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ताहिर हुसैन की पिस्टल, मोबाइल जब्त: AAP के MLA अमानतुल्लाह ने कहा- मुस्लिम होना सबसे बड़ा गुनाह

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में हिंसा भड़काने एवं आईबी के अंकित शर्मा की हत्या का आरोपित निगम पार्षद ताहिर हुसैन शुक्रवार (मार्च 6, 2020) को कड़कड़डूमा कोर्ट में पेशी के बाद 7 दिन की पुलिस रिमांड में भेज दिया गया। दंगों में भूमिका सामने आने के बाद पार्टी से निलंबित कर आप ताहिर से पल्ला छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, ओखला से पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान अब भी उसका बचाव कर रहा है। उसने ताहिर की गिरफ्तारी को मजहबी रंग देने की कोशिश भी की है।

अमानतुल्लाह ने ट्वीट कर कहा है, “आज ताहिर हुसैन सिर्फ इस बात की सजा काट रहा है कि वो एक मुस्लिम है। शायद आज हिंदुस्तान में सबसे बड़ा गुनाह मुस्लिम होना है। ये भी हो सकता है कि आने वाले वक्त में ये साबित कर दिया जाए कि दिल्ली की हिंसा ताहिर हुसैन ने कराई है।”

अमानतुल्लाह का बयान आने के बाद भाजपा नेता गौतम गंभीर ने भी आप विधायक पर पलटवार किया। उन्होंने लिखा, “सुंदरकांड का पाठ कराने चले…और कुछ सुंदर ना रहा… पर सुनियोजित कांड ज़रूर हुआ! देश की रक्षा करने वाले अंकित शर्मा पर 400 वार हुए जिसका आरोप ताहिर पर है और अपनी ज़ुबान से देश को बाँटने और धर्म पर वार करने का काम आप के विधायक कर रहे हैं? सवाल “आप” की नीयत पर है!”

ताहिर दंगों में अपना नाम सामने आने के बाद फरार हो गया था। इस बीच उसकी संलिप्तता की गवाही देते कई विडियो सामने आए। चश्मदीदों के अनुसार उसकी इमारत में करीब तीन हजार दंगाई जमा थे। वहॉं से हिंदुओं को निशाना बना पत्थरबाजी हुई। पेट्रोल बम फेंके गए। गोलियॉं चलाई गई। उसकी इमारत से पत्थरों और पेट्रोल बम का जखीरा बरामद किया गया था। शुरुआत में आप ने भी उसका बचाव करने की कोशिश की थी। 5 मार्च को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने राऊज एवेन्यू कोर्ट की पार्किंग से उसे तब दबोचा था जब वह अपने वकील के साथ पार्किंग में मास्क लगाए पहुँचा।

पुलिस ने ताहिर हुसैन की लाइसेंसी पिस्टल और कारतूस जब्त कर उन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया है। जाँच पूरी होने के बाद मालूम चलेगा कि उससे फायर हुआ था या नहीं। पिस्टल के अलावा एक मोबाइल भी बरामद किया गया है।

गंगाजल स्टाइल में दबोचा गया ताहिर हुसैन, चकमा देने के लिए बुर्का की जगह पहन रखा था…

ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम की तलाश: जहाँ हुई IB के अंकित शर्मा की हत्या वहाँ मौजूद था

ताहिर हुसैन के निशाने पर पहले से थे IB के अंकित शर्मा, हत्या के वक्त बांग्लादेशी आतंकी भी थे मौजूद!

पश्चिम बंगाल: BJP बूथ प्रेसिडेंट देवाशीष मंडल की निर्मम हत्या, TMC के गुंडों ने ली एक और जान

राजनीतिक हिंसा के लिए बदनाम पश्चिम बंगाल में एक और बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई है। इस बार भी आरोप सत्ताधारी दल टीएमसी के गुंडों पर ही लगा है। गंगा सागर में देवाशीष मंडल की हत्या किए जाने की खबर बंगाल बीजेपी ने अपने ट्विटर हैंडल से दी है। देवाशीष बंगाल बीजेपी के बूथ प्रेसिडेंट थे। बीजेपी बंगाल ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा कि ममता सरकार के राज में भाजपा कार्यकर्ता के खिलाफ राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में एक बीजेपी नेता नारायण विश्वास की निर्मम हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या का आरोप भी टीएमसी पर लगा था। गुंडों ने पहले मृतक को गोली मारी गई और जब वो जख्मी होकर नीचे गिर गए, तो हमलावरों ने धारदार हथियार से उनकी हत्या कर दी।

देवाशीष की हत्या ऐसे वक्त में की गई है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हाल ही में बंगाल में रैली कर लौटे हैं। उनकी रैली के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने की कई घटना सामने आई है। गौरतलब है कि 1 मार्च को अमित शाह के दौरे के दौरान टीएमसी के गुंडों ने भाजपा के कार्यालय में तोड़-फोड़ करने के बाद आग के हवाले कर दिया था। भाजपा ने उस समय आरोप लगाया था कि इस घटना को तृणमूल कॉन्ग्रेस के उपद्रवियों ने अंजाम दिया है, क्योंकि राज्य में भाजपा की संगठनात्मक शक्ति बढ़ रही है और टीएमसी इससे भयभीत है।

इतना ही नहीं, अमित शाह की रैली में जाने की वजह से एक महिला बीजेपी नेता के घर पर फायरिंग भी की गई थी। टीएमसी के गुंडों ने बीजेपी नेता अर्चना विश्वास के घर पर दो राउंड फायरिंग की थी। भाजपा ने दावा किया था कि उनके घर के ऊपर टीएमसी के गुंडों ने इसलिए फायरिंग की, क्योंकि उन्होंने 1 मार्च को अमित शाह की रैली में हिस्सा लिया था।

इसके साथ ही सीएए के समर्थन में 1 मार्च को कोलकाता के शहीद मीनार मैदान में हुई केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभा से लौट रहे भाजपा कार्यकताओं पर भी हमले हुए। भाजपा ने आरोप लगाया था कि महानगर के हेस्टिंग्स व हुगली जिले में शाह की सभा से लौट रहे भाजपा कार्यकर्ताओं पर टीएमसी के गुंडों ने हमला किया। उनका कहना था कि इन घटनाओं में दर्जन भर कार्यकर्ता जख्मी हुए। 

इससे पहले टीएमसी के गुंडों ने जलपाईगुड़ी जिले के सात भाजपा समर्थकों के घरों में तोड़-फोड़ के बाद आग लगा दी थी। भाजपा ने इसके लिए टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया था।

जब आप मुझे मेरे शब्दों के चयन पर ज्ञान देते हैं, उसी वक्त कोई ताहिर पेट्रोल बम बना रहा होता है

कई दोस्त, शुभचिंतक, वरिष्ठ सहकर्मी से लेकर डिजिटल दुनिया के मित्र आदि हमेशा सलाह देते हैं कि मुझे अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए वरना भविष्य में मेरे ये कथन/शब्द/अभिव्यक्तियाँ मेरे पीछे पड़ जाएँगी, कमज़ोर करेंगी। वो जो बात मुझे कहना चाहते हैं, वो मैं समझता हूँ। उनकी मंशा भी अच्छी है, मैं वो भी देख पा रहा हूँ।

ऐसा नहीं है कि मैंने नियंत्रण नहीं किया है। किया है, काफी हद तक किया है। लेकिन मैं जिससे लड़ रहा हूँ, मैं सभ्यता के जिस दौर में हूँ, मेरे हाथों की उँगलियों ने जो शस्त्र धारण किए हुए हैं, वो राम और कृष्ण के युग की आदर्शवादिता और सामयिकता से नहीं समझे जा सकते।

आज मेरा दुश्मन युद्ध के किसी भी नियम से नहीं चलता। वो हर दिन, हर घटना के बीतते ही, नए पैंतरे बदलता है, छल का सहारा लेता है, पीछे से वार करता है, छवि को धूमिल करने के लिए तमाम सामाजिक रूप से स्वीकार्य शब्दों का प्रयोग करता है। और आप चाहते हैं कि मैं उन्हें सम्मानसूचक शब्दों से लताड़ता रहूँ?

