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रबींद्र नाथ टैगोर के गीत पर अश्लील पैरोडी: पुरुष लिंग, संभोग जैसे शब्दों वाला विडियो वायरल

कोलकाता के रबींद्र भारती विश्वविद्यालय की तरह मालदा की चार छात्राओं ने रबींद्र नाथ ठाकुर के गीत को विकृत करके अश्लील विडियो बनाया। यह मामला मालदा के बारलो ग‌र्ल्स हाई स्कूल की है। विडियो स्कूल परिसर में बनाया गया है, जिसमें स्कूल ड्रेस में छात्राओं को अश्लील गीत गाते देखा जा सकता है। देखते ही देखते यह विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। आरोपित छात्राएँ 11वीं क्लास की हैं।

इस संबंध में आरोपित चारों छात्राओं के अभिभावकों को स्कूल बुलाकर उनके सामने ही छात्राओं से माफीनामा लिखाया गया। माफीनामा देने के बाद ही इन छात्राओं को 11वीं की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई। हालाँकि स्कूल की प्रधानाध्यापिका की तरफ से कहा गया है कि इन छात्राओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर स्कूल प्रबंधन समिति विचार करेगी।

रबींद्र नाथ टैगोर की मूल रचना का हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: “जब मैं अपने ज्ञात मार्ग पर टहल रहा था, रात के आकाश में चंद्रमा निकल रहा था… तभी हम उस पल की दिव्यता के बारे में जाने बिना मिले थे।” इसका अंग्रेजी अनुवाद यह है – “While I was strolling on my known path, the Moon had risen to the night sky… That was when we met without knowing about the divinity of the moment.”

हालाँकि, टैगोर के गीत की अश्लील पैरोडी, जो छात्राओं ने विडियो में गाया है, उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: “रात में आकाश के नीचे जहाँ हम चल रहे थे, किसी एक जगह पर पुरुष लिंग के द्वारा हमारे साथ संभोग किया गया। जब यह सब हो रहा था, पड़ोस के एक चाचा ने हमारे संभोग क्रिया को देखा। बहन#द! हमने एक जगह पर पुरुष लिंग के साथ संभोग किया।” जबकि अंग्रेजी अनुवाद कुछ यूँ है : “On our way under the night sky, we were fuced by a dik at one place. All this while, an uncle from the neighbourhood watched us fuk. Sister fucer! We fuced a di*k at one place. (3) ”

प्रधानाध्यापिका दीपश्री मजूमदार ने बताया कि छात्राओं ने अपनी की गई गलती को लेकर माफी माँगी है। उन्होंने कहा, “हमसे भूल हो गई। हम नहीं सोचे थे कि बात इतनी बढ़ जाएगी। हमें माफ कर दीजिए।” बाद में छात्राओं से लिखित माफीनामा लेकर प्रधानाधयापिका ने परीक्षा में बैठने की अनुमति दी।

दीपश्री मजूमदार ने कहा कि चारों छात्राओं व उनके अभिभावकों के साथ बंद कमरे में बैठक की गई। बैठक में कई शिक्षक भी मौजूद थे। छात्राओं ने वचन दिया कि भविष्य में इस तरह का अपराध दोबारा नहीं करेंगी। प्रधानाध्यापिका ने कहा कि छात्राओं ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, उसे कोई सभ्य व्यक्ति मुँह से भी नहीं निकाल सकता है। शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने भी इस घटना की निंदा की है।

गौरतलब है कि इससे पहले होली उत्सव के दौरान रबींद्र भारती विश्वविद्यालय की छात्राओं ने अपनी पीठ पर रबींद्र नाथ ठाकुर के गीत को विकृत कर लिखा था। इसमें बेहद अश्लील शब्द लिखे गए थे। रबींद्र नाथ से जुड़े इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय में अश्लीलता करने को लेकर सवाल खड़े हुए थे और प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की माँग की गई थी। लोगों का कहना था कि रबींद्र नाथ टैगोर द्वारा लिखे गए गीत आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं। उनसे जुड़े संस्थान में इस तरह के अश्लील गीत बजाने और अश्लील नृत्य ने बंगाल को अपमानित किया है।

महीनों से हिंदुओं पर हमले की योजना बना रही मुस्लिम भीड़ आख़िर पीड़ित कैसे? – 10 कहानियों से साफ होती तस्वीर

जिसने बड़ी मात्रा में ईंट-पत्थर घरों, मस्जिदों और ऊँचे मकानों की छतों पर सजा कर रख दिए हों, जिसने पेट्रोल खरीदकर, काँच की बोतलें इकट्ठा कर पेट्रोल बम बनाकर तैयार कर लिए हों, जिसने तेजाब खरीदकर बोतलों में जमा कर लिया हो, जिसने अपनी रक्षा के लिए हथियारों को सहेजकर रख लिया हो, जिसने अपने कीमती सामानों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया हो, जिसने हिंदुओं की संपत्ती को अपने निशाने पर ले लिया हो, जिसने हमले को अंजाम देने के लिए ऊँची इमारतों का चयन कर लिया हो, जिसने हिंदुओं के घरों को निशाना बनाने के लिए बड़ी गुलेल तैयार कर ली हो, जिसने स्कूलों से अपने बच्चों को पहले ही सुरक्षित निकाल लिया हो और जिसने कानों-कान अपने लोगों को हमला करने का संदेश दे दिया हो… आख़िर वही समुदाय दिल्ली दंगों का पीड़ित कैसे हो सकता है? इतने सारे ‘जिसने’ वाले सवाल उठना लाज़मी है, क्योंकि जिस समुदाय ने हिदुओं के खिलाफ़ महीनों तक साजिश रची और तैयारी की हो वही समुदाय आज अपने को पीड़त साबित करने पर तुला हुआ है।

खुद को पीड़ित दिखाने की कला भी देखिए साहब! संतरों को सड़क पर फैला दिया जाता है, रेहड़ी में खुद ही आग लगा दी जाती है। किराए की दुकान से अपने कीमती सामान को निकालकर उसे आग के हवाले कर दिया जाता है। बीमा कंपनी का लाभ लेने के लिए शोरूम से बाईकों को पहले ही निकालकर उसमें खुद ही तोड़फोड़ की जाती है, और पीड़ित दिखाने के लिए शोरूम से एक काउंटर बाहर निकालकर उसमें आग लगा दी जाती है। हद तो तब हो गई कि जब अपनी ही भीड़ की चपेट में आने से जिस भाईजान की जान चली गई, उसकी लाश को 24 घंटे घर के अंदर रखा जाता है और फ़िर जैसै ही केजरीवालल सरकार मृतकों के लिए मुआवजे का ऐलान करती है, वैसे ही उस लाश को निकाकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया जाता है।

