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जवाब दो कि आपराधिक छवि वालों को क्यों दिया टिकट: सभी दलों को सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश

राजनीति के आपराधीकरण को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए तमाम राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया है कि आपराधिक बैकग्राउंड वाले उम्‍मीदवारों को चिह्नित कर के 48 घंटों के भीतर उनकी पूरी प्रोफाइल पार्टी की वेबसाइट पर अपलोड करें।

कोर्ट ने कहा,’पिछले चार लोकसभा चुनावों में इसमें काफी वृद्धि हुई है। इस क्रम में सभी राजनीतिक पार्टियां आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार का नामांकन स्‍पष्‍ट होने के 48 घंटे के भीतर उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करें।‘ राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ते आपराधीकरण को रोकने के प्रयास काफी समय पहले से किये जा रहे हैं।

निर्वाचन आयोग को कोर्ट का निर्देश

मीडिया के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया है कि आपराधिक पृष्‍ठभूमि वाले उम्‍मीदवारों के चयन का कारण अपनी वेबसाइटों पर अपलोड करें। साथ ही, कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को भी चेताया है कि इन निर्देशों का पालन नहीं किए जाने को अदालत की अवमानना माना जाएगा। ऐसे में यदि पार्टियों ने कोर्ट के निर्देश का पालन नहीं किया तो निर्वाचन आयोग इस मामले को कोर्ट तक ले आएगी।

सियासी पार्टियों के लिए गाइडलाइन

कोर्ट ने सियासी पार्टियों के लिए गाइडलाइन जारी की हैं। कोर्ट ने कहा है कि पिछले चार आम चुनावों से राजनीति में आपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। इसके अनुसार, यदि राजनीतिक दलों द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट दिया जाता है तो उसका आपराधिक विवरण पार्टी की वेबसाइट पर और सोशल मीडिया पर देना होगा। साथ ही, उन्‍हें यह भी बताना होगा कि किसी बेदाग को टिकट क्यों नहीं दिया गया।

सोशल मीडिया पर भी देना होगा डिटेल

जस्टिस एफ नरीमन की अध्‍यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने राजनीतिक पार्टियों को यह भी निर्देश दिया है कि राजनीतिक पार्टियां ऐसे उम्‍मीदवारों के विवरण को फेसबुक और ट्विटर जैसे विभिन्न सोशल मीडिया प्‍लेटफार्म पर भी शेयर करें। इसके अलावा एक स्‍थानीय व एक राष्‍ट्रीय अखबार में भी इस विवरण को प्रकाशित किया जाए। शीर्ष कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे उम्‍मीदवारों के चयन के बाद 72 घंटों के भीतर उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर राजनीतिक पार्टियों को इस बारे में चुनाव आयोग को सूचित करना होगा।

पटेल को कैबिनेट में नहीं लेना चाहते थे नेहरू: खुलासे के बाद बिफरे गुहा को विदेश मंत्री ने लताड़ा

केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बुधवार (फरवरी 12, 2020) को एक पुस्तक का विमोचन किया। ये पुस्तक स्वतंत्र भारत के पहले गृह सचिव वीपी मेनन की जीवनी है। इसे इतिहासकार नारायणी बसु ने लिखा है। जयशंकर ने इस दौरान कहा कि ये पुस्तक ‘नेहरू के मेनन’ और ‘पटेल के मेनन’ के बीच के अंतर को बयाँ करती है। बता दें कि सरदार पटेल देश के पहले गृहमंत्री थे, जिनके अंतर्गत वीपी मेनन ने काम किया था। जूनागढ़ और हैदराबाद को भारत में मिलाने वाले कार्य में भी मेनन ने पटेल का सहयोग किया था।

जम्मू कश्मीर को लेकर भी मेनन उस वक्त नेहरू और पटेल को सलाह दिया करते थे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि नारायणी बसु द्वारा लिखी गई पुस्तक में एक ऐतिहासिक हस्ती के साथ न्याय किया गया है, जो काफ़ी पहले हो जाना चाहिए था। इस किताब में एक और बड़ा खुलासा हुआ है। इससे पता चलता है कि जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि सरदार पटेल उनके मंत्रिमंडल में शामिल हों। वो पटेल को पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में लेना ही नहीं चाहते थे। एस जयशंकर ने किताब के इस अंश को उद्धृत किया।

विदेश मंत्री ने कहा कि राजनीतिक मामलों से जुड़ा इतिहास लिखने वाला कार्य ईमानदारी के साथ किया जाना चाहिए, पूर्व में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों को समझाते हुए। उन्होंने बताया कि वीपी मेनन ने कहा था कि जब सरदार पटेल की मृत्यु के बाद उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक बड़े कार्यों व उनकी यादों को मिटाने के लिए जानबूझ एक एक कुत्सित अभियान चलाया गया। मेनन कहते थे कि उन्होंने इस अभियान को देखा था और कई बार वो इसका निशाना भी बन गए थे।

देश के प्रथम कैबिनेट की सूची जब बनी थी, तब नेहरू ने पटेल को उस सूची से हटा दिया था। जयशंकर ने कहा कि ये चर्चा का विषय है। इस पर बहस होनी चाहिए कि आखिर नेहरू क्यों पटेल को मंत्री नहीं बनाना चाहते थे? बकौल केंद्रीय विदेश मंत्री, लेखिका ने इस विषय पर विस्तार से लिखा है और वो भी सबूत के साथ। हालाँकि, कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा को ये सब पसंद नहीं आया।

