दिल्ली के उत्तम नगर में हुए तरुण हत्याकांड को लेकर सोशल मीडिया पर अब एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तेज हो गई है। पहले जहाँ हिंदू लड़के की हत्या मामले में असली पीड़ित मुस्लिम परिवार को दिखाने की गई। वहीं अब ध्यान ज्यादा भटकाने के लिए यह दावा फैलाया जा रहा है कि 4 मार्च को हुए विवाद के बाद मुस्लिम परिवार का 14 साल का लड़का रिजवान भी ‘गायब’ है। उसका कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा है।
इस नैरेटिव को हवा देने में कई तथाकथित सेकुलर और इस्लाम के नाम पर राजनीति और पत्रकारिता करने वाले कई चेहरे खुलकर सामने आ गए हैं। RJ सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा तक ने एक जैसा अभियान चलाते हुए सोशल मीडिया पर सवाल उठाया- “हेलो दिल्ली पुलिस, रिजवान कहाँ है?”
सवाल को उठाने का मकसद साफ है। पढ़ने वाले के मन में यह बैठाना कि उत्तम नगर की घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ने ही अपना बेटा नहीं खोया, बल्कि आरोपित मुस्लिम परिवार का भी एक बच्चा लापता है। पुलिस को टैग करने की रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि आरोपों को गंभीरता का रंग दिया जा सके। आम पाठक को लगे कि जब सीधे पुलिस से सवाल किया जा रहा है तो शायद बात में दम होगा।
इस अभियान में AIMIM से जुड़े नेता वारिस पठान से लेकर कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और इस्लामी कट्टरपंथी शामिल हैं। देख सकते हैं कैसे सबने लगभग एक जैसे शब्दों में ट्वीट कर इस कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
हालाँकि, यह नैरेटिव ज्यादा देर टिक नहीं पाया क्योंकि द्वारका जिले के डीसीपी ने खुद पोस्ट करके इस सवाल का जवाब दिया। उन्होंने बताया कि जिस रिजवान को ‘लापता’ बताया जा रहा है, वह दरअसल इस मामले के मुख्य आरोपितों में से एक है। उसे गिरफ्तार किया जा चुका है और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेश पर ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया गया है। यानी उसके गायब होने की कहानी पूरी तरह झूठी और भ्रामक है।
🚨 **PUBLIC APPEAL | Uttam Nagar Incident** 🚨
Dwarka District Police appeals to all citizens to maintain peace and harmony in view of the Uttam Nagar incident.
Do not trust or forward rumours and unverified information circulating on social media.
दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही पुलिस ने रिजवान के गायब होने के हल्ले पर सच्चाई सामने रखी, वैसे ही यही भीड़ दोबारा नया राग अलापने लगी। सवाल उठाया गया कि आखिर 14 साल के बच्चे को गिरफ्तार करने की जरूरत ही क्या थी।
सोशल मीडिया पर सक्रिय जाकिर अली त्यागी ने भी इसी सुर में लिखा कि परिवार के अनुसार वह ‘मासूम’ अभी 13–14 साल का है और उसे भी नहीं छोड़ा गया। उनके मुताबिक एक अकेले तरुण नाम के युवक की हत्या के आरोप में इतने लोगों- खासकर महिलाओं और बच्चों को घसीटना गलत है।
दिल्ली पुलिस ने Where is Rizwan पूछने वालों को जवाब दे दिया है कि "पुलिस ने उसे तरुण के हत्यारोपियों में शामिल कर उसे भी हत्यारोपी बना जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में पेश कर ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया हैं।"
एक मासूम जिसकी उम्र परिवार के मुताबिक़ अभी महज़ 13 साल के आस पास है, उसे भी नहीं… pic.twitter.com/JjIPRCvCeC
यह तर्क अपने आप में अजीब है। क्या किसी अपराध में शामिल व्यक्ति को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि उसकी उम्र कम है या वह किसी खास परिवार से आता है? अगर पुलिस के पास सबूत हैं कि रिजवान इस हत्या में शामिल था, तो कानून के मुताबिक उसे हिरासत में लिया जाना स्वाभाविक है।
दरअसल समस्या यह है कि कुछ लोग भीड़ हिंसा के उस पैटर्न को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं, जिसे देश कई बार देख चुका है। दिल्ली दंगों में बुर्का पहने महिलाओं की भीड़ द्वारा पुलिस पर हमला करने की घटनाएँ सामने आई थीं। कश्मीर में पत्थरबाजी के दौरान बच्चों को भीड़ का हिस्सा बनाकर आगे किया गया। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि कट्टरपंथी तत्व भीड़ तैयार करते समय उम्र और लिंग की परवाह नहीं करते।
उत्तम नगर की घटना में भी 4 मार्च को होली के दिन हुई हिंसा को लेकर कई चश्मदीद अपने बयान दे चुके हैं। पुलिस की जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की भूमिका खंगाली जा रही है। लेकिन इन सबके बीच ये वर्ग लगातार कोशिश कर रहा है कि असली मुद्दे से ध्यान भटक जाए। इनकी चिंता तरुण की हत्या पर नहीं, उसके परिवार के लिए नहीं, बल्कि आरोपितों के बचाव में है।
आज तरुण की हत्या पर संदेह करना साफ बताता है कि इस सेकुलर जमात के लिए सामने दिख रहा सच कोई महत्व नहीं रखता, इन्हें सिर्फ मजहब देखकर आवाज पीड़ित के लिए आवाज उठानी है। लेकिन ऐसे लोग ध्यान रखें, नैरेटिव कितना भी गढ़ा जाए, लेकिन तथ्य नहीं बदलते।
इस्लामिस्टों की वफादारी दूसरे देशों और नेताओं के लिए एक्सपोर्ट की जाती है। यह वफादारी अक्सर धर्म के आधार पर देशों और नेताओं के लिए बिना किसी शर्म के सपोर्ट और एकजुटता दिखाने के लिए दिखती है। इसके बदले भले ही भारत की विदेश नीति और नेशनल सिक्योरिटी को नुकसान उठाना पड़े।
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की इजरायली हमलों में हत्या पर आँसू बहाने वाले ये लोग अब अपनी इजरायल विरोधी भडास को भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर आक्रमण कर निकाल रहे हैं। हैदराबाद में भारत-इजरायल जॉइंट अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया ड्रोन समेत डिफेंस से जुड़े कई हथियार बनाती है। इस पर ये लोग अब हमलावर हैं।
भारत के खिलाफ नफरत फैलाने के दौरान ये भूल जाते हैं कि वे भारत में रहते हैं और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग उनके अपने देश को बाहरी खतरों से सुरक्षा मुहैया कराती है।
भारतीय इस्लामिस्ट हैदराबाद में अडानी-एलबिट जॉइंट वेंचर की खतरनाक रूप से तोड़-मरोड़कर तस्वीर पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और पोस्ट पटे पड़े हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि भारत किस तरह ईरान के खिलाफ इजरायल को हथियार, खासकर हर्मीस 900 UAV ड्रोन एक्सपोर्ट कर रहा है।
वे इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते झगड़े के बीच भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। बताया जा रहा है कि अडानी-एलबिट जॉइंट वेंचर की हैदराबाद फैक्ट्री में बनने वाली ड्रोन का इस्तेमाल इजरायल हमले में कर रहा है। पहले इसका इस्तेमाल गाजा में हुआ और अब ईरान में हो रहा है।
इस्लामिस्ट पोस्ट लिख रहे हैं और इमोशनल वीडियो बना रहे हैं, जिनमें अक्सर अडानी-एलबिट ज्वाइंट वेंचर की हैदराबाद फैक्ट्री की सही लोकेशन की डिटेल्स होती हैं। ऐसी ही एक पोस्ट में, मुशीर खान नाम के एक व्यक्ति ने दावा किया कि इजरायल पिछले 11 सालों से भारत में ड्रोन और मिसाइल बना रहा है और इन ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल पहले इजराइल के फिलिस्तीन के खिलाफ युद्ध में किया गया था और अब ईरान के खिलाफ किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, “किसी को यह पसंद नहीं आता, जब आपके पड़ोस में किसी दूसरे देश के लिए हथियार बनाने वाली फैक्ट्री हो।”
अनीस अहमद नाम के एक यूजर ने X पर यही वीडियो शेयर किया। उन्होंने लिखा, “अगर पिछले 11 सालों से गौतम अडानी और इजरायल हैदराबाद में ड्रोन-मिसाइल बनाने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं… और उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल गाजा पट्टी में नरसंहार और ईरान के खिलाफ किया जा रहा है… तो सवाल यह है कि एक नाजायज देश के साथ पार्टनरशिप करके दुनिया को क्या मैसेज दिया जा रहा है? असदुद्दीन ओवैसी साहब और राहुल गाँधी जी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? क्या यह सिर्फ एक अफवाह है… या एक बड़ा सच है जिसे दबाया जा रहा है?”
अगर हैदराबाद में पिछले 11 सालों से Gautam Adani और Israel मिलकर ड्रोन-मिसाइल बना रहे हैं… और वही हथियार Gaza Strip में genocide और Iran के खिलाफ इस्तेमाल हो रहे हैं… तो सवाल ये है कि एक illegitimate country के साथ मिलकर दुनिया को क्या मैसेज दिया जा रहा है?
एक आदिल सिद्दीकी ने भी मुशीर खान का वीडियो शेयर करते हुए इस गलत दावे को आगे बढ़ाया कि इजरायल भारत में मिसाइल और ड्रोन बना रहा है, ताकि गाजा और ईरान को निशाना बनाया जा सके।
— Adil siddiqui (azmi) (@adilsiddiqui7) March 9, 2026
कविश अजीज, जो खुद को पत्रकार कहता है और एक घोर कट्टरपंथी है। उसने दावा किया कि इजरायल भारत में हथियार बना रहा है, जिनका इस्तेमाल फिलिस्तीन के बाद ईरान में किया जा रहा है।
अजीज ने 9 मार्च 2026 के पोस्ट में लिखा, “क्या आप जानते हैं??? इज़राइल पिछले 11 सालों से हैदराबाद में मिसाइल और ड्रोन बना रहा है। अडानी डिफेंस ने 2016 में इजरायल के एल्बिट सिस्टम्स के साथ मिलकर हर्मीस 900 ड्रोन बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर बनाया था। ये वो ड्रोन हैं जिनका इस्तेमाल फिलिस्तीन युद्ध में किया गया था और अब ईरान युद्ध में किया जा रहा है। अडानी डिफेंस इजरायली हथियार इंडस्ट्री के साथ मिलकर Tavor TAR-21, X-95 Tavor, नेगेव लाइट मशीन गन, गैलिल ACE असॉल्ट राइफ़ल, गैलिल DMR, और मसाडा पिस्टल जैसे छोटे हथियार भी बनाती है। 2020 में भारतीय सेना के लिए 16,479 Negev NG-7 LMGs के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था।”
Do you know???
Israel has been manufacturing missiles and drones in Hyderabad for the past 11 years.
Adani Defence formed a joint venture with Israel's Elbit Systems in 2016 to manufacture the Hermes 900 drone.
