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भारतीयों को ‘अनपढ़’ और ‘हमलावर’ कहने वाली नस्लवादी लॉरा लूमर को इंडिया टुडे का न्योता: सोशल मीडिया पर फूटा लोगों का गुस्सा, पूछा- क्या देश का अपमान करने वालों को मिलेगा बड़ा मंच?

अपनी बेहद घटिया नस्लवादी टिप्पणियों और भारत विरोधी एजेंडे के लिए बदनाम अमेरिकी दक्षिणपंथी कमेंटेटर लॉरा लूमर एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। खबर है कि उन्हें ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026’ में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया है। लूमर ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर दावा किया है कि वह इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रही हैं।

इस खबर के सामने आते ही भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। लोग इस बात से हैरान और नाराज हैं कि जिस महिला ने भारतीयों को ‘तीसरी दुनिया का हमलावर’ कहा और हमारे रहन-सहन का मजाक उड़ाया, उसे भारत का एक बड़ा मीडिया संस्थान मंच क्यों दे रहा है। लोग इसे ‘आत्मघाती’ कदम बता रहे हैं और सवाल कर रहे हैं कि क्या भारत विरोधी नफरत को अब मुख्यधारा में जगह दी जाएगी।

सोशल मीडिया पर लूमर के पुराने पोस्ट वायरल

जैसे ही लॉरा लूमर के भारत आने की खबर फैली, ‘X’ पर उनके पुराने नस्लभेदी बयानों के स्क्रीनशॉट बाढ़ की तरह तैरने लगे। यूजर्स ने उन पोस्ट्स का कोलाज शेयर किया है जिसमें लॉरा लूमर ने भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर, बुद्धिमत्ता के स्तर और साफ-सफाई का भद्दा मजाक उड़ाया था। एक पोस्ट में उन्होंने बेशर्मी से पूछा था कि भारत के लोग उसी पानी में शौच क्यों करते हैं जिसे वे पीते और नहाते हैं।

कई कमेंटेटर्स का कहना है कि लॉरा लूमर को मंच देना उनकी नफरत भरी बयानबाजी को वैधता देने जैसा है। लोग इंडिया टुडे से सवाल कर रहे हैं कि क्या उन्हें दुनिया भर में कोई और काबिल वक्ता नहीं मिला जो उन्हें उस महिला को बुलाना पड़ा जिसने हर मौके पर भारत और यहाँ के लोगों को जलील किया है।

भारतीयों के खिलाफ लॉरा लूमर की जहरीली बयानबाजी

लॉरा लूमर का भारत के प्रति नफरत भरा रवैया तब खुलकर सामने आया था जब नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय-अमेरिकी विशेषज्ञ श्रीराम कृष्णन को व्हाइट हाउस में AI नीति सलाहकार नियुक्त किया। लूमर ने इस नियुक्ति को ‘निराशाजनक’ बताते हुए भारतीयों के खिलाफ एक लंबा अभियान छेड़ दिया।

लॉरा लूमप ने भारतीयों को ‘तीसरी दुनिया से आने वाले हमलावर‘ कहा और दावा किया कि अमेरिका को सिर्फ सफेद यूरोपीय लोगों ने बनाया है, इसलिए यहाँ भारतीयों की कोई जरूरत नहीं है। जब एक व्यक्ति ने उन्हें तर्क दिया कि अमेरिका की प्रगति में भारतीयों का बड़ा हाथ है, तो वह नीचता पर उतर आईं और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि भारत में पानी नल से नहीं आता और लोग उसी में गंदगी करते हैं जिसमें नहाते हैं।

इतना ही नहीं, लूमर ने डेमोक्रेटिक नेता कमला हैरिस की भारतीय विरासत का भी मजाक उड़ाया था। उन्होंने नस्लभेदी टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर हैरिस चुनाव जीतती हैं, तो व्हाइट हाउस से ‘करी’ (सब्जी) की महक आएगी और उनके भाषण कॉल सेंटर से चलेंगे। अमेरिका में ‘करी’ और ‘कॉल सेंटर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए किया जाता है।

बाद में विरोध होने पर उन्होंने इसे ‘राजनीतिक व्यंग्य’ कहकर पल्ला झाड़ लिया, लेकिन हकीकत यह है कि वह लगातार भारतीयों के खानपान और रहन-सहन को निशाना बनाती रही हैं। लूमर ने एच1-बी वीज़ा को लेकर भी झूठ फैलाया और भारतीयों पर ऑनलाइन हमलों के लिए ट्रंप समर्थकों के एक धड़े को उकसाया।

साजिशों की रानी और विवादों का पुराना नाता

लॉरा लूमर केवल भारत विरोधी ही नहीं हैं, बल्कि वह अमेरिका में भी अपनी ‘पागलपन भरी साजिशों’ के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने 9/11 के आतंकी हमलों को ‘अंदरूनी काम’ बताकर शक जताया था और कोविड-19 महामारी को एक बड़ा घोटाला करार दिया था। हालाँकि, बाद में वह खुद कोविड की चपेट में आ गई थीं और उनकी हालत काफी खराब हो गई थी।

लॉरा लूमर ने जो बायडेन की सेहत को लेकर भी कई बार झूठ फैलाया और उनके विमान की लैंडिंग को लेकर मेडिकल इमरजेंसी का दावा किया, जो पूरी तरह गलत साबित हुआ। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस तक उन्हें ‘पागल साजिशकर्ता’ कह चुके हैं। चुनाव की बात करें तो वह दो बार फ्लोरिडा से चुनाव लड़ चुकी हैं और दोनों ही बार उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा है।

आज जिन शंकराचार्य से ‘आशीर्वाद’ ले रहे अखिलेश, कभी उन्हीं पर चलवाई थी पुलिस से लाठियाँ: पिता मुलायम ने रामभक्तों का बहाया था खून, हिंदू घृणा ही सपा का आधार

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गुरुवार (12 मार्च 2026) को लखनऊ में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात की। करीब एक घंटे चली इस मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि शंकराचार्य का आशीर्वाद मिलना उनके लिए सम्मान की बात है।

अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि देश में नकली संतों का दौर खत्म होने वाला है और असली संत समाज को सही दिशा दिखाते हैं। हालाँकि इसी के साथ समाजवादी पार्टी और यादव परिवार के पुराने फैसलों और बयानों की भी याद ताजा हो गई है। यही समाजवादी पार्टी है जिस पर लंबे समय से हिंदू आस्था, मंदिरों और संतों का अपमान करने के आरोप लगते रहे हैं।

मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का फैसला हो या फिर अखिलेश यादव के मंदिरों, संतों और हिंदू परंपराओं को लेकर दिए गए विवादित बयान, ये घटनाएँ आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती रहती हैं।

दीपोत्सव, मंदिर और हिंदू परंपराओं पर विवादित टिप्पणियाँ

अखिलेश यादव पहले भी कई बार अपने बयानों को लेकर विवादों में घिर चुके हैं। अयोध्या में दीपोत्सव के दौरान दीपक और मोमबत्ती जलाने पर होने वाले खर्च को लेकर उन्होंने सवाल उठाया था।

उन्होंने कहा था कि दुनिया भर में क्रिसमस के दौरान शहर महीनों तक रोशनी से जगमगाते हैं और हमें उनसे सीखना चाहिए कि दीयों और मोमबत्तियों पर इतना पैसा क्यों खर्च किया जाए।

इसी दौरान उन्होंने हिंदू धर्म को लेकर एक टिप्पणी करते हुए कहा था कि हिंदू धर्म में कहीं भी पत्थर रखकर, लाल झंडा लगा देने से मंदिर बन जाता है। उनके इस बयान को लेकर भाजपा और कई हिंदू संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और इसे हिंदू आस्था का अपमान बताया। इसके अलावा उन्होंने अयोध्या में राम जन्मभूमि से जुड़े विवाद पर यह भी कहा था कि एक समय रात के अंधेरे में मूर्तियाँ रखी गई थीं।

भगवा और संतों पर उठाते रहे हैं सवाल

अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए एक बार कहा था कि सिर्फ भगवा कपड़े पहन लेने से कोई बाबा नहीं बन जाता। उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा था कि रावण भी साधु का वेश बनाकर माता सीता के पास पहुँचा था। इस बयान को लेकर भी कई संगठनों ने कहा कि इस तरह की तुलना साधु-संत परंपरा का अपमान है।

इन्हीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सिर से बही थी खून की धारा

साल 2015 में वाराणसी में गणेश प्रतिमा विसर्जन को लेकर संतों के विरोध के दौरान उनकी सरकार में पुलिस ने लाठीचार्ज किया था, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समेत कई संत घायल हुए थे। जिसके बाद हरिद्वार में संतों से मुलाकात के दौरान अखिलेश यादव ने उस घटना को अपनी सरकार की गलती बताते हुए माफी माँगी।

समाजवादी पार्टी के शासनकाल में कई संतों और धार्मिक नेताओं के साथ टकराव की घटनाएँ भी सामने आई थीं। कई मामलों में प्रशासन की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए और यह आरोप लगाया गया कि संतों को सम्मान देने के बजाय उन्हें दबाने की कोशिश की गई।

कारसेवकों का खून बहाने का रहा है पिता मुलायम का इतिहास

समाजवादी पार्टी के इतिहास में सबसे बड़ा विवाद 1990 की उस घटना से जुड़ा माना जाता है जब अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया गया था। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे।

30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में बड़ी संख्या में कारसेवक राम मंदिर आंदोलन के समर्थन में पहुँचे थे। उस दौरान पुलिस और कारसेवकों के बीच टकराव हुआ और पुलिस ने गोलीबारी की। आधिकारिक आंकड़ों में 17 लोगों की मौत बताई गई थी, जबकि आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इससे ज्यादा संख्या होने का दावा किया था।

