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गंगा घाटों के स्वच्छता अभियान की अगुवाई करने वाली तमसुतुला इमसॉन्ग को मिला देवी पुरस्कार

स्वच्छ भारत कार्यकर्ता तमसुतुला इमसॉन्ग को कोलकाता में हाल ही में संपन्न हुए देवी पुरस्कार समारोह में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें स्वच्छ भारत मिशन में नवीनता और गतिशीलता लाने में उनकी भूमिका के लिए दिया गया है।

दरअसल, देवी पुरस्कार द संडे स्टैंडर्ड और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस द्वारा शुरू की गई एक मुहीम है, जिसका मक़सद उन कामकाजी महिलाओं को सम्मानित करना है जो अपने संबंधित क्षेत्रों में नवीनता और गतिशीलता लाती हैं।

कई महिला उद्यमियों, कार्यकर्ताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों, नवप्रवर्तकों और शिक्षाविदों को इसकी स्थापना के बाद से सम्मानित किया जा रहा है।

इस वर्ष, यह कार्यक्रम कोलकाता में आयोजित किया गया, जहाँ केंद्रीय कपड़ा और महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने विभिन्न क्षेत्रों की चयनित महिलाओं को पुरस्कार प्रदान किए।

तमसुतुला के अलावा, शिक्षाविद परमीता शर्मा, नृत्यांगना आलोकानंद रॉय, मिज़ोरम के फैशन उद्यमी लालडिंसंगी, ललसांगज़ेली और लालरिनपुई, जिनकी फैशन पहल वाकिरिया ने मिज़ोरम के सबसे लोकप्रिय फैशन ब्रांड के रूप में ख़ुद को स्थापित किया है।

अन्य पुरस्कार विजेताओं में उद्यमी रितु अग्रवाल, मधु नियोतिया, जैविक किसान एकिता राजू, फैशन इनोवेटर सुजाता चटर्जी, और फिल्म निर्माता प्रीता चक्रवर्ती शामिल थीं।

तमसुतुला इमसॉन्ग, नागालैंड की एक युवती हैं। इनका समूह, Sakaar Sewa Samiti तब सुर्खियों में आया था, जब वाराणसी में गंगा घाटों को स्वच्छ रखने में उनके योगदान ने पीएम मोदी के प्रोत्साहन के साथ देशव्यापी पहचान हासिल की थी।

बता दें कि इमसॉन्ग गंगा घाटों के स्वच्छता अभियान की अगुवाई कर रही हैं। वो अब स्वच्छ भारत मिशन का पर्याय बन चुकी हैं और उन्हें अपने इस काम के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रशंसाएँ भी मिल चुकी हैं।

‘देश विरोधी नारा हो, या सर्जिकल से लेकर एयर स्ट्राइक, कॉन्ग्रेस गंभीर मौकों पर हमेशा सरकार के खिलाफ’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से 370 को निरस्त किए जाने का विरोध करने पर कॉन्ग्रेस नेतृत्व और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पर जमकर निशाना साधा। अमित शाह ने रविवार (सितंबर 1, 2019) को केंद्र शासित प्रदेश दादर एवं नागर हवेली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “कॉन्ग्रेस ने 370 को हटाने का विरोध किया। आज भी राहुल गाँधी जो बयान देते हैं उसकी पाकिस्तान में तारीफ होती है। उनके बयान को पाकिस्तान अपनी याचिका में शामिल करता है। कॉन्ग्रेसियों को शर्म आनी चाहिए कि उनके बयान का उपयोग भारत के खिलाफ हो रहा है।”

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के हटने से जम्मू कश्मीर में विकास के रास्ते खुले हैं, आतंकवाद के ताबूत में अंतिम कील ठोकी है, जम्मू कश्मीर को पूरी तरह से भारत के साथ मिलाने का काम हुआ है। सब लोग इस फैसले पर सरकार के साथ हैं लेकिन कुछ लोग इसका भी विरोध कर रहे हैं।

इसके साथ ही अमित शाह ने मोदी सरकार द्वारा कश्मीर पर लिए गए फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 और 35ए देश के एकीकरण में बाधा था। उन्होंने कहा, “मोदी जी को आपने फिर से प्रधानमंत्री बनाया और उन्होंने संसद के पहले ही सत्र में अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया। मोदी जी के अलावा ये काम कोई और नहीं कर सकता था।”

अमित शाह ने कहा कि चाहे जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने का मामला हो, या फिर सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयर स्ट्राइक का। कॉन्ग्रेस गंभीर मौकों पर सरकार के खिलाफ खड़ी रही। उन्होंने कहा कि वो कॉन्ग्रेस से पूछना चाहते हैं कि वो (कॉन्ग्रेस) किस तरह की राजनीति करना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस पर बरसते हुए उन्होंने कहा कि 70 सालों में देश में कई पार्टियों की सरकार बनी, कुछ लोगों की तीन-तीन पीढ़ियों ने देश पर राज किया, लेकिन इनमें अनुच्छेद-370 हटाने की हिम्मत नहीं थी।

गृह मंत्री ने कहा कि अनुच्छेद-370 को लेकर देश की जनता चट्टान की तरह नरेंद्र मोदी जी के साथ खड़ी है और वो पूरी दुनिया को बताना चाहेंगे कि 370 हटने के बाद कश्मीर में पूरी तरह से शांति है। 370 हटने के बाद वहाँ एक भी गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ी, एक भी आँसू गैस नहीं छोड़ा गया है और न ही किसी की जान गई है। अमित शाह ने कहा कि कानून-व्यवस्था को लेकर जो सवाल उठाए जाते हैं, उसका इस्तेमाल दुश्मन करते हैं।

क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? सरकार क्या कर रही है? (भाग 2)

समाधान क्या है? क्या करे सरकार?

त्वरित समाधान तो मनमोहन सरकार वाला ही है कि फिर से फिस्कल डेफिसिट को 6% के ऊपर ले जाओ, फिर से बैंकों को पैसा दे दो, या योजनाओं के जरिए लोगों तक पैसा पहुँचा दो। इससे आम जनता खर्च करने लगेगी और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेगा। लेकिन आठ-दस सालों में वापस यही स्थिति आएगी। यह समाधान चुनाव जीतने के लिए किया जा सकता है लेकिन देश को इससे लम्बे समय में नुकसान ही होता है, फायदा नहीं।

फिस्कल डेफिसिट वाला रिस्क एक बार लिया जा सकता है लेकिन वो ऐसे देशों में संभव है जहाँ लोग टैक्स देते हैं। भारत में टैक्स नहीं देना एक गुण के तौर पर देखा जाता है, पढ़े-लिखे लोगों से लेकर व्यापारियों तक में टैक्स चोरी करना इस तरह से देखा जाता है जैसे कि कुछ अच्छा किया जा रहा हो। आप टैक्स ही नहीं देंगे तो सरकार के पास आमदनी बढ़ेगी ही नहीं।

अगर सरकार आम लोगों की मदद कर रही है तो बिजनेस करने वाले लोगों को भी अपना सारा टैक्स देना चाहिए। लेकिन टैक्स देना एक बिहेवियर चेंज करने की बात है, इसमें समय लगेगा। पिछली सरकार ने इस पर कोई सोच नहीं दिखाई, इस सरकार ने जीएसटी से लेकर इनकम टैक्स तक में सक्रियता दिखाते हुए इसका दायरा बढ़ाया है। लेकिन वो इतना बड़ा नहीं हुआ है कि फिर से 2008 की तरह का रिस्क लिया जा सके।

प्राइवेट सेक्टर को आगे आना होगा

प्राइवेट सेक्टर के बारे में बात करते हुए चीफ इकनॉमिक अडवाइजर, यानी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत में प्राइवेट कम्पनी को अगर लाभ होता है तो वो प्राइवेट लाभ है, वो कम्पनी का लाभ है; लेकिन जब वही कम्पनी घाटे में जाती है, तो वे कहने लगते हैं कि सरकार मदद नहीं कर रही! प्राइवेट कम्पनी अपने बिजनेस के तरीकों से लाभ कमाती है, या घाटे में जाती है। अगर आपकी नीतियों के कारण कम्पनी डूब रही है तो इसमें सरकार क्या करे?

