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उम्माह का खलीफा बनने चला था मलेशिया, मोदी सरकार के एक दाँव से निकली हेकड़ी

धर्म के नाम पर बने और धर्म के नाम पर आतंकी पैदा करने वाले पाकिस्तान का इस्लाम से भरोसा बीते साल ही डोल गया था। पाकिस्तानी सीनेट के पूर्व चेयरमैन मियॉं राजा रब्बानी ने तो यहॉं तक कह दिया था कि ‘इस्लामिक उम्माह का बुलबुला फट गया है’ और पाकिस्तान को उम्माह के साथ रिश्तों पर फिर से विचार करना चाहिए। पाकिस्तान की यह स्थिति कश्मीर के मसले पर मोदी सरकार की कूटनीति की वजह से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ने से हुई थी।

ऐसे वक्त में पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हुए मलेशिया ने कई बयान दिए। मोस्टवांटेड जाकिर नाइक को पनाह देने वाले मलेशिया ने जम्मू-कश्मीर, नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और NRC जैसे मुद्दों को वैश्विक मंचों पर उठाने की कोशिश की। मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने और एनआरसी-सीएए पर भारत की खुलकर आलोचना की। उसने जाकिर नाइक के प्रत्यर्पण से भी इनकार कर दिया। जबकि कुछ समय पहले तक वह खुद को भारत का अच्छा दोस्त बताता था। महातिर ने यह सब कुछ समुदाय विशेष के नाम पर किया।

उन्होंने किसी भी सूरत में भारत के सामने झुकने से इनकार किया। लेकिन अब मलेशिया की हेकड़ी निकलती दिख रही है। उसने कहा है कि पाम ऑयल को लेकर वह भारत से बातचीत कर रहा है। मलेश‍िया की प्राइम इंडस्ट्रीज मिनिस्टर टेरेसा कॉक ने कहा कि वह इस बारे में भारत के संपर्क में हैं। असल में मलेशिया के बदलते रूख को देखते हुए भारत ने पाम ऑयल के आयात पर पूरी तरह से रोक न लगाते हुए आयात घटाना शुरू कर दिया है। इससे उसकी बैचेनी बढ़ गई है।

ख़बर के अनुसार, टेरेसा कॉक ने कहा, “इस साल हमें अपने प्रमुख बाजारों से चुनौती मिलती दिख रही है।” उन्होंने कहा कि वह इस मसले पर मलेश‍िया में भारतीय उच्चायुक्त के सम्पर्क में हैं। उन्होंने कहा, “हमारे लिए यह ज़रूरी है कि राजनयिक चैनल से और सभी पक्षों से संवाद करें। हम सम्पर्क बनाए रखेंगे।”

इसके बाद मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने पाकिस्तान से पाम ऑयल के आयात को बढ़ाने की गुहार लगाई है। लेकिन, पाकिस्तान की दिवालिया हालत से तो सारी दुनिया वाक़िफ़ है। ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जो पाकिस्तान आर्थिक मदद के लिए बाक़ी देशों के आगे ख़ुद झोली फैलाए हुए है, वो मलेशिया की मदद कैसे करेगा।

बता दें कि पाम ऑयल के सन्दर्भ में भारत के साथ बिगड़ते रिश्तों का असर मलेशिया पर बड़े पैमाने पर पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मलेशिया से दो-तिहाई तेल भारत आता था। उस समय भारत में इस तेल के आयात पर सरकार की तरफ़ से कोई पाबंदी नहीं थी। लेकिन, भारत सरकार ने अब इसे “रिस्ट्रेक्टेड” श्रेणी में डाल दिया है। इस श्रेणी में डालने का मतलब है कि अब अगर किस व्यवसायी को मलेशिया से पाम ऑयल का आयात करना हो तो उसे सरकार से लाइसेंस लेना पड़ेगा।

भारत के इस क़दम से निश्चित तौर पर मलेशिया को एक बड़ा झटका लगा है। 2019 में भारत ने मलेशिया से 40 लाख टन पाम ऑयल आयात किया था, जो अब महज़ 0.9 लाख टन रह गया है। मलेशिया ने CAA और NRC को भारत सरकार का ग़लत और भेदभाव वाला क़दम बताया था। मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने पिछले साल, अक्टूबर में जम्मू-कश्मीर और CAA की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत ने कश्मीर में क़ब्ज़ा कर लिया है। CAA को लेकर कहा था कि भारत सरकार अशांति को बढ़ावा दे रही है।

वहीं, अगर मलेशिया के क़ानून और प्रशासन की बात करें तो वहाँ रहने वाले ग़ैर-मुस्लिमों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। नौकरियों से लेकर अन्य छोटे-मोटे कामों में हर क़दम पर भेदभावपूर्ण नीति अपनाई जाती है।

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दीपिका जानती हैं कि वो क्या कर रही हैं, लेकिन मैं टुकड़े-टुकड़े गैंग से साथ खड़ी नहीं होती: कंगना

बॉलीवुड में कंगना रनौत को उनकी बेहतरीन अदाकारी के साथ हर मुद्दे पर उनके बेबाकी से राय रखने के लिए जाना जाता है। कंगना न केवल सामाजिक मुद्दों पर खुल पर बात करती है, बल्कि राजनीति पर भी उनकी राय हमेशा स्पष्ट दिखती है। हाल ही में कंगना ने अपनी इसी छवि को कायम रखते हुए दीपिका पादुकोण के जेएनयू पहुँचने पर बात की।

