घर से बाहर रह रहे लोगों को भले ही साल भर फुरसत ना मिले किन्तु तीज त्योहार पर घर और घर की यादें खींच ले जाती हैं अतीत में।
हमारा भी हाल कमोबेश यही है कुछ कि तीस साल घर से बाहर गुज़ार लेने के कारण घर ज़्यादा याद आता है होली दीवाली पर।
बुंदेलखंडी होने के कारण बचपन की यादों में एक याद ये भी है कि पड़वाँ के दिन होली नहीं खेली जाती है झाँसी में। पड़वाँ यानी कि होली दहन के बाद का दिन झाँसी वालों के लिए शोक दिवस होता था, सो रंगों का कार्यक्रम दूज वाले दिन होता था।
जो कारण यादों में बसा हुआ है या यूँ कहिए बसा हुआ था कल रात तक, वो ये था कि पड़वाँ वाले दिन झाँसी नरेश, महाराज गंगाधर राव का देहांत हो गया था। कल रात जब होली के बारे में कुछ जानकारी एकत्रित कर रहा था तो महराजा के मृत्यु दिवस पर दृष्टि गई।
21 नवम्बर ,1853 की तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज है। ध्यान नहीं गया एक बार और फिर चौंक गया। होली और नवम्बर कुछ जम सा नहीं रहा था।
और खंगालना शुरू किया तो पता ये चला कि महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु दिवस में तो कोई गड़बड़ नहीं है किन्तु ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फरवरी माह में जारी वो काला अध्यादेश, जिसमें महाराज के दत्तक पुत्र को राज्य से बेदखल कर देने की बात थी, 13 मार्च 1854 को झाँसी पहुँचा था। इसी वर्ष 14 मार्च को होली जलाई गई थी। अध्यादेश की जानकारी लोगों को अगले दिन हुई, जिसके बाद होली नहीं मनाई गई। इसके बाद से ही यह परम्परा चली आ रही है।
इतिहास के जानकार और पारिवारिक मित्र श्री मुकुन्द मेहरोत्रा जी की जानकारी के तथ्यों के अनुसार होलिका दहन के अगले दिन महाराजा गंगाधर राव की पुण्यतिथि मनाई जाती थी और इससे भ्रम की स्थिति बन गई।
वैसे क्या आपको पता है कि रंगों के त्योहार की शुरुआत कहाँ से हुई थी?
अगर आप किसी से ये सवाल पूछें भी तो उसका जवाब शायद ब्रज होगा लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल रंगों के त्योहार होली की शुरुआत बुंदेलखंड के एरच कस्बे से हुई है, जो झाँसी जिले में पड़ता है।
क्यूँ चौंक गए ना?
जी हाँ, यही वो कस्बा है, जो कभी असुरराज हिरण्यकश्यप की राजधानी हुआ करता था। इतिहास में इस बात के प्रमाण भी हैं कि सतयुग में इस एरच को ही ‘एरिकच्छ’ के नाम से जाना जाता था।
एरच के पास बेतवा नदी के किनारे डिकोली गाँव है। बताया जाता है कभी इस गाँव की जगह डिंकाचल पर्वत हुआ करता था। इसी पर्वत से प्रह्लाद को वेतवा नदी में फेंकने का प्रयास किया गया था लेकिन वे भगवान विष्णु के आशीर्वाद की वजह से बच गए। बाद में प्रह्लाद को हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर आग में जलाकर मारने का प्रयास किया। लेकिन ये भी संभव नहीं हो पाया और वरदान प्राप्त होने के बावजूद इस आग में खुद होलिका ही जल गई।
कहा जाता है बाद में नरसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप को मारने के बाद भगवान ने यहीं असुरों को गुलाल लगाकर उनसे आपसी दुश्मनी को खत्म करने का संदेश दिया था। वहीं लोगों ने बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक इस पर्व पर लोगों को रंग लगाकर उत्सव मनाना शुरू किया।
इस इलाके में पुराने महल के भग्नावशेष भी मिलते हैं, जो हिरण्यकश्यप के महल के बताए जाते हैं। खुदाई के दौरान यहाँ हिरण्यकश्यप काल की शिलाएँ और होलिका की गोद में बैठे प्रह्लाद की मूर्तियाँ भी मिली हैं, जो ये साबित करती हैं कि होलिका, हिरण्यकश्यप का संबंध इसी इलाके से रहा है।
वैसे बुंदेलखंड में पड़वाँ वाले दिन होली ना मनाने का एक कारण कुछ लोग राजा हिरण्यकश्यप और उसकी बहन की मृत्यु को भी बताया करते हैं।
इण्टरनेट को खँगालें तो उत्तर प्रदेश के हरदोई व बिहार के पूर्णिया जनपद को राजा हिरण्यकश्यप की रियासत बताने के साथ होली की शुरुआत वहाँ से होने का दावा किया गया है।
फिलहाल होली शुरू कहीं से भी हुई हो, आप कहीं भी किसी को रंग लगा सकते हैं। आज पड़वाँ है तो हम तो खेलने वाले नहीं होली, आप जी भर कर खेलिए और रंग-अबीर से आसमान को रंगीला राजा बना डालिए।
मध्य प्रदेश में राजनीतिक घमासान के बीच कॉन्ग्रेस के असंतुष्ट नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंगलवार को आखिरकार कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही सभी अटकलें खत्म हो गई हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़ दी है।