लेकिन माहौल ऐसे बनाया जाता है, सरकार को ब्लैकमेल किया जाता है कि जेट एयरवेज में इतनी नौकरियाँ खतरे में हैं, सरकार कुछ नहीं कर रही। सरकार तभी कुछ करेगी जब वो कम्पनी सरकारी होगी। वरना पंजाब नेशनल बैंक ने तो नीरव मोदी को लोन दिया था, आपके पैसे भी लेकर नहीं भागा, फिर सब उसे जेल में क्यों डालना चाहते हैं? वो इसलिए कि ऐसे लोग सिस्टम का फायदा न उठा सकें। साथ ही, प्राइवेट कम्पनियाँ जब अपने लाभ का हिस्सा सरकार के साथ नहीं बाँटती तो उनके घाटे पर सरकार मेरा या आपका पैसा क्यों खर्च करे?

प्राइवेट सेक्टर कई बार इस चक्कर में रहता है कि सरकार की ओर से कुछ मदद मिल जाएगी तो उसका अपना कैश रिजर्व बचा रहेगा। हर ठीक-ठाक कम्पनी के पास कुछ पैसे होते हैं, जो वो अपने पास बचा कर रखती है। व्यापारी को अगर लोन मिल जाए तो वो दूसरों के पैसों पर अपना व्यापार करने में सहजता दिखाता है क्योंकि अगर व्यापार डूब गया तो उसे वो पैसा बैंक को नहीं लौटाना पड़ेगा। लेकिन अपना पैसा जब लगाना हो, तो लोग ज्यादा सोच-समझ कर पैसा लगाते हैं।

ऑटो सेक्टर के साथ क्या हुआ?

जब पैसा अपना दाँव पर हो, तब प्राइवेट सेक्टर ऐसी स्थिति में नहीं पड़ता कि केवल सेंटीमेंट के आधार पर प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ा ले- जो कि पिछली बार हुआ था। उदाहरण के लिए ऑटो सेक्टर में ठीक-ठाक बूम आया था। पिछले कुछ सालों में तो टैक्सी कम्पनियों ने लोगों को ओला या ऊबर के लिए कार खरीदने में मदद की। इससे हुआ यह कि कारों की बिक्री शुरू में तो बढ़ी लेकिन यह दो साल में ही थम भी गई। बड़े शहरों में लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि भला कार क्यों खरीदें! जब एक फोन करने पर ड्राइवर के साथ कार आ जाती है, तो अपने घर पर रखने, बीमा करवाने, मेंटेनेंस और ड्राइवर का टेंशन कौन ले!

इसके साथ ही 2004-05 से मिडिल क्लास के लोगों ने कार लेनी शुरू कीथी, और पिछले सात-आठ सालों में ग्रामीण इलाकों में भी हर घर में मोटर सायकिल पहुँचने लगी थी। कार या मोटर सायकिल एक बार लेने का मतलब है कि लोग फिर लम्बे समय तक दोबारा नहीं लेंगे- क्योंकि यह आलू-टिंडे की तरह हर हफ्ते खत्म होने वाली या चाइनीज़ रेनकोट की तरह हर बरसात में रीप्लेस होने वाली चीज़ ही नहीं है। फिर ओला-ऊबर के कारण ऑटो सेक्टर में डिमांड घटती चली गई। जिन्होंने गलत आशा के चलते ज्यादा प्रोडक्शन शुरू कर दिया था, उन पर दबाव बढ़ने लगा, और अंततः शिफ्टें बंद करनी पड़ी, यूनिटों में ताले लगने लगे।

लेकिन फिर भी स्थिति इतनी ‘भयावह’ नहीं हुई है जितनी दिखाई जा रही है। यह गिरावट सामान्य है, जोकि कम्पनियों द्वारा दूरदर्शिता के अभाव के कारण पैदा हुई है। इस समय में प्राइवेट कम्पनियों को अपने कैश रिजर्व पर वापस जाना होगा क्योंकि सरकार को न तो चुनाव जीतना है, न ही वो पुरानी असफल नीति को अपनाने वाली है।

सरकार अगर वापस पुराने ढर्रे पर चलने लगे तो बिजनेस करने वालों को फिर से एक आसान रास्ता दिख जाएगा कि अगले कुछ साल वो फिर से वैसे ही बिजनेस कर लेंगे। लेकिन, सरकार अगर कड़ा रुख अपनाते हुए, इन प्राइवेट कम्पनियों को अपने पैसे अपने बिजनेस में लगाने पर मजबूर करती है, तो इन कम्पनियों के पास गम्भीरता से सोच कर, सही जगह पैसा लगाने के अलावा और कोई उपाय नहीं बचेगा। इससे सरकार की ऐसी छवि भी बनेगी कि ये सरकार क्विक फिक्स वाली नहीं है, इसलिए अपने पैसे को दूसरे का समझ कर नुकसान कराने की बजाय सही तरीके से बिजनेस करने में बेहतरी है।

मैनुफैक्चरिंग में समस्या अलग ही है

इसमें दूसरी बात यह है कि पहले मैनुफैक्चरिंग धीरे-धीरे बदलती थी, अब टेक्नॉल्जी हर जगह घुस गई है और हर सेक्टर की मैनुफैक्चरिंग पर इसका सीधा असर दिखने लगा है। साल भर में कारों में एकदम ही नया फीचर आ जाता है। उसी तरह कई और सेक्टरों में लगातार तकनीकी बदलाव हो रहे हैं, जिसमें फैक्ट्री में लगने वाले मशीनों से लेकर वहां क्या बन रहा है, और उसमें नया क्या हो रहा है तक शामिल हैं। इसके कारण प्राइवेट कम्पनियाँ असमंजस में होती हैं कि नया यूनिट लगाएँ या नहीं, क्योंकि संभव है कि अगले साल कुछ ऐसी तकनीक आ जाए कि लोग उसी को खरीदने लगें।

मैनुफैक्चरिंग को लेकर दूसरी समस्या यह है कि भारत में बनाने वालों से ज्यादा बेचने वाले हैं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि यहाँ आप जो बैग लाजपत नगर मार्केट में खरीदती हैं, या जो टीशर्ट पालिका बाजार में मिलती है, वो जरूरी नहीं कि लुधियाना की फैक्ट्री में बना हो। पारम्परिक तौर पर भारत में व्यापारियों ने कहीं से खरीद कर किसी और जगह लाभ पर बेचने में ज्यादा झुकाव दिखाया है। वो चीन से बैग खरीदते हैं, यहाँ बेच लेते हैं।

ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि मैनुफैक्चरिंग के लिए सिर्फ फैक्ट्री लगाकर आप बिजनेस नहीं कर सकते। चीन ने जब खुद को मैनुफैक्चरिंग का केन्द्र बनाया तो उसने अपनी जमीनी, हवाई और जलीय मार्गों पर सामानों की आवाजाही के लिए बेहतरीन तंत्र विकसित किया। वहाँ से कहीं भी बना सामान तुरंत दूसरी जगह पहुँच सकता है। भारत में हवाई परिवहन महँगा है, जलीय परिवहन पर किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया, सड़क पर इतने बैरियर लगे होते थे कि ट्रक सड़कों की साइड में दिन भर खड़े होते थे, रेलगाड़ी तो कभी समय पर आती ही नहीं…

आप यह देखिए कि आप समय से किसी भी सामान को पहुँचा नहीं सकते। फिर कोई कम्पनी यहाँ निवेश कर के, फैक्ट्री लगा कर पैसे क्यों फँसाएगी? व्यापारी तीन से पाँच घंटे की फ्लाइट से या समुद्री मार्ग से सस्ते दरों पर सामान भारत में मँगवा कर, बिना किसी माथापच्ची के लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा?

