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हाथों में पत्थर लिए जामिया PhD छात्र ने कटाए बाल, दाढ़ी, डिलीट किए अकाउंट: सोशल मीडिया पर वायरल

जामिया यूनिवर्सिटी चर्चा में है। पढ़ाई नहीं पत्थरबाजी को लेकर। मारपीट और आगजनी को लेकर। CCTV फुटेज पुलिस-प्रशासन को देने के बजाय खुद के पास रखने को लेकर। एक घंटा के विडियो होने का दावा करके मात्र 5 मिनट के एडिटेड विडियो को वायरल करने को लेकर। और सबसे ज्यादा चर्चा में इसलिए है क्योंकि यहाँ के PhD वाले स्टूडेंट भी रिसर्च से ज्यादा पत्थर पर ध्यान लगाते हैं।

बीते साल 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया में हिंसा हुई। हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में की गई। सारा दोष दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार पर मढ़ा गया। लेकिन 16 फरवरी को इसी जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी हिंसा कांड से जुड़े कुछ विडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए। पहले कुछ सेकंड वाले, बाद में कुछ मिनट वाले विडियो भी आए। सभी विडियो में पत्थरबाज जामिया स्टूडेंट्स की कलई खुलती नजर आई।

इन विडियो में एक चेहरा पहचान लिया गया (सूत्रों के अनुसार, जो इस चेहरे को व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, उनके अनुसार)। जिस शख्स का चेहरा वायरल हुआ है, उसका नाम मो. अशरफ भट बताया जा रहा है। यह जामिया में PhD का स्टूटेंड है और प्रोफेसर कडलूर सावित्री के गाइडेंस में “Biometrics in India Aadhar: Governmentality , Surveillance and privacy” पेपर पर रिसर्च कर रहा है।

जामिया के छात्रों के अनुसार मो. अशरफ का कल से पहले तक फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया पर प्रोफाइल था। लेकिन हिंसा वाले दिन का विडियो वायरल होने और तस्वीरें बाहर आते ही न सिर्फ इसने सारे प्रोफाइल डिलीट/डीएक्टिवेट कर दिए, बल्कि सूत्र बताते हैं कि उसने अपने बाल और दाढ़ी भी कटवा ली है। सूत्र की बात को स्पष्ट करने के लिए हमने प्रोफेसर कडलूर सावित्री को मेल भी किया है, जिसका जवाब रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं आया है।

मो. अशरफ कितना शातिर है, इसका अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है। हमने जामिया के सूत्र की बात को स्पष्ट करने के लिए कई तरह से इसके नाम को गूगल पर सर्च किया। नाम के साथ जामिया, PhD, सब्जेक्ट से लेकर और भी कई की-वर्ड का यूज किया, लेकिन नतीजा हर बार नील बटे सन्नाटा। फिर हमने नाम के साथ इमेज सर्च और इमेज से इमेज सर्च भी किया – नतीजा फिर वही! यह शख्स ने अपने हर सोशल मीडिया प्रोफाइल को डिलीट कर अंडरग्राउंड हो चुका है।

सोशल मीडिया में कुछ जगहों पर यह भी चल रहा है कि जिस लड़के के हाथ में एयरगन वाली गोली कुछ दिन पहले एक शख्स ने मारी थी, मो. अशरफ वही है। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों की दाढ़ी है, लंबे बाल हैं। लेकिन यह केवल अफवाह है। दोनों अलग-अलग शख्स हैं।

हाथ में पत्थर लेकर जामिया की लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई करने जा रहे ‘छात्र’: नए Video से पलटी पूरी तस्वीर

जामिया का हर वीडियो, हर एंगल: लाइब्रेरी में कब, क्या और कैसे हुआ, साथ में लिबरल गिरोह की नंगई भी

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

‘कॉन्ग्रेस छोड़ना है तो छोड़ दो, फिर उल्टा-पुलटा बोलो’ – केजरीवाल की तारीफ पर भिड़े दो सीनियर कॉन्ग्रेसी नेता

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) ने एक बार फिर से सरकार बना ली है। अरविंद केजरीवाल ने रविवार (फरवरी 16, 2020) को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालाँकि दिल्ली चुनाव में AAP की इस ऐतिहासिक जीत से कॉन्ग्रेस में काफी हलचल मची हुई है। पार्टी के कुछ नेता जहाँ केजरीवाल को बधाई दे रहे हैं, तो वहीं कुछ नेता आपस में ही उलझते दिख रहे हैं। 

इसी कड़ी में महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के नेता मिलिंद देवड़ा ने देर रात ट्वीट कर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की तारीफ की, जिसके बाद अजय माकन ने उन्हें जवाब देते हुए कहा कि अगर आपको पार्टी छोड़नी है, तो बेशक छोड़ सकते हैं।

कॉन्ग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने रविवार देर रात को एक ट्वीट किया। जिसमें उन्होंने दिल्ली सरकार के द्वारा रेवेन्यू के मोर्चे पर काम की तारीफ की। उन्होंने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “एक ऐसी जानकारी साझा कर रहा हूँ जो कि बहुत कम लोग जानते हैं और यह स्वागत करने योग्य भी है। केजरीवाल सरकार ने पिछले पाँच साल में रेवेन्यू को डबल कर दिया है और अब ये 60 हजार करोड़ रुपए तक पहुँच गई है। दिल्ली अब भारत का सबसे आर्थिक रूप से सक्षम राज्य बन गया है।”

