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जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: जानिए कैसे अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।

उन्होंने कहा कि आरक्षण इनलोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।

नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एकमात्र व्यवहार्य समाधान है।”

दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।

संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”

1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधानसभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।

इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

(साभार- constitutionofindia.net)

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।

अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।

संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

साभार- संविधान सभा की बहसें (खंड 8) (स्रोत: constitutionofindia.net)

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।

पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए

पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।

इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।

भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।

गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद

महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना ​​था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।

दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।

उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।

पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान

24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।

दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।

अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।

हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।

भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।

हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।

समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।

बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जिसने खिलाया अपनी थाली से खाना, उस RBI के पूर्व कर्मी का आजाद हुसैन ने रेता गला: बीवी ने धोए खून से सने कपड़े, पढ़ें- ऑपइंडिया पर पीड़ित परिवार ने क्या किए खुलासे

दिल्ली के सीआर पार्क में हुए डबल मर्डर का मामला अभी शांत नहीं हुआ था कि अब आरके आश्रम इलाके में RBI से रिटायर्ड कर्मचारी 63 वर्षीय माधव राम वाल्मीकि की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई। हत्या करने के बाद आरोपित मृतक के गले से सोने की चेन और सोने की अँगूठी ले गया। आरोपित मोहम्मद आजाद हुसैन, माधव राम को पानी देने के बहाने छत पर गया था। हत्या करने के बाद घर पर पहुँचे आजाद के खून से सने कपड़ों को उसकी बीवी रूबीना ने सबूत मिटाने के इरादे से साफ किया था।

19 अप्रैल की शाम को हुई हत्या के बाद ऑपइंडिया की टीम उस जगह पहुँची जिस घर में मोहम्मद आजाद ने इस घटना को अंजाम दिया था। गुस्साए हिंदू समाज के लोग इकट्ठा होकर बीते मंगलवार (21 अप्रैल 2026) घटना के विरोध में मृतक माधव राम के घर पहुँचे। सूचना पर पहले से बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस और RAF के जवान तैनात थे। घर के बाहर कुछ मीडिया कर्मियों और रिश्तेदारों का जमावड़ा लगा था।

घर के बाहर घटना से गुसाईं महिला रिश्तेदार ने हमें देखते ही कहा कि कुछ नहीं होगा, उत्तम नगर में भी कुछ नहीं हुआ। वहाँ भी बहुत मीडिया वाले और हिंदूवादी आए थे लेकिन क्या हुआ? तरुण की माँ आज भी न्याय के लिए बिलख रही है। ऐसे ही अब हमारे जीजा जी को बेरहमी से मारा है। पुलिस से कुछ नहीं होता तो उसे हमारे हवाले कर दो हम अपना हिसाब कर लेंगे। महिला ने आगे गुस्से में कहा कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम उनके घरों में सूअर छोड़ेंगे। चाहे हम कुछ भी करना पड़े हमें इंसाफ चाहिए खून के बदले खून चाहिए।

इसके बाद हम छोटे से बने माधव राम के घर के अंदर दाखिल हुए। एक छोटे से कमरे में उनका पूरा परिवार और कुछ रिश्तेदार गमगीन बैठे हुए थे। इकलौते बेटे सिद्धांत ने बताया कि घर पर पड़ोस में रहने वाला मोहम्मद आजाद हमारे घर आया था। उसने मुझसे ₹3000 पेटीएम करने के लिए बोला मैंने मना कर दिया। सिद्धांत ने कहा, “मैं वहाँ से बाहर जूस पीने के लिए चला गया। इसके कुछ देर बाद ही मुझे बहन का कॉल आता है की भैया जल्दी आ जाओ घर वह रो रही थी। मैं कुछ समझ नहीं पाया।”

सिद्धांत बताते हैं, “मैं जल्दी घर पहुँचा तो घर के बाहर भीड़ लगी थी और छत पर जाकर देखा तो पापा खून से लथपथ पड़े हुए थे। मुझसे देखा नहीं गया। कभी सोचा नहीं था कि अपने घर में ही पापा का यह हाल होगा।” सिद्धांत आगे बताते हैं कि घटना के बाद अहसास हुआ कि आजाद उर्फ जाजू हमारे घर की लगातार रेकी कर रहा था क्योंकि दो दिन पहले ही बैंक से मम्मी-पापा बैंक में रखे जेवरात लेकर आए थे और उस समय वह घर पर ही था।

माधव राम की पत्नी ने बताया कि मैं एक कार्यक्रम में जाने की तैयारी कर रही थी। वो घटना को याद कर बताती हैं, “उसी टाइम उन्होंने (माधव राम) मुझसे पानी माँगा तो मैं पानी बोतल लेकर ऊपर देने जा ही रही थी कि तभी जाजू आया उसने मेरे हाथ से बोतल लेते हुए कहा कि ‘आपके परेशान क्यों होते हो मैं देता हूँ’ और इसी के बहाने जाजू छत पर चला गया और मैं बाहर अपने कार्यक्रम में चली गई।”

रोते बिलखते हुए वह बताती हैं, “इसके बाद मुझे बेटी का फोन आया तो घटना के बारे में पता चला। शायद मैं यहाँ से नहीं जाती है तो ये घटना नहीं होती। यहाँ रहते हुए 70-80 साल हो गए। अब मैं कहाँ जाऊँगी। हमें इंसाफ चाहिए हमें योगी मॉडल चाहिए हमें जान के बदले जान चाहिए।”

आरोपित ने 2 साल पहले किया था अपनी माँ का कत्ल

माधव राम के बेटे सिद्धांत ने बताया कि मोहम्मद आजाद ने करीब 2 वर्ष पहले ऐसे ही अपनी अम्मी का भी कत्ल किया था। पड़ोस में ही रहने वाले चंद्रपाल सिंह ने बताया कि करीब 2-3 साल पहले इसी युवक ने अपनी अम्मी को भी ऐसे ही मारा था लेकिन उस मामले में भी पुलिस ने कोई ठोक कार्रवाई नहीं की थी जिसके कारण वह आज तक खुलेआम घूमता रहा और फिर उसने इस घटना को अंजाम दे दिया।  

भाईचारे में गई माधव राम की जान

बेटे सिद्धांत ने बताया कि मोहम्मद आजाद का बहुत सालों से हमारे घर पर आना-जाना था। वह बताते हैं कि पिताजी के रिटायरमेंट के बाद पापा का उसके साथ और भी ज्यादा उठना बैठना हो गया था लेकिन हमें कभी शक नहीं हुआ। माधव राम की पत्नी कहती हैं कि जब भी जाजू घर आता था तो माधव राम कई बार अपने हिस्से का खाना तक उसे खिला देते थे।

परिवार कर रहा योगी मॉडल की माँग

बेटे सिद्धांत कहते हैं, “यह घटना अगर यूपी में हुई होती तो अब तक हमें इंसाफ मिल जाता। आज घटना को तीन दिन हो गए लेकिन हमसे कोई मिलने तक नहीं आया। हमें न्याय चाहिए। आरोपित का योगी मॉडल से एनकाउंटर होना चाहिए।” इसी बात को पत्नी और उनकी बड़ी बेटी यहाँ तक कि आसपास में बैठे उनके रिश्तेदार भी दोहराते हुए योगी मॉडल की माँग करते हैं। बड़ी बेटी कहती है कि मैं चाहती हूँ कि जैसे मेरे पापा को तड़पा-तड़पाकर मारा है ऐसे ही आरोपित को तड़पा-तड़पाकर मारा जाए।

घटना के विरोध में इकट्ठा हुई भीड़ में शामिल एक युवक ने कहा कि अब ऐसे अपराधियों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस को योगी मॉडल की तर्ज पर गाड़ी पलटकर उनका परमानेंट इलाज करना होगा। इस दौरान महंत मंगल दास कहते हैं, “हिंदू समाज का रक्त बर्फ के जैसे जम गया है उसी को पिघलने के लिए मैं यहाँ आया हूँ, मैं कहता हूँ कि किसी भी क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होनी चाहिए नहीं तो कभी उत्तम नगर तो कभी आरके आश्रम होता रहेगा।”

विजय नाम के युवक ने कहा कि जब तक हिंदू समाज सोता रहेगा तब तक इस तरह की घटना होती रहेंगे या रहने वाले लोग सुरक्षित नहीं है क्योंकि यहाँ 70% मुस्लिम आबादी रहती है। विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री सुरेंद्र गुप्ता ने कहा कि इस तरह की घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन लगातार हिंदू जागरुक हो रहा है और सामने आकर अब अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहा है जो कि पहले नहीं होता था।

उन्होंने कहा, “रक्त बहाना मुसलमान के स्वभाव में है, जिसे उन्हें छोड़कर हमारे(हिंदू) जैसे शांत स्वभाव को अपनाना चाहिए जिससे कि वह सुरक्षित रह सकें। सोचिए कि अगर उनका स्वभाव हमारे बच्चों ने अपना लिया तो किसी(मुसलमानों) को भी भारत की भूमि पर सर छिपाने की जगह नहीं मिलेगी।” उन्होंने हिंदुओं को सजग करते हुए कहा कि हिंदुओं को सुरक्षित रहना है तो मुसलमान से दूर का व्यवहार रखना होगा। अगर अपने घर में घुसने की इजाजत देंगे तो कभी ना कभी हम इस तरह की घटनाओं का शिकार होंगे। आपको बता दें कि मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

घटना के बाद बोला मुस्लिम- परिवार का कोई दोष नहीं

पड़ोसन रहने वाले कमल हसन ने कहा कि यह घटना बहुत दु:खद है। वो कहते हैं कि हम मुस्लिम समाज के लोगों ने आरोपी के परिवार का बहिष्कार किया है लेकिन इसमें परिवार का कोई दोष नहीं है। उस एक गलत व्यक्ति के कारण माहौल खराब हुआ है। उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वहीं, रेडीमेड की दुकान करने वाले अजीब नाम के युवक ने कहा कि आरोपित को कठोर सजा होनी चाहिए। उसने बहुत गलत किया है। पड़ोस में रहने वाले हैदर अली कहते हैं कि एक हरामखोर ने हमारे पूरे इलाके की शांति को भंग कर दिया है और सरकार से कहूँगा कि उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।  

