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प्रेम-जाल में फँसाया,धर्म परिवर्तन कराया, लिव-इन में रहकर घर बिकवाया, बच्चा होने पर हो गया फरार

गाजियाबाद के कविनगर थाना क्षेत्र से धर्म परिवर्तन का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक व्यक्ति पर तलाकशुदा महिला ने आरोप लगाया है कि उसने पहले महिला को अपने प्रेम के जाल में फँसाया। उसके साथ लिव इन में रहा और जब बच्चा हुआ तो उसे छोड़कर फरार हो गया।

नवभारत टाइम्ल में प्रकाशित खबर

मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कविनगर थाना क्षेत्र की निवासी महिला ने बताया कि साल 2013 में उसका उसके पति से तलाक हो गया था। जिसके बाद 2014 में उसका संपर्क सिहानी गेट थाना क्षेत्र में रहने वाले युवक से हुआ।

इसके बाद महिला के मुताबिक मुस्लिम युवक ने उसे प्रेम जाल में फँसाकर पहले धर्म परिवर्तन कराया और फिर उसके साथ लिव-इन में रहने लगा। लेकिन जब महिला को बेटा हुआ तो वह उसकी जिम्मेदारी लेने की बजाए भाग खड़ा हुआ। 2017 में वह महिला को छोड़कर फरार हो गयाl उसके बाद से महिला दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।

महिला ने अपनी शिकायत में युवक पर आरोप लगाया कि युवक ने उसका घर भी बिकवा दिया था और उससे घर के रुपए भी ले लिए थे। अब उसके पास कुछ नहीं हैं। उसका बेटा 3 साल का हो चुका है, लेकिन लड़के के घरवाले उसे रखने को तैयार नहीं हैं।

पीड़िता ने कहा कि उसके साथ धोखा किया गया है। इसलिए अब उसे इंसाफ़ चाहिए। वो चाहती है कि उसके बेटे को पिता का नाम मिले। जिसके लिए उसने कोर्ट में अर्जी दाखिल की है और अपने लिए न्याय की गुहार लगाई है।

पाक ने UN को भेजे पत्र में कहा- राहुल गाँधी ने भी माना ‘J&K में लोग मर रहे हैं’, अब डैमेज कंट्रोल में जुटी कॉन्ग्रेस

जम्मू कश्मीर पर अब भारतीय नेता ही पाकिस्तान के मददगार साबित होते नज़र आ रहे हैं। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र को जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध में पत्र लिख कर कहा है कि भारत वहाँ ‘अत्याचार कर रहा है’ और अपनी इस बात को साबित करने के लिए उसने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के बयानों का सहारा लिया है। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र को भेजे पत्र में लिखा है कि भारत की मुख्यधारा के राजनेताओं द्वारा भी ‘कश्मीर में हो रही हिंसा’ को स्वीकार किया है।

पाकिस्तान ने राहुल गाँधी का हवाला देते हुए उनके उस बयान का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘जम्मू कश्मीर में लोग मर रहे हैं’। पाकिस्तान ने लिखा कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जम्मू कश्मीर में चीजें ग़लत दिशा में जाने की बात कही थी। पाकिस्तान ने इस पत्र में कई झूठे आरोप लगाते हुए कश्मीर के बच्चों व महिलाओं पर ‘भारत द्वारा अत्याचार’ करने की बात कही है। पाकिस्तान ने यूएन को भेजे गए पत्र में अपनी बात साबित करने के लिए जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की ट्वीट्स का भी सहारा लिया है।

बता दें कि राहुल गाँधी विपक्षी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ जम्मू कश्मीर गए थे लेकिन श्रीनगर एयरपोर्ट से ही उन्हें वापस भेज दिया गया। अब राहुल डैमेज कण्ट्रोल में जुट गए हैं। विवादों के बाद उन्होंने कहा है कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और वहाँ हो रही हिंसा के लिए पाक ज़िम्मेदार है। राहुल गाँधी ने ट्विटर पर लिखा कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकवाद का प्रमुख समर्थक के रूप में जाना जाता है।

साथ ही राहुल ने यह भी लिखा कि जम्मू कश्मीर में होने वाली हिंसा पाकिस्तान समर्थित होती है और पाकिस्तान के भड़काने से ही होती है। राहुल गाँधी ने लिखा कि वे केंद्र सरकार से कई मसलों पर मतभेद रखते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर के मामले में पाकिस्तान या किसी अन्य तीसरे देश को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

BBC उर्दू ने पत्थरबाज़ों के हाथों कश्मीरी ड्राइवर की माैत को बताया जायज, बाद में किया डिलीट

प्रोपेगेंडा परस्त पत्रकारिता से अपनी पहचान बनाने वाले बीबीसी ने इस बार अपने लेख में पत्थरबाजों द्वारा सुरक्षाबलों को मारने वाली कोशिशों को और बीते दिनों घाटी में हुई ट्रक ड्राइवर की हत्या को जस्टिफाई करने का प्रयास किया। अपने लेख में बीबीसी उर्दू ने कश्मीर में हुई उस घटना पर सफाई पेश की जिसमें एक ट्रक ड्राइवर को पत्थरबाज ने सुरक्षाबल का जवान समझकर बेहरमी से मार दिया।

अपने लेख में बीबीसी ने लिखा, “सेना के जवान बड़ी तादाद में ट्रक में ट्रैवल करते हैं, जिससे वहाँ के जवानों ने यह समझ लिया कि ट्रक में सुरक्षाबल है।” हालाँकि, कुछ देर बाद बीबीसी ने अपने आर्टिकल में से इस लाइन को हटा लिया, लेकिन जम्मू-कश्मीर के पुलिस अधिकारी इम्तियाज हुुसैन ने इस स्टोरी में उस लाइन का स्क्रीनशॉट ले लिया और ट्विटर पर शेयर कर दिया। भाषा उर्दू थी तो कई लोगों ने इसे रिट्वीट और कमेंट करके अनुवाद किया।