अंकित शर्मा को जब मजहबी झुंड चाकू मार रहा होगा तब क्या उनमें से किसी की भी घृणा का स्तर, मेरे द्वारा इस्तेमाल किए गए किसी भी शब्द से कम रहा होगा? दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर जला देने वाली मजहबी भीड़ की क्रूरता का सामना मेरे द्वारा लिखे या बोले गए कोई भी शब्द कर सकते हैं?

क्या मेरे द्वारा अभिव्यक्त शब्दावली का कोई भी शब्द इतना मारक हो सकता है जितना फारूक फैसल के राजधानी स्कूल पर लगी गुलेल से फेंके गए पेट्रोल बम होंगे? वो कौन-सा शब्द है जो मैंने लिखा या बोला, जिसका घाव ब्रह्मपुरी के विनोद को घसीट कर ले गए 40 कट्टरपंथियों द्वारा दिए गए उस घाव से गहरा है जिससे उनकी हत्या की गई?

हिन्दुओं की मूर्खता और उसके घातक परिणाम

यही मूर्खता हिन्दू करता आया है, और इसी मूर्खता की उम्मीद मुझसे की जा रही है। इसी मूर्खता के कारण हिन्दू अपने मंदिर गँवाता रहा। इसी मूर्खता का परिणाम है कि मंदिर के पुजारी को अपनी युवा बेटियों को दूसरे के घर में छुपाना पड़ता है, लेकिन वो इतना अनभिज्ञ है कि वो कैमरे पर पॉलिटिकली करेक्ट होने के चक्कर में ये बोलता है कि मंदिर पर पत्थर कौन फेंक रहा था उसे पता नहीं।

न तो सेकुलर शब्द या भाव भारतीय है, न ही उसका इस धरती पर होना आवश्यक है। ये शब्द ही वो छलावा है जहाँ अचानक से एक खूनी, आतंकी मजहब का पारम्परिक शिकार धर्म स्वयं को आक्रांता बना पाता है। मंदिर भी तुम्हारे टूटे, दंगों में मरे भी तुम, तुम्हारे ही 59 कार सेवकों को भी जलाया और तुम्हारे ही खिलाफ झूठी कहानी गढ़ी गई कि गर्भवती महिला के पेट के बच्चे को भी निकाल कर मार दिया गया।

कल को फिर से कहानी रची जाएगी कि अंकित शर्मा तो ताहिर हुसैन के घर में आग लगाने जा रहा था, और आत्मरक्षा में उसकी हत्या हो गई, उसके बाद सरकार और पुलिस ने डॉक्टर पर दबाव बनाया और कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बदल डालो, उसे क्रूर बनाओ। तुम इंतजार करो, ये कहानी भी आएगी और उनका तंत्र इतना मजबूत है कि वो पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों को खारिज कर देंगे, पैसे खाने वाला बता देंगे और अंततः अंकित शर्मा गायब हो जाएगा हमारी सामूहिक स्मृति से।

वो अपने चोर तबरेज को भी याद रखते हैं, लाखों की भीड़ जुटाते हैं। उन्हें झूठ के झूठ साबित होने के बाद भी उसे बोलते रहना आता है। और हम इस इंतजार में हैं कि हमारे लिए जो लिख-बोल रहा है, उसको हम तभी पढ़ेंगे जब वो अपनी भाषा में सुधार लाएगा। और हाँ, मथुरा के भरत, दिल्ली के अंकित, रविंदर, ध्रुव त्यागी, सक्सेना समेत तमाम हिन्दुओं की भीड़ हत्या तो हम भूल ही गए हैं। क्योंकि हमारा पूरा फोकस इस पर है कि यार, वो बोलता तो सही है लेकिन बीच में ‘साला’ बोल जाता है!

हम एक अनवरत युद्ध का अनचाहा हिस्सा बन चुके हैं

आप लोगों को अंदाजा नहीं है कि हम किस समर के केन्द्र में हैं। आप ही को मारने की समग्र तैयारी होती है। मजहबी फसादी छतों से हवाई हमले करते हुए, जमीन पर बंदूक, पत्थर, तलवार से आक्रमण करते हैं, और लाशों को नाली में फेंक रहे हैं, और आपको इस बात की पड़ी है कि उसने तो ट्वीट में ‘फक’ लिख दिया यार, ऐसे नहीं लिखना चाहिए।

वो दुर्गा को वेश्या कहें, चलेगा। वो ‘फक हिन्दुत्व’ लिखें, चलेगा। वो देवी काली को मुस्लिम बना कर हिजाब पहना दें, चलेगा। वो स्वास्तिक के पवित्र प्रतीक में आग लगाएँ, पैरों से तोड़े, चलेगा। वो ॐ को मरोड़ कर नाजियों वाला प्रतीक बना दें, चलेगा। वो शिवलिंग पर कंडोम चढ़ा दें, चलेगा। वो कृष्ण को बलात्कारी बताएँ, चलेगा।

ये सारी गालियाँ चलेंगी क्योंकि ‘हम में और उनमें अंतर रहना चाहिए।’ यही तर्क है ना आपका? आपको ये समझ में नहीं आ रहा कि उनके तंत्र ने कैसे हर छोटी बात पर ‘आपातकाल’ बोल कर आपको धीरे-धीरे अपने मालिकों द्वारा लाए गए उस वीभत्स राजनैतिक और सामाजिक दौर की वास्तविकता से दूर कर दिया। आप उस वक्त पैदा नहीं हुए थे, या काफी छोटे थे, पढ़ना और रिसर्च करना आपके वश की बात है नहीं, तो अब आपको कोई ‘आपातकाल’ कहेगा तो आपको लगेगा कि इंदिरा गाँधी के समय में किसी चोर को किसी भीड़ ने मारा होगा, उसी को ‘आपातकाल’ कहते होंगे।

आपको अंदाजा भी है कि वो चाकू भी मार रहे हैं, और शब्दों के प्रयोग से आपकी स्मृति से अपने राजनैतिक मालिकों के कुकर्मों को धोते भी जा रहे हैं। आप पढ़िए दंगों की कवरेज। आप सुनिए तो रवीश को कि कैसे दस मिनट में नौ मिनट वो फैजान और नईम के जले दुकानों की भावुक बात करता है, और अंत में यह भी कहता है कि राहुल का भी जल गया। बरखा दत्त ने अंकित शर्मा की नृशंस हत्या पर कुछ नहीं लिखा, पर रिक्शाचालक इमरान को किसी हिन्दू ने कथित तौर पर थप्पड़ मार दिया तो भावुक काव्य रचना में लीन है।

