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बिजली जाने की वजह से 25 मिनट तक लिफ्ट में फँसे रहे पोप, दमकलकर्मियों ने निकाला

वेटिकन में बिजली जाने से पोप फ्रांसिस 25 मिनट तक लिफ्ट में फँसे रहे। स्थिति ऐसी हो गई कि उन्हें लिफ्ट से निकालने के लिए दमकलकर्मियों को बुलाना पड़ा। लिफ्ट से सकुशल निकाले जाने के बाद ईसाईयों के सर्वोच्च धर्मगुरु ने दमकलकर्मियों का आभार जताया। रविवार (सितम्बर 1, 2019) को सेंट पीटर्स स्क्वायर में अपने साप्ताहिक भाषण के दौरान पॉप ने आपबीती सुनाई।

पोप ने बिल्डिंग के अन्य लोगों को भी दमकलकर्मियों का धन्यवाद करने को कहा। बताया जा रहा है कि बजली जाने की वजह से लिफ्ट 25 मिनट तक रुकी रही। इस कारण पोप भी कार्यक्रम में देरी से पहुँचे। मुस्कुराते हुए पोप ने वहाँ मौजूद लोगों से देरी के लिए माफ़ी माँगी।

पोप ने यह भी बताया कि वेटिकन में आजकल बिजली की समस्या चल रही है। 83 वर्षीय पोप कैथोलिक चर्च के शीर्ष पादरी हैं और वेटिकन के शासक भी हैं।

कश्मीरी नेता ही कश्मीरियों की जान के दुश्मन, हमने झेला है: कश्मीर के कॉन्ग्रेसी नेता सलमान निज़ामी

कॉन्ग्रेस नेता सलमान निज़ामी ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर एक बार फिर से पार्टी लाइन से हटकर बयान दिया है। जहाँ कॉन्ग्रेस आलाकमान, गुलाम नबी आज़ाद, अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता मोदी सरकार को घेरने में लगे हैं, वहीं निज़ामी ने केंद्र को अप्रत्यक्ष रूप से क्लीन चिट देते हुए कश्मीर के ही स्थानीय नेतृत्व को कटघरे में खड़ा किया है। इस बार उनके निशाने पर पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती हैं।

लाशों का गिनाया हिसाब

निज़ामी ने केंद्र/राष्ट्रपति शासन और मुफ़्ती-अब्दुल्ला शासन के समय हुई बड़ी अशान्तियों में मारे गए लोगों की संख्या की तुलना की है। ट्विटर पर उन्होंने लिखा, “उमर अब्दुल्ला के समय फैली अशांति में 200 लोग मारे गए, महबूबा मुफ़्ती के समय फैली अशांति में 260 लोग मारे गए, 2019 की अशांति में शून्य मारे गए।”

निज़ामी आगे लिखते हैं, “स्थानीय नेता कश्मीर के असली शत्रु हैं, ताकत के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। हमने अनुभव किया है, हमने झेला है। अब आत्मविवेचन का समय है।”

“पूरे हिंदुस्तान में किसी ने कश्मीरी मुस्लिमों को हाथ भी नहीं लगाया”

इसके पहले भी सलमान निज़ामी ने कश्मीरियों को आईना दिखाया था। जम्मू-कश्मीर से 370 के पर कुतरने और इसे कट्टरपंथियों के बीच जिहादी मानसिकता को बढ़ावा दे रहे लोगों द्वारा ‘हिन्दू सरकार की गुंडागर्दी’ के रूप में दिखाने की कोशिशों के बीच निज़ामी ने ट्वीट कर इस तथ्य की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया कि जहाँ बाकी पूरे देश में कश्मीरी मुस्लिम सुरक्षित हैं, वहीं खुद कश्मीर में 370 खत्म होने के बाद से दो बेग़ुनाह मुस्लिमों को जान से मारा जा चुका है।

मोदी के नाम पर फिर से बँटी कॉन्ग्रेस: 3 बड़े नेताओं के उलट सलमान खुर्शीद का अटपटा बयान

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने मोदी सरकार पर निशाना साधने के लिए अपनी ही पार्टी के नेताओं के बयानों के खिलाफ़ जाकर बयान दिया। खुर्शीद ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके काम में अच्छाई ढूँढना भूसे के ढेर में सुई को ढूँढने जैसा है। इसके अलावा उन्होंने देश के हालातों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस देश को लेकर बहुत चिंतित है।