आश्चर्य इस बात का कि जो दिल्ली दंगों में दंगाइयों का चेहरा बना, वही मुस्लिम समुदाय सबसे पहले मीडिया के सामने आकर झूठ के आँसू दिखाते हुए अपने को पीड़ित प्रदर्शित करता है। इसमें ग़ौर करने वाली बात ये है कि सीएए विरोध के नाम पर की गई हिंदू विरोधी हिंसा में छोटे से लेकर बड़े तक, जवान से लेकर बूढ़े तक और महिलाओं से लेकर बच्चों तक हर कोई शामिल था। इसे देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह लड़ाई एक दिन या सीएए विरोध की नहीं बल्कि गजवा-ए-हिंद के सपने को साकार करने की है।

खैर, अब आपको याद दिलाते हैं, दिल्ली हिंसा में असली पीड़ितों का दर्द और सच्ची कहानी, जो किसी न किसी रूप में मुस्लिमों की साजिश का तो शिकार हुए ही, साथ ही हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई के मीडिया रचित शोर में अपने माल के साथ अपनी जान से भी हाथ धो बैठे।

1. बलिदानी रतनलाल– अपने घर से अपने परिवार की नहीं बल्कि उस समाज की रक्षा करने के लिए निकलते हैं, जो इस देश के वासी हैं, लेकिन दुखद उसी समुदाय का वह शिकार हो गए और गाँव में होली से पहले तिरंगे में लिपटकर पहुँचते हैं।

2. आईबी कॉन्स्टेबल अंकित शर्मा– जिन्हें दंगाई घर लौटते समय ताहिर हुसैन के घर में खींच लेते हैं और 400 बार चाकुओं से प्रहार कर उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता है। इसके बाद उनकी लाश को मस्जिद से नाले में फेंक दिया जाता है।

3. राहुल ठाकुर– जो अपने घर से बाहर निकल कर बस यह देखने के लिए जाते हैं कि आख़िर ये हंगामा किस बात का हो रहा है और इसी बीच दंगाई उन्हें पेट में गोली मार देते हैं। यह सब तीन मिनट के अंदर होता है। इसके बाद घर की चौखट पर बैठी बेटे का इंतजार कर रही माँ को राहुल नहीं बल्कि उनकी लाश मिलती है।

4. आलोक तिवारी– जो घर से खाना खाकर टहलने के लिए बाहर की ओर निकलते हैं और दंगाई भीड़ का शिकार हो जाते हैं। दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ इंतजार कर रही पत्नी को पति आलोक तिवारी नहीं बल्कि उनकी लाश मिलती है और इसी के साथ उसके जीवन में अँधेरा सा छा जाता है।

5. इंजीनियर राहुल सोलंकी– जो घर से आ रही आवाजों को सुनकर निकलते हैं, लेकिन दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट पाते… क्योंकि दंगाई उनकी गर्दन में गोली मारकर हत्या कर देते हैं।

6. दिलबर नेगी– जो उत्तराखंड से जीवन यापन करने के लिए दिल्ली आकर एक दुकान में नौकरी करते हैं, लेकिन अफसोस दंगाइयों की भीड़ उनके हाथ-पैर काटकर उन्हें आग के हवाले कर देती है। परिवार को शव उस हालत में मिलता है, जिसका अंतिम संस्कार भी न किया जा सके। दिलबर सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे, उनका यह सपना अधूरा रह गया।

7- विवेक उर्फ विक्की– दुकान के अंदर बैठे विवेक के सिर में दंगाई ड्रिल घुसा देते हैं। इस घटना के बाद से पाँच बहनों के बीच इकलौते भाई विवेक आज भी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे हैं।

8. श्याम चाय वाले– दुकान पर बैठे ग्राहकों का इंतजार कर रहे थे, तभी दंगाइयों की भीड़ आती है, दुकान में लूटपाट करती है और उसे आग के हवाले कर देती है। आज भी श्याम अपने परिवार का पेट पालने के लिए दर-दर भीख माँगते फिर रहे हैं।

9- अनूप सिंह– बाहर हो रहे शोर-शराबे को सुन घर से बाहर निकलते हैं। इसी बीच ताहिर हुसैन के छत से चली गोली सीधे अनूप सिंह की गर्दन में जाकर लगती है। आज भी इलाज जारी है।

10- अंकित पॉल– हर दिन की तरह उस दिन भी दुकान पर बैठे थे। तभी दंगाइयों की भीड़ आती है और उन्हीं की आँखों के सामने पहले दुकान फिर गोदाम और ऑफिस में लूटपाट करती है। फिर सब कुछ आग के हवाले कर देती है। चंद घटों के अंदर अंकित की जीवन भर की कमाई ख़ाक हो जाती है।

यह उन पीड़ितों की कहानी है, जो दिल्ली दंगों की योजना और अपने ऊपर होने वाले हमलों से बिल्कुल अनजान थे। इसके बाद भी, जिन लोगों ने हिंदुओं पर हमला करने की महीनों पहले योजना बनाई और उसे अंजाम भी दिया, वही आज नकली आँसू बहाकर मीडिया के सामने खुद को दंगा पीड़ित बताते हुए घूम रहे हैं। आश्चर्य इस बात का है कि मुस्लिम दंगाइयों को मीडिया का एक बड़ा तबका पीड़ित बता भी रहे हैं और दिखा भी रहे हैं।

मोदी सरकार में खेलती-कूदती-पढ़ती बेटियाँ: वो 8 योजनाएँ, जो उनके सपनों को कर रहे साकार

