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मोदी के नाम से करंट खाने वाले इमरान के मंत्री का पाक मीडिया ने किया बॉयकॉट

पाकिस्तान की मीडिया ने देश के रेल मंत्री शेख रशीद अहमद का बहिष्कार करने का फैसला किया है। लंदन में अंडे खाने वाले शेख अहमद शेखी बखारने के चक्कर अपनी बेइज्जती करवाने के लिए मशहूर हैं। पाकिस्तान के पास पाव, आधा पाव का एटम बम होने का दावा करने वाले अहमद को एक बार मोदी का नाम लेते ही करंट लग गया था।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान के नेशनल प्रेस क्लब (एनपीसी) ने उनके कवरेज पर अस्थायी तौर पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसा एक कैंसर पीड़ित पत्रकार के लिए शेख अहमद द्वारा ‘अपमानजनक’ भाषा का इस्तेमाल करने को लेकर किया गया है।

मंगलवार को कैंसर पीड़ित पत्रकार के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने पर एनपीसी ने सात दिनों के लिए शेख रशीद पर प्रतिबंध लगाया है। क्लब की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि जियो टीवी के वीडियो पत्रकार नासिर से एनपीसी अध्यक्ष शकील करार के मिलने के बाद यह फैसला लिया गया। पत्रकार नासिर का रावलपिंडी के बेनजीर भुट्टो अस्पताल में कैंसर का इलाज चल रहा है।

नासिर ने करार को बताया कि रशीद ने हाल ही में जब अस्पताल का दौरा किया तो एक पत्रकार ने उनकी बीमारी के बारे में उन्हें बताया। इस पर रेल मंत्री ने नासिर के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जिससे उसकी भावनाएँ आहत हुईं।

शेख रशीद की गिनती इमरान खान के कैबिनेट के बड़बोले मंत्रियों में होती है। इसके कारण अक्सर वे खुद का मजाक भी बना लेते हैं। वे भारत पाकिस्तान के बीच एक-दो महीने में परमाणु युद्ध होने की भविष्यवाणी भी कर चुके हैं।

घाटी में पत्थरबाजों का शिकार बने असरार अहमद ने तोड़ा दम: 30 दिन में 5 नागरिक मारे गए

कश्मीर में पिछले महीने पत्थरबाजों का शिकार हुए कश्मीरी युवक असरार अहमद की बुधवार (सितंबर 4, 2019) तड़के श्रीनगर के अस्पताल में मौत हो गई। लेफ्टिनेंट जेनरल केजेएस ढिल्लन ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि 6 अगस्त को पत्थरबाजों ने असरार अहमद खान को निशाना बनाया था।

शौरा अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था। उन्होंने बताया कि बीते 30 दिनों में घाटी में किसी नागरिक की मौत की यह पाँचवीं घटना है। सभी जानें आतंकियों, पत्थरबाजों और पाकिस्तान परस्तों ने ली है।

असरार अहमद की मौत के बाद श्रीनगर के कुछ इलाके में माहौल तनावपूर्ण है। एहतियात के तौर पर सुरक्षाबलों ने इलाके में फिर से प्रतिबंध लगा दिया गया है। डाउन टाउन और सिविल लाइंस इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया है।

गौरतलब है कि, इससे पहले दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग के बिजबेहरा इलाके में 25 अगस्त को पत्थरबाजों ने सेना का जवान समझकर एक ट्रक ड्राइवर की बर्बरता से हत्या कर दी थी। मृतक की पहचान 42 वर्षीय नूर मोहम्मद डार के रूप में हुई थी। नूर देर शाम ट्रक लेकर वापस घर लौट रहा था कि तभी वहाँ मौजूद कुछ पत्थरबाजों की नजर उस पर पड़ी। पत्थरबाजों ने उसके ट्रक को सुरक्षाबल की गाड़ी और उसे जवान समझ लिया। इसके बाद उन्होंने नूर पर पत्थरबाजी शुरू कर दी।

दो लोगों की लड़ाई में मृतक साहिल को मुस्लिम समझकर वामपंथी कविता कृष्णन ने फैलाया प्रोपेगेंडा

सेकुलर और लिबरलों का गिरोह समुदाय विशेष के किसी व्यक्ति की मौत पर किस तरह से राजनीति करने और प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए उतारू रहते हैं, इसका ताजा नमूना वामपंथी कविता कृष्णन के ट्वीट से मिला है। बता दें कि, कविता कृष्णन वही शख्सियत है, जिनकी हाल ही में ईमेल लीक हुई थी। लीक हुए इस ईमेल में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के विरोध में रणनीति तैयार की गई थी।