खुर्शीद के इस बयान के साथ उल्लेखनीय है कि अभी बीते दिनों कॉन्ग्रेस के नामी नेता कहते नजर आए थे कि अगर प्रधानमत्री कुछ अच्छा करते हैं तो उनके काम की तारीफ़ होनी चाहिए। उनके प्रशासनिक मॉडल में सब कुछ खराब नहीं हो सकता। हमें उनके किए कार्यों को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि उनकी आलोचना करते रहने से कुछ नहीं होगा।

खुर्शीद के बयान और कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं बयानों को एक साथ पढ़कर स्पष्ट है एक ही पार्टी में मौजूद नेता अब मोदी के कार्यों पर टिप्पणी करने के कारण बँटने लगे हैं।

जहाँ जयराम रमेश, शशि थरूर और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे नेताओं का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यों के लिए उनकी तारीफ़ होनी चाहिए वहीं खुर्शीद का कहना है उनकी पार्टी के ये नेता सीधे-सीधे जवाब नहीं देना चाहते क्योंकि उससे और भी भ्रम पैदा होगा।

खुर्शीद के अनुसार रमेश और बाकी नेताओं ने वह कहा जो वो कहना चाहते थे। वो कहते हैं, “हम सभी चीजों को उसी हिसाब से देखते हैं जो हमारे लिए सही होता है जैसा कि मैंने कहा, मेरे लिए मोदी के काम में अच्छाई खोजना ‘भूसे के ढेर में सूई खोजने’ जैसा होगा। “

अपने परिसर में ही रखें ताजिया, ऊँचाई भी तय की जाएगी: मुहर्रम को लेकर CM योगी का निर्देश

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुहर्रम और गणेश चतुर्थी को लेकर अहम ऐलान किए हैं। मुहर्रम के दौरान ताजिया निकाले जाने को लेकर सीएम लोगों को सलाह दी कि ताजिया को सड़कों पर घुमाने की बजाय अपने परिसर में ही रखें। मुख्यमंत्री ने प्रशासन को निर्देश दिया कि ताजिया की ऊँचाई भी तय की जाए। पुलिस व प्रशासन को कई निर्देश देते हुए योगी आदित्यनाथ ने सुरक्षा व्यवस्था के कड़े बंदोबस्त रखने और अफवाहों को रोकने के किए सख्त क़दम उठाने को कहा है।

सीएम योगी ने कहा कि गणेश चतुर्थी और मुहर्रम के दौरान कोई भी काम परंपरा के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। उन्होंने पूजा-पंडालों व ताजिया रखे जाने वाले स्थानों के आसपास साफ़-सफाई रखने की बात कह स्वच्छता पर भी ज़ोर दिया। स्वच्छता, सुरक्षा और सुव्यवस्था का जिक्र करते हुए सीएम योगी ने पुलिस को असामाजिक तत्वों पर कड़ी नज़र रखने का निर्देश दिया।

सीएम योगी ने पुलिस को यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि त्योहारों के दौरान लोग अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग न करें। इस दौरान मुख्यमंत्री ने सख्त निर्देश दिया कि खेतों व सड़कों पर कोई भी निराश्रित गाय घूमती न मिले, इसका ख़ास ध्यान रखा जाए। उन्होंने पुलिस को गो-तस्करी के ख़िलाफ़ कड़ाई से क़दम उठाने का निर्देश देते हुए अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई करने को कहा।

मुख्यमंत्री ने डीजे बजाने को लेकर भी दिशा-निर्देश जारी किए। योगी आदित्यनाथ ने पुलिस इस बात का ध्यान रखने को कहा कि लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही डीजे का इस्तेमाल करें। सीएम योगी ने सभी थानों की पुलिस को समय रहते शांति समिति की बैठक कर लेने का निर्देश दिया। उन्होंने पुलिस को लगातार पेट्रोलिंग करने को कहा।

पाकिस्तान के परमाणु प्रोजेक्ट में काम कर रहे 200 चीनी नागरिकों को हुआ डेंगू, अब तक 6 की मौत

पाकिस्तान में परमाणु ऊर्जा संयंत्र में काम करने वाले लगभग 200 चीनी नागरिकों को डेंगू हो गया है। शनिवार को आई एक मीडिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। पाकिस्तान की समाचार वेबसाइट डेली जंग के अनुसार, कराची शहर के हॉक्स बे के तटीय क्षेत्र के पास परमाणु ऊर्जा संयंत्र में काम कर रहे 200 से अधिक चीनी लोग डेंगू वायरस के शिकार हो गए।

सिंध प्रांत के स्वास्थ्य मंत्री अज़रा फजल का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र में काम कर रहे लगभग 200 चीनी डेंगू वायरल संक्रमण से पीड़ित हैं। वायरस से प्रभावित सभी व्यक्तियों का इलाज चल रहा है और वो फिलहाल खतरे से बाहर हैं।

एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल सिंध प्रांत में डेंगू की वजह से 6 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1200 लोगों को जाँच में डेंगू होने की पुष्टी हुई है। इसके अलावा सिंध प्रांत में घातक टिक-जनित वायरल कॉन्गो बुखार भी फैला हुआ है, जिसमें अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है।

डेंगू बरसात के मौसम और उसके फौरन बाद के महीनों, यानी जुलाई से अक्टूबर में सबसे ज्यादा फैलता है, क्योंकि इस मौसम में मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

कुलभूषण जाधव को काउंसलर एक्सेस देने के लिए मजबूर हुआ पाकिस्तान, तारीख तय

भारत से चल रहे तनाव के बावजूद पाकिस्तान कुलभूषण जाधव को काउंसलर एक्सेस देने को मज़बूर हो गया है। पाकिस्तान ने निर्णय लिया है कि जाधव को वियना संधि के तहत काउंसलर एक्सेस दी जाएगी। बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने भारत द्वारा काउंसलर एक्सेस की तमाम माँगों को खारिज करते हुए जाधव को मौत की सज़ा सुना दी थी। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय में पाकिस्तान को तगड़ा झटका लगा और उसे जाधव को काउंसलर एक्सेस देने को कहा गया।

पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने रॉ एजेंट और भारतीय जासूस बताते हुए आतंकवादी होने तक का आरोप लगाया। हालाँकि, यहाँ स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि पाकिस्तान ने अवैध रूप से जाधव का अपहरण किया और ग़लत चार्ज फ्रेम किए। कुलभूषण जाधव को सोमवार (सितम्बर 2, 2019) को काउंसलर एक्सेस मुहैया कराया जाएगा। ये रहा पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद फैसल के ट्वीट्स:

ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत को कुलभूषण जाधव को काउंसलर एक्सेस देने की अनुमति मिली है। इससे पजल पाकिस्तान हमेशा से भारत के रिक्वेस्ट को टालता रहा था। अंतरराष्ट्रीय न्यायलय ने पाकिस्तान को जाधव की सज़ा पर पुनर्विचार करने का भी आदेश दिया था। हालाँकि, पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि ऐसा पाकिस्तान के क़ानून के तहत किया जा रहा है। उन्होंने लिखा कि वियना संधि, अंतररष्ट्रीय न्यायलय के आदेश और पाकिस्तानी क़ानून के तहत ऐसा किया जा रहा है।

पाकिस्तान को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि पाकिस्तान का यह क़ानून इससे पहले कहाँ था? बैकफुट पर आने और अंतरराष्ट्रीय न्यायलय में किरकिरी होने से पहले ऐसा क्यों नहीं किया गया?

गंगा घाटों के स्वच्छता अभियान की अगुवाई करने वाली तमसुतुला इमसॉन्ग को मिला देवी पुरस्कार

स्वच्छ भारत कार्यकर्ता तमसुतुला इमसॉन्ग को कोलकाता में हाल ही में संपन्न हुए देवी पुरस्कार समारोह में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें स्वच्छ भारत मिशन में नवीनता और गतिशीलता लाने में उनकी भूमिका के लिए दिया गया है।

दरअसल, देवी पुरस्कार द संडे स्टैंडर्ड और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस द्वारा शुरू की गई एक मुहीम है, जिसका मक़सद उन कामकाजी महिलाओं को सम्मानित करना है जो अपने संबंधित क्षेत्रों में नवीनता और गतिशीलता लाती हैं।

कई महिला उद्यमियों, कार्यकर्ताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों, नवप्रवर्तकों और शिक्षाविदों को इसकी स्थापना के बाद से सम्मानित किया जा रहा है।

इस वर्ष, यह कार्यक्रम कोलकाता में आयोजित किया गया, जहाँ केंद्रीय कपड़ा और महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने विभिन्न क्षेत्रों की चयनित महिलाओं को पुरस्कार प्रदान किए।

तमसुतुला के अलावा, शिक्षाविद परमीता शर्मा, नृत्यांगना आलोकानंद रॉय, मिज़ोरम के फैशन उद्यमी लालडिंसंगी, ललसांगज़ेली और लालरिनपुई, जिनकी फैशन पहल वाकिरिया ने मिज़ोरम के सबसे लोकप्रिय फैशन ब्रांड के रूप में ख़ुद को स्थापित किया है।