अपनी ट्वीट की सीरीज में पहले इम्तियाज ने बीबीसी को दुत्कारते हुए लिखा “बीबीसी उर्दू के पत्रकार ने पत्थरबाज की तरफ से खुद ही समझ लिया कि ट्रक में सिक्योरिटी फोर्स का कोई आदमी था, इसलिए उन्होंने उसे मारा। एक पत्रकार द्वारा हत्या का क्या घटिया आँकलन हैं। आज शर्म को भी शर्म से मर जाना चाहिए!! RIP पत्रकारिता।”

इस मामले पर अपने लास्ट ट्वीट में इम्तियाज ने लिखा, “ये जरूरी है कि कश्मीर की असल तस्वीर लोगों के सामने पेश की जाए क्योंकि बहुत से पाकिस्तानी लड़के है जो सोशल मीडिया पर वायरल होती ऐसी स्टोरी को पढ़ रहे है, आतंकी संगठन ज्वाइन करने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं और फिर कश्मीर आकर परेशानी का कारण बन रहे हैं।”

उल्लेखनीय है कि पुलिस अधिकारी के अलावा बीबीसी को उसकी हरकत के लिए सोशल मीडिया पर कई यूजर्स दुत्कार रहे हैं। लेख की डिलीट हुई विवादित लाइन का भी बढ़-चढ़कर अनुवाद किया जा रहा है। साथ ही संस्थान के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराने की भी माँग हो रही हैं। इसके अलावा कुछ लोगों का कहना ये भी है कि बीबीसी में पत्रकारों के नाम पर सिर्फ़ कट्टरपंथी लोग हैं, जो खुद की ‘घटिया’ सोच को पत्रकारिता कहकर पेश कर रहे हैं।

बता दें बीते रविवार को दक्षिण कश्मीर के बिजेबेहरा इलाके में नूर मोहम्मद नाम के ट्रक ड्राइवर की पत्थरबाजों ने पत्थर मारकर हत्या कर दी थी। जिसके बाद पुलिस ने जल्द ही उस पत्थरबाज को खोजकर उस पर हत्या के मामले में केस दर्ज किया था। हालाँकि, उस समय भी कई मीडिया रिपोर्ट्स का कहना था कि पत्थरबाज ने ट्रक को सिक्योरिटी फोर्स की गाड़ी समझकर उस पर हमला किया। लेकिन बीबीसी की तरह जस्टिफिकेशन किसी ने नहीं दिया था।

जय शाह केस: ‘The Wire’ ने याचिका वापस ली, जज ने कहा- कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ लेकिन…

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने अमित शाह के पुत्र जय शाह द्वारा दायर किए गए मानहानि के मुक़दमे को निरस्त किए जाने की माँग वाली अपनी याचिका सुप्रीम कोर्ट से वापस ले ली है। जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ के समक्ष ‘द वायर’ की तरफ़ से दलीलें पेश करते हुए गुजरात के ट्रायल कोर्ट में मामला चलाने की अपील की। अदालत ने सिब्बल की दलीलें तो मान ली लेकिन कुछ ऐसी बातें भी कही, जिससे ‘द वायर’ द्वारा लगातार फैलाए जा रहे झूठ की पोल खुल जाती है।

कोर्ट ने आजकल जिस तरह से पत्रकारिता की जा रही है, उस पर सवाल खड़े किए। अदालत ने इस बात पर आपत्ति जताई कि बिना उचित समय दिए लेख प्रकाशित कर दिए जाते हैं। ‘द वायर’ ने अपने बयान में कहा कि जय शाह के ख़िलाफ़ प्रकाशित किए गए लेख में जो कुछ भी लिखा है, उसे ट्रायल के दौरान सही साबित किया जाएगा और इसीलिए वे अपनी याचिका वापस ले रहे हैं।

‘द वायर’ और पत्रकार रोहिणी सिंह ने अपनी याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। यह मामला रोहिणी सिंह द्वारा ‘द वायर’ में लिखे गए एक लेख से सम्बंधित है, जिसमें जय शाह के व्यापार को लेकर उन पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। प्रोपेगंडा पोर्टल ने दावा किया था कि उस लेख को लिखने से पहले काफ़ी रिसर्च किया गया है लेकिन ऐसा साफ़ झलक रहा था कि लेखक के पास वित्तीय समझ नहीं है। जय शाह ने पोर्टल के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा दायर किया था।

जय शाह ने ‘द वायर’ के ख़िलाफ़ 100 करोड़ रुपए का मानहानि का मुक़दमा दायर किया था। इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने भी प्रोपेगंडा पोर्टल को इस मुद्दे पर कुछ भी प्रकाशित करने से रोक दिया था। जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि वे बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन कहेंगे नहीं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बिना तथ्यों की पत्रकारिता पर रोक लगाने की ज़रूरत पर बल दिया।

क्षत-विक्षत अवस्था में मिलीं आतंकियों द्वारा मारे गए 2 भाइयों की लाशें, गुज्जर मुस्लिम थे मृतक

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिला स्थित त्राल में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने 2 निर्दोष नागरिकों की जान ले ली। आतंकियों ने इस घटना को काफ़ी भयावह तरीके से अंजाम दिया। आतंकियों की दरिंदगी का शिकार बने दोनों ही मृतक मुस्लिम हैं और गुज्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। जब उनकी लाशें मिलीं, तब उनके दोनों हाथ बँधे हुए थे और देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आतंकियों ने दोनों को मारने से पहले उनके साथ काफ़ी बेरहमी भरा व्यवहार किया।

मृतक मंज़ूर अहमद कोहली और मोहद क़ादिर की लाशें क्षत-विक्षत अवस्था में मिलीं। मंज़ूर और क़ादिर कजन भाई थे। दोनों पूँछ और नोमाड्स क्षेत्र के निवासी थे। इन दोनों को अगस्त 20, 2019 को आतंकियों ने अपहृत कर लिया था। पुलिस इन दोनों की तलाश में लगी हुई थी। गुरुवार (अगस्त 27, 2019) को दोनों की लाशें त्राल के जंगल में मिलीं। पुलिस ने इस घटना के लिए ज़िम्मेदार आतंकियों की तलाश शुरू कर दी है।