ख़ुद को मातम गाँधी मामलों का विशेषज्ञ बताने वाले गुहा ने प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द प्रिंट’ में प्रोफेसर श्रीनाथ राघवन द्वारा लिखे गए एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि नेहरू द्वारा सरदार पटेल को मंत्री न बनाने वाली बात झूठ है, मिथक है। उन्होंने कहा कि उक्त लेख में इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक बताया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के विदेश मंत्री फेक न्यूज़ का प्रसार कर रहे हैं और आधुनिक भारत के दो निर्माताओं के बीच की ‘दुश्मनी’ की झूठी बातें कर रहे हैं। उन्होंने जयशंकर को सलाह दी कि उन्हें ये चीजें भाजपा आईटी सेल के लिए छोड़ देना चाहिए क्योंकि ये भारत के विदेश मंत्री का कार्य नहीं होता है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फर्जी इतिहासकार रामचंद्र गुहा के इस आरोप का करारा जवाब दिया। उन्होंने उन्हें कहा कि कुछ विदेश मंत्री ढेर सारी किताबें पढ़ते हैं और प्रोफेसरों के लिए भी ये अच्छी आदत हो सकती है। उन्होंने गुहा को सलाह दी कि वो नारायणी बसु द्वारा लिखित वीपी मेनन की जीवनी पढ़ें, जिसका उन्होंने विमोचन किया है।

BJP MLA जो 30000 की बढ़त के बाद भी हार गए: दिल्ली में मुस्लिम ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा सबूत

रिपोर्ट की शुरुआत एक सवाल से करते हैं। अगर रैंडम चुना जाए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुछ 7000 लोगों को, तो उनमें से कितने भाजपा समर्थक निकलेंगे? हालिया आम चुनाव में भाजपा को मिले 38.5% वोटों को दृष्टिगत रखा जाये , तो यह संख्या लगभग 2700 होनी चाहिए। वास्तविक संख्या इससे कुछ कम या कुछ ज्यादा हो सकती है। लेकिन अगर यह संख्या 6000 या 1000 हो फिर? अचरज होगा, है न!

अब अगर यह संख्या मात्र 5 निकले फिर? लगभग असम्भव लग रहा.. है न ?

पर ऐसा हुआ दिल्ली की मुस्तफाबाद विधानसभा मतगणना के दौरान। .

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मुस्तफाबाद मतगणना राउंड 14

दोनों दलों को मिले वोटों की स्थिति इस राउंड तक इस प्रकार थी कि भाजपा उम्मीदवार और सिटिंग विधायक जगदीश प्रधान अपने आम आदमी पार्टी प्रतिद्वंद्वी के ऊपर 30000 मतों से ज्यादा की बढ़त बना चुके थे, और असेम्बली चुनाव में 30000 मतों की बढ़त अमूमन निर्णायक सिद्ध होती है।

लेकिन इसके बाद कुछ आश्चर्यजनक घटित हुआ, बतौर उदाहरण राउंड 19 की मतगणना के आंकड़ें ये रहे :

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मुस्तफाबाद मतगणना राउंड 19

इस राउंड में आप के हाजी यूनुस को 7904 और भाजपा को केवल 36 वोट मिले। यह पैटर्न राउंड 14 से 23 तक लगातार कंटिन्यू रहा। हर बार AAP के प्रत्याशी को मिलते हजारों वोटों की तुलना में भाजपा तिहाई की संख्या तक पहुँचने के लिए भी संघर्ष करती नजर आई।

अंततः राउंड 23 तक आते आते भजपा के लिए खेल समाप्त हो चुका था। कैसे और क्यों हुआ ये?

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Round 23 in Mustafabad

इस राउंड में हाजी को 6878 वोट मिले वहीं बीजेपी को मात्र 5! और इस तरह हाजी 20000 वोटों की बढ़त बना, चुनाव जीतने की तरफ बढ़ गए।

क्या वोटिंग का यह पैटर्न किसी तकनीकी खराबी के कारण था या बिल्कुल अपेक्षित, जिस कारण बीजेपी ने चुपचाप बिना किसी भारी मन या शिकवे शिकायत के इसको स्वीकार कर लिया।

जी.. यह बिल्कुल अपेक्षित था, उस क्षेत्र की डेमोग्राफी को देखते हुए।

आम आदमी पार्टी की जीत के पीछे मचते सारे हल्ले और दिए जा रहे सारे ज्ञान की चकाचौंध में जो बातें मिस हो रहीं, मुस्तफाबाद की वोटिंग का यह पैटर्न उन सबको हाईलाइट में लाने का काम कर सकता है बशर्ते हम इस आँकड़े के पीछे छुपी इबारत पढ़ने-समझने के प्रति इच्छुक हों।

सैद्धांतिक तौर पर देखें तो वोट देते समय मुद्दे के आधार पर वोट करें, या कैंडिडेट के आधार पर, मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री की सीट पर कौन बैठेगा इसको सोच कर वोट करें या सांसद/विधायक कौन बनने जा रहा, इस आधार पर वोट करें, यह हमेशा ही एक कठिन पहेली हो सकती है।

फिर कुछ आयाम और विषय उस वक्त अँधेरे में भी हो सकते हैं, जिस समय हम वोट डाल रहे होते हैं!

जैसे महाराष्ट्र में शिव सेना को वोट करते वक़्त मतदाता को नहीं पता था कि उसका वोट कॉन्ग्रेस को जा रहा!

इन सभी आयामों को अगर मिलजुला कर देखें तो समझ आता है कि डेमोक्रेसी कितनी संवेदनशील और क्षणभंगुर जैसी हो सकती है। और इसकी इन कमियों को सिंगल इशू वोटर्स किस आसानी से अपह्रत कर सकते हैं। जैसे मुस्तफाबाद से जीते हाजी को पता है कि उसको मिले 6878, बीजेपी और मिले 5 के पीछे की वजह स्कूली शिक्षा में हुए कथित सुधारों या फ्री हुए बिजली पानी बस मेट्रो के कारण नहीं, अपितु किन्हीं अन्य कारणों के कारण ही सम्भव हो पाया है।

इस नतीजे और वोटिंग पैटर्न से पता चलता है कि अपने मुद्दे के प्रति समर्पित सिंगल इशू वोटर्स किस तरह बहुसंख्यक वोटर्स पर भारी पड़ सकता है।

ओखला सीट से आप उम्मीदवार अमानतुल्ला खान की 1 लाख से अधिक की जीत के पीछे क्या ओखला की समृद्धि जिम्मेदार है? क्या ओखला में बेस्ट स्कूल्स और अस्पताल हैं? शायद नहीं।

यह फिनॉमिना सिर्फ दिल्ली तक नहीं सीमित है। हैदराबाद में पिछले 30 वर्षों से कब्जा जमाये ओवैसी परिवार की MIM पार्टी क्या हैदराबाद जैसे मेट्रोपोलिस में जीतनी चाहिए? शायह नहीं। लेकिन MIM वहां लगातार जीतती जा रही क्योंकि हैदराबाद के सबसे पिछड़े इलाके पुराने हैदराबाद शहर के सिंगल इशू वोटर्स पर ओवैसी परिवार का होल्ड है। वैसे क्या कभी आपने किसी लिबरल के मुँह से हैदराबाद में होते ध्रुवीकरण के बारे में सुना है?