अन्य पुरस्कार विजेताओं में उद्यमी रितु अग्रवाल, मधु नियोतिया, जैविक किसान एकिता राजू, फैशन इनोवेटर सुजाता चटर्जी, और फिल्म निर्माता प्रीता चक्रवर्ती शामिल थीं।

तमसुतुला इमसॉन्ग, नागालैंड की एक युवती हैं। इनका समूह, Sakaar Sewa Samiti तब सुर्खियों में आया था, जब वाराणसी में गंगा घाटों को स्वच्छ रखने में उनके योगदान ने पीएम मोदी के प्रोत्साहन के साथ देशव्यापी पहचान हासिल की थी।

बता दें कि इमसॉन्ग गंगा घाटों के स्वच्छता अभियान की अगुवाई कर रही हैं। वो अब स्वच्छ भारत मिशन का पर्याय बन चुकी हैं और उन्हें अपने इस काम के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रशंसाएँ भी मिल चुकी हैं।

‘देश विरोधी नारा हो, या सर्जिकल से लेकर एयर स्ट्राइक, कॉन्ग्रेस गंभीर मौकों पर हमेशा सरकार के खिलाफ’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से 370 को निरस्त किए जाने का विरोध करने पर कॉन्ग्रेस नेतृत्व और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पर जमकर निशाना साधा। अमित शाह ने रविवार (सितंबर 1, 2019) को केंद्र शासित प्रदेश दादर एवं नागर हवेली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “कॉन्ग्रेस ने 370 को हटाने का विरोध किया। आज भी राहुल गाँधी जो बयान देते हैं उसकी पाकिस्तान में तारीफ होती है। उनके बयान को पाकिस्तान अपनी याचिका में शामिल करता है। कॉन्ग्रेसियों को शर्म आनी चाहिए कि उनके बयान का उपयोग भारत के खिलाफ हो रहा है।”

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के हटने से जम्मू कश्मीर में विकास के रास्ते खुले हैं, आतंकवाद के ताबूत में अंतिम कील ठोकी है, जम्मू कश्मीर को पूरी तरह से भारत के साथ मिलाने का काम हुआ है। सब लोग इस फैसले पर सरकार के साथ हैं लेकिन कुछ लोग इसका भी विरोध कर रहे हैं।

इसके साथ ही अमित शाह ने मोदी सरकार द्वारा कश्मीर पर लिए गए फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 और 35ए देश के एकीकरण में बाधा था। उन्होंने कहा, “मोदी जी को आपने फिर से प्रधानमंत्री बनाया और उन्होंने संसद के पहले ही सत्र में अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया। मोदी जी के अलावा ये काम कोई और नहीं कर सकता था।”

अमित शाह ने कहा कि चाहे जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने का मामला हो, या फिर सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयर स्ट्राइक का। कॉन्ग्रेस गंभीर मौकों पर सरकार के खिलाफ खड़ी रही। उन्होंने कहा कि वो कॉन्ग्रेस से पूछना चाहते हैं कि वो (कॉन्ग्रेस) किस तरह की राजनीति करना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस पर बरसते हुए उन्होंने कहा कि 70 सालों में देश में कई पार्टियों की सरकार बनी, कुछ लोगों की तीन-तीन पीढ़ियों ने देश पर राज किया, लेकिन इनमें अनुच्छेद-370 हटाने की हिम्मत नहीं थी।

गृह मंत्री ने कहा कि अनुच्छेद-370 को लेकर देश की जनता चट्टान की तरह नरेंद्र मोदी जी के साथ खड़ी है और वो पूरी दुनिया को बताना चाहेंगे कि 370 हटने के बाद कश्मीर में पूरी तरह से शांति है। 370 हटने के बाद वहाँ एक भी गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ी, एक भी आँसू गैस नहीं छोड़ा गया है और न ही किसी की जान गई है। अमित शाह ने कहा कि कानून-व्यवस्था को लेकर जो सवाल उठाए जाते हैं, उसका इस्तेमाल दुश्मन करते हैं।

क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? सरकार क्या कर रही है? (भाग 2)

समाधान क्या है? क्या करे सरकार?

