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अर्बन नक्सल: सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा को बेल नहीं, भीमा-कोरेगाँव हिंसा की रची थी साजिश

कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा को जमानत देने से बॉम्बे हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है। इन पर भीमा-कोरेगॉंव हिंसा की साजिश रचने और प्रतिबंधित माओवदी संगठन से संबंध रखने के आरोप हैं। हाई कोर्ट ने तीनों की जमानत याचिका खारिज कर दी। याचिका पर क़रीब एक महीने तक सुनवाई चली, जिसके बाद अदालत ने ये निर्णय लिया। जस्टिस सारंग कोतवाल की एकल पीठ 27 अक्टूबर से ही इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

हाई कोर्ट ने 7 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे मंगलवार (अक्टूबर 15, 2019) को सुनाया गया। दिसंबर 31, 2017 में एल्गार परिषद की एक बैठक हुई थी, जिसमें इन तीनों पर भड़काऊ बयान देने का आरोप है। पुलिस ने कहा है कि इन तीनों के कारण ही पुणे के भीमा-कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी। पुणे पुलिस ने अदालत में बताया कि वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा प्रतिबंधित नक्सली संगठन में भर्ती के लिए के लिए लोगों को उकसा रहे थे और सीपीएम (माओवादी) के लिए कैडर तैयार कर रहे थे।

पुणे पुलिस ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए हाई कोर्ट को बताया कि तीनों कथित एक्टिविस्ट्स 4 ऐसे संगठनों से जुड़े थे, जो प्रतिबंधित माओवादी संगठन के मुखौटे के रूप में कार्यरत हैं। UAPA एक्ट के तहत गिरफ़्तार किए अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज और वर्नोन गोंजाल्विस की जमानत याचिका पिछले वर्ष अक्टूबर में पुणे के एक स्पेशल जज ने खारिज कर दी थी। इसके बाद इन तीनों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। अरुण फरेरा ने अदालत में माना था कि वो मार्क्सिस्ट और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है। हालाँकि, उसने प्रतिबंधित नक्सली संगठनों से सम्बन्ध होने की बात नकार दी थी।

इससे पहले एक अन्य आरोपित गौतम नवलखा ने अपने ख़िलाफ़ दायर की गई एफआईआर को रद्द करने के लिए कोर्ट का रुख किया था, लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका भी ख़ारिज कर दी थी। हालाँकि, नवलखा को 15 अक्टूबर तक गिरफ़्तारी से राहत प्रदान की गई है। हाई कोर्ट से झटका मिलने के बाद नवलखा ने अपने ख़िलाफ़ दायर एफआईआर को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सुधा भारद्वाज के वकील ने आरोप लगाया कि ये डाक्यूमेंट्स उनके क्लाइंट के कंप्यूटर से नहीं मिले थे, बल्कि इन्हें अलग से कॉपी कर के हार्ड ड्राइव में डाला गया था। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा पेश किए गए डाक्यूमेंट्स महज प्रिंटआउट्स हैं।

वहीं पुणे पुलिस की तरफ़ से पेश हुए एडिशनल पब्लिक प्रोसिक्यूटर अरुणा पाई ने हाई कोर्ट को बताया कि सुधा भारद्वाज नक्सलियों के मुखौटा संगठन ‘Indian Association of People’s Lawyers (IAPL)’ की उपाध्यक्ष थीं और इसके बैठकों में भी हिस्सा लेती थीं। सुधा भारद्वाज के वकील ने कोर्ट में अजीबोगरीब बयान देते हुए कहा, “अगर A ने B को कोई पत्र भेजा, उसे C के कंप्यूटर से बरामद किया गया और उसमें D के बारे में कुछ कहा गया है। पुलिस इसे ही सबूत बता रही है।” अब देखना यह है कि हाई कोर्ट से झटका खाने के बाद कथित एक्टिविस्ट्स का क्या रुख रहता है।

अमित शाह के बेटे को घेरने के फेर में चिदंबरम के सांसद बेटे ने खुद की कराई जगहॅंसाई