अब जाकर सरकार ने जलमार्ग पर ध्यान देना शुरु किया है, जीएसटी के कारण सड़कों पर से बैरियर हट रहे हैं, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (यानी मालगाड़ियों के लिए समर्पित ट्रैक) पर कार्य हो रहा है। ये सारी चीजें मैनुफ़ैक्चरिंग को बेहतर करने के लिए उठाए गए वो कदम हैं जिनका लाभ कुछ सालों बाद मिलेगा। ये न तो एक दिन में तैयार हो सकते हैं, न बिना तैयार चीजों के केवल हवाई ‘विश्वास’ के आधार पर कोई समझदार व्यक्ति फैक्ट्री खोल लेगा। इसलिए प्राइवेट सेक्टर असमंजस में रहता है कि वो अपना पैसा लगाए भी तो कैसे!

सरकार की नीतियाँ और उसकी अपनी छवि

सरकार को बाजार में यह दिखाना होगा कि वो उनके लिए रास्ते तैयार कर रही है। मैनुफ़ैक्चरिंग के लिए ‘मेक इन इंडिया’ जरूरी है लेकिन उसे बनाने के बाद पहुँचाना उतना ही आवश्यक है। इसके साथ ही नीतिगत फैसलों पर सरकार के यूटर्न लेने से कई बार इंडस्ट्री का विश्वास सरकार से उठने लगता है। जैसे कि ऑटो सेक्टर में ही कभी सरकार यह कहती है कि अगले कुछ सालों में हम पूरी तरह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर आ जाएँगे, और फिर वित्त मंत्री कहती है कि नहीं, डीजल भी रहेगा।

अब कार बनाने वाले तो यही सोचेंगे कि डीजल-पेट्रोल वाली गाड़ियों को बनाना कम करते हुए बंद कर देते हैं, और इलेक्ट्रिक इंजन की तकनीक और मैनुफ़ैक्चरिंग पर पैसा लगाते हैं। इस तरह की नीतियाँ लम्बे समय तक के लिए होती हैं, इसलिए सरकारों को सोच समझ कर बोलना चाहिए ताकि बिजनेस करने वालों के बीच यह भरोसा रहे कि यह सरकार जो बोलती है, वो करती है। अगर नीतियाँ तीन महीने में घोषणा के बाद बदलती रहेंगी, जो कि मोदी सरकार में कई बार हो चुका है, तो इंडस्ट्री उसे सही सिग्नल नहीं मानती।

पॉलिसी, यानी नीतियों से इंडस्ट्री को दिशा मिलती है कि वो कहाँ अपना पैसा लगाए। इसलिए वो कभी नहीं चाहते कि सरकार बदल जाए। वो चाहते हैं कि सरकार बने, फैसले पर डटी रहने वाली सरकार बने और वो ऐसे फैसले ले जिससे पब्लिक में डिमांड हो और उनका व्यवसाय बढ़े। इसलिए इंडस्ट्री वैसी सरकारें नहीं चाहतीं जो गठबंधन से चलतीं हैं, और सही समय पर सही फैसले लेने में सकुचातीं हैं।

ऐसा ही एक फैसला है बैंकों के विलय का। हाल ही में घाटे में चलने वाले कुछ बैंकों का विलय हुआ। सरकार की मंशा यह है कि जो बैंक अकेले घाटे में थे और अपनी पूँजी में कमी के कारण लोन देने में सक्षम नहीं थे, वो अब एक साथ हो जाएँगे तो उनकी पूँजी बढ़ जाएगी, और वो बड़ी कम्पनी को बड़े लोन देने में सक्षम हो पाएँगे। ये बैंकिंग में चल रहे क्राइसिस के लिए त्वरित समाधान है, जिससे इनका अपना व्यवसाय बढ़ेगा। लेकिन इन बैंकों को यह देखना होगा कि जिसे यह लोन देंगे, उससे रिकवर करने के लिए उनके पास क्या तरीके हैं।

सरकार ने जब अपने गलत फैसलों को सुधारते हुए नए कदम उठाए हैं तो इससे अर्थव्यवस्था को संबल मिला है। कम्पनियों में उम्मीद जगी है कि सरकार सकारात्मक बदलाव के लिए प्रयासरत है। बाजार सेंटीमेंट पर खूब चलता है। सेंसेक्स और निफ्टी जैसे सूचकांक सरकार की नीतियों और फैसलों के हिसाब से उठते और गिरते हैं। अगर बाजार को लगता है कि सरकार ने अच्छे कदम उठाए हैं तो मार्केट में सुधार आता है, वो ऊपर जाता है। ऊपर जाने का मतलब है कि बाहरी कम्पनियाँ भारत में अपना पैसा लगाने को उत्सुक होंगी क्योंकि चीन में अमेरिका से ट्रेड वॉर के कारण स्थिति थोड़ी नकारात्मक है।

जीडीपी का नीचे जाना

लेकिन इस तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर का भाजपा के कार्यकाल में सबसे नीचे जाना चिंतनीय है। भले ही इस पर वैश्विक मंदी का भी प्रभाव है, लेकिन ग्रोथ रेट नीचे जाने के कारण हम विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रहेंगे। इसका मतलब यह है कि लोग अभी भी चीन में शी जिनपिंग के सत्ता में डटे रहने के कारण, वहाँ का रुख कर सकते हैं।

अंत में एक सवाल जो हम सब सोशल मीडिया पर पूछते हैं और मजाक भी बनाते हैं कि जीडीपी से क्या होता है। आम तौर पर जब भाजपा सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए कहती है कि जीडीपी ऊपर जा रही है, हम विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, तब विरोधियों की तरफ से जवाब आता है कि भारत के गरीबों को यही आँकड़ा खिला दो। कहने का उनका तात्पर्य यह होता है कि बढ़ते जीडीपी से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भारत में लोग भूखे हैं।

लेकिन यही लोग तब झुंडों में आते हैं जब वही जीडीपी दर नीचे जाती है। जीडीपी घट नहीं रही है, बस उसके बढ़ने की गति कम हुई है। ऐसे में कहने लगते हैं कि मोदी ने तबाही फैला दी, बर्बाद हो गया देश। तब आँकड़ों को गरीबों को खिलाने वाला तर्क नहीं आता। तब यही आँकड़े देश की सही स्थिति बताते हैं, जबकि जब बेहतर हो रहा हो तो भारत में गरीब ज्यादा हो जाते हैं।

ख़ैर, यह बात समझनी ज़रूरी है कि जीडीपी के घटने और बढ़ने का असर आम आदमी पर पड़ता है। यह असर इतना इमीडिएट नहीं होता कि वहाँ सरकार ने कहा कि ग्रोथ रेट कम हुई और यहाँ आपके घर से आटा घट गया, और आपके नल से पानी सूख गया। लेकिन हाँ, अगर यह ग्रोथ रेट नहीं सुधरी तो आप उसी आटे या कपड़े पर कम खर्च करेंगे।

