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3 राउंड जिन्दा कारतूस लेकर संसद में घुस रहा था अख्तर खान, पुलिस ने किया गिरफ्तार

बृहस्पतिवार (मार्च 05, 2020) को संसद में प्रवेश कर रहे अख्तर खान नाम के एक शख्स को तीन राउंड जिंदा कारतूस के साथ गिरफ्तार किया गया है। जब उसे गिरफ्तार किया गया, उस समय वह संसद के गेट नंबर-8 से प्रवेश कर रहा था। अख्तर खान को बाद में पूछताछ के लिए पुलिस को सौंप दिया गया। उसने कहा कि वह प्रवेश करने से पहले कारतूस बाहर निकलना भूल गया था।

संसद में कुल मिलाकर 12 गेट हैं, जिसमें कुछ से आवाजाही होती है लेकिन कुछ बंद रखे जाते हैं। हालाँकि, सुरक्षा बंदोबस्त सभी पर होते हैं। आमतौर पर संसद परिसर में जिन गेटों से आवाजाही होती है, उसमें गेट पर सुरक्षा का जिम्मा सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस का मिलाजुला होता है।

पूछताछ के बाद पुलिस ने अख्तर खान को रिहा कर दिया। ज्ञात हो कि दिसंबर 13, 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद संसद की सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई थी। उस दिन एक सफेद एंबेसडर कार में आए पाँच आतंकवादियों ने 45 मिनट में पूरे हिंदुस्तान को झकझोर दिया था। उस दौरान हुए हमले में संसद भवन के गार्ड, दिल्ली पुलिस के जवान समेत कुल 9 लोग शहीद हुए थे।

ज्ञात हो कि संसद के दोनों सदनों में इस समय दिल्ली हिंसा पर कार्यवाही को लेकर हंगामा चल रहा है। आज ही लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने कागज छीनने और फाड़कर कुर्सी पर फेंकने को लेकर कॉन्ग्रेस के सात सांसदों को निलंबित कर दिया।

भारत ने दिया मुँहतोड़ जवाब: एंटी टैंक मिसाइल से पाकिस्तानी सैन्य ठिकाने पर किया हमला, देखें VIDEO

भारतीय सेना ने एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल और तोप के गोले से पाकिस्तानी सेना के ठिकाने पर हमला किया है। भारतीय सेना ने यह कार्रवाई पाकिस्तान द्वारा लगातार सीजफायर उल्लंघन के जवाब में की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय सेना ने यह हमला कुपवाड़ा सेक्टर के ठीक सामने स्थित पाकिस्तानी सेना के ठिकाने पर किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार यह हमला पाकिस्तानी सेना द्वारा लगातार जम्मू-कश्मीर में सीजफायर उल्लंघन के जवाब में किया गया है।

पाकिस्तानी सेना लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन करती आई है। बीती फरवरी की आठ तारीख को पुँछ सेक्टर में बिना वजह हुए ऐसे ही संघर्ष विराम उल्लंघन में एक भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुआ था जबकि तीन अन्य सैनिक घायल हुए थे

4 फरवरी को भी पाकिस्तानी सेना ने बिना किसी उकसावे, पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम का उल्लंघन किया था। सैन्य सूत्रों के अनुसार पकिस्तान सीजफायर का यह उल्लंघन जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों को घुसपैठ कराने के लिए किया करता है। जहाँ बड़ी संख्या में आतंकवादी भारतीय सीमा में घुसपैठ करने को तैयार बैठे रहते हैं।

इसके पहले पिछले साल पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक कर के भी भारत अपने इरादे साफ कर चुका है कि अगर पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। और, भारतीय सेना भी किसी तरह की चुनौती से निपटने के लिए हमेशा तैयार है।

इस्लामी मुल्ला यासिर दिल्ली पुलिस को बोल रहा आतंकी, दंगाई शाहरुख़ को कहा- ‘हीरो’

दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में पत्थरबाजों का आतंक सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रहा। पत्थरबाजों ने आम हिन्दुओं को ही नहीं बल्कि पुलिसकर्मियों तक को अपना निशाना बनाया। ऐसे ही कुछ वीडियो, जिनमें बड़ी भीड़ को पुलिसवालों पर पत्थर बरसाते हुए देखा जा रहा है, सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है। इसमें एक वीडियो ऐसा भी सामने आया है जिसमें पुलिसकर्मी घायल डीसीपी अमित शर्मा को पत्थरबाजों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

वीडियो में स्पष्ट देख सकते हैं कि डीसीपी अमित शर्मा भीड़ के बीच फँसे हुए हैं, जिसके बाद कई पुलिसकर्मी वहाँ पहुँचते हैं और वो डीसीपी अमित शर्मा को पत्थरबाजों और भीड़ के चंगुल से बचाते हैं। चाँद बाग हिंसा में एसीपी अनुज भी घायल हुए थे।

लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ लोग पुलिस और हिन्दुओं के विरोध में पोस्ट लिखने से अभी भी बाज नहीं आ रहे हैं। इन्हीं में से एक है यासिर अराफात। यासिर अराफात ने ABP न्यूज़ चैनल की पत्रकार रुबिका लियाक़त का ट्वीट शेयर किया है। जिसमें भीड़ द्वारा पुलिस पर पत्थर फेंके जा रहे इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा है- “लाजवाब, आतंकवादी पिट रहे हैं…”

यासिर अराफात ने इस ट्वीट में पुलिस को आतंकवादी बताया है क्योंकि पत्थरबाजी कर रही भीड़ के निशाने पर पुलिसकर्मी ही हैं।

इससे पहले भी यासीर अराफात ट्विटर पर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार शरजील इमाम के साथ #iSupportSharjeelImam जैसे हैशटैग के साथ अपनी संवेदनाएँ व्यक्त कर चुका है।

ज्ञात हो कि सिर्फ मीडिया ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर मौजदू एक विशेष वर्ग निरंतर शरजील इमाम और शूटर मोहम्मद शाहरुख के लिए माहौल बनाते हुए देखा गया है। यहाँ तक कि मोहम्मद शाहरुख़ को ‘माय हीरो’ जैसे पोस्ट के जरिए अभी भी मासूम साबित करने की कोशिश की जा रही है।

ऐसा करने वाले सिर्फ सोशल मीडिया अकाउंट होल्डर्स ही नहीं बल्कि बीबीसी और दी प्रिंट जैसे मीडिया गिरोह भी हैं। मोहम्मद शाहरुख़ की गिरफ्तारी के बाद से ही कुछ मीडिया गिरोह शाहरुख़ के पक्ष में उसे निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हुए देखे जा सकते हैं।