भारत में महिलाओं की समस्याओं पर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। हर क्षेत्र में महिलाएँ परचम लहराए, यह बात भी लोग खूब करते हैं। खुद को महिला हितैषी बता लंबी-चौड़ी बातें करने वाली कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन महिलाओं से जुड़े छोटे-छोटे मुद्दों पर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन की बात हो, स्वच्छ भारत के जरिए शौचालय मुहैया कराना हो या उज्ज्वला योजना के जरिए करोड़ों परिवार को गैस कनेक्शन देकर स्वास्थ्य की चिंता करना, मोदी सरकार ने महिला हितैषी ऐसे कई कदम उठाए हैं, जिनके दूरगामी परिणाम होंगे। बात अगर शिक्षा की करें तो देश की बेटियाँ पढ़ें, आगे बढ़ें, हर क्षेत्र में अपना परचम लहराए, इसके लिए केंद्र सरकार ने कई अहम् कदम उठाए हैं। सरकार के उठाए इन कदमों से बेटियों को पढ़ने के अधिक अवसर मिल रहे हैं।

बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ

देश की बेटियों को पढ़ने का भरपूर अवसर मिले और समाज उन्हें पढ़ने, आगे बढ़ने का मौका देने में सहयोगी बने, इसके लिए 22 जनवरी, 2015 को केंद्र सरकार ने बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ कार्यक्रम की शुरुआत की। महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस साझा प्रयास से जहाँ देश भर में गर्ल चाइल्ड रेशियो में सुधार आया, वही बेटियों को पढ़ाने के लिए समाज के हर क्षेत्र में लोग सक्रिय व जागरूक हुए। इस योजना के तहत विशेष रुप से उन 100 जिलों को चुना गया है, जहाँ चाइल्ड सेक्स रेशियो में बच्चियों की संख्या कम थी। इस अभियान की सफलता इसी बात से आँका जा सकता है कि देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या बढ़ी है। लिंगानुपात में भी देश में काफी सुधार आया है। विशेषकर हरियाणा, जहाँ इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी।

हर स्कूल में बालिका शौचालय

देश के नीति नियंताओं ने बेटियों के लिए बड़ी-बड़ी बातें कीं, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी व्यवस्था मुहैया कराने पर ध्यान नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट की फटकार और यूनिसेफ जैसी वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट के बावजूद के लिए देश के स्कूलों में बेटियाँ बगैर शौचालय के पढ़ने जाती रहीं। बड़ी संख्या में होने वाली अनुपस्थिति और ड्रॉपआउट की वजह शौचालय थी, इसके बावजूद कोई ठोस पहल नहीं किए गए। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लाल किले के अपने भाषण से न केवल इस समस्या पर बातें की बल्कि युद्धस्तर पर देश में शौचालय बनवाने के अभियान की शुरुआत भी की। नतीजा, महज एक वर्ष में 2,61,400 स्कूलों में 4,17,796 शौचालय का निर्माण किया गया। वर्ष 2017-18 तक के प्राप्त आँकड़ों के मुताबिक देश में 98.38 प्रतिशत स्कूलों में बालिका शौचालय हो गए हैं।

कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय का विस्तार

“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” के सपने को साकार करने के लिए मोदी सरकार ने कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) को कक्षा 6-8 की बजाए कक्षा 6-12 तक चलाने का निर्णय लिया है। विद्यालय को विस्तारित करने की इस पहल से गरीब, अनाथ, दिव्यांग बेटियों के लिए उच्च शिक्षा का द्वार खुला है। देश के सभी पिछड़े ब्लॉक में चलने वाली कस्तूरबा गाँधी विद्यालयों में वे बेटियाँ पढ़ती हैं, जो आर्थिक, भौगौलिक व सामाजिक वजहों से प्राथमिक कक्षाओं में ही ड्रॉप आउट हो जाती हैं। इन विद्यालयों में बच्चियों के पढ़ने, रहने की व्यवस्था सरकार करती है। अब तक यही होता रहा है कि स्कूल से दूर होने के बाद बेटियाँ स्कूल से ड्रॉप आउट होकर घर-परिवार के कामकाज में ही हाथ बँटाने का काम करती थीं। किसी तरह नामांकन हो गया, तब भी 8वीं के बाद उनके पास उच्च शिक्षा के अवसर बेहद सीमित होते थे। सरकार के इस कदम से वे फिर से ड्रॉप आउट होने की बजाए 12वीं तक की शिक्षा प्राप्त कर आगे की पढ़ाई का स्वप्न देख सकेंगी।

आकांक्षी जिला परिवर्तन कार्यक्रम

मोदी सरकार ने देश के उन 115 पिछड़े जिलों की पहचान की, जहाँ अन्य बातों के साथ शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं थी। केंद्र सरकार ने इन जिलों में आकांक्षी जिला परिवर्तन कार्यक्रम की शुरुआत जनवरी, 2018 में की। इन जिलों में 8 चिन्हित मानकों के आधार पर शिक्षा की स्थिति बेहतर करने का कार्य युद्धस्तर पर हो रहा है। शिक्षा के लिए चिन्हित मानकों में कक्षा- 3,5,8 के बच्चों में गणित और भाषा में सीखने का स्तर सुधारने, कक्षा 5वीं से 6ठी व कक्षा 8वीं से 9वीं में होने वाले नामांकन दर की स्थिति बेहतर करना, अकादमिक सत्र के शुरुआती एक महीने में ही समय पर पाठ्य-पुस्तकों की पहुँच सुनिश्चित करना, शिक्षक-विद्यार्थी का अनुपात सही करना, माध्यमिक विद्यालयों में बिजली कनेक्शन उपलब्ध करवाने के साथ-साथ विशेष रूप से महिला साक्षरता दर बढ़ाने और हर विद्यालय में बालिका शौचालय बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस कार्यक्रम की निगरानी स्वयं प्रधानमंत्री कलेक्टरों के साथ होने वाले प्रगति बैठक में नियमित करते हैं। आकांक्षी जिला कार्यक्रम की वजह से देश के 115 जिलों में सरकारी शिक्षा तो बेहतर हो ही रही है, इससे सबसे अधिक लाभ बेटियों को हो रहा है।