त्वरित समाधान तो मनमोहन सरकार वाला ही है कि फिर से फिस्कल डेफिसिट को 6% के ऊपर ले जाओ, फिर से बैंकों को पैसा दे दो, या योजनाओं के जरिए लोगों तक पैसा पहुँचा दो। इससे आम जनता खर्च करने लगेगी और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेगा। लेकिन आठ-दस सालों में वापस यही स्थिति आएगी। यह समाधान चुनाव जीतने के लिए किया जा सकता है लेकिन देश को इससे लम्बे समय में नुकसान ही होता है, फायदा नहीं।

फिस्कल डेफिसिट वाला रिस्क एक बार लिया जा सकता है लेकिन वो ऐसे देशों में संभव है जहाँ लोग टैक्स देते हैं। भारत में टैक्स नहीं देना एक गुण के तौर पर देखा जाता है, पढ़े-लिखे लोगों से लेकर व्यापारियों तक में टैक्स चोरी करना इस तरह से देखा जाता है जैसे कि कुछ अच्छा किया जा रहा हो। आप टैक्स ही नहीं देंगे तो सरकार के पास आमदनी बढ़ेगी ही नहीं।

अगर सरकार आम लोगों की मदद कर रही है तो बिजनेस करने वाले लोगों को भी अपना सारा टैक्स देना चाहिए। लेकिन टैक्स देना एक बिहेवियर चेंज करने की बात है, इसमें समय लगेगा। पिछली सरकार ने इस पर कोई सोच नहीं दिखाई, इस सरकार ने जीएसटी से लेकर इनकम टैक्स तक में सक्रियता दिखाते हुए इसका दायरा बढ़ाया है। लेकिन वो इतना बड़ा नहीं हुआ है कि फिर से 2008 की तरह का रिस्क लिया जा सके।

प्राइवेट सेक्टर को आगे आना होगा

प्राइवेट सेक्टर के बारे में बात करते हुए चीफ इकनॉमिक अडवाइजर, यानी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत में प्राइवेट कम्पनी को अगर लाभ होता है तो वो प्राइवेट लाभ है, वो कम्पनी का लाभ है; लेकिन जब वही कम्पनी घाटे में जाती है, तो वे कहने लगते हैं कि सरकार मदद नहीं कर रही! प्राइवेट कम्पनी अपने बिजनेस के तरीकों से लाभ कमाती है, या घाटे में जाती है। अगर आपकी नीतियों के कारण कम्पनी डूब रही है तो इसमें सरकार क्या करे?

लेकिन माहौल ऐसे बनाया जाता है, सरकार को ब्लैकमेल किया जाता है कि जेट एयरवेज में इतनी नौकरियाँ खतरे में हैं, सरकार कुछ नहीं कर रही। सरकार तभी कुछ करेगी जब वो कम्पनी सरकारी होगी। वरना पंजाब नेशनल बैंक ने तो नीरव मोदी को लोन दिया था, आपके पैसे भी लेकर नहीं भागा, फिर सब उसे जेल में क्यों डालना चाहते हैं? वो इसलिए कि ऐसे लोग सिस्टम का फायदा न उठा सकें। साथ ही, प्राइवेट कम्पनियाँ जब अपने लाभ का हिस्सा सरकार के साथ नहीं बाँटती तो उनके घाटे पर सरकार मेरा या आपका पैसा क्यों खर्च करे?

प्राइवेट सेक्टर कई बार इस चक्कर में रहता है कि सरकार की ओर से कुछ मदद मिल जाएगी तो उसका अपना कैश रिजर्व बचा रहेगा। हर ठीक-ठाक कम्पनी के पास कुछ पैसे होते हैं, जो वो अपने पास बचा कर रखती है। व्यापारी को अगर लोन मिल जाए तो वो दूसरों के पैसों पर अपना व्यापार करने में सहजता दिखाता है क्योंकि अगर व्यापार डूब गया तो उसे वो पैसा बैंक को नहीं लौटाना पड़ेगा। लेकिन अपना पैसा जब लगाना हो, तो लोग ज्यादा सोच-समझ कर पैसा लगाते हैं।

ऑटो सेक्टर के साथ क्या हुआ?

जब पैसा अपना दाँव पर हो, तब प्राइवेट सेक्टर ऐसी स्थिति में नहीं पड़ता कि केवल सेंटीमेंट के आधार पर प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ा ले- जो कि पिछली बार हुआ था। उदाहरण के लिए ऑटो सेक्टर में ठीक-ठाक बूम आया था। पिछले कुछ सालों में तो टैक्सी कम्पनियों ने लोगों को ओला या ऊबर के लिए कार खरीदने में मदद की। इससे हुआ यह कि कारों की बिक्री शुरू में तो बढ़ी लेकिन यह दो साल में ही थम भी गई। बड़े शहरों में लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि भला कार क्यों खरीदें! जब एक फोन करने पर ड्राइवर के साथ कार आ जाती है, तो अपने घर पर रखने, बीमा करवाने, मेंटेनेंस और ड्राइवर का टेंशन कौन ले!