क्या भारत ने फिलिस्तीन और ईरान के खिलाफ इजरायल को अडानी-एलबिट के बनाए ड्रोन और मिसाइल सप्लाई किए? इन इस्लामिस्टों की सोच को समझने से पहले, जो डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग जैसे मामलों को भी इस्लामिक उम्माह के नजरिए से देखते हैं, उनके बारे में कुछ बातें साफ करना जरूरी है।हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी जरूरी नहीं कि मिसाइल ही बनाती हो।
2016 में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और इजरायली डिफेंस मैन्युफैक्चरर एलबिट सिस्टम्स ने भारत में हर्मीस 900 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस अनमैन्ड एरियल व्हीकल बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर, अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड बनाया था। 2018 में अडानी एलबिट JV ने तेलंगाना के हैदराबाद में अपनी पहली मानवरहित UAV मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी खोली। JV द्वारा भारत में बनाए गए हर्मीस 900 के वर्शन को दृष्टि 10 कहा जाता है। हालाँकि भारतीय सेना कंपनी की मुख्य कस्टमर है, लेकिन यह ड्रोन एक्सपोर्ट करने के लिए भी आजाद है।
यह याद रखना चाहिए कि 2024 में, भारतीय इस्लामो-लेफ्टिस्ट ग्रुप इस बात से नाराज था कि भारत ने हैदराबाद अडानी-एलबिट फैसिलिटी में बने 20 हर्मीस 900 ड्रोन इजरायल को सप्लाई किए थे। हालाँकि, ये भारत के पूरे डिफेंस इकोसिस्टम का बहुत छोटा हिस्सा था। अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री मुख्य रूप से भारतीय डिफेंस जरूरतों को पूरा करती है, इजरायल की नहीं।
ये ड्रोन खास तौर पर भारत की सुरक्षा कर रहे हैं, जहाँ ये इस्लामिस्ट रहते हैं। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए संयंत्र बनाया गया है।
भारत को इजरायल के लिए एक बड़े हथियार एक्सपोर्टर के तौर पर दिखाना असलियत से बिल्कुल अलग है। भारत पहले फिलिस्तीन और अब ईरान के खिलाफ इजरायल को हथियार दे रहा है, ये कहना बिलकुल गलत है। भारत इजरायल से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है, जो इजरायल के कुल डिफेंस एक्सपोर्ट का 34% है। इजरायल ने हाल के सालों में भारत को बराक-8 मिसाइलें और हेरॉन ड्रोन सप्लाई किए हैं।
गाजा युद्ध के वक्त भारत ने साफ तौर पर कहा था कि वह गाजा में इस्तेमाल के लिए इजराइल को हथियार या गोला-बारूद सप्लाई नहीं करेगा। सभी एक्सपोर्ट एक एंड-यूजर एग्रीमेंट के तहत होंगे। अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने पहले ही तय कर दिया था कि हर्मीस 900 ड्रोन निगरानी और टोही मिशन के लिए बनाए गए थे और इन्हें हमले के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
ईरान-इजरायल युद्ध पर वापस आते हैं, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भारत ने ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए इजरायल को हर्मीस 900 ड्रोन या कोई भी ‘मिसाइल’ एक्सपोर्ट की है। यह पूरा दावा कि हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ईरान के खिलाफ इजरायल के युद्ध के लिए ड्रोन बना रही है, पूरी तरह से एक प्रोपेगैंडा है और देश को जनता को गुमराह करने वाला है।
हर्मीस 900 एक इजरायली ड्रोन है, और इजरायली डिफेंस फोर्स पहले से ही बड़ी संख्या में हर्मीस 900 ड्रोन और उनके पुराने वर्जन हर्मीस 450 ड्रोन का इस्तेमाल करती हैं। हर्मीस असल में दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले मिलिट्री ड्रोन में से एक है। कई देशों ने इसे अपनी फोर्स के लिए खरीदा है। सिर्फ इसलिए कि हैदराबाद अडानी-एलबिट फैसिलिटी हर्मीस 900 ड्रोन बनाती है, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ईरान में लड़ाई में इस्तेमाल के लिए इन ड्रोन को इजरायल को एक्सपोर्ट कर रहा है।
कट्टरपंथी सोच वाले मुशीर खान ने ईरान के खिलाफ अपने हमले में इजरायल द्वारा हर्मीस 900 सर्विलांस ड्रोन का इस्तेमाल करने के बारे में अपने सवाल पर ChatGPT के जवाब पर भरोसा किया। लेकिन, चैटबॉट में कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि ईरान विरोधी ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन भारत में बने हैं। यह साफ है कि इजरायल लोकल बने हर्मीस 900 UAVs का इस्तेमाल कर रहा है। फिर भी मुशीर खान और दूसरे इस्लामी कट्टरपंथी झूठी और डरावनी स्टोरी बनाकर सोशल मीडिया पर फैला रहे हैं, ये पूरी तरह गैरजिम्मेदाराना रवैया है। इसमें साजिश की बू आती है क्योंकि इस दौरान बड़ी चालाकी से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
भारत की सोच संतुलित रहा है, चाहे वह इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध हो या ईरान और इजरायल-US के बीच चल रहा युद्ध। मोदी सरकार ने इजरायल के साथ डिफेंस टेक पार्टनरशिप के जरिए, ईरान के साथ एनर्जी और लॉजिस्टिक्स संबंधों के जरिए, और अरब देशों के साथ बड़े आर्थिक संबंधों के जरिए संबंधों को संतुलित बना कर रखा है। भारत अकेला ऐसा देश है, जिसके उन देशों के साथ अच्छे संबंध हैं जिनके साथ पुरानी दुश्मनी है या जो युद्ध में हैं, चाहे वह रूस-यूक्रेन हो, इजरायल-फिलिस्तीन हो, थाईलैंड-कंबोडिया हो, और इजरायल-ईरान हो या ईरान-गल्फ देश हों।
हालाँकि हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफ़ेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी की लोकेशन सीक्रेट नहीं है, लेकिन मैप इमेज को हाईलाइट करना, हमला करने के लिए उकसाने जैसा है।
भारत और इजरायल के बीच अडानी-एलबिट डिफ़ेंस मैन्युफ़ैक्चरिंग जॉइंट वेंचर को ईरान के साथ किसी तरह का ‘धोखा’ बताना बेबुनियाद, बेईमानी भरा और असल में भारतीय इस्लामिस्टों द्वारा भारत के साथ धोखा है। भारतीय इस्लामिस्ट जो प्रोपेगैंडा चला रहे हैं, वह एक कुत्ते के भोंकने जैसा है, जिसे कम IQ वाली सांप्रदायिक नफरत भड़काने, हैदराबाद में अडानी-एलबिट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी को टारगेट बनाने, भारत के अपने डिफेंस सेक्टर को नुकसान पहुँचाने और भारत के खिलाफ देश और दुनिया भर में गुस्सा भड़काने के लिए बनाया गया है।
इस्लामिस्ट भूल जाते हैं कि वे एक सुरक्षित और मजबूत भारत में रह रहे हैं, न कि युद्ध से जूझ रहे गाजा या ईरान में। किसी देश में बने हथियार न सिर्फ उस देश को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि वे जरूरी मिलिट्री लेवरेज और स्ट्रेटेजिक रिलेशन भी खरीदते हैं, जिससे वह देश लड़ाई और डिप्लोमेसी में मजबूत बनता है। भारत में कोई भी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट, जो भारतीय मिलिट्री को सप्लाई करता है और दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करता है, वह एक जरूरी पिलर है, जो भारत को दुनिया में सुरक्षित और मजबूत बनाए रखता है।
ये इस्लामिस्ट युद्ध में झुलस रहे गाजा और ईरान से दूर भारत में सुरक्षित हैं। ये एक मजबूत और स्थिर भारत में रह रहे है, जिसके अच्छे डिप्लोमैटिक और स्ट्रेटेजिक रिलेशन हैं। इसके बदौलत यहाँ शांति है।
भारत की विदेश और रक्षा नीति उन लोगों की भावनाओं या ‘धार्मिक’ भावनाओं से तय नहीं होती और न ही होनी चाहिए, जो विदेशी नेताओं और देशों को अपने देश और उसके हितों से ज्यादा अहमियत देते हैं।
हैदराबाद में चल रहे भारत-इजरायल जॉइंट वेंचर के खिलाफ भारतीय इस्लामी कैंपेन उस प्रोपेगैंडा कैंपेन जैसा है जो पाकिस्तानी जिहादी फरवरी 2026 के आखिर में ईरान और इजरायल+अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से कर रहे हैं। पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा सोशल मीडिया अकाउंट्स ने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस जयशंकर और भारतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी के वीडियो बनाए और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए, जिसमें वे ‘मान रहे’ थे कि भारत ने ईरान के खिलाफ इजराइल की मदद की।
इन झूठे बयानों को ईरान के खिलाफ भारत का ‘खुला धोखा’ बताया, ताकि भारत के खिलाफ दुनिया भर में नफरत फैलाई जा सके। ये लोग यह साबित करने में लगे हैं कि भारत ने ईरान को धोखा दिया। इसके लिए झूठ प्रपंच और प्रोपेगेंडा सबकुछ फैला रहे हैं। यह तब भी फैलाई जा रही है, जब भारत ने कम से कम तीन ईरानी नौसैनिक जहाजों को पनाह देने की पेशकश की, और ईरान ने नई दिल्ली को धन्यवाद भी दिया।
भारतीय इस्लामिस्ट भारत से नफरत करने वाले पाकिस्तानी जिहादियों से अलग नहीं हैं। उनका बर्ताव असल में ईरान और फिलिस्तीन के साथ ‘इस्लामिक उम्मा सॉलिडैरिटी’, मोदी-विरोधी झुकाव, दंगा भड़काने की मंशा रखने वाले हैं, वे अपने देश के हितों को भूल जाते हैं। इस्लामिस्टों को पक्का पता है कि मोदी सरकार को ‘प्रो-इजरायल’ दिखाने से वे अपने आप ‘एंटी-मुस्लिम’ लगेंगे। चल रहे प्रोपेगैंडा का असली मकसद सिर्फ भारत की डिफस मैन्युफैक्चरिंग के खिलाफ नफरत पैदा करने तक ही सीमित नहीं लगता, बल्कि देश में अशांति फैलाना भी इसका मकसद है।
यह देखा गया कि कैसे, इजरायली हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के मारे जाने की खबरें आने के बाद, लखनऊ, जम्मू और कश्मीर, कारगिल और दूसरे इलाकों में शिया मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई लोगों ने तो युद्ध से जूझ रहे ईरान जाकर खामेनेई के लिए इजरायल और अमेरिका से लड़ने की इच्छा भी जताई। इनमें से ज्यादातर ने बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की कभी निंदा नहीं की। भारत की आधिकारिक विदेश नीति के खिलाफ जाकर भी विदेशी नेताओं और देशों को इस तरह का धर्म के आधार पर सपोर्ट करना खतरनाक और देशद्रोह जैसा है।
हालाँकि बातें अलग-अलग है। लेकिन, 2022 में नूपुर शर्मा के ‘ईशनिंदा’ वाले मामले में भी ऐसी ही कोहराम मचाया गया था। इन्हीं इस्लामिस्ट लोगों ने कुरान की एक बात कोट करने पर BJP की पूर्व प्रवक्ता के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग की थी। कुछ ही समय में देश भर में दंगाई कट्टरपंथी भीड़ ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। ये गुस्सा खाड़ी देशों तक फैल गया। ऐसा लगता है कि नूपुर शर्मा वाले मामले की तरह ही कट्टरपंथी अब अडानी-एलबिट जॉइंट डिफेंस वेंचर के पीछे पड़ गए हैं और हैदराबाद फैक्ट्री के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग कर रहे हैं।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधि महाविहार, जो दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल है, एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में है। वर्तमान में चर्चा इस बात पर गर्म है कि इस मंदिर का पूरा प्रबंधन बौद्ध समुदाय को सौंप दिया जाना चाहिए। इस आंदोलन को तब और मजबूती मिली जब भंते धम्मशिखर ने ‘बोधगया मंदिर अधिनियम 1949’ को एक ‘काला कानून’ करार दिया और इसे तुरंत बदलने की माँग की। उनका तर्क है कि यह कानून बौद्धों के धार्मिक अधिकारों पर एक पाबंदी की तरह है क्योंकि यह एक शुद्ध बौद्ध स्थल के प्रबंधन में गैर-बौद्धों की भागीदारी को अनिवार्य बनाता है।