मोहम्मद शाहरुख के खिलाफ दिल्ली के जाफराबाद इलाके में भड़की हिंसा के दौरान 24 फरवरी को पुलिस के सामने आठ राउंड फायरिंग का आरोप है। मालूम हो कि जाफराबाद में सीएए विरोधी पत्थरबाजों को दौड़ाने के दौरान कर्दमपुरी मेन रोड निवासी शाहरुख ने पुलिसकर्मी के सीने पर पिस्टल तान दी थी। इसके बाद से ही वो लापता चल रहा था। लेकिन बाद में वो उत्तर प्रदेश में पकड़ लिया गया।

सोनिया-राहुल गाँधी के घर की भी हो जाँच, कोरोना वायरस के इटली कनेक्शन पर बोले भाजपा सांसद

लोकसभा में कोरोना वायरस पर चर्चा के दौरान एनडीए सहयोगी राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल की गाँधी परिवार पर टिप्पणी ने हंगामा खड़ा कर दिया। जिसके बाद लोकसभा की कार्यवाही को एक घंटे के लिए रोक देना पड़ा। आज सदन में कोरोना वायरस पर चर्चा के दौरान हनुमान बेनीवाल ने कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण को सोनिया गाँधी के ‘इटली कनेक्शन’ से जोड़ते हुए कहा- इस बात की जाँच होनी चाहिए कि क्या सोनिया गाँधी के घर से कोरोना वायरस फैला है?

इस सलाह के पीछे का कारण देते हुए हनुमान बेनीवाल ने कहा “क्योंकि ये लोग अभी हाल फिलहाल में ही इटली से वापस आए हैं, इसलिए सोनिया गाँधी के घर की जाँच होनी चाहिए कि कहीं उनके घर से ही तो कोरोना वायरस नहीं फैल रहा?”

इतना सुनते ही कॉन्ग्रेस के सदस्य सदन के वेल में आ गए, जिसके बाद सदन की कार्यवाही रोक देनी पड़ी। हालाँकि स्पीकर ने बेनीवाल की इस टिप्पणी को लोकसभा की कार्रवाई में शामिल नहीं करने की बात कही।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हनुमान बेनीवाल की इस विवादस्पद सलाह के पीछे उन्होंने जो तर्क दिया वह था – इटली का कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित होना। इसलिए सोनिया, राहुल और प्रियंका गाँधी वाड्रा की कोरोना जाँच की जानी चाहिए। पर इस सलाह के बाद ही लोकसभा में जैसा अपेक्षित भी था, जोरदार हंगामा खड़ा हो गया जिसमें कॉन्ग्रेस सदस्य सदन के वेल में कूद पड़े, नारे लगने लगे और, स्पीकर की टेबल पर कागज फेंके गए। जिसके बाद स्पीकर की कुर्सी पर मौजूद राजेंद्र अग्रवाल ने सदन की कार्यवाही 2 बजे तक रोक दी।

हनुमान बेनीवाल ने कहा- इसके पहले कॉन्ग्रेस लीडर अधीर रंजन चौधरी कह चुके हैं कि राहुल गाँधी ने सरकार को कोरोना वायरस के खतरे के बावत चेताया था।

आज इस हंगामे के पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कोरोना वायरस से निपटने के सरकारी प्रयासों को लोकसभा में साझा किया था जिसके बाद विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता अपनी-अपनी बात इस चर्चा के दौरान रख रहे थे, इसी क्रम में हनुमान बेनीवाल ने कोरोना वायरस के “इटली एंगल” को उठाते हुए गाँधी परिवार को लपेटे में ले लिया।

ज्ञातव्य है कि इटली कोरोना वायरस से संक्रमित प्रमुख ‘हॉटस्पॉट’ के रूप में सामने आया है। जहाँ से अबतक कोरोना वायरस के 3,089 कन्फर्म मामले और 107 मौतों की खबर आ चुकी है।

इस बीच राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने राजस्थान विधानसभा में जानकारी दी कि इटली कोरोना वायरस से प्रभावित तीसरा सबसे बड़ा देश है। उन्होंने कहा कि जयपुर एवं आगरा होते हुए दिल्ली पहुँचे इटालवी पर्यटक दल के 15 इतालवी पर्यटक भी कोरोना वायरस पाजिटिव पाए गए हैं। उन्होंने बताया कि पर्यटकों का यह दल दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरा था।

मेहनत और सम्मान से जीना वे क्या जानें, जिनके लिए पत्थर फेंकती औरतें हैं नारीवाद का चेहरा

महिलाओं को लेकर विश्वव्यापी धारणा है कि महिलाएँ भावनात्मक रूप से, शारीरिक रूप, मानसिक रूप से कमजोर ही होती हैं। वे सामाजिक दायरों को तोड़कर कितना ही खुद को सशक्त बना लें, लेकिन उनको लेकर इस कुत्सित मानसिकता की कोई थाह नहीं दिखती। जैसे-जैसे महिला आगे बढ़ती है, तरह तरह की उलाहनाएँ उसे घेरे रहती हैं। उसपर सवाल खड़े होते रहते हैं। कभी उसे परंपरा के नाम पर चार दिवारी में रखा जाता है, तो कभी अधिकारों का लालच देकर उसे अपनी क्षमता का विस्तार न करने पर बाध्य कर दिया जाता है।

और…शर्म की बात ये है कि इस घृणित काम को करने के पीछे सिर्फ़ रूढिवादी लोग अपना योगदान नहीं देते, बल्कि पढ़े-लिखे लोग भी इसमें खूब हिस्सा लेते है और साथ ही हिस्सा लेता है वो समुदाय जो खुद को महिलाओं को सच्चा हितैषी बताता है। उनके अधिकारों के लिए समय-समय पर आवाज उठाने के दावे करता है… मगर हकीकत में जब महिलाओं को आगे बढ़ता देखता है तो जुट जाता है उन औरतों का हौसला पस्त करने में, उन्हें भड़काने में। ताकि नारी सशक्तिकरण का झंडा उसी ओर उठे, जिस ओर वे उठाना चाहें।

