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हिन्दू से शादी करने पर कभी अब्दुल्ला परिवार ने ठुकराया था, भाई उमर के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं सारा

सचिन पायलट की पत्नी सारा पायलट ने अपने भाई उमर अब्दुल्ला की रिहाई के लिए दिन-रात एक कर दिया है। सारा पायलट जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं। फ़िलहाल उमर अब्दुल्ला ‘पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA)’ के तहत नजरबंदी झेल रहे हैं। उनकी रिहाई के लिए सारा सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई हैं। इस मामले में उनके वकील पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल हैं, जिन्होंने इस याचिका को अर्जेन्ट सुनवाई के लिए लिस्ट कराने में सफलता पाई थी।

सारा पायलट की दलील है कि एक ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ हिरासत में रखने के कोई सबूत हो ही नहीं सकते, जिसे पिछले 6 महीनों से नज़रबंद रखा गया हो। उन्होंने अपने भाई को हिरासत में लिए जाने के फैसले को अवैध करार देते हुए कहा है कि उनके ख़िलाफ़ कोई साक्ष्य नहीं हैं। इस मामले में सुनवाई से जस्टिस शान्तनागौडर ने ख़ुद को अलग कर लिया। हालाँकि, इसके लिए उन्होंने कोई कारण नहीं बताया। सारा पायलट ने अपनी याचिका में उमर को हिरासत में लिए जाने को अलोकतांत्रिक भी कहा है।

बता दें कि सारा पायलट राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट की पत्नी हैं। उन दोनों की शादी जनवरी 2004 में हुई थी। गौर करने लायक बात ये है कि सारा की शादी में उनके भाई व अब्बा शामिल नहीं हुए थे, क्योंकि वे एक हिन्दू से उनके रिश्ते को लेकर नाराज़ थे। फ़ारूक़ और उमर, दोनों ने ही उनके विवाह कार्यक्रम से दूरी बना ली थी। सारा पायलट ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा भी था कि वो अपने परिवार के इस फैसले से काफ़ी बिखर गई थीं और सचिन पायलट उन्हें ख़ुश रखने की कोशिश कर रहे थे।

सचिन से जब एक बार पूछा गया था कि आख़िर अब्दुल्ला बाद में मान कैसे गए, तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें और सारा को एक साथ ख़ुश देख कर सभी को इस रिश्ते को स्वीकार करना पड़ा। हालाँकि, ये जानने लायक बात है कि खुद उमर अब्दुल्ला ने भी मेजर जनरल (रिटायर्ड) रामनाथ की बेटी पायल नाथ के साथ शादी की थी। सितम्बर 2011 में उमर ने कन्फर्म किया कि वो दोनों अब अलग हो चुके हैं।

सारा और सचिन उच्च-शिक्षा के लिए ‘वारटन स्कूल ऑफ़ द यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया’ में गए थे, जहाँ उनकी मुलाकात हुई और बाद में दोस्ती प्यार में बदल गई। सारा चूँकि कश्मीरी मुस्लिम थीं और सचिन पायलट एक हिन्दू गुर्जर परिवार से आते थे, अब्दुल्ला खानदान को ये रिश्ता मंजूर नहीं था। सचिन और सारा के दो बेटे हैं और वो हँसी-खुशी रह रहे हैं। यही कारण है कि सालों बाद अब्दुल्लाओं को ये रिश्ता मंजूर करना पड़ा। आज सारा अपने भाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई हैं।

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जो शीला दीक्षित से लेना चाहते थे बदला, उनके गले लगकर भी दिन नहीं बदल पाई कॉन्ग्रेस

11 फरवरी 2020। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। जोरदार तरीके से आप ने सत्ता में वापसी की। कॉन्ग्रेस ने जो 66 उम्मीदवार उतारे थे उनमें से 63 अपनी जमानत ही नहीं बचा पाए। आप की जीत और भाजपा की हार के चर्चे के बीच कॉन्ग्रेस को सुर्खियॉं हाथ लगनी नहीं थी। इसलिए, उसके हाई प्रोफाइल उम्मीदवारों के दयनीय प्रदर्शन की भी चर्चा नहीं हुई। फिर भी आपको संगम विहार सीट का हाल सुनाता हूॅं। यहॉं से कॉन्ग्रेस की उम्मीदवार पूनम आजाद को कुल 2,604 वोट मिले हैं। जितने वोट पड़े उसका केवल 2.23 फीसदी। वे कॉन्ग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आजाद की पत्नी हैं।

यहॉं पूनम आजाद की विशेष तौर पर चर्चा की वजह शीला दीक्षित के नाम पर कॉन्ग्रेस में मचा घमासान है। इस कहानी को समझने के लिए आपको 2003 में जाना होगा। उस साल अचानक से दिल्ली के राजनीतिक सर्कल में एक महिला का नाम चर्चा में आया। यह महिला थीं, पूनम आजाद। बिहार के मुख्यमंत्री रहे भागवत झा आजाद की बहू और 1983 की वर्ल्ड चैंपियन क्रिकेट टीम के सदस्य तथा आज के दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस की चुनाव प्रचार समिति के चेयरमैन कीर्ति आजाद की पत्नी। उस समय कीर्ति बीजेपी में हुआ करते थे।