रामदास आठवले का समर्थन
इस विवाद में केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के बयान ने घी का काम किया है। उन्होंने अपनी एक विस्तृत पोस्ट में लिखा, “अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण भारत के करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा विषय था। जब यह सपना साकार हुआ, तब पूरे देश ने उसका स्वागत किया। अलग-अलग विचारधाराओं और धर्मों के लोगों ने भी इसे सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार किया, क्योंकि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था और पहचान से जुड़ा प्रश्न था। यह भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और धार्मिक सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक भी बना।”
राम मंदिर बनने का सबने किया स्वागत, अब महाबोधि महाविहार बौद्धों को सौंपने का भी होना चाहिए स्वागत
अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण भारत के करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा विषय था। जब यह सपना साकार हुआ, तब पूरे देश ने उसका स्वागत किया। अलग-अलग विचारधाराओं…
आठवले ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “उसी प्रकार बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार पूरी दुनिया के बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल है। यहीं भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई और यहीं से शांति, करुणा और समता का संदेश पूरी दुनिया में फैला। इसलिए यह स्वाभाविक है कि इस पवित्र स्थल के प्रबंधन में बौद्ध समाज की निर्णायक भूमिका हो। यदि राम मंदिर के निर्माण को हिंदू समाज की आस्था के सम्मान के रूप में स्वीकार किया गया, तो महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्धों के हाथों में देने की माँग भी उसी सम्मान और समानता की भावना से देखी जानी चाहिए।”
रामदास अठावले ने संवैधानिक पहलुओं पर जोर देते हुए आगे लिखा, “इस विषय का एक महत्वपूर्ण पहलू संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा है। भारत का संविधान अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के तहत प्रत्येक धर्म को अपनी आस्था का पालन करने और अपने धार्मिक संस्थानों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का संचालन और संस्थाओं का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब महाबोधि महाविहार बौद्ध धर्म का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है, तो उसके प्रबंधन में बौद्ध समाज को पूर्ण अधिकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।”
रामदास आठवले ने अपनी माँग को स्पष्ट करते हुए अंत में लिखा, “वर्तमान में बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 के तहत महाबोधि महाविहार के संचालन के लिए एक प्रबंधन समिति बनाई गई है, जिसमें हिंदू और बौद्ध दोनों समुदायों की भागीदारी का प्रावधान है और जिला अधिकारी (DM) को अध्यक्ष बनाया जाता है। समय के साथ यह बहस तेज हुई है कि दुनिया के सबसे पवित्र बौद्ध स्थल के प्रबंधन में बौद्धों की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। जब अन्य धर्मों के प्रमुख धार्मिक स्थलों का संचालन उनके अपने समुदायों के हाथों में होता है जैसे सिखों के लिए गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी या मुसलमानों के लिए वक्फ बोर्ड तो महाबोधि महाविहार के मामले में भी समान सिद्धांत लागू होने चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस मुद्दे को किसी विवाद या टकराव के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और धार्मिक सम्मान के दृष्टिकोण से देखा जाए। जिस प्रकार देश ने राम मंदिर के निर्माण को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया, उसी प्रकार यदि महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्ध समाज को सौंपा जाता है, तो उसका भी स्वागत होना चाहिए। यह कदम न केवल बौद्ध समाज के विश्वास को मजबूत करेगा, बल्कि भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और समावेशी लोकतांत्रिक परंपरा को भी और सशक्त बनाएगा। भारत की असली ताकत उसकी विविधता और परस्पर सम्मान में है। जब हम एक-दूसरे की आस्था और अधिकारों का सम्मान करते हैं, तभी संविधान की भावना मजबूत होती है। इसलिए महाबोधि महाविहार के प्रश्न का समाधान भी उसी संवैधानिक भावना समान अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर होना चाहिए।”
सोशल मीडिया पर क्यों हो रहा है कड़ा विरोध?
रामदास आठवले की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर एक नई जंग छिड़ गई है। कई हिंदू संगठनों और स्थानीय बिहारियों ने इस माँग का पुरजोर विरोध किया है। शुभम शर्मा नाम के एक यूजर ने आठवले की पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए लिखा कि उन्होंने बिहार चुनाव कवरेज के दौरान महाबोधि मंदिर का दौरा किया था और वहाँ पाया कि कुछ लोग मुख्य मंदिर से भगवान शिव, विष्णु और गणपति की मूर्तियों को हटाने के लिए लड़ रहे हैं। शुभम के अनुसार, हिंदू समाज किसी भी कीमत पर इस तरह के प्रचार को स्वीकार नहीं करेगा, खासकर तब जब यह एनडीए सरकार के एक केंद्रीय मंत्री की ओर से आ रहा हो।
I visited Mahabodhi Temple during the Bihar election coverage. They are fighting to remove the idols of Bhagwan Shiva, Vishnu ji, and Ganpati ji from the main temple.
At any cost, Hindus will not accept such propaganda, especially when it comes from a Union Minister of the NDA. https://t.co/BY68Dcv0VZ
विवाद का एक और पहलू क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा है। ‘द बिहार इंडेक्स’ नामक हैंडल ने लिखा कि बोधगया महाराष्ट्र नहीं है और बिहार में बौद्ध और हिंदू धर्म का बराबर सम्मान किया जाता है। उन्होंने आठवले पर बँटवारे की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब तक मराठी नव-बौद्ध बोधगया नहीं आए थे, तब तक यह कोई मुद्दा ही नहीं था।
यह महाराष्ट्र नहीं है, हम बिहारी बौद्ध और हिंदू धर्म का बराबर सम्मान करते हैं।
आप अपने राज्य में बंटवारे की राजनीति करते रहिए, जब तक मराठी बोधगया नहीं आए, तब तक यह कोई मुद्दा नहीं था।
अब बिहार की विरासत पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
इसी तरह सत्यम वत्स ने चेतावनी देते हुए लिखा कि महाबोधि मंदिर बिहार की संपत्ति है और यह बिहार के लोगों के संरक्षण में फला-फूला है। उन्होंने नव-बौद्धों और ‘भीमटों’ को किसी भी दुस्साहस के खिलाफ कड़े लहजे में चेतावनी दी। सोशल मीडिया पर लोग 1903 की पुरानी तस्वीरें भी साझा कर रहे हैं, जिनमें नागा साधुओं को मंदिर परिसर में ध्यान करते हुए दिखाया गया है। लोगों का तर्क है कि हिंदू और बौद्ध सदियों से यहाँ शांति से रहे हैं, लेकिन अब इसे कब्जाने की कोशिश की जा रही है।
Mahabodhi Temple belongs to Bihar and it has flourished under the patronage of the people of Bihar. Neo-Buddhists and Bhimtas will be dealt with proper belt treatment in case of any misadventure.
महाबोधि महाविहार का इतिहास बेहद प्राचीन और गहरा है। इसका निर्माण मूल रूप से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था। यह वही स्थान है जहाँ भगवान गौतम बुद्ध को निरंजना नदी के पास एक पीपल के पेड़ (बोधि वृक्ष) के नीचे कठिन तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ था। बाद के वर्षों में, पाल राजाओं के समय में भी यह बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र बना रहा। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी 7वीं शताब्दी में यहाँ की यात्रा की थी और इसकी महिमा का वर्णन किया था। हालाँकि, 13वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के हमले के बाद यहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होने लगा था।
ऐतिहासिक रूप से यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान मंदिर की ईंटों वाली संरचना और इसका पिरामिड जैसा शिखर गुप्त काल (5वीं-6वीं शताब्दी) के दौरान विकसित किया गया था। गुप्त शासक स्वयं हिंदू परंपराओं के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने बौद्ध स्थलों का जीर्णोद्धार और समर्थन किया। यह मंदिर परिसर केवल एक इमारत नहीं है, बल्कि इसमें सात पवित्र स्थल हैं जो बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद के सात हफ्तों के ध्यान की याद दिलाते हैं। 1590 में एक हिंदू भिक्षु ने यहाँ मठ की स्थापना की थी और लंबे समय तक इस मंदिर का नियंत्रण हिंदुओं के पास रहा, जिसने आज के इस प्रबंधन विवाद की नींव रखी।
क्या है 1949 का मंदिर अधिनियम?
आजादी के बाद, मंदिर के प्रबंधन को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए सरकार ‘बोधगया मंदिर अधिनियम 1949‘ लेकर आई। इस कानून का उद्देश्य मंदिर का प्रशासन सुचारू रूप से चलाना और इसका संरक्षण सुनिश्चित करना था। इस अधिनियम के तहत एक प्रबंधन समिति बनाई गई जिसमें साझा प्रबंधन का प्रावधान रखा गया। इस कानून के अनुसार, समिति में कुल 9 सदस्य होते हैं, जिनमें 4 हिंदू और 4 बौद्ध सदस्य होते हैं।
गया के जिलाधिकारी (DM) इस समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं। कानून की एक दिलचस्प बात यह है कि यदि जिलाधिकारी हिंदू नहीं है, तो सरकार को एक हिंदू व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करना होता है। बौद्ध समुदाय इसी ढांचे का विरोध कर रहा है और इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप मानता है।
अदालत ने इस माँग पर क्या कहा था?
इस विवाद को लेकर अदालती लड़ाई भी काफी पुरानी है। 30 जून 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें 1949 के अधिनियम को चुनौती देते हुए मंदिर का पूरा प्रबंधन बौद्धों को सौंपने की माँग की गई थी। यह याचिका अधिवक्ता सुलेखा कुंभारे द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने दलील दी कि साझा प्रबंधन से बौद्धों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया।
जस्टिस की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि वे अनुच्छेद 32 के तहत इस पर सीधे सुनवाई करने के इच्छुक नहीं हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी कि वे अपनी माँग लेकर पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएँ। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि मंदिर के दशकों पुराने प्रबंधन ढांचे को बदलना इतना आसान नहीं है और इसके लिए विस्तृत कानूनी और ऐतिहासिक साक्ष्यों की आवश्यकता होगी।
मामला क्या है?
