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शहबाज खान पर किशोरी से छेड़छाड़ का आरोप: चंद्रकांता से लोकप्रिय हुए थे ‘कुँअर विरेन्द्र विक्रम’, FIR दर्ज

बीते समय के मशहूर टीवी धारावाहिक चंद्रकांता में कुँवर वीरेंद्र विक्रम का किरदार निभाने वाले शाहबाज खान पर छेड़छाड़ के मामले में FIR दर्ज की गई है। कई वर्षों से टीवी पर अपनी कलाकारी के कारण अपनी पहचान बना चुके इस अभिनेता पर 19 वर्ष की एक किशोरी ने गंभीर आरोप लगाए हैं।

समाचार एजेंसी ANI ने अपने ट्वीट में लिखा है – “मुंबई: अभिनेता शाहबाज़ खान के खिलाफ ओशिवारा पुलिस स्टेशन में छेड़छाड़ का मामला दर्ज। IPC की धारा 354 (महिला या पुरुष को उसकी शील भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल) और 509 (शब्द, इशारा या किसी महिला की विनम्रता का अपमान करने का इरादा) के तहत एफआईआर दर्ज की गई।”

किशोरी के आरोपों के बाद 53 साल के शहबाज खान पर अपमान करने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल और महिला के शील भंग करने के लिए अपमानसूचक शब्‍द या इशारा करने (IPC की धारा 354,और 509) जैसे आपराध‍िक धाराओं में मामला दर्ज हुआ है।

अभिनेता शाहबाज़ खान की तरफ से हालाँकि, इस मामले पर अभी कोई बयान नहीं आया है और न ही पीड़िता की ओर से ज्यादा जानकारी मिल पाई है।

टीवी सीरियल ‘चंद्रकांता’ में कुंवर विरेन्द्र विक्रम की भूमिका निभाई थी

ज्ञात हो कि 22 साल की उम्र में शाहबाज खान को टीवी सीरियल ‘टीपू सुल्तान’ में पहला ब्रेक मिला था। इसके बाद शाहबाज खान ने मशहूर टीवी धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ में कुँवर विरेन्द्र विक्रम की भूमिका निभाई थी। उस समय इसी किरदार के कारण वो लोगों के बीच खूब लोकप्रिय रहे थे।

मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद को टेरर फंडिग केस में पाकिस्तानी अदालत ने सुनाई 5 साल की सजा

मुंबई हमले के मास्टर माइंड और जमात उल दावा प्रमुख हाफिज सईद को पाकिस्तान की एक अदालत ने टेरर फंडिग और एक अन्य मामले में 5 साल पाँच माह की सजा सुनाई है। पाकिस्तान की लाहौर कोर्ट ने सजा सुनाने के साथ ही हाफिज सईद पर 15 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

जानकारी के मुताबिक पिछले हफ्ते लाहौर की आतंकवाद रोधी अदालत (एटीसी) ने प्रतिबंधित जमात-उद-दावा के सरगना व 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के खिलाफ आतंकवादी फंडिंग से जुड़े दो मामलों में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। ये मामले आतंकवाद रोधी विभाग (CTD) की लाहौर और गुजरांवाला शाखाओं की ओर से दाखिल किए गए हैं।

बता दें कि आतंकवाद निरोधक अदालत 11 दिसंबर से सईद और अन्य के खिलाफ चल रही आतंकी वित्तपोषण मामले की रोजाना सुनवाई कर रही है। वहीं हाफिज सईद के खिलाफ आतंकी फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कब्जे के कुल 29 मामले दर्ज हैं। इसी बीच सईद के खिलाफ आतंकी फंडिंग के दो मामलों में पाकिस्तान के आतंकरोधी कोर्ट (ATC) ने 8 फरवरी को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

जेयूडी सरगना को बीते साल जुलाई में सीटीडी द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उसकी गिरफ्तारी से पहले जेयूडी नेताओं के खिलाफ 23 प्राथमिकी सीटीडी पुलिस स्टेशन लाहौर, गुजरांवाला, मुल्तान, फैसलाबाद व सरगोधा में जुलाई 2019 में दर्ज की गई। इनमें सईद और जेयूडी का एक अन्य प्रमुख आतंकी अब्दुल रहमान मक्की शामिल हैं। डॉन न्यूज के मुताबिक, सीटीडी ने कहा है कि जेयूडी गैर-लाभकारी संगठनों और ट्रस्टों के माध्यम से एकत्र किए गए भारी धन से आतंकवाद का फंडिंग कर रहा था।