कृष्णन ने साहिल नाम के एक 23 वर्षीय लड़के की मौत पर एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने साहिल को मुस्लिम बताते हुए इसे मॉब लिंचिंग, हेट क्राइम और मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा करार दिया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि बड़े ही अफसोस की बात है कि मुस्लिमों के खिलाफ सांप्रदियक हिंसा कोई नैरेटिव नहीं, बल्कि सच्चाई है। उन्होंने इस ट्वीट में मोहम्मद आसिफ खान के द्वारा मुस्लिमों के खिलाफ हेट क्राइम और मॉब लिंचिग पर तैयार की गई रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा है कि उसने बिल्कुल सही रिपोर्ट पेश की है। वह कभी गलत खबरें नहीं फैलाता है।

क्विंट ने भी साहिल की मौत वाली खबर को खूब तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। इसमें उसने साहिल के माता-पिता केे हवाले से लिखा है कि मुस्लिम होने की वजह से उसकी हत्या की गई। जबकि, सच्चाई कुछ और है और वो इसके बिल्कुल विपरीत है। 

सबसे पहली बात तो ये है कि जिस साहिल को मॉब लिंचिग का शिकार बताया जा रहा है। उसकी मॉब लिंचिंग में नहीं, बल्कि उसकी दो लोगों के साथ मोटरसाइकिल को रास्ता न देने की वजह से हाथापाई हुई थी। इस दौरान वो जख्मी हो गया था और फिर घर जाने के बाद उसकी हालत गंभीर हो गई। जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मौत हो गई। पुलिस उपायुक्त अतुल कुमार ठाकरे ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ये शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) की घटना है। इस मामले में दो लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिसमें से एक नाबालिग है। साथ ही पुलिस ने इस मामले में किसी भी तरह की सांप्रदायिक एंगल न होने की बात कही।

मगर, लिबरलों को तो बस प्रोपेगेंडा और झूठी खबर फैलाने का मौका चाहिए होता है। उसने साहिल का नाम देखा और उसे मुस्लिम समझकर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर दिया। इसके बाद कई लोगों ने कविता कृष्णन की खिंचाई करते हुए खबरों की पुष्टि कर लेने की नसीहत दी। जर्नलिस्ट रौशनी सिंह ने कृष्णन को लिखा कि उन्हें बिना खबरों की पुष्टि किए हुए इस तरह से झूठी खबर नहीं फैलानी चाहिए। हालाँकि, उन्होंने ये भी लिखा कि कविता ने ऐसा पहली बार नहीं किया है। रौशनी ने कृष्णन को बताया कि साहिल के माता-पिता यकीनी तौर पर नहीं कह सकते कि साहिल की हत्या मुस्लिम होने की वजह से की गई। उन्हें शक है कि ऐसा हुआ होगा। इसके साथ ही रौशनी ने कहा कि उसके और आसिफ जैसे लोग ही बिना सच को जाने ही प्रोपेगेंडा फैलाने का काम करते हैं।

कविता कृष्णन जिस आसिफ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहती हैं कि उसकी रिपोर्ट हमेशा सही होती है, एक यूजर ने उसका भी पर्दाफाश कर दिया। ललिया नाम के एक यूजर ने लिखा कि आसिफ एक बार नहीं, बल्कि सौ बार ऐसी हरकतें कर चुका है। उन्होंने आसिफ के एक हालिया ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर किया। जिसमें वो एक वीडियो को शेयर करते हुए मुस्लिमों के खिलाफ हो रही हिंसा के लिए पुलिस को संज्ञान लेने के लिए कहते हैं। मगर, पुलिस उन्हें फटकार लगाते हुए बताती है कि उन्होंने 2 साल पुराना वीडियो शेयर किया है। इस मामले में पहले ही कार्रवाई हो चुकी है। साथ ही पुलिस ने आसिफ को चेतावनी देते हुए कहा कि बिना तस्दीक के पुराने वीडियो को बार-बार शेयर कर साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने का प्रयास न करें, वरना उनके खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती है।

वहीं, नेशन फर्स्ट के सीनियर एडिटर प्रमोद कुमार सिंह ने भी कविता कृष्णन को फर्जी खबर फैलाने के लिए लताड़ लगाई है। उन्होंने लिखा कि ये कोई मॉब लिंचिग या हेट क्राइम की घटना नहीं थी। दो लोग मिलकर अगर किसी के साथ मारपीट करते है, तो उसे मॉब लिंचिग नहीं कहा जाता है। उन्होंने पुलिस के द्वारा किसी भी साम्प्रदायिक एंगल न होने की बात भी कही और साथ ही बताया कि साहिल एक सामान्य नाम है। उन्होंने बताया कि उनके भतीजे का नाम भी साहिल है और उनसे कभी किसी ने नहीं कहा कि ये एक मुस्लिम नाम है। प्रमोद सिंह ने कहा कि उनके रिपोर्टर भी वहाँ गए थे। वहाँ पर ऐसी कोई बात नहीं थी, जैसा कि वो दिखाने की कोशिश कर रही हैं। जर्निलस्ट स्वाति चतुर्वेदी ने भी प्रमोद कुमार सिंह के बात का समर्थन किया है।

