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JNU हिंसा में धरे गए वामपंथी, 9 की तस्वीर जारी: AISA, AISF, DSF, SFI के कई रंगरूट

रविवार (जनवरी 5, 2019 को जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय (JNU) में हुई हिंसा का खुलासा हो गया है। क्राइम ब्रांच के डीसीपी ने हिंसा का खुलासा करते हुए 4 लेफ्ट ग्रुप का हाथ बताया। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप ग्रुप, प्राइम विटनेस के आधार पर आरोपितों तक पहुँचना मुमकिन हो सका, क्योंकि विश्विद्यालय के छात्रों ने 4 जनवरी को सीसीटीवी को डैमेज कर दिया था। 

पुलिस ने इसमें AISA, AISF, DSF और SFI के शामिल होने की भी बात कही। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में हुई हिंसा में जेएनयू छात्र संघ प्रेसीडेंट आइशी घोष समेत चुनचुन कुमार, पंकज मिश्रा, प्रियरंजन, योगेंद्र भारद्वाज, वास्कर विजय मेक, सुचिता तालुकदार, डोलन सामंता और विकास पटेल का नाम शामिल है। डीसीपी ने बताया कि इस हिंसा के पीछे व्हाट्सएप ग्रुप का भी हाथ है, जिसका नाम है- यूनिटी अगेन्स्ट लेफ्ट। इस ग्रुप में 60 सदस्य हैं और योगेंद्र भारद्वाज इस ग्रुप का एडमिन है।

डीसीपी का कहना है कि 4 जनवरी को ही जेएनयू के सीसीटीवी को डैमेज कर दिया गया था, जिसकी वजह से जाँच करने में काफी दिक्कतें हुईं। हालाँकि वहाँ पर मौजूद लोगों के द्वारा मोबाइल से बनाए वीडियो और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसमें काफी मदद की। पुलिस ने अब तक सभी आरोपितों की तस्वीरें भी जारी कर दी है।

पुलिस ने बताया कि 4 जनवरी को फिर कुछ लोग विश्विद्यालय के अंदर घुसे और सर्वर को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। इसके बाद सारा प्रोसेस रुक गया। इसके बाद अगले दिन रजिस्ट्रेशन करने वाले छात्र के साथ मारपीट की गई। फिर अगले दिन इन्हीं लोगों ने पेरियार हॉस्टल में जाकर मारपीट की, जिसमें छात्रसंघ के लोग भी थे।

उसी समय कुछ वाट्सएप ग्रुप भी बनाया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा गया कि सीसीटीवी फुटेज नहीं मिल पाए, लेकिन वायरल फोटो और वीडियो से काफी मदद मिली है। यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट नाम के ग्रुप में 60 लोग हैं। कुछ लोगों को चिन्हित किया गया है। इन लोगों को नोटिस जारी किया जा रहा है। उनसे और जानकारी माँगी जाएगी।

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एमएस रंधावा ने कहा कि प्रदर्शनकारी लगातार कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। कल भी कुछ प्रदर्शनकारी जबरन कनॉट प्लेस चले गए, जो जेएनयू स्टूडेंट यूनियन से जुड़े थे, इनकी वजह से आम लोगों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा। मामले की जाँच चल रही है और जैसे-जैसे और तथ्य सामने आएँगे, मीडिया के सामने रखा जाएगा।

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लड़कियों के प्राइवेट पार्ट्स पर हमला करने वालों के साथ खड़ी हुईं दीपिका: स्मृति ईरानी

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के प्रदर्शनकारी वामपंथी छात्रों के बीच पहुॅंचने को लेकर दीपिका पादुकोण की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि दीपिका अच्छी तरह से जानती थीं कि वे उस टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में खड़ी हैं, जो भारत के विनाश की कामना करते हैं।

एक कार्यक्रम के दौरान स्मृति ईरानी ने कहा, “मैं ये जानना चाहती हूँ कि उनकी राजनीतिक विचारधारा क्या है। जिस किसी ने भी ये ख़बर पढ़ी उन्हें ये पता है कि वो आखिर वहाँ क्यों गईं। ये हमारे लिए हैरानी की बात नहीं है कि वो उन लोगों के साथ खड़ी हुईं, जो भारत की बर्बादी चाहते हैं। वो उनके साथ खड़ी हुईं, जिन्होंने लाठियों से लड़कियों के प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया। मैं उनका ये अधिकार छीन नहीं सकती।”