वहीं माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने यह कदम अंतराष्ट्रीय संस्था एफएटीएफ (FATF) की कार्रवाही से बचने के लिए मजबूरन उठाया है। फिलहाल पाकिस्तान को ग्रे की सूची में डाला गया है। वहीं लगातार संयुक्त राष्ट्र उस पर आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए पाकिस्तान पर दवाब बनाया जा रहा था।

गौरतलब है कि 26 नवंबर 2008 को भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में लश्कर के 10 आतंकियों ने हमला किया था, जिसमें 166 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और 300 से अधिक लोग घायल हो गए थे। आतंकियों ने ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाने के लिए उस दिन मुंबई के सीएसटी रेलवे स्टेशन, आलीशान ताज और ट्राइडेंड होटल सहित कई इलाकों को अपना निशाना बनाया था। मरने वालों में विदेशी नागरिक भी शामिल थे। इस घटना के बाद अमेरिका ने हाफिज को ब्लैक लिस्ट तो किया ही साथ ही उस पर इनाम भी घोषित किया था।

राजस्थान: ससुर के महिला से रेप के बाद शिकायत करने पर पति ने बेल्ट से पीटा, ननद ने गर्म सलाखों से दागा

राजस्थान के झालावाड़ जिले में एक विवाहिता के साथ उसके ससुराल वालों द्वारा किए गए बेहद अमानवीय हरकतों का एक मामला सामने आया है। इस महिला के साथ उसके ससुर ने ही बलात्कार किया। बात यहीं ख़त्म नहीं होती, इसके बाद उसके पति ने भी उसे ससुर से सम्बन्ध बनाने की बात कही और उसे बेल्ट से मारा। यही नहीं, महिला की ननद ने भी उसे गर्म सलाखों से दागा। इसके बाद किसी तरह से विवाहिता ससुराल से भागने में कामयाब रही और पुलिस के पास पहुँचकर मामले की प्राथमिकी दर्ज कराई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दाँगीपुरा थाने में पीड़िता की ओर से दर्ज कराई गई FIR के अनुसार तीन माह पूर्व ही उसकी नाताप्रथा रस्म के अंतर्गत शादी हुई थी। मामले के सामने आने के 2 दिन पहले एक रात पीड़िता के ससुर ने उसे खेत में सिंचाई के लिए साथ चलने के लिए कहा। इस पर वह अपने ससुर के साथ खेत पर सिंचाई करने चली गई। लेकिन वहाँ उसके ससुर ने उसके मुँह में कपड़ा ढूँसकर उससे बलात्कार किया।

पीड़िता के अनुसार वह किसी तरह वहाँ से भागी और अपने पति के पास पहुँची। जब महिला ने अपने पति को इस बारे में बताया तो उसने सहानुभूति जताने की बजाए पीड़िता को ही बेल्ट से मारा। यही नहीं, महिला के पति ने यह भी कहा कि उसे अपने ससुर के साथ सम्बन्ध बनाने होंगे।

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि मारपीट के बाद वहाँ हंगामा होने पर उनकी दो ननदें भी पहुँचीं। लेकिन उन्होंने भी पति और ससुर की हरकत का समर्थन किया। इसके बाद दोनों ने पीड़िता को गर्म चिमटे से दागा। महिला के पति ने उससे यह भी कहा कि वो नाता प्रथा के तहत उसे खरीदकर लाए हैं, इसलिए उसके पिता जैसा कहें, उसे मानना ही होगा। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। मंगलवार (फरवरी 11, 2020) को मनोहर थाना के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पीड़िता का मेडिकल कराया गया।

मौत के छ: माह बाद दिवंगत शीला दीक्षित पर दिल्ली चुनाव हराने का आरोप: पीसी चाको ने दिया इस्तीफा

दिल्ली विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को मिली शर्मनाक हार के बाद से पार्टी में घमासान मचा हुआ है। एक तरफ पार्टी के नेता अपने ही आला नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो कुछ पार्टी पदाधिकारियों के बीच की अंदरूनी कलह सामने आने लगी है। वहीं अब करारी हार के बाद पार्टी पदाधिकारियों के इस्तीफा देने का भी सिलसिला शुरू हो चला है।