चर्चा चली कि दिल्ली की हाई प्रोफाइल गोल मार्केट विधानसभा सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ बीजेपी पूनम को मैदान में उतार सकती है। इस चर्चा से सबसे ज्यादा हैरानी दिल्ली भाजपा के नेताओं को ही हुई। उन्होंने पूनम आजाद का न तो नाम सुना था और न कभी उन्हें पार्टी गतिविधियों में शामिल होते देखा था। उस समय कीर्ति आजाद ने कहा था कि यदि बीजेपी उनकी पत्नी को टिकट देती है तो यह उनके लिए अपनी हार का बदला लेने का मौका होगा। बीजेपी ने उस साल हुए विधानसभा चुनाव में गोल मार्केट से पूनम आजाद को ही लड़ाया। लेकिन, न शीला दीक्षित हारीं और न पत्नी के जरिए प्रतिशोध की कीर्ति की मुराद पूरी हो पाई।

असल में, कीर्ति आजाद और शीला दीक्षित की राजनीतिक अदावत 1998 में ही शुरू हो गई थी। कॉन्ग्रेसी पिता के क्रिकेटर बेटे कीर्ति आजाद ने राजनीतिक पारी की शुरुआत बीजेपी से की। 1993 में पहली बार चुनावी राजनीति के मैदान में उतरे। गोल मार्केट की पिच पर ऐसा झंडा गाड़ा कि दिल्ली विधानसभा पहुॅंच गए। लेकिन, पॉंच साल बाद ही उन्हें चुनावी हार का स्वाद चखना पड़ा। कॉन्ग्रेस की शीला दीक्षित ने न केवल उन्हें चुनाव में पटखनी दी, बल्कि दिल्ली के राजनीति से कीर्ति का बोरिया-बिस्तर बॅंध गया।

साल भर बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बिहार के दरभंगा से चुनाव लड़ने भेज दिया। दरभंगा कीर्ति का ससुराल भी है और यहॉं ब्राह्मण मतदाता प्रभावी भी हैं। इस सीट से कीर्ति तीन बार लोकसभा भी पहुॅंचे। लेकिन, दिल्ली की राजनीतिक पिच पर जमने का दूसरा मौका वे तलाशते रहे। कभी पत्नी पूनम के चेहरे को आगे कर तो कभी डीडीसीए में पैर जमाने की कोशिश कर। इस कोशिश में पूनम बीजेपी से भाया आप होते हुए साल 2017 में कॉन्ग्रेस में आ गईं। वहीं, दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) को लेकर पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ उनका विवाद आखिरकार बीजेपी से उनकी विदाई का कारण बना।

बीते साल आम चुनावों से पहले कीर्ति आजाद कॉन्ग्रेस में आए थे। उस समय पार्टी अध्यक्ष रहे राहुल गॉंधी ने खुद उनका इस्तकबाल किया था। यह दूसरी बात थी कि बिहार में कॉन्ग्रेस उनके लिए सहयोगियों से न दरभंगा की सीट ले पाई और न राज्य में दूसरा कोई सीट तलाश पाई। आखिरकार, उन्हें चुनावी भट्ठी में पार्टी ने झारखंड की धनबाद सीट से झोंक दिया। चमत्कार होना न था और कीर्ति हार गए।

इस चुनावी पराजय के बाद कीर्ति राजनीति के नेपथ्य में चले गए। फिर अक्टूबर 2019 में अचानक से चर्चा में आए। कहा गया कि उनका दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनना तय है और कभी भी नाम का ऐलान हो सकता है। लेकिन, जब नाम का ऐलान हुआ तो कीर्ति के हिस्से चुनाव प्रचार समिति आई। उस समय ऐसा दावा किया गया था कि कीर्ति के हाथ से अध्यक्ष की कुर्सी पार्टी के प्रदेश प्रभारी पीसी चाको और शीला दीक्षित के पूर्व सांसद बेटे संदीप दीक्षित के बीच की लड़ाई के कारण फिसली है। शीला दीक्षित का बीते साल 20 जुलाई को निधन हुआ था। उनके चाको से मतभेद जगजाहिर थे। संदीप ने इसे अपनी माँ की मौत का कारण बताया था। चाको चाहते थे कि शीला की जगह प्रदेश की कमान कीर्ति को मिले।

ऐसे में सोनिया ने बीच का रास्ता चुना। लेकिन, विडंबना देखिए सोनिया के नेतृत्व में जिस शख्स का दिल्ली की राजनीति से शीला ने बोरिया-बिस्तर बॅंधवाया था, दो दशक बाद सोनिया ने शीला की मौत के 94 दिन के बाद उसे ही मोर्चे पर लगा दिया। इस उम्मीद में कि शीला जैसा कमाल कर दिखाएँ। इसके पीछे कॉन्ग्रेस की दो दशक पुरानी वही रणनीति है जिसके बलबूते उसे 1998 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत मिली और फिर अगले डेढ़ दशक तक वह राज्य की सत्ता में बनी रही। पंजाबी और पूर्वांचल मतदाताओं को एक साथ साधना। उस समय भी पार्टी के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ही थे, जिन्हें एक बार फिर से अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी का चेहरा थीं शीला दीक्षित, जो उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता रहे उमाशंकर दीक्षित की बहू थीं।