आप देखिए तो ‘द वायर’, ‘क्विंट’, ‘स्क्रॉल’, ‘एनडीटीवी’, ‘दी प्रिंट’ जैसों की कवरेज। गिन लीजिए कि कितने ग्राउंड रिपोर्ट हैं, कितने कट्टरपंथियों की कहानी है, और कितने हिन्दुओं की। देखिए जा कर कि पूरी दुनिया को जो पेट्रोल बम, पत्थरों का ढेर, एसिड की बोतलें कट्टरपंथियों के छतों पर दिख रही है, वो इन लोगों को क्यों नहीं दिख रही। वो इसलिए महोदय, कि हम साल भर बाद अगर खोजें, तो हमें सिर्फ कट्टरपंथियों की ही कहानियाँ मिलें कि उन्हीं पर हमला हुआ।

इसलिए शब्दों पर मत जाइए, भाव समझिए। आपको यह समझना ही होगा कि ‘आपातकाल’ जैसे शब्दों को मुक्तहस्त प्रयोग समाज को मेरे द्वारा बोले गए ‘दोगलेपन’ जैसे शब्दों से ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। ‘फक’ शब्द से ज्यादा घातक ‘फक हिन्दुत्व’ है, और उससे भी ज्यादा घातक हमारी यह सोच है कि उनके एक पोस्टर से क्या होगा। अरे भाई, वो पोस्टर भी उन्होंने हिन्दुओं से ही बनवाया और उनके ही हाथों में रखवाया है। विवेक का इस्तेमाल करो, समझ जाओगे!

सबूत सामने फिर भी पाप हिन्दुओं के सर कैसे?

सड़कें पत्थरों से पटी हुई हैं, मस्जिदों की छतों पर पत्थर दिख रहे हैं, समुदाय विशेष के लोगों के घर के ऊपर युद्ध लड़ने के मकसद से पेट्रोल बम, एसिड, पत्थर और आग लगाने का सामान इकट्ठा दिख रहा है, और फिर भी आपको बताया जा रहा है कि ये ‘हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों के सफाए की साजिश है’, ‘ये मुस्लिमों का पोगरोम है’, ‘ये मुस्लिमों का नरसंहार है’।

सबूत हमारे सामने चीख रहे हैं लेकिन ‘लागा सेकुलरिज्म का दाग’ ऐसा गहरा है कि दिमाग के तंतुओं तक पर उसकी परत चढ़ी हुई दिख रही है। सबूत हिन्दुओं की लाशें हैं, और उनको मारने का तरीका है। उनको मारने के तरीके में निहित घृणा दिख रही है। आपको नहीं दिखेगी क्योंकि आप दंगा साहित्य के कवियों को पढ़ते हैं जो आज भी कह रहे हैं, “यार! मरे तो दोनों ही तरफ के लोग हैं!”

ये क्या पागलपन है! एक भीड़ मारने के लिए ही निकली थी। वो भीड़ जल-थल-नभ पर तैयार खड़ी थी। वो जानती थी कि हिन्दुओं के इस नरसंहार की कोशिश में उसके अपने भी मरेंगे। वो तैयार थे अपनी लाशें भी गिराने के लिए। योजना तो काफी सघन थी, लेकिन ताहिर या फारूक की छतों से दंगा-फसाद करने वाली इस्लामी भीड़ यह भूल गई कि नीचे दौड़ कर चाकू, पत्थर और गोली चलाने वाली भीड़ भी कट्टरपंथियों की ही है।

हिन्दू का क्या था, वो तो आलोक तिवारी या दिनेश की तरह सुबह अपने बच्चों के लिए दूध लाने निकला था। वो किसी वीरभान की तरह ऐसे ही बाहर निकला होगा। उसने तो तैयारी नहीं की थी। उसकी घात में तो हवा से पेट्रोल बम फेंकते, जमीन पर पत्थर, चाकू और पिस्तौल लिए कट्टरपंथियों की एक भीड़ तैयार थी।

इलाके का अल्पसंख्यक हिन्दू, हवा से भी गोली का शिकार हो सकता था, जमीन पर चाकू से मारा जा सकता था, नाली में फेंक कर मारा जा सकता था। हर जगह भीड़ थी। अब ताहिर के छत की भीड़ को या फैसल फारूक के छत पर से गुलेल ताने, रायफल से निशाना साधती भीड़ को क्या पता कि नीचे भी उसी के पैदल सिपाही हैं। भीड़ में निशाना भी कितना लगाओगे। परिणामवश कट्टरपंथियों को भी कट्टरपंथियों ने ही मार डाला होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

सेकुलर-सेकुलर खेलना बंद करो, हलाल तंत्र को समझो

इसलिए, ‘दोनों तरफ के मरने वाले हैं’ वाला गीत गाना बंद करो। सच्चाई को स्वीकारो कि दंगे की तैयारी उस इलाके के कथित अल्पसंख्यक कर रहे थे। पत्थर इकट्ठा हो रहा था, पेट्रोल बम बन रहे थे, गुलेल बनाए जा रहे थे, हथियार जुटाए जा रहे थे। हिन्दू क्या कर रहा था? वो शायद उसी दुकान से सामान खरीद रहा था जो दंगाइयों को पेट्रोल खरीदने के लिए चंदा दे कर मदद कर रहा होगा।

दो ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है हलाल तंत्र की। दो ट्रिलियन का मतलब जानते हो? भारत की पूरी अर्थव्यवस्था के दो तिहाई के बराबर। तुम्हारा तंत्र कहाँ है? तुम इस बात पर आह्लादित रहते हो कि ‘मैं तो ये भी नहीं जानता कि मेरी पूजा के लिए धूप, माला और प्रसाद कौन बनाता है?’ ये मूर्खता है क्योंकि ये जानना धार्मिक कारणों से भी जरूरी है कि तुम्हारे पूजा के फूल पर किसी आतंकी के रक्तरंजित हाथों का खून तो नहीं, और नैतिक कारणों से भी कि जो पैसा तुम दे रहे हो, वो किसी अनैतिक कार्य के लिए तो खर्च नहीं हो रहा।

तुम्हें जानना चाहिए कि तुम्हारा व्यापार किसके साथ हो रहा है। तुम किस बात के लिए, किस दुकानदार से सामान खरीदते हो। यह जानना जरूरी है क्योंकि जब गली का कोई दुकानदार जब किसी बम कांड में पकड़ा जाएगा तो नाम सुन कर तुम्हें आश्चर्य होता रहेगा… और थोड़ी देर सोचने के बाद पता चलेगा कि तुम्हारे संकट मोचन मंदिर पर जो बम फटे थे, उसके रहने की व्यवस्था तुम्हारी गली का वही दुकानदार कर रहा था। जागरूक नागरिक बनो, अपना आर्थिक तंत्र बनाओ कि किसी नेगी की हत्या पर, किसी नीरज प्रजापति के चले जाने पर, उनके परिवार वालों को भूखा न रहना पड़े।

वास्तविकता के धरातल पर नंगे पैर चलने पर उसकी तपन और सर्दी, दोनों का ही अहसास, होगा। इनका तंत्र देखो कि तुम्हारा मंदिर तोड़ा, उस पर मस्जिद बनाई, और तुम्हारे राम को काल्पनिक बता कर पूरी लड़ाई लगभग जीत ही ली थी। मथुरा और काशी की तो बात ही नहीं कर रहा। बाकी के तीस हजार मंदिरों की तो चर्चा भी नहीं कर रहा।

मैं तो बता रहा हूँ कि जिस बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को आग लगा दी, हमारी संस्कृति के बड़े हिस्से को गायब कर दिया, उसी के नाम का शहर, उसी नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों के पास, बख्तियारपुर के नाम से है, और किसी माई के लाल में नाम बदलने का प्रस्ताव रखने तक की हिम्मत नहीं है।

यही तो वो तंत्र है जो अपने जलसों पर गलियों में जानवरों के खून की नदियाँ बहा देता है और होली को छेड़छाड़ का त्योहार, दीवाली को प्रदूषण फैलाने वाला, रक्षाबंधन को पितृसत्ता का प्रतिनिधि, गणपति और दुर्गा विसर्जन को जलराशि को गंदा करने वाला बताता है, लेख लिखता है और तुम्हें भी सोचने पर विवश करता है कि ये तो सही बोल रहे हैं। सौ करोड़ हिन्दू हैं भारत में, अगर 10 करोड़ भी होली मनाते हैं तो कितनी खबरें पढ़ते हो छेड़छाड़ की?