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ‘ThinkEdu Conclave 2020’ के समापन सत्र के कार्यक्रम के दौरान चेन्नई में यह बात कही। एक साक्षात्कार का हवाला देते हुए कहा उन्होंने कहा दीपिका ने साल 2011 में ही बता दिया था कि वे कॉन्ग्रेस पार्टी का समर्थन करती हैं। साक्षात्कार में उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गाँधी का समर्थन किया था। उन्होंने कहा, “इसके बारे में लोग पहले नहीं जानते थे। इसलिए हैरान हैं। उनके बहुत सारे फैंस को इस बारे में अभी-अभी पता चला है।”

JNU में हुई हिंसा के मद्देनज़र केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जब सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, “मैं इतना कहना चाहूँगी कि इस मामले में अभी जाँच चल रही है। मैं संवैधानिक पद पर हूँ और पुलिस की तरफ़ से जाँच के पहलू कोर्ट के समक्ष रखें जाने तक कुछ कहना ठीक नहीं होगा।” कार्यक्रम के दौरान पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए उनका एक वीडियो भाजपा नेता तजिंदर पाल बग्गा ने भी ट्वीट किया है।

ग़ौरतलब है कि मंगलवार (7 जनवरी) को दीपिका जेएनयू पहुॅंची थीं। बात में यह बात सामने आई कि उनका जेएनयू जाना फ़िल्म ‘छपाक’ के प्रचार की पैंतरेबाजी थी। इस दौरान दीपिका ने JNU छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष से मुलाक़ात भी की। हालॉंकि सार्वजनिक तौर पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन, हिंसा के बाद छात्रों के एक खास समूह से ही मुलाकात को लेकर उनकी खासी आलोचना हो रही है।

बता दें कि फ़िल्म छपाक की बात करें तो ये दिल्ली की एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी से प्रेरित है। फ़िल्म में दीपिका पादुकोण संग विक्रांत मैसी, अंकित बिष्ट संग अन्य एक्टर्स हैं। मेघना गुलज़ार के निर्देशन में बनी फ़िल्म छपाक, 10 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है।

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‘जिन्ना वाली आजादी’ के नारे से गूँजा शाहीन बाग: CAA के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन का पर्दाफाश, Video Viral

नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद पूरे देश में इस्लामिक कट्टरपंथियों और वामपंथियों ने उत्पात मचाया। विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंदू विरोधी नारे लगाए गए। ‘फक हिंदुत्व’ लिखकर ‘ऊँ’ चिह्न का भरी दुनिया के सामने अपमान हुआ। हालाँकि, इतना सब देखने के बाद ये साफ हो गया था कि इन प्रदर्शनकारियों के भीतर हिंदुओं को लेकर गहरी नफरत है। लेकिन, 10 जनवरी की मध्यरात्रि इस इस्लामिक भीड़ के असल मनसूबों का खुलासा भी सरेआम हो गया, जब शाहीन बाग के प्रोटेस्ट में जिन्ना वाली आजादी के नारों से पूरा इलाका गूँज उठा और वहाँ किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई।

शाहीन बाग में 10 जनवरी की देर रात 2 बजे लगे नारों में जिन्ना का नाम सुना जा सकता है। वायरल वीडियो में देख सकते हैं कि एक शख्स मंच से आजादी के नारे लगा रहा है, जिसके बोल हैं “हम लड़के लेंगे आजादी। नेहरू वाली आजादी। गाँधी वाली आजादी। भगत वाली आजादी। अश्फाक वाली आजादी। जिन्ना वाली आजादी। दिल्ली वाली आजादी…।”

यहाँ प्रदर्शन के दौरान किसी भी व्यक्ति को समझ आ सकता है कि ये वामपंथी और कट्टरपंथी धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर ‘नेहरू वाली आजादी की माँग कर रहे हैं। जिसे अपने दौर में नेहरू ने अल्पसंख्यकों को सुपुर्द किया था। लेकिन यहाँ ‘जिन्ना वाली आजादी’ चिल्लाने का क्या मतलब है? बता दें जिन्ना वही शख्स है, जिसने भारत के 2 टुकड़े किए और इस्लामिक कट्टरपंथियों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान बनाया। इसका तो मतलब यही है कि जो भीड़ जिन्ना जैसी आजादी चाहता है, वो एक बार फिर देश को तोड़ना चाहता है। ताकि एक और पाकिस्तान बने, जहाँ के कायदे-कानून सब इस्लाम के अनुसार हों।