दिल्ली चुनावों के परिणाम की स्थिति मंगलवार को जैसे ही साफ़ होती गई ऐसे ही कॉन्ग्रेस पार्टी में आरोप-प्रत्यारोपों की सिलसिला शुरू हो गया। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों पर दिल्ली कॉन्ग्रेस प्रभारी पीसी चाको ने पार्टी के प्रदर्शन पर बुधवार को प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “वर्ष 2013 में ही कॉन्ग्रेस की स्थिति खराब होने लगी थी, जब शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं। ऐसा इसलिए कि पार्टी का वोट बैंक आम आदमी पार्टी की ओर चला गया। चाको ने यह भी कहा कि जब तक आम आदमी पार्टी है, तब तक कॉन्ग्रेस दिल्ली में आगे नहीं बढ़ सकती है।” इसी के साथ पीसी चाको ने अपने प्रभारी पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस नेता और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा भी अपने पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर चुके हैं।  

पीसी चाको के इस बयान के बाद पार्टी में घमासान शुरू हो गया। इस बयान पर पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने चाको पर निशाना साधते हुए कहा, “चुनावी हार के लिए दिवंगत शीला दीक्षित को जिम्मेदार ठहराना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। शीला दीक्षित एक बेहतरीन राजनीतिज्ञ और प्रशासक थीं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान दिल्ली की तस्वीर बदली और कॉन्ग्रेस पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई। उन्होंने अपना पूरा जीवन कॉन्ग्रेस और दिल्ली के लोगों के लिए समर्पित किया था।”

वहीं कॉन्ग्रेस नेता और प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भी चाको पर निशाना साधते हुए कहा, “2013 में जब हम हारे तो कॉन्ग्रेस को दिल्ली में 24.55 फीसदी वोट मिले थे। शीला जी 2015 के चुनाव में शामिल नहीं थीं, जब हमारा वोट प्रतिशत गिरकर 9.7 फीसदी हो गया। 2019 में जब शीला जी ने फिर से कमान संभाली तो कॉन्ग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़कर 22.46 फीसदी हो गया।”

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वहीं इससे पहले मंगलवार को दिल्ली चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा था इस हार के लिए पार्टी नेतृत्व ज़िम्मेदार है। उन्होंने स्वीकार किया था कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस का पतन हुआ है। बहुत आत्मनिरीक्षण हो चुका है, अब कार्रवाई का वक्त है।

गौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम में आम आदमी पार्टी को 70 में 62 और बीजेपी को 8 सीटें मिली हैं, जबकि कॉन्ग्रेस पार्टी अपना खाती भी नहीं खोल सकी। वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी अपने 66 उम्मीदवारों मे से 63 उम्मीदवारों की जमानत भी नहीं बचा सकी। इस परिणाम के बाद से ही दिल्ली कॉन्ग्रेस में घमासान मचा हुआ है।

‘देवबंद से ही निकलते हैं सारे बड़े आतंकी, वह गजवा-ए-हिंद के लिए लड़ रहे हैं’

अपने बयानों से लोकर अक्सर चर्चा में रहने वाले बीजेपी के कैबिनेट मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बार फिर आतंकियों को लेकर बयान दिया है। गिरिराज सिंह ने कहा है कि मैं पहले से ही कहता रहा हूँ कि देवबंद आतंकवादियों की गंगोत्री है, क्यों कि सारी दुनियाँ में पैदा हुए बड़े आतंकी यहीं से निकलते हैं।

बीते मंगलवार को जनसंख्या समाधान फाउंडेशन एवं हिंदू जागरण मंच द्वारा आयोजित सीएए के समर्थन कार्यक्रम में केंद्रीय पशुधन मंत्री गिरिराज सिंह सहारनपुर पहुँचे थे, जहाँ कार्यक्रम के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, “मैंने एक बार कहा था कि ये देवबंद आतंकवाद की गंगोत्री है, सारे बड़े-बड़े दुनियाँ में जो भी पैदा हुए आतंकवादी, चाहे हाफ़िज सईद मामला हो, ये सारे के सारे लोग यहीं से निकलते हैं।”

