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फैजान को पीटने, धमकाने पर AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ चार्जशीट दायर

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार  (सितंबर 13, 2019) को आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ मारपीट के एक मामले में चार्जशीट दायर की है। मामला 2018 का है। एसएम फैजान ने 10 अक्टूबर 2018 को दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

बता दें कि फैजान ने इससे पहले भी खान के खिलाफ दिल्ली के जामिया पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज करवा रखी थी। इसके मुताबिक खान ने फैजान की गाड़ी को टक्कर मार दी थी और जब उसने इसका विरोध किया तो बंदूक दिखाकर उसके साथ मारपीट की और धमकी दी। इसके बाद से ही अमानतुल्लाह केस वापस लेने के लिए उसे लगातार धमका रहे थे।

अमानतुल्लाह ने फैजान के साथ दूसरी बार तब मारपीट की थी, जब वह काका नगर में अपने एक दोस्त की बहन की शादी में गया था। AAP विधायक ने फैजान को पिछला मुकदमा वापस लेने के लिए धमकाया। जाँच के दौरान पुलिस को सबूत के तौर पर शादी में फैजान के साथ हुई मारपीट के चश्मदीद गवाह और कुछ वीडियो फुटेज मिले हैं। फैजान ने बताया कि शादी समारोह के दौरान अमानतुल्लाह खान और उनके सहयोगियों ने विवाह भवन से बाहर जाने के रास्ते को बंंद कर दिया और फिर पिछली घटना को लेकर एफआईआर दर्ज कराने के लिए उसके साथ मारपीट की थी। 

AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। पिछले साल दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ सीएम के आवास पर हुई मारपीट में भी कथित तौर पर शामिल थे।

इसके अलावा, भ्रष्टाचार, दिल्ली वक्फ बोर्ड में अनियमितता, धमकी और यौन उत्पीड़न के मामले में AAP विधायक के खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची है। पिछले साल, वह सिग्नेचर ब्रिज के एक कार्यक्रम में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ धक्का-मुक्की करते हुए भी पकड़े गए थे।

हिंदुस्तान ने मार गिराए दो पाकिस्तानी सैनिक, सीजफायर के उल्लंघन पर चखाया मज़ा

हिंदुस्तान की सेना ने दो पाकिस्तानी सैनिकों को हाजीपुर सेक्टर में ढेर कर दिया। घटना तीन दिन पहले (10-11 सितम्बर) की है। पाकिस्तान की ओर से सीजफायर का उल्लंघन किए जाने के बाद भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई में उसक दोनों सैनिक मार गिराए।

मारे गए सैनिकों में से एक का नाम गुलाम रसूल है। वह हिन्दुस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई में मारा गया। ANI के अनुसार गुलाम रसूल पाकिस्तानी पंजाब के बहावलनगर का रहने वाला है। उसकी लाश उठाने के लिए पाकिस्तान ने पहले तो फायरिंग तेज कर हिन्दुस्तानी सेना को पीछे धकेलने की कोशिश की। लेकिन वे न केवल इसमें नाकाम रहे, बल्कि दूसरे मजहब के अपने एक और पंजाबी सैनिक को गँवा दिया। इसके बाद कल (13 सितंबर) सफ़ेद झंडा दिखा पाकिस्तान दोनों के शव ले गया।

यहाँ मारे गए सैनिकों की जाति और प्रांत बताना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना अपने ही सैनिकों की लाशों के साथ जातीय भेदभाव करती रहती है। मारे जाने वाले सैनिक कश्मीरी (गुलाम कश्मीर/POK के निवासी) या नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री (NLI) के होते हैं तो पाकिस्तान उनकी लाशें लेने में हिचकता है, जबकि समुदाय विशेष के पंजाबी सैनिकों की लाशें वह हर कीमत पर पाने का प्रयास करता है।

कारगिल युद्ध के समय भी उसने मारे गए कश्मीरी/NLI सैनिकों को ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’/‘नॉन-सिटिज़न्स’ बताकर उनकी लाशें और उनके किए की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था और उन्हें हिंदुस्तान ने दफनाया। पंजाबी समुदाय का पाकिस्तान के राजनीतिक जीवन में वर्चस्व है। सेना में भी उनसे पहले कश्मीरियों और NLI को आगे धकेल दिया जाता है, ताकि अधिकतम जान के जोखिम से पंजाबी बचे रहें और कश्मीरी/NLI होने के नाते मारे गए सैनिकों के शव लाने का दबाव भी न हो।