हालिया उदाहरण देखिए। आज रेलवे मंत्रालय ने एक ट्वीट किया। ट्वीट महिला कूलियों से जुड़ा था। ट्वीट में कुछ महिला कूलियों की तस्वीरें थी, जो पुरूष कूलियों की तरह सामान उठाने का, उन्हें गाड़ियों पर खींचने का काम कर रही थीं। मुझे लगता है इससे खूबसूरत तस्वीर आज पूरे दिन भर में क्या ही होगी, रेलवे ने भी अपने ट्वीट में यही लिखा कि महिलाओं ने साबित कर दिया कि वे किसी से किसी मायने में पीछे नहीं हैं। अब आखिर इसमें क्या गलत था? मालूम नहीं, लेकिन लिबरल गिरोह की सशक्त महिलाओं को ये ट्वीट और ये तस्वीरें पसंद नहीं आईं।

उन्होंने महिला कूलियों की तस्वीर देखते ही उनकी हालत पर तरस खाना शुरू कर दिया। और, गिनी-चुनी इन महिला पत्रकारों ने इस तस्वीर के जरिए मोदी सरकार को घेरना शुरू किया। सबसे पहले फाय डियूजा ने इन तस्वीरों को देखकर ह्यूमन लेबर को अपना बिंदु बनाया और अपनी एलिट बुद्धि का प्रमाण देते हुए ह्यूमन लेबर को सशक्तिकरण से परे बताया। साथ ही ये कहा कि ह्यूमन लेबर देश में नौकरी की कमी है, बेरोजगारी हैं, गरीबी को दर्शाता है।

इसके बाद एक पत्रकार हैं- रोहिणी सिंह। रोहिणी ने भी इस तस्वीर को अपने लिए शर्मिंदगी की तरह देखा और ट्विटर पर कहा कि न्यू इंडिया उन्हें हर बीतते दिन के साथ शर्मसार कर रहा हैं। साथ ही शर्मसार कर रहे हैं सरकार के ट्विटर हैंडल जो ऐसी तस्वीरें डालते हैं।

जाहिर है, यहाँ पर फाय डिसूजा और रोहिणी सिंह जैसी क्रांतिकारी पत्रकारों को समझाकर कुछ हासिल नहीं होगा। क्योंकि जिन्हें महिला सशक्तिकरण के नाम पर एसी में बैठना और ऐसी बेफिजूल बातें करना सिखाया गया हो, उनका शारीरिक मेहनत जैसे कामों से क्या सरोकार? उन्हें आखिर क्या मतलब है एक महिला के स्वाभिमान से? उन्हें क्या मालूम कि समानता की बातें सिर्फ़ किताबों में परिभाषा सहित नहीं लिखनी होती, उन्हें व्यवहारिक स्तर पर उतारना पड़ता है, वो भी उदाहरण स्थापित करके, बिलकुल उस तरह जैसे ये महिलाएँ कर रही हैं। कभी उबर ड्राइवर के रूप में तो कभी महिला कूली के रूप में।

यकीन मानिए, मुझे या मेरी जैसी लड़कियों को स्टेशन पर महिला कूली या कार की स्टियरिंग पकड़े उबर चलाती महिलाओं को देखकर हमारे देश के आने वाले भविष्य की चिंता नहीं होती। बल्कि हमें तो खुशी होती है जब हम एक महिला या लड़की को समाज की बनाई उन धारणाओं को तोड़ता देखते हैं, जिन्हें गढ़कर कई कार्यक्षेत्रों को सिर्फ़ पुरुषों के नाम सुपुर्द कर दिए। हमें खुशी होती है ये सोचकर कि जिन महिलाओं ने अपने लिए यहाँ तक का रास्ता तय कर लिया वो अपने दम पर आगे भी बढ़ जाएँगी।

हमें यकीन है कि ये महिलाएँ अपनी ऊर्जा बेफिजूल चिल्लाकर बर्बाद नहीं करती होंगी। इन्हें सरकारी योजना के तहत केवल दियासलाई की लालसा नहीं रहती होगी। ये पारिवारिक आय के लिए सिर्फ़ किसी पुरूष पर आश्रित नहीं रहती होंगी। क्योंकि, ये वो महिलाएँ हैं जो अपनी क्षमताओं का विस्तार स्वयं कर रही हैं और खुद के जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपने पीछे संघर्ष की रूप-रेखा तैयार कर रही हैं।

मेरा सवाल फाय डियूजा और रोहिणी सिंह जैसे अनेको लोगों एवं पत्रकारों से है, जिन्हें महिलाओं को बतौर कूली के रूप में देखकर देश की स्थिति पर रोना आ रहा है, और ऐसा लग रहा है कि देश में रोजगार की तंगी के कारण महिलाओं को ये करना पड़ रहा है। क्या वो इनकी जगह होतीं तो इस कदम को उठा पातीं, क्या वो इस धारणा से निकल पातीं कि समाज ने तो उन्हें ये सिखाया है कि वो शारीरिक रूप से पुरूषों से कम होती हैं, तो फिर वो ये सब कैसे करें? या फिर परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए इतना हिम्मती काम कर पाते? शायद नहीं क्योंकि ऐसे लोगों के पास तो अपनी नाकामी छिपाने के लिए सरकार के प्रयासों को कोसना आखिरी विकल्प है। और बात नारीवाद की आए तो इनके लिए दिल्ली पुलिस पर पत्थर उठाने वाली महिलाओं और CAA पर निराधार प्रोटेस्ट चलाने वाली शाहीन बाग की महिलाओं को नायिका बनाना एकमात्र लक्ष्य। इनका कोई सरोकार नहीं है मेहनतकश और स्वाभिमानी महिलाओं से।

खुद सोचिए, आज जब एक संवेदनशील मुद्दे पर हमें ऐसी अव्यवहारिक टिप्पणी करने से बचना चाहिए और महिलाओं को उनके हौसले के लिए दाद देनी चाहिए। उस समय हम उनके प्रति अपनी दया प्रकट कर रहे हैं? उन्हें ये समझा रहे हैं कि देश के हालात बुरे हैं? आखिर क्यों? हमारे सामने बहुत से उदाहरण हैं जहाँ महिलाओं को आर्थिक दिक्कतों के कारण वेश्यावृत्ति तक का रास्ता अपनाना पड़ा। ऐसे में ये कूली, ड्राइवर का काम उससे तो बेहतर ही है न।

आज हम हमारे आसपास के समाज में देखते हैं कि देश में गरीबी है, लोग अपने लालन-पालन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में अगर महिलाएँ आगे आकर अपना योगदान दे रही हैं, तो हम या आप इसमें क्यों आपत्ति जता रहे हैं, जरूरी नहीं है कि हर महिला या हर पुरूष के लिए रोजगार का पर्याय किसी फैक्ट्री में नौकरी हासिल करना ही हो, हो सकता है कि किसी के लिए सशक्त होने का मतलब खुद ही अपने लिए रोजगार पैदा करना हो। मशीनों के इस युग में हम समझते हैं कि ह्यूमन लेबर कोई सराहनीय कार्य नहीं है। लेकिन इसे जीवनयापन के लिए संघर्ष करते इंसान को देखकर शर्मसार होना और भी शर्मिंदगी की बात है।