लेकिन, शायद सोनिया यह भूल गईं थी कि वह साल दूसरा था, यह साल दूसरा है। इस बीच यमुना में काफी पानी बहा। उसका ही असर था कि इस बार चुनाव में पहले कॉन्ग्रेस के नेतृत्व ने सरेंडर किया फिर उम्मीदवार पॉंच फीसदी वोट भी नहीं ला पाए। लगातार दूसरे विधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुला। नतीजों के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले सुभाष चोपड़ा की बेटी भी जमानत नहीं बचा पाई। ​आखिर में रही-सही कसर चाको ने हार की जिम्मेदार दिवंगत दीक्षित के मत्थे मढ़ कर पूरी कर दी है। जबकि सच्चाई यही है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी के लिए सोनिया ने हर उस शख्स को गले लगाया जिससे पूर्व मुख्यमंत्री के मतभेद थे, जो उनसे कभी बदला लेना चाहता था।

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काटा गया मायावती के घर का बिजली कनेक्शन, कई महीनों से बकाया था बिजली बिल

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती के हाथ से पावर तो 2012 में जा चुका था, अब उनके घर से भी पावर चला गया है। मायावती के घर के लोग कई महीनों से बिजली बिल का भुगतान नहीं कर रहे थे, जिसके बाद उनके घर का बिजली कनेक्शन ही काट डाला गया। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के ग्रेटर नोएडा के बादलपुर में स्थित आवास की बिजली काटी गई।

मायावती पर कुल 67,000 रुपए का बिजली बिल बकाया था, जिसके कारण उनके घर की बिजली काटी गई। हालाँकि, बिजली विभाग के प्रवक्ता ने बताया है कि ये एक रूटीन प्रक्रिया है और बिजली बिल न भरने पर कनेक्शन काटा जाता है। जैसे ही मायावती के घर की बिजली काटी जाने की ख़बर आई, उनके परिजनों ने बकाया भुगतान की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी।

पूर्व मुख्यम्नत्री के परिजनों ने 67,000 रुपए में से 50,000 रुपए का भुगतान कर दिया है। बिजली विभाग के लखनऊ में स्थित एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। जहाँ भी बिल पेंडिंग हैं, वहाँ का बिजली कनेक्शन काटा जा रहा है। मायावती का घर भी इसी क्रम में बिजली विभाग की रडार पर आया। ताज़ा सूचना के अनुसार, मायावती के घर की बिजली फिर से चालू कर दी गई है क्योंकि परिजनों ने बकाया राशि का भुगतान कर दिया है।

शाहीन बाग का ऐलान: अरे ओ सुन ले, तू हमें करंट क्या लगाएगा? अब तू दिल्ली से ही नहीं, हिंदुस्तान से भी जाएगा

दिल्ली के शाहीन बाग़ में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद जश्न मनाया गया। हालाँकि, ये जश्न केजरीवाल की जीत को लेकर कम और भाजपा की हार को लेकर ज्यादा था। भाजपा को चिढ़ाते हुए बैनर-पोस्टर लहराए गए। एक ऐसा पोस्टर भी लहराया गया, जिसमें भाजपा को धमकी दी गई है। धमकी भरे अंदाज में उस पोस्टर को शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने लहराया। ये तो शरजील के बयानों के बाद से ही स्पष्ट है कि मुद्दा सीएए और एनआरसी नहीं है, मुद्दा हिंदुत्व भाजपा का विरोध है। इसके लिए उन्हें बहाना चाहिए, जो सीएए के रूप में उन्हें मिल गया।

इस पोस्टर में लिखा हुआ है- “अरे ओ सुन ले, तू हमें करंट क्या लगाएगा? अब तू दिल्ली से ही नहीं, हिंदुस्तान से भी जाएगा।” शाहीन बाग़ वालों से जब मीडिया ने सवाल पूछा तो वो गुजरात दंगे की बातें करने लगे। भाजपा के प्रति अपने नफरत का इजहार करने लगे। इससे फिर ये साबित हुआ कि इनका आंदोलन किस मकसद से चल रहा है। इसका असली एजेंडा क्या है। हालाँकि, मीडिया ने इसे छिपाने की भरसक कोशिश की। फिर भी, एक सजग वर्ग ने इसे जनता के सामने रखा। दरअसल, इस पोस्टर के जरिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा गया।

शाह ने 26 जनवरी को बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ईवीएम का बटन इतने गुस्से के साथ दबाना कि बटन यहाँ दबे, करंट शाहीन बाग के अंदर लगे। उससे तीन दिन पहले जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही बयान दिया था। शाह ने कहा था, “बटन इतनी ताकत से दबाना कि इसके करंट से 8 फरवरी को शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी वो जगह छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ।’आम आदमी पार्टी की जीत के बाद अमानतुल्लाह ख़ान समेत कई नेताओं ने शाह के इस बयान पर तंज कसा।

जब मुस्लिमों के रहनुमाओं से इस बारे में पूछा गया तो वो बात बनाते नज़र आए। ‘न्यूज़ नेशन’ के शो में पत्रकार दीपक चौरसिया ने मुस्लिम प्रतिनिधियों से पूछा तो एक ने कहा कि शाहीन बाग़ में रोज लाखों लोग आते हैं, कैसे पता चलेगा कि पोस्टर प्रदर्शनकारियों ने ही लहराए हैं? वहीं दूसरे ने कहा कि वो इसकी निंदा करते हैं लेकिन साथ ही इस प्रदर्शन को पिछले 100 साल का सबसे बड़ा आंदोलन भी करार दिया। शाहीन बाग़ के मास्टरमाइंड शरजील इमाम ने AMU में इससे पहले नार्थ-ईस्ट को शेष भारत से अलग करने की बातें की थी।