छेड़छाड़ बसों में नहीं होती, मदरसों में मौलवी रेप नहीं कर रहे बच्चियों का, आम दिनों में छेड़छाड़ नहीं होती लड़कियों के साथ, परिवार के सदस्य बलात्कार नहीं कर रहे लड़कियों का? तो फिर परिवार नाम की संस्था क्यों खारिज नहीं कर पा रहे? होली को खारिज करना आसान है, क्योंकि हर शहर में दो-चार घटनाएँ होती हैं ऐसी।

सहिष्णुता, भावुकता और कोमलता का लाभ उठा रहे हैं वो

चूँकि सहिष्णु हो, तो तुम्हें अपराधबोध में डुबाना बहुत आसान है। कभी याद है कि क्रिसमस पर या न्यू इयर पर पटाखे छोड़ने की मनाही हुई हो? ईद पर हिंसा न करने का ज्ञान किसी ने दिया? बुरके और हिजाब को किसी ने बंधन कहा? नहीं कहा, क्योंकि तुम कह कर देखो एक बार, और कैसे वो झुंड में हमला बोलते हैं।

वे न सिर्फ अपने पाषाकालीन परंपराओं को डिफेंड करते हैं, बल्कि तुम्हारी वैज्ञानिकता को नकारने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। वो तुम्हें बाँटने के लिए हिरण्यकश्यपु, महिषासुर, होलिका, रावण, कंस जैसे राक्षसों को दलितों का राजा और पता नहीं क्या-क्या बताते हैं, लेकिन दंगे में जब उन्हें दुकान जलानी होती है, तब वो तुमसे नहीं पूछते कि तुम दलित हो कि हिन्दू। उस समय, तुम हिन्दू ही होते हो भले ही सोशल मीडिया पर देवी दुर्गा को वेश्या कहे जाने पर तुम्हें खुशी मिलती है।

इसलिए, काल, परिस्थिति और पात्र देख कर आचरण करना ही शास्त्रोचित है। कृष्ण और राम के समय में गालियाँ नहीं थी, न ही सोशल मीडिया था। इसलिए उन्होंने फेसबुक पर गाली नहीं लिखी। उनके दुश्मन वैसे नहीं थे कि मच्छर मारने पर भी आपातकाल की घोषणा कर देते थे। कृष्ण के समय में धूर्त दुश्मन थे, तो कृष्ण ने कर्ण को रथ का पहिया लगाते वक्त मरवाया, दुर्योधन की जाँघ तुड़वाई, जयद्रथ का वध करवाया और युधिष्ठिर से ‘अश्वत्थामा हतः’ कहलवाया…

कृष्ण अगर अपने से पूर्व के युग में, स्वयं के ही अवतार राम का अनुसरण करने लगते तो कुरुक्षेत्र का युद्ध अधर्मी दुर्योधन जीत जाता और नैरेटिव से अभिमन्यु की हत्या गायब हो जाती। कहा जाता कि वो तो आत्मरक्षा में मार दिया गया।

मैं अपने समय का राम या कृष्ण नहीं हूँ। मैं अपने समय का अजीत ही रहना चाहता हूँ, लेकिन मैं राम और कृष्ण दोनों के समय को याद रखना चाहता हूँ। अगर कलयुग में रामायण और महाभारत को पढ़ने के बाद भी, मैं अपना आचरण त्रेता और द्वापर जैसा रखूँ, तो स्वयं राम और कृष्ण ही उसे नकार देंगे। ये कलियुग है, और हम अपना युद्ध लड़ रहे हैं। राम को भारत छोड़ कर लड़ने जाना पड़ा था, कृष्ण को अपनी ही धरती पर युद्ध करना पड़ा था, और हमारे समय में हम पैदा ही अनवरत चलते एक अदृश्य युद्ध के दौर में हुए हैं।

दंगों की लाशों पर मेरे कथित ‘अपशब्द’ भारी कैसे?

इसलिए, यहाँ त्रेता का आदर्शवाद तो बिलकुल नहीं चलेगा। यहाँ तो, सामने वाला ‘पोगरोम’, ‘जिनोसाइड’ जैसे शब्द कहेगा, और बताएगा कि मरने वालों में ज्यादा समुदाय विशेष वाले हैं, तो आपको उसे इस दोगलेपन की याद दिलानी होगी कि ‘अबे हरामखोर, छत पर पत्थर, पेट्रोल, एसिड तुमने जमा किए, जमीन पर तुम्हारे लोग पत्थर, चाकू लेकर घूम रहे थे, तो ये दंगा हिन्दुओं के माथे कैसे मढ़ रहे हो बे?’

अब आप संवेदनशील हो कर कह देंगे कि ‘अजीत जी, आपकी सारी बात सही है लेकिन आपने ‘दोगलेपन’, ‘हरामखोर’ और ‘बे’ का जो प्रयोग किया उससे फलाँ तरह के दर्शक आपसे नहीं जुड़ पाएँगे। और जब आप मुझे ये ज्ञान की बात बता रहे होंगे, उसी समय में कोई जुबैर, किसी फारूक फैसल या ताहिर हुसैन की छत पर टायर-ट्यूब से गुलेल बना रहा होगा, कोई अहमद किसी कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतल में पेट्रोल डाल रहा होगा और कोई सलमा एसिड की बोतल ले कर नीचे फेंकने की तैयारी कर रही होगी।

अब आप मुझे बताइए कि मेरे तीन शब्दों से समाज का ज्यादा नुकसान है या फिर पूर्वी दिल्ली के दंगों से? उधर कोई शातिर हर्ष मंदर, जिसे करोड़ों की फंडिंग है, वो खुलेआम कह रहा है कि फैसला सुप्रीम कोर्ट में नहीं सड़कों पर होगा… और अंत में दार्शनिक बनते हुए जोड़ देगा कि ‘फैसला दिलों में होगा’ और आप उस टैक्निकेलिटी के बल पर ‘फैक्टचेकरों की लम्पट टोली’ के जाल में उलझते रहेंगे कि ‘हाँ भाई, उसने तो बोला दिल में होगा फैसला’।

अबे घोंचू, जब फैसला दिल में ही होना था, तो सड़क क्यों बोला? और राम मंदिर का फैसला क्या दिल में हुआ था? अब क्या कल को बलात्कार और चोरी के अपराधों के फैसले भी दिल से होंगे? कोर्ट यहाँ क्या घास छीलने के लिए है? वो पागल बनाते रहेंगे, और तुम कहना कि ‘अजीत जी, आपकी भाषा सही नहीं है, आपको ये शोभा नहीं देता, करियर के लिए खराब है!’

