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80 घंटों में ही किसानों को ₹5380 करोड़ दे गए फडणवीस, वर्ल्ड बैंक से राज्य को दिलाए ₹3500 करोड़

देवेंद्र फडणवीस का मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल लगभग 80 घंटों का ही रहा, लेकिन इतने कम समय में ही वो किसानों को काफ़ी कुछ देकर गए। फडणवीस ने दिल्ली जाकर गृहमंत्री अमित शाह से किसानों की समस्याओं पर बात की। उन्होंने महाराष्ट्र के किसानों की समस्याओं को केंद्र सरकार के सामने रखा। राष्ट्रपति शासन लगने और राजनीतिक अस्थिरता होने के कारण मौसम से परेशान किसानों की हालत बेहाल थी। ऐसे में, शनिवार (नवंबर 23, 2019) को सुबह शपथ लेते ही फडणवीस ने किसानों के मुद्दे को प्राथमिकता दी और काम पर लग गए।

महाराष्ट्र के किसान बेमौसम बरसात से बेहाल थे। फडणवीस ने तुरंत 5380 करोड़ रुपए का कंटिंजेंसी फंड जारी कर उनकी परेशानी को कम करने की दिशा में प्रयास किया। किसानों को वित्तीय मदद मुहैया कराई गई। उससे पहले फडणवीस और उनके डिप्टी रहे अजित पवार ने बैठक कर के किसानों की समस्याओं पर बातचीत की। उन्होंने किसानों की तत्काल मदद के लिए उपलब्ध विकल्पों पर विचार-विमर्श किया। अगले ही दिन उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव और वित्तीय सचिव से मुलाक़ात कर इस बारे में और अधिक चर्चा की।

अपने दूसरे कार्यकाल में फडणवीस ने पहला हस्ताक्षर सीएम रिलीफ फण्ड के एक चेक पर किया। ये चेक कुसुम वेंगुर्लेकर नामक महिला को दिया गया। इस दौरान उन्होंने ‘वर्ल्ड बैंक’ के प्रतिनिधियों से भी मुलाक़ात की। इस बैठक में बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए किए जाने वाले उचित प्रबंधन पर चर्चा की गई। वर्ल्ड बैंक इस प्रोजेक्ट पर 3500 करोड़ रुपए ख़र्च करेगा। इसके अलावा इस बैठक में 10,000 गाँवों के 20 लाख किसानों को सीधा बाजार से जोड़ने पर भी चर्चा हुई। ‘स्मार्ट विलेज’ प्रोजेक्ट के माध्यम से किसान सीधा कॉर्पोरेट से जुड़ जाएँगे।

सोशल मीडिया पर भी लोगों ने देवेंद्र फडणवीस के इस्तीफे को लेकर निराशा जताई। उनकी पत्नी अमृता फडणवीस ने इन पंक्तियों के माध्यम से अपने दिल की बात रखी:

पलट के आऊँगी शाखों पे खुशबुएँ लेकर,
खिज़ाँ की ज़द में हूँ मौसम ज़रा बदलने दे!

मात्र साढ़े तीन दिन तक मुख्यमंत्री रहने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। उप-मुख्यमंत्री अजित पवार उससे पहले ही इस्तीफा दे चुके थे। हालाँकि, नए मुख्यमंत्री के पद संभालने तक फडणवीस केयरटेकर सीएम बने रहेंगे। उद्धव ठाकरे को शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस के विधायकों ने अपना नेता चुन लिया है।

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महिला पत्रकार ने नौकरी नहीं छोड़ी तो शौहर दिलावर ने की हत्या, 7 महीने पहले ही हुआ था निकाह

पाकिस्तान में 27 वर्षीय एक महिला पत्रकार की उसके शौहर ने गोली मारकर हत्या कर दी। जानकारी के अनुसार शौहर नहीं चाहता था कि उसकी बीवी नौकरी करे। कई बार वह नौकरी छोड़ने का दबाव भी बना चुका था। हैरान करने वाली बात ये है कि मृतका का पति खुद भी एक पत्रकार है और दोनों ने 7 महीने पहले ही अपनी मर्जी से (लव मैरेज) से निकाह किया था।

उरूज इकबाल नामक महिला एक उर्दू अखबार में पत्रकार थी। सोमवार (नवंबर 25, 2019) को लाहौर में किला गुज्जर सिंह के पास स्थित अपने दफ्तर में वह प्रवेश कर रही थी, तभी शौहर दिलावर अली ने उसके सिर पर गोली चला दी। उरूज को फौरन अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी जिंदगी नहीं बचाई जा सकी।

एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि मृतका के भाई यासिर इकबाल ने शिकायत दर्ज कराई है। मामले की जाँच जारी है। महिला का पति भी एक उर्दू अखबार में पत्रकार का काम करता है। इकबाल ने अपनी शिकायत में बताया कि उसकी बहन ने अली से 7 महीने पहले निकाह किया था, लेकिन कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में घरेलू कारणों से खटास आ गई। अली लगातार उसे नौकरी छोड़ने के लिए कहता था। इकबाल के मुताबिक अली लगातार उसकी बहन को परेशान कर रहा था और हाल ही में उन्होंने इस संबंध में उसके ख़िलाफ़ शिकायत भी दर्ज करवाई थी, लेकिन उस समय पुलिस ने अली के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

उल्लेखनीय है कि उरूज इकबाल एक क्राइम रिपोर्टर थीं। जो अपने शौहर से घरेलू नोक-झोंक के बाद अपने ऑफिस के पास ही एक बिल्डिंग में कमरा लेकर रहती थीं। लेकिन अली से ये बर्दाशत नहीं हुआ और दफ्तर के बाहर पहुँचकर उसने अपनी बीवी की हत्या कर दी। उरूज की हत्या के बाद पुलिस सीसीटीवी फुटेज खँगालने में जुटी है और प्राप्त सभी सबूतों को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा जा रहा है।

वे गायब हैं, मैं चिंतित हूँ: वायनाड में सांसद राहुल गाँधी को लेकर दर्ज कराई गई ‘मिसिंग कंप्लेंट’

केरल के मल्लपुरम जिले स्थित एडक्करा पुलिस थाने में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया। पुलिस को एक व्यक्ति के गायब होने की रिपोर्ट मिली। मिसिंग कंप्लेंट कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के गायब होने को लेकर है। ये बात जानने लायक है कि एडक्करा पुलिस थाना नीलाम्बर विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। ये राहुल गाँधी के लोकसभा क्षेत्र वायनाड का हिस्सा है। इस वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में राहुल ने अपने पारम्परिक गढ़ यूपी के अमेठी और केरल के वायनाड से चुनाव लड़ा था। अमेठी में उन्हें केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।

वायनाड में राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ मिसिंग कंप्लेंट लिखाने वाले का नाम ए. थॉमस है। वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के सचिव हैं। शिकायतकर्ता ने पुलिस को कहा कि वे सोशल मीडिया में राहुल गाँधी के गायब होने की ख़बरों से ख़ासे चिंतित हैं और इसलिए रिपोर्ट दर्ज कराने आए हैं।

थॉमस द्वारा दर्ज कराई गई ये शिकायत केरल कॉन्ग्रेस को नागवार गुजरी। कॉन्ग्रेस नेताओं ने उसी पुलिस थाने में भाजयुमो नेता थॉमस के ख़िलाफ़ भी शिकायत दर्ज कराई। उन पर सांसद के अपमान का आरोप लगाया गया। पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर थॉमस के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है। थॉमस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि वायनाड और संसद सत्र से राहुल गाँधी की अनुपस्थिति ध्यान खींचती है। उन्होंने लिखा था कि सोशल मीडिया में उनके गायब होने वाली ख़बरों से वो चिंतित हैं, क्योंकि वो राहुल के लोकसभा क्षेत्र का नागरिक एवं वोटर हैं।

बता दें कि सोमवार (नवंबर 25, 2019) को राहुल गाँधी कई दिनों बाद संसद में दिखे और उन्होंने महाराष्ट्र प्रकरण को लेकर केंद्र सरकार को घेरा। 30 अक्टूबर को कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बताया था कि राहुल मेडिटेशन करने के लिए विदेश गए हैं।

पुलिस ने थॉमस के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने के पीछे का कारण बताते हुए कहा कि उन्होंने सांसद का अपमान किया है। साथ ही उन पर पुलिस को गुमराह करने का भी आरोप लगाया गया है। पुलिस ने बताया कि थॉमस के शिकायत से ऐसा प्रतीत होता है कि संसद कहीं छिपे हुए हैं, जबकि ऐसा नहीं है। इससे पहले यूपी में भी राहुल गाँधी के ‘मिसिंग’ होने के पोस्टर चिपकाए गए थे।