शाहीन बाग़ की तल्ख़ हकीकत: विरोध का असली मकसद देश में अस्थिरता का माहौल पैदा कर सरकार गिराना

संख्या नहीं गिनाएँगे, सैकड़ों प्रदर्शनकारी बताएँगे: AltNews ने किया शाहीन बाग़ के सन्नाटे का फर्जी फैक्ट चेक

हिन्दुओं! उपकार मानो कि शाहीन बाग़ ने एक शव यात्रा के लिए रास्ता दिया है, वो चाहते तो…

जमानत पर रिहा कार रेस कर रहे कॉन्ग्रेसी ‘विधायक-पुत्र’ मोहम्मद नालपाड की लग्जरी कार के टक्कर से 4 घायल

‘विधायक पुत्र’ और उनके रईशों वाली जिंदगी के कारनामों से आम जनता को कितनी असुविधा उठानी पड़ती है, यह अक्सर हम ख़बरों में देखते रहते हैं। इस बार ऐसे ही एक ‘विधायक-पुत्र’ ने कर्नाटक में नया कारनामा कर दिखाया है। ख़ास बात यह है कि यह ‘विधायक-पुत्र’ एक बड़े कॉन्ग्रेस नेता का बेटा है और जमानत पर बाहर घूम रहा है।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस नेता और विधायक एनए हैरिस का बेटा मोहम्मद नालपाड, जो 2 साल पहले मारपीट के मामले में जमानत पर बाहर है, फिर से विवादों में आ गया है। मोहम्मद नालपाड की लग्जरी बेंटले कार ने एक ऑटो और बाइक सवार को टक्कर मार दी, जिसमें 4 लोग घायल हो गए। यह हादसा बेंगलुरु रोड के पास हुआ।

कॉन्ग्रेस नेता का बेटा मोहम्मद नालपाड वर्ष 2018 में एक पब में एक शख्स को बुरी तरह पीट-पीटकर घायल कर देने के आरोप में जेल में बंद था। इसके बाद वो जमानत पर बाहर चल रहा है। कार को टक्कर मारकर चार लोगों को घायल करने के कारण मोहम्मद नालपाड एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

सोमवार को इस घटना में नया मोड़ तब आया जब मोहम्मद नालपाड के गनमैन ने इस घटना की जिम्मेदारी ली और कहा कि गाड़ी मोहम्मद नालपाड नहीं बल्कि वो चला रहा था। हालाँकि बेंगलुरु मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, CCTV में यह स्पष्ट देखा गया है कि मोहम्मद नालपाड और उसके दोस्त कार रेस कर रहे थे जब यह हादसा हुआ।

‘बेंगलुरु मिरर’ द्वारा जारी वीडियो से लिया गया मोहम्मद नालपाड की कार का स्क्रीनशॉट

यह हादसा बेंगलुरु के बेलारी रोड के पास रविवार (फरवरी 09, 2020) को हुआ। दरअसल, मोहम्मद नालपाड तेज गति से गाड़ी चला रहा था और कार पहले बाइक और फिर ऑटोरिक्शा से टकरा गई। कार के टक्कर मारने के बाद मोहम्मद नालपाड ने अपनी कार वहीं छोड़ दी और अपने दोस्त की गाडी में बैठकर वहाँ से भाग निकला।

इस टक्कर में एक बाइक सवार के पैर में फ्रेक्चर हुआ है और उसे अस्पताल भर्ती कर लिया गया और उसका अस्पताल में इलाज चल रहा है।

‘अब समय आ गया है कि हनुमान चालीसा का पाठ दिल्ली के विद्यालयों, मदरसों, शैक्षणिक संस्थानों में हो’

दिल्ली विधानसभा चुनावों में बहस का मुद्दा बनी हनुमान चालीसा एक बार फ़िर नए सिरे से चर्चा में आ गई है। इसकी शुरूआत इस बार बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने केजरीवाल को हनुमान जी की कृपा से हुई जीत पर बधाई देते हुए की है। इसे लेकर लोगों ने ट्विटर पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ दी हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की 62 सीटें आने के बाद केजरीवाल फिर से अपनी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहे हैं। इस बीच बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अरविंद केजरीवाल को जीत की बधाई देते हुए ट्वीट किया, “निश्चित ही जो हनुमान जी की शरण में आता है उसे आशीर्वाद मिलता है। अब समय आ गया है कि हनुमान चालीसा का पाठ दिल्ली के सभी विद्यालयों, मदरसों सहित सभी शैक्षणिक संस्थानों में भी जरूरी हो।” कैलास विजयवर्गीय ने केजरीवाल से एक सवाल भी किया कि बजरंगबली की कृपा से अब दिल्लीवासी और बच्चे क्यों वंचित रहें?

