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जहाँ हुआ जलियाँवाला नरसंहार, 8 महीने बाद कॉन्ग्रेस ने वहीं क्यों रखा अधिवेशन: 2 फाइल, एक लेटर में छिपा है राज

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस का 34वाँ अधिवेशन अमृतसर में बुलाया गया था। पहले दिन यानी 27 दिसंबर, 1919 को मोतीलाल नेहरू ने अध्यक्षीय भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन की शान में खूब तारीफ की। उस दौरान जॉर्ज फ्रेडेरिक (V) यूनाइटेड किंगडम के राजा और भारत के सम्राट कहे जाते थे। उनके उत्तराधिकारी प्रिंस ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड अल्बर्ट (VIII) का 1921 में भारत दौरा प्रस्तावित था। अधिवेशन में मोतीलाल ने सर्वशक्तिमान भगवान से प्रार्थना करते हुए भारत की समृद्धि और संतोष के लिए एडवर्ड की बुद्धिमानी और नेतृत्व की सराहना की। अपने भाषण के माध्यम से वे ब्रिटिश शासन की उदारता और अपनी निष्ठा का भी जिक्र करना नहीं भूले।

अधिवेशन के अलावा उन दिनों अमृतसर सुर्खियों में लगातार बना हुआ था क्योंकि 13 अप्रैल, 1919 को इस शहर में ही जलियाँवाला बाग नरसंहार हुआ था। यह घटना जितनी अमानवीय थी, उससे ज्यादा शर्मनाक भी थी। जब एक तरफ ब्रिटिश साम्राज्य की मोतीलाल स्तुति कर रहे थे तो ब्रिटेन की संसद में डायर को ‘क्षमतावान’ अधिकारी बताया जा रहा था। दरअसल 19 जुलाई, 1920 के ब्रिटिश संसद में एक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान बताया गया कि डायर ने ‘कुशलता और मानवता के गुणों से अत्यंत प्रभावित किया है’। इससे ज्यादा नृशंस नजरिया क्या हो सकता है, जबकि कॉन्ग्रेस ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध ली।

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ब्रिटिश भारत का यह क्रूरतम अध्याय यहीं खत्म नही होता। भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार की होम पॉलिटिकल विभाग की फ़ाइल संख्या जनवरी 1920/77 के अनुसार कॉन्ग्रेस ने अमृतसर को अपने अधिवेशन के लिए जानबूझकर चुना, जिससे एक खास राजनैतिक मकसद को पूरा किया जा सके। दस्तावेज के अनुसार जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस उन खूनी धब्बों से ब्रिटिश सरकार को बचाने का प्रयास कर रही थी, जिनके निशान आजतक अमृतसर में मौजूद हैं।

उपरोक्त फ़ाइल में एक पत्र है, जो कॉन्ग्रेस के एक सदस्य ने अमृतसर के उप-आयुक्त को लिखा था। उसमें उन्होंने सुझाव दिया कि अमृतसर में कॉन्ग्रेस का अधिवेशन दोनों (ब्रिटेन और कॉन्ग्रेस) के हितों के लिए जरूरी है। उस कॉन्ग्रेस सदस्य ने लिखा है कि अगर ब्रिटिश सरकार कॉन्ग्रेस को अधिवेशन की अनुमति देती है तो इससे जनता के बीच सरकार की छवि में सुधार होगा।

जलियाँवाला बाग नरसंहार पर ब्रिटिश सरकार ने 1920 में डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसमें बताया गया है कि 13 अप्रैल, 1919 को 5,000 से ज्यादा लोग वहाँ मौजूद थे। डायर के साथ 90 लोगों की फौज थी, जिसमें 50 के पास राइफल्स और 40 के पास खुरकियाँ (छोटी तलवारें) थी। वे लगातार, बिना चेतावनी के, 10 मिनट तक गोलियाँ चलाते रहे। इस घटना के बाद डायर ने लिखित में बताया कि जितनी भी गोलियाँ चलाई गईं, वह कम थी। अगर उसके पास पुलिस के जवान ज्यादा होते तो जनहानि भी अधिक होती।

नरसंहार में कितने निर्दोष भारतीयों का बलिदान हुआ, आजतक इसकी कोई ठोस जानकारी नहीं है। हालाँकि, राष्ट्रीय अभिलेखागार में होम पोलिटिकल विभाग की फाइल संख्या 23-1919 में इस संबंध में एक चौकाने वाली जानकारी मिलती है। फाइल के अनुसार एक ब्रिटिश अधिकारी जेपी थॉमसन ने एचडी क्रैक को 10 अगस्त, 1919 को एक पत्र में लिखा, “हम इस स्थिति में नहीं हैं, जिसमें हम बता सकें कि वास्तविकता में जलियाँवाला बाग में कितने लोग मारे गए।”

इस प्रकार के भयावह तथ्यों के बावजूद भी ब्रिटिश भारत में जलियाँवाला बाग नरसंहार का उपयोग कॉन्ग्रेस ने अपने निजी फायदे के लिए किया। बाद में जवाहर लाल नेहरू ने नरसंहार को कॉन्ग्रेस का एक ‘उपक्रम’ बना दिया। विभाजन के बाद जलियाँवाला बाग ट्रस्ट को वैधानिक रूप दिया जाना प्रस्तावित किया गया।