यह भी जानने लायक बात है कि अगस्त 5, 2019 को जब अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन पर संसद ने अपनी मुहर लगाईं, उसके बाद से यह घाटी में पहला आतंकी हमला है। अर्थात, पिछले 23 दिनों में आतंकियों ने पहली बार किसी निर्दोष की जान ली है, वो भी दो लोगों की। इससे पहले अगस्त 20, 2019 को पुलिस और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई थी, जिसमें एक स्पेशल पुलिस अधिकारी वीरगति को प्राप्त हो गए थे और 2 लश्कर के आतंकी भी मारे गए थे।

पुलवामा में हुई उस मुठभेड़ में किसी नागरिक की जान नहीं गई थी। ख़ुफ़िया सूचनाओं के मुताबिक़, आतंकी जम्मू कश्मीर पर सरकार के निर्णय का बदला लेने के लिए न सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी घुसपैठ कर हमले करना चाहते थे। मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में पहले ही अलर्ट जारी किया गया था। नौसेना प्रमुख भी कह चुके हैं कि पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा समुद्र के रास्ते हमले की योजना बनाई जा रही है लेकिन उसका जवाब देने के लिए भारतीय नौसेना तैयार है।

The Hindu वालो, ज़हरीला मर्द होना नहीं, तुम्हारे जैसा विक्षिप्त-लिबरपंथी होना है

‘Toxic Masculinity’ का लिबरपंथी कैंसर आखिरकार भारत में फैलना शुरू हो गया है। अमेरिका और पश्चिमी जगत में नारीवाद की तीसरी लहर, यानी ‘third wave feminism’ से निकला यह कालकूट विष कितना जहरीला है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि मानसिक बीमारियों को दूर करने के विशेषज्ञ माने जाने वाले मनोवैज्ञानिक भी इसकी चपेट में आकर ‘मर्द होने/पौरुषत्व’ (masculinity) को ही ‘ज़हरीला’ (toxic) मानने लगे हैं।

लगभग एक साल पहले अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन (American Psychological Association, APA) ने इसी आशय के बाकायदा दिशा-निर्देश जारी किए, जिनका मजमून यह था कि लड़कों का लड़कों जैसा बर्ताव हानिकारक होता है, और अपने मरीजों में से इसे निकालना मनोवैज्ञानिकों की ज़िम्मेदारी है। इसे आम जनता ने तो लताड़ा ही, दुनिया के चोटी के मनोवैज्ञानिक जॉर्डन पीटरसन को कहना पड़ा कि वे अपने पेशे की संस्था के इस वाहियात कदम के लिए जनता के सामने ‘शर्मिंदा’ हैं। अन्य कई शीर्ष मनोवैज्ञानिकों ने भी APA को लताड़ा

और अब यही फोड़ा भारत में रक्त-कैंसर बनने के लिए कमर कस चुका है। सबूत है राजीव भार्गव का द हिन्दू में प्रकाशित लेख, जिसमें हॉनर-किलिंग से लेकर मॉब-लिंचिंग और जातिवाद से लेकर बच्चों के एक-दूसरे को चिढ़ाने के लिए कही जाने वाली बातों को ‘toxic masculinity’ यानी ज़हरीले पौरुषत्व के नाम कर दिया गया है।

हॉनर-किलिंग का oversimplification

अगर हॉनर-किलिंग महज़ मर्दों का, मर्दों के अहम का या ‘toxic masculinity’ का मसला होता, तो आधे से अधिक मामलों में पीड़िता के परिवार की महिलाएँ भी हत्या में शामिल न होतीं, जैसा कि अदालतों, FIR से लेकर मीडिया रिपोर्टों में देखा जा सकता है। हॉनर-किलिंग जातिवादी ऊँच-नीच, सम्पत्ति (महिला नहीं, असली खेत-खलिहान की सम्पत्ति), केवल कुछ हद तक पितृसत्ता, समय के साथ जड़ रूढ़ियाँ हो गईं धार्मिक-सामाजिक परम्पराओं वाला जटिल मसला है। इसे केवल अपने ‘toxic masculinity’ एजेंडे से जोड़कर लेखक एजेंडेबाजी के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं।

पहलू खान, दलितों का मामला

आश्चर्य की बात है कि पहले पहलू खान मामला गौ-तस्करों और गौ-रक्षकों का न होकर साम्प्रदायिक था, और अब दो मजहबों का न होकर राजीव भार्गव के लिए ‘toxic masculinity’ का उदाहरण हो गया है! कल को पत्रकारिता के समुदाय विशेष की यादवों पर नज़र टेढ़ी हो गई तो यह यादव-समुदाय विशेष का मामला भी बन जाएगा? निश्चित तौर पर पहलू खान के हत्यारों को उनके किए की न्यायोचित सज़ा मिलनी चाहिए, लेकिन इस मामले में ‘toxic masculinity’ का एंगल कहीं से भी उचित नहीं है।

इसी तरह दलितों को पीटने का मामला, जो कल तक हिन्दू धर्म की गलती था, आज मर्द होने की गलती हो गया? यानी अगर दलितों के साथ हिंसा ‘toxic masculinity’ के कारण हो रही है, तो मृतक पहलू खान भी दलितों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार हुआ? ये कहाँ का लॉजिक है?

Manhood का model खुद तय करके खुद उसे गरियाना या तो बौद्धिक कायरता है, या toxic elitism

भारत में, खासकर हिन्दुओं में इतने जाति-सम्प्रदाय-परम्पराएँ हैं कि शादी जैसे सीधे-सीधे मामले में आज तक कोई ऐसा कानून बना नहीं, जो सारे-के-सारे भारतीयों पर लागू हो जाए- और रोज़मर्रा के लोगों के आपसी व्यवहार जैसे जटिल मसले पर भार्गव जी न केवल एक मर्दवादी व्यवहार का मॉडल निकाल भी लाए, बल्कि खुद उसमें मीन-मेख भी निकाल डाला! यानी खुद दुश्मन बनाया, और खुद उसे मार डाला। या तो यह घमंड है लिबरल बौद्धिक होने का, कि जो मैं कहूँ वही सब पर लागू होता है, या यह बौद्धिक कायरता है कि अपने बनाए हवा के गुब्बारे को फोड़ कर किला-तोड़ घोषित हो जाया जाए!

