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रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील कराने वाले डीलर के ठिकानों से 6 बोरी कागजात के साथ 11 लाख कैश बरामद

राजस्थान के बीकानेर में कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के लिए लैंड डील करने वाले प्रॉपर्टी डीलर के ठिकानों पर आयकर विभाग की छापेमारी के दौरान बड़े पैमाने पर जमीनों के दस्तावेज बरामद हुए हैं। प्रॉपर्टी डीलर के बीकानेर स्थित ठिकानों से आयकर विभाग की टीम ने 11 लाख रुपए कैश और लगभग 6 बोरियों में भरे जमीनों की रजिस्ट्री के कागजात बरामद किए हैं। अधिकारियों ने शुक्रवार (अक्टूबर 18, 2019) को इसकी जानकारी दी।

दस्तावेजों में कथित रूप से वाड्रा द्वारा राजस्थान और बीकानेर में खरीदी गई सैकड़ों एकड़ जमीन के पंजीकरण के कागजात शामिल हैं। इससे पहले प्रॉपर्टी डीलर ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई पूछताछ के दौरान स्वीकार किया था कि उसने राजस्थान में वाड्रा की कंपनियों के लिए जमीन के सौदे किए थे। 

सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए केस के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय की टीम मनी लॉन्ड्रिंग के उस मामले की जाँच कर रही है, जिसमें आरोप है कि वाड्रा की कंपनी ने राजस्थान में नियमों की अनदेखी कर लैंड डील की थी। प्रॉपर्टी द्वारा ईडी को दी गई जानकारी के आधार पर आयकर विभाग की टीम ने छापेमारी की थी, जो एक दिन से अधिक समय तक चली। जब्त की दस्तावेजों की जाँच के लिए पंजाब से आई टीम उसे अपने साथ ले गई है।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने मामले में गिरफ्तारी से वाड्रा को 24 नवंबर तक के लिए सुरक्षा दे दी है। इसकी अंतिम सुनवाई 26 सितंबर को हुई थी। इसके साथ ही वाड्रा को लंदन स्थित संपत्ति ब्रायनस्टन स्क्वायर में 1.9 मिलियन पाउंड की संपत्ति खरीदने के आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है।

हिन्दू छोड़ ईसाई बन जाओ, नौकरियों का विशेष स्कोप है: केरल सरकार का ‘सेक्युलर’ फरमान

केरल सरकार द्वारा जारी की गई एक राजपत्र अधिसूचना सोशल मीडिया पर उसकी छीछालेदर करा रही है। अगस्त 2019 में जारी इस राजपत्र में असिस्टेंट सर्जन और कैजुयलिटी मेडिकल अधिकारी के आवेदन माँगे गए हैं- केवल उन अनुसूचित जाति के लोगों के, जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया [Scheduled Caste Converts to Christianity (SCCC)]

इस अधिसूचना का मतलब है कि केरल की सरकार अलग से उन लोगों को प्राथमिकता दे रही है जिन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई पंथ अपनाया है।

केरल सरकार द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना

पद भरने की तीसरी कोशिश, मोटा वेतन- आखिर क्यों नहीं कम होंगे हिन्दू?

यह पहली बार हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। इसी SCCC श्रेणी के लिए विशेष तौर पर जारी यह तीसरी अधिसूचना है- क्योंकि SCCC वर्ग के लोग, यानि आदिवासी और जनजातीय लोग, जो हिन्दू से ईसाई बने हों, उतने हैं ही नहीं, जितने सरकार चाहती है। इससे पहले भी, इन्हीं रिक्तियों को भरने के लिए सरकार दो बार अधिसूचना जारी कर चुकी है और तब भी उनमें इस विशेष बिंदु का उल्लेख था-कि आवेदक हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई बना हो। इस पद को भरने के लिए पहली नोटिफिकेशन साल 2014 के दिसंबर में आई थी, दूसरी 2016 में और तीसरी अब फिर आई अगस्त 2019 में।

हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई बनने वालों के लिए विशेष तौर पर सुरक्षित किए गए इन पदों का वेतन ₹45,800 से ₹89000 तक है।

विभाग है या कंपनी?