स्पॉटब्वॉय को दिए अपने एक साक्षात्कार में दीपिका पादुकोण को लेकर कंगना रनौत ने कहा कि दीपिका जानती हैं कि वो क्या कर रही हैं और वो किन लोगों के साथ खड़ी हैं। इसलिए वे उनके बारे में कुछ नहीं कह सकती, लेकिन यहाँ कंगना ने ये भी साफ किया कि वे कभी भी टुकड़े-टुकड़े गैंग के पीछे नहीं खड़ी होती।

इस साक्षात्कार में कंगना ने दीपिका के बारे बात करते हुए स्पष्ट कहा, “उन्हें (दीपिका को) अपने लोकतांत्रिक अधिकार को एक्सप्रेस करने का पूरा अधिकार है। वो जानती हैं, कि वो क्या कर रही हैं। मुझे उनके बारे में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है, कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। मैं सिर्फ ये कह सकती हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए।”

कंगना ने इस इंटरव्यू में टुकड़े-टुकड़े गैंग पर अपना पक्ष साफ करते हुए कहा, “मैं कभी भी टुकड़े गैंग के साथ खड़ी नहीं होती। मैं ऐसे किसी भी शख्स का सपोर्ट नहीं कर सकती, जो देश को तोड़ने की बातें करता हो। मैं सिर्फ अपनी बात कर सकती हूँ, किसी और के बारे में बोलने का मुझे अधिकार नहीं है।”

गौरतलब है कि इस दौरान कंगना ने दीपिका की फिल्म छपाक का सोशल मीडिया पर बहिष्कार करने को लेकर भी बयान दिया। उन्होंने कहा कि इन सबसे फिल्म पर असर नहीं पड़ता, अगर फिल्म अच्छी होती है तो जरूर चलती है।

बता दें कंगना रनौत इससे पहले भी जेएनयू को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी और जेएनयू के खिलाफ आवाज उठाई थी। जबकि दीपिका पादुकोण जेएनयू में हुई हिंसा के बाद विरोध कर रहे छात्रों का समर्थन करने गई थीं।

अमेरिका से न्यूक्लियर और मिसाइल तकनीक स्मगलिंग करते फिर पकड़ा गया पाकिस्तान

पाकिस्तान के ऊपर न्यूक्लियर स्मग्लिंग और अवैध तरीके से मिसाइल टेक्नॉलोजी को हासिल करने का आरोप कोई नया नहीं है। बिना किसी विज्ञान और तकनीक के आधार पर अपने वैज्ञानिक एक क्यू खान की मदद से चोरी और धोखाधड़ी करके पाकिस्तान पहले परमाणु शक्ति संपन्न देश बना, फिर बैलिस्टिक मिसाइल पावर हासिल की। और अब एक बार फिर उसे तकनीक की चोरी करते पकड़ा गया है।

दरअसल, बुधवार को रावलपिंडी स्थित कंपनी ‘बिजनस वर्ल्ड’ से जुड़े पाँच पाकिस्तानियों पर अमेरिका में आरोप लगा है कि उन्होंने पाकिस्तान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम के लिए अमेरिकी तकनीक की स्मगलिंग की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने पाकिस्तान की चोरी पकड़ते हुए उसका खुलासा किया। उन्होंने कहा, ये पाँच पाकिस्तानी, हॉन्गकॉन्ग और यूके में रहते हैं। इनकी पहचान पाकिस्तान के मोहम्मद कामरान वली (41), कनाडा के मोहम्मद एहसान वली (48) और हाजी वली मोहम्मद शेख (82), हांगकांग के अशरफ खान मोहम्मद और इंग्लैंड के अहमद वहीद (52) के रूप में की गई है। जानकारी के अनुसार
इन सब पर इंटरनेशनल एनर्जी इकोनॉमिक पावर्स ऐक्ट और एक्सपोर्ट कंट्रोल रिफॉर्म ऐक्ट के उल्लंघन की साजिश रचने का आरोप लगा है।

विभाग का कहना है, “ये लोग बिजनस वर्ल्ड के लिए दुनियाभर से खरीद करने का नेटवर्क चलाते थे। बिजनस वर्ल्ड अडवांस्ड इंजिनियरिंग रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एईआरओ) और पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमिशन (पीएईसी) के लिए अमेरिका में बने उत्पाद खरीदती है। यह कंपनी अमेरिका से सामानों का निर्यात बिना एक्सपोर्ट लाइसेंस के ही करवाती है जो अमेरिकी कानून का खुला उल्लंघन है।”

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अमेरिकी असिस्टेंट अटॉर्नी जनरल जॉन सी डेमर्स ने कहा, “प्रतिवादियों (पाकिस्तानियों) ने अमेरिका में निर्मित उत्पाद उन संस्थानों को निर्यात किए जिन्हें अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में चिह्नित किया गया है क्योंकि इन संस्थानों के संबंध पाकिस्तान के हथियार कार्यक्रमों से है।” उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा मुद्दा है जो अमेरिका के लिए एक उदाहरण बन सकता है कि उसे निर्यात के नियमों को लागू करने में कड़ाई बरते।”

इसके अलावा, होमलैंड सिक्यॉरिटी इन्वेस्टिगेशंस के ऐक्टिंग स्पेशल एजेंट इन चार्ज जैसन मोलिना ने कहा, “इन पाँच लोगों का कथित व्यवहार अमेरिकी निर्यात कानूनों के उल्लंघन से कहीं ज्यादा बड़ा मसला है। इसने अमेरिकी सुरक्षा हितों के साथ-साथ क्षेत्र के विभिन्न देशों के बीच नाजुक शक्ति संतुलन के लिए भी खतरा पैदा कर दिया है।”