यह पूरा विवाद आस्था, इतिहास और कानूनी अधिकारों के बीच उलझा हुआ है। एक तरफ बौद्ध समुदाय है, जो इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमा का विषय मानता है और चाहता है कि उनका सबसे पवित्र स्थल केवल उन्हीं के द्वारा प्रबंधित हो। दूसरी तरफ हिंदू पक्ष और स्थानीय बिहारियों का तर्क है कि बुद्ध उनके लिए भी पूजनीय हैं और सदियों से हिंदू राजाओं और संन्यासियों ने इस मंदिर की रक्षा और सेवा की है। 1949 का कानून इन दोनों पक्षों के बीच एक पुल की तरह बनाया गया था, लेकिन अब इस पुल को हटाकर अधिकार की नई रेखा खींचने की माँग हो रही है। सोशल मीडिया पर चल रहा विरोध इस बात का संकेत है कि यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि समुदायों की गहरी पहचान से भी जुड़ गया है।
फारस की खाड़ी के नीले पानी के बीच बसा एक छोटा सा कोरल (मूंगा) द्वीप, जिसकी लंबाई महज कुछ किलोमीटर है, आज दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति और सबसे जिद्दी शासन के बीच युद्ध का केंद्र बन गया है। यह कहानी है ‘खार्ग द्वीप’ की। इसे आप ईरान की ‘तिजोरी’ कह सकते हैं या उसकी रगों में दौड़ता ‘खून’, क्योंकि ईरान जितना भी कच्चा तेल दुनिया को बेचता है, उसका 90 प्रतिशत हिस्सा इसी नन्हे से द्वीप से होकर गुजरता है।
आज जब अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का युद्ध दूसरे सप्ताह में है, तब ट्रंप प्रशासन की मेज पर जो सबसे बड़ा नक्शा खुला है, वह खार्ग द्वीप का ही है। लेकिन इस द्वीप पर एक भी मिसाइल दागने का मतलब है- पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग लग जाना। यही वजह है कि खार्ग द्वीप फिलहाल इस महायुद्ध का वह ‘नो-गो जोन’ बना हुआ है, जहाँ हमला करना जीत की गारंटी तो है, लेकिन विनाश का आमंत्रण भी।
ईरान की इकोनॉमी का ‘कंट्रोल रूम’: क्यों खार्ग ही है असली निशाना?
खार्ग द्वीप ईरान के बुशहर प्रांत के तट से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे एक प्राकृतिक किला बनाती है। ईरान के बड़े तेल क्षेत्रों जैसे अहवाज, मारून और गचसरन से पाइपलाइनों के जरिए कच्चा तेल इसी द्वीप तक लाया जाता है। यहाँ विशालकाय स्टोरेज टैंक हैं जिनकी क्षमता लगभग 3 करोड़ बैरल तेल जमा करने की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस द्वीप के टर्मिनल को नष्ट कर दिया जाए, तो ईरान की तेल निर्यात क्षमता रातों-रात शून्य हो जाएगी। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के पास आने वाला पैसा रुक जाएगा और ईरान का पूरा सरकारी ढाँचा चरमरा सकता है।
पेंटागन के पूर्व सलाहकार माइकल रुबिन जैसे रणनीतिकारों का मानना है कि खार्ग पर हमला करना ईरान के शासन के पैर काटने जैसा होगा। 2024 में भारी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने तेल बेचकर 78 अरब डॉलर कमाए हैं, और इस कमाई का रास्ता खार्ग से ही निकलता है।
हाल के दिनों में ईरान ने यहाँ से तेल का निर्यात बढ़ाकर 40 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुँचा दिया है, जो एक रिकॉर्ड है। यह इस बात का सबूत है कि ईरान युद्ध के लिए अपनी तिजोरी भरने में जुटा है। खार्ग द्वीप सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि वह वित्तीय इंजन है जो ईरान की मिसाइलों और ड्रोन प्रोग्राम को पैसा मुहैया कराता है।
युद्ध के रणनीतिकारों के लिए खार्ग द्वीप ईरान की सबसे कमजोर और सबसे महत्वपूर्ण नस (Achilles’ Heel) है। अगर वाशिंगटन या इजरायल ईरान के सैन्य साजो-सामान के वित्तपोषण को रोकना चाहते हैं, तो खार्ग को पंगु बनाना ही एकमात्र रास्ता बचता है। यही कारण है कि इजरायली विपक्षी नेता यायर लैपिड जैसे लोग खुलेआम कह रहे हैं कि ‘खार्ग को नष्ट करो और ईरान के शासन को गिरते हुए देखो।’
इतिहास की गवाही: क्यों हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने खार्ग से बनाए रखी दूरी?
खार्ग द्वीप का महत्व आज का नहीं है, बल्कि दशकों से यह अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए एक पहेली बना रहा है। 1979 के ईरानी बंधक संकट के दौरान, तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर को सलाह दी गई थी कि खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लिया जाए ताकि तेहरान घुटनों पर आ जाए।
लेकिन कार्टर ने अंततः पीछे हटने का फैसला किया क्योंकि उन्हें डर था कि इससे खाड़ी क्षेत्र में कभी न खत्म होने वाली आग लग जाएगी। 1980 के दशक में जब रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति थे और ईरान ने ‘होर्मुज स्ट्रेट’ में बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं, तब भी अमेरिका ने ईरान के कई ठिकानों पर हमला किया, लेकिन खार्ग द्वीप को हाथ नहीं लगाया।
ईरान-इराक युद्ध के दौरान सद्दाम हुसैन की इराकी सेना ने खार्ग पर भीषण हमले किए थे। तेल टर्मिनलों को काफी नुकसान भी पहुँचा था, लेकिन ईरान की इंजीनियरिंग और मरम्मत की गति इतनी तेज थी कि उन्होंने कुछ ही दिनों में परिचालन फिर से बहाल कर दिया।
यह दिखाता है कि ईरान ने इस द्वीप को बचाने के लिए कितनी तैयारी कर रखी है। आज भी, जबकि इजराइल ने तेहरान और अल्बोर्ज के ईंधन डिपो को उड़ा दिया है, खार्ग द्वीप अभी तक अछूता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन जानता है कि खार्ग पर हमला करना ‘मधुमक्खी के छत्ते’ में हाथ डालने जैसा है।
अगर खार्ग पर मिसाइलें गिरती हैं, तो ईरान के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचेगा। ऐसी स्थिति में वह सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी देशों के तेल बुनियादी ढांचे पर आत्मघाती हमले शुरू कर सकता है। यही वह डर है जो ट्रंप प्रशासन को सीधे हमले से रोक रहा है। खार्ग का इतिहास बताता है कि यह वह इलाका है जिसे दुश्मन डराने के लिए इस्तेमाल तो करता है, लेकिन इसे नष्ट करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता।
ट्रंप का दुविधापूर्ण फैसला: घरेलू राजनीति बनाम वैश्विक रणनीति
डोनाल्ड ट्रंप के लिए खार्ग द्वीप पर फैसला लेना ‘आग से खेलने’ जैसा है। एक तरफ उनकी ‘मैक्सिमम प्रेशर’ की नीति है, जिसके तहत वे ईरान को आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद करना चाहते हैं। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के अधिकारी इस द्वीप पर कब्जा करने या यहाँ कमांडो रेड (Special Forces Operation) मारने जैसे विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं। ट्रंप का तर्क है कि अगर तेल का पैसा नहीं होगा, तो ईरान युद्ध नहीं लड़ पाएगा। लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका की घरेलू राजनीति और महँगाई का मुद्दा है।
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव (Mid-term Elections) करीब हैं। अगर खार्ग द्वीप पर हमला होता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। ‘सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज’ का अनुमान है कि तेल की कीमतों में तत्काल 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हो जाएगी। ट्रंप जानते हैं कि अमेरिका में ईंधन की बढ़ती कीमतें उनकी लोकप्रियता को मिट्टी में मिला सकती हैं। वे एक तरफ ईरान को सबक सिखाना चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिकी जनता को महँगी गैस और पेट्रोल नहीं देना चाहते।
इसके अलावा, परमाणु एंगल भी इस दुविधा को बढ़ाता है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पास 60% तक संवर्धित लगभग 450 किलोग्राम यूरेनियम है। ट्रंप प्रशासन खार्ग द्वीप के साथ-साथ इन परमाणु भंडारों को सुरक्षित करने के लिए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है।
रणनीति यह है कि किसी तरह ईरान की आर्थिक और परमाणु शक्ति को एक साथ काबू में किया जाए। ट्रंप ने खुद एक इंटरव्यू में कहा है कि ‘सभी विकल्प खुले हैं,’ जिसका मतलब है कि वे खार्ग द्वीप पर कब्जा करने या इसे पूरी तरह ब्लॉक करने से पीछे नहीं हटेंगे, बस वे सही समय और कम से कम नुकसान वाले रास्ते का इंतजार कर रहे हैं।
खार्ग की तबाही का मतलब है वैश्विक ‘एनर्जी सुनामी’
खार्ग द्वीप पर होने वाली कोई भी सैन्य हलचल सिर्फ ईरान के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ‘एनर्जी सुनामी’ लेकर आएगी। ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर उसके तेल बुनियादी ढांचे को छुआ गया, तो वह पूरे क्षेत्र के ऊर्जा नेटवर्क को मलबे में बदल देगा। चूंकि खार्ग द्वीप होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बेहद करीब है, जहाँ से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, इसलिए यहाँ की एक चिंगारी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की गर्त में धकेल सकती है।
ट्रंप प्रशासन फिलहाल खार्ग द्वीप को एक ‘प्रेशर प्वाइंट’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है। वे चाहते हैं कि ईरान इस डर से बातचीत की मेज पर आए कि उसकी ‘लाइफलाइन’ कभी भी काटी जा सकती है। लेकिन अगर युद्ध और भड़कता है और ईरान पीछे नहीं हटता, तो खार्ग द्वीप पर अमेरिकी कमांडो की मौजूदगी या इजरायली मिसाइलों का गिरना तय है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि खार्ग द्वीप ईरान की ढाल बना रहेगा या उसकी बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बनेगा।
ईरान में चल रहे भीषण युद्ध के बीच फँसे कई भारतीय छात्र मोदी सरकार से उन्हें सुरक्षित वापस लाने की अपील कर रहे हैं। फिलहाल, 9,000 से अधिक भारतीय नागरिक ईरान की राजधानी तेहरान और क़ोम शहर में फँसे हुए हैं। इनमें अधिकतर जम्मू- कश्मीर के मेडिकल छात्र हैं। छात्रों को चिंता है कि उन्हें आर्मेनिया जाने और फिर वहाँ से दिल्ली के लिए उड़ान की व्यवस्था खुद करने को कहा जा रहा है। अगर इन छात्रों ने ईरान छोड़ने के लिए भारत के सरकार की बार-बार जारी की गई एजवाइजरी को माना होता, तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।
कई एडवाइजरी जारी की गईं, लेकिन भारतीय छात्रों ने सुरक्षा चेतावनियों को नजरअंदाज किया।
ईरान में फंसे भारतीय छात्रों के वीडियो और भावुक अपीलें भारत में भी वैसा ही डर और दहशत पैदा कर रही हैं, जैसा कि मिडिल ईस्ट में फँसे हुए दूसरे देशों के लोगों को होता होगा। 9 मार्च को जम्मू -कश्मीर के श्रीनगर में ईरान में फँसे कई भारतीय छात्रों के अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से अपने बच्चों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप करने की माँग की।
ईरान में फँसे एक कश्मीरी भारतीय छात्र ने वीडियो संदेश में कहा, “हालात भयावह हैं। अभी तो हम ठीक हैं, लेकिन अपनी सुरक्षा को लेकर हम आश्वस्त नहीं हो सकते। जिन जगहों पर छात्रों को स्थानांतरित किया गया है, वहाँ भी हमले हो रहे हैं।”
श्रीनगर में विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले अभिभावकों में से एक ने कहा कि ईरान में भारतीय दूतावास ने छात्रों को सलाह दी है कि वे जहां हैं वहीं रहें, या वे आर्मेनिया-दिल्ली की फ्लाइट टिकट पहले से बुक करने के बाद अपने रिस्क पर आर्मेनिया के लिए ईरान से निकल सकते हैं।
ऐसा दिखाया जा रहा है मानो मोदी सरकार ने संघर्षग्रस्त देशों में फँसे अपने नागरिकों को अमेरिका की तरह अकेला छोड़ दिया हो। यहाँ तक कि जिन छात्रों को भारतीय दूतावास ने ईरान में युद्धग्रस्त इलाके से भारतीय करदाताओं के पैसे से निकाला था, वे भी भारत सरकार से उन्हें तत्काल भारत वापस भेजने की अपील कर रहे हैं, जबकि उन्हें पता है कि हवाई क्षेत्र बंद है।
These are the students who were evacuated by the Indian embassy from the war epicenter in Tehran to a safer city on taxpayers’ money.