अब इस मामले के प्रकाश में आने के बाद लोगों ने आवाज उठानी शुरू की है कि आखिर कैसे केरल सरकार आस्था और उपासना-पद्धति के आधार पर भेदभाव कर रही है और कैसे नौकरी की भर्तियों में उन लोगों को प्राथमिकता दे रही है, जो हिन्दू से ईसाई बन गए। लेकिन और गहराई में झाँकने पर पता चलेगा कि इस मामले में चौंकने जैसा कुछ नहीं है- क्योंकि केरल सरकार में तो ऐसे लोगों के ‘कल्याण’ के लिए पूरा एक विभाग है जिन्होंने हिंदू धर्म त्यागकर ईसाई पंथ अपनाया। इस विभाग का नाम “केरल राज्य अनुसूचित जातियों और अनुशंसित समुदायों से ईसाई विकास निगम”। निगम– यानि कम्पनी, जैसे NTPC (राष्ट्रीय ताप-विद्युत ऊर्जा निगम) सरकारी कंपनी है, ONGC सरकारी तेल कंपनी है।

सही पढ़ा आपने- केरल सरकार ने हिन्दू से ईसाई बनने वाले लोगों की विशेष देखभाल करने के लिए एक पूरी कंपनी खोल रखी है

सरकार द्वारा संचालित इस विभाग (या कंपनी?) ने अपने घोषित लक्ष्य में बताया है:

“केरल के कोटय्यम में साल 1980 में कंपनी एक्ट 1956 के अंतर्गत केरल राज्य अनुसूचित जातियों और अनुशंसित समुदायों से ईसाई विकास निगम की स्थापना की गई थी। इसका प्रमुख लक्ष्य अनुसूचित जातियों और अनुशंसित समुदायों से ईसाई पंथ में मतांतरित लोगों के व्यापक समाज, शैक्षिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उत्थान एवं अन्य जीवन स्थितियों को बढ़ावा देना है।

हालाँकि, यह विभाग एक सरकारी उपक्रम है, लेकिन इसकी स्थापना कंपनी अधिनियम 1956 के तहत करना सवाल खड़े करता है। आमतौर पर ऐसे विभागों को ‘सोसाइटी एक्ट’ और ‘स्पेशल एक्ट’ के अंतर्गत स्थापित किया जाता है। करने को वैसे तो कंपनी एक्ट की धारा 8 के अंतर्गत सरकारी उपक्रम को स्थापित किया जा सकता है, लेकिन सोसाइटी की जगह कंपनी के तौर पर इसकी स्थापना की मंशा पर उठे सवाल केवल इतने से नहीं दबाए जा सकते कि यह किसी कानून के किसी पेंच से संभव है। आखिर इस विभाग को केरल सरकार ने सोसाएटी के अन्तर्गत न रखकर कंपनी एक्ट के तहत क्यों रखा है? ऐसा कौन सा व्यवसाय है, जिसे ये विभाग कंपनी एक्ट के तहत कंपनी बन कर कर रहा है?

इसके बारे में राज्य सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर भी जानकारी मौजूद है।

केरल सरकार की आधिकारिक वेबसाइट

केरल सरकार की वेबसाइट के मुताबिक इस विभाग/कंपनी में RTI कानून के तहत सूचना अधिकारियों (PIOs) की भी नियुक्ति की गई है। यानि यह तो पक्का है कि यह विभाग या कंपनी सरकारी ही है, निजी नहीं।

वेबसाइट के अनुसार इस विभाग योजनाएँ हैं:

मतलब कि चाहे ज़रूरत जमीन खरीददारी की हो या फिर विदेशी रोजगार की, शादी के लिए लोन चाहिए हो या निजी लोन- हिन्दू से ईसाई बनने को प्रोत्साहित करने के लिए केरल सरकार ढेरों योजनाएँ चला रही है। साल 2010 में SCCC श्रेणी के लोगों को ₹159 करोड़ की ऋण माफी भी दी गई थी। द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार केरल के SC/ST और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के मंत्री एके बालन ने इसकी सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी।

2010 की इस स्कीम में हिन्दू से ईसाई बनने वालों को 31 मार्च, 2006 की डेडलाइन के कर्ज़ों में ₹25,000 तक का तो कृषि कर्ज पूरी तरह माफ़ कर दिया गया, और जिनका कर्ज इससे अधिक का था, उन्हें जुर्माने के तौर पर वसूली जाने वाली सूद की राशि से मुक्त कर दिया गया। इस योजना की ‘पीठ’ एंग्लिकन चर्च ऑफ़ इंडिया के आर्चबिशप वटप्परा ने भी थपथपाई थी।

