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जब फ़्रांस ने कीमत चुकाई थी मक्का बचाने की…

20 नवम्बर, 1979 की सुबह थी और शेख मुहम्मद अल सुबायिल करीब 50,000 लोगों की नमाज़ की तैयारी में थे। अचानक करीब पाँच बजे सुबह कुछ हथियारबंद लोगों ने उन्हें घेर लिया। मस्जिद के दरवाजे बंद कर दिए और वहाँ मौजूद जो दो पुलिसकर्मी सिर्फ लाठी से लैस थे, उन्हें मार डाला।


फोटो साभार -अरब न्यूज़

करीब 400 से 500 हथियारबंद लोगों ने सभी नमाज अता करने आए लोगों को अपने काबू में कर लिया। इन हथियारबंद लोगों में कई औरतें और बच्चे भी थे। सभी अल कुओंताय्बी नाम के आन्दोलन से जुड़े हुए इन हमलावरों ने मक्का शहर के बड़े मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया।

सऊदी बिन लादेन ग्रुप इस समय मस्जिद में कुछ मरम्मत का काम कर रही थी। इस से पहले की हमलावर टेलिफोन के तार काट पाते उनके एक कर्मचारी ने बाहर इस बात की सूचना पहुँचा दी। थोड़ी देर में हमलावरों ने कई बंधकों को बाहर निकाल दिया और बाकि के बंधकों को अपने कब्ज़े में लेकर अन्दर बंद रहे। अब बाहर कोई नहीं समझ पा रहा था की अन्दर कितने बंधक और कितने हमलावर मौजूद हैं।


फोटो साभार -अरब न्यूज़

इस समय अरब के क्राउन प्रिंस फहद ट्यूनेशिया में थे, नेशनल गार्ड के मुखिया प्रिंस अब्दुल्ला मोरक्को गए थे। किंग खालिद ने मस्जिद को छुड़ाने की जिम्मेदारी प्रिंस सुलतान को सौंपी, प्रिंस नाएफ भी उनके साथ गए।

हमले के खबर सुनते ही आंतरिक मंत्रालय के कुछ सौ सिपाहियों ने मस्जिद को छुड़ाने का प्रयास किया लेकिन कई लोग मारे गए और उन्हें हमलावरों के हाथ मस्जिद छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। शाम ढलते-ढलते पूरा मक्का खाली करवा लिया गया। सऊदी अरब की आर्मी और सऊदी अरब नेशनल गार्ड ने भी मोर्चा संभाला। सऊदी इंटेलिजेंस अल मखाबरात अल आम्माह के मुखिया तुर्की बिन फैज़ल अल सउद ने आगे की कमान संभाली। अगले कई दिन तक वो वहीं रहने वाले थे। ऐसे माहौल में मदद के लिए पाकिस्तानियों से भी मदद माँगी गई। मगर कई दिन तक पाकिस्तानी कमांडो भी कुछ नहीं कर पाए।


फोटो साभार -अरब न्यूज़

आखिर में आई Groupe d’Intervention de la Gendarmerie Nationale (GIGN)! जी हाँ, फ़्रांसिसी कमांडो का एक दस्ता मक्का आया। अब मक्का में गैर मुस्लिमों को घुसने की इज़ाजत तो होती नहीं सो एक छोटे से आयोजन में तीन कमांडो ने धर्म परिवर्तन किया। फिर गैस के गोले अन्दर फेंके गए, अन्दर के चैम्बर में से हमलावरों को खुली जगह में आना पड़ा। दीवारों में ड्रिल कर के अन्दर अब बम फेंक दिए गए। फिर आगे की कार्रवाई में मस्जिद आजाद करवाया जा सका।

इस मामले में ख़ास था कि जैसे ही मस्जिद पर हमलावरों के कब्जे की खबर जारी हुई ईरान के इस्लामिक क्रन्तिकारी अयातोल्ला खोमेनी ने रेडियो पर कहा, इसमें कोई शक नहीं की इस हमले के पीछे अमरीकी और यहूदियों का हाथ है। इन अफवाहों के कारण दुनिया भर में अमेरिका विरोधी प्रदर्शन हुए। इस्लामाबाद में 21 नवम्बर को अमेरिकी एम्बेसी जला के राख कर दी गई। एक हफ्ते बाद लीबिया में भी अमेरिकी एम्बेसी जला दी गई।

अल कहताबी मस्जिद पर हमले में ही मारा गया था लेकिन जुहाय्मन और उसके 67 साथी पकड़े गए थे। सभी पुरुषों की गुप्त पेशी हुई। 9 जनवरी, 1980 को 63 को सऊदी के आठ अलग-अलग शहरों में बीच चौराहे पर सर काट कर मौत की सजा दी गई।

फोटो साभार -अरब न्यूज़

लड़ाई दो हफ्ते से थोड़ी ज्यादा चली। सरकारी तौर पर 255 हाजी, सिपाही और हमलावर मारे गए थे। करीब 560 जख्मी हुए।

4 साल पहले नवम्बर के महीने में इस्लामिक आतंकी हमला झेलकर फ्रांस ने 40 साल पहले मक्का की मस्जिद बचाने, और इसके अलावा अयातोल्ला खोमैनी को शरण देने की कीमत भर चुकाई थी।

फ्रांस अटैक जिसकी जिम्मेदारी ISIS ने ली थी।

हिन्दू हूँ, दूसरे समुदाय के 100 लोगों ने लिंच करने की कोशिश की: अहमदाबाद कपड़ा व्यापारी

अहमदाबाद के कालूपुर इलाके में दो समुदाय के लोगों के बीच पार्किंग को लेकर हुई हिंसा की एक घटना सामने आई है। जहाँ, कथित तौर पर, बोहरा समुदाय के कुछ लोगों ने मिलकर हिंदू कपड़ा व्यापारी को बुरी तरह पीट दिया। साथ ही उनके कपड़े भी फाड़े, मोबाइल भी तोड़ा और गाड़ी को भी नुकसान पहुँचाया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कालूपुर में बोहरा गली एक समुदाय विशेष बहुल इलाका है जहाँ पर 80-90 हिंदू व्यापारियों की भी दुकानें हैं। यहाँ अक्सर दूसरे समुदाय के लोग हिंदू व्यापारियों की गाड़ियों को नुकसान पहुँचाते हैं। लेकिन कोई उन्हें कुछ नहीं बोल पाता। ऐसे में 4 सितंबर को करीब 11 बजे भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब गाड़ी पार्क करने के मसले पर वहाँ के बोहरा समाज के लोगों ने उनसे बहस करनी शुरू कर दी और थोड़ी देर में इकट्ठा होकर मारपीट करने लगे।

पीड़ित कपड़ा व्यापारी की मानें तो इस कहा-सुनी के समय सिर्फ़ वहाँ 4-5 लोग ही वहाँ मौजूद थे लेकिन अचानक वहाँ 100 लोगों की भीड़ इकट्ठा होकर उन्हें मारने लगे। दिलीप नाम के इस व्यापारी के मुताबिक ये सब साजिश के तहत हुआ था और अगर किसी को उनकी इस बात पर यकीन नही हो तो वो सीसीटीवी फुटेज भी देख सकता है।

हालाँकि दिलीप के बयान और उनके साथ हुए इस वाकये को उनसे बेहतर कोई नहीं जान-समझ सकता, लेकिन सीसीटीवी फुटेज को देखकर लगता है कि वहाँ भीड़ समझौते के लिहाज़ से इकट्ठा हुई थी, न कि उनपर हमले करने की बाबत से। दिलीप पर हमले की बात पुलिस ने स्वीकारी है लेकिन उसमें अभी तक दूसरे समुदाय के 4-5 ही दोषी जान पड़ रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस घटना के बाद वहाँ के बाजार में अजीब-सी शांति हैं। अधिकतर दुकानदार इस बारे में बात करने से भी कतरा रहे हैं। लेकिन फिर भी वहाँ सभी दुकानदारों का एक मत बताएँ तो उनका कहना है, “दिलीपभाई के साथ जो हुआ वो बेहद ही डरावने स्वप्न की तरह था। ये दिलीपभाई का नसीब ही था कि वे उस भीड़ से बच निकलें।”

आपको बता दें अपने साथ हुई इस घटना पर दिलीप को कानून की ओर से बहुत निराशा हाथ लगी। जिसके कारण उन्हें शक है कि उन्हें न्याय मिलेगा या नहीं। उनकी मानें पहले तो पुलिस इस घटना पर एक्शन लेने को ही नहीं तैयार नहीं थी। उनका कहना था कि बोहरा समाज के लोग समुदाय के बाकी लोगों जैसे नहीं है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद उन्होंने मामले को दर्ज किया।

इस मामले के संबंध में पुलिस ने कहा, “तारीख़ 4/09/2019 की रोज़ पार्किंग के मसले पर कुतबी महोल्ले में सिंधी समाज के व्यापारी के साथ अंजान 4-5 शख़्सों ने मारपीट की है, जिसके अनुसंधान में हमारे यहाँ कंप्लेंट रजिस्टर करवाई गई है। उन अनजान शख़्सों के ख़िलाफ़ छानबीन शुरू है एवं जल्द से जल्द इस पर कार्रवाई की जाएगी।”

लगभग 40 मिनट के CCTV फुटेज में हमने पाया कि एक व्यक्ति अर्धनग्न अवस्था में एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहा है। साथ ही, दसियों लोगों की एक भीड़ भी 3-4 बार कैमरे के फ्रेम में इकठ्ठा होती दिखी। हमने दूसरे समुदाय से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा वो मुहर्रम के बाद ही कुछ बयान देंगे। पुलिस लगातार इसे एक झड़प कह रही है और इसमें सांप्रदायिक एंगल के होने से इनकार कर रही है।

J&K पर फेक रिपोर्ट्स बनाने के लिए एमनेस्टी इंडिया को विदेश से मिले करोड़ों रुपए: डाक्यूमेंट्स से ख़ुलासा

एमनेस्टी इंडिया ख़ुद को मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाला संगठन बताता है लेकिन ताज़ा ख़ुलासे से पता चला है कि वह एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है, जो कमर्शियल रूप में कार्य करता है। उसे यूनाइटेड किंगडम स्थित एमनेस्टी इंटरनेशनल से फंड्स मिलते हैं। इन फंड्स का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जाता है, जिसे मीडिया लपक कर भारत के प्रति नकारात्मक माहौल बनाती है। एमनेस्टी इंडिया ऐसे रिपोर्ट्स तैयार करता है, जिसमें सारा कंटेंट पहले से साज़िश के तहत तैयार रखा जाता है।

रिपब्लिक टीवी द्वारा एक्सेस किए गए डॉक्युमेंट्स के अनुसार, एमनेस्टी इंडिया को पिछले कुछ वर्षों में एमनेस्टी इंटरनेशनल से 5,29,87,663 रुपए मिले हैं। यानी लगभग 5.3 करोड़ रुपयों का इस्तेमाल सिर्फ़ जम्मू कश्मीर के बारे में रिपोर्ट्स तैयार करने के लिए किया गया। 2010 में यह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया फाउंडेशन ट्रस्ट’ के नाम से शुरू हुआ था लेकिन उन्हें ‘विदेशी योगदान नियंत्रण अधिनियम (FCRA, 2010)’ के तहत गृह मंत्रालय से इजाजत नहीं मिली।

इसके बाद उन्होंने ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक व्यापारिक अधिष्ठान (कमर्शियल एंटिटी) बनाया ताकि FCRA को बाईपास किया जा सके। ऐसा इसीलिए भी किया गया क्योंकि एक एनजीओ बन कर लाभ नहीं कमाया जा सकता। इसके बाद एमनेस्टी इंडिया को कमर्शियल रास्तों से तरह-तरह के फंड्स मिलने लगे। रिपब्लिक टीवी के अनुसार, आंतरिक लेनदेन की जो प्रक्रिया एमनेस्टी इंडिया द्वारा आजमाई गई, वह एफडीआई के नियमों का सीधा-सीधा उल्लंघन है।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, उसने ख़ुद को एक कंसल्टेंसी सर्विस का जामा पहना कर रुपयों के लेनदेन किया है। ये रुपए एमनेस्टी इंडिया को बाहर से मिले। ख़ुद को ‘एक्सपोर्ट्स एन्ड गुड्स सर्विसेज’ बता कर एमनेस्टी इंडिया ने जम्मू कश्मीर पर नकारात्मक, नकली और झूठे रिपोर्ट्स प्रकाशित किए। एमनेस्टी इंडिया को जम्मू कश्मीर पर अधकचरे झूठ का पुलिंदा प्रकाशित करने के लिए कुख्यात रहा है। एमनेस्टी इंडिया से जुड़े जो दस्तावेज सामने आए हैं, उसमें साफ़ दिख रहा है कि जम्मू कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करते समय क्या-क्या लिखना है और क्या करना है, यह सब पहले से तैयार कर लिया जाता है।

एमनेस्टी इंडिया को 2015 में 65,000 पाउंड्स मिले। इसका इस्तेमाल ‘जम्मू कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा पीड़ित लोगों को न्याय नहीं मिला’ जैसे नकारात्मक और भारत-विरोधी टॉपिक पर रिपोर्ट लिखने के लिए किया गया। ऐसा डॉक्यूमेंट के ‘Deliveries’ वाले सेक्शन में किया गया। रिपोर्ट में कौन सी चीजें हाइलाइट करनी है और क्या नहीं, यह सब बिना ग्राउंड रिपोर्ट जाने किया जाता है, जो सच्चाई से बिलकुल भी मेल नहीं खाता। नीचे दिए गए डाक्यूमेंट्स में आप और भी ऐसे पहले से तैयार किए गए टॉपिक्स और उसके बदले हुए पेमेंट्स का विवरण देख सकते हैं:

डॉक्युमेंट का पेज-1 (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)

जैसे ऊपर डॉक्यूमेंट के अमाउंट वाले सेक्शन में आप देख सकते हैं कि एमनेस्टी इंडिया को 46,868 पाउंड्स का पेमेंट किया गया है। यह पेमेंट क्यों किया गया? इसके लिए आपको ‘Deliverables’ वाले सेक्शन में देखना पड़ेगा। इसमें 10 ऐसे व्यक्तिगत मामलों को निकालने की बात कही गई है, जहाँ लोगों को न्याय नहीं मिल पाया। क्यों नहीं मिल पाया, इसका कारण ढूँढने को कहा गया है। साथ ही यह मान लिया गया है कि जम्मू कश्मीर में मानवाधिकार हनन (भारत की तरफ़ से) होता है।

इसमें एक फ्रेमवर्क बनाने का टास्क दिया गया है। इस फ्रेमवर्क में विस्तृत तरीके से यह बताया जाएगा कि भारत का सुप्रीम कोर्ट जम्मू कश्मीर में ‘मानवाधिकार हनन’ के ख़िलाफ़ क्या-क्या कर सकता है?

डॉक्यूमेंट का पेज-2 (फोटो साभार: रिपब्लिक टीवी)

इसी तरह ऊपर दिए गए डॉक्यूमेंट के दूसरे पेज में 90,000 डॉलर का पेमेंट देकर कोल रिसर्च प्रोजेक्ट के बारे में नकारात्मकता फैलाने का टास्क दिया गया है।

डॉक्यूमेंट का 11वाँ पेज

इस डॉक्यूमेंट के 11वें पेज पर जम्मू कश्मीर में ‘लोगों पर भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा अत्याचार’ की बात कही गई है, जो पाकिस्तान का वर्षों पुराना प्रोपेगेंडा रहा है। इसमें ऐसे महिलाओं को ढूँढ कर लाने और उनका अनुभव प्रकाशित करने को कहा गया है, जिन्हें यौन शोषण का सामना करना पड़ा। इसके अलावा ऐसे परिवारों के बारे में पता करने को कहा गया है, जिसका कोई सदस्य गायब हो गया। इसी तरह प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए विभिन्न तरीकों की बात की गई है।

इंग्लैंड के सबसे वरिष्ठ पादरी ने जलियाँवाला नरसंहार के लिए माँगी माफ़ी, लेट कर की प्रार्थना

जालियाँवाला बाग़ नरसंहार के बारे में तो आपने पढ़ा ही होगा। अप्रैल 1919 में ब्रिटिश जनरल डायर और उसके सैनिकों ने यहाँ ऐसा आतंक मचाया था कि जान बचाने के लिए कई महिलाएँ और बूढ़े-बच्चे तक भी कुँए में कूद गए थे। स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं के मुताबिक़, इस हत्याकांड में कम से कम 1000 लोग मारे गए और इससे काफ़ी ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए। अमृतसर के हरमिंदर साहिब के नजदीक स्थित जालियाँवाला बाग़ के बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर के अंग्रेजों ने वैशाखी मना रहे लोगों का नरसंहार किया था।

अब इंग्लैंड के सबसे वरिष्ठ पादरी ने इस घटना को लेकर माफ़ी माँगी है। जलियाँवाला नरसंहार के 100 वर्ष पूरे होने के बाद उन्होंने माफ़ी माँगते हुए कहा कि वे इसके लिए शर्मिंदा हैं। दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड के कैंटरबरी चर्च के 105वें आर्चबिशप जस्टिन पोर्टल वेबली ने जालियाँवाला बाग़ पहुँच कर उस नरसंहार को याद करते हुए दुःख जताया।

‘चर्च ऑफ इंग्लैंड’ के सबसे वरिष्ठ पादरी वेबली ने कहा कि जलियाँवाला बाग़ में जो अपराध हुआ था, उसके लिए वह शर्मिंदा हैं और एक धार्मिक नेता होने के तौर पर वह इस त्रासदी की निंदा करते हैं। उन्होंने माफ़ी माँगते हुए कहा कि इसकी यादें हमेशा रहेंगी। उन्होंने ज़मीन पर लेट कर प्रार्थना भी की। बिशप जस्टिन अपनी पत्नी कैरोलिन वेबली के साथ 2 दिवसीय अमृतसर दौरे पर पहुँचे हुए हैं।

वेबली ने कहा कि वह ब्रिटिश सरकार की तरफ से नहीं बोल सकते हैं क्योंकि वह सरकार के आदमी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह जीसस क्राइस्ट के नाम पर बोल सकते हैं। उन्होंने कहा कि वह मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए और इंग्लैंड-भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए प्रार्थना करने आए हैं। इस दौरान उन्होंने भारत की तारीफ करते हुए कहा कि यह दौरा एक तीर्थयात्रा के समान रहा है।

पिछले 1 महीने में सुरक्षाबलों ने एक भी गोली नहीं चलाई: कश्मीर पर फेक न्यूज़ फैलाने पर पाकिस्तान को फटकार

जम्मू-कश्मीर राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार फारूक खान ने पाकिस्तान पर झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने में प्रशासन सफल रहा है। पिछले एक महीने से अधिक समय से सुरक्षा बलों की ओर से एक भी गोली नहीं चलाई गई है। कश्मीर में लोगों की जान की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। धीरे-धीरे घाटी में सामान्य स्थिति लौट रही है।

उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि एक महीने से अधिक समय बीत गया, लेकिन सुरक्षा बलों तथा पुलिस की ओर से कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए एक भी गोली नहीं चलाई गई। यह बड़ी बात है। यह सच्चाई है। उन्होंने कश्मीरियों से अपील की है कि पाकिस्तानी दुष्प्रचार से वो किसी भी प्रकार के उकसावे में न आए।

पूर्व आईएएस ऑफिसर ने कहा कि केंद्र सरकार ने पाकिस्तानी दुष्प्रचार को नाकाम कर दिया, जिसकी वजह से झूठ के सहारे कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का पाकिस्तान का प्रयास नाकाम हो गया। उन्होंने कहा कि घाटी में कारोबारी तथा व्यापारिक गतिविधियाँ जल्द ही बहाल हो जाएँगी। कश्मीर के हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। आप जल्द देखेंगे कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं तथा कारोबारी गतिविधियाँ भी सामान्य हो जाएँगी। सोपोर में एक परिवार पर आतंकी हमले को उन्होंने हताशा में की गई कार्रवाई बताया, जिसमें ढाई साल का बच्चा घायल हो गया था।

इसके अलावा, फारूक खान ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित सभी फर्जी खबरों को खारिज कर दिया, जो पाकिस्तानी प्रचार चैनलों, पाकिस्तानी अधिकारियों और भारतीय मीडिया के भीतर पाकिस्तान के लिए सहानुभूति रखने वाले कुछ समर्थकों द्वारा फैलाए जा रहे हैं।

5 अगस्त को केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर पर लिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद ट्विटर और फेसबुक जैसी विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइटों पर फर्जी खबरों और अफवाहों की बाढ़ सी आ गई। इसी वजह से पिछले महीने गृह मंत्रालय को इस तरह की फर्जी खबर फैलाने वाले तकरीबन 8 लाख अकाउंट को ब्लॉक करने के लिए कहना पड़ा।

रवीश जी को पुरस्कार मिलने पर मोदी (नरेंद्र) ने क्यों नहीं दी बधाई? जलते हैं क्या?

रवीश कुमार को पुनः बधाई समेत उनसे गुजारिश करना चाहूँगा कि भक्त और चाटुकार आपके भी कम नहीं हैं और ऐसे में आप इस बात के लिए मोदी या किसी और को दोषी ठहराते हुए नंगे हो जाते हैं। हाँ, ये बात सही है कि मोदी के भक्त अक्ल से थोड़े अधिक पैदल हैं जबकि आपके वाले पढ़े-लिखे, सभ्य और अधिक तिकड़मी हैं।जहाँ गाली-गलौज में दोनों ही एक समान हैं, वहीं एक विशेष अंतर जो इनके मेन्टल स्टेट का है – जहाँ मोदी भक्त तृप्त और संतुष्ट हैं वहीं रवीश जी के भक्त अधिकतर अंदर से जले-भुने, कुढ़े, चिड़चिड़े, असंतुष्ट और कुछ अचीव न कर पाने का क्षोभ लिए।

खैर, तो रवीश जी को पुरस्कार मिल गया। बधाई बधाई बधाई। मेरी समझ से संभवतः यह ब्रह्मांड का पहला पुरस्कार होगा जो उसे उस चीज के लिए मिला है, जिसको वही आदमी गलत ठहराता और झूठ कहता रहा है। देश में असहिष्णुता है, डर का माहौल है और अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, ऐसा कहने वाले रवीश जी को अपनी अभिव्यक्ति के लिए ही पुरस्कार मिल गया।

फ़िलहाल संभ्रांत रवीश भक्तों की तंग गली में ताजा विषय है पुरस्कार पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या फिर किसी और ने बधाई क्यों नहीं दी? जबकि रवीश जी अपनी पहचान वाली पत्रकारिता 2014 में छोड़ चुके थे और तब तक एक पत्रकार के तौर पर मध्यम वर्ग के दिलों में राज करते थे – उन्हें नरेंद्र मोदी और उनके कारण उत्पन्न असहिष्णुता का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिसकी वजह से यह सब संभव हुआ।

वैसे भी मध्यम वर्ग के दिलों पर राज करने से ठुल्लू मिलता आया है, सो आदमी वर्ग विशेष का चहेता क्यों कर न बने भला! तब यह और आसान हो जाता है जबकि देश में विपक्ष के नाम पर शून्य हो! हमें विरोध करने को, अपनी कुत्सित मानसिकता दर्ज करने को, अपने आप को भीड़ से अलग साबित करने को और बस विरोध के लिए विरोध करने को कोई तो अड्डा चाहिए न। सो रवीश जी की वॉल यह शून्य भरता (अंडा) अड्डा बना।

अपने सोशल मीडिया के अनुभव से कह सकता हूँ कि प्रसंशा या (बड़ी वाली) शुभकामनाएँ उसे अधिक मिलती हैं जो सकारात्मक हो, एक धड़े को पकड़ कर रहे, आदर्श बातें करने के बजाय उसे अपने चरित्र में दिखाए और कभी एकतरफा या चुनिंदा सोच लिए न हो। यह भारतीय पत्रकारिता की बदकिस्मती से रवीश जी इनमें कहीं भी फिट नहीं बैठते हैं। यह दुनिया के आठवें आश्चर्य से क्या कम है कि जो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करके पहले से अधिक बहुमत लाती है, उस सरकार में रवीश जी को कोई सकारात्मक बात नहीं दिखी?

2007 के एक आलेख में रवीश जी लिखते हैं – “मनमोहन सिंह किसी जात बिरादरी के नेता की तरह अंतिम संस्कार के भोज, शादी, विदाई के वक्त संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। सरकार के मुखिया की तरह कुछ कर नहीं रहे हैं। रिलायंस के कार्टेल के सामने क्या मनमोहन सिंह खड़े हो सकते हैं? राजनीति में भी परिवारों का कार्टेल बन रहा है। क्या उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं? मनमोहन सिंह व्यक्तिगत जीवन में संयम से रहते हैं। उनकी बेटियां आज भी साधारण रूप से कॉलेजों में पढ़ाने जाती हैं। कोई अहंकार नहीं। मगर क्या वो इस व्यक्तिगत कामयाबी को सामाजिक या राष्ट्रीय कामयाबी में बदल सकते हैं? नहीं।”

“वो भाषण दे सकते हैं। सो दे रहे हैं। बहुत ही बेकार भाषण देते हैं। खुद ईमानदार होने पर बधाई। मगर अपराधी, भ्रष्ट नेताओं को मंत्री बनाने की बेबसी पर लानत। मनमोहन सिंह जैसे बेबस ईमानदारों से ऐसे ही भाषणों की उम्मीद की जा सकती है। मर्दाना कमजोरी से बचने के लिए हस्तमैथुन से संयम बरते की सलाह देने वाले सड़क छाप बाबाओं की तरह मनमोहन सिंह के इस भाषण पर बहुत गुस्सा आया है।”

ऐसा लिखने वाले रवीश आज चिदंबरम की गिरफ़्तारी पर मौन ओढ़ ले रहे हैं। यदि सिर्फ सत्ता को गाली देने की बातें ही सही मान लें तो कल को क्या ऐसा होगा कि रवीश जी पदच्युत होने के बाद मोदी के खिलाफ कुछ नहीं कहेंगे?

दरअसल अब ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ रवीश अपनी एक आँख बंद करके रिपोर्टिंग करते दिखे हैं। और तो और अब वो अच्छा दिखने और इमेज बनाने के लिए भी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ताजा उदाहरण है कशिश टीवी द्वारा मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड पर किए कार्य की सराहना पर। रवीश खुद तो इस पर कोई कार्यक्रम नहीं कर पाए किन्तु इस कांड के कवरेज के लिए पत्रकार की खूब तारीफ की, बिना मेहनत इस न्यूज को कवर कर फुटेज ली।

आज जबकि यह चैनल और वो पत्रकार इस खबर को किसी मज़बूरी में कवर करना छोड़ चुका है, रवीश जी नहीं पूछते। क्योंकि रवीश जी को इससे फुटेज नहीं मिलेगा। उनका यह आदर्शवाद का ढोंग वहाँ भी दिखता है, जहाँ वो एक तरफ ऐसा कार्यक्रम करते हैं जिसमें कहा जाता है कि देश में बात सुनी नहीं जा रही, सब गलत हो रहा है और दूसरी तरफ वो यह कार्यक्रम भी करते हुए दिखते हैं कि – हें, हें, हें!!! मेरी रिपोर्टिंग की वजह से (मोदी राज में ही) ट्रेन समय पर हो गई, लोगों को नौकरियाँ मिल गईं, विश्वविद्यालय में सुधार हो गया!!!

ऐसे में जबकि देश की अर्थव्यवस्था को एड्स हो जाने की ख़बरें आ रही हैं, देश के आम आदमी को अब (मोदी राज में भी) सब कुछ ठीक कर देने वाले सिर्फ और सिर्फ रवीश जी के उस प्राइम टाइम का इंतजार है, जिसमें वो कहेंगे कि देखिए मेरे प्राइम टाइम का असर हुआ – अर्थव्यवस्था का एड्स भी ठीक होने को है!!! हें हें हें हें!

यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं गर रवीश जी आपको प्राइम टाइम में कहते सुनाई दें – “हमें रोजगार को सिर्फ नौकरी की नजर से नहीं देखना चाहिए, बिजनेस भी तो रोजगार ही है!!! और आप देखिए कि 10 साल पहले के मेरे ट्वीट की वजह से आज का युवा अपना बिजनेस कर स्वावलंबी हो रहा है।” 

शायद विषयांतर हो गया है और यह हो ही जाता है। क्योंकि हमारे बिहारी बाबू ने इतना रायता फैलाया हुआ है कि उसे समेटने में विषयांतर हो ही जाता है! वो भी तब जबकि वो रायते में रंग मिलाकर रंग बदलने के माहिर हों। तो रवीश जी को पुरस्कार मिला और जैसा कि ऊपर लिख चुका हूँ, इसके लिए सबसे बड़े बधाई के पात्र हैं देश में उनकी आवाज दबाने वाले मोदी जी। इस पुरस्कार के लिए बधाई के दूसरे सबसे बड़े पात्र प्रणय रॉय हैं जिन्होंने खुद की इमेज से बचाते हुए, विपरीत समय में भी रवीश कुमार को NDTV का प्लेटफॉर्म दिया।

मैं नरेंद्र मोदी और प्रणय रॉय को साधुवाद देता हूँ और इसी लाइन में रवीश जी को बधाई नहीं लिखता हूँ क्योंकि किसी बड़े आदमी ने न तो आज की क्रांति – सोलर पावर के काम के लिए हरीश हंडे को मैग्सेसे पुरस्कार के लिए बधाई दी थी और न ही रूरल डेवलेपमेंट के लिए मैग्सेसे पाने वाले दीप जोशी को। रेमन मैग्सेसे पाने वाले गूँज वाले अंशुल गुप्ता और संजीव चतुर्वेदी को कितने लोगों ने बधाई दी थी! क्या उनके मुकाबले का कोई काम है रवीश जी का?

पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने जम्मू कश्मीर को बताया ‘भारतीय राज्य’, देखें वीडियो

जेनेवा में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने जम्मू कश्मीर को ‘भारतीय राज्य’ बताया। उन्होंने इसे ‘भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर’ कह कर सम्बोधित किया। भले ही उनकी जबान फिसल गई हो क्योंकि उनका बयान पाकिस्तान के बयान के विपरीत था लेकिन ग़लती से ही सही आख़िर उनके मुँह से सच निकल ही गया।

शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि एक तरफ तो भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष दावा करती है कि जम्मू कश्मीर में हालात सामान्य हैं जबकि दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मीडिया को वहाँ नहीं जाने दिया जा रहा।

इसी दौरान वे बोल गए कि इन संगठनों और मीडिया को ‘भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर’ में क्यों नहीं जाने दिया जा रहा? देखें वीडियो:

पाक विदेश मंत्री ने ‘जम्मू कश्मीर में भारत द्वारा नरसंहार’ का वही पुराना और झूठा पाकिस्तानी राग अलापा। बता दें कि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जम्मू कश्मीर का मसला उठाया है। भारत द्वारा इस सम्बन्ध में उसे उसी मंच पर जवाब दिया जाएगा। पाकिस्तान इस मामले में यूएनएचआरसी की अर्जेन्ट बैठक बुलाना चाहता है लेकिन भारत ने कूटनीतिक प्रयासों के जरिए पाकिस्तान की इस कोशिश को नाकाम कर दिया।

अजहर ने खुद को हिंदू बता किया निकाह, फिर MMS बनाकर दोस्तों के साथ सोने पर करने लगा मजबूर

उत्तर प्रदेश के बरेली से कथित तौर पर एक बार फिर से लव जिहाद का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक महिला ने थाने पहुँचकर आरोप लगाया है कि मोहम्मद अजहर नाम के शख्स ने पहले उसको प्रेम के जाल में फँसाया और फिर उसका धर्म परिवर्तन करवा दिया। बाद में उससे निकाह करके वो उसे अपने दोस्तों के साथ सोने पर मजबूर करता और जब महिला मना करती तो वो उसे बेल्ट से पीटता। अब फिलहाल पुलिस ने महिला की शिकायत पर मामले को दर्ज कर लिया और अजहर समेत चार लोगों के ख़िलाफ़ जाँच शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो, महिला शाहजहाँपुर जिले के निगोही की रहने वाली एक हिंदू है। जो अपनी बहन के घर पर रहकर पीलीभीत के बीसलपुर में पढ़ती थी। बारादरी के जगतपुर का रहने वाला मोहम्मद अजहर वहीं एक शोरूम में काम करता था, जिसने खुद को पहले महिला की जाति का ही बताया और फिर प्रेम में फँसाकर शारीरिक संबंध बनाए। इस दौरान उसने अपने दोस्त जीशान से कहकर लड़की की अश्लील वीडियो भी बनवा ली। लेकिन जब पोल खुली तो वो माफी माँगने की जगह महिला को ब्लैकमेल करने लगा।

बाद में जबरन महिला का धर्म परिवर्तन करवाया गया और उसकी अश्लील वीडियो का हवाला देकर उससे निकाह भी कर लिया। इसके बाद अजहर ने उसपर जुल्म करने शुरू किए।

महिला की मानें तो अजहर ने जो उसका अश्लील एमएमएस बनाया था वो उसे दिखाकर उसे ब्लैकमेल करता था और उसे दूसरे दोस्तों के पास सोने के लिए भेजता था। जब कभी महिला ऐसा करने से मना करती तो वो उसकी पिटाई कर देता था।

इस मामले को पुलिस ने धारा 323, 506 और 376 डी के तहत शनिवार को दर्ज कर लिया है। साथ ही कहा है कि इस मामले की विभिन्न एंगल से जाँच की जा रही हैं। जाँच पूरी होने पर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश के आतंकी असदुल्लाह शेख को NIA ने चेन्नई से किया गिरफ्तार

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को मंगलवार (सितम्बर 10, 2019) को बड़ी कामयाबी मिली है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से मंगलवार सुबह एक आतंकवादी को एनआईए ने जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) के एक आतंकवादी को गिरफ्तार किया। पकड़े गए आतंकवादी का नाम असदुल्लाह शेख है। 

पुलिस ने बताया कि असदुल्लाह पश्चिम बंगाल के बर्दवान शहर का निवासी है। उसे उसके चेन्नई के किराए वाले घर से गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने कहा कि उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। असदुल्लाह को कल (सितम्बर 11, 2019) अदालत में पेश किया जाएगा, जहाँ उसकी ट्रांजिट रिमांड माँगी जाएगी।

आतंकवादी की गिरफ्तारी के बाद से ही पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। एनआइए ने पूरे इलाके को घेर लिया है। इससे पहले 2 सितंबर को कोलकाता पुलिस के विशेष कार्य बल (एसटीएफ) ने आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) के संदिग्ध सदस्य को गिरफ्तार किया था। सूचना मिलने पर एसटीएफ के दल ने गजनबी ब्रिज के पास कनाल ईस्ट रोड से 22 वर्षीय मोहम्मद अब्दुल कासिम उर्फ कासिम को गिरफ्तार किया था। कासिम बर्दवान जिले के मंगलकोटे पुलिस थाना क्षेत्र के दुरमुट गाँव का रहने वाला है।

भीमा कोरेगाँव हिंसा: DU प्रोफेसर के घर पुणे पुलिस ने मारा छापा, नक्सलियों से सम्बन्ध की आशंका

भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में पुणे पुलिस और नोएडा पुलिस की संयुक्त टीम ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हनी सिंह के नोएडा स्थित आवास पर छापेमारी की। यह छापेमारी प्रोफेसर सिंह के नक्सलियों से सम्बन्ध को लेकर की गई। भीमा कोरेगाँव मामले में कई अर्बन नक्सल पहले से ही जेल में बंद हैं। 2018 में भड़की हिंसा के पीछे इन्हीं अर्बन नक्सलियों का हाथ सामने आ रहा है।

हनी बाबू डीयू के प्रोफ़ेसर हैं और ‘द कमिटी ऑफ सिविल राइट्स एक्टिविस्ट्स’ के सदस्य हैं। इस कमिटी का गठन जीएन साईबाबा द्वारा किया गया था। डीयू प्रोफ़ेसर साईबाबा को 2017 में महाराष्ट्र की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। साईबाबा के प्रतिबंधित माओवादी संगठन सीपीआई से सम्बन्ध सामने आए थे।

इस मामले में वकील सुधा भारद्वाज, कथित सामाजिक कार्यकर्ता वेरनॉन गोंजाल्विस, पी वरावरा राव, अरुण फरेरा और ख़ुद को पत्रकार कहने वाले गौतम नवलखा का नाम आरोपितों में शामिल है। अर्बन नक्सल सुरेंद्र गाडलिंग और सुधीर धावले ने एसआईटी के समक्ष बयान देने की बात कही थी लेकिन बाद में वे पलट गए और कहा कि इससे ट्रायल कोर्ट में चल रहे मामले पर प्रभाव पड़ेगा। इसके बाद एसआईटी के अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस जय नारायण पटेल ने दोनों को वापस पुणे स्थित यरवदा जेल में भेजने का आदेश दिया।

वेरनॉन गोंजाल्विस के घर से कई आपत्तिजनक पुस्तकें बरामद की गई थीं, जिसके बाद कोर्ट ने उनसे पूछा था कि ये पुस्तकें और सीडी उनके घर में क्या कर रही थीं? सुधा भारद्वाज ने भी उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दाखिल की थी।