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अलगाववादियों के साथ काम कर रही थीं महबूबा, बेटी इल्तिजा ने कहा- BJP के ख़िलाफ़ बोलने की ‘सज़ा’

महबूबा मुफ़्ती पर पीएसए (पब्लिक सेफ्टी एक्ट) लगा कर हिरासत की अवधि बढ़ा दी गई है। महबूबा पर अनुच्छेद 370 का बचाव करते हुए आतंकवादियों के पक्ष में ट्वीट करने और भड़काऊ भाषण देने का आरोप भी लगाया गया है। कहा गया है कि जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री अलगाववादियों के साथ मिल कर काम कर रही थी। महबूबा मुफ़्ती के अलगाववादियों के साथ मिल कर काम करने की बात पीएसए डोजियर में शामिल की गई है। उन्होंने अपनी ट्वीट में आतंकियों के मारे जाने के बाद उन्हें ‘सम्मान देने’ की बात की थी। साथ ही महबूबा ने सेना पर केमिकल हथियारों का प्रयोग करने के आरोप मढ़े थे।

महबूबा मुफ़्ती ने न सिर्फ मुस्लिमों के मॉब-लिंचिंग की फ़र्ज़ी ख़बरों को आगे बढ़ाते हुए कई आरोप लगाए थे बल्कि तीन तलाक़ क़ानून के विरोध में भी उलटा-सीधा बका था। पीएसए डोजियर में सबूत के रूप में महबूबा और उमर के कई भाषणों की सूची भी डाली गई है। इनमें से दो सबसे विवादित भाषण हैं। महबूबा को अनुच्छेद 370 पर केंद्र सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ सबसे ज्यादा महबूबा मुफ़्ती ने ही आवाज़ उठाई थी। जुलाई 2019 में दिए गए एक भाषण में महबूबा मुफ़्ती ने कहा था:

“अनुच्छेद 35ए के साथ छेड़छाड़ करना बारूद के ढेर को हाथ लगाने के बराबर होगा। जो हाथ अनुच्छेद 35ए के साथ छेड़छाड़ करने के लिए उठेंगे, सिर्फ़ वो हाथ ही नहीं बल्कि पूरा जिस्म जल कर राख हो जाएगा।”

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के बाद जम्मू कश्मीर में कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं बचेगा। वहीं महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती ने आरोप लगाया है कि उनकी अम्मी और उमर अब्दुल्लाह को भड़काऊ बयानों के कारण गिरफ्तार नहीं किया गया है, उन्हें सिर्फ़ इसीलिए गिरफ़्तार किया गया है क्योंकि उन्होंने जम्मू कश्मीर पर केंद्र सरकार के ‘अवैध फ़ैसले’ के ख़िलाफ़ ‘आवाज़ उठाने का अपराध’ किया था। इल्तिजा ने कहा कि भाजपा की आलोचना करने पर महबूबा को ‘सजा’ मिली है।

पीडीपी के प्रवक्ता फिरदौस टाक ने कहा कि अलोकतांत्रिक तरीके से महबूबा पर कार्रवाई की गई है। उन्होंने पूछा कि क्या केंद्र सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ पीआईएल दाखिल करने वाले सभी लोगों पर कार्रवाई की जाएगी? जम्मू कश्मीर के कई नेताओं की हिरासत की 6 महीने की अवधि पूरी हो गई है। इनमें पूर्व आइएएस अधिकारी शाह फैसल भी शामिल हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अली मुहम्मद सागर भी हिरासत में हैं क्योंकि वो पोलिंग बूथों पर घूम-घूम कर लोगों को भड़काया करते थे।

Exit Polls के बाद शाह-नड्डा ने की पार्टी नेताओं के साथ बैठक, AAP का ईवीएम राग शुरू

दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा के नतीजे 11 फरवरी को आएँगे। शनिवार को करीब 60 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले। उसके बाद एग्जिट पोल्स में सत्ता में आप की वापसी का अनुमान लगाया गया है। सभी एग्जिट पोल में आप आसानी से बहुमत के पार जाते दिखाई गई है। बीजेपी की सीटों में 2015 के मुकाबले इजाफा होने का अनुमान लगाया गया है। हालॉंकि पार्टी बहुमत के करीब पहुॅंचती नहीं दिख रही। एग्जिट पोल की माने तो कॉन्ग्रेस का इस बार भी खाता नहीं खुल सकता है।

हालॉंकि बीजेपी और कॉन्ग्रेस ने एग्जिट पोल को खारिज कर दिया है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा है कि पार्टी को 48 सीटें मिलेंगी। वहीं, कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा का कहना है कि एग्जिट पोल में जैसा अनुमान लगाया गया है कि उससे कहीं बेहतर पार्टी का प्रदर्शन होगा। उनके अनुसार आप बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी।

एग्जिट पोल के बाद बैठकों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। भाजपा मुख्यालय में पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी नेताओं के साथ बैठक की। देर रात तक चली बैठक में दिल्ली के चुनाव प्रभारी एवं केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, हरदीप पुरी, नित्यानंद राय, भाजपा नेता विजय गोयल, दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी समेत सातों सांसद एवं अन्य नेता मौजूद थे।

इधर, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अपने आवास पर एक बैठक की। बैठक में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, प्रशांत किशोर, संजय सिंह और गोपाल राय भी मौजूद थे। इस दौरान ईवीएम की सुरक्षा को लेकर पार्टी नेताओं ने चर्चा की। बैठक के बाद पार्टी सांसद संजय सिंह ने बताया कि कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी विधायक भी स्ट्रॉन्ग रूम की निगरानी करेंगे ताकि ईवीएम के साथ कोई छेड़छाड़ न हो।

इससे पहले संजय सिंह ने एक वीडियो ट्वीट कर कहा था, “चुनाव आयोग इस घटना का संज्ञान ले ये किस जगह EVM उतारी जा रही हैं। आस पास तो कोई सेंटर है नहीं।” वहीं, गोपाल राय ने ट्वीट किया, “हमारी विधानसभा बाबरपुर में वोटिंग खत्म होने पर सभी EVM मशीन स्ट्रॉन्ग रूम भेज दी गई। उसके बाद सरस्वती विद्या निकेतन पोलिंग स्टेशन पर एक अधिकारी EVM के साथ पकड़ा गया है। मैं इलेक्शन कमीशन से अपील करता हूॅं कि कि इस पर तुरंत कार्रवाई किया जाए।”