And now they want India to evacuate them urgently to India, despite fully knowing that the airspace is closed.
यह नहीं भूलना चाहिए कि ईरान में कितने भारतीय छात्र भारत में सुरक्षा को लेकर उठ रही चिंताओं को खारिज करते हुए वीडियो बना रहे थे और एडवाइजरी को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। इनकी आँख तब तक नहीं खुली, जब तक कि अमेरिकी और इजरायली मिसाइलो की आवाज उनके कानों तक नहीं पहुंची।
On January 14, 2026, India asked its nationals to leave Iran. Back then, Indian students insisted: “We’re safe, and the University is meeting our demands.”
Today, the same students are pleading with the Indian government to speed up evacuation.
छात्रों की वापसी के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शन , और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की जरूरत तब नहीं पड़ती, जब छात्रों ने 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले से कुछ सप्ताह पहले जारी किए गए भारतीय सरकार के परामर्श और मौजूदा तनाव की गंभीरता को समझा होता।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने 14 जनवरी 2026 को पहली एडवाइजरी जारी की थी। उस वक्त ईरानी इस्लामी शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे थे और इसने हिंसक रूप ले लिया था। इसको देखते हुए भारतीय नागरिकों से ईरान की सभी गैर-जरूरी यात्राओं को स्थगित करने का आग्रह किया गया था।
Advisory for Indian nationals regarding travel to Iran
इसके बाद 14 फरवरी को एक और कड़ी चेतावनी जारी की गई। इसमें छात्रों, तीर्थयात्रियों और व्यापारियों सहित भारतीय नागरिकों को स्पष्ट रूप से सलाह दी गई कि वे जैसे भी हो, ईरान छोड़ दें। भारतीय दूतावास ने ईरान में फँसे भारतीयों की सहायता के लिए 24 घंटे चलने वाली हेल्पलाइन भी शुरू की।
इसके नौ दिन बाद 23 फरवरी को, विदेश मंत्रालय ने एक और एडवाइजरी जारी की। इसमें ईरान में फँसे भारतीय नागरिकों को जल्द से जल्द देश छोड़ने के लिए कहा गया था। ईरान में फँसे लोगों के लिए विदेश मंत्रालय के पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया।
विदेश मंत्रालय ने 23 फरवरी को कहा, “भारत सरकार द्वारा 5 जनवरी 2026 को जारी की गई सलाह के क्रम में और ईरान में उत्पन्न हो रही स्थिति को देखते हुए, ईरान में मौजूद भारतीय नागरिकों (छात्रों, तीर्थयात्रियों, व्यापारियों और पर्यटकों) को वाणिज्यिक उड़ानों सहित उपलब्ध परिवहन साधनों का उपयोग करके ईरान छोड़ने की सलाह दी जाती है। 14 जनवरी 2026 की सलाह को दोहराते हुए, सभी भारतीय नागरिकों और व्यक्तिगत पहचानकर्ताओं को उचित सावधानी बरतनी चाहिए, विरोध प्रदर्शनों या रैलियों वाले क्षेत्रों से बचना चाहिए, ईरान में भारतीय दूतावास के संपर्क में रहना चाहिए और किसी भी घटनाक्रम के लिए स्थानीय मीडिया पर नजर रखनी चाहिए।”
ये सुझाव भय फैलाने के लिए नहीं बल्कि सावधान करने के लिए थी। विदेश मंत्रालय ने बढ़ते तनावों के आकलन के आधार पर कार्रवाई करने के लिए स्पष्ट और बार-बार आह्वान किया। विदेश मंत्रालय को आशंका थी कि ईरान- इजरायल यूएस युद्ध कभी भी हो सकता है।
चेतावनियों के बावजूद, भारतीय छात्रों ने वहीं रहने का फैसला किया। दरअसल, विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की कि युद्ध छिड़ने के बाद भी कई छात्रों ने मदद की पेशकश को ठुकरा दिया। उस वक्त विदेश मंत्रालय उनकी मदद कर उन्हें निकालना चाहता था।
विदेश मंत्रालय ने 3 मार्च को एक नई एडवाइजरी जारी की। इसमें कहा गया, “मौजूदा स्थिति को देखते हुए, ईरान में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों को अत्यधिक सावधानी बरतने, अनावश्यक आवाजाही से बचने और यथासंभव घर के अंदर रहने की सलाह दी जाती है। भारतीय नागरिक समाचारों पर नजर रखें, स्थिति की जानकारी रखें और भारतीय दूतावास से आगे के निर्देशों की प्रतीक्षा करें।”
तेहरान में बढ़ते खतरे को देखते हुए, भारतीय दूतावास ने तेहरान में मौजूद अधिकांश भारतीय छात्रों को तेहरान से बाहर सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया है। दूतावास ने उनके परिवहन, भोजन और आवास की व्यवस्था की है। भारतीय दूतावास ने ईरान को बताया कि दूतावास के प्रस्ताव को अस्वीकार करने वाले कुछ ही छात्र तेहरान में रह गए हैं। दूतावास ने यह भी बताया कि कुछ छात्र आर्मेनिया के रास्ते ईरान से चले गए, जबकि कई ने ईरान में ही रहने का विकल्प चुना है।
हवाई क्षेत्र बंद है, सीमाएं असुरक्षित हैं। वास्तव में ईरान में कोई भी स्थान अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों से सुरक्षित नहीं है। अब अगर परीक्षा के दबाव, डिग्री रद्द होने के डर, लापरवाही या किसी दूसरे कारण से ईरान में फँसे छात्रों के साथ कुछ गड़बड़ होती है, तो इसका दोष भारतीय सरकार पर आएगा। जब तक ईरान का आसमान इजरायली मिसाइलों से घिरा है, तब तक सरकार चार्टर्ड विमान भेजकर भारतीयों को वापस नहीं ला सकती।
स्थिति की गंभीरता को जानबूझकर नजरअंदाज करना और उड़ानें रद्द होने और हवाई क्षेत्र बंद होने पर अधिकार के साथ बाहर निकालने की अपीलें यह दर्शाती हैं कि अधिकांश छात्रों ने आधिकारिक चेतावनियों के बजाय अपनी व्यक्तिगत समय-सीमा और आराम को प्राथमिकता दी। उन्होंने पहले रुकने का जोखिम उठाया, लेकिन अब वे हर हाल में निकलना चाहते हैं। यह पूरा मामला स्व-निर्मित संकट के लिए अधिकारियों को दोषी ठहराने का एक उदाहरण है।
संकटग्रस्त क्षेत्रों से भारतीय नागरिकों को निकालने में मोदी सरकार के सराहनीय रिकॉर्ड रहे हैं। ईरान में फँसे हर भारतीय को वापस लाने का अभियान जारी रहेगा, हालाँकि ईरान पर लगातार हमलों और हवाई और समुद्री मार्गों के बंद होने के कारण स्थिति जटिल बनी हुई है।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
अमेरिकी न्यूज चैनल CNN अपनी एक रिपोर्ट को लेकर दुनिया भर में आलोचनाओं का सामना कर रहा है। हिंदू विरोधी मेयर जोहरान ममदानी के घर के बाहर बम फेंकने वाले दो संदिग्धों को CNN ने अपनी रिपोर्ट में ‘पेंसिल्वेनिया के किशोर’ (Pennsylvania teenagers) बताकर पेश किया था, जो मानो शहर की सैर पर निकले हों।
हालाँकि, अब सच्चाई सामने आने के बाद CNN को अपनी पोस्ट डिलीट करनी पड़ी है। जाँच में पता चला है कि ये हमलावर कोई साधारण किशोर नहीं, बल्कि खूंखार आतंकी संगठन ISIS के प्रति निष्ठा रखने वाले आतंकी हैं।
CNN की रिपोर्ट: ‘पिकनिक मनाने आए किशोरों से हो गई गलती’
CNN ने अपनी मूल रिपोर्ट में इस आतंकी घटना को बेहद साधारण दिखाने की कोशिश की थी। रिपोर्ट में लिखा गया था, “पेंसिल्वेनिया के दो किशोर शनिवार सुबह न्यूयॉर्क सिटी में एक सामान्य दिन बिताने और सुहावने मौसम का आनंद लेने आए थे, लेकिन एक घंटे के भीतर उनकी जिंदगी बदल गई क्योंकि उन्हें मेयर के घर के बाहर बम फेंकने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।” CNN ने इस हमले को ‘एंटी-मुस्लिम प्रदर्शनों’ से जोड़कर दिखाने की कोशिश की थी, जिससे ऐसा लगे कि हमलावर मुस्लिम विरोधी प्रदर्शनकारी थे।
CNN ने अपनी रिपोर्ट में आतंकियों को ‘मासूम’ बताया
सच्चाई: ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे और ‘मदर ऑफ सैटर्न’ बम
जाँच में CNN का यह नैरेटिव पूरी तरह धराशायी हो गया। न्यूयॉर्क पुलिस कमिश्नर जेसिका टिस ने खुलासा किया कि गिरफ्तार किए गए दोनों व्यक्ति ISIS से प्रेरित हैं। बम फेंकते समय वे ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगा रहे थे।
फॉरेंसिक जाँच में पाया गया कि उनके पास मौजूद बम में TATP (Triacetone Triperoxide) था, जिसे ‘मदर ऑफ सैटर्न’ कहा जाता है। यह वही विस्फोटक है जिसका उपयोग दुनिया भर में बड़े आतंकी हमलों में होता रहा है। पुलिस के मुताबिक, इनका मकसद सिर्फ डराना नहीं, बल्कि लोगों की जान लेना या उन्हें अपाहिज बनाना था।
ISIS के प्रति वफादारी और भारी विरोध
गिरफ्तारी के बाद दोनों संदिग्धों ने कबूल किया कि उन्होंने आतंकी संगठन ISIS के प्रति निष्ठा की शपथ ली है। उन पर अब सामूहिक विनाश के हथियार (WMD) के इस्तेमाल और विदेशी आतंकवादी संगठन को सहायता प्रदान करने के गंभीर संघीय आरोप लगाए गए हैं।
HOLY SHIT
The original CNN post was just "two guys were out on a nice walk, when suddenly their lives were changed forever, when they started throwing bombs"
सोशल मीडिया पर लोगों ने CNN को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि चैनल एक आतंकी हमले को ‘सैर-सपाटे’ की तरह पेश कर रहा था। भारी दबाव और किरकिरी के बाद CNN ने पोस्ट डिलीट करते हुए माना कि उनकी रिपोर्टिंग ‘संपादकीय मानकों’ पर खरी नहीं उतरी और घटना की गंभीरता को दिखाने में विफल रही।
A post regarding the two individuals arrested for throwing homemade bombs outside of New York City Mayor Zohran Mamdani’s home failed to reflect the gravity of the incident thereby breaching the editorial standards we require for all our reporting. It has therefore been deleted.