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आम आदमी का काम करने के लिए है पुलिस, FIR में बंद करो उर्दू-फारसी का इस्तेमाल: हाई कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (नवंबर 25, 2019) को FIR की भाषा को लेकर दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा, जब शिकायतकर्ता आम भाषा में अपनी शिकायत देता है तो एफआईआर दर्ज करने में उर्दू और फारसी शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को FIR दर्ज करने में साधारण भाषा का प्रयोग करना चाहिए ताकि एक आम आदमी भी उसे पढ़कर समझ सके। इस आदेश के बाद इसके कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए FIR की 100 प्रतियाँ पेश करने का आदेश भी कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को दिया। साथ ही इस मामले में दिल्ली पुलिस से हलफनामा दाखिल करने को भी कहा गया है। इस मामले में अगली सुनवाई अब 11 दिसंबर को होगी। 

मुख्य न्यायमूर्ति डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की खंडपीठ ने पुलिस को आदेश देते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस को FIR दर्ज करने में उर्दू और फारसी के उन शब्दों का उपयोग बंद करना चाहिए जो बिना सोचे समझे इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा एफआईआर दर्ज करने में साधारण भाषा का ही प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि शिकायतकर्ता उसे समझ सके कि उसने जो शिकायत दी वह वैसी ही दर्ज हुई।

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित खबर

अदालत ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि पुलिस आम आदमी का काम करने के लिए है, सिर्फ उनके लिए नहीं जिनके पास उर्दू या फारसी में डॉक्टरेट की डिग्री है। पीठ ने दिल्ली पुलिस से कहा, ऐसे शब्द जिनका अर्थ शब्दकोश में ढूँढना पड़े का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। FIR शिकायतकर्ता के शब्दों में होनी चाहिए। भारी-भरकम शब्द की जगह आसान भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। लोगों को ये पता होना चाहिए कि क्या लिखा गया है। 

उल्लेखनीय है दिल्ली हाईकोर्ट का ये निर्देश वकील विशालक्षी गोयल द्वारा लगाई गई जनहित याचिका (पीआईएल) पर आया है। इसमें कोर्ट से अनुरोध किया गया था कि वह दिल्ली पुलिस को उर्दू या फारसी शब्दों का इस्तेमाल बंद करने का निर्देश दे। इस संबंध में 20 नवंबर को पुलिस ने सभी थानों को एक सर्कुलर भेजा था। इसमें स्पष्ट बताया गया था कि प्राथमिकी दर्ज करते समय उर्दू और फारसी शब्दों की जगह साधारण शब्दों का प्रयोग किया जाए।

इसका जिक्र दिल्ली पुलिस ने अपनी दलील में करते हुए, कोर्ट को उर्दू और फारसी के ऐसे 383 शब्दों की सूची सौंपी है जिनका थानों में इस्तेमाल बंद हो चुका है। सर्कुलर का पालन हो रहा है या नहीं, यह पता लगाने के लिए कोर्ट ने 10 अलग-अलग थानों से 10-10 एफआईआर की प्रतियाँ मँगाई है।

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पंजाब में बागी हुए कॉन्ग्रेस विधायक: सरकार बचाने को इंग्लैंड से भागे आए CM अमरिंदर, कोर्ट में भी तलब

पंजाब से कॉन्ग्रेस के लिए बुरी ख़बर आई है। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह विदेश दौरे पर थे। विधायकों की नाराजगी की ख़बर मिलते ही वो भागे-भागे दिल्ली पहुँचे। उन्हें चंडीगढ़ जाना था लेकिन ख़राब मौसम के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका। बुधवार को कैप्टन अपने गृह जिले पटियाला के 4 विधायकों से मुलाक़ात कर स्थिति संभालने की कोशिश करेंगे। अफसरशाही के रवैए से नाराज़ होकर कई विधायक बागी हो उठे हैं और उन्होंने शिकायत की है कि राज्य को कैप्टन नहीं, अधिकारी चला रहे हैं।

विधायकों ने सार्वजनिक रूप से ब्यूरोक्रेसी पर निशाना साधते हुए कहा कि लोगों के काम रुके पड़े हैं और अफसरशाही विधायकों के काम में अड़ंगा डाल रही है। पार्टी हाईकमान तक ये मामला पहुँचा। इसी कारण मुख्यमंत्री को अपना इंग्लैंड दौरा बीच में ही छोड़ कर वापस पंजाब लौटना पड़ा। चारों बागी विधायक मुख्यमंत्री के गृह जिले के हैं। इन्हें कैप्टन के खेमे का भी माना जाता है। ऐसे में इनकी बगावत ने पार्टी की चिंताएं बढ़ा दी है। राज्य के अन्य हिस्सों और अन्य खेमों के विधायकों की नाराजगी को लेकर भी पार्टी सशंकित है।

