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GDP से क्या होता है? क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? (भाग 1)

जब हम ‘रिसेशन’, ‘जीडीपी’, ‘बैंकिंग क्राइसिस’, ‘लेंडिंग-बॉरोइंग’ आदि शब्द सुनते हैं तो दिमाग घूम जाता है, क्योंकि इन शब्दों को हमारे जानकारों ने कभी भी सीधे तरीके से, आम आदमी की भाषा में समझाया ही नहीं। जब परिभाषा ही नहीं पता, और बाते फिर इन शब्दों के नाम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था के ऊपर-नीचे होने की हो रही हो, तो फिर आम आदमी मानने लगता है कि कुछ तो बुरा या अच्छा हो ही रहा है। उसे यह पता नहीं चलता कि आखिर ये ‘बुरा’ या ‘अच्छा’ है क्या। वह बस मान लेता है, क्योंकि उतने पर ही उसका वश है।

पहले रिसेशन की बात करें, जिसे हिन्दी में मंदी का दौर कहते हैं। यह दौर अगर थोड़ा लम्बा चले तब उसे खतरनाक मान सकते हैं। जैसे कि अगर जीडीपी, जो कि पूरे देश का एक तरह से मूल्य कह सकते हैं, अगर लगातार घटने लगे, या उसकी वृद्धि रुक जाए, या कम हो जाए, और साल भर ऐसे ही रुकी या घिसटती रहे तो कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था में ‘मंदी’ आ गई है। और सरल शब्दों में कहा जाए तो इसे ऐसे देखिए कि आपके घर की हर वस्तु का मोल, आपके खेत का मोल, मवेशियों का मूल्य, आप जो कमाते हैं वो पैसा, यानि कि घर और परिवार की सारी चल और अचल संपत्ति के साथ आपके कौशल से आने वाले पैसों का मूल्य आपकी जीडीपी कही जाएगी।

हर साल आपकी जमीन, मवेशी और घर का मूल्य बढ़ता है, आपकी सैलरी भी बढ़ती है। इसे मानिए कि आपकी जीडीपी बढ़ रही है। लेकिन ये हमेशा एक तय तरीके से नहीं बढ़ती। कभी बाढ़ आने से आपकी जमीन डूब गई और खेती नहीं हुई, या घर में चोरी हो गई, या फिर आपकी कम्पनी ने अच्छा लाभ नहीं कमाया तो आपकी सैलरी में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई; कुल मिला कर जहाँ आपके बढ़ने की गति पिछले साल दस थी, अब आठ हो गई। फिर अगले तीन महीने कुछ और दिक्कत हो गई, आपकी गाड़ी खराब हो गई तो उसमें पैसे गए। गाय ने दूध देना कम कर दिया क्योंकि गर्मी बढ़ गई और चारे का इंतजाम नहीं हो पाया। उस तीन महीने आपकी जीडीपी की वृद्धि में फिर गिरावट आई। यही गिरावट अगर हर तीन महीने (तिमाही) पर जारी रहे, तो आपको सोचना पड़ेगा कि क्या किया जाए- नई नौकरी लें, किसी से ज्यादा जमीन लेकर खेती शुरू कर दें, या कुछ बेच कर कुछ और खरीदें, जिससे मुनाफा कमा सकें।

राष्ट्र के संदर्भ में भी कुछ यही होता है। अगर हर चौथाई साल या क्वार्टर, यानि तिमाही, में यह दर गिरती रहे, तब कहते हैं कि मंदी का दौर है। इस बात पर भी गौर कीजिए कि बढ़ अभी भी रही है, बस उसकी गति कम हो गई है। यानि सीधे तौर पर नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन भविष्य में अगर कुछ नहीं किया गया तो होने वाले फायदे में कमी के कारण नुकसान होगा। इसलिए अभी की ग्रोथ रेट, यानि वृद्धि दर, को सही करने के लिए सरकार को कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। ये कदम क्या होंगे, उस पर चर्चा थोड़ा आगे जाने पर।

मनमोहन सिंह की कारगुजारी और उसके नुकसान

मनमोहन सिंह किसी तरह राज्यसभा में पहुँच गए हैं और अर्थव्यवस्था पर ज्ञान दिए जा रहे हैं। देना भी चाहिए क्योंकि ऑक्सफोर्ड से पढ़े हुए हैं। मनमोहन सिंह कहते हैं कि मोदी की नीतियों ने भारत को इस स्थिति में पहुँचाया है। लेकिन आँकड़े इस दावे के उलट कुछ और ही कहानी कहते हैं।

याद कीजिए 2008 का वह दौर, जब वैश्विक मंदी से पूरा विश्व जूझ रहा था। तत्कालीन भारत सरकार ने, यानि अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह जी ने, उस मंदी के असर से भारत को बचाने के लिए कुछ त्वरित उपाय किए। अब सवाल यह है कि मंदी से बचाने के उपाय क्या हैं?