गौरतलब है कि 11 फरवरी को आए दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम में आम आदमी पार्टी को 70 से 62 सीटें, बीजेपी को 8 सीटें मिली हैं। वहीं कॉन्ग्रेस दिल्ली में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। इसी के साथ 16 फरवरी को अरविंद केजरीवाल फिर से दिल्ली के मुख्मंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं।

आपको बता दें कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में 5 दिन पूर्व एक समाचार चैनल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों के कहने पर हनुमान चालीसा का पाठ किया था। न्यूज 18 हिंदी चैनल द्वारा आयोजित ‘एजेंडा दिल्ली’ में एंकर ने केजरीवाल से पूछा था कि क्या वह हनुमान मंदिरों का दौरा करते हैं, तो केजरीवाल ने उत्साह से हाँ में जवाब दिया था। इसे लेकर मुस्लिमों ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त की थी।

वहीं इस कार्यक्रम के बाद बीजेपी पार्टी सहित अन्य लोगों ने केजरीवाल को अपने निशाने पर लिया था और कहा था कि, एक तरफ तो केजरीवाल शाहीन बाग को खुलकर अपना समर्थन दे रहे हैं, जहाँ आए दिन देशविरोधी नारे लगाए जा रहे हैं और हिंदुओं को गाली देते हुए बिरयानी बाँटी जा रही है। साथ ही लोगों ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं।

अल्लाह मेहरबान तो PK पहलवान: मिलिए, चुनावी कैंपेन की दुनिया के ‘रामविलास’ से

बिहार की एक पार्टी है। पार्टी क्या, पारिवारिक दल कह लीजिए। लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा। इसके संस्थापक रामविलास पासवान फिलहाल राज्यसभा से सांसद और मोदी कैबिनेट के मंत्री हैं। रामविलास की राजनीति में पहचान मौसम वैज्ञानिक के तौर पर है। सरकार भले बदल जाए सरकार में उनकी हिस्सेदारी नहीं बदलती। हवा का रूख भांपने में उनका कोई सानी नहीं। अब ऐसा लगता है कि यह हुनर पीके यानी प्रशांत किशोर में भी कूट-कूट कर भरी है। बतौर चुनावी रणनीतिकार राजनेताओं से करीबी गढ़ने में माहिर पीके हर बार हवा के साथ होते हैं। इसकी बदौलत अपनी ब्रांडिंग करते हैं और मीडिया को भी दीवाना बना लेते हैं।

11 फरवरी को आम आदमी पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल हुई और अरविन्द केजरीवाल के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ हो गया। इसी दिन प्रशांत किशोर के साथ केजरीवाल की फोटो वायरल हुई। दोनों साथ में टीवी पर चुनाव परिणाम देख रहे थे। दोनों के गले मिलते हुए फोटो वायरल हुए। आधुनिक राजनीति में पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर के पीछे एक बार फिर मीडिया बावला हो गया और उनकी ‘चाणक्य’ वाली छवि के महिमामंडन में जुट गया। क्या सचमुच AAP की जीत प्रशांत किशोर की देन है?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत करीब-करीब तय थी। सवाल था कि क्या एकतरफा लग रहे इस चुनाव को बीजेपी और कॉन्ग्रेस मुकाबले में बदल पाएगी। वोटों की हिस्सेदारी से तो कुछ हद तक भाजपा ऐसा करती दिख रही है। लेकिन, कॉन्ग्रेस के प्रचार के दौरान ही सरेंडर करने का फायदा आप को मिला है यह भी स्पष्ट है। सारे ओपिनियन और एग्जिट पोल्स में भी आप की सत्ता में धमाकेदार वापसी के अनुमान लगाए गए थे।

चुनाव से ठीक पहले केजरीवाल ने ट्वीट कर सूचना दी थी कि प्रशांत किशोर की कम्पनी ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC)’ ने उनके चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी सँभाली है। केजरीवाल की जीत के साथ ही प्रशांत किशोर के लिए ‘अल्लाह मेहरबान…’ वाली कहावत चरितार्थ हुई। दिल्ली की 8 मुस्लिम बहुल सीटों पर केजरीवाल की पार्टी की जीत हुई। इनमें से 4 प्रमुख मुस्लिम बहुल सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों के खाते में गई। मुस्लिमों में गजब का ध्रुवीकरण हुआ। कॉन्ग्रेस के आधे वोटर निकल लिए।

अगर एक भी सर्वे, ओपिनियन पोल अथवा एग्जिट पोल में भाजपा की जीत की भविष्यवाणी जताई गई होती और तब केजरीवाल सत्ता में वापसी करते, तब प्रशांत किशोर के योगदान पर कम से कम चर्चा तो हो ही सकती थी। लेकिन, जहाँ चीजें सपष्ट दिख रही थी, वहाँ प्रशांत किशोर ने एक तरह से फिर से बहती गंगा में हाथ धोकर खुद की जिताऊ रणनीतिकार की गढ़ी हुई छवि और मजबूत कर ली। उन्हें हाल ही में जदयू से निकाल बाहर किया गया है। सीएए पर उनका रुख पार्टी के मुखिया नीतीश कुमार से एकदम भिन्न था। सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

इसके बाद जिस नीतीश कुमार ने पीके को कैबिनेट मंत्री स्तर का दर्जा दिया था, उन्होंने ही उन्हें पार्टी से बाहर करने में देर न लगाई। जदयू ने प्रशांत किशोर का समर्थन करने वाले चन्दन कुमार सिंह को भी निकाल बाहर किया। चन्दन पटना महानगर युवा जदयू के राज्य सचिव थे। सोचने वाली बात है, कोई भी दल किसी ‘राजनीतिक चाणक्य’ को निकाल बाहर क्यों करेगा, जब वो चुटकियों में चुनाव जिताने की क्षमता रखता हो। कम से कम मीडिया तो उन्हें यही तमगा देती है। लेकिन, नीतीश ने ऐसा किया। क्योंकि उन्हें भलीभॉंति पता था कि 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्हें जीत पीके की रणनीतियों के बदौलत नहीं मिली थी।