चुनाव आते जाते रहते हैं। दिल्ली की इस मुस्तफाबाद सीट से अगर बीजेपी जीत भी जाती तब भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर सिर्फ हार जीत से अलग हट वोटर्स के सोचने के तरीके पर गौर करें तो समझ आएगा कि जहाँ एक ओर सिंगल इशू वोटर्स जहाँ आज हैं वहीं कल होंगे, और इस प्रकार आज नहीं तो कल डेमोक्रेसी की कमियों का फायदा उठा अपनी मनमर्जी उन बहुसंख्यक वोटर्स पर थोप सकेंगे जो वोट करते समय कई तरह के मूडस्विंग से गुजरते रहते हैं।

बतौर उदाहरण शाहीन बाग़ की बात करते हैं। मीडिया ने अब उस पर बात करनी बंद कर दी है। लेकिन याद रहे कि किस तरह वहाँ 4 महीने के एक बच्चे की मौत का जश्न मनाया गया, जहाँ धीरे धीरे कतरा कतरा उससे साँसे छीनी गईं। पर न उसकी माँ को कोई अफ़सोस न बाकियों को! मानवता के खिलाफ इस बर्बर हमले को किस कदर सेलिब्रेट किया गया है वह यह दर्शाता है कि सिंगल इशू वोटर्स अपने मुद्दे के प्रति किस हद तक समर्पित हैं।

हो सकता है कि आप सिंगल इशू वोटर न हों। आपकी प्राथमिकताएँ अलग हो सकती हैं। हो सकता है कि आप फिलहाल के लिए इन सिंगल इशू वोटर्स के साथ समझौते करने को इच्छुक हों पर याद रहे समझौते हमेशा आपको ही करने होंगे! यदि कोई माँ अपने बच्चे को अपने मुद्दे के लिए मारने पर सहर्ष उतारू हो सकती है तो फिर ऐसी जमात से यह उम्मीद करना कि वो आपके मुद्दों पर किसी प्रकार के समझोतों को तैयार होगी, कभी भी… यह असम्भव है। सिंगल इशू वोटर्स एक इंच भी खुद के एजेंडे से पीछे हटने वाले नहीं हैं, न वो पूरा 100% जीतने तक रुकने ही वाले हैं। भले इसमें 5 वर्ष लगें या 100 वर्ष, लेकिन जीत सिंगल इशू वोटर्स की भी होगी।

दिसंबर में फेक न्यूज साबित हुई खबर को इंडिया टुडे ने वापस चलाया: दलितों ने नहीं अपनाया इस्लाम

‘इंडिया टुडे’ ने एक महीने पुरानी फर्जी ख़बर दोबारा चलाई है, जिसमें कहा गया है कि तमिलनाडु के कोयम्बटूर में दीवार गिरने से 17 दलितों की मौत के बाद 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है। दिसंबर में धर्मान्तरण की ये फेक ख़बर ख़ूब शेयर हुई थी। उस समय 3000 लोगों के मजहबी धर्मान्तरण के आँकड़े दिए जा रहे थे। ‘इंडिया टुडे’ ने संगठन ‘तमिल पुलिगल कच्ची’ के हवाले से लिखा कि 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है और कई अन्य इसी राह पर हैं। साथ ही ये भी लिखा गया कि क्षेत्र के दलितों ने भेदभाव की बात कही है। कुछ दलितों के बयान भी प्रकाशित किए गए हैं।

ऑपइंडिया ने दिसंबर में ही इसका ‘फैक्ट-चेक’ किया था, जिसमें बताया गया था कि कोयम्बटूर के दलितों ने इस ख़बर में किये गए दावों को ख़ारिज कर दिया है। उन्होंने इस्लाम अपनाने की बात से इनकार कर दिया था। उस समय भी ‘आजतक’ ने ये ख़बर चलाई थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, तमिल पुलिगल काटची नामक संगठन के महासचिव इलवेनिल ने रविवार को उनसे बातचीत की थी। जिसमें उन्होंने कथित धर्म परिवर्तन को दलितों के साथ होते भेदभाव के ख़िलाफ़ एक जन-आंदोलन बताया था। उन्होंने कहा कि जाति की ‘दीवार गिराने’ के लिए अब उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन, जब इस ‘इस्लाम स्वीकारने’ के संबंध में गाँव के लोगों से बात की गई तो उन्होंने संगठन से बिलकुल हटकर जवाब दिया।

इसी क्रम में नांदुरा आदि द्रविड़ गाँव के 70 वर्षीय एम सुब्रमणियम ने बताया था कि उनके पास इस्लाम कबूल करने की कोई वजह नहीं हैं। उन्होंने कहा, “हर धर्म अच्छा है। इस्लाम उनके लिए अच्छा है, हिदूत्व हमारे लिए। हम क्यों परिवर्तित हों। घटना (दीवार गिरने से 17 लोगों की मौत) के बाद कई संगठनों ने हमसे संपर्क किया। जिसके लिए हमने उनका धन्यवाद दिया। लेकिन राजनीति के लिए हमारा इस्तेमाल क्यों हो?”