अजय माकन ने मिलिंद देवड़ा को जवाब देते हुए दिल्‍ली में कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी की सरकार के दौर के तुलनात्‍मक आँकड़े पेश किए। उन्‍होंने ट्विटर पर लिखा, “भाई, यदि आप कॉन्ग्रेस छोड़ना चाहते हैं तो कृपया छोड़ दें। उसके बाद इस तरह के कच्‍चे-पक्‍के, आधे-अधूरे तथ्‍यों का आराम से फैलाइए। चलिए मैं तथ्य पेश करता हूँ, जिसके बारे में काफी कम लोगों को पता है। 1997-98 (रेवेन्यू) 4,073 करोड़, 2013-14 (रेवेन्यू) 37,459 करोड़। कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान 14.87% राजस्‍व में बढ़ोतरी हुई। 2015-2016 (रेवेन्यू) 41,129, वहीं 2019-20 (रेवेन्यू) 60,000। AAP सरकार के दौरान 9.90% रेवेन्यू बढ़ा।”

अजय माकन के ट्वीट पर पलटवार करते हुए मिलिंद देवड़ा ने उनके राजनीतिक मंशे पर ही सवाल खड़े कर दिए। मिलिंद ने कहा, “अगर आपने AAP के संग गंठबंधन की वकालत के बजाय शीला दीक्षित (जिनके कामों पर आपने हमेशा निशाना साधा) के कामों को जनता के बीच ले जाते तो आज हम सत्ता में होते।”

वहीं पहली बार चुनाव लड़ने वाली युवा कॉन्ग्रेस नेता राधिका खेड़ा ने भी मिलिंद देवड़ा के ट्वीट पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वो पहली बार पार्टी की उम्मीदवार बनकर मैदान में उतरीं और उन्हें अपने वरिष्ठ नेताओं के इस रवैये काफी दुख हुआ कि वो अपनी पार्टी को बेहतर करने के लिए प्रोतत्साहित करने की बजाए AAP की शाबाशी देने में व्यस्त हैं! दिल्ली में यह सरप्लस 1994 से चलता आ रहा है। 2011 में शीला दीक्षित के समय में यह चरम पर पहुँचा।

गौरतलब है कि इससे पहले पी चिदंबरम और अधीर रंजन चौधरी जैसे वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता भी AAP की जीत पर खुशी जता चुके हैं। चौधरी कहा था कि बीजेपी और उसके सांप्रदायिक मुद्दों के खिलाफ AAP की जीत महत्वपूर्ण है। नतीजे आने से पहले अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि अगर इस चुनाव में केजरीवाल जीतते हैं तो ये विकास के मुद्दों की जीत होगी। वहीं चिदंबरम की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए कई सवाल उठाए थे।

बता दें कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। साल 2015 की तरह इस बार भी कॉन्ग्रेस दिल्ली में एक भी सीट हालिस नहीं कर सकी है। वहीं इस बार कॉन्ग्रेस का वोट प्रतिशत भी घटा है।

…उस मुगल ‘बादशाह’ की कब्र खोजेगा ASI, जिसने किया था गीता और 52 उपनिषदों का अनुवाद

इतिहास के पन्नों में कई राज दफन हैं। इनमें कुछ मौखिक तो कुछ लिखित हैं, जिन्हें बाद में शब्दों की शक्ल दी गई। अब इन्हीं शब्दों की परतों को खोलने का कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) करने जा रहा है, जिसमें उन्हें हुमायूँ मकबरे के भीतर दाराशिकोह की कब्र को खोजने का उत्तरदायित्व दिया गया है।

लिखित इतिहास के अनुसार दाराशिकोह की कब्र हुमायूँ मकबरे के भीतर है। ASI के सामने सबसे बड़ी परेशानी यहाँ दाराशिकोह की कब्र को खोजने की है क्योंकि अधिकतर कब्रों पर नाम नहीं लिखे हुए हैं। हुमायूँ मकबरे के पूरे परिसर में करीब 140 कब्रें हैं, जिनमें कुछ कब्रों पर नाम है तो ज्यादातर कब्र बेनाम हैं।

संस्कृति व पर्यटन मंत्रालय के आदेश पर ASI द्वारा 7 सदस्यीय टीम गठित की गई है, जो 3 महीने के भीतर दाराशिकोह की कब्र को ढूँढकर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। इस टीम का नेतृत्व टीजे अलोन करेंगे, जो ASI में स्मारक निदेशक हैं। इस टीम में वरिष्ठ पुरातत्वविद् आरएस बिष्ट, सईद जमाल हसन, केएन दीक्षित, बीआर मणि, केके मुहम्मद, सतीश चंद्र और बीएम पांडे शामिल हैं। इसके लिए तीन महीने का समय दिया गया है।

वहीं इस बारे में पूछे जाने पर संस्कृति व पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कहा, “निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए तीन महीने के समय को बढ़ाया भी जा सकता है। क्योंकि इसे ढूँढने में उस समय की वास्तुकला से लेकर लिखित इतिहास व अन्य जानकारियों को ध्यान में रखना होगा। पैनल उस समय के लिखित इतिहास, साक्ष्य या फिर कोई अन्य जानकारी, जिसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, का उपयोग करके निष्कर्ष पर पहुँचेगा।”

बता दें कि दाराशिकोह, शाहजहाँ व मुमताज के बड़े बेटे एवं औरंगजेब के बड़े भाई थे। कई भाषाओं के विद्वान दाराशिकोह को मारकर 1659 में औरंगजेब गद्दी पर बैठा था। दारा शिकोह को एक “उदार मुस्लिम” के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने हिंदू और इस्लामी परंपराओं के बीच समानताएँ खोजने की कोशिश की। उन्होंने भागवत गीता के साथ-साथ 52 उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया था।