प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि इसका विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत न करके मंत्रिमंडल से ही पारित हो जाए। वे 11 मार्च, 1950 को लिखते हैं, “मैं चाहता हूँ कि इस विधेयक के मसौदे को जलियाँवाला बाग मैनेजिंग कमिटी की बैठक में रखा जाए। उसके बाद, मुझे उसकी प्रति भेज दें। तब विधेयक को मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए पेश किया जायेगा। जाहिर है इसे संसद के वर्तमान सेशन में नहीं रखा जा सकता, लेकिन यह मंत्रिमंडल के द्वारा पारित कराया जाएगा।” (भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार, गृह मंत्रालय, 16(11)-51 Judicial)

विधेयक के मसौदे पर एक भ्रम फैलाया जाता है कि इसे डॉ बीआर आंबेडकर ने तैयार किया था। दरअसल इसका मसौदा कॉन्ग्रेस के ही एक सदस्य टेकचंद ने बनाया था। आंबेडकर के पास तो यह समीक्षा के लिए 24 मार्च, 1950 को भेजा गया था। कुछ मामूली सुझावों के साथ उन्होंने इसे वापस भेज दिया।

जलियाँवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट बिल, 1950 में नेहरू के साथ सरदार पटेल भी न्यासी थे। एक्स-ऑफिसियो में पंजाब के राज्यपाल, पंजाब के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को रखा गया। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा पहले चार लोगों को नामांकित किया जा सकता था लेकिन अंत में यह संख्या तीन कर दी गई। इसके न्यासी जीवन भर के लिए पदाधिकारी बनाए गए। आखिरकार, संसद के समक्ष 7 दिसंबर, 1950 को विधेयक प्रस्तुत किया गया। तब तक सरदार पटेल बेहद अस्वस्थ हो गए थे। उनके स्थान पर पहले राजकुमारी अमृत कौर के नाम पर विचार किया गया। बाद में नेहरू के सुझाव पर डॉ सैफुद्दीन किचलू को न्यासी बनाया गया।

कॉन्ग्रेस ने इस पूरे मामले में अलोकतांत्रिक रवैया अपनाया और किसी अन्य दल, सामाजिक एवं राजनैतिक व्यक्ति से इस सन्दर्भ में चर्चा तक नहीं की। शुरुआत में विधेयक को संसद में न लाकर मंत्रिमंडल से ही पारित किया जाना था। बाद में प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे संसद के समक्ष रखा तो इसमें सभी सदस्य कॉन्ग्रेस के ही थे। नियम तो यहाँ तक था कि कॉन्ग्रेस का जो भी अध्यक्ष होगा, वह ट्रस्ट का सदस्य होगा। यह विधान 1951 में लागू हुआ था, जिसे भारत सरकार ने 2018 में बदल दिया।

किश्तवाड़ा में आतंकियों ने घात लगाकर पुलिस पर किया कुल्हाड़ी से हमला: हथियार छीनकर फरार, 1 SPO की मौत, 1 घायल

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ा जिले में सोमवार (अप्रैल 13, 2020) को आतंकवादियों ने पुलिस बल पर अचानक हमला बोला। इस हमले में एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई व दूसरा अधिकारी घायल हो गया। घायल अधिकारी का इस समय अस्पताल में इलाज चल रहा है। वहीं पुलिस ने भागे आतंकवादियों की तलाश शुरू कर दी है और पूरे इलाके को सील कर दिया गया है।

इस घटना की जानकारी देते हुए एक अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि आतंकवादियों ने ड्यूटी कर रहे 2 एसपीओ पर मौक़े पर गोली चलाईं जिसमें एक की घटनास्थल पर मौत हो गई और दूसरा गोली लगने के कारण घायल है।

बता दें, आज किश्तवाड़ा के दच्छन इलाके में आतंकवादियों ने घात लगाकर पुलिस जवानों पर हमला बोला। जिसमें एक पुलिस के एसपीओ मारे गए जबकि दूसरे एसपीओ जख्मी हो गए। इसके साथ ही आतंकवादियों ने पुलिसजवानों से हथियार भी छीन लिए। सूचना मिलने पर पुलिस जवानों को तुरंत किश्तवाड़ा के जिला अस्पताल पहुँचाया जहाँ डाक्टरों ने जवान खुर्शीद इकबाल को मृत घोषित कर दिया। वहीं विशाल सिंह की हालत भी अभी गंभीर बताई गई है।

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रिपोर्ट के मुताबिक आतंकवादियों ने एसपीओ पर तेज हथियार (कुल्हाड़ी) से हमला बोला और पुलिसकर्मियों से एके-47 (AK-47) राइफल और इंसास राइफल छिनकर फरार हो गए। सोशल मीडिया पर कई जगह आतंकी की पहचान आशिक हुसैन के रूप में बताई जा रही है। जिसने कोरोना के कारण हाल में पुलिस ने रिहा किया था। इसके अलावा अन्य आतंकी का नाम बशरत खान बताया जा रहा है।

उद्धव ठाकरे सरकार ने महाराष्ट्र में कोरोना वायरस संकट के बीच राज्य में सेना के हस्तक्षेप से किया इनकार: रिपोर्ट

पूरे विश्व के साथ-साथ भारत में भी कोरोना का कहर जारी है। भारत में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र है। यहाँ पर कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। जिसकी वजह से यहाँ पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को भारी नुकसान होने का खतरा है। इसके बावजूद राज्य में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार ने कोरोना के प्रसार पर काबू पाने के लिए देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में केंद्र सरकार के सशस्त्र बलों को तैनात करने के कदम से इनकार कर दिया है।

देश के सबसे बड़े और काफी घनी आबादी वाले शहरों में से एक, मुंबई में कोरोना पॉजिटिव मामलों की संख्या धड़ल्ले से बढ़ रही है। मुंबई के विभिन्न उपनगरों जैसे वर्ली, धारावी, अंधेरी, जोगेश्वरी, बायकुला, पवई, डोंगरी, ग्रांट रोड, सांताक्रूज, चेंबूर, गोवंडी, मलाड, दादर और कांदिवली से बड़ी संख्या में संक्रमित लोगों का पता चला है। जिसकी वजह से यहाँ पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की आशंकाएँ बढ़ गई है।