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम इन दिनों आईएनएक्स मीडिया स्कैम में तिहाड़ में बंद हैं। उनके सांसद बेटे कार्ति चिदंबरम भी घोटाले में आरोपित हैं। अब कार्ति ने एक ऐसा कारनामा किया है जिससे वे खुद की जगहॅंसाई करवा बैठे।

असल में, कार्ति की मंशा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह को घेरने की थी। जय बीसीसीआई के सचिव बने। उन्हें निशाना बनाते हुए कार्ति ने ट्वीट किया, “क्या होता अगर मेरे पिता के गृह मंत्री रहते हुए मुझे बीसीसीआई का सचिव चुना जाता। उस समय राष्ट्रवादी और भक्त इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते?” लेकिन यह पैंतरा उन पर ही भारी पड़ गया। लोगों ने सोशल मीडिया में उनकी पोल खोलते हुए बताया कि वे किन-किन खेलों की संस्था से जुड़े रहे हैं।

सोशल मीडिया यूजर्स ने कार्ति को याद दिलाया कि जब यूपीए की सरकार थी तब वह खुद कई खेल संस्थाओं में आसीन थे।

एक यूजर ने लिखा कि खुद को टेनिस के शौकीन कहने वाले कार्ति ऑल इंडिया टेनिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष थे। मनमाना फैसले की आदत के कारण उन्हें एसोसिएशन से बाहर कर दिया गया था।

बता दें कि इस समय कार्ति चिदंबरम ऑल इंडिया कराटे-डू फेडरेशन के मुख्य संरक्षक हैं और टेनपिन बॉलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के प्रमुख भी।

कई लोगों ने कार्ति का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वे बीसीसीआई के सचिव जैसे पद के लिए क्यों परेशान हो रहे हैं। उन्होंने तो इससे भी बड़े-बड़े काम किए हैं। मसलन, कम्पनियाँ बनाना, करोड़ों कमाना और पूरी दुनिया में संपत्ति खरीदना।

लोगों ने यहाँ तक कहा है कि कार्ति चिदंबरम कैसी बात कर रहे हैं? उनकी थाली में तो पहले से ही बहुत कुछ है। लेकिन फिर भी वो जनता का पैसा खाना चाहते हैं?

गौरतलब है कि जय शाह के बीसीसीआई सचिव बनने के बाद से उन्हें बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया में कई तरह का प्रोपगेंडा चल रहा है। लेकिन शायद कॉन्ग्रेसियों को याद नहीं है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत जैसे उनके नेता भी खेल प्रशासन से जुड़े हुए हैं।

कर्नाटक के सीएम रहे कॉन्ग्रेस नेता सिद्धारमैया ने दी देश में खून-खराबे की धमकी

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सोमवार (अक्टूबर 14, 2019) को यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि अगर भारतीय संविधान में कुछ भी बदलने की कोशिश की गई, तो ‘खून-खराबा’ हो जाएगा। मैसूर के टी नरसीपुरा में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “खबरदार, अगर संविधान को बदलने की कोई कोशिश की गई तो देश में खून-खराबा हो जाएगा।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण करने पहुॅंचे थे। उन्होंने कहा कि आंबेडकर केवल दलितों के लिए नहीं लड़े। वे उन लोगों के साथ भी खड़े हुए जिनका शोषण किया गया था। जातिवाद के कारण समुचित अवसरों से वंचित सभी समुदायों को न्याय दिलाने के लिए आंबेडकर ने ईमानदारी से प्रयास किया।

सिद्धारमैया ने कहा कि कुछ लोग आंबेडकर का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने समाज के हर व्यक्ति को समान अवसर दिए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को भारतीय संविधान पसंद नहीं है, क्योंकि डॉ. आंबेडकर ने अपने संविधान के माध्यम से सभी दलित समुदायों को समान अवसर प्रदान किए।

उल्लेखनीय है कि 2018 में राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान भी सिद्धारमैया ने इसी तरह की टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने संविधान को बदलने की कोशिश की, तो ‘देश में खून-खराबा होगा।’ इस तरह की टिप्पणी कर लोगों को उकसाते वक्त सिद्धरमैया शायद यह भूल जाते हैं कि संविधान में कई बार बदलाव और संशोधन किए गए हैं। इनमें से कई सारे विवादास्पद संवैधानिक संशोधनों के लिए उनकी खुद की पार्टी जिम्मेदार है। इसमें 1972 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के जमाने में किया गया 42वां संवैधानिक संशोधन भी शामिल है, जो ‘मिनी संविधान’ के नाम से कुख्यात है।