इलेक्ट्रीशियन प्रकाश को दो दिन बाद पुलिस ने छोड़ा

घटना के विरोध में इकट्ठा हुए हिंदू समाज के लोगों ने दिल्ली पुलिस के सामने सबसे पहले इलेक्ट्रीशियन प्रकाश कोतत्काल छोड़ने की माँग रखी। इसके बाद माहौल को देखते हुए पुलिस ने 10 मिनट के अंदर ही प्रकाश को परिजनों को हवाले कर दिया। प्रकाश को दो दिन से पुलिस ने पूछताछ के नाम पर थाने में बिठा रखा था। प्रकाश ने हमें बताया कि मैं रोज की तरह माधव राम जी को आवाज देते हुए छत पर गया लेकिन उन्होंने जवाब में कोई आवाज नहीं दी।

वह बताते हैं कि उन्होंने चादर ओढ़ी हुई थी तो मैं उनके पैर पड़कर हिलाए सोचा कि सो रहे होंगे। फिर भी उठ नहीं उठे तो मैंने चादर हटाई तो पूरा शरीर खून से लथपथ था, उन्हें देखकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने कहा, “मैं तुरंत नहीं गया और उनकी बेटी को बताया। फिर पूरे मोहल्ले वालों को पता चला। मैं 12-13 साल से माधव राम को जानता था यह घटना बहुत दुखद है आरोपित को को फाँसी की सजा होनी चाहिए।”

गुड़गाँव से गायब होती मेड और बंगाल चुनाव का ‘सीक्रेट’ कनेक्शन: जानें- कैसे अपने पत्ते खेल रही है हताश TMC

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक ही चर्चा छाई हुई है। गुड़गाँव की महिलाएँ परेशान हैं और अपनी आपबीती Video के जरिए बता रही हैं। हर तरफ थकी-हारी महिलाओं की रील नजर आ रही हैं। वे बस एक ही सवाल पूछ रही हैं- आखिर गुड़गाँव की मेड कहाँ चली गईं?

इंस्टाग्राम पर ‘गुड़गाँव की मेड कहाँ गायब हैं’ जैसे सवाल वायरल हो रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि अचानक घरों में काम करने वाली महिलाएँ कहाँ चली गईं? हालत यह है कि स्विगी और जोमैटो के ऑर्डर लेने वाले भी कम नजर आ रहे हैं। हर कोई हैरान है कि आखिर शहर में चल क्या रहा है?

इतना ही नहीं, घर बैठे काम करवाने वाली ऐप्स पर भी बुरा हाल है। अर्बन कंपनी और इंस्टा-मेड जैसी सेवाओं के स्लॉट ही नहीं मिल रहे हैं। लोग फोन और ऐप चेक कर-करके थक चुके हैं। इंस्टाग्राम पर क्या पुरुष और क्या महिलाएँ, सभी इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं। गुड़गाँव के घरों में काम ठप हो गया है और लोगों की हताशा अब इंटरनेट पर साफ दिख रही है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ये वीडियो तो बस एक झलक हैं। लोग अपनी सबसे भरोसेमंद मेड को खोने का दुख मना रहे हैं। आखिर गुड़गाँव की ये मेड कहाँ जा रही हैं? क्या इसका 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव से कोई ताल्लुक है?

हमने शहर छोड़कर जा रही कई मेड और परेशान मकान मालकिनों से बात की। इस बातचीत में जो बातें सामने आईं, वे वाकई चौंकाने वाली थीं। इसमें सबसे पहला पैटर्न यह दिखा कि जाने वाली ज्यादातर मेड पश्चिम बंगाल की रहने वाली हैं। वे शुद्ध बंगाली और टूटी-फूटी हिंदी बोलती हैं। उनकी बोली और लहजे से यह भी संकेत मिलता है कि इनमें से कुछ शायद पश्चिम बंगाल से नहीं, बल्कि बांग्लादेश से हो सकती हैं।

दूसरा बड़ा पैटर्न यह नजर आया कि शहर छोड़ने वाली मेड में से बड़ी संख्या बंगाली मुस्लिमों की है। ये दोनों ही बातें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ठीक पहले सामने आई हैं। चुनाव के पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल 2026 को होना है। जा रही मेड ने बातचीत में खुलासा किया कि वे पश्चिम बंगाल के चुनावों में वोट डालने के लिए ही गुड़गाँव छोड़ रही हैं।

मर्जी या मजबूरी? क्यों भाग रही हैं मेड

क्या गुड़गाँव की मुस्लिम मेड अपनी मर्जी से बंगाल वोट डालने जा रही हैं? या फिर इसके पीछे TMC की कोई धमकी है? आम तौर पर लोग इसे नागरिक जिम्मेदारी मानते हैं। पर बंगाल के मामले में सच्चाई कुछ और ही नजर आती है।

शहर छोड़ रही महिलाओं ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास बंगाल से TMC कार्यकर्ताओं के फोन आ रहे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि इस बार वोट डालना बहुत जरूरी है। कार्यकर्ताओं ने साफ कहा, “चाहे अगली बार वोट मत देना, पर इस बार आना ही पड़ेगा।”

धमकियाँ यहीं खत्म नहीं होतीं। महिलाओं का दावा है कि उन्हें डराया जा रहा है। उनसे कहा गया कि अगर वे वोट देने नहीं आईं, तो उनकी जमीन छीन ली जाएगी। उनके घर गिरा दिए जाएँगे। उन्हें डराया जा रहा है कि अगर बंगाल में BJP सत्ता में आई, तो उन्हें बांग्लादेश बॉर्डर पर ले जाकर मार दिया जाएगा।

एक महिला ने दुखी होकर बताया कि वे बंगाली हैं, बांग्लादेशी नहीं। फिर भी उन्हें मुस्लिम होने के नाते डराया जा रहा है। TMC कार्यकर्ता कह रहे हैं कि वे ही उन्हें NRC से बचा सकते हैं। अगर BJP आई तो NRC होगा और सबको मार दिया जाएगा। महिलाएँ पूछ रही हैं कि इस बार नेता इतने बेचैन क्यों हैं और उन्हें घर लौटने पर मजबूर क्यों कर रहे हैं।

हमने जिन महिलाओं से बात की, उनमें से कुछ की राय बिल्कुल अलग थी। वे डरने के बजाय अपनी बात खुलकर रख रही थीं। उनका कहना था कि TMC उन्हें डराकर वोट लेना चाहती है। लेकिन वे इस बार ‘मोदी अंकल’ को वोट देना चाहती हैं।

एक महिला ने गुस्से में पूछा कि TMC ने उनके लिए किया ही क्या है? उन्होंने कहा, “हम उन्हें ‘दीदी’ कहते थे, लेकिन गाँव में न पानी है न काम।” उनका कहना है कि अगर दीदी ने कुछ किया होता, तो उन्हें गुड़गाँव आकर काम नहीं करना पड़ता। वे अपने ही राज्य में खुश रहतीं।

ग्राउंड रिपोर्ट से पता चला है कि दिल्ली और गुड़गाँव से हजारों लोग बंगाल पहुँच रहे हैं। सियालदह और हावड़ा रेलवे स्टेशनों पर लोगों का तांता लगा हुआ है। ये गरीब लोग सिर्फ वोट डालने के लिए इतनी दूर से भागकर आ रहे हैं। उनके चेहरों पर डर साफ देखा जा सकता है।

हिंदू मेड क्यों छोड़ रही हैं गुड़गाँव?

मुस्लिम महिलाओं के साथ-साथ गुड़गाँव में काम करने वाली हिंदू मेड भी बंगाल लौट रही हैं। हालाँकि, उनकी संख्या उतनी ज्यादा नहीं है, फिर भी पलायन जारी है। हमने कई हिंदू घरेलू सहायिकाओं से बात की और उनसे वहाँ जाने का कारण पूछा।

हैरानी की बात यह है कि इन हिंदू महिलाओं को किसी नेता या पार्टी का फोन नहीं आया। न तो TMC ने उन्हें धमकाया और न ही BJP ने उन्हें बुलाया। जब हमने उनसे पूछा कि फिर वे क्यों जा रही हैं, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा, “यह बंगाल को बचाने का हमारा आखिरी मौका है।”

महिलाओं के एक समूह ने कहा कि वे देख रही हैं कि कैसे हजारों मुस्लिम वोट डालने जा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर फिर से वही सरकार (TMC) आई, तो वे कभी अपने घर नहीं लौट पाएँगी। एक महिला ने पूछा, “क्या आप नहीं जानते संदेशखाली में हमारे साथ क्या हुआ? वे हमारे साथ कैसा सलूक करते हैं?”

इन महिलाओं का मानना है कि कुछ लोग बंगाल को बांग्लादेश बनाना चाहते हैं। उनका कहना है कि इसी मकसद से इतनी भारी भीड़ वोट डालने जा रही है। हिंदू महिलाओं के लिए यह चुनाव सिर्फ वोट देना नहीं, बल्कि अपनी जमीन और पहचान बचाने की एक कोशिश बन गया है। इसलिए वे अपना काम छोड़कर बंगाल रवाना हो रही हैं।

TMC की बढ़ती बेचैनी और डर

गुड़गाँव से भागती इन महिलाओं की आपबीती TMC की घबराहट बयाँ कर रही है। यह बेचैनी सबसे पहले चुनाव आयोग की ‘SIR’ प्रक्रिया के विरोध में दिखी। जब सुप्रीम कोर्ट ने TMC की कोशिशों को खारिज कर दिया, तो बंगाल में हालात बिगड़ गए। आरोप है कि इसके बाद न्यायिक अधिकारियों पर हमले किए गए और उन्हें घंटों बंधक बनाया गया।

मालदा में हुई हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपिन पंचोली की बेंच ने इस पर सुनवाई की। कोर्ट ने बंगाल सरकार और मालदा प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने साफ कहा कि यह कोई मामूली घटना नहीं थी।