जब जश्न मनाने की AAP की तैयारियाँ धरी रह गई… इसलिए Exit Polls को झुठला सकती है BJP

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक बेहद लोकप्रिय कविता की कुछ पंक्तियॉं यूॅं हैं,

टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ

ऐसे वक्त में जब दिल्ली की जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है, एग्जिट पोल्स आप की सत्ता में वापसी की भविष्यवाणी कर रहे हैं, शायद ही कोई आम आदमी पार्टी के टूटे हुए सपनों की सिसकी सुनना पसंद करे। लेकिन, राजनीति में अतीत को बिसरा भविष्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। सो, अतीत की मिसालें इस बात का संकेत करती हैं कि 11 फरवरी को जब नतीजे आएँगे तो असल तस्वीर दूसरी अनुमानों के बिल्कुल उलट भी हो सकती है। फिलहाल आसानी से बहुमत पाती दिख रही आप जादुई आँकड़े से पहले भी ठिठक सकती है। इसके कारणों की पड़ताल करने से पहले 2017 की एक घटना पर गौर करते हैं।

2017 में पंजाब में विधानसभा के चुनाव हुए थे। जैसे इस बार मतदान से दो महीने पहले तक दिल्ली विधानसभा चुनाव को एकतरफा बताया जा रहा था, उसी तरह राजनीतिक पंडित पंजाब में आप की सरकार बनने की भविष्यवाणी कर रहे थे। बीजेपी-शिअद गठबंधन की सरकार पंजाब में 10 साल से चल रही थी। एंटी इंकबेंसी फैक्टर काम कर रहा था। कॉन्ग्रेस गुटबाजी से उसी तरह त्रस्त बताई जा रही थी, जैसे आज दिल्ली में उसकी हालत है। 11 मार्च को पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे आने थे। आप जीत को लेकर इस कदर आश्वस्त थी कि रूझानों के आने से पहले ही दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर के बाहर बैनर और गुब्बारों से सजावट कर दी गई थी। मंच तैयार था। बैंड बाजे सब रेडी। पार्टी नेता मीडिया से बातचीत में लगातार पंजाब में सरकार बनाने का दावा कर रहे थे। उस समय आप में रहे कुमार विश्वास ने दावा किया था कि 117 सदस्यीय पंजाब विधानसभा में 75 से ज्यादा सीटें जीत पार्टी दिल्ली की तरह सरकार बनाएगी।

लेकिन, रूझानों के साथ ही आप का जश्न काफूर हो गया। नेता, कार्यकर्ता सब गायब। केजरीवाल के घर के बाहर सन्नाटा पसरा गया। जब अंतिम नतीजे आए तो 77 सीटों के साथ कॉन्ग्रेस पंजाब की सत्ता में लौटी थी। आप 20 सीटों पर सिमट गई थी।

पंजाब जीतने को लेकर आप का आत्मविश्वास और राजनैतिक पंडितों के दावे कितने ऊँचे थे इसकी एक और मिसाल देखिए। आप नेता संजय सिंह जो फिलहाल राज्यसभा के सांसद हैं का एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें पार्टी नेता पंजाब में जीत की खुशी मनाते दिख रहे थे। साथ ही पार्टी के कुछ नेताओं का मजाक भी उड़ाया जा रहा था। वीडियो में संजय सिंह यह भी कहते दिख रहे थे कि पार्टी 100 से ज्यादा सीट जीत रही है और सरकार बनाने के लिए तैयार है।

अब 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के लिए हुए चुनावों पर लौटते हैं। बीते साल के आखिर तक हर कोई दिल्ली के विधानसभा चुनावों में आप के प्रचंड जीत का दावा करता नजर आ रहा था। इसमें कथित गोदी मीडिया भी शामिल है। लेकिन, शनिवार (8 फरवरी 2020) को आए एग्जिट पोल्स में भले बीजेपी बहुमत से दूर दिख रखी है, पर सभी पोल में उसकी सीटें 2015 की 3 सीटों से काफी ज्यादा बताई गई है। मसलन, टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल में बीजेपी को 26, न्यूजएक्स-पोलस्टार्ट में 14, इंडिया न्यूज नेशन में 14, रिपब्लिक-जन की बात में 9-21, एबीपी न्यूज-सी वोटर में 12, टीवी9-सिसरो में 15 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। जाहिर है कि यह चुनाव उतना तो एकतरफा नहीं है जितना दावा किया जा रहा था।

इन अनुमानों को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी और दिल्ली से पार्टी सांसद प्रवेश वर्मा ने सिरे से खारिज किया है। तिवारी ने पार्टी को 48 तो वर्मा ने 50 सीटें मिलने का दावा किया है। तिवारी ने ट्वीट कर कहा है, “ये सभी एग्जिट पोल फेल होंगे। बीजेपी 48 सीटों के साथ सरकार बनाएगी। मेरा यह ट्वीट सॅंभालकर रखिएगा।”

एग्जिट पोल्स के ट्रैक रिकॉर्ड और अमित शाह के माइक्रोमैनेजमेंट की रणनीति बताती है कि तिवारी और वर्मा के दावों को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। जैसा का वरिष्ठ पत्रकार राहुल रोशन कहते हैं कि एग्जिट पोल्स के माध्यम से मतदातों के मूड का सटीक आँकलन कठिन होता है। 2015 के चुनाव में किसी ने भी आप के 70 में से 67 सीटें लाने का अनुमान नहीं लगाया था।

इसके अलावा दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान हुई वोटिंग के आँकड़े भी एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। 1993 से 2015 तक के चुनाव बताते हैं कि वोटिंग का ग्राफ गिरने पर सत्ताधारी दल को नुकसान होता है, लेकिन जब वोटिंग परसेंट बढ़ता है तो उसकी सत्ता में वापसी होती है। मसलन, 1993 के 61.75 फीसदी से गिरकर 1998 में 48.99 फीसदी वोटिंग हुई और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई थी। इसके बाद 2013 को अपवाद मान लें तो हर मौके पर वोटिंग में इजाफा दर्ज किया गया और सत्ता में रहने वाले दल की वापसी हुई। इस बार मतदान 2015 के 67.13 फीसदी से करीब दस फीसदी कम हुआ।