बता दें जस्टिस डिपार्टमेंट की प्रेस रिलीज के मुताबिक, एईआरओ और पीएईसी, दोनों अमेरिकी कॉमर्स डिपार्टमेंट की एंटिटि लिस्ट शामिल हैं। कॉमर्स डिपार्मटमेंट ही उन संस्थानों के लिए एक्सपोर्ट लाइसेंस अनिवार्य करता है जिनकी गतिविधियाँ अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा या विदेश नीति के हितों के विरुद्ध पाई जाती हैं। पीएईसी को यूएस कॉमर्स डिपार्टमेंट की एंटिटि लिस्ट में 1998 में जबकि एईआरओ को 2014 में शामिल किया गया था।

आजम खान के बेटे को SC का झटका, निर्वाचन रद्द करने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार

समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता व रामपुर सीट से सांसद आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम को विधायक पद से अयोग्य घोषित होने के फैसले से फिलहाल राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल्ला आजम का निर्वाचन रद्द करने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी।

बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब्दुल्ला आजम के रामपुर स्वार टांडा विधानसभा से 2017 के निर्वाचन को बीते साल 16 दिसंबर को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए अब्दुल्ला आजम खान की विधायकी रद्द कर कर दी थी कि साल 2017 में विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी उम्र चुनाव लड़ने के लिए कम थी और वो चुनाव लड़ने के योग्य नहीं थे। इसी को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने उनका निर्वाचन रद कर दिया था।

इसके बाद आजम खान के पुत्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। शुक्रवार (जनवरी 17, 2019) को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए अब्दुल्ला आजम के खिलाफ शिकायत करने वाले बसपा नेता नवाब काजिम अली को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।

दरअसल आजम खान बेटे ने अपना निर्वाचन रद्द होने को लेकर बसपा नेता नवाब काजिम अली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अब्दुल्ला आजम की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नवाब काजिम अली को नोटिस दी है। इस पर अब 25 मार्च को सुनवाई होगी। नवाब काजिम अली, अब्दुल्ला के खिलाफ 2017 के चुनाव में स्वार विधानसभा क्षेत्र से बीएसपी के उम्मीदवार थे।

गौरतलब है कि 24 अप्रैल 2017 को हाईकोर्ट में दायर चुनाव याचिका में नवाब काजिम अली खान ने अब्दुल्ला आजम की सीबीएसई बोर्ड की हाईस्कूल की मार्कशीट पेश की थी, जिसमें अब्दुल्ला की जन्मतिथि 01.01.1993 है। इसके हिसाब में वह चुनाव नहीं लड़ सकते थे। हालाँकि, पूरे मामले को लेकर अब्दुल्ला आजम का कहना था कि प्राइमरी में दाखिले के वक्त टीचर ने अंदाज से जन्मतिथि दर्ज की थी। उनकी माँ तंजीन फातिमा ने भी कहा था कि अब्दुल्ला का जन्म 30 सितंबर 1990 को हुआ था। तंजीन फातिमा ने कोर्ट को बताया था कि अब्दुल्ला का जन्म लखनऊ में हुआ था।

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CAA-NRC समर्थन का अनूठा तरीका: UP में कपल ने शादी कार्ड तो पर्वतारोही ने सबसे ऊँची चोटी पर लहराया बैनर

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) व राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर लोग अलग-अलग तरीके से समर्थन जता रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चन्दौसी में एक कपल ने CAA व NRC के समर्थन का अनूठा तरीका निकाला है। कपल ने अपने विवाह के निमंत्रण पत्र में सीएए व एनआरसी के सर्मथन की घोषणा की है।

बता दें कि मोहित मिश्रा और सोनम पाठक 3 फरवरी 2020 को शादी के बँधन में बँधने वाले हैं। कपल ने विवाह आयोजन के लिए तैयार किए गए निमंत्रण कार्ड में वैवाहिक कार्यक्रमों के साथ यह भी विशेष तौर पर छपवाया है, “हम सीएए व एनआरसी का समर्थन करते हैं।” अब यह निमंत्रण कार्ड वितरित किए जा रहे हैं। कपल के परिवार का मानना है कि उन्हें अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार है। इसलिए उन्होंने अपने विचारों को अन्य लोगों तक पहुँचाने के लिए यह तरीका अपनाया है।

इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पदाधिकारी और पर्वतारोही विपिन चौधरी ने नागरिकता संशोधन कानून को अपना समर्थन देने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। उन्होंने नागरिक संशोधन कानून के समर्थन में दक्षिण अमेरिका स्थित सबसे ऊँचे पर्वत एकोनकागुआ पर CAA समर्थन का बैनर फहराया है।

उन्होंने द प्रिंट को बताया कि वो 1 जनवरी को एकोनकागुआ की चोटी पर पहुँचे थे। वहाँ पर पहुँचने के बाद सबसे पहले उन्होंने तिरंगा लहराया और फिर उसके बाद उन्होंने एक बैनर लहराया। उस बैनर पर लिखा था, “मैं नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन करता हूँ।” विपिन चौधरी ने आगे कहा, “मैं दुनिया को बताना चाहता हूँ कि भारतीय CAA को लेकर क्या महसूस करते हैं और मैं अपने देशवासियों से यह भी कहना चाहता हूँ कि हमें CAA का सपोर्ट करना चाहिए।” 

