Sunday, November 29, 2020
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सुशांत सिंह की नई बकैती: दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरते थीं क्या? मैंने तो नहीं सुना, लोगों ने दिखाई हकीकत

"दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? नहीं। और कहीं औरतों की हिंसक भीड़ के बारे में सुना है? मैंने तो नहीं। पुरुषप्रधान समाज ने बेहिसाब शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा दी है हमें। काफ़ी नहीं है क्या? अब औरतों को दुनिया सम्भालने दो यार।"

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में समुदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए अपराधों को व्हॉइटवॉश करने में सोशल मीडिया पर वामपंथियों की एक पूरी लॉबी काम कर रही है। इसी लॉबी का हिस्सा टीवी कलाकार सुशांत सिंह हैं। वही सुशांत सिंह जिन्होंने कुछ दिन पहले न केवल सीएए विरोधी प्रदर्शन में भाग लिया, बल्कि सीएए, एनआरसी और एनपीआर को सेक्स का अधिकार छिनने तक से जोड़ दिया। हालाँकि इन सबके कारण सुशांत सिंह की सोशल मीडिया पर काफी फजीहत हुई, लेकिन फिर भी वह अपनी आदतों से बाज नहीं आए और गाहे-बगाहे मौक़ा देखकर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ बोलते रहे, साथ ही विशेष समुदाय के अपराधों पर पर्दा ढकते रहे।

इस बार सुशांत सिंह ने ये कोशिश वुमेन्स डे की आड़ में की। 8 मार्च को वुमेन्स डे पर सुशांत सिंह ने एक ट्वीट किया। ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? नहीं। और कहीं औरतों की हिंसक भीड़ के बारे में सुना है? मैंने तो नहीं। पुरुषप्रधान समाज ने बेहिसाब शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा दी है हमें। काफ़ी नहीं है क्या? अब औरतों को दुनिया सम्भालने दो यार।”

अब हालाँकि, ये बात सब जान चुके हैं कि न केवल दिल्ली में हुई हिंसा के पीछे बुर्काधारी महिलाओं का हाथ था। बल्कि डीसीपी अमित शर्मा एवं एसीपी अनुज के घायल होने के पीछे भी इन्ही महिलाओं का हाथ था और साथ ही रतनलाल की मौत के पीछे भी इन्हीं महिलाओं का हाथ था। जिन्होंने प्रदर्शन के नाम पर कई दिनों तक रास्ते को जाम किए रखा।

तो फिर, ऐसे में सवाल है कि आखिर ये सुशांत सिंह किन महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं। अगर इन्हें महिला दिवस पर नारी को उसके अधिकार दिलाने की गुहार लगानी ही है, पुरुष प्रधान समाज को कोसना ही है तो फिर आखिर महिलाओं की सौम्यता, सरलता साबित करने के लिए दिल्ली दंगों का उल्लेख करने की क्या जरूरत है? आखिर क्या आवश्यकता है अपने ट्वीट में ये पूछने की कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरते थीं क्या? आखिर ऐसे सवालों से सुशांत क्या साबित करना चाहते हैं कि सभी महिलाओं का वर्ग एक समान होता है, सभी महिलाओं की परिस्थितियाँ एक सी होती है? जी नहीं। कुछ के ऊपर मजहबी उन्माद का रंग भी चढ़ा होता है। जो पहले उन्हें शाहीन बाग जैसे निराधार प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी बनवाता है और फिर पुलिस के पीछे पत्थर लेकर दौड़वाता है।

सोशल मीडिया पर चाँदबाग की वो वीडियो सैलाब की तरह तैर रही है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं ने पुलिस अधिकारियों पर पत्थर से हमला कर उन्हें घायल किया। लेकिन, इसके बाद भी सुशांत सिंह पूछते हैं कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? मैंने तो नहीं सुना। सोचिए कितना शर्मसार करने वाला है सुशांत का ये ट्वीट।

क्या चाँदबाग की वो वीडियो सुशांत सिंह के पास नहीं पहुँची। या फिर ये कहें कि उन्होंने अपनी आँखों पर सेक्युलरिज्म के नाम की ऐसी पट्टी बाँध ली है, जो उन्हें इस भीड़ में मौजूद बुर्काधारी महिलाओं को न देखने पर मजबूर कर रही है।

खैर, वजह जो भी हो। जब सुशांत सिंह ने इस मुद्दे को उठाया और अपने फॉलोवर्स को वुमेन्स डे के नाम पर बरगलाया, तो सोशल मीडिया यूजर्स भी उनके बहकावे में नहीं आए और फर्जी नारीवादी बन नारी के हित में प्रोपगेंडा का झंडा बुलंद करने पर उन्हें खूब लताड़ा। देखते ही देखते यूजर्स उनके ट्वीट के जवाब में चाँदबाग की वीडियो ट्वीट करने लगे और कहने लगे ये देखिए जनाब, बुर्के के अंदर औरते ही हैं।

इसके अलावा ऐसी तस्वीरें भी अपलोड की गई जिनमें मुस्लिम समुदाय की औरतों ने पत्थर उठाकर पुलिस को मारने की कोशिश की थी और साथ ही यूजर्स ने उन्हें ये भी कहा कि उन्होंने सुशांत को उनकी फिल्मों में केवल देशभक्त के किरदार में देखा है, इसलिए अब उनके मुँह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर सुशांत सिंह के कुछ प्रशंसक भी आए और उन्होंने इस तथ्य को पूरी तरह से खारिज किया कि इन दंगों में महिलाओं का कोई भी हाथ था, जबकि जिन्होंने चाँदबाग की वीडियो शेयर की वो लगातार पुलिस अधिकारियों के घायल और मौत के पीछे बुर्केधारी महिलाओं को जिम्मेदार ठहराते रहे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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