इससे पहले कार्यक्रम में जनसंख्या नियंत्रण पर बोलते हुए मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि देश के अंदर जनसंख्या नियंत्रण जल्द से जल्द लागू होना चाहिए। अन्यथा देश का विकास नहीं हो पाएगा। अगर देश का विकास करना है तो जनसंख्या नियंत्रण कानून बहुत जल्द से जल्द लाना होगा।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कार्यक्रम में शाहीन बाग पर निशाना साधते हुए कहा कि वह नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वह गजवा-ए-हिंद के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। गजवा-ए-हिंद को भारत में लाकर मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहते हैं। हम उनको इस मकसद में कामयाब नहीं होने देंगे।

आपको बता दें कि पिछले वर्ष 29 नवंबर को देवबंद के स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से उनके आश्रम में मुलाक़ात करने के बाद केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा था कि देवबंद आतंकवाद का अड्डा बन गया है। इतना ही नहीं हाफिज सईद और बगदादी जैसे आतंकवादी भी देवबंद से शिक्षा लेते हैं। उन्होंने आगे कहा था कि गुरुकुल से आजतक कोई बच्चा आतंकी नहीं निकला, लेकिन देवबंद से निकले हुए लोग देशभक्त का तो पता नहीं, लेकिन आतंकी जरूर बनते हैं। अब पता नहीं यह शिक्षा का मंदिर है या आतंक का मंदिर।

हिन्दू से शादी करने पर कभी अब्दुल्ला परिवार ने ठुकराया था, भाई उमर के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं सारा

सचिन पायलट की पत्नी सारा पायलट ने अपने भाई उमर अब्दुल्ला की रिहाई के लिए दिन-रात एक कर दिया है। सारा पायलट जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं। फ़िलहाल उमर अब्दुल्ला ‘पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA)’ के तहत नजरबंदी झेल रहे हैं। उनकी रिहाई के लिए सारा सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई हैं। इस मामले में उनके वकील पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल हैं, जिन्होंने इस याचिका को अर्जेन्ट सुनवाई के लिए लिस्ट कराने में सफलता पाई थी।

सारा पायलट की दलील है कि एक ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ हिरासत में रखने के कोई सबूत हो ही नहीं सकते, जिसे पिछले 6 महीनों से नज़रबंद रखा गया हो। उन्होंने अपने भाई को हिरासत में लिए जाने के फैसले को अवैध करार देते हुए कहा है कि उनके ख़िलाफ़ कोई साक्ष्य नहीं हैं। इस मामले में सुनवाई से जस्टिस शान्तनागौडर ने ख़ुद को अलग कर लिया। हालाँकि, इसके लिए उन्होंने कोई कारण नहीं बताया। सारा पायलट ने अपनी याचिका में उमर को हिरासत में लिए जाने को अलोकतांत्रिक भी कहा है।

बता दें कि सारा पायलट राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट की पत्नी हैं। उन दोनों की शादी जनवरी 2004 में हुई थी। गौर करने लायक बात ये है कि सारा की शादी में उनके भाई व अब्बा शामिल नहीं हुए थे, क्योंकि वे एक हिन्दू से उनके रिश्ते को लेकर नाराज़ थे। फ़ारूक़ और उमर, दोनों ने ही उनके विवाह कार्यक्रम से दूरी बना ली थी। सारा पायलट ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा भी था कि वो अपने परिवार के इस फैसले से काफ़ी बिखर गई थीं और सचिन पायलट उन्हें ख़ुश रखने की कोशिश कर रहे थे।

सचिन से जब एक बार पूछा गया था कि आख़िर अब्दुल्ला बाद में मान कैसे गए, तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें और सारा को एक साथ ख़ुश देख कर सभी को इस रिश्ते को स्वीकार करना पड़ा। हालाँकि, ये जानने लायक बात है कि खुद उमर अब्दुल्ला ने भी मेजर जनरल (रिटायर्ड) रामनाथ की बेटी पायल नाथ के साथ शादी की थी। सितम्बर 2011 में उमर ने कन्फर्म किया कि वो दोनों अब अलग हो चुके हैं।

सारा और सचिन उच्च-शिक्षा के लिए ‘वारटन स्कूल ऑफ़ द यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया’ में गए थे, जहाँ उनकी मुलाकात हुई और बाद में दोस्ती प्यार में बदल गई। सारा चूँकि कश्मीरी मुस्लिम थीं और सचिन पायलट एक हिन्दू गुर्जर परिवार से आते थे, अब्दुल्ला खानदान को ये रिश्ता मंजूर नहीं था। सचिन और सारा के दो बेटे हैं और वो हँसी-खुशी रह रहे हैं। यही कारण है कि सालों बाद अब्दुल्लाओं को ये रिश्ता मंजूर करना पड़ा। आज सारा अपने भाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई हैं।

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बाप के बनाए काले कानून से बेटे के कैद होने का कर्मफल: फ़ारूक़ अब्दुल्ला और कश्मीरियत

जो शीला दीक्षित से लेना चाहते थे बदला, उनके गले लगकर भी दिन नहीं बदल पाई कॉन्ग्रेस

11 फरवरी 2020। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। जोरदार तरीके से आप ने सत्ता में वापसी की। कॉन्ग्रेस ने जो 66 उम्मीदवार उतारे थे उनमें से 63 अपनी जमानत ही नहीं बचा पाए। आप की जीत और भाजपा की हार के चर्चे के बीच कॉन्ग्रेस को सुर्खियॉं हाथ लगनी नहीं थी। इसलिए, उसके हाई प्रोफाइल उम्मीदवारों के दयनीय प्रदर्शन की भी चर्चा नहीं हुई। फिर भी आपको संगम विहार सीट का हाल सुनाता हूॅं। यहॉं से कॉन्ग्रेस की उम्मीदवार पूनम आजाद को कुल 2,604 वोट मिले हैं। जितने वोट पड़े उसका केवल 2.23 फीसदी। वे कॉन्ग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आजाद की पत्नी हैं।

यहॉं पूनम आजाद की विशेष तौर पर चर्चा की वजह शीला दीक्षित के नाम पर कॉन्ग्रेस में मचा घमासान है। इस कहानी को समझने के लिए आपको 2003 में जाना होगा। उस साल अचानक से दिल्ली के राजनीतिक सर्कल में एक महिला का नाम चर्चा में आया। यह महिला थीं, पूनम आजाद। बिहार के मुख्यमंत्री रहे भागवत झा आजाद की बहू और 1983 की वर्ल्ड चैंपियन क्रिकेट टीम के सदस्य तथा आज के दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस की चुनाव प्रचार समिति के चेयरमैन कीर्ति आजाद की पत्नी। उस समय कीर्ति बीजेपी में हुआ करते थे।

चर्चा चली कि दिल्ली की हाई प्रोफाइल गोल मार्केट विधानसभा सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ बीजेपी पूनम को मैदान में उतार सकती है। इस चर्चा से सबसे ज्यादा हैरानी दिल्ली भाजपा के नेताओं को ही हुई। उन्होंने पूनम आजाद का न तो नाम सुना था और न कभी उन्हें पार्टी गतिविधियों में शामिल होते देखा था। उस समय कीर्ति आजाद ने कहा था कि यदि बीजेपी उनकी पत्नी को टिकट देती है तो यह उनके लिए अपनी हार का बदला लेने का मौका होगा। बीजेपी ने उस साल हुए विधानसभा चुनाव में गोल मार्केट से पूनम आजाद को ही लड़ाया। लेकिन, न शीला दीक्षित हारीं और न पत्नी के जरिए प्रतिशोध की कीर्ति की मुराद पूरी हो पाई।

असल में, कीर्ति आजाद और शीला दीक्षित की राजनीतिक अदावत 1998 में ही शुरू हो गई थी। कॉन्ग्रेसी पिता के क्रिकेटर बेटे कीर्ति आजाद ने राजनीतिक पारी की शुरुआत बीजेपी से की। 1993 में पहली बार चुनावी राजनीति के मैदान में उतरे। गोल मार्केट की पिच पर ऐसा झंडा गाड़ा कि दिल्ली विधानसभा पहुॅंच गए। लेकिन, पॉंच साल बाद ही उन्हें चुनावी हार का स्वाद चखना पड़ा। कॉन्ग्रेस की शीला दीक्षित ने न केवल उन्हें चुनाव में पटखनी दी, बल्कि दिल्ली के राजनीति से कीर्ति का बोरिया-बिस्तर बॅंध गया।

साल भर बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बिहार के दरभंगा से चुनाव लड़ने भेज दिया। दरभंगा कीर्ति का ससुराल भी है और यहॉं ब्राह्मण मतदाता प्रभावी भी हैं। इस सीट से कीर्ति तीन बार लोकसभा भी पहुॅंचे। लेकिन, दिल्ली की राजनीतिक पिच पर जमने का दूसरा मौका वे तलाशते रहे। कभी पत्नी पूनम के चेहरे को आगे कर तो कभी डीडीसीए में पैर जमाने की कोशिश कर। इस कोशिश में पूनम बीजेपी से भाया आप होते हुए साल 2017 में कॉन्ग्रेस में आ गईं। वहीं, दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) को लेकर पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ उनका विवाद आखिरकार बीजेपी से उनकी विदाई का कारण बना।

बीते साल आम चुनावों से पहले कीर्ति आजाद कॉन्ग्रेस में आए थे। उस समय पार्टी अध्यक्ष रहे राहुल गॉंधी ने खुद उनका इस्तकबाल किया था। यह दूसरी बात थी कि बिहार में कॉन्ग्रेस उनके लिए सहयोगियों से न दरभंगा की सीट ले पाई और न राज्य में दूसरा कोई सीट तलाश पाई। आखिरकार, उन्हें चुनावी भट्ठी में पार्टी ने झारखंड की धनबाद सीट से झोंक दिया। चमत्कार होना न था और कीर्ति हार गए।

इस चुनावी पराजय के बाद कीर्ति राजनीति के नेपथ्य में चले गए। फिर अक्टूबर 2019 में अचानक से चर्चा में आए। कहा गया कि उनका दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनना तय है और कभी भी नाम का ऐलान हो सकता है। लेकिन, जब नाम का ऐलान हुआ तो कीर्ति के हिस्से चुनाव प्रचार समिति आई। उस समय ऐसा दावा किया गया था कि कीर्ति के हाथ से अध्यक्ष की कुर्सी पार्टी के प्रदेश प्रभारी पीसी चाको और शीला दीक्षित के पूर्व सांसद बेटे संदीप दीक्षित के बीच की लड़ाई के कारण फिसली है। शीला दीक्षित का बीते साल 20 जुलाई को निधन हुआ था। उनके चाको से मतभेद जगजाहिर थे। संदीप ने इसे अपनी माँ की मौत का कारण बताया था। चाको चाहते थे कि शीला की जगह प्रदेश की कमान कीर्ति को मिले।

ऐसे में सोनिया ने बीच का रास्ता चुना। लेकिन, विडंबना देखिए सोनिया के नेतृत्व में जिस शख्स का दिल्ली की राजनीति से शीला ने बोरिया-बिस्तर बॅंधवाया था, दो दशक बाद सोनिया ने शीला की मौत के 94 दिन के बाद उसे ही मोर्चे पर लगा दिया। इस उम्मीद में कि शीला जैसा कमाल कर दिखाएँ। इसके पीछे कॉन्ग्रेस की दो दशक पुरानी वही रणनीति है जिसके बलबूते उसे 1998 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत मिली और फिर अगले डेढ़ दशक तक वह राज्य की सत्ता में बनी रही। पंजाबी और पूर्वांचल मतदाताओं को एक साथ साधना। उस समय भी पार्टी के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ही थे, जिन्हें एक बार फिर से अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी का चेहरा थीं शीला दीक्षित, जो उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता रहे उमाशंकर दीक्षित की बहू थीं।

लेकिन, शायद सोनिया यह भूल गईं थी कि वह साल दूसरा था, यह साल दूसरा है। इस बीच यमुना में काफी पानी बहा। उसका ही असर था कि इस बार चुनाव में पहले कॉन्ग्रेस के नेतृत्व ने सरेंडर किया फिर उम्मीदवार पॉंच फीसदी वोट भी नहीं ला पाए। लगातार दूसरे विधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुला। नतीजों के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले सुभाष चोपड़ा की बेटी भी जमानत नहीं बचा पाई। ​आखिर में रही-सही कसर चाको ने हार की जिम्मेदार दिवंगत दीक्षित के मत्थे मढ़ कर पूरी कर दी है। जबकि सच्चाई यही है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी के लिए सोनिया ने हर उस शख्स को गले लगाया जिससे पूर्व मुख्यमंत्री के मतभेद थे, जो उनसे कभी बदला लेना चाहता था।

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काटा गया मायावती के घर का बिजली कनेक्शन, कई महीनों से बकाया था बिजली बिल

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती के हाथ से पावर तो 2012 में जा चुका था, अब उनके घर से भी पावर चला गया है। मायावती के घर के लोग कई महीनों से बिजली बिल का भुगतान नहीं कर रहे थे, जिसके बाद उनके घर का बिजली कनेक्शन ही काट डाला गया। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के ग्रेटर नोएडा के बादलपुर में स्थित आवास की बिजली काटी गई।

मायावती पर कुल 67,000 रुपए का बिजली बिल बकाया था, जिसके कारण उनके घर की बिजली काटी गई। हालाँकि, बिजली विभाग के प्रवक्ता ने बताया है कि ये एक रूटीन प्रक्रिया है और बिजली बिल न भरने पर कनेक्शन काटा जाता है। जैसे ही मायावती के घर की बिजली काटी जाने की ख़बर आई, उनके परिजनों ने बकाया भुगतान की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी।

पूर्व मुख्यम्नत्री के परिजनों ने 67,000 रुपए में से 50,000 रुपए का भुगतान कर दिया है। बिजली विभाग के लखनऊ में स्थित एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। जहाँ भी बिल पेंडिंग हैं, वहाँ का बिजली कनेक्शन काटा जा रहा है। मायावती का घर भी इसी क्रम में बिजली विभाग की रडार पर आया। ताज़ा सूचना के अनुसार, मायावती के घर की बिजली फिर से चालू कर दी गई है क्योंकि परिजनों ने बकाया राशि का भुगतान कर दिया है।

शाहीन बाग का ऐलान: अरे ओ सुन ले, तू हमें करंट क्या लगाएगा? अब तू दिल्ली से ही नहीं, हिंदुस्तान से भी जाएगा

दिल्ली के शाहीन बाग़ में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद जश्न मनाया गया। हालाँकि, ये जश्न केजरीवाल की जीत को लेकर कम और भाजपा की हार को लेकर ज्यादा था। भाजपा को चिढ़ाते हुए बैनर-पोस्टर लहराए गए। एक ऐसा पोस्टर भी लहराया गया, जिसमें भाजपा को धमकी दी गई है। धमकी भरे अंदाज में उस पोस्टर को शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने लहराया। ये तो शरजील के बयानों के बाद से ही स्पष्ट है कि मुद्दा सीएए और एनआरसी नहीं है, मुद्दा हिंदुत्व भाजपा का विरोध है। इसके लिए उन्हें बहाना चाहिए, जो सीएए के रूप में उन्हें मिल गया।

इस पोस्टर में लिखा हुआ है- “अरे ओ सुन ले, तू हमें करंट क्या लगाएगा? अब तू दिल्ली से ही नहीं, हिंदुस्तान से भी जाएगा।” शाहीन बाग़ वालों से जब मीडिया ने सवाल पूछा तो वो गुजरात दंगे की बातें करने लगे। भाजपा के प्रति अपने नफरत का इजहार करने लगे। इससे फिर ये साबित हुआ कि इनका आंदोलन किस मकसद से चल रहा है। इसका असली एजेंडा क्या है। हालाँकि, मीडिया ने इसे छिपाने की भरसक कोशिश की। फिर भी, एक सजग वर्ग ने इसे जनता के सामने रखा। दरअसल, इस पोस्टर के जरिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा गया।

शाह ने 26 जनवरी को बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ईवीएम का बटन इतने गुस्से के साथ दबाना कि बटन यहाँ दबे, करंट शाहीन बाग के अंदर लगे। उससे तीन दिन पहले जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही बयान दिया था। शाह ने कहा था, “बटन इतनी ताकत से दबाना कि इसके करंट से 8 फरवरी को शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी वो जगह छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ।’आम आदमी पार्टी की जीत के बाद अमानतुल्लाह ख़ान समेत कई नेताओं ने शाह के इस बयान पर तंज कसा।

जब मुस्लिमों के रहनुमाओं से इस बारे में पूछा गया तो वो बात बनाते नज़र आए। ‘न्यूज़ नेशन’ के शो में पत्रकार दीपक चौरसिया ने मुस्लिम प्रतिनिधियों से पूछा तो एक ने कहा कि शाहीन बाग़ में रोज लाखों लोग आते हैं, कैसे पता चलेगा कि पोस्टर प्रदर्शनकारियों ने ही लहराए हैं? वहीं दूसरे ने कहा कि वो इसकी निंदा करते हैं लेकिन साथ ही इस प्रदर्शन को पिछले 100 साल का सबसे बड़ा आंदोलन भी करार दिया। शाहीन बाग़ के मास्टरमाइंड शरजील इमाम ने AMU में इससे पहले नार्थ-ईस्ट को शेष भारत से अलग करने की बातें की थी।


शाहीन बाग़ की तल्ख़ हकीकत: विरोध का असली मकसद देश में अस्थिरता का माहौल पैदा कर सरकार गिराना

संख्या नहीं गिनाएँगे, सैकड़ों प्रदर्शनकारी बताएँगे: AltNews ने किया शाहीन बाग़ के सन्नाटे का फर्जी फैक्ट चेक

हिन्दुओं! उपकार मानो कि शाहीन बाग़ ने एक शव यात्रा के लिए रास्ता दिया है, वो चाहते तो…

जमानत पर रिहा कार रेस कर रहे कॉन्ग्रेसी ‘विधायक-पुत्र’ मोहम्मद नालपाड की लग्जरी कार के टक्कर से 4 घायल

‘विधायक पुत्र’ और उनके रईशों वाली जिंदगी के कारनामों से आम जनता को कितनी असुविधा उठानी पड़ती है, यह अक्सर हम ख़बरों में देखते रहते हैं। इस बार ऐसे ही एक ‘विधायक-पुत्र’ ने कर्नाटक में नया कारनामा कर दिखाया है। ख़ास बात यह है कि यह ‘विधायक-पुत्र’ एक बड़े कॉन्ग्रेस नेता का बेटा है और जमानत पर बाहर घूम रहा है।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस नेता और विधायक एनए हैरिस का बेटा मोहम्मद नालपाड, जो 2 साल पहले मारपीट के मामले में जमानत पर बाहर है, फिर से विवादों में आ गया है। मोहम्मद नालपाड की लग्जरी बेंटले कार ने एक ऑटो और बाइक सवार को टक्कर मार दी, जिसमें 4 लोग घायल हो गए। यह हादसा बेंगलुरु रोड के पास हुआ।

कॉन्ग्रेस नेता का बेटा मोहम्मद नालपाड वर्ष 2018 में एक पब में एक शख्स को बुरी तरह पीट-पीटकर घायल कर देने के आरोप में जेल में बंद था। इसके बाद वो जमानत पर बाहर चल रहा है। कार को टक्कर मारकर चार लोगों को घायल करने के कारण मोहम्मद नालपाड एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

सोमवार को इस घटना में नया मोड़ तब आया जब मोहम्मद नालपाड के गनमैन ने इस घटना की जिम्मेदारी ली और कहा कि गाड़ी मोहम्मद नालपाड नहीं बल्कि वो चला रहा था। हालाँकि बेंगलुरु मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, CCTV में यह स्पष्ट देखा गया है कि मोहम्मद नालपाड और उसके दोस्त कार रेस कर रहे थे जब यह हादसा हुआ।

‘बेंगलुरु मिरर’ द्वारा जारी वीडियो से लिया गया मोहम्मद नालपाड की कार का स्क्रीनशॉट

यह हादसा बेंगलुरु के बेलारी रोड के पास रविवार (फरवरी 09, 2020) को हुआ। दरअसल, मोहम्मद नालपाड तेज गति से गाड़ी चला रहा था और कार पहले बाइक और फिर ऑटोरिक्शा से टकरा गई। कार के टक्कर मारने के बाद मोहम्मद नालपाड ने अपनी कार वहीं छोड़ दी और अपने दोस्त की गाडी में बैठकर वहाँ से भाग निकला।

इस टक्कर में एक बाइक सवार के पैर में फ्रेक्चर हुआ है और उसे अस्पताल भर्ती कर लिया गया और उसका अस्पताल में इलाज चल रहा है।