सैनिक स्कूलों में अब ले सकेंगी बेटियाँ भी एडमिशन

देश की बेटियाँ सेना में अधिकारी बनने का सपना अब पूरा कर पाएँगी। केंद्र सरकार ने अब सैनिक स्कूल में लड़कों के साथ-साथ लड़कियों के भी पढ़ने की सुविधा दे दी है। रक्षा मंत्रालय ने इसके लिए देश के पाँच सैनिक स्कूलों को चुना है। इनमें चंद्रपुर (महाराष्ट्र), बीजापुर (कर्नाटक), कोडागु (कर्नाटक), कलिकिरी (आंध्र प्रदेश) और घोड़ाखाल (उत्तराखंड) स्थित सैनिक स्कूल शामिल हैं। इन स्कूलों में लड़कियाँ भी कक्षा 6 में नामांकन ले सकेंगी। 2020-21 सत्र से इन स्कूलों में नामांकन की प्रक्रिया शुरु हो गई है।

पढ़ने के साथ-साथ खेलने के अवसर

मोदी सरकार ने “पढ़ेगा भारत बढ़ेगा भारत” को सुनिश्चित करने के लिए लगभग 10 लाख से अधिक स्कूलों में पुस्कालयों को बेहतर बनाने का अभियान चलाया है। पुस्तकालय की स्थिति में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2018-19 में सरकारी स्कूलों को 5,000 रुपए से लेकर 20,000 रुपए तक का पुस्तकालय-अनुदान दिया है। पुस्तकालय के साथ साथ खेल-कूद में बच्चे आगे बढ़ें, इसके लिए “खेलेगा भारत, खिलेगा भारत” पर मोदी सरकार कार्य कर रही है। स्कूली बच्चों के बीच खेल को प्रोत्साहित करने हेतु प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय को 5000 रुपए, उच्च प्राथमिक को 10,000 रुपए एवं माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्कूलों के लिए 25,000 रुपए खेलकूद के उपकरण खरीदने के लिए मुहैया कराए गए हैं।

खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत “खेलो इंडिया स्कूल गेम्स” के आयोजन की शुरुआत 2018 से हुई। स्कूल गेम्स की वजह से बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली बच्चों को अवसर मिल रहे हैं। अभी 22 फरवरी, 2020 को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने बताया कि खेलो इंडिया स्कूल गेम्स में 80 रिकॉर्ड टूटे हैं, जिनमें 56 रिकॉर्ड बेटियों ने तोड़े। खेलो इंडिया स्कूल गेम्स ने गाँव, गरीब और अभावग्रस्त इलाकों के बेटियों को खेलकूद में देश का मान बढ़ाने और खुद के लिए बड़े सपने देखने का अवसर दिया है। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया गर्ल्स लीग की भी शुरुआत की है, जिसके तहत अंडर-13 व अंडर-15 आयु समूह के बेटियों को और अधिक अवसर दिए जाएँगे। बात चाहे पुस्तकालय की हो या फिर खेल-कूद की, सबमें बेटियों को खूब मौके मिल रहे हैं पढ़ने और खेल-कूद में आगे बढ़ने के लिए।

सुकन्या समृद्धि योजना

शादी पर होने वाले खर्च की चिंता करने के बजाए माँ-बाप बेटियों की शिक्षा पर ध्यान दें, इस दिशा में केंद्र सरकार ने दो अभिनव पहल की है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के तहत केंद्र सरकार ने 2015 में बेटियों के हित में छोटी बचत को बढ़ावा देने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत सरकार 8.5 प्रतिशत ब्याज (वर्तमान समय में) इनकम टैक्स की छूट की सुविधा के साथ देती है। इस योजना में जन्म लेने के 10 साल से पहले की उम्र में कम से कम 250 रुपए के जमा के साथ पोस्ट ऑफिस में खाता खोला जा सकता है, जिसे बाद में एक हजार के गुणक में डेढ़ लाख की राशि जमा करवाई जा सकती है। बेटी की आयु 18 साल होने पर जमा की गई राशि में से उच्च शिक्षा के लिए 50 फीसदी तक की निकासी की जा सकती है। ये योजना न केवल बेटी को पढ़ाने के लिए प्रेरित करने का काम कर रही है बल्कि बेटियों को पढ़ने के लिए समाज में एक बेहतर माहौल भी बना रही है।

सेल्फ अटेस्टेड करने का अधिकार

देश के युवाओं को विभिन्न तरह की नौकरियों के आवेदन करने के लिए अपने अंक-पत्र सहित अन्य दस्तावेज पर अधिकारियों से हस्ताक्षर करवाने के लिए भाग-दौड़ करना पड़ता था। मोदी सरकार ने इस समस्या को समझा और इस समस्या से निजात दिलाने के लिए खुद से ही प्रमाणित अर्थात सेल्फ अटेस्टेड करने का हक दिया। इसका सबसे अधिक लाभ ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में रहने वाली बेटियों को हुआ, जिन्हें अब सरकारी फॉर्म भरने में दिक्कतों का सामना नही करना पड़ता। यह छोटा सा लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास न केवल युवाओं में सरकार के भरोसे की अभिव्यक्ति थी बल्कि इस वजह से होने वाली परेशानियों से निजात दिलाने वाला भी था।

यूपी के 257 मस्जिद-मदरसे रडार पर: टेरर फंडिंग का शक, नए अमीरों की निगरानी का भी आदेश

नेपाल की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के जिलों में बड़े स्तर पर टेरर फंडिंग की सूचना के बाद योगी सरकार ने जाँच के आदेश दिए हैं। दरअसल सीमा से सटे 257 मस्जिद-मदरसों में टेरर फंडिंग का शक जताया गया है। इसके बाद इन मस्जिद-मदरसों पर खुफिया विभाग की नजर है। मामले में उत्तर प्रदेश शासन की रिपोर्ट के बाद गोरखपुर के एडीजी जोन दावा शेरपा ने निगरानी के आदेश दिए हैं। अब संदिग्ध स्थानों की सूची बनाकर पुलिस नजर रख रही है।

पुलिस को एक-एक मस्जिद, मदरसे की निगरानी करने को कहा गया है। कुछ भी संदिग्ध मिलने पर एडीजी को तत्काल सूचना भेजने का आदेश दिया गया है। बता दें कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर, महराजगंज, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों की सीमा नेपाल से सटी है। यहाँ पर अचानक से बड़ी संख्या में मस्जिद, मदरसे सामने आए हैं, जिसके बाद हड़कंप मचा हुआ है।