मंदी के दौर में एक तो पूरी इकॉनमी धीमी होती ही है, दूसरी बात यह होती है कि आम आदमी इस डर से खर्च करना बंद कर देता है कि भविष्य में बुरा दौर आने वाला है तो बचाना ज़रूरी है। यानि वो बाहर खाना खाने में कमी करता है, सिनेमा नहीं देखने जाता, ऑटो या टैक्सी की जगह बस या मेट्रो से चलने लगता है, कपड़े कम खरीदता है, महंगा भोजन घर में कम बनवाता है। इससे इकॉनमी और मंद हो जाती है क्योंकि धीमी अर्थव्यवस्था को चलायमान रखने के लिए लोगों को पैसा खर्च करना होता है- वो खर्च नहीं करेंगे तो रेस्तराँ, सिनेमा, कमर्शियल गाड़ियाँ चलाने वाले लोगों का व्यवसाय कम होता है। यानि एक बार ‘मंदी’ की खबर फ़ैल जाने पर आम आदमी की सतर्कता मार्केट को और ‘मंदा’ करने लगती है।

फिर सरकार क्या करे? सरकार के सामने एक विकल्प होता है कि अपनी योजनाओं के माध्यम से लोगों तक पैसे पहुँचा दो। दूसरा तरीका है कि बैंकों को कहो कि लोगों को लोन दें, व्यापारियों को लोन दें, कम ब्याज दर पर दें। दोनों ही समाधान हालाँकि त्वरित होते हैं, लेकिन इनसे लोगों के हाथ में पैसा पहुँचता है, लोगों के बीच ‘सेंटिमेंट’ अच्छा बनता है और वो हाथ में आए पैसे को खर्च करना शुरू करते हैं।

यूँ तो यह प्रक्रिया और भी जटिल है, लेकिन मोटे तौर पर इसे ऐसे ही समझिए कि बैंक व्यवसाय करने वालों को पैसा देगी तो वो व्यवसायी उसे फैक्ट्री लगाने से लेकर छोटी कम्पनियों को खरीदने, अपने बिजनेस को बढ़ाने में लगाएँगे, जिससे रोजगार बढ़ेगा, लोगों को सैलरी मिलेगी, सैलरी से डिमांड बढ़ेगी और दूसरे उद्योगों पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा। साथ ही, अगर आपकी ग्रोथ रेट सही होगी तो बाहर से निवेश आने के भी मौके बेहतर होने लगते हैं।

इस दौर में मनमोहन सिंह की सरकार ने यही क्विक-फिक्स अपनाया कि थोड़े समय के लिए इकॉनमी सुधर जाए लेकिन लम्बे दौर में उसका असर दोबारा दिखने लगा है। होता यह है कि लोगों के पास आपने पैसे तो दे दिए, लेकिन उन्हें इस योग्य नहीं बनाया कि वो आगे भी पैसे कमाते रहें। आपने ईएमआई पर उसे गाड़ी दिलवा दी, तो ऑटो सेक्टर सही चल गया। लेकिन उस गाड़ी को वो चला भी नहीं पा रहा, क्योंकि आगे ईएमआई और ईंधन का पैसा कौन देगा? उसी तरह मनरेगा से, या फूड सिक्योरिटी एक्ट से, लोगों के खाने-पीने का इंतजाम तो हो गया लेकिन उनके लिए लगातार चलने वाला कोई काम नहीं मिला।

अंततः, इसका असर कुछ ऐसे हुआ कि लोगों के पास से पैसे फिर खत्म हो गए। आपने उसे मछली पकड़ना सिखाने की जगह मछली पकड़ कर दे दी। वो रात को मछली खा कर सो गया, और अगली सुबह फिर भूखा है। आपने वहाँ पहले स्किल डेवलप करने की जगह उसे सीधा इनाम दे दिया, पीठ ठोक दी और कहा ऐश करो। एक पूरी पीढ़ी बिना किसी खास स्किल के, सस्ते दरों पर गेहूँ-चावल पा कर, अपने आप को किसी लायक नहीं बना पाई क्योंकि आपने उसे पंगु और लाचार बनाए रखा। क्योंकि जब अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और हार्वर्ड के पढ़े इकॉनमिस्ट अर्थव्यवस्था की बैंड बजाते हैं तो फिस्कल डेफिसिट का ख्याल नहीं करते। इसकी चर्चा आगे होगी।

बैंकिंग क्राइसिस और मनमोहन सिंह का दौर

एक आँकड़ा देखिए कि आजादी के बाद से लेकर साल 2008 तक, देश के बैंकों ने 18 लाख करोड़ रुपए की राशि ही लोन के तौर पर दी थी। लेकिन 2008 के बाद के 6 वर्षों में ये राशि बढ़कर 52 लाख करोड़ रुपए हो गई। 2008 का साल इसलिए जरूरी है क्योंकि इसी साल ‘रिसेशन’ आया था और भारत सरकार ने उसी साल से आने वाले समय के लिए नई क्राइसिस की नींव रख दी थी।

रिसेशन का चक्र होता है, और हर व्यवसाय की तरह यह आता और जाता रहता है। कई बार मंदी के दौर में आपकी नीतियों का हाथ नहीं होता, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में नकारात्मक असर होने से, आपकी इकॉनमी भी उसका प्रभाव झेलती है। जैसे कि अभी अमेरिका और चीन लड़ रहे हैं, तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। एप्पल और एमेजॉन जैसी कम्पनियाँ अब चीन से फैक्ट्री हटा कर भारत में लगाएँगी। लेकिन वो होने में समय है। उसी तरह, जब दो आर्थिक शक्तियाँ ऐसे उलझती हैं तो पूरे विश्व में एक चिंता का माहौल उपजता है, बड़ी कम्पनियाँ सोच में पड़ जाती हैं कि वो निवेश करें तो कहाँ करें, या इंतज़ार करें कि दो राष्ट्र अपनी नीतियाँ सही कर लें।