दलितों के इस्लाम अपनाने की ख़बर फर्जी साबित हो चुकी है: ‘इंडिया टुडे’ ने फिर चलाया

वहीं, मनियम्मा नामक निवासी ने कहा था, “हमारे इलाके में बहुसंख्यक आबादी में लोग राम के भक्त हैं। यहाँ मरघाजी माह में तो हम माँस तक नहीं खाते। हमारे इलाके में एक भी मुस्लिम नहीं हैं और न ही किसी ने हमें धर्म परिवर्तन के लिए संपर्क किया है। सब एकदम झूठ है।”

एक बार ख़बर के झूठा साबित होने के बावजूद ‘इंडिया टुडे’ ने इसे दोबारा क्यों चलाया, ये समझ से पड़े है। फर्जी स्टिंग ऑपरेशन से लेकर राजदीप के स्टूडियो में नाचने तक, दिन प्रति दिन मीडिया संस्थान अपनी साख खोते जा रहा है। ऐसे में इससे यही अपेक्षित भी है।

CAA पर ताबड़तोड़ झूठ: लोगों को भड़का कर सरकारी कर्मचारियों पर हमले करवाने की फिराक में YoYa?

ख़ुद को किसान नेता बताने वाले योगेंद्र यादव ने सीएए और एनआरसी को लेकर एक बार फिर से झूठ फैलाया है। ये कथित बुद्धिजीवी जनता को बरगलाने में इतना व्यस्त हो गए हैं कि अब वो एक ही झूठ हज़ार बार बोल कर उसे जनता के मन में सच की तरह बिठाने में लग गए हैं। ‘स्वराज इंडिया’ के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने पाँच उँगलियों पर गिन कर सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ जनता को भड़काया। योगेंद्र यादव ने कहा कि अप्रैल के महीने में कोई सरकारी कर्मचारी या स्कूली शिक्षक आएँगे, जो नाम, जन्मस्थान माता-पिता के जन्मस्थान, आधार नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस वगैरह जैसी जानकारी माँगेंगे।

इस दौरान योगेंद्र यादव ने पहला झूठ तो ये बोला कि एनपीआर के दौरान किसी से उसके माता-पिता के जन्मस्थान के बारे में जानकारी माँगी जाएगी। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। एनपीआर के द्वारा लोगों का एक ‘आइडेंटिटी डेटाबेस’ तैयार किया जाएगा। ख़बरों की मानें तो इसमें ये जानकारियाँ देनी होंगी- नाम, जन्मदिन, जन्मस्थान, माता-पिता का नाम, पतिपत्नी का नाम (शादीशुदा के लिए), पता, पेशा और शैक्षिक योग्यता। इनमें माता-पिता के जन्मस्थान संबंधी कोई जानकारी है ही नहीं।

इससे साफ़ पता चलता है कि योगेंद्र यादव जनता को भड़का कर जनगणना की रूटीन प्रक्रिया को बाधित करना चाह रहे हैं। ऐसे ही प्रयासों के कारण ‘नेशनल इकोनॉमिक सेन्सस’ के लिए डेटा इकठ्ठा कर रही राजस्थान के कोटा में एक महिला नज़ीरा बानो पर हमला कर दिया गया। जब उन्होंने भीड़ को बताया कि वो भी मुस्लिम हैं, तब जाकर लोगों ने उन्हें छोड़ा। नजीरा का मोबाइल फोन छीन लिया गया और सारे डेटा भी डिलीट कर दिए गए। इसी तरह पश्चिम बंगाल के बीरभूम में गूगल और टाटा के ‘इंटरनेट साथी’ के तहत महिलाओं के साक्षरता का डाटा इकठ्ठा कर रहीं चुमकी खातून का घर जला डाला गया। महिला को परिवार सहित पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी।

इन दोनों घटनाओं का शिकार मुस्लिम महिलाएँ बनीं। देश के अलग-अलग इलाक़ों की मुस्लिम महिलाएँ। एक तो मुस्लिमों में साक्षरता दर कम है, ऊपर से उनकी महिलाओं के मामले में ये आँकड़ा और भी भयावह है। और जब वो सरकार व प्राइवेट कंपनियों के लिए जनहित का काम कर रही हैं, तो उन पर हमला होता है। क्यों? क्योंकि लोगों ने समझा कि वो एनआरसी के लिए डेटा इकठ्ठा कर रही हैं। लोगों को तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा इस कदर भड़का दिया है कि इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं। फिर तो जन-कल्याणकारी योजनाओं के सारे सर्वे रुक जाएँगे और अराजकता का माहौल फ़ैल जाएगा।

यही तो ये बुद्धिजीवी चाहते हैं। योगेंद्र यादव ने भी यूँ ही जनता को भड़काने का काम किया है, ताकि जनगणना और एनपीआर जैसी रूटीन प्रक्रियाएँ बंद हो जाएँ, बाधित हों। और एनपीआर के लिए भाजपा तो दोषी है ही नहीं। इसे एनआरसी से कॉन्ग्रेस ने जोड़ा था। भाजपा सरकार ने तो हटाया है इसे एनआरसी से। सरकार कह चुकी है कि इसका एनआरसी से कोई जुड़ाव नहीं। एनपीआर के तहत जुलाई 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल रजिस्टर होने वाली पहली नागरिक बनी थीं। तब यूपीए-2 की सरकार थी। उस समय इन बुद्धिजीवियों ने हमला क्यों नहीं किया सरकार पर?

योगेंद्र यादव ने वीडियो में आगे कहा कि जब डेटा सरकारी दफ्तरों में पहुँचेगा तो उनमें से कुछ लोगों के आगे ‘चुपचाप’ सरकारी कर्मचारी ‘D’ लगा देंगे, यानी ‘Doubtful’ या संदेहास्पद, फिर इसके बाद उन्हें नोटिस जाएगा कि की साबित करें कि वो भारत के नागरिक हैं। फिर योगेंद्र यादव कहते हैं कि उन्हें भारत की नागरिकता साबित करने के लिए राशन कार्ड, आधार कार्ड कुछ भी दिखाने से काम नहीं चलेगा, उनसे सरकारी प्रमाण-पत्र माँगा जाएगा। इसके बाद वो असम का उदाहरण गिनाते हैं, जहाँ वोटर लिस्ट में नाम होने के बावजूद लोगों को भारत का नागरिक नहीं माना गया। यादव ने कहा कि 30 साल पहले के सरकारी प्रमाण-पत्र और संपत्ति का प्रमाण-पत्र जुटाना होगा। फिर वो पूछते हैं कि ग़रीब कहाँ से ये सब लेकर आएगा?

