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मशहूर बांग्ला अभिनेत्री को बताया कॉल गर्ल, चिपकाए पोस्टर: लिखा – फोन करो और कमाओ ₹2000

‘तुमै अमै मिले’, ‘सुबर्णलता’ और ‘भूमिकन्या’ जैसे बांग्ला टीवी सीरियल्स में काम करके अपनी पहचान बनाने वाली बृष्टि रॉय इन दिनों काफ़ी परेशान चल रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पिछले कुछ दिनों से उन्हें बंगाल के अलग-अलग इलाकों से पुरुषों की कॉल आ रही हैं जो उनसे फोन पर भद्दी बातें करते हैं और ज्यादातर एस्कॉर्ट सर्विस के बारे में पूछते हैं।

बृष्टि के मुताबिक सबसे पहले उन्हें 24 अगस्त को शाम 4:30 बजे कॉल आया था। शुरू में उन्हें लगा कि कोई स्पैम कॉल होगा,लेकिन कुछ देर बाद उनके फोन पर लगातार कॉल आने लगे। उन्होंने परेशान होकर इन फोन नंबर्स को ब्लैक लिस्ट में डालना शुरू कर दिया। लेकिन तब भी सिलसिला रुका नहीं।

उनके मुताबिक इस घटना के बाद उनके एक दोस्त ने बताया कि उसने बृष्टि के पोस्टर सियालदाह-लक्ष्मीकांतपुर लोकल में देखें, जिसे देखकर वो हैरान रह गया।

इन पोस्टर्स पर बृष्टि का नाम, उनका फोन नंबर लिखा था और साथ ही ये भी लिखा था कि अकेले लोग रात को इस नंबर पर बात करें। फोन करने वाला 2000 तक कमा सकता है।

पोस्टर्स की जानकारी मिलते ही बृष्टि ने थाने में मामला दर्ज करवाया और बताया कि उन्हें रोज लगभग 250-300 ऐसे ही कॉल आ रहे हैं। जो उनसे घिनौनी बातें करते हैं।

जानकारी के मुताबिक उनके यह पोस्टर सिर्फ़ सियालदह-लक्ष्मीकांतपुर में नहीं बल्कि टॉलीगंज, जादवपुर और सोनारपुर के विभिन्‍न स्‍थानों के दीवारों पर भी लगे हुए हैं। जिनके आधार पर मामले को थाने में दर्ज कर लिया गया है। लेकिन, फिलहाल इस मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, पुलिस मामले की छानबीन में जुटी है। कहा जा रहा है कि इसके पीछे किसी रैकेट का हाथ हो सकता है। जिसका उद्देश्य बृष्टि को बदनाम करना है।

मीडिया से बातचीत में बृष्टि ने इस मामले पर बताया है, “मैंने फोन नंबर चेंज करने के बारे में सोचा, लेकिन अभी नहीं कर सकती क्योंकि पुलिस जाँच जारी है। उन्हें यह नंबर चाहिए क्योंकि यह पोस्टर पर छपा हुआ है। मेरे सारे जरूरी नंबर इसी में हैं और मैं रातोंरात इसे नहीं बदल सकती। मैं हालात से जूझ रही हूँ। मैं जानती हूँ कि मैं निर्दोष हूँ। और यह किसी की मुझे तंग करने की शरारत है। लेकिन मैं आसानी से हार नहीं मानने वाली। मुझे भरोसा है कि दोषियों को जल्द ही पकड़ लिया जाएगा।”

मुझे मिड डे मील बनाने के लिए सामान नहीं दिए जाते: मिर्ज़ापुर स्कूल की कुक ने प्रशासन की खोली पोल

मिर्ज़ापुर में एक सरकारी स्कूल में छात्रों को मिड डे मील के नाम पर नमक-रोटी दिए जाने की बात सामने आई थी। स्थानीय पत्रकार पवन जायसवाल ने इसका वीडियो बनाया था, जिसके बाद डीएम ने वहाँ छानबीन करने के बाद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की। हालाँकि, डीएम अनुराग पटेल बाद में पलट गए और पत्रकार को ही दोषी ठहराने लगे। उनका कहना था कि प्रिंट के पत्रकार ने वीडियो क्यों बनाया, फोटो क्यों नहीं क्लिक किया? पत्रकार पर मुक़दमे दायर कर दिए गए और उसके साथी को जेल भेज दिया गया।

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि ये एक साज़िश के तहत किया गया है। डीएम भी इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाते दिखे। अब इस मामले में नया खुलासा हुआ है। मामला जमालपुर के शिउर का है। वहाँ के जिस सरकारी स्कूल का यह मामला है, उस स्कूल में मिड डे मील तैयार करने वाली कुक रुक्मणि देवी ने कहा है कि पत्रकार की कोई ग़लती नहीं है। उन्होंने स्कूल के ही किसी मुरारी सर का नाम लेते हुए कहा कि सारी ग़लती उनकी है।

उन्होंने कहा कि जब बच्चों को नमक-रोटी खाने दिया गया था, तभी पत्रकार पवन ने वहाँ पहुँच कर मामले का वीडियो बनाया। जब रुक्मणि देवी से पूछा गया कि बच्चे नमक-रोटी खाने को मजबूर क्यों हैं तो उन्होंने स्कूल प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी तरफ से संसाधन दिए ही नहीं जाते हैं ताकि बच्चों को अच्छा खाना खिलाया जा सके। रुक्मिणी देवी ने सवाल किया कि जब उन्हें संसाधन ही नहीं दिया जाएगा तो वह छात्रों के लिए खाना कैसे बनाएँगी? देखें वीडियो:

कुक रुक्मणि देवी ने बताया कि बच्चों को केला और दूध भी देने का नियम है लेकिन हर चीज में कोताही बरती गई। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि इससे पहले बच्चे नमक-चावल खाने को भी मजबूर हो चुके हैं। इस मामले में डीएम अनुराग पटेल की पोल खुलती दिख रही है, जिन्होंने पहले तो कहा कि स्कूल स्तर पर गड़बड़ी हुई है और बात में पत्रकार को ही संदिग्ध बताने लगे।

उधर मिर्ज़ापुर में कई स्थानीय पत्रकार सड़क पर उतरे। उनकी माँग थी कि पत्रकार पवन के ख़िलाफ़ दर्ज की गई एफआईआर और उनके ख़िलाफ़ लगाईं गई धाराएँ वापस ली जाएँ। पत्रकारों ने रात को सड़क पर उतर के विरोध प्रदर्शन किया।

पर्यटन इंडेक्स: 6 वर्ष में 31 स्थान की छलांग के साथ भारत की स्थिति में भारी सुधार, पाक की हालत बदतर

वर्ल्ड ट्रेवल एंड टूरिज्म प्रतिस्पर्धा इंडेक्स में भारत की रैंकिंग में काफ़ी सुधार हुआ है। इस इंडेक्स के माध्यम से यह पता चलता है कि कौन सा देश पर्यटन के लिए कितना सही है? भारत की रैंकिंग और उसे मिलने वाले अंकों में सुधार हुआ है। जहाँ 2017 में 40वाँ रैंक से 2019 में 34वाँ रैंक हासिल कर भारत ने 2 वर्षों में 6 स्थान की छलांग लगाई है। वहीं अगर पाकिस्तान की बात करें तो उसकी रैंकिंग 121 है और वह दक्षिण एशिया में पर्यटन के हिसाब से सबसे ख़राब स्थिति में है।

ये रैंकिंग वर्ल्ड इकनोमिक फोरम द्वारा जारी किया गया है। अगर टॉप के 25% देशों की बात करें तो भारत ने 2017 के मुक़ाबले सबसे बड़ी छलांग लगाई है। अगर हम 2013 के आँकड़े को देखेंगे तो पता चलता है कि मोदी सरकार के आने के बाद से पर्यटन के क्षेत्र में भारत लगातार नई सीढ़ियाँ चढ़ रहा है। 2013 में भारत का रैंक 65 था। अर्थात, 5 वर्षों में भारत ने 31 स्थानों की लम्बी छलांग लगाई है।

प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधनों के मामले में समृद्ध होने के कारण वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने भारत की प्रशंसा की है। हालाँकि, पर्यावरण को लेकर चिंता जताई गई है। 140 देशों की इस सूची में स्पेन टॉप पर है। इसके बाद फ्रांस, जर्मनी, जापान और अमेरिका आते हैं। फोरम का कहना है कि पर्यटन इंडेक्स में भारत दक्षिण एशिया में एक बड़ी उपस्थिति रखता है और क्षेत्र की पर्यटन जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान देता है।

दक्षिण एशिया के अन्य देशों की बात करें तो वे भारत की रैंकिंग के सामने कहीं नहीं टिकते। वर्ल्ड इकॉनिमिक फोरम इस रैंकिंग को प्रकाशित करने से पहले सभी देशों में पर्यटकों की सुरक्षा, आवागमन, पर्यावरण और स्वास्थ्य सुविधाओं सहित कई मानकों का अध्ययन करता है।

कट्टरवादी समाज वाला पाकिस्तान दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश: पूर्व US डिफेंस सेक्रेट्री

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के पूर्व रक्षा सचिव जिम मैटिस ने कहा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई देशों के साथ डील किया लेकिन पाकिस्तान उनमें सबसे ख़तरनाक देश रहा। न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि पाकिस्तान दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक बहुत बड़ी समस्या है। मैटिस अफ़ग़ानिस्तान में भी सक्रिय रहे हैं।

अपनी पुस्तक में अमेरिका के पूर्व डिफेंस सेक्रेटरी ने लिखा है कि दुनिया में चल रही हर एक गतिविधि को पाकिस्तान ‘भारत से दुश्मनी’ वाले चश्मे से देखता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की इस नीति से अफ़ग़ान लोगों को काफ़ी हानि हुई है। उन्होंने कहा कि ओसामा बिन लादेन को संरक्षण देने वाला पाकिस्तान न सिर्फ़ अफ़ग़ान तालिबान का पोषक रहा है बल्कि उसने आतंकवादी संगठन अलकायदा को भी संसाधन मुहैया कराया है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान जैसे कई ऐसे आतंकी समूह सक्रिय हैं, जो पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेंक कर खलीफा का राज स्थापित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में समाज अतिवादी होता जा रहा है और ऊपर से वह अपने परमाणु हथियारों के जखीरे में लगातार वृद्धि कर रहा है। मैटिस ने कहा:

“पाकिस्तान में सरकार के ख़िलाफ़ जिहादी कट्टरता बढ़ती जा रही है। यह एक ऐसे बुरे सपने को साकार कर सकता है जिसमें हमें इस्लामाबाद में एक परमाणु शक्ति संपन्न कट्टरवादी सरकार देखने को मिले। पाकिस्तान और अमेरिका का रिश्ता भी काफ़ी उलझा हुआ है।”

69 वर्षीय जिम मैटिस ने 2017 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ मतभेदों के कारण रक्षा सचिव के पद से इस्तीफा दे दिया था। यूनाइटेड स्टेट्स मरीन से रिटायर हो चुके मैटिस पर्शियन गल्फ वॉर, अफ़ग़ानिस्तान युद्ध और इराक युद्ध के दौरान अहम भूमिका निभा चुके हैं।

बलूचिस्तान में पाक फ़ौज कर रही महिलाओं-बच्चों का क़त्लेआम: इमरान ख़ान का वीडियो वायरल

ट्विटर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में वह अपने ही देश की फौज को लताड़ लगाते हुए नज़र आ रहे हैं। इस वीडियो में इमरान ख़ान पाकिस्तानी फ़ौज की असलियत उजागर करते हुए कहते हैं कि पाकिस्तानी फ़ौज बलूचिस्तान में निर्दोष लोगों का क़त्लेआम कर रही है। लोगों ने इस वायरल वीडियो को ट्वीट कर इमरान से पूछा कि क्या वह अब भी अपने देश की फ़ौज के प्रति यही राय रखते हैं?

इमरान ख़ान अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं और अक्सर भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देते रहते हैं। लेकिन जिस फ़ौज के बल पर वह धमकियाँ देते हैं, कभी उन्होंने उसी फ़ौज के बारे में कहा था:

“हमारी फ़ौज बलूचिस्तान में अपने ही लोगों पर बम बरसा रही है। हम अपने ही लोगों को कैसे मार सकते हैं? जरा सोचिए अपने ही लोगों पर बम बरसाना और उन्हें मारना कितना अनुचित है। ट्राइबल क्षेत्रों में 60 लाख लोगों पर बम बरसाए जा रहे हैं। उनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। वो रिफ्यूजी कैम्पों में जीवन बसर करने को मजबूर हैं। अभी जो अवैध क़त्लेआम चल रहा है, उसका क्या? जो चल रहा है वह मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है।“

जम्मू कश्मीर के आईपीएस इम्तियाज हुसैन ने इमरान ख़ान को उनके इस बयान की याद दिलाते हुए बलूचिस्तान में चल रहे नरसंहार की याद दिलाई। हुसैन ने लिखा कि इमरान ख़ान ने ख़ुद स्वीकार किया है कि पाकिस्तानी फ़ौज बलूचिस्तान में वैसा ही आतंक मचा रही है, जैसा उसने बांग्लादेश में किया था। हुसैन ने लिखा कि इस भ्रम के कारण इमरान सोचते हैं कि जम्मू कश्मीर में भी भारतीय सेना यही कर रही।

जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी इम्तियाज हुसैन ने अपनी ट्वीट में बताया कि जम्मू कश्मीर में कहीं भी नरसंहार नहीं हुआ है, वायुसेना का प्रयोग नहीं किया गया है और न ही तोपों का प्रयोग किया गया है। बता दें कि पाकिस्तान बार-बार ‘जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा अत्याचार’ का राग छेड़ता रहता है। हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पाकिस्तान के वकील खावर कुरैशी स्वीकार कर चुके हैं कि अगर इस मामले को पाकिस्तान इंटरनेशनल कोर्ट में लेकर जाता है तो सबूतों के अभाव में इसमें कोई दम नहीं होगा।

कुरैशी ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान के पास जम्मू कश्मीर को लेकर अपना नैरेटिव साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है। अब जब इमरान ख़ान का पुराना वीडियो वायरल हो रहा है, ट्विटर पर लोग उनसे पूछ रहे हैं कि कभी बलूचिस्तान में पाक फ़ौज द्वारा महिलाओं-बच्चों का क़त्लेआम की बात करने वाले ख़ान ने आज पीएम बनने के बाद अपना सुर बदल क्यों लिया है?

13 सितम्बर तक रिमांड पर भेजे गए कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार, पूछताछ में नहीं कर रहे थे सहयोग

डीके शिवकुमार को आज बुधवार (सितम्बर 4, 2019) को सीबीआई की विशेष अदालत में पेश किया गया। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोर्ट से डीके शिवकुमार की 14 दिन के रिमांड की माँग की थी। लेकिन कोर्ट ने 13 सितम्बर तक की रिमांड पर ED को सौंप दिया है। कर्नाटक कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता शिवकुमार को मंगलवार की रात ईडी ने गिरफ़्तार कर लिया था। मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में यह कार्रवाई की गई। ईडी ने अदालत को बताया कि इनकम टैक्स विभाग द्वारा की गई जाँच और गवाहों के बयान से शिवकुमार के ख़िलाफ़ सबूत मिले हैं।

एजेंसी ने अदालत को बताया कि समन जारी किए जाने के बाद शिवकुमार हाजिर तो हुए लेकिन वह प्रश्नों का जवाब देने की बजाय टालमटोल करते रहे। ईडी के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता ने पूछताछ में सहयोग नहीं किया। ईडी ने अदालत में यह भी कहा कि जाँच अभी महत्वपूर्ण स्थिति में है और सभी डाक्यूमेंट्स डीके शिवकुमार के सामने रख कर उनसे पूछताछ करना ज़रूरी है।