जब यही रिसेशन लम्बा खिंच जाता है तो उससे निपटने के लिए सरकार को या तो नीतियों में बदलाव करना होता है, या इंतज़ार कर उसका झटका सहन करते रहना होता है- या फिर कोई त्वरित समाधान दे कर अगले साल होने वाले चुनावों पर नजर रखनी होती है। मनमोहन सिंह के सलाहकारों ने चुनाव को देखते हुए 2008 के बाद एक ऐसी कमाल की युक्ति लगाई कि उनके पाप मोदी को धोने पड़ रहे हैं। जब बैंको ने 52 लाख करोड़ बाँट दिए और उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा उसके पास वापस नहीं आया, तो बैंकों का व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ। बड़े व्यापारियों को लोन मिला मनमोहन काल में, रिकवरी के लिए गारंटी की कोई व्यवस्था नहीं, भागा वो मोदी काल में क्योंकि रोकने का कोई कानून ही नहीं था, और कटघरे में खड़ा होता है मोदी।

बैंकों के एनपीए बढ़ने से क्या होता है?

हर बैंक के पास अपनी पूरी पूँजी का एक तय प्रतिशत ही लोन के तौर पर देने का प्रावधान होता है। जैसे कि आपकी पूँजी सौ रुपए है, तो आप ₹40 तक लोगों को उधार दे सकते हैं। अब देखिए कि कोई माल्या या नीरव मोदी टाइप का आदमी आपसे बीस रुपया लेता है, और आपके पास अगले साल वो पैसा वापस नहीं आता, तो आपकी कुल जमा पूँजी बचती है 80 रुपए। तो इस साल आप सिर्फ 32 रुपए ही लोन पर देने के योग्य हैं। ऐसे ही आप अगले साल भी रिकवर नहीं कर पाते तो, आपका व्यवसाय डूबने लगता है। इसी से बैंकिंग में समस्या आती है और फिर वो लोगों को लोन देने की अवस्था में नहीं होते।

अब लोन नहीं मिलेगा तो नए लोग रोजगार नहीं बिठा सकते, घर बनाने में समस्या आ सकती है, कार खरीदने में दिक्कत हो सकती है। यानि कि बैंक के पास पैसे की कमी होती है, और वो इस बात से भी डरते हैं कि अगर वापस लोन दें, और रिकवरी न हो, तो फिर वो डूब जाएँगे। मतलब आम आदमी के हाथ में पैसे आने के स्रोत खत्म।

फिर आती है सरकार पिक्चर में। सरकार चाहे तो लोगों में पैसे बाँट दे। नई योजनाएँ बनाए, गरीबों के हाथ में जीने के लिए पैसे दे, बैंकों को इसलिए पैसे दे कि उनकी पूँजी बढ़े तो व्यापारियों को लोन दें। इससे अर्थव्यवस्था सही हो जाए। तो इसमें बुरा क्या है?

बुरा यह है कि जिस मनमोहन सिंह की सरकार में 2007-08 में देश की आमदनी और देश के खर्चे का अंतर, यानि फिस्कल डेफिसिट, जीडीपी का 2.5% था, वो अगले साल अचानक से 2008-09 में 6.2% और यूपीए-द्वितीय के पहले साल 2009-10 में 6.6% तक चला जाता है। यानि कमा रहे हैं 100 और खर्चा हो रहा है 107 रूपया। मनमोहन सिंह ने जो ये कदम उठाए उसे पाटने में अरुण जेटली तक आते-आते दो साल और लग गए।

आँकड़ों की बात करें तो 2010-11 में फिस्कल डेफिसिट 4.7% पर पहुँचा लेकिन अगले ही साल 2011-12 में यह वापस 6% की तरफ जाने लगा और 5.9% पर पहुंच गया। फिर, 2012-13 में यह 4.9% तक गिरा, 2013-14 में और गिर कर 4.5% हुआ। इसके बाद, 2014-15 में मोदी सरकार के एक साल में यह सामान्य टार्गेट के आस-पास पहुँचा जब यह फिस्कल डेफिसिट 4% से होते हुए, 2015-16 में 3.9%, और 2016-17 3.5% पर पहुँचा। ध्यान रहे यह वही साल था जब नोटबंदी हुई थी, और टैक्स कलेक्शन बढ़ने लगा था। भारत सरकार ने फिस्कल डेफिसिट का सामान्य टार्गेट 3.5% रखा है।

मोदी सरकार अगले साल 2017-18 में इस डेफिसिट को टार्गेट के पास 3.5% लाते हुए, अगले साल और नीचे करते हुए 3.4% पर ले आई। यह सब तब संभव हुआ जब पूरे देश में लगातार ढाँचागत काम चल रहे थे, बुलेट ट्रेन जैसी योजनाओं पर पैसे लग रहे थे, और आयुष्मान योजना जैसी लोककल्याणकारी योजना में बजट का बड़ा हिस्सा जा रहा था। भले ही, विरोधी इन सारी बातों को खारिज कर दें, लेकिन आँकड़े झूठ नहीं बोलते।

