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हरि सिंह के पोते और कॉन्ग्रेस नेता ने किया मोदी सरकार के फैसले का स्वागत, बताया 2011 के जनगणना को फर्जी

जम्मू कश्मीर में परिसीमन आयोग गठित होने के बाद कॉन्ग्रेस नेता एवं राजा हरि सिंह के पोते विक्रामादित्य सिंह ने मोदी सरकार के इस फैसलै को सराहा है। मगर, इसके साथ ही उन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना के आँकड़ों के उपयोग के बारे में आशंका व्यक्त की है और उसे एक गंभीर गलती भी बताया है।

विक्रमादित्य सिंह ने अपने ट्वीट में कहा, “जम्मू कश्मीर के लिए परिसीमन आयोग बनाना एक सराहनीय कदम है। लेकिन, अगर ये 2011 के सेंसस के आधार पर किया जाता है तो ये गंभीर गलती होगी। क्योंकि सभी सबूतों से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर की जनगणना फर्जी थी। इसलिए मैं 2021 की जनगणना के अनुसार, निर्णय की समीक्षा करने के लिए भारत सरकार से आग्रह करता हूँ।”

बता दें कि विक्रमादित्य सिंह के अलावा पैंथर्स पार्टी के प्रधान एवं पूर्व विधायक बलवंत सिंह मनकोटिया ने भी भाजपा को 2021 के सेंसस के बाद परिसीमन आयोग के गठन करने की सलाह दी है। पैंथर्स पार्टी के मुताबिक भाजपा खुद मानती है कि जम्मू कश्मीर की पिछली राज्य सरकारों ने जनगणना के तहत कश्मीर संभाग की आबादी और जमीन ज्यादा बताई है। जबकि जम्मू की आबादी और जमीन कश्मीर से ज्यादा है। इसलिए उनका कहना है कि अगर 2011 की मतगणना के तहत ही परिसीमन आयोग का गठन किया गया तो फिर जम्मू संभाग को कोई फायदा नहीं होगा और जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा। इसके साथ ही विधानसभा क्षेत्र और संसदीय क्षेत्र भी कश्मीर के ज्यादा होंगे।

उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार जम्मू की जनता के साथ इंसाफ करना चाहती है तो परिसीमन आयोग का गठन 2021 की जनगणना के बाद किया जाना चाहिए, क्योंकि जम्मू की संख्या और जमीन कश्मीर से ज्यादा है। बैठक में पैंथर्स पार्टी के काफी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत परिसीमन के बाद प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या में सात सीटों का इजाफा होना है और कुल सीटों की संख्या 114 पर पहुँच जाएगी। इनमें 24 सीटों को पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के लिए आरक्षित रखा जाएगा।

जानकारों के अनुसार परिसीमन के बाद बढ़ने वाली सात सीटों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए कई सीटों को आरक्षित किया जा सकता हैं। फिलहाल जम्मू कश्मीर में 7 विधानसभा सीटों को अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित रखा जाता रहा है लेकिन अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए एक सीट भी आरक्षित नहीं है। ऐसे में नए परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए भी सभी सीटों का आरक्षण होने का आसार है। इसके अतिरिक्त का भाजपा नेतृत्व भी चाहता है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण हो। इससे जम्मू संभाग में सीटों की संख्या बढ़ने के आसार बनेंगे।

बता दें कि केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के नियम, शर्तें तय करने के बाद आयोग की अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पैनल अपना काम करना शुरू करेगा। चुनाव विभाग के सूत्रों के अनुसार परिसीमन आयोग के गठन के बाद अब जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई जल्द बैठक बुला सकती हैं। जिसमें पैनल में शामिल सदस्य जिसमें चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा, जम्मू कश्मीर के मुख्य चुनाव आयुक्त शैलेंद्र कुमार मुख्य रूप से शामिल रहेंगे। इसी बैठक में परिसीमन आयोग के काम करने के क्षेत्र के नियम व शर्तें तय होगी और आयोग अपना काम करना प्रारंभ करेगा।

लंदन भाग रही थीं ‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर की बेटी रौशनी, मुंबई एयरपोर्ट पर रोकी गईं

‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर फ़िलहाल ईडी की कस्टडी में हैं लेकिन उनके परिवार पर जैसे ही जाँच की आँच पहुँची, उनकी बेटी रौशनी कपूर लंदन भागने लगीं। रौशनी को मुंबई एयरपोर्ट पर शिकंजे में लिया गया है, जहाँ से वो ब्रिटिश एयरवेज़ से लंदन जाने की फ़िराक़ में थीं। बता दें कि नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे भगोड़े भी अभी लंदन में ही हैं और उनके प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार लगी हुई है। राणा कपूर और उनके परिवार, जिसमें पत्नी बिंदु कपूर, बेटियाँ- राखी कपूर टंडन, राधा कपूर और रोशनी कपूर के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया जा चुका है।

राणा कपूर की बेटी रौशनी को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लंदन जाने से रोका गया। ईडी ने खुलासा किया है कि कपूर, उनकी पत्नी और तीनों बेटियों ने मिल कर 20 फ़र्ज़ी कम्पनियाँ खोल रखी थीं और उन कंपनियों के द्वारा रुपयों की गड़बड़ी की जाती थी। ‘यस बैंक’ से लोन दिलाने के एवज में भारी रक़म वसूली जाती थी। ‘लुक आउट नोटिस’ को नज़रअंदाज़ कर लंदन भागने की कोशिश करने वाली रौशनी ने ईडी और सीबीआई का शक और गहरा कर दिया कि दाल में ज़रूर कुछ काला है।

ईडी ने राणा कपूर की पत्नी बिंदु और उनकी तीनों बेटियों के कई ठिकानों की तलाशी भी ली है। दिल्ली और मुंबई में चले इस तलाशी अभियान के दौरान राखी कपूर टंडन, राधा कपूर और रोशनी कपूर से पूछताछ भी की गई, जो कई घंटों तक चली। 

ईडी ने मुंबई कोर्ट को बताया है कि ‘यस बैंक’ ने डीएचएफएल के 3700 करोड़ मूल्य से भी अधिक के डिबेंचर ख़रीदे। डीबीएचएल ने डोलीट अर्बन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड को 600 करोड़ का लोन दिया। इस कम्पनी में राणा कपूर की बेटियाँ बतौर डायरेक्टर कार्यरत हैं।

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जिनके पति हुए देश पर बलिदान… उसी राह पर चल वीरांगनाओं ने सेना का बढ़ाया मान: 10 कहानियाँ

आज ‘महिला दिवस’ के अवसर पर हम कुछ ऐसी महिलाओं की दास्ताँ लेकर आ रहे हैं, जिनके पति सेना में थे और जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद सेना को ही अपनाया। इन्हीं में एक कैप्टेन शालिनी सिंह हैं, जिनके पति मेजर अविनाश सिंह भदौरिया के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उन्होंने सेना ज्वाइन की। शालिनी को 2017 में ‘मिसेज इंडिया क्लासिक क्वीन ऑफ सबस्टेंस’ का अवॉर्ड भी मिला। शालिनी के पति कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। शालिनी भी अब सेना से रिटायर हो चुकी हैं। 2001 में जब मेजर भदौरिया बलिदानी हुए, तब शालिनी मात्र 21 साल की थीं। उनके बेटा ध्रुव तब 2 साल का ही था।

स्कवाड्रन लीडर समीर मिराज-2000 के क्रैश होने के कारण वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उसके बाद उनकी पत्नी ने फेसबुक पर लिखा था- ‘मुझे अभी भी यकीन नहीं होता कि तुम जा चुके हो। किसी के पास मेरे सवालों का जवाब नहीं हैं। तुम ही क्यों?’ पति के बलिदान के बाद गरिमा अबरोल ने भी वायुसेना में शामिल होने का फ़ैसला किया। उन्होंने एएफएसबी के साथ सर्विस सिलेक्शन बोर्ड का इंटरव्यू पास किया था।

इसी तरह नीतू संब्याल भी अपने पति के वीरगति को प्राप्त होने बाद सेना में शामिल हुईं और लेफ्टिनेंट बनीं। जम्मू कश्मीर के साम्बा की नीरू के पति रवींद्र 2015 में एक इंजरी की वजह से दिवंगत हो गए थे। रवींद्र जम्मू कश्मीर राइफल्स में थे। उनकी एक छोटी बेटी भी है।

मेजर अमित देशवाल मणिपुर में उग्रवादियों के साथ मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। वो अपने पीछे एक नन्हे बेटे को छोड़ गए थे। पत्नी नीता देशवाल ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने चेन्नई में सेना के पासिंग आउट परेड में हिस्सा लेकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। अमित झज्जर जिले के सुरमति गाँव में रहने वाले थे।