इसे ऐसे देखिए कि आप जहाँ काम करते हैं, उस कम्पनी को भारत की बढ़ती जीडीपी के कारण फायदा होगा तो वो फायदा आपकी सैलरी में वृद्धि के तौर पर आएगा। यानि जीडीपी बढ़ रही है तो बहुत संभावना है कि आपकी कम्पनी का व्यवसाय भी बढ़ ही रहा होगा, और उसका मुनाफा भी। साल के अंत में उसी मुनाफे का एक हिस्सा वह अपने कर्मचारियों को एक तय प्रतिशत वृद्धि के साथ देगी। अब, जब यही मुनाफा कम हो जाएगा तो आपका इन्क्रीमेंट भी कम होगा। मतलब सैलरी उतनी नहीं बढ़ेगी जितनी बढ़नी चाहिए। कई बार तो ऐसा भी होता है कि महँगाई सात प्रतिशत बढ़ी और सैलरी छः। मतलब, आप पिछले साल से कम चीजें ही खरीद सकते हैं, भले ही सैलरी में वृद्धि हुई हो।

इसका दूसरा नुकसान यह होता है कि कई बार छोटी कम्पनियाँ खराब होती अर्थव्यवस्था में अपना बचाव नहीं कर पातीं। बड़ी कम्पनियाँ कुछ लोगों की छँटनी कर सकतीं हैं, कुछ शिफ्ट बंद कर सकतीं हैं। लेकिन छोटी कंपनियों का तो भट्टा ही बैठ जाता है। मतलब भारत जैसे देश में, जहाँ रोजगार पहले ही एक समस्या है, वहाँ और लोग बेरोजगार हो जाएँगे।

इन सबके कारण कंज़्यूमर सेंटिमेंट यानी उपभोक्ता के मनोभावों में परिवर्तन आने लगते हैं। वो अपनी नौकरी को लेकर ज्यादा सजग हो जाता है। पैसे बचाने लगता है। पैसा कम खर्च होने से उस पर आधारित कई उद्योगों के नुकसान पहुँचता है, जिसके कारण और नौकरियाँ जाती हैं। ये चक्रीय तरीके से काम करता है।

इसलिए जीडीपी का बढ़ना हमेशा बेहतर होता है। भले ही गरीबी हो, लेकिन बढ़ती जीडीपी के कारण ही उन गरीबों के लिए गेहूँ और चावल को सस्ते दरों में पहुँचाना संभव हो पाता है। इसी बढ़ती जीडीपी के कारण सरकार हाइवे को चौड़ा कर पाती है, गरीबों को मुफ्त इलाज दे पाती है, सब्सिडी के माध्यम से लोगों को लोन दे कर स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर सकती है। इसलिए इसका बढ़ते रहना आवश्यक है।

साथ ही, जब यह घटती है, और कुछ न किया जाए, तो भी स्थिति चिंताजनक होती है। लेकिन सिर्फ एक तिमाही के गिरे आँकड़ों पर परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। इससे अर्थव्यवस्था बर्बाद नहीं होती चाहे कोई कितना भी चिल्ला कर कहे। हर देश को ये उतार-चढ़ाव झेलना होता है। अगर यह लगातार गिरती रहे, और सरकार कदम न उठाए तो परेशानी की बात ज़रूर है। लेकिन सरकार ने जिस तरीके से अपने गलत फैसलों को मोड़ा है, कुछ एहतियाती कदम उठाए हैं, उससे आशा है कि बेहतरी होगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात को आसान शब्दों में समझने के लिए इस लेख का पहला हिस्सा आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

प्रोफेसर बने रहना है तो योग्यता साबित करनी होगी, CV दिखाइए: JNU का रोमिला थापर को नोटिस

हिन्दुओं को बदनाम करने और उनके इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए कुख्यात इतिहासकार और JNU की प्रोफेसर एमेरिटस रोमिला थापर को विश्विवद्यालय प्रशासन ने पद पर बने रहने के लिए अपना CV जमा करने को कहा है। उसके आधार पर प्रशासन यह तय करेगा कि प्रोफेसर एमेरिटस के तौर पर विश्वविद्यालय को उनकी सेवाएँ आगे चाहिए या नहीं। हिन्दू इतिहास में “आर्य आक्रमण सिद्धांत”, “हिन्दुओं ने बौद्धों को प्रताड़ित किया” जैसे झूठों को खुराक देने, अयोध्या में राम मंदिर के अस्तित्व को बेवजह झुठलाने की कोशिशों आदि के लिए जाना जाता है।

सदमे में “बुद्धिजीवी”

मीडिया खबरों के मुताबिक JNU प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद से कई प्रोफेसर झटके में हैं। उनका कहना है कि प्रोफेसर एमेरिटस को पहले कभी भी CV जमा कर अपनी योग्यता साबित नहीं करनी पड़ी है। द टेलीग्राफ़ को दो प्रोफेसरों ने तो बताया कि एक बार जो इस पद पर काबिज़ हो गया, वह अमूमन जीवन-भर पद पर बना रहता है। खुद प्रोफेसर थापर 1993 से यानी 26 वर्षों से इस पद पर कायम हैं।

इतिहास के ही एक दूसरे JNU वाले जानकार प्रोफेसर इरफ़ान हबीब ने ट्वीट किया कि इस प्रशासन से इसके अलावा क्या उम्मीद की जा सकती है।

‘इतिहास के नोबेल’ से मोदी पर हमले तक फैला है थापर का करियर

JNU में 1970 से 1991 तक शिक्षिका रहने वालीं प्रोफेसर थापर को अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ़ कॉन्ग्रेस का प्रतिष्ठित क्लूग प्राइज़ मिल चुका है, यह प्राइज़ उन विषयों के लिए दिया जाता है, जिन विषयों पर नोबेल नहीं मिलता है। लेकिन उन्हें हाल-फ़िलहाल में मोदी के खिलाफ अपनी किताब The Public Intellectual in India में लिखने के लिए अधिक जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने नयनतारा सहगल, अमिताव घोष, मरहूम गिरीश कर्नाड और खूँखार नक्सलियों को “बंदूक वाले गाँधीवादी” और पाकिस्तानी सेना को हिंदुस्तानी सेना से बेहतर बताने वाली लेखिका अरुंधति रॉय के साथ मिलकर मोदी को हराने की अपील वाला पत्र लोकसभा चुनावों के ठीक पहले जारी किया था।

GDP से क्या होता है? क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? (भाग 1)

जब हम ‘रिसेशन’, ‘जीडीपी’, ‘बैंकिंग क्राइसिस’, ‘लेंडिंग-बॉरोइंग’ आदि शब्द सुनते हैं तो दिमाग घूम जाता है, क्योंकि इन शब्दों को हमारे जानकारों ने कभी भी सीधे तरीके से, आम आदमी की भाषा में समझाया ही नहीं। जब परिभाषा ही नहीं पता, और बाते फिर इन शब्दों के नाम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था के ऊपर-नीचे होने की हो रही हो, तो फिर आम आदमी मानने लगता है कि कुछ तो बुरा या अच्छा हो ही रहा है। उसे यह पता नहीं चलता कि आखिर ये ‘बुरा’ या ‘अच्छा’ है क्या। वह बस मान लेता है, क्योंकि उतने पर ही उसका वश है।

पहले रिसेशन की बात करें, जिसे हिन्दी में मंदी का दौर कहते हैं। यह दौर अगर थोड़ा लम्बा चले तब उसे खतरनाक मान सकते हैं। जैसे कि अगर जीडीपी, जो कि पूरे देश का एक तरह से मूल्य कह सकते हैं, अगर लगातार घटने लगे, या उसकी वृद्धि रुक जाए, या कम हो जाए, और साल भर ऐसे ही रुकी या घिसटती रहे तो कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था में ‘मंदी’ आ गई है। और सरल शब्दों में कहा जाए तो इसे ऐसे देखिए कि आपके घर की हर वस्तु का मोल, आपके खेत का मोल, मवेशियों का मूल्य, आप जो कमाते हैं वो पैसा, यानि कि घर और परिवार की सारी चल और अचल संपत्ति के साथ आपके कौशल से आने वाले पैसों का मूल्य आपकी जीडीपी कही जाएगी।