आप इसे संयोग कहकर खारिज कर सकते हैं। लेकिन, क्या इसे भी महज संयोग माना जाए कि 2017 में भी आप आज की तरह ही आत्मविश्वास में थी, राजनैतिक पंडित उसके हक में आज की तरह ही दावे कर रहे थे लेकिन आखिरी नतीजा कुछ और निकला। क्या इसे भी संयोग माना जाए कि उस साल भी वोटों की गिनती 11 तारीख को हुई थी और इस बार भी 11 को ही होनी है। अंतर बस केवल इतना ही है कि वह मार्च का महीना था और यह फरवरी की 11 तारीख होगी। दिल्ली के एग्जिट पोल्स में खारिज कर दी गई कॉन्ग्रेस नतीजों में भी उन करीब दर्जनभर सीटों पर मजबूती से लड़ती दिखी तो यह अंतर खत्म हो सकता है, क्योंकि इसी तरह पंजाब चुनाव के वक्त शिअद-बीजेपी के सूपड़ा साफ होने की बात कही गई थी। लेकिन दोनों ने मिलकर 18 सीटें जीत ली थी।

ऐसे में आखिरी तस्वीर तो 11 फरवरी को मतगणना के बाद ही साफ होगी। तब ही पता चलेगा कि आप अपने ही अतीत को झुठला पाती है या नहीं।

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रोज पीटता था मौलवी, माँ ने पैरों में बँधवा दी जंजीर: भरतपुर के मदरसे से भागे बच्चों ने बताई आपबीती

दीनी तालीम के नाम पर चल रहे मदरसे कैसे प्रताड़ना के केंद्रों में बदल चुके हैं इसकी पुष्टि करती हुई एक और घटना सामने आई है। घटना राजस्थान के भरतपुर की है। यहॉं के एक मदरसे से तीन बच्चे मौलवी की रोजाना की पिटाई से तंग आकर भाग गए। पुलिस को संदिग्ध हालात में मिले। एक बच्चे के पैर में जंजीर बॅंधी दी। शुरुआती जॉंच से पता चला है कि बच्चा मदरसा से भाग न जाए इसलिए मॉं ने ही मौलवी से कह जंजीर बॅंधवाई थी।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भरतपुर के मछली मोहल्ला स्थित मदरसे में रोज-रोज की पिटाई से परेशान होकर 3 बच्चे मंगलवार (फरवरी 04, 2020) सुबह भाग गए। तीनों बच्चों की उम्र क्रमश: 12,13 और 14 साल थी। पुलिस को जयपुर-आगरा हाइवे स्थित विश्व प्रिय शास्त्री पार्क में ये बच्चे संदिग्ध हालात में घूमते हुए मिले। पुलिस को इनमें से एक बच्चे के पैर में लोहे की जंजीर बँधी मिली। वक्फ बोर्ड से मान्यता प्राप्त इस मदरसे में छोटे बच्चों के लिए आवासीय सुविधा भी है। ये तीनों बच्चे भी वहीं रहकर पढ़ाई कर रहे थे।

जाँच में पुलिस को पता चला कि पिटाई के डर से बच्चे भाग न जाएँ, इस वजह से बच्चे की माँ ने ही मौलवी से कहकर उसके पैर में लोहे की जंजीर बँधवाई थी। मौलवी यूसुफ ने हालॉंकि मदरसे में बच्चों की पिटाई की बात को गलत बताया है। उसने कहा कि बच्चों को मदरसे से भागने से रोकने के लिए उनके पैरों में जंजीर बाँधी गई थी।

इस घटना के सामने आने के बाद भरतपुर जिला प्रशासन ने तीनों बच्चों को बाल सुधार गृह में भिजवाया है। साथ ही, समाज कल्याण विभाग के उप निदेशक को मामले की जाँच के आदेश दिए गए हैं। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में बताया गया है कि ये तीनों बच्चे मदरसे में नहीं बल्कि सरकारी मांटेसरी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं। बच्चे के पैरों में बँधी जंजीर को खोलने के लिए मदरसे के संचालक से चाबी मँगवाई गई।

गौरतलब है कि मुस्लिम समाज आज भी मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली को छोड़कर दीनी तालीम को ही महत्व देना पसंद करता है। मदरसे से भागे हुए इन बच्चों की कहानी ऐसी पहली घटना नहीं है। सितंबर के महीने में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था जब भोपाल के एक मदरसे में बच्चा जंजीर से बँधा हुआ मिला था।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सितंबर 15, 2020 को पुलिस ने दो बच्चों को प्रताड़ना से मुक्त कराते हुए एक मदरसे के संचालक और उसके सहायक को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक बच्चे की उम्र 10 साल और दूसरे की 7 साल थी। इस मदरसे में 10 साल का बच्चा चेन से बॅंधा था और उसे आजाद कराने के लिए गैस कटर का इस्तेमाल करना पड़ा था।

ऐसा केवल भारत में ही नहीं होता है। अफ्रीकी देश सेनेगल, जहॉं की डेढ़ करोड़ की आबादी में से 90 फीसदी लोग मुस्लिम हैं, वहॉं के मदरसों के अमानवीय बर्ताव सुन देह में सिहरन पैदा हो जाती है। सेनेगल में मदरसों को डारा कहते हैं। उनमें पढ़ने वाले बच्चों को तालिब और पढ़ाने वाले मौलवी को माराबू कहते हैं। डारा में कुरान के अलावा शराफत भी सिखाई जाती है। यूॅं तो शराफत का मतलब विनम्रता होता है, लेकिन डारा शराफत के नाम पर बच्चों को भीख मॉंगने के लिए मजबूर करते हैं।

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक सेनेगल में करीब 1 लाख तालिब भीख मॉंग रहे हैं। ऐसे ज्यादातर तालिब की उम्र 12 साल से कम है। कुछ तो 4 साल के ही हैं। इसी संस्था ने 2010 के अपने अध्ययन में अनुमान लगाया था कि सेनेगल के मदरसों में पढ़ने वाले करीब 50 हजार बच्चे भीख मॉंग रहे हैं। यानी करीब 10 साल में इनकी संख्या दोगुनी हो चुकी है।

शिक्षा की इस मदरसा पद्दति से निपटने के भारत सरकार कई प्रयास करती आ रही हैं। उत्तराखंड राज्य में मुस्लिमों एवं रोजगार सम्बन्धी चहुमुखी विकास के लिए भी सरकार द्वारा ’15 सूत्रीय कार्यक्रम’ जारी किए गए थे। लेकिन प्रश्न यह है कि समाज जब अपनी मजहबी कट्टरता से स्वयं बाहर नहीं आना चाहता है तो फिर कोई और आकर हमारी मदद कैसे कर सकता है?