इसके साथ ही 2004-05 से मिडिल क्लास के लोगों ने कार लेनी शुरू कीथी, और पिछले सात-आठ सालों में ग्रामीण इलाकों में भी हर घर में मोटर सायकिल पहुँचने लगी थी। कार या मोटर सायकिल एक बार लेने का मतलब है कि लोग फिर लम्बे समय तक दोबारा नहीं लेंगे- क्योंकि यह आलू-टिंडे की तरह हर हफ्ते खत्म होने वाली या चाइनीज़ रेनकोट की तरह हर बरसात में रीप्लेस होने वाली चीज़ ही नहीं है। फिर ओला-ऊबर के कारण ऑटो सेक्टर में डिमांड घटती चली गई। जिन्होंने गलत आशा के चलते ज्यादा प्रोडक्शन शुरू कर दिया था, उन पर दबाव बढ़ने लगा, और अंततः शिफ्टें बंद करनी पड़ी, यूनिटों में ताले लगने लगे।

लेकिन फिर भी स्थिति इतनी ‘भयावह’ नहीं हुई है जितनी दिखाई जा रही है। यह गिरावट सामान्य है, जोकि कम्पनियों द्वारा दूरदर्शिता के अभाव के कारण पैदा हुई है। इस समय में प्राइवेट कम्पनियों को अपने कैश रिजर्व पर वापस जाना होगा क्योंकि सरकार को न तो चुनाव जीतना है, न ही वो पुरानी असफल नीति को अपनाने वाली है।

सरकार अगर वापस पुराने ढर्रे पर चलने लगे तो बिजनेस करने वालों को फिर से एक आसान रास्ता दिख जाएगा कि अगले कुछ साल वो फिर से वैसे ही बिजनेस कर लेंगे। लेकिन, सरकार अगर कड़ा रुख अपनाते हुए, इन प्राइवेट कम्पनियों को अपने पैसे अपने बिजनेस में लगाने पर मजबूर करती है, तो इन कम्पनियों के पास गम्भीरता से सोच कर, सही जगह पैसा लगाने के अलावा और कोई उपाय नहीं बचेगा। इससे सरकार की ऐसी छवि भी बनेगी कि ये सरकार क्विक फिक्स वाली नहीं है, इसलिए अपने पैसे को दूसरे का समझ कर नुकसान कराने की बजाय सही तरीके से बिजनेस करने में बेहतरी है।

मैनुफैक्चरिंग में समस्या अलग ही है

इसमें दूसरी बात यह है कि पहले मैनुफैक्चरिंग धीरे-धीरे बदलती थी, अब टेक्नॉल्जी हर जगह घुस गई है और हर सेक्टर की मैनुफैक्चरिंग पर इसका सीधा असर दिखने लगा है। साल भर में कारों में एकदम ही नया फीचर आ जाता है। उसी तरह कई और सेक्टरों में लगातार तकनीकी बदलाव हो रहे हैं, जिसमें फैक्ट्री में लगने वाले मशीनों से लेकर वहां क्या बन रहा है, और उसमें नया क्या हो रहा है तक शामिल हैं। इसके कारण प्राइवेट कम्पनियाँ असमंजस में होती हैं कि नया यूनिट लगाएँ या नहीं, क्योंकि संभव है कि अगले साल कुछ ऐसी तकनीक आ जाए कि लोग उसी को खरीदने लगें।

मैनुफैक्चरिंग को लेकर दूसरी समस्या यह है कि भारत में बनाने वालों से ज्यादा बेचने वाले हैं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि यहाँ आप जो बैग लाजपत नगर मार्केट में खरीदती हैं, या जो टीशर्ट पालिका बाजार में मिलती है, वो जरूरी नहीं कि लुधियाना की फैक्ट्री में बना हो। पारम्परिक तौर पर भारत में व्यापारियों ने कहीं से खरीद कर किसी और जगह लाभ पर बेचने में ज्यादा झुकाव दिखाया है। वो चीन से बैग खरीदते हैं, यहाँ बेच लेते हैं।

ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि मैनुफैक्चरिंग के लिए सिर्फ फैक्ट्री लगाकर आप बिजनेस नहीं कर सकते। चीन ने जब खुद को मैनुफैक्चरिंग का केन्द्र बनाया तो उसने अपनी जमीनी, हवाई और जलीय मार्गों पर सामानों की आवाजाही के लिए बेहतरीन तंत्र विकसित किया। वहाँ से कहीं भी बना सामान तुरंत दूसरी जगह पहुँच सकता है। भारत में हवाई परिवहन महँगा है, जलीय परिवहन पर किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया, सड़क पर इतने बैरियर लगे होते थे कि ट्रक सड़कों की साइड में दिन भर खड़े होते थे, रेलगाड़ी तो कभी समय पर आती ही नहीं…

आप यह देखिए कि आप समय से किसी भी सामान को पहुँचा नहीं सकते। फिर कोई कम्पनी यहाँ निवेश कर के, फैक्ट्री लगा कर पैसे क्यों फँसाएगी? व्यापारी तीन से पाँच घंटे की फ्लाइट से या समुद्री मार्ग से सस्ते दरों पर सामान भारत में मँगवा कर, बिना किसी माथापच्ची के लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा?