यहाँ योगेंद्र यादव ने एक साथ ताबड़तोड़ कई झूठ बोले। असम में एनआरसी लागू हुई है, वहाँ डाक्यूमेंट्स की दो सूचियाँ बनाई गई हैं। दोनों में से एक-एक ही दिखाने हैं। पहली सूची में 14 डॉक्युमेंट्स में से कोई एक और दूसरी सूची में 8 डाक्यूमेंट्स में से कोई एक। ये डाक्यूमेंट्स मार्च 1971 के कट-ऑफ डेट के पहले के होने चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि असम एकॉर्ड में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ही ये तारीख दी गई थी। पूरे भारत के लिए एनआरसी लागू ही नहीं हुई है और कोई नियम-क़ानून आया ही नहीं है इस सम्बन्ध में, फिर योगेंद्र यादव जैसे लोग पूरी प्रक्रिया मालूम होने के दावे कैसे कर रहे हैं?

योगेंद्र यादव ने सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लेकर बोला ताबड़तोड़ झूठ

योगेंद्र यादव ने कहा कि कोई सरकारी कर्मचारी ‘चुपचाप’ नामों को संदिग्ध वाली सूची में डाल देगा। एनपीआर के 2003 के नियमों के अनुसार, ‘संदिग्ध नागरिक’ का प्रावधान तो है लेकिन इस बार ऐसा कुछ करने के बारे में सरकार ने कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है। इसीलिए बिना प्रक्रिया जाने, योगेंद्र यादव लोगों को भड़काने में लगे हुए हैं। असम के मामले में पूरी प्रक्रिया काफी अच्छे तरीके से परिभाषित की गई है और उसी अनुसार काम हो रहा है। सरकारी प्रक्रिया ‘चुपचाप’ पूरी नहीं की जाती, हर चीज के पीछे कारण बताए जाते हैं और पूर्व-निर्धारित नियम के अनुसार ही काम होता है।

इसके बाद योगेंद्र यादव का वही पुराना झूठ चालू हो जाता है- मुस्लिमों को नागरिक नहीं माना जाएगा क्योंकि यहाँ से सीएए का खेल शुरू हो जाएगा और हिन्दू बच जाएँगे। सरकार कई बार कह चुकी है कि सीएए और एनआरसी के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी लगातार झूठ पर झूठ बोला जा रहा है। सीएए विदेशी अल्पसंख्यकों के लिए है, जो भारत में शरणार्थी बन कर वर्षों से रह रहे हैं और जिन पर मजहब के आधार पर अत्याचार किया गया है। जबकि एनआरसी अभी पूरे देश के लिए आई ही नहीं है। फिर हंगामा क्यों? क्या देश में होने वाली हर रूटीन सरकारी प्रक्रिया को भी एनआरसी से जोड़ा जाएगा।

दरअसल, योगेंद्र यादव सरीखे लोग विकास नहीं होने देना चाहते हैं। ‘उज्ज्वला’ के तहत हर घर में गैस पहुँचने और ‘सौभाग्य’ के द्वारा हर घर में बिजली पहुँचाए जाने से ये लोग मोदी सरकार से खफा हैं। ऐसी कई योजनाएँ हैं, जिनका सीधा लाभ जनता को मिल रहा है। साक्षरता से लेकर बच्चों के पोषण-कुपोषण तक, हज़ार तरह के सर्वे सरकार कराती रहती है और फिर उसी हिसाब से योजनाओं की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसमें हजारों कर्मचारी, शिक्षक और आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता लगे रहते हैं। यादव जैसे लोगों के भड़काने के कारण कल को अगर इन लोगों पर एक भी हमले हों तो इन बुद्धिजीवियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

FATF द्वारा ब्लैकलिस्ट होने से बचने के Pak ने लिए हाफिज सईद पर की कार्रवाई: भारत ने जताई आशंका

पाकिस्तानी कोर्ट द्वारा आतंकी हाफ़िज सईद को सजा सुनाए जाने के फैसले पर भारत ने अपनी सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। भारत ने कहा है कि आगामी दिनों में FATF बैठक होनी है, ऐसे समय में पाकिस्तान कोर्ट द्वारा हाफ़िज पर कार्रवाई करना एक दिखावा भी हो सकता है।

भारत की तरफ से कहा गया है कि पाकिस्तान की एक अदालत ने आतंकी वित्तपोषण मामले में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी के रूप में नामित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियुक्त आतंकवादी हाफिज सईद को सजा सुनाई है। यह पाकिस्तान के लंबे समय से लंबित अंतरराष्ट्रीय दायित्व का हिस्सा है, ताकि आतंकवाद का समर्थन किए जाने पर लगाम लग सके, लेकिन इस फैसले को FATF बैठक से ठीक पहले लेना गौर करने वाली बात है।

भारत ने कहा है कि, यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या पाकिस्तान अपने नियंत्रण में आने वाले सभी आतंकवादी संगठनों और क्षेत्रों से काम करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेगा और मुंबई और पठानकोट सहित सीमा पार आतंकवादी हमलों के अपराधियों को पाकिस्तान क्या त्वरित न्याय दिलाएगा। सरकार की तरफ से कहा गया है कि यह फैसला FATF की बैठक से पहले लिया गया है, जिसे नोट किया जाना चाहिए।

दरअसल माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने यह कदम अंतरराष्ट्रीय संस्था एफएटीएफ (FATF) की कार्रवाई से बचने के लिए मजबूरन उठाया है, क्योंकि फिलहाल पाकिस्तान को ग्रे की सूची में डाला गया है। वहीं संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए पाकिस्तान पर लगातार दवाब बनाया जा रहा था।

आपको बता दें कि मुंबई हमले के मास्टर माइंड और जमात उल दावा प्रमुख हाफिज सईद को पाकिस्तान की एक अदालत ने टेरर फंडिग के एक मामले में 5 साल, वहीं दूसरे मामले में 5 साल 5 महीने की सज़ा सुनाई है। पाकिस्तान की लाहौर कोर्ट ने सजा सुनाने के साथ ही हाफिज सईद पर दोनों मामलों में 15-15 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

