अंततः चर्च स्थापना और धर्म परिवर्तन के लक्ष्य से जुड़े हैं। खास बात यह है कि उसके एक प्रमुख वीडियो में ज्यादातर दृश्य भारत के हैं।
TTI के एक वीडियो में भारत पर केंद्रित विजुअल का स्क्रीनशॉट (साभार: TTI)
TTI के अनुसार उसके काम में 5 स्तर की लीडरशिप होती है- Titus, Timothy, Pauls, master trainers और movement leaders और इनमें से हर स्तर के लिए अलग-अलग फंडिंग की जरूरत होती है। यह मॉडल काफी हद तक MLM जैसा है, जहाँ नीचे लोगों की संख्या के आधार पर ‘स्तर’ तय होते हैं।
Titus स्तर के लोगों को 2 किताबों से ट्रेनिंग दी जाती है जबकि Timothy स्तर के लिए 12 किताबें और हजारों पन्नों की सामग्री होती है। Pauls को मास्टर ट्रेनर मैनुअल, लगातार ट्रेनिंग और यात्रा भत्ता मिलता है।
संगठन के मुताबिक, Master Trainers और Movement Leaders को ट्रेनिंग के दौरान खाने, यात्रा और रहने का खर्च दिया जाता है। साथ ही उन्हें हर महीने एक छोटा स्टाइपेंड भी मिलता है। यानी यह सिर्फ स्वैच्छिक प्रचार नहीं बल्कि इसमें लीडर्स और ट्रेनर्स को आर्थिक सहयोग भी दिया जाता है।
प्रमोशनल सामग्री में यह भी बताया गया है कि डोनर का पैसा ‘विजन कास्टिंग’ जैसे कार्यक्रमों में खर्च होता है, जिनका मकसद नए लोगों को जोड़ना होता है। साथ ही TTI के लोग फील्ड में जाकर यह भी जाँच करते हैं कि चर्च और समूह वास्तव में मौजूद हैं या नहीं यानि ट्रेनिंग के साथ निगरानी और रिपोर्टिंग सिस्टम भी है।
इसके अलावा, फंड का इस्तेमाल नए देशों में विस्तार, ऑफिस खोलने, यात्रा और नई भाषाओं में सामग्री तैयार करने में होता है। संगठन के खर्चों में गाँवों की मैपिंग सॉफ्टवेयर, ट्रेनिंग लॉन्च, रिपोर्टिंग, लीडरशिप डेवलपमेंट, मेंटरिंग, ऑफिस, प्रिंटिंग, नई सामग्री, वीडियो, ऑडियो बाइबल, किताबें, स्टाफ सैलरी, मीटिंग्स और अन्य कई तरह के ऑपरेशनल खर्च शामिल हैं।
संगठन के अनुसार, 2010 में उसने 10 किताबों का एक मुख्य ट्रेनिंग मॉडल बनाया जिसमें लक्ष्य था कि हर प्रशिक्षित व्यक्ति ट्रेनिंग के अंत तक एक चर्च स्थापित करे। 2013 में ‘Disciples Making Disciples (DMD)’ नाम का मल्टीप्लिकेशन मॉडल लागू किया गया। 2020 तक यह 7 लाख गाँवों की मैपिंग की बात कर रहा था और 2021 में ‘Coalition of the Willing’ के जरिए 50 लाख गाँवों की मैपिंग का लक्ष्य बताया गया।
TTI भले ही व्यावसायिक MLM न हो लेकिन इसका चर्च बनाने का सिस्टम मल्टी-लेवल विस्तार मॉडल जैसा है। इसमें अलग-अलग स्तर की लीडरशिप बनाई जाती है, लोगों को तय ट्रेनिंग दी जाती है, लीडर्स और ट्रेनर्स को फंड दिया जाता है, विस्तार को ट्रैक किया जाता है, जमीनी स्तर पर काम की जाँच होती है और सफलता को चर्च और अनुयायियों की बढ़ती संख्या से मापा जाता है।
विदेशी चर्च, भारत पर फोकस और हिंदू बहुल क्षेत्र
TTI से जुड़े पार्टनर्स की सामग्री से संकेत मिलता है कि भारत में इसकी गतिविधियाँ सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स के अनुसार, राजस्थान और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में भी TTI से जुड़ी गतिविधियाँ सामने आई हैं।
एक पोस्ट में बताया गया कि TTI राजस्थान में पादरियों और लीडर्स को ट्रेनिंग देने के मिशन के तहत सक्रिय था। इसमें योजनाबद्ध ट्रेनिंग, अनुयायी तैयार करना और सहयोग देना शामिल था। साथ ही यह भी कहा गया कि यह पहल फैकल्टी बैटिस्टा पियोनेरा और बैपटिस्ट चर्च ऑफ न्यू इंग्लैंड मल्टीप्लिकेशन सेंटर के बीच साझेदारी के माध्यम से संभव हो पाई है। इससे संकेत मिलता है कि राजस्थान में चल रही ट्रेनिंग गतिविधियों से विदेशी चर्च नेटवर्क भी जुड़े हुए थे।