FATF में अलग-थलग पाकिस्तान: ‘डार्क ग्रे’ लिस्ट में जाने के आसार, चीन, तुर्की और मलेशिया ने भी काटी कन्नी

आतंकवाद का समर्थन करने और आतंकियों को पालने—पोसने के कारण पाकिस्तान बड़ी मुसीबत में घिरता दिख रहा है। अंतर्राष्ट्रीय फाइनेंसियल एक्शन टास्क फाॅर्स (FATF) पाकिस्तान को ‘डार्क ग्रे’ लिस्ट में डाल सकता है। इससे आर्थिक मोर्चे पर उसके लिए चीजें और मुश्किल हो जाएँगी। पाकिस्तान में पहले सही महॅंगाई आसमान छू रही है और अर्थव्यवस्था संकट में है। ऐसे में एफएटीएफ की कार्रवाई का उस पर विपरीत असर पड़ना तय है। हालाँकि, पाकिस्तान अब भी पूरी कोशिश में है कि उसे ‘डार्क ग्रे’ लिस्ट में न डाला जाए।

टेरर फाइनेंसिंग पर नज़र रखने वाली संस्था एफएटीएफ इस मामले में शुक्रवार (अक्टूबर 18, 2019) तक किसी ठोस निर्णय पर पहुँचेगी। पाकिस्तान के वित्तीय मामलों के मंत्री हम्माद अज़हर भी एफटीएफ के सेशन में पहुँचे और अपने देश का पक्ष रखा। जून 2018 में एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डाल दिया था और उसे ’27 प्वाइंट एक्शन प्लान’ सौंपा गया था। अब एफएटीएफ इन सभी 27 बिंदुओं की समीक्षा कर रहा है, जिसके बाद यह तय किया जाएगा कि पाकिस्तान को ‘डार्क ग्रे’ लिस्ट में डाला जाए या नहीं

फ्रांस के पेरिस में चल रही बैठक में एफएटीएफ यह भी देखेगा कि पाकिस्तान ने टेरर फाइनेंसिंग के मामले में क्या कार्रवाई की है? पाकिस्तान को इस मामले में चीन, तुर्की और मलेशिया से मदद की आस थी। पिछली बार उसे ब्लैकलिस्ट होने से इन्हीं तीन मुल्कों ने बचाया था। लेकिन, इस बार ये तीनों देश भी उससे किनारा करते नजर आ रहे हैं।

बता दें कि दिखावे के लिए इस बैठक से कुछ दिनों पहले पाकिस्तान ने आतंकी हाफिज सईद से जुड़े कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया था। इससे पहले इमरान ख़ान के अमेरिका दौरे से पहले भी पाकिस्तान ने आतंक के ख़िलाफ़ कार्रवाई का नाटक किया था।

यह भी जानने लायक बात है कि एफएटीएफ के ‘ग्रे’ लिस्ट और ‘ब्लैक’ लिस्ट के बीच में ‘डार्क ग्रे’ लिस्ट होता है, जो किसी भी देश के लिए अंतिम चेतावनी के रूप में काम करता है। एफएटीएफ में पाक्सितान बिलकुल अलग-थलग हो चुका है। हालाँकि, एफएटीएफ की अध्यक्षता चीन के पास होने के कारण ऐसी आशंका जताई जा रही कि शायद पाकिस्तान ‘डार्क ग्रे’ लिस्ट में जाने से बच जाए। अमेरिकी सेना के रिटायर्ड कर्नल लॉरेंस सेलिन ने कहा कि आतंक समर्थक पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में न डालने से एफएटीएफ की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होंगे।

बाबरी मस्जिद के पक्षकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से पल्ला झाड़ा, योगी के मंत्री को बताया सही

बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले से खुद को अलग कर लिया है। बोर्ड ने बीते दिनों कहा था कि वे अयोध्या में विवादित जमीन पर अपना दावा नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह शरीयत के खिलाफ है। इस फैसले से खुद को अलग करते हुए अंसारी ने उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रजा का समर्थन किया है। रजा ने बोर्ड को असंवैधानिक बताया था। अंसारी ने कहा है कि रजा ने जो कहा वह ठीक है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अंसारी ने कहा, “हम हिंदुस्तान के वफादार नागरिक हैं और किसी भी तरह का विवाद पसंद नहीं करते। हम मुस्लिम हैं। हमारा मजहब कहता है कि जिस मुल्क में रहो उसके वफादार बनो, उसका कानून मानो। हम अपने ईमान पर चलते हैं। कौन-क्या कह रहा है उससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि मंदिर-मस्जिद विवाद पर जो भी सुनना था वह अदालत सुन चुका है और जो भी अदालत फैसला लेगी उसे माना जाएगा। उल्लेखनीय है कि दो दिन पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक पर मोहसिन रजा ने सवाल उठाए थे। उन्होंने इस संस्था को असंवैधानिक गैर सरकारी संगठन करार दिया था। साथ में ये भी कहा था कि ये संगठन देश के ख़िलाफ़ बोलने वाला संगठन हैं। उन्होंने पूछा था कि इस बैठक का क्या मतलब है?

इसके बाद ही मीडिया से बातचीत में इकबाल अंसारी ने उनके बयान का समर्थन किया और कहा कि उन्होंने जो भी कहा है ठीक कहा है। कुछ लोग सिर्फ़ नेतागिरी करने चले आते हैं। उनका कहना था कि सारे सवाल राम जन्मभूमि, बाबरी मस्जिद और ट्रिपल तलाक के हैं, तो सरकार को इस पर काम करने का मौक़ा देना चाहिए।

इकबाल के अनुसार तीन तलाक पर इससे पूर्व जो कानून बने थे, वह ठीक थे और जो कानून पीएम मोदी ने बनाए है वो भी ठीक हैं। उनका कहना है कि तलाक का मामला राजनीति करने के लिए नहीं हैं और अब तक तलाक पर केवल राजनीति होती रही है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और सीएम योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में कानून का हिसाब-किताब ठीक चल रहा है। अब सरकार को अपना काम करने देना चाहिए। नेताओं की दखलअंदाजी इसमें बेकार है। ये लोग राजनीति चमकाने के लिए मीडिया के सामने आते हैं और अपने निजी फायदे के लिए विरोध कर रहे हैं।

आपातकाल के बंदियों को पेंशन नहीं, MP के बाद राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने भी लगाई रोक

मध्य प्रदेश के बाद अब राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने भी आपातकाल के दौरान जेल गए मीसा (Maintenance of Internal Security Act) बंदियों की पेंशन पर रोक लगा दी है। अशोक गहलोत कैबिनेट ने मीसा पेंशन पर रोक लगाने के निर्णय पर मुहर लगा दी है। शहरी विकास एवं आवास मंत्री शांति धारीवाल ने कैबिनेट के निर्णय की जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि मीसा बंदियों को चिकित्सा सुविधाएँ मिलती रहेंगी। लेकिन उनका पेंशन रोक दिया जाएगा, क्योंकि वे उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानते। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी वे होते हैं, जो आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते हैं।

मीसा बंदियों की पेंशन बंद करने के फैसले के पीछे गहलोत सरकार का कहना है कि वित्तीय भार को कम करने के लिए यह निर्णय लिया गया। वहीं, मीसा बंदियों की पेंशन बंद करने पर बीजेपी विधायक वासुदेव देवनानी ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि पेंशन बंद कर लोकतंत्र के सेनानियों का अपमान किया गया है। कॉन्ग्रेस ने साबित किया उसकी मानसिकता अभी भी आपातकाल जैसी है। प्रदेश सरकार आपातकाल का विरोध करने वालों से अब दुश्मनी निकाल रही है।