निधि मिश्रा की कहानी काफ़ी संघर्ष भरी है। उन्हें उनके ससुराल वालों ने ही बेदखल कर दिया था। जब उनके पति वीरगति को प्राप्त हुए, तब निधि के पेट में 4 महीने का बच्चा था। आज वो लेफ्टिनेंट निधि मिश्रा दुबे हैं। सुसराल वालों ने उनके पति की मृत्यु के बाद उन्हें सदमे से उबरने के लिए समय भी नहीं दिया और तुरंत निकल जाने को कहा। 7 सालों के संघर्ष के बाद निधि ने सेना में ट्रेनिंग ली।

गौरी महादिक के पति मेजर प्रसाद महादिक उग्रवादियों के हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। गौरी ने सेना ज्वाइन की और कहा कि वो वही कर रही हैं, जो उनके पति चाहते थे। वो चाहते थे कि गौरी हमेशा हँसती-मुस्कुराती रहे। दिसंबर 2017 में जब मेजर प्रसाद वीरगति को प्राप्त हुए, तब उन दोनों की शादी को महज दो साल ही हुए थे। गौरी ने चेन्नई में सेना की ट्रेनिंग ली। संयोग देखिए, उन्हें वही नंबर मिला जो उनके पति को मिला था।

वीरगति को प्राप्त मेजर विभूति ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल के परिवार को भी एक समय में कश्मीर को हमेशा के लिए अलविदा कहना पड़ गया था क्योंकि वो कश्मीरी पंडित थे। शादी के 10 माह बाद ही मेजर विभूति बलिदानी हो गए और निकिता अकेली रह गईं। लेकिन उन्होंने हौंसला नहीं हारा और सेना ज्वाइन किया।

सुष्मिता पांडेय न सिर्फ़ सेना में शामिल हुईं बल्कि अपने पति के समकक्ष पद पर पहुँचीं। उनकी शादी 2010 में मेजर नीरज से हुई थी। 16 मार्च 2016 को एक रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान नीरज वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उस वक़्त उनका बेटा मात्र 4 साल का था। सुष्मिता एसएसबी की परीक्षा पास कर लेफ्टिनेंट बनीं।

कर्नल संतोष महादिक की पत्नी स्वाति महादिक सितम्बर 2017 में 11 महीनों के कठिन प्रशिक्षण हासिल करने के बाद सेना में अधिकारी के तौर पर शामिल हुईं। उनके पति 2015 में उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंक विरोधी अभियान में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उन्हें वीरता के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया था। चेन्नई स्थित ओटीए में ट्रेनिंग के बाद वो सेना में बतौर अधिकारी शामिल हुईं।

दून की कैप्टन प्रिया सेमवाल पश्चिम बंगाल के हल्दिया से पोरबंदर (गुजरात) के बीच आर्मी सेलिंग एक्सपीडिशन का हिस्सा बनीं और 45 दिनों में 3500 मील का सफर तय किया। प्रिया के पति नायक अमित शर्मा 20 जून 2012 को अरुणाचल प्रदेश में सेना के ऑपरेशन ऑर्किड के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। प्रिया को कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

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‘कफ़न बाँध कर आए हैं, जो हमारे साथ नहीं… वो देश का गद्दार है’ – पिंजरा तोड़ वालों के खिलाफ अपील

ये सन्देश सीलमपुर व जाफराबाद के लोगों की तरफ़ से है। ट्रांस-यमुना क्षेत्र में रह रहे लोगों की तरफ से जनता के लिए ये अपील जारी की गई है:

कुछ प्रबुद्ध सामाजिक वर्ग के लोगों और ‘पिंजरा तोड़’ जैसे कथित सामाजिक संगठनों के कारण हम यमुना के आसपास रहने वाले लोग ख़ासी परेशानी में हैं। यहाँ के सभी स्थानीय लोग पीड़ित और दुःखी महसूस कर रहे हैं। चारों तरफ़ भगदड़ का माहौल है। ये संगठन और कथित प्रबुद्ध जन प्रतिदिन हिंसा भड़काने के काम में लगे रहते हैं और उन्होंने आज जाफराबाद मेन रोड को ही जाम कर दिया। इससे राहगीरों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

हम अभी भी उस आतंक से उबरे नहीं हैं, जिसका सामना हमें 1992 और 2006 में करना पड़ा था। हाल में भी हमारे ख़िलाफ़ जब हिंसा हुई, तो हमारे साथ कोई नहीं खड़ा हुआ। ये एक बहुत ही ग़ैर-जिम्मेदाराना हरकत है, जिसका सामना हमें करना पड़ रहा है। यहाँ की महिलाएँ रोड जाम करने के पक्ष में नहीं थीं और उन्होंने जब कड़ा विरोध दर्ज कराया तो ‘पिंजरा तोड़’ के नेताओं ने कहा:

“कफ़न बाँध कर आए हैं। जो हमारे साथ नहीं, वो देश का गद्दार है।”

दरियागंज दिल्ली गेट पर इसी ‘पिंजरा तोड़’ के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने पुलिस के साथ झड़प की लेकिन इनमें से किसी एक को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया। वो सभी हिंसक हरकतें कर के भाग खड़े हुए। फँसा कौन? स्थानीय लोग। स्थानीय लोगों में से कई आज भी पुलिस केस और अदालती कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं। करनी उनकी और भुगतना हमें पड़ रहा है।

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The fight against CAA-NPR-NRC is being sabotaged by the Hindutva forces out of which the recent pogrom targeted on Muslim community which managed to displace and kill largely Muslims was executed in North East Delhi along with other regions in India to curb, repress and instill fear among anti NPR-NRC-CAA protestors. We are seeing the collapse of all state machinery meant to check the authoritarian and fascist forces of the government. Arbitrary and false allegations as grave as attempt to murder, rioting with arms and sedition are being filed on organisers and participants of peaceful protests. Countless innocent people have lost their lives and livelihoods. So far there are at least 46 confirmed deaths while over 300 are undergoing treatment for serious injuries, including gunshot wounds. This is an organized attempt to communalise the two months of peaceful mass sit-ins against the divisive, anti-people CAA-NRC-NPR. Damage of properties, livelihoods and lifelong earnings are one of the primary material consequences which has led to displacements of the Muslim community, something that anti CAA –NPR protests were protesting against. People have in fact lost their identity documents and assets. Pinjratod supports the call by Young India committee and will join in strength and solidarity with the ANTI CAA-NPR-NRC movement on 3rd MARCH, 11 AM AT RAMLILA MAIDAN, DELHI We request all to come together. INQUILAAB ZINDABAD

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हम इलाक़े में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। यहाँ हम किसी भी प्रकार की हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर सकते। ट्रांस-यमुना क्षेत्र में कई प्रदर्शन स्थलों पर ‘पिंजरा तोड़’ ने पहले भी हिंसा फैलाने की कोशिशें की थीं लेकिन हमने उन्हें सफल नहीं होने दिया। हमारे लिए प्रार्थना कीजिए। इन असामाजिक तत्वों को यहाँ हिंसा करने और अराजकता फैलाने से रोकने में हमारी मदद कीजिए।

कुरान में बुर्का शब्द का कहीं भी वर्णन ही नहीं… ‘मर्दों की आँखों की दरिंदगी’ से बचाव वाला तर्क फिर कहाँ पैदा हुआ!

बुर्का एक शब्द नहीं बल्कि एक प्रतिबन्ध है| अगर आपको चित्रात्मक तरीके से प्रतिबन्ध को दिखाना हो तो आप बुर्का पहने हुए एक महिला को दिखा सकते हैं। जब पूरे विश्व में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उसी समय विश्व का एक बहुत बड़ा तबका बुर्के के द्वारा महिलाओं की आजादी छीनने को सही ठहराने में लगा हुआ है।

किसी मुस्लिम से पूछिए बुर्का क्यों ज़रूरी है? जवाब में वो तपाक से यही बोलेगा कि कुरान में लिखा है। अगर थोड़े मौलाना टाइप के किसी आदमी से पूछेंगे कि बुर्क़ा महिलाएँ ही क्यों पहनती हैं? तो वो पूरा तरीका बताने लग जाएगा कि किस टाइप का बुर्क़ा पहनने को कुरान में बोला गया है। इन्हें ये तक नहीं पता है कि कुरान में वास्तव में क्या कहा गया है। ऐसे लोग भले ही अपने आपको इस्लाम का प्रचारक समझते हों लेकिन उनमें बहुत ज्यादा ज्ञान की कमी ही है। इन दोनों व्यक्तियों में इस चीज़ की समानता है कि दोनों ही मुस्लिम महिला को दबाकर रखना चाहते हैं।