विधायकों को मनाने के लिए सांसद परनीत कौर को भी लगाया गया। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की मुश्किलें केवल यही नहीं हैं। उन्हें 27 नवंबर को कोर्ट में भी पेश होना है। सिटी सेंटर घोटाला मामले में सरकारी और आरोपित पक्ष की बहस पूरी होने के बाद कैप्टन को कोर्ट में हाजिरी लगाने के आदेश दिए गए हैं। विजिलेंस ब्यूरो ने मुख्यमंत्री सहित 7 आरोपितों के ख़िलाफ़ क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की हुई है। ये मामला 2006 का है। तब भी राज्य में अमरिंदर सिंह ही सीएम थे। अकाली सरकार आने के बाद 2007 में उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था।

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित ख़बर

इस मामले में 36 आरोपितों पर केस दर्ज किया गया था। इनमें से 4 आरोपितों की मृत्यु हो चुकी है। अब तक 152 गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। 130 पन्नों की चार्जशीट में आरोपितों पर आरोप तय किया गया था। अदालत इस मामले में कभी भी फ़ैसला सुना कती है। लुधियाना के जिस सिटी सेंटर को लेकर ये मामला चल रहा है, वो अब एक खंडहर का रूप ले चुका है। आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के बजट में से 100 करोड़ रुपए कॉन्ग्रेस पार्टी को दिए गए। तब भाजपा में रहे नवजोत सिंह सिद्धू सहित कई नेताओं ने कैप्टन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था।

‘डेढ़ लाख करोड़ रुपए गलत हाथों में जाने से बचे’ – Republic Summit में PM मोदी ने विरोधियों को दिया करारा जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विरोधियों पर एक बार फिर ज़ोरदार हमला बोला है। रिपब्लिक टीवी के Republic Summit 2019 को सम्बोधित करते हुए मोदी ने न केवल अपनी सरकार के 5.5 सालों की उपलब्धियाँ गिनाईं बल्कि विरोधियों को भी करारा जवाब दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके विरोधियों की चलती तो देश में जीएसटी कभी लागू ही न हो पाता। गौरतलब है कि राहुल गाँधी जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहते हैं।

उन्होंने कहा कि उनके दूसरे प्रोजेक्ट आधार को भी बेपटरी करने की पूरी कोशिश की गई। लोग सुप्रीम कोर्ट तक आधार को घसीट ले गए।

मोदी ने दावा किया कि आधार को सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए ज़रूरी बनाने से ₹1.5 लाख करोड़ की बर्बादी पर रोक लगी है। इसके पहले भी सब्सिडी लीकेज रोकने में सफलता को मोदी सरकार न केवल अपनी सबसे बड़ी सफलताओं में गिनाती रही है, बल्कि इसे आधार पर किसी भी तरह की आपत्ति के खिलाफ भाजपा के प्रमुख तर्क के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

प्रधानमंत्री ने जीएसटी लागू होने से दामों में आई गिरावट की भी याद दिलाई। दावा किया कि जीएसटी के बाद से रोज़मर्रा के सामान पर टैक्स ~31% से गिरकर लगभग 10-12% तक कम हुआ है।

उन्होंने 23 मई को लोकसभा चुनाव जीतने पर दिया गया अपना “सबका साथ- सबका विकास और सबका विश्वास” का नारा भी दोहराया।

60 करोड़ टॉयलेट के ज़िक्र से उन्होंने साफ़ किया कि स्वच्छ भारत मिशन उनकी सरकार की प्राथमिकता में बरकरार रहेगा।

मोदी ने दावा किया कि ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ और उनकी अन्य योजनाओं के चलते 37 करोड़ गरीबों के बैंक खाते खुले हैं।

सुनंदा की मानसिक स्थिति कैसी थी, यह उनके ट्विटर एकाउंट के पता चलेगा: थरूर ने कोर्ट से लगाई गुहार

कॉन्ग्रेस नेता और थिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर इन दिनों एक बार फिर सुनंदा पुष्कर केस को लेकर सुर्ख़ियों में हैं। दरअसल थरूर ने मंगलवार को विशेष अदालत से एक अपील की है। अपनी अपील में उन्होंने कहा है कि कोर्ट दिल्ली पुलिस को इस बात का निर्देश दे कि वह उनकी दिवंगत पत्नी सुनंदा पुष्कर द्वारा किए गए ट्वीट को रिकॉर्ड के रूप में ले। इस मामले को लेकर थरूर का कहना है कि मौत से पहले सुनंदा की मानसिक स्थिति कैसी थी, यह जाँचने के लिए उनका ट्विटर एकाउंट देखना बेहद ज़रूरी है।