ऐसा है कि मैं किसान का बेटा हूँ। मेरी महात्वाकांक्षाएँ इतनी नहीं हैं कि बीस साल बाद मैं फलाने अवॉर्ड के लिए लालायित रहूँगा और इंटरनेट से कोई मेरी पुरानी क्लिप निकाल कर चला देगा कि देखो उसने तो ‘हरामखोर’ शब्द का प्रयोग किया था, उसे आप सम्मानित कैसे कर रहे हैं। मुझे मान-सम्मान की आशा कभी नहीं रही। जिस कार्य में दक्ष हूँ, करता रहूँगा। जैसे करना है, वैसे ही करूँगा। एक दायरा है, जिसे न तो लाँघता हूँ, न लाघूँगा।

मुझे न तो अवॉर्ड चाहिए, न दस लाख फॉलोवर जुटाने की चाह है, न विडियो से करोड़ों रुपए बनाने की चाह है। जो इतनी बातें सोचते हैं, वही अपने शब्दों को तौलते हैं, पॉलिटिकली करेक्ट बनना चाहते हैं। मैं बस करेक्ट बोलना चाहता हूँ क्योंकि पॉलिटिक्स और डिप्लोमेसी मुझे समझ में नहीं आती। आपको मेरी बात समझ में आती है तो, अच्छी बात है, आगे बढ़ाइए। इससे ज्यादा मेरी कोई इच्छा नहीं।

मेरा ध्यान वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों के नैरेटिव को ध्वस्त करना है। वो कैसे करना है, उसके लिए मेरे पास पूरी योजना है। वो काम मैं जानता हूँ क्योंकि अहर्निश मैं उन्हें पढ़ता और समझता रहता हूँ। मैं आपके सामने सच को लाने को तत्पर हूँ। मैं आपको यह याद दिलाने के लिए काम करता हूँ कि अगर ऑपइंडिया जैसी तीन-चार संस्थाएँ नहीं होतीं, तो आप गोधरा की ही तरह 59 कारसेवकों की हत्या भूल कर, कश्मीर के लाखों हिन्दुओं के नरसंहार को भूल कर, पूर्वी दिल्ली के इन दंगों को भी हिन्दुओं पर ही लाद कर पूछते कि मुस्लिमों की हत्या क्यों कर दी हमारे हिन्दुओं ने?

इसलिए, समय को समझिए, इस अदृश्य अनवरत चलते युद्ध को समझिए और उन परिवारों के दर्द को अपनाइए क्योंकि अगर ताहिर हुसैन के गुंडे गली नंबर पाँच और छः की हिन्दू लड़कियों के कपड़े उतार सकते हैं, तो गलियों और शहरों का नाम बदलने में देर नहीं होगी। आप बच गए लेकिन शरजील आपके शहर तक भी पहुँचाएगा अपनी आवाज, सलमान आपकी कब्र खोदने की तैयारी कर रहा है, एक पूरा विश्वविद्यालय हिन्दुओं से आजादी की जद्दोजहद में लगा हुआ है, दूसरी यूनिवर्सिटी मुस्लिमों के वैश्विक शासन की चाह में दीवारों पर नारे लिख रहा है…

और आपको पड़ी है कि अजीत भारती बोलता तो सही है लेकिन कभी-कभी गाली दे देता है, इसलिए मैं नहीं सुनता!

पेट्रोल बम फेंको, नौकरी पाओ योजना: ‘ये लोग’ दंगाइयों को पालते रहेंगे, हिंदू सोता रहेगा

शाहीन बाग ने पोस्टर से मंशा बता दी: हिन्दू स्त्रियों पर है इनका ध्यान, पहले कन्वर्जन फिर…

‘दोनों तरफ के लोग हैं’: ‘दंगा साहित्य’ के दोगले कवियों से पूछिए कि हिन्दू ने कहाँ दंगा किया, कितने दिन किया?

हाथ-पैर काट जिंदा आग में झोंक दिया: मुस्लिम भीड़ की क्रूरता पर ‘The Wire’ ने डाला पर्दा

प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने दिलबर नेगी की दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में की गई क्रूरतापूर्ण हत्या को ‘जलने के कारण हुए घाव से हुई मौत’ बताया है। उसने मुस्लिम दंगाई भीड़ द्वारा किए गए इस जघन्य कुकृत्य को छिपाने के प्रयास किया है। दिल्ली क्राइम ब्रांच ने नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में दिलबर नेगी की हत्या के आरोप में शाहनवाज़ को गिरफ़्तार किया है। दिलबर नेगी बृजपुरी में एक मिठाई की दुकान में काम करते थे। उनकी हत्या फ़रवरी 26, 2020 को कर दी गई थी।

अताताइयों ने उनके पूरे शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया गया था। इसके बाद शाहनवाज़ और उसके साथियों ने मिल कर नेगी को ज़िंदा आग में झोंक दिया था। उनकी हत्या जिस तरह से की गई, वैसे कसाई भी जानवरों को नहीं मारता। शाहनवाज़ और उसके साथियों ने पहले तो 20 साल के दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट डाले और फिर उसके बाद उनकी दुकान में आग लगा दी। फिर नेगी को उसी दुकान में लगी आग में ज़िंदा झोंक दिया गया, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।

दिलबर नेगी की भयावह हत्या को छिपाने के लिए ‘द वायर’ ने लिखा कि वो जलने से मरे

शाहनवाज़ व उसके साथ आई मुस्लिम भीड़ को बचाने के लिए और इस हत्या की वीभत्सता को छिपाने के लिए ‘द वायर’ ने लिख दिया है कि दिलबर नेगी जलने के कारण हुए घावों से मरे। जबकि सच्चाई ये है कि उनकी हत्या की गई। उन्हें तड़पाया गया, प्रताड़ित किया गया और फिर ज़िंदा जला डाला गया। ‘द वायर’ के लिए ये सब एकदम सीधा है, सपाट है- “जलने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।” ऐसा थोड़े था कि वो ग़लती से किसी जलती हुई आग में गिर गए और घायल होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई?

‘द वायर’ क्रूर मुस्लिम दंगाइयों को बचाने के लिए पागल हो गया है। उसने दंगों में मारे गए मृतकों की एक सूची प्रकाशित की, जिसमें दिलबर नेगी के बारे में बताया गया है। बस एक लाइन में उनके बारे में लिख दिया गया है और इतिश्री कर ली गई है। न तो दंगाई मुस्लिम भीड़ का जिक्र है, न शाहनवाज़ का और न ही इसका जिक्र है कि उनकी हत्या के लिए कौन सा वीभत्स तरीका अपनाया गया। उलटा इन सभी चीजों को छिपाने और ढकने के लिए पूरा जोर लगाया गया।

…जिन दिलबर नेगी का हाथ-पैर काटकर आग में फेंका था, उनकी हत्या के आरोप में शाहनवाज गिरफ्तार

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तारिक ने दी थी ताहिर हुसैन को पनाह, दिल्ली पुलिस की हिरासत में लियाकत और रियासत भी

आप के निलंबित पार्षद ताहि​र हुसैन पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है। ताहिर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का वह मुख्य सरगना बनकर उभरा है। चश्मदीदों के अनुसार उसकी इमारत में करीब तीन हजार दंगाई जमा थे जिन्होंने हिंदुओं को निशाना बनाया। दिल्ली पुलिस ने तारिक रिजवी, लियाकत और रियासत को हिरासत में लिया है। सूत्रों के अनुसार लियाकत और रियासत दिल्ली दंगों में संलिप्त थे। वहीं तारिक पर ताहिर हुसैन को पनाह देने का आरोप है। दंगों में अपनी भूमिका सामने आने के बाद ताहिर फरार हो गया था।