खुद विचार करिए, एक ऐसा विकासशील देश जिसका इतिहास रूढ़िवादी परंपराओं से भरा हुआ है और जहाँ गरीबों की संख्या किसी नगर या किसी देश की संख्या से भी ज्यादा है, वहाँ पर कितना बेहतर है कि रोजगार के विकल्प तलाशे जाएँ और महिलाएँ भ्रांतियों को तोड़कर आगे आएँ।

लदीदा, ताहिर, शाहरुख़, सलमान, इशरत…जिहादियों की नई पौध CAA विरोध के साथ तैयार

नागरिकता कानून के नाम पर शुरू हुई हिंसा की टाइमलाइन पर यदि शुरू से नजर दौडाएँ तो कुछ बातें एकदम स्पष्ट नजर आती हैं। भीषण दंगों के ठहरने के बाद आखिरकार दिल्ली अपने सामान्य रूप में वापस लौटती हुई नजर आ रही है। हालाँकि इन हिन्दू विरोधी दंगों में अभी भी कई निर्मम हत्याओं की कहानियाँ सामने आ रही हैं। लेकिन साथ ही लेफ्ट-लिबरल मीडिया का एक गिरोह ऐसा है, जो क्रूरता से काटकर आग में झोंक दिए गए बीस साल के दिलबर नेगी के बजाए लिबरल मीडिया फ्रेंडली खबरों में अपने नायक तलाश रहा है।

यह बताने की जरूरत नहीं है कि देश में मौजूद लेफ्ट-लिबरल मीडिया के नायक कौन हैं या फिर कौन हो सकते हैं। यूँ भी हमारे देश ने अपने नायकों को चुनने में जल्दबाजी ही की है, और इसमें सबसे बड़ा योगदान लेफ्ट-लिबरल मीडिया का ही रहा है।

बरखा दत्त की Shero लादीदा फरजाना

गत वर्ष दिसंबर माह में नागरिकता कानून के नाम पर जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी से शुरू हुए इस विवाद में सबसे पहले शुरुआत हुई सोशल मीडिया की एक ऐसी तस्वीर से, जिसमें आयशा रीना और लदीदा फरजाना नाम की दो लड़कियाँ अपने एक साथ को पुलिस की लाठियों से बचाती नजर आईं।

फ़ौरन लेफ्ट-लिबरल मीडिया ने आदतन इन दोनों को कंधों पर बिठाकर झाँकी निकालनी शुरू की और बरखा दत्त जैसे प्रोपेगैंडा को सूँघने वाली तथाकथित पत्रकार ने इन्हें ‘Shero’ बताया। लेकिन इससे पहले कि लेफ्ट-लिबरल मीडिया गिरोह अपने इस त्वरित स्खलन से बाहर निकल पाता, हिजाब में ढकी इन दोनों लिबरल गिरोह की नायिकाओं के सोशल मीडिया अकाउंट से इनके इस्लामिक जिहाद के साक्ष्य लोगों के हाथ लग गए। इसे बाद बुद्धिजीवी वर्ग इनसे पीछा छुड़ाते नजर आया। कम कैमरा के सामने तो यही दिखाते हुए नजर आए।

लदीदा ने अपने फेसबुक पोस्ट में खुलकर अपने मन की बातें लिखी हुई थीं, जैसे वह और लोगों की तरह सेक्युलर नजर नहीं आना चाहती है, बल्कि वह इस्लाम के अनुसार ही अपनी ‘माँगों’ के लिए खड़े रहेगी। लदीदा के फेसबुक पोस्ट कट्टर इस्लामी मदांधता में डूबे हुए थे। लदीदा इस पोस्ट में ख़ुद को और ‘अपने’ लोगों को जिस अली मुस्लीयर की बेटी बता रही थी, वो केरल के मोपला दंगों का साज़िश करता है, जिसके हाथ हिन्दुओं के ख़ून से रंगे हुए हैं। जिस अली मुस्लीयर का जिक्र कर रही थी, वो खिलाफत आंदोलन का वो भड़काऊ चेहरा है, जिसने देश के बँटवारे के लिए हिंसा की।

शरजील इमाम

खैर, फैज़ को पढ़ने वालों के लिए यह सब सामान्य सी घटना ही हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। लदीदा की इस्लामिक पुकारों को कुछ आँखों को अच्छे लगने वाले मूक स्केच में दबा दिया गया। इसके बाद बारी थी शरजील इमाम की। लेकिन शरजील और अन्य दंगाइयों में एक अंतर तो था, शरजील ने अपने भारत विरोधी एजेंडे को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया।

शरजील ने रोजाना प्राइम टाइम में बैठकर बेहद सभ्य शब्दों में ‘फासीवाद’ और गैस चैंबर चिल्लाने वाले लेफ्ट-लिबरल गिरोह की तरह अपने चेहरे के आगे सभ्यता का नकाब नहीं लगाया और कहा कि वह हमेशा से ही भारत को एक इस्लामी राज्य बनाने का सपना देखता आया है। उसने शाहीन बाग़ के बेनकाब होने के बाद ‘फक़ हिन्दुत्व’ और ‘कागज गाय खा गई जैसे’, हिन्दुओं की कब्र खोदने और हिन्दुओं का उपहास करने वाले तमाम बैनर जलाए नहीं। शरजील ने जो कुछ किया, पूरी ईमानदारी से किया।

सोशल मीडिया पर फैज़ को पढ़ते हुए मन में ‘गजवा-ए-हिन्द’ की सेक्युलर आयतें गाने वाले अपने एजेंडा को लेकर शरजील जितने साहसी और ईमानदार नहीं हैं।

लेकिन जब शरजील सारे देश की नजरों में था, ठीक उसी समय ताहिर हुसैन जैसे लोग फरवरी के आखिर में हुए दंगों की तैयारियों में व्यस्त थे। वो छतों से पत्थरबाजी करने के लिए बड़ी-बड़ी गुलेलें बना रहे थे। ट्रेक्टर में पत्थर मँगवाकर उन्हें छोटे टुकड़ों में तैयार कर रहे थे।

सलमान

शाहीन बाग की तर्ज पर महाराष्ट्र के नांदेड़ में भी सीएए के खिलाफ कुछ दिन चले विरोध प्रदर्शन में भड़काऊ बयान देने वाले शख्स मोहम्मद सलमान का नाम भी बाहर आया। सलमान एक वीडियो में ‘शरजील तेरे सपने को हम मंजिल तक पहुँचाएँगे’ जैसे नारे लगाते हुए देखा गया।

AAP नेता कपिल गुर्जर

इसी बीच ठीक दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी नेता कपिल गुर्जर गोली चलाते हुए पकड़ा गया। ‘रामभक्त गोपाल‘ के फर्जी स्टंट से भी मीडिया जब अपने मतलब का कुछ न उठा पाया तो उसने पहले कपिल गुर्जर को ‘देशभक्त’ साबित करने की कोशिश की, लेकिन कपिल गुर्जर आम आदमी पार्टी नेता निकला।

अमानतुल्ला खान

ठीक इसी दौरान आम आदमी पार्टी नेता अमानतुल्ला खान, जिसे कि शाहीन बाग़ जैसे आयोजनों का असल मास्टरमाइंड ठहराया जाना चाहिए, की भी एंट्री हुई। यह दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम वोटों के लिए किया गया ऐतिहासिक ध्रुवीकरण के तौर पर याद रखा जाना चाहिए।

शाहीन बाग़ ने अपने चहेते मीडियाकारों के साथ मिलकर रोज थोड़ा-थोड़ा प्रयासों से दिल्ली में हिन्दुओं के खिलाफ नरसंहार की तैयारियाँ शुरू की। बीस साल के दिलबर नेगी की मौत हो, चाहे आईबी अधिकारी अंकित शर्मा का चार सौ बार चाकुओं से गोदा गया शरीर हो, इस सबकी पटकथा शाहीनबाग ने ही आधार दिया इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

वैचारिक आतंकी

शाहीन बाग़ के साथ-साथ आरजे सायमा जैसी छुपी हुई घातक टुकड़ियाँ भी अपने स्तर पर लोगों को उकसाते हुए खूब देखि गई। जब हालात वामपंथी मीडिया के हाथों से बेकाबू होते नजर आए तो उन्होंने कपिल मिश्रा को आरोपित बनाने का भी प्रयास किया। लेकिन इसमें भी उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। वही कपिल शर्मा आज पीड़ितों के परिवारों को ढूँढकर आर्थिक मदद उपलब्ध करवा रहे हैं, जबकि ताहिर हुसैन और अमानतुल्ला खान जैसे दंगाई दंगों के बाद क्या कर रहे हैं, यह सभी को मालूम है। यही नहीं, दंगों के बाद सामने आ रहे वीडियो में पता चल रहा है कि मोहम्मद अतहर जैसे ऐसे ही न जाने कितने ‘मोहम्मद फलाना’ इन दंगों के पीछे के मास्टर माइंड थे।

मोहम्मद शाहरुख बनाम रवीश कुमार

मीडिया के इन गोदी नायकों के प्रकरण के बीच सबसे ज्यादा हास्यास्पद थी मोहम्मद शाहरुख़ की पहचान! ये वही मुहम्मद शाहरुख़ है, जिसने दंगों के पहले दिन ही आठ राउंड गोलियाँ चलाकर दहशत में योगदान दिया। मोहम्मद शाहरुख के सामने एक पुलिसकर्मी ढृढ़ता से खड़ा रहा, लेकिन लेफ्ट-लिबरल मीडिया ने अपना नायक मोहम्मद शाहरुख़ में ढूँढा।

दंगों के बीच एक आदमी, जो शायद अभी भी अपना चेहरा उसी आत्ममुग्धता से आईने में देखता हो, वो है वामपंथी मीडिया के सरगना रवीश कुमार! रवीश कुमार इस बीच अपने जज्बात और भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए और आदतन एक के बाद एक गलतियाँ करते रहे। उनके जहरीले दिमाग पर उनकी उम्र का असर नजर आने लगा है।

जिस दिन मोहम्मद शाहरुख़ की आठ राउंड गोलियाँ चलाने के बाद सिर्फ तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर होनी शुरू हुई, उस दिन लेफ्ट-लिबरल मीडिया गिरोह यही दुआएँ करता रहा कि यह शाहरुख न होकर कोई ‘अपर कास्ट हिन्दू ब्राह्मण’ निकल आए। लेकिन लिबरल मीडिया और मुंगेरीलाल के हसीं सपनों का भाँडाफोड़ हुआ और शूटर की पहचान मोहम्मद शाहरुख के रूप में हुई।

फिर भी रवीश कुमार ने अपना आखिरी दाँव खेला और शाहरुख़ की पहचान को ‘किसी अनुराग मिश्रा‘ बताते हुए अपने प्राइम टाइम को विराम दिया। अगले दिन अनुराग मिश्रा ने अपनी तस्वीर शेयर करते हुए उसे मोहम्मद शाहरुख बताने वालों के खिलाफ FIR करने की धमकी दे डाली। लेकिन वो रवीश ही क्या, जो हार माने। फिलहाल अब रवीश को किसी नए नाम और नई ‘जात’ की तलाश है, तब तक वो वचनबद्ध है कि दिलबर नेगी और अंकित शर्मा पर बात नहीं करेंगे।

बन्दूकबाज मोहम्मद शाहरुख की गिरफ्तारी के बाद बरखा दत्त के ‘हेडमास्टर का बेटा’ की ही तर्ज पर बीबीसी और ‘दी प्रिंट’ जैसे मीडिया अपने प्रिय मानस पुत्रों को ‘टिकटोक प्रेमी’ ‘उभरता हुआ सितारा’ ‘जिम प्रेमी’ आदि आदि विशेषण देता हुआ भी नजर आया।

कॉन्ग्रेस नेता इशरत जहाँ

हिन्दू विरोधी दंगों की बात कॉन्ग्रेस का जिक्र न आए यह सम्भव नहीं होता है। सोमवार और मंगलवार को सांप्रदायिक हिंसा के दौरान शाहदरा के जगतपुरी इलाके में भी दंगा हुआ था। इस दंगे का आरोप कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व पार्षद इशरत जहाँ उर्फ पिंकी पर लगा है। पुलिस ने पहले उसे हिरासत में लिया था और बाद में केस दर्ज कर गिरफ्तार भी कर लिया है।

चिरकालीन वामपंथी मीडिया गिरोह

इस तमाम प्रकरण से इस बार जो एक और निराशा वामपंथी मीडिया गिरोह के हाथ लगी, वह अरविन्द केजरीवाल के रंग बदलने से लगी है। जिस मुस्लिम वोट बैंक के ध्रुवीकरण से अरविन्द केजरीवाल ने जीत हासिल की, वह हनुमान चालीसा पढ़ने और पढ़ाने की सलाह दे रहा है। गोफी मीडिया के दुलारे अरविन्द केजरीवाल ने जैसे ही मृतक अंकित शर्मा के परिवार को आर्थिक मदद देने की बात कही, ‘विचारक’ वर्ग को मानो साँप सूँघ गया।

खैर, यह खेल लंबा चलेगा। लेकिन जिस तरह से वामपंथी मीडिया अपने नायकों की तलाश के लिए छटपटा रहा है, यह आनंदित तो करता है। क्योंकि अब जेएनयू और जंतर-मंतर पर जाकर देश को टुकड़ों में बाँटना फैज़-परस्तों का हसीन ख्वाब नहीं रह गया है। अब सरकारें ऐसी नहीं हैं कि इन सपनों को देखने वालों को नायक बना देगी।

केरल: CPM नेता अनवर के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया बाढ़ पीड़ितों का पैसा

केरल में एक वित्तीय भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। यह 2018 के बाढ़ राहत कोष से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार 2018 बाढ़ राहत कोष का पैसा स्थानीय सीपीएम नेता अनवर के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया गया था। एर्नाकुलम जिला कलेक्टर एस सुहास के अनुसार ऐसा जानबूझकर किया गया।

बाढ़ राहत कोष से 10 लाख रुपए स्थानीय सीपीएम नेता एमए अनवर के खाते में ट्रांसफर किए गए। अनवर थिक्काक्करा सीपीएम लोकल कमेटी से जुड़े हुए हैं। शुरुआती जाँच में मार्च 2019 में कलेक्ट्रेट ऑफिस से बाढ़ राहत कोष के 325 लाभार्थियों के नाम सही नहीं पाए जाने का पता चला। इन फर्जी नामों के लिए जो पैसा आया वो कथित तौर पर सीपीएम नेता अनवर के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया गया।

इस फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद जिला कलेक्टर ने बाढ़ राहत विभाग में क्लर्क विष्णुप्रसाद को सस्पेंड कर दिया है। कलेक्टर ने बताया है कि उन्होंने अनवर के अकाउंट से पैसे को ‘रीक्रेडिट’ यानी पैसे की वापसी कर ली है। कलेक्टर ने यह भी जोड़ा कि उनके संज्ञान में ऐसा कोई और मामला नहीं है।

मातृभूमि की रिपोर्ट के मुताबिक विष्णुप्रसाद और उसके दोस्त ने पोलाची में एक पॉल्ट्री फार्म खरीदा। इसका पैसा चुकाने के लिए विष्णुप्रसाद, उसके दोस्त महेश और सीपीएम नेता अनवर ने बाढ़ राहत कोष से डायवर्ट किए गए पैसे का इस्तेमाल किया। इस मामले में जहाँ विष्णुप्रसाद की गिरफ्तारी हो चुकी है वहीं महेश और अनवर अभी फरार हैं।

सोमवार (2 मार्च) को विष्णुप्रसाद को पुलिस ने गिरफ्तार किया। उसका लैपटॉप और हार्ड डिस्क जब्त कर लिया गया। इसके उसको मुवत्तापूझा के विजिलेंस और भ्रष्टाचार निरोधक कोर्ट में पेश किया गया जहाँ से उसे 17 मार्च तक की रिमांड में भेज दिया गया। जिला क्राइम ब्रांच ने अपनी रिपोर्ट में विष्णुप्रसाद के साथ बी महेश और एमए अनवर को सह अभियुक्त बनाया है।

याद रहे कि राज्य में बाढ़ राहत कोष से जुड़ी धांधली का यह पहला मामला नहीं है, इसके पहले भी इस तरह के मामले सामने आते रहे हैं। 2019 में केरल के लोकायुक्त ने पी विजयन के नेतृत्व वाली राज्य की वामपंथी सरकार के खिलाफ बाढ़ राहत कोष के दुरुपयोग से जुड़ी शिकायतों को जरूरी एक्शन के लिए स्वीकार किया था।

इसके पहले जून 2019 में भी केरल सरकार ने विश्व बैंक के साथ एक 250 मिलियन डॉलर के लोन अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किया था। इसका उपयोग बाढ़ के कारण बर्बाद हुए राज्य के आधारभूत ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए किया जाना था। हालाँकि उसी वर्ष नवंबर 2019 में राज्य के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने स्वीकार किया था कि इस पैसे का इस्तेमाल सरकार के रूटीन खर्चों, मसलन सैलरी और पेंशन देने के लिए किया गया।

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‘BJP ने नहीं बनाया बंधक, कॉन्ग्रेस के प्लेन में बैठकर आना हमारा दुर्भाग्य’: मध्य प्रदेश की पॉलिटिक्स में नया ट्विस्ट

मध्य प्रदेश में लगातार राजनीतिक घटनाक्रम बदल रहा है। विधायकों को बंधक बनाने और करोड़ों रुपए के ऑफर के आरोप लगाने के बीच सपा विधायक राजेश शुक्ला ने इस बात से इनकार किया है। विधायक का कहना है कि उन्हें किसी ने भी बंधक नहीं बनाया था। बता दें कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भाजपा नेताओं पर कुछ विधायकों को बंधक बनाकर सत्ता हासिल करने की कोशिश का आरोप लगाया था।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया था कि 10 विधायकों को बीजेपी धनबल और गुमराह करके गुरुग्राम ले गई। एक-एक विधायकों को पैसे का ऑफर किया गया था। दिग्विजय सिंह की अगुवाई में मध्य प्रदेश सरकार के दो मंत्री जयवर्धन सिंह और जीतू पटवारी गुरुग्राम के होटल पहुँचे और 6 विधायकों को निकाल लाए। उन्होंने दावा किया कि सभी विधायक वापस आ गए हैं। अब सिर्फ तीन कॉन्ग्रेस विधायक और एक निर्दलीय ही बीजेपी के पास हैं। उनको भी जल्द ही बीजेपी के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हम उनके संपर्क में हैं।

लेकिन दिग्विजय जिन विधायकों को छुड़ाकर लाने का दावा कर रहे हैं उन्होंने ही बंधक बनाए जाने से इनकार कर दिया है। कमलनाथ के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार को समर्थन दे रहे सपा विधायक राजेश शुक्ला का कहना है, “कॉन्ग्रेस के नेता गलत कह रहे हैं। ये कॉन्ग्रेस की अंदरूनी लड़ाई है। जो लोग हमें छुड़ाने की बात बोल रहे हैं, हममें इतनी हिम्मत है कि उनको ही छुड़ा कर ला सकते हैं। अगर हमें बंधक बनाया गया था तो ट्रेस कर लें। होटल में सीसीटीवी लगे हैं। उनमें देख लें। जहाँ तक भाजपा नेताओं के संपर्क की बात है, तो अभी तक कोई बात नहीं हुई। करोड़ों रुपए का ऑफर मिलने की बात पूरी तरह से गलत है। किसी भी तरह की कोई भी राशि ऑफर नहीं हुई है और ना ही भाजपा नेताओं से कोई संपर्क किया गया है।”

राजेश ने कहा, “समझ नहीं आ रहा है कि पार्टी के ही नेता बंधक बनाने की बात क्यों फैला रहे हैं इन्हीं नेताओं के कारण ही तो इस तरह की स्थितियाँ बनती हैं। यकीनन जो अफवाह फैलाई जा रही हैं, उससे पीड़ा होती है।” उन्होंने कहा कि अगर हमें सरकार के साथ नहीं रहना होता तो हम पहले ही उन्हें छोड़ देते। मंत्री बस अपने नंबर बढ़ाने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं।

भाजपा के साथ जाने की बात पर राजेश शुक्ला ने कहा, “हम कमलनाथ सरकार के साथ हैं और हम इसका समर्थन करते रहेंगे। हमारे लिए कोई हॉर्स-ट्रेडिंग ऑफर नहीं किया गया था। हम ईमानदारी से कमलनाथ जी के साथ हैं, अगर उनकी सरकार को किसी भी खतरे का सामना करना पड़ता है, तो यह कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं की वजह से है, हमारी वजह से नहीं।” शुक्ला ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं के कहने पर उनके प्लेन में बैठकर आना हमारा दुर्भाग्य था। बीजेपी की ओर से न तो हमें कोई प्रलोभन दिया गया और बंधक बनाया गया था।

इसके साथ ही सपा विधायक शुक्ला ने कहा कि दिग्विजय सिंह बुजुर्ग हो गए हैं, इसलिए ऐसे बयान दे रहे हैं। बसपा विधायक रामबाई और संजीव सिंह कुशवाह ने भी खरीद-फरोख्त के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि कोई खरीद-फरोख्त नहीं हुई है। हम पर आरोप लगाने वाले मंत्रियों को सार्वजनिक तौर पर माफी माँगनी चाहिए। 

निर्भया के गुनहगारों को चौथा डेथ वॉरंट जारी, 20 मार्च को दी जाएगी फाँसी

दिल्ली में बलात्कार के बाद क्रूरता से मार दी गई निर्भया के गुनहगारों को आखिरकार मार्च 20, 2020 की सुबह 5.30 बजे फाँसी दी जानी तय हुई है। इस मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने नया डेथ वॉरंट जारी किया है, जिसके बाद दोषियों के पास सारे कानूनी विकल्प खत्म हो गए हैं।

इससे पहले बुधवार (मार्च 04, 2020) को दोषी पवन की दया याचिका को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने खारिज कर दिया था। इसके साथ ही चारों दोषियों के सभी कानूनी विकल्प खत्म हो गए। चौथा डेथ वारंट जारी होने के बाद निर्भया की माँ ने कहा कि अब चारों दोषियों के सारे कानूनी दाँव पेंच खत्म हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस बार निर्धारित तारीख को गुनहगारों को फाँसी पर चढ़ाया जाएगा। 

एक ओर जहाँ नया डेथ वॉरंट जारी होने पर निर्भया के परिजनों ने खुशी जाहिर की, वहीं निर्भया के गुनहगारों के वकील एपी सिंह नाखुश दिखे। गुनहगारों के वकील एपी सिंह ने फाँसी दिए जाने और ना दिए जाने पर रोष जताते हुए कहा कि आज चौथा डेथ वॉरंट जारी हुआ है, 2013 में चारों दोषियों को फाँसी दी गई, फिर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी दी और इसके बाद पुनर्विचार याचिका में चारों गुनहगारों को फाँसी दी गई।

दोषी पवन के वकील ने कहा कि इसके बाद फिर क्यूरेटिव पिटिशन जब खारिज हुई तब फाँसी दी गई, दया याचिका खारिज हुई तब फाँसी दी गई, तीन बार और फाँसी दे चुके हैं। वकील ने फाँसी दिए जाने के इस क्रम पर कहा- “मैं जानना चाहता हूँ कि आप कितनी बार फाँसी दोगे?”

सुनवाई शुरू होते ही दोषी पवन के वकील एपी सिंह ने कहा- “मुझे कोई नोटिस नहीं मिला है। मैं तो मीडिया रिपोर्ट्स देखकर कोर्ट में हाजिर हुआ हूँ। मैं पवन की ओर से दया याचिका खारिज किए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना चाहता हूँ। इस लिहाज से मेरी पवन से मुलाकात ज़रूरी है।”

साथ ही मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते हुए बलात्कार और हत्या के दोषियों के वकील एपी सिंह ने कहा, “ये पढ़े-लिखे हैं, जेल में सुधर रहे हैं, जेल में संभल रहे हैं और अपना परिवर्तन कर रहे हैं। आपकी आवाजें और चीखें बता रही हैं कि कितना प्रेशर है। यह चौथा डेथ वॉरंट है, जो 20 तारीख के लिए जारी किया गया है।”

इस बीच सरकारी वकील ने कोर्ट से आग्रह किया कि दोषियों ने सभी क़ानूनी और संविधानिक राहत के विकल्पों को आजमा लिया है। लिहाजा डेथ वारंट जारी किया जाना चाहिए। गुनहगार मुकेश को DLSA की ओर से मुहैया कराए गए वकील रवि काजी ने भी कहा कि अभी किसी दोषी के पास कोई क़ानूनी राहत के विकल्प नही बचे हैं इसलिए कोर्ट डेथ वारंट जारी कर सकता है।

दरअसल, इन दोषियों को तीन मार्च को फाँसी होनी थी, लेकिन दया याचिका लंबित होने को ध्यान में रखते हुए अदालत ने 2 मार्च को फाँसी पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। हालाँकि, अब दोषियों के सभी कानूनी विकल्प खत्म हो चुके हैं, इसके बाद उन्हें फाँसी पर लटकाने का रास्ता साफ हो चुका है।

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा: बेटी की शादी के लिए पाई-पाई जोड़ रहे थे, घर तोड़ा, गुल्लक तक ले गए

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के बाद हालात धीरे-धीरे सामन्य हो रहे हैं, लेकिन इसने जो जख्म दिए हैं उससे उबरने में कुछ लोगों की पूरी जिंदगी खप जाएगी। दंगों में लगी आग की तपिश जैसे-जैसे कम हो रही है, राख से एक से बढ़कर एक दर्दनाक कहानियाँ भी सामने आ रही हैं। ऐसी ही एक कहानी शिव विहार की झुग्गियों में रहने वाले एक गरीब परिवार का भी है। सुकून इतना भर है कि परिवार के पाँचों सदस्य अभी भी साँसें ले रहे हैं, लेकिन इसके अलावा उनके पास कुछ नहीं बचा है। कमाई का जो जरिया था वह तबाह किया जा चुका है। ऊपर से कर्ज का पहाड़ सिर पर अलग बोझ बन गया है। बेटी की शादी के लिए पेट काटकर जो पैसे हर रोज गुल्लक में जमा करते थे, दंगाई वो भी ले जा चुके हैं।

शिव विहार की झुग्गियों में रहकर मटके बेचने वाली बबीता की आँखों के सामने अब अँधेरा ही अँधेरा है। पति रामभजन मटका बनाते थे और बबीता उसे बेचकर घर चलाती थी। उसी में से हर रोज कुछ पैसे बचाकर गुल्लक में जमा कर रही थी। डेढ़ साल में इतना पैसा जमा हो गया था कि उम्मीद थी कि बिटिया की शादी के खर्च निकल आएगा। लेकिन, कौन जानता था कि उनके जीवन में 24 फरवरी की काली रात भी आएगी जब उनके गरीब परिवार की जिंदगी भर के सारे सपने देखते ही देखते बर्बाद हो जाएँगे। उस घटना का जिक्र कर बबीता की आवाज थम जाती है और आँसू तो सूखने का नाम ही नहीं लेती। 24 फरवरी की रात दंगाइयों ने उनकी झुग्गी तोड़कर उसमें आग लगा दी। आने वाले गर्मी के मौसम के लिए तैयार सारे मटके तबाह कर गए। दिल्ली को जलाने वालों को जब इतने से भी कलेजा शांत नहीं हुआ तो गरीब की बेटी की शादी के लिए जमा पैसों वाला गुल्लक भी अपने साथ ले गए।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर

रामभजन का परिवार यूपी के मेरठ का रहने वाला है और रोजी-रोटी की तलाश में शिव विहार तिराहे पर सड़क किनारे ही झुग्गी में रहता था। उस काली रात को याद कर आज भी उसका परिवार का शरीर सिहर जाता है। नारेबाजी हो रही थी। अचानक शिव विहार तिराहे पर पत्थरबाजी होने लगी और पेट्रोल बम फेंके जाने लगे। दंगाइयों के सिर पर खून सवार था। दुकानों-मकानों को जलाते जा रहे थे। दंगाइयों की नजर से इस गरीब की झुग्गी भी नहीं बची और उसे भी आग के हवाले कर दिया। परिवार ने तो किसी तरह भागकर अपनी जान बचा ली, लेकिन उनकी सारी जमा-पूँजी तहस-नहस कर दी गई। आने वाले सीजन की तैयारी हो चुकी थी। राजस्थान से मिट्टी लाकर लगभग 6 गाड़ियों जितना माल तैयार किया था। मटके तो नहीं ही बचे हैं, लेकिन उसके लिए राजस्थान से खरीदी गई मिट्टी का कर्ज बोझ जरूर बन गया है। परिवार में दो बेटे और बेटी शिवानी है। परिवार की दिन भर की मेहनत से इतनी कमाई हो जाती थी कि किसी तरह जीवन की गाड़ी चल रही थी और बेटी की शादी की भी चिंता कम होती जा रही थी। लेकिन, अब बबीता-रामभजन क्या करें?

शिव विहार में ऐसी कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं है। शिव विहार के गली नंबर 12 में नरेश चंद्र अपनी पत्नी मुन्नी देवी और बेटे-बहू के साथ रहते हैं। उनके दो छोटे बच्चे भी हैं। बुजुर्ग दंपती 25 फरवरी का जिक्र करते हुए फूट-फूटकर रोने लगते हैं। उन्होंने अपने जले हुए घर की तरफ इशारा करते हुए कहा कि उपद्रवियों ने सब कुछ खत्म कर दिया। उन्होंने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई। उपद्रवी घर के बाहर खडे होकर गालियाँ देने के साथ जिंदा जलाने की धमकी दे रहे थे।

उन्होंने बताया कि 25 फरवरी की शाम को बाबरपुर की तरफ से बड़ी संख्या में लोग शिव विहार में दाखिल हुए और घरों पर पथराव करने लगे। गेट बंद करके वो अपनी पत्नी, बेटे, बहू, पोती और पोते के साथ घर के अंदर वाले कमरे में घुस गए थे, लेकिन बाहर से ताबड़तोड़ पत्थर चल रहे थे। बाहर से घर में आग लगाई जा रही थी। इसके बाद वो अपने कुछ जानने वालों की मदद से बाहर निकले। 

उनकी पत्नी मुन्नी देवी ने बताया कि जब वह घर में थी तब बाहर से लगातार पत्थर आ रहे थे। कोई पत्थर उनके सिर पर लगता तो कोई उनके सीने पर। उन्होंने बताया कि दंगाई उन्हें परिवार के साथ घर में ही जला देना चाहते थे। जब वो लोग किसी तरह घर से बाहर निकल गए तो दंगाइयों ने पहले तो लूटपाट की और फिर घर को फूँक दिया। अब जब वहाँ का माहौल थोड़ा शांत हुआ है तो नरेश चंद्र और उनकी पत्नी तो घर लौट आए हैं, लेकिन उनका बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अभी भी रिश्तेदार के घर पर ही हैं।

इसी तरह दंगाइयों ने इसी इलाके में रहने वाली सुधा के घर को भी निशाना बनाया। घर पर पथराव किया और फिर मुख्य गेट तोड़कर घर में घुस गए। वह पहली मंजिल पर अपने पति राजकुमार के साथ छिप गई और दरवाजा बंद कर लिया। उपद्रवी कपड़े, जेवर व अन्य सामान लूटकर और तोड़फोड़ कर चले गए। शुक्रवार (फरवरी 28, 2020) को ही वापस घर लौटी सुधा ने बताया कि डर के कारण वह उस दिन शाम से रात 11 बजे तक ऊपर ही बैठी रहीं।

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