गौरतलब है कि 26 नवंबर 2008 को भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में लश्कर के 10 आतंकियों ने हमला किया था, जिसमें 166 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और 300 से अधिक लोग घायल हो गए थे। मरने वालों में विदेशी नागरिक भी शामिल थे। इस घटना के बाद अमेरिका ने हाफिज को ब्लैक लिस्ट तो किया ही साथ ही उस पर इनाम भी घोषित किया था।

शाहीन बाग के मास्टरमाइंड शरजील इमाम का होगा वॉयस टेस्ट, देशविरोधी भाषणों से किया जाएगा मिलान

पिछले दिनों अपने भाषणों में देश विरोधी भाषण देकर चर्चा में आए शरजील इमाम का अब आवाज का नमूना भी लिया जाएगा। इसके लिए कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को अनुमति दे दी है। वहीं बुधवार को कोर्ट में पेश हुए शरजील को 14 दिनों की न्यायायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को पुलिस को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार जेएनयू छात्र शरजील इमाम की आवाज का सैंपल लेने की अनुमति दे दी है। पुलिस इस सैंपल का मिलान उस वीडियो क्लिप से करेगी जिस पर भड़काउ बयान देने का आरोप लगा था। मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम पाठक ने दिल्ली पुलिस के एक आवेदन पर आदेश दिया और निर्देश दिया कि आरोपी जो फिलहाल न्यायिक हिरासत में है, उसे 13 फरवरी को सीएफएसएल में पेश किया जाए।

जेएनयू से पीएचडी कर रहे शाहीन बाग के मास्टरमाइंड शरजील इमाम ने पिछले महीने सीएए के विरोध में शाहीन बाग और एएमयू में आयोजित धरने में देशविरोधी भाषण दिए थे। इसके बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए शरजील के वीडियो को देख पुलिस ने शिकायत के आधार पर दोशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। दरअसल शरजील वीडियो में भारत से पूर्वोत्तर के राज्यों को काटने की बात कर रहा था। इसके बाद शरजील को दिल्ली पुलिस ने बिहार के जहानाबाद से 28 जनवरी को गिरफ्तार किया था।

शरजील इमाम के बैंक खातों से मिले विदेशी फंडिंग के संकेत, क्राइम ब्रांच ने शुरू की जाँच

शरजील के फोन से चौंकाने वाले खुलासे, जामिया और एएमयू के छात्रों सहित 15 पर कसा शिकंजा

भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता है शरजील इमाम, पूछताछ में माना- वीडियो से नहीं हुई छेड़छाड़

गार्गी कॉलेज यौन उत्पीड़न केस: पुलिस ने 10 छात्रों को किया गिरफ्तार, जाँच के लिए बनाई 11 टीमें

गार्गी कॉलेज में पिछले दिनों हुए छेड़खानी की घटना के विरोध में छात्राओं का चल रहा धरना प्रदर्शन अब तेज हो गया है। वहीं पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए 10 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही मामले का खुलासा करने के लिए दिल्ली पुलिस ने 11 टीमों को दिन-रात जाँच में लगा दिया है।

पुलिस उपायुक्त अतुल कुमार ठाकुर ने बताया कि इस मामले में पुलिस की 11 टीमें जाँच कर रही हैं। साथ ही अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त गीतांजलि खंडेलवाल की टीम ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और मोबाइल सर्विलांस की मदद से 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने यह भी बताया कि, गिरफ्तार आरोपित वारदात वाली रात सीसीटीवी में जबरन कॉलेज में प्रवेश करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ ही आरोपितों की पहचान छात्राओं से करवाने के बाद ही उनसे मामले की पूछताछ भी की जा रही है।

इस बीच पुलिस टीम ने 57 छात्राओं से बयान लिए है। इन बयानों के आधार पर पुलिस टीम ने यह जानकारी जुटाई कि पार्टी में कितने लोग कैसे-कैसे शामिल हुए थे। इसके अलावा कॉलेज के सुरक्षाकर्मियों से पूछताछ के बाद पुलिस को कई अहम सुराग भी मिले है। सुरक्षाकर्मियों ने ही वीडियो फुटेज की मदद से आरोपितों की पहचान करवाने में पुलिस की मदद की है।

उधर बुधवार को पूरे दिन कॉलेज की छात्राओं का कॉलेज प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी जारी रही। साथ ही प्रदर्शन कर रही छात्राएं लगातार घटना के विरोध में कॉलेज प्रिंसिपल के इस्तीफे की माँग कर रही हैं। वहीं कॉलेज प्रिंसिपल प्रमिला कुमार का कहना है कि हम प्रदर्शनकारी छात्राओं से लगातार बातचीत कर रहे हैं और परिसर में सब कुछ सामान्य है। पूरे मामले से दिल्ली पुलिस को अवगत करा दिया गया है।

वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी प्राचार्यों को परामर्श जारी कर छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा है। विश्वविद्यालय ने 10 फरवरी को जारी परामर्श में कॉलेजों को दो सप्ताह के भीतर छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देने के लिए भी कहा है। डीयू ने गार्गी कॉलेज में हुई घटना की निंदा करते हुए पुलिस से इस घटना में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। परामर्श में कहा गया है कि डीयू ने कॉलेज की प्राचार्य से इस मामले में की गई कार्रवाई पर रिपोर्ट भी माँगी है।

आपको बता दें कि गार्गी कॉलेज में आयोजित तीन दिवसीय वार्षिक फेस्ट का छह फरवरी को अंतिम दिन था। कुछ छात्राओं ने कॉलेज प्रशासन से छेड़छाड़ की शिकायत दी थी। उन्होंने बताया था कि कॉलेज परिसर में दोपहर को जबरन घुसे बाहरी लोगों ने छात्राओं के सामने अश्लील हरकत कर छेड़छाड़ की। इस घटना पर गुस्सा जाहिर करते हुए उन्होंने इसे सुरक्षा में भारी चूक करार दिया था। वहीं इसके बाद घटना को लेकर कॉलेज प्रशासन हरकत में आया और मामले में पुलिस से शिकायत की गई। वहीं कॉलेज की प्रिंसिपल ने पूरे मामले की जाँच के लिए एक हाई लेवल फैक्ट फाइंडिग कमेटी भी बनाई है।