इस घटना के बाद राजनीतिक विरोधियों ने मुलायम सिंह यादव पर रामभक्तों के खिलाफ कार्रवाई का आरोप लगाया। यही वजह रही कि लंबे समय तक उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ कहाँ जाता था।

मुलायम सिंह यादव अपने विवादित बयानों को लेकर भी आलोचना का सामना कर चुके हैं। एक भाषण में उन्होंने कहा था कि “लड़कों से गलती हो जाती है” और बलात्कार के मामलों में मौत की सजा नहीं होनी चाहिए। एक अन्य बयान में उन्होंने कहा था कि चार लोग किसी महिला के साथ रेप कर दें, यह प्रैक्टिकल नहीं लगता।

पॉपुलैरिटी के गुमान में चूर, परिवार से दूर… पढ़िए क्यों हिंदू लड़कियों में ‘दिलचस्पी’ दिखाते हैं मुस्लिम लड़के, बाद में कहते हैं- हमारे लिए पहले मजहब है जरूरी

सोशल मीडिया के इस आभासी युग में ‘पॉपुलर’ होने की चाहत ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी है। आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर हिंदू लड़कियाँ, जब इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर मशहूर होती हैं, तो वे धीरे-धीरे अपने वास्तविक परिवार और संस्कारों से दूर होने लगती हैं। इसी शून्य में प्रवेश करते हैं वे ‘शिकारी’, जिनका उद्देश्य प्रेम नहीं बल्कि धर्मांतरण और दमन होता है।

यह एक ऐसी विचारणीय रिपोर्ट है जो उस भयावह पैटर्न को उजागर करती है, जहाँ शुरुआत ‘मेरा अब्दुल ऐसा नहीं है’ से होती है और अंत या तो ‘फ्रिज’ में होता है या फिर ‘घर वापसी’ के कठिन संघर्ष में।

मोनालिसा भोसले: कुंभ की प्रसिद्धि से ‘फरमान’ से निकाह तक

हाल ही में मोनालिसा भोसले का मामला इस चर्चा के केंद्र में है। कुंभ मेले के दौरान अपनी मासूम मुस्कान और खूबसूरत आँखों की वजह से रातों-रात वायरल हुई माला बेचने वाली यह लड़की आज एक मॉडल और अभिनेत्री बन चुकी है। लेकिन प्रसिद्धि के इस शिखर पर पहुँचते ही उसने अपने परिवार के विरुद्ध जाकर फरमान खान से शादी कर ली। मोनालिसा को वर्तमान में अपना यह फैसला ‘मर्जी’ और ‘प्यार’ लग रहा है लेकिन भविष्य किसने देखा है। हकीकत यह है कि मोनालिसा को मुस्लिम से शादी करने के लिए पुलिस से अपने ही पिता के खिलाफ सुरक्षा माँगनी पड़ रही है।

इतिहास गवाह है कि जब कोई हिंदू लड़की अपने परिवार के अनुभव और सुरक्षा चक्र को ठुकराकर ऐसे रिश्तों में जाती है, तो शुरुआती कुछ महीने ‘सुहाने’ लगते हैं। लेकिन जैसे ही पॉपुलरिटी का नशा उतरता है और मजहबी दीवारें सामने आती हैं, तब इन हिंदू लड़कियों को एहसास होता है कि वे एक जाल में हैं। मोनालिसा का मामला उन हजारों लड़कियों के लिए एक चेतावनी है जो वर्चुअल दुनिया के रिश्तों को हकीकत मान बैठती हैं।

सायली सुर्वे और चाहत खन्ना: ‘मिस इंडिया अर्थ’ से ‘घर वापसी’ की दर्दनाक दास्तान

पॉपुलर होने के बाद मुस्लिम लड़कों के निशाने पर आई हिंदू लड़कियों का एक उदाहरण पुणे की सायली सुर्वे भी हैं। 2019 में ‘मिस इंडिया अर्थ’ का खिताब जीतने वाली सायली ने 10 साल पहले अपने परिवार की बात अनसुनी कर आतिफ तासे से निकाह किया था। उस समय सायली पर आधुनिकता और ‘सेक्युलरिज्म’ का नशा था। लेकिन निकाह के बाद जो हुआ, वह रूह कंपा देने वाला है। सायली को जबरन ‘अतेजा तासे’ बनाया गया, उनके साथ मारपीट की गई और चार बच्चों की माँ बनने के बाद भी उन्हें पशुओं की तरह प्रताड़ित किया गया। आखिर में सायली सुर्वे को हिंदुत्ववादी संगठनों की मदद लेनी पड़ी और फिर उनकी ‘घर वापसी’ हुई।

मशहूर अभिनेत्री चाहत खन्ना ने अपनी दास्तान सुनाते हुए बताया कि कैसे उन्हें इस्लाम की ओर ले जाने के लिए व्यवस्थित तरीके से ‘ब्रेनवाश’ किया गया था। उन्हें सिखाया गया कि सनातन धर्म का हर पहलू गलत है। फरहान मिर्जा से निकाह के बाद वे अपनी जड़ों से इतनी कट गईं कि उन्हें खुद को पहचानने में 5 साल लग गए। चाहत ने स्वीकार किया कि जब आप छोटी उम्र के होते हैं और लोग आपके दिमाग से खेलने लगते हैं, तो आप भटक जाते हैं। आज वे वापस अपनी जड़ों (काली और कृष्ण भक्ति) की ओर लौट आई हैं, लेकिन उनकी जिंदगी के वो कीमती साल इसी ‘भटकाव’ की भेंट चढ़ गए। चाहत जैसी सेलिब्रिटी लड़कियाँ अक्सर इन मुस्लिम लड़कों के लिए ‘ट्रॉफी’ की तरह होती हैं, जिन्हें फँसाकर वे समाज में अपनी धाक जमाना चाहते हैं।

अदनान शेख: ‘ग्रूमिंग’ का खेल और मजहब की प्राथमिकता

इन्फ्लुएंसर अदनान शेख की बहन इफ्फत ने जो खुलासे किए, वे चौंकाने वाले हैं। अदनान ने इंडिगो में काम करने वाली रिद्धि जाधव नाम की हिंदू लड़की को कन्वर्ट कर ‘आयशा’ बनाया था। अदनान का खुद का इंटरव्यू गवाही देता है कि ‘हमारे लिए मजहब जरूरी है, प्यार अलग चीज है।’ यह मानसिकता दर्शाती है कि इन लड़कों के लिए हिंदू लड़की केवल एक ‘संख्या’ है जिसे कन्वर्ट करना उनका मिशन होता है। अदनान शेख की बहन इफ्फत ने पोल खोलते हुए बताया था कि निकाह के बाद भी हिंसा और पाबंदियों का दौर शुरू हो गया।

अदनान शेख की बीवी रिद्धि जाधव आजकल बुर्के में दिखती है और उनका बच्चा स्कल कैप पहनता है। स्वघोषित फेमिनिस्ट ऐसे मामलों पर कभी सवाल क्यों नहीं उठाते या इसे जुल्म क्यों नहीं कहते लेकिन जब जडेजा की पत्नी उनके पैर छू लेती हैं तो उनका दिमाग खराब होने लगता है।

डॉक्टर स्तुति सोनावने और तारा शाहदेव: ‘फ्रिज’ की धमकी और शारीरिक यातनाएँ

मुंबई की डॉक्टर स्तुति सोनावने की कहानी उन लोगों के गाल पर तमाचा है जो कहते हैं कि शिक्षा सब ठीक कर देती है। स्तुति एक शिक्षित हिंदू डॉक्टर थीं, जिन्हें उनके बॉयफ्रेंड फैजुल मोहम्मद खान ने इस कदर मानसिक रूप से तोड़ा कि उन्होंने दुपट्टे से फाँसी लगा ली। सुसाइड नोट के 6 पन्ने बताते हैं कि फैजुल पहले उन्हें ताज होटल ले गया, खुशियाँ दिखाईं और फिर शक और अपमान का सिलसिला शुरू किया। फैजुल उन्हें धमकी देता था कि ‘तू एक दिन फ्रिज में मिलेगी’। एक डॉक्टर जैसी समझदार लड़की भी इस ‘साइकोलॉजिकल ट्रैप’ से नहीं निकल पाई और आखिर में उन्होंने अपनी जान दे दी।

राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज तारा शाहदेव का मामला देश ने देखा। रंजीत कोहली बनकर रकीबुल हसन ने उनसे शादी की। निकाह की पहली ही रात उन पर इस्लाम कबूलने का दबाव डाला गया। मना करने पर उन्हें एक महीने तक कुत्तों से कटवाया गया और भयंकर शारीरिक यातनाएँ दी गईं। जब वे वहाँ से भागीं, तब पता चला कि यह ‘प्यार’ नहीं, बल्कि एक खतरनाक गिरोह का हिस्सा था।

विधायक रूमी नाथ: सत्ता और ग्लैमर भी नहीं बचा सके अपमान से

असम की विधायक डॉ रूमी नाथ का मामला यह स्पष्ट करता है कि राजनीति और पावर भी ‘अब्दुल’ की मानसिकता के आगे फीके हैं। रूमी नाथ ने अपने पति और छोटी बेटी को छोड़कर जैकी जाकिर से निकाह किया और ‘राबिया सुल्ताना’ बन गईं। परिणाम क्या हुआ? उसी जाकिर ने रूमी को पैसों के लिए पीटना शुरू किया, उन पर जानलेवा हमला किया और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया। एक विधायक होने के बावजूद उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस की शरण लेनी पड़ी।