मेयर जोहरान ममदानी ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि वे और उनकी बीवी उस समय घर पर नहीं थे, लेकिन यह हमला जानलेवा हो सकता था। पुलिस कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि यह ‘ISIS से प्रेरित आतंकवाद’ का मामला है। हालाँकि, फिलहाल इस घटना का ईरान में चल रहे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संघर्ष से कोई सीधा संबंध नहीं मिला है।
दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन इस्लामी भीड़ द्वारा की गई हिंदू युवक की हत्या मामले में अब नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश शुरू हो गई है। एक तरफ जहाँ वामपंथी रिपोर्टिंग के लिए कुख्यात बीबीसी इस कोशिश में जुटा है कि कैसे पूरे मामले में मजहब वाले एंगल को साइड किया जाए, तो वहीं सोशल मीडिया पर वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी समूह के लोग ये फैला रहे हैं कि तरुण हत्याकांड में असलियत में हिंदू पक्ष नहीं बल्कि मुस्लिम पक्ष पीड़ित है।
तरुण खटीक की मौत- मुस्लिम लड़की के लिए छोटी सी बात
इस नैरेटिव को गढ़ने के लिए सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से फैलाया जा रहा है। इस वीडियो में आरोपित मुस्लिम परिवार की महिला रोते-बिलखते यह दावा कर रही है कि हर कोई हिंदुओं का पक्ष दिखा रहा है जबकि असल में ‘पीड़ित’ उनका परिवार है। वह कहती है- हिंदू-मुस्लिम सबको उन लोगों के उनके समर्थन में सड़कों पर उतरना चाहिए और उनके लिए न्याय माँगना चाहिए।
वीडियो में ये लड़की उस घटना को, उस विवाद को, मजहबी कट्टरता को छोटी सी बात बता रही है जिसके कारण निर्ममता से तरुण की हत्या कर दी गई। सुन सकते हैं कि लड़की कहती है- छोटी सी बात को इस बढ़ा दिया, क्या किसी के घर पर बुलडोजर चलाया जाता है?
दिल्ली के Uttam Nagar मामले में मीडिया और संघ के लोग एकतरफा नॉरेटिव दिखाकर माहौल खराब करना चाहते हैं, सच्चाई क्या है, दूसरे पक्ष की मुस्लिम लड़की ने खुद सामने आ कर बताया.मामला छेड़खानी से शुरू हुआ था. वीडियो पूरा देखिये और ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए. सवाल यह है कि पीड़ित कौन… pic.twitter.com/NQbxLFXpTD
वीडियो में लड़की आगे मुस्लिम कार्ड खेलते हुए दोहराती है कि उन्हें सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। असलियत ये है कि होली के दिन उसकी बुआ सहरी के लिए सामान लेने गई थी जब उनपर गंदे पानी का गुब्बारा फेंका गया। इसके बाद हिंदू परिवार ने लड़ाई शुरू की, उसके घर के लड़कों ने कुछ नहीं किया। यहाँ तक तरुण की हत्या का इल्जाम भी लड़की तरुण के घरवालों पर ही लगाती है।
इस्लामी कट्टरपंथी और वामपंथी हुए एक्टिव
अब यही वीडियो को साझा करते दिल्ली में AIMIM पार्टी के अध्यक्ष शोएब जमई ने संघ पर निशाना साधा है। जमई ने कहा है- संघ से जुड़े लोग एकतरफा नैरेटिव दिखाकर माहौल खराब करना चाहते हैं। उनके अनुसार सच्चाई जानने के लिए मुस्लिम पक्ष की इस लड़की की बात भी सुनी जानी चाहिए। जमई ने ये बताना चाहा कि मामला छेड़खानी से शुरू हुआ था और जो मुस्लिम भीड़ टूटी उसे हिंदू ‘आत्मरक्षा’ के नजरिए से देखें और दिल्ली सरकार मुस्लिम पक्ष के साथ न्याय करे।
दिल्ली के Uttam Nagar मामले में मीडिया और संघ के लोग एकतरफा नॉरेटिव दिखाकर माहौल खराब करना चाहते हैं, सच्चाई क्या है, दूसरे पक्ष की मुस्लिम लड़की ने खुद सामने आ कर बताया.मामला छेड़खानी से शुरू हुआ था. वीडियो पूरा देखिये और ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए. सवाल यह है कि पीड़ित कौन… pic.twitter.com/NQbxLFXpTD
इसी तरह मुस्लिम आईटी सेल से जुड़े कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने भी इस वीडियो को साझा किया। उनके दावों के अनुसार, गुब्बारा किसी बच्चे ने नहीं बल्कि 20 साल के युवक ने महिला पर फेंका था। विरोध करने पर नशे में धुत लोगों ने महिला के साथ बदसलूकी की और बाद में तरुण के घरवालों ने ही दूसरे पक्ष को बुरी तरह पीटा।
Uttam Nagar | The truth behind the one-sided narrative.
According to a woman seen in a video, the incident started when a 20-year-old named Prince threw dirty water balloons at a Muslim woman during Holi.
वामपंथी नेता सुभाषिनी अली की बात करें तो वो भी इस नैरेटिव को हवा देने में पीछे नहीं रहीं। उन्होंने अपने फॉलोवर्स को ये बताने की कोशिश की कि तरुण हत्याकांड बहुत जटिल है। मामले में मुस्लिम लोग भी घायल हुए हैं और अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ घरों को लूट लिया गया और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
सुहासिनी अली का प्रयास था कि कैसे भी करके जो तरुण के लिए आवाज उठा रहे हैं उनके भीतर एक ग्लानि आ जाए। ऐसी ग्लानि कि वो लोग भी तरुण हत्याकांड की बात छोड़कर उन लोगों की बात करने लगें जिन्हें चोट उस समय लगी जब वह तरुण को लाठी-डंडे और सरिए से मारने आए थे।
रिपोर्टिंग के नाम पर BBC की ओछी हरकत
अब बात करें मीडिया की तो वामपंथी मीडिया संस्थान बीबीसी की तो उन्होंने इस मुद्दे पर कितना बचाव करते हुए रिपोर्टिंग की है ये देखने लायक है। उन्होंने हिंदू युवक की हत्या केस में 3 मिनट की अपनी रिपोर्ट प्रसारित की है। इसके शीर्षक में उन्होंने ये नहीं बताया कि घटना में कौन मरा, किसने मारा। उन्होंने टाइटल में लिखा कि तरुण के साथ जो हुआ वो दो समुदायों की झड़प का नतीजा था, इसमें एक युवक की मौत हो गई है और जानिए पुलिस ने क्या बताया है।
बीबीसी की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
रिपोर्ट देखते हुए पता चलेगा कि इसमें बीबीसी कुछ खंगालने की जगह ये कहते हुए बचता दिखा कि अभी इलाके में सुरक्षाबल तैनात है और किसी से बात नहीं करने दिया जा रही है। रिपोर्ट में पीड़िता पिता की बाइट लगाई गई। पुलिस का बयान लगाया जिससे कम्युनल एंगल खारिज हो और और बाद में दो ऐसे स्थानीयों की बाइट ली गई जो सिर्फ ये बताते रहे कि इलाके में शांति थी। शरारती तत्व तो हर समाज में होते हैं, उन्हें इंतजार है स्थिति दोबारा पहले जैसे होगी। इनमें एक हरीश और दूसरा अब्दुल है।
अब आएँगे सेकुलरों के न्यूट्रल पोस्ट
ध्यान देने वाली बात यह है उत्तम नगर में 4 मार्च 2026 को हुई तरुण की हत्या के बाद से आसपास के चश्मदीद, पीड़ित परिवार, पड़ोसी लगातार एक ही तरह की बात बता रहे हैं कि बच्ची ने गुब्बारा फेंका, बुर्काधारी महिला बिदकी और इस्लामी भीड़ आकर हिंदू परिवार पर टूट पड़ी।
इन सब बयानों के बावजूद सोशल मीडिया पर अब नई कहानी गढ़ी जा रही है, ताकि तरुण की मौत से ध्यान हटाया जा सके। नए नैरेटिव में ये बताने का प्रयास हो रहा है कि होली के दिन मुस्लिम परिवार शांति से ही था। लड़ाई हिंदू परिवार ने की थी। उन्होंने जानकर मुस्लिम महिला को निशाना बनाया, फिर विरोध करने पर मारपीट करने लगे।
4 मार्च के बाद से ये पूरा एंगल अब तक सामने नहीं आया था। घटना के 5 दिन बाद अचानक से ये कहानी फैलना शुरू हुई और इसे फैलाने वाले वही लोग हैं जिन्होंने इतने दिन से तरुण हत्याकांड पर एक शब्द नहीं बोला। शायद इन्हें इंतजार था कि ऐसा कुछ नैरेटिव सामने आए तो कुछ बोलें।
अब देखना है कि कि पूरे मामले पर तथाकथित ‘न्यूट्रल’ पत्रकार अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता करते हुए आरफा खानम शेरवानी, आरजे सायमा और रवीश कुमार क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
संभव है कि इस मामले पर इन लोगों के ऐसे पोस्ट सामने आएँ- उत्तम नगर में तरुण की मौत होना दुखद है, लेकिन दूसरे पक्ष की आवाज भी सुनी जानी चाहिए। या कह दिया जाए कि जो दिख रहा है और जो लोग बता रहे हैं हो सकता है वो सच न हो… सच वो हो जो ये मुस्लिम लड़की बोल रही है।
सर्वोच्च न्यायालय ने जजों के लिए नई गाइडलाइंस बनाने का फैसला किया है। खासकर कोर्ट में जब यौन अपराध और कमजोर पीड़ितों से जुड़े मामलों की सुनवाई हों, ताकि जज ज्यादा संवेदनशील हो सकें। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अदालतों में लैंगिक रूढ़ियों से निपटने के पहले किए गए एक प्रयास को लेकर न्यायपालिका के भीतर कुछ असहजता भी देखी जा रही है।
10 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने पॉक्सो मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को निरस्त कर दिया। उस मामले में हाईकोर्ट ने ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ के बीच अंतर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को व्यापक दृष्टिकोण से देखा और भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी से विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने को कहा। ये समिति ऐसे दिशा-निर्देशों की एक रिपोर्ट कोर्ट को दे। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने यह फैसला सुनाया। इसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया भी शामिल थे।
इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस करेंगे। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होंगे। इनमें प्रैक्टिशनर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता भी होंगे। समिति पहले किए गए प्रयासों का अध्ययन करेगी और यह प्रस्तावित करेगी कि न्यायाधीशों और न्यायिक व्यवस्था को यौन अपराधों तथा कमजोर पीड़ितों या गवाहों से जुड़े अन्य संवेदनशील मामलों में किस तरह का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम 2023 में प्रकाशित सुप्रीम कोर्ट की एक पुस्तक ‘हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स’ को लेकर न्यायपालिका के भीतर मौजूद असहजता के बीच उठाया गया है। यह पुस्तक पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के कार्यकाल के दौरान जारी की गई थी।
किस मामले से चर्चा शुरू
सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश उस स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) मामले की सुनवाई के दौरान दिए, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद शुरू किया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा था, “पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना…रेप की कोशिश नहीं है।”