मुद्रा योजना: 33 महीने में 1.12 करोड़ को रोजगार, शिशु लोन से 66% नौकरी पैदा

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मुद्रा योजना से 33 महीने में 1.12 करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा हुए हैं। इनमें से 66 फीसदी नौकरी अकेले शिशु लोन से पैदा हुई है। इस योजना के तहत 50 हजार रुपए तक का कर्ज शिशु लोन के दायरे में आता है।

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से कराए गए सर्वे से यह बात सामने आई है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से संबंधित यह सर्वे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने मसौदा रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि अप्रैल 2015 से दिसंबर 2017 यानी शुरुआती 33 महीनों में ही इस योजना से 1.12 करोड़ अतिरिक्त नौकरी पैदा हुई।

इसके मुताबिक इस योजना से 51.06 लाख लोग स्वरोजगार कर रहे हैं, जबकि 60.94 लाख लोग वेतन पर काम कर रहे हैं। योजना का लाभ उठाने वाले हरेक पाँच (20.6 प्रतिशत) में से एक ने लोन के पैसे से नया बिज़नेस शुरू किया। वहीं, अन्य कारोबारियों ने लोन के पैसों से पहले से चल रहे अपने बिज़नेस का विस्तार किया। मसौदा रिपोर्ट 27 मार्च, 2019 को तैयार की गई।

सर्वे की मुख्य बातें

  • मुद्रा योजना के तहत कुल 5.71 लाख करोड़ का लोन मुद्रा योजना की शिशु, किशोर और तरुण योजना के तहत बाँटा गया है। इसमें से 12.27 करोड़ के लोन पहले तीन सालों में बाँटे गए। बाँटे गए लोन की औसत रकम 46,536 रुपए रही।
  • योजना के तहत बाँटे गए लोन में से शिशु लोन (50,000 तक का लोन) का हिस्सा 42 प्रतिशत है। किशोर लोन (50,000 से 5 लाख रुपए तक) का हिस्सा 34 प्रतिशत है, जबकि तरुण लोन (पाँच लाख से लेकर 10 लाख तक का लोन) की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत है।
  • अतिरिक्त रोजगार का 66 प्रतिशत हिस्सा शिशु लोन से पैदा हुआ। किशोर लोन से 18.85% और तरुण लोन से 15.51% लोगों को रोज़गार मिला।

यह सर्वे, विनिर्माण, सेवाओं, संबद्ध कृषि, व्यापार और अन्य क्षेत्रों सहित विभिन्न क्षेत्रों में रोज़गार सृजन की जानकारी एकत्र करने के लिए किया गया था। सर्वे शुरू होने से पहले लगभग 5 करोड़ व्यक्ति (3.1 करोड़ स्व-नियोजित, 1.95 करोड़ काम पर रखे गए कर्मचारी) ऐसे प्रतिष्ठानों में कार्यरत थे, जिन्हें मुद्रा लोन का लाभ मिला था।

ग़ौरतलब है कि मुद्रा योजना (PMMY) के तहत बिना गारंटी के लोन मिलता है। इसके अलावा लोन के लिए कोई प्रोसेसिंग चार्ज भी नहीं लिया जाता है। मुद्रा योजना (PMMY) में लोन चुकाने की अवधि को 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है। लोन लेने वाले को एक मुद्रा कार्ड मिलता है, जिसकी मदद से कारोबारी ज़रूरत पर आने वाला खर्च कर सकता है। कोई भी व्यक्ति जो अपना व्यवसाय शुरू करना चाहता है, वह PMMY के तहत लोन ले सकता है।

विधायकों की खरीद-फरोख्त: उत्तराखंड के पूर्व CM हरीश रावत पर कसा शिकंजा, FIR दर्ज करने की तैयारी में CBI

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, कर्नाटक के कद्दावर कॉन्गेसी नेता डीके शिवकुमार के बाद अब उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत पर कानूनी शिकंजा कसता दिख रहा है। उनके खिलाफ 2016 में सामने आए स्टिंग वीडियो मामले में सीबीआई एफआईआर दर्ज करने की तैयारी में है। वीडियो में रावत सत्ता बचाए रखने के लिए कथित तौर पर विधायकों की खरीद-फरोख्त करते नजर आ रहे हैं।