केरल में SCCC बाकायदा अलग वर्ग है

केरल में यह SCCC एक विशिष्ट वर्ग है, जिसे केरल सरकार अलग से आरक्षण देती है।

केरल के पिछड़ा वर्ग विकास आयोग की वेबसाइट के हिसाब से हिन्दू से ईसाई बनने वाले लोग पिछड़े वर्ग के भीतर ही एक अलग वर्ग हैं, जिन्हें राज्य सरकार की नौकरियों में विशेष आरक्षण प्राप्त होता है। यह एंग्लो-इंडियंस और लैटिन कैथोलिकों से अलग, और इनके अलावा एक विशेष आरक्षण है। “हिन्दू से ईसाई बने अनुसूचित जनजाति के लोग” वर्ग को राज्य की ओबीसी सूची में भी स्थान मिला हुआ है।

कई पद केवल हिन्दू धर्म छोड़ने को प्रोत्साहित करने के लिए

एक नहीं, कई-कई पद, कई-कई बार हिन्दू से ईसाई बनने वालों के लिए केरल सरकार ने विशेष तौर पर सुरक्षित रखे हैं। जून 2019 में सहायक जेल अधिकारी के पद के लिए भी हिन्दू से ईसाई बने अनुसूचित जनजाति के लोगों से ही आवेदन माँगे गए थे

इसके अलावा लेक्चरर,जल प्राधिकरण के सर्वेयर, जैसे पदों के लिए भी केवल SCCC अभ्यर्थियों से ही आवेदन माँगे गए।

कहाँ गया सेक्युलरिज़्म?

ऐसे में यह सवाल उठता है कि एक ‘सेक्युलर’ संविधान, उससे चलने वाली सेक्युलर सरकार आखिर किसी एक मज़हब से दूसरे में मतांतरण के लिए प्रोत्साहित कैसे कर सकती है। कैसे आस्था के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है कि इस नौकरी के लिए न केवल किसी एक मज़हब के ही लोग आवेदन करें, बल्कि उस मज़हब के अंदर भी नए-नए आए लोग ही आवेदन करें, पुराने ईसाई नहीं? केरल सरकार की यह नीति सेक्युलरिज़्म, अनुसूचित जनजातियों से साथ सामाजिक न्याय आदि कई सारे सिद्धांतों का उल्लंघन है।

(नूपुर शर्मा की मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट का हिंदी रूपांतरण मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

गोरखपुर, वाराणसी के साथ अयोध्या भी आतंकी निशाने पर, नेपाल के रास्ते लश्कर आतंकी भारतीय सीमा में: रिपोर्ट्स

ख़ुफ़िया एजेंसियों की तरफ से अलर्ट जारी होने के बाद से ही गोरखपुर व आसपास के जिलों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। बताया जा रहा है कि नेपाल के रास्ते कुछ आतंकियों के भारतीय सीमा को पार कर देश में घुसपैठ करने की सूचना मिली है। दरअसल इन आतंकियों को भारत में गोरखपुर के ज़रिए घुसवाने में नेपाल में ठिकाना बनाए बैठे आतंकी मोहम्मद उमर मदनी की अहम भूमिका है।

ख़ुफ़िया एजेंसियों की मानें तो मदनी मार्च और मई के महीने में एक नेपाली व्यक्ति के साथ गोरखपुर, वाराणसी और अयोध्या की यात्रा कर कई अहम जगहों की रेकी करने भारत आया था, उसने यहाँ रूककर कई स्थानीय जानकारियाँ भी इकठ्ठा की थीं। सूचना यह भी मिली थी कि वह यहाँ रुककर कुछ लोगों से मिलकर गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन ने अपनी कमर कस ली है। अपनी जाँच के आधार पर सुरक्षा आयुक्त ने अपने पत्र में लिखा है कि 16 सितम्बर को कहा जंगल की रेलवे क्रासिंग के पास एक कार सर्विस सेंटर पर कुछ संदिग्ध लोगों को बात करते सुना गया था जो बोल रहे थे कि “इस दीवाली पर काफी धमाका होगा जिसे पूरा हिंदुस्तान याद रखेगा।”