अदालत में मामले की सुनवाई कर रहे जज अजय कुमार कुहर के सामने अपना पक्ष रखते हुए थरूर ने कहा कि 2018 तक पुलिस को मौत की वजह मालूम ही नहीं थी।

बहस के दौरान थरूर का बचाव कर रहे वकील विकास पाहवा ने कहा, “मृतक के ट्विटर हैंडल को जाँचना ज़रूरी है, जब हम उनकी मानसिक स्थिति की जाँच कर रहे हैं।” बता दें कि जनवरी 2014 में सुनन्दा पुष्कर की रहस्यमयी परिस्थितियों में दिल्ली स्थित लीला होटल में मौत हो गई थी।

एक रिपोर्ट के मुताबिक पाहवा ने अदालत में थरूर की ओर से दलील रखते हुए कहा कि 30 जनवरी को 2014 को मृतक के तीन ब्लैकबेरी फोन जब्त किए गए थे। इसके बाद उन्हें सीएफएसएल को भेजा गया मगर डेटा वही चुना, जिसका वह इस्तेमाल करना चाहते थे। वहीं अपनी दलील में उन्होंने आगे कहा कि सुनंदा की ट्विटर टाइमलाइन उनकी मानसिक स्थिति को दर्शाने के लिए काफी है।

थरूर बोले कि पुलिस कैसे कह सकती है कि यह अप्रासंगिक है। अपनी बात रखते हुए थरूर ने आगे कहा, “मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि उन्हें दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जोकि मेरे पक्ष में हैं।” बता दें कि थरूर के आवेदन पर इस पर फैसला 12 दिसम्बर को आएगा।

दरअसल पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर इस मामले में मुख्य आरोपी हैं और इस वक़्त बेल पर बाहर हैं। दिल्ली पुलिस ने उन पर भारतीय दंड संहिता 498A और 306 के तहत केस दर्ज किया है। पुलिस ने थरूर पर आरोप लगाया है कि उनके उकसाने के चलते ही सुनंदा पुष्कर ने आत्महत्या की थी।

बाला साहेब के ‘आटे की बोरी’ में कैद हो गया उनका ही बेटा, ‘मातेश्री’ के तट पर अस्त हुआ ‘मातोश्री’ का सूरज

श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ‘जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च…’। यानी, जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद जन्म भी। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा है- “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः, न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः”। यानी, आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते। आग जला नहीं सकती। जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

17 नवंबर 2012 को जब शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अंतिम सॉंसे ली तो उन्होंने केवल शरीर त्यागा था। उनकी आत्मा ने तो साथ छोड़ा 26 नवंबर 2019 को। उस दिन जिस दिन मातोश्री में रहने वाले उनके बेटे ने 10 जनपथ की महारानी और सलमान खुर्शीद की ‘भारत माता’ सोनिया गॉंधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस तथा शरद पवार की एनसीपी की सदारत कबूल की। और वह भी केवल मुख्यमंत्री की उस कुर्सी के लिए जिस पर बाल ठाकरे अपनी मर्जी के शिवसैनिक को बिठा दिया करते थे।

आखिर आत्मा क्या थी बाल ठाकरे? बाल ठाकरे की आत्मा थी हिन्दुत्व की वह विचारधारा जिसके दम पर अपने चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में वे किसी के सामने नहीं झुके। लेकिन उनकी मौत के सात साल बाद उनके राजनीतिक वारिस ने इस विचार का किला इस कदर ढहा दिया है कि अब उसका मर्सिया पढ़ने वाला भी कोई नहीं बचा है। हिन्दू हृदय सम्राट कहे जाने वाले बाल ठाकरे ने खुद का स्वभाविक उत्तराधिकारी माने जाने वाले भतीजे राज ठाकरे को किनारे लगाने और फोटोग्राफी के शौकीन बेटे उद्धव ठाकरे को जब राजनीतिक विरासत सौंपने का फैसला किया होगा, तो उन्हें उम्मीद रही होगी कि वह हिन्दुत्व की राजनीति को नए कैनवास पर उकेरेगा। यह तो सोचा भी न होगा कि उनके शरीर त्यागने के सात साल के भीतर ही वह उसकी अंत्येष्टि कर देगा।