बता दें कि वसुंधरा राजे ने सत्ता में आने के बाद मीसा बंदियों के लिए पेंशन शुरू किया था। वसुंधरा राजे ने उन्हें लोकतंत्र सेनानी का दर्जा दिया था। वसुंधरा राजे सरकार ने मीसा बंदियों को 20 हजार रुपए मासिक पेंशन, नि:शुल्क बस यात्रा और नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा देने की योजना लागू की थी। इन्हें स्वतंत्रता सेनानी की तरह लोकतंत्र सेनानी नाम एवं सम्मान दिया गया था। वर्तमान में प्रदेश में 1120 मीसा बंदी हैं।

राजस्थान सरकार के इस फैसले पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा कि सरकार जनता से डरी हुई है। विद्वेष की राजनीति को पोषित करने वाली सरकार ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़ने वाले योद्धाओं की पेंशन पर रोक लगा दी है। कई गरीब परिवार जो इसी पर निर्भर थे उनका निवाला छीन लिया है। आज तानाशाही की बात करने वाले मुख्यमंत्री जी को ध्यान होगा आपातकाल कॉन्ग्रेस ने लगाया था।

मायावती ने किया धर्म बदलने का ऐलान, कहा- मेरे साथ देश भर में बड़ी तादाद में लोग करेंगे धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि वो अपना धर्म-परिवर्तन कर लेंगी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नागपुर में एक जनसभा सम्बोधित करते हुए उन्होंने ये ऐलान किया। मायावती ने कहा कि उनके समर्थक ज़रूर ऐसा सोचते होंगे कि देश के प्रथम क़ानून मंत्री बाबसाहब भीमराव आंबेडकर की तरह वो कब धर्मांतरण करेंगी? बसपा सुप्रीमो ने ऐलान किया कि वो बौद्ध धर्म की दीक्षा ज़रूर लेंगी। हालाँकि, उन्होंने इसके लिए कोई समय नहीं बताया। उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में सही समय पर फ़ैसला लिया जाएगा।

साथ ही मायावती ने बड़ा दावा करते हुए कहा कि उनके साथ पूरे देश में बड़ी तादाद में लोग धर्मांतरण करेंगे। मायावती ने वहाँ उपस्थित लोगों से कहा कि देशव्यापी धर्म-परिवर्तन तभी संभव हो सकता है जब ‘बाबासाहब के अनुयायी’ उनके बताए रास्तों पर चलें। बता दें कि नागपुर की ही दीक्षा भूमि में भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। अक्टूबर 14, 1956 को उन्होंने यहाँ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। अभी इसके 2 महीने भी नहीं पूरे हुए थे कि उसी साल 6 दिसंबर को आंबेडकर का निधन हो गया।

मायावती ने आंबेडकर का नाम लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वह उनके ‘हिन्दू राष्ट्र’ वाले बयान से असहमत हैं, क्योंकि बाबासाहब ने सभी धर्मों व सम्प्रदायों का ख्याल रखते हुए धर्मनिरपेक्षता के आधार पर संविधान बनाया था। उन्होंने इस दौरान कॉन्ग्रेस को भी आड़े हाथों लिया। बसपा अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ भाजपा दलितों व पिछड़ों को मिले आरक्षण को रोकना चाहती है और कॉन्ग्रेस भी इसमें उसका साथ दे रही है। उन्होंने अर्थव्यवस्था को लेकर भी मोदी सरकार पर निशाना साधा।

नागपुर में मायावती ने किया धर्मान्तरण का ऐलान

महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव होने हैं और 24 अक्टूबर को मतगणना के बाद परिणाम आ जाएँगे।भाजपा-शिवसेना गठबंधन राज्य में काफ़ी मजबूत नज़र आ रही है और कॉन्ग्रेस और एनसीपी गठबंधन के कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम चुके हैं। कॉन्ग्रेस और एनसीपी दोनों आंतरिक कलह से जूझ रही हैं। राजस्थान में मायावती के 6 विधायक कॉन्ग्रेस के साथ हो लिए। इसीलिए, इस बार बसपा सुप्रीमो टिकट वितरण में फूँक-फूँक कर क़दम रख रही हैं।

लंबे वक्त तक चलेगी बीजेपी की सरकार, कॉन्ग्रेस की दया के कारण जिंदा नहीं मुस्लिम: ओवैसी