जाँच एजेंसी की तरफ से इस संबंध में मंगलवार को हाई कोर्ट में प्रार्थना पत्र दाखिल किया, जिसमें कहा गया कि इस मामले में प्रारंभिक जाँच पूरी हो चुकी है और अब वो हरीश रावत के खिलाफ मामला दर्ज करना चाहती है। कोर्ट की अगली सुनवाई 20 सितंबर को होने वाली है।

दरअसल, मार्च 2016 में विधानसभा में वित्त विधेयक पर वोटिंग के बाद 9 कॉन्ग्रेस विधायकों ने बगावत कर दी थी। जिसके बाद एक निजी चैनल ने हरीश रावत का एक स्टिंग जारी किया था। जिसमें रावत सरकार बचाने के लिए कथित तौर पर विधायकों से सौदेबाजी करते दिखे थे। इसके बाद तत्कालीन राज्यपाल कृष्णकांत पॉल द्वारा केंद्र सरकार को स्टिंग मामले की सीबीआई जाँच की संस्तुति भेजी गई। इसी बीच केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद-356 का उपयोग करते हुए रावत सरकार को बर्खास्त कर दिया था।

हालाँकि, मामला हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में पहुँचने के बाद कोर्ट के आदेश पर कॉन्ग्रेस सरकार फिर से बहाल हो गई। कॉन्ग्रेस की सरकार वापस आने पर कैबिनेट बैठक में स्टिंग प्रकरण की जाँच सीबीआई से हटाकर एसआईटी से कराने का निर्णय किया गया। लेकिन केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया और हरीश रावत के खिलाफ सीबीआई की प्रारंभिक जाँच जारी रही। तत्कालीन बागी विधायक व वर्तमान में वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ हरक सिंह रावत ने भी कैबिनेट के इस निर्णय को हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी। इसमें कहा गया था कि जब एक बार राज्यपाल मामले की सीबीआई जाँच की संस्तुति केंद्र को भेज चुके हैं, तो आदेश वापस नहीं लिया जा सकता।

अलादीन ने शादी का झॉंसा दे हिंदू लड़की से बनाए संबंध, मलेशिया ले जाकर बेचने की फिराक में था

हरियाणा में पानीपत के यमुनानगर में लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। अलादीन नाम के शख़्स ने पहले तो एक हिंदू लड़की को अपने प्रेम-जाल में फँसाया और फिर शादी का झाँसा दे उससे संबंध बनाए। इसके बाद वो लड़की को मलेशिया ले जाकर उसका सौदा करने की तैयारी में था। अलादीन अपनी इस चाल में क़ामयाब हो पाता, उससे पहले ही उसे पुलिस ने धर-दबोचा।

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपी ख़बर

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार, 25 वर्षीय अलादीन और 21 वर्षीय लड़की साथ पढ़ते थे। अलादीन और लड़की के बीच दोस्ती हुई जो धीरे-धीरे प्रेम में तब्दील हो गई। अलादीन ने शादी कर मलेशिया ले जाने का झाँसा दे लड़की से संबंध बनाए। बाद में उसने शादी से इनकार कर लड़की से बात करना बंद कर दिया।

पूरे प्रकरण की जानकारी लड़की ने जब अपने परिजनों को दी, तो उन्होंने थाने में जाकर अलादीन के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करवाया। अलादीन के पास से लड़की का पासपोर्ट और वीज़ा बरामद हुआ है, जिसमे आरोपित ने अपना 15 दिन का वीज़ा लगवाया था, जबकि लड़की का वीज़ा 6 महीने का था। शक़ जताया जा रहा कि आरोपित लड़की को मलेशिया ले जाकर बेचने की फ़िराक में था। परिजनों की शिक़ायत पर पुलिस ने अलादीन को धर-दबोचा।

महिला थाने के डीएसपी प्रदीप राणा ने बताया कि पीड़िता की शिक़ायत पर आरोपित के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है।

विश्व हिंदू परिषद के संयोजक गगन प्रकाश का कहना है कि ये मामला बेहद गंभीर है, आरोपित अलादीन के ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो घटना के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किए जाएँगे। उनका कहना है कि इस तरह का यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके हैं।