उन्होंने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखे अपने पत्र में कहा कि वह 18 वर्षों से कॉन्ग्रेस के प्राथमिक सदस्य रहे हैं, लेकिन अब राह अलग करने का वक्त आ गया है। दिलचस्प बात यह है कि यह पत्र कल यानी 9 मार्च का ही है।
सिंधिया ने सोनिया पर सब कुछ जानते हुए कुछ नहीं करने आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “मैं भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहा हूँ और जैसा कि आपको अच्छी तरह पता है कि पिछले एक साल से यह मार्ग प्रशस्त किया गया है।” आज भी मैं अपने राज्य और देश के लोगों की रक्षा करने के अपने लक्ष्य और उद्देश्य पर अडिग हूँ।
सिंधिया के साथ ही कॉन्ग्रेस के अन्य 14 विधायकों ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है ।
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को अपना इस्तीफ सौंपा है। अब उनका बीजेपी में जाने की बस औपचारिकता भर बाकी है। बहरहाल, जवाब में कॉन्ग्रेस ने भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी से बेदखल कर दिया है।
मध्य प्रदेश में यह राजनीतिक स्थिति ऐसे समय में उत्पन्न हुई है, जब प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। सिंधिया समर्थक विधायकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता अपनी अनदेखी से क्षुब्ध हैं।
सिंधिया के इस्तीफे पर कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “सिंधिया जी कॉन्ग्रेस पार्टी में कई वरिष्ठ पदों पर रहे और उनका सम्मान किया। शायद मोदी जी द्वारा दिए गए मंत्रियों के प्रस्ताव के कारण उन्हें लालच आ गया। हम जानते हैं कि उनका परिवार दशकों से बीजेपी से जुड़ा हुआ है, लेकिन फिर भी यह एक बड़ा नुकसान है।” इसके साथ ही अधीर रंजन चौधरी ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि पीएम मोदी के किसी लालच में ऐसा हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया बीजेपी इसी तरह की राजनीति करती है।
नागरिकता कानून (CAA) के समर्थकों और विरोधियों के बीच हुई हिंसा के दौरान जान गँवाने वाले दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल को जिस जगह पर पत्थरबाजों ने घेर कर मारा था, वहाँ का एक विडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है।
इस विडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह से भीड़ ने आकर सबसे पहले वहाँ पर CCTV कैमरा को तोड़ा। बता दें कि फरवरी 24, 2020 को पत्थरबाजी के दौरान हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की जान चली गई थी।
This is where constable Ratan Lal martyred. This is the place where 1000s of Burkha and Skull cap attacked Delhi Police. Look how they break CCTV Cameras before attacking Police. They even celebrated it.#AntiHinduRiotpic.twitter.com/zJfT8hIAU6
ट्विटर यूजर @pokershash ने एक विडियो शेयर करते हुए लिखा है- “यही वो जगह है, जहाँ हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल का बलिदान हुआ था। यही वो जगह है, जहाँ बुरका और टोपी पहने हुए हजारों की भीड़ ने दिल्ली पुलिस पर हमला किया। देखिए, किस तरह से उन्होंने पुलिस पर हमला करने से पहले CCTV कैमरा को तोड़ दिया। यहाँ तक कि इसके बाद उन्होंने जश्न भी मनाया। #AntiHinduRiot।”
विडियो बना रहे व्यक्ति को कहते हुए सुना जा सकता है कि मास्क लगाकर वो लोग CCTV कैमरा तोड़ रहे हैं।
दिल्ली हिंसा में मारे गए राजस्थान में सीकर जिले के रहने वाले हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल को केंद्र सरकार ने शहीद का दर्जा दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे से ठीक पहले दिल्ली में भड़के इन दंगों में कई लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी, जिनमें से हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल भी एक हैं।
रतन लाल के अलावा आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की भी निर्ममता से चार सौ बार चाकू गोदकर हत्या की गई। उनकी लाश अगले दिन एक नाले से बरामद हुई थी।
मध्य प्रदेश से बड़ी ख़बर आ रही है। मीडिया के हवाले से कहा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल होने वाले हैं। ‘न्यूज़ 24’ के मानक गुप्ता ने अपनी ट्वीट में बताया है कि सिंधिया भाजपा में शामिल हो रहे हैं और शिवराज सिंह चौहान को भाजपा विधायक दल का नेता चुना जा सकता है।