लियाकत और रियासत के दिल्ली दंगों के आरोपी ताहिर हुसैन से तार जुड़े हैं। पुलिस इनमें से एक से ताहिर हुसैन को छिपाने को लेकर पूछताछ कर रही है। ज्ञात हो कि आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के हत्या के आरोप में दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (मार्च 05, 2020) को ताहिर हुसैन को गिरफ्तार किया था।

इसके बाद पुलिस ने शुक्रवार को ताहिर को कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने ताहिर को सात दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया है। सात दिन की पुलिस रिमांड पर चल रहे ताहिर हुसैन की घटना वाले दिन की जानकारी निकालने पर शुक्रवार को मामले की जाँच कर रही एसआईटी को काफी कुछ जानकारियाँ हासिल हुई हैं।

दिल्ली में हुई हिंसा मामले में पुलिस ने अब तक 690 एफआईआर दर्ज की है। 48 मामले आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज किए गए है। 2193 लोग हिरासत में लिए गए हैं या गिरफ्तार किए गए हैं। दंगों में अब तक 53 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। 200 से ज्यादा घायल हुए हैं।

गिरफ्तार किए गए लोगों में जाफराबाद में पुलिसकर्मी पर पिस्टल तानने वाला मोहम्मद शाहरुख़ और बीस साल के दिलबर सिंह नेगी को काटने के बाद आग में झोंकने का आरोपित शाहनवाज भी है। बलिदानी कॉन्स्टेबल रतनलाल और पुलिस पर हमला करने वाले दंगाइयों की पहचान किए जाने की बात भी कही जा रही है।

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सरकार बनाने के लिए रद्द कर दिया था दौरा: अयोध्या पहुँचते उद्धव को आई हिंदुत्व की याद

महाराष्ट्र की कमान संभालने के 100 दिन बाद मुख्यमंत्री तथा शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे शनिवार को रामनगरी अयोध्‍या पहुँचे। उद्धव ठाकरे ने अयोध्या पहुँच राम मंदिर के लिए एक करोड़ रुपए दान किया। उन्होंने शिवसेना की विचारधारा की राह भी साफ़ की। मंदिर के लिए खुद के ट्रस्ट से 1 करोड़ रुपए देते हुए उद्धव ने कहा कि रामलला का मंदिर बनाना हम सब की जिम्मेदारी है, मंदिर ऐसा भव्य बनना चाहिए कि दुनिया देखे।

अयोध्या में मीडिया से बातचीत करते समय उद्धव ने कहा कि महाराष्ट्र से आने वाले रामभक्त श्रद्धालुओं के लिए उनकी सरकार अयोध्या में एक महाराष्ट्र भवन भी बनवाएगी। इसके हेतु उन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ से भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किया। शाम करीब चार बजे रामलला का दर्शन कर उद्धव वापस लौट गए।  

सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा, “मैं रामलला का आशीर्वाद लेने के लिए यहाँ आया हूँ। आज मेरे साथ मेरे ‘भगवा’ परिवार के कई सदस्य मौजूद हैं। मेरा सौभाग्य है कि पिछले डेढ़ साल में मैं तीन बार अयोध्या आ सका। मैं बीजेपी से अलग हूँ, हिंदुत्व से नहीं। बीजेपी का मतलब हिंदुत्व नहीं है।”

अयोध्या में उद्धव का परिवार के साथ सरयू आरती में शामिल होने और एक जनसभा की भी योजना थी। इसे कोरोना वायरस को लेकर गृह मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा अडवायजरी जारी होने के बाद रद्द कर दिया गया। इससे पहले आज ठाकरे परिवार के साथ लखनऊ के अमौसी एयरपोर्ट उतरे जहाँ से सड़क मार्ग से अयोध्या पहुँचे।

यहाँ पर यह भी याद रखना जरूरी है कि शिवसेना ने दिसंबर 2019 में भाजपा के साथ अपना दशकों पुराना गठबंधन तोड़ कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ अवसरवादी गठजोड़ बना महाराष्ट्र में सरकार का गठन किया था। मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए शिवसेना को उस कॉन्ग्रेस से भी हाथ मिलाने में कतई गुरेज नहीं हुआ जिसने एक समय राम के अस्तित्व पर ही सुप्रीम कोर्ट के भीतर प्रश्नचिन्ह खड़े किए थे।

मजेदार बात यह है कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस, शिव सेना और एनसीपी गठबंधन ने जिस कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के आधार पर सरकार गठित की वह संविधान के “सेक्युलर” रूप को बनाए रखने के लिए संकल्पित है। इस सीएमपी की प्रस्तावना कहती है कि शिवसेना एनसीपी और कॉन्ग्रेस का यह गठबंधन संविधान के “सेक्युलर” मूल्यों को बचाने के लिए संकल्पबद्ध है।

हालाँकि उद्धव ठाकरे का भीमा-कोरेगाँव पर स्टैंड या राममंदिर को लेकर बयानबाजी इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि उद्धव हिंदुत्व के मुद्दे को छोड़ने को लेकर पसोपेश में हैं। ज्ञात हो कि उद्धव ठाकरे के कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ जाने के बाद से ही भाजपा और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना को घेरने में लगी है। उद्धव ठाकरे को राज ठाकरे की मनसे से ही सबसे ज्यादा खतरा दिखाई पड़ रहा है जो आजकल नागरिकता कानून समेत एनआरसी आदि मुद्दे पर बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

ज्ञात हो कि उद्धव ठाकरे नवम्बर 2019 में ही अयोध्या दौरा पर आने वाले थे लेकिन सुरक्षा कारणों का बहाना बनाते हुए उनकी पार्टी ने दौरा रद्द किए जाने की सूचना दी थी। उस वक़्त वो परदे के पीछे से कॉन्ग्रेस व शरद पवार की पार्टी के साथ साँठगाँठ में लगे थे।

भारत अद्भुत है, अफ्रीका को इससे सीखना चाहिए: नॉर्थ-ईस्ट का दौरा कर चकित हुए केविन पीटरसन

इंग्लैंड के दिग्गज क्रिकेटर और स्विच हिट मारने के लिए विख्यात केविन पीटरसन भारत आकर अभिभूत नज़र आ रहे हैं। वो कई दिनों से ‘नेशनल जियोग्राफिक’ चैनल के लिए हो रहे एक डॉक्यूमेंट्री शूट के लिए भारत आए हुए हैं और उत्तर-पूर्व का दौरा कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के तटवर्ती इलाक़ों से लेकर नॉथ-ईस्ट के जंगलों तक का भ्रमण किया और भारत के लोगों की ख़ूब प्रशंसा की। केविन पीटरसन ने माना है कि भारत के लोग जानवरों से काफ़ी प्यार करते हैं और उनकी ख़ूब देखभाल करते हैं।

पीटरसन ने एक कुत्ते के साथ फॉरेस्ट अधिकारियों की एक फोटो शेयर की। इनमें फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के जवान हथियारों के साथ दिख रहे हैं। उन्होंने कुत्ते के बारे में लिखा कि ये भले ही हिंसक हो लेकिन ये उतना ही अनुशासित और प्रभावशाली हैं। उन्होंने लिखा कि वो जितना भी भारत भ्रमण करते हैं, जानवरों की देखभाल को लेकर यहॉं के लोगों के समर्पण से उतना ही अभिभूत हो जाते हैं। उन्होंने लिखा कि भारत को ऐसे लोगों पर गर्व होना चाहिए, जो निःस्वार्थ भाव से अपने काम में लगे हुए हैं।