आम लड़कियों पर प्रभाव: एक खतरनाक सोशल ट्रेंड

जब मोनालिसा जैसी हिंदू लड़कियाँ या पॉपुलर एक्ट्रेसेज इन रिश्तों को ‘ग्लोरिफाई’ करती हैं, तो वे आम हिंदू लड़कियों के लिए एक गलत नजीर पेश करती हैं। आम लड़कियाँ सोचती हैं कि अगर उनकी पसंदीदा स्टार ऐसा कर रही है, तो यह ‘कूल’ है। वे नहीं जानतीं कि पर्दे के पीछे ‘अब्दुल’ का असली चेहरा क्या है। ये पॉपुलर लड़कियाँ पुलिस सुरक्षा माँगकर अपने माता-पिता को दुश्मन की तरह पेश करती हैं, जिससे आम लड़कियाँ भी अपने माता-पिता के अनुभव को ‘दखल’ मानने लगती हैं। पॉपुलर होने के बाद ये लड़कियाँ जब शिकार बनती हैं, तो वे अपनी हार स्वीकार नहीं करतीं और लंबे समय तक हिंसा सहती रहती हैं, जिसे देखकर आम लड़कियाँ भी ‘सहनशीलता’ को ही अपनी नियति मान लेती हैं।

‘मेरा अब्दुल ऐसा नहीं है’ से ‘घर वापसी’ तक का चक्र

यह पूरा खेल ‘आकर्षण’ और ‘धोखे’ पर टिका है। अंजलि अरोड़ा जैसे भी कुछ उदाहरण है। IAS टीना डाबी ने भी मुस्लिम से निकाह किया था और 2 साल बाद ही उन्होंने अपने पति अतहर आमिर खान से तलाक ले लिया था। इन 2 वर्षों में ही टीना डाबी को इस्लाम की खूबसूरती पता चल गई। टीना डाबी का पूर्व पति अख्तर इन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित करता था, जमकर मारता था, बुर्का पहनने पर मजबूर करता था और भी बहुत कुछ था जो बताया नहीं गया।

मार्च 2020 में इन्होंने अलग होने की घोषणा की और अपने नाम में से खान भी हटा लिया। उसी दिन पहला ट्वीट या यूँ कहें अधिकारिक बयान इन्होंने यही दिया, “सब सुख लहे तुम्हारी सरना , तुम रक्षक काहू को डरना”, फिर लिखा, “जय श्री राम”।

इसके अलावा कच्चा बादाम फेम गर्ल अंजलि अरोड़ा ने Lock UP टीवी शो मुनव्वर फारूकी से नजदीकियाँ बढ़ाई, लेकिन जब कंगना रनौत ने फारूकी की असलियत बताई, कि वो शादीशुदा है और उनकी गर्लफ्रेंड है, तब उन्हें समझ आई और फिर मुनव्वर फारूकी को ब्लॉक किया।

पहले ये महिलाएँ अपनी पसंद को सर्वोच्च मानती हैं, लेकिन वास्तविकता सामने आने पर उन्हें भी पीछे हटना पड़ता है। हिंदू लड़कियाँ जो किसी कारण फेमस हो जाती हैं, वे इन मुस्लिम लड़कों के लिए एक ‘मिशन’ बन जाती हैं। वे बेहद विनम्रता से आते हैं, प्यार का इजहार करते हैं और जैसे ही हिंदू लड़की अपनी संस्कृति से कटती है, वे उसे मानसिक और शारीरिक रूप से अपना गुलाम बना लेते हैं।

कभी आपसी विवाद में घुसाया जातिवाद, कभी वसूली के लिए ठोका SC-ST एक्ट: फतेहपुर में परिवार के 3 लोगों की आत्महत्या का मामला पहला नहीं, पढ़ें कानून के दुरुपयोग के 5 मामले

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक ही परिवार के 3 लोगों द्वारा आत्महत्या का मामला सामने आया है। यहाँ अमर श्रीवास्तव, उनकी माँ सुशीला श्रीवास्तव और चाचा सुनील श्रीवास्तव अपने घर में मृत पाए गए। उन्होंने पहले जहर का सेवन किया, फिर ब्लेड से काट लिया। इस मामले में अमर श्रीवास्तव का सुसाइड नोट सामने आया है, जिसमें उन्होंने खुद को प्रताड़ित बताया है और कहा है कि रुपयों के लेन-देन के बीच कुछ लोग एससी-एसटी एक्ट में फँसाकर जेल भेजने की धमकी दे रहे थे, जिसके बाद उनके पास कोई चारा नहीं बचा, सिवाय खुद की जान देने के।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फतेहपुर जिले के चौफेरवा गाँव में अमर श्रीवास्तव (29 वर्ष), उनकी माँ सुशीला श्रीवास्तव (55 वर्ष) और चाचा सुनील श्रीवास्तव एक साथ मृत पाए गए। शुरुआती जाँच में तीनों के हाथ और गले की नसें कटी हुई मिलीं, जिससे हत्या की आशंका जताई गई। लेकिन घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट ने जाँच की दिशा बदल दी।

अमर के कथित सुसाइड नोट में लिखा था कि आर्थिक तंगी, कर्ज के बोझ और कुछ लोगों द्वारा एससी/एसटी एक्ट लगाकर ब्लैकमेल करने की धमकी के कारण वे मजबूर होकर यह कदम उठा रहे हैं। नोट में संजय सिंह, दिलीप त्रिवेदी (पप्पू), शुभम साहू, राहुल श्रीवास्तव और सोनू जैसे नामों का जिक्र है, जिन्होंने कथित तौर पर उन्हें धमकाया और वसूली की।

अमर का सुसाइड नोट (फोटो साभार: Amar Ujala)

प्रयागराज जोन के एडीजी ज्योति नारायण ने पुष्टि की कि सुसाइड नोट प्रथम दृष्टया अमर के हाथ का लिखा प्रतीत होता है, जिसमें आर्थिक दबाव के साथ एससी/एसटी एक्ट की धमकी का जिक्र है। पुलिस ने नोट में उल्लिखित व्यक्तियों से पूछताछ शुरू की है, हैंडराइटिंग जाँच, पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार है।

यूँ तो एससी/एसटी (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक महत्वपूर्ण कानून है जो कमजोर वर्गों को जातिगत अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना और उन्हें न्याय दिलाना है।

हालाँकि हाल के वर्षों में इस एक्ट के दुरुपयोग की कई घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ व्यक्तिगत रंजिश, आर्थिक वसूली या बदले की भावना से झूठे मामले दर्ज कराए जाते हैं। इससे निर्दोष लोगों की जिंदगियाँ तबाह हो जाती हैं, व्यापार बर्बाद होते हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा खराब होती है, लंबी कानूनी लड़ाई में आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं और कुछ मामलों में तो परिवार स्तर पर त्रासदी घटित हो जाती है।

फतेहपुर का मामला पहला नहीं, अलीगढ़ में तो बाकायदा परिवार चला रहा था गिरोह

यह पहला मामला नहीं है। कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जहाँ एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग गिरोहबंद तरीके से किया गया। अलीगढ़ के हस्तपुर गाँव में चंद्रावती देवी और उनके परिवार ने पिछले 10 वर्षों में 15 फर्जी केस दर्ज कराकर लगभग 46 लाख रुपए की सरकारी सहायता और मुआवजा हड़प लिया। वे एससी/एसटी एक्ट के तहत झूठे मामले बनाकर वित्तीय लाभ लेते रहे।

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने इसे गंभीर मानते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) को जाँच सौंपी और सख्त कार्रवाई की माँग की।

लखनऊ में वकील ने SC-ST एक्ट का बुना जाल, दर्ज कराए 20 मामले-HC ने भेजा जेल

लखनऊ में अधिवक्ता लाखन सिंह का मामला न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रहार है। उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत लगभग 20 झूठे मुकदमे दर्ज कराए, मुख्य रूप से भूमि विवाद में बदला लेने के लिए। एक मामले में उन्होंने सुनील दुबे और रामचंद्र जैसे लोगों पर फर्जी हत्या के प्रयास का आरोप लगाया।

जाँच में साबित हुआ कि आरोप पूरी तरह झूठे थे और कई केस फाइनल रिपोर्ट के साथ बंद हो गए। एससी/एसटी विशेष कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने लाखन सिंह को 10 वर्ष 6 महीने की कठोर कारावास और 2.51 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अधिवक्ता पेशे को कलंकित किया और झूठे मुकदमों की फैक्ट्री चला रखी है। फैसला बार काउंसिल और जिला प्रशासन को भेजा गया ताकि आगे कार्रवाई हो।

लखनऊ के एक अन्य मामले में HC ने वकील को दी उम्रकैद की सजा

एक और गंभीर मामला लखनऊ के ही अधिवक्ता परमानंद गुप्ता का है। उन्होंने पड़ोसी अरविंद यादव और परिवार के खिलाफ भूमि विवाद में एससी/एसटी एक्ट के तहत फर्जी बलात्कार और उत्पीड़न का केस दर्ज कराया। उन्होंने अपनी पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली दलित महिला पूजा रावत को मजबूर कर झूठे बयान दिलवाए।

सीबीआई जाँच में साबित हुआ कि महिला घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थी। गुप्ता ने कुल 11 और उनकी पत्नी ने 18 फर्जी केस दर्ज कराए। लखनऊ की विशेष एससी/एसटी कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद और 5.10 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