यही कारण है कि आज भी देश के युवाओं का एक बड़ा हिस्सा पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी अनपढ़ ही रह जाता है। जाहिर सी बात है कि एक ओर जहाँ मुख्यधारा की शिक्षा में विज्ञान पर बात हो रही है, बच्चे प्रतिस्पर्धा के माहौल के बीच रोजाना कुछ नया सीख रहे हैं, ऐसे में मदरसे में सदियों पुरानी तालीम लेकर वह बच्चा समाज से आखिर किस तरह से जुड़ पाएगा? उसे तो यह अवसर ही नहीं दिया जा रहा है कि वह अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके।

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2015 नहीं, 1998 की याद दिला रही दिल्ली की जनता, AAP के लिए खतरे की घंटी!

दिल्ली में मतदान की गति बेहद धीमी है। अतीत के अनुभवों को देखते हुए यदि इसे मतदाताओं के मूड का संकेत माना जाए तो सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के लिए इसे बुरी खबर कह सकते हैं। दिल्ली में 1.47 करोड़ लोग मताधिकार का प्रयोग करने योग्य हैं जो 672 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। इनमें से पुरुषों की संख्या 81.05 लाख है, वहीं महिला वोटरों की संख्या 66.80 लाख है। पहली बार वोट डालने वालों की संख्या 2.32 लाख है।

शाम 4 बजे तक मात्र 42.70 फीसदी ही मतदान हुआ था। चुनाव आयोग के मुताबिक शाम 3.50 मिनट तक 41.21 फीसद मतदान हुआ। शाम 3:30 बजे तक 40.51 फीसदी मतदान हुआ था।

दोपहर 3 बजे दिल्ली में 30.18 फीसदी वोटिंग हुई। इस दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 37.35 प्रतिशत, पूर्वी दिल्ली में 31.99 प्रतिशत, उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली में 29.50 प्रतिशत, पश्चिम दिल्ली 31.93 प्रतिशत, दक्षिण दिल्ली में 31.82 प्रतिशत, दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में 21.37 प्रतिशत और मध्य दिल्ली में 30.40 प्रतिशत मतदान हुआ।

चुनाव आयोग के अनुसार दोपहर 2 बजे तक 28.14 फीसद मतदान हुआ। दोपहर 1 बजे तक महज 19.37 प्रतिशत वोट ही डाले गए थे। 12 बजे तक 15.57 वोट डाले गए थे। इस समय में सबसे अधिक वोट प्रतिशत सुल्तानपुर माजरा में दर्ज किया गया। यहाँ पर 25% वोट पड़े थे, जबकि मुस्लिम बहुल इलाके ओखला में मात्र 5% ही मतदान हुआ था। चुनाव अधिकारियों ने बताया कि सुबह आठ बजे शुरू हुए मतदान के पहले घंटे में 3.66 प्रतिशत मतदान हुआ।

इन वोटिंग रफ्तार को देखकर ऐसा लग रहा है कि कहीं दिल्ली की जनता 1998 का रिकॉर्ड तो नहीं तोड़ देगी? बता दें कि 1998 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं ने अब तक सबसे कम मतदान महज 48.99 फीसदी वोट दिए थे। दिल्ली विधानसभा के साल 2015 के चुनाव में 67.13 फीसदी मतदान हुआ था। वहीं, 2013 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत 65.63 रहा। इससे पहले 2008 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली में 57.58 फीसदी लोगों ने वोटिंग की थी तो 2003 के विधानसभा चुनाव में 53.42 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था।

दिल्ली ने 2013 और फिर 2015 में मतदान का नया रिकॉर्ड कायम किया। जनता ने रिकॉर्ड तोड़ मतदान करके दिल्ली की सरकार बदल दी। दोनों ही बार आम आदमी पार्टी की सरकार बनी। ऐसे में इस बार दिल्ली का मूड क्या है यह 11 फरवरी को नतीजे आने के बाद ही पता चलेंगे।

CAA के विरोध में उपद्रव की साजिश रच रहा था यात्री, उसे पुलिस के हवाले करने वाले ड्राइवर को अवॉर्ड

देश जलाने की बात करने वाले सीएए विरोधी वामपंथी को पुलिस के हवाले करने वाले कैब ड्राइवर को भाजपा ने सम्मानित किया है। उसे ‘सजग नागरिक अवॉर्ड’ से नवाजा गया है। मुंबई भाजपा के अध्यक्ष मंगल प्रताप लोढ़ा ने अन्य पार्टी नेताओं के साथ मिल कर कैब ड्राइवर रोहित गौड़ को सम्मानित किया। लोढ़ा ने कहा कि सीएए के ख़िलाफ़ देशविरोधी षड्यंत्र कर रहे व्यक्ति को पुलिस को सौंप कर रोहित ने अच्छा कार्य किया है। रोहित को सबअर्बन स्थित सांताक्रुज पुलिस थाने में बुला कर सम्मानित किया गया। भाजपा ने बताया कि जनता ने भी रोहित का अभिनन्दन किया।

जब उक्त यात्री रोहित के कैब में बैठा, तभी से वो विरोध के नाम पर फोन पर भड़काऊ बातें कर रहा था। वो शाहीन बाग़ के बारे में बातें कर रहा था। रोहित ने कहा कि शाहीन बाग़ में क्या हो रहा ये सबको पता है, इसलिए उसने संदिग्ध यात्री को पुलिस के हवाले कर दिया। रोहित ने कहा कि वो नहीं चाहते था कि मुंबई में भी कोई ग़ैर-क़ानूनी घटना हो। उक्त यात्री कैब में फोन पर कुछ बड़ा करने की बातें कर रहा था।

उस यात्री का नाम बाप्पादित्य सरकार है, जिससे पुलिस ने भी पूछताछ की है। पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया। वहीं 35 वर्षीय कैब ड्राइवर रोहित ने कहा कि जिस शहर ने उन्हें छत और भोजन दिया है, उस शहर में शांति भंग होने की बात वो स्वीकार नहीं कर सकते। सरकार उसके कैब में बैठ कर कथित तौर पर साज़िश रच रहा था कि कैसे मुंबई में शाहीन बाग़ के तर्ज पर विरोध प्रदर्शन किया जा सकता है। उसने दावा किया कि मुंबई की मुस्लिम महिलाओं से सीएए विरोध-प्रदर्शन की उम्मीद जगी है। इन्हीं बातों को सुन कर रोहित ने उसे पुलिस के हवाले करने का निर्णय लिया।