पैनल में शामिल पुरातत्वविदों में से एक, केके मुहम्मद ने दारा शिकोह को उस समय के सबसे महान मुक्त विचारकों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि दारा शिकोह ने उपनिषदों के महत्व को समझा और उसका अनुवाद किया। उपनिषद उस समय केवल कुछ उच्च जाति के हिंदुओं के लिए जाना जाता था। दारा शिकोह के उस फारसी अनुवाद ने आज के बहुत से मुक्त विचारकों को प्रेरित किया, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शामिल हैं।

वहीं कुछ इतिहासकारों का कहना है कि अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह मुगल सिंहासन पर बैठता तो इससे सांप्रदायिक हिंसा में खोए हजारों लोगों की जान बच सकती थी। अविक चंदा अपनी किताब- ‘दारा शिकोह, द मैन हू वुड बी किंग’ में लिखते हैं, “दारा शुकोह औरंगज़ेब का धुर विरोधी था। वह काफी सामंजस्यवादी, गर्मजोशी और उदार था, लेकिन इसके साथ ही वह लड़ाई के क्षेत्र में एक उदासीन प्रशासक होने के साथ ही अप्रभावी भी था।”

बता दें कि हाल ही में दिल्ली के एक सम्मेलन में वक्ताओं ने दारा शिकोह को ‘असली हिंदुस्तानी’ कहा था। इसमें RSS के पदाधिकारी भी शामिल थे। पिछले साल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दारा शिकोह के नाम पर एक रिसर्च चेयर स्थापित की गई।

दिल्ली विश्वविद्यालय में मध्ययुगीन इतिहास के प्रोफेसर सुनील कुमार ने दारा शिकोह के कब्र की खोज पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब भी आप आधुनिक राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अतीत का उपयोग करते हैं, तो आप हमेशा इसे ट्विस्ट कर देंगे क्योंकि अतीत आधुनिकता में उपयुक्त नहीं बैठ सकता। आप इसे अपने वर्तमान इरादों के लिए इसमें जोड़-तोड़ करते हैं। अगर औरंगजेब की जगह वह शहंशाह होता, तो क्या अलग भारत होता? ये धारणाएँ मुगल इतिहास की मिसप्लेस्ड अंडरस्टैंडिंग की वजह से आ रही हैं। उन्हें एक अच्छा मुस्लिम बनाया गया है लेकिन उनकी कब्र की खोज क्यों हो रही है?”

शाहजहाँनामा के अनुसार, औरंगजेब ने दारा शिकोह को पराजित करने के बाद, उन्हें जंजीरों में बाँधकर दिल्ली लाया गया था। उनका सिर काट दिया गया और आगरा किले में भेज दिया गया, जबकि उनके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफना दिया गया।

केके मुहम्मद ने कहा, “कोई नहीं जानता कि वास्तव में दारा शिकोह को कहाँ दफनाया गया था। हम सभी जानते हैं कि यह हुमायूँ के मकबरे के परिसर में एक छोटी सी कब्र है। अधिकांश लोग वहाँ एक विशेष छोटी सी कब्र की ओर इशारा करते हैं। इटालियन यात्री निकोलो मनुची ने ट्रेवल्स ऑफ मनुसी में उस दिन का एक ग्राफिक विवरण दिया है, जो कि इसके प्रत्यक्षदर्शी हैं। यही इस थेसिस का आधार है।”

पैनल के सदस्य बीआर मणि ने कहा, “परिसर में मौजूद कब्रों में से एक पारंपरिक रूप से दारा शिकोह का कहा जाता है। यह हुमायूँ के मकबरे परिसर के पश्चिमी तरफ स्थित है। हम इस बारे में पीढ़ियों से क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ-साथ वरिष्ठ ASI अधिकारियों से सुनते आ रहे हैं, लेकिन फिर भी कोई सबूत नहीं है।”

AMU के प्रोफेसर शिरीन मूसवी ने कहा, “1857 तक परिवार के सभी सदस्यों को उसी परिसर में दफनाया गया था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार, सभी अधिकारियों के साथ-साथ यूरोपियन और फारसी भी इसी तरफ इशारा करते हैं कि दारा शिकोह को हुमायूँ के मकबरे में दफन किया गया था।”

ASI की सबसे बड़ी समस्या यह है कि परिसर की अधिकांश कब्रों का कोई नाम नहीं है। ASI के एक पूर्व निदेशक और पैनल के सदस्य हसन ने कहा, “शाहजहाँनामा में मुहम्मद सालेह कम्बोह ने दारा शिकोह के अंतिम दिनों के बारे में कम से कम दो पेजों में लिखा है कि कैसे उनकी बेरहमी से हत्या की गई थी और फिर परिसर में कहीं दफना दिया गया था।”

केके मुहम्मद ने कहा कि निश्चितता के साथ तो नहीं कहा जा सकता है, मगर संभावना जरूर है। वहीं प्रोफेसर मूसवी को डर है कि कहीं यह खोज कभी खत्म न होने वाला न हो जाए, क्योंकि किसी ने भी कब्र की जगह का उल्लेख नहीं किया है। वहाँ पर कोई भी कब्र चिह्नित या अंकित नहीं है। दारा शिकोह की कब्र को पहचानने का कोई तरीका नहीं है।

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’20 सीटों पर बढ़त के बाद BJP नेता कहने लगे – ऐसा कैसे हो गया? वो चाहते थे कि पार्टी दिल्ली चुनाव हारे’

