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ब्रज के गौरक्षक चंद्रशेखर महाराज, जिनकी ट्रक से कुचलकर गई जान: जानिए कैसे मिला था उन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ का नाम

धर्मनगरी मथुरा में गौरक्षा के सबसे बड़े नायक माने जाने वाले संत चंद्रशेखर, जिन्हें ब्रज के लोग सम्मान से ‘फरसा वाले बाबा’ पुकारते थे, अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार (20 मार्च 2026) तड़के करीब 4 बजे, जब पूरा इलाका नींद में था, तब बाबा अकेले ही गोतस्करों के एक काल बनकर उनका पीछा कर रहे थे।

इसी दौरान एक हादसे में उन्हें ट्रक ने कुचल दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद इस मामले का संज्ञान लेते हुए आरोपितों के खिलाफ पाताल से ढूँढकर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

कौन थे ‘फरसा वाले बाबा’ संत चंद्रशेखर?

संत चंद्रशेखर महाराज मथुरा के कोसीकलां क्षेत्र के एक समर्पित गौ सेवक और संत थे, जो पिछले कई वर्षों से ब्रज की गायों को तस्करों से बचाने के लिए एक दीवार की तरह खड़े थे। उन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि वे हमेशा अपने साथ एक छोटा फरसा रखते थे, जो उनके साहस और अधर्म के प्रति कड़े विरोध का प्रतीक था। वे केवल प्रवचन देने वाले संत नहीं थे, बल्कि वे जमीन पर उतरकर आधी रात को भी तस्करों की सूचना मिलते ही अपनी बाइक से उनका मुकाबला करने निकल पड़ते थे।

ब्रज के गाँवों में उनकी छवि एक रक्षक की थी, जो गोवंश की सुरक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर चलते थे। उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन श्री कृष्ण की लाडली गायों की सेवा में समर्पित कर दिया था। स्थानीय गौरक्षा संगठनों में उनकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी और वे युवाओं के लिए प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत थे। उनके जाने से गौरक्षा आंदोलन को एक ऐसी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी।

साजिश के तहत हुई निर्मम हत्या

घटनाक्रम के अनुसार, शुक्रवार (20 मार्च 2026) तड़के बाबा को गुप्त सूचना मिली थी कि तस्कर गायों से भरा एक ट्रक लेकर नवीपुर गाँव के पास से गुजरने वाले हैं। बिना किसी डर के, बाबा ने अपनी बाइक उठाई और अकेले ही उस ट्रक को रोकने के लिए निकल पड़े। पीछा करने के दौरान जब तस्करों को लगा कि वे पकड़े जा सकते हैं, तो उन्होंने अपनी गाड़ी रोकने के बजाय जानबूझकर बाबा की बाइक में जोरदार टक्कर मारी और उन्हें रौंदते हुए फरार हो गए।

टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बाबा चंद्रशेखर की मौके पर ही मौत हो गई। हालाँकि, मौके पर मौजूद कुछ स्थानीय लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए ट्रक का पीछा किया और भाग रहे एक मुस्लिम आरोपित को दबोचकर पुलिस के हवाले कर दिया, जबकि उसके तीन अन्य साथी अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे। इस घटना को लोग महज एक हादसा नहीं, बल्कि गोतस्करों द्वारा रची गई एक सोची-समझी साजिश और प्रतिशोध का हिस्सा मान रहे हैं।

हालाँकि बाद में पुलिस ने बताया कि बाबा चंद्रशेखर की मौत हादसे में हुई थी। पुलिस ने बताया कि वो जिस ट्रक को रुकवा कर तलाशी रहे थे, उस पर किराने का सामान लदा था और बाबा को कुचलने वाला ट्रक दूसरा था, जिसपर सरिया लदा था। हादसे में ट्रक ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हो गया था, जिसकी अस्पताल में मौत हो गई थी।

हाईवे पर संग्राम और सुलगता आक्रोश

बाबा की हत्या की खबर जैसे ही मथुरा और आसपास के जिलों में फैली, हजारों की तादाद में गौरक्षक और ग्रामीण दिल्ली-आगरा हाईवे पर जमा हो गए। लोगों का गुस्सा इतना ज्यादा था कि उन्होंने हाईवे को पूरी तरह ठप कर दिया, जिससे गाड़ियों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक फरार तीनों हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं होती और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिलता, वे पीछे नहीं हटेंगे।

हालात उस समय और बिगड़ गए जब भीड़ और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई। आक्रोशित लोगों ने हाईवे पर खड़े वाहनों पर पथराव शुरू कर दिया, जिसमें कई गाड़ियाँ क्षतिग्रस्त हो गईं और कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और पूरे इलाके को छावनी में तब्दील करना पड़ा। वर्तमान में मथुरा के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल तैनात है, लेकिन बाबा के समर्थकों की आँखों में आँसू और दिल में सुलगता गुस्सा अभी भी बना हुआ है।

पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने शिया मौलवियों को घंटों सुनाया, फिर कहा- ईरान से मोहब्बत है तो वहीं जाओ: भड़के मौलवियों ने जिया-उल-हक के दौर से की तुलना

पाकिस्तान में गुरुवार (19 मार्च 2026) को हुई एक हाई-प्रोफाइल इफ्तार बैठक के बाद शिया मौलवी, फौज के मुखिया आसिम मुनीर पर भड़के हुए हैं। रावलपिंडी स्थित फौज के जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में आयोजित इस बैठक में पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने शिया मौलवियों से बातचीत की। इस दौरान मुनीर ने मौलानाओं से कहा, “अगर आपको ईरान से इतनी मोहब्बत है तो आप ईरान चले जाओ, मैं आपको बता दूँ कि जिन्ना एक शिया थे।”

शिया समुदाय ने मुनीर के इस लेक्चर को अपने अपमान के रूप में लेते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। इस बैठक में एक दर्जन से अधिक शिया उलेमा शामिल हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बातचीत का माहौल शुरुआत से ही संतुलित नहीं रहा।

शिया मौलवियों ने कहा कि आर्मी चीफ मुनीर ने लंबे समय तक केवल अपनी बात रखी और उलेमा को बीच में बोलने या अपनी बात विस्तार से रखने का मौका ही नहीं दिया गया। इससे बैठक धीरे-धीरे एकतरफा होती चली गई और कई मुद्दों पर असहमति उभरकर सामने आई।

शिया धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया और आरोप

शुक्रवार (20 मार्च 2026) को इस्लामाबाद में शिया धर्मगुरु अल्लामा आगा शिफा नजफी ने खुलासा किया कि बैठक के दौरान असीम मुनीर का रवैया काफी सख्त और आपत्तिजनक था। उन्होंने आरोप लगाया कि बातचीत के दौरान फील्ड मार्शल ने शिया समुदाय को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिससे उन्हें अपमानित महसूस हुआ।

नजफी ने बताया कि बैठक की शुरुआत में ही असीम मुनीर ने अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद इस्लामाबाद और पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगिट-बाल्टिस्तान में हुए प्रदर्शनों पर नाराजगी जताई। उन्होंने खासतौर पर फौज की एक इमारत को जलाए जाने की घटना को अस्वीकार्य बताया।

नजफी के अनुसार, माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया तो उन्होंने खुद हस्तक्षेप करते हुए मुनीर को याद दिलाया कि पाकिस्तान की फौज में बड़ी संख्या में शिया अधिकारी भी सेवा दे रहे हैं। उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके मामा अमीर हयात को ‘सितारा-ए-जुर्रत’ से सम्मानित किया जा चुका है और उनके अन्य परिजन भी फौज में रह चुके हैं।

नजफी का कहना है कि इस पर असीम मुनीर का लहजा कुछ नरम पड़ा लेकिन इसके बाद उन्होंने फिर वही टिप्पणी दोहराई कि अगर शिया समुदाय को ईरान से इतना लगाव है, तो उन्हें वहाँ चले जाना चाहिए। इस पर नजफी ने गहरी नाराजगी जताते हुए सवाल उठाया कि क्या कभी किसी शिया व्यक्ति ने इस्लामाबाद या कराची में किसी फौजी की हत्या की है?

उन्होंने यह भी कहा कि जिन तत्वों ने फौजियों के साथ बर्बरता की घटनाएँ कीं, क्या उनसे कभी यह कहा गया कि वे अफगानिस्तान चले जाएँ? लेकिन आज शिया समुदाय को इस तरह की बातें सुननी पड़ रही हैं। नजफी ने कहा कि असीम मुनीर ने बैठक में बताया कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है। ऐसे में यदि ईरान सऊदी अरब पर हमला जारी रखता है तो पाकिस्तान को सऊदी की रक्षा के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं।

जिया-उल-हक दौर से तुलना, शिया समुदाय के हालात पहले से ही खराब

शिया मौलवी सैयद जवाद नकवी ने पूरे घटनाक्रम की तुलना जिया-उल-हक के दौर से की। उनका कहना है कि उस समय की तरह अब भी एक खास सोच को थोपने का माहौल बनता दिख रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि देशभक्ति की परिभाषा को सीमित किया जा रहा है और ईरान जैसे देशों से मजहबी या भावनात्मक जुड़ाव को संदेह की नजर से देखा जा रहा है।

पाकिस्तान में मजहबी अल्पसंख्यकों, खासकर शिया, अहमदिया और हजारा समुदाय स्थिति चिंताजनक है। एक ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि ये समुदाय लगातार सांप्रदायिक हिंसा का शिकार हो रहे हैं और सरकार उन्हें पर्याप्त सुरक्षा देने में नाकाम रही है।

एथेंस स्थित संस्था डायरेक्टस के अनुसार, कट्टरपंथी संगठन ना केवल अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं बल्कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन एजेंसियों द्वारा होने वाले दुरुपयोग के खिलाफ प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है।

रिपोर्ट में हाल ही में इस्लामाबाद में शिया मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले का उल्लेख किया गया है जिसमें 36 लोगों की मौत और करीब 170 लोग घायल हुए थे। पाकिस्तान में शिया आबादी कुल आबाद की करीब 10-15% है और यह बहुसंख्यक सुन्नी समुदायों के निशाने पर रहते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, शिया, हजारा, अहमदिया, इस्माइली, दाऊदी बोहरा, जिक्रि, सूफी और बरेलवी समुदाय न केवल हिंसा बल्कि भेदभावपूर्ण कानूनों और कमजोर कानूनी सुरक्षा का भी सामना कर रहे हैं। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के हवाले से यह भी कहा गया है कि कई मामलों में आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न होने से ऐसे हमलों को बढ़ावा मिल रहा है।

‘गंगा किसकी है?’: इफ्तार के नाम पर नाव में मीट पार्टी करने वाले मुस्लिम युवकों को ‘The Wire’ ने दिया कवर फायर

हरीश की भी गंगा है, हारिस की भी गंगा है, हरकीरत की भी गंगा है और हैरी की भी गंगा है- इनशॉर्ट गंगा या कोई भी नदी सबकी साझा होती है। वो जाति, रंग मजहब देखे बिना सबका भरण-पोषण करती है- सुनने में ये बात कितनी तार्किक मालूम पड़ती है… है ना? The Wire की हेडिंग भी कुछ ऐसी ही है। इसमें उर्दू शायरी और शायरों का जिक्र भी है जिन्होंने गंगा के बारे में लिखा है। यानी ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि भाई हमारे वालों ने तो गंगा पर साहित्य भी लिखा है इसलिए गंगा हमारी है।

उनकी और उनके पुरखों की भावनाओं का क्या… जो पीढ़ियों से गंगा किनारे रहते आए हैं। यह सवाल पूछते हुए लेखिका आगे लिखती हैं कि क्या अब हम नदियों और पहाड़ों पर भी पहले अधिकार तय करने वाले हैं? 

रखशंदा जलील ये आर्टिकल लिखती हैं और पुरानी वामपंथन सीमा चिश्ती इसे शेयर करती हैं। गंगा सबकी है ये बात सही है लेकिन यहाँ कुछ फेक न्यूज फैलाई जा रही है इसलिए सबसे पहले फैक्ट्स जानने जरूरी हैं।

मुस्लिमों को यह बताया जा रहा है कि गंगा में इफ्तारी मनाने वालो को इसलिए पकड़ा गया क्योंकि वो गंगा नदी में अपना रोजा खोल रहे थे। विक्टिम कार्ड खेला जा रहा है कि उन्हें गंगा नदी में जाने से रोका जा रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि वो उस गंगा नदी में मीट खा रहे थे। नॉनवेज बिरयानी खा रहे थे और वो भी जानबूझकर बिंदुमाधव मंदिर के पास खा रहे थे जहाँ नॉनवेज बैन है। 

सच्चाई ये है कि कोर्ट में जब इन 14 आरोपितों को पेश किया गया तो ये रोने लगे। जज के सामने कान पकड़कर माफी माँगने लगे कि उन्हें अपने किए का पछतावा है। नाव चालकों का तो आरोप है कि इन मुस्लिम युवकों ने डरा-धमकाकर और उनकी इच्छा के खिलाफ नाव को बीच गंगा में ले जाकर इस काम को अंजाम दिया। 

अब आपने वो वीडियो तो देखे होंगे कि कुछ नशेड़ी गंगा में शराब और हुक्का पीने लगते हैं। जब ये पकड़े जाते हैं तो प्रशासन एक्शन लेते हैं और फिर कानूनी कार्रवाई होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि गंगा आपकी अय्याशी का अड्डा नहीं है, इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ जुड़ी हुई है।

ऐसे में अगर ये नियम नदी की पवित्रता बनाए रखने के लिए अगर ये बात शराबियों पर लागू होती है तो गंगा नदी में चिकन बिरयानी से रोजा खोलने और हड्डियों को गंगा में फेंकने वालों को सहानुभूति की नजर से क्यों देखा जाए। क्यों ना इसे षड्यंत्र की नजर से देखा जाए। 

ये लोग गंगा को केवल एक नदी के तौर पर देखते हैं लेकिन हिंदुओं के लिए गंगा हिमवान की पुत्री और माँ पार्वती की बहन है। गंगा स्कंद यानी कार्तिकेय की धाय माँ है। गंगा विष्णुपदी है। गंगा शांतनु की पत्नी और भीष्म पितामह की माँ है। गंगा को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया है। गंगा राजा भगीरथ के 60 हजार पूर्वजों की उद्धारक है। इसीलिए गंगा हमारे लिए केवल एक बहता पानी नहीं है, वह पाप-नाशिनी है, पूजनीय है। गंगा हर एक हिंदू के जीवन में रची बसी है, चाहे वह गंगा के किनारे रहता हो या गंगा नदी से दूर।