BIG BREAKING – Jyotiraditya Scindia joining BJP…!!! He has gone too far to return to Congress. Reports my colleague @RanjanSukesh#MadhyaPradesh#scindia
अगर ऐसा होता है तो मध्य प्रदेश में फिर से शिवराज सिंह चौहान की मुख्यमंत्री के रूप में वापसी हो सकती है। ख़बर के अनुसार, सिंधिया ने कह दिया है कि अब वापसी की कोई सम्भावना नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, रविवार की शाम कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की मुलाकात भाजपा के बड़े नेताओं से हुई है। कहा जा रहा है कि इस मुलाकात में सिंधिया को राज्यसभा भेजने के फॉर्मूले पर सहमति बनी है।हालाँकि, सिंधिया की माँग है कि केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाया जाए। ऐसा विभिन्न ख़बरों में कहा जा रहा है।
एनडीटीवी कई बार ऐसी ख़बरें करता रहता है, जिससे आतंकियों और पाकिस्तान को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिलती रहती है। अब इसी फेरहिस्त में एनडीटीवी की निधि राजदान का नया कारनामा सामने आता है। निधि जिस ट्विटर अकाउंट से अक्सर सार्वजनिक रूप से बातें किया करती थीं और इमोजी-इमोजी खेला करती थीं, वो आतंकवादी का निकला। निधि ‘Kashmirosint’ नामक ट्विटर हैंडल से अक्सर बातचीत किया करती थीं। अब सामने आया है कि ये ट्विटर अकाउंट आतंकवादियों द्वारा संचालित किया जाता था और इसके द्वारा प्रोपेगंडा व फेक न्यूज़ फैलाया जाता था।
दरअसल, दिल्ली पुलिस ने एक आतंकी दम्पति को गिरफ़्तार किया जो वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस के लिए काम करते थे। दिल्ली दंगों में भी इन दोनों के हाथ सामने आ सकते हैं। इससे पता चलता है कि इन दंगों की प्लानिंग काफी पहले से की जा रही थी और यह सब एक दिन में नहीं हुआ। नीचे संलग्न किए गए ट्वीट में आप देख सकते हैं कैंसे निधि राजदान एक-दो बार नहीं बल्कि कई बार आतंकवादियों के ट्विटर हैंडल के साथ इमोजी-इमोजी खेला करती थीं:
कश्मीर का रहने वाला दम्पति जहाँजैब सामी और उसकी पत्नी हिंदा बसीर बेग को आज हिरासत में लिया गया था। वही दोनों इस ट्विटर अकाउंट को चलाते थे। जहाँजैब सामी नामक यह व्यक्ति अफगानिस्तान के आईएसकेपी संगठन के वरिष्ठ सदस्यों के साथ सम्पर्क रखने के कारण भारतीय इंटेलिजेंस की नजरों में आया। यह संगठन अफगानिस्तान में आईएस का सहयोगी है।
पुलिस के अनुसार, ऐसा मालूम पड़ता है कि यह व्यक्ति फिदायीन हमले की तैयारी में था और इसके लिए हथियारों को भी जमा करने की कोशिश में था। उसकी पत्नी हिंदा बसीर बेग को भी पुलिस ने गिरफ़्तार किया। उनसे एनडीटीवी के लिंक्स सामने आने के बाद अब एक बार फिर से उसकी किरकरी हो रही है।
मध्य प्रदेश में सियासी संकट और गहरा हो गया है। वहाँ कमलनाथ सरकार कई समस्याओं से घिर गई है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री सोमवार (मार्च 9, 2020) को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से दिल्ली में मिले और उसके तुरंत बाद भोपाल रवाना हो गए। हालाँकि, उन्होंने ये ज़रूर कहा कि किसी भी मसले पर पार्टी का सरकार में न कोई विवाद है और न ही कोई संकट है। लेकिन, मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस व उसका समर्थन करने वाले विधायकों के बगावती तेवरों को देख कर ऐसा लगता नहीं। कहा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कैम्प के 6 मंत्री बेंगलुरु में हैं, जिनके फोन स्विच ऑफ हैं। कुल 11 विधायक बगावती तेवर अपनाए हुए हैं।
ख़बरों में तो यहाँ तक कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी जा सकती है। गुना सीट से चुनाव हारने के लिए सिंधिया राज्यसभा जाने की भी फ़िराक़ में हैं। फ़िलहाल कमलनाथ राज्य में सरकार और संगठन, दोनों के मुखिया हैं। राज्यसभा सीट की दावेदारी को लेकर भी कमलनाथ ने कहा कि कोई विवाद नहीं है और आलाकमान से चर्चा के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा। कमलनाथ ने दावा किया कि जिन विधायकों के बारे कहा जा रहा है कि वो गायब थे, वो सब तीर्थयात्रा पर गए थे।