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने रविवार (फरवरी 16, 2020) को देश की अर्थव्यव्स्था और दिल्ली चुनाव का मुद्दा उठाकर भाजपा पर निशाना साधा। प्रदेश की राजधानी जयपुर में आरक्षण मामले पर केंद्र सरकार के रुख के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन में बोलते हुए सीएम गहलोत ने मोदी सरकार की वित्त संबंधी समझ पर सवाल उठाए और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लाई गई नीतियों को अपनाने की सलाह दी। इसके अलावा अशोक गहलोत ने इस आयोजन में राष्ट्रवाद और आरक्षण के ख़िलाफ सरकार को घेरा। साथ ही दिल्ली चुनावों के मद्देनजर भाजपा नेताओं पर आरोप लगाया कि वे लोग खुद नहीं चाहते थे कि उनकी पार्टी जीते।

अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “आज देश में आर्थिक संकट है। उनके (मोदी सरकार के) वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति ने कहा है कि सरकार आर्थिक स्थिति को नहीं समझती। इसलिए अब उन्हें मनमोहन सिंह की नीतियों का अनुसरण करना चाहिए, जिसे वे (डॉ मनमोहन सिंह) नरसिम्हा राव के समय में अर्थव्यव्स्था बचाने के लिए लाए थे।” प्रदेश मुख्यमंत्री के अनुसार भाजपा की विश्वसनीयता नहीं है और वे अपनी विश्वसनीयता सिर्फ़ नरेंद्र मोदी और अमित शाह के केंद्र में होने के कारण खो रहे हैं।

कॉन्ग्रेस नेता गहलोत ने इस आयोजन में राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाते हुए भाजपा के राष्ट्रवाद को छद्म-राष्ट्रवाद करार दिया और कहा कि हम असली राष्ट्रवादी हैं। उन्होंने कहा आरक्षण को लेकर खतरनाक खेल चल रहा है। भाजपा के सांसदों और संघ नेताओं की ओर से जिस प्रकार के बयान आ रहे हैं, इनका कोई भरोसा नहीं है कि कब ये आरक्षण को खत्म करने की घोषणा कर दें। उन्होंने आरक्षण के दायरे में आने वाले एससी, एसटी, ओबीसी से एकजुट होने का आह्वान किया और कहा कि आरक्षण की रक्षा के लिए यह जरूरी है। इससे भविष्य में आरक्षण को खत्म करने की किसी में हिम्मत नहीं होगी।

दिल्ली चुनावों में अपना खाता तक न खोल पाने वाली पार्टी के वरिष्ठ नेता ने इस आयोजन में दिल्ली चुनाव के परिणाम में भाजपा को मिली हार पर भी बयान दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता ही दिल्ली के चुनाव में पार्टी की दुर्गति चाहते थे। उन्हीं के नेता चाहते थे कि भाजपा को अच्छे नतीजे न मिलें। मुख्यमंत्री गहलोत के मुताबिक भाजपा के नेता मन ही मन कह रहे थे कि इन्हें कोई सबक मिलना चाहिए।

दिल्ली में भाजपा की हार पर तंज कसते हुए गहलोत ने इस दौरान कहा कि सुबह जब भाजपा के 20 सीटों पर बढ़त के रुझान आए, तो भाजपा के नेता ही यह चर्चा करने लगे कि ऐसा कैसे हो गया। भाजपा को तो 10 सीटों के अंदर होना चाहिए था।

जामिया का हर वीडियो, हर एंगल: लाइब्रेरी में कब, क्या और कैसे हुआ, साथ में लिबरल गिरोह की नंगई भी

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में बीते साल 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया में हिंसा हुई। उपद्रवियों पर काबू पाने की कोशिश में दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में प्रवेश किया। उस समय लिबरल गिरोह ने पुलिस के कैंपस में दाखिल होने को लेकर खूब रोना रोया। 16 फरवरी की सुबह एक वीडियो सामने आया और इसके बाद फिर से गिरोह का प्रलाप शुरू हो गया। एडिटेड वीडियो के जरिए दिल्ली पुलिस को बदनाम करने और दंगाइयों को पाक-साफ बताने की कोशिश की गई। हालॉंकि समय बीतने के साथ पूरी तस्वीर पलट गई और लिबरलों के प्रपंच का किला रेत की महल के माफिक ढह गया। आइए समझते हैं पूरे दिन किस तरह यह मामला आगे बढ़ा;

वीडियो 1

आज सुबह तड़के जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी ने यह वीडियो जारी किया। वीडियो में दिखाई पड़ रहा था कि दिल्ली पुलिस लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों को पीट रही है। इस वीडियो की आड़ लेकर रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और राणा अयूब जैसे इस्लामिस्ट्स ने मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस पर हमला बोल दिया और जामिया हिंसा के लिए उसे जिम्मेदार ठहरा, पुलिस पर हमले करने वाली मुस्लिम भीड़ को बचाने की कोशिशें शुरू कर दीं। यह एडिटेड वीडियो था। इसमें दिख रहा था कि छात्र किताबें बंद कर के बैठे हुए थे और जैसे ही पुलिस आई, उन्होंने किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया। बाद में इस वीडियो से जामिया प्रशासन ने भी किनारा कर लिया।

वीडियो 2

जामिया लाइब्रेरी में हुई हिंसा का पूरा सच ( साभार : न्यूज़ नेशन )

मीडिया गैंग के प्रोपेगेंडा के बाद जामिया लाइब्रेरी में पुलिस और उपद्रवियों के बीच संघर्ष का एक और वीडियो भी सामने आ गया। इसमें नकाबपोश उपद्रवी पहले लाइब्रेरी में घुसते दिखे। फिर पुलिस उन्हें खदेड़ते हुए लाइब्रेरी पहुॅंची। ऐसा नहीं है कि पुलिस ने यूँ ही किसी पर कार्रवाई कर दी। पुलिस ने उपद्रवियों को चिह्नित कर एक्शन लिया। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि लाइब्रेरी के दरवाजे पर एक व्यक्ति खड़ा है, जो भाग कर आ रहे नकाबपोशों को अंदर घुसा रहा है।