इस मजहब में कुरान को इस्लाम की एक दैवीय पुस्तक मानते हैं। इस्लाम के समर्थकों के अनुसार उनके हर प्रश्न का जवाब कुरान में दिया हुआ है। अगर पहनावे की बात की जाए तो वो भी उनके अनुसार कुरान में दिया गया है कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए। उनके अनुसार ये बोला जाता है कि कुरान में बोला गया है कि महिलाएँ अपने पूरे शरीर को पूरा ढकें जबकि यह बात पूरी तरह से गलत है कि ऐसा कुछ कुरान में बोला गया है। सच्चाई यह है कि कुरान में बुर्का शब्द का कहीं भी वर्णन है ही नहीं। उसमें केवल यह बोला गया है कि महिलाओं का सर ढका होना चाहिए और कपड़े शालीन होने चाहिए।

बुर्का शब्द और पहनने का प्रचलन ईरान से आया है। जब इस्लाम मजहब ईरान में आया तब उन लोगों ने वहाँ के प्रचलित परिधान को अपना लिया और धीरे-धीरे ये उनके मजहब का अंग बन गया। अब इसको अगर यह कहा जाए कि कुरान में ऐसा कहा गया है तो उन आदमियों को लानत है, जो केवल महिलाओं को दबाने के लिए मानसिक प्रतिबन्ध के अलावा उनके वस्त्रों का भी सहारा ले रहे हैं।

जब आप किसी से बात करें और वो व्यक्ति सामने हो पर वो आपकी तरफ ना देख रहा हो तो आप यही समझेंगे कि वो आपकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है और आप अपनी बात उस तक पहुँचाने में पूरी तरह से विफल रहेंगे। यही बात बुर्के में भी कहीं हद तक सत्य सिद्ध होती है। अगर कोई महिला सामने खड़ी है और उसका चेहरा पूरी तरह से ढका हुआ हो तो आप सामान्य सा महसूस नहीं करेंगे। इसकी जगह अगर उस महिला का चेहरा दिख रहा हो तो आप के शब्दों पर उसके चेहरे के हाव भाव से आप अपनी बात को पूरी तरह से उस तक पहुँचा सकते हैं।

समुदाय विशेष के लोग कहते हैं कि बुरका पहनने से महिलाओं का ‘मर्दों की आँखों की दरिंदगी’ से बचाव होता है। उनके अनुसार महिलाओं को केवल अपने खून के रिश्ते के अलावा किसी अन्य को चेहरा नहीं दिखाना चाहिए। इसके लिए वो बुर्के को पहनना जायज ठहराते हैं। जबकि इसका अगर दूसरा हिस्सा देखें तो, मर्दों की आँखों में यदि दरिंदगी है तो उसका उपाय ढूँढना चाहिए ना कि महिलाओं की वेशभूषा की स्वतन्त्रता में रोक लगाना चाहिए। क्या मुस्लिम मर्दों की आँखों में दरिंदगी है? ऐसा है तो उन्हें पहले नैतिक शिक्षा की जानकारी होनी चाहिए और महिलाओं के लिए उनके मन में अगर सम्मान है तो दरिंदगी का मतलब नहीं रह जाता है।

बुर्के से एक बहुत बड़ा नुकसान महिलाओं की त्वचा को भी होता है। बुर्का पहनने से महिलाओं की त्वचा को विटामिन डी नहीं मिल पाता है। इससे उनको त्वचा से सम्बंधित रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। बुर्का पहनने से मुस्लिम महिलाओं को हड्डी के रोगों के भी होने की भी संभावना रहती है। मुस्लिम महिलाएँ अगर बाहर काम करती हैं तो वो दिन भर बुर्का पहने रहती हैं, जिससे उनकी त्वचा में जो विटामिन मिलने चाहिए उसकी कमी होने लगती है। कभी-कभी यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि स्किन कैंसर का रूप ले लेती है।

बुर्का महिलाओं की आत्मा और उनके स्वाभिमान को पूरी तरह से चोट पहुँचाता है। मुस्लिम महिला अगर सामान्य रूप से शालीन सी कोई पोशाक पहनना चाहती है, फिर भी उसको काले रंग का बुर्का उसके ऊपर डालना होता है। इससे उसके स्वाभिमान को कहीं न कहीं ठेस पहुँचती है। वो महिला जो बुर्का पहने हुए हैं, वो जब अन्य महिलाओं के स्वतंत्र शालीन लिबास को देखती है तो उसके मन में कहीं न कहीं बुर्के के प्रति हीन भावना आ ही जाती है, जिससे उसके आत्मविश्वास को बहुत ज्यादा चोट पहुँचती है।

बुर्के के अगर इतिहास को लोग सही में जान लें तो उन्हें पता चल जाएगा की यह पहनावा भौगोलिक क्षेत्र की आवश्यकता के लिए उस समय की महिलाओं ने अपनाया था, जिससे उस क्षेत्र में चलने वाली रेत भरी हवाओं से बचा जा सके। उसको अगर दूसरे क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं पर जबरदस्ती लागू किया जाता है तो यह एक मानसिक प्रताड़ना कहलाती है। महिलाओं को अगर इस्लाम के समर्थक पुरुष उनको उनके मन से अगर कपड़े तक पहनने नहीं दे रहे हैं तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है|

बुर्का का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है| बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है, लेकिन इस्लाम का एक हिस्सा नहीं है। जहाँ पर इस्लाम का जन्म हुआ, उस हिस्से की औरतों ने कभी भी पर्दा नहीं पहना था। हजरत मुहम्मद ने कभी भी पर्दा करने के निर्देश नहीं दिए थे। धर्मग्रन्थों में दिए गए विचारों के साथ ही, विद्वानों का ये मत है कि इस्लाम में, सिर ढकने की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसका सीधा संबंध क़ुराम से है। सिर को ढकने की प्रथा का प्रारंभ अरब में इस्लाम के आगमन से पूर्व कुछ अन्य देशों के साथ संपर्क के चलते किया गया था, जहाँ पर हिजाब एक प्रकार की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। आवरण में या बुर्के में रहना- इसे अरब में पैगम्बर मोहम्मद द्वारा प्रचलित नहीं किया गया था वरन्‌ ये वहाँ पर पहले से मौजूद था।

आवरण में रहना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था और ग्रीक, रोमन, ज्यू और असायरियन्स में ये प्रथा थोड़ी या ज्यादा मात्रा में उपस्थित थी। ये पता नहीं चल पाया है कि ये रिवाज़ आमजनों तक कैसे पहुँचा। मुस्लिम समाज में, अपनी प्रतिष्ठा व धन प्रदर्शन का मुद्‌दा बनाकर आवरण को ग्रहण करने की प्रथा धीरे-धीरे पैगम्बर मोहम्मद की पत्नियों को अपना आदर्श बनाकर आगे चल पड़ी। अरब के लोगों ने इस्लाम में हिजाब और नकाब को मिलाकर बुर्क़ा पहनने को अनिवार्य कर दिया। ब्रिटेन के एक कैबिनेट मंत्री ने सुझाव दिया था कि अगर वो बुर्के वाली महिला से बात करती हैं तो वो सहज महसूस नहीं करती हैं। उन्होंने कहा था कि अगर कोई महिला हिजाब पहनकर आती है तो उन्हें ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि उसमें महिला का चेहरा दिखता है।

कुरान में हिजाब का जिक्र है, जिसमें महिला का चेहरा दिखता रहता है। बुर्का केवल कट्टरपंथी इस्लाम की सोच है जिसमें वो महिला को जबरदस्ती चेहरा ढकने के लिए बाध्य करते हैं। श्रीलंका ने वहाँ पर हुए आत्मघाती हमले के बाद बुर्क़ा पहनने पर रोक लगा दिया है। बहुत से यूरोपियन और अफ़्रीकी देशों ने बुर्क़े पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। अरब देशों में बुर्का पहनने का चलन वहाँ पर चलने वाली आँधियों से बचने के लिए था। धीरे-धीरे उस क्षेत्र में इस्लाम धर्म के फ़ैलने के कारण बुर्का इस्लाम का अंग बन गया। कुरान में ‘जिलबाब या खिबर’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ होता है बदन को ढकने वाली एक चादर या दुपट्टा। इसमें चेहरे को ढकने को नहीं बोला गया है। बुर्क़ा की शुरुआत फारस यानी ईरान से हुई। फारस में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तो वहाँ पर एक संस्कृति पहले से ही मौजूद थी। इस्लामी संस्कृति में कई चीज़ें फारसी संस्कृति से आई हैं।