अदालत ने माना कि यह न्यायिक अधिकारियों को डराने की एक ‘सोची-समझी’ साजिश थी। इसका मकसद छूटे हुए केसों की जाँच को रोकना था। कोर्ट ने इसे अपनी अथॉरिटी को दी गई सीधी चुनौती बताया। जजों ने कहा कि यह हमला न्याय प्रक्रिया को बाधित करने के लिए किया गया एक जानबूझकर किया गया कृत्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारी कोर्ट का ही हिस्सा होते हैं। उन्हें निशाना बनाना कोर्ट को धमकाने जैसा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। यह पूरी तरह से वेल-प्लान्ड हमला था ताकि अफसरों का मनोबल तोड़ा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बहुत सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जजों के मन में डर पैदा करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं होगी। कानून-व्यवस्था बिगाड़कर काम रोकना गलत है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों का घेराव करना ‘आपराधिक अवमानना’ माना गया है।

कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। जजों को मानसिक रूप से डराना एक गंभीर अपराध है। अदालत के मुताबिक, ऐसा व्यवहार कोर्ट की गरिमा के खिलाफ है। यह सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

अदालत ने मालदा की घटना को प्रशासन की विफलता बताया। कोर्ट ने कहा कि वहाँ की पुलिस और सिविल प्रशासन कानून संभालने में फेल रहा। जिले के हालात बहुत खराब नजर आए। जजों की सुरक्षा करने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा।

अदालत को जो जानकारी मिली, वह काफी चौंकाने वाली थी। बताया गया कि बंधक बनाए गए जजों को खाना और पानी तक नहीं दिया गया। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जब अफसरों को घेरा गया, तब न तो डीएम (DM) और न ही एसपी (SP) मौके पर पहुँचे। कोर्ट ने इस लापरवाही पर गहरा दुख जताया।

सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के बड़े अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी (DGP) की नाकामी को उजागर किया। जजों को बंधक बनाए जाने की जानकारी होने के बावजूद उन्हें सुरक्षित निकालने के ठोस कदम नहीं उठाए गए। कोर्ट ने इस सुस्ती को बेहद शर्मनाक बताया है।

अदालत ने पूछा कि दोपहर 3:30 बजे जानकारी मिलने के बाद भी कोई एक्शन क्यों नहीं हुआ? प्रशासन को इस देरी के लिए कोर्ट को सफाई देनी होगी। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी कि वे तुरंत चुनाव आयोग को बताएँ। अगर जरूरत थी, तो जजों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की मदद लेनी चाहिए थी।

सुनवाई के दौरान सीजेआई (CJI) सूर्यकांत ने मौखिक रूप से बड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य’ बन गया है। वहाँ हर कोई सिर्फ राजनीति की भाषा बोल रहा है। कोर्ट इस बात से दुखी था कि निष्पक्ष अफसरों को भी नहीं बख्शा गया, जबकि उनका स्वागत होना चाहिए था।

हिंसा के अलावा खुद ममता बनर्जी के बयान भी उनकी घबराहट बयाँ कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि ममता वैसी ही छटपटाहट महसूस कर रही हैं, जैसी 2011 में वामपंथियों ने की थी। हाल ही में ममता ने एक बयान दिया, “अगर TMC रहेगी, तभी हम फिर मिलेंगे।” उनके इस बयान को उनकी सियासी असुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।

क्या TMC सत्ता में बनी रहेगी? इसका जवाब तो सिर्फ आने वाला वक्त ही देगा। फिलहाल, दो बातें बिल्कुल साफ नजर आ रही हैं। पहली यह कि TMC इस समय जबरदस्त बेचैनी और दबाव में है।

दूसरी बड़ी बात यह है कि 2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अब महज एक चुनाव नहीं रह गया है। यह बंगाल की आत्मा और उसकी पहचान बचाने की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है। अब देखना होगा कि ऊँट किस करवट बैठता है।

(ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

दशकों तक असम में असमिया और बंगाली की रही लड़ाई, फिर हिमंता बिस्वा सरमा ने एकजुट किए हिंदू: पढ़ें- एक बंगाली हिंदू का नजरिया

31 अगस्त 2025 का दिन था। असम के सिलचर शहर के रंगीरखारी इलाके में हिमंता बिस्वा सरमा की एक झलक पाने के लिए लाखों बंगाली लोग जुटे थे। हर तरफ लोग ही लोग थे, चेहरे पर उत्साह और आंखों में इंतजार। एक असमिया भाषी मुख्यमंत्री के लिए बंगाली समाज का इतना बड़ा और गर्मजोशी भरा स्वागत, राज्य में पहले कभी नहीं देखा गया था।

यह कोई सामान्य राजनीतिक रोड शो नहीं था बल्कि रिश्तों के लिहाज से एक अहम पल था। उस दिन असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच सालों से चली आ रही दूरी कम होती दिखी। ऐसा लगा कि दोनों समुदायों के रिश्तों में एक नया बदलाव शुरू हो रहा है।

हिमंता बिस्वा सरमा उस समय सच में ‘मामा’ बनकर उभरे थे। वो भी सिर्फ ब्रह्मपुत्र घाटी के असमिया बहुल इलाकों के युवाओं के लिए ही नहीं बल्कि बराक घाटी के बंगाली बहुल समाज के लिए भी। दोनों इलाकों में उन्हें एक अपने जैसा अपनापन मिल रहा था। कुछ दशक पहले तक ऐसा दृश्य सोचना भी मुश्किल था। उस समय की राजनीति में ऐसी एकजुटता ना तो संभव लगती थी और ना ही किसी ने इसकी कल्पना की थी।

इतिहास पर एक नजर

पिछली एक सदी में तीन बड़ी घटनाओं ने बंगालियों और असमियों के रिश्तों को गहराई से प्रभावित किया- 1905 में बंगाल का बँटवारा, 1947 में भारत का विभाजन और 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध।

हालाँकि, खाने-पीने, भाषा (लिखने की लिपि) और संस्कृति में बंगाली और असमिया लोगों के बीच काफी समानताएँ हैं लेकिन बड़ी संख्या में लोगों का आना और आबादी का बदलना दोनों समुदायों के बीच झगड़े की वजह बन गया।

1947 और 1971 की घटनाओं के दौरान बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू शरणार्थी असम आए। ये लोग मुस्लिम अलगाववादियों के धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पहले ईस्ट पाकिस्तान से और बाद में बांग्लादेश से यहाँ पहुँचे थे।

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद भी बंगाली हिंदू शरणार्थियों का असम आना जारी रहा। इससे जमीन, संसाधनों के बँटवारे और राजनीति में हिस्सेदारी को लेकर स्थानीय असमिया समुदाय के साथ तनाव बढ़ गया। 1950 के दशक से लेकर 1980 के दशक के बीच यह जातीय टकराव काफी ज्यादा बढ़ गया जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर हिंसा और भाषा को लेकर दंगे हुए।

स्थिति को और खराब करने का काम कुछ स्वार्थी राजनीतिक दलों ने किया, जिन्होंने साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया और हिंदू वोटों को असमिया और बंगाली जैसे अलग-अलग समूहों में बाँटने की कोशिश की।

हिमंता ने खत्म की असमिया और बंगाली हिंदुओं को बाँटने की राजनीति

दिलचस्प बात यह रही कि कुछ स्वार्थी समूहों ने ईस्ट पाकिस्तान/बांग्लादेश से आए बंगाली मुसलमानों को खुश करने की राजनीति की जो आर्थिक मौके की तलाश में अवैध रूप से असम में घुस आए थे और इससे डेमोग्राफी बदलने का संकट और बढ़ गया।

इसे एक चालाक चुनावी रणनीति की तरह इस्तेमाल किया गया। पहले हिंदुओं को असमिया और बंगाली में बाँटकर भाषा और पहचान के मुद्दे पर आपस में लड़ाया गया। फिर ‘मिया’ (बंगाली मुसलमानों द्वारा खुद के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द) वोट बैंक को एक साथ जोड़कर चुनाव जीतने का रास्ता बनाया गया।

इसके चलते बंगाली हिंदुओं और असमिया हिंदुओं के बीच का तनाव समय-समय पर भड़काया जाता रहा… कभी भड़काऊ भाषणों से, कभी बाँटने वाली नीतियों से और कभी नफरत भरी राजनीति से। यह सिलसिला 2016 में असम में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद बदलना शुरू हुआ पहले सर्बानंद सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनने पर और फिर हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में यह बदलाव और तेज हुआ।

असम की राजनीति में पहले कभी न देखे गए तरीके से एक साफ और ठोस दृष्टिकोण अपनाया गया। इसमें बंगाली हिंदू शरणार्थियों (जो उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आए) और बंगाली मुस्लिम घुसपैठियों (जो आर्थिक अवसरों के लिए असम में घुस आए) के बीच जरूरी फर्क बताया गया। खास तरीके से संदेश देकर लोगों को यह समझाया गया कि इन दोनों समूहों में कितना बड़ा अंतर है और इनका जनसंख्या बदलाव पर क्या असर पड़ा।

आखिर जो व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान बचाने के लिए असम आया हो, उसकी तुलना उस व्यक्ति से कैसे की जा सकती है जिसने पहले एक इस्लामिक देश बनाया और फिर मौके का फायदा उठाने के लिए भारत आ गया? न्याय के नजरिए से ऐसी तुलना बिल्कुल ठीक नहीं है। जिस असमिया हिंदू समाज को कुछ राजनीतिक समूहों ने यह विश्वास दिलाया था कि बंगाली हिंदू उनके दुश्मन हैं वो अब इस सच्चाई को समझ चुका है।

सालों तक लोगों को आपस में लड़ाने के लिए की गई ‘बाँटो और राज करो’ वाली राजनीति को हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में काफी हद तक खत्म कर दिया गया है। अब राज्य और वहाँ के लोग इस बात पर एकमत होते जा रहे हैं कि असली समस्या वो अवैध घुसपैठिए हैं जो 24 मार्च 1971 (असम समझौते की तय तारीख) के बाद असम आए ताकि यहाँ आर्थिक फायदे ले सके और इस खूबसूरत पूर्वोत्तर राज्य की संस्कृति को बदल सके।

बंगालियों को पसंद है ‘मामा’

हिमंता लगातार घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच फर्क को लेकर खुलकर बोलते रहे हैं। अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन-जायदाद और पीढ़ियों की संपत्ति तक खो देने वाले बंगाली हिंदुओं को अब वह पहचान मिल रही है जिसके वे हकदार थे।