वीडियो 3

हाथ में पत्थर लेकर और चेहरे पर नकाब बाँध कर लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई की जाती है, ये जामिया के उपद्रवी ही बता पाएँगे। वीडियो में कुछ उपद्रवियों को पत्थर लेकर लाइब्रेरी में घुसते हुए देखा जा सकता है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये वो दंगाई हैं, जो 15 दिसंबर को पुलिस से बचने के लिए यहाँ छिपे थे। पुलिस उनलोगों की तलाश कर रही थी, जिन्होंने यूनिवर्सिटी के बाहर आगजनी की थी। दिल्ली पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहे सभी वीडियोज की जाँच की जाएगी, जिसके बाद ही इस दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।

ऑप इंडिया के सवाल

आपको याद होगा कि जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रशासन और छात्रों, दोनों ने ही पुलिस को जाँच में सहयोग नहीं किया। जब पुलिस जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज लेने पहुँची, तब छात्रों ने हंगामा किया और पुलिस को वो फुटेज नहीं लेने दिया। आख़िर जामिया के छात्र क्या छिपाना चाहते थे? हमारे कुछ और भी सवाल हैं, जो इस वीडियो को देखने के बाद उभरते हैं:

  1. जामिया का ये वीडियो हिंसा के 60 दिनों बाद क्यों रिलीज किया गया? इतने दिन तक इन्तजार क्यों? उपद्रवी छात्रों और गिरोह विशेष के बीच क्या सेटिंग चल रही थी?
  2. वीडियो को काट-छाँट कर क्यों जारी किया गया? पूरा वीडियो आने से उपद्रवी छात्रों की पोल खुल जाती, क्या इसीलिए वीडियो को अपने हिसाब से काट कर पेश किया गया?
  3. ऊपर हम पूछ चुके हैं कि जामिया का प्रशासन और छात्र पुलिस की जाँच में सहयोग क्यों नहीं कर रहे हैं? सीसीटीवी फुटेज में ऐसा क्या था कि इसे पुलिस को नहीं दिया गया था?
  4. ये वीडियो किसने जारी किया? पुलिस ने तो नहीं किया है। फिर जामिया के छात्रों ने किया? या फिर गिरोह विशेष ने?
  5. पूरी क्रोनोलॉजी कुछ यूँ लग रही है। बसें जलाओ, पत्थरबाजी करो, अराजकता फैलाओ और फिर लाइब्रेरी में छिप कर पढ़ने का नाटक करो। पुलिस चिह्नित कर कार्रवाई करे तो सहानुभूति कार्ड खेलो। कहीं यही क्रोनोलॉजी तो नहीं है।

हालाँकि, फ़िलहाल सोशल मीडिया पर गिरोह विशेष द्वारा दिल्ली पुलिस को बदनाम करने का खेल जारी है। रवीश कुमार से लेकर बरखा दत्त तक इसी काम में लगे हुए हैं। किसी ने पूरा वाला वीडियो शेयर करने की जहमत नहीं उठाई है। आधे-अधूरे वीडियो के आधार पर अफवाहों का बाजार गर्म किया जा रहा है।

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

‘प्रदर्शन का विडियो FB पर क्यों डाली’ – जामिया की पूर्व छात्रा सीमा रिजवी पर हमला, बेटी को किडनैप करने की धमकी

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

जामिया के उपद्रवियों का मीडिया के लिबरल गिरोह विशेष से ऐसा गठजोड़ हुआ कि दिल्ली पुलिस को बदनाम करने के लिए काटा-छाँटा हुआ वीडियो जारी किया गया। मकसद था जामिया के दंगाइयों को पाक-साफ़ साबित किया जा सके और दिसंबर में हुई हिंसा का पूरा दोष दिल्ली पुलिस पर मढ़ा जा सके। क्यों? क्योंकि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है, जिसके मुखिया अमित शाह हैं। पुलिसकर्मियों का ‘गुनाह’ इतना भर है कि उन्होंने उपद्रवियों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया।

आप क्रोनोलॉजी समझिए। नकाब पहने छात्र बिना किताबें लिए बैठे हुए थे। एक अन्य वीडियो के जरिए उनकी पोल खुल गई, जिसमें देखा जा सकता है कि छात्र किताबें बंद कर के बैठे हुए थे और जैसे ही पुलिस आई, उन्होंने किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया। दूसरे वीडियो में देखा जा सकता है कि दरवाजे पर खड़ा एक छात्र नकाबपोशों को लाइब्रेरी के भीतर घुसा रहा है। हाथ में पत्थर और चेहरे पर नकाब- जामिया के लाइब्रेरी का ड्रेस कोड कुछ अजीब नहीं लग रहा?

अब दंगाई अगर कहीं छिपेंगे, तो क्या पुलिस वहाँ जाकर उन्हें चिह्नित नहीं करेगी? एक बार वो चिह्नित हो गए तो उन पर पुलिस कार्रवाई भी करेगी ही। इसीलिए, जामिया के उपद्रवियों ने काट-छाँट कर वीडियो रिलीज किया, ताकि उन्हें सहानुभूति मिल सके। तभी तो अमित मालवीय ने पूछा है कि जामिया के छात्रों की शिक्षा के लिए भारत सरकार प्रतिवर्ष 600 करोड़ रुपए ख़र्च करती है, बदले में ये छात्र क्या देते हैं? यानी, जामिया के एक छात्र पर सरकार एक साल में सवा 3 लाख रुपए ख़र्च करती है।

जब विडियो 29 सेकेंड से 49 सेकेंड का होते हुए अब 2 मिनट से ज़्यादा लम्बा आ गया है, जिसमें दंगाई और फ़सादी लौंडे लाइब्रेरी में पहुँचाए जा रहे हैं, कोई डायरेक्शन दे रहा है कि किधर जाना है, छुपना है, हाथों में पत्थर और गले में रुमाल का मास्क दिख रहा है, तब रवीश जी ने इंडिया टुडे के ‘एक और विडियो’ का लिंक डाला है। इस दोहरे रवैये पर सवाल तो पूछे जाएँगे। लेकिन इस आदमी से पूछना चाहिए कि क्या उसके पास अभी भी सही विडियो नहीं गया?