जैसे, अल्लाह की जगह खुदा और सलात की जगह नमाज जैसे शब्द। इसी तरह ईरानी संस्कृति के प्रभाव में मुसलामानों ने बुर्क़ा अपना लिया। बुर्क़ा का आत्मघाती कार्रवाइयों में इस्तेमाल तथा उसका अपराधियों द्वारा स्वयं को छुपाने के उपकरण के रूप में प्रयोग करने की घटनाओं के बाद उसके सार्वजनिक स्थलों में प्रयोग पर गंभीर विवाद खड़ा हो गया। इसके पश्चात अनेक इसाई बहुल पश्चिमी देशों ने सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने को प्रतिबंधित कर दिया। फ्रांस में 2011 में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। वर्ष 2018 में डेनमार्क में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने का प्रतिबन्ध लगा दिया गया। नीदरलैंड की सीनेट ने जून 2018 में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने के प्रतिबन्ध का कानून पास किया।

जर्मनी की संसद ने गाड़ी ड्राइव करते समय किसी भी तरह से चेहरा नहीं ढकने का कानून पास किया। वर्ष 2017 में ऑस्ट्रिया में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने के प्रतिबन्ध का कानून पास किया। बेल्जियम में जुलाई 2011 में पूरे चेहरे को ढकने को प्रतिबंधित करने वाला कानून पास किया गया। नॉर्वे में 2018 में पारित एक कानून के तहत शिक्षण संस्थानों में चेहरा ढकने वाले कपड़े पहनने पर रोक है। बुल्गारिया की संसद ने 2016 में एक बिल पारित किया था। इसके अनुसार, सार्वजानिक जगहों में चेहरा ढकने वाली महिलाओं को मिलने वाली सरकारी मदद में कटौती की जा सकती है। लिसबर्ग में भी इसी तरह के आंशिक प्रतिबन्ध हैं। वहाँ अस्पतालों, अदालतों और सार्वजनिक इमारतों में चेहरा नहीं ढका जा सकता है।

इटली के कई शहरों में चेहरा ढके रहने पर प्रतिबन्ध है। स्पेन के बार्सिलोना शहर में साल 2010 में नगर पालिका कार्यालय, सार्वजनिक बाजारों और लाइब्रेरी जैसी जगहों पर चेहरा ढकने पर रोक लगी थी। स्विटज़रलैंड के भी कुछ इलाकों में इस तरह का प्रतिबन्ध लगा हुआ है। साल 2015 में बुर्काधारी महिलाओं ने अफ्रीका में कई आत्मघाती हमले किए थे। इसके बाद कार्ड, गबान, कैमरून के उत्तरी क्षेत्र, निजिरिया और रिपब्लिक ऑफ़ कॉम्बो में पूरा चेहरा ढकने पर रोक लगा दी गई। अल्जीरिया में साल 2018 में सरकारी कर्मचारियों पर सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा पूरा ढकने पर रोक लगा दी गई। चीन में कुछ जगहों पर चेहरा पूरा ढकने या बुर्का पहनने पर प्रतिबन्ध है। आतंकवाद को रोकने के लिए भारत को बुर्का प्रतिबंध की आवश्यकता है। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सार्कोजी ने दो साल पहले बयान दिया था महिलाओं को ढकने वाला बुर्का गुलामी का प्रतीक है।

पिछले साल ऐसा किस्सा भी सामने आया था, जब फ्रांस की सरकार ने एक विदेशी व्यक्ति को नागरिकता देने से इसलिए इनकार कर दिया था क्योंकि उसने अपनी ‘पत्नी को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया। वहीं सऊदी अरब के एक मजहबी चैनल ‘वतन टीवी’ ने नियम बनाया हुआ है कि महिला एंकर नकाब पहनें। जब महिलाएँ कार्यक्रम पेश कर रही होती हैं तो स्टूडियों में पुरुष तकनीकी कर्मचारियों को घुसने की इजाजत नहीं होती है। बुर्के को लेकर अलग-अलग दुविधाएँ सामने आती रही हैं। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के एक जज के सामने जब धोखाधड़ी का एक मामला आया तो उन्होंने आदेश दिया कि मुस्लिम महिला गवाही देने के लिए अपने चेहरे से नकाब हटाएँ। जज का कहना था कि ये उचित नहीं होगा कि गवाह का चेहरा ढका रहे।

ईरान में भी बुर्के को लेकर दिलचस्प किस्सा सामने आ चुका है। दरअसल, ईरानी लड़कियों की फुटबॉल टीम को युवा ओलिम्पिक खेलों में भाग लेना था, लेकिन उसका कहना था कि वे हिजाब पहनकर खेलेंगी, जिस पर फीफा राजी नहीं था। बाद में फीफा ने बालों को पूरी तरह से ढकने वाले हिजाब के स्थान पर सिर को ढकने वाले एक विशेष कैप की पेशकश की ताकि बीच का रास्ता निकल सके। 2009 के अपने भाषण के तत्कालीन फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने कहा कि बुर्का महिला की अधीनता का प्रतीक है। राष्ट्रपति सरकोजी ने आगे बताया कि जो महिलाएँ पर्दा करती हैं, उन्हें फ्रांस में अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि देश महिलाओं की पहचान उनके कारावास और वंचितता में विश्वास नहीं करता।

मिस्र में भी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ अधिकारियों ने विश्वविद्यालय में नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया है। अधिकारियों का तर्क है कि उन्होंने सुरक्षा कारणों की वजह से ये पहल की। फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी के लिए बुर्का एक निहत्थे जेल का प्रतीक है, जो महिलाओं को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में प्रस्तुत करता है। लेखक ऐनी अप्पलम्ब्याउम के अनुसार, बुर्का को शालीनता और स्थानीय रीति-रिवाजों के सम्मान के लिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

(लेखक: गौरव मिश्रा)

‘हराम की बोटी’ को काट कर फेंक दो, खतने के बाद लड़कियाँ शादी तक पवित्र रहेंगी: FGM का भयावह सच

राणा कपूर की तीनों बेटियों की 20 फर्जी कम्पनियाँ, ₹13000 करोड़ का गबन: CBI ने दर्ज किया मामला

‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर की गिरफ़्तारी के बाद ये मामला और भी फँसता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच की आँच अब राणा कपूर की पत्नी और उनकी तीनों बेटियों तक पहुँच गई है। राणा कपूर ने कई महँगी पेंटिंग्स ख़रीदी थीं, जिनकी क़ीमत करोड़ों में लगाई गई थी। इसके अलावा उनके 2000 करोड़ रुपए के निवेश की भी जाँच की जा रही है। मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ़्तार राणा कपूर एक दर्जन से भी अधिक मुखौटा कंपनियों के जरिए अपना कारोबार चला रहे हैं, जो जाँच की जद में आ गई है।

ईडी ने मुंबई कोर्ट को बताया है कि ‘यस बैंक’ ने डीएचएफएल के 3700 करोड़ मूल्य से भी अधिक के डिबेंचर ख़रीदे। डीबीएचएल ने डोलीट अर्बन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड को 600 करोड़ का लोन दिया। इस कम्पनी में राणा कपूर की बेटियाँ बतौर डायरेक्टर कार्यरत हैं। बिना पर्याप्त कोलैटरल के उक्त लोन दे दिया गया और नियमों की अनदेखी की गई। दोनों कंपनियों के करार में 4300 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की बात ईडी ने कही है। इसके बाद कोर्ट ने राणा कपूर को 11 मार्च तक ईडी की कस्टडी में भेज दिया।

ईडी ने राणा कपूर की पत्नी बिंदु और उनकी तीनों बेटियों के कई ठिकानों की तलाशी भी ली है। दिल्ली और मुंबई में चले इस तलाशी अभियान के दौरान राखी कपूर टंडन, राधा कपूर और रोशनी कपूर से पूछताछ भी की गई, जो कई घंटों तक चली। तीनों बेटियों पर आरोप है कि उनके नाम से कई कम्पनियाँ चलती हैं, जो दूसरी कंपनियों को ‘यस बैंक’ से लोन दिलाने के एवज में मोटी रकम वसूलती थीं। इस तलाशी अभियान के बाद मिले दस्तावेजों के आधार पर राणा कपूर के ख़िलाफ़ एक और अलग मामला दर्ज किया जा सकता है।

कपूर परिवार के पास 44 महँगे पेंटिंग्स मिले हैं। इनमें से कई राजनेतओं से ख़रीदी गई है। ईडी ने कपूर की पत्नी और तीनों बेटियों के बयान भी रिकॉर्ड किए हैं। आरबीआई ने ‘यस बैंक’ पर पाबन्दी लगाने के साथ ही उसके बोर्ड को भी भांग कर दिया है, ऐसे में कोई व्यक्ति अपनी जमापूँजी में से इस बैंक से 50,000 रुपए तक ही निकाल सकता है। सीबीआई ने ‘दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड’ और राणा कपूर की तीनों बेटियों के ख़िलाफ़ भी केस दर्ज किया है।