फोन पर बात करते हुए बाप्पादित्य कह रहा था– “इस देश में आग लगने वाली है।” रोहित ने कहा कि कोई उनके कार में बैठ कर ये सब साज़िशें करे, ये उन्हें कबूल नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि वो चंद रुपयों के लिए अपने शहर को नुकसान होता हुआ नहीं देख सकते। पुलिस ने शिकायत दर्ज करने के बाद इस मामले में रूटीन इन्क्वायरी की। रोहित और सरकार, दोनों के ही डिटेल लिए गए।

सत्ता के लिए कागज़ दिखाएँगे वरना ‘कागज बकरी खा गई, बकरी अब्बा खा गए’ चिल्लाएँगे

शाहीन बाग़, जामिया नगर में मतदान के लिए बुर्के और टोपी में उमड़ी हुई भीड़ इस बात का सबूत है कि सत्ता और ताकत की ‘च्वाइस’ इंसान को क्या कुछ करने के लिए मजबूर कर सकती है। करीब दो महीनों से ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ और ‘कागज बकरी खा गई और बकरी अब्बा खा गए’ जैसे नारे लगाने वाले आज सुबह से मतदान केंद्रों की लाइन पर लगे हैं। वो भी बकायदा दस्तावेज (वोटर कार्ड) हाथ में लेकर।

शाहीन बाग़ को धरती पर ही जन्नत बताने वाले विचारक पत्रकारों ने भी ये मंजर देखकर एक बार खुद को चूँटी जरूर काटी होगी कि अचानक से ये इतने सारे कागज़ लेकर कहाँ से उमड़ पड़े। वरना ‘बिरियानी बाग़’ में विरोध-प्रदर्शन के नाम पर बाँटी जा रही बिरयानी के लिए तो पात्रता ही कागजों का ना होना था।

शरीयत की ‘सेक्युलेरियत’ को कितना भी नकारते रहें लेकिन जब शुक्रवार की शाम मौलवियों ने घोषणा जारी करते हुए दिल्ली में मतदान करने के आदेश दिए तो उसके बाद मजहबी साथियों के लिए इस आदेश को नकारना बहुत कठिन था। या यह कहें कि चूँकि यह आदेश संविधान निर्माताओं द्वारा बनाए गए कानून से नहीं, बल्कि मस्जिद के सेक्युलर स्पीकर्स से जारी किए गए, इसलिए इनकी अवहेलना करने का तो कोई विकल्प ही मौजूद नहीं होता है।

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर आम आदमी पार्टी ने शाहीन बाग़ को खड़ा किया है, यह बात चुनाव आते-आते पूरी तरह से स्पष्ट होती गई। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि एक ऐसा आदमी, जिसके राजनीतिक करियर की शुरुआत ही धरना-प्रदर्शन से हुई थी, उसने अपना पहला कार्यकाल पूरा होते-होते दिल्ली को एक आधिकारिक धरना राजधानी में तब्दील कर ही दिया।

इससे भी दिलचस्प बात यह कि एक विधानसभा चुनाव से दूसरे विधानसभा चुनाव के बीच दिल्ली ने इन विरोध-प्रदर्शनों के बीच शायद ही कुछ देखा हो और आज जब चुनाव की बारी एक बार फिर से आई, तो लोग धरना राजधानी में धरने से ही उठकर मतदान देने भी जा रहे हैं।

इस सब के बावजूद भी अरविंद केजरीवाल से इससे भी बड़ी उपलब्धि की उम्मीद अगर कोई अभी भी कर रहा है, तो उसे जाकर पहली फुरसत में कॉन्ग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए। क्योंकि आज की तारीख में ना कॉन्ग्रेस का कोई भविष्य नजर आता है, और ना ही केजरीवाल से धरना-प्रदर्शन के अलावा कोई और उम्मीद करने वाले का कोई सुनहरा भविष्य हो सकता है। जो आदमी राहुल गाँधी से उम्मीद लगाए बैठे हों, वे अगर एक बार के लिए केजरीवाल से भी उम्मीद लगा ले तो कोई गुनाह है क्या?

राहुल गाँधी का जिक्र आते ही कि दिल्ली चुनाव और ‘कागज नहीं दिखाएँगे’ के इस पूरे ड्रामे के बीच एक राजनीतिक दल ऐसा भी था, जिसे ना ही किसी को कागज़ दिखाने थे और ना ही किसी से कागज माँगने थे; वो है कॉन्ग्रेस! कॉन्ग्रेस जिस तरह से इस पूरे प्रकरण के बीच सोई हुई नजर आई, उसे देखकर तो यही लगता है कि वो वर्षों तक इस देश में सत्ता में रहने की थकान उतार रही है और जिम्मेदारी का यह बोझ राजमाता सोनिया और चिर-युवा युवराज राहुल गाँधी के ही कन्धों पर था।

इस चुनाव में कॉन्ग्रेस के हालात ये हैं कि आज मतदान देकर जब सॉल्ट न्यूज़ के एक सस्ते फैक्ट चेकर ने EVM पर कॉन्ग्रेस का निशान दबाया तो बदले में मशीन से हँसने की आवाजें आई। इस घटना से दहशत में जब फैक्ट चेकर मतदान देकर बाहर निकला, तो उसे तुरंत चाचा नेहरू अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। इसकी सूचना ‘न्यूज़लॉन्डी’ नामक हास्य व्यंग्य का फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट ने दी है।

इस राज परिवार को शाहीन बाग़ से कोई ख़ास लेना देना नहीं रहा। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि कॉन्ग्रेस कार्यालय में इस बात की मिठाइयाँ बाँटी जा रहीं कि उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुछ भी ना कर के कम से कम इतने रुपए तो बचा ही लिए हैं, जिससे वो राहुल गाँधी की एक और थाईलैंड यात्रा का इंतजाम कर सकें।

अगर इस चुनाव में दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत होती है, तो अरविन्द केजरीवाल को सब कुछ (फिल्म रिव्यु, बेवजह हर जगह कंटाप खाना, आदि आदि) पहली फुरसत में छोड़कर एक ‘धरना मंत्रालय’ का गठन करना चाहिए। जिस स्ट्राइक रेट से पिछले पाँच सालों में दिल्ली में धरना प्रदर्शन होते रहे, उससे तो यही संदेश जाता है कि दिल्ली को एक मुख्यमंत्री की नहीं बल्कि एक धरना मंत्री की ज्यादा जरूरत है।