असल में बिहार के राजनीतिक समीकरण ही कुछ ऐसे हैं कि दो बड़े दल जिधर होते हैं बाजी उसके ही हाथ लगती है। बीजेपी को छोड़ 2014 के आम चुनावों में कमजोर हुई जदयू ने विधानसभा चुनाव से पहले राजद से गठबंधन किया। राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण उसे 30% से भी अधिक जनसंख्या को साधने का जरिया बनाता रहा है। ख़ासकर लालू यादव के सक्रिय रहने से ये चीज और आसान हो जाती है। नीतीश के सोशल इंजीनियरिंग को मिला दें तो महादलितों और कुर्मी वर्ग का भी साथ महागठबंधन को मिल जाता है। ऊपर से नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ वाली छवि। ऐसे में प्रशांत किशोर ने ज्यादा से ज्यादा सीटें टच करने की सलाह लालू और नीतीश दोनों को दी। दोनों ने लगभग हर सीट पर सभाएँ की और महागठबंधन जीत गया।

एक मँझे हुए राजनेता नीतीश कभी भी प्रशांत किशोर को जाने नहीं देते, अगर उनका 2015 की जीत में जरा सा भी योगदान होता। इसी तरह पंजाब में अकाली सरकार के ख़िलाफ़ घोर एंटी-इंकम्बेंसी थी, जिसे कॉन्ग्रेस ने भुनाया। कैप्टेन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की वापसी तय थी। अगर उन्हें सीएम उम्मीदवार न घोषित किया गया होता तो शायद कुछ चर्चा हो भी सकती थी। बीच चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गाँधी को कैप्टेन के सामने झुकना पड़ा और उन्हें चेहरा बनाने को मजबूर होना पड़ा। कॉन्ग्रेस की जीत हुई और प्रशांत किशोर एक बार फिर से लहरिया लूट ले गए।

आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए। प्रशांत किशोर की कम्पनी ने वाईएसआर कॉन्ग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के लिए रणनीति बनाने व प्रचार की कमान सँभाली। लोकसभा और विधानसभा, दोनों में ही चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को बुरी हार का सामना करना पड़ा। यहाँ भी नतीजे आश्चर्यजनक नहीं थे। जगन ने राज्य भर में पदयात्राएँ और सभाएँ महीनों पहले शुरू कर दी थी। नायडू के ख़िलाफ़ एंटी-इंकम्बेंसी थी सो अलग। पीके के जुड़ने से पहले से ही राज्य की सत्ता में जगन के काबिज होने के कयास लगाए जा रहे थे। इस लिहाज से यहॉं भी पीके ने हवा के साथ होकर अपनी ब्रांडिंग की।

इस दौरान पीके को जो सबसे मुश्किल मोर्चा मिला था उस पर वह बुरी तरह नाकाम रहे। 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों के लिए कॉन्ग्रेस ने रणनीति बनाने की जिम्मेदारी उन्हें ही सौंपी थी। कॉन्ग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन भी किया। लेकिन, पीके कॉन्ग्रेस की किस्मत नहीं बदल पाए थे। साफ़ है जहाँ मुकाबला कठिन हो, वहाँ पीके की परफॉरमेंस एकदम शून्य हो जाती है। बाद में इस दाग को धोने के लिए उन्होंने यूपी में हार का ठीकरा पूरी तरह कॉन्ग्रेस के नेताओं पर फोड़ दिया। लेकिन, उसी समय पंजाब में कॉन्ग्रेस की जीत का सेहरा अपने सिर बॉंधने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

असल में 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने जो भी तौर-तरीके आजमाए- सब हिट हो गए। उन्होंने जिसके साथ हाथ मिलाया, वो जननेता बन गया। उन्होंने जो नारा दे दिया, वो चुनाव का ही स्लोगन बन गया। उनके लिए जिन लोगों ने काम किया, वो ‘चाणक्य’ कहला गए। उन्हीं में से एक प्रशांत किशोर भी थे, जो मोदी की लोकप्रियता की नाव चढ़ कर मीडिया के महिमामंडन के कारण उभर कर सामने आए। पीके का मोदी की जीत में क्या योगदान था, ये आज तक किसी को नहीं पता चल पाया। लेकिन हाँ, वो जुड़े हुए थे, तो मीडिया की नज़रों में छा गए।

अब आते हैं कुछ ऐसी ख़बरों पर, जिनकी चर्चा तो हुई लेकिन वो छिप गईं। प्रशांत किशोर को लेकर नीतीश कुमार कह चुके हैं कि उन्होंने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह के कहने पर उन्हें पार्टी में शामिल किया था। उससे पहले ख़बर आई थी कि प्रशांत किशोर ब्यूरोक्रेसी में ‘लेटरल एंट्री’ चाहते हैं और वो मोदी से इसी कारण नाराज़ हुए। वो कहते रहे हैं कि वो पीएमओ के लिए एक विंग बनाना चाहते थे, जिसके लिए वो भर्तियाँ करते। एक ‘Lobbyist’ अपने अलग-अलग लोगों को कुर्सी तक पहुँचा कर विभिन्न प्रकार के काम निकलवा सकता है, ये छिपा नहीं है। नीरा राडिया से लेकर अमर सिंह जैसे लोग ये काम दशकों से करते रहे हैं।

दिल्ली के सियासी गलियारों में चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस के सरेंडर को प्रियंका गॉंधी के साथ पीके के अच्छे संबंधों से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा जोरों पर है कि पीके की सलाह पर ही कॉन्ग्रेस के नेतृत्व ने इस चुनाव को लेकर उत्साह नहीं दिखाया और आप के लिए लड़ाई को आसान बनाने की कोशिश की।