इस मामले के तार गैंगस्टर इक़बाल मिर्ची तक भी जुड़ते नज़र आ रहे हैं। ऐसे में ईडी फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है। ‘यस बैंक’ के संस्थापक रहे राणा कपूर बाद में इसके एमडी और सीईओ बने। सितम्बर 2018 में उन्हें ये पद छोड़ना पड़ा था। आरोप है कि डीएफएचएल ने कुल 80 फ़र्ज़ी कंपनियों के जरिए 13,000 करोड़ रुपए का गबन किया है। एक ईडी अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि कपूर परिवार ने 20 फ़र्ज़ी कम्पनियाँ बना रखी हैं, जिनका इस्तेमाल इन गड़बड़ियों के लिए किया गया।

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‘खतना’ एक शब्द में ही सब कुछ कह जाता है। यह शब्द बोलने में ही कितना गंदा सा लगता है और अगर इसका सच जानें तो और भी घिन सी आ जाएगी। जब लोग खतना बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी के साथ कुछ अत्याचार सा हो रहा है। बात करने में लगता है कि कहीं पर कुछ काटने-पीटने की बात हो रही है और जब काटना-पीटना मनुष्य के शरीर का हो तो मन में एक दया और उस प्रथा के प्रति एक घृणा स्वाभाविक तौर आ जाती है। घृणा होना उस प्रथा के प्रति एक पहलू है। दूसरा पहलू यह भी है कि इस बेवजह की प्रथा को यहूदियों और मुसलामानों ने क्यों अपनाया?

खतना किसी भी धर्म का अंग नहीं है। यह एक प्रथा है, जो मुस्लिम और यहूदियों में बहुत पुराने समय से चली आ रही है। ना तो बाइबल में ऐसा कुछ लिखा है और ना तो कुरान में खतने का कहीं भी जिक्र है फिर भी इस प्रथा को मुस्लिम और यहूदी धर्म के ठेकेदार उसको धर्म से जोड़कर लोगों को डराने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। उनके लिए महिला के शरीर के एक खाल को निकालकर बहार फेंक देना कहाँ तक उस धर्म के इस प्रथा को सही ठहराता है!

महिलाओं की खतना प्रथा के बारे में बहुत से लोगों को नहीं पता है। महिलाओं का जब खतना होता है तो महिला के क्लिटोरिस को काटकर निकाल दिया जाता है। आम भाषा में इस अंग का कोई नाम नहीं है पर संस्कृत में इसे भग्नशिष कहते हैं। यह महिला के जननांग के ऊपरी भाग में खाल का एक टुकड़ा सा होता है। मुस्लिमों में इस अंग को ‘हराम की बोटी’ कहा जाता है। मुस्लिमों के द्वारा मनुष्य के किसी अंग को ‘हराम” शब्द देना वैसे ही अपने आप में मुस्लिमों का महिलाओं के प्रति उनकी दृष्टि को दिखाता है।

महिलाओं का खतना कैसे? इसके प्रकार मुस्लिम समुदायों के अनुसार अलग-अलग हैं। सबसे ज्यादा जिस प्रकार का खतना किया जाता है, उसमें उनके क्लिटोरिस वाले अंग को काटकर निकाल दिया जाता है| आप इस भयावह स्थिति का विचार कर सकते हैं कि महिला के अंग को काटकर निकाला जा रहा हो तो उस समय बच्ची या महिला की शारीरिक वेदना क्या होगी? दूसरे तरह के प्रकार में क्लिटोरिस का थोड़ा सा हिस्सा काटा जाता है। इसके बाद के दो और प्रकार बहुत ही डरावने हैं। तीसरे तरह के प्रकार में महिला के जननांग को बींध दिया जाता है और उससे बहुत ही बुरा चौथा प्रकार यह है कि महिलाओं के जननांग को सिल दिया जाता है। ये चारों ही प्रकार महिलाओं के ऊपर मुस्लिम समाज के द्वारा किया गया चरम सीमा का अत्याचार ही है। कुछ लोंगो का यहाँ तक मानना है कि अगर उनके परिवार की किसी लड़की का उन्होंने खतना कर दिया है तो उस परिवार का समुदाय में मान भी बढ़ता है। मुस्लिम समुदाय अगर इस तरह से अपने मान को बढ़ाने के लिए लड़कियों के ऊपर अत्याचार करते रहेंगे तो यह कहाँ तक सही है?

इस घिनौनी प्रथा का सच भी बड़ा अजीब सा है। मुस्लिम और यहूदी समुदाय में यह माना जाता है कि अगर लड़कियों का कम उम्र में क्लिटोरिस को काटकर निकाल दिया जाए तो उनके मन में सेक्स के प्रति इच्छा नहीं रहेगी। उस स्त्री का सेक्स करने का मन नहीं करेगा और शादी के पहले वह स्त्री पवित्र रहेगी। क्या लड़कियों का सेक्स करना इतना गलत है कि उनको इतनी अमानवीय प्रथा से गुजरना पड़े? क्या लड़कियों का कोई अधिकार नहीं है कि वो अपने शरीर के बारे में और अपनी इच्छा को अपने अनुसार सोच सकें? यह एक कुप्रथा ही नहीं बल्कि महिला का शारीरिक शोषण भी है।

खतना के बाद महिला को असहनीय पीड़ा सहन करनी पड़ती है। आप यह सोंचे कि जब आपके शरीर में हल्की सी कोई चुटकी काट ले तो आपको कितनी पीड़ा होती है, वहीं जब महिला के एक अंग को निकालकर बाहर फेंका जा रहा है तो उस महिला को कितनी पीड़ा का सामना करना पड़ता होगा! इस खतना क्रिया के बाद महिला या बच्ची में योनि संक्रमण होने की संभावना बहुत ज्यादा रहती है क्योंकि बहुत बार ऐसा होता है कि एक ही रेजर से कई महिलाओं का खतना कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में जननांग के साथ इस तरह से कुकृत्य करने से कई बार महिला के बच्चे की जनन क्रिया में बाधा हो जाती है और कभी-कभी वह महिला बच्चे को जन्म भी नहीं दे पाती है। कितनी गन्दी और घिनौनी प्रथा है यह, जिसमें महिला के आतंरिक अंगों को इस प्रथा के द्वारा हानि पहुँचाई जाती है। जब यह होता है तो कई बार बहुत ज्यादा रक्तस्राव होने से बच्चियों की मृत्यु तक हो जाती है और कभी-कभी बच्चियाँ कोमा तक में पहुँच जाती हैं। मतलब आप यह सोच सकते हैं कि एक प्रथा के चक्कर में यह मुस्लिम समाज किस तरह से बच्चियों को मृत्यु तक पहुँचा रहा है।

इस प्रथा से महिलाओं को मानसिक वेदना का भी शिकार होना पड़ता है। इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद शादी के बाद महिला के सेक्स जीवन में काफी असर पड़ता है। वो मानसिक द्वन्द्व से गुजरती रहती है। बच्ची को जब बहला फुसलाकर ले जाकर उसका खतना करवा दिया जाता है, तो उसका अपने लोंगो के प्रति किसी तरह का भरोसा नहीं रह जाता है और यह अविश्वास की भावना उसके जीवन में बहुत समय तक रहती है और मानसिक उत्पीड़न से अपने दिनों को काटती रहती है। वो महिला जिसको इस गंदे और वीभत्स प्रथा से होकर गुजरना पड़ता है उसके मानसिक अंतर्द्वंद्व को हम किसी भी तरह समझ नहीं सकते हैं कि किस पीड़ा से वो महिला या बच्ची गुजर रही होगी।

एक प्रथा जिसका कोई भी कारण नहीं है होने का, जिसमें केवल और केवल वेदना है, वेदना शारीरिक और मानसिक दोनों ही, उस कुप्रथा को कैसे मुस्लिम धर्म अपना सकता है। मुस्लिम धर्म में ऐसी बहुत सी कुप्रथाएँ चल रही हैं जो केवल महिलाओं के ऊपर ही लागू होती हैं। मुस्लिम धर्म महिला की हर तरीके से आजादी छीनने में विश्वास कैसे कर सकता है? मुस्लिम धर्म कैसे किसी महिला के अंग को निकालकर बाहर फेंक सकता है? यह पूरी तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन ही तो है। इसको खत्म करने के लिए हर देश को कानून बनाने ही होंगे, जिससे महिलाओं का शोषण रोका जा सके।