इन सभी तथ्यों के बावजूद केजरीवाल के मीडिया प्रमुख अपने प्राइम टाइम में यह भी कहते सुने और देखे गए कि दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल को हरा पाना नामुमकिन है। लेकिन सॉल्ट न्यूज़ द्वारा सत्यापित आँकड़ों वाली ग्राउंड रिपोर्ट तो यही बताती है कि अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में सिर्फ एक ही कंडीशन में हार सकते हैं, अगर भाजपा उन्हें दिल्ली में अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर देती।

खैर, सॉल्ट न्यूज़ और सभी आँकड़े क्या कुछ नहीं कहते। ये तो यह भी कहते थे कि पाँच साल में केजरीवाल दिल्ली को लंदन बना देने वाले थे। वो तो भला हो मोदी सरकार, दिल्ली के गवर्नर, हाशमी दवाखाना और हर उस आदमी का जिन्होंने अरविन्द केजरीवाल को कभी कुछ करने ही नहीं दिया, वरना शाहीन बाग़ वालों को लंदन में बिरियानी के लिए लंगर लगाने और धरना प्रदर्शन करने की इजाजत ही कैसे मिल पाती, क्योंकि लंदन में तो हर काम के लिए कागज दिखाने पड़ते हैं और शाहीन बाग़ वालों के कागज़ तो कब की बकरी खा गई थी।

मतदान के बाद बाबा भीमराव आम्बेडकर और संविधान निर्माताओं पर आखिरी एहसान ये ‘शाहीन बाग़’ अब सिर्फ यही कर सकता है कि जिन कागजों को लेकर वो पोलिंग बूथ पहुँचे हैं, उन्हीं कागजों को उस वक़्त भी दिखा दें, जब NRC और CAA के लिए कागज माँगे जाएँगे। क्योंकि संविधान के अनुसार नागरिकता की पहचान के लिए यही कागज़ वहाँ भी दिखाने हैं, जिन्हें हाथ में लेकर आप मतदान करने गए हैं।

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राहुल गाँधी ने जिस अनिल अंबानी को बताया था ‘चोर’, उस पर ही मेहरबान MP की कॉन्ग्रेस सरकार

लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उद्योगपति अनिल अंबानी को अनुचित तरीके से लाभ पहुँचाया था। चुनावी रैली के दौरान राहुल गाँधी, अनिल अंबानी को चोर कहते नहीं थकते थे। राहुल गाँधी ने राफेल फाइटर जेट को लेकर आरोप लगाया था कि ‘चौकीदार’ ने ‘चोर’ की जेब में पैसे डाल दिए। लेकिन अब मध्य प्रदेश में उन्हीं की पार्टी की सरकार अनिल अंबानी पर मेहरबानियाँ करती हुई दिखाई दे रही है।

चुनाव से पूर्व जिसे राहुल गाँधी सरकार बनने पर जेल भिजवाने की बात करते थे, मध्य प्रदेश में उनकी पार्टी की सरकार ने अंबानी पर दरियादिली दिखाई है। दरअसल अनिल अंबानी के सासन पॉवर प्रोजेक्ट पर सरकार का 450 करोड़ रुपए बकाया है। इसकी वसूली एक साल के अंदर करनी थी। मगर मध्य प्रदेश की सरकार ने इसकी मियाद चार साल कर दी है। यानी बकाए को वह चार साल में चुकाएँगे। निवेश संवर्धन की कैबिनेट कमेटी (CCIP) ने अनिल अंबानी को यह राहत दी है। इतना ही नहीं, रिलायंस डिफेंस को शिवपुरी में 65 एकड़ जमीन भी आवंटित की गई है। जहाँ पर कारतूस बनाने का कारखाना प्रस्तावित है।

इसके बाद बीजेपी ने कॉन्ग्रेस की सरकार पर सीधे निशाना साधा है। मध्यप्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्र ने कहा है कि कमलनाथ सरकार का स्पेशल पैकेज चल रहा है। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो सरकार खजाना खाली होने की बात कहती है तो दूसरी तरफ उद्योग नीति उद्योगपतियों के हिसाब से चल रही है। किसानों का कर्जमाफ नहीं हो रहा। कन्यादान योजना की राशि नहीं दी जा रही। लेकिन सरकार आईफा और आईटीए पर खर्च कर रही है।

बीजेपी नेता गोपाल भार्गव ने कॉन्ग्रेस सरकार पर हमलावर होते हुए कहा कि यह फैसला दिखाता है कि वर्तमान राज्य सरकार केवल उद्योगपतियों और पूँजीवादियों शासन है, जो गरीबों और बेरोजगारों के हितों के बारे में सोचने की अपेक्षा उद्योगपतियों और पूँजीपतियों के हितों में काम करती है। वहीं राज्य सरकार के इस कदम पर बीजेपी प्रवक्ता राहुल कोठारी का कहना है कि कॉन्ग्रेस की कथनी और करनी में अंतर है। मध्य प्रदेश सरकार भेदभाव के तहत काम कर रही है। इस मामले में बीजेपी ने बड़े भ्रष्टाचार की आशंका जताई है कि सब्सिडी के नाम पर उद्योगपतियों को गैर वाजिब फायदा पहुँचाया जा रहा है।

इस फैसले का बचाव करते हुए राज्य सरकार का कहना है कि सासन पॉवर प्रोजेक्ट से मध्य प्रदेश को कुल उत्पादन की 37 फीसदी बिजली मिलती है। इसकी कीमत 2 रु. प्रति यूनिट है। उद्योग विभाग के मुताबिक सासन प्रोजेक्ट से हर साल सरकार को 2700 करोड़ रुपए की बचत हो रही है, वरना 4 रुपए प्रति यूनिट बिजली खरीदनी पड़ती।

उद्योगपति अनिल अंबानी को छूट देने पर कमलनाथ सरकार में जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि मध्य प्रदेश में निवेश आकर्षित करने के लिये यह फैसला लिया गया है। साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी यह भी दावा किया कि मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा 2014 में अपनाई गई इनवेस्टमेंट प्रमोशन पॉलिसी के तहत यह छूट दी गई है।

कमलनाथ सरकार मकान-दुकान बनाने के लिए बिल्डर्स को बेचेगी मंदिरों की जमीन, बीजेपी ने किया विरोध