वैसे, राजनीति में बेमेल गठजोड़ कोई नई बात नहीं है। ​अपने जिस साझेदार को झटक कर शिवसेना ने एनसीपी और कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाया है, वह भी कई बेमेल गठबंधन की भागीदार रही है। चाहे वह आपातकाल के जमाने में जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हो या फिर वीपी सिंह की सरकार को समर्थन। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार चलाने का प्रयोग हो या फिर यूपी में मायावती के साथ सत्ता शेयरिंग का फॉर्मूला। लेकिन, देश की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और समय की मॉंग को देख ये प्रयोग करते वक्त भाजपा ने कभी अपने मूल सिद्धांत से समझौता नहीं किया। पहचान का संकट खड़ा हुआ तो वह जनता पार्टी से निकल गई। राम मंदिर की राह में वीपी सिंह और उनके शागिर्द रोड़ा बनने लगे तो उस सरकार को भी झटक ​दिया। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई नरम होती दिखी तो पीडीपी से नाता तोड़ लिया। यहॉं तक कि एनडीए की गठबंधन सरकार चलाते वक्त भले कॉमन एजेंडे में राम मंदिर, आर्टिकल 370 और सामान नागरिक संहिता नहीं थे, फिर भी कभी इनसे कन्नी नहीं काटी। भाजपा लगातार इन मुद्दों को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराती रही।

लिहाजा, सत्ता के लिए शिवसेना के इस प्रयोग में कुछ भी नयापन नहीं है। नयापन तो उस तरीके में है जिसके सहारे उसने यह गठजोड़ कायम किया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सरकार बनने से पहले ही शिवसेना ने अपने मूल एजेंडे को छोड़ दिया है। एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ मिलकर उसने जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार किया है, वह कहता है कि समुदाय विशेष को 5 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण दिया जाएगा। उसके मुताबिक शिवसेना वीर सावरकर के लिए भारत रत्न नहीं मॉंगेगी। यानी, सत्ता पाने की कीमत चुकाने के लिए उसने हिन्दुत्व की अपनी कोर राजनीति को ही गिरवी रख दिया है, जैसा भाजपा ने अपने तमाम प्रयोगों के दौरान कभी नहीं किया।

यही कारण है कि अब नए साथी शिवसेना के हिन्दुत्व को खुलेआम सांप्रदायिक बता रहे हैं। जरा एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक के इस बयान पर गौर कीजिए। बकौल मलिक, “शिवसेना का जन्‍म सांप्रदायिक राजनीति के लिए नहीं हुआ है। वे महाराष्‍ट्र की जनता की सेवा के लिए अस्तित्‍व में आए हैं। बीजेपी के साथ हाथ मिलाने के बाद शिवसेना बिगड़ गई।” मलिक का यह बयान उद्धव ठाकरे के महा विकास अघाड़ी (शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी) का नेता चुने जाने के बाद आया।

शिवसेना के इस पतन की दो बड़ी वजहें हैं। पहला, सत्ता की लालसा। दूसरा, पुत्रमोह। यह पुत्रमोह ही था जिसके फँदे में फँसकर बाल ठाकरे ने शिवसेना की बागडोर उद्धव को सौंपी थी। लेकिन, सत्ता की लालसा उन्होंने कभी नहीं दिखाई। मराठी अस्मिता के नाम पर राष्ट्रपति चुनाव में भले कॉन्ग्रेस की प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया लेकिन कभी उसकी सत्ता के सामने नहीं झुके। यही उनकी पूँजी थी और कमाई भी।

1966 में शिवसेना बनाने के बाद से बाल ठाकरे करीब 46 साल राजनीति में रहे। कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। कभी मुख्यमंत्री नहीं बने। न सांसद, न विधायक और न पार्षद ही बनना चाहा। जीवनभर ठसक के साथ हिंदू और सावरकर के नाम की राजनीति की। विरोधियों को हड़काते रहे, लेकिन कोर एजेंडे से कभी समझौता नहीं किया। किसी के सामने नहीं झुके। तब भी नहीं जब मतदान का अधिकार छीन लिया गया। फिर भी जब शरीर त्यागा तो मुंबई थम गई। वह मुंबई जो कभी रुकती नहीं। उसी तरह राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ, जैसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर रहे लोगों का होता है।

बाल ठाकरे के निधन के बाद नितिन गडकरी ने कहा था, ‘हिंदुत्व का विचार उनका हुँकार था’। मौत के 7 साल बाद उद्धव ठाकरे ने उस हुँकार को चीत्कार में बदल दिया है। बदले में मिली सीएम की कुर्सी, जिसकी बाल ठाकरे कभी रिमोट अपने पास रखते थे। यही रिमोट उद्धव ने उस शरद पवार को सौंप दी है, जिसे बाल ठाकरे ‘आटे की बोरी’ कहा करते थे। ‘आटे की बोरी’ में बेटा कैद भी बाला साहेब के नाम की दुहाई देकर ही हुआ है। पहले बेटे ने यह दावा कर कि ‘उसने पिता से शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था’, बीजेपी से नाता तोड़ा। फिर अघाड़ी का नेता चुने जाने के बाद कहा, “कभी सोचा नहीं था कि मैं सीएम बनूॅंगा। संघर्ष के समय बालासाहेब की बहुत याद आती है।” सो, सीएम के लिए बाला साहेब के बेटे के चुने जाने के बाद भी मुंबई के ट्राइडेंट होटल के भीतर-बाहर जयकारे शरदराव के लग रहे। 28 नवंबर को यही शोर शिवाजी पार्क में भी सुनाई पड़े तो चौंकिएगा मत।