क्या यही छात्र लाइब्रेरी में छुपते हुए, इसी पुलिस पर आरोप लगाने के लिए भीतर जा कर आग ही लगा देती तो जिम्मेदारी किसकी होती? जब 15-16 दिसंबर को कुछ विडियो सामने आए थे, जिसमें कहीं भी पुलिस नहीं थी, और छात्र स्वयं ही टेबल आदि तोड़ते दिख रहे थे, तो ये सवाल उठा था कि इसमें पुलिस कहाँ है। साथ ही इस बात का अंदाज़ा पहले ही लग गया था कि अगर पुलिस घुसी भी होगी तो दंगाइयों का पीछा करते हुए घुसी होगी जो बाहर आग लगा कर, पत्थरबाजी करने के बाद लाइब्रेरी की तरफ भागे होंगे। अब यही सत्य साबित होती हुई दिख रही है।

आज विडियो में वही दिख रहा है। रवीश समेत कुछ लोगों का कहना है कि पुलिस डंडे क्यों मार रही है? भाई, हाथ में पत्थर ले कर घूमने वाले और बसों में आग लगाने वाले छात्र नहीं, फसादी होते हैं। उनसे अपराधियों की तरह ही निपटना चाहिए। उन्हें नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज पुलिस को तब करना होता है जब मान-मनौव्वल की संभावना दंगाइयों की तरफ से खत्म हो जाती है। विडियो जैसे-जैसे बाहर आएँगे, सच भी सामने आता चला जाएगा।

अभी समय के साथ ऐसे और भी कुत्सित प्रयास किए जाएँगे। आज जामिया के दंगाइयों को बचाने के लिए प्रपंच खेला जा रहा है, बीते कल को जेएनयू के उपद्रवियों को बचाने के लिए भी ऐसा ही खेल किया गया था और आने वाले दिनों में शाहीन बाग़ के उपद्रवियों को गाँधीवादी बताने के लिए चल रहा प्रपंच भी और गहरा होगा। हर एक सरकार विरोधी हिंसा की वारदात में शामिल व्यक्ति को भारत का ‘स्वतंत्रता सेनानी’ साबित करने का प्रयास होता है, भले ही उसने पुलिस पर गोली चलाई हो या फिर आम लोगों पर पत्थर।

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जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

भारत के बाहर पहली बार योग यूनिवर्सिटी, अप्रैल से शुरू होंगी कक्षाएँ

भारत से बाहर पहली बार ‘योग’ को बढ़ावा देने के लिए एक विश्विद्यालय शुरू हो रहा है। अमेरिका के लॉस एंजिलिस में शुरू हो रही इस यूनिवर्सिटी में अप्रैल 2020 से कक्षाएँ शुरू होंगीं। मानव सभ्यता को भारतवर्ष की अप्रतिम सौगात ‘योग’, के वैश्विक प्रचार-प्रसार की दिशा में यह यूनिवर्सिटी एक पायदान ऊपर चढ़ना है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के कारण विश्व स्तर पर 21 जून को योग दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिल चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विवेकानंद योग यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए लॉस एंजिलिस में शुरूआती कैंपस बना दिया गया है। इस विश्वविद्यालय का प्रारम्भिक बजट 5 मिलियन डॉलर का है, जो प्राचीन भारतीय पद्धति पर शोधों को भी बढ़ावा देगी। भारतीय योग गुरु एचआर नरेंद्र को यूनिवर्सिटी का चेयरमैन और केस वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्री श्रीनाथ को यूनिवर्सिटी का प्रेसीडेंट बनाया गया है।

कैलिफोर्निया के ब्यूरो फॉर प्राइवेट पोस्ट सेकेंडरी एजुकेशन से योग यूनिवर्सिटी को नवंबर 2019 में आधिकारिक मान्यता प्राप्त हो गई थी। योग यूनिवर्सिटी में अप्रैल महीने में योगा में मास्टर कोर्स करने के लिए एडमिशन शुरू हो जाएगा।

NASA में वैज्ञानिक रह चुके योग यूनिवर्सिटी के चेयरमैन नागेंद्र ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि शिक्षा इंसान को पूर्ण बनाती है और शिक्षा के जरिए वह राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकता है। योग विश्विद्यालय का ध्येय छात्रों में शिक्षा देना है जिससे राष्ट्र के निर्माण में वह अपना योगदान दे सकें।

भारत में पहली योगा यूनिवर्सिटी वर्ष 2002 में शुरू की गई थी। नागेंद्र ने बताया कि इससे प्रेरित होकर ही उन्होंने विश्व में योग के प्रचार-प्रसार के लिए भारत से बाहर भी यूनिवर्सिटी शुरू करने की प्रेरणा पाई। यह योग यूनिवर्सिटी अनुसंधान क्रियाओं में संयुक्त शोधों की सुविधा भी प्रदान करेगी, जिसके जरिए उसे विश्व भर की यूनिवर्सिटीज का भी सहयोग प्राप्त हो सकेगा।

मोदी का कुत्ता, शाह का रखैल, योगी की नाजायद औलाद: अखिलेश ने नंबर किया वायरल, सपाई बक रहे गालियाँ

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक व्यक्ति को भाजपा नेता बताते हुए उससे ख़ुद की जान को ख़तरा होने का दावा किया था। अब उस व्यक्ति ने ख़ुद के निर्दोष होने का दावा करते हुए सपा के मुखिया पर आरोप लगाया है कि उनके समर्थक उन्हें लगातार धमकियाँ दे रहे हैं। ज्ञात हो कि शनिवार (फरवरी 15, 2020) को एक व्यक्ति ने अखिलेश यादव के कार्यक्रम में ‘जय श्री राम’ कह दिया था, जिसके बाद सपा कार्यकर्ताओं ने उस व्यक्ति की पिटाई की थी। इसके बाद अखिलेश ने दावा किया कि एक भाजपा नेता से उनकी जान को ख़तरा है। उन्होंने एक मैसेज मीडिया को दिखाया था, जिसके बाद उस व्यक्ति का नंबर वायरल हो गया था।

जिस व्यक्ति ने अखिलेश की सभा में ‘जय श्री राम’ कहा था, उसका नाम गोविन्द शुक्ला था। उन्होंने जिस व्यक्ति पर धमकी देने के आरोप लगा कर नंबर वायरल किया, उसका नाम प्रशांत सिंह है। ‘स्वराज्य’ की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने पूछा कि क्या अखिलेश यादव को ‘टोंटी चोर’ कहना गाली की श्रेणी में आता है, वो भी तब जब मोदी-शाह को नाजी से लेकर हत्यारा कहे जाने तक को लोकतान्त्रिक विरोध बताया जाता रहा हो। अखिलेश ने जिस व्यक्ति का नंबर ट्वीट किया, उसे जान से मारने की लगातार धमकियाँ मिल रही हैं।

प्रशांत ने एक वीडियो के माध्यम से बताया कि अखिलेश यादव ने उनका मोबाइल नंबर और व्हाट्सप्प स्क्रीनशॉट वायरल कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व सीएम ने बिना जाँच-पड़ताल किए और सच्चाई समझे बिना ये सब किया, जिससे सपा समर्थक उनके ख़ून के प्यासे हो गए हैं। प्रशांत ने कहा कि उनके परिवार पर भी ख़तरा है। उन्होंने कहा कि अगर उनकी किसी बात से अखिलेश को ठेस पहुँची है, तो उन्हें इसका खेद है। उन्होंने बताया कि वो काफ़ी परेशान हैं और घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

प्रशांत ने दावा किया कि उन्होंने कोई ग़लत मैसेज नहीं किया था, बल्कि मोदी और योगी के लिए ‘ज़िंदाबाद’ लिखा था। प्रशांत ने यह भी कहा कि पीएम मोदी और सीएम योगी अच्छा कार्य कर रहे हैं, इसीलिए उनका ‘ज़िंदाबाद’ होना चाहिए। उन्होंने अखिलेश को सलाह दी कि अगर भविष्य में वो अच्छा कार्य करेंगे तो उनका भी ‘ज़िंदाबाद’ किया जाएगा। बकौल प्रशांत सिंह, उन्होंने 16 जनवरी को अखिलेश यादव को मैसेज किया था और अखिलेश ने कन्नौज प्रकरण में राजनीतिक लाभ लेने के लिए उनको निशाने पर ले लिया।

प्रशांत ने कहा कि अगर उन्हें या फिर उनके परिवार को कोई भी क्षति पहुँचती है तो इसके जिम्मेदार अखिलेश यादव होंगे। उन्होंने कहा कि ‘टोंटी चोर’ एक साधारण शब्द है, इसके लिए उन पर निशाना साधा जा रहा जबकि अखिलेश के समर्थक उनके पेज पर सीएम योगी व अन्य विरोधियों के ख़िलाफ़ कई भद्दे-भद्दे कमेंट्स करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री को सपा समर्थकों द्वारा ‘चिलम वाले बाबा’ भी कहा जाता है।

वहीं समाजवादी पार्टी के विभिन्न सोशल मीडिया ग्रुप्स में प्रशांत सिंह को ‘गुंडा’ बताते हुए उनका नंबर वायरल किया जा रहा है। उन्हें ‘अपराधी’ बताया जा रहा है और ‘मार-मार कर गर्दा उड़ाने’ की धमकी दी जा रही है। उन्हें ‘कायर’ बताते हुए ‘भूसा भर के पर्दा गिरा देने’ की धमकी भी दी जा रही है। उन्हें व्हाट्सप्प के माध्यम से भी धमकाया जा रहा है। एक बिलाल ख़ान नामक सपा कार्यकर्ता ने प्रशांत को ‘मोदी का कुत्ता, शाह का रखैल और योगी की नाजायज औलाद’ जैसे आपत्तिजनक तमगों से नवाजा।

उद्धव की कुर्सी पर संकट: शरद पवार ने NCP मंत्रियों को बुलाया, अजित ने कहा- पता नहीं कब तक चलेगी सरकार

महाराष्ट्र में राजनीति कब किस करवट बैठ जाए कहना मुश्किल है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में प्रदेश में चल रही शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार के मतभेद आए दिन सामने आते रहते हैं। भीमा-कोरेगॉंव के मसले ने इसे और गहरा दिया है।

भीमा-कोरेगाँव मामले की जाँच पुणे पुलिस से एनआइए को सौंपे जाने को लेकर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने उद्धव सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र पुलिस में कुछ लोगों का व्यवहार आपत्तिजनक था। पवार ने कहा था कि वो चाहते हैं कि इन अधिकारियों की भूमिका की भी जाँच होनी चाहिए।