जिन्ना का दो राष्ट्र सिद्धांत (Two Nation Theory) का आधार यही था कि मुस्लिम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते हैं। इस थ्योरी में बताया गया था कि हर परिभाषा के अनुसार हिंदू-मुस्लिम के लिए दो अलग-अलग राष्ट्र होने चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिमों के अलग रिवाज़ हैं, अलग मजहब है। इसके अलावा मुस्लिम सामाजिक एवं नैतिक हर बिंदु से हिंदुओं से अलग है। इसलिए मुस्लिमों के पास भारत जैसी अपनी एक जमीन होनी चाहिए। वो भी वहाँ, जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हों और जहाँ इस्लाम सबसे शक्तिशाली मजहब हो।

गौरतलब है कि उस दौरान भी जिन्ना की ये विचारधारा मुस्लिमों को जगाने के नाम पर उठी थी, जिसने भारत को 2 टुकड़ों में बाँट दिया था। संविधान के जनक डॉ बीआर अम्बेडकर ने कई बार मुहम्मद अली जिन्ना की और उनकी 14 माँगो की आलोचना की थी। जिनमें वंदे मातरम को खारिज करना और मुस्लिमों को गाय काटने की आजादी देना, मुस्लिम लीग के झंडे को बराबर सम्मान देना जैसे बिंदु थे। इन सभी बिंदुओं का जिक्र ‘Pakistan or the partition of India’ नामक बुक के 11वें अध्याय में डॉ अंबेडकर ने खुद किया है। ये डॉ बीआर अंबेडकर का ही मत था कि मुस्लिम अपनी माँगों से हिंदुओं को शोषण कर रहे हैं। ताकि हिंदु उनके बिंदुओं को नकार दें।

16 नवंबर 1942 को जिन्ना के शब्द

आज जब शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी पाकिस्तान से प्रताड़ित हिंदुओं को नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं, तो साफ पता चलता है कि ये जिन्ना की विचारधारा से प्रभावित भीड़ है। जो अब बिना किसी शर्म के ‘जिन्ना जैसी आजादी’ के नारे खुलेआम लगा रहे हैं। और वो हर शख्स, जो भारत में रहते हुए जिन्ना वाली आजादी की माँग कर रहा है। वो चाहता है कि हिंदुओं और मुस्लिमों को अलग राष्ट्र मिले। जिसमें मुस्लिम अलग रहे और देश एक बार फिर दो टुकड़ों में बँटे, जिसका एक हिस्सा कोई नया पाकिस्तान कहलाए।

बता दें कि बीते दिनों सीएए के ख़िलाफ़ हुए दंगों में देश ने इस्लामिक भीड़ का एक अलग ही चेहरा देखा। ये याद रखने वाली बात है कि खुद को भारत का नागरिक कहने वाले लोग एक तरफ देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये लोग हिंदुओं से आजादी की माँग कर रहे थे। और हिंदू विरोधी नारों के साथ उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली में हिंसा मचा रहे थे। ख़िलाफत 2.0 का संदेश दे रहे थे और ला इलाहा इल्लल्लाह के नारे लगा रहे थे।

नफरती नारों में AMU ने JNU को पछाड़ा, हिन्दुत्व के बाद मोदी और योगी की भी कब्र खोदी

देश विरोधी और सांप्रदायिक उन्मादी नारों के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ मुस्लिम विश्वद्यिालय (AMU) रोज नए कीर्तिमान गढ़ रहा है। इस मामले में उसने JNU को भी पीछे छोड़ दिया है। नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध के नाम पर बीते दिसंबर में AMU ने अपने नारों से देश को चौंका दिया था। प्रदर्शनकारी छात्रों ने “हिन्दुत्व की क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगाए थे।

AMU के इन नफरती नारों को लेकर देशभर में आक्रोश देखा गया। लेकिन इससे एएमयू के कथित उन्मादी छात्रों को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। गुरुवार (9 जनवरी) को AMU में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कब्र खुदने के नारे लगे। सोशल मीडिया पर नारेबाजी का यह वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून, एनआरसी, जेएनयू हिंसा के विरोध में पंक्तिबद्ध होकर चल रहे छात्र AMU की आर्ट्स फैकल्टी से लेकर एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक तक एक सुर में “मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर”, “योगी तेरी क़ब्र खुदेगी AMU की धरती पर” जैसे नारे लगा रहे हैं। देर शाम इस घटना पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने 50-60 छात्रों के ख़िलाफ़ धारा-153 ए के तहत मुक़दमा दर्ज किया है।