इसमें कोई शक नहीं कि पुरुष महिलाओं से सामान्यतः थोड़े अधिक आक्रामक होते हैं, लेकिन यह किसी सांस्कृतिक ज़बरदस्ती या ‘toxic masculinity’ के चलते नहीं, बायोलॉजिकल कारणों से होता है। इन जटिल मामलों का अध्ययन जॉर्डन पीटरसन जैसे मनोवैज्ञानिकों, ब्रेट वाइन्सटाइन जैसे evolutionary theorist या गैड साद जैसे evolutionary psychologist को पढ़ कर समझा जाता है भार्गव जी, ‘toxic masculinity’ का रोना रोकर नहीं। और अगर मर्द ‘आक्रामक’ न हों तो जब कोई नाव डूबने लगेगी, घरों में आग लगेगी या कोई बनैला पशु हमला करेगा, तो महिलाओं-बच्चों को पीछे कर हट्टे-कट्टे पुरुष आगे कूदने की बजाय बच्चों-औरतों को फेंक कर उनकी लाशों पर चढ़ कर जान बचा कर भागेंगे!

महिलाओं द्वारा पुरुषों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार, समुदाय विशेष पर चुप्पी

चूँकि लिबरल अख़बार और लिबरल (और माना जा सकता है कि फेमिनिस्ट भी) लेखक हैं, इसलिए ज़ाहिर है कि न तो महिलाओं द्वारा पुरुषों पर होने वाली ज़्यादतियों का नाम लेने की उम्मीद की जा सकती है, न समुदाय विशेष का नाम लेने की। और यही हुआ है भी। महिलाओं द्वारा पुरुषों के साथ किए जाने वाले गलत व्यवहार को कौन सी ‘-ity’ कहा जाएगा, भार्गव जी न यह बताते हैं, न ही यह कि समुदाय विशेष में होने वाले तीन तलाक, हलाला, बुरका आदि ‘toxic masculinity’ होंगे या कुछ और।

लेकिन भार्गव जी से सवाल ज़रूर है कि अगर कोई महिला पति से तलाक का मुकदमा जीतने के लिए अपनी ही बच्ची के बलात्कार का झूठा आरोप पति पर लगा दे, तो यह feminity (क्योंकि बलात्कार के आरोप का इस्तेमाल masculinity तो नहीं सकता) toxic होगी या नहीं? अगर कोई महिलाओं को प्रमोशन मिलते ही प्रमोशन के लिए जी-जान से पीछे खड़ा पति बोझ हो जाए, उससे तलाक की इच्छा कुलबुलाने लगे तो यह blatant hypergamy ही होगा, या इसके समर्थन के लिए कोई कुतर्क बचा कर रखा है?

देशद्रोह मामले में कुख्यात नक्सली नेता कोबाड गाँधी गुजरात में हुआ गिरफ्तार

कुख्यात नक्सली नेता कोबाड गाँधी उर्फ कमाल उर्फ आजाद को सोमवार (अगस्त 26, 2019) को सूरत की एक अदालत में पेश किया गया। संयुक्त पुलिस उपायुक्त एफजी पटेल ने बताया कि 2010 में सूरत के कामरेज थाने में दर्ज नक्सली षडयंत्र प्रकरण के आरोप में कोबाड गाँधी को हजारीबाग जेल (झारखंड) से ट्रेन के जरिए लाया गया और अदालत में पेश किया गया।

नक्सली नेता कोबाड गाँधी को 9 साल पुराने देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया है। झारखंड की हजारीबाग जेल में निरुद्ध प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य कोबाड गाँधी को सोमवार को ट्रांसफर वारंट पर सूरत लाया गया था।

सूरत जिले की कामरेज पुलिस ने वर्ष 2010 में कोबाड गाँधी और 24 अन्य लोगों के खिलाफ देशद्रोह और कथित तौर पर दक्षिणी गुजरात में नक्सली गतिविधियों को बढ़ावा देने का मामला दर्ज किया था। इस मामले में कोबाड से पहले 23 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि एक आरोपित सीमा हिरानी अभी भी पुलिस की गिरफ्त से दूर है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, डिप्टी एसपी सीएम जडेजा ने बताया कि 68 वर्षीय नक्सली विचारक कोबाड गाँधी को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट एचआर ठाकोर की कोर्ट मे पेश किया गया था। उन्होंने कोबाड को सूरत ग्रामीण पुलिस को सौंप दिया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस मंगलवार (अगस्त 27, 2019) को कोर्ट से कोबाड की रिमांड माँगेगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जिले में नक्सली गतिविधियों को बढ़ावा देने में उसकी क्या भूमिका थी।

कोबाड गाँधी को सितंबर 22, 2009 में दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। सुरक्षा के दृष्टकोण से उसे झारखंड के जेपी कारा में लाया गया था। नक्सलियों से जुड़ी एक पत्रिका विजन-2026 निकाली गई थी, जिसका संपादन कोबाड ने किया था। इसके बाद अक्टूबर 10, 2009 को नक्सली नेता रवि शर्मा को इचाक से गिरफ्तार किया गया था।

इसी रवि शर्मा को नक्सली संगठन का वैज्ञानिक कहा जाता था। वह लैटिन अमेरिकी भाषा में बात करता था। यही कारण है कि हजारीबाग पुलिस को पूछताछ करने के लिए राँची और दिल्ली से लैटिन अमेरिकी अंग्रेजी के विशेषज्ञ को बुलाया गया था। बाद में रवि शर्मा की पत्नी अनुराधा शर्मा को पटना से गिरफ्तार किया गया था।


ब्राह्मणों पर पहली बार जजिया कर लगाने वाले फिरोजशाह तुगलक ने बसाया था ‘कुश्के-फिरोज’

भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली की मृत्यु के बाद आज (अगस्त 27, 2019 को) DDCA ने फिरोजशाह कोटला मैदान का नाम बदलकर अरुण जेटली के नाम पर रखने का निर्णय लिया है। दिल्ली के इतिहास में मध्यकालीन भारत का काफी महत्त्व देखने को मिलता है। जिसका कारण यह है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने इसे और आगरा को अपना ख़ास ठिकाना बनाकर रखा। इन्हीं में से एक नाम है फिरोजशाह तुगलक, जिसे इतिहास एक असहिष्णु और धर्मांध शासक के रूप में जानता है।

फिरोज शाह तुगलक दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश का शासक था। उसकी माँ- बीबी जैजैला (भड़ी) राजपूत सरदार रजामल की पुत्री थी। फिरोजशाह, मुहम्मद बिन तुगलक का चचेरा भाई एवं सिपहसलार ‘रजब’ का पुत्र था। मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद ही फिरोज शाह का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ था।
इस तरह से फिरोजशाह तुगलक वंश का तीसरा शासक (1351-1388) बना और उसने दिल्ली में एक नया शहर बसाया-फिरोजाबाद! 

उलेमाओं को खुश रखने के लिए अपनाई थी कट्टर छवि

इतिहासकारों के अनुसार, फिरोजशाह द्वारा हिन्दुओं पर जुर्म और बर्बरता करने का एक यह भी कारण था कि उसे एक राजपूत माँ से पैदा होने के कारण अपने समय के उलेमाओं के सामने अपनी कट्टर मुस्लिम छवि को बनाए रखना था। यही वजह है कि इतिहास में उसे एक धर्मांध शासक के रूप में जाना गया। उसने अपनी हूकूमत के दौरान कई हिन्दूओं को मुस्लिम धर्म अपनाने पर मजबूर किया।

फिरोज तुगलक ने उलेमाओं का सहयोग पाने के लिए कट्टर धार्मिक नीति अपनाई, उलेमाओं को विशेषाधिकार पुनः प्राप्त किए तथा शरीयत को न केवल प्रशासन का आधार घोषित किया बल्कि व्यवहार में भी उसे लागू किया। ऐसा करने वाला वह सल्तनत का पहला शासक था।

इसी फिरोजशाह तुगलक ने शरीयत के अनुसार जनता से 4 तरह के कर वसूले थे- जकात, सिंचाई कर (यह अपवाद था, क्योंकि यह शरियत में नहीं है), खम्स (युद्ध से प्राप्त लूट तथा भूमि में दबा खजाना तथा खानों से प्राप्त आय का बँटवारा) जिसके अनुपात को शरीयत के आधार पर वसूला। और इसी ने पहली बार ब्राह्मणों से भी जजिया (गैर मुस्लमानों से लिया जाने वाला कर) कर वसूला। वह पहला शासक था, जो जजिया को खराज (भू-राजस्व) से पृथक रूप से वसूलता था।

इससे पूर्व ब्राह्मणों को इस कर से मुक्त रखा गया था। यह पहला सुल्तान था जिसने ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगा दिया। फिरोज तुगलक के ऐसा करने के विरोध में दिल्ली के ब्राह्मणों ने भूख हड़ताल कर दी थी। इसके बावजूद भी फिरोज तुगलक ने इसे समाप्त करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अंत में दिल्ली की जनता ने ब्राह्मणों के बदले स्वयं जजिया देने का निर्णय लिया।

फिरोज शाह एक कमजोर सेनापति था, इसलिए उसने सत्ता में बने रहने का सबसे आसान तरीका अपनाकर उलेमाओं को खुश रखने का काम किया। यह सब फिरोजशाह ने सिर्फ और सिर्फ अपना सिंहासन बचाए रखने के लिए किया था।

तीसरे अभियान में जगन्नाथपुरी मंदिर की लूट

फिरोजशाह ने अपने जीवन काल में मात्र 4 अभियान किए। इसी क्रम में फिरोज तुगलक ने एक ब्राह्मण को सिर्फ इसलिए जिंदा जलाया था क्योंकि वह मुस्लिमों के बीच हिन्दुओं की प्रशंसा कर रहा था। उसने नागरकोट (बंगाल) और 1360 में प्रसिद्ध जगन्नाथपुरी के मंदिर को नष्ट किया और मंदिर में स्थित पुस्तकालय के 1300 संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया जिसे ‘दलायते फिरोजशाही’ नाम दिया। इसके साथ ही फिरोज शाह ने प्रशासन में हिन्दुओं को शामिल करना अत्यंत सीमित कर दिया।

मुस्लिम महिलाओं के पीरों की मजार जाने पर पाबंदी

उलेमाओं को प्रसन्न करने के लिए ही उसने हिन्दुओं पर अत्याचार के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं के पीरों की मजार जाने पर पाबंदी लगाई। पर्दा प्रथा को प्रोत्साहन दिया तथा अनेक मस्जिदों व मदरसों का निर्माण करवाया।

इतिहास में फिरोजशाह तुगलक को बुलंद इमारतों की तामीर करवाने के शौक के कारण भी याद किया जाता है। उसने करीब 300 नगर बसाए थे जिनमें हिसार, फिरोजाबाद (दिल्ली में नया शहर), फतेहाबाद, जौनपुर आदि प्रमुख हैं। दिल्ली स्थित कोटला फिरोजशाह दुर्ग जो कि फिरोजशाह कोटला मैदान के नाम से जाना जाता है, भी इसी ने बनाया था।

फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली में एक नया शहर बसाया था, जिसे फिरोजाबाद नाम दिया। फिलहाल दिल्ली में स्थित ‘कोटला फिरोजशाह आबाद’ कभी उसके दुर्ग का काम करता था। इस किले को कुश्के-फिरोज यानी फिरोज के महल के नाम से पुकारा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि फिरोजाबाद, हौज खास से लेकर ‘पीर गायब’ (हिंदूराव हॉस्पिटल) तक आबाद था। लेकिन अब इसके अवशेष भी ढूँढे नहीं मिलते हैं। इतिहासकार फिरोजाबाद को दिल्ली का 5वाँ शहर मानते हैं।