फोटो साभार: इंस्टाग्राम
केंसिंग्टन चर्च की एक अन्य पोस्ट में TTI को एक वैश्विक आंदोलन बताया, जो अनुयायियों, चर्चों और लीडर्स की संख्या बढ़ाने पर काम करता है। पोस्ट के अनुसार, TTI के साथ साझेदारी के जरिए उत्तर भारत, जिसे हिंदू बहुल क्षेत्र बताया गया, में 3000 से ज्यादा हाउस चर्च शुरू किए गए। इसमें यह भी कहा गया कि केंसिंग्टन सहित आठ चर्चों के समूह ने इस क्षेत्र में यीशु का संदेश फैलाने के लिए 10 लाख डॉलर जुटाने का संकल्प लिया।
फोटो साभार: इंस्टाग्राम
ED ने छत्तीसगढ़ के धमतरी और बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में संदिग्ध कैश निकासी का जिक्र किया है। जबकि TTI से जुड़े नेटवर्क का दायरा खासकर हिंदू बहुल क्षेत्रों में राजस्थान और उत्तर भारत तक फैला बताया जा रहा है।
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़, बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों में हालात और गंभीर बताए गए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई गाँवों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं और ईसाई बहुसंख्यक बन चुके हैं। कई जगह ऐसे गाँव हैं जहाँ एक भी मंदिर नहीं है लेकिन 3-4 चर्च मौजूद हैं। साथ ही, पारंपरिक दाह संस्कार की जगह कई स्थानों पर कब्र और क्रॉस के साथ दफनाने की परंपरा बढ़ने का भी जिक्र है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गरीब, बीमार और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों को निशाना बनाया जा रहा है, जहाँ 2-3 पादरी कई गाँवों में सक्रिय हैं। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में 146 NGO FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं, जिनमें 50 मिशनरी संगठन शामिल हैं। इनमें से 30 जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़ और बस्तर जैसे उन्हीं जिलों में काम कर रहे हैं, जहां धर्मांतरण के मामले सबसे ज्यादा बताए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी NGO छत्तीसगढ़ फर्म एंड सोसाइटी में भी रजिस्टर्ड हैं लेकिन इनका सरकारी ऑडिट नहीं होता बल्कि ये खुद ही अपनी ऑडिट रिपोर्ट जमा करते हैं। साथ ही, राज्य सरकार के पास इनके विदेशी फंडिंग को लेकर ठोस जानकारी नहीं होने की बात भी कही गई है।
TTI की टाइमलाइन: कैसे चर्च स्थापना बनी अभियान
TTI की टाइमलाइन के अनुसार, इसकी शुरुआत 2007 में हुई जब इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स एशिया के दौरे पर आए। संगठन के मुताबिक, उन्होंने वहां बहुत सारे मंदिर और मस्जिदें देखीं और पूछा- “चर्च कहाँ हैं?’ इस पर जवाब मिला- “कोई नहीं।” TTI इसी घटना को अपने आंदोलन की “आध्यात्मिक शुरुआत” बताता है जिसका उद्देश्य भारत में हिंदुओं को लक्ष्य बनाकर चर्च स्थापित करना था।
फोटो साभार: TTI
2008 में TTI का कहना है कि डेविड नेल्म्स और स्थानीय लीडर्स जोशुआ विजयकुमार और हर्षा कुमार ने एक चर्च स्थापना प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। संगठन का यह भी कहना है कि इसी के साथ TTI के पहले 3,075 चर्च संस्थापकों की शुरुआत हुई। इससे पता चलता है कि संगठन का प्रारंभिक मॉडल केवल व्यक्तिगत प्रचार या छोटे पैमाने पर संगति कार्य नहीं था बल्कि चर्च संस्थापकों का सुनियोजित प्रशिक्षण था।