रही बात मुस्लिमों को बैन की तो हमारा दिल बड़ा है इसलिए हम बैन तो मुस्लिमों को नहीं कर रहे हैं, लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये सवाल ही कहा से आया कि गंगा किसकी है? हर चीज पर अधिकार जमाने का जो कॉन्सेप्ट है वो इस्लाम का ही है। काबा हमारा है, कुतुब भी हमारा है, कश्मीर हमारा है और हिंदुस्तान हमारे अब्बू का है। ये सब तो इस्लाम की भाषा है जबकि हिंदुओं ने तो कभी भी किसी तरह के कब्जे की बात ही नहीं की है।

ट्रैफिक जाम से मिली मुक्ति, रोपवे-इलेक्टिक बसों और पिंक ऑटो की हुई शुरुआत: योगी सरकार के 9 साल का कमाल, UP में बदला परिवहन का हाल

उत्तर प्रदेश, जिसे कभी धीमे परिवहन और ट्रैफिक जाम के लिए जाना जाता था, आज आधुनिक शहरी परिवहन के मामले में देश का अग्रणी राज्य बनकर उभरा है। योगी सरकार के 9 वर्षों के कार्यकाल में ‘नए भारत के नए उत्तर प्रदेश’ का संकल्प धरातल पर उतरता दिख रहा है। राज्य के महानगरों में आज जिस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हुआ है, उसने न केवल आम जनता के सफर को आसान बनाया है, बल्कि प्रदेश को निवेश और रोजगार के ग्लोबल मॉडल के रूप में परिवर्तित कर दिया है।

मेट्रो और नमो भारत: रफ्तार की नई परिभाषा

उत्तर प्रदेश आज देश का ऐसा राज्य है जहाँ सबसे अधिक शहरों में मेट्रो का जाल बिछ चुका है। वर्तमान में मेरठ, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ, कानपुर और आगरा जैसे प्रमुख शहरों में मेट्रो रेल सेवा का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है। इसके साथ ही, देश की पहली ‘नमो भारत’ रैपिड रेल (दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ) का संचालन शुरू होना परिवहन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है, जिसे NCR क्षेत्र की ‘लाइफलाइन’ माना जा रहा है।

वाराणसी में देश का पहला अर्बन रोपवे

तकनीकी नवाचार की दिशा में योगी सरकार ने काशी (वाराणसी) को देश का पहला ऐसा शहर बनाया है जहाँ नगरीय परिवहन के लिए रोपवे की सुविधा शुरू होने जा रही है। यह न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा, बल्कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में यातायात को सुगम बनाने का देश में अपनी तरह का पहला मॉडल बनेगा।

इलेक्ट्रिक बसों का जाल और ‘वन यूपी वन कार्ड’

प्रदूषण मुक्त सफर के लिए सरकार ने इलेक्ट्रिक बसों पर विशेष जोर दिया है। वर्तमान में प्रदेश के 15 शहरों में 743 इलेक्ट्रिक बसें दौड़ रही हैं। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक निगम के बेड़े में 3,000 नई इलेक्ट्रिक बसें शामिल करने और अनुबंध के आधार पर 5,000 और बसें जोड़ने का है। इसके साथ ही, यात्रियों की सुविधा के लिए ‘वन यूपी वन कार्ड‘ की शुरुआत की गई है, जिससे किराए में 10 प्रतिशत की छूट मिलती है। वहीं, ‘UPRAHI’ ऐप के माध्यम से यात्री बसों की वास्तविक स्थिति और अन्य सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं।

सुरक्षित और स्मार्ट परिवहन: पिंक ऑटो और AI का उपयोग

शहरी परिवहन को सुरक्षित बनाने के लिए सरकार ने आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। बसों की निगरानी के लिए 24×7 कंट्रोल रूम स्थापित किए गए हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए 7 शहरों में 500 ई-ऑटो चलाने की योजना है, जिनमें से 50 प्रतिशत महिला चालक होंगी। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत शहरों में ऑटोमैटिक इंटेलिजेंस स्पीड और रेड लाइट सेंसिंग की व्यवस्था की गई है, जिससे यातायात नियमों का उल्लंघन कम हो और सड़क सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

लॉजिस्टिक्स और भविष्य की योजनाएँ

योगी सरकार का विजन केवल बसों और ट्रेनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहरों को ‘लॉजिस्टिक्स हब‘ के रूप में विकसित करने का है। प्रयागराज और साहिबाबाद में इलेक्ट्रिक डिपो हब तैयार किए जा रहे हैं। प्रदेश के 16 जनपदों में ड्राइवर ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग इंस्टीट्यूट संचालित हैं ताकि कुशल जनशक्ति तैयार हो सके। लखनऊ में यातायात को सुगम बनाने के लिए ₹7000 करोड़ की लागत से ‘ग्रीन कॉरिडोर’ का विकास किया जा रहा है।

आधुनिक शहरी परिवहन का यह मजबूत ढांचा उत्तर प्रदेश के 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को गति दे रहा है। ‘विजन 2047’ के तहत विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश की नींव इन्हीं पहलों पर टिकी है, जहाँ हर नागरिक को घर, पानी, बिजली के साथ-साथ विश्वस्तरीय परिवहन की सुविधा प्राप्त हो। ‘काम दमदार – डबल इंजन सरकार’ का यह विजन आज यूपी के शहरों को सिंगापुर और जापान जैसी सुविधाओं की होड़ में खड़ा कर रहा है।

तरुण की लिंचिंग मामले में ‘द वायर’ और वामपंथी अपूर्वानंद ने खेला ‘मुस्लिमों को पीड़ित’ दिखाने का खेला: पढ़िए कैसे हिंदुओं को बदनाम करके की जा रही इस्लामियों को बचाने की कोशिश

2002 के गोधरा कांड से लेकर 2020 के दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगे, पहलगाम का इस्लामी आतंकी हमला, उदयपुर के हिंदू दर्जी कन्हैयालाल की निर्मम हत्या और अब उत्तम नगर में मुस्लिम भीड़ द्वारा तरुण कुमार की लिंचिंग इन सभी घटनाओं में एक ही पैटर्न देखने को मिला है। हर बार वामपंथी कट्टर गैंग ने इस्लामी हमलों को कम करके दिखाया और उसके जवाब में उठे हिंदू आक्रोश को ही बड़ा खतरा बताने की कोशिश की।

इतना ही नहीं, इस्लामियों द्वारा किए गए हिंदू-विरोधी अपराधों पर पर्दा डालने के लिए ये वामपंथी गिरोह हिंदुओं को ही बदनाम करने पर उतारू हो जाते हैं। इनकी कोशिश पूरे मामले को इस तरह घुमाने की होती है कि असली अपराधी को पीड़ित और पीड़ित को ही अपराधी साबित कर दिया जाए। इसी कड़ी में, वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ ने तरुण हत्याकांड को लेकर मुस्लिम विक्टिमहुड (पीड़ित होने का नाटक) का एक नया प्रोपेगेंडा लेख तैयार किया है, जिसका मकसद असल घटना से ध्यान भटकाना है।

वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ ने एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का शीर्षक ‘दिल्ली के उत्तम नगर में नफरत आजाद है, लेकिन मुस्लिम सुरक्षा नहीं’ लिखा है। प्रोफेसर अपूर्वानंद ने एक बार फिर ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (पीड़ित होने का कार्ड) का पुराना राग अलापा है, जिसमें मुस्लिमों को पीड़ित दिखाया गया है। हैरानी की बात यह है कि यह लेख तब लिखा गया है जब हकीकत में एक हिंदू परिवार ने अपना बेटा खोया है।

पूरी घटना उत्तम नगर की है, जहाँ एक मुस्लिम महिला ने गलती से होली का रंग लग जाने को बर्दाश्त नहीं किया और भीड़ को उकसा दिया। इस मुस्लिम भीड़ ने तरुण कुमार की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी। इसके बावजूद, अपूर्वानंद जैसे बुद्धिजीवी इस क्रूर हत्या पर पर्दा डालकर उलटा हिंदुओं को ही दोषी ठहराने और मुस्लिमों को असुरक्षित दिखाने का प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं। यह पीड़ित और अपराधी के बीच के अंतर को जानबूझकर मिटाने की एक सोची-समझी कोशिश है।

वामपंथी न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ ने 18 मार्च 2026 को छपे एक लेख में हिंदू समाज के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। अपूर्वानंद ने अपने लेख में दावा किया कि प्रशासन बस इसलिए तारीफ के काबिल है क्योंकि उसने उस ‘हिंदू भीड़’ को रोक कर रखा है, जो मुसलमानों का नरसंहार (massacre) करना चाहती है।

इसका जवाब देते हुए कट्टरपंथियों का पक्ष लेने वाले अपूर्वानंद कहते हैं कि हिंदू जो उग्र नारे लगा रहे हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं, उसे प्रशासन सिर्फ इसलिए बर्दाश्त कर रहा है क्योंकि एक हिंदू की मौत हुई है। अपूर्वानंद का तर्क है कि प्रशासन यह मानकर चल रहा है कि ‘हिंदू की मौत पर दूसरे हिंदुओं का खून तो खौलेगा ही।’

अपूर्वानंद ने प्रदर्शनकारियों की उस कथित माँग (15 मिनट के लिए पुलिस हटने वाली बात) को भी उछाला, ताकि वे पूरी दुनिया को यह दिखा सकें कि हिंदू समाज मुस्लिमों के खून का प्यासा है। अपूर्वानंद ने एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर की गई हत्या (लिंचिंग) जैसी बड़ी और खौफनाक घटना को एक ‘छोटी सी बात’ बताने की कोशिश की है, ताकि दोषियों का बचाव किया जा सके और उल्टा पीड़ितों को ही हिंसक साबित किया जा सके।

‘सर तन से जुदा’ पर चुप्पी, हिंदू आक्रोश पर ‘नरसंहार’ का शोर: ‘द वायर’ का दोहरा चेहरा

‘द वायर’ के लेखक अपूर्वानंद की बातों से ऐसा लगता है जैसे वे चाहते थे कि हिंदू अपने बेटे (तरुण कुमार खटीक) की मौत के बाद भी चुपचाप घरों में बैठे रहें। उनके हिसाब से, हत्यारों के खिलाफ गुस्सा दिखाना और इंसाफ माँगना देश के ‘भाईचारे’ और ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के लिए खतरा है।

हैरानी की बात ये है कि एक तरफ अपूर्वानंद दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाते हैं कि वह हिंदू प्रदर्शनकारियों (जिन्हें वे ‘हिंसक भीड़’ कह रहे हैं) के साथ ‘मिलीभगत’ कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, वे खुद यह भी स्वीकार करते हैं कि पुलिस ने ‘हिंदू भीड़’ की उस कथित माँग को नहीं माना जिसमें 15 मिनट के लिए पीछे हटने और उन्हें खुली छूट देने की बात कही गई थी। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि अपूर्वानंद का मकसद सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करना और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाना है।

इस पूरे मामले में हिंदू प्रदर्शनकारियों और मुस्लिम भीड़ के बीच का फर्क साफ दिखता है। जहाँ एक तरफ हिंदू समाज तरुण कुमार के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए प्रशासन पर दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी भीड़ अक्सर कानून को हाथ में लेकर पत्थरबाजी और ‘सर तन से जुदा’ जैसे हिंसक रास्तों का सहारा लेती है।

साल 2022 का नूपुर शर्मा मामला इसका सबसे बड़ा सबूत है। पूर्व भाजपा नेता नूपुर शर्मा ने सिर्फ धार्मिक ग्रंथों का जिक्र किया था, लेकिन इसके बदले में कट्टरपंथियों ने उनके सिर कलम करने के नारे लगाए और देश के कई हिस्सों में दंगे भड़काए। इसी उन्माद के चलते उदयपुर में कन्हैयालाल और महाराष्ट्र में उमेश कोल्हे की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इसके बावजूद, न्यायपालिका से लेकर वामपंथी बुद्धिजीवियों तक, सभी ने नूपुर शर्मा को ही दोषी ठहराया। यह संदेश देने की कोशिश की गई कि हिंदुओं का अपनी बात कहना बड़ी समस्या है, जबकि मुस्लिम भीड़ का दंगे करना और गला काटना जैसे जायज हो।

इतिहास गवाह है कि कई मौकों पर मुस्लिम राजनेताओं, खासकर AIMIM से जुड़े लोगों ने हिंदुओं को खुलेआम धमकी दी है। उन्होंने बार-बार कहा है कि ‘अगर 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दी जाए, तो वे हिंदुओं को अपनी ताकत दिखा देंगे।’ हैरान करने वाली बात यह है कि तब अपूर्वानंद जैसे वामपंथियों को कोई दिक्कत नहीं हुई। उलटा, वे इसके पीछे यह तर्क देने लगते हैं कि बीजेपी-RSS ने मुस्लिम ‘अल्पसंख्यकों’ को इतना डरा दिया है कि उनके पास आक्रामक होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

अगर वर्तमान मामले की बात करें, तो आरोपित उमरदीन (49) और उसके बेटे मुजफ्फर (25) ने महज एक छोटी सी बहस के बाद तरुण कुमार की पीट-पीटकर हत्या कर दी। यह विवाद सिर्फ इसलिए शुरू हुआ था क्योंकि एक बच्चे ने पानी का गुब्बारा फेंका था, जिसका रंग गलती से आरोपित समुदाय की एक महिला पर गिर गया था। इसके बावजूद, ‘द वायर’ के पूरे लेख में तरुण कुमार की इस क्रूर लिंचिंग को अंजाम देने वाले असली अपराधियों के नाम तक नहीं लिखे गए हैं।

1984 के दंगों को ‘हिंदू बनाम सिख’ रंग देने की कोशिश: अपूर्वानंद का नया एजेंडा

हैरानी की बात यह है कि ‘द वायर’ के लेखक अपूर्वानंद ने उत्तम नगर में एक हिंदू युवक की बेरहमी से हुई हत्या (लिंचिंग) के सांप्रदायिक पहलू को जानबूझकर दबा दिया है। इसके बजाय, वे 1984 के सिख विरोधी दंगों का हवाला देकर एक झूठा नैरेटिव गढ़ रहे हैं कि ‘हिंदू भीड़ ने सिखों पर हमला किया था’, जबकि हकीकत में वह एक राजनीतिक हिंसा थी। इतना ही नहीं, अपूर्वानंद ने हिंदू समाज के साथ-साथ पुलिस और सेना तक को मुसलमानों के खिलाफ ‘हिंसक हिंदू भीड़ का मददगार’ बता दिया है।

अपूर्वानंद लिखते हैं, “1984 में न केवल दिल्ली, बल्कि भारत के अन्य हिस्सों में भी पुलिस ने इंदिरा गाँधी की हत्या से नाराज हिंदुओं को सिखों को लूटने और मारने की पूरी छूट दी। कई मामलों में तो पुलिस ने खुद लुटेरों और हत्यारों की मदद की।” वे आगे हाशिमपुरा कांड का जिक्र करते हुए आरोप लगाते हैं कि सेना और पुलिस ने न केवल भीड़ को अनुमति दी, बल्कि खुद भी मुसलमानों की हत्या की। उनके मुताबिक, आजादी के बाद से मुसलमानों का यह अनुभव रहा है कि पुलिस अक्सर उन पर होने वाली हिंसा में ‘हिंदू भीड़’ के साथ मिल जाती है।

‘द वायर’ में 1984 दंगों का जिक्र

तरुण हत्याकांड के मामले में यह साफ है कि जिस मुस्लिम महिला पर गलती से होली का रंग गिरा था, उसने पड़ोस के हिंदू बच्चों की इस मासूम सी भूल को बर्दाश्त नहीं किया। इसके बजाय, उसने एक हिंसक भीड़ को इकट्ठा कर तरुण कुमार खटीक जैसे निर्दोष हिंदू युवक पर हमला करवा दिया।

इसके विपरीत, 1984 के सिख विरोधी दंगों में कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं था। वे हिंदू नहीं थे जो सड़कों पर उतरकर सिखों को निशाना बना रहे थे। हकीकत में, वे कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता थे, जिन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या का बदला लेने के लिए पार्टी नेतृत्व ने दंगों के लिए उकसाया था। यह सिखों के खिलाफ हिंदुओं का कोई स्वाभाविक गुस्सा नहीं था, बल्कि कॉन्ग्रेस द्वारा प्रायोजित एक सुनियोजित नरसंहार था।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने सिखों पर हमला करने और लूटपाट मचाने के लिए मिट्टी का तेल और अन्य हथियार उपलब्ध कराए थे। यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भी इस नरसंहार को यह कहते हुए जायज ठहराया था कि ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती ही है।’ इस बयान ने साफ कर दिया था कि वे सिख विरोधी दंगों को कितनी मामूली बात समझते थे।

2004 की नानावती आयोग की रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि 1984 के दंगों में कॉन्ग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ही भीड़ को उकसाया और मदद की थी। इसमें बीजेपी, RSS या आम हिंदुओं की कोई भूमिका नहीं थी। इसके उलट, आम हिंदुओं और RSS के स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सिखों को कॉन्ग्रेस के हमलावरों से बचाया और उन्हें पनाह दी थी।

इसके बावजूद, बीजेपी के धुर विरोधी अपूर्वानंद जैसे लेखकों का यह दावा करना बेहद दुस्साहस भरा है कि हिंदू भीड़ और पुलिस हमेशा से मुसलमानों को निशाना बनाने में शामिल रहे हैं। इसके लिए वे ‘हाशिमपुरा कांड’ का जिक्र करते हैं, जबकि हकीकत में वह हिंदू-पुलिस की मिलीभगत नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस का एक ‘सेक्युलर’ अपराध था।

22 मई 1987 को उत्तर प्रदेश की पीएसी (PAC) ने हाशिमपुरा इलाके से करीब 50 मुस्लिम युवकों को ट्रक में भरकर ऊपरी गंगा नहर के पास ले जाकर गोलियों से भून दिया था और उनके शव पानी में फेंक दिए थे। इस क्रूरता में 42 लोगों की जान गई थी। यह जघन्य अपराध किसी हिंदू भीड़ ने नहीं, बल्कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के इशारे पर पुलिस अधिकारियों ने अंजाम दिया था।

अपूर्वानंद जैसे लेखकों द्वारा पुराने नरसंहारों को सांप्रदायिक रंग देना और कॉन्ग्रेस के पापों का बोझ हिंदुओं के सिर मढ़ना सिर्फ एक दिखावा है। यह उनकी उस छटपटाहट को दिखाता है जहाँ वे पुरानी घटनाओं के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं ताकि आज के समय में हो रहे कट्टरपंथी अपराधों पर पर्दा डाला जा सके।

हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथियों का पक्ष लेने वाले अपूर्वानंद उन घटनाओं का जिक्र कभी नहीं करते जहाँ पुलिस ने निहत्थे हिंदुओं पर गोलियाँ चलाईं। उन्होंने 1966 के उस साधु नरसंहार का कोई उल्लेख नहीं किया जब इंदिरा गाँधी के आदेश पर दिल्ली पुलिस ने लाखों गौभक्त साधुओं पर हमला किया था। इसी तरह, वे 1990 में मुलायम सिंह यादव के आदेश पर अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग पर भी चुप्पी साधे रहते हैं।

2020 के दिल्ली दंगों का हवाला देते हुए अपूर्वानंद ने दावा किया कि हिंदू भीड़ ने ‘दिल्ली पुलिस लाठी चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं’ जैसे नारे लगाए, जिससे पुलिस ने हिंदुओं के साथ मिलकर मुस्लिमों को पीटा। वे सवाल उठाते हैं कि ‘आखिर वो कौन सा पल होता है जब पुलिस से डरने वाली जनता को लगने लगता है कि पुलिस उनकी अपनी है?’ उनके इस सवाल का असली मकसद पुलिस और हिंदू समाज को एक हिंसक गठबंधन के रूप में दिखाकर बदनाम करना है।

अपूर्वानंद के सवालों का सीधा जवाब यह है कि पुलिस से मदद हमेशा पीड़ित माँगते हैं, अपराधी नहीं। जो मुस्लिम भीड़ हिंदुओं के घरों, कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों पर पत्थर बरसा रही थी, वह भला यह क्यों कहेगी कि ‘दिल्ली पुलिस लाठी चलाओ’? वे अच्छी तरह जानते हैं कि लाठियाँ किन पर चलनी चाहिए और किन पर नहीं।

लेकिन तर्क और सामान्य ज्ञान को ताक पर रखकर भारतीय पुलिस को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर देना इन वामपंथी-कट्टरपंथी विचारकों के लिए आम बात है। वे भूल जाते हैं कि भारतीय पुलिस में हर धर्म के जवान शामिल होते हैं। उनका एकमात्र मकसद मुस्लिमों को हमेशा ‘पीड़ित’ (Victim) दिखाकर अपना एजेंडा चलाना है।

यही नहीं, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कैसे पूरा ‘लिबरल-सेक्युलर’ गिरोह दिल्ली की सड़कों पर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा करने वाले कट्टरपंथियों को सुरक्षा दे रहा था। दिसंबर 2019 में जामिया दंगों के दौरान, दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जैसे नेताओं ने आरोप लगाया था कि बसों में आग प्रदर्शनकारियों ने नहीं, बल्कि बीजेपी के इशारे पर खुद दिल्ली पुलिस ने लगाई थी। यह सब केवल नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हो रहे हिंसक प्रदर्शनों का बचाव करने के लिए किया गया था।

‘द वायर’ के लेख में इस बात पर भी दुख जताया गया है कि भारतीय मुसलमानों को ईरान पर होने वाले हमलों के खिलाफ प्रदर्शन तक नहीं करने दिया जाता और उन्हें ईरान जाने की सलाह दी जाती है। लेखक अपूर्वानंद ने चतुराई से इस बात को छिपा लिया कि इन प्रदर्शनों में खुद प्रदर्शनकारी ही ईरान के समर्थन में युद्ध के मैदान में उतरने और अपनी जान देने की बातें कर रहे थे। इंटरनेट पर ऐसे वीडियो भी सामने आए जिनमें बुर्का पहनी महिलाएँ अपनी ही देश की सरकार पर ईरान को ‘धोखा’ देने का आरोप लगा रही थीं।

हैरानी की बात यह है कि ‘द वायर’ के लिए अपने देश से ऊपर विदेशी धार्मिक नेताओं के प्रति वफादारी दिखाना कोई समस्या नहीं है, लेकिन जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, वे उनकी नजर में गलत हैं। यहाँ भी वही पुराना तरीका अपनाया गया है- कट्टरपंथियों की उग्र हरकतों पर चुप्पी साध ली जाती है, लेकिन जब हिंदू उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, तो उदारवादी गिरोह उसे एक बड़ा मुद्दा बना देता है।

कसाब का मोह और दिल्ली दंगा: प्रोफेसर अपूर्वानंद के जिहादी कनेक्शन पर सवाल

मुसलमानों को ‘पीड़ित’ दिखाने वाला ऐसा खुला प्रोपेगेंडा अपूर्वानंद जैसे व्यक्ति की ओर से आना कोई हैरानी की बात नहीं है। यह वही शख्स है जिसका इतिहास 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब के प्रति सहानुभूति जताने का रहा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का यह प्रोफेसर, जो आज पुलिस पर ‘हिंदू भीड़’ का साथ देने का आरोप लगा रहा है, वह खुद 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों का आरोपित है।

दिल्ली दंगों की मुख्य आरोपितों में से एक, गुलफिशा (उर्फ गुल), जिसे UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया है, उसने दिल्ली पुलिस के सामने यह कबूल किया था कि प्रोफेसर अपूर्वानंद ही दिल्ली में दंगे भड़काने की साजिश के असली साजिशकर्ता थे। उनके मार्गदर्शन में ही दंगों की पूरी योजना तैयार की गई थी।

आरोपित गुलफिशा ने खुलासा किया था कि हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों से पहले प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ही औरतों की एक ‘बुर्का-धारी टीम’ तैयार की थी। गुलफिशा के मुताबिक, अपूर्वानंद ने दंगों से काफी पहले ही उन्हें आगाह कर दिया था कि हिंसा होने वाली है। इतना ही नहीं, जब दिल्ली दंगों की आग में झुलस रही थी, तब अपूर्वानंद ने इस खूनी खेल में शामिल छात्रों की जमकर तारीफ भी की थी।

गुलफिशा ने अपने बयान में यह भी बताया कि अपूर्वानंद ने उन्हें निर्देश दिया था कि ‘जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी’ (JCC) दिल्ली में 20-25 जगहों पर आंदोलन खड़ा करेगी। इस आंदोलन का असली मकसद भारत सरकार को दुनिया के सामने एक ‘अत्याचारी शासन’ के रूप में पेश करना था, जो मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है। गुलफिशा के शब्दों में, अपूर्वानंद का कहना था कि ‘यह तभी संभव होगा, जब इन प्रदर्शनों की आड़ में दंगे भड़काए जाएँगे।’

तरुण की लिंचिंग को ‘दो परिवारों का झगड़ा’ बताकर झाड़ा पल्ला: अपूर्वानंद का सफेद झूठ

जब बात मुसलमानों को ‘पीड़ित’ (Victim) दिखाने की आती है, तो ये वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोग झूठ का जाल बुनने से पीछे नहीं हटते, भले ही असली शिकार हिंदू ही क्यों न हों। ‘द वायर’ और अपूर्वानंद ने तरुण की मॉब लिंचिंग के मामले में भी यही खेल खेला है। उन्होंने एक हिंदू युवक की बेरहमी से हुई हत्या को महज़ दो पड़ोसी परिवारों के बीच का ‘मामूली झगड़ा’ बताकर हल्का कर दिया।

अपूर्वानंद लिखते हैं, “भारत के बाहर बैठे दोस्त यह सब सुनकर दंग रह जाते हैं। वे देखते हैं कि दो परिवारों के बीच झगड़ा हुआ, लड़ाई हुई। एक परिवार मुस्लिम था और दूसरा हिंदू। दोनों तरफ के लोग घायल हुए, लेकिन हिंदू परिवार के एक शख्स की मौत हो गई। इसके बाद मुस्लिम परिवार के लगभग सभी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया।”

वे आगे तर्क देते हैं कि अब इस पर जाँच होगी, मुकदमा चलेगा और मुस्लिम परिवार का भी अपना पक्ष होगा क्योंकि वे भी घायल हुए थे। उनके अनुसार, दुनिया भर में चीजें इसी तरह चलती हैं। इस तरह के तर्कों के जरिए अपूर्वानंद ने एक सोची-समझी हत्या को एक साधारण विवाद का रूप देने की कोशिश की है, ताकि आरोपितों का बचाव किया जा सके।

अपूर्वानंद ने यह दावा भी किया है कि तरुण की हत्या पर स्थानीय हिंदुओं में कोई गुस्सा नहीं है और केवल ‘बाहरी लोग’ आकर माहौल खराब कर रहे हैं। हालाँकि, हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जब ऑपइंडिया (OpIndia) ने उत्तम नगर के स्थानीय हिंदुओं से बात की, तो उन्होंने इस मॉब लिंचिंग को लेकर अपना भारी आक्रोश व्यक्त किया। हिंदू पड़ोसियों ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि तरुण पर हुआ यह हमला कोई अचानक हुआ झगड़ा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश (Pre-planned) थी।

‘द वायर’ के संबंधित लेख से लिया गया अंश

इससे पहले कि हम एक सोची-समझी ‘मॉब लिंचिंग’ को ‘स्थानीय झगड़ा’ बताकर उस पर पर्दा डालने वाली इस कोशिश पर कुछ कहें, तरुण कुमार हत्याकांड के असली तथ्यों को समझ लेना जरूरी है।

बुधवार, 4 मार्च को दिल्ली के उत्तम नगर में होली के जश्न के दौरान, 26 साल के तरुण कुमार की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। यह पूरी हिंसा सिर्फ इसलिए शुरू हुई क्योंकि होली के गुब्बारे का रंगीन पानी गलती से किसी पर गिर गया था। यह घटना दक्षिण-पश्चिम दिल्ली की जेजे कॉलोनी इलाके में त्योहार के दिन हुई।

पुलिस और परिवार के बयानों के अनुसार, तरुण के परिवार की एक 11 साल की बच्ची अपनी छत पर होली खेल रही थी। उसने नीचे खड़े अपने पिता पर पानी का गुब्बारा फेंका, जो गलती से सड़क पर गिर गया और उसका पानी पड़ोस की एक मुस्लिम परिवार की महिला पर जा गिरा। बस इसी बात पर दोनों परिवारों के बीच बहस शुरू हो गई, जिसने आगे चलकर एक खूनी शक्ल अख्तियार कर ली।

शुरुआत में जब हिंदू परिवार ने माफी माँग ली थी, तो मामला सुलझता हुआ दिख रहा था। लेकिन उसी शाम तनाव फिर से बढ़ गया। जब तरुण होली खेलकर अपने दोस्त के साथ बाइक से घर लौट रहा था, तभी 40-50 इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने उसे घेर लिया। उसे लोहे की रॉड, ईंटों और पत्थरों से इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी जान चली गई।

अपूर्वानंद ने बड़ी चतुराई से अपने ‘विदेशी दोस्तों’ का सहारा लेकर तरुण की इस सांप्रदायिक हत्या को कम करके आँकने की कोशिश की है। वे ‘मुसलमान भी पीड़ित हैं’ वाला नैरेटिव चला रहे हैं, जो पूरी तरह से बेईमानी है। सच्चाई यह है कि हिंदू परिवार ने एक उन्मादी भीड़ के हाथों अपना बेटा खो दिया है, जबकि आरोपित मुस्लिम परिवार को सिर्फ गिरफ्तारी और अपने अवैध निर्माण पर बुलडोजर कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।

हद तो तब हो गई जब अपूर्वानंद ने अपराधी और पीड़ित की भूमिका ही पलट दी। उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि तरुण की हत्या के बाद उपजे हिंदू आक्रोश के डर से मुस्लिम परिवार ईद मनाने के लिए इलाका छोड़कर भाग रहे हैं। वे लिखते हैं, “किसी ने उन्हें नहीं रोका, किसी को यह जरूरी भी नहीं लगा। पुलिस कह सकती है कि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है, वे अपनी मर्जी से जा रहे हैं।” इस तरह उन्होंने हत्यारों के डर को ही ‘पीड़ा’ बनाकर पेश करने की कोशिश की है।

आखिर अपूर्वानंद स्थानीय हिंदुओं से क्या उम्मीद करते हैं? क्या वे चाहते हैं कि हिंदू लोग उन मुस्लिम घरों में जाकर उनका हाल-चाल पूछें? क्या वे एक निर्दोष हिंदू युवक की हत्या पर अपने गुस्से के लिए माफ़ी माँगें? या फिर वे उन आरोपितों के लिए चंदा इकट्ठा करें ताकि वे मृतक के परिवार के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ सकें? क्या वे हत्यारों के बचाव में ‘ह्यूमन चेन’ (मानव श्रृंखला) बनाएँ?