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98 से आगे निकली दिल्ली की जनता, Exit Poll में AAP आगे, कॉन्ग्रेस के फिर से 0 पर सिमटने के आसार

दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए 8 फरवरी को वोट डाले गए। सुबह से ही मतदान की गति धीमी रही। करीब 58 फीसदी लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया। य​ह 1998 के विधानसभा चुनावों के 48.99 फीसदी से तो अधिक हैं, लेकिन 2015 के विधानसभा चुनावों में पड़े 67.13 फीसदी वोट से काफी कम हैं। दिल्ली में अब तक हुए विधानसभा चुनावों में सबसे कम वोट 1998 में और सबसे ज्यादा 2015 में पड़े थे।

वहीं, एग्जिट पोल के अनुमानों के मुताबिक आम आदमी पार्टी (AAP) दिल्ली की सत्ता में वापसी करती दिख रही है। बीजेपी का प्रदर्शन 2015 के मुकाबले सुधरा है, लेकिन वह बहुमत के करीब पहुॅंचती नहीं दिख रही। वहीं, कॉन्ग्रेस के एक बार फिर से खाता नहीं खुलने के आसार हैं।

टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल के मुताबिक आप को 44 और बीजेपी को 26 सीटें मिल सकती है। न्यूजएक्स-पोलस्टार्ट ने आप को 56 और बीजेपी को 14 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। इंडिया न्यूज नेशन के मुताबिक आप को 55, बीजेपी को 14 और कॉन्ग्रेस को एक सीट मिल सकती है। रिपब्लिक और जन की बात के एग्जिट पोल के मुताबिक, आपा को 48-61, बीजेपी को 9-21 और कॉन्ग्रेस को 0-1 सीटें मिलने का अनुमान है।

एबीपी न्यूज-सी वोटर के एग्जिट पोल के मुताबिक, आप को 56, बीजेपी को 12 और कॉन्ग्रेस को 2 सीटें मिलने का अनुमान है। सुदर्शन न्यूज के एग्जिट पोल के मुताबिक, आप को 42, बीजेपी को 26 और कॉन्ग्रेस को दो सीटें मिल सकती है। एनडीटीवी के पोल ऑफ एग्जिट पोल्स के मुताबिक, आप को 52, बीजेपी को 17 और कॉन्ग्रेस को एक सीट मिलने का अनुमान है। टीवी9-सिसरो’ के एग्जिट पोल के अनुसार आप को 54, बीजेपी 15 और कॉन्ग्रेस को को एक सीट मिलने के आसार हैं। मतगणना 11 फरवरी को होगी।

बहुमत का आँकड़ा 36 है। 2015 के चुनाव में आप को 67 और बीजेपी को 3 सीटें मिली थी। कॉन्ग्रेस खाता खोलने में नाकाम रही थी। अधिकांश एग्जिट पोल में आम आदमी पार्टी को 45 से अधिक सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं। वैसे कम मतदान ने बड़े वोटर टर्नआउट की बात कर रहे पोलिटिकल पंडितों के लिए चुनावी हार-जीत का गुना-भाग करना कठिन कर दिया है। रविन्द केजरीवाल और मनोज तिवारी के बीच हनुमान जी को लेकर हुई नोकझोंक भी चर्चा का विषय रही। अब सभी मीडिया संस्थानों के एग्जिट पोल्स के रुझान आने शुरू हो गए हैं।

हाथ में संविधान, जुबाँ पर सुप्रीम कोर्ट के लिए गाली, दिल में राम के लिए घृणा: ऐसे कैसे चलेगा स्वरा मैडम?

घटिया एक्टिंग और मूर्खता भरी बातों की प्रतिमूर्ति स्वरा भास्कर अपने ‘गिरोह विशेष’ के कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा के बचाव में आगे आई हैं। उनका कहना है कि देश के लोग इस बात से ज्यादा चिंतित दिख रहे हैं कि एक स्टैंडअप कॉमेडियन ने किसी को फ्लाइट में परेशान किया। लेकिन लोग बन्दूक लेकर घूम रहे हैं और फायरिंग कर रहे हैं उस पर वे चिंतित नजर नहीं आ रहे। स्वरा जब ये बोल रही थीं, तब अभिनेता जीशान अयूब भी उनके बगल में बैठे हुए थे। इस दौरान स्वरा ने सुप्रीम कोर्ट का भी अपमान किया।

स्वरा भास्कर ने कहा कि एक ‘स्टैंड अप कॉमेडियन’ ने ‘किसी व्यक्ति’ को परेशान किया। यहाँ कुछ बातें स्पष्ट करना ज़रूरी है। स्वरा ने फालतू चुटकुले मार के ख़ुद हँसने वाले कुणाल कामरा के प्रोफेशन का तो जिक्र किया है लेकिन अर्नब गोस्वामी को ‘किसी व्यक्ति’ कहा। ज्ञात हो कि फ्लाइट में सफर के दौरान कामरा ने अर्नब को उत्पीड़ित किया था। उन्हें डरपोक तक बताया था। इसके बाद इंडिगो और एयर इंडिया सहित कई फ्लाइट सेवाओं ने कामरा को प्रतिबंधित कर दिया। बावजूद इसके कामरा नहीं सुधरा और वो लगातार अर्नब को निशाना बनाता रहा।

अर्नब गोस्वामी ‘कोई व्यक्ति’ नहीं हैं, ये सबको पता है। अंग्रेज़ी न्यूज़ कैटेगरी में लगातार कई महीनों तक नंबर एक पर रहने वाले चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ के संस्थापक हैं और उनके सबसे बड़े शो ‘नेशन वांट्स टू नो’ के एंकर भी हैं। लेकिन, स्वरा की नज़र में कामरा और उसका प्रोफेशन जिक्र करने लायक है क्योंकि वो उनके गिरोह से है लेकिन अर्नब गोस्वामी उनकी नज़र में कोई नहीं हैं। वामपंथियों की यही आदत होती है- जो आपके विरोधी हैं, न नकी इज्जत करो और न ही उनके काम की। स्वरा ने भी जाहिर कर दिया कि उनके विपरीत विचार रखने वालों के लिए उनके मन में कोई इज्जत नहीं।