गार्गी कॉलेज में छेड़-छाड़ जरूर हुई, लेकिन धार्मिक नारों की बात सिर्फ वामपंथी मीडिया की करामात है

थरूर के बाद अब राहुल गाँधी ने शेयर किया भारत का ग़लत नक्शा, J&K को दिखाया पाकिस्तान का अंग

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कोरोना वायरस को लेकर मोदी सरकार पर हमला तो बोला लेकिन इस दौरान वो बड़ी ग़लती कर गए। राहुल ने इस दौरान जो भारत का नक्शा शेयर किया, उसमें जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से को पाकिस्तान का भाग दिखाया गया है। इसके बाद भाजपा नेताओं व अन्य लोगों ने राहुल को निशाने पर लिया। राहुल गाँधी ने हार्वर्ड के एक रिसर्च रिपोर्ट के हवाले से मोदी सरकार पर निशाना साधा था। इस रिपोर्ट में विश्व के नक़्शे में उन देशों को चिह्नित किया गया था, जिनके कोरोना वायरस की लपेट में आने के ज्यादा चांस हैं। इनमें से एक भारत भी है।

राहुल गाँधी ने अपनी ट्वीट में कहा कि कोरोना वायरस से भारत के लोगों और यहाँ की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा ख़तरा है। उन्होंने दावा किया कि उनकी समझ कहती है कि मोदी सरकार इससे निपटने के लिए कुछ ख़ास नहीं कर रही है। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए समय पर कार्रवाई की जाए। लेकिन, इतना सारा ज्ञान देने के चक्कर में उन्होंने भारत का ऐसा नक्शा शेयर कर दिया, जिसमें खिलवाड़ किया गया था।

लोगों ने राहुल गाँधी से पूछा कि क्या वो जम्मू कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानते? क्या वो नहीं मानते कि पीओके भारत का ही हिस्सा है, जिसपर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा कर रखा है? वैसे ये पहला मौका नहीं है जब कॉन्ग्रेस के कसी नेता ने भारत का ऐसा नक्शा शेयर किया हो। इससे पहले दिसंबर 2019 में तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर ने भारत का ऐसा ही नक्शा शेयर किया था, जिसमें जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान का भाग दिखाया गया था। उन्होंने सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते हुए ऐसा किया था।

राहुल गाँधी ने विरोध के बाद अपना ट्वीट डिलीट कर लिया है

हाल ही में फ़िल्म निर्देशक व अभिनेता फरहान अख्तर ने भी सीएए को लेकर सरकार पर हमला बोलने के क्रम में भारत का छेड़छाड़ किया हुआ नक्शा शेयर कर दिया था। विरोध होने के बाद राहुल गाँधी ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। उन्होंने फिर से दोबारा बिना नक़्शे वाला ट्वीट किया और कोरोना वायरस को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा। हालाँकि, राहुल गाँधी ने अभी तक इस पर माफी नहीं माँगी है।

AAP की जीत पर स्टूडियो में नाचता है राजदीप, मोदी की जीत पर लड्डू खिलाने वाले की छिनती है नौकरी

क्या मीडिया में राइट विंग समर्थक पत्रकारों को ठिकाने लगाया जा रहा है? पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जो इसी बात की तरफ़ इशारा करते हैं। कुछ प्रमुख मीडिया समूहों में दक्षिणपंथी पत्रकारों को नौकरी से निकालने या साइडलाइन किए जाने की रिपोर्ट्स मिल रही हैं। ऑपइंडिया ने ऐसे कुछ लोगों से बात की और जो जानकारी सामने आई है वो चौंकाने वाली है।

ख़ुद को सबसे तेज़ बताने वाला मीडिया ग्रुप इस अभियान में सबसे आगे है। बताया जा रहा है कि यहाँ पर लोकसभा चुनावों के पहले ही दक्षिणपंथी पत्रकारों की लिस्ट तैयार कर ली गई थी और माना जा रहा था कि चुनाव में नरेंद्र मोदी के हारते ही इन लोगों की नौकरी जानी तय है। चुनाव में बीजेपी की जीत से इस प्लान को झटका लगा, लेकिन पिछले कुछ महीनों में अलग-अलग बहानों से या आरोप लगाकर उन्हें निकाला जा रहा है। मैनेजमेंट का संदेश है कि जो लोग भी उनके आदेश के मुताबिक़ एकतरफ़ा ख़बर लिखने या दिखाने को तैयार नहीं होंगे उन्हें जाना होगा। इसी तरह एक केंद्रीय मंत्री की बहन के न्यूज़ चैनल से भी एक पत्रकार को नौकरी छोड़ने को मजबूर कर दिया गया, क्योंकि वो नागरिकता क़ानून और ऐसे दूसरे मुद्दों पर मैनेजमेंट की लाइन से सहमत नहीं थे। कई दूसरे मीडिया समूहों में भी कमोबेश यही हालात बताए जा रहे हैं।

चुन-चुनकर बनाया जा रहा है निशाना

हमें बताया गया कि ‘सबसे तेज़’ समूह ने यह अभियान लोकसभा चुनाव से पहले ही शुरू कर दिया था। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की हार से समूह के मैनेजमेंट के हौसले बुलंद थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी किसी भी तरह बहुमत से पीछे छूट जाएगी। लेकिन जब नतीजे आए मैनेजमेंट और संपादकीय टीम को निराशा हाथ लगी। नतीजों वाले दिन एक पत्रकार ने न्यूज़रूम में मिठाई बाँटी। उन पत्रकार को पिछले दिनों बुलाकर कह दिया गया कि आपका कॉन्ट्रैक्ट रीन्यू नहीं होगा। इस कार्रवाई का कारण कुछ नहीं बताया गया, लेकिन हर कोई जानता है कि कारण क्या है। ये वही पत्रकार हैं जिसने कन्हैया का भाषण कई घंटे लाइव दिखाने पर चैनल के संपादक से औपचारिक विरोध दर्ज कराया था। वो अक्सर दिखाई जाने वाली फ़र्ज़ी और एकतरफ़ा ख़बरों पर विरोध किया करते थे, जिसकी क़ीमत उन्हें नौकरी गंवाकर चुकानी पड़ी।