लाल सिंह को 32 साल बाद मिला न्याय, झगड़ा था मामूली

राजस्थान में लाल सिंह का मामला 32 साल पुराना है, जो SC/ST एक्ट के दुरुपयोग की लंबी मार झेलने का उदाहरण है। 1993 में जोधपुर जिले के सोवणिया गाँव में आटा चक्की संचालक से पिसाई के पैसे को लेकर विवाद हुआ। चक्की संचालक ने लाल सिंह पर जातिसूचक शब्दों से अपमान, रास्ता रोकने और मारपीट का आरोप लगाकर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया। निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और 6 महीने की सजा दी, जो उन्होंने पूरी की।

हालाँकि राजस्थान हाई कोर्ट ने 32 साल बाद उन्हें निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एक्ट का अपराध साबित करने के लिए अपमान जानबूझकर, केवल जाति आधार पर और सार्वजनिक रूप से होना चाहिए। विवाद आर्थिक था, गवाहों के बयान विरोधाभासी थे और FIR देरी से दर्ज हुई। कोर्ट ने दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की, जो संतुलित प्रयोग की जरूरत बताती है।

एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायत पर हो सकती है जेल

एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायत पर शिकायतकर्ता को भी सजा मिल सकती है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 217 (पुरानी आईपीसी 182) और 248 (पुरानी 211) के तहत जानबूझकर गलत जानकारी देने पर 6 महीने से 3 साल या अधिक की जेल हो सकती है। लखनऊ में एक महिला को फर्जी शिकायत पर साढ़े तीन साल की सजा मिली भी।

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि महज जाति का नाम लेने से एक्ट लागू नहीं होता, इरादा सार्वजनिक अपमान का होना चाहिए। झूठे मामलों में मुआवजा केवल चार्जशीट और प्रथम दृष्टया सही पाए जाने पर मिलता है। हाई कोर्ट में CrPC धारा 482 के तहत FIR रद्द कराई जा सकती है।

कुल मिलाकर एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बन चुका है। फतेहपुर जैसी त्रासदी से लेकर वकीलों द्वारा गिरोहबंद वसूली और लंबे समय तक निर्दोषों की जिंदगी तबाह होने तक ये मामले दिखाते हैं कि कानून की सुरक्षा कमजोर वर्गों के लिए है, लेकिन दुरुपयोग से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है।

फतेहपुर का यह मामला भी दर्शाता है कि कैसे एक्ट की धमकी से परिवार स्तर पर निराशा और आत्महत्या जैसी चरम स्थिति पैदा हो सकती है। पुलिस का वर्जन अभी प्रारंभिक है, लेकिन सुसाइड नोट ने स्पष्ट रूप से वसूली और ब्लैकमेल को वजह बताया है।

सामूहिक धर्मांतरण कराया तो उम्रकैद, ST को फँसाया तो ₹25 लाख जुर्माना: छत्तीसगढ़ में ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक’ कैबिनेट ने किया पास, जानें इससे जुड़ी हर एक बात

छत्तीसगढ़ की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में धर्मांतरण एक लंबे समय से अत्यंत संवेदनशील और चर्चा का विषय रहा है। राज्य की विष्णु देव साय सरकार ने इस दिशा में एक युगांतकारी कदम उठाते हुए ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ के प्रारूप को कैबिनेट में मंजूरी दे दी है।

यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक अखंडता, जनजातीय पहचान और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को सुरक्षित करने का एक व्यापक सुरक्षा चक्र है। वर्तमान में जारी विधानसभा सत्र के दौरान इस विधेयक को सदन पटल पर रखा जाएगा, जिसके पारित होने के बाद यह एक अत्यंत प्रभावी कानून का रूप ले लेगा।

सरकार का स्पष्ट तर्क है कि धार्मिक आस्था एक व्यक्तिगत विषय है, लेकिन जब इसमें प्रलोभन, कपट या बल का समावेश हो जाता है, तो यह सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा बन जाता है। इसी खतरे को भाँपते हुए साय सरकार ने पुराने नियमों को बदलकर एक ऐसा ढांचा तैयार किया है, जो अवैध धर्मांतरण की जड़ पर चोट करता है।

पुराना कानून आउटडेटेड, अब नए जमाने के ‘डिजिटल लालच’ पर कसेगा शिकंजा

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को रोकने के लिए जो कानून अब तक चल रहा था, वह काफी पुराना था। साल 1968 का यह ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ छत्तीसगढ़ को मध्य प्रदेश से विरासत में मिला था और राज्य बनने के समय से ही लागू था। लेकिन पिछले 50-60 सालों में दुनिया और अपराध करने के तरीके दोनों बदल गए हैं। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का कहना है कि अब पुराने कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर लोग अवैध तरीके से धर्म बदलवा रहे थे।

आज के दौर में केवल सीधा लालच ही नहीं, बल्कि इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल रास्तों से भी लोगों को गुमराह किया जा रहा है। साथ ही, अब अकेले के बजाय पूरे-पूरे समूहों का धर्म बदलवाने यानी ‘सामूहिक धर्मांतरण’ की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। इन्हीं आधुनिक चुनौतियों और चालाकियों से निपटने के लिए सरकार ‘2026 का नया कानून’ लाई है। यह नया कानून न केवल पुराने नियमों की जगह लेगा, बल्कि इसे इतना सख्त और स्पष्ट बनाया गया है कि कोई भी अपराधी कानून की बारीकियों का फायदा उठाकर बच न सके।

चुपके से धर्म बदलना अब मुमकिन नहीं, DM को होगा बताना

नए कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब सब कुछ शीशे की तरह साफ होगा। छत्तीसगढ़ में अब कोई भी व्यक्ति अचानक या गुपचुप तरीके से अपना धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर कोई अपनी मर्जी से धर्म बदलना चाहता है, तो उसे एक तय सरकारी रास्ते से गुजरना होगा। नए नियमों के मुताबिक, धर्म बदलने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सबसे पहले जिला मजिस्ट्रेट यानी कलेक्टर (DM) को लिखित में जानकारी देनी होगी। यह सूचना एक तय समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य है।

जैसे ही आप प्रशासन को सूचना देंगे, सरकार इस जानकारी को सार्वजनिक कर देगी ताकि सबको पता चल सके। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि यह पक्का हो सके कि व्यक्ति किसी के डर, दबाव या लालच में आकर तो ऐसा नहीं कर रहा है। जानकारी पब्लिक होने के बाद 30 दिनों का समय दिया जाएगा।

इस दौरान अगर किसी को लगता है कि यह धर्मांतरण गलत तरीके से हो रहा है, तो वह अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। प्रशासन उन शिकायतों की बारीकी से जाँच करेगा और सब कुछ सही पाए जाने पर ही आगे की अनुमति देगा। अगर कोई व्यक्ति इस कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर धर्म बदलता है, तो कानून की नजर में उसके नए धर्म को कोई मान्यता नहीं मिलेगी।

पूरे गाँव का धर्म बदलवाया तो होगी उम्रकैद, लगेगा 25 लाख का भारी जुर्माना

छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने ‘सामूहिक धर्मांतरण’ (एक साथ कई लोगों का धर्म बदलवाना) को राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना है। सरकार का मानना है कि यह केवल धर्म का मामला नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने को बिगाड़ने की एक साजिश है। इसी डर को खत्म करने के लिए नए कानून में सजा को बढ़ाकर सीधा ‘टॉप लेवल’ पर पहुँचा दिया गया है। अब अगर कोई भी व्यक्ति या समूह मिलकर बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हुए दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम 10 साल और ज्यादा से ज्यादा आजीवन कारावास यानी पूरी जिंदगी जेल में काटने की सजा मिल सकती है।

सिर्फ जेल ही नहीं, दोषियों की जेब पर भी कड़ा प्रहार किया जाएगा। ऐसे मामलों में कम से कम 25 लाख रुपए का मोटा जुर्माना भरने का प्रावधान है। सरकार का मुख्य ध्यान बस्तर और जशपुर जैसे आदिवासी अंचलों पर है, जहाँ भोले-भाले लोगों को निशाना बनाने वाले गिरोह सक्रिय रहते हैं। सरकार को उम्मीद है कि इतनी कठोर सजा के डर से वे संगठन और गिरोह हतोत्साहित होंगे जो पूरी प्लानिंग के साथ गाँवों में जाकर लोगों का धर्मांतरण करवाते हैं। अब छत्तीसगढ़ में सामूहिक धर्मांतरण का खेल खेलना अपराधियों को पूरी जिंदगी के लिए सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है।

महिलाओं और जनजातियों के धर्मांतरण पर डबल सजा, 20 साल तक की जेल

छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहाँ आदिवासियों की आबादी काफी ज्यादा है। अक्सर देखा गया है कि भोले-भाले ग्रामीणों और पिछड़े समाज के लोगों को झूठ बोलकर या लालच देकर आसानी से फँसा लिया जाता है। इसी ‘टारगेट’ को रोकने के लिए साय सरकार ने नए कानून में महिलाओं, बच्चों और पिछड़े वर्गों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किया है। सरकार ने यह साफ कर दिया है कि समाज के इन संवेदनशील हिस्सों के साथ किसी भी तरह की धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सजा के नए प्रावधानों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति किसी नाबालिग (बच्चे), महिला, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के व्यक्ति का अवैध तरीके से धर्म बदलवाता है, तो उसे बहुत भारी कीमत चुकानी होगी। ऐसे दोषियों को 10 से 20 साल तक की जेल काटनी होगी और साथ ही कम से कम 10 लाख रुपए का जुर्माना भी देना होगा। जबकि सामान्य मामलों में सजा 7 से 10 साल और जुर्माना 5 लाख रुपए है। सजा का यह बड़ा अंतर साफ बताता है कि सरकार उन लोगों को कड़ी चेतावनी दे रही है जो समाज के कमजोर या आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को अपना शिकार बनाते हैं।