बता दें की मोहम्मद मदनी आतंकी संगठन लश्कर का ही एक सक्रिय सदस्य है और 15 साल पहले उसे पाकिस्तान में छपे 5 लाख की रकम वाले जाली नोट के साथ गिरफ्तार किया गया था, टेरर फंडिंग के अपराध में मदन भारत की जेल में 10 साल सज़ा भी काट चुका है। जेल से छूटने के बाद उसने नेपाल के जनकपुर जिले के बलकटवा में अपना ठिकाना बना लिया, अब मदनी वहीं से भारत में आतंकवादी गतिविधियों की रूपरेखा तैयार करता है और भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए स्लीपिंग माड्यूल तैयार करने में जुटा है।

अयोध्या: मध्यस्थता पैनल की रिपोर्ट लीक होने से मुस्लिम पक्ष नाराज, ख़ारिज की शर्तें, याचिका दायर

अयोध्या भूमि विवाद मामले में एक नया मोड़ आ गया है। मुस्लिम पक्षकारों के वकील एजाज मकबूल ने अयोध्या मामले में मध्यस्थता पैनल द्वारा की गई रिपोर्ट की सिफारिशों को अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है। दरअसल, बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को मीडिया में एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें कहा गया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड तीन शर्तों के तहत राम जन्मभूमि भूमि पर अपना दावा छोड़ने को तैयार है। मगर अब मुस्लिम पक्षों ने मध्यस्थता रिपोर्ट में दिए गए प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि मुस्लिम पक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करते हैं जो मीडिया में जारी किया गया है और साथ ही उस तरीके को भी अस्वीकार करते हैं जिसमें दावे को वापस लेने का समझौता किया गया था।

इसको लेकर मुस्लिम पक्ष ने याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधियों के अयोध्या साइट पर से अपना दावा वापस लेने के बयान के बाद मुस्लिम पक्ष को आड़े हाथों लिया गया। उनका कहना है कि मीडिया में यह जानकारी मध्यस्थता समिति या फिर निर्वाणी अखाड़ा द्वारा लीक की गई।

याचिका में कहा गया है कि यह स्वीकार करना मुश्किल है कि ऐसी परिस्थिति में मध्यस्थता हो सकता है, खासकर जब मुख्य हिंदू दलों ने खुले तौर पर कहा कि वे किसी भी तरह के मध्यस्थता के पक्ष में नहीं है और अन्य सभी मुस्लिम अपीलकर्ताओं ने भी स्पष्ट किया था कि वे भी किसी भी तरह की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं हैं, तो फिर आखिर मध्यस्थता कैसे हो सकती है। उनका कहना है कि मध्यस्थता कमिटी ने जो प्रयास किया था उसमें उनका कोई आदमी शामिल नही था।

याचिका के मुताबिक वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से जफर फारुकी को संरक्षण देने की अपील की थी। उनका कहना है कि पंचू ने मुख्य न्यायाधीश से कहा था कि वो उत्तर प्रदेश सरकार को इसके लिए आदेश दें।

इसके अलावा, याचिका में कहा गया है कि मध्यस्थता समिति खुद प्रतिनिधि नहीं थी और मीडिया में लीक हुआ रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन था। याचिका में लीक होने के समय पर भी संदेह जताया गया है।

उल्लेखनीय है कि मीडिया के सामने आई रिपोर्ट में कहा गया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने माँग की है कि ‘THE PLACES OF WORSHIP (SPECIAL PROVISIONS) ACT, 1991 ACT NO. 42 OF 1991’ को पूर्णरूपेण लागू कर इसे अभेद्य बनाया जाए। साथ ही सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने यह भी कहा है कि अयोध्या में 22 मस्जिदों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सरकार उठाए। इसके साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अंतिम शर्त रखी है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के नियंत्रण में जितने भी धार्मिक स्थल हैं, उनकी स्थिति की जाँच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट एक समिति बनाए। 

बता दें कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई पूरी कर ली है और फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस पर अपना फैसला सुनाएगी। बताया जा रहा है कि 14 से 16 नवंबर 2019 के बीच इस पर फैसला आ सकता है।

INX मीडिया घोटाला: CBI ने दाखिल की चार्जशीट, चिदंबरम सहित 14 लोगों के नाम

INX मीडिया मामले में सीबीआई ने आज चार्जशीट दाखिल कर दी। इस चार्जशीट में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम सहित 14 लोगों के नाम शामिल हैं। अब मामले में आगे की सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के अनुसार सीबीआई की तरफ से दायर आरोप पत्र में कार्ति चिदंबरम, पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी समेत 14 लोगों को आरोपित बनाया गया है।

इसके अलावा भास्कर, सिंधुश्री खुल्लर, अनूप पुजारी, प्रबोध सक्सेना, आर प्रसाद जैसे लोगों के नाम भी चार्जशीट में हैं। इस चार्जशीट में वित्त मंत्रालय के 4 पूर्व अफसरों का नाम हैं। साथ ही आईएनएक्स मीडिया, एएचसीएल और शतरंज प्रबंधन पर भी इसमें आरोप हैं।

उल्लेखनीय है कि काफी दिनों से तिहाड़ जेल में बंद कॉन्ग्रेस नेता को गुरुवार को यानी कल (17 अक्टूबर, 2019) राउज़ एवेन्यू कोर्ट में एक बार फिर झटका लगा था। दरअसल, दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने चिदंबरम को 7 दिनों के लिए ईडी की कस्टडी में भेज दिया।

जिसके बाद आईएनएक्स मीडिया केस में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम अब आगामी 24 अक्टूबर तक ईडी की कस्टडी में रहेंगे। इस दौरान पी चिदंबरम को घर से खाना ले जाने की अनुमति मिलेगी, वेस्टर्न टॉयलेट और दवाइयाँ ले जाने की भी इजाजत दे दी गई है। वहीं सीबीआई ने भी चिदंबरम की न्यायिक हिरासत 14 दिन आगे बढ़ाने की माँग हैं और ईडी भी एक और मामले में चिदंबरम को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती है।

हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की गला रेत कर हत्या, मिठाई के डिब्बे में छिपाकर लाए थे चाकू-पिस्टल

लखनऊ में नाका क्षेत्र स्थित हिन्दू महासभा कार्यालय में कमलेश तिवारी को बदमाशों ने गला रेतकर व गोली मारकर हत्या कर दी। शुक्रवार (18 अक्टूबर 2019) को हत्या की वारदात को अंजाम देकर हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए। गंभीर हालत में तिवारी को ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

डॉक्टरों ने बताया कि कमलेश तिवारी का किसी धारदार हथियार से गला रेता गया। पुलिस का कहना है कि हत्या की वारदात को किसी परिचित ने अंजाम दिया है। जानकारी के अनुसार, कमलेश तिवारी पर खुर्शीद बाग स्थित उनके कार्यालय में ही हमला हुआ। घटना-स्थल से पुलिस ने रिवॉल्वर भी बरामद की है। इससे यह माना जा रहा था कि कमलेश को सटाकर गोली मारी गई होगी।

डॉक्टर्स की पुष्टि किए जाने के बाद पता चला कि कमलेश तिवारी का गला रेतकर बड़ी बेरहमी से हत्या की गई। अभी तक यह पता चला है कि तिवारी से मिलने दो लोग आए थे, इनमें से एक ने भगवा वस्त्र पहन रखे थे। फ़िलहाल, पुलिस आरोपितों की तलाश में जुटी हुई है।

मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, तिवारी से मिलने आए दो लोग मिठाई के डिब्बे में असलहे और चाकू छिपाकर लाए थे। बातचीत के दौरान हमलावरों ने वारदात को अंजाम दिया और वहाँ से भाग निकले। गोली की आवाज़ जब बाहर निकली तो अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया। ख़बर के अनुसार, दो हमलावरों में एक ने तिवारी का गला रेता और दूसरे ने गोली मारी। उनके शरीर पर 15 से अधिक वार किए गए थे।

कमलेश तिवारी की दिन-दहाड़े हत्या किए जाने से लोगों में काफ़ी आक्रोश फैल गया है। उनके समर्थकों ने ख़ुर्शीद बाग़ कॉलोनी में प्रदर्शन शुरू कर दिया है। घटना-स्थल पर बड़ी संख्या में पुलिस बल व पीएसी की तैनाती कर दी गई है।

ग़ौरतलब है कि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे कमलेश तिवारी को पैगंबर साहब के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने के एक मामले में रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) के तहत गिरफ़्तार कर जेल भेजा गया था। इसके बाद साल 2017 में उन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले हिन्दू समाज पार्टी का गठन किया था।

सोनिया गाँधी ने हरियाणा की रैली से खींच लिए हाथ, कॉन्ग्रेस ने नहीं बताई कोई वजह

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हरियाणा चुनाव से हाथ खींच लिए हैं, इस चुनावी माहौल में हरियाणा के महेंद्रगढ़ में अपनी पहली चुनावी रैली से ठीक पहले ही आखिरी वक़्त पर जनसभा को संबोधित करने नहीं पहुँचीं। इसकी जानकारी भी पार्टी की ही ओर से ट्वीट के जरिए दी गई।

वहीं सोनिया की जगह राहुल इस रैली को संबोधित करेंगे इस बात की जानकारी देते हुए प्रदेश की कॉन्ग्रेस पार्टी ने लीपापोती करते हुए लिखा कि –

“आज दोपहर 2 बजे महेंद्रगढ़ में राहुल गाँधी जनता से संवाद करने पहुँच रहे हैं। किसी कारणवश कॉन्ग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी जी आने में असमर्थ हैं। आपसे निवेदन है कि इस जनसभा में पहुँच कर कॉन्ग्रेस परिवार को अपना समर्थन दें।”

कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस बात की कोई जानकारी नहीं दी कि सोनिया ने आखिरी वक़्त पर हरियाणा की जनसभा को संबोधित करने से क्यों इनकार कर दिया, यदि वे इस जनसभा को संबोधित करतीं तो पार्टी अध्यक्ष का पद संभालने के बाद इस चुनावी संग्राम में यह उनकी पहली जनसभा होती। हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सोनिया चुनाव से ज्यादा अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दे रही हैं।

बता दें कि राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए उनकी माँ सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष पद से खुदको दूर कर लिया था मगर इसी साल अगस्त में लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार का मुँह देखने के बाद एक बार फिर सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाली थी।

बता दें कि महेंद्रगढ़ में कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से राव दान सिंह मैदान में हैं जिनका मुकाबला भाजपा के राम बिलास शर्मा से है। 2014 में 90 सीट वाली हरियाणा की विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा को 47 सीटें मिली थीं वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी के खाते में 15 सीटें और इंडियन नेशनल लोक दल (आईएनएलडी) के पक्ष में 19 सीटें आईं थीं।

DoE ने कहा बंद होंगे 700 से अधिक ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालय, सिसोदिया ने कहा – नहीं होने दूँगा

दिल्ली में 700 से अधिक प्राथमिक विद्यालय बंद होंगे, जो बिना मान्यता प्राप्त किए चल रहे हैं। इस संदर्भ में राज्य शिक्षा निदेशालय (DoE) का कहना है कि इन ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा-18 का उल्लंघन किया है। इसके अनुसार, कोई भी विद्यालय, स्थानीय सरकारी प्राधिकरण द्वारा प्रमाण पत्र प्राप्त किए बिना कार्य नहीं करेगा।

ख़बर के अनुसार, इन सभी ग़ैर-मान्यता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों की पहचान नगर निगम द्वारा की जाएगी। इस संबंध में शिक्षा निदेशालय के एक अधिकारी ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया,

“जिला DDEs को मध्य वर्ग और उससे ऊपर के सभी ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों को बंद करने का नोटिस जारी करना चाहिए। निजी विद्यालय की शाखा दिल्ली के विभिन्न इलाक़ों में चल रहे 700 से अधिक ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों की सूची को DDEs के साथ साझा करेगी।”

वहीं, दिल्ली राज्य पब्लिक विद्यालय मैनेजमेंट एसोसिएशन के अनुसार, शहर में लगभग 3,000 ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालय हैं, जो हर साल दस लाख छात्रों को प्रवेश देते हैं। ऐसा सरकार द्वारा चेतावनी दिए जाने के बावजूद होता है। दरअसल, पिछले साल मई में, शिक्षा निदेशालय ने विद्यालयों को मान्यता देने या कक्षाएँ रोकने और 2018-19 शैक्षणिक सत्र में प्रवेश से बचने का अंतिम अवसर दिया था।

वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी बताया कि सरकार वास्तव में सरकारी मान्यता प्राप्त विद्यालयों में अवैध प्रैक्टिस पर भी नकेल कसने जा रही है। ऐसे विद्यालयों की मान्यता वापस लेने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना चाहिए और इस मामले को सख़्ती से निपटाया जाना चाहिए।

दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 से पता चला है कि शहर के सरकारी विद्यालय अभी भी सीखने के परिणामों के मामले में पिछड़ रहे हैं। इसमें बताया गया है कि दिल्ली के विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात 80:1 पर है, जो शिक्षा के अधिकार (RTE) के दिशा-निर्देशों के ख़िलाफ़ है।


इसके अतिरिक्त, दिल्ली विद्यालय शिक्षा मानदंडों में कहा गया है कि विद्यालयों की मान्यता भौगोलिक स्थिति के अनुसार होगी। नामांकन अनुपात बनाए रखने के लिए इलाक़े के अन्य विद्यालयों के साथ तालमेल बैठाए रखना होगा। आपको बता दें कि ग़ैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों की समस्या अन्य राज्यों में भी है। दरअसल, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में बिना मान्यता प्राप्त विद्यालयों से संबंधित मामले पर हरियाणा के अतिरिक्त मुख्य सचिव को तलब किया था।

दिल्ली विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में राज्य शिक्षा निदेशालय द्वारा गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करने की पहल पर शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया का कहना है कि किसी भी स्कूल को बंद नहीं किया जाएगा

अल्लाह गवाह है कि मैंने उस दिन 1 नहीं बल्कि 15 बॉटल ख़ून दिया था: असदुद्दीन ओवैसी, लोगों ने लिए मजे

चुनावी माहौल है और ऐसे में हवाई वादे चलते हैं पर ये क्या कि कोई हवा बाँधने के चक्कर में कुछ ऐसा कह दे जो संभव ही न हो, साथ ही बेहद बेवकूफाना भी। कुछ ऐसा ही किया है, ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने, वैसे उनका विवादों से गहरा नाता रहा है। अपनी बेतुकी बयानबाज़ी के चलते आए दिन उनकी किरकिरी होती रहती है। रैलियों या समारोहों में भाषण देते समय वो अक्सर इतना बेसुध हो जाते हैं कि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता होता कि आख़िर वो बोल क्या रहे हैं! ऐसा हम नहीं बल्कि सोशल मीडिया डोमेन में कहा जा रहा है।

ऐसा ही कुछ विचित्र देखने को मिला उनकी एक रैली में, जहाँ वो लोगों को संबोधित करते हुए कह रहे थे, “एक अस्पताल में ख़ून की ज़रूरत थी तो किसी डॉक्टर ने आवाज़ लगाई कि क्या किसी का ब्लड ग्रुप ओ पॉज़िटिव (O+) है, तो मैंने कहा मेरा है।” इस पर डॉक्टर ने ओवैसी से ख़ून देने के लिए कहा।

इसके आगे ओवैसी ने कहा, “अल्लाह गवाह है कि मैंने उस दिन 1 नहीं बल्कि 15 बॉटल ख़ून दिया था, और हुआ क्या ख़ून भी देता था और अपने हाथ से वो बॉटल लेकर भागता था जहाँ उस ख़ून की ज़रुरत थी।”

ग़ौर करने वाली बात यह है कि ओवैसी कितनी सफ़ाई से अपने बयान में लोगों को ठगने का काम कर गए। बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि उनके इस बेतुके बयान का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। 

दरअसल, एक स्वस्थ्य व्यक्ति के शरीर में लगभग 5-6 लीटर ख़ून होता है। 1 यूनिट ब्लड से मतलब एक बॉटल ख़ून से होता है, जिसमें 350-450 मिलीलीटर ख़ून होता है। ओवैसी के बयान के मुताबिक़ उन्होंने 1 नहीं बल्कि 15 बॉटल ख़ून दिया। इसका मतलब उन्होंने 15 यूनिट ब्लड दिया जो कि हुआ (350×15= 5,250) या (450×15= 6,750 मिलीलीटर)। सरल शब्दों में कहें तो ओवैसी ने उस दिन 5-6 लीटर ख़ून दिया, यानी अपने शरीर की एक-एक बूँद तक उन्होंने डोनेट कर दी।

अश्चर्य इस बात पर होता है कि आख़िर इतना ख़ून देने के बाद उनके अंदर इतनी ताक़त कैसे बनी रही कि वो एक तरफ़ ख़ून भी देते रहे और हर बॉटल को दौड़कर ज़रुरतमंद तक पहुँचाते भी रहे। भई, ये तो किसी करिश्माई कमाल से कम नहीं, क्योंकि जिस अवस्था में कोई दौड़ना तो दूर की बात साँस तक नहीं ले सकता, उस अवस्था में ओवैसी दौड़ रहे थे।

ओवैसी का यह 15 बॉटल वाला वीडियो सोशल मीडिया पर भी ख़ूब छाया हुआ है, जिस पर यूज़र्स जमकर चुटकी ले रहे हैं। किसी ने कहा कि कहीं वो बॉटल 30 मिलीलीटर वाली तो नहीं थी, तो किसी ने लिखा कि वो बॉटल 2 मिलीलीटर वाली होंगी।