एक बात के लिए तो पीटरसन ने अफ्रीका को भी भारत से सीखने की सलाह दी। पीटरसन ने कहा कि भारत में गैंडों की जनसँख्या तेज़ी से बढ़ रही है और अफ्रीका को इस मामले में भारत से सीख लेकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी दुर्लभ प्रजातियों को बचाना हमारी जिम्मेदारी है और भारत में ये काम बखूबी किया जा रहा है।

केविन पीटरसन अपने भारत प्रवास के दौरान असम स्थित काजीरंगा नेशनल पार्क भी पहुँचे। वहाँ पर गैंडों की संख्या को देखते हुए उन्होंने इसे ‘वन हॉर्न नेशन’ कहा। उन्होंने लिखा कि भारत अद्भुत है। पीटरसन ने कहा कि पिछले 15 वर्षों में उन्हें इस देश ने काफ़ी कुछ दिया है। बकौल पीटरसन, भारत के सुदूर क्षेत्रों में घूमने का उन्हें मौका मिला है, जो उनकी यात्रा का सबसे रोचक भाग है। उन्होंने नॉर्थ-ईस्ट के दृश्यों को शानदार करार दिया।

केविन पीटरसन जो डॉक्यूमेंट्री शूट कर रहे हैं, उसमें बताया जाएगा कि कैसे आपदा आने पर ब्रह्मपुत्र के किनारे से जानवरों व लोगों को वहाँ से भागना पड़ता है। उन्होंने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे हाथियों से उनकी मुलाक़ात होती रहती है और ये काफ़ी उपजाऊ इलाक़ा है। पीटरसन ने भारत की महिलाओं को प्रेरणादायी बताया है।

24 मार्च को बुलेटप्रूफ मंदिर में शिफ्ट होंगे रामलला, फाइबर से बनाया जाएगा अस्थायी मंदिर

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण से पहले रामलला अस्थायी मंदिर में शिफ्ट किए जाएँगे। इसको लेकर काफी समय से अटकलें लगाई जा रही थी। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने शनिवार को इस संबंध में स्थिति स्पष्ट कर दी। उन्होंने बताया कि रामलला को वर्तमान टेंट वाले स्थान से अस्थायी मंदिर में 24 मार्च को शिफ्ट किया जाएगा।

श्रद्धालु 25 मार्च यानी चैत्र नवरात्रि के पहले दिन से अस्थायी मंदिर में ही रामलला के दर्शन कर सकेंगे। बताया जा रहा है कि अस्थायी मंदिर का ब्लू प्रिंट तैयार हो गया है। यह गर्भ गृह से 150 मीटर की दूरी पर होगा। फाइबर से बना अस्थायी मंदिर बुलेटप्रूफ होगा। इस बार रामनवमी के दिन फाइबर के बने इस अस्थायी मंदिर मंदिर में लाखों श्रद्धालु दर्शन करेंगे।

खबरों के अनुसार रामलला मंदिर और रामभक्तों की सुरक्षा को और सख्त किया जाएगा। रामभक्तों की सुविधा का भी ख्याल रखते हुए ऐसे मार्ग बनाए जाने की योजना है जिससे दर्शन मार्ग को छोटा किया जा सके। चंपत राय ने बताया, “सुरक्षा विभाग नए स्‍थान का विकास कर रहा है। कमिश्नर और जिला मजिस्‍ट्रेट सभी कार्यों को देख रहे हैं। एक नए स्‍थान पर भगवान आएँगे तो उस स्‍थान और वहाँ देवताओं को भी प्रसन्‍न करना होगा। 25 मार्च यानी प्रथम नवरात्र से भक्‍तों के दर्शन भगवान के नए आसन पर हों, इसको लेकर तैयारी कर रहे हैं। अब रामलला टेंट में नहीं रहेंगे। मंदिर इतना मजबूत होगा कि हथौड़े से भी नहीं तोड़ पाना संभव नहीं होगा। अब तक भक्‍तों को दर्शन 50 फीट की दूरी से हो रहे थे। नए आसन पर भगवान के विराजने के बाद दूरी कम होगी।”

इसके पहले ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के लिए कार्यालय स्थल फाइनल किया। ट्रस्ट का कार्यालय राम कचहरी मंदिर में खोला जाएगा। राय के साथ जिलाधिकारी अनुज झा ने शनिवार को इस कार्यालय का निरीक्षण किया। निरीक्षण के बाद राय ने यह भी बताया कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की दूसरी बैठक रामनवमी के बाद 4 अप्रैल को अयोध्या में ही होगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 9 नवंबर को रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला सुनाने के बाद केंद्र सरकार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट गठित करने का निर्देश दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का गठन किया था। अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास तथा महासचिव विहिप के चंपत राय को बनाया गया था।

इस ट्रस्ट के मंदिर निर्माण विभाग के प्रमुख बनाए गए नृपेंद्र मिश्रा जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रमुख सचिव भी रह चुके हैं। मंदिर निर्माण से संबंधित तैयारियों के सिलसिले में 20 फरवरी को वे अयोध्या पहुँचे थे। मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी लेने के बाद नृपेंद्र मिश्रा का यह पहला अयोध्या दौरा था, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की थी।

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होलिका बहुजन और दुर्गा वेश्या: दानवी को दलित आइकॉन बता बाल हत्या को बढ़ावा देती JNU वाली जड़ता

होली प्रह्लाद का पर्व है। यानी अत्यधिक आनंद का। वैसे ही आनंद का जिसका जिक्र सुदर्शन ने अपनी कहानी ‘हार की जीत’ के पहले ही वाक्य में ये कहकर किया है कि माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। यह नवान्न के आनंद का पर्व है। इस रात जो अग्नि जलाई जाती है और उसमें गेहूँ की जो बालियाँ अग्नि में जलाई जाती हैं, उनका बाहरी हिस्सा जल जाता है, भीतर का अन्न बचा रहता है। वह जो बाहर की बाली के अंक में था, प्रह्लाद वही है। बाहर की बाली होलिका की तरह उसे लिए हुए है।

यह एक अच्छा संयोग था, जिससे प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की घटना जुड़ गई। निःसंदेह कोई गेहूँ का अन्न प्रार्थना के स्तोत्र नहीं गढ़ता। प्रह्लाद का नृसिंह स्तोत्र श्रीमद्भागवत पुराण में दिया हुआ है। अतः होली एक युगान्तर का पर्व है। तब जब सभ्यता ने कृषि का आविष्कार किया और तब जब नृसिंह का अवतार हुआ।

अब JNU में जिस तरह की जड़ता आश्रय पाती है, वहाँ कुछ लोग ऐसे पोस्टर लगाते हैं, जिनमें होली को स्त्री विरोधी त्यौहार की तरह बताया जाता है। एक पोस्टर की भाषा देखिए: “Why does Brahmanical Patriarchal India celebrate burning of Holika, an Asura Bahujan woman? What is holy about Holi ? Holi will not only remain anti-bahujan, anti-dalit and anti-adivasi women in character, but is against womanhood itself. SAY NO TO HOLI!”