मध्य प्रदेश में यूथ कॉन्ग्रेस का चुनाव भी टाल दिया गया है। मुख्यमंत्री ने सभी मंत्रियों की बैठक भी बुलाई है। उधर एक निर्दलीय विधायक ने गृह मंत्रालय की माँग कर के कॉन्ग्रेस को सकते में डाल दिया है। निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शोरा ने मोलजोल की शुरुआत करते हुए कहा कि उन्हें गृह मंत्रालय चाहिए क्योंकि वर्तमान मंत्री बाला बच्चन इस मंत्रालय को संभालने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि होली के बाद मंत्रिमंडल विस्तार होगा, तब उन्हें कोई मलाईदार विभाग दिया जा सकता है।
बता दें कि हरियाणा के गुरुग्राम से सटे तावडू में स्थित आइटीसी ग्रैंड भारत होटल में मंगलवार रात करीब 11 बजे मध्यप्रदेश नंबर की गाड़ियों से मध्यप्रदेश के आठ विधायकों के पहुँचने की ख़बर आई थी। कॉन्ग्रेस पार्टी ने दावा किया था कि उसका व उसके सहयोगियों के कुल 9 विधायकों को भाजपा ने होटल में बंद कर के रखा हुआ है। वहीं भाजपा का दावा है कि दिग्विजय सिंह ये सब कमलनाथ पर दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं।
#BREAKING | दिल्ली में सचिन पायलट से मिलकर अपने घर पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया
उधर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सचिन पायलट से मुलाक़ात की है। वो फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं। कॉन्ग्रेस के संकटमोचक डीके शिवकुमार कर्नाटक में ही मौजूद हैं लेकिन इस बार वो भी बेबस नज़र आ रहे ।
विविधताओं से भरी भारतीय जीवन शैली अपने आम में जीवन के हर रंग समाए हुए है। बात जीवन के रंगों के उत्सव की हो तो होली से ख़ास क्या होगा। वैसे होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह प्रेम, ताजगी और ऊर्जा का त्यौहार है साथ ही रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलायी जाती है। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल से सराबोर कर देते हैं, ढोलक और अन्य वाद्य यंत्रों की ताल पर होली के गीत गाए जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाने के साथ ही होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर प्यार से गले मिल जाते हैं। यह समरसता का प्रतीक भी है।
काशी मोक्ष की नगरी है और मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं। लिहाजा यहाँ पर मृत्यु भी उत्सव है और होली पर चिता की भस्म को उनके गण अबीर और गुलाल की भांति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का मनोरथ करते हैं। pic.twitter.com/daTBbUtvYQ
बनारस में होली की शुरूआत रंगभरी एकादशी से ही हो जाती है। राग विराग की नगरी काशी की परंपराएं भी अजग और अनोखी हैं। रंगभरी एकादशी पर भूतभावन बाबा भोलेनाथ के गौना के दूसरे दिन काशी में उनके गणों के द्वारा चिता भस्म की होली की मान्यता है। रंगभरी एकादशी के मौके पर गौरा को विदा करा कर कैलाश ले जाने के साथ ही भगवान भोलेनाथ काशी में अपने भक्तों को होली खेलने और हुडदंग की अनुमति प्रदान करते हैं। इसके बाद ही काशी होलियाने मूड में आती है।
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। वैसे होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। बनारस में रंग भरी एकादशी से होली का नशा काशी वासियों पर छा जाता है।
बरसाने की लट्ठ मार होली
होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं। हालाँकि, इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्णिमा के दिन मनाए जाने के कारण पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। कहते हैं, इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।
राग-विराग-वैराग की नगरी काशी की परम्पराएँ भी अनोखी हैं। रंगभरी एकादशी पर भूतभावन महादेव के गौना के दूसरे दिन काशी में उनके गणों के द्वारा चिता भस्म की होली की मान्यता है।
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। भागवत पुराण के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। जो आज के मुल्तान (पाकिस्तान) पर शासन करता था। ब्रह्मा जी उसकी कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया था जिसने उसे एक प्रकार से अमर बना दिया था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। यहाँ तक कि उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद नारायण भक्त था। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भगवान की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।
सनातन में ऐसी कहानियों का बहुत गूढ़ अर्थ था। प्रतीक रूप से ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