दिल्ली स्थित हौज खास में फिरोजशाह तुगलक का मकबरा है। उसके शासन में दिल्ली में कई मस्जिदें भी बनाई गईं। फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अपने पुत्र फ़तेह खान के जन्मदिवस के मौके पर फतेहाबाद शहर की स्थापना की थी। इसके साथ ही उसने जौनपुर शहर की भी स्थापना अपने बड़े भाई जौना खान की याद में की और इस नगर का नाम जौनाखाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) के नाम पर रखा।

हम मुस्लिमों ने 2 कश्मीरियों को मार डाला: 370 पर कॉन्ग्रेसी मुस्लिम नेता ने दिखाया आईना

जम्मू-कश्मीर से 370 के पर कुतरने और इसे मुस्लिमों के बीच जिहादी मानसिकता को बढ़ावा दे रहे लोगों द्वारा ‘हिन्दू सरकार की गुंडागर्दी’ के रूप में दिखाने की कोशिशों के बीच कॉन्ग्रेस के ही एक मुस्लिम नेता ने अपने समुदाय के लोगों को आईना दिखाया है। सलमान निज़ामी नामक कश्मीरी नेता ने ट्वीट कर इस तथ्य की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया कि जहाँ बाकी पूरे देश में कश्मीरी मुस्लिम सुरक्षित हैं, वहीं खुद कश्मीर में 370 खत्म होने के बाद से दो बेग़ुनाह मुस्लिमों को जान से मारा जा चुका है।

हिन्दुओं को दोष देना गलत

सलमान निज़ामी ने ट्वीट किया, “वर्तमान की बात करते हैं। पिछले 22 दिनों से कश्मीर में कर्फ्यू है। पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवादियों ने गुज्जर (मुस्लिम) को मार डाला, पत्थरबाजों ने एक कश्मीरी (मुस्लिम) ड्राइवर को मार डाला। (बाकी के) भारत में एक भी कश्मीरी मुस्लिम पर कोई हमला नहीं हुआ। अब हिन्दुओं को दोष देंगे? नहीं। हम गलत हैं यहाँ पर। सच्चाई को मान लेना चाहिए।”

सलमान निज़ामी के ट्वीट से उन लोगों की तो आँखें खुल ही जानी चाहिए जो बेवजह का विक्टिम-कॉम्प्लेक्स पाल कर बैठे हैं, और अपने आस-पास न होते हुए भी ‘डर का माहौल’ खुद ही अपने दिमाग में पैदा करते रहते हैं। साथ ही इस ट्वीट से जम्मू-कश्मीर के मामले में कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व (राहुल गाँधी-सोनिया गाँधी, गुलाम नबी आज़ाद आदि) और अन्य नेताओं के बीच न पट रही खाई भी फिर से उभर आती है।

रिजर्व बैंक ने मोदी को क्यों दिया ₹1.76 लाख करोड़? राहुल गाँधी इसे डकैती क्यों कह रहा है?

कल भारतीय रिजर्व बैंक ने, पूर्व गवर्नर बिमल जालान के नेतृत्व में बनी समिति के सुझावों पर अमल करते हुए, भारत सरकार को ₹1.76 लाख करोड़ दिए। इस पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। एक तरफ के लोगों ने इसे अच्छा कदम बताते हुए कहा कि सरकार को इसकी आवश्यकता थी और इसे सरकार कहाँ खर्च करती है इससे पता चलेगा कि अर्थव्यवस्था पर इसका कैसा असर पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ वाले लोगों ने कहा है कि ये डकैती है, मोदी रिजर्व बैंक से पैसा चुरा रहा है, लूट हो रही है।

फिर बीबीसी जैसे प्रोपेगेंडा गिरोह ने कनाडा में बैठे अर्थशास्त्रियों के बयान लेते हुए बताना शुरू किया कि यह रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर हमला है, और भारत सरकार ज्यादती कर रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पैसों के हेर-फेर के मामलों में फँसे राहुल गाँधी ने मोदी पर करारा हमला बोलते हुए बताया कि सरकार ने फंड चुरा लिया और ये गलत है। उन्होंने उदाहरण दिया कि मोदी सरकार बंदूक की गोली का घाव रोकने के लिए दवाखाने से बैंड-एड चुरा कर भागी है। यह बात अलग है कि जिन्हें रिजर्व बैंक के बारे में थोड़ी भी जानकारी है, और मोदी से घृणा न करते हों, वे जानते हैं कि न तो रिजर्व बैंक ने, और न ही सरकार ने कुछ भी गलत किया है।

पहली बात तो यह है कि रिजर्व बैंक है क्या?

सरल शब्दों में, भारतीय रिजर्व बैंक भारत सरकार की संपत्ति है। 1949 से यह बैंक भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व में आया। फिर स्वायत्तता का क्या संदर्भ है? स्वायत्त होने का मतलब यह नहीं होता कि आप सरकार के दायरे से बाहर हो जाते हैं, या एक स्वतंत्र कम्पनी बन जाते हैं। स्वायत्त होने का मतलब है कि पॉलिसी-संबंधित बातों पर बैंक के पास अपने अधिकार हैं कि वो अपने दायरे में संचालित होने वाले बैंकों, वित्तीय नीति आदि पर स्वयं निर्णय ले सके।

रिजर्व बैंक हमेशा सरकार के वित्त मंत्रालय के साथ मिल कर ही काम करता है। दोनों की नीतियाँ अलग हो सकतीं हैं, लेकिन विपरीत नहीं। कहने का अर्थ यह है कि दोनों ही संस्थाओं का लक्ष्य भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतरी है। दोनों के देखने का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन स्वायत्त होने के बावजूद रिजर्व बैंक भारतीय अर्थ-तंत्र का ही हिस्सा है, और वो सरकार के साथ मिल कर ही काम करता है।

रिजर्व बैंक का पैसा कहाँ से आता है, उसके लाभ का क्या होता है?