शायद इसलिए गीतकार इंदीवर लिख कर गए हैं;

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या
होगा मसीहा सामने तेरे फिर भी न तू बच पाएगा
तेरा अपना खून ही आखिर तुझको आग लगाएगा

‘जो श्री राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं’ – बाला साहेब के सैनिक ने उद्धव की सेना से दिया इस्तीफ़ा

शिव सेना को सीएम पद के लालच में कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने का कदम कितना भारी पड़ने वाला है, यह नज़र आना शुरू हो गया है। उसके कद्दावर पदाधिकारी रमेश सोलंकी ने पार्टी के विचारधारा से भटक जाने के कारण का हवाला देते हुए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है।

रमेश सोलंकी शिवसेना की इकाई युवासेना की आईटी सेल कोर कमिटी मेंबर थे। इसके अलावा वह युवासेना की आईटी सेल कोर कमिटी के मुंबई सेक्रटरी और गुजरात राज्य संपर्क प्रमुख भी थे।

सोलंकी ने ट्विटर पर बताया कि बचपन से बाला साहेब ठाकरे के फायरब्रांड हिंदुत्व, करिश्माई व्यक्तित्व और निडर नेतृत्व से प्रभावित होने के बाद 1998 में वे शिव सैनिक बने थे। उन्होंने कहा कि कई चुनावों में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन वे बृहन्मुम्बई महानगरपालिका से लेकर लोक सभा चुनावों तक हिन्दू राष्ट्र और कॉन्ग्रेस-मुक्त भारत के सपने के लिए काम करते रहे।

उन्होंने कहा कि 21 साल तक बिना पद, प्रतिष्ठा या टिकट की माँग के वे रात-दिन पार्टी के आदेश का पालन करते रहे, लेकिन जब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एनसीपी और कॉन्ग्रेस से हाथ मिला लिया है तो कॉन्ग्रेस का सहयोग करने की इजाज़त उनका ज़मीर नहीं दे रहा है। चूँकि वे आधे-अधूरे मन से कोई काम नहीं करना चाहते, इसलिए वे इस्तीफ़ा दे रहे हैं।

उन्होंने यह भी साफ़ किया कि उनका इस्तीफ़ा विशुद्धतः विचारधारा के आधार पर है न कि राजनीतिक मौकापरस्ती, क्योंकि वे पार्टी तब छोड़ रहे हैं जब शिव सेना महीने भर से चल रहे सत्ता-संघर्ष में विजयी होकर उभर रही है।

जाते जाते उन्होंने कॉन्ग्रेस पर भगवान श्री राम का विरोधी होने का आरोप लगाया और कहा, “जो मेरे श्री राम का नहीं है (Congress), वो मेरे किसी काम का नहीं है।” उन्होंने युवा सेना के मुखिया और उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे का धन्यवाद भी किया।

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इस्लामिक स्टेट में रिक्रूटमेंट करता था पति अब्दुल्ला, बीवी आयशा ने अफ़ग़ानिस्तान में किया सरेंडर

बीते दस दिनों में अफ़ग़ानिस्तान में करीब 600 इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने अपने हथियार डाल दिए हैं। इनमें से एक महिला की पहचान केरल वासी के रूप में हुई है। द हिन्दू की एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 32 वर्षीय यह महिला आईएस आतंकी (मारा जा चुका है) अब्दुल्ला की पहली पत्नी है। शादी से पहले आयशा का नाम सोनिया सेबेस्टियन था। अब्दुल्ला वही शख्स है, जो केरल में आईएस के लिए रिक्रूटमेंट किया करता था। सरेंडर करने वाले आतंकवादियों के बीच महिला की पहचान उन फोटोज़ के ज़रिए हुई, जिसमें वह एक बच्चे के साथ खड़ी दिखाई दे रही है।

2016 में आयशा और अब्दुल्ला इरान से होते हुए पैदल ही अफ़ग़ानिस्तान को निकल गए। अब्दुल्ला उस वक़्त केरल के 21 लोगों के एक दल की अगुवाई कर रहा था, जिन्हें आईएस ज्वाइन करना था। हालाँकि मई 2019 में अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर हुए हमले में यूएस सेना ने अब्दुल्ला और उसके जैसे कितने ही आतंकवादियों को मार गिराया। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में जब अब्दुल्ला और आयशा अफ़ग़ानिस्तान के लिए निकले तो उनके साथ उनका दो साल का बच्चा भी था लेकिन बाद में उसके बारे में कोई सुराग नहीं मिल सका।

केरल में लोगों और युवाओं को आईएस में भेजने वाले अब्दुल्ला ने बड़ी ही चालाकी से अन्य सम्प्रदाय और विचार के लोगों का धर्मांतरण करवाया और फिर उन्हें अपने साथ अफ़ग़ानिस्तान के खोरासन प्रान्त में ले गया। यहाँ तक की उसकी पत्नी सोनिया खुद शादी से पहले ईसाई थी, जिसका नाम बाद में आयशा रख दिया। आयशा ने एर्नाकुलम से इंजीनियरिंग पूरी कर बंगलूरु से एमबीए किया था।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 तक पाला निवासी अब्दुल्ला कोड़ीकोड स्थित पीस इंटरनेशनल स्कूल में एक टीचर हुआ करता था। इस स्कूल में उसकी मुलाक़ात एक 30 वर्षीय महिला यास्मीन मोहम्मद शहीद से हुई, जो बिहार की रहने वाली थी। आगे चलकर उसने इसी महिला के साथ दूसरी शादी कर ली। इसके बाद अब्दुल्ला ने 21 लोगों को जबकि यास्मीन ने 15 लोगों को बहला-फुसला कर 2016 में आईएसआईएस ज्वाइन करवा दिया।

अब्दुल्ला अफ़ग़ानिस्तान रहकर भी सबसे संपर्क में था, व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जारिए वह अक्सर कई भड़काऊ क्लिप डालता रहता था, जिसका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को आईएस ज्वाइन कराना होता था। इसी रास्ते वह लोगों को हिन्दू संगठनों के खिलाफ हमला करने के लिए उकसाता था। केरल से ISIS में गए लोगों को अफग़ानिस्तान में अब्दुल्ला रशीद के साथ विलायत खोरासन के लिए लगा दिया गया जोकि खोरासन प्रांत में सक्रिय है। दरअसल विलायत खोरासन नाम के इस संगठन की शुरुआत 2015 में हुई थी।

2016 में यास्मीन और उसके बच्चे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। केरल से गायब हुए युवाओं के मामले में पहली सजा यास्मीन को हुई। मार्च 2018 में कोच्चि स्थित एनआईए की एक विशेष अदालत ने यास्मीन को 7 साल कैद की सजा सुनाई गई। बता दें कि जिस दौरान पुलिस ने यास्मीन और उसके चार साल के बच्चे को पकड़ा, उस दौरान वह दिल्ली से काबुल जाने वाली एक फ्लाईट में सवार हो चुकी थी। उस वक़्त उसने पुलिस से कहा था कि वह उस जगह जा रही थी, जहाँ सच्चा इस्लाम माना जाता है।

एनआईए ने अपनी चार्जशीट में यह माना था कि यास्मीन और अब्दुल्ला राशिद ने मिलकर उन देशों के साथ लड़ाई की, जिनके साथ भारत के मैत्री सम्बन्ध हैं। इस मामले में दोषी पाए जाने पर कोर्ट ने महिला पर 25,000 रुपए का जुर्माना लगाया था। वहीं मई 2019 में अफ़ग़ानिस्तान के खोरासन प्रांत में यूएस बोम्बिंग्स के दौरान अबदुल्ला राशिद की मौत हो गई। इस खबर की पुष्टि स्वयं एक पुलिस अधिकारी ने की थी। टेलीग्राम चैट पर एक आईएस ऑपरेटिव के भेजे एक सन्देश में लिखा मिला था कि इस बम विस्फोट में 3 हिन्दुस्तानी भाई, दो हिन्दुस्तानी महिला और चार बच्चे मारे गए हैं।

2017 की चार्जशीट में सोनिया सेबेस्टियन और अब्दुल रशीद पर आरोप था कि जिहाद और इस्लामिक स्टेट के समर्थन में वह सीक्रेट क्लास लगाते थे। चार्जशीट के मुताबिक उनकी यह क्लास रमजान के आखिर में लगा करती थीं। सोनिया पहले ही सरेंडर कर चुकी हैं जबकि उसके बच्चे की कोई खबर नहीं है।