हर साल आपकी जमीन, मवेशी और घर का मूल्य बढ़ता है, आपकी सैलरी भी बढ़ती है। इसे मानिए कि आपकी जीडीपी बढ़ रही है। लेकिन ये हमेशा एक तय तरीके से नहीं बढ़ती। कभी बाढ़ आने से आपकी जमीन डूब गई और खेती नहीं हुई, या घर में चोरी हो गई, या फिर आपकी कम्पनी ने अच्छा लाभ नहीं कमाया तो आपकी सैलरी में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई; कुल मिला कर जहाँ आपके बढ़ने की गति पिछले साल दस थी, अब आठ हो गई। फिर अगले तीन महीने कुछ और दिक्कत हो गई, आपकी गाड़ी खराब हो गई तो उसमें पैसे गए। गाय ने दूध देना कम कर दिया क्योंकि गर्मी बढ़ गई और चारे का इंतजाम नहीं हो पाया। उस तीन महीने आपकी जीडीपी की वृद्धि में फिर गिरावट आई। यही गिरावट अगर हर तीन महीने (तिमाही) पर जारी रहे, तो आपको सोचना पड़ेगा कि क्या किया जाए- नई नौकरी लें, किसी से ज्यादा जमीन लेकर खेती शुरू कर दें, या कुछ बेच कर कुछ और खरीदें, जिससे मुनाफा कमा सकें।

राष्ट्र के संदर्भ में भी कुछ यही होता है। अगर हर चौथाई साल या क्वार्टर, यानि तिमाही, में यह दर गिरती रहे, तब कहते हैं कि मंदी का दौर है। इस बात पर भी गौर कीजिए कि बढ़ अभी भी रही है, बस उसकी गति कम हो गई है। यानि सीधे तौर पर नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन भविष्य में अगर कुछ नहीं किया गया तो होने वाले फायदे में कमी के कारण नुकसान होगा। इसलिए अभी की ग्रोथ रेट, यानि वृद्धि दर, को सही करने के लिए सरकार को कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। ये कदम क्या होंगे, उस पर चर्चा थोड़ा आगे जाने पर।

मनमोहन सिंह की कारगुजारी और उसके नुकसान

मनमोहन सिंह किसी तरह राज्यसभा में पहुँच गए हैं और अर्थव्यवस्था पर ज्ञान दिए जा रहे हैं। देना भी चाहिए क्योंकि ऑक्सफोर्ड से पढ़े हुए हैं। मनमोहन सिंह कहते हैं कि मोदी की नीतियों ने भारत को इस स्थिति में पहुँचाया है। लेकिन आँकड़े इस दावे के उलट कुछ और ही कहानी कहते हैं।

याद कीजिए 2008 का वह दौर, जब वैश्विक मंदी से पूरा विश्व जूझ रहा था। तत्कालीन भारत सरकार ने, यानि अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह जी ने, उस मंदी के असर से भारत को बचाने के लिए कुछ त्वरित उपाय किए। अब सवाल यह है कि मंदी से बचाने के उपाय क्या हैं?

मंदी के दौर में एक तो पूरी इकॉनमी धीमी होती ही है, दूसरी बात यह होती है कि आम आदमी इस डर से खर्च करना बंद कर देता है कि भविष्य में बुरा दौर आने वाला है तो बचाना ज़रूरी है। यानि वो बाहर खाना खाने में कमी करता है, सिनेमा नहीं देखने जाता, ऑटो या टैक्सी की जगह बस या मेट्रो से चलने लगता है, कपड़े कम खरीदता है, महंगा भोजन घर में कम बनवाता है। इससे इकॉनमी और मंद हो जाती है क्योंकि धीमी अर्थव्यवस्था को चलायमान रखने के लिए लोगों को पैसा खर्च करना होता है- वो खर्च नहीं करेंगे तो रेस्तराँ, सिनेमा, कमर्शियल गाड़ियाँ चलाने वाले लोगों का व्यवसाय कम होता है। यानि एक बार ‘मंदी’ की खबर फ़ैल जाने पर आम आदमी की सतर्कता मार्केट को और ‘मंदा’ करने लगती है।

फिर सरकार क्या करे? सरकार के सामने एक विकल्प होता है कि अपनी योजनाओं के माध्यम से लोगों तक पैसे पहुँचा दो। दूसरा तरीका है कि बैंकों को कहो कि लोगों को लोन दें, व्यापारियों को लोन दें, कम ब्याज दर पर दें। दोनों ही समाधान हालाँकि त्वरित होते हैं, लेकिन इनसे लोगों के हाथ में पैसा पहुँचता है, लोगों के बीच ‘सेंटिमेंट’ अच्छा बनता है और वो हाथ में आए पैसे को खर्च करना शुरू करते हैं।

यूँ तो यह प्रक्रिया और भी जटिल है, लेकिन मोटे तौर पर इसे ऐसे ही समझिए कि बैंक व्यवसाय करने वालों को पैसा देगी तो वो व्यवसायी उसे फैक्ट्री लगाने से लेकर छोटी कम्पनियों को खरीदने, अपने बिजनेस को बढ़ाने में लगाएँगे, जिससे रोजगार बढ़ेगा, लोगों को सैलरी मिलेगी, सैलरी से डिमांड बढ़ेगी और दूसरे उद्योगों पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा। साथ ही, अगर आपकी ग्रोथ रेट सही होगी तो बाहर से निवेश आने के भी मौके बेहतर होने लगते हैं।

इस दौर में मनमोहन सिंह की सरकार ने यही क्विक-फिक्स अपनाया कि थोड़े समय के लिए इकॉनमी सुधर जाए लेकिन लम्बे दौर में उसका असर दोबारा दिखने लगा है। होता यह है कि लोगों के पास आपने पैसे तो दे दिए, लेकिन उन्हें इस योग्य नहीं बनाया कि वो आगे भी पैसे कमाते रहें। आपने ईएमआई पर उसे गाड़ी दिलवा दी, तो ऑटो सेक्टर सही चल गया। लेकिन उस गाड़ी को वो चला भी नहीं पा रहा, क्योंकि आगे ईएमआई और ईंधन का पैसा कौन देगा? उसी तरह मनरेगा से, या फूड सिक्योरिटी एक्ट से, लोगों के खाने-पीने का इंतजाम तो हो गया लेकिन उनके लिए लगातार चलने वाला कोई काम नहीं मिला।

अंततः, इसका असर कुछ ऐसे हुआ कि लोगों के पास से पैसे फिर खत्म हो गए। आपने उसे मछली पकड़ना सिखाने की जगह मछली पकड़ कर दे दी। वो रात को मछली खा कर सो गया, और अगली सुबह फिर भूखा है। आपने वहाँ पहले स्किल डेवलप करने की जगह उसे सीधा इनाम दे दिया, पीठ ठोक दी और कहा ऐश करो। एक पूरी पीढ़ी बिना किसी खास स्किल के, सस्ते दरों पर गेहूँ-चावल पा कर, अपने आप को किसी लायक नहीं बना पाई क्योंकि आपने उसे पंगु और लाचार बनाए रखा। क्योंकि जब अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और हार्वर्ड के पढ़े इकॉनमिस्ट अर्थव्यवस्था की बैंड बजाते हैं तो फिस्कल डेफिसिट का ख्याल नहीं करते। इसकी चर्चा आगे होगी।