उस फैसले में जज ने बलात्कार करने की ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ के बीच अंतर किया था। हाईकोर्ट ने माना था कि आरोपी की कार्रवाई बलात्कार के प्रयास के रूप में नहीं आती, इसलिए आरोपों में बदलाव कर दिया गया था।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि आरोपों से स्पष्ट है कि आरोपी केवल तैयारी के स्तर से आगे बढ़ चुके थे और अपने इरादे को अंजाम देने की प्रक्रिया शुरू कर चुके थे। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मूल आरोपों को बहाल करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने वकीलों द्वारा उठाई गई उन चिंताओं को भी माना, जिनमें कहा गया था कि कभी-कभी यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक तर्कों में असंवेदनशीलता दिखाई देती है, खासकर तब जब पीड़ित नाबालिग या कमजोर स्थिति में हों।
अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में कानून के सिद्धांतों को लागू करते समय अदालतों को संवेदनशीलता, करुणा और सहानुभूति के साथ काम करना चाहिए।
2023 जेंडर हैंडबुक को लेकर जजों में बेचैनी
2023 हैंडबुक को जजों को कोर्ट की कार्रवाई और फैसलों में जेंडर स्टीरियोटाइप को पहचानने और उनसे बचने में मदद करने के लिए बनाया गया था। हालाँकि, रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई जजों ने हैंडबुक के प्रोसेस और कंटेंट के कुछ हिस्सों से नाखुशी जताई।
द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से कहा कि यौन अपराध और जाति के बारे में स्टीरियोटाइप पर चर्चा करने वाला एक सेक्शन विवाद की अहम वजह है। हैंडबुक में कहा गया है कि एक स्टीरियोटाइप मौजूद है, जो यह बताता है कि “दबंग जाति के पुरुष दबी हुई जातियों की महिलाओं के साथ सेक्सुअल रिलेशन नहीं बनाना चाहते” और इसलिए ऐसी महिलाओं द्वारा दबंग जाति के पुरुषों पर रेप के झूठे आरोप भी लगाए जा सकते हैं।
Source: SCI
फिर यह तर्क दिया गया कि ऐतिहासिक रूप से, यौन हिंसा का इस्तेमाल सामाजिक कंट्रोल के एक टूल के तौर पर किया गया है और दबंग जाति के पुरुषों ने जाति के ऊँच-नीच को मजबूत करने के लिए ऐसी हिंसा का इस्तेमाल किया। सूत्रों के मुताबिक, कुछ जजों को लगा कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे बड़े आम फैसले करने से बचना चाहिए जिनसे लगे कि गलत कामों के लिए पूरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
‘बहुत ज़्यादा हार्वर्ड ओरिएंटेड’ – CJI ने प्रैक्टिकल गाइडेंस की मांग की
10 फरवरी को सुनवाई के दौरान, CJI सूर्यकांत ने हैंडबुक की तकनीकी भाषा की भी आलोचना की और इसे बहुत ज़्यादा एकेडमिक और ‘हार्वर्ड ओरिएंटेड’ बताया। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के पहलुओं को मुश्किल या फोरेंसिक मतलब देने से ऐसे डॉक्यूमेंट्स सर्वाइवर्स, उनके परिवारों और आम नागरिकों की पहुँच से दूर हो जाएँगे।
अपने ऑर्डर में बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य की कोई भी गाइडलाइंस ऐसी भाषा में बनाई जानी चाहिए, जो आसान हो और आम लोगों को आसानी से समझ में आए। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई पीड़ित और शिकायत करने वाले कमजोर बैकग्राउंड से आते हैं और हो सकता है कि उनके पास कानूनी ट्रेनिंग या भाषा की जानकारी न हो। इसलिए गाइडलाइंस आसान होनी चाहिए और मुश्किल एकेडमिक टर्मिनोलॉजी के बजाय प्रैक्टिकल असलियत पर आधारित होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया है कि गाइडलाइंस में भारत की सामाजिक हकीकत और भाषा की विविधता दिखनी चाहिए। कमेटी को अलग-अलग इलाकों में इस्तेमाल होने वाले आपत्तिजनक या असंवेदनशील एक्सप्रेशन की पहचान करने के लिए बढ़ावा दिया गया है, ताकि पीड़ित कोर्ट के सामने अपने अनुभव बेहतर ढंग से बता सकें।
इसके अलावा, कोर्ट ने निर्देश दिया है कि गाइडलाइंस में विदेशी कानूनी फ्रेमवर्क से लिए गए भारी और मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इसके बजाय उन्हें भारत के माहौल और सामाजिक ताने-बाने पर आधारित होना चाहिए। कमेटी को तीन महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है।
बहस बढ़ने से पहले बदलाव
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी के आदेश में 2023 के हैंडबुक की साफ तौर पर आलोचना नहीं की, लेकिन विवाद शुरू होने से पहले ही ज्यूडिशियरी ने फिर से विचार करने की जरूरत को समझ लिया।
जेंडर स्टीरियोटाइप से निपटने पर 2023 हैंडबुक को इस मकसद से पेश किया गया था कि जजों को यौन हिंसा से जुड़े मामलों में स्टीरियोटाइप वाली सोच को पहचानने और उनसे बचने में मदद मिल सके। हालाँकि, इसके कुछ हिस्सों ने ज्यूडिशियरी के कुछ सदस्यों में बेचैनी पैदा की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हैंडबुक में कुछ सोशियोलॉजिकल बातों को लेकर चिताएँ थीं, जिसमें जाति के आधार पर भेदभाव और यौन हिंसा का जिक्र भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ जजों को लगा कि ये पूरे समुदायों का जनरलाइजेशन हैं, इससे दिक्कतें पैदा होंगी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए किसी डॉक्यूमेंट के लिए, उसकी भाषा और फॉर्मूलेशन का इंस्टीट्यूशनल महत्व होता है। कोर्ट से उम्मीद की जाती है कि वे अलग-अलग सोशल बैकग्राउंड के लोगों से जुड़े झगड़ों पर फैसला सुनाएँ। हालांकि, ज्यूडिशियरी द्वारा जारी ऑफिशियल मटीरियल में बड़े सोशियोलॉजिकल दावों को कभी-कभी एकेडमिक ऑब्ज़र्वेशन के बजाय इंस्टीट्यूशनल पोजीशन के तौर पर समझा जा सकता है।
हाल के दिनों में, इंस्टीट्यूशनल डॉक्यूमेंट्स को लेकर ऐसी चर्चाएं हुई हैं जो तेज़ी से बढ़ी हैं और विवादों का रूप ले लिया है। एक हालिया उदाहरण जिस पर यहां विचार किया जाना चाहिए, वह है यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 में इक्विटी को बढ़ावा देने के विवाद।
गाइडलाइंस, जिन पर इस साल जनवरी के आखिरी हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी, स्ट्रक्चरल तौर पर जाति भेदभाव के मामलों में जनरल कैटेगरी को अपराधी मानती हैं।
हालाँकि दोनों मुद्दे आपस में जुड़े नहीं हैं, लेकिन दोनों यह दिखाते हैं कि कैसे संवेदनशील सामाजिक सवालों से निपटने वाले इंस्टीट्यूशनल टेक्स्ट पर गहरी बहस हो सकती है, जब इन डॉक्यूमेंट्स में इस्तेमाल की गई भाषा सामाजिक परिवेश के कुछ घटनाओं को आम बना देती है। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का कदम पहले की हैंडबुक को सीधे खारिज करने के बजाय उसे दोबारा जाँच करने जैसा लगता है।
सुनवाई के दौरान उठाया गया एक और मुद्दा भाषा की सहजता को लेकर था। CJI सूर्यकांत ने कहा कि हैंडबुक ‘बहुत ज्यादा हार्वर्ड ओरिएंटेड’ लग रही थी। उनकी बातों से पता चलता है कि भाषा और उनमें लिखी गई बातें बहुत ज्यादा एकेडमिक थी और आम लोगों के लिए समझना मुश्किल था।
इस हैंडबुक का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका में महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी भाषा और सोच (जैसे- ‘हौसवाइफ’, ‘अविश्वासी’) को खत्म करना था, न कि किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना।
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका के लिए बनाई गई गाइडलाइंस को आखिरकार उन गवाहों और पीड़ितों की जरूरतों को पूरा करना चाहिए जो कोर्ट के समक्ष पेश होते हैं। इनमें से कई टेक्निकल लीगल या एकेडमिक टर्मिनोलॉजी को जानते भी नहीं हैं।
इसलिए कोर्ट का ऑर्डर अप्रोच में बदलाव का संकेत देता है। हैंडबुक के बारे में बहस को और गहरा होने देने के बजाय, उसने एक कंसल्टेटिव मैकेनिज्म के ज़रिए इस काम को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। इस ऑर्डर के साथ, कोर्ट ने पहले के फ्रेमवर्क पर रोक लगा दी है, ताकि नया फ्रेमवर्क बनाया जा सके।
इस कदम को एक इंस्टीट्यूशनल कोर्स करेक्शन के तौर पर देखा जा सकता है। ज्यूडिशियरी सेक्सुअल ऑफेंस के मामलों से निपटने में संवेदनशीलता की जरूरत को समझती है। हालाँकि कोर्ट ने यह भी इशारा किया है कि ऐसी संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले टूल्स में सोच-समझकर बातें डाली जानी चाहिए। ऐसे डॉक्यूमेंट्स पर ज्यूडिशियरी के अंदर चर्चा होनी चाहिए और इससे कोई विवाद नहीं होना चाहिए।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
ईरान की सरकारी मीडिया ने बताया कि अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई (56) को एक्सपर्ट्स की असेंबली ने देश का नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है।
रविवार (8 मार्च 2026) को जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया, “एक अहम वोट से, एक्सपर्ट्स की असेंबली ने अयातुल्ला सैय्यद मोजतबा हुसैनी खामेनेई को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के पवित्र सिस्टम का तीसरा लीडर चुन लिया।” नए लीडर को नियुक्त करने का काम 88 मौलवियों के एक ग्रुप ने किया।
Iran's Assembly of Experts has appointed Ayatollah Sayyed Mojtaba Khamenei as the new Leader of the Islamic Republic
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को नामंजूर कर दिया है। ABC न्यूज से बात करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उन्हें हमसे मंजूरी नहीं मिली, तो वे ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएँगे।” इससे पहले इजरायल ने ईरान के अगले सुप्रीम लीडर पर हमला करने की धमकी भी दी थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था, ‘वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। खामेनेई का बेटा एक कमजोर खिलाड़ी है। मुझे नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होना होगा, जैसा कि वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिगेज के मामले में हुआ था।’ राष्ट्रपति ट्रंप ने मोजतबा खामेनेई को ‘अस्वीकार्य’ बताते हुए कहा कि वे ऐसे नेता को देखना चाहते हैं जो ईरान में ‘सद्भाव और शांति’ ला सके। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अली खामेनेई की नीतियाँ जारी रहीं, तो भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच फिर टकराव हो सकता है।
नवंबर 2019 में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध लगाए थे। उन पर आरोप था कि वे उस समय के सुप्रीम लीडर का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जबकि वे किसी सरकारी पद पर चुने या नियुक्त नहीं हुए थे। अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, उस समय के सुप्रीम लीडर ने अपनी कुछ जिम्मेदारियां मोजतबा खामेनेई को सौंप दी थीं।