यह बात भी सत्य है कि इस वित्तीय वर्ष के पहले क्वार्टर में ही फिस्कल डेफिसिट के टार्गेट का 77% जा चुका है, जो कि बेशक चिंताजनक है, और यह अगली तिमाही में बहुत कम हो जाए इसकी आशा भी कम ही है। लेकिन, रिसेशन सिर्फ एक तिमाही की मंदी से नहीं आता। सरकार ने पिछले कुछ समय में अपने कुछ फैसलों से भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिससे बाजार का सेंटीमेंट बुरा हुआ है और बिजनेस करने वाले असमंजस की स्थिति में हैं कि पैसा लगाएँ या नहीं। लेकिन, पिछले सप्ताह वित्त मंत्री ने उसमें सुधार लाने के लिए कुछ फैसलों को पलटा है, तो यह तय है कि सरकार इससे निपटने के लिए सक्रिय है।

वापस बात बैंकों और गैर-बैंकिंग वाले वित्तीय संस्थाओं की

बैंकिंग पर हमने देख लिया कि बैंक के पास अपनी पूँजी का एक तय हिस्सा ही लोन पर देने के लिए होता है, लेकिन NBFC (नॉन-बैंकिंग फायनेंशियल कम्पनी) का मुख्य कार्य ही लोन देना होता है। इन संस्थाओं को इसलिए बनाया गया ताकि व्यापारियों को बड़े लोन लेने में समस्या न हो। बैंकों पर लोन देने की सीमा होती है क्योंकि उसमें आम आदमी के पैसे होते हैं। अगर बैंक सारा पैसा लोन में दे कर डूब जाए तो आम लोगों के पैसे भी डूब जाएँगे जिससे विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

इससे बचने को लिए NBFC का प्रावधान आया कि व्यवसायों को लोन देने के लिए ये कम्पनियाँ उनकी संपत्ति या पुराने रिकॉर्ड देख कर तय करे कि कितना लोन देना है, किस दर पर देना है, और कैसे वापस लेना है। इससे व्यापार चलता रहता है, नए लोग बिजनेस करते हैं, या पुराने लोग नए बिजनेस में घुसते हैं। इन कम्पनियों में रिस्क लेने की क्षमता ज्यादा होती है, तो बड़े लोन देने में ये आगे होतीं हैं।

इसमें भी क्राइसिस आ गई, क्योंकि लोग लोन लेकर या तो भाग गए, या उनका व्यापार उस तरह से नहीं चला, जैसा इन्होंने सोचा था। वापस 2008 में जाते हैं जहाँ बाजार में डिमांड क्रिएट करने के लिए सरकार ने बैंकों को पैसे देने शुरु किए ताकि रिसेशन से मुक्ति मिल सके, और चुनाव तक सेंटीमेंट खराब न हो। अगले छः सालों में 52 लाख करोड़ रुपए बैंकों ने लोन में दे दिए।

अब हुआ यह कि बिजनेस करने वालों के पास पैसे आए, उन्होंने फैक्ट्री लगाई। फैक्ट्री का प्रोडक्शन इस उम्मीद में ज्यादा रखा कि लोग खरीदेंगे। इससे सप्लाई में वृद्धि हुई, लेकिन डिमांड उतनी ज्यादा नहीं बढ़ी। जैसे कि टाटा ने जैगुआर को खरीद लिया, लेकिन उसकी कारें भारत में खरीदने वाले बहुत कम थे। बहुत कम इसलिए थे क्योंकि सरकार ने लोगों को चीजें खरीदने योग्य बनाने की जगह उन्हें लोन और ईएमआई उपलब्ध कराने पर ज्यादा जोर दिया।

इससे बिजनेस करने वालों को वांछित लाभ नहीं मिला और वो NBFC या बैंक से लिए लोन चुकाने में अक्षम रहे। यानि कि अब यही बैंकिंग और नॉन-बैंकिंग कम्पनियाँ अगले साल कम लोगों को लोन देगी, फिर डिमांड सही नहीं हुई, तो फिर रिकवरी नहीं हो पाएगी। इसका मतलब यह हुआ बैंकों का घाटा बढ़ता जाएगा। फिर वो स्थिति आएगी जब आप सारे कागज जुटा लेंगे, और वही बैंक आपको लोन नहीं देंगे जो पिछले साल फोन कर-कर के आपको पागल कर रहे थे। स्थिति बदल चुकी थी, क्योंकि बैंक लगातार घाटे में जा रहे थे।

यह परिस्थिति मोदी सरकार की देन नहीं है, बल्कि इसमें बैंकों ने अपने रिस्क पर अपना पैसा डुबाया है। जब आप बड़े लोन देते हैं तो आपके पास उसे वापस पाने के तरीके होने चाहिए। परसों एक रिपोर्ट आई कि बैंकों में फ्रॉड 74% बढ़ गया है, लेकिन यह बात आधा सत्य है। बैंकों में फ्रॉड की रिपोर्टिंग बढ़ी है क्योंकि पहले बैंक अपने व्यवसाय को सही दिखाने के लिए इस तरह के फ्रॉड को रिपोर्ट ही नहीं करते थे। अब रिजर्व बैंक ने सख्ती की है तो यह संख्या बढ़ गई है।

अगले हिस्से में पढ़िए प्राइवेट सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और समाधानों के बारे में