जाँच एजेंसी के अनुसार, कई ऐसी बातें हैं जो व्यक्तिगत रूप से सिर्फ़ डीके शिवकुमार को ही पता है और मनी लॉन्ड्रिंग के इस मामले के तह तक जाने के लिए उनको कस्टडी में लेना ज़रूरी है। वहीं शिवकुमार की तरफ से बहस करते हुए वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि समन भेजे जाने के बाद शिवकुमार जाँच एजेंसी के समक्ष पेश हुए, वह भागे नहीं।

डीके शिवकुमार ने जमानत एप्लीकेशन पेश करते हुए जमानत की माँग की। जबकि ईडी ने कहा कि शिवकुमार ने जानबूझ कर जाँच प्रक्रिया को पटरी से उतारने की कोशिश की और उनके पास मिले कैश का स्रोत नहीं बताया। सिंघवी ने रिमांड को अपवाद बताते हुए कहा कि रिमांड रेयर केस में ही दिया जा सकता है, कोर्ट इसका निर्णय ले।

42000 फॉलोवर वाला Tik-Tok सेलेब्रिटी शाहरुख़ ख़ान निकला मोबाइल लुटेरा, साथियों संग गिरफ़्तार

ग्रेटर नोएडा पुलिस ने एक लूटपाट करने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसमें शाहरुख़ ख़ान नाम का एक टिक-टॉक सेलेब्रिटी भी शामिल है। वह टिक-टॉक पर डांस करते हुए वीडियो डाला करता था और उसके डांस को लोग पसंद भी करते थे। शाहरुख़ ख़ान अब एक मोबाइल झपटमारी गिरोह का सदस्य निकला है। उसे पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। टिक-टॉक पर उसके 42,000 से भी अधिक फॉलोवर्स हैं। पुलिस शाहरुख़ सहित अन्य आरोपितों से पूछताछ कर रही है।

ये गिरोह मोबाइल और कैश की लूटपाट करता था। ऐसा ये महँगे शौक पूरा करने के लिए करते थे। शाहरुख़ के अलावा आसिफ फैज़ान और मुकेश नामक व्यक्ति को भी गिरफ़्तार किया गया है। लुटेरों के पास से 5 मोबाइल फोन, एक बाइक और कैश भी बरामद किए गए हैं। सभी आरोपितों ने स्वीकार किया कि वे गौतम बुद्ध नगर में अब तक लूटपाट की 6 वारदातों को अंजाम दे चुके हैं।

पिछले कुछ दिनों से इलाक़े में मोबाइल लूट की घटनाएँ बढ़ गई थीं, जिसके बाद बीटा-2 थाने की पुलिस ने गिरोह की धर-पकड़ के लिए अभियान चलाया। ये लुटेरे हथियार के दम पर राहगीरों से उनके फोन व रुपए लूट लिया करते थे। पुलिस ने अपने मुखबिरों को अलर्ट कर पेट्रोलिंग में तेज़ी लाई थी। पुलिस को पता चला है कि टिक-टॉक पर वीडियो बनाने वाला शाहरुख़ ही इस गैंग का लीडर है।

शाहरुख़ लूटपाट की घटना को अंजाम देने से पहले इलाक़े की रेकी करता था और पुलिस मूवमेंट पर भी नज़र रखता था। लूट के बाद वह समान व रुपए का बँटवारा करता था। शाहरुख़ कुछ महीने पहले तक सऊदी अरब में ड्राइविंग का काम करता था। उसके टिक-टॉक अकाउंट पर डाले गए अधिकतर वीडियो सऊदी अरब में ही शूट किए गए हैं। वह ग्रेटर नोएडा में लूटपाट कर बचने के लिए बुलंदशहर चला जाया करता था।

‘कश्मीरी’ पोर्न स्टार जॉनी सिन्स ने पूर्व पाक राजनयिक को किया ट्रोल, कहा- मेरी आँखें एकदम मस्त हैं

लीजेंडरी पोर्न अभिनेता जॉनी सिन्स ने पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक अब्दुल बासित को ट्रोल किया है। जॉनी सिन्स ने अब्दुल बासित को टैग करते हुए ट्विटर पर लिखा कि उनकी आँखें बिलकुल ठीक हैं। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि अब्दुल बासित को नए फॉलोवर्स मुबारक हों। दरअसल, यह सब शुरू हुआ अब्दुल बासित द्वारा जॉनी सिन्स को पीड़ित कश्मीरी समझ कर उनका फोटो रीट्वीट करने के बाद। ये देखिए जॉनी सिन्स का स्पष्टीकरण:

दरअसल, ट्विटर पर अब्दुल बासित ने एक ऐसा ट्वीट रीट्वीट किया था, जिसमें एक अडल्ट फिल्म कलाकार के स्क्रीनशॉट को कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहाँ की पीड़ित जनता बताकर दिखाया जा रहा है। भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने ट्विटर पर शेयर की जा रही तस्वीरों को कश्मीर में पेलेट गन्स से पीड़ित लोगों की तस्वीर समझकर रीट्वीट किया। ये देखिए ट्वीट, जिसके जाल में अब्दुल फँस गए:

यह भी जानने लायक बात है कि इस तरह की तस्वीरें आजकल सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के लोगों का मजाक बनाने के लिए ट्विटर यूजर्स इस्तेमाल कर रहे हैं। कई पाकिस्तानी नेता, अधिकारी और फ़ौज के लोग इस मज़ाक के जाल में फँस जा रहे हैं।