ख़ैर, यहाँ इस बात का भी जवाब देना आवश्यक है कि बन्दूक लेकर कौन घूम रहा है। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने जनवरी 3, 2020 को राजस्थान स्थित भरतपुर निवासी एक व्यक्ति को 20 अवैध पिस्तौल के साथ गिरफ़्तार किया। उसके पास से 50 कारतूस भी मिले। यहाँ ये सवाल भी उठ सकता है कि जामिया नगर और शाहीन बाग़ में किसी ने हवाई फायरिंग कर दी और स्वरा को देश ख़तरे में नज़र आने लगा, लेकिन एक व्यक्ति 20 अवैध पिस्तौल के साथ गिरफ़्तार किए जाने के बावजूद चर्चा का विषय नहीं बना? सिर्फ़ इसीलिए, क्योंकि उसका नाम साजिद है।

स्वरा भास्कर यहीं नहीं रुकीं बल्कि उन्होंने तो देश की शीर्ष अदालत को भी निशाने पर ले लिया। बकौल स्वरा, सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी विध्वंस को ग़ैर-क़ानूनी माना है और उसी फ़ैसले में राम मंदिर की ज़मीन उन्हीं को सौंप दी, जिन्होंने मंदिर तोड़ी थी। नहीं, राम मंदिर उन्हें नहीं सौंपा गया जिन्होंने मंदिर तोड़ी थी। राम मंदिर की जमीन रामलला विराजमान को सौंपी गई, जो इसके असली मालिक थे और जिनकी ज़मीन पर आतंकी बाबर के गुर्गों ने ग़ैर-क़ानूनी रूप से मंस्जिद बना ली थी। और हाँ, राम मंदिर की ज़मीन इस देश के प्रति, यहाँ की मिट्टी के प्रति आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों को सौंपी गई है।

जरा सोचिए, अगर वामपंथी विरोधी गुट से किसी ने किसी ट्रायल कोर्ट के भी फ़ैसले पर सवाल उठाया होता तो कितना आउटरेज होता? लेकिन यहाँ सुप्रीम कोर्ट को ही पेट भर भला-बुरा कहा जा रहा है लेकिन कोई चूँ तक नहीं कर रहा। इसे ही दोहरा रवैया कहा गया है। इसे दोमुँही प्रवृत्ति भी कह सकते हैं। एक तरफ़ ये संविधान का पाठ करते हैं और दूसरी तरफ देश की शीर्ष न्याय व्यवस्था को गाली देते हैं। मैडम को संविधान में आस्था भी जतानी है, मैडम को न्यापालिका को गालियाँ भी बकनी है और मैडम को लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया से बनाने गए क़ानून को असंवैधानिक भी बताना है। ऐसे कैसे चलेगा मैडम?

फेक न्यूज़ फैलाने में तो वामपंथी गुट का कोई सानी नहीं। स्वरा ने कहा कि पुलिसकर्मियों ने मुस्लिमों के घरों में घुस कर उन्हें मारा-पीटा और उनकी संपत्ति जला डाली, क्योंकि वो लोग माँसाहारी हैं। उनका इशारा उत्तर प्रदेश से आई एक फेक न्यूज़ को लेकर था, जिस पर राणा अयूब सरीखों ने ख़ूब हंगामा किया था। अयूब का तो यहाँ तक कहना था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता भी पुलिस के साथ मिल कर ऐसा कर रहे हैं। न तो इसका कोई सबूत सामने आया और न ही कोर्ट में उन्हें कोई सफलता हासिल हुई। फ़र्ज़ी ख़बरों पर ही अगर लोगों को भड़काना है तो स्वरा भास्कर इस मामले में टॉप पर प्रतिस्पर्द्धा करती दिखती हैं।

स्वरा भास्कर ने कहा कि लोग हत्या को बुरा नहीं मानते और किसी ने किसी को उत्पीड़ित कर दिया तो लोग ग़लत मानते हैं। ऐसा कह के कितनी आसानी से हज़ारों मौतों के जिम्मेदार इस्लामी आतंकवाद और वामपंथी आतंकवाद को कमतर दिखाया जाता है। क्यों? क्योंकि किसी ने जामिया नगर और शाहीन बाग़ में पिस्तौल लहरा दी। दो लोगों ने पिस्तौल लहरा दिया, इसका मतलब ये है कि इस्लामी आतंकवाद और नक्सल आतंकवाद की बात नहीं की जाएगी और सारी हत्याओं के लिए उन्हीं दो लगों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। और हाँ, उनमें से एक के केजरीवाल की पार्टी से लिंक सामने आए हैं, उसे छिपाना तो परम उद्देश्य होना चाहिए।

जैसा कि वामपंथियों की आदत है, स्वरा ने भी पहले देश में लोकतंत्र के ख़ात्मे की बात कही और फिर इसके लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा दिया। उनका कहना था कि ये सब 1925 से शुरू हुआ है, क्योंकि संघ की स्थापना भी उसी साल हुई। एक झूठ और फिर उस झूठ को सच बता कर उसकी जिम्मेदारी अपने टारगेट पर डालने डालने के लिए एक और झूठ। झूठ बोल कर माहौल बिगाड़ने की कोशिश करना और फिर उसके लिए भाजपा, संघ, हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहरा देना- ये वामपंथियों का फेवरेट ट्रेंड है।

बात वही है। कुणाल कामरा अगर किसी के साथ कुछ ग़लत करता है तो वो ‘एक्ट ऑफ रेजिस्टेंस’ है और पाकिस्तान से आए इस्लामी कट्टरपंथी आतंकी हजारों लोगों को मार डालें, तो भी आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता। व्हाट्सप्प ग्रुप्स में मैसेजों को हिंसा के लिए जिम्मेदार बताने वाली स्वरा भास्कर ने अगर ख़ुद सीएए पढ़ा होता तो शायद ये नौबत ही नहीं आती। या ये भी हो सकता है कि इस गिरोह विशेष के अधिकतर लोगों ने पढ़ रखा है लेकिन वो नहीं चाहते कि जनता का एक बड़ा वर्ग इसे पढ़े। तभी तो दो हवाई फायरिंग से इस्लामी आतंकवाद गौण हो जाता है।

जामिया हिंसा में हाथ सेंकने ट्विटर पर लौट आए अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर ने भी उगला जहर

कॉमेडी के नाम पर स्वरा भास्कर की फूहड़ता: 4 साल के बच्चे को कहा- चू**या, कमीना…

स्वरा भास्कर का फ़र्ज़ी फेमिनिज़्म और आँकड़े: राहतें और भी हैं ऑर्गेज्म की राहत के सिवा