प्रह्लाद-होलिका
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढूँढ़ी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।
होलिका दहन
होलिका दहन का पहला काम झंडा या डंडा (रेड़ का पेड़) गाड़ना होता है। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।
होलिका दहन
लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा संगीत की लय में नृत्य में डूब जाते हैं।
होलीका दहन का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं।
आध्यात्मिक रूप से होलिका दहन का मकसद पुराने कपड़ों या वस्तुओं को जलाना ही नहीं है, बल्कि पिछले एक साल की यादों को जलाना है ताकि आज से आप एक नए और उल्लासमय जीवन के रूप में शुरुआत कर सकें।
रंग बरसे, उमंग बरसे
प्रेम और सौहार्द का प्रतीक होली से अगला दिन धूलिवंदन भी कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। कबीरा और जोगीरा के माध्यम से समाज ने अपने मन की तमाम कुण्ठाओं के विसर्जन और मनोरंजन का भी उपाय कर रखा था।
होली आई रे बधाई रंग बरसे
होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।
महाश्मशान चिता भस्म होली
मस्तानों की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में होली खेली जाती है। यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना कराकर काशी लौटाते हैं तो उनका स्वागत सभी लोकों के लोग करते हैं। उसमें शिव के भूत-पिशाच भक्त गण और दृश्य-अदृश्य आत्माएँ मौजूद नहीं होतीं। इसलिए रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में महादेव अपने भक्तों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। यह भस्म कोई साधारण भस्म नहीं होती इंसान के शव जलने के बाद पैदा होने वाली राख होती है।
मणिकर्णिका घाट महाश्मशान की चिताभस्म होली–
रंग भरी एकादशी के दूसरे दिन काशी के मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से होली खेली जाती है! ऐसी मान्यता है कि “बाबा विश्वनाथ” स्वयं अपने भूत-प्रेत के साथ होली खेलने शमशान आते हैं…. तब से वह परम्परा आज भी कायम है। pic.twitter.com/px7lQOtALj
परंपराओं के अनुसार रंगभरी एकादशी के ठीक अगले दिन भगवान शिव के स्वरुप बाबा मशान नाथ की पूजा कर श्मशान घाट पर चिता भस्म से उनके गण होली खेलते हैं। काशी मोक्ष की नगरी है और मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं। लिहाजा यहाँ पर मृत्यु भी उत्सव है और होली पर चिता की भस्म को उनके गण अबीर और गुलाल की भांति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का उपक्रम करते हैं।
खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी भूत पिसाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता-भस्म भर झोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी गोपन-गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कौनऊ बाधा ना साजन ना गोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज कै गोरी धन-धन नाथ अघोरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी
रंग भरी एकादशी: आज के ही दिन बाबा विश्वनाथ का गौना होता है और काशीवाशी बाबा को गुलाल लगाकर होली खेलने की अनुमति मांगते हैं।अद्धभुत मनभावन नज़ारा होता है…..
बुढ़वा मंगल पर सुर लहरियों से सराबोर करते काशी के धरोहर डॉ. राजेश्वर आचार्य
होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं। होली युवाओं के जोश का त्यौहार है लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्ग लोगों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है। बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है। बनारस के इस पारम्परिक मेले से प्रमुख साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी सम्बद्ध रहे हैं।
चलते एक जोगीरा की बानगी देखिए, जोगीरा मन के उन भावों को भी व्यक्त करने की कला है जो आमतौर पर मन में होती तो ज़रूर है पर कही नहीं जाती। तो चलिए एक जोगीरा हो जाए….
प्रियंका गाँधी ने ‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर को जो पेंटिंग बेची थी, उस पूरी प्रक्रिया में पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने बिचौलिए की भूमिका निभाई थी। मिलिंद फ़िलहाल मुंबई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हैं। मई 1, 2010 को मिलिंद द्वारा राणा को लिखे गए पत्र से सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। मिलिंद मुंबई में राणा से मिले थे और उन्होंने इस पत्र में राणा कपूर को ‘अंकल’ कह कर सम्बोधित करते हुए लिखा है कि वो ‘यस बैंक’ द्वारा किए जा रहे कार्यों से ख़ासे प्रभावित हैं। मिलिंद ने लिखा था कि कला के क्षेत्र में ‘यस बैंक’ के कार्य और नेहरू सेंटर में उनके दफ्तर से वो बहुत प्रभावित हैं।
मिलिंद देवड़ा के इस पत्र से ऐसा लगता है कि जब वो दोनों मिले थे, तब उनके बीच प्रियंका गाँधी की उस पेंटिंग को ख़रीदने की बातचीत हुई थी। राणा कपूर ने शायद उस पेंटिंग की बड़ाई की हो या फिर उसे ख़रीदने की इच्छा जाहिर की हो। इसी बात को लेकर मिलिंद ने राणा कपूर को सलाह दी कि वो इस बारे में सीधा प्रियंका गाँधी को लिखें और अपनी इच्छा जाहिर करें। मिलिंद पत्र में यह भी दावा करते हैं कि गाँधी परिवार उस पेंटिंग को तभी बेचेगा, जब वो इस बात को लेकर आश्वस्त होगा कि पेंटिंग ख़रीदने वाला व्यक्ति इसकी इज्जत करे, इसकी सुरक्षा पर ध्यान दे व अच्छे से देखभाल करे।
पेंटिंग खरीदने के लिए मिलिंद देवड़ा ने राणा कपूर को लिखा पत्र
मिलिंद देवड़ा इसी पत्र में राणा कपूर को आश्वासन दिलाते हैं कि उनके अथवा उनकी कम्पनी द्वारा इस पेंटिंग को ख़रीदना जायज है। वो दोबारा फिर इसी बात को दोहराते हैं की वो पेंटिंग ख़रीदने के लिए प्रियंका गाँधी को लिखें। पत्र देख कर सपहत होता है कि जितनी राणा कपूर को पेंटिंग ख़रीदने की जल्दी नहीं थी, उतनी मिलिंद देवड़ा को इसे बेचने की थी। यदि राणा कपूर को वो पेंटिंग उतनी ज्यादा ही पसंद आई होती तो वो पहले ही इस बारे में मिलिंद को लिखते।
नीचे आप उस चेक की फोटो देख सकते हैं, जिसके माध्यम से राणा कपूर ने पेंटिंग की एवज में प्रियंका गाँधी को पेमेंट किया। ये 2 करोड़ रुपए का चेक है। ये चेक ‘हॉन्गकॉन्ग एन्ड संघाई बैंकिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HSBC)’ का चेक है। इस चेक पर जून 3, 2010 की तारीख दर्ज है।
राणा कपूर ने इसी चेक के माध्यम से प्रियंका को पेमेंट किया
‘ऑपइंडिया’ को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि मिलिंद देवड़ा और राणा कपूर के बीच इस पेंटिंग की बिक्री को लेकर तेज़त के माध्यम से बातचीत भी हुई। मिलिंद अपने ब्लैकबेरी के फोन से राणा से बात किया करते थे। यहाँ भी वो राणा कपूर को ‘अंकल’ कह कर सम्बोधित करते हैं। ऑपइंडिया के सूत्रों की मानें तो मिलिंद देवड़ा ने मई 29, 2010 को राणा कपूर को भेजे मैसेज में लिखा था:
“राणा अंकल, मई 28, 2010 को मुझे आपका पत्र मिला और मैंने उसे प्रियंका गाँधी को भेज दिया है। हालाँकि, अभी तो उनके या उनके परिवार के साथ अपनी मुलाक़ात नहीं हो सकेगी लेकिन कुछ दिनों बाद मैं इसके लिए पूरा प्रबंध करा दूँगा। पेंटिंग के पेमेंट चेक के रूप में प्रियंका और सोनिया अगले ही सप्ताह चाहती हैं। मेरे पिता को भी इस बारे में बताया गया है और उन्होंने भी आपसे संपर्क करने की असफल कोशिश की थी। दुर्भाग्य से चीजें काफ़ी देरी से हो रही हैं। आप इस मैसेज का रिप्लाई करें और बताएँ कि आप कब तक चेक दे रहे हैं। मुझे मेरे पिता को इस बारे में तुरंत बताना है। आप मैसेज देख रहे हैं तो जल्द रिप्लाई करें।”
उपर्युक्त मैसेज से स्पष्ट है कि ‘यस बैंक’ के तत्कालीन सीईओ राणा कपूर चाहते थे कि वो पेंटिंग तो ख़रीदेंगे लेकिन बदले में गाँधी परिवार के साथ उनकी बैठक का प्रबंध किया जाए। यही माँग उन्होंने मिलिंद और मुरली से रखी होगी। मिलिंद के पिता मुरली देवड़ा उस वक़्त मनमोहन सिंह सरकार में पेट्रोलियम मंत्री थे। वो यूपीए-1 में भी केंद्रीय मंत्री रह चुके थे। इस टेक्स्ट से ये भी पता चलता है कि पेंटिंग ख़रीदने में राणा ने किसी कारणवश बाद में ज्यादा रुचि न दिखाई हो लेकिन मिलिंद जल्द से जल्द 2 करोड़ रुपए का पेमेंट चाहते थे। देवड़ा पिता-पुत्र लगातार बिचौलिए के रूप में कार्यरत थे।
इसके ठीक 5 दिन बाद मिलिंद देवड़ा ने राणा कपूर को फिर से मैसेज किया और अबकी उनकी भाषा काफ़ी झल्लाई हुई सी लग रही थी। मिलिंद नस इस मैसेज में राणा कपूर से कहा कि वो गाँधी परिवार को कई सप्ताह से आश्वासन दे रहे हैं लेकिन आपने चेक के इंतज़ार में सब गुड़-गोबर हो रहा है। उन्होंने राणा कपूर को जल्द से जल्द चेक पेमेंट की व्यवस्था करने को कहा। उसके अगले दिन राणा कपूर ने मिलिंद को फोन किया और उसी दिन 2 बजे दोपहर में दोनों की बैठक हुई। राणा से मिलने के लिए मिलिंद ने अपनी फ्लाइट तक कैंसल कर दी थी।
मिलिंद ने राणा को कह दिया था कि वो चिट्ठी और चेक तैयार रखें, जिन्हें लेने वो उनके दफ्तर आ रहे हैं। इस पेंटिंग को बेचवाने में मिलिंद देवड़ा ने दिन-रात एक कर दिया था, ऐसा प्रतीत होता है। लगातार राणा कपूर के पीछे पड़ना, अपने पिता तक को इसमें शामिल करना और चेक पेमेंट लेने के लिए फ्लाइट तक कैंसल कर देना- इन चीजों से उनकी बेचैनी तो समझी जा सकती है लेकिन इसकी वजह साफ़ नहीं है।
जून 4, 2010 को प्रियंका गाँधी ने राणा कपूर को पत्र लिख कर पेंटिंग को ख़रीदने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने इसी पत्र में बताया कि इस पेंटिंग को 1985 में उनके पिता व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को ये गिफ्ट के रूप में मिला था और अभी ये उनके स्वामित्व में है। इसी पत्र में प्रियंका ने इसकी भी पुष्टि की कि उन्हें राणा कपूर का चेक मिल चुका है और पेमेंट डन हो गया है। अंत में उन्होंने राणा को लिखा है कि उन्हें विश्वास है कि वो इस पेंटिंग को सही तरीके से रखेंगे।
मिलिंद देवड़ा ने ही इस पेंटिंग का मूल्य 2 करोड़ रुपए तय किया था और राणा को इस सम्बन्ध में सूचित किया। उन्होंने राणा कपूर को सलाह दी थी कि वो प्रियंका को लिखें कि इस पेंटिंग के एवज में 2 करोड़ रुपए देने को राजी हो गए हैं।
जब ‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर द्वारा कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी की पेंटिंग 2 करोड़ रुपए में ख़रीदने की बात आई, तब पार्टी चारों तरफ़ से आरोपों से घिर गई। इसके बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने बयान जारी कर उस पेंटिंग के बारे में डिटेल्स बताए। रणदीप सिंह सुरजेवाला ने दावा किया कि जो पेंटिंग प्रियंका ने राणा को बेचीं, वो मशहूर पेंटर एमएफ हुसैन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को गिफ्ट की थी। ये बात 1985 की है, जब कॉन्ग्रेस अपना 100वाँ स्थापना दिवस मना रही थी। अब इसके बाद कई सवाल उठते हैं। क्या एमएफ हुसैन ने राजीव को जो पेंटिंग गिफ्ट की, उसे बेचने का हक़ उनके परिवार को है?
अगर किसी प्रधानमंत्री को कोई व्यक्ति कुछ गिफ्ट देता है तो वो उस पद को देता है या फिर व्यक्ति को? अगर पद को देता है तो वो चीज सरकारी संपत्ति हुई और उसे बेचने का हक़ उसके परिवार को नहीं है। राजीव उस समय कॉन्ग्रेस अध्यक्ष भी थे। ऐस में अगर वो गिफ्ट कॉन्ग्रेस पार्टी को दी गई थी तो प्रियंका गाँधी बिना पार्टी की अनुमति के उसे कैसे बेच सकती हैं? इस पेंटिंग के कारण ‘यस बैंक’ घोटाले से प्रियंका गाँधी के तार जुड़ रहे हैं और कॉन्ग्रेस पार्टी किसी तरह इस मुद्दे से किनारा करने में लगी हुई है।
भाजपा ने दावा किया है कि ‘यस बैंक’ घोटाले में प्रियंका गाँधी भी शामिल हैं। भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने वित्तीय अपराधों की एक सूची शेयर कर के बताया कि भारत में हुए हर ऐसे घोटालों के तार गाँधी परिवार से जुड़ते रहे हैं। उन्होंने भगोड़ा कारोबारी विजय माल्या के सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के संबधों का भी जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि एक अन्य भगोड़ा कारोबारी नीरव मोदी की ब्राइडल ज्वेलरी कलेक्शन का उद्घाटन राहुल गाँधी ने किया था और अब राणा कपूर से प्रियंका गाँधी के तार जुड़ते नज़र आ रहे हैं।
टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, मिलिंद देवड़ा ने राणा कपूर और प्रियंका गाँधी के बीच इस पेंटिंग को लेकर डील कराई थी। देवड़ा उन्हें ‘राणा अंकल’ कह कर सम्बोधित करते थे। ख़बर में दावा किया गया है कि पेंटिंग बेचने के बाद मिले रुपयों को प्रियंका गाँधी के ऑफिस को दे दिया गया। फिर प्रियंका गाँधी ने किस हैसियत से उस पेंटिंग को राणा कपूर को बेचा, ये अब तक साफ़ नहीं हो पाया है।
दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में समुदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए अपराधों को व्हॉइटवॉश करने में सोशल मीडिया पर वामपंथियों की एक पूरी लॉबी काम कर रही है। इसी लॉबी का हिस्सा टीवी कलाकार सुशांत सिंह हैं। वही सुशांत सिंह जिन्होंने कुछ दिन पहले न केवल सीएए विरोधी प्रदर्शन में भाग लिया, बल्कि सीएए, एनआरसी और एनपीआर को सेक्स का अधिकार छिनने तक से जोड़ दिया। हालाँकि इन सबके कारण सुशांत सिंह की सोशल मीडिया पर काफी फजीहत हुई, लेकिन फिर भी वह अपनी आदतों से बाज नहीं आए और गाहे-बगाहे मौक़ा देखकर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ बोलते रहे, साथ ही विशेष समुदाय के अपराधों पर पर्दा ढकते रहे।