असम के मुख्यमंत्री ने बार-बार यह भरोसा दिलाया है कि किसी भी बंगाली हिंदू को विदेशी नहीं कहा जाएगा और न ही उन्हें किसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। पिछले साल सितंबर में उन्होंने साफ कहा था, “हिंदू बंगालियों को विदेशी मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि वे 1971 से पहले ही आ चुके हैं। असम में CAA का कोई खास महत्व नहीं है।”

जब 2019 में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का मसौदा जारी हुआ और उसमें करीब 12 लाख बंगाली हिंदू बाहर रह गए, तब हिमंता बिस्वा सरमा ने इस प्रक्रिया को ‘मूल रूप से खामियों से भरा’ बताया और नए सिरे से NRC कराने की माँग की।

हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी हिंदू पहचान को लेकर कभी झिझक नहीं दिखाई और असम में भाषा और जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर समुदाय को एकजुट करने के लिए लगातार काम किया। उन्होंने असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच की दूरियों को कम करने और उन्हें करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है।

इसी का असर था कि ‘मामा’ को 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले वेस्ट बंगाल में जोरदार स्वागत मिला। उनके भाषणों को सुनने के लिए हजारों बंगाली मतदाता पहुँचे। बंगाली भाषी राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी असमिया मुख्यमंत्री को स्थानीय लोगों से इतना बड़ा समर्थन मिला हो।

दिलचस्प बात यह रही कि हिमंता ने स्थानीय लोगों के लिए बंगाली में भाषण भी दिया। कुछ दशक पहले अगर ऐसा हुआ होता तो स्वार्थी समूह इसे लेकर असम की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा कर देते लेकिन इस बार ये कमजोर पड़ चुके लोग कोई असर नहीं डाल सके।

असम के मुख्यमंत्री के लगातार प्रयासों का ही असर है कि असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच के पुराने मतभेद धीरे-धीरे खत्म होते दिख रहे हैं। अब राज्य एक स्थायी मेल-मिलाप की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

‘अवसरवाद’ को पहचानने का एक निजी अनुभव

मुझे साफ तौर पर याद है कि 2020 की शुरुआत में मेरे अपने ट्विटर अकाउंट पर एक मुस्लिम एक्टिविस्ट से बहस हुई थी, जो खुद को असमिया राष्ट्रवादी बता रहा था। यह बहस असम में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने को लेकर थी।

ऑनलाइन बहस के दौरान उस एक्टिविस्ट ने अपने असमिया फॉलोअर्स के बीच शेखी बघारने के लिए यह जताने की कोशिश की कि मैं ‘सीमा के उस पार’ से आया हूँ और लोगों को मुझसे सावधान रहना चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि मेरा परिवार 1947 में पूर्वी पाकिस्तान से स्वतंत्र भारत में आया था।

पहली बार किसी स्थानीय असमिया मुस्लिम राष्ट्रवादी को देखकर मुझे हैरानी हुई। इसलिए मैंने उसके अकाउंट को और ध्यान से देखना शुरू किया। जब मैंने उसकी ट्विटर टाइमलाइन देखी तो पाया कि उसने असम में अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की आलोचना करते हुए कई लेख पोस्ट किए थे।

इससे एक बात साफ हो गई कि वह एक्टिविस्ट एक तरफ अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों को असम में बनाए रखने की वकालत कर रहा था और दूसरी तरफ खुद को ‘असमिया राष्ट्रवादी’ बताकर एक दूसरी पीढ़ी के बंगाली हिंदू प्रवासी पर सवाल उठा रहा था।

क्या यह अजीब नहीं है? भेड़ की खाल में भेड़िया जो अपनी धार्मिक सोच को आगे बढ़ाते हुए जातीय पहचान का इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन यह बात आज से 6 साल पुरानी है।

इतिहास ने जैसे करवट ली है, वैसे ही आज ऐसे एक्टिविस्ट्स का प्रोपेगेंडा ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता। क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा ने अब इस मामले में कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। उन्होंने एक बात साफ कर दी है कि असम में कौन है जो यहाँ का है और कौन नहीं है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

हम ‘लव जिहाद’ कहें तो हो जाते हैं महिला विरोधी, तुम्हारे भाईजान गैर मुस्लिम लड़कियों को नोंच-खसोट लें तो भी न हो चर्चा… आरफा जी बढ़िया है आपकी ‘स्ट्रेटजी’

आरफा खानुम शेरवानी खुद को मुस्लिमों का ‘मुन्जी’ समझती हैं। जहाँ वो हर बार किसी मुस्लिम पहचान वाले अपराधी के मामले को उठाती हैं, और एकतरफा पक्ष लेकर सोशल मीडिया पर मुखर हो जाती हैं। लेकिन आरफा को जमीन पर क्या हो रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता, उससे ज्यादा उन्हें अपने तय नैरेटिव को आगे बढ़ाने की जल्दी रहती है। यही वजह है कि विवादित मुद्दों पर बोलते हुए वह फैक्ट्स मिस कर देती हैं और नतीजतन उनके ‘विचार’ लड़खड़ा जाते हैं।

अब उनके इस नए बयान को ही देख लीजिए। आरफा ने ‘लव जिहाद‘ को सीधे-सीधे हिंदू महिलाओं का अपमान बता दिया। मतलब जो भी इस मुद्दे पर सवाल उठा रहा है, वो महिलाओं को नासमझ मान रहा है, यहाँ यही बताने की कोशिश की गई। लेकिन आरफा, बात इतनी सीधी नहीं है जितनी आप बना रही हैं। हर चीज को एक लाइन में समेट देना आसान होता है, लेकिन क्या इससे सच भी उतना ही आसान हो जाता है?

आरफा बार-बार ‘लव जिहाद‘ को महिलाओं की आजादी का मुद्दा बताकर पूरी बहस को वहीं खत्म करना चाहती हैं। लेकिन क्या जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, उनके पास कोई वजह नहीं है? आरफा, क्या आप ‘महिला की स्वतंत्रता’ की बात कहकर आगे बढ़ जाएँगी? असली बात ये है कि आप सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल उठाने को ही कठघरे में खड़ा कर देती हैं और यही तरीका इस पूरे मुद्दे को और उलझा देता है।

कभी हिंदुओं को दोषी ठहरा देती हैं, कभी हिंदू संगठनों को निशाने पर लेती हैं। तो अब ‘महिला स्वतंत्रता’ के नाम पर ‘लव जिहाद’ जैसे बड़ी साजिश पर ही पर्दा डालने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन आरफा, अगर आप सच में थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो आपको पता चलेगा कि यह शब्द अचानक से हवा में नहीं बना था।

इसकी शुरुआत ही केरल से हुई थी और वो भी तब, जब वहाँ के सबसे बड़े चर्च ‘साइरो मालाबार‘ ने खुद सामने आकर यह चिंता जताई थी कि किस तरह ईसाई लड़कियों को टारगेट किया जा रहा है। उस समय चर्च ने खुलकर कहा था कि सुनियोजित तरीके से लड़कियों को फँसाया जा रहा है, उन्हें ब्रेनवॉश किया जा रहा है और फिर इस्लामी कट्टरपंथी नेटवर्क के जरिए उन्हें सीरिया और अफगानिस्तान भेजा जा रहा है।

ये कोई सोशल मीडिया की अफवाह नहीं थी, बल्कि चर्च की अपनी रिपोर्ट्स और बयान थे, जिनमें साफ तौर पर बताया गया कि कैसे बड़ी संख्या में लड़कियाँ इस जाल में फँसी और बाद में उनका कोई अता-पता तक नहीं चला। अब सवाल ये है आरफा, क्या उस वक्त भी ये ‘महिला की स्वतंत्रता’ ही थी या फिर उस समय सच्चाई कुछ और थी, जिसे आप नजरअंदाज कर रही हैं?

और अगर आपको लगता है कि ये सिर्फ भारत तक सीमित कोई ‘कहानी’ है, तो जरा नजर बाहरी देशों पर भी डाल लीजिए। ब्रिटेन के रोदरहैम जैसे मामलों में क्या हुआ, ये पूरी दुनिया जानती है, जहाँ संगठित ग्रूमिंग गैंग्स ने नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाया, उन्हें फँसाया और सालों तक उनका शोषण किया गया।

भारत में अजमेर का मामला भी कोई छुपा नहीं है, जहाँ नाबालिग लड़कियों को लव जिहाद के जाल में फँसाकर उनके साथ अपराध किए गए। अब क्या इन सब मामलों को भी आप सिर्फ ‘महिला की स्वतंत्रता’ कहकर टाल देंगी या फिर मानेंगी कि यहाँ कुछ ऐसा हो रहा था जिसे नजरअंदाज करना आपके लिए आसान तो है, लेकिन सही नहीं?