लंदन में फिर पाकिस्तानियों की गुंडई, भारतीय उच्चायोग पर फेंके पत्थर और स्मोक बम

ब्रिटेन की राजधानी लंदन में फिर से पाकिस्तानियों ने उत्पात मचाया है। यहॉं स्थित भारतीय उच्चायोग के सामने
मंगलवार (सितंबर 3, 2019) को पाकिस्तानी कश्मीर के नाम पर इकट्ठा हुए और फिर सैकड़ों की भीड़ ने दफ्तर पर हमला किया। बिल्डिंग पर अंडे, टमाटर, जूते, पत्थर, स्मोक बम और बोतलों से हमला किया गया।

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद पाकिस्तानियों ने लंदन में दूसरी बार ऐसी हिमाकत की है। इससे पहले 15 अगस्त को उच्चायोग के सामने देश की स्वतंत्रता का जश्न मना रहे भारतीयों पर पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों ने हमला किया था।

कश्मीर पर अपने प्रोपगेंडा को ​समर्थन नहीं मिलने से निराश पाकिस्तान के हुक्मरान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की साजिश रच रहे हैं। बीते दिनों दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता तेजिंदर बग्गा ने एक ऑडियो जारी कर इस साजिश का खुलासा किया था। ऑडियो में पेरिस में भारत विरोधी प्रदर्शन की आयोजक एक पाकिस्तानी महिला इसमें शामिल होने के लिए पैसे का लालच देती सुनाई पड़ रही है।

भारतीय उच्चायोग ने ट्वीट कर मंगलवार को हुए हमले की जानकारी दी। भारतीय उच्चायोग ने प्रदर्शन का फोटो ट्वीट करते हुए कहा, “लंदन में भारतीय उच्चायोग के सामने दूसरी बार हिंसक प्रदर्शन किया गया।” तस्वीर में उच्चायोग की खिड़कियों के शीशे टूटे हुए दिखाई दे रहे हैं।

पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों ने अपने इस विरोध-प्रदर्शन को ‘कश्मीर फ्रीडम मार्च’ का नाम दिया था। मार्च पार्लियामेंट स्क्वेयर से शुरू होकर भारतीय उच्चायोग की बिल्डिंग तक पहुँचा। मार्च का नेतृत्व यूके की लेबर पार्टी के कुछ सांसदों ने किया। प्रदर्शनकारियों के हाथ में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) का झंडा और प्लेकार्ड था, जिस पर लिखा था- कश्मीर में गोलाबारी बंद करो और चिल्लाते हुए कह रहे थे- ‘हम आजादी चाहते हैं।’ प्रदर्शनकारियों में मुख्य रूप से ब्रिटिश पाकिस्तानी और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) मूल के ब्रिटिश नागरिक शामिल थे।

लंदन के पाकिस्तानी मूल के मेयर सादिक खान ने इस घटना की निंदा की है। उन्होंने कहा है कि इस बारे में लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलिस से बात की है। जल्द से जल्द दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि, 15 अगस्त को हुए हमले में पाकिस्तानी मूल के हमलावरों ने बच्चों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा था। उन्होंने जश्न मना रहे भारतीयों पर पानी, जूस, आलू, टमाटर, अंडे और भी कई अन्य चीजें फेंक कर कर उन्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश की।

सड़े हुए सिस्टम से लड़ो नामर्दों, 73 साल के डॉ. देबेन दत्ता की मॉब लिंचिंग से खाक मिलेगा

“कोई भी फिज़िशियन, कितना भी कर्मवीर या ध्यान से काम करने वाला क्यों न हो, यह नहीं बता सकता कि किस घड़ी या किस दिन उसके ऊपर अकारण हमला हो सकता है, दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जा सकते हैं, ब्लैकमेल किया जा सकता है या फिर क्षतिपूर्ति का मुक़दमा किया जा सकता है।”

यह अंश 136 साल पुराने ‘द जर्नल आफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) के 10 जून 1992 को प्रकाशित अंक ‘असॉल्ट अपॉन मेडिकल मेन’ से लिया गया है। 73 साल के डॉ. देबेन दत्ता की मॉब लिंचिंग बताती है कि 27 साल में मेडिकल जगत ने भले बहुत तरक्की कर ली हो, लेकिन डॉक्टरों पर वही खतरा आज भी मॅंडरा रहा है, जिसके बारे में करीब तीन दशक पहले जिक्र किया गया था।

असम के एक चाय बागान के अस्पताल में इलाज के दौरान एक मजदूर की मौत हो गई। उसके नाराज रिश्तेदारों और अन्य मजदूरों ने डॉ. दत्ता के साथ मारपीट की। बाद में दत्ता की जान चली गई। इसी साल जून में देश के करीब आठ लाख डॉक्टरों के हड़ताल पर जाने से स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई थी। हड़ताल कोलकाता के एक अस्पताल में मोहम्मद सईद की मौत के बाद उनके परिजनों द्वारा जूनियर डॉक्टरों की पिटाई के विरोध में था। जिन डॉक्टरों को निशाना बनाया गया वे सईद के इलाज में शामिल तक नहीं थे।