करीब 4 मिनट के इस वीडियो में  सफ़ेद झंडा लहराते हुए एक आदमी सामने की पहाड़ी से उतर कर तलहटी के पास एक टीले के पास आता है। उसके बाद कुछ दो-तीन और लोग उसके बुलाने पर आते हैं, और एक-एक कर दो शव उठाकर ले जाते हैं।

इससे पहले पाकिस्तान ने केरन सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास पाँच से सात BAT (Border Action Team) कमांडो के शव को LOC पर से उठाने से मना कर दिया था, जबकि हिन्दुस्तानी सेना ने पेशकश की थी कि पाकिस्तानी सेना सफेद झंडे के साथ आकर इन शवों को ले जा सकती है। उस समय भी खबरें चलीं थीं कि मारे गए सैनिकों में मजहब विशेष के पंजाबी न होने के चलते ही पाकिस्तान ने शवों को ले जाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

अजमेर दरगाह के दीवान ने Article 370 हटाने का किया समर्थन, कहा- मुख्य धारा का हिस्सा बने कश्मीरी

अजमेर दरगाह के दीवान सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुस्लिम पाकिस्तान और उसके झूठ का समर्थन नहीं करते।

आबेदीन ने टाइम्स नाउ से बात करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का सरकार का निर्णय सही निर्णय था। उन्होंने कहा कि मीडिया चैनल के माध्यम से, वह पाकिस्तान और उसके नेताओं को एक संदेश भेजना चाहते हैं कि वो जो भारतीयों को देश के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं और ये उम्मीदें पाले बैठे हैं कि वो उनका समर्थन करेंगे, उनकी ये कोशिश और उम्मीदें बुरी तरह से असफल हो जाएँगी।

इतना ही नहीं, ज़ैनुल आबेदीन ने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से कोई और युद्ध होता है, तो देश के अल्पसंख्यक भारतीय सशस्त्र बलों के साथ खड़े होंगे और युद्ध के मैदान में पाकिस्तान का सामना करेंगे।

सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने कहा कि भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करके, कश्मीर मुद्दे को लगभग हल कर लिया है। उन्होंने कहा, “हर भारतीय को सरकार के फैसले पर गर्व होना चाहिए। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि गलत है। यह किसी भी तरह से धर्म से संबंधित नहीं है और भारत के मुस्लिमों को इस फैसले का स्वागत करना चाहिए।”

अजमेर दरगाह के प्रमुख ने सभी कश्मीरी पुरुषों और महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि वो सरकार के फैसले का समर्थन करें, मुख्य धारा का हिस्सा बनने और देश के कानूनों और नीतियों से लाभ उठाने का सुनहरा अवसर प्राप्त करें।

गौरतलब है कि पिछले दिनों सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का भी आह्वान किया था और मजहब विशेष से हिंदुओं के साथ सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के लिए बीफ (गोमांस) का सेवन न करने का आग्रह किया था। हाल ही में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी ने भी पीएम मोदी के फैसले का समर्थन किया था और कहा था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन कश्मीरियों के लिए हानिकारक है।

हिंदी दिवस विशेष: मात्रा ‘मात्र’ नहीं होती, हिंदी में यह ‘माई’ है

किसी पांच सितारा में जाने पर सबसे बड़ी समस्या खाने का ऑर्डर देना भी हो सकता है- वैसे तो खाने का तरीका, कौन सा चम्मच-काँटा या विधि इस्तेमाल करनी है, आदि भी तय करना मुश्किल ही होता है। ऊपर से व्यंजनों के नाम कुछ ऐसे होते हैं, जिनसे शाकाहारी-माँसाहारी का फर्क पता न चले। खाने में स्वाद जाना-पहचाना-सा होगा, या कुछ अजीब, उबला-सा परोस देंगे, यह भी तय कर पाना मुश्किल है। अब, जब ऐसी ‘विकट’ समस्याओं के बीच एक गरीब, मासूम, अंग्रेजी कम जानने वाला, भटका हुआ नौजवान पहली बार 5-सितारा में ऑर्डर देने बैठा तो मेनू को गौर से पढ़ने लगा। चूँकि बिहार से कई लोग महानगरों में नौकरी करने जाते हैं और नौजवान की किस्मत अच्छी थी, इसलिए उसकी टेबल का वेटर भी बिहारी निकला।

उसने नौजवान की समस्या भाँप ली और मेनू में वेज सेक्शन की तरफ़ जाने का इशारा किया। वहां कोफ्ते का एक सेक्शन था और यह नौजवान कोफ्ते क्या होते हैं इतना तो जानता था। व्यंजन का विवरण पढ़कर उसने कद्दू (लौकी)–अंगूर के कोफ्ते का आर्डर कर दिया। नान और कोफ्ते ख़त्म करने के बाद उसने बिल भरा और जब वेटर बिल लेकर वापस आया तो उसने पूछा, “भाई, एक बात बताओ। ये कोफ्ते कद्दू (लौकी) के थे, वो तो ठीक है। मगर ये बताओ कि इसमें अंगूर कहाँ थे?” वेटर ने जवाब दिया, “सर, दोनों चीज़ें इस कोफ्ते को बनाने के लिए बिलकुल बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं। एक लौकी पर एक अंगूर, अगर दस लौकी (कद्दू) का बने तो रसोइया पूरे दस अंगूर डालता है!”

मात्रा बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ होती है। सिर्फ खाने में ही नहीं, भाषा में भी मात्रा का अपना महत्व है। हिंदी और भारत की दूसरी कई भाषाओं में इसके होने या न होने से कई बार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं और अनर्थ हो जाता है। ऐसा ही एक किस्सा सम्राट अशोक के काल का है। किस्से-कहानियों से गायब होने के कारण अशोक का ऐसे तो ज्यादा जिक्र नहीं आता, लेकिन उनकी एक पत्नी का जिक्र बौद्ध ग्रंथों में कई बार आता है। ये पत्नी थी तिष्यरक्षिता, जो कि अत्यंत कामुक मानी जाती थी। अशोक शायद वृद्ध हो चुके थे जब उनका तिष्यरक्षिता से विवाह हुआ। माना जाता है कि इस वजह से तिष्यरक्षिता का ध्यान अन्य पुरुषों पर रहता था। एक मान्यता में उनकी निगाह अशोक के ही एक पुत्र कुणाल पर थी। लेकिन कुणाल उनके प्रयासों को कोई भाव नहीं देता था, इसलिए वो उस से नाराज रहती थी।

दूसरी प्रचलित मान्यता ये है कि वो अपने पुत्र को राजा बनते देखना चाहती थी, जबकि अशोक कुणाल को अगला मौर्य सम्राट बनाना चाहते थे। इस वजह से तिष्यरक्षिता, कुमार कुणाल से खार खाए बैठी थी। जो भी वजह हो, उनकी कुणाल से शत्रुता का अंत बड़ा भयावह निकला। कहते हैं कि कुणाल को अगले राजा के रूप में शिक्षित करने के लिए अशोक ने अपने मंत्रियों को पत्र लिखा “कुमार अधियती”। पत्र किसी तरह तिष्यरक्षिता के हाथ लग गया और उन्होंने अपनी आँख के काजल से उसमें एक बिंदी बना दी। अनुस्वार की मात्रा पड़ते ही पत्र हो गया “कुमार अंधियती”। अधियती का मतलब जहाँ “शिक्षा दो” होता है, अंधियती का मतलब था “अन्धा कर दो” और अन्धा राजा नहीं बन सकता था। नेत्रहीन कुणाल बाद में अपनी बहन के साथ लंका में बौद्ध धर्म प्रचार के लिए चले गए, और मौर्य वंश नाश की ओर बढ़  गया।

बाकी, हिन्दी भाषा में मात्रा उच्चारण के हिसाब से लगती है- जो आप बोलते हैं, पक्का-पक्का वही लिखा जाता है। जो अशुद्ध हिंदी लिखते हैं, वो ज़्यादातर उच्चारण भी अशुद्ध ही कर रहे होंगे। हिंदी दिवस पर “चंद्रबिंदुओं की रक्षिका” जैसे मठाधीशों के साथ-साथ मेरे जैसे लोग जो मात्राओं की गलतियाँ करते रहते हैं, उन तक भी शुभकामनाएँ पहुँचें!

अब अपना टैक्स खुद भरेंगे यूपी के मंत्री, योगी सरकार ने बदला 40 साल पुराना कानून

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने करीब चार दशक पुराने Uttar Pradesh Ministers’ Salaries and Miscellaneous Act, 1981 में संशोधन करते हुए मंत्रियों का आयकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भरे जाने का प्रावधान खत्म कर दिया है। अब से सूबे के माननीयों को अपना आयकर खुद भरना होगा, जबकि पहले यह ज़िम्मेदारी राज्य सरकार के खजाने की होती थी कि वह राज्य सरकार के मंत्रियों का इनकम टैक्स भरे।

उपरोक्त प्रावधान पूर्व प्रधानमन्त्री वीपी सिंह के समय का है, जब वे सूबे के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उस समय उन्होंने सूबे के मंत्रियों का टैक्स सरकार द्वारा भरे जाने की व्यवस्था की थी, जो अब तक चली आ रही थी। मीडिया में पिछले दिनों इसे लेकर काफी सवाल उठ रहे थे और सोशल मीडिया पर भी इस व्यवस्था की काफी आलोचना हो रही थी।

खबरों के मुताबिक इस मामले के संज्ञान में आने के बाद योगी आदित्यनाथ ने इस प्रावधान को खत्म करने का निर्णय लिया। राज्य सरकार के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने भी पुष्टि की कि यह निर्णय योगी आदित्यनाथ के ही निर्देशों पर लिया जा रहा है। इस आशय से प्रदेश के सूचना और जनसम्पर्क विभाग ने भी एक कथन जारी किया है।

मीडिया खबरों के मुताबिक केवल योगी सरकार ही मार्च, 2017 से अब तक अपने मंत्रियों का ₹86 लाख आयकर भर चुकी है। इस स्कीम का फायदा उठाने वालों में ‘आम’ मंत्रियों के अलावा नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह, मायावती, वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता भी शामिल रहे हैं।

BJP के हुए छत्रपति शिवाजी के वंशज, उदयनराजे भोसले ने लोकसभा से भी दिया इस्तीफा

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को शनिवार को बड़ा झटका लगा। सतारा से पार्टी सांसद उदयनराजे भोसले ने बीजेपी का दामन थाम लिया।

बीजेपी अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के घर पर आयोजित कार्यक्रम में वे पार्टी में शामिल हुए। इस मौके पर भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस सहित कई नेता मौजूद थे।

बीजेपी में शामिल होने से पहले सतारा से तीन बार के सांसद भोसले ने लोकसभा की सदस्या से भी इस्तीफा दे दिया। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर उन्हें अपना इस्‍तीफा सौंपा। काफी दिन से भोसले के बीजेपी में शामिल होने की अटकलें थीं, लेकिन शुक्रवार (सितंबर 13, 2019) को ट्वीट कर उन्होंने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा था कि वह 14 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस और चंद्रकांत पाटिल जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में भाजपा में शामिल होंगे।

भोसले के साथ आने के बाद भाजपा ने ट्वीट कर कहा , “आज शिव छत्रपति, जिन्होंने स्वदेश और स्वधर्म  के लिए कठिन से कठिन समय में एक बहुत बड़ा वैचारिक आंदोलन शुरू किया और संघर्ष करके स्वराज की स्थापना की, उनके वंशज उदयनराजे जी भाजपा में आए हैं।” इस मौके पर केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा, “मैं भाजपा के करोड़ों कार्यकर्ताओं की ओर से उनका हार्दिक स्वागत करता हूँ।”

महाराष्‍ट्र चुनाव से पहले एनसीपी के इस बड़े नेता के बीजेपी में शामिल होने से निश्‍चित रूप से शरद पवार को बड़ा झटका लगा है। बता दें कि, भोसले ने गुरुवार (सितंबर 12, 2019) को शरद पवार के घर जाकर उन्हें अपने फैसले से अवगत कराया था। राजनेता के रूप में निर्दलीय करियर शुरू करके वह 1998 में भाजपा में शामिल हुए। फिर कॉन्ग्रेस और वहाँ से एनसीपी में पहुँचे थे। अब वापस से बीजेपी में शामिल हो गए हैं। हाल के समय में कॉन्ग्रेस-एनसीपी के कई नेताओं ने भाजपा और शिवसेना का दामन थामा है।

पुलिस को झॉंसा देने के लिए सपा नेता फिरोज खान ने सेहरे से छिपा रखा था चेहरा

समाजवादी पार्टी के सांसद भू-माफिया आजम खान के समर्थन में सपा नेता पुलिस को चकमा देकर फिल्मी अंदाज में रामपुर पहुँच गए। बता दें कि, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के रामपुर दौरे को लेकर दिन भर प्रशासन अलर्ट रहा। जिले के साथ ही पड़ोसी जनपदों में पुलिस पूरी तरह अलर्ट मोड में नजर आई। बाहरी नेताओं को रामपुर जाने से रोकने की पूरी व्यवस्था की गई थी। इसके बावजूद सम्भल के जिलाध्यक्ष फिरोज खान तमाम कार्यकर्ताओं सहित पुलिस की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गए। वह दूल्हा बने और कार्यकर्ता बराती। उसके बाद आराम से उनकी गाड़ियां पुलिस के सामने से गुजरती हुई रामपुर पहुँच गई।

फिरोज खान ने शेरवानी पहनी, चेहरा फूलों के सेहरे से ढका और दूल्हे का रूप बनाकर गाड़ी में बैठ गए। उनके साथ गाड़ियों में बराती बन कर अन्य कार्यकर्ता भी बैठ गए और पुलिस को धोखा देकर रामपुर पहुँच गए। आजम खान के समर्थन में अखिलेश यादव शुक्रवार (सितंबर 13, 2019) को दो दिवसीय दौरे पर रामपुर पहुँचे थे। उन्होंने पार्टी  के नेताओं और कार्यकर्ताओं को रामपुर पहुँचने का निर्देश दिया था। जिसके बाद सपा अध्यक्ष के दो दिवसीय दौरे को सफल बनाने के लिए बड़ी संख्या में सपा कार्यकर्ता और नेता रामपुर पहुँचने लगे। इसके मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने सभी जिलों में पुलिस को नेताओं को रोकने के आदेश दिए, लेकिन संभल में सपा नेताओं को रोकने में पुलिस कामयाब नहीं हो सकी।

इससे पहले, पुलिस ने चंदौसी चौराहे पर सपा विधायक इकबाल महमूद और सांसद शफीकुर्रहमान बर्क को रोका था। लेकिन फिर बाद में दोनों को रामपुर जाने की अनुमति दी गई। हालाँकि, उनके समर्थकों को वापस भेज दिया गया। कोई भी सपा कार्यकर्ता रामपुर न जा सके, इसके लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आलोक जायसवाल और सर्कल ऑफिसर केके सरोज ने खुद चंदौसी चौराहे की कमान संभाली थी।

घूस लेकर तबादले कर रहे हमारे मंत्री, नहीं सुधरे तो पद से हटाएँ सीएम: कॉन्ग्रेस MLA

छत्तीसगढ़ के कॉन्ग्रेस विधायक बृहस्पति सिंह ने अपनी ही पार्टी के राज्य सरकार पर बड़ा आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि राज्य का शिक्षा विभाग और मंत्री भाजपा के बंधुआ हैं और घूस ले रहे हैं।

सिंह छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के रामानुजगंज इलाके से विधायक हैं, जबकि डॉ. प्रेम साय सिंह बघेल सरकार में शिक्षा मंत्री हैं। विधायक के अनुसार साय तबादलों और पदों दिलाने के आश्वासन के बदले रिश्वत ले रहे हैं।

उन्होंने कहा, “बीजेपी ने हमारे राज्य के शिक्षा विभाग को हाईजैक कर लिया है। उन्होंने हमारे मंत्री को भी हाईजैक कर लिया है। वे रिश्वत ले रहे हैं। हमने यह बात मुख्यमंत्री, वोरा जी और पुनिया जी को बताई है। हमने उनसे भाजपा के चंगुल से मुक्त करने का अनुरोध किया है… यदि वह नहीं सुधरे तो उन्हें उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए।”

बृहस्पति सिंह ने आरोप लगाया कि शिक्षकों के स्थानांतरण में कॉन्ग्रेस के मंत्री ने विधायकों की भी नहीं सुनी। भाजपा के लोगों के द्वारा लिस्ट बनाकर स्थानांतरण कराया गया। इसके कारण काफी विसंगतियाँ हुई हैं। स्थिति ऐसी आ गई है कि आदिवासी बाहुल्य कई गाँव में एकल स्कूलों के शिक्षक का भी स्थानांतरण कर दिया गया है। विधायक ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, मोती लाल वोरा, पीएल पुनिया और पार्टी आलाकमान से शिक्षा विभाग मंत्री को उनके पद से हटाने की माँग की है।

रामानुजगंज में पत्रकारों से बात करते हुए बृहस्पति सिंह ने कहा कि विधायकों के द्वारा स्थानांतरण के लिए शिक्षा मंत्री को सूची दी गई थी। उस सूची से स्थानांतरण न कर भाजपा के लोगों द्वारा बनाई गई सूची के आधार पर स्थानांतरण किया गया। यहाँ तक कि मंत्रियों के अनुशंसा पर भी तबादले नहीं हुए। कॉन्ग्रेस के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा की गई।

विधायक ने आरोप लगाया है कि शिक्षकों के ट्रांसफर के लिए खुलेआम मंत्री के बंगले से पैसे की माँग की जा रही है। लोगों की पोस्टिंग भी रिश्वत के आधार पर हो रही है। बृहस्पति सिंह का कहना है कि उनके प्रस्ताव पर काम नहीं किया जा रहा है और उनके विरोधी को अधिकारी बनाकर उनके खिलाफ काम कराया जा रहा है।

गौरतलब है कि, पिछले दिनों बलरामपुर में राशनकार्ड वितरण कार्यक्रम प्रशासन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में पहुँचे बृहस्पति सिंह ने किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे पर बात करते हुए गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों को जूता मारने का विवादित बयान भी दिया था। इससे पहले प्रदेश के आबकारी मंत्री कवासी ने विवादित बयान देते हुए कहा था कि अगर बड़ा नेता बनना है तो एसपी और कलेक्टर का कॉलर पकड़ो।

नीता अंबानी और उनके तीन बच्चों से आयकर विभाग ने मॉंगा जवाब, ब्लैक मनी एक्ट के तहत नोटिस

आयकर विभाग की मुंबई शाखा द्वारा रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का मालिकाना हक रखने वाले अंबानी परिवार के सदस्यों को नोटिस भेजने की खबरें आ रही हैं। कई देशों की कई एजेंसियों से मिली सूचनाओं के आधार पर इस साल मार्च में जारी यह नोटिस 2015 में पारित ब्लैक मनी एक्ट के तहत जारी की गई है। रिलायंस फाउंडेशन की अध्यक्षा, मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी और उनके तीनों बच्चों पर आरोप है कि उन्होंने अपनी विदेशी आय और सम्पत्ति के बारे में खुलासा नहीं किया था।

2011 में मिली थी सूचना

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 2011 में HSBC बैंक, जिनेवा से 700 भारतीय खाताधारकों की जानकारी मिलने के बाद आयकर विभाग ने यह जाँच शुरू की थी। इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस दावा यह भी करता है कि उसने अंतरराष्ट्रीय खोजी पत्रकारिता संघ (International Consortium of Investigative Journalists) के साथ मिलकर 2015 में ‘स्विस लीक्स’ नामक एक तहकीकात की थी, जिससे HSBC मामले के खातों की संख्या बढ़कर 1,195 हो गई थी।

समाचार पत्र के दावे के मुताबिक उसकी इसी जाँच में सबसे पहले Reliance का नाम सामने आया था। 14 HSBC Geneva खातों में कुल $60.1 करोड़ (₹4200 करोड़ से ज्यादा, आज की विनिमय दर से) टैक्स हेवन माने जाने वाले देशों में बनी कंपनियों के खाते में थे। इन खातों और कंपनियों के सूत्र जटिल ऑफशोर होल्डिंग्स और एसोसिएट चेनों से होते हुए रिलायंस ग्रुप में जाकर मिलते थे।

28 मार्च 2019 का नोटिस, रिलायंस ने नकारा

28 मार्च 2019 को जारी इस नोटिस और 4 फरवरी, 2019 की आयकर विभाग की जाँच रिपोर्ट से पता चलता है कि इन 14 संदिग्ध कंपनियों और खातों में से एक Capital Investment Trust का अंतिम लाभार्थी विभाग अंबानी परिवार के सदस्यों को मानता है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार जब उसने इस मामले में रिलायंस का पक्ष जानना चाहा तो कंपनी के एक प्रवक्ता ने आरोपों को ख़ारिज करते हुए नोटिस मिलने से इनकार कर दिया। लेकिन समाचार पत्र का दावा है कि उसकी छानबीन में यह निकल कर आया है कि न केवल नोटिस भेजे गए हैं, बल्कि उन्हें लेकर आयकर विभाग में भी काफ़ी रस्साकशी मुंबई इकाई और Central Board of Direct Taxes (CBDT) के राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच हुई थी। नोटिस भेजने की अंतिम स्वीकृति नोटिस जाने के महज़ कुछ दिन पहले आने का दावा समाचार पत्र द्वारा किया गया है।

अयोध्या मामला: ‘हिन्दू सूरज की पूजा करते हैं, पर इससे उस पर उनका हक़ तो नहीं हो जाता’

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद की शुक्रवार को 23वें दिन की सुनवाई हुई। मुस्लिम पक्षकार ने विवादित स्थल पर अपने दावे को साबित करने का प्रयास किया। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से राजीव धवन ने कहा कि सुनवाई में हिंदू पक्षकार रामलला के तरफ से दलील दी गई थी कि हिंदू नदियों, पहाड़ों को पूजते आए हैं, इसी तर्ज पर रामजन्मस्थान भी वंदनीय है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पक्ष रखते हुए धवन ने कहा- “मेरा कहना है कि यह एक वैदिक अभ्यास है। हिंदू सूरज की पूजा करते हैं पर इससे उस पर उनका मालिकाना हक तो नहीं हो जाता। निर्मोही अखाड़े के पास ऐसे सबूत नहीं, जिससे साबित हो सके कि उनका शास्वत काल से सेवादार का हक रहा है। अखाड़े ने भी सिर्फ सेवादार/ प्रबंधन का अधिकार माँगा है, ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर दावा नहीं किया।”

सुनवाई के दौरान पूजा करने के आधार पर विवादित स्थल पर हिन्दू पक्ष के मालिकाना हक के दावे का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई सूर्य की पूजा करता है, तो इससे उसका अधिकार सूर्य पर नहीं हो जाता। धवन ने कहा कि लोगों का विश्वास है कि 11,000 साल पहले उस जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था, लेकिन विवादित जमीन को श्रीराम जन्मभूमि पहली बार 1989 में कहा गया। उसी साल पहली बार कहा गया कि जन्मस्थान न्यायिक व्यक्ति है। इससे पहले कभी ऐसा दावा नहीं किया गया।

कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों ने कहा कि जन्मस्थान के लिए अदालत में याचिका दाखिल नहीं हो सकती। जन्मस्थान कोई कानूनी व्यक्ति नहीं है। उन्होंने प्रार्थना को एक वैदिक अभ्यास बताते हुए कहा कि अगर कल को चीन मानसरोवर में जाने से रोक देता है, तो क्या कोई पूजा के अधिकार का दावा कर सकता है?

मुस्लिम पक्ष की तरफ से सबसे पहले वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी ने बहस की शुरुआत की। जिलानी ने कहा कि वर्ष 1885 में निर्मोही अखाड़े ने जब कोर्ट में याचिका दायर की थी, तो उन्होंने अपनी याचिका में विवादित जमीन की पश्चिमी सीमा पर मस्जिद होने की बात कही थी। यह हिस्सा अब विवादित जमीन के भीतरी आँगन के नाम से जाना जाता है। निर्मोही अखाड़े ने 1942 के अपने मुकदमे में भी मस्जिद का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने तीन गुम्बद वाले ढाँचे को मस्जिद स्वीकार किया था।

जिलानी ने मुस्लिम पक्ष के गवाहों के बयान पर यह साबित करने की कोशिश की कि 1934 के बाद भी विवादित स्थल पर नामज़ पढ़ी गई। इसके लिए उन्होंने कोर्ट के सामने कुछ दस्तावेजों का संदर्भ पेश किया।

जिलानी ने PWD की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि 1934 के सांप्रदायिक दंगों में मस्जिद के एक हिस्से को कथित रूप से क्षतिग्रस्त किया गया था और PWD से उसकी मरम्मत करवाई गई थी। जिलानी ने बाबरी मस्जिद में 1945-46 में तरावीह की नमाज पढ़ाने वाले हाफ़िज़ के बयान का ज़िक्र भी किया। जीलानी ने एक गवाह का बयान पढ़ते हुए कहा कि उसने 1939 में मगरिब की नमाज़ बाबरी मस्जिद में पढ़ी थी। हिंदू पक्ष की तरफ से चर्चा के दौरान यह दलील दी गई थी कि 1934 के बाद विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी गई।