दाऊदी बोहरा समुदाय से आने वाली कई महिलाओं ने प्रधानमंत्री से लड़कियों के खतना को गैरकानूनी करार देने के लिए मदद की गुहार लगाई है। भारत में फिलहाल खतना को लेकर कोई कानून नहीं है और बोहरा समुदाय अब भी इस परंपरा का पालन करता है। जिसे यहाँ खतना या महिला सुन्नत कहते हैं। इसे अंग्रेजी में फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मुस्लिम महिला योनि के एक हिस्से क्लिटोरिस को रेजर ब्लेड से काट दिया जाता है। या कुछ जगहों पर क्लिटोरिस और योनि की अंदरूनी त्वचा को भी आंशिक रूप से हटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया में महिला को असहनीय पीड़ा सहन करनी पड़ती है।

इस कुरीति को लेकर विश्वास है कि महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए खतरनाक है और महिलाओं को सेक्स का का कोई अधिकार नहीं है। इससे मुस्लिम महिला एक मानसिक वेदना से गुजरती है| मुस्लिम समाज में रूढ़िवादिता हावी है| माना जाता है कि जिस मुस्लिम महिला का खतना हो चुका है, वह अपने पति के प्रति ज्यादा वफादार होगी और घर से बाहर नहीं जाएगी।

यूनिसेफ के आँकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में सालाना 20 करोड़ मुस्लिम महिलाओं का खतना होता है। इनमें आधे से ज्यादा सिर्फ मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया में होते हैं। आँकड़ों के मुताबिक जिन 20 करोड़ लड़कियों का खतना होता है, उनमें से करीब साढ़े चार करोड़ बच्चियाँ 14 साल से कम उम्र की होती हैं। इंडोनेशिया में आधी से ज्यादा बच्चियों का खतना हो चुका है। माना जाता है कि अफ्रीका में हर साल तीस लाख लड़कियों पर इसका खतरा मंडरा रहा है।

ऐसा समझा जाता है कि तीस अफ्रीकी देशों, यमन, इराकी कुर्दिस्तान और इंडोनेशिया में महिला खतना ज्यादा चलन में है। वैसे भारत समेत कुछ अन्य एशियाई देशों में भी इसके मामले मिले हैं। औद्योगिक देशों में बसी प्रवासी आबादी के बीच भी महिला खतना के मामले देखे गए हैं। यानी नए देश और समाज का हिस्सा बनने के बावजूद कुछ लोग अपनी पुरानी रीतियों को जारी रखे हुए हैं। जिन देशों में लगभग सभी महिलाओं को खतना कराना पड़ता है, उनमें सोमालिया, जिबूती और गिनी शामिल हैं। ये तीनों ही देश अफ्रीकी महाद्वीप में हैं।

आम तौर पर परिवार की महिलाएँ ही इस काम को अंजाम देती हैं। साधारण ब्लेड या किसी खास धारदार औजार के जरिए खतना किया जाता है। हालाँकि मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में अब मेडिकल स्टाफ के जरिए महिलाओं का खतना कराने का चलन बढ़ा है। महिला खतने का चलन मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अलावा कुछ स्थानीय धार्मिक समुदायों में भी है। आम तौर पर लोग समझते हैं कि धर्म के मुताबिक यह खतना जरूरी है लेकिन कुरान या बाइबिल में ऐसा कोई जिक्र नहीं है।

माना जाता है कि महिला की यौन इच्छा को नियंत्रित करने के लिए उसका खतना किया जाता है। लेकिन इसके लिए धर्म का बेतुका हवाला दिया जाता है। बहुत से ईसाई और मुस्लिम समाज के लोग का मानना है कि खतने के जरिए महिलाएँ पवित्र होती हैं। इससे समुदाय में उनका मान बढ़ता है और ज्यादा कामेच्छा नहीं जगती। जो लड़कियाँ खतना नहीं करातीं, उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है। खतने के कारण उस महिला को माँ बनने के समय बहुत सी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके कारण कई तरह की मानसिक समस्याएँ और अवसाद भी हो सकता है।

बहुत से अफ्रीकी देशों में महिला खतने पर प्रतिबंध है। लेकिन अकसर इस कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जाता है। वहीं माली, सिएरा लियोन और सूडान जैसे देशों में यह कानूनी है। महिला खतने से कई अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन होता है। 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला खतने को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव स्वीकार किया था। यूएन महिला खतने को ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन’ मानता है। खतना से पहले एनीस्थीसिया भी नहीं दिया जाता। बच्चियाँ पूरे होशोहवास में रहती हैं और दर्द से चीखती हैं।

अगर बच्ची का खतना वाकई यौन इच्छा घटाने के लिए है तो सात साल की लड़की का खतना कराके वो क्या हासिल करना चाहते हैं? छोटी बच्ची को सेक्स और यौन इच्छा से क्या मतलब? खतना से औरतों को शारीरिक तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है, इसके अलावा तरह-तरह की मानसिक परेशानियाँ भी होती हैं। उनकी सेक्स लाइफ पर भी असर पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, बेल्जियम, यूके, अमरीका, स्वीडन, डेनमार्क और स्पेन जैसे कई देश इसे पहले ही अपराध घोषित कर चुके हैं।

इस परंपरा पर 42 देशों ने रोक लगा दी है, जिनमें 27 अफ्रीकी देश हैं। बच्चियों का खतना बहुत छोटी उम्र में कराया जाता है। उस वक्त उन्हें कुछ पता ही नहीं होता, फिर वो पुलिस को कैसे बताएँगी? और फिर खतना कराते ही घरवाले हैं, तो बात बाहर कैसे आएगी? सरकार को बोहरा समुदाय के धार्मिक नेताओं से भी बात करनी चाहिए, उनके बिना इस अमानवीय परम्परा को खत्म करना बहुत मुश्किल है।

हाई-प्रोफाइल बोहरा परिवार अपनी बच्चियों का खतना कराने के लिए डॉक्टरों के यहाँ ले जाते हैं| चूँकि खतना मेडिकल प्रैक्टिस है ही नहीं इसलिए डॉक्टरों को भी इस बारे में कुछ पता नहीं होता फिर भी पैसों के लिए वो भी इसमें शामिल हो जाते हैं। ये सब बिल्कुल गुपचुप तरीके से होता है और कोई इस बारे में बात नहीं करता। महिलाओं का खतना एक ऐसी कुप्रथा है, जिससे न सिर्फ महिलाएँ अपना मानसिक संतुलन खो देती हैं, बल्कि उनके शरीर को बेहद नुकसान भी पहुँचता है।

यूएन ने साल 2030 तक महिला खतना को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं का खतना करने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि महिलाओं का खतना सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता है क्योंकि उन्हें शादी करनी है। इस मसले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं का जीवन केवल शादी और पति के लिए नहीं होता है। शादी के अलावा भी महिलाओं के दायित्व होते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी महिला पर ही ये दायित्व क्यों हो कि वह अपने पति को खुश करे।

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खतने वाली प्रथा को निजता के अधिकार का उल्लंघन माना है। साथ ही ये भी कहा है कि यह लैंगिक संवेदनशीलता का मामला है और ऐसा किया जाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। महिलाओं के खतना जैसे आपराधिक कृत्य को इस आधार पर इजाजत नहीं दी सकती कि वह प्रैक्टिस का हिस्सा है। प्राइवेट पार्ट को छूना पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने भी महिलाओं की खतना प्रथा के खिलाफ कहा कि ये किसी भी व्यक्ति के पहचान का केंद्र बिंदु होता है और ये एक्ट (खतना) किसी की पहचान के खिलाफ है। कोर्ट ने माना कि इस तरह का एक्ट एक औरत को आदमी के लिए तैयार करने के मकसद से किया जाता है, जैसे वो जानवर हों।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्म के नाम पर कोई किसी महिला के यौन अंग को कैसे छू सकता है। यौन अंगों को काटना महिलाओं की गरिमा और सम्मान के खिलाफ है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करती है। बोहरा मुस्लिम समुदाय से संबंधित एक महिला के अनुसार क्लिटरिस को बोहरा समाज में हराम की बोटी कहा जाता है।

दाउदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं के खतना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं का खतना यानी महिला जननांग का छेदन करने की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है, जो कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा और धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करने की गारंटी देता है। खतना प्रथा के समर्थन में खड़े संगठन की ओर से पेश हुए वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि खतना करना इतना क्रूर भी नहीं है, जितना कि इसे बताया जा रहा है। तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था, “यह संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है क्योंकि इसमें बच्ची का खतना कर उसको आघात पहुँचाया जाता है।” केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि सरकार याचिकाकर्ता की दलील का समर्थन करती है कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) और बाल यौन अपराध सुरक्षा कानून (POCSO Act) के तहत दंडनीय अपराध है।