ये वही अब्दुल बासित हैं जिन्होंने हाल ही में एक विवादास्पद बयान में कहा है कि 2016 में आतंकी बुरहान वानी की हत्या के बाद उन्होंने प्रख्यात सोशलाइट-कॉलमनिस्ट शोभा डे से जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह के पक्ष में वकालत करवाई। हालाँकि, शोभा डे ने इस दावे का खंडन किया है।

रोमिला थापर जी, सीवी न सही सुरख़ाब के जो पर लगे हैं आप पर वही दिखा दीजिए हमें…

चाहे वो माओवंशी लेनिननंदन कामभक्त वामपंथी हों या अपनी ही बात पर कट्टर बन कर डटे रहने वाले लिबरपंथी, दोनों के ध्येय में हमेशा से अभिजात्यता या किसी भी तरह के ‘मैं बड़ा हूँ’ वाली बातों को लेकर, थ्योरेटिकली, नकारात्मक मानसिकता रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि इन्होंने हमेशा समाज को एकरूपता में रहते देखना चाहा है, ये बात और है ये सब कहने की बातें हैं और पब्लिक में बीड़ी पीने वाले कामपंथियों को पार्टियों में मुफ्त की मार्लबोरो पीते देखा गया है।

ख़ैर, मुद्दा यह है कि भारत की प्रसिद्ध कहानीकार, जिन्हें लिबरपंथी-वामपंथी लॉबी इतिहासकार भी मानती है, रोमिला थापर से जेएनयू प्रशासन ने नए नियमों का हवाला देते हुए कहा कि वो अपनी सीवी भेज दें। इस पर हो-हल्ला मच गया और बहुत सारे लोग आहत हो गए, क्योंकि आहत होना हमारा राष्ट्रीय उद्योग है। आहत होने वालों को रोमिला थापर के अलावा दर्जन भर और प्रोफेसरों से माँगे गए सीवी से कोई मतलब नहीं है क्योंकि रोमिला तो रोमिला हैं!

ये सब हो क्या रहा है?

रोमिला थापर 1991 में जेएनयू से रिटायर हो चुकी हैं। विश्वविद्यालयों में रिटायर हो चुके प्रोफेसरों को भी उनकी अकादमिक क्षमता और उनकी सहमति को देखते हुए प्रोफेसर एमेरिटस/एमेरिटा की पदवी दी जाती है जिसमें उन्हें आर्थिक लाभ तो नहीं मिलता पर विश्वविद्यालय उनसे शैक्षणिक सेवाएँ लेता रहता है। इसे यूनिवर्सिटी द्वारा एक सम्मान के तौर पर देखा जाता है।

रोमिला थापर समेत 21 प्रोफेसरों को विश्वविद्यालय ने यह पद दिया हुआ था। इन 21 लोगों में 17 सोशल साइंस और ह्यूमैनिटीज संकायों से आते थे, और चार विज्ञान से। यूनिवर्सिटी की एक्जीक्यूटिव काउंसिल ने इस बात पर गौर करते हुए, अन्य बातों को ध्यान में लेते हुए, प्रोफेसर एमेरिटस (या एमेरिटा) के पद हेतु नियम तय किए ताकि कई प्रोफेसर जो दूसरे विभागों से रिटायर हो चुके हैं, उनके अनुभव और शिक्षण से भी यूनिवर्सिटी लाभान्वित हों।

साथ ही, ध्यान देने योग्य बात यह है कि नियम यह भी बनाया गया कि 75 की उम्र के बाद ऐसे प्रोफेसरों के पदों की समीक्षा होनी चाहिए और देखना चाहिए कि उनका स्वास्थ्य आदि उन्हें इस योग्य बनाता है कि वो यूनिवर्सिटी के क्रियाकलापों में अपना बेहतर योगदान दे सकें। इस हेतु सीवी मँगाना इस प्रक्रिया का हिस्सा है।

ब्लू आईड बेबी और हुआँ-हुआँ चिल्लाने वाले लोग

अब रोमिला थापर को ये बात चुभ गई कि उनसे, जिसने भारत का इतिहास लिखा है, उससे सीवी माँगी जा रही है! ये तो हद बात हो गई कि रोमिला थापर से सीवी माँगी जा रही है! लेकिन यही सारे लोग प्रधानमंत्री की डिग्री तो खूब माँग रहे थे। कह रहे थे कि जाँच होने में क्या जाता है। जबकि मंत्री या प्रधानमंत्री बनने के लिए डिग्री के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन, प्रोफेसर से सीवी माँग लेना आखिर ईशनिंदा की तरह क्यों लिया जा रहा है?

नहीं देना है तो मत दो, पद छोड़ दो क्योंकि अगर इसी जेनयू का एकेडमिक काउंसिल योग पर आधारित पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय के भगवाकरण के तौर पर देखते हुए नकारता रहता है क्योंकि उस काउंसिल में वामपंथियों का वर्चस्व है, तो फिर एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल कोई नियम बना कर, उसे लागू करना चाहती है तो समस्या क्या है?

मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि जब सीवी में कोई समस्या नहीं है तो इसे अपने सम्मान पर लेने जैसी कौन सी बात हो गई? सीवी माँगने की बात पर जेएनयू के शिक्षक समूह ने इसे दिल पर लेते हुए कहा है कि इस तरीके से विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोमिला थापर को नीचा दिखाने की कोशिश की है और अपमान किया है। साथ ही, वो यहाँ तक कह बैठे कि प्रशासन को माफी माँगनी चाहिए।

अपनी पत्नी की हत्या का आरोप झेल रहे शशि थरूर ने बताया कि देश के इंटेलेक्चुअल्स का अपमान हो रहा है और ये बहुत ही बुरी बात है कि उनसे सीवी माँगी गई है। रवीश कुमार ने करीब तीन एकड़ लम्बी पोस्ट लिख कर ट्रेडमार्क धूर्तता से बताया कि देश के युवाओं के साथ क्या-क्या गलत हो रहा है। उन्होंने बताया कि देश के युवा मुर्दा हो चुके हैं और उनकी सियासी समझ थर्ड क्लास हो चुकी है। ये बताना रवीश जी भूल गए कि ये सियासी समझ की पाठशाला करोड़ों रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपित प्रणय रॉय के कुलपतित्व में चलने वाली रवीश कुमार यूनिवर्सिटी ऑफ सियासी साइंसेज के व्हाट्सएप्प कैम्पस में चलती है या फिर वो सोचते हैं कि वो जिसे थर्ड क्लास कह देंगे, वो वैसा हो जाएगा।

रवीश कुमार की पीड़ा या फिर घमंड?

बात यह है कि रवीश ‘मैं मनीला जा रहा हूँ’ कुमार स्वयं में इतने डूब चुके हैं कि वो जेएनयू के वीसी पर थीसिस चुरा कर वीसी बनने का इशारा भी कर दिया। उन्होंने रोमिला थापर की किताबों की बात तो की लेकिन उसी इंटरनेट पर जेएनयू के वीसी के किताबों और शोधपत्रों का नाम नहीं पढ़ सके क्योंकि उसकी क्या ज़रूरत है।

रवीश जी नहीं पढ़ेंगे क्योंकि डॉ जगदीश कुमार ने अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य पर नहीं लिखा, उन्होंने फलाँ बात पर किताब नहीं लिखी जिससे अंग्रेजी का ज्ञान भी बढ़ता है। ये बात और है कि डॉ जगदीश ने आईआईटी मद्रास से पीएचडी की है, और वाटरलू यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रिकल और कम्प्यूटर इंजीनियरिंग से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च किया। साथ ही, वो आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर भी हैं। इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण और ख्यातिप्राप्त पदों से जुड़े रहे हैं और शैक्षणिक कार्यों के लिए विशेषणों से सराहे गए हैं।

रवीश जी को इसमें रूचि नहीं होगी क्योंकि वो एक लाइन में उन्हें चोर बता गए कि आजकल थीसिस चुरा कर लोग वीसी बन जाते हैं। रवीश लिखते हैं कि जब वीसी को रोमिला थापर की सीवी मिलेगी तो वो देख पाएँगे कि कोई रोमिला थापर कैसे बनता है। जैसे कि प्रोफेसर जगदीश कुमार को मोदी ने नागपुर में पेड़ों पर संतरा गिनते देखा था और दस तक की गिनती सही पाने पर जेएनयू का वीसी बना दिया।

रवीश कुमार जैसों की यही करतूत इन्हें लगातार पब्लिक डिस्कोर्स से बाहर करती जा रही है, लोग इन्हें गम्भीरता से नहीं लेते। रवीश जी, आप मनीला में हैं, आपको मैग्सेसे अवार्ड मिला है, गले में मेडल ज़रूर पहनिए, लेकिन ध्यान रहे कि प्रोफेसर रोमिला को महान बताने के लिए प्रोफेसर जगदीश कुमार का हीन होना आवश्यक नहीं है।

प्रोफेसर जगदीश नैनोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, नैनोस्केल डिवाइस मॉडलिंग और सिमुलेशन, इनोवेटिव डिवाइस डिजाइन और पावर सेमिकन्डक्टर डिवाइसेज पर काम करते हैं। लेकिन मैं भी आप ही की तरह आपको नीचा दिखाने के लिए, आपके ही अंदाज में यह कह सकता हूँ कि रवीश के लिए सेमीकंडक्टर और बस कंडक्टर एक ही बात है, तो वो क्या जाने जगदीश कुमार क्या हैं। और हाँ रवीश जी, प्रोफेसर जगदीश ने इन विषयों पर 200 से ज्यादा पेपर पब्लिश किए हैं।

सुरखाब के पर अगर लगे हैं, तो वो कहाँ हैं?

आखिर रोमिला थापर से सीवी क्यों न माँगी जाए? इसे ऐसे क्यों दिखाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय ने रोमिला थापर के ऊपर कोई परमाणु हथियार डेटोनेट कर दिया है? लिबरपंथी और वामपंथी क्षुब्ध क्यों हैं? रोमिला थापर ने जो इतिहास लिखा है उस पर सम्यक चर्चा होने पर पता चलता है कि उन्होंने कल्पनाशीलता के आधार पर तथ्य बना दिया। बच्चों की किताबों में इतिहास पहुँचाने वाली रोमिला थापर से यह पूछा जाना चाहिए कि भारत के अनेकों राजाओं और राजवंशों के इतिहास को चंद पन्नों में समेटने के पीछे, और इस्लामी आतंकियों के परपोतों के प्रेमसंबंधों तक को पढ़ाने और अंग्रेजों के पापों को सामान्यीकृत करने के पीछे क्या उद्देश्य रहा होगा?