अब पवार ने सोमवार (फरवरी 17, 2020) को महाराष्ट्र में अपने सभी मंत्रियों की बैठक बुलाई है। इस बैठक में एनसीपी के सभी 16 मंत्री शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि यह बैठक पवार ने आनन-फानन में बुलाई है और इसके कारणों पर पार्टी ने कुछ नहीं बताया है।

वहीं, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भीमा-कोरेगाँव की जांँच केंद्रीय एजेंसी एनआईए को सौंपने को लेकर कहा कि वो इसके लिए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को धन्यवाद देते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि शरद पवार इस फैसले का विरोध कर रहे थे, उन्हें इस बात का डर लग रहा था कि कहीं सच सामने ना आ जाए।

भाजपा नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना को फिर से चुनाव लड़ने की चुनौती भी दी है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने शिवसेना, NCP और कॉन्ग्रेस गठबंधन को हराने की बात कही। फडणवीस ने कहा, “अगर शिवसेना को इतना ही भरोसा है, तो मैं उन्हें फिर से चुनाव लड़ने की चुनौती देता हूँ। शिवसेना, कॉन्ग्रेस और NCP गठबंधन को बीजेपी अकेले चुनाव में हराएगी।”

दूसरी ओर, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने भी आज बयान दिया है कि कोई भी ज्योतिष यह नहीं बता सकता है कि महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार कितने दिन चलने वाली है। अजित पवार ने यह भी कहा कि चीजें तभी तक आराम से चल सकती हैं जब तक यह सोनिया गाँधी, शरद पवार और उद्धव ठाकरे के अनुसार चलेंगी।

इससे पहले कॉन्ग्रेस ने शनिवार को उद्धव सरकार की ओर से भीमा-कोरेगाँव मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौंपे जाने पर सहमति को लेकर असहमति जताई थी। कॉन्ग्रेस के महाराष्ट्र प्रभारी मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि यह उचित नहीं था। इस तरह की बातों को लेकर पार्टनर से विचार करना चाहिए। उन्होंने उद्धव ठाकरे के लिए कहा था कि वो पावर में हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से करना चाहिए था।

ज्ञात हो कि महाराष्ट्र में बीते विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना साथ चुनाव लड़ी थी। चुनाव नतीजों में गठबंधन को बहुमत भी मिले थे, लेकिन बाद में शिवसेना और भाजपा की राह अलग हो गई थी। इसके बाद शिवसेना ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।

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हाथ में पत्थर लेकर जामिया की लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई करने जा रहे ‘छात्र’: नए Video से पलटी पूरी तस्वीर

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 15 दिसंबर को हुई हिंसा के संबंध में एक के बाद एक कई खुलासे हो रहे हैं। इनसे उपद्रवी छात्रों और मीडिया के गिरोह विशेष के बीच गठजोड़ की पोल खुल रही है। सबसे पहले तो एक सीसीटीवी फुटेज वायरल किया गया, जिसके आधार पर आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस ने जामिया लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों की पिटाई की। दिल्ली पुलिस को बदनाम करने के तमाम प्रयास किए गए। लेकिन, एक अन्य वीडियो के जरिए उनकी पोल खुल गई, जिसमें देखा जा सकता है कि छात्र किताबें बंद कर के बैठे हुए थे और जैसे ही पुलिस आई, उन्होंने किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया।

जामिया के छात्रों की पोल खोलती हुई एक दूसरी वीडियो भी सामने आई है। इसमें देखा जा सकता है कि दरवाजे पर खड़ा एक छात्र नकाबपोशों को लाइब्रेरी के भीतर घुसा रहा है? अब दंगाई अगर कहीं छिपेंगे, तो क्या पुलिस वहाँ जाकर उन्हें चिह्नित नहीं करेगी? एक बार वो चिह्नित हो गए तो उन पर पुलिस कार्रवाई भी करेगी ही। इसीलिए, जामिया के उपद्रवियों ने काट-छाँट कर वीडियो रिलीज किया, ताकि उन्हें सहानुभूति मिल सके। अब नए वीडियो में पत्थरबाजों को लाइब्रेरी में घुसते देखा जा सकता है।

हाथ में पत्थर लेकर और चेहरे पर नकाब बाँध कर लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई की जाती है, ये जामिया के उपद्रवी ही बता पाएँगे। वीडियो में कुछ उपद्रवियों को पत्थर लेकर लाइब्रेरी में घुसते हुए देखा जा सकता है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये वो दंगाई हैं, जो 15 दिसंबर को पुलिस से बचने के लिए यहाँ छिपे थे। पुलिस उनलोगों की तलाश कर रही थी, जिन्होंने यूनिवर्सिटी के बाहर आगजनी की थी। दिल्ली पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहे सभी वीडियोज की जाँच की जाएगी, जिसके बाद ही इस दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।

अब गिरोह विशेष को जिस बात का जवाब देना है कि हाथ में पत्थर लेकर लाइब्रेरी में शरण ले रहे उपद्रवियों पर पुलिस ने अगर कार्रवाई की भी तो इसमें गलत क्या है? आगजनी और दंगा करने वाले अगर लाइब्रेरी में छिप जाएँ तो उनका पाप धुल जाता है क्या और वो क़ानून से ऊपर हो जाते हैं क्या?

जामिया के लाइब्रेरी में पहले घुसे नकाबपोश, पीछे से आई पुलिस: नए वीडियो से बेनकाब हुआ प्रपंच

7 फरेबी पत्रकार: जामिया के एडिटेड विडियो से कर रहे बलजोरी, सोशल मीडिया पर लत्तम-जूत्तम

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