रिजर्व बैंक के पास देश का सोना है, भारत के विभिन्न बैंकों को पैसे देता है, सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाती है, विदेशी मुद्रा की खरीद-बिक्री करती है। ये उसके आय के स्रोत हैं। जाहिर है कि अगर बैंक व्यवसाय करेगा तो उसे लाभ भी हो सकता है, हानि भी। सोने के दाम में अगर साल के शुरुआत से साल के अंत में अंतर आएगा, तो वो रिजर्व बैंक की आमदनी में जुड़ेगा (या घटेगा)। वैसे ही, अगर रिजर्व बैंक ने सरकारी बॉन्ड को बेचा और उससे पैसे आए तो वे पैसे भी आमदनी का हिस्सा बनेंगे। अगर रिजर्व बैंक ने अपने पास के विदेशी मुद्रा रिजर्व से डॉलर को कम दाम पर खरीदा, और ज्यादा दाम पर बेचा, तो भी उसे आमदनी होगी।

यह आमदनी आम तौर पर एक स्तर तक की होती है, जिससे वित्तीय वर्ष के अंत में रिजर्व बैंक अपने लाभ का एक हिस्सा अपने पास रख कर बाकी पैसे सरकार को दे देता है। जो हिस्सा बैंक अपने पास रखता है, वो पैसे वो अपने बुरे दिनों को लिए रखता है- जैसे कि कभी बैंकिंग सिस्टम में पैसे की कमी हो जाए, अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मंदी का असर पड़ने लगे, या ऐसी समस्या आ जाए कि देश की इकॉनमी खतरे में पड़ जाए। ऐसे समय पर, जब सरकार के पास पैसों की कमी हो जाएगी, लोगों के हाथों में पैसा न होने के कारण खरीददारी करने की क्षमता कम होने लगेगी, तब रिजर्व बैंक बाजार और अर्थव्यवस्था की मदद के लिए कई कदम उठाता है।

जब आमदनी अच्छी होती है, लाभ होता है, और लाभ में से खतरे के समय के लिए बैंक के पास एक तय पैसा अलग रख लिया जाता है (contigency fund, कंटिंजेंसी फंड), तब उसके बाद जो पैसा बचता है, उसे सरप्लस कहते हैं। यह हर कम्पनी के साथ होता है, हर व्यक्ति के साथ होता है। आपकी जितनी सैलरी है, उसमें से आप अपने सारे खर्च और निवेश के बाद कुछ पैसा जो बचा पाते हैं, वो सरप्लस होता है। इसका उपयोग आप घर के किसी ऐसे कार्य को करने के लिए करते हैं, जो आपके सामान्य जरूरतों से शायद अलग होता है।

पिछले कुछ सालों में रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को अपना सरप्लस लगातार दिया है। कई साल सारा सरप्लस सरकार को दिया है। ये बात और है कि सामान्य तौर पर यह सरप्लस लगभग ₹40-50,000 करोड़ के आस-पास रहा है। इस बार यह सरप्लस असामान्य है क्योंकि इस साल का सरप्लस उस संख्या का लगभग तीन गुना है।

इस साल सरप्लस इतना ज्यादा कैसे हो गया?

रिजर्व बैंक ने पिछले साल अप्रत्याशित कारोबार किया, जिसमें अच्छे फायदे पर डॉलर और सरकारी बॉन्ड को बेचना शामिल है। ऐसा कार्य रिजर्व बैंक ने पिछले कई सालों से नहीं किया था, इसलिए लाभ हमेशा एक नियत संख्या के आस-पास ही दिखता था।

इसी बिक्री के कारण बैंक ने अप्रत्याशित मुनाफा कमाया। इस मुनाफे से बुरे दिनों के लिए बचाए गए फंड का हर समस्या से जूझने की स्थिति का आकलन करने के बाद, बिमल जालान समिति ने सुझाव दिया कि इस लाभ को सरकार को दे देना चाहिए क्योंकि राष्ट्र को अभी इस फंड की आवश्यकता है। आप सब जानते हैं कि बजट में सरकार देश पर हुए खर्च और टैक्स से हुई आमदनी का लेखा-जोखा रखने के बाद, अगले साल में खर्च होने वाले आँकड़े रखती है।

अगर यह आँकड़े आमदनी से कम होते हैं, तो उसे वित्तीय घाटा या फिस्कल डेफिसिट कहा जाता है। यह घाटा अगर बहुत ज्यादा हो जाएगा तो सरकार को कहीं से कर्ज लेना होगा। लेकिन सरकार के पास रिजर्व बैंक है, जिसके पास कुछ पैसा है। वह पैसा, जिसका अगर कहीं पड़े रहने से ज्यादा उपयोग नहीं है, तो वह पैसा सरकार को बैंक दे सकता है। इसलिए दे सकता है क्योंकि अंततः बैंक का स्वामित्व सरकार के पास ही होता है। यही बिमल जालान इंदिरा गाँधी से लेकर मनमोहन के समय तक महान अर्थशास्त्री माने जाते थे, और अब यही जालान “मोदी के गुलाम” हो गए हैं।

जालान समिति ने सुझाव दिया कि रिजर्व बैंक अपने बुरे दिनों के लिए लाभ का एक हिस्सा रखने के बाद पूरा सरप्लस सरकार को दे दे। इस सुझाव तक पहुँचने से पहले समिति ने बैंक के ऊपर आने वाले खतरों, पहले के समय के सबसे बुरे दौर आदि को संदर्भ में रखते हुए निर्णय लिया कि उसके अपने बचाव के लिए कम-से-कम कितने पैसों की ज़रूरत है। उसके बाद जो बचा, वो सरकार को दे देने की सिफारिश समिति ने की।

रिजर्व बैंक के लिए रिस्क क्या है? खतरे वाले दिनों से क्या मतलब है?