ITR फाइल करने वालों ने रचा इतिहास, 31 अगस्त को फ़ाइल हुए रिकॉर्ड 49 लाख से ज्यादा ITR

आयकर विभाग ने एक दिन में सबसे ज्यादा इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का नया रिकॉर्ड बनाया है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के अनुसार, शनिवार 31 अगस्त को रिकॉर्ड 49,29,121 आईटीआर फाइल हुए। CBDT के मुताबिक हर सेकेंड अधिकतम 196 आईटीआर। अगर पीक फाइलिंग दर प्रति मिनट की बात करें तो यह संख्‍या 7447 थी और हर घंटे अधिकतम 3,87,571 आईटीआर फाइल किए गए।

शनिवार अगस्त 31, 2019 को आयकर रिटर्न (ITR) फाइल करने का आखिरी दिन था। इससे पहले ITR फाइल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई थी, जिसे बाद में एक महीने के लिए बढ़ा दिया गया था। वित्तीय वर्ष का इनकम टैक्स रिटर्न 31 जुलाई तक दाखिल करना अनिवार्य होता है।

सोशल मीडिया में चल रही है आईटीआर फाइल करने की मियाद बढ़ने की अफवाह

ITR फ़ाइल करने की तारीख बढ़ने की अफवाहों को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने खारिज करते हुए कहा था कि इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की अंतिम तारीख में कोई बदलाव नहीं हुआ है। यह 31 अगस्त 2019 ही है।

CBDT ने कहा कि करदाताओं को इस समयसीमा में अपना रिटर्न फाइल करना चाहिए। सोशल मीडिया में आईटीआर फाइल करने की मियाद बढ़ने की खबर अफवाह है। सीबीडीटी ने शुक्रवार को अपने ट्विटर हैंडल पर यह जानकारी दी थी। इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की अंतिम तारीख को लेकर सोशल मीडिया पर एक झूठा मैसेज तेजी से वायरल हो रहा था। इसके बाद सीबीडीटी ने इस बारे में स्थिति स्पष्ट की।

31 अगस्त के बाद देनी होगी पेनल्टी

अगर आपने 31 अगस्त तक रिटर्न फाइल नहीं किया तो आपको पेनाल्टी देनी होगी। समय सीमा खत्म होने के बाद 31 दिसंबर तक रिटर्न फाइल करने पर 5,000 रुपए पेनाल्टी भरनी होगी। जबकि दिसंबर के बाद रिटर्न फाइल किया तो 10,000 रुपए जुर्माने के तौर पर वसूले जाएँगे।

आईटीआर नहीं भरने पर तीन महीने से दो साल तक की जेल हो सकती है। अगर इनकम टैक्स का बकाया 25 लाख रुपए से ज्यादा है तो 7 साल तक की जेल हो सकती है।

जहाँ दर्द, वहीं सुई: फ़र्ज़ी डॉक्टर खलील अहमद गिरफ़्तार, 5वीं फेल लगा रखा था MBBS/MS का बोर्ड

मध्य प्रदेश में एक ऐसे फ़र्ज़ी डॉक्टर को गिरफ़्तार किया गया है, जो पाँचवीं फेल है। यहाँ तक कि उसे एमबीबीएस का फुल फॉर्म तक नहीं पता। जबकि, वह ख़ुद को एमबीबीएस और एमएस डिग्री होल्डर बताता फिरता था। मामला इंदौर के गौतमपुरा का है, जहाँ खलील अहमद नामक फ़र्ज़ी डॉक्टर आर्थोपेडिक क्लिनिक चलाया करता था। वहाँ उसने बाँझपन से लेकर कैंसर तक का इलाज करने जैसे दावों के साथ एक बोर्ड भी लगा रखा था।

शनिवार (अगस्त 31, 2019) को उसके ख़िलाफ़ पुलिस को शिकायत मिली थी। इसके बाद पुलिस ने स्वास्थ्य विभाग की एक टीम के साथ आरोपित डॉक्टर के क्लिनिक पर छापेमारी की। पुलिस को अपनी पड़ताल में पता लगा कि खलील के पास मेडिकल काउंसिल का रजिस्ट्रेशन तक नहीं था। यहाँ तक कि जब उससे उसकी डिग्री के बारे में पूछा गया तो वह अचानक से हड़बड़ा गया और उससे कोई जवाब देते नहीं बना।

आरोपित फ़र्ज़ी डॉक्टर के क्लिनिक से कई दवाइयाँ भी बरामद की गईं। हालाँकि, खलील इसका जवाब देने में भी विफल रहा कि कौन सी दवा किस बीमारी में दी जाती है। बाद में जब पुलिस ने उसकी शिक्षा-दीक्षा के बारे में पता लगाया तो खुलासा हुआ कि वह 5वीं फेल है। स्वास्थ्य विभाग की टीम से उससे अंग्रेजी में ‘डॉक्टर’ शब्द लिखने को कहा लेकिन खलील इतना भी नहीं कर सका।

आरोपित खलील पहले बंगाल में किसी डॉक्टर की क्लिनिक पर काम किया करता था। वहीं उसके शैतानी दिमाग में ये आईडिया आया कि ऐसा ही कोई क्लिनिक खोल कर लोगों को बेवकूफ बनाते हुए पैसा कमाया जा सकता है। तब उसने गौतमपुरा में क्लिनिक खोला। एक और अजीबोगरीब बात यह सामने आई है कि मरीज को शरीर के जिस भाग में दर्द होता था, वह उसे उसी स्थान पर इंजेक्शन लगा दिया करता था।