दूसरा मामला, दक्षिणपंथी माने जाने वाले एक अन्य पत्रकार का है जिन पर कुछ मनगढ़ंत आरोप लगाकर इस्तीफ़ा ले लिया गया। माना जाता है कि असली कारण यह था कि वो मीडिया के पक्षपात के ख़िलाफ़ फ़ेसबुक पर बहुत खुलकर लिखा करते थे। नागरिकता क़ानून और जेएनयू के मुद्दे पर भी उन्होंने कुछ ऐसा लिखा था जो मैनेजमेंट को नागवार गुजरा। इसी तरह के कुछ और मामलों की जानकारी भी हमें मिली है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो विचारधारा के आधार पर साइडलाइन कर दिए गए और नौकरी छोड़ने को मजबूर कर दिए गए। इन घटनाओं का नतीजा यह कि संपादकीय टीम में एक डर का माहौल है। जो लोग भी बीजेपी के समर्थक समझे जाते हैं उनमें से ज़्यादातर ने सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखना बंद कर दिया है। जबकि वामपंथी, कॉन्ग्रेसी और आम आदमी पार्टी समर्थक माने जाने वालों पर ऐसी कोई पाबंदी लागू नहीं है।

न्यूज़रूम में संदेश देने की है कोशिश

हमने जब इस इस स्थिति का कारण जानना चाहा तो सभी लोगों का मानना था कि ‘सबसे तेज़’ समूह का मैनेजमेंट पूरे न्यूज़रूम को एक मैसेज देना चाहता था। जिन लोगों को निकाला गया है वो सभी मिड से सीनियर रैंक के हैं। जिससे जूनियर और सीनियर दोनों ही स्टाफ़ में साफ-साफ संदेश चला गया है। ‘सबसे तेज़’ समूह के एक पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ लखनऊ में आगज़नी कर रही भीड़ के लिए मैंने दंगाई शब्द टॉप बैंड में लिख दिया था। जिस पर मुझे चेतावनी दी गई। जब मैंने पूछा कि जाट, गुर्जर और कर्णी सेना के आंदोलनों में भी हिंसा पर हमने ऐसी ही भाषा लिखी थी तो यहाँ पर ये फ़र्क़ क्यों? तो कोई जवाब नहीं मिला। अगले दिन मुझे शिफ़्ट की ज़िम्मेदारी से हटा दिया गया।” इसी तरह एक पत्रकार ने “नागरिकता क़ानून के नाम पर हिंसा” लिखा तो संपादक ने आकर उसे “संघी” करार दिया और कहा कि लिखो “नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ भड़का गुस्सा”। जब इतने से भी ज़्यादा असर नहीं पड़ा तो लोगों को विचारधारा के आधार पर नौकरी से निकालने का काम शुरू किया गया।

दूसरी तरफ़, इसी ग्रुप में वो महिला रिपोर्टर भी हैं जो आनंद भवन के बाहर बीजेपी के ख़िलाफ़ नारे लगवाते देखी गई थीं और वो लल्लनछाप एडिटर भी है, जो ट्वीट करता है कि बीजेपी नेताओं को कॉन्डोम इस्तेमाल करना चाहिए ताकि उनके जैसे बच्चे देश में पैदा न हों। ऐसी ढेरों कहानियाँ भरी पड़ी हैं, लेकिन ऐसे किसी भी तथाकथित पत्रकार के ख़िलाफ़ कभी कोई एक्शन नहीं लिया गया। उल्टा उन्हें ऐसा करने पर तरक़्क़ी और अवॉर्ड मिल जाते हैं। ज़्यादातर तथाकथित निष्पक्ष चैनलों के न्यूज़रूम में एक ख़ास विचारधारा के ही लोग भरे पड़े हैं, जो अपनी ख़बरों में न सिर्फ खुलकर अपनी राजनीतिक पसंद दिखाते हैं, बल्कि बीजेपी और इससे जुड़े संगठनों के लिए अपनी नफ़रत को भी झलकाते हैं।

निष्पक्ष पत्रकारिता का आलम देखिए कि मोदी की जीत पर लड्डू खिलाने वाला नौकरी से हाथ धो देता है और आप की जीत पर डांस करने वाला निष्पक्ष कहलाता है। जश्न थम ही नहीं रहा है। कल जलेबी समोसा पार्टी हुई। मालिक ने राजदीप से फिर नाचने को बोला। लेकिन वो शरमा गए और नहीं नाचे।

सबसे तेज़ ग्रुप की खूबी है कि यहाँ संपादकीय पदों पर ज़्यादातर वामपंथी या कॉन्ग्रेसी मानसिकता वाले ही बिठाए जाते हैं। कुछ दक्षिणपंथी लोग दिखावे के लिए वरिष्ठ पदों पर ज़रूर हैं ताकि भ्रम बना रहे। लेकिन उन पर भी कई तरह की बंदिशें थोपी गई हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रवादी छवि वाले एक चैनल से आए एक तेज़तर्रार एंकर को लगभग चुप करा दिया गया है। उनके वो तेवर ग़ायब हैं जो पिछले चैनल में हुआ करते थे।

मीडिया के अंदर की यह तस्वीर उस नैरेटिव से बिल्कुल अलग है जो “गोदी मीडिया” के नाम पर बनाई गई है। कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम के तमाम मीडिया समूहों के अंदर काम करने वाले कई पत्रकारों से बातचीत के आधार पर आने वाले दिनों में हम और भी जानकारियाँ सामने लाएँगे। यह भी बताएँगे कि कॉन्ग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के इशारे पर चलने वाले ये चैनल किस तरह से बीजेपी और बीजेपी के समर्थकों की आँखों में धूल झोंकते हैं।

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