लेख में आगे बढ़ते हुए ‘द वायर’ कुछ ऐसे सवाल उठाता है, जिनका जवाब उन्हीं लोगों ने बहुत हिंसक तरीके से दिया है जिन्हें यह लेख ‘पीड़ित’ बताकर बचाने की कोशिश कर रहा है।

‘द वायर’ के लेख में पूछा गया है, “जब कोई मुस्लिम मारा जाता है, तो क्या पड़ोसी मुस्लिम हिंदू घरों को गिराने की माँग करते हैं? क्या प्रशासन आरोपित हिंदुओं के घर और दुकानें ढहा देता है? क्या मुस्लिम संगठन हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं? क्या मीडिया हिंदुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाता है? हमें इसका जवाब पता है।”

लेखक यहाँ यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि केवल हिंदुओं के मामलों में ही ऐसी सख्त कार्रवाई और आक्रोश देखने को मिलता है, जबकि वे उन अनगिनत दंगों और हिंसक प्रतिक्रियाओं को भूल जाते हैं जो कट्टरपंथी भीड़ द्वारा छोटी-छोटी बातों पर अंजाम दी जाती हैं।

उदयपुर में कन्हैयालाल और अमरावती में उमेश कोल्हे की बेरहमी से हत्या से लेकर, 2020 के दिल्ली दंगों में हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की गोली मारकर हत्या और आईबी ऑफिसर अंकित शर्मा की निर्मम हत्या तक, कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए हिंदुओं की सूची बहुत लंबी है। चाहे किशन भरवाड़ हों, कर्नाटक के प्रवीण नेट्टारू, बहराइच के राम गोपाल मिश्रा हों या अब उत्तम नगर के तरुण कुमार, इन सभी को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू थे।

कट्टरपंथी अक्सर मामूली बहानों पर हिंदुओं पर हमला करते हैं। वे पहले से ही छतों पर पत्थर और पेट्रोल बम जमा करके रखते हैं ताकि जब पुलिस आरोपितों को पकड़ने आए, तो उन पर भी हमला किया जा सके। हिंदुओं के विपरीत, वे प्रशासन द्वारा कार्रवाई किए जाने का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि खुद ही कानून हाथ में लेकर तबाही मचाना शुरू कर देते हैं।

इतना ही नहीं, कट्टरपंथी संगठनों और राजनेताओं ने लगातार मुस्लिमों को दंगे भड़काने के लिए उकसाया है। पश्चिम बंगाल में वक्फ विरोधी प्रदर्शन के दौरान हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा इसका जीता-जागता उदाहरण है कि उन्हें हमला करने के लिए किसी उकसावे की भी जरूरत नहीं होती। हमने देखा कि कैसे अमानतुल्लाह खान ने ताहिर हुसैन जैसे दंगों के आरोपितों का बचाव किया, जिसने खुद स्वीकार किया था कि उसका मकसद ‘हिंदुओं को सबक सिखाना’ था। असल में, खुद अमानतुल्लाह खान उस हिंसक भीड़ का हिस्सा थे। आज एक पूरा वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम मौजूद है जो इन दंगाइयों को न केवल बचाता है और उनका महिमामंडन करता है, बल्कि उन्हें कानूनी सहायता भी प्रदान करता है।

अपूर्वानंद या तो किसी गुफा में रह रहे हैं या उन्होंने जानबूझकर हिंदुओं के प्रति कट्टरपंथियों की बढ़ती असहिष्णुता से अपनी आँखें मूँद ली हैं, जिसके कारण उन्हें साफ दिख रही हकीकत भी नजर नहीं आती। हालाँकि, ‘द वायर’ जैसे पोर्टल से मुस्लिमों के अपराधों का दोष हिंदुओं के सिर मढ़ने की उम्मीद पहले से ही थी। इस वामपंथी पत्रिका का इतिहास रहा है कि यह हिंदू-विरोधी नैरेटिव गढ़ती है और उमर खालिद व शरजील इमाम जैसे दंगाई और राष्ट्रविरोधी तत्वों को मंच प्रदान करती है।

अपने इस प्रोपेगेंडा लेख के अंत में, अपूर्वानंद जोर देते हैं कि ‘मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाना एक अपराध है’, लेकिन उनके लिए हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलना कोई अपराध नहीं है। ‘द वायर’ के लिए कट्टरपंथियों की हिंसा पर हिंदुओं का स्वाभाविक गुस्सा तो ‘जुर्म’ है, लेकिन धार्मिक कट्टरता के कारण मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की हत्या करना सिर्फ एक ‘मामूली झगड़ा’ या ‘स्थानीय विवाद’ है। वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम का तरीका हमेशा से यही रहा है, अपराधी को पीड़ित बनाना और असली पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करना।

गोधरा कांड से तरुण हत्याकांड तक: मुस्लिमों के अपराध को हिंदुओं के सिर मढ़ने का वामपंथी खेल

पिछले साल 2025 अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के बाद, जहाँ जिहादियों ने चुन-चुनकर हिंदुओं को निशाना बनाया, उनसे कलमा पढ़वाया और उनकी धार्मिक पहचान पक्की करने के लिए उनकी शारीरिक जाँच (खतना) तक की, तब मासूम हिंदुओं की इस हत्या पर देश भर में स्वाभाविक गुस्सा था। इस गुस्से की एक बड़ी वजह यह भी थी कि मुस्लिम समुदाय इस हमले के धार्मिक पहलू को नकार रहा था और इसे इस्लाम से अलग बताने की कोशिश कर रहा था, जबकि यह पूरी तरह से मजहबी नफरत से प्रेरित हमला था। उस समय भी पूरे वामपंथी-लिबरल गिरोह ने ‘इस्लामोफोबिया’ का हौआ खड़ा कर दिया, जो हिंदुओं के नरसंहार से भी बड़ा मुद्दा बना दिया गया।

ठीक यही तरीका नवंबर 2025 में लाल किला ब्लास्ट के बाद भी देखा गया। जब एक उच्च शिक्षित मुस्लिम डॉक्टर, उमर उन नबी ने ‘काफिरों’ को मारने के लिए फिदायीन हमला किया, तो लोगों का मुस्लिमों पर भरोसा करना, उन्हें फ्लैट किराए पर देना या मुस्लिम डॉक्टरों के पास जाना कम हो गया। किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए यह डर और सावधानी स्वाभाविक थी, क्योंकि जब डॉक्टर जैसा पढ़ा-लिखा वर्ग भी खुद को बम से उड़ाने वाला जिहादी बन जाए और अपनी शिक्षा का इस्तेमाल ‘बायोटैरर‘ (जैविक हमले) की साजिश रचने के लिए करने लगे, तो समाज में असुरक्षा का भाव आना लाजिमी है।

यह कोई नया तरीका नहीं है, बल्कि 2002 के गोधरा कांड से ही चला आ रहा है। एक पूर्व-नियोजित साजिश के तहत मुस्लिम भीड़ द्वारा अयोध्या से लौट रहे 59 हिंदुओं को ट्रेन में जिंदा जला दिया गया था। लेकिन वामपंथी इकोसिस्टम ने इस मुख्य घटना को सार्वजनिक यादों से मिटा दिया और केवल उसके बाद हुई प्रतिक्रियात्मक हिंसा को ही उछाला, ताकि यह नैरेटिव बनाया जा सके कि हिंदुओं ने अचानक ‘निर्दोष’ मुस्लिमों पर हमला कर दिया था।

बीते वर्षों में, वामपंथी-कट्टरपंथी गिरोह ने सहानुभूति बटोरने और हिंदुओं को दोषी ठहराने वाले अनगिनत लेख लिखे हैं। वे इस बात पर रोते हैं कि मुस्लिम भीड़ की हिंसा, आतंकी हमलों और हिंदू मान्यताओं के अपमान के जवाब में हिंदू ‘असहिष्णु’ और हिंसक क्यों हो रहे हैं।

इसका एक उदाहरण देखिए, जब कुछ मुस्लिम पुरुषों ने पवित्र गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी की, मांसाहारी बिरयानी खाई और चबाई हुई हड्डियाँ नदी में फेंकी, तो कॉन्ग्रेस और उदारवादी गिरोह ने यह कुतर्क देते हुए उनका बचाव किया कि ‘हिंदू भी तो गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करते हैं।’ संक्षेप में, कट्टरपंथी चाहे जिहादी हमले करें, हिंदुओं की मॉब लिंचिंग करें या जानबूझकर उनकी आस्था का अपमान करें, हिंदुओं को कभी विरोध नहीं करना चाहिए। उन्हें बस कट्टरपंथियों की इस ‘असहिष्णुता’ को सहते रहना चाहिए।

अपूर्वानंद का ‘द वायर’ में लिखा यह लेख उसी पुराने वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है, जिसमें हिंदू-विरोधी हिंसा के तुरंत बाद मुस्लिम समुदाय को ‘पीड़ित’ (Victim) दिखाकर असली अपराध पर पर्दा डाल दिया जाता है।

कट्टरपंथियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले अपूर्वानंद ने अपने लेख का अंत एक सवाल से किया है, “ईद में अब बस कुछ ही दिन बचे हैं। क्या किसी भी समाज के लिए यह गौरव की बात है कि उसका पड़ोसी किसी त्योहार का इंतज़ार खुशी से नहीं बल्कि हिंसा के डर से करे? उत्तम नगर, दिल्ली और भारत के हिंदू इस बारे में क्या सोचते हैं?”

बेहतर होता यदि ‘द वायर’ और अपूर्वानंद यह सवाल मुसलमानों से पूछते कि क्या किसी समाज के लिए यह गौरव की बात है कि होली जैसे खुशी के त्योहार पर उनके पड़ोसी ने एक उन्मादी मुस्लिम भीड़ के हमले में अपना जवान बेटा खो दिया?

हमें अच्छी तरह पता है कि उत्तम नगर, दिल्ली और भारत के मुसलमान क्या सोचते हैं। लेकिन अगर वामपंथी गिरोह यह सवाल सीधे उन्हीं लोगों से पूछ ले जिनका वे अपनी पूरी ताकत लगाकर बचाव करते हैं, तो ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’, ‘शांति’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ जैसे उनके सारे भ्रम एक झटके में चकनाचूर हो जाएँगे।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी हैं। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

UP में गौशाला के नाम पर निर्मोही अखाड़े के संत से ₹28.50 लाख की ठगी, पीड़ित संत ने हासिम को 8 साल पाला था: पढ़ें- कैसे पूरी प्लानिंग के साथ गैंग ने लगाया चूना

मुजफ्फरनगर में गंगा किनारे बसा पवित्र तीर्थ स्थल शुकतीर्थ। यहाँ निर्मोही अखाड़ा के आश्रम में रहने वाले संत विष्णुदास (उर्फ बच्चू सिंह) पिछले कई दशकों से गोवंश की सेवा कर रहे थे। उनके चेहरे पर अब उदासी छाई है। आश्रम के पीछे गौशाला में मवेशी चरते हैं, लेकिन संत जी का सपना था एक बड़ी गौशाला बनाने का, जो अब चूर-चूर हो गया है।

संत विष्णुदास ने हाथरस जिले की ग्राम बघना में अपनी पैतृक जमीन बेचकर अच्छी रकम जुटाई थी। उसी रकम से गौशाला का विस्तार करना चाहते थे। लेकिन 8 साल से आश्रम में रहकर गोवंश सेवा करने वाले हासिम ने उनके भरोसे का फायदा उठाकर एक अंतरराज्यीय गिरोह के साथ मिलकर 28 लाख 50 हजार रुपए की ठगी कर ली। इस मामले की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

कैसे की गई संत विष्णुदास के साथ ठगी, पढ़ें हर एक जानकारी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये ठगी की कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि लंबे समय तक की गई तैयारी का नतीजा है। पुलिस पूछताछ में खुलासा हुआ कि हासिम पिछले 8 साल से आश्रम में रह रहा था। संत विष्णुदास ने हाथरस में जमीन बेचने के बाद गौशाला बनाने की बात की, तो हासिम ने तुरंत योजना बनाई। हासिम ही इस गिरोह का सरगना है। उसने भोकरहेडी के अपने दोस्तों को शामिल किया।

इसके बाद इस गिरोह ने सबसे पहले फर्जी मालिक खड़ा किया- नजीर पुत्र मिर्जामान खान, निवासी ग्राम सीकरी, तहसील जानसठ। लेकिन असल में नजीर नाम का कोई व्यक्ति सीकरी में नहीं था। उसका फर्जी आधार कार्ड हरिद्वार के अब्दुल कादिर पुत्र महबूब हसन (किशनपुर जमालपुर, थाना भगवानपुर, हरिद्वार) ने बनाया। आधार पर सुखविंदर (पुत्र सोहनवीर, गाँव गादला, थाना भोपा) का फोटो चिपका दिया गया। सुखविंदर ही नजीर बनकर संत से मिला।

दिलशाद पुत्र भोंदा और फैजाब पुत्र मुन्ना (दोनों भोकरहेडी) ने संत को मुजफ्फरनगर के ग्राम सीकरी में 40 बीघा जमीन गौशाला के लिए दिखाई। फैजाब ने ही यूकेलिप्टस वाले खेत दिखाकर कहा, “यह जमीन आपके नाम हो जाएगी।” इसके बाद 17 फरवरी 2026 को ₹25 लाख और 27 फरवरी को ₹3.50 लाख आश्रम में ही हासिम और उसके साथियों ने ले लिए। बदले में 18 फरवरी 2026 को एक फर्जी ठेकानामा नोटरी से बनवाकर दे दिया गया। इस दौरान फर्जी पटवारी रितेश ने 26 हजार रुपये लेकर ठेकानामा तैयार किया और फिर उनके सामने ही जमीन की नाप-जोख भी की, ताकि उन्हें पूरा भरोसा हो जाए।

सीकरी गाँव पहुँचने पर हुआ ठगी का खुलासा

जब संत विष्णुदास 40 बीघा जमीन की देखभाल के लिए सीकरी पहुँचे तो वहाँ मौराद नाम का व्यक्ति पानी चला रहा था। उसने बताया, “हमने यह जमीन 15 दिन पहले खरीदकर बैनामा करवा लिया है। यहाँ नजीर नाम का कोई नहीं रहता।” जिसके बाद संत विष्णुदास के पैरों तले जमीन खिसक गई और फिर उन्हें अपने साथ हुई ठगी का अहसास हुआ।

FIR की कॉपी

पुलिस ने सिर्फ 24 घंटे में कर दिया गिरोह का भंडाफोड़

संत विष्णुदास ने बुधवार (18 मार्च 2026) को भोपा थाने पहुँचकर अपनी तहरीर दर्ज कराई। थाना प्रभारी जसवीर सिंह ने मामले की गंभीरता समझते हुए तुरंत एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित कर दी। इस टीम ने सबसे पहले एफआईआर में दिए गए तीन अहम मोबाइल नंबर्स, जिसमें हासिम का 86792XXXXX, फर्जी नजीर का 74090XXXXX और फर्जी पटवारी रितेश का 70553XXXXX की सीडीआर और टावर लोकेशन निकाली। तकनीकी विश्लेषण में पता चला कि सभी आरोपी पिछले 48 घंटे से लगातार एक-दूसरे से संपर्क में थे और उनकी लोकेशन तुगलकपुर रोड के एक सुनसान मुर्गा फार्म की ओर इशारा कर रही थी। टीम ने बिना देरी किए रात में ही सर्विलांस शुरू कर दिया।

गुरुवार (19 मार्च 2026) की सुबह ठीक 5 बजे पुलिस की टीम ने मुर्गा फार्म को चारों तरफ से घेर लिया। अचानक छापेमारी शुरू हो गई, जिसकी वजह से सभी आरोपित सोते ही रह गए और उन्हें भागने का कोई मौका नहीं मिला। इस छापेमारी में पुलिस ने मास्टरमाइंड हासिम के साथ ही प्रवीन, दिलशाद, सुखविंदर, फैजाब, रवीश और अब्दुल कादिर को गिरफ्तार कर लिया।

छापे के दौरान पुलिस को 22 लाख रुपये नकद, दो फर्जी आधार कार्ड (नजीर और रितेश के नाम), कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर, नोटरी के कागजात, फर्जी दस्तावेजों के प्रिंटआउट और ठगी में इस्तेमाल होने वाले सिम कार्ड बरामद हुए। इस मामले में एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर इसका खुलासा किया।

थाना प्रभारी जसवीर सिंह ने बताया कि पूछताछ जारी है और शेष रकम की बरामदगी के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। मात्र 24 घंटे में इस अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश न सिर्फ संत विष्णुदास के लिए न्याय है, बल्कि ऐसी ठगी की भविष्य में रोकथाम का भी संदेश है।

पूरे गिरोह के बारे में जान लीजिए, जो हुए हैं गिरफ्तार

हासिम पुत्र माँगा (नई बस्ती भोकरहेडी): सरगना, 8 साल आश्रम में घुसा।
प्रवीन पुत्र भंवर सिंह (कलालान भोकरहेडी): एमए डबल, सिविल सर्विस तैयारी, प्लानिंग।
दिलशाद पुत्र भोंदा (भोकरहेडी): जमीन दिखाने वाला।
सुखविंदर पुत्र सोहनवीर (गादला): फर्जी नजीर, अपना फोटो आधार पर।
फैजाब पुत्र इस्माइल उर्फ मुन्ना(भोकरहेडी): जमीन दिखाने और साथी।
रवीश पुत्र सुभाष (भोकरहेडी): फर्जी पटवारी रितेश (सारसवा), नपाई की।
अब्दुल कादिर पुत्र महबूब हसन (किशनपुर जमालपुर, हरिद्वार): फर्जी आधार बनाने वाला।

शशि थरूर ने कूटनीति के मोर्चे पर सोनिया गाँधी को दिखाया आईना, ईरान युद्ध पर चुप्पी और संयम को बताया ताकत: कहा- ये कायरता नहीं, पढ़ें- इंटरव्यू की अहम बातें

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव को लेकर जहाँ कॉन्ग्रेस लगातार केंद्र सरकार पर ‘चुप्पी’ साधने का आरोप लगा रही है, वहीं कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपनी ही पार्टी की लाइन से अलग रुख अपनाते हुए मोदी सरकार की नीति का समर्थन किया है। थरूर ने इसे ‘जिम्मेदार कूटनीति’ करार देते हुए कहा कि ऐसे समय में ‘संयम’ ही सबसे बड़ी ताकत होती है, न कि कमजोरी।

संयम को बताया ताकत, सरकार की नीति का समर्थन

न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में थरूर ने कहा कि अगर वह किसी कॉन्ग्रेस सरकार को सलाह देते, तो भी यही कहते कि इस समय संयम बरतना चाहिए। उन्होंने साफ कहा, “अगर मैं कॉन्ग्रेस सरकार को सलाह दे रहा होता, तो मेरी सलाह होती कि इस समय संयम बरतें। संयम का मतलब आत्मसमर्पण नहीं है, यह एक ताकत है, यह दिखाने का एक तरीका है कि हम अपने हितों को जानते हैं और सर्वप्रथम उनकी रक्षा के लिए कार्य करेंगे।”

थरूर के अनुसार, भारत की चुप्पी को युद्ध के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति है। इससे भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक बातचीत के रास्ते खुले रख सकता है।

उन्होंने कहा कि कई बार चुप रहना भी एक प्रभावी रणनीति होती है, जो अनावश्यक टकराव से बचाते हुए शांति की दिशा में आगे बढ़ने का मौका देती है। आलोचकों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि नैतिक आदर्शवाद और वास्तविक कूटनीतिक जरूरतों के बीच फर्क समझना जरूरी है।

सोनिया गाँधी ने उठाए थे सरकार पर सवाल

इससे पहले सोनिया गाँधी ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी ‘तटस्थता’ नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारी से पीछे हटना’ है। उन्होंने अपने लेख में यह भी कहा था कि भारत और ईरान के संबंध ‘सभ्यतागत और रणनीतिक’ रहे हैं और ऐसे समय में चुप रहना उचित नहीं है।

सोनिया ने लिखा था, “भारत सरकार ने इस हत्या या ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा करने से परहेज किया है। जब किसी विदेशी नेता की हत्या पर हमारे देश की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में कोई स्पष्ट समर्थन नहीं दिखता और निष्पक्षता छोड़ दी जाती है, तो यह हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।”

‘कंडेमनेशन और कंडोलेंस में फर्क’ : थरूर

थरूर ने सोनिया गाँधी के इस रुख से अलग हटते हुए कहा कि निंदा और संवेदना में फर्क होता है। उनके मुताबिक हर घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं होता, बल्कि कई बार संतुलित और सोच-समझकर दिया गया संदेश ही देश के हित में होता है।

कॉन्ग्रेस सांसद ने कहा कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है। देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से पूरा होता है और करीब 90 लाख भारतीय वहाँ रोजगार से जुड़े हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के खिलाफ खुलकर कड़ा रुख अपनाना इन महत्वपूर्ण संबंधों को नुकसान पहुँचा सकता है।

थरूर ने अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व, खासकर डोनाल्ड ट्रंप  अक्सर अपने हितों के खिलाफ जाने वाले देशों के प्रति सख्त रुख अपनाते हैं, इसलिए भारत के लिए रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और चीन के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना जरूरी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विदेश नीति कोई नैतिक भाषण देने का मंच नहीं होती, बल्कि यह वह क्षेत्र है जहाँ आदर्शों और शक्ति के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बिना पर्याप्त प्रभाव के किसी बड़ी ताकत की खुलकर आलोचना करना व्यावहारिक नहीं होता।

नागपुर दंगा केस में इंडियन एक्सप्रेस ने किया फिर वही काम, जिसके लिए वो है बदनाम: पीड़ित हिंदुओं पर एक्शन न लेने पर सरकार को घेरा, दंगाई मुस्लिमों पर कार्रवाई से इन्हें परेशानी

मार्च 2026 महीने में साल 2025 के नागपुर में हिंदुओं के खिलाफ हुए दंगों के एक साल पूरे हो गए। इन दंगों में हिंदुओं को निशाना बनाया गया था। दरअसल, हिंदू कार्यकर्ताओं ने छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) में अत्याचारी मुगल शासक औरंगजेब की कब्र हटाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे, उस समय अफवाह फैली कि हिंदुओं ने कुरान का अपमान किया है।

बस, इसी बात पर भड़के नागपुर के मुस्लिमों ने हिंदुओं के खिलाफ जमकर हिंसा की। उन्होंने गलियों में भीड़ की शक्ल में घुसकर हिंसा की और बाकायदा हिंदुओं की गाड़ियों की पहचान कर उन्हें आग के हवाले कर दिया। हिंदुओं के घरों में पत्थरबाजी भी की। इन घटनाओं में पुलिसकर्मियों, अधिकारियों समेत 55 लोग घायल हो गए, तो 1 व्यक्ति की मौत भी हुई।

इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने पुलिस की मौजूदगी में भी हिंसा की थी। महिला पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया गया, उनके कपड़े फाड़े गए और यहाँ तक की रेप की भी कोशिश की गई। नागपुर के इस दंगे के मामले में 13 एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें से 12 केसों में चार्जशीट भी दाखिल कर दी गई है। हालाँकि एक FIR जिसमें विहिप और बजरंग दल के नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज था, वो अभी सरकार की मंजूरी न मिल पाने की वजह से पेंडिंग है। हालाँकि जाँच अब भी चल रही है।

लेकिन यही वो मामला है, जो इंडियन एक्सप्रेस को पच नहीं रहा। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने गुरुवार (19 मार्च 2026) को इस मामले में खबर छापी, जिसका शीर्षक था- ‘नागपुर दंगे के एक साल बाद: सभी FIR में चार्जशीट दाखिल सिवाय एक जिसमें VHP और बजरंग दल के सदस्य नामजद’। देखा जाए तो ये सिर्फ एक खबर है, लेकिन जोर देकर सोचा जाए तो ये रिपोर्टर इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की उस हताशा का परिणाम है, जिसमें वो चाहती है कि एक लोकतांत्रिक देश में ‘पीड़ितों’ के खिलाफ ही एक्शन लेने में देर न की जाए, क्योंकि वो बहुसंख्यक है। जबकि ये सर्वविदित है कि नागपुर दंगों में कौन निशाना बने थे और उन्हें निशाना बनाया किसने था।

इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

रिपोर्ट में लिखा गया कि प्रदर्शन के दौरान औरंगजेब की पुतली और उसकी कब्र का मॉडल जलाया गया। लेकिन मुस्लिम समुदाय ने दावा किया कि कुरान की आयतें वाली चादर भी जलाई गई। रिपोर्ट में आगे कहा गया कि बाद में लगभग 60 लोगों की भीड़ गणेशपेठ पुलिस स्टेशन के बाहर इकट्ठी हुई और वीएचपी तथा बजरंग दल के सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की। इसके बाद इन दोनों संगठनों के पदाधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले नियमों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।

रिपोर्ट में पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया गया कि पहली शिकायत में 9 लोगों के नाम थे जिनमें नागपुर के 8 पदाधिकारी और महाराष्ट्र-गोवा के वीएचपी क्षेत्रीय प्रमुख गोविंद शेंडे शामिल थे। बाद में एक और नाम जोड़ा गया। वे कोर्ट में पेश हुए और जमानत पर छूट गए। रिपोर्ट में लिखा कि उसी शाम वीएचपी और बजरंग दल के प्रदर्शन के जवाब में हिंसा भड़क उठी।

इंडियन एक्सप्रेस मेनस्ट्रीम मीडिया की उन्हीं कोशिशों में से एक है, जिसमें जिहादियों के कारनामों को तो छिपाया जाता है, लेकिन हिंदुओं के छोटे से विरोध को भी आतंक और हिंसा को फैलाने वाला बताया जाता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या हिंदू किसी परेशानी के होने पर विरोध भी न दर्ज कराएँ? वो भी सिर्फ इसलिए, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी भड़क उठेंगे? क्या भारत में बोलने की आजादी सिर्फ एक समुदाय को ही मिली हुई है?

चार्जशीट ने सच्चाई कर दी उजागर

रिपोर्ट में एफआईआर नंबर 0115/2025 का जिक्र करते हुए बताया गया कि 500 से 600 लोगों की भीड़ ने दंगा, आगजनी, संपत्ति को नुकसान और पुलिस पर हमला किया जिसमें 51 लोगों पर आरोप लगे। जाँच पूरी होने के बाद 36 और नाम जोड़े गए।

जून में 87 लोगों के खिलाफ 1900 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की गई जिनमें सब मुस्लिम समुदाय के सदस्य थे। उनमें से 13 अभी फरार हैं जबकि बाकी सभी जमानत पर बाहर हैं। इनमें से 11 नाबालिग हैं।

चार्जशीट में डिजिटल, फॉरेंसिक और प्रत्यक्षदर्शी सबूतों के आधार पर इस हमले को पुलिसकर्मियों और सार्वजनिक संपत्ति पर ‘ पूरी तैयारी के साथ सुनियोजित हमला’ बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार फॉरेंसिक टीम को मौके पर पत्थरों से भरी ट्रॉली मिली जिससे साफ है कि पथराव पहले से तय था। हमलावरों के पास तलवारें, खंजर, लोहे की छड़ें और पेट्रोल बम थे।

ये चौंकाने वाले खुलासे खुद बता रहे हैं कि अपराधी हिंदू समुदाय के खिलाफ साजिश रचकर समय का इंतजार कर रहे थे और उन्होंने पुलिस को भी नहीं बख्शा। इसमें साफ तौर पर सावधानीपूर्वक प्लानिंग और मजबूत इरादा था।

रिपोर्ट में लिखा गया कि जाँचकर्ताओं ने कहा कि हिंसा पूर्व नियोजित थी लेकिन अफवाह ने स्थिति को और बिगाड़ दिया जबकि दिन में हुए वीएचपी-बजरंग दल के प्रदर्शन ने इसे ट्रिगर कर दिया। इससे पहले की बात दोहराई गई कि कोई भी बहाना इनके लिए काफी है और हिंदू ही ऐसे निशाने बनते हैं जिन पर दोनों तरफ से आरोप लगाए जाते हैं और हिंसा भी की जाती है।

चार्जशीट में ‘कलमा की चादर’ का कोई जिक्र नहीं

रिपोर्ट में कहा गया कि चार्जशीट में 179 गवाहों की सूची है जिनमें पुलिसकर्मी और अन्य अधिकारी शामिल हैं। गवाहों ने वीएचपी-बजरंग दल के प्रदर्शन के दौरान हरी चादर जलाए जाने की बात कही लेकिन चार्जशीट में ये बात कहीं नहीं है कि ये कलमा लिखी चादर थी, जिसका दावा इस्लामी कट्टरपंथियों ने किया और उसकी आड़ में पूरे नागपुर को हिंसा की आग में झोंक दिया गया।

यह लाहौर की उस घटना की याद दिलाता है जिसमें एक महिला को अपने कपड़ों पर अरबी में ‘हलवा’ लिखा होने के कारण जान बचाने के लिए छिपना पड़ा क्योंकि लोगों ने उसे कुरान की आयत समझकर ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए। यह ऐसे कट्टरपंथियों को खुश करने का नतीजा बताता है लेकिन भारत के वामपंथी-लिबरल पर इसका उल्टा असर पड़ता है।

चार्जशीट में पुलिसकर्मियों और हिंदुओं को दी गई धमकियों और नफरत भरे नारों का भी जिक्र है। रिपोर्ट में जोर दिया गया कि आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता की 57 धाराओं के अलावा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम 1908, हथियार अधिनियम 1959 और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान रोकथाम अधिनियम 1984 के तहत आरोप लगाए गए। इनमें मुख्य आरोपित फहीम शमीम खान का नाम भी था। वह चार महीने जेल में रहा फिर जमानत पर छूट गया।

उसके बाद उसके घर को अवैध निर्माण बताकर तोड़ दिया गया। इस साल जनवरी में उसकी बीवी आलीशा उसी नगर निगम की पार्षद चुनी गई जिसने उनका घर तोड़ा था। फरवरी में हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने निगम को घर दोबारा बनाने या परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया।

यह देखना बहुत दिलचस्प है कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल कैसे एक खास विचारधारा वाले लोगों को बचाने के लिए किया जाता है जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे लोगों को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बावजूद बिना वजह आलोचना का शिकार होना पड़ता है।

रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया कि अभियोजन वकीलों ने बताया कि 13 फरार आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट अभी लंबित है और वह दाखिल होने के बाद कोर्ट आरोप तय कर मुकदमा शुरू करेगा। जैसा उम्मीद था बचाव पक्ष के वकील आदिल शेख ने कहा कि चार्जशीट जल्दबाजी में दाखिल की गई है और दावा किया कि सूची में नाम वाले लोग असली आरोपित नहीं हैं और उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है।

हिंदू संगठनों के सदस्यों के खिलाफ FIR

रिपोर्ट में कहा गया कि एफआईआर नंबर 0114/2025 कुरान की आयतों वाली हरी चादर जलाए जाने से संबंधित थी। अधिकारियों ने बताया कि जून में इसकी चार्जशीट तैयार हो चुकी थी लेकिन सरकार की मंजूरी न मिलने से अभी दाखिल नहीं की गई। चार्जशीट में धारा 295ए और 153ए का हवाला दिया गया है जिनके लिए कोर्ट में पेश करने से पहले मंजूरी जरूरी है।

धारा 295ए जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और धारा 153ए धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने से संबंधित है। जोन-3 के डीसीपी राहुल मदने ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि राज्य सरकार ने कुछ बदलाव सुझाए थे जिन्हें लागू कर दस्तावेज दोबारा मंजूरी के लिए भेजे गए हैं।

उन्होंने कहा कि कलमा की चादर जलाए जाने के आरोप की जाँच हुई और आरोपितों पर संबंधित धाराओं में कार्रवाई की गई। नागपुर पुलिस ने दंगों से जुड़ी 11 और प्राथमिकी दर्ज की जिनमें से चार साइबर सेल से आईं। हर मामले में चार्जशीट तैयार कर ली गई है जिसमें मुख्य आरोपित फहीम खान पर राजद्रोह जैसी धाराएँ भी लगी है।

23 मार्च 2026 को इरफान अंसारी 38 वर्षीय जो दंगाइयों और पुलिस के बीच फंसकर घायल हुआ था अपनी चोटों के कारण मर गया। 11 प्राथमिकियों में से एक उसकी मौत से जुड़ी थी जिसमें करीब 40 लोगों के नाम हैं जिनमें एक हिंदू समुदाय का व्यक्ति भी बताया गया। एक वकील ने बताया कि इस मामले के कई आरोपित एफआईआर नंबर 0115/2025 के ही हैं।

हमेशा विक्टिव कार्ड खेलने की कला

रिपोर्ट में गाँधी गेट के पास मोहम्मद इबाद के घर के सामने बड़ी काली चादर डालने का जिक्र किया गया। पीछे जहाँ दीवार थी वहाँ नगर निगम ने दंगों के बाद हिस्सा तोड़ दिया। उनके 24 सदस्यीय परिवार में 96 वर्षीय अब्बू और 86 वर्षीय अम्मी समेत सभी अंदर रह रहे हैं। घर न पूरी तरह बना है न टूटा है बल्कि बीच में अटका हुआ है।

बंबई हाईकोर्ट ने बाद में कहा कि घर को तोड़ना कानून के मुताबिक नहीं था और नागपुर नगर निगम को परिवार को मुआवजा देने को कहा।

रिपोर्ट ने आरोप लगाया कि एक साल बाद भी इबाद कहते हैं कि राहत नहीं मिली। उन्होंने कहा कि नुकसान का आकलन नहीं हुआ। हमने हलफनामा दिया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। करीब एक साल हो गया लेकिन कोई राहत नहीं। वहीं निगम ने कहा कि मामला अदालत में लंबित है।

प्रशासन का जवाब है कि लोकतंत्र में बहस का विषय हो सकता है लेकिन यह साफ है कि मुस्लिम कट्टरपंथी आक्रामक थे और हिंदू उनके नफरत के शिकार बने।

हिंदुओं में असुरक्षा की भावना

रिपोर्ट ने आखिर में असली पीड़ितों की पीड़ा बताने की कोशिश की ताकि निष्पक्ष लगे। रिपोर्ट में लिखा कि सिर्फ एक गली दूर शिरके गली में रहने वाले लोग कहते हैं कि उस रात की सबसे बुरी हिंसा यहीं हुई। एक 40 वर्षीय केयरटेकर जिसने नाम नहीं बताने की शर्त रखी खिड़की से देख रही थी कि भीड़ गली में घुसी और उसकी स्कूटर में आग लगा दी।

उसने बताया कि स्कूटर पर गणेश जी का स्टिकर लगा था। भीड़ में किसी ने चिल्लाया कि यह हिंदू की है इसलिए जला दो। वह गली कैंसर की मरीज है और अकेली माँ है जिसने हाल ही में पिता को खोया। उसने कहा कि इस घटना से उसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हुआ।

दूसरे व्यक्ति सुनील पेश्ने ने बताया कि उनका घर तोड़ा गया और कार बर्बाद कर दी गई। उन्होंने कहा कि हमने दंगों के दौरान छह पुलिसकर्मियों को शरण दी थी। भीड़ को गुस्सा आया और फिर हमारे घर पर हमला किया। वे गली में सीसीटीवी लगवाने का इंतजार कर रहे हैं और बोले कि अगर फिर ऐसा हुआ तो कम से कम जिम्मेदारों को पहचाना जा सकेगा।

हिंदू पीड़ितों और हमलावर इस्लामी कट्टरपंथियों को एक ही तराजू पर तोलने की कोशिश

इंडियन एक्सप्रेस की ये रिपोर्ट इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसक गतिविधियों को हिंदुओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और नारेबाजी के बराबर बताने की कोशिश है। एक तरफ तो इस्लामी कट्टरपंथी प्रदर्शन करने वाले हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर उतर आए, वो भी शंभाजी नगर से इतनी दूर, उस पर भी अब इंडियन एक्सप्रेस ये चाहता है कि इस्लामी कट्टरपंथियों की तरह उन हिंदुओंं को ट्रीट किया जाए, जिन्होंने शांतिपूर्वक प्रदर्शन किया।

इसके अलावा एक समुदाय को अपने मजहबी भावनाओं के नाम पर तबाही मचाने की छूट है जबकि दूसरे समुदाय को अपनी पीड़ा व्यक्त करने का भी अधिकार नहीं है और अगर वह ऐसा करता है तो उसे बदनाम किया जाता है। कट्टरपंथियों ने हमले के लिए पेट्रोल बम पहले से जमा कर रखे थे। हिंदू घरों और गाड़ियों को खास तौर पर निशाना बनाया गया। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस हिंदू संगठनों से जुड़ी प्राथमिकी में चार्जशीट न आने पर नाराज है।

यह एक दोहराया पैटर्न है जिसमें पहले ऐसे बेईमान लोग मुस्लिम इलाके का नाम लेकर विक्टिम कार्ड खेलते हैं और फिर घटना की सच्चाई सामने आने पर हिंदुओं से तुलना करके प्रदर्शन शुरू किया जाता है। फिर इन्हें (हिंदुओं को) ही राक्षस बताया जाता है और सरकार के साथ ही अधिकारियों को दोष दिया जाता है कि उन्होंने हिंदुओं को अपराधी नहीं माना या नरमी बरती। इंडियन एक्सप्रेस की ये रिपोर्ट भी उसी पैटर्न का एक बेशर्म नमूना भर है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

खाने को आटा चावल नहीं, फिर भी ज्यादा ‘खुश’ है पाकिस्तान: समझिए- कैसे हैप्पीनेस इंडेक्स जैसे प्रोपेगेंडा के नाम पर भारत को नीचा दिखाने में जुटे रहे हैं पश्चिमी देश

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 जारी कर दी गई है, जिसमें नॉर्डिक देशों को दुनिया का सबसे खुशहाल क्षेत्र बताया गया है। फिनलैंड, आइसलैंड और डेनमार्क ने शीर्ष तीन स्थान हासिल किए हैं।

यह सर्वे हर साल संयुक्त राष्ट्र (UN) के इंटरनेशनल डे ऑफ हैप्पीनेस के आसपास जारी किया जाता है और इसमें 140 से अधिक देशों का मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें लोगों द्वारा अपनी जिंदगी के अनुभवों के आधार पर रेटिंग ली जाती है। रोचक बात यह है कि पाकिस्तान 109वें स्थान पर है, जबकि भारत 118वें स्थान पर है।

खास बात यह है कि इस्लामिक रिपब्लिक, जो एक कमजोर होती अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है और जहाँ घटती हुई आटे की फसल की लंबी कतारों ने हिंसा, मौत और चोटों को जन्म दिया है।

जहाँ कथित लोकतंत्र को सख्ती से दबाया गया है और एक पूर्व प्रधानमंत्री जेल में है, जहाँ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और बलूच विद्रोहियों के लगातार आतंकवादी हमले हो रहे हैं और पड़ोसियों के साथ सीमा पर लगातार झड़पें हो रही हैं, उसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से ज्यादा ‘खुशहाल’ बताया गया है। मध्य पूर्व के तनावों के कारण उनकी स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।

यह वही देश है जिसने भारत के हाथों बार-बार युद्धों और क्रिकेट के मैदानों पर हार का स्वाद चखा है और वैश्विक अपमान सहा है। इसलिए यह रैंकिंग तभी सही मानी जा सकती है जब पाकिस्तानी अपनी गंभीर वास्तविकता से अलग रहकर किसी काल्पनिक दुनिया में जी रहे हों, जहाँ सब कुछ सही और परफेक्ट हो या फिर रिपोर्ट में ही कोई गलती हो।

बेशक, उनकी खुली अवास्तविकता और बेबाकी, जहाँ वे सोशल मीडिया पर युद्ध जीतने का दावा करते हैं और इन दावों का आनंद लेते हैं जबकि असलियत इसके बिल्कुल अलग है, उसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इस तरह के सर्वेक्षणों में इस्तेमाल की गई पद्धतियों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर संदेह पैदा होता है।

बिगड़ी हुई कार्यप्रणाली की कला

WHR की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ‘कैन्ट्रिल लैडर’ नाम का एक ही सवाल, जो जीवन के मूल्यांकन से जुड़ा होता है, उनकी खुशी की रेटिंग का आधार है। यह स्कोर पाँच बातों के मेल से बनता है, जिनमें वेल-बीइंग, सब्जेक्टिव वेल-बीइंग, जीवन का मूल्यांकन और संतुष्टि, साथ ही व्यक्ति की भावनाओं और मानसिक स्थिति से जुड़ा असर शामिल होता है।

इसमें बताया गया है कि 2005 से गैलप वर्ल्ड पोल यह डेटा इकट्ठा कर रहा है और इसे इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट तय करते हैं। प्रकाशन में कहा गया है, ‘गैलप वर्ल्ड पोल पूरे साल डेटा जुटाता है, जिसमें धार्मिक अवसर, मौसम, महामारी, युद्ध और अन्य स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है।’

इसके बाद जब गणना की प्रक्रिया बताई गई, तो सैंपल साइज पर खास ध्यान देने की जरूरत सामने आती है। इसमें कहा गया, “हर साल सर्वे में शामिल लोगों और देशों की संख्या बदलती रहती है, लेकिन आम तौर पर 140 देशों और क्षेत्रों के 1 लाख से ज्यादा लोग इसमें हिस्सा लेते हैं। ज्यादातर देशों में हर साल करीब 1000 लोगों से फोन या आमने-सामने बात की जाती है।”

इतने छोटे समूह से निकला नतीजा, खासकर भारत जैसे देश में, जिसकी आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा है, इसकी सच्चाई पर सवाल खड़े करता है। यह 140 करोड़ से ज्यादा लोगों की आवाज या हकीकत को कैसे दिखा सकता है और क्या यह बात दूसरे देशों पर भी लागू नहीं होती? भारत में होने वाले स्थानीय सर्वे इससे कहीं ज्यादा लोगों को शामिल करते हैं, ताकि नतीजों की विश्वसनीयता बनी रहे।

वेबसाइट में यह भी कहा गया, “हर देश के औसत जीवन मूल्यांकन को ज्यादा सटीक बनाने के लिए हम पिछले तीन सालों के जवाबों को जोड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2025 की रैंकिंग 2022 से 2024 के डेटा पर आधारित है। कम से कम 3000 लोगों का सैंपल लेने से रैंडम गलती कम होती है और उन सालों में भी देशों को रैंकिंग में रखा जा सकता है, जब सर्वे नहीं हुआ हो।”

हालाँकि, ये दावे भी कमजोर लगते हैं क्योंकि जिन लोगों से बात की जाती है, उनकी संख्या सीमित होती है। इसके अलावा, हर किसी से आमने-सामने बात नहीं होती, कई जवाब फोन पर लिए जाते हैं, जिससे यह तय करना मुश्किल होता है कि जवाब देने वाला कौन है, उसने सवाल को ठीक से समझा या नहीं और उसके आसपास का माहौल क्या था।

जबकि ये सभी बातें ऐसे सर्वे में अहम होती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिर्फ राय पर आधारित सर्वे उन चीजों को कैसे सही तरीके से माप सकता है, जिनके लिए गहरी गणना और विस्तृत आंकड़ों की जरूरत होती है?

WHR के मुताबिक, कुछ देश छह आधारों पर दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जिनमें “संकट में सहारा देने वाला व्यक्ति, प्रति व्यक्ति GDP, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, जीवन के फैसले लेने की आजादी, उदारता और भ्रष्टाचार से मुक्ति” शामिल हैं। साफ है कि इन क्षेत्रों में भारत, पाकिस्तान से काफी आगे है, भले ही इन अमूर्त सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाए।

भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, अमेरिका और अन्य देशों से आर्थिक मदद पर निर्भर रहा है। इस्लामाबाद पर उसकी भ्रष्ट सेना का नियंत्रण है।

चाहे सीधे तौर पर या फिर ऐसे राजनीतिक कठपुतलियों के जरिए, जिनका मकसद सिर्फ सत्ता में बने रहना और अपनी निजी संपत्ति बढ़ाना है, जबकि नई दिल्ली एक मजबूत लोकतंत्र है। दोनों समाज पूरी तरह से अलग हैं।

भारत एक हद तक परंपरावादी है, जबकि उसका पड़ोसी सख्त इस्लामी विचारधारा से संचालित होता है, जो जीवन के हर फैसले को तय करती है और इसका विरोध करने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

व्यक्तिगत फैसले लेने की आजादी वहाँ मुख्य रूप से ऊँचे वर्ग तक सीमित है, जैसे देश के बाकी संसाधन। पाकिस्तान के नागरिकों का जटिल बीमारियों के इलाज के लिए भारत आना, उनके खराब स्वास्थ्य तंत्र की सच्चाई को दिखाता है।

जाहिर है कि ऐसे हालात में उनकी औसत उम्र भी भारतीयों से कम ही होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब इन अहम पहलुओं में पाकिस्तान, भारत से पीछे है, तो वह ज्यादा खुशहाल कैसे हो सकता है?

इंटरनेशनल इंडेक्स क्यों एक मजाक हैं?

यह मामला सिर्फ इसी एक रिपोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि उन कई अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों से भी जुड़ा है, जो अक्सर भारत के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के लिए जाने जाते हैं। यह सही है कि देश के सामने अपनी चुनौतियाँ हैं, जिनसे उसे निपटना है, लेकिन ऐसे पक्षपाती सर्वे सालों से भारत की उपलब्धियों और सुधारों को नजरअंदाज करते हुए उसे दुनिया के कई कमजोर देशों से भी नीचे दिखाते रहे हैं।

सरकार ने 15 अक्टूबर 2022 को इसी बात को उठाया था, जब उसने ग्लोबल हंगर रिपोर्ट 2022 को खारिज कर दिया था, जिसमें भारत को श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश के बाद रखा गया था। सरकार ने इस रिपोर्ट पर आरोप लगाया था कि इसमें गंभीर पद्धतिगत खामियाँ हैं और भूख के आंकड़ों का गलत अनुमान लगाया गया है।

सरकार ने कहा था, “हर साल जारी होने वाला ग्लोबल हंगर इंडेक्स गलत जानकारी का उदाहरण बन गया है। यह भूख को मापने का एक गलत तरीका है और इसमें गंभीर पद्धतिगत समस्याएँ हैं। इस इंडेक्स के चार में से तीन संकेतक बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े हैं, जो पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। चौथा और सबसे अहम संकेतक, यानी कुपोषित आबादी का अनुमान, केवल 3000 लोगों के छोटे से सैंपल पर आधारित एक राय सर्वे पर टिका है।”

बयान के अनुसार, कोविड महामारी के दौरान लोगों को खाद्य सुरक्षा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को इस रिपोर्ट ने जानबूझकर नजरअंदाज किया, जिससे यह वास्तविकता से कटी हुई नजर आती है।

सरकार ने आगे कहा, “एकतरफा नजरिए के कारण यह रिपोर्ट भारत की रैंकिंग को घटा देती है, क्योंकि इसमें भारत की कुपोषित आबादी का अनुमान 16.3% बताया गया है। खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का यह आंकड़ा फूड इनसिक्योरिटी एक्सपीरियंस स्केल सर्वे मॉड्यूल पर आधारित है, जिसे गैलप वर्ल्ड पोल के जरिए किया जाता है। यह 8 सवालों पर आधारित एक राय सर्वे है, जिसमें सिर्फ 3000 लोगों का सैंपल लिया जाता है।”

पक्षपाती विश्लेषक और उनकी संदिग्ध रिपोर्ट

अमेरिकी समाजशास्त्री साल्वाटोर बाबोन्स ने भी पिछले साल अपने एक शोध पत्र में इस विषय की पड़ताल की थी, जिसमें उन्होंने बताया कि इन नतीजों में विशेषज्ञों की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद बड़ी भूमिका निभाती है।

उन्होंने लिखा, “इसका साफ उदाहरण वेरायटीज ऑफ डेमोक्रेसी (V-Dem) इंस्टीट्यूट द्वारा प्रकाशित भारतीय लोकतंत्र के आकलन में देखा जा सकता है। V-Dem की रेटिंग्स, जो पहली बार 2017 में आई थीं, बहुत तेजी से दुनिया के लोकतंत्रों का मूल्यांकन करने का मुख्य आधार बन गई हैं और उन्होंने अन्य सभी स्रोतों को विश्लेषण और उद्धरण के मामले में पीछे छोड़ दिया है।”

उन्होंने आगे कहा, “हालाँकि V-Dem की रेटिंग्स एक जटिल सांख्यिकीय पद्धति पर आधारित हैं, लेकिन आखिरकार वे विशेषज्ञों के आकलन पर ही टिकी होती हैं और ऐसे कई संकेत मिलते हैं कि V-Dem के लिए राय देने वाले विशेषज्ञों ने अपनी निजी सोच को उन आकलनों में शामिल कर दिया, जो असल में निष्पक्ष होने चाहिए थे।”

यह संस्था जॉर्ज सोरोस जैसे विवादित व्यक्ति से फंडेड है और उसने अपनी पिछली लोकतंत्र रिपोर्ट में भारत को इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी बताया था, यहाँ तक कि नेपाल से भी नीचे रखा था। बाबोन्स ने बताया कि 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के पहले ही दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी हिंद जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जो 1977 में चुनाव होने तक जारी रहा। इस दौरान इनके हजारों कार्यकर्ताओं और सभी बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था।

उन्होंने कहा, “इसके बावजूद V-Dem के ऐतिहासिक डाटाबेस में उस समय भारत में सिविल सोसाइटी पर दमन को 0 से 4 के पैमाने पर 2 अंक दिए गए हैं।” उन्होंने उस विवरण का जिक्र किया जिसमें कहा गया कि सरकार केवल मामूली कानूनी दबाव (जैसे हिरासत या थोड़े समय की जेल) का इस्तेमाल करती है, ताकि सिविल सोसाइटी संगठन अपनी गतिविधियाँ या अभिव्यक्ति सीमित रखें।

समाजशास्त्री ने V-Dem के कोडबुक का हवाला देते हुए कहा कि “धार्मिक प्रेरणा से जुड़े संगठन, अगर वे सामाजिक या राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हैं, तो उन्हें सिविल सोसाइटी का हिस्सा माना जाएगा और इस आधार पर RSS और JIH दोनों इस श्रेणी में आते हैं।” उन्होंने कहा, “स्पष्ट रूप से 1976 के लिए भारत की सही रेटिंग 1 होनी चाहिए थी, जिसका मतलब है कि सरकार उन संगठनों के नेताओं और सदस्यों को गिरफ्तार कर रही थी, जो कानूनी रूप से काम कर रहे थे।”

इसके बावजूद पाँच में से केवल एक कोडर ने ऐसा आकलन दिया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला “इसका परिणाम यह होता है कि V-Dem जैसे लोकतंत्र सूचकांक अनिवार्य रूप से नैतिक निर्णयों को शामिल कर लेते हैं, क्योंकि आखिरकार निर्णय लेने वाले इंसान ही होते हैं और उनकी अपनी सोच और पक्षपात होता है और यही बात अन्य ऐसे सूचकांकों पर भी लागू होती है।”

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं और कई बार इन्हें पसंदीदा देशों या सरकारों के लिए एक प्रचार के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जिन चीजों से वे सहमत नहीं होते, उन्हें गलत और भ्रामक तरीकों से बदनाम किया जाता है या पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि जिनका वे समर्थन करते हैं, उन्हें भी ऐसे ही तरीकों से बढ़ावा दिया जाता है।

भारत के मामले में यह बात खास तौर पर 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ज्यादा देखने को मिली है। अगर बाकी सभी सूचकांकों में इस दौर में भारत को लगातार खराब दिखाया जा रहा है, तो इसी रुझान को जारी रखते हुए उसे सबसे कम खुशहाल देशों में भी दिखाया जा सकता है। आखिर डेटा और तथ्यों जैसी चीजों की परवाह ही कौन करता है?

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

म्यांमार से लौटे जिस अमेरिकी एजेंट को रूसी टिप पर NIA ने दबोचा, वो निकला CIA और MI6 का खास: जानें- कैसे जर्नलिज्म और ट्रेनिंग के डेडली कॉम्बिनेशन से मचाई कई मुल्कों में तबाही

अंतरराष्ट्रीय जासूसी की रहस्यमयी दुनिया में एक स्वतंत्र पत्रकार, ‘आजादी के सिपाही’ और पश्चिमी खुफिया एजेंसी के मोहरे के बीच का अंतर न केवल धुँधला है, बल्कि इसे जानबूझकर भ्रमित करने वाला बनाया गया है। लेकिन 13 मार्च 2026 को इस नकाब के पीछे का सच सामने आ गया। भारत की राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने कोलकाता, लखनऊ और दिल्ली के एयरपोर्ट पर एक बड़ा आतंकवाद-विरोधी अभियान चलाकर 6 यूक्रेनी नागरिकों और मैथ्यू आरोन वैनडाइक नाम के एक अमेरिकी व्यक्ति को गिरफ्तार किया।

इन पर आरोप है कि वे टूरिस्ट वीजा का सहारा लेकर भारत में दाखिल हुए ताकि यूरोपीय ड्रोनों की तस्करी की जा सके और मिजोरम की खुली सीमाओं के रास्ते म्यांमार के जातीय विद्रोही समूहों को प्रशिक्षण दिया जा सके। साल 2011 में मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ लीबिया के गृहयुद्ध से लेकर सीरिया और यूक्रेन के युद्ध के मैदानों तक, मैथ्यू वैनडाइक खुद को एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता बताता रहा है। एक आम इंसान की नजर में वह केवल रोमांच की तलाश करने वाला एक सनकी व्यक्ति लग सकता है, लेकिन उसके दो दशकों के करियर की बारीकियों को देखने पर एक बेहद गंभीर और गहरा सच सामने आता है।

मैथ्यू आरोन वैनडाइक का करियर पश्चिमी खुफिया तंत्र के शीर्ष स्तरों से गहराई से जुड़ा हुआ है, विशेष रूप से ‘बेलिंगकैट’ (Bellingcat) के संस्थापक एलियट हिगिंस के साथ उसके करीबी संबंधों के कारण। बेलिंगकैट खुद को एक ‘ओपन-सोर्स’ इंटेलिजेंस संस्था बताता है, लेकिन भारत में मैथ्यू आरोन वैनडाइक की हालिया गिरफ्तारी ने एक पुराने पर्दे को हटा दिया है। जैसा कि सबूत स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं, ‘OpIndia’ की यह पड़ताल उजागर करती है कि बेलिंगकैट असल में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और ब्रिटिश एजेंसी MI6 के लिए एक बेहद आधुनिक और सुनियोजित मुखौटे के रूप में काम कर रहा है।

2013 सीरियाई गृहयुद्ध

इस खुफिया तंत्र की बनावट और इसके काम करने के तरीके को समझने के लिए हमें सीरियाई गृहयुद्ध के घटनाक्रम पर गौर करना होगा। साल 2013 में, सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की खबरों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं पर हावी रहीं। उस वक्त पश्चिमी देशों के बीच बनी आम सहमति पर वहाँ के मुख्यधारा मीडिया का गहरा प्रभाव था। मैनस्ट्रीम मीडिया ने इस पूरी तबाही की जिम्मेदारी पूरी तरह से बशर अल-असद की सरकार पर डाल दी। इस सोची-समझी रणनीति ने सीरिया में अंतरराष्ट्रीय सैन्य हस्तक्षेप के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर दिया था।

यहाँ एलियट हिगिंस की भूमिका सामने आती है, जिन्होंने 2014 में ‘बेलिंगकैट’ (Bellingcat) की स्थापना की थी। इससे पहले उन्होंने ‘ब्राउन मोजेस’ (Brown Moses) के छद्म नाम से एक साधारण ‘आर्मचेयर एनालिस्ट’ (घर बैठे विश्लेषण करने वाले) के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। हिगिंस ने खुद को एक निष्पक्ष और तटस्थ ‘ओपन-सोर्स डेटा ट्रैकर’ के तौर पर पेश किया, जो केवल उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर सच्चाई बताता है। हालाँकि, रूसी विदेश मंत्रालय और ‘क्रिप्टोम-विकीलीक्स’ द्वारा जारी किए गए पत्राचार हिगिंस की पत्रकारिता की ईमानदारी और उनकी निष्पक्षता की एक बिल्कुल अलग और संदिग्ध तस्वीर पेश करते हैं।