मिस्र में आमतौर पर 9 से 12 साल की उम्र में ही लड़कियों का खतना कर दिया जाता है। मिस्र सरकार के मुताबिक, यहाँ 92 फीसदी शादीशुदा महिलाएँ खतना की प्रक्रिया से गुजर चुकी है। यूएन के आँकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया से गुजरने वाली सबसे ज्यादा महिलाएँ मिस्र की हैं। दक्षिण अफ्रीकी देश गुयाना को आधिकारिक तौर फ्रेंच गुयाना के नाम से जाना जाता है। यहाँ खतना गैरकानूनी है। इसके बावजूद दुनिया में खतने के मामले में यह दूसरे नंबर पर है। एक सर्वे के मुताबिक, 15 से 49 साल की 96 फीसदी महिलाएँ खतना की प्रक्रिया से गुजरीं। इसके लिए यहाँ धर्म या क्षेत्र का कोई भेद नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका में स्थित माली में भी खतना परंपरा आम है। WHO के आँकड़ों के मुताबिक, माली में 15-49 साल की उम्र की 85.2 फीसदी महिलाएँ इस प्रक्रिया से गुजरीं। यहाँ के सोनरई, तामाचेक और बोजो लोगों में ही इसका आँकड़ा कम है। माली में 64 फीसदी महिलाएँ एफएमजी को धार्मिक दृष्टि से जरूरी मानती हैं। यहाँ इसके खिलाफ अब तक कोई सख्त कानून भी नहीं है। दक्षिण अफ्रीकी देश एरिट्रिया में सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में FGM की दर 89 फीसदी बताई गई थी। यहाँ भी ग्रामीण इलाकों में धार्मिक दृष्टि से इसे जरूरी माना जाता है। ये मुस्लिम और ईसाई, दोनों ही धर्मों में प्रचलित है। मार्च 2007 में सरकार ने इसके खिलाफ कानून बनाया गया। इसके तहत जुर्माने से लेकर कैद तक की सजा का प्रावधान है।

सोमालिया में करीब 80 से 98 फीसदी महिलाओं का खतना होता है। WHO ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि सोमालिया में 97.7 फीसदी महिलाएँ और लड़कियाँ खतने की प्रक्रिया से गुजरीं। वहीं, यूनिसेफ ने भी अपनी रिपोर्ट में सोमालिया में खतने की दर को दुनिया में सबसे ज्यादा बताया था। अगस्त 2012 में संविधान के आर्टिकल 15 में खतना पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन इस पर रोक नहीं लग पाई है। मुख्य रूप से मुस्लिम आबादी वाले जिबूती में 93 फीसदी से 98 फीसदी महिलाओं का खतना होता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में जिबूती को दुनिया का दूसरा ऐसा देश बताया गया था, जहाँ तीसरे स्तर के खतने की दर बहुत ज्यादा है।

हालाँकि, यहाँ के मौलवी भी इस प्रक्रिया को लेकर दो धड़ों में बँटे हुए हैं। देश में इसके खिलाफ सख्त कानून है। जिसके तहत दोषी पाए जाने पर पाँच साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान भी है। बुर्किना फासो को बुर्किना और आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ अपर वोल्टा के नाम से जाना जाता है। इस छोटे से देश की आबादी डेढ़ करोड़ से थोड़ी ज्यादा होगी। खतना यहाँ की संस्कृति में शामिल है। WHO ने 2006 की अपनी रिपोर्ट में यहाँ खतने की दर 72.5 फीसदी बताई थी। 1996 में देश में इसके खिलाफ कानून बनाया गया, जो फरवरी 1997 से लागू है।

हे शक्ति
तुम क्यों निराश हो
उदास हो
बदहवास हो।

हे शक्ति
तुम हनुमान नहीं
कि तुम्हें
तुम्हारी शक्ति का अहसास दिलाऊँ
तुम्हारी ऊर्जा का श्रोत बताऊँ।

हे शक्ति
तुम उठो
जागो
तुम अपने खड्ग से
महिसासुर ‘खतना’ का वध कर दो।

हे शक्ति
तुम क्यों निराश हो
उदास हो
बदहवास हो।

लेखक: गौरव मिश्रा

60 वर्षीय कॉन्ग्रेस नेता ने रवीना से रचाई शादी, पार्टी अध्यक्ष पद की रेस में भी रहे हैं शामिल

कॉन्ग्रेस पार्टी के 60 वर्षीय नेता मुकुल वासनिक ने शादी रचाई है। आनंदपुर साहिब से सांसद मनीष तिवारी ने वासनिक की शादी की सूचना दी और उन्हें बधाई भी दी। तिवारी अपनी पत्नी नाज़नीन के साथ नवविवाहित जोड़े को शुभकामनाएँ देने पहुँचे। उन्होंने ट्विटर पर इस पल को शेयर किया और लिखा कि वो वासनिक को 1984 से ही जानते हैं।

1988 में ‘इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस’ के अध्यक्ष रहे मुकुल वासनिक ने रवीना खुराना के साथ शादी रचाई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने बताया है कि वो रवीना को 1985 से ही जानते हैं और दोनों की जोड़ी खूब जम भी रही है। मनीष जब ‘वर्ल्ड फेस्टिवल ऑफ यूथ एंड स्टूडेंट्स’ में भाग लेने मॉस्को गए थे, तब उनकी मुलाक़ात रवीना खुराना से हुई थी। तिवारी ने लिखा कि वो इन दोनों के विवाह के बंधन में बंध जाने के बाद ख़ासे ख़ुश हैं।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार (मार्च 8, 2020) को दिल्ली के मौर्या शेरेटन पहुँचे और उन्होंने पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक को शादी की बधाई दी। मौर्या शेरेटन में मुकुल वासनिक की तरफ से लंच पार्टी का आयोजन किया गया था, जिसमें अहमद पटेल, अम्बिका सोनी और आनंद शर्मा जैसे कई दिग्गज कॉन्ग्रेस नेता उपस्थित रहे।

बता दें कि हाल ही में जब राहुल गाँधी ने अचानक से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, तब मीडिया में मुकुल वासनिक के नए अध्यक्ष बनने की अटकलें लगाई जा रही थीं। हालाँकि, सोनिया गाँधी को फिर से पार्टी की कमान दे दी गई थी।

IAF क्या-क्या करती है, ऊँची जगह से फोटो लो और Pak भेजो: हजाम, अरबाज और अब्बास जासूसी करते धराए

भारत में रहकर यहाँ के सैन्य ठिकानों से संबंधी अहम जानकारियाँ पाकिस्तान को भेजने के आरोप में पुलिस ने गुजरात के कच्छ से 4 पाकिस्तानी जासूसों को गिरफ्तार किया। जानकारी के मुताबिक गुजरात पुलिस और एटीएस की रडार पर ये चारों काफी लंबे समय थे। मगर, इनकी गिरफ्तारी आज सुबह जाकर संभव हुई। अब पुलिस, चारों आरोपितों से पूछताछ में जुटी है।

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गिरफ्तार हुए चारों आरोपितों की उम्र 17-23 वर्ष तक की है। इनमें से तीन की पहचान 23 वर्षीय हजाम मामाद्राफिक (Hajam Mamadrafik), 20 वर्षीय अरबाज इस्माइल, 18 साल के पढियार अब्बास (Padeiyar Abas) के रूप में हुई है। चौथे आरोपित के नाबालिग होने के कारण उसकी पहचान का खुलासा नहीं किया गया है।

शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इन 4 युवकों पर कच्छ के नलिया वायुसेना की डिप्लॉयमेंट की जानकारी और वायुसेना की मूवमेंट सीमा पार पाकिस्तान भेजने का आरोप है। इसके अलावा बताया जा रहा है कि इनके जरिए सैन्य की गुप्त जानकारियाँ फोटोग्राफी की आड़ में पाकिस्तान भेजी जा रही थीं। जिसके लिए ये एयरबेस के आसपास ऊँची जगह पर जाकर फोटो लेते थे और पाकिस्तान भेजते थे। यह किस-किस के संपर्क में थे, फिलहाल भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ इसकी जानकारी जुटा रही हैं। इनके खिलाफ़ शासकीय गोपनीयता अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है।

बता दें कि इससे पहले भारतीय नौसेना में जासूसी और हनी ट्रैप के खुलासे के बाद डिफेंस कर्मचारियों के लिए फेसबुक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब कोई भी जवान फेसबुक का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। साथ ही नौसेना के ठिकानों, डॉकयार्ड और ऑन-बोर्ड युद्धपोतों पर स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। बीते दिनों नौसेना के 7 कर्मियों को सूचनाएँ लीक करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद नौसेना ने अपने कर्मियों से सोशल मीडिया से दूरी बनाने का फरमान जारी किया था।

कोई ढोती थीं मैला तो कोई थीं सफाई कर्मचारी: पद्म पुरस्कार विजेता महिलाओं की 7 कहानियाँ