फ़र्ज़ी डॉक्टर खलील अहमद द्वारा तंत्र-मन्त्र और झाड़-फूँक करने की बात भी सामने आई है। उनके ख़िलाफ़ धारा 420 के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने उसके क्लिनिक को भी सील कर दिया है।

2018-19 में UPI लेन-देन 5 बिलियन के पार, डेबिट कार्ड से हुए लेनदेन को छोड़ा पीछे: RBI की रिपोर्ट

मोदी सरकार की नीतियों की वजह से डिजिटल लेनदेन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018-19 में यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी UPI के ज़रिए डिजिटल पेमेंट ने डेबिट कार्ड से हुए लेनदेन को पीछे छोड़ दिया है।

ख़बर के अनुसार, 5.35 बिलियन का UPI लेन-देन, डेबिट कार्ड लेन-देन की तुलना में लगभग 1.2 गुना अधिक था, यानी डेबिट कार्ड का लेन-देन 4.41 बिलियन था। यह डेटा इस बात को स्पष्ट करता है कि UPI के यूज़र्स ने लेन-देन के इस माध्यम को हाथों-हाथ लिया है, जबकि इस तरह के ऐप को लॉन्च हुए केवल तीन साल हुए हैं।

2017-18 में, UPI के ज़रिए केवल 915.2 मिलियन लेन-देन हुआ, जबकि डेबिट कार्ड का लेन-देन 3.34 बिलियन था। दिलचस्प बात यह है कि इसी अवधि में एटीएम की संख्या 222,247 से घटकर 221,703 हो गई।

इसका मतलब यह साफ़ है कि अब उपभोक्ताओं को नकद भुगतान की बजाए ऑनलाइन भुगतान की ओर अग्रसर किया जा सकता है। केंद्रीय बैंक दिसंबर से अपने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (NEFT) प्रणाली को 24×7 उपलब्ध कराने की योजना बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बैंकिंग सिस्टम में डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

‘दिग्विजय को ऐसी बयानबाजी करनी है तो पाकिस्तान जाएँ, हम तो उनके खिलाफ कोर्ट जा रहे हैं’

देश को हिंदू आतंकवाद की थ्योरी परोसने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इस बार बजरंग दल के ख़िलाफ़ बयानबाजी करके बुरे फँसे। भाजपा और बजरंग दल पर आईएसआई से पैसे लेने का आरोप लगाने के बयान पर बजरंग दल ने उन पर एक्शन लेने का फैसला कर लिया है।

बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक सोहन सोलंकी ने कहा है कि वो अब कोर्ट में जाकर दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करवाएँगे। साथ ही उनका कहना है कि पार्टी को अब दिग्विजय सिंह को बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन कॉन्ग्रेस ही भारत से बाहर हो जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राष्ट्रीय संयोजक का दिग्विजय के बयान पर कहना है कि अगर दिग्विजय को इसी तरह की बयानबाजी करनी है तो पाकिस्तान जाएँ और पाकिस्तानियों के साथ रहें। उनकी मानें तो दिग्विजय के बयानों को अब उनके घरवाले ही गंभीरता से नहीं लेते और न ही उनके बयानों को वो सुनते हैं।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में भिंड प्रवास के दौरान अभी हाल ही में दिग्विजय सिंह ने बजरंग दल और भाजपा के सदस्यों पर निशाना साधते हुए कहा था “जितने भी पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पाए गए हैं, वे लोग बजरंग दल, बीजेपी और आईएसआई से पैसा ले रहे हैं। आईएसआई के लिए जासूसी समुदाय विशेष वाले कम कर रहे हैं और दूसरे धर्म वाले ज्‍यादा कर रहे हैं। इसको भी समझ लीजिए।” हालाँकि बाद में उन्होंने अपने इस बयान को लेकर सफाई भी पेश की और दावा किया कि यह पूरी तरह से गलत हैं।

ट्रैफिक नियमों को तोड़ने पर फाइन या सजा नहीं, मिली मिठाई और टॉफी: मणिपुर में अनोखा अभियान

मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन के बाद रविवार आधी रात से नया कानून पूरे देश भर में लागू हो गया। कहा जा रहा है कि अब से ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों को 10 गुना ज्यादा जुर्माना भरना होगा। लेकिन इसी बीच मणिपुर से एक हैरान करने वाली भी खबर आ रही है।

बताया जा रहा है मणिपुर के चुराचंदपुर इलाके में ट्रैफिक पुलिस ने बिना हेलमेट बाइक चलाते लोगों को न केवल हिदायत दी कि सभी सुरक्षा नियम जनता के लिए बनाए गए हैं। इसलिए वो उसका अनुसरण करें बल्कि उनको मिठाई और टॉफियाँ भी बाँटीं और उनसे कोई फाइन भी नहीं लिया

एएनआई के ट्वीट के मुताबिक एसपी अमृता सिन्हा ने बताया कि पहले जब उन्होंने बिना हेलमेट पहने लोगों को सड़क पर रोकना शुरू किया तो लोगों को ये अच्छा नहीं लगा, फिर उन्हें एक आइडिया आया और उन्होंने कुछ दूर पर गाड़ी को रुकवाना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने लोगों से उनकी गाड़ी को खींचकर आगे लाने को कहा और फिर उनको टॉफी और मिठाई दी।