मतदाताओं को लुभाने के लिए ओवैसी जैसे नेता भोली-भाली जनता को बरगलाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते, फिर भले ही अपनी बयानबाज़ी से उन्हें मुँह की ही खानी पड़े।

120 हिन्दू परिवार के 700 लोगों को भगा दिया जाएगा उनके घरों से? NGT के सख्त कदम से संशय बरकरार

कुछ साल पहले तीर्थयात्रा के नाम पर भारत आकर बसे पाकिस्तानी हिंदू परिवारों का भविष्य अब खतरे में है। दरअसल, एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने दिल्ली स्थित मजनूं का टीला के दक्षिण में यमुना के किनारे बनी झुग्गियों और अर्ध स्थायी संरचनाओं पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मामले में कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। पर्यावरण और पारिस्थिकी के नजर से यह सही भी है लेकिन सवाल यह भी कि आखिर पाकिस्तान से जान बचा कर आए हिन्दू शरणार्थी परिवार आखिर जाएँगे कहाँ? क्योंकि इन सभी शर्णार्थियों ने इसी इलाके में अपना निवास बनाया है, जहाँ अतिक्रमण के ख़िलाफ़ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

जानकारी के मुताबिक 100 से ज्यादा परिवार कुछ साल पहले तीर्थयात्रा के वीजा पर भारत आए थे, लेकिन वे यहाँ से वापस जाने की बजाए यहीं बस गए। उन्होंने यमुना के किनारे झुग्गियों में रहना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और अब इनमें से अधिकतर के पास मजनूं का टीला के पते पर बने आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते सब हैं। इसके अलावा इन लोगों के बच्चों ने भी नजदीक के सरकारी स्कूलों में जाना शुरू कर दिया है। लेकिन फिर भी अगर एनजीटी के निर्देशानुसार इस मामले पर काम किया जाता है, तो क्या इन हिन्दू परिवारों को कहीं और बसाने का इंतजाम किया गया है या इन्हें वापस इनके मुल्क (पाकिस्तान, जिसे इन्होंने अपना मुल्क मानने से इनकार कर दिया है) भेज दिया जाएगा?

सालों से ठंडे बस्ते में पड़े इस मामले पर जगदेव नामक व्यक्ति ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष कुछ दिन पहले रिपोर्ट पेश की थी। जिसके बाद इस मामले पर खुलासा हुआ। याचिका में जगदेव ने गुरुद्वारे के दक्षिणी हिस्से से सटे अतिक्रमण के ख़िलाफ़ और पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई के ख़िलाफ कार्रवाई की माँग की थी।

इसी पर संज्ञान लेते हुए ही एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सख्ती से पूछा कि प्राधिकारी कैसे यमुना क्षेत्र में ऐसे अतिक्रमण की अनुमति दे सकते हैं? यहाँ जानना जरूरी है कि एनजीटी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों के निरीक्षण पर आधारित है।

डीडीए की ओर से एनजीटी के समक्ष पेश हुए वकील राजीव बंसल और अधिवक्ता कुश कुमार ने इस दौरान निरीक्षण की रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों पर बताया। उन्होंने कहा कि स्थल के निरीक्षण के दौरान पता चला है कि ये 120 हिन्दू परिवार साल 2011 से 2014 तक तीर्थयात्रा वीजा पर भारत आए थे। जिनमें कुल 700 लोग हैं। ये यमुना के किनारे बनी झुग्गी और अर्ध-स्थायी संरचनाओं में रह रहे हैं। इनके द्वारा कब्जा की हुई जमीन करीब 5000 वर्ग गज है।

बता दें कि ये 120 पाकिस्तानी हिन्दू परिवार इस इलाके में सालों से झुग्गियों में बसे हुए हैं, लेकिन इन्हें कोई बिजली मुहैया नहीं करवाई गई है। जल आपूर्ति भी साझा नलों से की जा रही है और कुछ निवासियों ने तो जीवनयापन के लिए फुटपाथ पर छोटी दुकानें भी शुरू कर दी हैं। इस जमीन पर आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय का अधिकार है। जिसे देखभाल और रख रखाव के लिए 7 जुलाई 1971 को डीडीए को हस्तांतरित किया गया था।