देश के हर कोने में मरीज की मौत के बाद डॉक्टर या अस्पताल के कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटना सामान्य होती जा रही है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के प्रेसीडेंट डॉ. राजन शर्मा ने कोलकाता की घटना के बाद कहा था, “यह सिलसिला अरसे से चला आ रहा। किसी भी सभ्य समाज में डॉक्टरों के खिलाफ ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती।” डॉक्टरों को भगवान माने जाने को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने कहा था, “भगवान हड़ताल पर नहीं जाते, लेकिन भगवान पर हमले भी नहीं होते हैं।”

यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट्स आफ हेल्थस नेशनल लाइब्रेरी आफ मेडिसिन (NIH/NLM) के जर्नल पबमेड सेंट्रल (PMC) की अगस्त 2018 की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों में बीते 40 साल में इस खतरे का दायरा सीमित हुआ है। इसके उलट डॉक्टरों को भगवान मानने वाले देश भारत में यह खतरा रोज बढ़ता जा रहा है।

पीएमसी की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों में इस खतरे के सीमित होने का मुख्य कारण इलाज की समुचित और बेहतर सरकारी चिकित्सा व्यवस्था है। ज्यादातर यूरोपीय देशों में इलाज पर होने वाला खर्च सरकार उठाती है। भारत में हालात इसके ठीक उलट हैं।

अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज डाइनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एन्ड पॉलिसी का अध्ययन बताता है कि भारत में 65 फीसदी लोग इलाज के लिए अपने जेब से खर्च करते हैं। इसके कारण हर साल 5.70 करोड़ लोग गरीबी के दलदल में धँस जाते हैं। इस अध्ययन के अनुसार देश में 6 लाख डॉक्टर और 20 लाख नर्सों की कमी है। 10,189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर हैं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल ने ऑप इंडिया को बताया, “देश की 70 फीसदी आबादी इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर आश्रित है। निजी अस्पतालों के मुकाबले संख्या और संसाधन के लिहाज से सरकारी अस्पताल मुश्किल से 10 फीसदी होंगे। इलाज के लिए आश्रित आबादी और सरकारी अस्पतालों के बीच का असंतुलन इस खतरे का एक बड़ा कारण है। सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाने में सरकारों की भी रूचि नहीं है। यहॉं तक कि सरकारी अस्पताल मुफ्त में उपचार नहीं मुहैया कराते। ऐसे में गरीब भला क्या करे, कहॉं जाए?”

अग्रवाल सोशल ज्यूरिस्ट नामक संस्था चलाते हैं। निजी अस्पतालों में आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए कोटा पाने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में इसी संस्था ने लड़ी थी। वे बताते हैं, “कोई संदेह नहीं कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर बोझ बहुत ज्यादा है। ओपीडी में कभी-कभी एक डॉक्टर 300 मरीजों का इलाज करते हैं। डॉक्टरों के साथ मारपीट की घटना भी अमूमन सरकारी अस्पतालों में ही होती है। ज्यादातर मामलों में इसका कारण सुविधाओं की कमी है, जिसे पूरा करना डॉक्टरों के वश में नहीं है। अस्पताल के कर्मचारियों और मरीजों के परिजनों के बीच बढ़ता अविश्वास इसका एक और कारण है।”

आईएमए का एक सर्वे बताता है कि 75 फीसदी डॉक्टरों को जुबानी और 12 फीसदी को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। इस ट्रेंड से डॉक्टर इतने भयभीत हैं कि देश के शीर्ष मेडिकल संस्थान ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) दिल्ली के रेजीडेंट डॉक्टरों के एसोसिएशन ने 2017 में सदस्यों के लिए सेल्फ डिफेंस क्लासेज की शुरुआत तक कर डाली।

जून में हुए हड़ताल को लेकर इसी साल जुलाई में लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने कहा था कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए मरीजों के परिजनों और डॉक्टरों के बीच विवाद का केंद्र सरकार ब्यौरा नहीं रखती। इसी जवाब में बताया गया है कि इस कारण से इस साल 12 जुलाई तक दिल्ली स्थित केंद्रीय अस्पतालों सफदरजंग, लेडी हार्डिंग और राम मनोहर लोहिया में क्रमश: 4, 1 और 2 दिनों की हड़ताल हो चुकी थी।