इसके साथ ही पुलिस ने नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों आराम से समझाया कि ये सब उनकी सुरक्षा के लिए ही है इसलिए पुलिस चाहती हैं कि वो हेलमेट पहनें। एसपी अमृता बताती हैं कि उन्होंने जैसे ही इस तरीके को अपनाया लोग उनके साथ कॉपरेट करना शुरू कर दिया और उनकी बात भी सुनने लगे। लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए जागरूक करने के लिए मणिपुर में यह मुहिम अभी कुछ दिन पहले से शुरू हुई है।

कमलनाथ सरकार ने 8 महीने में 11 बार किया तबादला: परेशान थाना प्रभारी पहुँचा हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के सत्ता संभालने के बाद से ही कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा अधिकारियों के ख़बरें सामने आती रही हैं लेकिन एक थानेदार का इतनी बार तबादला किया गया कि वह हाईकोर्ट पहुँच गया है। थानेदार सुनील लाटा अपने लगातार तबादलों के ख़िलाफ़ जबलपुर हाईकोर्ट पहुँच गए हैं। कमलनाथ सरकार द्वारा पिछले 8 महीने में उनका 11 बार ट्रान्सफर किया गया है।

अभी लाटा बैतूल जिले के सारणी थाने के प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं। उनके तबादलों का दौर भी तभी शुरू हुआ, जब मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। अब उन्हें निवाड़ी जिले के एक थाने में योगदान देने का आदेश आया है। जरा पिछले 8 महीनों में थाना प्रभारी लाटा के तबादलों की एक बानगी देखिए:

  • सबसे पहले उन्हें बैतूल से आईजी ऑफिस होशंगाबाद ट्रान्सफर किया गया।
  • होशंगाबाद से उन्हें पुलिस मुख्यालय भेज दिया गया। वहाँ उन्हें आदिम जाति कल्याण शाखा में रखा गया।
  • इसके बाद उन्हें बैतूल के आदिम जाति कल्याण में भेज दिया गया।
  • इसके बाद उनका तबादला सागर और छतरपुर के लिए हुआ। वहाँ वह आमद दर्ज करा पाते, उससे पहले ही उनका तबादला भोपाल के लिए कर दिया गया।
  • उन्हें फिर भोपाल से बैतूल भज दिया गया, जहाँ वह कोतवाली थाना के प्रभारी रहे।
  • लाटा को फिर लाइन हाज़िर कर दिया गया।
  • अंत में उन्हें सारणी थाने का चार्ज दिया गया लेकिन ट्रान्सफर का दौर यहीं ख़त्म नहीं हुआ।
  • सारणी में चार्ज सम्भाले एक सप्ताह भी नहीं हुए थे कि लाटा का ट्रान्सफर निवाड़ी जिले में कर दिया गया।

थानेदार लाटा ने बताया कि तबादलों से परेशान होकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है, जहाँ सुनवाई चल रही है। उन्होंने यह याचिका शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को दायर की।

जनसंख्या पर काबू नहीं होने से मंदी: कॉन्ग्रेस नेता जितिन प्रसाद ने मनमोहन की ‘चिंता’ की निकाली हवा

अर्थव्यवस्था पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ‘चिंता’ की हवा उनकी ही पार्टी के एक युवा नेता जितिन प्रसाद ने निकाल दी है। ​मनमोहन की कैबिनेट में रह चुके जितिन ने मंदी और बेरोजगारी का कारण बढ़ती जनसंख्या को बताया है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री ने इसे ‘मानव रचित संकट’ बताते हुए मोदी सरकार से बदले की राजनीति छोड़ अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कदम उठाने को कहा था।

जितिन प्रसाद ने कहा, “जनसंख्या नियंत्रण पर देशभर में व्यापक बहस होनी चाहिए। इस पर क़ानून भी बनाया जाना चाहिए। अगर देश को आगे बढ़ना है तो ठोस क़दम उठाने होंगे। मैं सरकार से माँग करता हूँ कि इस मुद्दे पर जो भी क़ानून लाना है, वह लाए।”

उन्होंने कहा, “अर्थव्यवस्था डूब रही है, बेरोज़गारी बढ़ रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि आबादी को नियंत्रित नहीं किया गया। पर्यावरण पर इसका प्रभाव पड़ रहा। जल संकट, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भारत में आबादी बढ़ने के कारण हैं।”

जितिन प्रसाद ने सभी राजनीतिक दलों से अपील करते हुए कहा कि उन्हें जनसंख्या नियंत्रण जैसे गंभीर मुद्दे पर एकसाथ खड़े होना चाहिए। बता दें कि इस साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंख्या का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जो लोग छोटा परिवार रख रहे हैं, वे भी एक तरह से देशभक्ति कर रहे हैं।

लाल किले की प्राचीर से जनसंख्या विस्फोट को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए पीएम मोदी ने देशवासियों से छोटे परिवार की अपील की थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताते हुए कहा था कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए नयी चुनौतियाँ पेश करता है। इससे निपटने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को क़दम उठाने चाहिए।


मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होंगे ट्रैफिक से जुड़े नए कानून