यही नहीं, आरफा, इस पूरे मुद्दे पर सिर्फ आप ही नहीं हैं जो इसे मात्र ‘विचार’ बताकर खारिज कर देती हैं। वामपंथी इकोसिस्टम और इस्लामी कट्टरपंथी भी सालों से यही लाइन दोहरा रहे हैं कि ‘लव जिहाद जैसा कुछ होता ही नहीं है।’

कई मामलों में अदालतों ने भी पहचान छुपाकर धर्मांतरण कराने के मामलो को ‘देश के लिए खतरा’ बताया है, लेकिन उस पर बात करने के बजाए पूरा ध्यान इस बात पर लगा दिया जाता है कि ‘नैरेटिव’ कैसे बचाया जाए। वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी, दोनों ही इस मुद्दे पर एक ही सुर में बोलते दिखते हैं और यही सबसे बड़ा संकेत है कि यहाँ अपनी तय सोच बचाने की कोशिश हो रही है।

निष्कर्ष सीधा है। जब तकइस्लामी कट्टरपंथी लव जिहाद को नकारते रहेंगे और वामपंथी उसी हवा में बहते रहेंगे, तब तक सच्चाई को दबाने की कोशिश चलती रहेगी। लेकिन जमीन पर जो हो रहा है, उसे हमेशा के लिए छुपाया नहीं जा सकता। TCS नासिक धर्मांतरण कांड यूँ ही सामने नहीं आते, ये उसी सोच का नतीजा है जहाँ इस तरह के अपराधों को अपराध मानने से इनकार कर दिया जाता है और सच बाहर आता है तो बचाव में पूरा तंत्र खड़ा हो जाता है।

आपकी असली समस्या भी यही है, आरफा। आप हर अपराध को एक ही नजरिए से देखती हैं। इसलिए ‘महिलाओं की स्वतंत्रता और अपमान’ की बातें करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हकीकत क्या है, क्योंकि रिकॉर्ड में जो दर्ज है, उसे सिर्फ इसलिए झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि वो आपके बनाए नैरेटिव में फिट नहीं बैठता।

श्रम के बाद अब नेपाल के गृह मंत्री को देना पड़ा इस्तीफा, बालेन शाह के शिक्षा मंत्री को भी झेलना पड़ रहा विरोध: जानिए- सत्ता में आते ही क्यों विवादों में घिरे

नेपाल में बालेन शाह की अगुवाई में बनी नई सरकार को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन शुरुआती दौर में ही दो मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है। गृहमंत्री सूदन गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग केस में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद इस्तीफा दे दिया। इससे बालेन सरकार की भ्रष्टाचार मुक्त साफ सुथरी छवि और नई पीढ़ी की राजनीति करने के दावे पर बट्टा लगा है।

श्रम मंत्री दीपक कुमार साह पर गलत तरीके से अपनी पत्नी को हेल्थ इंश्योरेंस बोर्ड में शामिल करने के आरोप लगे। इसके बाद उनसे इस्तीफा ले लिया गया। दूसरा आरोप गृहमंत्री सुदन गुरुंग पर मनी लॉन्ड्रिंग का लगा। उनके इस्तीफे की माँग को लेकर विपक्ष ने विरोध प्रदर्शन किया। अब उन्हें इस्तीफा देना पड़ा है।

शिक्षा मंत्री पोखरेल को उनके पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद नीतिगत निर्णयों और विरोधाभासी बयानों के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा। उन्होंने अचानक कोचिंग संस्थानों पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन पढ़ाई की व्यवस्था नहीं की। इससे छात्रों और अभिभावकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

अच्छा शासन, पारदर्शिता और साफ-सुथरी राजनीति का वादा करके सत्ता में आई बालेन सरकार के लिए ये शुभ लक्षण नहीं हैं। 2025 में Gen Z आंदोलन ने नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया था। उस आंदोलन की उपज बालेन शाह जब सत्ता में आए, तो जनता को उनसे काफी उम्मीदें थीं।

100 दिन के एक्शन प्लान के तहत उन्होंने सबसे पहले ‘छात्र राजनीति’ पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे Gen Z सकते में है। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। भारतीय बॉर्डर पर भंसार नीति लागू कर नेपाली 100 रुपए से अधिक के सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दी। इससे खिलाफ सीमावर्ती क्षेत्र में जनता सड़कों पर हैं। नीतियों को लेकर विवाद के साथ-साथ अब नेताओं की छवि भी धुमिल हो रही है।

गृहमंत्री का मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप के बाद इस्तीफा

जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ Gen Z ने विद्रोह किया था। केपी ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था। उस भ्रष्टाचार का दीमक एक महीने में ही बालेन सरकार को लग गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के कैबिनेट के अहम सदस्य गृहमंत्री सूदन गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में फँस गए। उन पर इस्तीफा देने का राजनीतिक दबाव था। जनता भी शक कर रही है। इसलिए बालेन शाह सरकार ने गृहमंत्री से इस्तीफा ले लिया। हालाँकि गृहमंत्री गुरुंग का दावा है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। वे जाँच कराए जाने का समर्थन करेंगे और पार्टी का फैसला मानेंगे।

गृह मंत्री सूदन गुरुंग नेपाल के सबसे प्रभावशाली नेताओं में एक हैं। जेन जी आंदोलन के दौरान सितंबर 2025 में उन्होंने हामी नेपाली नाम से एनजीओ के माध्यम से सुर्खियाँ बटोरी और अपनी सफलता को चुनाव में भुनाने में कामयाब रहे। लेकिन उनकी दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही संपत्ति पर जनता का ध्यान गया और उन पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे।

काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, गृहमंत्री सूदन गुरुंग और बिजनेसमैन दीपक कुमार भट्ट की कंपनियों के बीच संदिग्ध लेन-देन हुए। गुरुंग की दो कंपनियों लिबर्टी माइक्रो लाइफ इश्योरेंस और स्टार माइक्रो इंश्योरेंस में 25-25 हजार शेयर खरीदे थे। ये कंपनियाँ दीपक भट्ट और जगदंबा ग्रुप की हैं। इसके अलावा समय समय पर अलग अलग लोगों ने उनके खाते में काफी पैसे जमा कराए। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में संजय सर्विसेज सेंटर प्राइवेट लिमिटेड ने 10 लाख रुपए और फिर 1.25 करोड़ रुपए जमा किए।

सूडान के खाते में 37 लाख रुपये जमा करने वाले बिजय कुमार श्रेष्ठ की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। लिबर्टी माइक्रो लाइफ इंश्योरेंस और स्टार माइक्रो इंश्योरेंस में शेयर खरीदने के लिए इस्तेमाल किए गए धन के स्रोत को लेकर विवाद के बाद, गृह मंत्री गुरुंग ने दावा किया है कि उन्होंने ऋण के माध्यम से शेयर हासिल किए थे।

सूदन गुरुंग ने हालाँकि खुद पर लगे आरोपों को सिरे से नकार दिया। द हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने दो कंपनियों में निवेश की बात मानी है। संपत्ति छिपाने के आरोप पर उनका कहना है कि 2 करोड़ रुपए से अधिक के निवेश की बात उन्होंने सार्वजनिक की थी। उनका निवेश पारदर्शी है और निवेश के वर्गीकरण में गलती हुई है। उनकी मंशा कुछ भी छिपाने की नहीं है।

विपक्ष का विरोध प्रदर्शन

गृहमंत्री सूदन गुरुंग के इस्तीफे की माँग को लेकर विपक्ष सड़कों पर उतर गई। नेपाली कॉन्ग्रेस ने निष्पक्ष जाँच की माँग करते हुए इस्तीफा देने को कहा। पार्टी का कहना है कि सरकार होम मिनिस्टर के खिलाफ सभी आरोपों की तुरंत एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और हाई-लेवल जाँच शुरू करे। इस मामले को टालने, प्रभावित करने या छिपाने की कोशिश न की जाए।

वहीं CPN-UML ने गुरुंग से जुड़े सभी मामलों की जाँच के लिए एक हाई-लेवल जाँच कमेटी बनाने की माँग की है। साथ ही संगठन का कहना है कि ये जाँच तुरंत शुरू की जाए और इसमें किसी तरह की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। किसी तरह की लीपापोती न की जाए। सोशल मीडिया पर भी गृह मंत्री को लेकर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। इसमें कहा जा रहा है कि लोगों के खून-पसीने की कमाई को लूटने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। दरअसल गृहमंत्री ने खुद के खिलाफ मीडिया ट्रायल और सुनियोजित तरीके से अफवाह फैलाने का आरोप लगाया था, जिसके बाद लोगों का गुस्सा फूट गया।

श्रम मंत्री ने दिया इस्तीफा

नेपाल में सबसे पहले श्रम मंत्री दीपक कुमार साह विवादों में आए। दरअसल उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी को स्वास्थ्य बीमा बोर्ड में नियुक्त कर दिया था। इस पर एक्शन लेते हुए बालेन सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया। लेकिन इतनी जल्दीबाजी में एक्शन लेने पर भी विपक्ष सवाल उठा रहा है, क्योंकि उन्हें सफाई का मौका भी नहीं दिया गया। इतनी जल्दी एक्शन पर विपक्ष का कहना है कि ‘दाल में कुछ काला’ है।

घटना के हफ्तेभर भी नहीं हुए और गृहमंत्री सुरंग मनी लॉन्ड्रिंग में फँस गए। विपक्षी पार्टियों को कहना है कि दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए और इसके लिए सबसे पहले गृहमंत्री को अपने पद से हटाया जाना चाहिए। जनता और विपक्षी दलों के दबाव के बाद बालेन सरकार ने गृहमंत्री का इस्तीफा ले लिया है। विपक्ष का मानना था कि पद पर रहते हुए कोई भी एजेंसी निष्पक्ष जाँच नहीं कर पाएगी। यहाँ तक कि सत्ताधारी दल के कई नेता भी निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे थे।

कौन था मोसाद का एजेंट ‘M’ जिनकी झील में डूबने से हुई मौत, ईरान के जुटाए थे सारे सीक्रेट: जंग के बीच इजरायल का कबूलनामा, कोई पहचान न सके इसलिए मास्क में श्रद्धांजलि देने आए अधिकारी

दुनिया की और इजरायल की सबसे बड़ी जासूसी एजेंसी ‘मोसाद’ के काम करने का तरीका हमेशा एक राज रहा है। कुछ समय पहले ही इजरायल ने अपने एक ऐसे ही जाबांज एजेंट की कहानी से पर्दा उठाया है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी देश की सुरक्षा के लिए अंधेरे में रहकर काम किया। मई 2023 में इटली में एक नाव हादसे के दौरान इस एजेंट की जान चली गई थी।

यह एजेंट कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बल्कि ईरान के खतरनाक मंसूबों को रोकने में इजरायल का सबसे बड़ा हथियार था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस एजेंट की वजह से ही इजरायल को ईरान के खिलाफ चल रही गुप्त जंग में बड़ी कामयाबी मिली थी।

कौन था एजेंट ‘M’ और क्या थी उनकी पहचान?