इस हिंसा के मूल में है डॉक्टरों, अस्पतालों, उपकरणों और संरचना की कमी। खासकर, सरकारी क्षेत्र में। देश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में पीने के पानी और शौचालय की तरीके से व्यवस्था नहीं है। हर अस्पताल में लंबी लाइन तो दिख जाती है, लेकिन बैठने की जगह कहीं नहीं होती।

इन अस्पतालों में डॉक्टर भी मरीजों की लंबी कतार से जूझ रहे होते हैं। लम्बे समय तक उन्हें काम करना पड़ता है। उनके लिए भी अस्पतालों में थोड़ी देर बैठकर सॉंस लेने की जगह नहीं होती। गिनती के सरकारी अस्पतालों को छोड़ दें तो डॉक्टरों को बैठने के लिए कायदे की कुर्सी भी नसीब नहीं होती। मरीज के साथ-साथ उनके 20-30 परिजन और दोस्तों से भी उन्हें जूझना पड़ता है।

यानी, संकट दोनों तरफ है। इस तरह के हालात में जब बेड, डायलिसिस मशीन, वेंटिलेटर या अन्य किसी कारण से मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए उनके परिजनों या दोस्तों से कहा जाता है तो भावनाओं पर काबू नहीं रहता और गुस्सा फूट पड़ता है।

लेकिन, इसमें डॉक्टरों का क्या दोष? फिर सरकारों की नाकामी का खीझ हम उन पर क्यों निकालते हैं?

सरकारें कितनी गंभीर

कोलकाता की घटना के बाद जब डॉक्टर हड़ताल पर गए तो वहॉं की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुरक्षा का भरोसा दिलाने की बजाए उन्हें काम पर लौटने के लिए धमकाया। जब हड़ताल देशव्यापी हो गया तो पश्चिम बंगाल की सरकार मजबूरी में बातचीत के लिए राजी हुई। हालॉंकि, ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े अन्य लोगों पर बढ़ते हमलों को देख केंद्र सरकार नया कानून लाने जा रही है। इसके मसौदे के मुताबिक हिंसा में शामिल लोगों को 10 साल तक की जेल हो सकती है और 10 लाख रुपए तक जुर्माना देना पड़ सकता है।

आँकड़ों की ये कैसी बाजीगरी

एक तरफ सरकार डॉक्टरों की कमी दूर करने वादा करती है, दूसरी तरफ दावा करती है कि देश में डॉक्टर-मरीज का अनुपात डब्ल्यूएचओ के मानदंड से बेहतर है। केंद्र सरकार ने इसी साल जुलाई में लोकसभा में बताया था कि डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए 2017-18 से लेकर 2019-20 के बीच अंडर ग्रेजुएट की 15,815 और पोस्ट ग्रेजुएट की 8,883 सीटें बढ़ाई गई हैं। उससे पहले 28 जूून को लोकसभा में बताया था कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के अनुसार 31 जनवरी 2019 तक देश में 11,57,771 डॉक्टर स्टेट मेडिकल काउंसिल और एमसीआई के तहत पंजीकृत थे। सरकार का अनुमान है कि इनमें से 9.26 लाख डॉक्टर सेवा के लिए उपलब्ध हैं। इस आधार पर 1,457 मरीज पर 1 डॉक्टर का अनुपात बैठता है। लेकिन, इसी जवाब में सरकार आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक चिकित्सकों की संख्या बता कर यह दावा भी करती है कि 867 मरीज पर 1 डॉक्टर हैं।

हकीकत कुछ ऐसी है

सच्चाई यह है कि ज्यादातर डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे या प्राइवेट हॉस्पिटल में काम करते हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कितनी घोर कमी है, इसका अंदाजा देश के शीर्ष संस्थान एम्स की स्थिति से लगाया जा सकता है। एम्स दिल्ली में ​संकाय और गैर संकाय चिकित्सकों को 2,200 से ज्यादा पद खाली हैं। 10 नए एम्स में जूनियर और रेजीडेंट डॉक्टरों के 1,350 से ज्यादा तो संकाय चिकित्सकों के आधे से ज्यादा यानी 2,395 सृजित पदों में से 1,364 खाली हैं। जबकि एम्स दिल्ली की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि साल भर में मरीजों की संख्या 17 फीसदी बढ़ी है। उसके ओपीडी में औसतन 9,300 मरीज रोज इलाज कराते हैं। वेटिंग पीरियड छह महीने से दो साल तक का है। हालत यह है कि इस साल मार्च में एम्स ने बिहार से आए 66 साल के बहादुर राम को हार्ट सर्जरी के 13 जनवरी 2021 को आने के लिए कहा।