ट्रैफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वालों के लिए सरकार ने 1 सितंबर से नया मोटर व्हीकल कानून लागू कर दिया है। कानून में हुए संशोधन के बाद अब ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर 10 गुना तक अधिक जुर्माना भरना पड़ेगा। अब देश भर में अनाधिकृत रूप से सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर वाहन खड़े रखने वालों पर 500 रुपए प्रति घंटा का जुर्माना लगेगा। नए मोटर व्हीकल एक्ट के तहत शराब पीकर गाड़ी चलाने पर 10 हजार रुपए जुर्माना और 6 महीने की जेल का प्रावधान है और कोई ऐसा करते हुए दोबारा पकड़ा जाता है, तो उसे 2 साल की जेल और 15 हजार रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा।

जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार और राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार और मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने अपने-अपने राज्यों में इस अधिनियम को लागू करने से मना कर दिया है। मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने इसे लागू करने से इनकार करते हुए कहा कि जुर्माने की राशि काफी अधिक है। प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने नए नियमों का विरोध किया है। उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने जुर्माने की दरें जरूरत से ज्यादा बढ़ा दी है। इसी वजह से मोटर व्हीकल एक्ट की नई दरें मध्य प्रदेश में अभी लागू नहीं होगी।

सरकार पहले इसकी विवेचना करेगी और उसके बाद लागू करने पर निर्णय लेगी। इसमें प्रावधान के तहत काम करने का फिलहाल कोई नोटिफिकेशन नहीं है, लेकिन केन्द्र से बात की जा रही है। मध्य प्रदेश शासन के तरफ से निर्देश नहीं मिलने की वजह से पुलिस 1 सितंबर से नए एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं करेगी, जबकि केंद्र सरकार संशोधित एक्ट को लेकर नोटिफिकेशन जारी कर चुकी है।

कमिश्नर ने मुझे लाठी से मारा, गालियाँ दी: दफ्तर से TMC गुंडों को हटाने गए BJP सांसद का दावा

पश्चिम बंगाल में भाजपा सांसद अर्जुन सिंह ने तृणमूल कॉन्ग्रेस और पुलिस पर साँठगाँठ का आरोप लगाया है। भाजपा सांसद कार्यकर्ताओं के साथ विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे, तभी तृणमूल के गुंडों ने उनकी गाड़ी में तोड़फोड़ की। सिंह बैरकपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। उन्होंने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस कमिश्नर ने उनके सिर पर लाठी से वार किया। उन्होंने बंगाल पुलिस द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज करने का आरोप लगाया।

अर्जुन सिंह ने आरोप लगाया कि बैरकपुर के पुलिस कमिश्नर मनोज वर्मा ने उनके सिर पर लाठी से मारा और गालियाँ दी। सिंह ने कहा कि उनके आवास पर भी पुलिस और तृणमूल कार्यकर्ताओं ने हमला किया। उन्होंने बताया कि उनके सिर में 12 टाँके लगे हैं। स्थानीय अस्पताल में इलाज करा कर बाहर निकले सांसद ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए अपनी व्यथा सुनाई।

पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री और वरिष्ठ तृणमूल नेता ज्योतिप्रिया मालिक ने सांसद अर्जुन सिंह पर झूठ का रोना रोने का आरोप लगाते हुए पुलिस कमिश्नर का बचाव किया। मलिक ने कहा कि कमिश्नर वर्मा उस स्थान पर मौजूद ही नहीं थे, जहाँ सांसद सिंह प्रदर्शन कर रहे थे। मलिक ने कहा कि अर्जुन सिंह झूठे हैं और उनके आरोप आधारहीन हैं।

विवाद तब शुरू हुआ जब भाजपा सांसद को सूचना मिली कि पार्टी के श्यामनगर स्थित दफ्तर को तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने अपने कब्जे में ले लिया है। वह तुरंत वहाँ के लिए निकल पड़े। भाजपा के कार्यकर्ता जब वहाँ पहुँचे थे उन्होंने देखा कि तृणमूल के गुंडों ने न सिर्फ़ भाजपा दफ्तर पर अपनी पार्टी का झंडा लगा रखा था, बल्कि सीएम ममता की फोटो भी टाँग रखी थी। भाजपा नेताओं ने ममता बनर्जी के फोटो और तृणमूल के अन्य साजो-सामान वहाँ से हटाना शुरू कर दिया।

इसके बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने सांसद की गाड़ी में तोड़फोड़ की और उन पर हमला कर दिया। सांसद ने कहा कि अगर हमले नहीं रुके तो तृणमूल के लोगों के साथ ही ऐसा ही सलूक किया जाएगा। उन्होंने बंगाल में सिविल वार की आशंका जताई। वहीं, दूसरी तरफ़ ज्योतिप्रिया मलिक ने दावा किया कि भाजपा ने भंगवा रंग से पेंट कर-कर के उनके 180 दफ्तर हथिया लिए हैं, जिन्हें वापस छीन लिया जाएगा।

पश्चिम बंगाल के मंत्री ने याद दिलाया कि ऐसे ही भाजपा के एक दफ्तर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ख़ुद कब्ज़ा किया था। इसी तरह तृणमूल के बाकी नेता भी भाजपा दफ्तरों पर कब्ज़ा करेंगे। फिलहाल घटनास्थल पर पुलिस कैम्प कर रही है।