यह जड़ता यदि स्त्री के लिए वाकई आदर रखती तो महिषासुरमर्दिनी दुर्गा को वैश्या नहीं बता रही होती। इसके लिए तो वैसा ही IQ level चाहिए, जिसमें बुआ होलिका तो असुर बहुजन स्त्री हो, लेकिन भतीजा प्रह्लाद ब्राह्मनिकल हो। वो प्रह्लाद जो अपनी प्रार्थना में यह कहता हो:

“जो ब्राह्मण धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग के बारह गुणों से युक्त है किन्तु भगवान कमलनाभ के चरणों से विमुख है, उससे तो मैं उस चांडाल को श्रेष्ठ समझता हूँ जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण श्रीहरि में लगा रखे हैं। वह अपने कुल को पवित्र कर देता है, किन्तु अधिक प्रभावशाली ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता।”

प्रॉब्लम ये है कि हमारी परंपरा की एक बड़ी कटी-पिटी सी पढ़ाई हमारे विश्वविद्यालयों में होती है। समाज में भी उनका एक बड़ा अबौद्धिक किस्म का निर्वहन सा होता है। इसी कारण अपने समय के सबसे निरंकुश सत्तावाद के प्रतिरोध और उसकी पराजय के प्रतीक हमारे त्यौहार अपनी गतानुगतिकता में अपनी चमक खोते गए हैं। नहीं तो होली, दशहरा, दीपावली सब अधिनायकवादी सत्ता के खिलाफ संघर्ष के स्मृति-संदर्भ हैं।

रावण हों या महिषासुर या हिरण्यकशिपु इनमें से कोई भी दलित-वंचित नहीं था। सब अधिकारिता का अधिकतम संघनन थे। इन्हें बहुजन जैसे चालू जुमलों का लाभ वही दे सकता है जिसका IQ level ही निगेटिव हो। आज के प्रतिरोध आंदोलनों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वे पुराने रेसिस्टेंस मूवमेंट्स से सबक नहीं लेते, बल्कि उनका मूर्खतापूर्ण तिरस्कार करते हैं, उन लोगों के चक्कर में आकर जिनका लक्ष्य भारतीय जीवन-शक्ति का दुर्दमन है।

आज होलिका जैसी दानवी के माध्यम से यदि वे वूमेनहुड का कोई विमर्श रचना चाहें तो प्रह्लाद की बाल-हत्या के प्रयास क्या कहलाएँगे? यह कौन सा वूमेनहुड है जो infanticide पर पनपता है? पूतना और होलिका को खलनायिका से नायिका बनाने की कोशिश बाल-हत्या के महिमामंडन की कोशिश है। उसे ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर ढका नहीं जा सकता। ब्राह्मण तो वे दधीचि थे, जिन्होंने वृत्रासुर को मारने के लिए अपनी अस्थियाँ दे दीं। वज्र का निर्माण करने वास्ते अपनी हड्डियाँ देने वाले ऋषि।

जब दलित अस्मिता का आइडेंटिफिकेशन पूतना, होलिका और महिषासुर से किया जाता है तब ब्राह्मनिज्म को नुकसान नहीं होता, दलितों की आत्म-छवि को होता है। इन तीनों असुरों की दलित आइकॉन के रूप में प्रशंसा न इन्हें कहीं पहुँचाती है, न दलितों को। स्वयं ही सोचें कि यदि ये वाकई ऐसे आइकॉन हैं जिन पर गर्व कर सकें तो क्या आंबेडकर को आज महिषासुर कह के हम संतुष्ट होंगे या सावित्री फुले को होलिका कह सकेंगे।

यह कोई संयोग नहीं है कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एक बालक की देह को जलाकर मार देने की कोशिश करने वाली होलिका असुर कहलाई और आज ही के दिन जनकल्याण के लिए अपना देहोत्सर्ग करने वाले दधीचि ब्राह्मण कहलाए।

महिलाओं के साथ ‘छेड़छाड़’ के लिए होली है: लेफ्ट लिबरल और इस्लामिक गैंग प्रोपेगेंडा के साथ लौटा

बरसाने की लट्ठ मार होली देखने पहुँचे देश-विदेश से लाखों लोग, नंदगाँव के हुरियारों पर सखियों ने बरसाईं प्रेम की लाठियाँ

होली खेलता कसाब, साईंभक्त लादेन और PUBG खेलते आतंकी: लोगों ने ‘फॉल्ट न्यूज़’ के यूँ लिए मजे

(लेखक आशुतोष सिंह ठाकुर ‘यंग थिंकर्स फोरम’ के फाउंडिंग डायरेक्टर हैं)

कोई ऐसा देश बताइए जो कहता हो कि दुनिया के हर व्यक्ति का स्वागत है: CAA पर विदेश मंत्री एस जयशंकर

देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भारत की आलोचना करने वालों पर निशाना साधते हुए शनिवार (मार्च 07, 2020) को कहा कि दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है, जो कहे कि उसके यहाँ हर किसी का स्वागत है।

दिल्ली में आयोजित ग्लोबल बिजनेस समिट को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “मैं आज इस बात को बहुत विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अगर आप किसी भारतीय दूतावास में जाते हैं, तो वहाँ आपका स्वागत ऐसा होगा जिससे कि आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि हम अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक नए मुकाम पर ले जाना चाहते हैं जो पहले नहीं था।”

एस जयशंकर से जब सवाल पूछा गया कि क्या भारत वैश्विक स्तर पर दोस्त खो रहा है? इस पर उन्होंने जवाब देते हुए कहा, “शायद अब देश समझ रहा है कि हमारे असली दोस्त कौन हैं।”

विदेश मंत्री ने कहा, “एक ऐसा समय था जब भारत बहुत रक्षात्मक था, हमारी क्षमताएँ कम थीं, जोखिम अधिक थे, खतरे ज्यादा थे, इसलिए हमने दुनिया को संभालने की रणनीति अपनाई लेकिन उससे दूर रहे। हम ऐसा आगे नहीं कर सकते। हम दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। अब दुनिया का स्वरूप बदल गया है।”

ग्लोबल समिट के दौरान जब जयशंकर से पूछा गया कि क्या भारत सीएए पर स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाया है या गलत समझा जा रहा है? इस पर विदेश मंत्री ने जवाब दिया, “मीडिया के बाहर भी दुनिया के कुछ वर्ग हैं। मैंने सरकारों से बात की है। मैं ब्रसेल्स में था जहाँ मैंने एक कमरे में 27 विदेश मंत्रियों के साथ बात की। हम सीएए को लेकर इस नतीजे पर पहुँचे कि यह किसी का मामला नहीं है कि सरकार और संसद के पास नागरिकता की शर्तें निर्धारित करने का कोई अधिकार नहीं है। हमने देश में शरणार्थियों की संख्या कम करने की कोशिश की है। इसकी सराहना होनी चाहिए। हर कोई नागरिकता को एक संदर्भ में देखता है, मुझे कोई भी ऐसा देश बताइए जो कहता हो कि दुनिया के हर व्यक्ति का वहाँ स्वागत है।”

विदेश मंत्री से जब कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के निदेशक आपसे (CAA पर) सहमत नहीं दिखते तो उन्होंने कहा, “हो सकता है। वह पहले भी गलत रही हैं। मैंने जम्मू-कश्मीर पर इस संस्था की रिपोर्ट देखी है। जिसमें बहुत ही सावधानीपूर्वक यह बताया गया है कि देश सीमापार की आतंकवादी गतिविधियों की वजह से प्रभावित हो रहा है।”

एस जयशंकर का पूरा सम्बोधन इस लिंक पर देख सकते हैं-