जड़ों की ओर लौटना अब और आसान, ‘घर वापसी’ पर कोई पाबंदी नहीं

छत्तीसगढ़ के इस नए कानून का सबसे खास और चर्चित हिस्सा ‘घर वापसी’ से जुड़ा है। सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना मौजूदा धर्म छोड़कर वापस अपने पुराने या ‘पैतृक धर्म’ (वह धर्म जो उसके पूर्वजों का था) में लौटता है, तो इसे धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। यानी, अपनी जड़ों की ओर लौटने वाले लोगों के लिए कानून के दरवाजे पूरी तरह खुले रखे गए हैं।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ‘घर वापसी’ करने वालों को उन कड़े नियमों से नहीं गुजरना होगा, जो नए धर्मांतरण के लिए जरूरी हैं। ऐसे लोगों को न तो जिला मजिस्ट्रेट (DM) को पहले से कोई सूचना देने की जरूरत होगी और न ही उन्हें 30 दिनों तक किसी आपत्ति का इंतजार करना पड़ेगा। सरकार का मानना है कि अपनी मूल संस्कृति और धर्म में वापस आना हर व्यक्ति का अधिकार है, इसलिए इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं होनी चाहिए। यह उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्होंने पहले कभी किसी दबाव, लालच या भ्रम में आकर अपना मूल धर्म छोड़ दिया था। अब वे बिना किसी डर या कागजी कार्रवाई के अपने पुराने धर्म को दोबारा अपना सकते हैं।

ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया वाली ‘धोखेबाजी’ अब नहीं चलेगी

आज के समय में धर्मांतरण का तरीका केवल आमने-सामने की मुलाकातों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब इंटरनेट का इस्तेमाल हथियार के रूप में हो रहा है। छत्तीसगढ़ का यह नया कानून इस मामले में बेहद एडवांस है, क्योंकि इसमें ‘डिजिटल धर्मांतरण’ को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है। अक्सर देखा गया है कि सोशल मीडिया, चैटिंग ऐप्स और यहाँ तक कि ऑनलाइन गेमिंग के जरिए युवाओं और बच्चों को बहलाया-फुसलाया जाता है। अब ऐसे किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किया गया धर्मांतरण सीधे जेल की राह दिखाएगा।

सरकार ने इस कानून में धोखाधड़ी के तरीकों को बहुत बारीकी से समझाया है। इसमें लालच देना, डराना-धमकाना, गलत जानकारी देना या किसी को सुनहरे सपने दिखाकर गुमराह करना… इन सभी को बहुत स्पष्ट तरीके से परिभाषित किया गया है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अपराधी कानून की किसी बारीकी या तकनीकी कमी का फायदा उठाकर बच नहीं पाएँगे। अब इंटरनेट के जरिए किसी को झूठ बोलकर धर्म बदलवाना कानूनी रूप से बहुत भारी पड़ेगा। सरकार ने साफ कर दिया है कि चाहे साजिश जमीन पर रची जाए या आसमान (इंटरनेट) में, दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।

बिना वारंट गिरफ्तारी और ‘नो बेल’ का डर, विशेष अदालतों में होगा तुरंत फैसला

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस कानून को केवल फाइलों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे जमीन पर बेहद पावरफुल बनाया है। इस कानून के तहत किए गए सभी अपराध ‘संज्ञेय’ और ‘गैर-जमानती’ (Non-bailable) होंगे। इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर किसी पर अवैध धर्मांतरण का आरोप लगता है, तो पुलिस को उसे गिरफ्तार करने के लिए किसी वारंट का इंतजार नहीं करना होगा। साथ ही, पकड़े जाने के बाद आरोपित को कोर्ट से आसानी से जमानत भी नहीं मिलेगी। यह सख्ती इसलिए बरती गई है ताकि समाज में जहर घोलने वाले लोग कानून के शिकंजे से बच न सकें।

इतना ही नहीं, सरकार ने इन मामलों के जल्द निपटारे के लिए ‘विशेष न्यायालय’ (Special Courts) बनाने का भी फैसला किया है। अक्सर अदालतों में मामले सालों-साल चलते रहते हैं, लेकिन इन विशेष अदालतों में धर्मांतरण से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई बहुत तेजी से होगी। इसका फायदा यह होगा कि पीड़ितों को न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और गुनाह करने वालों को उनके अंजाम तक बहुत जल्द पहुँचाया जा सकेगा। यह पूरी व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि छत्तीसगढ़ में भाईचारे को बिगाड़ने वाली किसी भी साजिश को तुरंत और कड़ाई से कुचला जा सके।

अन्य राज्यों के मुकाबले क्यों अलग और ज्यादा सख्त है छत्तीसगढ़ का कानून

छत्तीसगढ़ से पहले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड जैसे कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ का विधेयक कई मायनों में उनसे अलग और कहीं अधिक सख्त है। सबसे बड़ा अंतर ‘सामूहिक धर्मांतरण’ की सजा में है, जहाँ अन्य राज्यों में अधिकतम सजा आमतौर पर 10 साल तक है, छत्तीसगढ़ में इसे आजीवन कारावास तक बढ़ा दिया गया है।

दूसरा प्रमुख अंतर जुर्माने की राशि है, जो यहाँ 25 लाख रुपए तक रखी गई है, जो देश में सर्वाधिक है। छत्तीसगढ़ का कानून विशेष रूप से जनजातीय समुदायों की ‘सांस्कृतिक अखंडता’ पर केंद्रित है, जबकि अन्य राज्यों के कानून अक्सर ‘लव जिहाद’ या विवाह के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण पर अधिक केंद्रित रहे हैं। छत्तीसगढ़ ने ‘घर वापसी’ को जो स्पष्ट कानूनी सुरक्षा दी है, वह भी इसे अन्य राज्यों के मुकाबले एक विशिष्ट और साहसी कानूनी ढांचा प्रदान करती है।

बस्तर-जशपुर के जनजातियों के लिए ‘सुरक्षा कवच’

छत्तीसगढ़ के बस्तर और जशपुर जैसे जनजातीय इलाकों में पिछले काफी समय से धर्मांतरण को लेकर माहौल तनावपूर्ण रहा है। कई बार तो स्थिति इतनी बिगड़ गई कि स्थानीय आदिवासियों और धर्म बदलने वाले समूहों के बीच हिंसक झड़पें और खूनी संघर्ष तक देखने को मिला। खासकर इन क्षेत्रों में ईसाई धर्म अपनाने के बाद होने वाले सामाजिक विवादों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी थी। बीते कुछ महीनों में इन जिलों से जबरन या धोखे से धर्मांतरण कराने की ढेरों शिकायतें और पुलिस केस (FIR) सामने आए हैं, जिससे समाज में दरार पैदा हो रही थी।

सरकार का मानना है कि नया कानून लागू होने के बाद इन विवादित इलाकों में शांति लौटेगी और स्थिति नियंत्रण में रहेगी। इस कानून को केवल दंड देने का जरिया नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सदियों पुरानी परंपराओं और उनकी अनोखी पहचान को बचाने वाली एक ‘ढाल’ के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि अगर जनजातीयों की जमीन, उनकी अपनी संस्कृति और उनके अस्तित्व को बचाना है, तो अवैध तरीके से हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकना बेहद जरूरी है। यह कानून जनजातीयों को उनकी जड़ों से जोड़े रखने और बाहरी दखल को खत्म करने में मददगार साबित होगा।

आस्था की आजादी या मजबूरी का फायदा?

छत्तीसगढ़ के इस नए कानून को लेकर अब राज्य में दो तरह की विचारधाराएँ आमने-सामने आ गई हैं। एक तरफ विपक्षी दल और कुछ संगठनों का कहना है कि भारत का संविधान हर इंसान को अपनी पसंद का धर्म चुनने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। उनका तर्क है कि इतने कड़े नियम और जेल की सजा लोगों की निजी आजादी में दखल दे सकते हैं और इसका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है।

दूसरी तरफ, BJP सरकार का कहना है कि यह कानून किसी की आस्था नहीं छीन रहा, बल्कि उस ‘धोखे’ को रोक रहा है जो लालच या डर दिखाकर किया जाता है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने साफ लफ्जों में कहा है कि अपनी मर्जी से धर्म बदलना गुनाह नहीं है, लेकिन किसी गरीब की लाचारी का फायदा उठाकर उसका धर्म बदलवाना एक सामाजिक अपराध है। सरकार के मुताबिक, यह कानून उन भोले-भाले लोगों के लिए एक रक्षा कवच है जिन्हें बाहरी ताकतें बहला-फुसलाकर अपना शिकार बनाती हैं। मकसद साफ है- धर्म परिवर्तन दिल से होना चाहिए, मजबूरी से नहीं।

धोखे का धंधा बंद, अब सिर्फ ‘दिल की मर्जी’ चलेगी

छत्तीसगढ़ का यह नया ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल 2026’ राज्य के सामाजिक और कानूनी इतिहास में एक बहुत बड़ा मोड़ साबित होने वाला है। कैबिनेट से हरी झंडी मिलने के बाद अब सबकी नजरें विधानसभा पर हैं, जहाँ इसके पास होने की पूरी उम्मीद है। जैसे ही यह बिल कानून बनेगा, पूरे राज्य में धर्मांतरण से जुड़ी हर छोटी-बड़ी हलचल पर सरकार और प्रशासन की पैनी नजर रहेगी। इसका मकसद साफ है- कोई भी व्यक्ति किसी के दबाव या लालच में आकर अपना धर्म न बदले।

यह नया कानून छत्तीसगढ़ में एक ऐसी व्यवस्था बनाएगा जहाँ धर्म बदलना केवल और केवल इंसान का निजी फैसला और उसकी आस्था का मामला होगा, न कि किसी साजिश या प्रलोभन का नतीजा। विष्णु देव साय सरकार ने इस कड़े फैसले से जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि राज्य के हर नागरिक की परंपरा, संस्कृति और उसके विश्वास को सुरक्षित रखना उनकी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। अब छत्तीसगढ़ में ‘धर्मांतरण का धंधा’ करने वालों के लिए कोई जगह नहीं होगी।

T20 वर्ल्ड कप जीत के जश्न में हार्दिक पांड्या विवादों में घिरे, तिरंगे के अपमान पर हुई शिकायत: सचिन तेंदुलकर-सानिया मिर्जा भी फँसे थे, जानें- राष्ट्र ध्वज से जुड़ा फ्लैग कोड

भारत की टी20 वर्ल्ड कप 2026 में ऐतिहासिक जीत के बाद जहाँ पूरे देश में जश्न का माहौल है, वहीं इसी जश्न से जुड़ा एक विवाद भी सामने आ गया है। भारतीय टीम के ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप लगा है।

फाइनल मैच के बाद अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में हुए जश्न के दौरान पांड्या की कुछ तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। इन वीडियो में वह अपनी गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा के साथ जश्न मनाते हुए दिखाई दे रहे हैं और उनके कंधे पर भारतीय तिरंगा लिपटा हुआ है।

इसी को लेकर पुणे के एक वकील वाजिद खान ने शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया है कि पांड्या ने जश्न के दौरान राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा का ध्यान नहीं रखा। शिकायत में कहा गया है कि तिरंगे को शरीर पर लपेटकर और मंच पर लेटते हुए जश्न मनाना राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के खिलाफ है।

यह शिकायत शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में दी गई है। हालाँकि पुलिस ने अभी तक FIR दर्ज नहीं की है और मामले की जाँच की जा रही है।

क्या है पूरा मामला

शिकायत के मुताबिक, भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेले गए टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में भारत की जीत के बाद मैदान पर खिलाड़ी और उनके परिवार के लोग जश्न मना रहे थे।

इसी दौरान हार्दिक पांड्या अपनी गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा के साथ मैदान पर दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में पांड्या के कंधे पर तिरंगा लिपटा हुआ है और वह डांस करते हुए और ट्रॉफी के साथ तस्वीरें खिंचवाते नजर आ रहे हैं।

एक और वीडियो में दोनों को स्टेज के पास लेटे हुए भी देखा गया। आरोप लगाने वाले वकील का कहना है कि उस समय भी पांड्या के शरीर पर तिरंगा लिपटा हुआ था।

वकील वाजिद खान का कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ इस तरह का व्यवहार उसकी गरिमा के खिलाफ है। उनका कहना है कि खिलाड़ियों को जश्न मनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का ध्यान रखना भी जरूरी है।

वकील ने पुलिस में क्या शिकायत की

पुणे के वकील वाजिद खान ने शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि राष्ट्रीय ध्वज पूरे देश का प्रतीक है और उसका सम्मान करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा, “आपने टी20 वर्ल्ड कप के जश्न की तस्वीरें देखी होंगी। हार्दिक पांड्या अपनी गर्लफ्रेंड के साथ जश्न मना रहे थे और उनके शरीर पर राष्ट्रीय ध्वज लिपटा हुआ था। बाद में वे उसी हालत में मंच पर लेटे हुए दिखाई दिए। यह राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के खिलाफ है।”

शिकायत दर्ज कराने के दौरान पुलिस ने उनसे पूछा कि घटना अहमदाबाद में हुई है, फिर शिकायत पुणे में क्यों की जा रही है। इस पर वकील ने कहा कि तिरंगा पूरे देश का प्रतीक है, इसलिए देश के किसी भी हिस्से में इसकी शिकायत की जा सकती है।

पुलिस ने फिलहाल उनकी शिकायत स्वीकार कर ली है और उन्हें उसकी कॉपी भी दे दी है। अब पुलिस वायरल वीडियो और तस्वीरों की जाँच कर रही है। जाँच के बाद ही यह तय होगा कि इस मामले में FIR दर्ज होगी या नहीं।

पहले भी तिरंगे को लेकर हो चुके हैं विवाद

यह पहला मौका नहीं है जब किसी खिलाड़ी का नाम राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े विवाद में आया हो। साल 2007 में महान क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर भी इसी तरह के विवाद में फंस गए थे। उनके जन्मदिन की एक तस्वीर वायरल हुई थी जिसमें तिरंगे के डिजाइन वाला केक काटा जा रहा था। कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान बताया और शिकायत भी दर्ज कराई थी।

इसी तरह साल 2015 में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा को भी विवाद का सामना करना पड़ा था। एक तस्वीर में वह स्टेडियम में कुर्सी पर बैठी दिखाई दे रही थीं और उनके सामने जमीन पर भारतीय तिरंगा नजर आ रहा था। इस तस्वीर को लेकर कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्होंने तिरंगे का अपमान किया है। बाद में इस मामले को लेकर काफी बहस हुई थी।

भारतीय तिरंगे के सम्मान से जुड़े नियम और सजा

भारत में राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को लेकर स्पष्ट कानून बनाए गए हैं। मुख्य रूप से यह नियम प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 के तहत आते हैं। इस कानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति अगर सार्वजनिक जगह पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को जलाता है, फाड़ता है, गंदा करता है, पैरों तले रौंदता है या किसी भी तरह से उसका अपमान करता है, तो यह अपराध माना जाता है।

अगर कोई व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करता है तो उसे सजा भी हो सकती है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। इसके अलावा फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में भी तिरंगे के इस्तेमाल को लेकर कई नियम तय किए गए हैं।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ जरूरी नियम बनाए गए हैं। इन नियमों के अनुसार तिरंगे को कभी भी जमीन या पानी पर गिरने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इसे देश की शान और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

इसी तरह तिरंगे का इस्तेमाल कपड़े, कुशन, या किसी भी तरह की सजावट के रूप में नहीं किया जा सकता। यदि झंडा फट जाए या गंदा हो जाए तो उसे फहराना भी सही नहीं माना जाता। कुल मिलाकर राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल हमेशा सम्मानजनक तरीके से ही होना चाहिए, ताकि देश की पहचान और उसकी गरिमा बनी रहे। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य यही है कि तिरंगे का सम्मान हर परिस्थिति में सुरक्षित रखा जाए।

ईरान-इजरायल युद्ध का भारत पर पड़ने लगा असर, लागू किया गया ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’: जानें- क्या है यह कानून और इससे क्या बदलेगा?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद पूरी दुनिया में ऊर्जा बाजार को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने भी एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

केंद्र सरकार ने सोमवार (09 मार्च 2026) को पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act – ECA) लागू करने का फैसला किया है ताकि देश में ईंधन की सप्लाई और वितरण पर सख्त निगरानी रखी जा सके।

सरकार का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बिगड़ते हालात का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। ऐसे में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों, प्राकृतिक गैस और अन्य ईंधनों की उपलब्धता प्रभावित न हो इसके लिए यह कदम उठाया गया है।

इस अधिनियम के लागू होने के बाद केंद्र सरकार को इन संसाधनों के उत्पादन,भंडारण,वितरण और आपूर्ति को नियंत्रित करने का अधिकार मिल जाता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस संबंध में एक गजट नोटिफिकेशन भी जारी किया है।

क्या है 1955 का आवश्यक वस्तु अधिनियम?

आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 संसद द्वारा बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रोज की जिंदगी की जरूरी चीजें लोगों को सही कीमत पर मिलती रहें।

इस कानून के जरिए केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए जरूरी वस्तुओं के उत्पादन,आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सके ताकि किसी भी स्थिति में आम लोगों को इन वस्तुओं की कमी का सामना न करना पड़े।

समय के साथ इस कानून के तहत कई ऐसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में शामिल किया गया है जो लोगों के दैनिक जीवन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं। इनमें खाद्यान्न, खाद्य तेल,दवाइयाँ, उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पाद जैसे सामान शामिल रहे हैं।

परिस्थितियों के अनुसार केंद्र सरकार के पास यह अधिकार भी होता है कि वह इस सूची में नई वस्तुएँ जोड़ सकती है या जरूरत पड़ने पर किसी वस्तु को इससे हटा भी सकती है। युद्ध, प्राकृतिक आपदा या आपूर्ति व्यवस्था में बाधा जैसी परिस्थितियों में अक्सर जमाखोरी और मुनाफाखोरी की स्थिति पैदा हो जाती है।

ऐसे हालात में यह कानून सरकार को हस्तक्षेप करने की शक्ति देता है जिससे बाजार में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनी रहे और उनकी कीमतें नियंत्रण में रहें। इस अधिनियम की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सके।

इसके तहत सरकार भंडारण की सीमा तय कर सकती है, व्यापार को नियंत्रित कर सकती है, कीमतों को निर्धारित कर सकती है और जमाखोरी जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध भी लगा सकती है।

इस कानून की धारा 5 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार भी है कि वह धारा 3 के अंतर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों को राज्य सरकारों या अधिकृत अधिकारियों को सौंप सकती है। इसका उद्देश्य यह होता है कि स्थानीय स्तर पर भी इस कानून का प्रभावी और त्वरित तरीके से पालन कराया जा सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। वर्ष 2020 में संसद ने इस कानून में संशोधन भी किया था।

इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार की शक्तियों को कुछ विशेष वस्तुओं जैसे अनाज, दालें, आलू, प्याज, खाद्य तिलहन और ईंधन तेल के मामले में केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित कर दिया गया।

इन असाधारण परिस्थितियों में युद्ध, अकाल, अत्यधिक मूल्य वृद्धि और गंभीर प्राकृतिक आपदाएँ जैसी स्थितियाँ शामिल की गई हैं। पेट्रोलियम उत्पादों को भी इस कानून के तहत आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा गया है और इनमें एलपीजी भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि एलपीजी की आपूर्ति और वितरण को भी इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।

क्यों अब सरकार को पड़ी इसकी जरूरत?

केंद्र सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज)के रास्ते आने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की सप्लाई प्रभावित हुई है।

कई गैस सप्लायर कंपनियों ने फोर्स मेज्योर (Force Majeure) का हवाला दिया है, जिसका मतलब यह है कि असाधारण परिस्थितियों के कारण वे अपनी तय आपूर्ति पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे हालात में गैस की उपलब्ध मात्रा को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने की जरूरत है।

सरकार का कहना है कि प्राकृतिक गैस, एलएनजी और री-गैसीफाइड एलएनजी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी कच्चा माल हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई, परिवहन के लिए CNG, उर्वरक उत्पादन, LPG उत्पादन और कई अन्य औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार का मानना है कि प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस की समान और निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक गैस के उत्पादन, विभिन्न क्षेत्रों के लिए उसके आवंटन, आपूर्ति के डायवर्जन, वितरण, निपटान, अधिग्रहण, उपयोग और खपत को नियंत्रित करना जरूरी है।

इस अधिनियम का अब आपूर्ति पर क्या पड़ेगा असर?

केंद्र सरकार ने प्राकृतिक गैस के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने के लिए कुछ स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं जिससे देश में गैस की उपलब्धता बनी रहे। साथ ही इसका मकसद गैस को उसे प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बराबरी से बाँटना भी है। सरकार का कहना है कि प्राकृतिक गैस की सप्लाई को अलग-अलग प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में बाँटा जाएगा और उसी के अनुसार गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

सबसे पहले प्राथमिकता क्षेत्र-1 तय किया गया है। इसमें आने वाले क्षेत्रों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाएगी। इन क्षेत्रों में घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई, परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाली कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG), एलपीजी उत्पादन और पाइपलाइन कंप्रेसर ईंधन और पाइपलाइन संचालन से जुड़ी जरूरी जरूरतें शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 100% तक गैस आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा।

इसके बाद प्राथमिकता क्षेत्र-2 में उर्वरक (फर्टिलाइजर) प्लांट्स को रखा गया है। इन संयंत्रों को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 70% तक गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही यह शर्त भी रखी गई है कि इन संयंत्रों को मिलने वाली गैस का उपयोग केवल उर्वरक उत्पादन के लिए ही किया जाएगा और किसी अन्य उद्देश्य के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।

प्राथमिकता क्षेत्र-3 में गैस मार्केटिंग कंपनियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रीय गैस ग्रिड के माध्यम से सप्लाई पाने वाले चाय उद्योग, विनिर्माण क्षेत्र और अन्य औद्योगिक उपभोक्ताओं को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 80% तक गैस आपूर्ति मिलती रहे।

इसके अलावा प्राथमिकता क्षेत्र-4 में आने वाली सभी सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके नेटवर्क से जुड़े औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 80% तक गैस सप्लाई मिलती रहे।

देश में कितनी है सालाना LPG खपत?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 3.13 करोड़ टन LPG की खपत होती है और इसमें करीब 87% हिस्सा घरेलू रसोई गैस का है। भारत अपनी LPG जरूरत का करीब 62% को बाहर से आयात करता है और मिडिल ईस्ट में संकट के बाद यह आयात प्रभावित हुआ है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव के चलते यह संकट और गहरा गया है क्योंकि आयात का करीब 85-90% हिस्सा इसी रास्ते से आता है। देश में पर्याप्त है ईंधन का भंडार मिडिल ईस्ट में संकट के बीच कई जगहों पर गैस की कमी की खबरें हैं लेकिन मंत्रालय का कहना है कि देश में ईंधन का पर्याप्त भंडार मौजूद है।

इसके साथ ही पेट्रोलियम रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल उत्पादन घटाकर LPG उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। मंत्रालय ने एहतियाती कदम के तौर पर LPG सिलेंडर की दो बुकिंग के बीच का अंतराल भी 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी रोकी जा सके।

क्यों वायरल हो रही काजल हिंदुस्तानी और साध्वी ऋतंभरा की Video: जानिए वृंदावन में हुई चर्चा में किसने क्या कहा

उत्तर प्रदेश के वृंदावन में 28 फरवरी 2026 से 2 मार्च 2026 तक संतों का एक भव्य कार्यक्रम ‘शताब्दी आनंद महोत्सव’ का आयोजन हुआ। इस आध्यात्मिक समागम में देश भर से साधु-संत और कई सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान मंच से दिए गए भाषणों की दो क्लिप सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रही हैं।

पहली क्लिप सामाजिक कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी की है और दूसरी क्लिप विख्यात प्रखर वक्ता ‘दीदी माँ’ साध्वी ऋतंभरा की है। इन दोनों के बयानों को लेकर इंटरनेट पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। आईए इस बहस की वजह इन्हीं के बयानों से समझते हैं।

काजल हिंदुस्तानी का संबोधन और UGC का मुद्दा

कार्यक्रम में काजल हिंदुस्तानी ने जब मंच संभाला तो अपना पहले संतों का अभिवादन किया और उसके बाद राम मंदिर निर्माण के लिए कारसेवकों के बलिदान को याद किया। उन्होंने धर्म की बात करते हुए प्रभु श्रीराम में अपनी आस्था प्रकट की। इसके बाद उन्होंने मंच से यूजीसी का मुद्दा छेड़ा। लोग सोशल मीडिया पर उनके वक्तव्य के इसी हिस्से को शेयर कर रहे हैं।

इसमें वह कहती सुनाई पड़ती हैं, “हम हिंदू समाज को एक करने की बात करते हैं, लेकिन फिर एक राजा आता है और गलत फैसला लेकर यूजीसी (UGC) जैसा काला कानून ले आता है, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सेवक को बाँटने का काम करता है। यह अधर्म है।”

काजल कहती हैं,

“मैं नहीं जानती कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है, मैं तो उस धर्म और अधर्म को मानती हूँ जो भगवान कृष्ण ने गीता में बहुत सरल भाषा में सिखाया है। इसलिए यह अधर्म है। जब अर्जुन ने भगवान से कहा कि मैं द्रोणाचार्य को कैसे मार सकता हूँ, वे मेरे गुरु हैं, मैं अपने भाइयों को कैसे मार सकता हूँ, वे सब मेरे भाई हैं और मैं अपने भीष्म पितामह को कैसे मार सकता हूँ, वे मेरे पितामह हैं। तब भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया। भगवान कृष्ण ने कहा कि जिस द्रोणाचार्य को तुम अपना गुरु कह रहे हो, जब उनकी अपनी संतान अधर्म कर रही है और वे उन्हें नहीं रोक रहे हैं, तो वे भी अधर्मी हैं। जिस भीष्म पितामह को तुम अपना पितामह कह रहे हो, उस भीष्म पितामह ने तब अपनी आँखें बंद कर ली थीं जब तुम्हारा भाई दुर्योधन जाँघा ठोकर कहता था द्रौपदी को कि आ मेरी जाँघा पर बैठ और वो चुप था। भगवान ने अर्जुन से कहा कि वे सभी अधर्मी हैं, और जो अधर्म पर मौन रहते हैं और केवल उन्हें देखते रहते हैं, चाहे वह द्रोण हों, भीष्म हों या कर्ण, वे सभी मारे जाते हैं। वे सभी मारे जाएँगे। अगर यूजीसी जैसा काला कानून है और अगर हम चुप हैं, तो हम भी अधर्मी हैं।”

उन्होंने कहा, “हमें जातियों में क्यों बाँटा गया है? कोई भी संत जातियों में नहीं बँटा है। ब्राह्मणों को पहले ही बदनाम किया जा चुका है। कॉलेजों में नारे लगते हैं कि ‘ब्राह्मणों तेरी कब्र खुदेगी’, ब्राह्मणों की कब्र क्यों खुदेगी? ‘तिलक, तराजू और तलवार’ को मारने की बात होती है, क्यों मारें उन्हें? नारे लगते हैं कि ‘ब्राह्मण भारत छोड़ो’, ‘तुम्हारा खून बहेगा’, खून क्यों बहेगा? हमें यह सब कौन बाँट रहा है?”

काजल ने जाति के आधार पर होने वाले विभाजन को लेकर सवाल उठाते हुए न केवल ब्राह्मणों के खिलाफ हुई नारेबाजी की आलोचना की बल्किन कॉलेजों में छात्र राजनीति का विरोध किया। उन्होंने श्रोताओं से प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का प्रस्ताव रखा, नेताओं से नाराजगी जाहिर की और हिंदू समाज की एकता पर बोलते हुए संदेश दिया कि यूजीसी कानून जैसे कानूनों को थोपना हिंदुओं को बाँटने का प्रयास है।

साध्वी ऋतंभरा का मंच से दिया गया बयान

काजल हिंदुस्तानी का ये वक्तव्य वायरल होने के बाद एक वीडियो साध्वी ऋतंभरा (दीदी माँ) की भी सामने आई है। उन्होंने जब मंच संभाला तो और समाज को एकजुट रहने की सीख दी। वीडियो में उन्हें कहते सुन सकते हैं, “इतने अपमानों के बाद हम इस स्थिति तक पहुँचे हैं, ऐसे में यदि आप सत्ता में बैठे नेतृत्व पर संदेह करेंगे, तो सत्य का विनाश हो जाएगा। अपनों के प्रति गुस्सा मंचों पर नहीं, बल्कि घर में व्यक्त किया जाता है। घर के गंदे कपड़े सड़क पर नहीं धोए जाते।”

साध्वी ऋतंभरा ने हिंदू समाज से एक ‘दानव’ को पहचानने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने ‘विमर्श’ या ‘नैरेटिव’ का नाम दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य पूर्व में बैठे विदेशी तत्वों द्वारा भारत के भीतर जाति व्यवस्था का ऐसा जाल बुना गया है कि भाई-बहनों के सिर कट रहे हैं और साजिशें रची जा रही हैं।

साध्वी ऋतंभरा ने आगे कहा कि यदि हम आपस में बँट गए, तो हिंदू चेतना को कैसे बचा पाएँगे? उन्होंने हरिजन, स्वर्ण और पिछड़ों के रिश्तों को तोड़ने वाली साजिशों को धूल में मिलाने का आह्वान किया। साध्वी ने देवदासी और सती जैसे शब्दों के साथ जुड़े ऐतिहासिक बलिदानों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह सनातन संस्कृति को अपमानित करने के लिए विमर्श गढ़े गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो कुछ भी हमें मिला है, वह वर्षों के अपमान को सहने के बाद मिला है, इसलिए हमें आंतरिक मतभेदों को भुलाकर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोना होगा।

सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग: समर्थन और विरोध के स्वर

इन बयानों के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर नेटीजन्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कुछ लोग हैं जो दोनों के वक्तव्यों को अपनी-अपनी जगह पर सही बता रहे हैं। वहीं कुछ को काजल हिंदुस्तानी के बयान में राजनीति दिख रही है और कुछ साध्वी ऋतंभरा की प्रतिक्रिया से असहमत होने के चलते उनके लिए अमर्यादित शब्द इस्तेमाल करने पर उतर आए हैं।

ऐसे में काजल ने तो अपने पूरे वक्तव्य को साझा करके कह दिया है कि उन्होंने राजनीति नहीं की, वो समय-समय पर हर वर्ग की आवाज बनी हैं। लेकिन साध्वी ऋतंभरा को अब जातिगत आधार पर निशाना बनाते हुए अपमानित किया जा रहा है।

हिंदू समाज और धर्म के लिए दिए गए उनके योगदान को दरकिनार करते हुए उनके चरित्र और मंशा पर अपमानजनक शब्दों से प्रहार हो रहा है। शायद ऐसे लोग भूल गए हैं कि साध्वी ऋतंभरा ही वो चेहरा थीं जिन्होंने 1990 के दशक में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा संचालित ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन’ में अहम भूमिका निभाते हुए सारे भारत में धर्म जागरण किया।

उन्होंने इस आंदोलन के लिए हिन्दू समाज की विभिन्न जातियों को एकता के सूत्र में बाँधा। इसी एकात्म हुई हिन्दू शक्ति ने इस आंदोलन की सफलता के रूप में अपने आराध्य श्री रामलला की जन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण का सम्पूर्ण न्यायालयीन अधिकार प्राप्त किया। फिलहाल साध्वी ऋतंभरा श्रीकृष्ण की लीला स्थली वृंदावन में वात्सल्य ग्राम चलाती हैं। वात्सल्य ग्राम की पूरी परिकल्पना के माध्यम से वे भारतीय पारिवारिक व्यवस्था की सकारात्मकता पर जनमानस का ध्यान आकर्षित कर उसका प्रसार करने का सम्पूर्ण प्रयास कर रही हैं।

₹25 लाख करोड़ की डील? रिलायंस इंडस्ट्रीज के टेक्सास में ऑयल रिफाइनरी लगाने के दावे की क्या है सच्चाई, जानिए सब कुछ

US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने 10 मार्च को महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि टेक्सास के ब्राउन्सविले में एक नई ऑयल रिफाइनरी ‘हिस्टोरिक $300 बिलियन डील’ का हिस्सा होगी। उन्होंने इसे अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी एनर्जी डील बताया और कहा कि 50 साल में पहली बार एक नया ऑयल रिफाइनरी अमेरिका में लग रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर अपने पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज इस प्रोजेक्ट में शामिल है। उन्होंने निवेश को आकर्षित करने का क्रेडिट अपनी सरकार के ‘अमेरिका फर्स्ट एनर्जी एजेंडा’ को दिया। उन्होंने रिफाइनरी को एक बड़ा इकोनॉमिक प्रोजेक्ट बताया, जो अमेरिकी एनर्जी प्रोडक्शन को बढ़ाएगा, हजारों नौकरियाँ पैदा करेगा, नेशनल सिक्योरिटी को मजबूत करेगा और ग्लोबल एक्सपोर्ट को ताकत देगा।

इसके अलावा, ट्रंप ने इस प्रोजेक्ट को इस बात का संकेत बताया कि घरेलू उत्पाद पर फोकस पॉलिसी और आसान रेगुलेटरी अप्रूवल की वजह से बड़े एनर्जी निवेशक अमेरिका में वापस आ रहे हैं।

प्रोजेक्ट में असल में क्या है

अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग की प्रेस रिलीज के मुताबिक, कंपनी टेक्सास में ब्राउन्सविले पोर्ट पर रिफाइनरी बनाने का प्लान बना रही है, जो US-मेक्सिको बॉर्डर के पास है। इस संयंत्र से हर दिन लगभग 1,68,000 बैरल क्रूड ऑयल बनने की उम्मीद है। इसे खास तौर पर अमेरिका में बनने वाले लाइट शेल ऑयल को रिफाइन करने के लिए डिजाइन किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस साइज की रिफाइनरी बनाने में आमतौर पर कई बिलियन डॉलर खर्च होते हैं, न कि सैकड़ों बिलियन डॉलर, जैसा कि ट्रंप ने कहा था। हर बैरल कैपेसिटी पर रिफाइनरी बनाने की आम लागत के आधार पर, यह अनुमान है कि इस लेवल के प्रोजेक्ट को बनाने में लगभग $6 से $7 बिलियन का खर्च आ सकता है।

इसलिए यह प्रोजेक्ट $300 बिलियन के पूँजी निवेश वाली कंपनी के बजाय एक नॉर्मल बड़ा एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट है।

प्रोजेक्ट में रिलायंस की भूमिका

ट्रंप ने अपनी पोस्ट में खास तौर पर रिलायंस के एक बड़े फाइनेंशियल कमिटमेंट का जिक्र किया। हालाँकि प्रोजेक्ट डेवलपर्स के बयानों से पता चलता है कि रिलायंस ने ‘नौ अंकों का इन्वेस्टमेंट’ किया है। इसका मतलब है कि निवेश शायद $100 मिलियन और $999 मिलियन के बीच होगा।

साथ ही, रिलायंस ने रिफाइनरी के साथ 20 साल का ऑफटेक एग्रीमेंट साइन किया है। यह एग्रीमेंट यह वादा करता है कि कंपनी अगले 20 सालों में संयंत्र से बनने वाले पेट्रोलियम उत्पाद खरीदेगी। आसान शब्दों में, यह रिलायंस को रिफाइनरी के कंस्ट्रक्शन को फंड करने वाले प्राइमरी इन्वेस्टर के बजाय एक लॉन्ग टर्म बायर और कमर्शियल पार्टनर बनाता है।

रिलायंस का शामिल होना इसलिए भी खास है क्योंकि यह पहले से ही भारत में जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स का बड़ा हिस्सा चला रहा है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी माना जाता है।

$300 बिलियन का आँकड़ा कहाँ से आया

ट्रंप ने अपनी पोस्ट में जो $300 बिलियन यानी 25 लाख करोड़ रुपए का आँकड़ा बताया है, वह रिफाइनरी बनाने की लागत या रिलायंस के तुरंत होने वाले इन्वेस्टमेंट नहीं दिखाता है। इसके बजाय यह आँकड़ा कई सालों में कैलकुलेट किए गए अनुमानित आर्थिक आँकड़ा हो सकता है।

ऐसे अनुमान आमतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की घोषणाओं में सीधे फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट के बजाय लाइफटाइम इकोनॉमिक असर के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

रिफाइनरी का प्रस्ताव क्यों रखा जा रहा है

यह प्रोजेक्ट अमेरिकी लाइट शेल ऑयल को प्रोसेस करने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है। US शेल बेसिन में फ्रैकिंग बढ़ने की वजह से यह बहुत ज़्यादा मात्रा में मिल रहा है। US गल्फ कोस्ट पर कई मौजूदा रिफाइनरियां मूल रूप से भारी इम्पोर्टेड क्रूड ऑयल को प्रोसेस करने के लिए बनाई गई थीं। इस वजह से, उनमें से कुछ देश में बनने वाले हल्के क्रूड ऑयल के लिए उपयोगी नहीं हैं।

यह नई फैसिलिटी कच्चे क्रूड के रूप में एक्सपोर्ट किए जाने के बजाय अमेरिका के अंदर रिफाइंड किए गए अमेरिकी शेल ऑयल की मात्रा बढ़ाने में मदद करेगी।

मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जो गला देता है हड्डियाँ, हर तरफ फैलती है आग: जानें- कितने खतरनाक हैं ‘फॉस्फोरस बम’ जो इजरायल ने लेबनान पर दागे, UN ने किया है बैन

इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।

ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”

गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा

मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।

3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।

इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।

क्या है सफेद फॉस्फोरस

सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।

इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना

इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।