सकाल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि राज्य सरकार द्वारा लॉकडाउन को प्रभावी रूप से लागू करने और लोगों को प्रतिबंधों का उल्लंघन करने से रोकने में असफल होने के बाद केंद्र ने शहर को नियंत्रित करने और वायरस के बढ़ते प्रसार पर लगाम लगाने के लिए सेना भेजने की योजना बनाई थी।

शहर में अनियंत्रित रूप से बढ़ रहे कोरोना पॉजिटिव मामलों की संख्या के बावजूद मुंबई में लोग लॉकडाउन के आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं, सड़कों पर जोर-जबरदस्ती कर रहे हैं। इसलिए केंद्र सरकार ने मुंबई में सेना को तैनात करने की योजना बनाई थी। विशेषकर धारावी, रे रोड, मानखुर्द, मोहम्मद अली रोड और ठाणे के भिवंडी जैसे क्षेत्रों में।

हालाँकि, इस महामारी के बीच उद्धव ठाकरे सरकार द्वारा सेना के हस्तक्षेप से इनकार करने के बाद इस योजना को निरस्त कर दिया गया। जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र सरकार को यह गलतफहमी हो गई कि अगर भारतीय सेना को मुंबई की बागडोर संभालने की अनुमति दी जाती है, तो वो राज्य और स्थानीय प्रशासन में निहित शक्तियों को प्रभावी रूप से खो देगी। साथ ही केंद्र सरकार संघीय सशस्त्र बलों की उपस्थिति के साथ शहर पर हावी हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसी डर की वजह से महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में सेना के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

भारत में कोरोना वायरस के संकट से सबसे अधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र है। राज्य में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के लगभग 2064 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से आधे से अधिक अकेले मुंबई शहर से रिपोर्ट किए गए हैं। बीएमसी द्वारा कल 16 घातक मामलों के साथ 217 कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आए।

66 करोड़ खादी के मास्क, 20 लाख महिलाओं व 6 लाख बुनकरों को रोजगार: सस्ते में मास्क उपलब्ध कराने का योगी मॉडल

भारत में कोरोना वायरस से उपजी आपदा के बीच एक चीज की माँग अगर सबसे ज्यादा बढ़ी है तो वो है मास्क। देश में मास्कों की कमी की बात कही जा रही थी, जिसे पूरा करने के लिए सरकार ने ऐसा तरीका अपनाया है जिससे न सिर्फ़ लोगों की ज़रूरतें पूरी होंगी बल्कि कई महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा। मोदी मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक में ‘होम मेड मास्क’ पहन कर जनता को पहले ही ये सन्देश दे चुके हैं कि उन्हें महँगे मास्क ख़रीदने के लिए दुकानों में भीड़ जुटाने की आवश्यकता नहीं हैं, वो घर में बने मास्क भी आसानी से पहन सकते हैं।

योगी आदित्यनाथ की सरकार ने खादी को कोरोना के ख़िलाफ़ सुरक्षा कवच के रूप में अपनाने का फ़ैसला लिया है। खादी को घर-घर पहुँचाने में भी इसकी अहम भूमिका होगी। लोग स्वस्थ भी रहेंगे, बुनकरों को रोजगार भी मिलेगा और स्वदेशी की ब्रांडिंग भी होगी। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग के प्रमुख सचिव डॉ़. नवनीत सहगल ने योगी सरकार के इस निर्णय के बारे में अधिक जानकारी देते हुए बताया:

“ग्राम विकास विभाग की स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिलाओं द्वारा यह खादी के मास्क तैयार किए जा रहे हैं। उन्हें इसके लिए 6 लाख मीटर कपड़ा दे दिया गया है। एक मीटर कपड़े में लगभग आठ मास्क बन जाते हैं। बची हुई कतरन से एक-दो और मास्क बनाए जा सकते हैं। इस तरह इतने कपड़ों में करीब 50 लाख मास्क तैयार कर लिए जाएँगे। बाजार में एक जोड़े मास्क का मूल्य मात्र 20-22 रुपए ही होगा। इसमें दोहरा रोजगार है। एक तो कपड़ा बुनकरों को और दूसरा मास्क बना रही महिलाओं को फायदा मिलेगा। स्वयं सहायता समूहों के लोग इसे बाजार तक पहुँचाएँगे।”

खादी के मास्कों के उत्पादन में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और ये सारे न सिर्फ़ 2-3 लेयर के होंगे बल्कि इन्हें दो-दो की पैकिंग में उपलब्ध कराया जाएगा। कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों से बचाव में भी इसका उपयोग होगा, जो वायरस से होते हैं। ‘भारतीय हरित खादी’ नामक संस्था को ये जिम्मेदारी दी गई है कि वो मास्क बनाने वालों को प्रशिक्षित करें और स्वास्थ्य मानकों का भी ध्यान रखा जाए। प्रदेश में फ़िलहाल 2000 स्वयं सहायता समूहों से 20 लाख महिलाओं को रोजगार मिलेगा। इसके अलावा 6 लाख बुनकरों के भी दिन फिरेंगे। ग्राम्य विकास विभाग इन मास्कों को गाँवों में बँटवाएगा।