इस बार के नारी दिवस की थीम है- समानता और बराबरी। बराबरी की दुनिया ही सक्षम दुनिया है। और हाँ, इस थीम पर पूरी तरह से फिट बैठती हैं भारत की वो महिलाएँ, जिन्होंने हर बंधन को तोड़कर, हर मुश्किल से लड़कर ना केवल अपने सपनों को साकार किया है बल्कि समाज और देश के विकास में भी अपना अहम योगदान दिया है। सरकार ने इस साल 141 पद्म पुरस्कार दिए हैं और उन्हें पाने वालों में 34 महिलाएँ हैं। चलिए आज नारी दिवस के अवसर इन पद्म पुरस्कार विजेताओं में से कुछ से मिलते हैं।

सफाई कर्मचारी से विधान सभा का सफर- भागीरथी देवी

“कौन कहता है आसमाँ में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”। ये कहावत फिट बैठती है इस साल पद्म पुरस्कार पाने वाली भागीरथी देवी पर। वो रामनगर, पश्चिम चम्पारण से बिहार विधान सभा की सदस्या हैं। भागीरथी देवी पश्चिम चम्पारण के नरकटियागंज के एक महादलित परिवार से आती हैं। कभी यह नरकटियागंज के ब्लॉक विकास कार्यालय में मात्र 800 रूपए माह की तन्ख्वाह पर काम करने वाली सफाई कर्मचारी हुआ करती थीं।

साइकिल पर घूम कर काम करने वाली भागीरथी देवी ने गाँव की लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया है। महिलाओं के संगठन बनाकर लोगों को घरेलू हिंसा और दलित हिंसा के बारे में जागरूक करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

पेड़-पौधों को जानने वाली तुलसी अम्मा

अब मिलिए कर्नाटक की तुलसी गौड़ा जी से। 72 साल की तुलसी अम्मा मूलत: हलक्की आदिवासी हैं। इनके पास चिकित्सकीय पौधों से जुड़े ज्ञान का भण्डार है। किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद तुलसी अम्मा ने पर्यावरण को संरक्षित करने में अतुलनीय योगदान दिया है।

यह अब तक 30,000 से ज़्यादा पौधे रोप चुकी हैं और फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट की नर्सरीज़ की देखभाल करती हैं।

महाराष्ट्र की ‘सीड मदर’

सफल होने के लिए बस दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए, इस सोच को और प्रगाढ़ करती हैं महाराष्ट्र की 56 वर्षीय आदिवासी महिला राहिबाई सोमा पोपोरे। इन्होंने खुद से एग्रो बायो-डाइवर्सिटी के संरक्षण के बारे में सीखा है और आज यह अपने इस काम के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। इन्होंने लगभग पचास एकड़ की कृषि भूमि का संरक्षण किया है, जहाँ ये 17 अलग अलग तरह की फसलें उगाती हैं। इन्होंने खाली पड़ी ज़मीनों पर जल संरक्षण करने के अपने तरीके विकसित किए हैं।

पोपेरे, किसानों और छात्रों को सही बीज चुनने, मिट्टी को उपजाऊ रखने और कीड़ों से फसल को बचाने की ट्रेनिंग देती हैं। लोगों की सहायता करने के लिए यह स्वयं सहायता समूह भी चलाती हैं। इनकी इन्हीं खूबियों के चलते इन्हें ‘सीड मदर’ के नाम से जाना जाता है।

केरल की पारम्परिक कठपुतली कला की अन्तिम जीवित जानकार

81 साल की मूज़िक्कल पंकाजक्क्षी केरल की पारम्परिक कठपुतली कला नोक्कूविद्या पावाक्कली की अकेली जानकार हैं। यह बेहद मुश्किल कठपुतली कला है, जिसे सीखने के लिए कड़ा प्रशिक्षण और बेहद मेहनत लगती है। इस कला में कलाकार को कठपुतलियों को अपने अपर लिप पर बैलेंस करना होता है और उनकी चालों को नियंत्रित करने के लिए धागों के साथ आँख की पुतलियों को भी लगातार चलाना पड़ता है। यह अपने स्टायल और अलग तरीके से अंजाम दिए जाने के कारण एक दुर्लभ विद्या मानी जाती है।

पंकाजक्क्षी पाँच दशकों से इसे कर रही हैं। फिलहाल वो इस कठपुतली विधा की एकमात्र जानकार हैं, जो खत्म होने के कगार पर है। उन्हें इस विद्या को जीवित रखने के लिए पद्म पुरस्कार से नवाज़ा गया है।

हल्दी क्रांति की जनक ट्रिनिटी सय्यू

मेघालय की ट्रिनिटी सय्यू का नाम हल्दी की खेती के साथ जुड़ चुका है। सय्यू अपने गाँव की 800 से ज़्यादा महिलाओं को जैविक खेती के ज़रिए शुद्धतम और उच्चतम किस्म की हल्दी की खेती करने का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। इनके स्वयं सहायता समूह की महिला किसान लाकाडोंग किस्म की हल्दी की खेती करती हैं, जो खाना बनाने में इस्तमाल होने के साथ ही एक एन्टी इन्फ्लेमेट्री, एन्टी डायबीटिक और एन्टी कैन्सरस चिकित्सकीय गुणों वाली उपज भी है।

सय्यू जैयन्तिया हिल आदिवासी महिला हैं जहाँ मातृसत्तात्मक सत्ता चलती है। परिवार की सम्पत्ति महिलाओं को मिलती है। अपनी माँ से मिली पारिवारिक सम्पत्ति और कृषि के गुणों का सय्यू बेहद कौशल के साथ संरक्षण कर रही हैं।

सिर पर मैला ढोने वाली ऊषा चोमर बनी महिला शक्ति की पहचान

जिजीविषा, इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और हौसले का जीता-जागता उदाहरण हैं, राजस्थान के अलवर जिले में रहने वाली ऊषा चोमर। मात्र 10 साल की उम्र में शादी होने के बाद जब वो अपने ससुराल पहुँचीं तो उन्हें सिर पर मैला ढोने के काम में लगा दिया गया। समाज में हर कोई उन्हें तिरस्कृत नज़रों से देखता था और उस काम से बचने का कोई रास्ता भी नहीं था। तब ऊषा की मुलाकात सुलभ इंटरनेशनल के डॉ बिन्देश्वर पाठक से हुई, जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने जैसी मैला ढोने वाली महिलाओं को एकत्र किया और जूट और पापड़ बनाने जैसे कामों की शुरुआत की।

धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता बढ़ी और ऊषा मैला ढोने के उस काम से बाहर निकल आईं। यह उनकी कोशिशों का ही परिणाम है कि आज अलवर में कोई मैला ढोने वाली महिला नहीं रह गई है। आज उनके बच्चे स्कूल और कॉलेज में पढ़ रहे हैं, समाज में उनका मान सम्मान है। उषा अब ‘सुलभ इन्टरनेशनल’ की प्रेसिडेन्ट भी बन गई हैं।

माइक्रोक्रेडिट बैंकिंग सिस्टम की जनक- चिन्ना अम्मा

चिन्ना पिल्लई मदुरै के पास के एक छोटे से गाँव से हैं। लेकिन छोटी जगह इनकी बड़ी सोच और बड़ी सफलता में बाधा नहीं बन पाई। चिन्ना ने अपने गाँव की गरीबी से जूझने के लिए और ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए आसपास के गाँवों की महिलाओं के साथ मिलकर खुद का एक माइक्रोक्रेडिट बैंकिंग सिस्टम शुरू किया, जिसके ज़रिए ज़रूरतमन्दों को बेहद कम दर पर कर्ज़ दिया जाता है।

चिन्ना अम्मा: मदुरै के एक छोटे से गाँव से रचा इतिहास

उनकी इस छोटी से कोशिश ने बहुत सी महिलाओं को गरीबी से बाहर निकालकर आत्मनिर्भर बनने में भी मदद की। इन्हें 1999 में स्त्री शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उस समय के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने चिन्ना अम्मा को पुरस्कार देते समय उनके पैर भी छुए थे। इन्हें इनके काम के लिए 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

यह भारत की वो गौरवशाली नारियाँ हैं जिन्होंने हर बंधन, हर रोक, हर परम्परा को तोड़कर अपने लिए रास्ता साफ किया है। जो फेमिनिज़्म की सही पहचान हैं, जिन्हें ना तो पितृसत्तात्मक सोच रोक पाई और ना ही इन पर थोपी गई वर्ण व्यवस्था। विश्व के लिए भले ही महिला दिवस का समापन आज रात 12 बजे हो जाएगा, लेकिन मुस्कुराइए कि आप भारतवर्ष में हैं, जहाँ पर महिलाशक्ति का अभिनन्दन और सफलताएँ अनवरत चलने वाली सतत् प्रक्रिया है। हैप्पी वीमेन्स डे…

(लेखिका: चित्रलेखा अग्रवाल)