नीति आयोग की इस साल ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ शीर्षक से जारी दूसरी स्वास्थ्य सूचकांक से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की स्वास्थ्य सेवा देश में सबसे खराब है। देश के ज्यादातर राज्यों में सालों से डॉक्टरों की बहाली नहीं हुई है या वे अनुबंध पर काम कर रहे हैं। जब इलाज करने वालों की ऐसी कमी हो, एम्स जैसे संस्थानों के पास पर्याप्त संसाधन ना हो तो अन्य अस्पतालों में उपकरणों, इलाज की अन्य सुविधाओं और संसाधनों की कमी का अंदाजा लगाया ही जा सकता है।

क्यूँ ऐसे हालात

मौजूदा हालात का सबसे बड़ा कारण केंद्र और राज्य सरकारों के बजट में स्वास्थ्य के लिए बेहद कम आवंटन का होना है। नेशनल हेल्थ पॉलिसी में 2025 तक स्वास्थ्य बजट जीडीपी का 2.5 फीसदी करने का लक्ष्य तय किया गया है। फिलहाल यह 1.7 फीसदी है। विकसित देशों में यह 6 फीसदी है।

चाहे किसी दल की सरकार हो, किसी भी प्रदेश की बात हो स्वास्थ्य पर खर्च कमोबेश ऐसा ही है। यह स्वास्थ्य को लेकर हमारे राजनीतिक दलों की गंभीरता को बयॉं करने के लिए काफी है। इसलिए, अगली बार जब भी भावनात्मक रूप से टूटे तो गुस्सा बचाकर रखिएगा। सिस्टम से, जिम्मेदारों से सवाल करने के लिए। उन नामर्दों की भीड़ में मत शामिल हो जाइएगा जिसका गुस्सा लाचार डॉक्टरों को निशाना बना शांत हो जाता है। आप की तरह डॉक्टर भी सिस्टम के ही मारे हैं। बेबसी और लाचारी ही उनका भी सत्य है।

‘राम मंदिर मामले में तुम ईश्वर से धोखा कर रहे’ – 88 वर्षीय प्रोफेसर ने मुस्लिम पक्षकार धवन को लिखा पत्र

राम मंदिर सुनवाई में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्हें एक धमकी भरा पत्र मिला है। इस पत्र में धवन से पूछा गया था कि वे एक हिन्दू होकर राम मंदिर के विरुद्ध जिरह कैसे कर सकते हैं? राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस मामले को उठाया, जिसके बाद पत्र लिखने वाले के ख़िलाफ़ अवमानना का मामला दर्ज किया गया है। पत्र भेजने वाले की पहचान का भी खुलासा हुआ है।

मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन को यह पत्र चेन्नई के प्रोफेसर एन शानमुगम ने लिखा था। प्रोफेसर शानमुगम की उम्र 88 वर्ष है। इस पत्र में उन्होंने राजीव धवन से पूछा था कि वह अपनी आस्था के साथ विश्वासघात कैसे कर सकते हैं? प्रोफेसर ने लिखा था कि धवन को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे क्योंकि उन्होंने ईश्वर की अवहेलना की है। इसके अलावा उन्होंने राजीव धवन को श्राप भी दिए।

राजीव धवन को इसके अलावा व्हाट्सप्प पर भी धमकी भरे मैसेज मिले हैं। बता दें कि राम मंदिर मामले में जहाँ हिन्दू पक्ष की तरफ से के पराशरण वकील हैं, वहीं राजीव धवन मुस्लिम पक्षकार हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब राम मंदिर मामले की नियमित सुनवाई चल रही है।

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार गिरफ़्तार, ED की बड़ी कार्रवाई

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार को गिरफ़्तार कर लिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने यह कार्रवाई ‘Prevention of Money Laundering Act (PMLA)’ के तहत की गई है। लगातार 4 दिनों तक चली मैराथन पूछताछ के बाद ईडी ने उन्हें गिरफ़्तार किया है।

कॉन्ग्रेस-जेडीएस सरकार के दौरान डीके शिवकुमार अपनी पार्टी के लिए मुख्य भूमिका में थे। उन्होंने विधायकों को रिसोर्ट में ठहराने से लेकर बस से आवागमन तक की व्यवस्था की थी। उन्हें शनिवार (अगस्त 31, 2019) को ही ईडी ने हिरासत में ले लिया था, जिसके बाद उनसे पूछताछ जारी थी।

कॉन्ग्रेस ने इस मामले में भाजपा पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगाया है। डीके शिवकुमार ने पूछताछ से पहले मीडिया से बात करते हुए कहा था कि वह निर्दोष हैं और जाँच एजेंसियों के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं।