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NDTV, Reuters और AP के पत्रकारों को आलीशान कश्मीरी बंगलों को खाली करने का आदेश

सरकार ने हाल ही में NDTV के ब्यूरो प्रमुख नाज़िर मसूदी, रॉयटर्स के वरिष्ठ प्रतिनिधि फ़य्याज़ बुखारी और एसोसिएटेड प्रेस के ऐजाज़ हुसैन को जल्दी-से-जल्दी उन्हें श्रीनगर में मिले हुए सरकारी बंगले खाली करने का निर्देश दिया है। कारण बताया गया है कि वे उन बंगलों के आवंटन की न्यूनतम शर्तें पूरी नहीं करते।

आर्गेनाइज़र में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इन तथाकथित पत्रकारों को यह बंगले पिछली सरकार ने उनकी “पत्रकारिता की सेवाओं” के बदले न्यूनतम शर्तें पूरी न करने पर भी आवंटित कर दिए थे। अब चूँकि वे शर्तों को पूरा नहीं करते थे, तो उन्हें हुआ यह आवंटन सरकार के किसी भी नियम के हिसाब से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। अतः उनका वहाँ निवास करते रहना साफ-साफ अवैध था। इसीलिए सरकार ने उन पत्रकारों को बंगले खाली करने के निर्देश दिए।

ज़ाहिर तौर पर इससे कश्मीर का, और उससे जुड़े देश भर का, पत्रकारिता का समुदाय विशेष नाराज़ तो हो ही गया। इतने साल से पिछली सरकारों से मिलती आ रही सुविधाओं की लत जो लग गई थी। इसीलिए इस समुदाय विशेष की संस्था कश्मीर प्रेस क्लब ने बयान जारी कर राज्य प्रशासन (यानि कि केंद्र सरकार) पर ‘प्रताड़ना’ का आरोप लगाया है- यानि उनके हिसाब से इन पत्रकारों ने जो बंगलों पर अवैध कब्ज़ा कर रखा था, उसे हटाने की कोशिश इन्हें प्रताड़ित करना है। उनके हिसाब से यह प्रताड़ना इसलिए है, ताकि घाटी के पत्रकार एक लाइन विशेष को पकड़ कर ही रिपोर्टिंग करें।

यह समुदाय विशेष वाले पत्रकार केवल कश्मीर के पत्रकारों का समुदाय विशेष हो, ऐसा भी नहीं है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और एडिटर्स’ गिल्ड का पूरा समर्थन रहता है।

यहाँ इन पत्रकारों के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि इनमें से कई न केवल जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की ही भाषा बोल रहे हैं, बल्कि उसे हिंदुस्तान के खिलाफ प्रोपेगंडा करने के लिए ‘कच्चा माल’ ही नहीं, पकी-पकाई खीर ही थाली में परोस रहे हैं।

उदाहरण हैं NDTV के नाज़िर मसूदी, जिनकी श्रीनगर से की गई ‘रिपोर्टिंग’ के दम पर इमरान खान की पीटीआई हिंदुस्तान को गालियाँ बकती फिर रही है। मसूदी ने बिना किसी वीडियो सबूत या लोगों के नाम बताए यह दावा किया कि उन्होंने श्रीनगर के स्थानीय लोगों से बात की हैं और वे बस इस इंतज़ार में हैं कि सुरक्षा इंतज़ाम ढीले हों और वे हिंदुस्तान के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन के नाम पर जिहादी हिंसा शुरू करें।

जिहाद के लिए आने-जाने वाले पैसे की जाँच के दौरान NIA ने भी दावा किया था कि कश्मीर प्रेस क्लब और कश्मीर एडिटर्स’ गिल्ड के सदस्यों में से कई ISI से वित्तपोषित होते हैं। कश्मीर में अशांति किसी-न-किसी तरह साबित करने के लिए, बल्कि वहाँ अशांति फ़ैलाने के लिए, कई तरह का प्रोपेगंडा, कई तरह की फेक न्यूज़ वहाँ के पत्रकारों द्वारा फैलाई जा रही है। एक झूठा नैरेटिव बनाने की कोशिश हो रही है कि हिंदुस्तानी सुरक्षा बल कश्मीर में ‘अत्याचार’ कर रहे हैं।

आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे: राखीगढ़ी DNA स्टडी से इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा

आर्यों को लेकर कई दावे किए गए लेकिन फिर भी सवाल ज्यों का त्यों रहा कि आर्य बाहर से आए थे या यहीं (भारत) के ही निवासी थे? इस सवाल के जवाब में वामपंथियों ने कई दावे किए जिसका मकसद भारतियों को शायद हीन साबित करना रहा हो लेकिन अब इस सवाल का जवाब स्पष्ट नज़र आने लगा है।

दरअसल, हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी में हुई हड़प्पाकालीन सभ्यता की खोदाई में कई ऐतिहासिक राज से पर्दा उठ गया है। बता दें कि राखीगढ़ी में मिले 5000 साल पुराने कंकालों के डीएनए टेस्ट के बाद जारी की गई रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए बल्कि यहीं अर्थात भारत के ही के मूल निवासी थे। डीएनए स्टडी से यह भी खुलासा हुआ है कि भारत के लोगों के जीन में पिछले हजारों सालों में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिला है।

इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के एक अंश में यह दावा किया गया है कि इस अध्ययन में सामने आया है कि आर्यन्स भारत के ही मूल निवासी थे। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने राखीगढ़ी से प्राप्त नरकंकालों के अवशेषों का डीएनए टेस्ट किया था। डीएनए टेस्ट से स्पष्ट पता चला है कि यह रिपोर्ट प्राचीन आर्यन्स की डीएनए रिपोर्ट से मेल नहीं खाती है। ऐसे में जाहिर आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी ही गलत साबित होती है। वैसे पहले भी कई इतिहासकारों का कहना था कि वामपंथियों की आर्यन थ्योरी मनगढंत कल्पना पर आधारित है। जिसकी परतें इस नए शोध से उघड़ती नज़र आ रही हैं।

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि 9000 साल पहले भारत के लोगों ने ही कृषि की शुरुआत की थी। इसके बाद ये ईरान व इराक होते हुए पूरी दुनिया में पहुँची। भारत के विकास में यहीं के लोगों का योगदान है।

यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि इतिहास के लिए तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं, इन तथ्यों में भी वैज्ञानिक सबूतों का ज्यादा महत्व होता है। राखीगढ़ी में मिले 5000 साल पुराने कंकालों के अध्ययन के बाद जारी की गई रिपोर्ट में ऐसी कई बातें सामने आई है जिनके अभी तक कयास ही लगाए जा रहे थे।

बता दें कि हिसार के राखीगढ़ी में हड़प्‍पा खोदाई का काम कर रहे पुणे के डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविदों के अनुसार, खोदाई के वक्त युवक (कंकाल) का मुँह युवती की तरफ था। और यह पहली बार है कि जब हड़प्पा सभ्यता की खुदाई के दौरान किसी युगल की कब्र मिली है।

यहाँ हैरानी की बात यह भी है कि अब तक हड़प्पा सभ्यता से संबंधित कई कब्रिस्तानों की जाँच की गई थी लेकिन आज तक किसी भी युगल के इस तरह दफनाने का मामला सामने नहीं आया था।

राखीगढ़ी में खोदाई करने वाले पुरातत्वविदों के अनुसार, युगल कंकाल का मुँह, हाथ और पैर सभी एक समान है। इससे साफ है कि दोनों को जवानी में एक साथ दफनाया गया था। बता दें के ये निष्कर्ष हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, एसीबी जर्नल ऑफ अनैटमी और सेल बायॉलजी में प्रकाशित किए गए थे।

इस नए शोध और प्रमाणों के साये में इतिहास को देखने और समझने की एक नई दृष्टि मिलती है। और वामपंथियों की हीनता भरे इतिहास को एक चपत भी लगती है। आप इस स्टडी पर एक रिपोर्ट यहाँ Opindia पर भी पढ़ सकते हैं।

चंद्रयान-2: हम वहाँ जा रहे हैं, जहाँ कोई नहीं जाता, ISRO प्रमुख के शिवन का बयान, जानिए पूरा मिशन

“हम वहाँ जाते हैं जहाँ कोई नहीं जा सकता” यह अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी CIA के ट्विटर बायो पर उनका ध्येय-वाक्य है, और सच भी है- वे असम्भव को अपने देशहित में सम्भव करके दिखाते हैं। ISRO के कार्यक्षेत्र का शायद CIA से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन चंद्रयान-2 के बाद इसरो भी यह कहने का पूरी ठसक के साथ हकदार हो गया है कि “हम वहाँ जाते हैं, जहाँ कोई नहीं जाता।” ऐसा इसलिए क्योंकि चंद्रयान-2 चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा, जहाँ किसी और देश ने अपना अभियान नहीं भेजा।

चंद्रमा- और अंतरिक्ष-अभियानों की कायापलट

इसरो को उम्मीद है कि विक्रम नामक मॉड्यूल की सॉफ़्ट लैंडिंग (जोकि भारत चन्द्रमा पर पहली बार करने का प्रयास करेगा) से जो खोजें होंगी, वे न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के लिए लाभकारी होंगी। प्रेस को जारी विस्तृत जानकारी-सामग्री में इसरो ने उम्मीद जताई है कि चन्द्रमा पर भविष्य में होने वाले अभियानों में तो यह अभियान आमूलचूल परिवर्तन लाएगा ही, साथ ही सुदूर अंतरिक्ष की नई सीमाओं को नापने में भी इसका योगदान होगा।

इसरो ने इशारा किया है कि चंद्र-अभियान का मकसद केवल चन्द्रमा की नई गहराईयों में उतरना ही नहीं है, बल्कि सुदूर अंतरिक्ष में अभियानों की तैयारी के लिए भी चन्द्रमा ‘प्रयोगशाला’ है।

सबसे ताकतवर लॉन्चर का इस्तेमाल

भारत ने चंद्रयान के लिए अब तक का सबसे ताकतवर लॉन्चर GSLV Mk-III (जीएसएलवी मार्क-3) इस्तेमाल किया है। 43.43 मीटर लम्बा और 640 टन भारी लॉन्चर चंद्रयान को उसकी निर्धारित कक्षा तक ले जाएगा।

22 जुलाई को भारत से लिफ़्ट-ऑफ़ लेने वाले चंद्रयान का सफ़र कुल 48 दिनों का है। इसके अंत में 6-7 सितंबर की रात को deboosting की प्रक्रिया शुरू कर लैंडिंग पूरी कर लेगा।

महान वैज्ञानिक के नाम पर लैंडर

विक्रम नामक लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष प्रोग्राम के जनक माने जाने वाले डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर है। इसका जीवन काल चाँद के एक दिन का है। धरती के लिए यह 14 दिनों के करीब होगा, क्योंकि चाँद अपनी धुरी पर एक घूर्णन (rotation) धरती के मुकाबले करीब 14 गुना धीमी गति से करता है। इसका सम्पर्क बंगलुरु के पास ब्यालालु स्थित Indian Deep Space Network (ISDN) के साथ भी रहेगा।

उपकरण

चंद्रयान के मिशन पेलोड में कई सारे उपकरण हैं, जो चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव की पूरी तस्वीर खींचने में किसी-न-किसी पैमाने पर सहायक होंगे। इसमें इलाके की तस्वीरें लेने के लिए टेरेन मैपिंग कैमरा, सतह पर मौजूद धुल-मिट्टी में रासायनिक तत्वों का अनुपात मापने के लिए लार्ज एरिया सॉफ़्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रॉमिटर, वहाँ पहुँचती सूर्य की किरणों के विश्लेषण के लिए सोलर एक्स-रे मॉनिटर प्रमुख हैं। इसके अलावा जमे हुए पानी को ढूँढ़ने के लिए ड्युअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर रेडार, चन्द्रमा के ऊपरी वातावरण के अध्ययन के लिए ड्युअल फ्रीक्वेंसी रेडियो साइंस एक्स्पेरिमेंट, भूकंप को भाँपने के लिए विशेष उपकरण आदि होंगे।

प्रज्ञान रोवर

चंद्रयान-2 का ज़मीनी उपकरण प्रज्ञान है, जोकि एक 6 पहियों वाला रोबोटिक वाहन है। यह 1 सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से 500 मीटर (आधा किलोमीटर) तक चल सकता है। साथ ही यह विक्रम लैंडर से संचार माध्यम से सम्पर्क भी स्थापित कर सकता है। चन्द्रमा पर यह सौर-ऊर्जा से काम करेगा।

मासूम कश्मीरी बच्ची को जहरीले साँप ने डसा, सेना ने ऐसे बचाई जान

जम्मू-कश्मीर में जहाँ अनुच्छेद-370 हटने के बाद से ही लगातार वहाँ सेना को दुश्मन के रूप में कुछ छुद्र अलगाववादी-देश विरोधी ताकतों द्वारा विलेन के रूप में जा रहा है वहीं भारतीय सेना पूरी मुस्तैदी के साथ कश्मीरियों का दिल जीतने में लगी है। भारतीय सेना कश्मीरियों को वैसे हर संकट में मदद करती रही है चाहे वह बाढ़ के समय हो, आतंक से लोहा लेना हो या चिकित्सा से जुड़ी ही कोई समस्या क्यों न हो। भारतीय सेना से जुड़ी एक ऐसी ही घटना और सामने आई है जिसमें सेना की सूझ-बूझ के चलते एक मासूम कश्मीरी बच्ची की जान बच गई है।

मामला कुछ यूँ है, 11 साल की कश्मीरी लड़की यास्मीन को एक जहरीले साँप ने डस लिया था लेकिन आर्मी हॉस्पिटल की मेहनत और वक़्त पर इलाज करने के चलते उसकी जान बच गई है। सेना के अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि बच्ची को गंभीर हालत में अस्पताल में लाया गया था। डॉक्टरों के प्रयास से बच्ची खतरे से बाहर है और अगले 72 घंटों के बाद उसे हास्पिटल से छुट्टी दे दी जाएगी।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले आर्टिकल 370 को हटाने के बाद कई तरह की अफवाहें फैलायी जा रही थी और ये सिलसिला अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। सेना को लेकर मनगढंत और झूठे आरोप लगाने वाली शेहला रशीद के खिलाफ भी आज देश द्रोह का मुकदमा दर्ज किया है।

इतना ही नहीं कई सरकार विरोधी विपक्षी नेता भी पाकिस्तान और अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते नज़र आए बिना यह सोचे कि इससे आखिर सेना के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी भारतीय सेना कश्मीरी जनता की सेवा में तत्पर है। सेना ने इस दुष्‍प्रचार का जवाब ‘आर्मी फॉर अवाम’ फॉर्मूला से देने की तैयारी की है। जिसमें वह खासी सफल रही है।

बधाई हो रवीश जी, आज आपने विदेशियों को अंग्रेजी में बताया कि भारत नॉर्थ कोरिया बन गया है

रवीश कुमार को कौन नहीं जानता। बिस्कुट का चाय के कप में टूटने पर आपातकाल लाने वाले रवीश जी को हाल ही में मैग्सेसे अवार्ड मिला था जिसे एशिया का नोबेल भी कहते हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं कि आने वाले वक्त में रवीश कुमार की छवि जैसी भी हो जाए, लेकिन वो इस अवार्ड के हकदार हैं। हाँ, जिस कालखंड के लिए यह अवार्ड मिला है उस पर मैंने पहले भी आपत्ति दर्ज की है, आज भी करूँगा। वो इसलिए कि ऐसे साइटेशन देने के बाद आदमी का कद ऊँचा हो न हो, मैग्सेसे अवार्ड का कद फिलिपीन्स के फिल्मफेयर टाइप का हो जाता है।

सिवाय इस बात के कि यह स्पीच अंग्रेजी में अनुवाद की गई थी, मैं दावे के साथ कह देता हूँ कि अगर कल रात भी मुझसे कोई पूछता कि रवीश जी सुबह में क्या-क्या बोलेंगे, तो मैं वो स्पीच एक बार में बिना उँगलियाँ उठाए टाइप कर देता। भले ही कुछ पैराग्राफ ऊपर या नीचे हो जाते, लेकिन मूल बातें तो वही होतीं कि भारत में स्वतंत्र विचारों को दबाया जा रहा है, पत्रकारिता की स्थिति बहुत खराब है, मेरे चैनल को छोड़ कर बाकी जगह घृणा बाँटी जा रही है, व्हाट्सएप्प के ट्रोल मुझे गाली देते हैं, कश्मीर में मानवाधिकारों को हनन हो रहा है, आप सरकार के खिलाफ कुछ भी लिखिए तो आप एंटी-नेशनल बता दिए जाएँगे… आप समझ ही गए होंगे कि ये स्पीच आप भी लिख देते, बस मेरी और आपकी टायपिंग स्पीड या अभिव्यक्ति के माध्यम के चुनाव में अंतर है।

जिस रवीश कुमार को, जिस कारण यह अवार्ड मिला है, वो यह बता रहे हैं कि आवाजों को दबाया जा रहा है। यही दबी आवाज इतनी ज्यादा दब चुकी है कि उनका चैनल बाकायदा चल रहा है, उनके फेसबुक पेज चल रहे हैं, और उनके प्रोग्राम को हजारों लोग देखते हैं। यह बात और है कि उन्होंने आज की स्पीच में भी, और पहले भी यह जिक्र जरूर किया है कि उनके चाहने वालों के घरों के ऊपर अमित शाह या मोदी प्लास लेकर केबल का तार काट देता है, या एंटेना हिला कर भाग जाता है। अगर आप किसी देश में, झूठ बोल कर, प्रपंच फैला कर, ‘मुझे लोगों ने बताया’ और ‘सूत्रों के हिसाब से’, अपने मतलब से मुद्दों को मरोड़ कर रखते हैं, आप पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो मुझे लगता है कि भारत में आवाजों को फलने-फूलने का मौका दिया जा रहा है। हाँ, अगर आपकी व्यूअरशिप घट रही है, और तब आपको लगता है कि लोग आपको सुन नहीं रहे, इसमें मोदी का हाथ है, तो मनीला में ही किसी मनोचिकित्सक से भेंट की जा सकती है।

रवीश जी ने आगे कश्मीर की बात की। वही कश्मीर जो या तो आतंकवाद के कारण जाना जाता है, या फिर कश्मीरी पंडितों के पलायन के बारे में। वही कश्मीर जिसके हिन्दुओं को घाटी से रातों-रात कट्टरपंथियों ने भगाया था और रवीश अपने प्राइम टाइम में एक से बात करते हुए इसे सामान्य घटना की तरह ट्रीट करते हुए, बोलते हैं कि सारे कश्मीरी हिन्दू परेशान नहीं है! ये है उनका सैम्पल साइज।

जब सैम्पल साइज का लोचा हो, तो जाहिर है कि कविता कृष्णन जैसे धूर्त नक्सलियों द्वारा कश्मीर जा कर, चार लोगों के पैर दिखा कर, कल्पनाशीलता से दुखी कहानियाँ लाने को आप पूरे कश्मीर की वस्तुस्थिति के समानांतर रख सकते हैं। तब आपको श्रीनगर के पुलिस अधिकारी श्री इम्तियाज हुसैन या जिलाधिकारी श्री शाहिद चौधरी जी की हर दिन की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं होगा। क्योंकि आप वही सुनना चाहते हैं जो कहानी आपने पहले से मन में बना रखी है।

रवीश जी पूछते हैं कि क्या उपस्थित सुधिजन इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि कश्मीरियों को इंटरनेट का एक्सेस नहीं है! मुझे आज पता चला कि जिस इंटरनेट का प्रयोग करके भारत के कई राज्यों में दंगे हुए हैं, कश्मीर में पत्थरबाजों को इकट्ठा किया गया है, उस इंटरनेट को आतंकियों को एक्सेस के लिए सरकार को छोड़ देना चाहिए था क्योंकि रवीश जी की दिली इच्छा थी। यहाँ कश्मीर में हिंसा का इतिहास जिसने 42,000 से ज्यादा लोगों की जानें लीं, वहाँ के हर सप्ताह मरने वाले चार आतंकी, और हर शुक्रवार को होने वाली पत्थरबाजी की बातों को सरकार को इग्नोर करते हुए, इंटरनेट एक्सेस दे देना चाहिए था। क्यों? क्योंकि रवीश जी को लगता है कि किसी को सूचना से दूर रखना गलत बात है!

बोलने का मंच मिले तो नेशनल आदमी इंटरनेशनल हो कर कुछ भी बोल सकता है क्योंकि सुनने वाले कहीं जा नहीं सकते, और उनके भूरे-सफेद चेहरों पर जो भी फेंक दो, गम्भीरता का लबादा ओढ़े, वो लगातार ऐसे सुनते हैं जैसे कि रवीश उत्तरी कोरिया से सुरंग खोद कर, धारीदार गंजी और फटे पैंट के साथ सीधा मनीला में प्रकट हुए हैं।

सोशल मीडिया को पिछले छः सालों तक ट्रोलों का तंत्र और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी कह कर, इसे आईटी सेल से जोड़ने वाले रवीश जी की स्पीच में अचानक से इस माध्यम के प्रति प्रेम उबलता दिख पड़ा। जिस सोशल मीडिया ने इनके हर प्रोपेगेंडा को वहीं के वहीं नकारा है, याद दिलाया है कि उनकी घृणा और आलोचना की परिभाषा में अंतर है, उसी की बात करते हुए रवीश जी बताने लगे कि असली बदलाव यहीं से आएगा।

फर्क बस इतना है कि रवीश जी बदलाव देखना चाहते हैं, जबकि बदलाव आ चुका है। वो दिन गए जब इनके जैसे एंकर एकतरफा संवाद करते हुए जुनैद की हत्या को बीफ की वजह से बता देते थे और सवाल पूछने वालों को जगह नहीं मिलती थी। आज वो इन्हें याद दिलाते हैं कि जुनैद तो सीट के चक्कर में मारपीट का शिकार हुआ था। लेकिन रवीश ने न तो तब नैतिकता दिखाई न आज। इसलिए, वो जब दोबारा कश्मीर को याद करते हुए कहते हैं कि अगर कश्मीर की कोई लड़की ब्लॉग लिखेगी तो उसे एंटी-नेशनल कह दिया जाएगा।

जबकि अजीब बात यह है कि इन्होंने जितनी बार हर छोटी सी बात पर एंटिसिपेटरी बेल लेने जैसा ‘अब आपको एंटी नेशनल कह दिया जाएगा’ वाला पासा फेंका है, उतनी बार तो किसी ने किसी को एंटी नेशनल बोला भी नहीं है। ये तकनीक रवीश पिछले पाँच सालों से अपना रहे हैं, और सफलता भी इनके चरणचुंबन करती रही है। जैसे कि सबको याद होगा कि आपातकाल नामक बैल को ये कितनी बार नाथ से पकड़ कर अपनी घृणा की बैलगाड़ी चलाने के लिए उसके जुए तक लाते रहे हैं, लेकिन वो बैल भी इनके बागों के फर्जी बहार और काली स्क्रीन की नौटंकी को देख कर बोर हो चुका था, और ज्यादा दूर जा न सका।

पत्रकारिता की बात

पत्रकारिता की बात करते हुए उन्होंने श्रोताओं का काफी समय बर्बाद किया। वो बताते रहे कि जन आंदोलनों को कवरेज नहीं मिलती मीडिया में क्योंकि वो चलता नहीं। जबकि, स्थिति इसके उलट ऐसी है कि सारे चैनल कॉलेज की झड़प से लेकर, नेताओं के थप्पड़ मारने तक को लाइव कवर करना चाहते हैं। यूनिवर्सिटी के चुनावों तक राष्ट्रीय मुद्दे की तरह दिखाया जाता रहा है। भीमा कोरेगाँव हिंसा हो या फिर पिछले साल का तथाकथित दलित आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, सवर्ण आंदोलन, विद्यार्थियों का प्रोटेस्ट, हर आंदोलन को टीवी दिखाता है और रवीश कुमार जैसे एंकर उसी के आधार पर घृणा की दुकान चलाते हैं। लेकिन फिलीपीन्स में बैठे आदमी को क्या पता कि जो रवीश अंग्रेजी में ,रिपोर्ताज ऑफ प्रोटेस्ट्स इज नॉट देयर’ फेंक रहा है वो हिन्दी में कितना क्या करता है।

आगे उन्होंने फिर इलाका धुआँ-धुआँ करने वाला माहौल गढ़ते हुए कहा कि सरकार ने मीडिया को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है। ये सब बस कहने की बातें हैं क्योंकि भाजपा समर्थकों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि दो-तीन चैनल छोड़ बाकी लोग मोदी जी की चालीसा क्यों नहीं पढ़ते। पूरी तरह से नियंत्रण का आखिर क्या मतलब है? अंग्रेजी में इस तरह के वाक्यांश बोलना कूल लगता होगा शायद क्योंकि भारत में मीडिया अगर पक्षपाती है, तो वो दोनों तरीके से है। ये बात और है कि रवीश जी ने दुनिया को टीवी न देखने की सलाह देते हुए शुतुर्मुर्ग टाइप सच में दो-तीन सालों से टीवी देखा ही न हो, और लगता हो कि उनका चैनल छोड़ कर सारे लोग सुबह में ‘अमित शाह जी की जय’ से शुरु करते हैं और शाम में ‘जय मोदी देवा’ कहते हुए सोते हैं।

सब मिले हुए हैं जी

बीच-बीच में लोकतंत्र की जीत और आम तौर पर लोकतंत्र की हत्या का राग छेड़ने वाले रवीश जी ने आज यह भी कह दिया कि सत्ता, पुलिस और न्यायपालिका पूरी तरह से नागरिकों के प्रति शत्रुतापूर्ण आचरण करने लगी है। ये कहने के पीछे रवीश जी, जाहिर तौर पर, अपने ‘जाँच कराने में क्या जाता है’ वाली बात को याद कर रहे होंगे।

रवीश जी की समस्या यह है कि वो सोचते हैं कि जो मुद्दा उन्होंने उठा लिया, उस पर वो जो सोच चुके हैं, न्यायपालिका से लेकर सरकार और पुलिस तक को उन्हीं के आदेशानुसार कार्य करना चाहिए। जैसे कि जस्टिस लोया के केस में परिवार ने जब कह दिया कि उन्हें जाँच नहीं करानी, कोर्ट ने कह दिया कि कुछ गलत नहीं है, तो अंकित सक्सेना के पिता की अपील को सराहने वाले रवीश बिफर गए कि कोर्ट ने ऐसा कैसे कह दिया!

अब, जबकि उनके द्वारा उठाए मुद्दे, उनके द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों को पूरे भारत की जनता अखंड सत्य मान कर कार्य नहीं करती तो उन्हें लगता है कि सब कुछ मैनेज हो गया है। घर में कोई भाई अगर उनका चैनल ऑफ कर देता है तो वो समाज को बाँटने वाली शक्तियों का परिवार के स्तर पर उतरना हो जाता है। आप यह देखिए कि अवसाद का स्तर कितना ज्यादा हो गया है कि इस व्यक्ति के हिसाब से भारत में हर संस्था न सिर्फ कॉम्प्रोमाइज्ड है बल्कि नागरिकों का शत्रु बन बैठी है!

यह कहते हुए रवीश के होंठ नहीं काँपे क्योंकि हर रात जब व्यक्ति इतने ही अवसाद के साथ, समाज को तोड़ने के लिए लोगों को उकसाता रहता हो, उन्हें तैयार करता हो कि हिन्दू तो तुम्हें राह चलते ‘जय श्री राम’ कहने को बोलेगा, तुम नहीं बोलोगे तो तुम्हें तो लिंच कर देगा, तो जाहिर है कि भारत की स्थिति सोमालिया या नॉर्थ कोरिया से भी बदतर बताने में ये आदमी लायडिटेक्टर मशीन को भी धोखा दे देगा। क्योंकि ऐसा करने में इनका कम्फर्ट लेवल बहुत हाय हो चुका है।

व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी का हर दिन मजाक बनाने वाले रवीश ने आज स्वयं ही स्वीकार किया कि उनकी पूरी पत्रकारिता आज कल व्हाट्सएप्प से ही चल रही है। अपने व्हाट्सएप्प पढ़ने के हृदयविदारक अनुभव को उन्होंने चम्पारण में किसानों से बात करते महात्मा गाँधी के समकक्ष रख दिया। ये सही तरीका है कि लोग गाँधी न बोलें तो स्वयं ही गाँधी बन जाओ, वैसे भी गाँधियों में रवीश जी को देश का भविष्य तो हाल के दिनों तक दिखता रहा है। व्हाट्सएप्प को न्यूजरूम मानने वाले रवीश जी इसीलिए बिना सबूत के ‘मुझे मैसेज आते हैं‘ के बल पर प्रोग्राम करते हैं, और 25 लाख लोगों की जाती नौकरियों की बात करते हुए, दो आदमी ढूँढ कर नहीं ला पाते जो सरकार के खिलाफ बोल सके। और हाँ, अंत में ‘सरकार का डर इतना ज्यादा है कि लोग कैमरे पर बोलना नहीं चाहते’ वाली कालजयी लाइन तो है ही।

सूचना, सत्य और रवीश

स्पीच के अंतिम हिस्से में उन्होंने जो-जो बात कही, वो सुन कर तथ्यात्मक पत्रकारिता में विश्वास करने वाला सिर्फ मुस्कुरा सकता है। रवीश कुमार ने बताया कि सूचना को तथ्यात्मक होना चाहिए, जबकि रवीश जी को जिस बात के लिए अवार्ड मिला है, उसमें जो सूचना इन्होंने तथ्य के नाम पर प्रोपेगेंडा की चाशनी में डुबा कर बार-बार परोसा है, उसे देखने वालों को तो यह सुन कर गजब आश्चर्य होगा।

पिछले पाँच सालों में रवीश की पूरी पत्रकारिता, सेलेक्टिव रही है। यह कह कर उन्माद फैलाने की कला सिर्फ रवीश को आती है कि जिसमें बार-बार एक समुदाय को कहा जाता है कि ‘डर का माहौल है’, हिन्दू तुम्हें लिंच कर रहे हैं, संभल कर रहो। जब आप रिपोर्टिंग के नाम पर प्रपंच बाँटते हैं तो यही सारी बातें निकलती हैं जहाँ गोएबल्स की बातें करते हुए, खुद ही उसी की तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों तक झूठ को सत्य बना कर पहुँचाना मुख्य लक्ष्य हो जाता है।

सामाजिक अपराधों को मजहबी रंग दे कर, कट्टरपंथियों को हमेशा पीड़ित की तरह दिखाना, और उसी तरह के वैसे अपराधों पर चुप हो जाना जिसमें पीड़ित हिन्दू हैं, आरोपित समुदाय विशेष से, यह बताता है कि आपके पत्रकारिता की ब्रांड क्या है। चाहे वो हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ने की बात रही हो, काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की बात हो, बंगाल के हर जिले में मजहबी दंगों की बात हो, रवीश की चुप्पी बहुत सहज हो जाती है। जब रवीश अपनी स्पीच में यह कहते दिखते हैं कि भारतीय मीडिया घृणा फैलाने में व्यस्त है, तो वो भी उसके बहुत बड़े हिस्सेदार हैं।

अंत में करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोप झेलते अपने मालिकों का धन्यवाद करते हुए आपने दोबारा वही एंटिसिपेटरी बेल वाली तकनीक अपनाई जब आपने कहा कि पता नहीं इस स्पीच के बाद उनके साथ क्या हो। आख़िर आपकी स्पीच के कारण उन पर कुछ भी क्यों होगा? आप जब आरोप लगाएँ कि जय शाह ने धाँधली की, डोभाल के बेटे कालाधन छुपा रहे हैं, जस्टिस लोया की हत्या हुई और हर बात में ‘जाँच कराने में क्या जाता है’ कहते रहे तो सब ठीक था, लेकिन आपके मालिकों पर सरकारी एजेंसियाँ पूछताछ कर रही है, जाँच कर रही है, तो आप ऐसा माहौल बना रहे हैं कि मोदी सुबह-सुबह योग करने के बाद टीवी ऑन कर के आपका स्पीच सुन रहा होगा, और खत्म होते ही ईडी वालों को कहा होगा कि जरा देखो तो प्रणय्या क्या कर रहा है, उसको उठा लो।

अपने आपको इतना इम्पॉर्टेंस क्यों देते हैं आप जबकि भाजपा का एक प्रवक्ता भी आपको इम्पॉर्टेंस के लायक नहीं समझता, कारण जो भी हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रणय रॉय-राधिका रॉय के मामले में कुछ पता हो आपको जो सरकार को भी पता चल जाए और जब वो पकड़े तो आप उछल पड़ें कि ‘मैंने तो बोला ही था, मैंने बोला था न…’

लोकतंत्र ही रहे, लेकिन चले बस कुछ लोगों के हिसाब से

जब आप घरों में पिता द्वारा टीवी पर अपने प्रोग्राम के बंद करने के बाद, बेटी द्वारा टीवी ऑन कर लेने को लोकतंत्र के बचने के जैसा मान रहे हैं तो कहीं न कहीं ये दिमागी समस्या है। लोकतंत्र की हत्या लगभग हर दिन करने वाले रवीश जी को यह जानना चाहिए लोकतंत्र को बचाने की जरूरत नहीं है क्योंकि वो सक्षम हाथों में है जिसे तय तरीके से, संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में रह कर भारत की जनता ने सत्ता दी है।

रवीश और उनके गिरोह को यह बात हमेशा खली है कि वो जिसे चाहते हैं वही लोग सत्ता में क्यों नहीं हैं। यह बात पचाना मुश्किल है, और लगभग उनकी पत्रकारिता द्वारा अजेंडा सेटिंग की क्षमता पर सवाल खड़े करता है कि पाँच साल की अनवरत नकारात्मक अजेंडाबाजी के बावजूद भाजपा को ज्यादा सीटें कैसे आ गईं। उनका दम्भ उन्हें इस बात को समझने से मना करता है कि रवीश के वोट का मोल और सड़क के लिए पत्थर ढोने वाले किसी ब्रजेश के वोट का मोल एक ही है।

जबकि इनकी दिली इच्छा रही है कि नाम तो सिस्टम का डेमोक्रेसी ही रहे, लेकिन सत्ता चुनने का हक उनके गिरोह के पास चला जाए क्योंकि कुपोषण से जूझते, गरीबी में पलते, रटंत स्कूलिंग से निकले और टाय लगाकर डिजिटल मजदूरी करने वाले भारतीयों को समझ में ही क्या आता है कि सरकार होती क्या है, और कैसे चलनी चाहिए। वैसे भी इन्होंने यहाँ के युवाओं की सियासी समझ को थर्ड क्लास कहा ही है और उन्हें मुर्दा भी बताया।

इसलिए, जब रवीश कुमार भारत आएँ, तो उन्हें बताया जाए कि उनके वोट की कीमत दस करोड़ हो गई है। उन्हें बस राजदीप, बरखा, सगारिका जैसे पाँच लोगों को ही तैयार करना होगा कि 2024 के चुनावों में वो लोग वोट दे दें, जिससे कि पचास करोड़ वोट मोदी के खिलाफ हों और वो चुनाव हार जाए। उसके बाद फिर स्टूडियो में बैठ कर, फोन करते हुए, कैबिनेट तय हो जाए, भारत दोबारा वैसा हो जाएगा जैसा 2014 के पहले था: मैडिटेरेनियन क्लाइमेट, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नॉर्डिक शिक्षा-स्वास्थ्य-नौकरी पद्धति का अनूठा संगम!

पाकिस्तान के हिन्दू बेहाल: 24 घंटों में आए बच्चियों के जबरन धर्मान्तरण के दो मामले

हिंदुस्तान को अल्पसंख्यकों पर ज्ञान देने वाले पाकिस्तान के हालात कितने खराब हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। और इसके बावजूद वहाँ का समाज और सरकार दोनों ही हिन्दुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्मों को बढ़ावा ही देने में लगे हुए हैं। इसका एक और सबूत देखने को मिल रहा है। पाकिस्तान में महज़ एक दिन के भीतर 13-15 साल की दो बच्चियों को जबरन उठा ले जाने के मामले सामने आए हैं।

पायल ठाकुर को बंदूक की नोंक पर उठाया, धर्म परिवर्तन किया

पाकिस्तान में रहने वाली 15-वर्षीया पायल ठाकुर के पिता रिक्शा चलाकर अपना पेट पालते हैं। पिछले शुक्रवार को उनकी बेटी पायल को स्थानीय कट्टरपंथियों ने असलहा (बंदूक) दिखाकर उठा लिया। यही नहीं, जिस लड़के पर पायल को अगवा करने का शक था, उसके घर जब पूजा की बहन और परिवार गया तो उसके बाप ने माना कि उनकी बेटी को उसी के बेटे ने उठाया है। लेकिन उसने पायल को लौटाने से इंकार करते हुए ‘दिलासा’ दिया कि “तीन दिन में” वे उसे लौटा देंगे।

तीन दिन में! भारत में ह्यूमन राइट्स का रोना रोने वाले, लैला सीरियल देखकर “इंडिया में यही होता है, ब्रो” का ज्ञान झाड़ने वाले इस वाक्य को फिर से पढ़ें- और बताएँ हिंदुस्तान में ऐसा किस मोहल्ले के हिन्दुओं में होता है। एक लड़की को उसके पंथ, उसकी आस्था के अल्पसंख्यक होने के कारण उठा लिया जाता है- ज़ाहिर तौर पर बैठा कर टॉम एंड जेरी दिखाने के लिए नहीं, बलात्कार करने के लिए। और बलात्कारी का बाप पीड़िता के परिवार को ‘दिलासा’ देता है कि चिंता मत करो, केवल तुम्हारी बेटी का जिस्म नोचेंगे-खसोटेंगे (क्योंकि तुम पाकिस्तान में काफिरान होने के गुनहगार हो), लेकिन उसके बाद लौटा देंगे। इसकी एक बार कल्पना करिए।

इसका सीधा-सा मतलब है कि पाकिस्तान में हिन्दू कठमुल्लाओं के सेक्स-गुलाम हैं; उनकी लड़कियों के शरीर पर पाकिस्तानियों का तो हक है ही। चिंता तो माँ-बाप को इसकी करनी चाहिए कि लड़की वापिस भी मिलेगी या नहीं, जोकि इस मामले में हुआ भी है। उस दिन के बाद से उस लड़के का बाप भी पीड़ित परिवार को नहीं मिला है, और पुलिस की दबिश भी बेअसर रही है। परिवार वालों का आरोप है कि पायल का धर्मांतरण कर उसे मुस्लिम बना दिया गया है।

“तुसी मुस्लिम हो जाओ, त्वानु बच्ची दे, कुड़ी दे छड़ देंगे”

13 साल की पूजा कुमार के माँ-बाप की अगर मानें तो हिन्दुओं का अपने बच्चों को, खासकर बेटियों को पाकिस्तान के स्कूलों में भेजना भी खतरे से खाली नहीं है। हमेशा यह खतरा बरकरार है कि गवर्नमेंट गर्ल्स हाई स्कूल, खानगढ़ जैसे सरकारी स्कूल का शिक्षक ही इस्लाम स्वीकार करने का दबाव अबोध मन पर डालने लगे। पूजा कुमार का मामला यही है। पहले शिक्षक ने मुस्लिम बनाया, फिर स्कूल वालों ने बेटी को गायब कर दिया।

शिक्षक ने कहा कि तूने अरबी पढ़ ली, अब तो तू मुस्लिम हो गई। अब तू (काफिर माँ-बाप के पास) घर नहीं जा सकती। प्रिंसिपल खुलकर कहता है कि मुस्लिम बन जाओ, बच्ची को छोड़ देंगे। पैसे का लालच भी देता है। बिना बोले भी “अन्यथा नहीं” साफ होता है।

शिरोमणि अकाली दल के नेता के ट्वीट्स

यह मामले भी शायद सामने नहीं आते, अगर शिरोमणि अकाली दल के राजौरी गार्डन (दिल्ली) विधायक मनजिंदर सिरसा इन बेबस माँ-बापों का दर्द सोशल मीडिया पर नहीं रखते। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालात कितने खराब हैं, इसकी बानगी इसी से समझी जा सकती है कि हाल ही में अपने माँ-बाप के पास दोबारा पहुँचने वाली रेणु कुमारी का मामला पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार किसी हिन्दू अगवा लड़की के सही-सलामत अपने परिवार से दोबारा जा मिलने का किस्सा है। यह दावा किसी हिंदुस्तानी का नहीं, पाकिस्तान के नागरिक और इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के सांसद रमेश कुमार का है।

यही पाकिस्तान है- जिन्ना का भी, और इमरान खान का भी।

तृणमूल सांसद शताब्दी रॉय ने ED को लौटाए ₹30 लाख, सारधा चिट फंड के प्रचार के लिए मिले थे

तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद और बांग्ला फिल्मों की अदाकारा शताब्दी रॉय ने ₹30.64 लाख प्रवर्तन निदेशालय (ED) को लौटा दिए हैं। उन्हें यह पैसे सारधा ग्रुप के ब्रांड अंबेसडर के तौर पर उसका प्रचार करने के लिए मिले थे। ED के सूत्रों ने मीडिया को इस खबर की पुष्टि की है कि किसी ‘संदेशवाहक’ के ज़रिए ED अधिकारियों को इस रकम का ड्राफ्ट 2 सितंबर (सोमवार) को प्राप्त हुआ था।

करार था ₹49 लाख का, लेकिन बाकी टैक्स कटा

जब सारधा में यह घोटाला चल रहा था और लोगों की गाढ़ी कमाई ऊँचे रिटर्न का सब्जबाग दिखाकर लूटी जा रही थी, उसी काल खंड में सारधा ग्रुप की ब्रांड अंबेसडर बनने के लिए रॉय ने ₹49 लाख का करार किया था। लेकिन उनका दावा है कि सारधा ने उनके खाते में ₹30.64 लाख ही डाले, और बाकी की रकम टैक्स में ही कट गई। वही रकम वह अब लौटा रहीं हैं। उनके पहले अभिनेता और तृणमूल के राज्यसभा सांसद रह चुके मिथुन चक्रवर्ती भी सारधा के प्रचार के लिए मिले ₹1.16 करोड़ ED को 2015 में लौटा चुके हैं।

₹200 अरब का घोटाला

200 के करीब विभिन्न कंपनियों के एकत्रित होने (consortium) से बने सारधा ग्रुप पर आरोप है कि इसने लाखों छोटे निवेशकों से लगभग ₹200 अरब लूटे। 2013 में यह ग्रुप ठप्प हो गया, और एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को राज्य की SIT से इसकी जाँच का ज़िम्मा अपने ऊपर ले लेने का निर्देश दिया। इसके बाद से कोलकाता के चोटी के पुलिस अधिकारी राजीव कुमार से लेकर के तृणमूल नेताओं डेरेक ओ’ब्रायन और पार्थ चटर्जी से लेकर के बांग्ला फिल्मों के कई अभिनेताओं जैसे ऋतुपर्णा सेनगुप्ता, प्रसेनजित चटर्जी, मदन मित्रा आदि इस मामले में ED के समन पा चुके हैं। सीबीआई ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी मामले की जाँच में अड़ंगा डालने का आरोप लगाया है।

कार्ति चिदंबरम को विदेश यात्रा के लिए डिपॉजिट 10 करोड़ लौटाने से SC ने किया इंकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कॉन्ग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम द्वारा विदेश यात्रा के लिए जमा कराई गई 10 करोड़ की राशि को लौटाने से मना कर दिया है।

जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभी कार्ति चिदंबरम द्वारा जमा कराई गई रााशि सावधि खाते में 3 महीने तक जमा रहेगी।

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो कुछ समय पहले मनी लॉन्ड्रिंग और एयरसेल-मैक्सिस जैसे मामलों में आरोपित कार्ति चिदंबरम को मई-जून के महीने में अंतरराष्ट्रीय टेनिस टूर्नामेंट में शामिल होने के लिए यू.एस, स्पेन, और जर्मनी जाना चाहते थे। जिसके लिए कोर्ट ने उन्हें सेक्योरिटी मनी के रूप में 10 करोड़ रुपए जमा करने का आदेश दिया था। और साथ ही उस समय सीजेआई रंजन गोगोई, न्यायाधीश दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना की बेंच ने उन्हें लिखित आश्वासन देने के भी निर्देश दिए थे कि वह विदेश से लौटने के बाद जाँच में सहयोग करेंगे। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो उनके ख़िलाफ़ सख्ती होगी।

हालाँकि, उस समय कोर्ट में कार्ति चिदंबरम द्वारा राशि जमा करवा दी गई थी, लेकिन अब कोर्ट वो पैसे लौटाने से इंकार कर रहा है। कोर्ट का कहना है कि कार्ति ने शीर्ष अदालत द्वारा विदेश यात्रा के लिए लगाए गए शर्त के अनुसार 10 करोड़ रुपए जमा किए थे। जिसके लौटाने की याचिका को कोर्ट मई में भी खारिज कर चुका हैं।

उन्होंने बताया कि उस समय भी सुप्रीम कोर्ट ने कार्ति से कहा था कि अगर वो पुराने मामले में दस करोड़ वापस चाहते हैं तो कोर्ट रिफंड कर देगा, लेकिन विदेश जाने के लिए 10 करोड़ की सुरक्षा राशि को बढ़ाकर 20 करोड़ कर देगा। इस दौरान रंजन गोगोई और जस्टिस अनुराधा बोस ने उनकी याचिका को खारिज किया था और सख्ती से कहा था कि वो अपने संसदीय क्षेत्र पर ध्यान दें।

डियर शेहला डोंट वरी! कहना, कंडोम वाले लौंडों को चिढ़ा रही थी

डियर शेहला रशीद शोरा,

सुना है दिल्ली पुलिस ने तुम्हारी कुंडली तैयार की है। 124-A, 153, 153-A, 504 और 505 की धारा लगा दी है। वकील तो हूॅं नहीं। पर पता चला कि ये धाराएँ राजद्रोह, शांति भंग करने, अफवाह फैलाने, दंगा फैलाने और शत्रुता पैदा करने की लिए लगाई जाती है।

पर तुम घबराना मत। दिल भारी मत करना। वैसे ये तुम्हारी फितरत है भी नहीं। मैं ही तुम्हारी चिंता में दुबला हुए जाता हूॅं। ये भी मत पूछना कि सा​हस की ये कैसी मंदी, एक ही चिट्ठी में आप से तुम।

सच कहूॅं तो कुंडली देख डियर भी भारी मन से ही लिखा है। अब क्या करूॅं आरोप लगते ही हमने आसाराम और कुलदीप सेंगर जैसों के लिए भी संबोधन लगाना छोड़ दिया था। कंडोम वाले लौंडों को लेकर तो तुम्हें पिछले खत में बता ही चुका हूॅं। हम उनमें भी नहीं जो चारा चोरी की सजा काट रहे लालू की स्तुति में नहीं अघाते। सुना है अब वे तुम्हारे लिए अपनी कलम को धार दे रहे हैं।

कुछ तो यह भी कह रहे कि चर्चे में आकर तुम बहुत खुश हो। सुना है हैशटैग ट्रेंड कराने का भी प्लान है। फिर उसे पार्टी विशेष की करतूत बता महफिल लूटनी तो तुम्हें आती ही है।

वैसे, मेरी मातृभाषा मैथिली में कहते हैं कुकर्मे नाम कि सुकर्मे नाम। अब अर्थ समझने के लिए पन्ने मत पलटना। तुम्हारा सखा कन्हैया, उससे पूछ लेना। उसे मैथिली भी आती है और इसी फॉर्मूले से नाम भी बहुत कमाया है।

लोग तो यह भी कह रहे कि तुम्हारे यूॅं चर्चे में आने से कन्हैया, राना अय्यूब, आरफा खानम शेनवारी सब रश्क कर रहे हैं। राना अय्यूब तो वाशिंगटन पोस्ट तक लिख आई। आरफा भी वायर लेकर तैयार हैं। मोटा-मोटी भाषा भी दोनों की वैसी ही है जैसे तुम्हारे उन ट्वीटों की थी जिस पर दिल्ली पुलिस ने कुंडली तैयार की है। पर ‘आ बैल मुझे मार’ वाला तुम्हारा ट्रिक इनके काम अब तक नहीं आया।

खैर, इन दोनों को छोड़ो, तुम कन्हैया पर फोकस करो। अखबार के पन्ने पलटो। संकट निवारण उपाय छपा है। टुकड़े-टुकड़े वाले मामले में दिल्ली वाले सरजी के गृह विभाग का कहना है कि देश की बर्बादी के नारे चिढ़ाने के लिए लगे थे। सो, मामला नहीं बनता। बस यही दलील सबके मुॅंह पर मारना। कहना- चिढ़ी थी बेगूसराय से। कंडोम की अफवाह से। सो, उन दुष्चरित्र लौंडों को चिढ़ाने के लिए सेना पर आरोप लगाया।

जैसे को तैसा। उन्होंने भी सोशल मीडिया से बदनाम किया था। मैंने भी ट्विटर से सेना को बदनाम किया।

लगे हाथ जोड़ देना, साहस की मंदी है, वरना पार्ट टाइम पढ़ाई और फुल टाइम पॉलिटिक्स से पैदा भड़ास आप क्या जानो स्पेशल सेल वाले बाबू। रवीश का भी प्रचार होगा। क्या पता समर्थन में प्राइम टाइम की स्क्रीन भी काली हो जाए।

तुम्हारा
…
(खुद की मर्जी से भक्त वगैरह तो पिछली बार ही डाल लिया होगा)

35 साल के पाकिस्तानी डिलीवरी बॉय ने 12 साल की भारतीय बच्ची से की छेड़छाड़, मामला दर्ज

दुबई में एक 12 साल की भारतीय लड़की से आवासीय इमारत की लिफ्ट में छेड़छाड़ करने के आरोप में वहाँ की कोर्ट ने एक पाकिस्तानी युवक को आरोपित बनाया है। इस बात की जानकारी खुद वहाँ की एक मीडिया रिपोर्ट ने दी है

दुबई के खलील टाइम्स के मुताबिक कोर्ट के अभियोजकों ने प्रथम दृष्ट्या 35 वर्षीय पाकिस्तानी डिलीवरी बॉय को नाबालिग लड़की को आपत्तिजनक तरीके से छूने का आरोपित बनाया, किंतु पाकिस्तानी शख्स ने फर्स्ट इंस्टैंस में लगाए गए आरोपों से इनकार कर दिया।

लेकिन, जब जाँच हुई तो बच्ची की 34 वर्षीय ट्यूशन टीचर ने बताया कि बच्ची घटना वाले दिन गणित का ट्यूशन लेने उसके घर आई थी, उस समय वह अपने घर से कुछ पेपर लाना भूल गई थी, जिस कारण उसे दोबारा जाना पड़ा। महिला ने आगे बताया कि जब लड़की दोबारा उसके घर आई तो उसका चेहरा पूरा पीला पड़ा था और रो- रोकर बुरी तरह काँप रही थी।

जब महिला ने उसे पूछा कि आखिर हुआ क्या है? तो उसने बताया कि एक शख्स पता पूछने के बहाने लिफ्ट के अंदर उसे पकड़ लिया था। जिसके बाद महिला ने फौरन अपने पड़ोसी से सुरक्षा गार्ड के कमरे में सर्विलांस कैमरों की जाँच करने का अनुरोध किया।

इस सीसीटीवी फुटेज में साफ़ दिखा कि कैसे वो डिलीवरी ब्वॉय एक पैकेज देने के लिए पाँचवीं मंजिल की ओर जा रहा था, लेकिन बच्ची को देखकर उसने अपना रास्ता बदल लिया और सामान को डिलीवरी किए बिना वो लड़की का पीछा करने लगा। ये देखने के बाद ट्यूशन टीचर ने तुरंत इस बारे में बच्ची की माँ को बताया और इस घटना को अल रफा पुलिस थाने में दर्ज करवाया गया। बाद में पुलिस ने इस पाकिस्तानी शख्स को गिरफ्तार कर लिया और इसकी अदालत में पेशी हुई।