ख़बर के अनुसार, गुरुवार को CAA के विरोध में उन्मादी छात्रों की भीड़ जब स्टाफ़ क्लब से AMU गेस्ट हाउस नंबर एक की ओर बढ़ रही थी तभी उन्मादी छात्रों ने मोदी और योगी को लेकर आपत्तिजनक नारे लगाए। पुलिस मामले की जाँच में जुट गई है। भड़काऊ नारेबाज़ी करने वालों से सख़्ती से निपटने की बात कही गई है।

कानून से खेलो, हिंदुत्व की कब्र खोदो… क्योंकि वे जब आएँगे सारे गुनाह दफन हो जाएँगे

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रट लें जनगणना में पूछे जाएँगे ये 31 सवाल, कोई 32वां गिनाए तो पत्थर ले सड़क पर न करें ‘छपाक’

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर (NPR) को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद से विपक्ष उसी तरह अफवाह फैलाने में जुटा है, जैसा उसने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) को लेकर किया। वह NPR को भी NRC से जोड़कर पेश कर रहा है, जबकि तथ्य यह है नागरिकता कानून 1955 और नागरिकता नियम 2003 के तहत NPR पहली बार 2010 में तैयार किया गया था। आधार से जोड़े जाने के बाद 2015 में इसे अपडेट किया गया था।

अब एक अप्रैल से शुरू हो रहे जनगणना को लेकर अधिसूचना जारी कर दी गई है। जनगणना आयुक्त की ओर से जारी इस अधिसूचना में यह भी बताया गया है कि इस दौरान आपसे कौन से सवाल पूछे जाएँगे। कुल 31 सवाल पूछे जाएँगे जो हैं,

1. बिल्डिंग नंबर (म्यूनिसिपल या स्थानीय अथॉरिटी नंबर)
2. सेंसस हाउस नंबर
3. मकान की छत, दीवार और सीलिंग में मुख्य रूप से इस्तेमाल हुआ मटीरियल
4. मकान के इस्तेमाल का उद्देश्य क्या है
5. मकान की स्थिति
6. मकान का नंबर
7. घर में रहने वाले लोगों की संख्या
8. घर के मुखिया का नाम
9. मुखिया का लिंग
10. घर का मुखिया SC/ST या अन्य समुदाय से ताल्लुक रखते हैं
11. मकान का ओनरशिप स्टेटस
12. मकान में मौजूद कमरे
13. घर में कितने शादीशुदा जोड़े रहते हैं
14. पीने के पानी का मुख्य स्नोत
15. घर में पानी के स्नोत की उपलब्धता
16. बिजली का मुख्य स्नोत
17. शौचालय है या नहीं
18. किस प्रकार के शौचालय हैं
19. गंदे पानी की निकासी है या नहीं
20. वॉशरूम है या नहीं
21. रसोई घर है या नहीं, इसमें एलपीजी/पीएनजी कनेक्शन है या नहीं
22. रसोई के लिए इस्तेमाल होने वाला ईंधन
23. रेडियो/ट्रांजिस्टर
24. टेलीविजन
25. इंटरनेट की सुविधा है या नहीं
26. लैपटॉप/कंप्यूटर है या नहीं
27. टेलीफोन/मोबाइल फोन/स्मार्टफोन
28. साइकिल/स्कूटर/मोटर साइकिल/मोपेड
29. कार/जीप/वैन
30. घर में किस अनाज का मुख्य रूप से उपभोग होता है
31. मोबाइल नंबर

अधिसूचना में साफ शब्दों में कहा गया है कि जनगणना अधिकारियों को देश में एक अप्रैल से 30 सितंबर तक चलने वाली गृह सूचीकरण और गृह जनगणना की कवायद के दौरान हर परिवार से जानकारी हासिल करने के लिए 31 प्रश्न पूछने के निर्देश दिए गए हैं। मोबाइल नंबर सिर्फ जनगणना के मकसद से ही पूछा जाएगा और उसका इस्तेमाल किसी और प्रयोजन के लिए नहीं किया जाएगा। यह जनगणना पारंपरिक पेन और पेपर के बजाए मोबाइल फोन एप्लीकेशन के जरिए होगी। इस कवायद के साथ ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का काम भी चलता रहेगा, क्योंकि केंद्र सरकार ने इसे सितंबर 2020 तक तैयार करने का फैसला किया है।

जनगणना की संदर्भ तिथि एक मार्च, 2021 होगी, लेकिन पर्वतीय राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए यह तिथि एक अक्टूबर, 2020 रहेगी।

इसी के साथ जनगणना के दौरान जुटाई जानी वाली जानकारियों को लेकर आधिकारिक रूप से तस्वीर साफ हो गई है। सरकार पहले भी कह चुकी है कि इन जानकारियों का मकसद लोककल्याण की योजनाओं का बेहतर तरीके से खाका खींचना है। इस अधिसूचना से इससे जुड़ी तमाम अफवाहों पर भी विराम लग गया है। एनआरसी और सीएए पर विपक्ष के अफवाह के कारण देश के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए थे। समुदाय विशेष के लोगों ने विरोध के नाम पर जमकर पत्थरबाजी और आगजनी की थी।

अमित शाह ने बताया किन लोगों के लिए है डिटेंशन सेंटर, कहा- NPR का NRC से कोई संबंध नहीं

NPR का पहला डाटा किसका: जिसके लिए कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा था- इंदिरा गाँधी की रसोई सँभालती थी

भाजपा ने नहीं, कॉन्ग्रेस की सरकार ने NPR को NRC से जोड़ा था: 9 साल बाद मोदी सरकार ने अलग किया

सरकारी योजनाओं में नहीं होगा फर्जीवाड़ा, घुसपैठ रुकेगा: NDTV के इस वीडियो से समझें NPR के फायदे

शवयात्रा में भी नहीं थी राम नाम लेने की इजाजत, Tanhaji ने बताया औरंगज़ेब कितना ‘महान’

यहाँ बाकी समीक्षकों की तरह फ़िल्म की कहानी नहीं बताई जाएगी। फ़िल्म ‘तानाजी’ झूठे सेक्युलर दिखावों में नहीं फँसती। इसमें ‘अच्छा मुस्लिम’ और ‘बुरा मुस्लिम’ वाला कॉन्सेप्ट दिखाने से बचा गया है, जो अब तक बॉलीवुड का ट्रेंड रहा है। मराठों के ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ की गूँज से आपका रोम-रोम खड़ा हो जाएगा। इसे Goosebumps कह लीजिए। सबसे अच्छी बात ये है कि छत्रपति शिवाजी राजे के किरदार की गरिमा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया गया है। राजे जब स्क्रीन पर आते हैं तो हाव-भाव और दमदार आवाज़ से लगता है कि उनके किरदार को पूरी सावधानी से लिखा गया है।

अजय देवगन ने ‘सिंघम’ सरीखी फ़िल्मों में मराठी किरदार निभाया है, इसीलिए एक मराठा वीर के किरदार में वो फिट बैठे हैं। लेकिन, सैफ अली ख़ान एक ‘सरप्राइज पैकेज’ हैं, जिन्होंने उदयभान के किरदार को पूरी शिद्दत के साथ निभाया है। गाय और भेंड़ की माँस खाने वाला उदयभान। हिंदुओं को हिंदुओं के साथ लड़ाने की मुगलिया रणनीति और गद्दारों की वजह से हिंदुओं का सत्यानाश कैसे होता था, इसे भी दिखाया गया है।

औरंगज़ेब जैसा कट्टर मुस्लिम था, उसे वैसे ही दिखाया गया है। संजय मिश्रा ने कहानी को नैरेट किया है, पूरे संजीदापन के साथ। स्क्रिप्ट इतनी कसी हुई है कि इंटरवल कैसे आ गया, पता ही नहीं चला। ‘भगवा’ हमारी पहचान है, ये आपको फ़िल्म देखने पर पता चलेगा।

शिवाजी राजे की तलवार चलती है तो ब्राह्मणों का जनेऊ और लोगों का घर-बार सुरक्षित रहता है- भंसाली जैसों की फ़िल्मों में इस तरह के डायलॉग के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। मुस्लिम आक्रांताओं के डर का आलम ये था कि लोग राम नाम बोलते हुए शवयात्रा निकालने से भी डरते थे, तानाजी के किरदार में अजय देवगन का ये डायलॉग उस समय की परिस्थियों की बयान करता है।

आप जरा उस महिला के बारे में सोचिए, जो 17वीं शताब्दी में औरंगज़ेब जैसों के डर के कारण घर से बाहर तक नहीं निकल पाती थीं। ऐसी हज़ारों महिलाओं की जगह पर ख़ुद को रख कर देखिए, जो इस्लामी आक्रांताओं से आए दिन इज़्ज़त बचाते फिरती थीं। काजोल का किरदार फ़िल्म के दूसरे भाग में ऐसे उभर कर आया है, जैसी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। इमोशनल दृश्यों में इस जगह पर उनसे अच्छा अभिनय शायद ही कोई कर पाता।

तानाजी को बिना ‘Larger Than Life’ दिखाए हुए, अजय देवगन ने उनकी वीरता, बहादुरी, साहस और कारनामे को इस तरह से दिखा कर फ़िल्म के साथ पूरा न्याय किया है। एक और महिला किरदार है। नेहा शर्मा ने उस किरदार को बखूबी अदा किया है। चाहे वो किसी जीत के लिए गए राजपरिवार की महिला हो या फिर एक ऐसे योद्धा की पत्नी, जिसका पति एक ऐसे युद्ध में गया है, जहाँ से लौटने की संभावना न के बराबर है- इस्लामी आक्रांताओं के क्रूरकाल की एक अच्छी झलक मिलेगी आपको।

दूसरे हाफ में अधिकतर युद्ध ही है, जो कहानी के हिसाब से आवश्यक भी था। लेकिन, वीर शिवाजी की महानता की झलकियाँ भी आपको मिलेंगी। भगवा हमारी पहचान है, भगवा हमारी स्वाधीनता का प्रतीक है और भगवा ही हमारा इतिहास एवं संस्कृति है- इस फ़िल्म से आपको पता चलेगा। शिवाजी राजे के किरदार में शरत केलकर गजब के जँचे हैं। उन्हें पता था कि वो किसका किरदार निभा रहे हैं।

सबसे बड़ी बात कि स्क्रिप्ट को कसी हुई रखने के लिए फ़िल्म की लंबाई को जबरदस्ती नहीं खींचा गया। सवा 2 घण्टे से भी कम में सब कुछ दिखा दिया गया है। अजय देवगन ने बॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखाई जाने वाली ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ को ठेंगा दिखा दिया है। कुल मिला कर ये मातृभूमि के लिए लड़ने वाले एक ऐसे योद्धा की कहानी है, जिसे आपको देखनी चाहिए।

सिंह चला गया लेकिन ‘माँ’ को सिंहगढ़ दे गया: बेटे की शादी छोड़ छत्रपति के लिए युद्ध करने वाले तानाजी

नहीं रिलीज़ होगी Chhapaak? जिस लड़की पर बनी फिल्म, उसी की वकील ने दायर की याचिका

Chhapaak में करनी होगी एडिटिंग, तब होगी रिलीज: कोर्ट ने डायरेक्टर को दिया आदेश

पाक फैला रहा आतंक, 1 इंच भी जमीन नहीं देंगे: 15 विदेशी राजनयिकों से बोले कश्मीरी

विभिन्न देशों का 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल मौजूदा स्थिति का जायजा लेने के लिए गुरुवार को दो दिवसीय दौरे पर जम्मू-कश्मीर पहुँचा। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद विदेशी राजनयिकों की यह पहली यात्रा है। इस समूह के साथ विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और सुरक्षा अधिकारी भी हैं। इससे पहले यूरोपीय संसद के सांसदों के एक समूह ने जमीनी हकीकत जानने के लिए जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था।

कश्मीर घाटी का जायजा लेने के बाद विदेशी प्रतिनिधियों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों ने पाकिस्तान के उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिनमें पड़ोसी मुल्क द्वारा कहा जा रहा था कि घाटी में रक्तपात हो रहा है। इसके अलावा प्रतिनिधियों ने बताया कि कश्मीर के लोग पाकिस्तान के झूठ को पूरी तरह से खारिज करते हैं और वहाँ के लोगों का कहना है कि वो पाकिस्तान को एक इंच भी जमीन नहीं देंगे। साथ ही लोगों ने जम्मू-कश्मीर में हत्याओं के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया और दूतों को पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कहा।

गुरुवार की यात्रा के दौरान राजनयिकों ने पंचायत सदस्यों और स्थानीय निकायों और गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। प्रतिनिधिमंडल को चिनार कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने सुरक्षा स्थिति पर भी जानकारी दी। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद स्थानीय लोगों को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि क्षेत्र में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक था।

दो दिवसीय यात्रा के पहले दिन के दौरान प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर में सामान्य स्थिति के गवाह भी बने। उन्होंने कहा कि श्रीनगर की सड़कों पर आम दिन की तरह ही दुकानें खुलीं और सब कुछ बिलकुल सामान्य रहा। प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेताओं से भी मुलाकात की। इनमें गुलाम हसन मीर, अल्ताफ बुखारी, शोएब इकबाल लोन, हिलाल अहमद शाह, नूर मोहम्मद शेख, अब्दुल मजीद पद्दर, अब्दुल रहीम राथर और रफी अहमद मीर शामिल थे।

प्रतिनिधिमंडल की यात्रा पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि उनकी पहली बैठक वहाँ के सुरक्षा जवानों के साथ थी, ताकि उन्हें जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के हालातों की जानकारी मिल सके। उन्होंने कहा कि यात्रा का उद्देश्य राजनयिकों को यह दिखाना है कि सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए हैं। रवीश कुमार ने बताया कि अमेरिका, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, बांग्लादेश, मालदीव, मोरक्को, फिजी, नॉर्वे, फिलीपींस, अर्जेंटीना, पेरू, नाइजर, टोगो और गुयाना के दूत इस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे।

जम्मू-कश्मीर में इस ‘साहसिक’ कदम के लिए अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ने की मोदी की सराहना

जम्मू-कश्मीर हमारा मामला, हम चीन के मामले में नहीं बोलते, वह भी चुप रहे: भारत का करारा जवाब

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से बंद 50 हजार मंदिर खोलने की तैयारी में सरकार, जल्द होगा सर्वे: गृह राज्यमंत्री

J&K: सुप्रीम कोर्ट ने कहा मानवाधिकार जरूरी लेकिन सुरक्षा को दरकिनार नहीं कर सकते, रिव्यू का निर्देश

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्क्रिय होने के बाद सुरक्षा लिहाज से इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंध समेत कई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी शुक्रवार (जनवरी,10, 2019) को अपना फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा है कि जम्मू कश्मीर सरकार एक सप्ताह के भीतर सभी प्रतिबंधात्मक आदेशों की समीक्षा करे।

कोर्ट ने प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने के लिए कहा। न्यायालय का मानना है कि इंटरनेट का अनिश्चितकालीन निलंबन उन्हें स्वीकार्य नहीं है और धारा 144 सीआरपीसी के तहत बार-बार आदेश देने से सत्ता का दुरुपयोग होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल समाधान के तौर पर नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “कश्मीर में बहुत हिंसा हुई है। हम सुरक्षा के मुद्दे के साथ मानवाधिकारों और स्वतंत्रता को संतुलित करने की पूरी कोशिश करेंगे। इंटरनेट पर एक समय-सीमा तक ही रोक लगनी चाहिए।”

कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकतंत्र स्थापित करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक जरूरी साधन है। इंटरनेट का इस्तेमाल फ्री स्पीच के आर्टिल 19 (1) के तहत मौलिक अधिकारों में आता है।

गौरतलब है कि न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई की 3 सदस्यीय पीठ ने इन प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली गुलाम नबी आजाद और अन्य की याचिकाओं पर पिछले साल 27 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी।

केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान समाप्त करने के बाद वहाँ लगाए गए प्रतिबंधों को 21 नवंबर को सही ठहराया था। केंद्र ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के एहतियाती उपायों की वजह से ही राज्य में किसी व्यक्ति की न तो जान गई और न ही एक भी गोली चलानी पड़ी।

इस दौरान केंद्र ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का हवाला देते हुए कहा था कि कई सालों से सीमा पार से आतंकवादियों को यहाँ भेजा जाता था। स्थानीय उग्रवादी और अलगावादी संगठनों ने पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा था और ऐसी स्थिति में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह मूर्खता होती।

JNU हिंसा की जाँच में भी रोड़े डाल रहे वामपंथी, प्रोफेसरों की 5 सदस्यीय समिति के विरोध में JNUTA

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में रविवार (5 जनवरी) को साबरमती हॉस्टल में नक़ाबपोश बदमाशों की हिंसा के कारणों का पता लगाने के लिए कुलपति एम जगदीश कुमार ने पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया है। इस समिति में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स फेडरेशन (JNUTF) के सदस्यों को शामिल किया गया है। इनमें, प्रोफ़ेसर सुशांत मिश्रा, मज़हर आसिफ़, सुधीर प्रताप सिंह, संतोष शुक्ला और भसवती दास शामिल हैं।

ख़बर के अनुसार, कुलपति द्वारा जारी की गई अधिसूचना में कहा गया है कि यह समिति हिंसा के कारणों का पता लगाकर जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इसके अलावा, कुलपति ने कहा कि यदि सुरक्षा में किसी भी तरह की चूक हुई होगी, तो समिति छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उचित उपायों की सिफ़ारिश भी करेगी।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (JNUTA) ने कुलपति द्वारा नियुक्त की गई जाँच समिति के सदस्यों के चयन पर सवाल उठाए हैं। सेंटर फॉर कॉपरोटेविव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर मोहिंदर सिंह ने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सुलह का रास्ता दिखाया था। उससे पहले कुलपति द्वारा अपने लोगों को शामिल कर समिति का गठन करना ठीक नहीं। उन्होंने जाँच समिति की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। JNUTA वैचारिक रूप से JNUTF का विरोधी माना जाता है।

JNUTF के वरिष्ठ सदस्य और स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के डीन अश्विनी महापात्रा ने बताया कि जाँच समिति का गठन JNU के छात्रों को राष्ट्रहित में काम करने के लिए किया गया। जिस तरह से विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक मुद्दों को लेकर चर्चा में बना हुआ है उससे हम आहत हैं। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि JNU को लेकर नकारात्मक धारणाएँ बदल जाएँ। आने वाले दिनों में, हमारे पास कैंपस के लिए कई कार्यक्रम हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों के सन्दर्भ में कहा कि हमें उनके प्रदर्शनों से समस्या नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि छात्र राजनीतिक हकीकत और अपने विरोध की सीमाओं को समझें।

अश्विनी महापत्रा का कहना है कि वो कुलपति से केवल औपचारिक बैठकों में ही मिलते हैं। इस दौरान उनकी चर्चा का विषय विश्वविद्यालय की जगह को सभी के लिए एकसमान रूप से उपलब्ध कराना होता है, जिसमें नियमित तौर पर अनुसंधान की अनुमति देना भी शामिल है। बता दें कि JNUTF ने पिछले महीने JNUTA की कमियों के चलते ख़ुद को उससे अलग कर लिया था।

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दिल्ली के बाद वडोदरा से भी पकड़ा गया ISIS आतंकी, तमिलनाडु का वांटेड है जफर अली

गुजरात में आतंकवाद-रोधी दस्ते (ATS) को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है। गुजरात एटीएस ने एक वांटेड आतंकवादी को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आतंकवादी का नाम जफर अली मोहम्मद हलीक है। एटीएस ने उसे वडोदरा शहर के गोरवा क्षेत्र से पकड़ा है। जफर नाम का यह आतंकवादी तमिलनाडु में वांटेड था।

जानकारी के मुताबिक जफर अली पिछले 10-12 दिनों से वडोदरा में था और उसके जिम्मे शहर में आईएसआईएस मॉड्यूल को फैलाना था। अधिकारियों ने बताया कि जफर तमिलनाडु के कुड्डलोर जिले का रहने वाला है। उसे गोरवा इलाके के पंचवटी सर्किल के पास वडोदरा पुलिस और एटीएस के संयुक्त अभियान के तहत पकड़ा गया। पुलिस ने बताया कि एटीएस और स्थानीय पुलिस को जफर के वडोदरा में होने की खुफिया सूचना मिली थी। वह 6 संदिग्ध लोगों के साथ कई दिनों से गायब था।

एटीएस ने अपने बयान में कहा, “खुफिया सूचनाओं से संकेत मिला था कि 6 फरार लोग किसी अज्ञात स्थान पर जिहादी गतिविधियों के संचालन की बात कर रहे थे। वे आईएसआईएस से प्रेरित थे और इस्लामिक चरमपंथी थे, जिसकी वजह से यह इस बात की आशंका थी कि वे देश में आतंकी गतिविधि की योजना बनाएँगे।”

इसके बाद गुजरात एटीएस के अधिकारियों ने तलाशी अभियान शुरू किया। इस दौरान अधिकारियों को एक ऐसे ही शख्स के वडोदरा में छुपे होने की सूचना मिली। इस सूचना के आधार पर गुजरात एटीएस और वडोदरा पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उसे गोरवा से उसे धर दबोचा।

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस के तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ये दिल्ली एनसीआर और उत्तर प्रदेश में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे। बताया जा रहा है कि जफर अली भी उसी आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा है जिसे ये तीनों आतंकवादी स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।

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