अब जाकर सरकार ने जलमार्ग पर ध्यान देना शुरु किया है, जीएसटी के कारण सड़कों पर से बैरियर हट रहे हैं, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (यानी मालगाड़ियों के लिए समर्पित ट्रैक) पर कार्य हो रहा है। ये सारी चीजें मैनुफ़ैक्चरिंग को बेहतर करने के लिए उठाए गए वो कदम हैं जिनका लाभ कुछ सालों बाद मिलेगा। ये न तो एक दिन में तैयार हो सकते हैं, न बिना तैयार चीजों के केवल हवाई ‘विश्वास’ के आधार पर कोई समझदार व्यक्ति फैक्ट्री खोल लेगा। इसलिए प्राइवेट सेक्टर असमंजस में रहता है कि वो अपना पैसा लगाए भी तो कैसे!

सरकार की नीतियाँ और उसकी अपनी छवि

सरकार को बाजार में यह दिखाना होगा कि वो उनके लिए रास्ते तैयार कर रही है। मैनुफ़ैक्चरिंग के लिए ‘मेक इन इंडिया’ जरूरी है लेकिन उसे बनाने के बाद पहुँचाना उतना ही आवश्यक है। इसके साथ ही नीतिगत फैसलों पर सरकार के यूटर्न लेने से कई बार इंडस्ट्री का विश्वास सरकार से उठने लगता है। जैसे कि ऑटो सेक्टर में ही कभी सरकार यह कहती है कि अगले कुछ सालों में हम पूरी तरह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर आ जाएँगे, और फिर वित्त मंत्री कहती है कि नहीं, डीजल भी रहेगा।

अब कार बनाने वाले तो यही सोचेंगे कि डीजल-पेट्रोल वाली गाड़ियों को बनाना कम करते हुए बंद कर देते हैं, और इलेक्ट्रिक इंजन की तकनीक और मैनुफ़ैक्चरिंग पर पैसा लगाते हैं। इस तरह की नीतियाँ लम्बे समय तक के लिए होती हैं, इसलिए सरकारों को सोच समझ कर बोलना चाहिए ताकि बिजनेस करने वालों के बीच यह भरोसा रहे कि यह सरकार जो बोलती है, वो करती है। अगर नीतियाँ तीन महीने में घोषणा के बाद बदलती रहेंगी, जो कि मोदी सरकार में कई बार हो चुका है, तो इंडस्ट्री उसे सही सिग्नल नहीं मानती।

पॉलिसी, यानी नीतियों से इंडस्ट्री को दिशा मिलती है कि वो कहाँ अपना पैसा लगाए। इसलिए वो कभी नहीं चाहते कि सरकार बदल जाए। वो चाहते हैं कि सरकार बने, फैसले पर डटी रहने वाली सरकार बने और वो ऐसे फैसले ले जिससे पब्लिक में डिमांड हो और उनका व्यवसाय बढ़े। इसलिए इंडस्ट्री वैसी सरकारें नहीं चाहतीं जो गठबंधन से चलतीं हैं, और सही समय पर सही फैसले लेने में सकुचातीं हैं।

ऐसा ही एक फैसला है बैंकों के विलय का। हाल ही में घाटे में चलने वाले कुछ बैंकों का विलय हुआ। सरकार की मंशा यह है कि जो बैंक अकेले घाटे में थे और अपनी पूँजी में कमी के कारण लोन देने में सक्षम नहीं थे, वो अब एक साथ हो जाएँगे तो उनकी पूँजी बढ़ जाएगी, और वो बड़ी कम्पनी को बड़े लोन देने में सक्षम हो पाएँगे। ये बैंकिंग में चल रहे क्राइसिस के लिए त्वरित समाधान है, जिससे इनका अपना व्यवसाय बढ़ेगा। लेकिन इन बैंकों को यह देखना होगा कि जिसे यह लोन देंगे, उससे रिकवर करने के लिए उनके पास क्या तरीके हैं।