दरअसल दिसंबर के महीने में यूपी के अलग-अलग जिलों में सीएए और एनआरसी के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन में पीएफआई का नाम सामने आने के बाद यूपी पुलिस इस कट्टरपंथी संगठन से जुड़े लोगों की लिस्ट तैयार कर रही थी। उस दौरान भी नेपाल सीमा से सटे बहराइच का नाम प्रमुखता से सामने आया था। यह बात भी सामने आई थी कि अपने नेटवर्क के प्रचार-प्रसार के लिए पीएफआई धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल कर रहा है।

हाल ही में नई दिल्ली में हुई हिंसा के बाद खुफिया एजेंसी ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को एक खुफिया इनपुट दिया है। इसके मुताबिक नेपाल सीमा से सटे हुए यूपी के जिलों के 257 मस्जिद, मदरसों पर नजर रखने को कहा गया है। यहाँ टेरर फंडिंग की आशंका जताई गई है। इस इनपुट के बाद गोरखपुर जोन के कई जिलों में पुलिस और खुफिया विभाग ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।

बताया जा रहा है कि कुशीनगर, बहराइच, महाराजगंज ,सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और श्रावस्ती में मस्जिद और मदरसों की इंतजामिया कमेटी से जुड़े हुए लोग और इन धार्मिक स्थलों की फंडिंग से जुड़ी हुई डिटेल खुफिया तौर पर जुटाई जा रही है। इन इलाकों में संदिग्ध और नए अमीरों पर भी नजर रखने को कहा गया है। यह पता करने के लिए कहा गया है कि आखिर इनके पास पैसा कहाँ से आ रहा है? इसके बाद खुफिया एजेंसियाँ अपने हिसाब से पड़ताल में जुटी हैं। पुलिस मस्जिद, मदरसों में आने वाले फंड व लोगों की कुंडली तैयार कर रही है।

‘सरकार में आते ही दिल्ली की सभी 54 अवैध मस्जिद-मदरसे, कब्रिस्तान को गिराएगी BJP’

मेरे भाई को जिहाद ने मारा है, एक-एक मस्जिदों व मदरसों की तलाशी ली जाए: दलित दिनेश के भाई

मस्जिदों में अजान के लिए लाउडस्पीकर लगाने की इजाजत देने से इलाहाबाद हाईकोर्ट का इनकार

#SheInspiresUs: 7 महिलाओं के हवाले पीएम मोदी ने किया अपना सोशल मीडिया अकाउंट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार सुबह देश को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई देने के बाद अपने सोशल मीडिया अकाउंट को दिनभर के लिए सात महिलाओं को सुपुर्द कर दिया। उन्होंने ट्वीट किया, “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई। नारी शक्ति की भावना और उपलब्धियों को सलाम करते हैं। जैसा कि मैंने कुछ दिन पहले कहा था, मैं आज के लिए विदा लेता हूँ। आज दिनभर सात महिलाएँ अपनी जीवन यात्रा साझा करेंगी और संभवत: मेरे सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से बातचीत करेंगी।”

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दिनभर के लिए पीएम मोदी के सोशल मीडिया अकाउंट से विदा लेने के बाद उनके अकाउंट से सबसे पहला ट्वीट स्नेहा मोहनदास का आया। उन्होंने लिखा- मैं स्नेहा मोहनदास हूँ। अपनी माँ से प्रेरित होकर, जिन्होंने बेघरों को खाना खिलाने की आदत डाली, मैंने फूडबैंक इंडिया नाम से पहल शुरू की है।

प्रधानमंत्री के आकउंट के जरिए दूसरा ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा- मैं सशक्त महसूस करती हूँ। मैं अपने साथी नागरिकों, खासकर महिलाओं को आगे आने और मेरे साथ हाथ मिलाने के लिए प्रेरित करना चाहती हूँ। मैं सभी से आग्रह करती हूँ कि कम से कम एक जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएँ।

इसके पहले आज सरकार के ट्विटर हैंडल MyGovIndia से ऐसी कई स्त्रियों की प्रेरणादायक कहानी शेयर की गई। आइए एक नजर डालते हैं ऐसी ही प्रेरणास्पद कहानियों पर जिनके बारे में जानकारी शेयर की गई है।

इन कहानियों में 90 वर्ष की भक्ति यादव की कहानी भी है जो डॉक्टर दीदी के नाम से मशहूर हैं। ये इंदौर की पहली महिला एमबीबीएस डिग्री होल्डर हैं जो पिछले 68 वर्षों से लोगों का निशुल्क इलाज कर रहीं हैं। उन्होंने अब तक हजारों सुरक्षित प्रसव करवाने में सहायता की है।

ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी आतंकवाद से जूझते कश्मीर की शकीना अख्तर की है जो घाटी की पहली क्वालिफाइड महिला कोच हैं। वे आजकल राज्य की अन्डर 19 महिला क्रिकेट टीम को कोचिंग दे रही हैं।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने 3 मार्च को ट्विटर, फेसबुक समेत सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म छोड़ने पर विचार करने की बात कही थी। इससे हर कोई अचंभित हो गया था। इस फैसले को लेकर कई तरह के कयास लगाए जाने लगे थे। हालॉंकि बाद में पीएम ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि वह महिला दिवस पर अपने सोशल मीडिया अकाउंट उन महिलाओं को सौंपेंगे, जिनका जीवन एवं कार्य प्रेरणा देने वाला हो।

सोशल मीडिया पर पीएम मोदी की लोकप्रियता का अंदाजा उनके फेसबुक पेज और ट्विटर अकाउंट को फॉलो करने वालों की संख्या से लगाया जा सकता है। फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पेज पर जहाँ 44,723,734 लाइक्स हैं, वहीं उन्हें फॉलो करने वालों की संख्या 44, 598,804 है। ट्विटर पर पीएम मोदी दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा फॉलो किये जाने वाले शख्स हैं जिन्हें 53.3 मिलियन लोग फॉलो करते हैं। उनसे ज्यादा फॉलोवर केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और बराक ओबामा के पास हैं।

चुनाव से पहले 2 महीने में प्रचार पर AAP की सरकार ने फूँक दिए ₹29 करोड़: RTI से खुलासा

दिल्ली की लगभग हर गली, हर मोहल्ले, हर नुक्कड़ में आम आदमी पार्टी की सरकार का प्रचार-प्रसार करने वाले विज्ञापन आपने देखे होंगे। लेकिन, क्या आप जानते हैं बड़े-बड़े होर्डिंग, मेट्रो में प्रचार से लेकर अखबार के साथ आए पैम्पलेटों के जरिए दिल्ली के घर-घर पहुँचने के लिए अरविंद केजरीवाल की सरकार ने कितना खर्चा किया? शायद नहीं…। तो आइए आज आपको इसी सवाल का जवाब देते हैं।