रिजर्व बैंक को विदेशी या अप्रत्याशित कारणों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए उसके अपने पास एक प्रक्रिया होनी चाहिए- जैसे कि अगर डॉलर के मुकाबले रुपए का दाम बढ़ने लगे, या अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव गिरने लगे। इससे रिजर्व बैंक की संपत्ति पर सीधा असर पड़ता है। इसका मतलब है कि आमदनी घटेगी। आमदनी अगर घटेगी तो उसका असर सीधा देश के बैंकों और वित्तीय व्यवस्था पर पड़ेगा। लेकिन यह असर वित्तीय तंत्र पर न पड़े, उसके लिए रिजर्व बैंक एक फंड रखता है।

मान लीजिए कि अमेरिका ने अचानक से भारत पर कुछ वित्तीय प्रतिबंध लगा दिए। या ऐसा हो कि एक ऐसी सरकार आ जाए जिसकी नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था हिल जाए। ऐसे समय में भी तंत्र को सुचारू रूप से चलाते रहने के लिए रिजर्व बैंक के पास कुछ अलग फंड होना चाहिए, ताकि इस तरह की स्थिति में वित्तीय तंत्र में अपने पास के पैसे लगा कर उसे गिरने से बचाया जा सके।

जहाँ तक बात स्वायत्तता की आती है तो उसमें रिजर्व बैंक के पास अपने लिए काम करने वाले लोगों और अपने कार्य को सही तरह से चलाने के लिए होने वाले खर्च के मामले में स्वतंत्रता है। लेकिन स्वायत्त होने का मतलब यह बिलकुल नहीं कि भले ही हमारा स्वामित्व भारत सरकार के पास है, लेकिन अर्थव्यवस्था को जब ज़रूरत पड़े तो हम अपनी मर्जी से सरप्लस फंड रोक लेंगे।

कुछ लोग रिजर्व बैंक के संपत्ति के आधार पर रखे जा रहे रिजर्व के प्रतिशत पर आ कर अटक गए हैं। इसे अंग्रेजी में ‘असेट-टू-रिजर्व रेशियो’ कहा जाता है। अगर अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर चलें तो इस रिजर्व का मीडियन प्रतिशत 16 है जबकि भारतीय रिजर्व बैंक उससे बहुत ऊपर 26% का रिजर्व रखता है। ये अनुपात भी अर्थव्यवस्था के हिसाब से रखा जाता है ताकि बुरे-से-बुरे दौर में भी आपके पास इतना पैसा हो कि इकॉनमी पूरी तरह से गिर न जाए।

राहुल गाँधी रो क्यों रहे हैं? कॉन्ग्रेस इसे डकैती क्यों कह रही है?

राहुल गाँधी समेत पूरे कॉन्ग्रेस के पास सिवाय फर्जीवाड़े के कुछ बचा नहीं। इन्होंने राफेल के मुद्दे पर भारतीय आम जनता की अनभिज्ञता का लाभ उठाते हुए हर जिले में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने से लेकर हर रैली में राफेल-राफेल चिल्लाने की योजना बनाई थी, वह योजना काफी हद तक सफल रही क्योंकि अचानक से जो लोग मोदी को भ्रष्टाचार से बिलकुल अलग मानते थे, उन्हों रवीश वाला रोग लग गया और वो भी रवीश टाइप कहने लगे: जाँच करवाने में क्या जाता है?

हालाँकि रवीश भी जानते थे और राहुल भी कि रक्षा मामलों में उसकी पूरी जानकारी पब्लिक में नहीं दी जा सकती क्योंकि उसमें उस कम्पनी द्वारा विकसित तकनीकों के पब्लिक हो जाने का खतरा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में मोदी सरकार को सही पाया। फिर भी, मीडिया और कॉन्ग्रेस लगातार राफेल-राफेल करते रहे। यह सब सिर्फ इसलिए संभव हो पाया क्योंकि लोगों को इतनी डीटेल्स पता नहीं होतीं कि रक्षा सौदों में क्या शर्तें होती हैं। साथ ही, अगर घोटालों के खानदान में पले-बढ़े लोग अगर घोटाले होने की बातें करने लगते हैं तो आदमी को लगता है कि यार इसके तो बाप, माँ, परनाना तक घोटालेबाज रहे हैं, इसको तो आयडिया होगा ही!

तो रिजर्व बैंक को लेकर भी इन्होंने यही रणनीति अपनाई है। आम आदमी को रिजर्व बैंक या उसी कार्यशैली का कुछ पता नहीं होता। इसलिए, उसे मूर्ख बनाना आसान होता है कि देखो मोदी रिजर्व बैंक को लूट रहा है। जबकि राहुल गाँधी ये नहीं बता पाएँगे कि 2013-14, 14-15, 15-16 और उसके पहले भी रिजर्व बैंक ने सरप्लस भारत सरकार को दिया या नहीं। दिया तो कितने प्रतिशत दिया। वो इसलिए नहीं बता पाएँगे क्योंकि आम आदमी को मूर्ख समझना एक बात है, और रिजर्व बैंक के बारे में पता लगाना बिलकुल अलग। वो राहुल के वश का तो नहीं लगता।

आपकी कम्पनी है। उसने लाभ कमाया है। लाभ का एक हिस्सा अपने पास रखने के बाद, बाकी का पैसा परिवार पर खर्च के लिए घर के मुखिया को दे दिया है। कम्पनी ने अपने बचाव का भी पूरा ध्यान रखा, और परिवार को भी जरूरत के समय में मदद की। इसमें गलत क्या है? वो भी तब, जब कम्पनी का स्वामित्व परिवार के पास ही है।

राहुल गाँधी, अपने दावे के अनुसार, कैम्ब्रिज से पढ़े हैं। उनकी चुनावी टीम में अभिजीत बनर्जी जैसे MIT के अर्थशास्त्री थे। हाल ही में जेल चले जाने से पहले तक चिदंबरम के रूप में एक और अर्थशास्त्री था उनके पास। RBI गवर्नर रहे मनमोहन सिंह (पूर्व प्रधानमंत्री भी रहे हैं) आज भी उनका फ़ोन उठा ही लेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। तो राहुल गाँधी ऐसे हास्यास्पद दावे करने के पहले कम-से-कम इन लोगों से ही पूछ लेते, तो पता चल जाता कितनी मूर्खता भरी बातें वे कर आए हैं।