बताया गया है कि 66 करोड़ मास्क बनाए जाएँगे। योगी सरकार लोगों के हित के लिए इस कठिन समय में ख़र्च करने के लिए तैयार है। यूपी के सभी जिलों को जरूरी उपाय करने, मेडिकल उपकरण खरीदने के लिए 389 करोड़ रुपए दिए गए हैं। इसके साथ ही जरूरतमंदों को सहायता उपलब्ध कराने के लिए 750 करोड़ रुपयों की व्यवस्था की गई है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की है।

पाकिस्तानी डॉक्टरों ने कोरोना मरीजों के सामने किया चिट्टा-चोला गाने पर डांस, देखें वायरल Video

एक ओर पूरे विश्व के स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस से लोगों की जान बचाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के डॉक्टर्स अपना मूड शांत करने के लिए वार्ड में नाचते-गाते देखे गए। इस वाकए का वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और लोग इसपर तरह-तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

वायरल वीडियो में देख सकते हैं कि पाकिस्तानी डॉक्टर्स प्रोटेक्टिव सूट पहनकर मरीजों के सामने ‘चिट्टा चोले’ गाने पर डांस कर रहे हैं। हालाँकि, वीडियो से ये पता नहीं चल पाया है कि जिन मरीजों के सामने वे ऐसी हरकतें कर रहे हैं। वे कोरोना पॉजिटिव हैं या उन्हें सिर्फ़ क्वारंटाइन किया गया है।

पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने भी इनमें से एक वीडियो को शेयर किया है और अपने ट्वीटर अकॉउंट पर लिखा है, “Corona….जहाँ भी हो सुन लो चिट्टा चोला।” इसके अलावा एक अन्य वीडियो भी है जोकि क्वारंटाइन सेंटर की बताई जा रही है और जिसमें डॉक्टर्स को कोरोना पॉजिटिव मरीजों के साथ नाचते देखा जा सकता है।

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गौरतलब है कि इन वीडियोज के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग पाकिस्तानी डॉक्टर की इन हरकतों को बेफिजूल बता रहे हैं। साथ ही सलाह दे रहे हैं कि उन्हें अब इन मामलों पर सीरियस हो जाना चाहिए। वहीं कुछ पाकिस्तानी लोग ऐसे हैं जो अपने डॉक्टर्स की इस हरकत के लिए उन्हें सराह रहे हैं और उनकी तारीफों के पुलिंदे बाँध रहे हैं।

बता दें इस वुहान वायरस के कारण पूरे विश्व में अब तक मृतकों की संख्या 1, 14, 200 तक पहुँच चुकी है। जबकि 1.8 मीलियन लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं। अकेले पाकिस्तान की बात करें, तो वहाँ इसके 386 नए मामले आए हैं। जबकि कोरोना पॉजिटिवों की संख्या 5, 170 है। बता दें पाकिस्तान में हाल में कोरोना से मरने वालों की संख्या 14 गिनी गई है। जबकि कुल मृतकों की संख्या 86 पहुँच गई है।

गुरु गोविन्द सिंह की वो सभा, जिसमें उन्होंने अपने ही 5 लोगों के शीश माँगे: खालसा और ‘पंज प्यारे’ का इतिहास

जब कोरोना वायरस की आपदा के बीच वैशाखी देशवासियों के लिए ख़ुशी का एक मौक़ा लेकर आया है, ये समय इस्लामी आक्रांताओं से लोहा लेकर खालसा पंथ की स्थापना करने वाले सिखों के दसवें और अंतिम गुरु गोविन्द सिंह जी को याद करने का भी है। गुरु ने 5 लोगों को ‘पंज प्यारे’ के रूप में चुना था, और ख़ुद खालसा के छठे सदस्य बने थे। यहाँ ये कहना भी सही होगा कि वो पाँचों ख़ुद से आगे आए थे। ये तब की बात है, जब औरंगज़ेब का आतंक बढ़ता ही जा रहा था। 17वीं शताब्दी अपने अंतिम दिनों में थी। उसी दौरान गुरु गोविन्द सिंह ने आनंदपुर साहिब के मैदान में हज़ारों लोगों को बुलाया। मैदान में एक बड़ा सा पंडाल, उसके सामने तख़्त और उस पर बैठे गुरु। साथ में वहाँ पर एक तम्बू भी था।

सन 1699 में गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिखों के इतिहास में ये एक बड़ा क्षण रहा है। खालसा की स्थापना का मकसद ही ये था कि मजहबी उत्पीड़न और अत्याचार से लड़ने के लिए ऐसे लोग तैयार किए जाएँ, जो धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए जान देने से भी नहीं हिचकें। इसलिए, गुरु गोविन्द सिंह ने वैशाखी के दिन इतनी बड़ी भीड़ एकत्रित की थी। आज वहाँ पर केशगढ़ साहिब गुरुद्वारा शान से खड़ा है। यही वो जगह है, जहाँ हाथ में चमकती हुई नंगी तलवार लिए गुरु गोविंद सिंह ने वहाँ उपस्थित जनता से एक बहुत बड़ी माँग रख दी थी। उन्हें ‘धर्म की रक्षा के लिए’ किसी का सिर चाहिए था।

सारी सभा में हलचल मच गई। रौद्र रूप धरे गुरु गोविन्द सिंह की इस माँग के बाद जो लोग आए, उन्होंने न सिर्फ़ अपनी बहादुरी से देश को गौरवान्वित किया बल्कि जाति-पाती के बंधनों को तोड़ने में भी अहम भूमिका निभाई। एक व्यक्ति आगे आया। गुरु गोविन्द सिंह उसे तम्बू में ले गए और खचाक…! जब वो बाहर आए तो उनके तलवार पर रक्त लगा हुआ था और उन्होंने फिर से ऐसी ही माँग रख दी। एक के बाद एक कर के पाँच लोग सामने आए और यही प्रक्रिया दोहराई गई। कई लोगों को ऐसा लग रहा था कि कहीं गुरु पागल तो नहीं हो गए हैं? वो अपने ही लोगों को मार डाल रहे हैं। लेकिन, उनके मन में तो कुछ और ही चल रहा था।