इस बार सुशांत सिंह ने ये कोशिश वुमेन्स डे की आड़ में की। 8 मार्च को वुमेन्स डे पर सुशांत सिंह ने एक ट्वीट किया। ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? नहीं। और कहीं औरतों की हिंसक भीड़ के बारे में सुना है? मैंने तो नहीं। पुरुषप्रधान समाज ने बेहिसाब शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा दी है हमें। काफ़ी नहीं है क्या? अब औरतों को दुनिया सम्भालने दो यार।”
दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? नहीं। और कहीं औरतों की हिंसक भीड़ के बारे में सुना है? मैंने तो नहीं। पुरुषप्रधान समाज ने बेहिसाब शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा दी है हमें। काफ़ी नहीं है क्या? अब औरतों को दुनिया सम्भालने दो यार।#HappyWomensWorld
— सुशांत सिंह sushant singh سوشانت سنگھ (@sushant_says) March 8, 2020
अब हालाँकि, ये बात सब जान चुके हैं कि न केवल दिल्ली में हुई हिंसा के पीछे बुर्काधारी महिलाओं का हाथ था। बल्कि डीसीपी अमित शर्मा एवं एसीपी अनुज के घायल होने के पीछे भी इन्ही महिलाओं का हाथ था और साथ ही रतनलाल की मौत के पीछे भी इन्हीं महिलाओं का हाथ था। जिन्होंने प्रदर्शन के नाम पर कई दिनों तक रास्ते को जाम किए रखा।
तो फिर, ऐसे में सवाल है कि आखिर ये सुशांत सिंह किन महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं। अगर इन्हें महिला दिवस पर नारी को उसके अधिकार दिलाने की गुहार लगानी ही है, पुरुष प्रधान समाज को कोसना ही है तो फिर आखिर महिलाओं की सौम्यता, सरलता साबित करने के लिए दिल्ली दंगों का उल्लेख करने की क्या जरूरत है? आखिर क्या आवश्यकता है अपने ट्वीट में ये पूछने की कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरते थीं क्या? आखिर ऐसे सवालों से सुशांत क्या साबित करना चाहते हैं कि सभी महिलाओं का वर्ग एक समान होता है, सभी महिलाओं की परिस्थितियाँ एक सी होती है? जी नहीं। कुछ के ऊपर मजहबी उन्माद का रंग भी चढ़ा होता है। जो पहले उन्हें शाहीन बाग जैसे निराधार प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी बनवाता है और फिर पुलिस के पीछे पत्थर लेकर दौड़वाता है।
सोशल मीडिया पर चाँदबाग की वो वीडियो सैलाब की तरह तैर रही है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं ने पुलिस अधिकारियों पर पत्थर से हमला कर उन्हें घायल किया। लेकिन, इसके बाद भी सुशांत सिंह पूछते हैं कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? मैंने तो नहीं सुना। सोचिए कितना शर्मसार करने वाला है सुशांत का ये ट्वीट।
क्या चाँदबाग की वो वीडियो सुशांत सिंह के पास नहीं पहुँची। या फिर ये कहें कि उन्होंने अपनी आँखों पर सेक्युलरिज्म के नाम की ऐसी पट्टी बाँध ली है, जो उन्हें इस भीड़ में मौजूद बुर्काधारी महिलाओं को न देखने पर मजबूर कर रही है।
खैर, वजह जो भी हो। जब सुशांत सिंह ने इस मुद्दे को उठाया और अपने फॉलोवर्स को वुमेन्स डे के नाम पर बरगलाया, तो सोशल मीडिया यूजर्स भी उनके बहकावे में नहीं आए और फर्जी नारीवादी बन नारी के हित में प्रोपगेंडा का झंडा बुलंद करने पर उन्हें खूब लताड़ा। देखते ही देखते यूजर्स उनके ट्वीट के जवाब में चाँदबाग की वीडियो ट्वीट करने लगे और कहने लगे ये देखिए जनाब, बुर्के के अंदर औरते ही हैं।
— ?? प्रिया राठौड़ ?? (@lokarlorajniti) March 8, 2020
इसके अलावा ऐसी तस्वीरें भी अपलोड की गई जिनमें मुस्लिम समुदाय की औरतों ने पत्थर उठाकर पुलिस को मारने की कोशिश की थी और साथ ही यूजर्स ने उन्हें ये भी कहा कि उन्होंने सुशांत को उनकी फिल्मों में केवल देशभक्त के किरदार में देखा है, इसलिए अब उनके मुँह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं।
हालाँकि, सोशल मीडिया पर सुशांत सिंह के कुछ प्रशंसक भी आए और उन्होंने इस तथ्य को पूरी तरह से खारिज किया कि इन दंगों में महिलाओं का कोई भी हाथ था, जबकि जिन्होंने चाँदबाग की वीडियो शेयर की वो लगातार पुलिस अधिकारियों के घायल और मौत के पीछे बुर्केधारी महिलाओं को जिम्मेदार ठहराते रहे।