2010 में TTI ने 10 किताबों का कोर ट्रेनिंग सिस्टम तैयार किया। इसमें साफ लक्ष्य रखा गया कि हर प्रशिक्षित व्यक्ति ट्रेनिंग के अंत तक एक चर्च बनाए। यानी यहाँ सिर्फ सीखना नहीं बल्कि सीधे चर्च बनाना ही मुख्य उद्देश्य था- ट्रेनिंग और चर्च निर्माण आपस में सीधे जुड़े हुए हैं।
2013 में TTI के अनुसार उसने ‘अनुयायी से अनुयायी बनाने’ (Disciples Making Disciples या DMD) वाला एक नया प्रशिक्षण मॉडल लागू किया। इसी समय यह भी कहा गया कि संगठन 30 देशों में सक्रिय हो गया। इस मॉडल का मतलब साफ है कि एक व्यक्ति सिर्फ अनुयायी बनकर नहीं रहता बल्कि आगे और नए अनुयायी तैयार करता है। यहीं से यह पूरी व्यवस्था एक चेन की तरह काम करने लगती है, जहाँ हर प्रशिक्षित व्यक्ति आगे विस्तार का नया केंद्र बन जाता है।
फोटो साभार: TTI
2014 में TTI ने दावा किया कि उसने 25,000 से ज्यादा चर्च स्थापित कर लिए हैं। यानी कुछ ही सालों में संगठन ने चर्च की संख्या को अपनी उपलब्धि का पैमाना बनाना शुरू कर दिया। इससे साफ होता है कि उसका काम सिर्फ सेवा या कल्याण तक सीमित नहीं बल्कि चर्चों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित है।
2016 में TTI ने ‘अनरीच्ड पीपल ग्रुप्स’ पर ध्यान देना शुरू किया यानि ऐसे समुदाय जहाँ ईसाई मौजूदगी बहुत कम या नहीं के बराबर है। इससे यह दिखता है कि संगठन खास तौर पर तय किए गए लक्षित समूहों तक पहुँचने पर काम कर रहा था।
2020 में TTI ने ‘हर गाँव में एक चर्च’ के लक्ष्य के साथ एक नया अभियान शुरू किया। संगठन के अनुसार, एशिया के दो देशों में 7 लाख गाँवों का सर्वे और मैपिंग शुरू की गई ताकि हर गाँव में चर्च बनाया जा सके। साथ ही यह दावा भी किया गया कि हर 40 मिनट में एक नया चर्च स्थापित हो रहा था। इस चरण को इसलिए अधिक अहम माना गया है क्योंकि इसमें गाँव स्तर पर पहचान, सर्वे और टारगेटिंग के जरिए विस्तार की योजना साफ दिखती है।
फोटो साभार: TTI
2021 में TTI ने अपने अगले चरण ‘पर्स्यूट’ की शुरुआत बताई। इसके अनुसार, ‘हर गाँव में चर्च’ के लक्ष्य को पाने के लिए साझेदारी जरूरी थी। इसी से ‘कोएलिशन ऑफ द विलिंग’ बना। संगठन का कहना है कि अलग-अलग समूहों ने मिलकर 50 लाख गाँवों की मैपिंग की। इस दौरान यह दावा भी किया गया कि हर 20 मिनट में एक नया चर्च स्थापित हो रहा था।
अपने ‘आज’ (Today) वाले चरण को TTI ‘तेजी’ का दौर बताता है। इसके अनुसार, 2.6 लाख से ज्यादा चर्च स्थापित हो चुके हैं, 23 लाख नए अनुयायी जुड़े हैं और यह 50 देशों तक फैल रहा है। साथ ही यह दावा भी किया गया कि अब हर 11 मिनट में एक नया चर्च बनाया जा रहा है।
मौजूदा नेतृत्व और डॉ. जेरेड नेल्म्स की भूमिका
TTI की वेबसाइट के अनुसार, डॉ. जेरेड नेल्म्स इसके प्रेसिडेंट और सीईओ हैं। उनके प्रोफाइल में कहा गया है कि उनका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के स्थानीय नेताओं को तैयार करना, उनके साथ काम करना और हर जगह तक धार्मिक संदेश पहुँचाना है।
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निष्कर्ष
ED की जाँच ने भले ही छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में TTI की गतिविधियों पर ध्यान खींचा है लेकिन संगठन की गतिविधियां सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत तक फैली हुई हैं। इसका मल्टी-लेवल जैसा काम करने का तरीका और सक्रिय सदस्य, जो अलग-अलग जगहों पर जाकर चर्च स्थापित करने और धर्म परिवर्तन से जुड़े काम कर रहे हैं, एक गंभीर मुद्दा है जिस पर गहराई से जाँच किए जाने की जरूरत है।
(यह खबर मूल रुप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)