प्रचार-प्रसार करके अपनी राजनीति साधना हर राजनैतिक पार्टी का काम है। मगर आम आदमी और क्राउड फंडिंग के जरिए खुद को स्थापित करने वाली पार्टी इसमें 2 कदम आगे निकल चुकी है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार सिर्फ़ अगस्त से लेकर जनवरी तक में आप सरकार ने प्रचार-प्रसार पर 43 करोड़ रुपए खर्च किए। इसमें से 29 करोड़ रुपए तो केवल बीते दिसंबर और जनवरी में खर्च किए गए।

आरटीआई से हुआ प्रचार-प्रसार पर AAP सरकार के खर्चे का खुलासा

इस आरटीआई को फाइल करने वाले का नाम विवेक कुमार है। विवेक एक्टिविस्ट हैं। उनकी बदौलत आम आदमी पार्टी की इस हकीकत का खुलासा हुआ है। इस तथ्य के सामने आने से यह भी पता चलता है कि केजरीवाल जनता के कितने बड़े हितैषी हैं। जनता का पैसा उसके कल्याण में इस्तेमाल न कर अपनी पार्टी के प्रचार-प्रसार में किया। एक बार फिर दोहरा दें कि केजरीवाल ने जनता के पैसे से 42.47 करोड़ रुपया सिर्फ अपनी पब्लिसिटी करने में खर्च किया।

गौरतलब है कि ये सिर्फ़ पहला मामला उजागर नहीं हुआ है, जहाँ केजरीवाल सरकार की हकीकत इस तरह से सामने आई है। इससे पहले एक आरटीआई से मालूम हुआ था कि दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने अपने शुरुआती चार सालों में सालाना 78 करोड़ रुपए केवल विज्ञापन में खर्च किए। जबकि पूरे चार सालों को देखें तो ये खर्चा 300 करोड़ रुपए के पार था। जी हाँ, 2015 से 2019 तक पार्टी ने विज्ञापन में कुल 311.78 करोड़ खर्च किए।

इसके अतिरिक्त, 2015 में जब आम आदमी पार्टी सत्ता में आई तो उसने 2015-2016 में ₹81 करोड़ विज्ञापन में उड़ाए, जबकि 2016-17 में ये खर्चा 67.25 करोड़ था। सबसे ज्यादा विज्ञापन पर पैसा उड़ाने वाला साल अगर देखें तो आम आदमी पार्टी ने 2017-2018 में ₹117 करोड़ से ज्यादा खर्चा किया।

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ऐसे ही नहीं डूब गया यस बैंक, प्रियंका गाँधी की पेंटिंग खरीदने पर राणा कपूर ने खर्चे करोड़ों

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रविवार (मार्च 8, 2020) तड़के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में यस बैंक के फाउंडर राणा कपूर को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ़्तारी से पहले ईडी के अधिकारियों ने उनसे करीब 30 घंटे से ज्यादा पूछताछ की था। ईडी अधिकारियों ने बताया कि बैंकर को तड़के करीब तीन बजे धन शोधन निवारण कानून (PMLA) के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया, क्योंकि वह जाँच में सहयोग नहीं कर रहे थे।

इस मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक आयकर विभाग ने यस बैंक के पूर्व प्रमोटर राणा कपूर और प्रियंका गाँधी वाड्रा के बीच कथित साँठगाँठ पाया है।

नए खुलासे के अनुसार, राणा कपूर ने प्रियंका गाँधी वाड्रा की एक पेंटिंग खरीदी थी। इसने यस बैंक घोटाले में गाँधी परिवार की भागीदारी को लेकर संदेह बढ़ा दिया है। खुलासे के बाद आयकर विभाग यह जाँच कर रहा है कि क्या यस बैंक के संस्थापक राणा कपूर और कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी के बीच कोई संबंध है।

मीडिया में आई रिपोर्टों से पता चलता है कि राणा कपूर के गाँधी परिवार के साथ घनिष्ठ संबंध थे। राणा कपूर ने कथित तौर पर प्रियंका गाँधी की 2 करोड़ रुपए में एक पेंटिंग खरीदी थी। यह खुलासा प्रवर्तन निदेशालय द्वारा राणा कपूर से लगभग 30 घंटे तक किए गए पूछताछ के दौरान हुआ। 

ईडी ने शुक्रवार (मार्च 6, 2020) देर रात राणा कपूर के वरली स्थित समुद्र महल बिल्डिंग में उनके घर पर छापे मारे थे। राणा को शनिवार (मार्च 7, 2020) दोपहर दक्षिण मुंबई के बेलार्ड पियर्स स्थित ईडी दफ्तर ले जाया गया। यहाँ उनसे 30 से अधिक घंटों तक पूछताछ की गई। अधिकारियों ने बताया कि राणा कपूर को एक स्थानीय अदालत में पेश किया जाएगा ताकि उन्हें हिरासत में लिया जा सके।

ईडी ने यह कार्रवाई तब की है जब भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार (मार्च 5, 2020) को पूँजी की कमी से जूझ रहे यस बैंक पर पाबंदी लगाई, जिससे उसका हर खाताधारक केवल 50,000 रुपए तक ही निकाल सकता है। निजी क्षेत्र के इस बैंक के बोर्ड को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है।

शुक्रवार को SBI के बोर्ड ने यस बैंक में 49 फीसद हिस्सेदारी के अधिग्रहण को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। पिछले दो दिन में केंद्रीय वित्त मंत्री से लेकर आरबीआई गवर्नर और एसबीआई के चेयरमैन तक यस बैंक के ग्राहकों को आश्वस्त करने की कोशिशों में लगे हैं कि उनके मेहनत की कमाई पूरी तरह सुरक्षित है और डूबेगी नहीं।