इन रामचंद्र गुहा और थापर जैसों से पूछना चाहिए कि जिस गजनवी ने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किया था उसके हिम्मत की दाद देने वाली, कभी न हार मानने वाली बात को हमें बचपन में क्या सोच कर पढ़ाया जाता रहा? क्या अपने ही देश पर सत्रह बार आक्रमण कर, मंदिर लूटने वाले, गाँव जलाने वाले, बलात्कारी और आतंकी लुटेरे को भारत के बच्चे प्रेरक कहानी मान कर पढ़ें कि देखो वो तुम्हारे पूर्वजों का बलात्कार करने के लिए, तुम्हारे मंदिर तोड़ने के लिए सत्रह बार तक प्रयासरत रहा… इसका जवाब कौन देगा?

इन्होंने जो ‘सभ्यता’ की परिभाषाएँ दी हैं, भगत सिंह जैसे बलिदानियों और आजादी के क्रांतिवीरों को बागी और आतंकी तक कहा है, वो इसी गिरोह के तो लोग हैं। उसे रोमिला थापर ‘कॉन्टेक्स्ट’ याद दिलाती हैं लेकिन यह भूल जाती हैं कि ये इतिहास हमारा है, अंग्रेज़ों को पढ़ाने के लिए नहीं है। इनको इतनी इज्जत आखिर क्यों कि सीवी माँग लिया तो ऐसे बात हो रही है जैसे अब तो कयामत आएगी और कब्रों से लाशें निकलकर सड़कों पर पैदल चलने लगेंगी!

फिर तो एक दिन प्रधानमंत्री कहे कि वो संविधान की शपथ क्यों लेगा वो तो चुन कर आया है। राष्ट्रपति बोले कि वो तो राष्ट्रपति है वो बस चिल करेगा और उससे कोई सवाल नहीं पूछेगा! अरे सीवी माँगा है, किडनी निकाल कर देने को नहीं कहा है!

‘विद्या ददाति विनयम्’ पढ़ कर हम बड़े हुए हैं। अंग्रेजी में कहते हैं कि नॉलेज से ह्यूमिलिटी आती है। आदमी विनम्र हो जाता है। ये कैसी विद्या है कि किसी विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार, एक तय उम्र जिसमें बहुत सारे लोग पढ़ाने के काबिल नहीं रह जाते, उनका स्वास्थ्य गिर जाता है, उनसे सीवी माँगा गया तो प्रोफेसर एमेरिटा होने का ऐसा दंभ कि आप बिफर गए!

आप तो बिफरे ही, साथ ही एक पूरा गिरोह पागल हो गया कि अब तो आने वाला जलजला उसकी आइसक्रीम पिघला देगा इसलिए प्रोफेसर जगदीश की ऐसी की तैसी! क्या एक प्रोफेसर एमेरिटा को यह शोभा देता है कि वो इस छोटी सी बात को, एक यूनिवर्सिटी के नियमों को धता बताते हुए ईगो पर ले ले कि तुम्हारी औकात क्या है कि तुमने रोमिला थापर से सीवी माँग ली!

ये प्रोपेगेंडा है जो ऐसे ही तिल का ताड़ बनाता है

ये बिलकुल भी नई बात नहीं है। ये प्रोपेगेंडा का तंत्र है जो इसी निश्चित तरीके से काम करता है। एक बहुत छोटी सी बात को यह ऐसे दिखाता है मानो हम तानाशाही में जी रहे हों और हर बात मोदी के इशारे पर हो रही है। सीवी माँग कर कोई किसी को कैसे अपमानित कर सकता है? इस बात पर अपमानित होना या न होना तो हमारे हाथों में है। इस बात को इतनी तूल आखिर क्यों दी गई?

वो इसलिए कि पिछले सात-आठ सालों से संघर्षरत वामपंथी-लिबरपंथी समूह को एक भी वैसी बात नहीं दिखी जिसे यह भुना सकें। इनके सारे प्रपंच समय के साथ एक्सपोज होते रहे और लोग सत्य को सामने लाते रहे। चाहे वो असहिष्णुता वाली बातें हो, चाहे वो बीफ को लेकर कथित तौर पर हुई हत्याएँ हों, कथित अल्पसंख्यकों की लिंचिंग हो, वंदे मातरम न कहने पर पीटने की बातें हों, या जय श्री राम के नारे को आतंकी बनाने की जिद, इनका एक भी अजेंडा सत्य के सामने टिक नहीं सका।

फिर भी, जब लड़ाई महीनों की नहीं, सालों की नहीं, दशकों को रेंज में लेकर लड़ी जा रही हो तो हर टॉम-डिक-हैरी के नाखून टूटने की खबर को खबर बनाया जाता है। पत्रकार मनीला जाते-जाते अपनी जिम्मेदारी निभा लेता है। नेता सक्रिय हो कर बताने लगते हैं कि भारत में तो बुद्धिजीवियों की कोई कद्र ही नहीं है। उसके बाद उदारवादी विचारधारा के कट्टरपंथी समर्थक यह कहने लगते हैं कि देश में तो आपातकाल है और तानाशाही हो रही है।