अंत में गुरु गोविन्द सिंह फिर से तम्बू में गए और जब वो वापस लौटे तो सभा में उपस्थित सभी लोग हतप्रभ थे। उनके साथ वो पाँचों बहादुर थे, जिन्होंने अपने शीश अर्पित करने का साहस किया था। जिन्दा और सलामत। लोगों को समझ आ गया कि ये गुरु की एक परीक्षा थी, जिसमें विरलों को ही उत्तीर्ण होना था। यही हुआ। ये ही ‘पंज प्यारे’ पहलाए और साथ ही ख़ालसा के पहले पाँच सदस्य भी यही बने। फिर गुरु गोविन्द सिंह छठे सदस्य बने। इनमें दया राम, धरम दास, हिम्मत राय, मोहकाम चंद और साहिब चंद शामिल थे। इसके बाद उन सभी को ‘सिंह’ सरनेम दिया गया। ख़ुद गुरु गोविन्द भी ‘राय’ से ‘सिंह’ बने।

गुरु गोविन्द सिंह ने वहीं पर खालसा पंथ की पहली प्रक्रिया पूरी की। उन्होंने एक लोहे के मर्तबान में पानी और चीनी को तलवार से मिलाया और इसे ही उन्होंने अमृत नाम दिया। जिस प्रक्रिया से गुरु ने उन पाँचों को खालसा की सदस्यता दिलाई, उसी प्रक्रिया से वापस उन पाँचों ने मिल कर गुरु को सदस्यता दिलाई। पुरुषों को ‘सिंह’ और महिलाओं को ‘कौर’ सरनेम दिया गया। तम्बाकू का सेवन नहीं, हलाला मीट का सेवन नहीं, व्यभिचार नहीं और शराब का सेवन नहीं- खालसा पंथ के लिए कई नियम-कायदे तय किए गए, जो आवश्यक थे। उन्हें एक ख़ास ड्रेस कोड भी दिया गया।

गुरु गोविन्द सिंह ने पाँचों को भगवा वस्त्र पहनाए थे। असल में गुरु गोविन्द सिंह ने पहले ही कह दिया था कि वो किसी का शीश माँग रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं कि बाकी उन्हें प्यारे नहीं है। पूरी संगत उन्हें प्रिय है लेकिन एक ख़ास कार्य के लिए उन्हें ऐसे ही लोग चाहिए। इन पाँचों में हर वर्ग के लोग शामिल थे- लाहौर के एक व्यक्ति से लेकर हस्तिनापुर के जाट तक। द्वारका के एक कपड़े सिलने वाले से लेकर एक नाइ तक। यानी, पाँचों में एक क्षत्रिय था, एक जाट और तीन ऐसे लोग थे- जो उस समुदाय से आते थे जिन्हें कई लोग ‘नीच जाति’ कहते थे। गुरु का सन्देश जिसने समझ लिया, वो सच्चा सिख बन गया।

ख़ालसा को एक ख़ास पहचान दी है, एक ख़ास कार्य सौंपा गया और इसीलिए संगत में ये ख़ास हुए। आगे के कई युद्धों में खालसा पंथ ने जो बहादुरी दिखाई, वो तो इतिहास है। 13 अप्रैल 1699 में गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। 322 साल हो गए लेकिन सिखों का मातृभूमि और धर्म के प्रति आस्था अडिग ही होती चली गई। गुरु गोविन्द सिंह ने एक तरह से समुदाय को पुनर्जीवन दिया।

बाबासाहब आजादी से पहले ही भाँप गए थे वहाबियों के खतरे को, चंद कॉन्ग्रेसी नेताओं ने दबा दी थी उनकी आवाज

विश्व के साथ भारत भी कोरोना महामारी से जूझ रहा है और पूरा देश लॉकडाउन में है। इसी बीच आज भारत के महान सपूत बाबासाहब डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती भी है। महामारी के दौरान कुछ समुदायों के प्रतिनिधियों की गैरजिम्मेदारी और सुनियोजित लापरवाही के कारण बिगड़ी स्थिति और इससे उठते अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर तलाशते समय हमें अतीत के ऐतिहासिक तथ्यों पर भी ध्यान देना चाहिए।

इससे पूर्व नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए) के अनर्गल व निराधार विरोध और उपद्रव से भी इसी प्रकार के प्रश्न उठे थे। भारतीय समाज, राजनीति, दर्शन और तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक समस्याओं पर बाबा साहब के अध्ययन, लेखन और साहित्य में अनेक ऐसे तथ्य हैं, जो अलगाववाद और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध इस प्रकार की घटनाओं के विश्लेषण में सहायक हैं।

धार्मिक व अन्य प्रकार के सभी स्थलों पर एकत्रीकरण के प्रतिबंध के बावजूद जिस प्रकार देश के अनेक भागों में सरकार और प्रशासन के आदेशों को धता बताकर लॉकडाउन का उल्लंघन करते हुए मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ने, तबलीगी जमात के मरकज में शामिल लोगों को छिपाने, अल्पसंख्यक समुदाय की बस्तियों, संस्थाओं व धार्मिक क्षेत्रों में गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त मजहब विशेष के विदेशी नागरिकों को शरण देने, फलों-सब्जियों व अन्य खाद्य पदार्थों में थूकने जैसी घिनौनी हरकतें; और सबसे बढ़कर इस समुदाय के अग्रणी लोगों द्वारा तबलीगी जमात का बचाव करने तथा दूसरे समुदायों के हर मामले पर अतिरंजित रूप से मुखर रहने वाले आमिर खान टाइप लोगों की इस मामले में चुप्पी, यह सोचने पर विवश करती है कि ऐसी घातक मानसिकता की जड़ें कहाँ हैं?

वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम, वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे: आंबेडकर

हिंदुस्तान के उत्थान में रमता था बाबा साहब का मन, उनके नाम पर विघटन-घृणा का बीज बोना वामपंथियों की साजिश

इसके उत्तर के लिए हमें अतीत की उस मानसिकता का भी अध्ययन करना होगा, जो भारत विभाजन का जिम्मेदार था। हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत विभाजन की माँग की सुगबुगाहट और तबलीगी जमात की स्थापना का काल लगभग एक ही है। भारत विभाजन की नींव 1920 से 1932 के बीच रखी गई थी, जबकि तबलीगी जमात 1927 में बना था। तबलीगी जमात की स्थापना का घोषित उद्देश्य समुदाय विशेष को कट्टरपंथी बनाना और दावत-ओ-तबलीग यानी धर्मांतरण है।

कॉन्ग्रेस के शह पर एक धर्मनिरपेक्ष हिंदू बहुल देश में तबलीगी जमात बेरोकटोक अपना काम करता रहा, देश के कथित अल्पसंख्यकों को कट्टरता के उसी जाल में फाँसने के लिए लगा रहा, जो उसने विभाजन के बाद पाकिस्तान में किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि तबलीगी जमात मजहब के लोगों को उस अंधे युग में ले जाना चाहता है, जहाँ कट्टरता, कठोरता और मजहबी शुद्धता के नाम पर शेष समुदाय से अलगाव व द्वेष जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी जाएँ। अल्पसंख्यकों के बीच यही स्थितियाँ तब भी बनाई गई थीं, जब भारत विभाजन की पटकथा लिखी गई थी।

बाबासाहब संभवत: उन गिने-चुने लोगों में से थे, जो स्वतंत्रता से पहले ही चल रहे वहाबी आंदोलन के खतरे को भाँपकर भारत के भविष्य को लेकर चिंतित थे। इसीलिए बाबासाहब ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ पुस्तक में लिखा है,

”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है। यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस्लाम आमने समर्थकों और दूसरे धर्मों में भेद करता है। इस्लाम मानव का सार्वभौमिक बंधुत्व नहीं, उनका भाईचारा केवल अपने ही मजहब वालोंके साथ है। जो इनके समुदाय का नहीं है, उनके लिए इसमें केवल घृणा और शत्रुता ही है।”

विभाजन की त्रासदी से दुखी बाबासाहब समस्या को समझते ही नहीं थे, बल्कि उसका समाधान भी प्रस्तुत करते थे। यह अलग बात है कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस के कुछ प्रभावी नेताओं की दुर्भावना के कारण उनके व्यवहारिक और उपयोगी विचारों को अनुसुना कर दिया गया। कॉन्ग्रेस में ही बड़ी संख्या में लोग वहाबियत और इसके कारण भारत के विरुद्ध हो रहे षडयंत्र व खतरों को समझते थे, पर चूँकि उस समय भी कॉन्ग्रेस में लोकतंत्र का केवल दिखावा था, जबकि पार्टी के नीति नियंता चंद नेता ही थे, इसलिए लगता है कि ऐसे राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेसजनों की आवाजें भी दबाई गईं।

बाबासाहब ने इसी पुस्तक में लिखा है, “सांप्रदायिक मुस्लिमों और राष्ट्रवादी मुस्लिमों के अंतर को समझना कठिन है… वास्तव में अधिकांश कॉन्ग्रेसजनों की धारणा है कि इन दोनों में कोई अंतर नहीं है और कॉन्ग्रेस के अंदर के राष्ट्रवादी मुस्लिमों की स्थिति सांप्रदायिक मुस्लिमों की फ़ौज की चौकी की तरह है।”

बाबासाहब कहते थे कि उनके जीवन का प्रत्येक क्षण भारत के लिए है तो यह उनके राष्ट्रवादी व्यक्तित्व का परिचायक था, भारत माता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। इसी प्रतिबद्धता के कारण देश के टुकड़े होने से दुखी थे और बचे हुए भारत को सुरक्षित, सुंदर और विश्व में अग्रणी देखना चाहते थे। उन्होंने ने इसी पुस्तक में लिखा है:

“मुस्लिमों के लिए हिंदू काफिर है। मुस्लिमों की दृष्टि में काफिर सम्मान के योग्य नहीं होता है, उसकी कोई सामाजिक स्थिति भी नहीं होती है। अत: जिस देश में काफिरों का शासन हो, वह स्थान मुस्लिमों के लिए दारुल-हर्ब है। ऐसी स्थिति में यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं बचती कि मुस्लिम गैर-मुस्लिम के शासन को स्वीकार नहीं कर पाएँगे। इसलिए भारत और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की पूर्ण अदला-बदली ही क्षेत्र में शांति व सौहार्द रख सकती है।”

आज जब तबलीगी जमात और उसके समर्थकों की देशव्यापी अवज्ञा व उपद्रव देखने को मिल रहा है तो मुस्लिमों को लेकर बाबासाहब के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। विशेषकर मुस्लिम समाज के प्रगतिशील समाज को बाबासाहब के विचारों पर चिंतन-मनन कर अपने समुदाय को विकृतियों से बचाकर देश की मुख्यधारा में बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।

बहरहाल, अतीत की भूल को सुधारना तो संभव नहीं है, किंतु उससे सबक लेकर वर्तमान और भविष्य का निर्माण अवश्य किया जा सकता है। ऐसे में आवश्यकता है कि देश की जनता के समक्ष बाबासाहब के विचारों को समग्र रूप में पहुँचाया जाए, जिससे कि छद्म धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी, इतिहासकार और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग संदर्भहीन और चयनात्मक ढंग से बाबा साहब के विचार पेशकर समाज को भड़काने और समस्या उत्पन्न करने के कुत्सित प्रयासों में सफल न हो सकें।

तबलीगी जमात पर कसता शिकंजा: मौलाना साद को गिरफ्तार करने की तैयारी में दिल्ली पुलिस, जुटाए सबूत

कोरोना वायरस के मद्देनजर लॉकडाउन के दौरान दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में तबलीगी जमात का मजहबी कार्यक्रम आयोजित करने के आरोप में मौलाना साद के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है। केस दर्ज होने के बाद से ही मौलाना साद लापता बताए जा रहे हैं। इस बीच, पूरे मामले में बड़ी जानकारी सामने आई है कि दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम मौलाना साद पर शिकंजा कसने की तैयारी कर चुकी है।

इंडिया टीवी के मुताबिक पुलिस ने साद और FIR में नामजद सभी लोगों के खिलाफ सबूत जुटा लिए हैं, अब उनसे अगले दो दिनों में पूछताछ की जा सकती है। क्राइम ब्रांच अपनी टीम में डॉक्टरों को भी शामिल करेगी, जिससे कि मौलाना जाँच के दौरान मेडिकल वजहों की बहानेबाजी कर भाग न पाए। पहले सभी आरोपितों से अलग-अलग पूछताछ होगी। इसके बाद उन्हें आमने-सामने बैठाकर भी सवाल किए जाएँगे।

दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने इंडिया टीवी को बताया कि मौलाना पूछताछ में सहयोग नहीं करने के लिए कई बहाने बना सकता है। वह होम क्वारंटाइन से तुरंत लौटने की बात कहकर जाँच में सहयोग करने की बात को टाल सकता है। वह यह भी कह सकता है कि 14 दिनों तक क्वारंटाइन में होने की वजह से उसे तबलीगी जमात के मुख्यालय की मौजूदा स्थिति पता नहीं है। उसे अपने सहयोगियों से बात करने के लिए समय चाहिए। पुलिस इन सभी पहलुओं को ध्यान में रख रही है। 

मौलाना साद समेत अन्य आरोपितों के गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल करने के सवाल पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि आरोपितों को इसका अधिकार है, कानून सभी के लिए है, लेकिन पूरे मामले में उनसे पूछताछ जरूरी है। आरोपितों को पुलिस के सवालों का जवाब देना ही होगा। 

अभी पुलिस को बताया गया है कि मौलाना होम क्वारंटाइन में हैं। हम उसके क्वारंटाइम का समय पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि कोरोना के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखना भी अहम है। पुलिस पूरी तरह से तैयार है। फिलहाल सबूत की ज्यादा जरूरत नहीं होगी। आगे की कार्रवाई आरोपितों के बयान के आधार पर होगी।

मौलाना साद से पूछे जाने वाले सवालों पर पुलिस अधिकारी ने कहा, “दिल्ली सरकार, पुलिस, एसडीएम, डब्ल्यूएचओ और स्वास्थ्य विभाग की बार-बार चेतावनी के बावजूद इतना बड़ा जमावड़ा क्यों था?” क्वारंटाइन के दौरान दस्तावेजों की बरामदगी के सवाल पर क्राइम ब्रांच के अधिकारी ने कहा कि पुलिस और मीडिया के काम करने के तरीके में अंतर होता है। अभी इस मामले में और कुछ नहीं बताया जा सकता है।

क्राइम ब्रांच फिलहाल मरकज में जाँच- पड़ताल शुरु कर चुकी है। मरकज के अंदर कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं मिला। साथ ही मरकज से जुड़े लोग भी सहयोग नहीं कर रहे। इससे पहले पुलिस ने मरकज प्रशासन से जानकारी माँगी थी कि 13 मार्च के बाद मरकज में जो लोग आए थे, उनका उपस्थिति रजिस्टर दिया जाए। यह भी पूछा कि 13 तारीख के दिल्ली सरकार के भीड़ इकट्ठा न होने के आदेश के बाद मरकज ने अपने यहाँ से लोगों को निकालने के लिए क्या कदम उठाए? 

गौरतलब है कि दिल्ली के निजामुद्दीदन मरकज में 1 से 15 मार्च के बीच हुए कार्यक्रम में देश-विदेश के कई हजार लोग शामिल हुए थे, लेकिन इसके बाद भी करीब 2000 लोग यहाँ रुके रहे, जबकि ज्यादातर लॉकडाउन से पहले अपने घरों को लौट गए। मौलाना पर इस आयोजन में शामिल लोगों को कोरोना पर गुमराह करने और लोगों की जान खतरे में डालने का आरोप है। क्राइम ब्रांच अब तक दो बार उन्हें नोटिस जारी कर चुकी है।

फरीदकोट: कर्फ्यू के दौरान दारू के नशे में धरे गए 2 युवकों ने की पुलिस पर फायरिंग, रेलवे में होने की दिखाई धौंस

पंजाब के फरीदकोट में नाके पर तैनात पुलिसकर्मियों पर रविवार की रात दो युवकों ने फायरिंग की। दोनों आरोपित युवक शहर के ही रहने वाले बताए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, कर्फ्यू होने के बावजूद रविवार की रात दोनों युवक अपनी मोटरसाइकिल से आते पुलिस को दिखे। पुलिस ने इन्हें नाके पर रोका। मगर, वहाँ सफाई देने की जगह ये पुलिस से हाथापाई कर बैठे और बात बढ़ने पर फायरिंग भी कर दी। इस दौरान एक पुलिसकर्मी की वर्दी फट गई। जबकि कई घायल हो गए। पुलिस ने इनमें से एक को गिरफ्तार कर लिया।

मीडिया में मौजूद जानकारी के अनुसार, घटना रविवार रात करीब पौने 10 बजे फरीदकोट के कोट कपूरा में हरिनौ रोड पर घटी। यहाँ करीब 9:50 पर पुलिस ने दो युवकों को नशे की हालत में धुत सामने से आते देखा और इनकी दुपहिया रुकवाई। मगर, इससे पहले पुलिस पूछताछ करती दोनों ने खुद के रेलवे में होने की बात पुलिस को बताई और फिर इसी के आधार पर उन्हें धौंस देने लगे।

थोड़ी देर में दोनों युवकों ने पुलिस से बहस करनी शुरू कर दी और कहने लगे कि रोज का काम हो गया, बिना वजह परेशान करते रहते हो। जिसके बाद नाके पर तैनात पुलिस कर्मचारियों ने कहा कि जाओ, चले जाओ सुबह बात करेंगे। मगर, इसी बीच दोनों ने गुंडई पर उतर आए और ड्यूटी पर तैनात एएसआई केवल सिंह का गला पकड़ लिया।

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जवाबी हाथापाई में पुलिस भारी पड़ी तो दोनों आरोपित भाग खड़े हुए। साथ ही रेलवे लाइन पर पहुँचकर वहाँ से पत्थर उठाकर मारने शुरू कर दिए। इस दौरान सतपाल वहीं पर गिर गया, लेकिन दूसरे आरोपित कंवर पाल ने लाइन क्रॉस करके अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर से गोलियाँ चलानी शुरू कर दी।

गौरतलब है कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस घटना में आरोपित युवक द्वारा चलाई गोलियाँ किसी को नहीं लगी। लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में कइयों के घायल होने की बात है। बता दें, इस घटना के बाद कंवर पाल मौके से फरार हो गया, जबकि लाइन पर गिरे सतपाल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। फिलहाल मामले की जाँच जारी है और कंवल की तलाश भी की जा रही है। मालूम हुआ है कि इन दोनों में से एक व्यक्ति फिरोजपुर में डीआरएम ऑफिस में क्लर्क है।

दिल्ली के मरकज़ में उपस्थित थे 9000 जमाती, 3200 को ही खोज पाई है पुलिस: वरिष्ठ पत्रकार का दावा

तबलीगी जमात के मुसलमानों ने पूरे देश में ऐसी तबाही मचाई है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। जमातियों को पकड़ने के लिए कई राज्यों की पुलिस को दिन रात एक करना पड़ा। अब ‘इंडिया टीवी’ के एडिटर इन चीफ और चेयरमैन रजत शर्मा ने बताया है कि दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ मस्जिद में 9000 से ज़्यादा लोग मौजूद थे। उन्होंने जानकारी दी कि अभी पूरे देश में इनमें से 3193 को ही खोजा जा सका है, बाकियों का कोई अता-पता नहीं है। इनमें से 765 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं।

रजत शर्मा ने बताया कि सिर्फ़ दिल्ली में घरों और मस्जिदों से पुलिस ने तबलीगी जमात के 900 लोगों को निकाला है। उन्होंने पूछा कि बाक़ी बचे 6000 से ज़्यादा कहाँ हैं? बता दें कि अप्रैल के शुरूआती हफ्ते में ही ख़बर आई थी कि 9000 ऐसे लोगों को चिह्नित कर के क्वारंटाइन किया गया है, जो जमातियों के सम्पर्क में आए। मार्च के अंतिम हफ़्तों में मरकज़ मस्जिद में एक समय में 1500 से भी अधिक लोग उपस्थित थे और 1000 से अधिक लोग देश के विभिन्न राज्यों में गए थे। इनमें से 1300 तो विदेशी ही थे।

कई राज्यों में पुलिस के दबिश देने के बाद बड़ी संख्या में जमाती सामने आए, जो मुसलमानों के प्रभाव वाले विभिन्न इलाक़ों में मस्जिदों वगैरह में छिपे हुए थे। आज ही महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा कि राज्य से लापता तबलीगी जमात के 58 सदस्यों में से 40 का पता लगा लिया गया है। इन्हें क्वारंटाइन किया गया है। यानी, ये लोग अलग-अलग राज्यों में जाकर जाकर छिपे हुए थे। महाराष्ट्र सरकार ने बताया है कि इस इस्लामिक संगठन के बाकी 18 सदस्य अब भी लापता हैं तथा उन्हें ढूँढने की कोशिश की जा रही है।

आंध्र प्रदेश के उप-मुख़्यमंत्री के नारायणस्वामी ने भी कहा है कि जमाती अपने गंदे रहन-सहन और अजीबोगरीब दिनचर्या के कारण इस रोग को पूरे देश में लेकर गए। लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा कि वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भरोसा करती हैं लेकिन कई बार इंसानियत के लिए कुछ चीजों पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि तबलीगी जमात मुसलमानों को 1400 साल पुराने अरब दौर में ले जाना चाहता है। उन्होंने जमात के लाखों लोगों पर अज्ञान और अंधकार फैलाने का आरोप लगाया।