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार में लगे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी सोमवार (अक्टूबर 14, 2019) को ठाणे जिले के भिवंडी में पार्टी प्रत्याशी के लिए वोट माँगने पहुँचे। यहाँ ओवैसी ने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पर जमकर तंज कसा। उन्होंने राहुल गाँधी पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जब कोई जहाज डूबता है, तो जहाज का कैप्टन सभी को सुरक्षित निकाल लेता है, लेकिन राहुल गाँधी ऐसे कप्तान हैं जो कॉन्ग्रेस के जहाज को डूबता देख छोड़कर भाग गए।

ओवैसी ने कहा, “जब एक जहाज समुद्र के बीच में डूबता है, तो कप्तान सभी को सुरक्षित रूप से बाहर निकालता है, लेकिन राहुल गाँधी वो कप्तान हैं जो कॉन्ग्रेस को डूबते हुए देखकर उसे छोड़कर भाग जाते हैं। 70 साल से हम मुस्लिम कॉन्ग्रेस की दया के कारण जीवित नहीं हैं, बल्कि हम तो संविधान और ईश्वर की कृपा से जीवित हैं।”

तीन तलाक को अपराध बनाने वाले कानून की आलोचना करते हुए ओवैसी ने कहा कि यह कानून सभी मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ है। उन्होंने इस फैसले को गलत बताते हुए कहा कि भाजपा लंबे समय तक चलने वाली सरकार है और इसका मतलब यह है कि यह अंधेरा लंबे समय तक चलने वाला है। इस दौरान ओवैसी ने मुस्लिमों के लिए आरक्षण देने की बात करते हुए यह भी कहा कि जिस तरह से सरकार ने मराठों को आरक्षण दिया है, उसी तरह से मुस्लिमों को भी आरक्षण देना चाहिए।

गौरतलब है कि ओवैसी ने इससे पहले भी एक रैली के दौरान राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा था, “ये पार्टी (कॉन्ग्रेस) न तो सुधरने वाली है और न ही संभलने वाली, इनकी हालत ऐसी है कि गिरे तो गिरे, मेरी टाँग तो ऊपर है।” उन्होंने कहा था कि देश की राजनीतिक तस्वीर से कॉन्ग्रेस पार्टी खत्म हो चुकी है। अब किसी भी सूरत में कॉन्ग्रेस की वापसी नहीं हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान ने भी राहुल गाँधी पर इसी तरह की टिप्पणी करते हुए कहा था, “जब कोई जहाज डूबता है, तो उसका कैप्टन अंत तक डटा रहता है, लेकिन कॉन्ग्रेस ऐसा डूबता जहाज है, जिसका कप्तान (राहुल गाँधी) सबसे पहले भाग जाना चाहता है। वो पार्टी के डूबते जहाज को छोड़कर जाने वाले पहले शख्स हैं।”

बौखलाए आतंकियों ने राजस्थान के ट्रक ड्राइवर को शोपियाँ में गोलियों से भूना

जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ में सोमवार (अक्टूबर 14, 2019) को दो आतंकियों ने राजस्थान के एक ट्रक ड्राइवर को निशाना बनाया। ड्राइवर शरीफ खान की गोली मार कर हत्या कर दी। इसके बाद आतंकियों ने के स्थानीय बाग मालिक की पिटाई भी की।

पुलिस ने बताया कि घाटी में फलों से भरे ट्रकों की आवाजाही शुरू होने से हताश होकर आतंकवादियों ने शीरमाल गाँव में यह हमला किया। आतंकियों की फायरिंग के बाद ट्रक ड्राइवर शरीफ खान की मौक़े पर मौत हो गई। कहा जा रहा है इस घटना में शामिल एक आतंकवादी पाकिस्तानी था। पुलिस इन्हें ढूँढने के लिए सर्च ऑपरेशन चला रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार घटना की सूचना मिलने के बाद इलाके में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और सीआरपीएफ की टीमों को भेजा गया। जिसके बाद उन्होंने इन आतंकियों को ढूँढने के लिए पूरा इलाका सील कर सर्च ऑपरेशन शुरू किया। आतंकियों की तलाश जारी हैं। सुरक्षाबल को आशंका है कि हमलावर शोपियाँ में ही छिपे हुए हैं। पुलिस का कहना है कि इस घटना के बाद वहाँ के स्थानीय लोगों में गुस्सा भड़का हुआ है।

उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में लोगों की जिंदगी वापस पटरी पर आते देख आतंकी बौखलाए हुए हैं। सेना की मुस्तैदी के कारण वे अपने नापाक मनसूबों में कामयाब नहीं हो पा रहे, इसलिए अब आम जनता को अपना निशाना बनाने लगे। इस कड़ी में ही उन्होंने शोपियाँ की घटना को अंजाम दिया। इससे पहले वह श्रीनगर और अनंतनाग जिलों में भी ऐसी आतंकी वारदातों को अंजाम दे चुके हैं, जिनमें कई लोगों के घायल होने की खबर थी।

बता दें कि कश्मीर में 70 दिन बाद सोमवार से मोबाइल फोन सेवा बहाल हो गई है। राज्य में सुरक्षा के लिहाज से 5 अगस्त से ही इन पर प्रतिबंध था।

प्रफुल्ल पटेल और इक़बाल मिर्ची की डील को अमित शाह ने बताया देशद्रोह, कहा- ‘जितनी मर्जी चीख लें, कोई फ़ायदा नहीं’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि मुंबई ब्लास्ट के आरोपित और दाऊद के क़रीबी इक़बाल मिर्ची के साथ एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल की डील किसी देशद्रोह से कम नहीं है। उन्होंने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और एनसीपी के संस्थापाक-अध्यक्ष शरद पवार से कहा कि उन सभी को इस मामले में ख़ुद को पाक-साफ़ करना चाहिए। दरअसल, पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल और इक़बाल मिर्ची की पत्नी हाजरा बीबी के बीच 2007 में एक रियल स्टेट डील हुई थी, जिसे लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि इस मामले में राहुल गाँधी से सवाल पूछे जाने चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय केंद्र और महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस की सरकारें थीं। अमित शाह ने इस मामले में एनसीपी अध्यक्ष व महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार से सवाल पूछने की बात कही। शाह ने बताया कि 1993 मुंबई ब्लास्ट में आरोपित इक़बाल मिर्ची के ख़िलाफ़ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था। इन सबके बावजूद प्रफुल्ल पटेल का उनकी पत्नी के साथ डील करना आश्चर्यजनक है।

अमित शाह ने लीक हुए दस्तावेजों को लेकर एनसीपी और कॉन्ग्रेस को घेरे में लिया। उन्होंने कहा कि उन्हें एनसीपी और कॉन्ग्रेस की चुप्पी से हैरानी हो रही है। उन्होंने पूछा कि आखिर प्रफुल्ल पटेल की ऐसी क्या मज़बूरी थी कि उन्हें हाजरा बीबी के साथ डील करना पड़ा? अमित शाह ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा:

“इस मामले में जाँच चल रही है। आप और हम यहाँ बैठकर निर्णय नहीं कर सकते हैं। ईडी मामले की बारीकियाँ जुटा रही है। एक बार जाँच पूरी हो जाए और विश्लेषण हो जाए तभी हम टिप्पणी कर सकते हैं कि इसमें कोई आतंक से सम्बंधित ऐंगल है या नहीं। लेकिन, पहली नजर में इकबाल मिर्ची की पत्नी के साथ करार करना ‘देशद्रोह’ जैसा ही लगता है।”

अमित शाह ने विपक्ष के इन आरोपों को लेकर इनकार किया कि केंद्र सरकार चुनाव के समय गड़े मुर्दे उखाड़ रही है। उन्होंने पूछा कि पी. चिदंबरम मामले के समय कौन सा चुनाव था? साथ ही उन्होंने पूछा कि जब अगस्ता-वेस्टलैंड हैलीकॉप्टर मामले में कार्रवाई की गई, तब कौन सा चुनाव था? इस दौरान शाह ने नेशनल हेराल्ड केस का भी जिक्र किया। इस मामले में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी जमानत पर बाहर हैं। शाह ने पूछा कि उस वक़्त कौन सा चुनाव था? अमित शाह ने कहा कि चाहे वे जितनी मर्जी चीख-चिल्ला लें, इससे कोई फायदा नहीं होने वाला है।