बैंकिंग क्राइसिस और मनमोहन सिंह का दौर

एक आँकड़ा देखिए कि आजादी के बाद से लेकर साल 2008 तक, देश के बैंकों ने 18 लाख करोड़ रुपए की राशि ही लोन के तौर पर दी थी। लेकिन 2008 के बाद के 6 वर्षों में ये राशि बढ़कर 52 लाख करोड़ रुपए हो गई। 2008 का साल इसलिए जरूरी है क्योंकि इसी साल ‘रिसेशन’ आया था और भारत सरकार ने उसी साल से आने वाले समय के लिए नई क्राइसिस की नींव रख दी थी।

रिसेशन का चक्र होता है, और हर व्यवसाय की तरह यह आता और जाता रहता है। कई बार मंदी के दौर में आपकी नीतियों का हाथ नहीं होता, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में नकारात्मक असर होने से, आपकी इकॉनमी भी उसका प्रभाव झेलती है। जैसे कि अभी अमेरिका और चीन लड़ रहे हैं, तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। एप्पल और एमेजॉन जैसी कम्पनियाँ अब चीन से फैक्ट्री हटा कर भारत में लगाएँगी। लेकिन वो होने में समय है। उसी तरह, जब दो आर्थिक शक्तियाँ ऐसे उलझती हैं तो पूरे विश्व में एक चिंता का माहौल उपजता है, बड़ी कम्पनियाँ सोच में पड़ जाती हैं कि वो निवेश करें तो कहाँ करें, या इंतज़ार करें कि दो राष्ट्र अपनी नीतियाँ सही कर लें।

जब यही रिसेशन लम्बा खिंच जाता है तो उससे निपटने के लिए सरकार को या तो नीतियों में बदलाव करना होता है, या इंतज़ार कर उसका झटका सहन करते रहना होता है- या फिर कोई त्वरित समाधान दे कर अगले साल होने वाले चुनावों पर नजर रखनी होती है। मनमोहन सिंह के सलाहकारों ने चुनाव को देखते हुए 2008 के बाद एक ऐसी कमाल की युक्ति लगाई कि उनके पाप मोदी को धोने पड़ रहे हैं। जब बैंको ने 52 लाख करोड़ बाँट दिए और उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा उसके पास वापस नहीं आया, तो बैंकों का व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ। बड़े व्यापारियों को लोन मिला मनमोहन काल में, रिकवरी के लिए गारंटी की कोई व्यवस्था नहीं, भागा वो मोदी काल में क्योंकि रोकने का कोई कानून ही नहीं था, और कटघरे में खड़ा होता है मोदी।

बैंकों के एनपीए बढ़ने से क्या होता है?

हर बैंक के पास अपनी पूरी पूँजी का एक तय प्रतिशत ही लोन के तौर पर देने का प्रावधान होता है। जैसे कि आपकी पूँजी सौ रुपए है, तो आप ₹40 तक लोगों को उधार दे सकते हैं। अब देखिए कि कोई माल्या या नीरव मोदी टाइप का आदमी आपसे बीस रुपया लेता है, और आपके पास अगले साल वो पैसा वापस नहीं आता, तो आपकी कुल जमा पूँजी बचती है 80 रुपए। तो इस साल आप सिर्फ 32 रुपए ही लोन पर देने के योग्य हैं। ऐसे ही आप अगले साल भी रिकवर नहीं कर पाते तो, आपका व्यवसाय डूबने लगता है। इसी से बैंकिंग में समस्या आती है और फिर वो लोगों को लोन देने की अवस्था में नहीं होते।

अब लोन नहीं मिलेगा तो नए लोग रोजगार नहीं बिठा सकते, घर बनाने में समस्या आ सकती है, कार खरीदने में दिक्कत हो सकती है। यानि कि बैंक के पास पैसे की कमी होती है, और वो इस बात से भी डरते हैं कि अगर वापस लोन दें, और रिकवरी न हो, तो फिर वो डूब जाएँगे। मतलब आम आदमी के हाथ में पैसे आने के स्रोत खत्म।

फिर आती है सरकार पिक्चर में। सरकार चाहे तो लोगों में पैसे बाँट दे। नई योजनाएँ बनाए, गरीबों के हाथ में जीने के लिए पैसे दे, बैंकों को इसलिए पैसे दे कि उनकी पूँजी बढ़े तो व्यापारियों को लोन दें। इससे अर्थव्यवस्था सही हो जाए। तो इसमें बुरा क्या है?

बुरा यह है कि जिस मनमोहन सिंह की सरकार में 2007-08 में देश की आमदनी और देश के खर्चे का अंतर, यानि फिस्कल डेफिसिट, जीडीपी का 2.5% था, वो अगले साल अचानक से 2008-09 में 6.2% और यूपीए-द्वितीय के पहले साल 2009-10 में 6.6% तक चला जाता है। यानि कमा रहे हैं 100 और खर्चा हो रहा है 107 रूपया। मनमोहन सिंह ने जो ये कदम उठाए उसे पाटने में अरुण जेटली तक आते-आते दो साल और लग गए।

आँकड़ों की बात करें तो 2010-11 में फिस्कल डेफिसिट 4.7% पर पहुँचा लेकिन अगले ही साल 2011-12 में यह वापस 6% की तरफ जाने लगा और 5.9% पर पहुंच गया। फिर, 2012-13 में यह 4.9% तक गिरा, 2013-14 में और गिर कर 4.5% हुआ। इसके बाद, 2014-15 में मोदी सरकार के एक साल में यह सामान्य टार्गेट के आस-पास पहुँचा जब यह फिस्कल डेफिसिट 4% से होते हुए, 2015-16 में 3.9%, और 2016-17 3.5% पर पहुँचा। ध्यान रहे यह वही साल था जब नोटबंदी हुई थी, और टैक्स कलेक्शन बढ़ने लगा था। भारत सरकार ने फिस्कल डेफिसिट का सामान्य टार्गेट 3.5% रखा है।

मोदी सरकार अगले साल 2017-18 में इस डेफिसिट को टार्गेट के पास 3.5% लाते हुए, अगले साल और नीचे करते हुए 3.4% पर ले आई। यह सब तब संभव हुआ जब पूरे देश में लगातार ढाँचागत काम चल रहे थे, बुलेट ट्रेन जैसी योजनाओं पर पैसे लग रहे थे, और आयुष्मान योजना जैसी लोककल्याणकारी योजना में बजट का बड़ा हिस्सा जा रहा था। भले ही, विरोधी इन सारी बातों को खारिज कर दें, लेकिन आँकड़े झूठ नहीं बोलते।

यह बात भी सत्य है कि इस वित्तीय वर्ष के पहले क्वार्टर में ही फिस्कल डेफिसिट के टार्गेट का 77% जा चुका है, जो कि बेशक चिंताजनक है, और यह अगली तिमाही में बहुत कम हो जाए इसकी आशा भी कम ही है। लेकिन, रिसेशन सिर्फ एक तिमाही की मंदी से नहीं आता। सरकार ने पिछले कुछ समय में अपने कुछ फैसलों से भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिससे बाजार का सेंटीमेंट बुरा हुआ है और बिजनेस करने वाले असमंजस की स्थिति में हैं कि पैसा लगाएँ या नहीं। लेकिन, पिछले सप्ताह वित्त मंत्री ने उसमें सुधार लाने के लिए कुछ फैसलों को पलटा है, तो यह तय है कि सरकार इससे निपटने के लिए सक्रिय है।