एजेंट ‘M’ का असली नाम आज भी एक गहरा राज बना हुआ है। इजरायल की सरकार और मोसाद ने कभी भी उनकी पहचान को पूरी तरह नहीं खोला। इटली की मीडिया ने उन्हें ‘एरेज शिमोनी’ नाम दिया था, लेकिन माना जाता है कि यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए एक नकली नाम था। उन्होंने मोसाद में लगभग 30 साल तक अपनी सेवा दी और इजरायल की सबसे मजबूत दीवार बने रहे।

वह स्वभाव से बहुत ही शांत और नेक इंसान था। उनके दोस्तों और साथियों का कहना है कि वह हर किसी से बहुत प्यार से मिलते थे और बड़ों से लेकर बच्चों तक, सबकी भाषा समझते थे। वह दुनिया की नजरों में एक साधारण इंसान थे, लेकिन असल में वह इजरायल के सबसे बड़े रक्षक थे। उनकी मृत्यु के बाद जब उन्हें विदा किया गया, तो मोसाद के बड़े अधिकारियों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए टोपी और मास्क लगाकर उन्हें अंतिम सलाम दिया।

ईरान के खिलाफ भूमिका और ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’

एजेंट ‘M’ ने ईरान के खिलाफ चल रही लड़ाई में बहुत ही खास भूमिका निभाई थी। मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने बताया कि ‘M’ ने उन गुप्त मिशनों को संभाला था जिनकी वजह से इजरायल को ईरान पर बड़ी जीत मिली। उन्होंने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ नाम के एक बड़े अभियान में अपनी बुद्धि और नई तकनीक का ऐसा इस्तेमाल किया कि दुश्मन के पास कोई जवाब नहीं था।

मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया ने आगे बताया कि उन्हें ‘M’ की बहादुरी पर बहुत गर्व है। ‘M’ ने इजरायल की सरहद से दूर रहकर उन खतरों को खत्म किया जो देश की सुरक्षा को नुकसान पहुँचा सकते थे। उनके काम करने का तरीका इतना शानदार था कि दुश्मन को पता भी नहीं चलता था और मिशन पूरा हो जाता था। वह उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने ईरान के खतरनाक हथियारों और परमाणु मंसूबों को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

इटली की झील में वो दर्दनाक नाव हादसा

मई 2023 की एक शाम इटली की ‘लेक मैगीगोर’ झील में एक बहुत ही दुखद हादसा हुआ। एजेंट ‘M’ वहाँ किसी छुट्टी पर नहीं, बल्कि एक बहुत ही जरूरी मीटिंग के लिए गए थे। उस नाव पर उनके साथ इजरायल और इटली के कई और जासूस भी सवार थे। अचानक मौसम बिगड़ा और नाव पलट गई। इस हादसे में ‘M’ के साथ इटली के दो एजेंट और नाव के कप्तान की पत्नी की डूबने से मौत हो गई।

उस नाव पर क्षमता से ज्यादा लोग सवार थे, जिस कारण यह हादसा हुआ। नाव जब डूबी तो वह किनारे से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर थी, लेकिन ‘M’ को बचाया नहीं जा सका। हादसे के तुरंत बाद इजरायल ने अपने बाकी बचे जासूसों को एक प्राइवेट जेट से तुरंत वापस बुला लिया। यह पूरी घटना इतनी रहस्यमयी थी कि इसने पूरी दुनिया की मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया।

देश की श्रद्धांजलि और आखिरी सलाम

एजेंट ‘M’ को इजरायल के अश्कलोन शहर में पूरे सम्मान के साथ विदाई दी गई। मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया उनके जनाजे पर भावुक हो गए और उन्हें एक सच्चा दोस्त और महान इंसान बताया। उन्होंने कहा कि ‘M’ ने अपनी पूरी जवानी देश की सेवा में लगा दी। उनकी बहादुरी की कई ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें शायद देश की सुरक्षा की वजह से कभी भी जनता को नहीं बताया जा सकेगा।

इजरायल के प्रधानमंत्री और बड़े नेताओं ने भी उनकी शहादत को याद किया। उन्होंने कहा कि ‘M’ जैसे गुमनाम हीरोज की वजह से ही देश आज सुरक्षित है। आज इजरायल की आधिकारिक यादगारों पर उनका नाम बड़े सम्मान के साथ दर्ज है। भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए महान काम इजरायल के इतिहास में हमेशा चमकते रहेंगे।

माता वैष्णो देवी मंदिर के चढ़ावे में नकली चाँदी मिलने पर हड़कंप, ₹550 करोड़ का अनुमान लेकिन निकली सिर्फ ₹30 करोड़ की: जहरीली धातुओं की मिलावट उजागर

माता वैष्णो देवी मंदिर में भक्तों द्वारा चढ़ाई जाने वाली चाँदी को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। इससे मंदिर के आसपास बिकने वाली चीजों की असलियत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिस चाँदी को भक्त असली समझकर चढ़ा रहे थे उसमें असल में बहुत कम चाँदी और बाकी सस्ती व जहरीली धातुएँ मिली हैं।

सरकारी टकसाल में चौंकाने वाला खुलासा

यह मामला तब सामने आया जब श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने करीब 20 टन जमा चढ़ावे को पिघलाने और सुरक्षित रखने के लिए सरकारी टकसाल (मिंट) में भेजा। जब वहाँ इसकी जाँच हुई तो अधिकारी भी हैरान रह गए। जाँच में पता चला कि इस पूरी धातु में सिर्फ 5-6% ही असली चाँदी है।

चाँदी के बजाय बाकी का हिस्सा ज्यादातर कैडमियम और लोहे का था। जहाँ चाँदी की कीमत इस समय करीब 2,75,000 रुपए प्रति किलो है तो वहीं कैडमियम की कीमत सिर्फ 400-500 रुपये प्रति किलो है। यानी चढ़ावे की असली कीमत उम्मीद से बहुत कम निकली।

पहले अनुमान लगाया गया था कि इन चढ़ावों से करीब 500-550 करोड़ रुपए की चाँदी निकलेगी। हालाँकि, अब साफ हो गया है कि असल कीमत सिर्फ करीब 30 करोड़ रुपए ही हो सकती है।

एक मामले में करीब 70 किलो चढ़ावे में से सिर्फ 3 किलो ही असली चाँदी निकली। इसे अलग करने में टकसाल अधिकारियों को लगभग 3 महीने लग गए और इससे पता चलता है कि समस्या कितनी गहरी है।

सेहत के लिए खतरा और प्रोसेसिंग में मुश्किलें

कैडमियम का होना इस मामले को और गंभीर बना देता है। यह धातु न सिर्फ सस्ती है बल्कि खतरनाक भी है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के नियमों के तहत इसे उपभोक्ता सामान में इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है क्योंकि इससे निकलने वाली गैसें कैंसर पैदा कर सकती हैं।

इसी वजह से टकसाल अधिकारियों ने शुरुआत में इस धातु को प्रोसेस करने से मना कर दिया था। बाद में सुरक्षा इंतजाम और खास मशीनों के इंतजाम के बाद ही काम शुरू किया गया। फिर भी ज्यादा चांदी वाले हिस्सों को पहचानने के लिए करीब 25 लाख रुपए की कीमत वाले खास हैंडहेल्ड डिवाइस का इस्तेमाल करना पड़ा।

अधिकारियों ने यह भी बताया कि ऐसी जहरीली धातुओं को संभालना कर्मचारियों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी खतरनाक है और इससे हवा-पानी दोनों प्रदूषित हो सकते हैं।

अब तक कोई कार्रवाई नहीं

इतनी गंभीर चेतावनियों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। टकसाल ने पिछले एक साल में कई बार इस मुद्दे को उठाया है। इसके लिए उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के दफ्तर और मंदिर बोर्ड को पत्र भी लिखा गया।

टकसाल ने साफ कहा है कि यह भक्तों के साथ धोखा है, क्योंकि वे अच्छी नीयत से सामान खरीदते हैं लेकिन उन्हें असलियत का पता नहीं होता। साथ ही यह भी कहा गया कि ऐसी मिलावटी चाँदी के सामान की बिक्री तुरंत रोकी जानी चाहिए। लेकिन अभी तक न तो उपराज्यपाल के दफ्तर की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया आई है और न ही मंदिर बोर्ड ने कोई ठोस कदम उठाया है।

कहाँ से आई नकली चाँदी

भारत के अन्य प्रमुख मंदिरों जैसे तिरुपति, सिद्धिविनायक, गुरुवायूर देवस्वम या श्रीकालहस्ती में इस तरह की मिलावट की कोई खबर सामने नहीं आई है। इससे शक और गहरा हो गया है कि समस्या वैष्णो देवी यात्रा मार्ग के आसपास के स्थानीय ज्वेलर्स और दुकानदारों में हो सकती है। माना जा रहा है कि ये दुकानदार चाँदी जैसी दिखने वाली चीजें बेच रहे हैं, जो असल में सस्ती धातुओं से बनी होती हैं।

कैडमियम देखने में चाँदी जैसा ही लगता है और इसलिए आम लोग आसानी से धोखा खा जाते हैं। इससे हर साल लाखों भक्तों के साथ ठगी होने का खतरा बना रहता है।

भक्त सच्चाई से अनजान

हर साल लाखों श्रद्धालु त्रिकुटा पहाड़ियों पर चढ़कर माता को सिक्के, गहने और अन्य चीजें चढ़ाते हैं। उनके लिए यह सिर्फ आस्था और श्रद्धा का सवाल होता है। हालाँकि, अब जो सच्चाई सामने आई है उसने इन चढ़ावों की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। साथ ही धार्मिक बाजारों में भरोसे और नियमों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।

यह जानकारी न केवल बेचे जा रहे सामान की गुणवत्ता पर सवाल उठाती है बल्कि धार्मिक बाजारों में भरोसे और नियमों को लेकर भी बड़े सवाल खड़े करती है। टकसाल द्वारा बार-बार इस मुद्दे को उठाने और इसमें जुड़े आर्थिक तथा स्वास्थ्य संबंधी खतरों को उजागर करने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है जिससे यह मामला और भी ज्यादा गंभीर हो गया है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ‘न्याय’ को जिंदा रखने के लिए जरूरी था आपका डटे रहना, क्योंकि कोर्टरूम को भी केजरीवाल बनाना चाहते थे अपनी ‘टुच्ची राजनीति’ का अड्डा

दिल्ली हाईकोर्ट ने शराब नीति केस (एक्साइज पॉलिसी केस) में AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस माँग को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के इस मामले की सुनवाई से ‘रिक्यूजल’ (खुद को केस से अलग करने) की माँग की गई थी। यह कोई सीधा सा फैसला भर नहीं है बल्कि केजरीवाल के उस प्रोपेगेंडा को कानून का हंटर है जिसमें वो यह तय करने की कोशिश कर रहे थे कि कौन सा जज निष्पक्ष है और कौन नहीं।