रूसी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण प्रेस रिलीज और ‘क्रिप्टोम-विकीलीक्स‘ के आर्काइव से मिले दस्तावेजों ने एलियट हिगिंस और मैथ्यू वैनडाइक के बीच हुई निजी बातचीत का भंडाफोड़ कर दिया है। उस समय मैथ्यू वैनडाइक अपनी सैन्य कॉन्ट्रैक्टिंग कंपनी ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ (SOLI) की आड़ में सीरियाई विद्रोही समूहों के साथ जमीनी स्तर पर सक्रिय रूप से काम कर रहा था। इन पत्रों के अनुसार, वैनडाइक ने सीधे तौर पर हिगिंस को बताया था कि रासायनिक हथियार केवल असद सरकार के पास नहीं, बल्कि सीरियाई विद्रोही समूहों के हाथों में भी थे। मैथ्यू वैनडाइक का यह कबूलनामा बेहद चौंकाने वाला था क्योंकि वह खुद उन विद्रोही ताकतों के साथ मिलकर काम कर रहा था। यह जानकारी उस स्पष्ट और एकतरफा कहानी के बिल्कुल उलट थी, जिसे वाशिंगटन और लंदन की सरकारें दुनिया के सामने पेश करने की कोशिश कर रही थीं।

अब सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी सच्चाई सामने आने के बाद एलियट हिगिंस ने क्या किया? उन्होंने इसे पूरी तरह दबा दिया।

विद्रोही समूहों के रासायनिक हथियारों के जखीरे की जांच करने के बजाय, ‘बेलिंगकैट’ ने जानबूझकर इस महत्वपूर्ण जानकारी को दुनिया से छिपाए रखा। इसके उलट, इस संस्था ने लगातार ऐसी खबरें प्रकाशित कीं जिनमें सीरियाई सरकार पर रासायनिक हमलों के आरोप लगाए गए थे। ऐसा करके उन्होंने CIA और MI6 को वह सटीक ‘ओपन-सोर्स’ तर्क (बहाना) मुहैया कराया, जिसकी उन्हें सीरिया में सत्ता परिवर्तन की मांग करने के लिए जरूरत थी। पश्चिमी देशों के पक्ष में नैरेटिव बनाए रखने के लिए, हिगिंस ने मैथ्यू वैनडाइक द्वारा दी गई उस खुफिया जानकारी को जानबूझकर छिपाया जिसमें बताया गया था कि आतंकवादी भी रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे।

बेलिंगकैट: इंडिपेंडेंट मीडिया के नाम पर खुफिया कट-आउट

बेलिंगकैट‘ (Bellingcat) खुद को शोधकर्ताओं के एक ऐसे स्वतंत्र और नैतिक समूह के रूप में पेश करता है, जो केवल ‘ओपन-सोर्स’ जाँच (सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी) के प्रति अपने जुनून से प्रेरित है। यह संगठन किसी भी देश की सरकार से सीधे तौर पर फंडिंग लेने की बात को सिरे से खारिज करता है, लेकिन असल में यह बड़ी चतुराई से एक कानूनी चोर-रास्ते (loophole) का फायदा उठाता है। वे उन निजी फाउंडेशनों या अंतरराष्ट्रीय संगठनों से पैसा लेने में जरा भी संकोच नहीं करते, जिन्हें खुद सरकारों द्वारा भारी फंड दिया जाता है।

हकीकत यह है कि पश्चिमी खुफिया एजेंसियाँ सार्वजनिक रूप से इस संगठन की प्रशंसा करती हैं। साल 2020 की ‘फॉरेन पॉलिसी’ (Foreign Policy) की एक रिपोर्ट में सीआईए के पूर्व डिप्टी चीफ ऑफ ऑपरेशंस, मार्क पॉलिमरपोलोस ने इस एजेंसी की सराहना करते हुए स्वीकार किया था कि ‘हमें यह (बेलिंगकैट का काम) बहुत पसंद है।’ इसी तरह सीआईए के एक पूर्व स्टेशन प्रमुख, डैनियल हॉफमैन ने तो स्पष्ट रूप से मान लिया था कि ‘बेलिंगकैट’ उनकी एजेंसी के लिए एक बेहद सुविधाजनक ‘कटआउट’ (बीच का जरिया) के रूप में काम करता है। चूँकि बेलिंगकैट की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है, इसलिए अमेरिकी खुफिया तंत्र उनकी रिसर्च का इस्तेमाल अपनी गुप्त सूचनाओं को सार्वजनिक रूप से ‘लॉन्डर’ (वैध) करने और दूसरे देशों की सरकारों पर दबाव बनाने के लिए करता है और इसके लिए उन्हें अपने खुद के राजकीय रहस्यों को उजागर भी नहीं करना पड़ता।

काले धन का सुराग

अगर आप पैसे के लेन-देन (फंडिंग) पर नजर डालें, तो बेलिंगकैट का ‘स्वतंत्र’ होने का मुखौटा पूरी तरह से उतर जाता है। इस संगठन के कामकाज के लिए भारी-भरकम पैसा उन सरकारी ठेकेदारों और संस्थाओं से आता है, जो दूसरे देशों में तख्तापलट (regime change) कराने के लिए बदनाम हैं।

द जिंक नेटवर्क (The Zinc Network): यह एक गुप्त इंटेलिजेंस संस्था है जो अमेरिकी विदेश विभाग, USAID और ब्रिटिश सरकार के मंत्रालयों के लिए ‘सूचना युद्ध’ (information warfare) चलाने का काम करती है। इसने बेलिंगकैट को 1,60,000 यूरो दिए।

कीमोनिक्स (Chemonics): वॉशिंगटन स्थित इस ठेकेदार कंपनी को अमेरिकी सरकार के समर्थन से जासूसी करने और देशों को अस्थिर करने के ऑपरेशंस चलाने के लिए जाना जाता है, जिसने इन्हें 5,000 यूरो की राशि दी।

एडम स्मिथ इंटरनेशनल: यह कंपनी विदेशी जमीन पर संदिग्ध ऑपरेशंस के लिए ब्रिटिश सरकार से करोड़ों पाउंड हासिल करती है। इसने बेलिंगकैट को 65,000 डॉलर से अधिक का फंड दिया।

तख्तापलट के फाइनेंसर: जॉर्ज सोरोस की ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ और सीआईए से जुड़ी संस्था ‘नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी’ (NED) भी सक्रिय रूप से इनका समर्थन करती हैं।

हैरानी की बात यह है कि मीडिया का चहेता होने के बावजूद, इसके समर्थक भी गुप्त रूप से इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं। ब्रिटिश विदेश मंत्रालय (UK Foreign Office) के एक लीक हुए विश्लेषण के अनुसार, बेलिंगकैट की साख ‘काफी हद तक खराब’ हो चुकी है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह समूह ‘पैसे देने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए रिपोर्ट तैयार करने को तैयार रहता है’ और वास्तव में गलत जानकारियाँ भी प्रकाशित करता है।

बेलिंगकैट (Bellingcat) ने केवल पूर्व जासूसों की ही भर्ती नहीं की है, बल्कि ‘तख्तापलट’ (regime change) की अपनी मुहिम के दौरान इसके कदम काफी परेशान करने वाले और संदिग्ध रहे हैं। सीरिया में अमेरिकी खुफिया तंत्र के नैरेटिव को बढ़ावा देते समय, एलियट हिगिंस ने ‘शामी विटनेस’ (Shami Witness) नामक एक अकाउंट को ‘सीरिया विशेषज्ञ’ के रूप में जोर-शोर से प्रचारित किया था। बाद में हुए खुलासे ने सबको चौंका दिया और यह पता चला कि ‘शामी विटनेस’ असल में मेहदी मसरूर बिस्वास था, जो ISIS का एक जाना-माना रिक्रूटर (आतंकियों की भर्ती करने वाला) था। अंततः भारतीय आतंकवाद-विरोधी कानूनों के तहत उसे दोषी भी पाया गया।

बेलिंगकैट: CIA/MI6 लॉन्ड्रोमैट

एलियट हिगिंस और मैथ्यू वैनडाइक के बीच सूचनाओं को छिपाने का यह मामला केवल पत्रकारिता की कोई चूक नहीं है, बल्कि यह डेस्क पर बैठकर नैरेटिव गढ़ने वाले प्रबंधकों और जमीन पर सक्रिय भाड़े के सैनिकों (mercenaries) के बीच एक गहरे रणनीतिक संबंध का पुख्ता सबूत है। जब CIA या MI6 जैसी खुफिया एजेंसियाँ अपने स्रोतों को उजागर किए बिना संवेदनशील जानकारी साझा नहीं कर पातीं, या जब उन्हें किसी भू-राजनीतिक चाल के लिए जनता की सहमति जुटानी होती है, तब उन्हें सूचनाओं की ‘लॉन्ड्रिंग’ (सफाई) करने वाले एक तंत्र की जरूरत पड़ती है।

‘बेलिंगकैट’ (Bellingcat) ठीक यही काम करता है। ‘ओपन-सोर्स’ इंटेलिजेंस का सहारा लेकर यह आउटलेट हमेशा ऐसे निष्कर्ष निकालता है जो नाटो (NATO) के रणनीतिक लक्ष्यों का समर्थन करते हैं। बेलिंगकैट को मिलने वाली फंडिंग अक्सर उन्हीं संगठनों से आती है जो पश्चिमी देशों की कूटनीति से जुड़े हैं और जिन्हें पश्चिमी खुफिया तंत्र के सार्वजनिक अंगों के रूप में जाना जाता है।

एलियट हिगिंस और मैथ्यू वैनडाइक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वैनडाइक संघर्ष वाले क्षेत्रों में एक ऐसे मोहरे के रूप में काम करता है, जिससे एजेंसियाँ जरूरत पड़ने पर पल्ला झाड़ सकें। उसने खुद स्वीकार किया है कि वह CIA भर्ती के अंतिम चरणों तक पहुँच गया था, लेकिन कथित तौर पर पॉलीग्राफ टेस्ट में विफल रहा। वह जमीन पर ड्रोन पहुँचाने, ऑपरेशन के लिए फंड जुटाने और विद्रोहियों को हथियार देने जैसी वास्तविक गतिविधियों को संभालता है। वहीं दूसरी ओर, एलियट हिगिंस और बेलिंगकैट सूचनाओं के मोर्चे को संभालते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि वैनडाइक जैसे एजेंटों के सामने आने वाली कोई भी कड़वी सच्चाई, जो पश्चिमी देशों के खिलाफ जा सकती हो उसे या तो साफ कर दिया जाए, दबा दिया जाए या उसे गलत तरीके से पेश किया जाए ताकि पश्चिमी उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।

मैथ्यू वैनडाइक भारत क्यों आया था?

आमतौर पर विदेशी पर्यटक शांति या घूमने के लिए भारत आते हैं, लेकिन वैनडाइक का मकसद खतरनाक था। NIA (भारतीय जाँच एजेंसी) के अनुसार, वह और उसके 6 यूक्रेनी साथी मिजोरम की सीमा का इस्तेमाल कर रहे थे। उनका काम यूरोप से आधुनिक ड्रोन तकनीक की तस्करी करना था। म्यांमार के विद्रोही गुटों को इन ड्रोनों को चलाने की ट्रेनिंग देना था।

यह सिर्फ म्यांमार का मामला नहीं है। म्यांमार के ये विद्रोही गुट उन संगठनों के साथ मिले हुए हैं जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (Northeast) में अशांति फैलाना चाहते हैं। यानी, वैनडाइक जिन लोगों की मदद कर रहा था, वे परोक्ष रूप से भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। एक अमेरिकी लड़ाका, जिसका कनेक्शन यूक्रेन के युद्ध से है, वह अचानक भारत की सीमा पर क्यों सक्रिय हुआ? रिपोर्ट के अनुसार, यह एक ‘छद्म युद्ध’ (Proxy War) का हिस्सा है।

अगर भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा और पड़ोसी देश म्यांमार अशांत रहेंगे, तो भारत की तरक्की की रफ्तार धीमी हो जाएगी। जब किसी क्षेत्र में हिंसा और अस्थिरता होती है, तो वहाँ दखल देने के लिए पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका या ब्रिटेन) को मौका मिल जाता है। इसका मकसद भारत को उलझाए रखना है ताकि वह अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हमेशा पश्चिमी ताकतों की मदद और उनके हस्तक्षेप पर निर्भर रहे।

बेनकाब हुआ ‘पत्रकारिता’ का खेल

मैथ्यू वैनडाइक की गिरफ्तारी ने उस खतरनाक सच को उजागर कर दिया है जहाँ जासूसी की दुनिया में चेहरे और इरादे दोनों नकली होते हैं। यहाँ कुछ लोग पत्रकार का चोला पहनकर झूठ (प्रोपेगेंडा) फैला रहे हैं, तो कुछ ‘फिल्म मेकर’ होने का नाटक करके असल में युद्ध और हिंसा भड़काने वाले भाड़े के सैनिक (mercenaries) के रूप में काम कर रहे हैं। यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे एक बहुत बड़े धोखे का पर्दाफाश है।

इस पूरे खेल की जड़ 2013 के ‘क्रिप्टोम लीक’ (Cryptome leak) में छिपी है। उस समय वैनडाइक ने खुद एलियट हिगिंस (Bellingcat के संस्थापक) को बताया था कि सीरिया में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल सरकार ने नहीं, बल्कि विद्रोहियों ने किया है। लेकिन हिगिंस ने इस सच को जानबूझकर दुनिया से छिपा लिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि पश्चिमी देशों का यह झूठ कायम रहे कि सीरियाई सरकार ही गुनहगार है और वहाँ सैन्य हस्तक्षेप का रास्ता साफ हो सके।

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका (CIA) और ब्रिटेन (MI6) की खुफिया एजेंसियाँ ‘बेलिंगकैट’ (Bellingcat) जैसी संस्थाओं को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती हैं। जब ये एजेंसियाँ कोई गुप्त जानकारी सीधे नहीं दे पातीं, तो वे उसे बेलिंगकैट जैसी ‘स्वतंत्र’ दिखने वाली संस्थाओं के जरिए जनता तक पहुँचाती हैं। आसान शब्दों में कहें तो, बेलिंगकैट इन जासूसी एजेंसियों की एक ऐसी PR ब्रांच है जो उनके पक्ष में माहौल बनाने का काम करती है।

आज जब मैथ्यू वैनडाइक भारत की जाँच एजेंसियों की गिरफ्त में है, तो खुद को ‘ईमानदार पश्चिमी योद्धा’ बताने वाला उसका सारा पाखंड खत्म हो गया है। भारत ने उसे पकड़कर पूरी दुनिया को यह साफ कर दिया है कि वह किसी भी विदेशी एजेंट या जासूस को अपनी जमीन पर साजिश रचने की इजाजत नहीं देगा। भारत अब विदेशी खुफिया तंत्रों के लिए ‘खेल का मैदान’ नहीं बनेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी हैं। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)