वापस बात बैंकों और गैर-बैंकिंग वाले वित्तीय संस्थाओं की

बैंकिंग पर हमने देख लिया कि बैंक के पास अपनी पूँजी का एक तय हिस्सा ही लोन पर देने के लिए होता है, लेकिन NBFC (नॉन-बैंकिंग फायनेंशियल कम्पनी) का मुख्य कार्य ही लोन देना होता है। इन संस्थाओं को इसलिए बनाया गया ताकि व्यापारियों को बड़े लोन लेने में समस्या न हो। बैंकों पर लोन देने की सीमा होती है क्योंकि उसमें आम आदमी के पैसे होते हैं। अगर बैंक सारा पैसा लोन में दे कर डूब जाए तो आम लोगों के पैसे भी डूब जाएँगे जिससे विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

इससे बचने को लिए NBFC का प्रावधान आया कि व्यवसायों को लोन देने के लिए ये कम्पनियाँ उनकी संपत्ति या पुराने रिकॉर्ड देख कर तय करे कि कितना लोन देना है, किस दर पर देना है, और कैसे वापस लेना है। इससे व्यापार चलता रहता है, नए लोग बिजनेस करते हैं, या पुराने लोग नए बिजनेस में घुसते हैं। इन कम्पनियों में रिस्क लेने की क्षमता ज्यादा होती है, तो बड़े लोन देने में ये आगे होतीं हैं।

इसमें भी क्राइसिस आ गई, क्योंकि लोग लोन लेकर या तो भाग गए, या उनका व्यापार उस तरह से नहीं चला, जैसा इन्होंने सोचा था। वापस 2008 में जाते हैं जहाँ बाजार में डिमांड क्रिएट करने के लिए सरकार ने बैंकों को पैसे देने शुरु किए ताकि रिसेशन से मुक्ति मिल सके, और चुनाव तक सेंटीमेंट खराब न हो। अगले छः सालों में 52 लाख करोड़ रुपए बैंकों ने लोन में दे दिए।

अब हुआ यह कि बिजनेस करने वालों के पास पैसे आए, उन्होंने फैक्ट्री लगाई। फैक्ट्री का प्रोडक्शन इस उम्मीद में ज्यादा रखा कि लोग खरीदेंगे। इससे सप्लाई में वृद्धि हुई, लेकिन डिमांड उतनी ज्यादा नहीं बढ़ी। जैसे कि टाटा ने जैगुआर को खरीद लिया, लेकिन उसकी कारें भारत में खरीदने वाले बहुत कम थे। बहुत कम इसलिए थे क्योंकि सरकार ने लोगों को चीजें खरीदने योग्य बनाने की जगह उन्हें लोन और ईएमआई उपलब्ध कराने पर ज्यादा जोर दिया।

इससे बिजनेस करने वालों को वांछित लाभ नहीं मिला और वो NBFC या बैंक से लिए लोन चुकाने में अक्षम रहे। यानि कि अब यही बैंकिंग और नॉन-बैंकिंग कम्पनियाँ अगले साल कम लोगों को लोन देगी, फिर डिमांड सही नहीं हुई, तो फिर रिकवरी नहीं हो पाएगी। इसका मतलब यह हुआ बैंकों का घाटा बढ़ता जाएगा। फिर वो स्थिति आएगी जब आप सारे कागज जुटा लेंगे, और वही बैंक आपको लोन नहीं देंगे जो पिछले साल फोन कर-कर के आपको पागल कर रहे थे। स्थिति बदल चुकी थी, क्योंकि बैंक लगातार घाटे में जा रहे थे।

यह परिस्थिति मोदी सरकार की देन नहीं है, बल्कि इसमें बैंकों ने अपने रिस्क पर अपना पैसा डुबाया है। जब आप बड़े लोन देते हैं तो आपके पास उसे वापस पाने के तरीके होने चाहिए। परसों एक रिपोर्ट आई कि बैंकों में फ्रॉड 74% बढ़ गया है, लेकिन यह बात आधा सत्य है। बैंकों में फ्रॉड की रिपोर्टिंग बढ़ी है क्योंकि पहले बैंक अपने व्यवसाय को सही दिखाने के लिए इस तरह के फ्रॉड को रिपोर्ट ही नहीं करते थे। अब रिजर्व बैंक ने सख्ती की है तो यह संख्या बढ़ गई है।

अगले हिस्से में पढ़िए प्राइवेट सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और समाधानों के बारे में

ITR फाइल करने वालों ने रचा इतिहास, 31 अगस्त को फ़ाइल हुए रिकॉर्ड 49 लाख से ज्यादा ITR

आयकर विभाग ने एक दिन में सबसे ज्यादा इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का नया रिकॉर्ड बनाया है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के अनुसार, शनिवार 31 अगस्त को रिकॉर्ड 49,29,121 आईटीआर फाइल हुए। CBDT के मुताबिक हर सेकेंड अधिकतम 196 आईटीआर। अगर पीक फाइलिंग दर प्रति मिनट की बात करें तो यह संख्‍या 7447 थी और हर घंटे अधिकतम 3,87,571 आईटीआर फाइल किए गए।

शनिवार अगस्त 31, 2019 को आयकर रिटर्न (ITR) फाइल करने का आखिरी दिन था। इससे पहले ITR फाइल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई थी, जिसे बाद में एक महीने के लिए बढ़ा दिया गया था। वित्तीय वर्ष का इनकम टैक्स रिटर्न 31 जुलाई तक दाखिल करना अनिवार्य होता है।

सोशल मीडिया में चल रही है आईटीआर फाइल करने की मियाद बढ़ने की अफवाह

ITR फ़ाइल करने की तारीख बढ़ने की अफवाहों को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने खारिज करते हुए कहा था कि इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की अंतिम तारीख में कोई बदलाव नहीं हुआ है। यह 31 अगस्त 2019 ही है।

CBDT ने कहा कि करदाताओं को इस समयसीमा में अपना रिटर्न फाइल करना चाहिए। सोशल मीडिया में आईटीआर फाइल करने की मियाद बढ़ने की खबर अफवाह है। सीबीडीटी ने शुक्रवार को अपने ट्विटर हैंडल पर यह जानकारी दी थी। इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की अंतिम तारीख को लेकर सोशल मीडिया पर एक झूठा मैसेज तेजी से वायरल हो रहा था। इसके बाद सीबीडीटी ने इस बारे में स्थिति स्पष्ट की।

31 अगस्त के बाद देनी होगी पेनल्टी

अगर आपने 31 अगस्त तक रिटर्न फाइल नहीं किया तो आपको पेनाल्टी देनी होगी। समय सीमा खत्म होने के बाद 31 दिसंबर तक रिटर्न फाइल करने पर 5,000 रुपए पेनाल्टी भरनी होगी। जबकि दिसंबर के बाद रिटर्न फाइल किया तो 10,000 रुपए जुर्माने के तौर पर वसूले जाएँगे।

आईटीआर नहीं भरने पर तीन महीने से दो साल तक की जेल हो सकती है। अगर इनकम टैक्स का बकाया 25 लाख रुपए से ज्यादा है तो 7 साल तक की जेल हो सकती है।

जहाँ दर्द, वहीं सुई: फ़र्ज़ी डॉक्टर खलील अहमद गिरफ़्तार, 5वीं फेल लगा रखा था MBBS/MS का बोर्ड

मध्य प्रदेश में एक ऐसे फ़र्ज़ी डॉक्टर को गिरफ़्तार किया गया है, जो पाँचवीं फेल है। यहाँ तक कि उसे एमबीबीएस का फुल फॉर्म तक नहीं पता। जबकि, वह ख़ुद को एमबीबीएस और एमएस डिग्री होल्डर बताता फिरता था। मामला इंदौर के गौतमपुरा का है, जहाँ खलील अहमद नामक फ़र्ज़ी डॉक्टर आर्थोपेडिक क्लिनिक चलाया करता था। वहाँ उसने बाँझपन से लेकर कैंसर तक का इलाज करने जैसे दावों के साथ एक बोर्ड भी लगा रखा था।