केजरीवाल खुद को बेशक लोकतंत्र का मसीहा बताते ना थकते हों लेकिन उनकी यह दलील या कहें तो प्रोपेगेंडा लोकतंत्र की उस बुनियादी आत्मा के खिलाफ भी है जिसमें न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल के प्रोपेगेंडा के खिलाफ तल्ख टिप्पणियाँ की और साफ कर दिया कि वह इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग नहीं करने वाली हैं।

जज की क्षमता का फैसला नेता नहीं ऊपरी अदालत करेगी: जस्टिस शर्मा

दरअसल, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपितों ने कहा था कि जस्टिस शर्मा पहले भी उनके खिलाफ फैसले दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज के बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में है और इससे ‘हितों का टकराव’ हो सकता है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में सख्त लहजे में कहा, “किसी जज की क्षमता (कम्पीटेंस) का फैसला कोई पक्षकार (लिटिगेंट) या नेता नहीं कर सकता। यह काम केवल ऊपरी अदालत का होता है। उन्होंने कहा कि कोई भी राजनेता इस सीमा को पार नहीं कर सकता और जज की योग्यता पर फैसला नहीं दे सकता।”

साथ ही उन्होंने कहा, “हर बार मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति जीत नहीं सकता। अगर उसे लगता है कि फैसला गलत या एकतरफा है तो उसका आकलन भी केवल ऊपरी अदालत ही करेगी। जैसे जिला अदालत (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के फैसले को हाईकोर्ट (HC) देखती है और हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट (SC) जाँचती है।” उन्होंने कहा कि सिर्फ इस बात से कि किसी पक्षकार को यह डर है कि उसे इस कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी वह जज पर पक्षपात का आरोप लगाने का आधार नहीं बन सकता।

यूँ तो जस्टिस शर्मा का बयान न्याय व्यवस्था के एक बुनियादी सिद्धांत को समझाने के लिए ही है लेकिन इसे समझना बेहद अहम है। न्यायपालिका में एक तय प्रक्रिया होती है। अगर किसी को लगता है कि निचली अदालत का फैसला गलत है, तो उसके लिए एक रास्ता पहले से बना हुआ है और वो है अपील का रास्ता। जैसे- जिला अदालत के फैसले को हाई कोर्ट देखता है और हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट देखता है। यानी किसी फैसले की सही या गलत होने की जाँच ऊपरी अदालत करती है, न कि वह व्यक्ति जो केस हार रहा है या जिसे फैसला पसंद नहीं आया।

जस्टिस शर्मा का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ‘हर मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति जीत नहीं सकता’। इसका मतलब यह है कि अदालत में हमेशा एक पक्ष जीतेगा और दूसरा हारेगा। लेकिन हारने वाला पक्ष अगर सिर्फ इस आधार पर जज पर पक्षपात का आरोप लगाने लगे कि उसे राहत नहीं मिली तो यह न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है। अगर ऐसा मान लिया जाए तो हर असंतुष्ट पक्षकार जज बदलने की माँग करेगा और आगे चलकर इससे अदालतों का काम रुक जाएगा और न्याय प्रक्रिया प्रभावित होगी।

ताकि जनता के मन में जजों की निष्पक्षता बनी रही

केजरीवाल ने जो इस मामले पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू किया है उसका मकसद यही है कि किसी भी तरह लोगों के मन में जस्टिस शर्मा को लेकर भ्रम पैदा किया जा सके। इससे होता ये कि अगर कल को फैसला केजरीवाल के खिलाफ भी आता तो वो यह कहना शुरू कर देते कि यही तो उन्हें पहले से उम्मीद थी। वहीं, उनके पक्ष में फैसला देने पर जस्टिस शर्मा के दबाव में आने को लेकर सवाल उठने शुरू हो जाते। लेकिन जस्टिस शर्मा ने न्याय के सिद्धांत को सबसे आगे रखा और केजरीवाल को खूब खरी-खरी भी सुनाई।

जस्टिस शर्मा ने जज पर हमलों पर संस्था पर हमला बताते हुए कहा, “जज किसी वादी के मन में पूर्वाग्रह से पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर सुनवाई से खुद को अलग नहीं कर सकता। इस तरह का खतरा न केवल हाईकोर्ट्स तक पहुँचेगा, बल्कि जिला कोर्ट तक भी जाएगा।” उन्होंने साफ-साफ कहा कि अगर आज वो इस फैसले से खुद को अलग कर लेती हैं तो जनता के मन में यह धारणा बना जाएगी कि जज किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विरोध में काम करते हैं।

जजों को हटाने की माँग कहाँ जाकर रुकेगी?

केजरीवाल की इस माँग को मान लिया जाए तो फिर यह माँग कहा जाकर रुकेगी? जजों के भी परिवार हैं, उनके बच्चे हैं और वो कुछ ना कुछ काम करते ही होंगे। ऐसे में अगर हर बात को जजों के परिवार से जोड़कर पूर्वाग्रह पैदा कर लिया जाए तो यह नजीर कितनी खतरनाक हो सकती है। कल को जिसके भी पक्ष में फैसला नहीं आएगा वो जज पर इल्जाम लगा देगा, उसे बदलने की माँग करने लगेगा और फिर जजों-न्याय व्यवस्था के खिलाफ एक अंतहीन चक्र शुरू हो जाएगा।

न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी होती है कि जज निष्पक्ष होकर कानून के अनुसार फैसला करेंगे। अगर हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलवाने लगे, तो यह ‘फोरम शॉपिंग’ जैसी स्थिति पैदा कर देता है। इसके बाद लोग उस जज की तलाश करेंगे जो उन्हें लगेगा कि वो उनके पक्ष में फैसला दे सके। इससे न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया कमजोर होती है बल्कि यह संदेश भी जाता है कि अदालतें दबाव में आ सकती हैं और यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

जस्टिस शर्मा का कहना है कि केजरीवाल ने मनगढ़ंत और अटकलों पर आधारित आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह उनका पक्का फर्ज बन जाता है कि वह इसका बेखौफ होकर जवाब दें। उन्होंने कहा, “बदकिस्मती से मुझे दो मुकदमेबाजों के बीच का झगड़ा नहीं बल्कि एक मुकदमेबाज और मेरे एक जज के बीच का झगड़ा सुलझाना है। कोई भी जज, किसी मुक़दमेबाज के मन में पक्षपात को लेकर पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने के लिए, या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर खुद को केस से अलग नहीं कर सकता।”

उन्होंने केजरीवाल को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “यह अदालत अपने और इस संस्था के सम्मान के लिए खड़ी रहेगी, भले ही यह मुश्किल क्यों न लगे। अगर ऐसे आधारों पर खुद को केस से अलग करने की बात मान ली जाती है तो इससे हमारी न्याय प्रक्रिया पर खतरा पैदा हो जाएगा। तब इसे ‘मैनेज्ड जस्टिस’ (प्रबंधित न्याय) कहा जाएगा।”

इसे इस तरह समझिए कि अगर बिना सबूतों के जजों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाएँ और उन्हें हटाने की माँग की जाए तो यह धीरे-धीरे एक ट्रेंड बन सकता है। इसके चलते जजों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है और वे विवादास्पद मामलों में निर्णय लेने से हिचक सकते हैं। इससे न्याय मिलने में देरी होगी और आम जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ सकता है। इसलिए रिक्यूजल की माँग केवल असाधारण परिस्थितियों में ठोस और प्रमाणिक आधार पर ही होनी चाहिए न कि इसे एक राजनीतिक या कानूनी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए।

केजरीवाल का इतिहास रहा है बेबुनियाद आरोपों की ‘टुच्ची राजनीति’

अरविंद केजरीवाल की राजनीति की शुरुआत आरोप लगाने वाले अंदाज में ही हुई थी। बिना ठोस सबूतों के गंभीर आरोप लगाना, नैतिकता की ऊँची बातें करना और फिर उन्हीं आरोपों को राजनीतिक हथियार बनाकर जनभावनाओं को प्रभावित करना। यही उन्होंने राजनीति में किया और यही कोशिश अब वो कोर्ट में भी करने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल, केजरीवाल का राजनीतिक उदय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ। उस समय उन्होंने और उनकी टीम ने राजनीतिक दलों, उद्योगपतियों या सरकारी संस्थाओं पर। उस दौर में व्यवस्था से नाराज जनता के एक बड़ने वर्ग ने इन आरोपों को बिना ज्यादा सवाल किए स्वीकार कर लिया। लेकिन राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है राजनीति में धारणा काम करती जाती है जबकि अदालत में केवल तथ्य और सबूत ही मायने रखते हैं।

यह ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र में न्यायपालिका अहम स्तंभ होती है। यदि राजनीतिक लाभ के लिए उस पर भी संदेह किए जाने लगेगा तो यह केवल एक व्यक्ति या एक पार्टी का मुद्दा नहीं रहता बल्कि यह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरा बन जाता है। जब जनता के सामने बार-बार यह नैरेटिव बनाया जाता है कि ‘अगर फैसला हमारे पक्ष में नहीं आया, तो सिस्टम ही गलत है’ तो यह न्याय व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करता है।

यह रास्ता खतरनाक है। क्योंकि यह धीरे-धीरे यह एक प्रवृत्ति बन जाती है। अगर हर हार के बाद न्यायपालिका पर ही सवाल उठाए जाएँगे तो आम जनता का भरोसा किस पर रहेगा? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है लेकिन संस्थाओं की गरिमा को गिराकर राजनीति करना पूरे सिस्टम को कमजोर करता है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि आरोपों की राजनीति ने केजरीवाल को सत्ता तक पहुँचाया था लेकिन वही राजनीति अब उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती सकती है। क्योंकि जब वही तरीका अदालत में अपनाया जाता है, तो वह न केवल असफल होता है बल्कि उल्टा नुकसान भी पहुँचाता है।