इससे पहले वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि यस बैंक को बचाने के लिए सरकार और आरबीआई साथ काम कर रहे हैं। वित्त मंत्री ने हर खाताधारक को भरोसा दिलाया कि उनका पैसा सुरक्षित है और वे लगातार आरबीआई के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार बैंक के लिए जल्द ही रिजोल्यूशन प्लान लेकर आएगी। उन्होंने कहा कि वह आरबीआई से बात करेंगी कि यस बैंक के जमाकर्ताओं को नकदी की समस्या का सामना न करना पड़े। इसके साथ ही कम से कम एक साल के लिए बैंक में काम करने वालों का रोजगार और वेतन सुनिश्चित किया जाएगा।

कलीम ने दी थी पुलिसकर्मी पर पिस्टल तानने वाले शाहरुख को पनाह, दोनों के अब्बा तिहाड़ में थे साथ-साथ बंद

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में पुलिस पर पिस्तौल तानने वाले मोहम्मद शाहरुख को पिछले दिनों यूपी के शामली से गिरफ्तार किया गया। उसकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उसे पनाह देने वाले 28 वर्षीय कलीम को भी शामली से पकड़ा है। कलीम अतंरराष्ट्रीय स्तर का ड्रग तस्कर है।

कलीम के मुताबिक, 27 फरवरी की रात शाहरुख पठान उसके पास कैराना में रात को 2-2:30 पहुँचा। जब वह शाहरुख से मिला तो उसकी कार टूट-फूट चुकी थी। उसका मोबाइल भी काम नहीं कर रहा था। कलीम ने उससे कुछ सवाल किए, लेकिन शाहरुख ने उसे अपने अपराधों के बारे में कोई बात नहीं बताई। उसने केवल खुद को पुलिस से बचाने को कहा। इसके बाद कलीम को उस पर शक हुआ। बावजूद इसके उसने उसे अपने पास पूरी रात रखा। सुबह होते ही हरियाणा के पानीपत जाने के लिए बस अड्डे पर छोड़ आया।

कलीम के अनुसार वो शाहरुख के साथ पिछले 2 साल से संपर्क में था। दोनों की मुलाकात दिल्ली के तिहाड़ में हुई थी। दोनों दिल्ली के तिहाड़ में बंद अपने अपने पिता से मिलने जाते थे। इसी बीच दोनों की बातचीत बढ़ी और दोनों एक-दूसरे के साथ संपर्क में रहने लगे। पुलिस ने सभी सिरों को तलाशने के बाद कैराना के बिसातयान मोहल्ले में कलीम के घर पर दबिश दी थी, लेकिन उस समय वह उन्हें मिला नहीं था।

इसके बाद पुलिस ने उसे शनिवार को शामली से गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद मालूम हुआ कि कलीम को 235 किलोग्राम गांजा तस्करी के पुराने केसों में भी वांछित था। दिल्ली पुलिस की नारकोटिक्स सेल में उसके खिलाफ़ मामला भी दर्ज है। साथ ही मेरठ कोर्ट से उसके ख़िलाफ़ गैर जमानती वारंट भी जारी हुआ था।

गौरतलब है कि शाहरुख की गिरफ्तारी के बाद उसके ड्रग तस्करों से संबंधों का लगातार खुलासा हो रहा है। कुछ दिन पहले मालूम हुआ था कि न केवल शाहरुख का अब्बा ड्रग तस्करी में जेल जा चुका है, बल्कि उसकी अम्मी के भी ड्रग तस्करों से ताल्लुकात हैं। साथ ही मौसा भी एक ड्रग तस्कर है। इतना ही नहीं, शाहरुख का
ननिहाल भी बरेली के मीरंगज के खानपुरा मोहल्ले में है। यह उन इलाकों में से एक है जहॉं कई बड़े ड्रग तस्कर रहते हैं। शायद इसलिए उसने खुद को पुलिस से बचाने के लिए इस जगह पर छिपना मुनासिब समझा था।

बता दें, इस पूरे मामले की जाँच के दौरा अभी तक पुलिस को कई अहम सुराग मिल चुके हैं। ड्रग तस्करों से संबंध के अलावा पुलिस ने शाहरुख की पिस्टल समेत तीन कारतूस बरामद कर लिए हैं। इसके अलावा उसका एक अन्य फोन भी बरामद हुआ। अब पुलिस इनकी जाँच फॉरेंसिक लैब में करवा रही है।

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बनारस से 30 किमी दूर मिला 3500 साल पुराना शिवलिंग, गुप्तकाल में मंदिर होने के मिले साक्ष्य

बनारस शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर बभनियॉंव गॉंव में चल रही खुदाई के दौरान सैकड़ों वर्ष पुराना शिवलिंग मिला है। जानकारी के मुताबिक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय यानी BHU के प्राचीन इतिहास विभाग की एक टीम यहाँ पुरातात्विक खुदाई में जुटी है। इसी दौरान उन्हें यहाँ से ये अवशेष मिले। इस खोज के साथ ही गुप्तकालीन ईंटों से बने मंदिरों के शहरों की लिस्ट में अब उत्तर प्रदेश का बनारस शहर भी शुमार हो गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वाराणसी हेरिटेज प्रोजेक्ट्स के अंतर्गत पंचकोस परिक्रमा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में सर्वे का काम शुरू किया गया था। उसी दौरान बभनियॉंव गाँव में कई सौ साल पुराने अवशेष मिले। यहाँ ताम्र पाषाण काल के मिट्टी के बर्तनों और कुषाण काल की ब्राह्मी स्क्रिप्ट के मिलने के बाद जब बीएचयू के पुरातत्व विभाग ने खुदाई शुरू की तो 3500 वर्ष पुराना गुप्तकालीन शिवलिंग मिला। BHU के प्राचीन इतिहास के प्रोफेसर मानते हैं यह स्थान गुप्त काल के दौरान लोगों का उपासना स्थल रहा होगा।

हिंंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, उत्खनन के निदेशक प्रो. एके सिंह ने इस शिवलिंग के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह एक जीवंत मंदिर रहा होगा। इस पर बहुत सालों तक जल चढ़ाया गया होगा जिससे कि यह घिस गया है। इसका अरघा एक वर्ग मीटर का है। उत्तर की ओर से आए पानी के बहाव ने मंदिर को ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है। मंदिर का मलबा गिरने से अरघा उत्तर की ओर झुक गया होगा। अब तक इसके आधे भाग का उत्खनन हुआ है। इस मंदिर का गर्भगृह दो वर्ग मीटर से बड़ा है। गुप्तकाल की ईटों से बने मंदिर कम मिलते हैं। बभनियॉंव का यह मंदिर उनमें से एक है।

बता दें बीएचयू के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में मिट्टी के बर्तन और कई तरह की मूर्तियाँ भी मिली हैं। इसके अलावा ब्लैक एंड रेड बर्तन भी मिले हैं। इन बर्तनों का बाहरी हिस्सा काला और अंदरूनी हिस्सा लाल है। इसे देख बीएचयू के इतिहासकारों का कहना है कि ऐसे बर्तन ताम्र पाषाण काल में यानी आज से 1500 ईसापूर्व (3500 वर्ष पहले) बनते थे।

गौरतलब है कि इसी खोज के साथ भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहे जाने वाले गुप्तकाल के दौर में काशी का भी एकमंदिर शुमार हो गया है। इससे पहले प्रदेश में कानपुर व सैदपुर भितरी में गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष मिल चुके हैं। अब यब मंदिर गुप्तकाल की संस्कृति को हमेशा याद दिलाता रहेगा।

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व्रत था, कहा- मुझे जल्दी जाना होगा… क्या पता था कि वो सदा के लिए चले जाएँगे

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में अब 53 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। 200 से अधिक जख्मी हैं। दंगों दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की भी जान चली गई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उन्हें गोली मारी गई थी।

रतनलाल की पत्नी पूनम ने बताया कि जिस दिन उनकी मौत हुई, उन्होंने सोमवार का व्रत रखा हुआ था। पत्रिका से बात करते हुए वो कहती हैं, “सुबह से भूखे थे। सुबह साढ़े आठ बजे घर से निकलते हुए उन्होंने कहा था कि उनके बॉस फील्ड में अकेले हैं। दंगे भड़क गए हैं। मुझे जल्दी जाना होगा…और चले गए। मुझे क्या पता था कि वो सदा के लिए चले जाएँगे। उस दिन उनकी तबीयत खराब थी, लेकिन फिर भी ड्यूटी चले गए।”

पूनम कहती हैं कि जब वह ड्यूटी पर गए तो उन्होंने खैरियत जानने के लिए उनको फोन भी किया था। लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। उसके बाद उनका फोन बंद आने लगा। दोपहर बाद जैसे ही रतनलाल की पत्नी ने टीवी पर हेडलाइन देखी तो बेहोश हो गईं। लोगों ने उन्हें दिलासा दिलाने की कोशिश की कि चोटें लगी हैं, मगर कुछ ही समय में पुष्टि हो गई कि अब रतनलाल इस दुनिया में नहीं रहे। इसके बाद उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

बता दें कि रतनलाल ने घटना से दो दिन पहले ही माँ संतरा देवी व भाई दिनेश से फोन पर बात की थी। उन्होंने माँ से हाल-समाचार पूछने के साथ ही इस बार होली पर गाँव आने का वादा किया था, लेकिन बेबस माँ को क्या पता था कि उनकी बेटे से आखिरी बार बात हो रही है। रतनलाल का कभी किसी से लड़ाई-झगड़े की बात तो दूर, ‘तू तू मैं मैं’ से भी वास्ता नहीं रहा। फिर भी उपद्रवियों ने उन्हें मार डाला और हँसते-खेलते परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

बलिदानी रतनलाल की पत्नी भावुक होते हुए कहती हैं कि वो अपने तीनों बच्चों को अब अकेले कैसे सँभालेंगी? 42 वर्षीय रतनलाल परिवार में कमाने वाले इकलौते सदस्य थे। वे मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले थे और 1998 में दिल्ली पुलिस में बहाल हुए थे।

24 फरवरी को चॉंदबाग इलाके में हुई हिंसा में रतनलाल की मौत हुई थी। कुछ विडियो सामने आए हैं जो इस हिंसा के सोची-समझी साजिश होने की गवाही देते हैं। विडियो में हिंसा भड़कने से पहले कुछ लोग सीसीटीवी को तोड़ते साफ तौर पर दिखाई पड़ते हैं। इसके बाद पुलिस को कॉल कर बुलाया जाता है। डीसीपी अमित शर्मा, एसीपी अनुज, हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल व अन्य पुलिसकर्मी जब वहाँ पहुँचे, तो हिंसक भीड़ ने हमला कर दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सीसीटीवी फुटेज के आधार पर क्राइम ब्रांच हमलावरों की पहचान कर चुकी है। जल्द ही इनके गिरफ्त में होने की बात कही जा रही है।

इसी हमले में रतनलाल को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। एसीपी अनुज घायल हुए और डीसीपी अमित शर्मा को गंभीर चोटें आईं। हमले का जो विडियो सामने आया है उसमें दंगाई भीड़ दिल्ली पुलिस पर लाठी और पत्थर से हमला करती नजर आ रही है। भीड़ में शामिल बुर्का धारी महिलाएँ भी पुलिस पर हमला करते हुए नजर आती हैं। गोली चलने की आवाज भी सुनाई पड़ती है। डीसीपी अमित शर्मा की पत्नी ने भी कहा है कि उनके पति महिला प्रदर्शनकारियों से बात करने गए थे। लेकिन, वहॉं उन पर हमला कर दिया गया। एसीपी अनुज कुमार ने भी उस भीड़ की हिंसा के बारे में बताते हुए कहा था, “डीसीपी अमित शर्मा के मुँह से खून निकल रहा था। आँखें ऊपर की ओर हो चुकी थी। भीड़ 5-10 मीटर पर थी। हम पर पथराव हो रहा था। फिर मैंने जब डीसीपी को देखा तो आशाहीन हो गया। जैसे-तैसे मैंने खुद को सॅंभाला और डीसीपी को डिवाइडर पर लगी ग्रिल के उस पार किया।”

उन्होंने बताया था, “24 फरवरी को मैं शाहदरा के डीसीपी अमित शर्मा को जख्मी होने के बाद अस्पताल ले जा रहा था। इस दौरान भी प्रदर्शनकारी पथराव कर रहे थे और मुझे भी सिर पर चोट लगी। हमें नहीं पता था कि रतनलाल को गोली लग गई थी। हम रतनलाल को जीटीबी अस्पताल ले गए, जहाँ उसे बचाया नहीं किया जा सका और फिर बाद में हम डीसीपी को मैक्स अस्पताल में ले गए।”

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