शनिवार (अगस्त 31, 2019) को उसके ख़िलाफ़ पुलिस को शिकायत मिली थी। इसके बाद पुलिस ने स्वास्थ्य विभाग की एक टीम के साथ आरोपित डॉक्टर के क्लिनिक पर छापेमारी की। पुलिस को अपनी पड़ताल में पता लगा कि खलील के पास मेडिकल काउंसिल का रजिस्ट्रेशन तक नहीं था। यहाँ तक कि जब उससे उसकी डिग्री के बारे में पूछा गया तो वह अचानक से हड़बड़ा गया और उससे कोई जवाब देते नहीं बना।

आरोपित फ़र्ज़ी डॉक्टर के क्लिनिक से कई दवाइयाँ भी बरामद की गईं। हालाँकि, खलील इसका जवाब देने में भी विफल रहा कि कौन सी दवा किस बीमारी में दी जाती है। बाद में जब पुलिस ने उसकी शिक्षा-दीक्षा के बारे में पता लगाया तो खुलासा हुआ कि वह 5वीं फेल है। स्वास्थ्य विभाग की टीम से उससे अंग्रेजी में ‘डॉक्टर’ शब्द लिखने को कहा लेकिन खलील इतना भी नहीं कर सका।

आरोपित खलील पहले बंगाल में किसी डॉक्टर की क्लिनिक पर काम किया करता था। वहीं उसके शैतानी दिमाग में ये आईडिया आया कि ऐसा ही कोई क्लिनिक खोल कर लोगों को बेवकूफ बनाते हुए पैसा कमाया जा सकता है। तब उसने गौतमपुरा में क्लिनिक खोला। एक और अजीबोगरीब बात यह सामने आई है कि मरीज को शरीर के जिस भाग में दर्द होता था, वह उसे उसी स्थान पर इंजेक्शन लगा दिया करता था।

फ़र्ज़ी डॉक्टर खलील अहमद द्वारा तंत्र-मन्त्र और झाड़-फूँक करने की बात भी सामने आई है। उनके ख़िलाफ़ धारा 420 के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने उसके क्लिनिक को भी सील कर दिया है।

2018-19 में UPI लेन-देन 5 बिलियन के पार, डेबिट कार्ड से हुए लेनदेन को छोड़ा पीछे: RBI की रिपोर्ट

मोदी सरकार की नीतियों की वजह से डिजिटल लेनदेन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018-19 में यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी UPI के ज़रिए डिजिटल पेमेंट ने डेबिट कार्ड से हुए लेनदेन को पीछे छोड़ दिया है।

ख़बर के अनुसार, 5.35 बिलियन का UPI लेन-देन, डेबिट कार्ड लेन-देन की तुलना में लगभग 1.2 गुना अधिक था, यानी डेबिट कार्ड का लेन-देन 4.41 बिलियन था। यह डेटा इस बात को स्पष्ट करता है कि UPI के यूज़र्स ने लेन-देन के इस माध्यम को हाथों-हाथ लिया है, जबकि इस तरह के ऐप को लॉन्च हुए केवल तीन साल हुए हैं।

2017-18 में, UPI के ज़रिए केवल 915.2 मिलियन लेन-देन हुआ, जबकि डेबिट कार्ड का लेन-देन 3.34 बिलियन था। दिलचस्प बात यह है कि इसी अवधि में एटीएम की संख्या 222,247 से घटकर 221,703 हो गई।

इसका मतलब यह साफ़ है कि अब उपभोक्ताओं को नकद भुगतान की बजाए ऑनलाइन भुगतान की ओर अग्रसर किया जा सकता है। केंद्रीय बैंक दिसंबर से अपने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (NEFT) प्रणाली को 24×7 उपलब्ध कराने की योजना बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बैंकिंग सिस्टम में डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

‘दिग्विजय को ऐसी बयानबाजी करनी है तो पाकिस्तान जाएँ, हम तो उनके खिलाफ कोर्ट जा रहे हैं’

देश को हिंदू आतंकवाद की थ्योरी परोसने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इस बार बजरंग दल के ख़िलाफ़ बयानबाजी करके बुरे फँसे। भाजपा और बजरंग दल पर आईएसआई से पैसे लेने का आरोप लगाने के बयान पर बजरंग दल ने उन पर एक्शन लेने का फैसला कर लिया है।

बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक सोहन सोलंकी ने कहा है कि वो अब कोर्ट में जाकर दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करवाएँगे। साथ ही उनका कहना है कि पार्टी को अब दिग्विजय सिंह को बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन कॉन्ग्रेस ही भारत से बाहर हो जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राष्ट्रीय संयोजक का दिग्विजय के बयान पर कहना है कि अगर दिग्विजय को इसी तरह की बयानबाजी करनी है तो पाकिस्तान जाएँ और पाकिस्तानियों के साथ रहें। उनकी मानें तो दिग्विजय के बयानों को अब उनके घरवाले ही गंभीरता से नहीं लेते और न ही उनके बयानों को वो सुनते हैं।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में भिंड प्रवास के दौरान अभी हाल ही में दिग्विजय सिंह ने बजरंग दल और भाजपा के सदस्यों पर निशाना साधते हुए कहा था “जितने भी पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पाए गए हैं, वे लोग बजरंग दल, बीजेपी और आईएसआई से पैसा ले रहे हैं। आईएसआई के लिए जासूसी समुदाय विशेष वाले कम कर रहे हैं और दूसरे धर्म वाले ज्‍यादा कर रहे हैं। इसको भी समझ लीजिए।” हालाँकि बाद में उन्होंने अपने इस बयान को लेकर सफाई भी पेश की और दावा किया कि यह पूरी तरह से गलत हैं।

ट्रैफिक नियमों को तोड़ने पर फाइन या सजा नहीं, मिली मिठाई और टॉफी: मणिपुर में अनोखा अभियान

मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन के बाद रविवार आधी रात से नया कानून पूरे देश भर में लागू हो गया। कहा जा रहा है कि अब से ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों को 10 गुना ज्यादा जुर्माना भरना होगा। लेकिन इसी बीच मणिपुर से एक हैरान करने वाली भी खबर आ रही है।

बताया जा रहा है मणिपुर के चुराचंदपुर इलाके में ट्रैफिक पुलिस ने बिना हेलमेट बाइक चलाते लोगों को न केवल हिदायत दी कि सभी सुरक्षा नियम जनता के लिए बनाए गए हैं। इसलिए वो उसका अनुसरण करें बल्कि उनको मिठाई और टॉफियाँ भी बाँटीं और उनसे कोई फाइन भी नहीं लिया

एएनआई के ट्वीट के मुताबिक एसपी अमृता सिन्हा ने बताया कि पहले जब उन्होंने बिना हेलमेट पहने लोगों को सड़क पर रोकना शुरू किया तो लोगों को ये अच्छा नहीं लगा, फिर उन्हें एक आइडिया आया और उन्होंने कुछ दूर पर गाड़ी को रुकवाना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने लोगों से उनकी गाड़ी को खींचकर आगे लाने को कहा और फिर उनको टॉफी और मिठाई दी।

इसके साथ ही पुलिस ने नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों आराम से समझाया कि ये सब उनकी सुरक्षा के लिए ही है इसलिए पुलिस चाहती हैं कि वो हेलमेट पहनें। एसपी अमृता बताती हैं कि उन्होंने जैसे ही इस तरीके को अपनाया लोग उनके साथ कॉपरेट करना शुरू कर दिया और उनकी बात भी सुनने लगे। लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए जागरूक करने के लिए मणिपुर में यह मुहिम अभी कुछ दिन पहले से शुरू हुई है।