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने 18 दिसंबर को अर्जेंटीना के एकोनकागुआ पर चढ़ाई शुरू की थी तो तब तक तब तक नागरिक संशोधन विधेयक पास हो चुका था और उसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो चुके थे। उन्होंने कहा कि वह अपने साथ कानून के समर्थन वाला बैनर लेकर गए थे। उन्होंने वहाँ पर नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन वाला बैनर लहराकर अपनी विचारधारा की प्रतिबद्धता को दोहराया।

मुंबई से नमाज पढ़ने निकला था ‘डॉ. बम’, कानपुर की मस्जिद से निकलते धराया

मुंबई से गुरुवार (जनवरी 16, 2020) को लापता हुआ आतंकी जलीस अंसारी शुक्रवार को कानपुर में पकड़ा गया। इसकी जानकारी उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने दी। उन्होंने कहा कि जलीस अंसारी को कानपुर की एक मस्जिद से बाहर निकलते वक्त गिरफ्तार किया गया। उसे लखनऊ लाया जा रहा है। उन्होंने इसे उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया। फिलहाल उससे पूछताछ जारी है।

अंसारी 90 के शुरूआती दशक से अब तक 50 से ज्यादा जगहों पर बम धमाका कर चुका है। फिलहाल वह 1993 में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा था। उसे अजमेर जेल से 21 दिन के
परोल पर छोड़ा गया था। शुक्रवार (जनवरी 17, 2020) को यानी आज उसकी परोल अवधि खत्म हो रही थी और उसे अजमेर जेल पहुँचना था। पेरोल मिलने के बाद वह मुंबई स्थित अपने परिवार से मिलने आया हुआ था।

गुरुवार को उसके बेटे जैद ने पिता के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि जलीस अंसारी तड़के उठा और घरवालों से नमाज पढ़ने की बात कहकर निकला। लेकिन वापस नहीं लौटा।

गौरतलब है कि अंसारी अग्रीपाडा थाने के अंतर्गत मोमिनपुर का रहने वाला है। वह देश के विभिन्न हिस्सों में हुए कई धमाकों में भी सदिंग्ध है। उसे बम बनाने में महारत हासिल है। इसके कारण उसे डॉ. बम भी कहते हैं। वह सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों से जुड़ा था और उन्हें बम बनाना सिखाता था। यही कारण है कि उसके गायब होने की जानकारी मिलते ही महाराष्ट्र एटीएस, मुंबई क्राइम ब्रांच समेत अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गई थी।

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कुछ तो परीक्षा, चुनाव में भी इंटरनेट पर लगा देते हैं पहरा, यहाँ तो प्राइम टाइम में प्रोपेगेंडा की आजादी

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार (17 जनवरी 2020) को वकील एहतेशाम हाशमी ने एक जनहित याचिका दायर की। इसके जरिए शीर्ष अदालत से इंटरनेट शटडाउन को असंवैधानिक और अवैध घोषित करने की अपील की गई है। यह तथ्य छिपा नहीं है कि जम्मू-कश्मीर हो या नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में भड़की हिंसा के बाद देश के कुछ शहरों में इंटरनेट पर जो पाबंदी लगाई गई थी, वह आतंकी खतरों और सुरक्षा के मद्देनजर किया गया था। आशंका रहती है कि देश के दुश्मन और असमाजिक तत्व इंटरनेट का इस्तेमाल हिंसा को भड़काने के लिए कर सकते हैं।

बावजूद इसके भारत की कथित सेक्युलर मीडिया, वामपंथी-लिबरल गैंग इस मसले को प्रोपेगेंडा की चाशनी में इस कदर लपेट कर परोसता है कि जैसे अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा बिठा दिया गया हो। पिछले महीने इंटरनेट शटडाउन पर एक रिपोर्ट आने के बाद इसी तरह का माहौल बनाने की कोशिश की गई थी। हाल में जब सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी को लेकर टिप्पणी की तो ‘गिरोह’ ने उसे भी गलत तरीके से पेश किया।

अब एक वैश्विक रिपोर्ट आई है जो इस प्रोपेगेंडा को तार-तार कर देती है। जो बताती है कि इंटरनेट की आजादी के मामले में भारत काफी आगे है। न केवल पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी, बल्कि रूस जैसे विकसित राष्ट्रों से भी। भारत में इंटरनेट की आजादी सिंगापुर जैसे अत्याधुनिक मुल्क से लेकर उम्माह का दंभ भरने वाले इस्लामी मुल्कों से भी काफी बेहतर है।

टेक रिसर्च कंपनी कंपैरीटेक ने दुनिया के 181 देशों में इंटरनेट की आजादी को लेकर यह सर्वे किया है। इसमें बताया गया है कि कई अफ्रीकी मुल्कों में चुनाव के वक्त सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया जाता है। मसलन, मॉरीतानिया। इथोपिया और सोमालिया जैसे देश तो स्कूलों में परीक्षा के दौरान भी इंटरनेट पर पाबंदी लगा देते हैं।

इस रिपोर्ट में 10 कारकों के आधार पर देशों की रैंक तैयार की गई है,

  • टॉरेंट रिस्ट्रिक्टिड
  • टॉरेंट बैन
  • पॉर्नोग्राफी रिस्ट्रिक्टिड
  • पॉर्नोग्राफी बैन
  • पॉलिटिरल मीडिया रिस्ट्रिक्टिड
  • पॉलिटिकल मीडिया सेंसर
  • सोशल मीडिया रिस्ट्रिक्टिड
  • सोशल मीडिया बैन
  • वीपीएन रिस्ट्रिक्टिड
  • वीपीएन बैन

इंटरनेट सेंसरशिप 2020 की इस रिपोर्ट में स्कोर के जरिए विश्व के उन देशों के बारे में बात हुई, जो इंटरनेट सेंसरशिप के लिहाज से सबसे खराब पाए गए। जहाँ इंटरनेट इस्तेमाल करने पर इतनी पाबंदी है कि लोग सोशल मीडिया से न केवल दूर हैं, बल्कि ग्लोबल इंटरनेट का इस्तेमाल तक नहीं कर पाते। इनमें नॉर्थ कोरिया, चीन,
रूस, तुर्की, ईरान जैसे देशों का नाम सबसे ऊपर है। इन्हें ‘इंटरनेट सेंसरशिप के लिए सबसे खराब देश’ की सूची में 10/10, 9/10, 8/10 अंक प्राप्त हुए हैं। बता दें इन देशों को ये स्कोर उस देश की जनता द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे सोशल मीडिया, टॉरेंट या वीपीएन के इस्तेमाल और पॉर्न देखने पर आँका गया। पाकिस्तान को 10 में से सात नंबर मिले। पाकिस्तान के अलावा बेलारूस, तुर्की, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और इरिट्रिया को भी 10 में से सात नंबर मिले। सेंसरशिप स्केल में यह नंबर इंटरनेट फ्रीडम के मामले में काफी खराब स्थिति को इंगित करता है।

नॉर्थ कॉरिया में लोगों के लिए न केवल सोशल मीडिया इस्तेमाल करने, पॉर्न देखने और टॉरेंट इस्तेमाल पर प्रतिबंध है, बल्कि वहाँ तो सूचना भी सिर्फ़ एक स्त्रोत के जरिए ही पहुँचती है। इसका नाम है- द कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी। इसके बाद इस सूची में चीन है। जिसे इस मामले में 9/10 स्कोर मिला है। यहाँ पश्चिमी सोशल मीडिया, पॉर्न और वीपीएन सब ब्लॉक है। पॉलिटिकल मीडिया पर तो भारी सेंसशिप है। जानकारी के मुताबिक चीन में अगर पत्रकारों को सरकार के ख़िलाफ़ कुछ भी करते हुए देख लिया जाता है तो उन्हें फौरन जेल की सजा सुना दी जाती है।

रूस, तुर्की और ईरान को 8 नंबर मिले हैं। इन देशों में भी पॉलिटिकल मीडिया पर भारी सेंसर लगा है। मगर, अगर इनके बारे में अलग-अलग बात करें तो इन तीनों देशों के इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर अपने कानून हैं। जैसे रूस में टॉरेंस साइट्स और वीपीएन ब्लॉक है। लेकिन यहाँ पूर्ण रूप से पॉर्न या सोशल मीडिया ब्लॉक नहीं है। रूस में पॉर्न देखना गैरकानूनी नहीं हैं। लेकिन ऐसा कुछ प्रोड्यूस करना जुर्म है। इसके अलावा रूस में प्रतिबंध होने के बावजूद कई सोशल मीडिया साइट्स का लोग इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन इन पर सरकार कड़ी निगरानी और नियंत्रण रखती है। इनके इस्तेमाल के लिए यूजर्स को अपना मोबाइल नंबर रजिस्टर करना पड़ता है। यहाँ बता दें, रूस अपना खुद का इंटरनेट बनाने पर विचार कर रहा है।

इसी तरह ईरान में वीपीएन ब्लॉक हैं। लेकिन यहाँ टॉरेंटिंग को पूर्ण रूप से बैन नहीं किया गया है। इसके अलावा ईरान में पॉर्नोग्राफी बैन है, लेकिन सोशल मीडिया का थोड़ा बहुत इस्तेमाल होता है। यहाँ न्यूज़ मीडिया सेंसरशिप के दायरे में आती है। ईरान के उलट तुर्कीस्तान में सोशल मीडिया ब्लॉक है, लेकिन प़ॉर्न पर, टॉरेंटिंग पर, वीपीएन के इस्तेमाल पर इतना प्रतिबंध नहीं हैं।

इसके बाद बेलारूस, तुर्की, ओमान, पाकिस्तान, यूनाइटिड अरब और इरीट्रिया को इस स्कोर बोर्ड में 7 अंक मिले हैं। क्योंकि इन सभी देशों में इंटरनेट सेंसरशिप के एक जैसे तरीके हैं। इन सभी देशों में पॉर्न बैन है। पॉलिटिकल मीडिया पर प्रतिबंध हैं। इसके अलावा पाकिस्तान में टॉरेंटिंग बैन है और इरीट्रिया में सोशल मीडिया।

अब जाहिर है कि इस सूची आने के बाद ये तो साफ हुआ कि भारत इंटरनेट सेंसरशिप पर विश्व में सबसे आगे नहीं है। हाँ, ये बात जरूर है कि भारत में पड़ोसी मुल्क और विपक्षियों के भड़काने से परिस्थितियाँ ऐसी उत्पन्न होती है कि चाहते, न चाहते हुए सरकार को कई बार कई इलाकों में इंटरनेट ठप्प करना पड़ता है। वो भी सिर्फ़ इसलिए होता है, ताकि कानून-व्यवस्था के हालात ना बिगड़े। अफवाहों को रोका जा सके। इंटरनेट के जरिए फैलाई जाने वाली अराजकता को नियंत्रित किया जा सके। अभियव्यक्ति की आजादी और सूचना प्राप्त करने का अधिकार छीनने के लिहाज से इंटरनेट बंद नहीं किया जाता।

लेकिन फिर भी जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी को तूल दी गई। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले इस मामले को कोर्ट तक ले गए।बता दें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बाद राज्य में धारा 144 लागू करने के साथ ही इंटरनेट सेवाएँ बेमियादी तौर पर बंद कर दी गई थीं। साथ ही मोबाइल इंटरनेट, वायरलाइन या लैंडलाइन सर्विस के साथ ही वायर ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाएँ स्थगित की गई थीं। सिर्फ़ इसलिए ताकि वहाँ के लोग किसी बहकावे में न आए। पड़ोसी मुल्क और विपक्षियों के अराजक तत्वों के प्रोपेगेंडा में न फॅंसे।

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर प्राइम टाइम में प्रोपेगेंडा रचने वालों, हिंदू विरोधी घृणा से भरे लिबरल गैंग को आइना दिखाता है। बताता है कि अभिव्यक्ति की यह आजादी उन्हें उस पाकिस्तान में भी नहीं मिलती जो उनके हवाले से अक्सर भारत विरोधी दुष्प्रचारों को हवा देता रहता है।

परमादरणीय रवीश कुमार, भारत का दिल छोटा नहीं, आपकी नीयत में खोट है

बात रवीश कुमार के ‘सूत्रों’, ‘कई लोगों से मैंने बात की’, ‘मुझे कई मैसेज आते हैं’, वाली पत्रकारिता की

रवीश कुमार इतना ज्ञान क्यों बाँच रहे हैं? एंकर तो आप भी बना दिए गए हैं, मैनेज तो आप भी हो रहे हैं

छात्रों ने कुलपति राकेश भटनागर पर लगाए धाँधली के गंभीर आरोप: शहर में लगे ‘BHU वीसी हिंदी विरोधी’ के पोस्टर

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में एक के बाद एक नए विवाद सामने आ रहे हैं। हाल ही में फिरोज खान की नियुक्ति का विवाद किसी तरह शांत ही हुआ था कि विश्वविद्यालय में एक दूसरे विवाद ने जन्म ले लिया है। BHU के छात्रों ने विश्वविद्यालय में चल रही नियुक्तियों में धाँधली और भेदभाव का आरोप कुलपति राकेश भटनागर और BHU प्रशासन पर लगाया है। इतना ही नहीं इस बार विवाद परिसर से निकलकर शहर भर में चर्चा का विषय है हालाँकि JNU, जामिया, AMU में उलझा देश अभी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है लेकिन छात्रों ने विश्वविद्यालय के वीसी पर गँभीर आरोप लगाते हुए उनके ख़िलाफ शहर भर में होर्डिंग्स और पोस्टर चस्पा कर दिए हैं। पोस्टर-होर्डिंग्स पर वीसी को हिंदी विरोधी बताते हुए लिखा है, ‘BHU वीसी हिंदी विरोधी’ और उनसे इस्तीफे की माँग की है।

शहर भर के प्रमुख चौराहों पर होर्डिंग्स लगने के बाद विश्वविद्यालय एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है। इस बार विश्वविद्यालय के छात्रों ने वीसी राकेश भटनागर के ख़िलाफ मोर्चा खोलते हुए चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए हैं, जिसमें बड़े अक्षरों में लिखा है ‘BHU वीसी हिंदी विरोधी।’

छात्रों ने आरोप लगाया है कि वीसी हिन्दी भाषी छात्रों के साथ भेदभाव कर रहे हैं और हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, हमारे मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। यहाँ तक कि भर्ती प्रक्रिया में वह अपने JNU के छात्रों को वरीयता दे रहे हैं। बता दें कि BHU के कुलपति राकेश भटनागर JNU के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं उन पर BHU का कुलपति रहते हुए अधिकांश नियुक्तियों में JNU, वामपंथ और अँग्रेजी को वरीयता देने जैसे कई गंभीर आरोप छात्रों ने पहले भी लगाए हैं।

इतना ही नहीं शहर भर में दीवारों पर भी पोस्टर चस्पा किए गए हैं, जिनमें वीसी पर वही आरोप दोहराए गए हैं, जोकि होर्डिंग्स में आरोप लगाए गए हैं। साथ ही छात्रों ने वीसी से इस्तीफा देने की माँग की है। जानकारी के मुताबिक इस काम को विश्नविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों ने देर रात तक पूरा किया गया। सुबह जब राहगीरों ने देखा और पढ़ा तो सभी दंग रह गए और देखते ही देखते शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।

बीएचयू वीसी के ख़िलाफ़ वाराणसी की दीवारों पर लगाए गए पोस्टर (साभार- अमर उजाला)

दरअसल पिछले महीने इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए एक साक्षात्कार चल रहा था। आरोप है कि इस साक्षात्कार में वीसी ने धाराप्रवाह अँग्रेजी नहीं बोलने वाले केंडीटेड्स को बाहर कर दिया था, जिसके बाद से कई छात्र वीसी के ख़िलाफ विरोध करते हुए उनसे इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। साथ ही छात्रों ने माँग की है कि नियुक्ति प्रक्रिया की जाँच अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में कराई जानी चाहिए।

इतना ही नहीं शुक्रवार को आयोजित दो दिवसीय पुरातन छात्र सम्मेलन में भी छात्रों नें वीसी के ख़िलाफ लिखे पोस्टरों को हाथ में लेकर लहराना शुरू कर दिया। इस बीच समागम में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया, जिसे संभालने के लिए प्रॉक्टर टीम ने वीसी का विरोध कर रहे कई छात्रों को हिरासत में ले लिया। हिरासत में लेने के बाद इन छात्रों से क़रीब 4 घंटे तक प्रॉक्टर ऑफिस में बैठाए रखा गया और बाद में हिदायत देकर छोड़ दिया गया। BHU के छात्रों ने ही ऑपइंडिया को बताया कि इन दिनों विश्वविद्यालय में 200 शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है।

‘पुरातन छात्र समागम’ में वीसी का विरोध करते छात्र (साभार- दैनिक जागरण)

वहीं विश्वविद्यालय ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि हमें हाल ही में इंस्‍टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा मिला है। इसके तहत बीएचयू को वैश्विक रैंकिंग में लाना है, जिसके लिए ऐसी फैकल्‍टी की तलाश करनी हो जो ग्‍लोबल लैंग्‍वेज यानि कि अँग्रेजी की अच्‍छी समझ रखता हो।

गौरतलब है कि BHU में प्रोफेसर फिरोज़ ख़ान की संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में नियुक्ति किए जाने के बाद से कुलपति राकेश भटनागर पूरे देश में चर्चा में आए थे। उस समय भी फिरोज खान को SVDV में नियुक्त करने के लिए 10 में से 10 मार्क्स दिए गए थे तब छात्रों ने अन्य 8 को 0-2 मार्क्स दिए जाने पर आपत्ति जताई थी तब भी नियुक्ति में धाँधली के आरोप लगाए गए थे।

बिग BC का नया चुटकुला: ‘कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी ही नहीं, पूरी सरकार चिंतित है’

लोकसभा चुनावों में अपनी वामपंथी पलटन और मीडिया गिरोह के बलबूते बेगूसराय से ‘सांसद’ बनने के सपने देखने वाले कन्हैया कुमार को नतीजों वाले दिन जमीन पर मुँह के बल गिरना पड़ा था। 4 लाख वोटों से हारे थे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सरगना। स्थिति ये थी कि चुनाव प्रचार तक में लोग उनका चेहरा नहीं देखना चाहते थे। वो तो स्वरा भास्कर जैसे मौक़ापरस्त कलाकारों का भला हो, जिन्होंने कैंपेनिंग में पहुँचकर लोगों को इकट्ठा कर लिया। वरना जिग्नेश मेवानी जैसे नेताओं को अपनी मम्मी कसम खाकर लोगों को यकीन दिलवाना पड़ रहा था कि कन्हैया कुमार वाकई अच्छा आदमी है।

खैर, ये सब पुरानी बातें हैं। लोकसभा चुनाव के बाद तो कन्हैया कुमार कई मसलों को लेकर चर्चा में आए। आजकल उन्हें सीएए/एनआरसी के प्रदर्शनों में देखा जाता है। उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि ट्विटर पर उन्हें हर बात पर दुत्कार मिलती है। लेकिन, इतने सबके बावजूद उनके गिरोह के लोगों की हिम्मत देखिए, वो आज भी कन्हैया कुमार के लिए जनसंपर्क का काम कर रहे हैं। इसी सूची में एक नाम बिग बीसी करने वाले बीबीसी का है। जो अपने प्रोपगेंडा के चलते न केवल कन्हैया कुमार की इमेज बिल्डिंग कर रहा हैं, बल्कि अपने पाठकों को ये सूचना दे रहा है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार, कन्हैया कुमार की बढ़ती लोकप्रियता से चिंता में है।

जी हाँ। रॉयटर्स का हवाला देकर बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि नरेंद्र मोदी के एक क़रीबी ने उन्हें खुद जानकारी दी है कि युवाओं और वोटरों के बीच कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी सरकार चिंतित है।

अब ये खुद सोचिए, क्या सच में! गिरोह की लाख कोशिशों के बाद भी जिस प्रधानमंत्री को भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री होने का तमगा प्राप्त हो, उन्हें या उनकी सरकार को कन्हैया कुमार की लोकप्रियता चिंता में डालेगी। क्या सच में! जनता की भलाई में जुटी सरकार जेएनयू के कन्हैया कुमार की लोकप्रियता को लेकर शोक मनाएगी। क्या वाकई! जो व्यक्ति देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन चुके हों, जिनके नेतृत्व के गुणगान अमेरिका, रूस करे। जिनकी प्रतिबद्धता का लोहा उनके निर्णयों में दिखे, जिन्हें मुस्लिम देश अपने मुल्क में बुलाकर सम्मान दें। उन्हें या उनकी सरकार को कन्हैया कुमार के बढ़ते कद की फिक्र सताएगी? शायद नहीं और बिलकुल नहीं। इसलिए बिग बीसी को समझ जाना चाहिए कि हर कोई कन्हैया कुमार की तरह डॉक्टर की डिग्री हासिल करने के बाद प्रदर्शनों का ठेका नहीं उठाता, तो वो तो प्रधानमंत्री मोदी हैं। जिनके आत्मविश्वास ने उन्हें दोबारा देश का प्रधानसेवक बनाया।

लेकिन, इतने सबके बावजूद बिग बीसी की नीयत को देखकर लगता है कि वो मानकर चल रहे हैं कि उनके लेख छापने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में खलबली मच गई है। उनके सभी नेता अपनी कमियों पर सोच-विचार कर रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री करीब तीन दिनों से सो नहीं पाए हैं और अमित शाह को भाजपा के कोर ग्रुप की मीटिंग करते देखा गया है क्योंकि शाहीन बाग में कन्हैया के जाने के बाद अब सरकार गिरना तय है।

मगर रुकिए! जरा इसी रिपोर्ट पर उन ट्विटर यूजर्स का रिएक्शन देखिए। जिन सोशल मीडिया यूजर्स के लिए बीबीसी ने इतना प्रोपगेंडा तैयार किया, वो कैसे अपने विवेक से उसी को तार-तार कर रहे हैं।

बीबीसी के इस ट्वीट पर सोशल मीडिया यूजर्स न केवल कन्हैया कुमार की खिल्ली उड़ा रहे हैं, बल्कि बीबीसी की रिपोर्ट के लिए उसे हमेशा की तरह धिक्कार रहे हैं। उसे तलवे चाटने वाला चैनल बता रहे हैं। डूब मरने की बात कर रहे हैं। गद्दार कह रहे हैं। साथ ही ये भी कह रहे हैं कि चिरकुट चिलगोजे को बिहार ने उसकी औकात बता दी। अब बारी बीबीसी की है।

बता दें, सोशल मीडिया यूजर्स का पूछना है, “अभी चार महीने पहले कन्हैया कुमार की जमानत जब्त हुई है बेगूसराय में! कौन सी लोकप्रियता से मोदी चिंतित हैं जमानत जब्त वाली।”

गौरतलब है कि इसके अलावा बीबीसी को ऐसी आधारहीन खबरें चलाने पर लोकप्रियता का असली मतलब समझाया जा रहा है। और यूजर्स कन्हैया के लिए लिख रहे है, “कन्हैया कुमार सिर्फ मीडिया वालों के लिए लोकप्रिय है, आम जनता कन्हैया कुमार का नाम भी सुनना नही चाहती है, लोगों का खून खोल उठता है, लोग उसे देशद्रोही और गद्दार, टुकड़े टुकड़े गैंग का आदमी बुलाते हैं, और यह भी कहते हैं लोग जो देश का नहीं वह किसी का नहीं हो सकता है।”

एक अन्य यूजर बीबीसी और अन्य मीडिया गिरोह को लताड़ लगाते हुए कहता है, “कन्हैया कुमार जैसे देशद्रोही का महिमा मंडन सिर्फ़ BBC न्यूज़, NDTV और कुछ दलाल मीडिया वाले ही करते हैं।”

निर्भया गैंगरेप के दोषी की दया याचिका ख़ारिज: पीड़िता के पिता ने कहा- केजरीवाल ने सत्ता के लिए किया इस्तेमाल

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने निर्भया गैंगरेप के दोषी मुकेश सिंह की दया याचिका खारिज कर दी है। मुकेश ने जनवरी 14, 2020 को सुप्रीम कोर्ट से क्यूरेटिव पिटिशन खारिज होने के बाद राष्ट्रपति से दया की गुहार लगाई थी।

मुकेश सिंह उन 6 आरोपितों में शामिल था, जिन्होंने 2012 में निर्भया गैंगरेप को अंजाम दिया था। छह में से चार
आरोपितों को दिल्ली कोर्ट ने फाँसी की सजा दी थी, जबकि 1 आरोपित राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फाँसी लगा ली थी। वहीं, दूसरे नाबालिग आरोपित को सुधारगृह भेज दिया गया था, जो कि अब रिहा हो गया है।

दिल्ली की पटियालाा हाउस कोर्ट ने मुकेश समेत चार दोषियों को फाँसी देने के लिए 22 जनवरी का डेथ वॉरंट जारी किया था। हालाँकि, बृहस्पतिवार (जनवरी 16, 2020) को कोर्ट ने कहा कि मुकेश की दया याचिका राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास लंबित होने के कारण 22 जनवरी को फाँसी नहीं दी जा सकती है।

निर्भया के पिता ने केजरीवाल पर लगाया राजनीति करने का आरोप

रिपोर्ट्स के अनुसार, निर्भया के पिता का कहना है कि दिल्ली सरकार तब तक सोई रही, जब तक हम लोग आगे नहीं बढ़े। उन्होंने कहा कि आखिर दिल्ली सरकार ने जेल अथॉरिटी से पहले क्यों नहीं कहा था कि आप फाँसी के लिए नोटिस जारी करो। तब तक उन्होंने जेल प्रशासन से कुछ नहीं कहा। निर्भया के पिता ने कहा कि यदि इलेक्शन से पहले कोई फैसला नहीं आता है तो इसके जिम्मेदार अरविंद केजरीवाल होंगे। साथ ही उन्होंने अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाते हुए कहा कि केजरीवाल ने सत्ता में आने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल किया।

निर्भया की माँ ने कहा- दोषियों को फाँसी देने में हो रही है राजनीति

दूसरी ओर, निर्भया गैंग रेप मामले में आरोपितों की फाँसी में हो रही देरी पर पीड़िता की माँ आशा देवी ने बीजेपी और आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जो लोग 2012 में हाथ में तिरंगा लेकर इंसाफ के लिए सड़क पर उतरे थे आज वही लोग राजनीति के लिए निर्भया के दोषियों की फाँसी टाल रहे हैं। कोई कह रहा है कि दिल्ली सरकार फाँसी में देरी कर रही है तो दिल्ली सरकार कह रही है कि दिल्ली पुलिस हमें दे दो।