असल में मोदी मैजिक पर सवार होकर आए पीके अब भाजपा विरोधी गैंग में अपनी घुसपैठ मजबूत करने की फिराक में लगे हुए हैं। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जदयू के स्टैंड से विपरीत जाकर उनका आक्रामक रूख अपनाना और दिल्ली के नतीजों के बाद ट्वीट कर यह कहना कि भारत की आत्मा की रक्षा करने के लिए दिल्ली की जनता का धन्यवाद, को उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से जोड़कर ही देखा जा रहा है। अब यह तो वक्त ही बताएगा पीके अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर पाएँगे या फिर ब्रांडिंग की दुनिया के ‘रामविलास’ बनकर ही रह जाएँगे।

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हर दूसरे दिन पिट रहे हैं कन्हैया कुमार, जूता-चप्पल, अंडा, मोबिल, पत्थर… सब बरसा रहे बिहारी

बिहार में जन-गण-मन यात्रा पर निकले जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और CPI नेता कन्हैया कुमार को लगातार भारी विरोध का सामना करना पड़ा रहा है। विरोध भी कुछ इस तरह कि लोग कन्हैया पर अंडे, मोबिल और पत्थर तक फेंक रहे हैं। बीते दो सप्ताह में 7 बार उनके काफिले पर हमला हो चुका है।

जानकारी के मुताबिक मंगलवार को गया ज़िले के इमामगंज क्षेत्र के गाँधी मैदान में CPI की ओर से सीएए के ख़िलाफ़ जनसभा का आयोजन किया गया था। सभा को संबोधित करने जा रहे कन्हैया कुमार के काफ़िले पर विश्रामपुर के पास पथराव किया गया। काफिले पर लोगों ने अंडा, स्याही, जला हुआ मोबिल और पत्थर फेंके। विरोध कर रहे लोगों ने काले झंडे दिखाते हुए कन्हैया मुर्दाबाद के नारे लगाए। पथराव में कन्हैया के काफिले के साथ चल रहे वजीरगंज से कॉन्ग्रेस के विधायक अवधेश प्रसाद सिंह की गाड़ी का शीशा टूट गया।

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दैनिक जागरण के गया संस्करण में 12 फरवरी 2020 को प्रकाशित खबर

इसके पहले सोमवार को जमुई से नवादा आते वक्‍त कन्हैया के काफिले पर हमला किया गया था। इस दौरान लोगों ने नवादा में उनके लिए कौआ कुमार की संज्ञा देते हुए गो बैक के पोस्‍टर दिखाए थे। आपको बता दें कि, पिछले करीब 14 दिनों में कन्‍हैया पर मोतिहारी, सुपौल, कटिहार, सीवान, मधेपुरा, गोपालगंज, जमुई, गया और सारण सहित कई स्थानों पर सात बार हमला हो चुका है। इतना ही नहीं कन्हैया इस यात्रा के दौरान जहाँ कहीं भी गए वहीं उनकों लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा है। कन्हैया का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि वह देशद्रोही हैं, उनसे देश के लिए बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती।

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संख्या नहीं गिनाएँगे, सैकड़ों प्रदर्शनकारी बताएँगे: AltNews ने किया शाहीन बाग़ के सन्नाटे का फर्जी फैक्ट चेक

जगजाहिर है कि दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में चल रहे प्रदर्शन के पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही हैं। भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की मंशा रखने वाले शरजील इमाम की गिरफ़्तारी के बाद चीजें स्पष्ट हो गई हैं। शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों का जोश चुनाव परिणाम आते ही ठंडा पड़ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि आम आदमी पार्टी की भारी जीत से मुस्लिमों का मकसद पूरा हो गया है। ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित एक ख़बर ने भी इस बात की पुष्टि की। भाजपा की हार के साथ ही शाहीन बाग़ वीरान पड़ गया है और वहाँ से प्रदर्शनकारी जाने लगे हैं।

ये बातें फैक्ट-चेक का दावा करने वाली वेबसाइट ‘ऑल्टन्यूज़’ को नागवार गुजरी। ऑपइंडिया ने भी इस ख़बर को चलाया था, जिससे ‘ऑल्ट न्यूज़’ को मिर्ची लग गई। भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने ऑपइंडिया की इस ख़बर को शेयर किया, जिससे प्रतीक सिन्हा का प्रोपेगेंडा पोर्टल तिलमिला उठा। शाहीन बाग़ में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा लगा है, ये साबित करने के लिए उसने बेसिक गणित ज्ञान को भी तिलांजलि दे दी।

उसने ‘द क्विंट’ के एक पत्रकार द्वारा ली गई तस्वीरों से यह साबित करने का प्रयास किया कि शाहीन बाग़ पूरा भरा हुआ है। वहाँ की एक तस्वीर में एक भी व्यक्ति नहीं दिख रहा है। प्रोपेगेंडा पोर्टल ने बताया कि यह तस्वीर 11 फरवरी के सुबह 8 बजे की है, जब प्रदर्शनकारी सो रहे थे और मुस्लिम महिलाएँ आई नहीं थीं। यहाँ सवाल उठता है कि क्या अब सोने को भी विरोध-प्रदर्शन माना जाएगा? क्या कोई व्यक्ति अपने घर में सो जाएगा तो उसे भी विरोध-प्रदर्शन माना जाएगा? ‘ऑल्ट न्यूज़’ ने लिख दिया कि प्रदर्शनकारी सो रहे हैं, इसलिए वहाँ कोई नहीं दिखा।