विभाग ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपने पिता को कमजोर करने के लिए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स-क़ुद्स फ़ोर्स (IRGC-QF) और बासिज रेजिस्टेंस फ़ोर्स (बासिज) के कमांडर के साथ हाथ मिलाया। इसके अलावा यह भी बताया गया कि यूनाइटेड किंगडम, स्विट्जरलैंड और लिकटेंस्टीन में उनकी संपति है। लंदन में उनकी पॉश इलाके में संपत्ति का भी उल्लेख है।
कौन हैं मोजतबा खामेनेई
ईरान के मशहद में 8 सितंबर 1969 में पैदा हुए मोजतबा खामेनेई शिया धर्मगुरु अयातुल्ला खामेनेई के दूसरे सबसे बड़े बेटे हैं। उन्हें शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स का समर्थन हासिल है। अपने पिता की तुलना में मोजतबा ज्यादा कट्टरपंथी माने जाते हैं।
پخش خبر انتخاب سومین رهبر انقلاب اسلامی، آیتالله سید مجتبی خامنهای، در شبکه خبر صدا و سیمای جمهوری اسلامی ایران pic.twitter.com/JMdoBP5dNb
— SNN.ir | خبرگزاری دانشجو (@snntv_fa) March 8, 2026
ईरान के बड़े फैसलों में अब मोजतबा खामेनेई का निर्णय ही अंतिम होगा। वह सेना और पैरामिलिट्री संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के सर्वोच्च कमांडर भी होंगे। दूसरे नीतिगत और देश-विदेश से जुड़े मुद्दों पर भी अंतिम फैसला उन्हीं का होगा, जिसमें ईरान के परमाणु हथियारों से जुड़े निर्णय भी शामिल हैं। ईरान में परमाणु हथियार बनाने का समर्थन करने वालों में मोजतबा खामेनई का नाम भी आता है।
ईरान में हुए प्रदर्शनों के दौरान मोजतबा खामेनेई का विरोध किया गया था। इजरायली मीडिया ने मोजतबा को अपने पिता से भी ज्यादा कट्टर रुख वाला बताया है। उसके मुताबिक, ईरान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई सख्त कार्रवाई के पीछे भी उनकी भूमिका रही है। युवती की मौत के बाद ईरान में जबरदस्त प्रदर्शन हुए थे। युवती को देश के कपड़ों को लेकर बने कानूनों को तोड़ने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। वह कट्टरपंथी महमूद अहमदीनेजाद से करीब से जुड़े थे, जो 2005 में ईरान के प्रेसिडेंट चुने गए थे।
ईरान के सरकारी मीडिया ने मोजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने की घोषणा के बाद पूरे ईरान में जश्न मनाते लोगों की तस्वीरें सामने आईं।
टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक, सोशल मीडिया पर एक ऐसी तस्वीरें भी दिखी जिसमें तेहरान में लोगों को अपनी खिड़कियों से ‘मोजतबा की मौत’ चिल्लाते हुए सुना गया। हालाँकि इसे वेरिफाई नहीं किया जा सकता।
People chanted “Death to Mojtaba” from their windows in Tehran’s Ekbatan neighborhood early Monday shortly before Iran's Assembly of Experts announced Mojtaba Khamenei as the country’s new supreme leader, according to a video shared on social media. pic.twitter.com/nEiM7x7AbM
— Iran International English (@IranIntl_En) March 8, 2026
सुप्रीम लीडर का पद मोजतबा खामेनेई को इस्लामिक रिपब्लिक में देश के सभी मामलों में आखिरी फैसला लेने का अधिकार देता है, जिसमें इसकी सेना के साथ-साथ यूरेनियम संवर्धन और उसके स्टॉक पर नियंत्रण भी शामिल है। अगर सुप्रीम लीडर चाहे तो परमाणु हथियार बनाने की इजाजत ईरानी एक्सपर्ट को दे सकता है।
28 फरवरी को, अयातुल्ला अली खामेनेई को US-इज़राइल के हमले में मार दिया गया, जिससे मिडिल ईस्ट में लड़ाई और तेज हो गई।
देश में प्रस्तावित बिजली संशोधन विधेयक 2025 को लेकर केंद्र सरकार और बिजली क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी-इंजीनियर संगठनों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। सरकार इस विधेयक को बिजली क्षेत्र में बड़े सुधारों के रूप में पेश कर रही है जबकि कर्मचारी संगठन इसे निजीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बताते हुए विरोध कर रहे हैं।
संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस बिल को मौजूदा बजट सत्र के दूसरे हिस्से में संसद में पेश कर सकती है, जिसके खिलाफ बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति ने 10 मार्च 2026 को देशभर में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह विधेयक बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने का रास्ता खोल सकता है। उनका मानना है कि इससे किसानों, आम उपभोक्ताओं और बिजली विभाग के कर्मचारियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं, सरकार का कहना है कि इस विधेयक का मकसद बिजली क्षेत्र को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना, इसमें प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा को तेजी से बढ़ावा देना है।
बिजली संशोधन बिल को लेकर क्या है विवाद?
प्रस्तावित विधेयक को लेकर सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियों को शामिल किया जा सकता है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि यह कानून बिजली क्षेत्र के निजीकरण को बढ़ावा देगा। उनका कहना है कि अगर यह बिल पास हो गया तो निजी कंपनियों को भी बिजली वितरण का लाइसेंस मिल सकता है, जिससे सरकारी बिजली व्यवस्था में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी।
इस व्यवस्था के लागू होने पर कंपनियों को यह तय करने की छूट मिल सकती है कि वे किन उपभोक्ताओं को बिजली दें। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि ऐसी स्थिति में निजी कंपनियाँ उन इलाकों पर ज्यादा ध्यान देंगी जहाँ ज्यादा मुनाफा है जबकि कम कमाई वाले क्षेत्रों की जिम्मेदारी सरकारी बिजली कंपनियों पर ही ज्यादा आ जाएगी।
कर्मचारी संगठनों का यह भी आरोप है कि सरकार निजी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने जैसे कदम उठा रही है। इसी मुद्दे को लेकर देशभर में विरोध की तैयारी की गई है।
कर्मचारियों और संगठनों का विरोध क्यों?
बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति के अनुसार, यह बिल आम उपभोक्ताओं और किसानों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उनका कहना है कि अगर वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियाँ आती हैं तो बिजली दरों पर असर पड़ सकता है और सब्सिडी व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
समिति का आरोप है कि सरकार ने बिजली क्षेत्र से जुड़े संगठनों और ट्रेड यूनियनों से सुझाव जरूर माँगे थे लेकिन उनकी आपत्तियों को सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके अलावा बिजली मंत्रालय द्वारा एक वर्किंग ग्रुप बनाए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
कर्मचारी संगठनों के नेताओं का कहना है कि जिस संस्था ने पहले ही बिजली क्षेत्र के निजीकरण का समर्थन किया है, उसे ही कानून को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में शामिल करना निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। उनका मानना है कि इससे निर्णय पहले से तय होने का संदेह पैदा होता है। इसी कारण कर्मचारी संगठनों ने इस विधेयक के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया है।
सरकार के मुताबिक बिल की जरूरत क्यों?
केंद्र सरकार का कहना है कि बिजली क्षेत्र को मजबूत बनाने और भविष्य की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए सुधार करना जरूरी है। सरकार के मुताबिक प्रस्तावित विधेयक का मकसद बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक हालत को बेहतर बनाना, बिजली दरों को ज्यादा तर्कसंगत बनाना और इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना है।
सरकार का तर्क है कि कई राज्यों में बिजली वितरण कंपनियाँ आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं, इसलिए बिजली की लागत के हिसाब से दर तय करना और नियामक व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी हो गया है।
इसके अलावा सरकार इस विधेयक को ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य से भी जोड़कर देख रही है। सरकार का कहना है कि आने वाले समय में स्वच्छ ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली को तेजी से बढ़ाना देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी होगा।
बिल में प्रस्तावित मुख्य सुधार
विधेयक में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं।
वित्तीय स्थिरता: बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए लागत के अनुसार बिजली दर तय करने का प्रावधान रखा गया है। नियामक आयोगों को हर साल 1 अप्रैल से टैरिफ निर्धारित करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है।
प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: औद्योगिक उपभोक्ताओं पर ज्यादा दर और क्रॉस-सब्सिडी के कारण उद्योगों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की बात कही गई है। बिल का उद्देश्य दरों को संतुलित करना, बिजली की माँग बढ़ाना और लागत कम करना है ताकि भारत की आर्थिक उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ सके।
ऊर्जा परिवर्तन: सरकार 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखती है। इसके लिए बिजली नियामक आयोग को बाजार आधारित नए उपकरण लागू करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ सके।
उपभोक्ता सुविधा: बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और सेवा मानकों को पूरे देश में एक जैसा बनाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही बिजली के अनधिकृत उपयोग से जुड़े मामलों में आकलन की अवधि को एक वर्ष तक सीमित करने और अपील प्रक्रिया को आसान बनाने की बात कही गई है।
नियामक व्यवस्था को मजबूत करना: केंद्रीय और राज्य बिजली नियामक आयोगों के सदस्यों के खिलाफ शिकायतों की प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रस्ताव है। साथ ही बिजली से जुड़े विवादों के फैसलों के लिए समय सीमा तय करने और अपीलीय न्यायाधिकरण की क्षमता बढ़ाने की भी योजना है।
अन्य बदलाव: बिजली लाइनों के निर्माण और रखरखाव से जुड़े अधिकार पुराने टेलीग्राफ कानून से बिजली कानून में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा नेटवर्क साझा करने की अनुमति देकर लागत कम करने और व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने का प्रयास किया गया है।
सरकार के अनुसार, यह विधेयक लागू होने के बाद पूरे देश में समान रूप से लागू होगा और इससे बिजली क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। राज्यों को यह भी अधिकार रहेगा कि वे विशेष उपभोक्ता श्रेणियों, जैसे जनजातीय परिवारों या गरीब उपभोक्ताओं को पारदर्शी तरीके से सब्सिडी दे सकें।