विचारधाराओं की लड़ाई के इस दौर में सजग हो कर, तथ्य से, सही सूचना के साथ बात रखने की जरूरत है। सही सवाल उठाने की जरूरत है कि कोई भी प्रोफेसर इतना बड़ा नहीं होता कि वो विश्वविद्यालय से ही बड़ा हो जाए। ये जानने की जरूरत है कि नियम सबके लिए हैं और जब तक वो सामान्य बुद्धि-विवेक के तर्कों से परे न हों, उसका सम्मान करना आवश्यक है।

प्रोपेगेंडा को काटना ज़रूरी है। वरना यही रवीश कुमार जुनैद को बीफ के कारण शहीद बना देता है, लेकिन सत्य सामने आने पर नहीं बताता कि उसकी हत्या सीट के लिए हुई एक झड़प का दुर्भाग्यपूर्ण अंत थी। बीफ की माला जपने वाला यही रवीश कभी भी एक लाइन नहीं बोल पाता कि 2018 के बाद से कितने हिंदुओं को बीफ तस्करी में संलिप्त लोगों ने मौत के घाट उतार दिया। यही रवीश जो पाताल तक जा कर हर घटना को कम्यूनल बना कर, उसके फूफा के मौसे के पोते के भाई का भाजपा कनेक्शन निकाल लाता है, वो बार-बार झूठी हेट क्राइम की खबरें बनवाने या काँवड़ियों पर लगातार हो रही पत्थरबाजी पर नहीं बोल पाता।

इसीलिए, चाहे वो रवीश कुमार हों या पूरा वामपंथी गिरोह, इनसे सवाल पूछते रहिए कि इनसे 1984 के दंगों की बात नहीं पूछ रहे हम, हम पूछ रहे हैं कि हिन्दुओं की हत्या पर, मंदिरों को तोड़ने पर, विसर्जन के जुलूस पर पत्थरबाजी करने पर, काँवड़ियों पर होने वाले हमलों पर, हिन्दुओं की दूसरे मजहब वालों द्वारा मॉब लिंचिंग पर, मेरठ से पलायन करते हिंदुओं की कहानी पर… इन सब पर आपने कब बोला?

रोमिला थापर की सीवी तो कोई मुद्दा है ही नहीं। सीवी तो एक कागज का टुकड़ा होता है, उससे रोमिला थापर के कथित सामाजिक या अकादमिक उपलब्धियों पर धब्बा नहीं लगता, उनके स्टेटस को धक्का नहीं पहुँचता। लेकिन इसे ऐसे दिखाना कि सरकार के साथ मिल कर जेएनयू प्रशासन तबाही मचाने पर तुली हुई है, और इससे तो विश्वविद्यालय ही बर्बाद हो जाएगा, ये तो अलग लेवल का प्रपंच है। आप बस ये सवाल अपने आप से पूछिए कि इससे विश्वविद्यालय कैसे बर्बाद हो गया? जवाब मिले तो ज़रूर बताएँ।

प्रोपेगंडा पोर्टल के संस्थापक को कॉन्ग्रेस ने दी डेटा सेल की कमान, पहले मानती थी ‘मोदी का आदमी’

कॉन्ग्रेस पार्टी ने प्रोपेगंडा पोर्टल के संस्थापक ट्रस्टी को अपने डेटा सेल का का अध्यक्ष बनाया है। कॉन्ग्रेस ने ऐलान किया है कि प्रवीण चक्रवर्ती को पार्टी के ‘टेक्नोलॉजी एवं डेटा सेल’ का अध्यक्ष बनाया गया है। चक्रवर्ती प्रोपेगंडा पोर्टल इंडियास्पेंड के फाउंडिंग ट्रस्टी हैं। आपको बता दें कि फ़र्ज़ी फैक्ट चेक कर के अपने आप को न्यूज़ वेबसाइट कहने वाले पोर्टल ‘फैक्ट चेक इंडिया’ भी इंडियास्पेंड का ही एक भाग है।

इंडियास्पेंड के बारे में बता दें कि हाल ही में इसका एक पत्रकार पीड़ितों को बरगलाने की कोशिश में धरा गया था। बेगूसराय में एक महादलित परिवार को मुस्लिमों द्वारा परेशान किया जा रहा था। महिलाओं से बलात्कार तक की कोशिश की गई और घर के पुरुष सदस्यों को पीटा गया। जब मामला प्रकाश में आया तो इंडियास्पेंड के पत्रकार ने पीड़ित से जबरदस्ती यह कबूलवाने की कोशिश की कि यह एक सांप्रदायिक मामला नहीं है।

प्रवीण चक्रवर्ती इससे पहले भी कॉन्ग्रेस डेटा सेल में रह चुके हैं। इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव के दौरान उन पर तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को ग़लत जानकारियाँ देने का आरोप लगा था। कॉन्ग्रेस का तो ये तक सोचना था कि प्रवीण चक्रवर्ती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदमी हैं, जिन्हें जानबूझ कर कॉन्ग्रेस को हराने के लिए प्लांट किया गया है। कॉन्ग्रेस ने अपने डेटा एनालिटिक्स डिपार्टमेंट को डेटा सेल बना कर वापस लाया है।

अब फिर से प्रवीण की वापसी यह बताती है कि प्रोपेगंडा पोर्टलों और ऐसे पोर्टलों को चलाने वाले लोगों के सहारे कॉन्ग्रेस ग़लत नैरेटिव बना कर चुनाव जीतना चाहती है।