इसकी तुलना घोड़ा और घास वाली पेंटिंग से की जा सकती है। कहानी के अनुसार, एक पेंटिंग थी जो पूरी खाली थी। एकदम सफ़ेद। चित्रकार उसे घोड़ा और घास की पेंटिंग बताता था। किसी ने पूछ दिया कि चित्र में घास कहाँ है, तो पेंटर ने बताया कि घास तो घोड़ा खा गया। उसे भूख लगी थी तो छोड़ेगा थोड़े? जब पूछा गया कि घोड़ा कहाँ है, तो पेंटर ने जवाब दिया कि घास खा कर घोड़ा बैठा थोड़ी न रहेगा, वो चला गया पेट भर के अपना। यही हाल ‘ऑल्टन्यूज़’ का है। वो सैकड़ों प्रदर्शनकारी और सोते हुए प्रदर्शनकारी के बीच फँसा हुआ है।

‘ऑल्टन्यूज़’ के भ्रामक और प्रपंची फैक्ट-चेक की खुली पोल

‘ऑल्टन्यूज़’ ने दावा किया कि वहाँ सैकड़ों प्रदर्शनकारी मौजूद हैं, जबकि तस्वीरों में ऊँगली पर गिने जाने लायक ही प्रदर्शनकारी दिखते हैं। बाकी समय ‘ऑल्ट न्यूज’ नासा के सॉफ़टवेयर इस्तेमाल करके फोटो लेने की तारीख, समय और फोटोग्राफर का मूड तक बता दिया करता है, लेकिन इस तस्वीर के बारे में यही बता पाया कि प्रदर्शनकारी सो रहे थे। सवाल यह है कि वो वहाँ प्रदर्शन करने गए थे या सोने? क्या वहाँ प्रदर्शन के लिए शिफ्ट नहीं लगा करती थी? वो वहाँ संविधान बचा रहे हैं कि सो रहे हैं?

इस चित्र में आपको कहाँ दिख रहे हैं सैकड़ों प्रदर्शनकारी?

‘ऑल्टन्यूज़’ ने प्रदर्शनकारियों की संख्या की पुष्टि क्यों नहीं की? ये तो वही बात हो गई कि किसी ने पूछा कि आसमान में कितने तारे हैं तो एक हाजिरजवाब व्यक्ति ने बताया कि जितने उसके सिर में बाल हैं, उतने ही। सैकड़ों प्रदर्शनकारी? कितने सौ? 200..300..400..?? अगर इतने हैं तो दिख क्यों नहीं रहे? क्या वो अदृश्य हैं? जिन चार तस्वीरों को दिखा कर, 8 बजे से 12 बजे की तस्वीरें बता कर ऑल्टन्यूज यह क्लेम कर रहा है कि वहाँ सैकड़ों कर्मचारी हैं, उनमें से तीन तस्वीरों में कुल दस लोग भी नहीं दिख रहे और चौथी में संख्या तीस के आस-पास है।

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आरिफ ने सीमा को दिया तीन तलाक, फिर मिट्टी तेल छिड़क लगा दी आग

उत्तर प्रदेश के रामपुर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। थाना खेड़ा टांडा निवासी एक युवक ने दहेज की माँग पूरी न करने पर बीबी को पहले तीन तलाक दिया फिर परिजनों की मदद से उसे आग के हवाले कर दिया। 75 फीसदी झुलस चुकी पीड़िता सीमा अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। उसके शौहर आरिफ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। अन्य आरोपितों की तलाश की जा रही है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार घटना रविवार (9 फरवरी 2020) को दहेज़ को लेकर सीमा और आरिफ के बीच झगड़ा हुआ। झगड़े के दौरान ही आरिफ ने तीन तलाक दे सीमा को घर से निकलने को कहा। इसका विरोध करने पर मिट्टी का तेल डाल आग के हवाले कर दिया और मौके से फरार हो गया। सीमा की चीख पुकार सुन आस-पड़ोस के लोग मौके पर पहुँचे और उसे जिला अस्पताल गए ले गए। हालत देख उसे मुरादाबाद के टीएमयू सेंटर रेफर कर दिया गया।

दैनिक जागरण के रामपुर संस्करण में 11 फरवरी 2020 को प्रकाशित खबर

सीमा के परिजनों की तहरीर पर पुलिस ने शौहर आरिफ सहित पाँच के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। इनमें ससुर बन्ने, सास हनीफा, जेठ तालिब और तारिक भी शामिल हैं। अजीमनगर थाना प्रभारी अमरीश कुमार ने बताया कि आरोपित पति आरिफ को सोमवार को खेमपुर बस अड्डे से गिरफ्तार कर लिया गया है। जल्द ही अन्य आरोपित भी गिरफ़्तार कर लिए जाएँगे।

जानकारी के मुताबिक खेड़ा टांडा निवासी नजाकत अली की बेटी सीमा का निकाह दो साल पहले दौंकपुरी टांडा निवासी मोहम्मद आरिफ से हुआ था। सीमा के परिजनों ने निकाह में सात लाख रुपये खर्च किए थे। आरोप है कि ससुराल के लोग उसे कम दहेज लाने का ताना देते थे। वे दहेज में बोलेरो गाड़ी की मॉंग कर रहे थे। मॉंग पूरी नहीं होने पर उसे प्रताड़ित करते थे।

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