केजरीवाल ने एक चतुर राजनेता की तरह दाँव चला और अपनी कुटिल बुद्धि से टुच्ची राजनीति को कोर्ट तक खींच लिया। हालाँकि, जस्टिस शर्मा केजरीवाल के खिलाफ तनकर खड़ी हो गईं और उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त कर दिया।

जिस Gen-Z पर फिदा था भारत का विपक्ष, महीने भर में उनका अपने ‘हीरो’ से होने लगा मोहभंग: नेपाल में फूटने लगा क्रांति का बुलबुला

जिस Gen-z की आँधी पर सवार होकर बालेन शाह ने नेपाल की सत्ता तक की चढ़ाई पूरी की। उसका एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है और नेपाल में असंतोष देखा जा रहा है। चाहे ‘भंसार नीति‘ हो या ‘स्वास्थ्य नीति’ जनता विरोध कर रही है। यहाँ तक कि छात्र राजनीति पर रोक लगाने के खिलाफ छात्र एकजुट हो रहे हैं। रहा सहा कसर गृहमंत्री पर लगे मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप ने पूरा कर दिया, क्योंकि Gen-z के आंदोलन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार के खिलाफ हुई थी।

बालेन शाह का उदय भले ही एक ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ और युवा नेतृत्व की जीत के रूप में देखा गया हो, लेकिन नेपाल की वास्तविक राजनीतिक व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक तरह से कहा जा सकता है कि एक महीने में ही बालेन शाह रूपी ‘गुब्बारा’ फूट गया है।

दरअसल बालेन शाह को लेकर जिस ‘जेनरेशनल शिफ्ट’ की बात की जा रही थी, वह अभी अधूरी नजर आ रही है। यह सही है कि उन्होंने पारंपरिक दलों से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई और युवाओं के बीच खासा समर्थन हासिल किया, लेकिन उनकी राजनीतिक टीम और निर्णय प्रक्रिया में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी काफी कम है यानी प्रतिनिधित्व के स्तर पर वही पुरानी व्यवस्था कायम है।

Gen-z का आंदोलन और सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह

Gen-z आंदोलन के बाद 2025 में नेपाल में तख्ता पलट गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उस वक्त भी Gen-z बालेन शाह को ही अपना नेता मान रहे थे। बालेन शाह के समर्थन से ही सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। चुनाव हुए और बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने प्रचंड बहुमत पाया। 27 मार्च 2026 को बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। लेकिन Gen-z की उम्मीदों पर क्या खड़े नहीं उतर पा रहे बालेन शाह? आखिर क्यों कुछ महीने बाद ही नेपाल की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।

भारत-नेपाल के बीच बेटी-रोटी का संबंध रहा है। भारत- नेपाल सीमा से हर दिन हजारों लोग आवाजाही करते हैं और दिनचर्चा की वस्तुएँ खरीदते हैं। बालेन सरकार ने इसे हतोत्साहित करने के लिए 100 रुपए से ज्यादा कीमत के सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दिया है। इससे सामान उन्हें खरीद कर नेपाल ले जाना काफी महँगा पड़ रहा है। पहले सीमा पर कड़ा पहरा नहीं था और बॉर्डर क्रॉस करने के लिए पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसके विरोध में सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता सड़कों पर उतर आई है।

लेकिन, बालेन शाह के निर्देश के बाद स्थितियाँ काफी बदल गई हैं। सीमा पार कर हर दिन सामानों की आवाजाही होती थी, उसमें कमी आ गई है। ऐसे में नेपाल को सामानों की कमी हो रही है। इससे महँगाई बढ़ने की आशंका है। सरकार भले ही टैक्स लगाकर पैसे कमा ले, लेकिन जनता बेहाल है। यही वजह है कि वहाँ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

कई राजनीतिक संगठनों ने भी बालेन शाह की नीति का विरोध किया है। इनका कहना है कि पारंपरिक रिश्तों को कमजोर करने की कोशिश बालेन सरकार ने की है। यह नीतिगत फैसला बालेन सरकार को भारी पड़ सकता है।

भ्रष्टाचार के आरोप में गृहमंत्री गुरुंग फँसे

जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ जेन जी ने विद्रोह किया था। केपी ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था। उस भ्रष्टाचार का दीमक एक महीने में ही बालेन सरकार को लग गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के कैबिनेट के अहम सदस्य गृहमंत्री सुदन गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में फँस गए हैं। उन पर इस्तीफा देने का राजनीतिक दबाव बन रहा है।

सुदन पर विवादित बिजनेसमैन दीपक भट्ट की कंपनियों के शेयर खरीदने के आरोप हैं। ऐसे में सबकी नजर बालेन शाह पर टिकी हुई है। आखिर भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री अब क्या कदम उठाते हैं।

नेपाली कॉन्ग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने गृहमंत्री के खिलाफ स्वतंत्र जाँच की माँग की है। सिविल सोसायटी भी चाहती है कि जब तक जाँच हो, तब तक गृहमंत्री को पद से हट जाना चाहिए, क्योंकि इससे जाँच प्रभावित हो सकता है। जेन जी रेड फोर्स ने नैतिक आधार पर इस्तीफे की माँग करते हुए कहा है कि अगर गृहमंत्री गुरुंग अपने पद पर बने रहते हैं तो इससे जनता का विश्वास नई सरकार में कमजोर होगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नीति पर विवाद

नेपाल में स्वास्थ्य क्षेत्र का राजनीतिकरण और भ्रष्टाचार के साथ साथ स्वास्थ्य बीमा का खस्ता हालत से लोग त्रस्त हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण से हाई क्वालिटी की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए काफी खर्च करना पड़ता है। वहीं सरकारी अस्पतालों की हालत बुरी है। बुनियादी ढाँचा भी चरमरा गया है जिससे आम जनता का ठीक से इलाज करना दूभर हो गया है।

स्वास्थ्य संस्थानों में कर्मचारी संगठनों का बोलबाला है। इससे प्रबंधन और सेवाओं पर असर पड़ रहा है। जनता चाहती है कि हर हाल में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत में सुधार हो, लेकिन सरकार इसे सुधारने के बजाए निजीकरण करने पर जोर दे रही है, जिससे आम जनता में असंतोष फैल रहा है।

छात्र राजनीति पर प्रतिबंध का पड़ रहा असर

जिस जेन जी के दम पर सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह, उन्होंने अपने 100 दिनों के एक्शन प्लान में सबसे पहले छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया। बालेन शाह ने साफ कहा कि शिक्षण संस्थान अब राजनीति के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान का केन्द्र होंगे यानी अब तक ‘राजनीति’ हो रही थी, वह गलत था।

छात्रों को दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर स्टूडेंट काउंसिल बना कर अपनी समस्याओं को रखने का मौका उन्होंने दिया। ‘स्टुडेंट काउंसिल’ या ‘वॉइस ऑफ स्टूडेंट’ जैसे गैर राजनीतिक संगठन विकसित किए जाने की बात उन्होंने कही। छात्रों को अपनी समस्या के समाधान के लिए सरकार की छात्रों के लिए बनाए गए संगठन में जाने का विकल्प दिया है। छात्रों के अंदर इसको लेकर भी असंतोष पैदा हो रहा है।

दरअसल नेपाल में बालेन शाह का चुनाव दक्षिण एशियाई राजनीति में एक बदलाव को दर्शाता है। Gen-Z की जबरदस्त भागीदारी से बनी सरकार से लोगों को स्वच्छ शासन, प्रशासनिक दक्षता और पारंपरिक राजनीतिक ढाँचों से पूरी तरह अलग व्यवस्था बनाने की उम्मीद थी। उन्होंने योग्यता, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे नारे बुलंद किए थे। पुरानी व्यवस्था की जगह एक जवाबदेह सिस्टम बनाने का विश्वास दिलाया था।

लेकिन एक महीने में ही जनता का विश्वास हिलने लगा है। Gen-Z आंदोलन की दीर्घकालिक सफलता केवल नेतृत्व पर ही नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर भागीदारी पर भी निर्भर करती है। देश के नागरिक लोकतंत्र में केवल वोट ही नहीं देते बल्कि सरकार के कामकाज पर अपना फैसला भी वोट के माध्यम से बताते हैं।

नेपाल का सिस्टम अभी भी नहीं बदला है। नौकरशाही पुरानी है और कामकाज का तरीका भी उनका पुराना ही है। इसमें बदलाव जरूरी है। शासन केवल लोकप्रियता या अच्छे इरादों से ही नहीं चलता, यह उन संस्थागत ढाँचों को बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है, जो समाज में गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुकी हैं।

बालेन शाह की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। अगर प्रचंड जनादेश के बाद भी नेपाल की स्थिति नहीं बदलती है तो इसका परिणाम लोकतंत्र के लिए भी घातक हो सकता है। अभी तक लोकतंत्रिक बदलाव को जनता आशाभरी नजरों से देख रही है, वह शायद इसकी प्रभावशीलता पर ही सवाल उठाने लगे।

युवाओं का अगर मोहभंग हुआ, तो ये और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। नेपाल ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसक वारदातों और बड़े पैमाने पर खून खराबा झेला है। अगर फिर युवा सड़कों पर उतरे तो लोकतंत्र के लिए ‘काला दिन’ साबित होगा क्योंकि अब लोकतंत्र ही उनके चपेट में आएगा।

भारत में विपक्ष को Gen-z आंदोलन का था इंतजार

भारत की विपक्षी पार्टियों को भी Gen-z आंदोलन काफी पसंद रहा था। राहुल गाँधी से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं ने जेन जी को भड़काना चाहा। उन्होंने पीएम मोदी के आवास तक में घुसने की अपील कर दी थी। सत्ता विरोधी लहर को नेपाल और बांग्लादेश की तरह भारत में आक्रमकता तक पहुँचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

‘संविधान बचाओ’ और ‘लोकतंत्र की रक्षा’ की बात कह जेन जी को अपनी राजनीतिक लड़ाई में शामिल करने की काफी कोशिश विपक्ष ने की, लेकिन सब बेकार हो गया। भारत में जेन जी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन रखते हैं। उन्हें वोट के जरिए अपनी आक्रमकता दर्शाने का मौका संविधान ने दे रखा है। वे इसका इस्तेमाल भी वोटर के तौर पर करते रहे हैं और विपक्ष को पटखनी देते रहे हैं।