सरकार ने जब अपने गलत फैसलों को सुधारते हुए नए कदम उठाए हैं तो इससे अर्थव्यवस्था को संबल मिला है। कम्पनियों में उम्मीद जगी है कि सरकार सकारात्मक बदलाव के लिए प्रयासरत है। बाजार सेंटीमेंट पर खूब चलता है। सेंसेक्स और निफ्टी जैसे सूचकांक सरकार की नीतियों और फैसलों के हिसाब से उठते और गिरते हैं। अगर बाजार को लगता है कि सरकार ने अच्छे कदम उठाए हैं तो मार्केट में सुधार आता है, वो ऊपर जाता है। ऊपर जाने का मतलब है कि बाहरी कम्पनियाँ भारत में अपना पैसा लगाने को उत्सुक होंगी क्योंकि चीन में अमेरिका से ट्रेड वॉर के कारण स्थिति थोड़ी नकारात्मक है।

जीडीपी का नीचे जाना

लेकिन इस तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर का भाजपा के कार्यकाल में सबसे नीचे जाना चिंतनीय है। भले ही इस पर वैश्विक मंदी का भी प्रभाव है, लेकिन ग्रोथ रेट नीचे जाने के कारण हम विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रहेंगे। इसका मतलब यह है कि लोग अभी भी चीन में शी जिनपिंग के सत्ता में डटे रहने के कारण, वहाँ का रुख कर सकते हैं।

अंत में एक सवाल जो हम सब सोशल मीडिया पर पूछते हैं और मजाक भी बनाते हैं कि जीडीपी से क्या होता है। आम तौर पर जब भाजपा सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए कहती है कि जीडीपी ऊपर जा रही है, हम विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, तब विरोधियों की तरफ से जवाब आता है कि भारत के गरीबों को यही आँकड़ा खिला दो। कहने का उनका तात्पर्य यह होता है कि बढ़ते जीडीपी से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भारत में लोग भूखे हैं।

लेकिन यही लोग तब झुंडों में आते हैं जब वही जीडीपी दर नीचे जाती है। जीडीपी घट नहीं रही है, बस उसके बढ़ने की गति कम हुई है। ऐसे में कहने लगते हैं कि मोदी ने तबाही फैला दी, बर्बाद हो गया देश। तब आँकड़ों को गरीबों को खिलाने वाला तर्क नहीं आता। तब यही आँकड़े देश की सही स्थिति बताते हैं, जबकि जब बेहतर हो रहा हो तो भारत में गरीब ज्यादा हो जाते हैं।

ख़ैर, यह बात समझनी ज़रूरी है कि जीडीपी के घटने और बढ़ने का असर आम आदमी पर पड़ता है। यह असर इतना इमीडिएट नहीं होता कि वहाँ सरकार ने कहा कि ग्रोथ रेट कम हुई और यहाँ आपके घर से आटा घट गया, और आपके नल से पानी सूख गया। लेकिन हाँ, अगर यह ग्रोथ रेट नहीं सुधरी तो आप उसी आटे या कपड़े पर कम खर्च करेंगे।

इसे ऐसे देखिए कि आप जहाँ काम करते हैं, उस कम्पनी को भारत की बढ़ती जीडीपी के कारण फायदा होगा तो वो फायदा आपकी सैलरी में वृद्धि के तौर पर आएगा। यानि जीडीपी बढ़ रही है तो बहुत संभावना है कि आपकी कम्पनी का व्यवसाय भी बढ़ ही रहा होगा, और उसका मुनाफा भी। साल के अंत में उसी मुनाफे का एक हिस्सा वह अपने कर्मचारियों को एक तय प्रतिशत वृद्धि के साथ देगी। अब, जब यही मुनाफा कम हो जाएगा तो आपका इन्क्रीमेंट भी कम होगा। मतलब सैलरी उतनी नहीं बढ़ेगी जितनी बढ़नी चाहिए। कई बार तो ऐसा भी होता है कि महँगाई सात प्रतिशत बढ़ी और सैलरी छः। मतलब, आप पिछले साल से कम चीजें ही खरीद सकते हैं, भले ही सैलरी में वृद्धि हुई हो।

इसका दूसरा नुकसान यह होता है कि कई बार छोटी कम्पनियाँ खराब होती अर्थव्यवस्था में अपना बचाव नहीं कर पातीं। बड़ी कम्पनियाँ कुछ लोगों की छँटनी कर सकतीं हैं, कुछ शिफ्ट बंद कर सकतीं हैं। लेकिन छोटी कंपनियों का तो भट्टा ही बैठ जाता है। मतलब भारत जैसे देश में, जहाँ रोजगार पहले ही एक समस्या है, वहाँ और लोग बेरोजगार हो जाएँगे।

इन सबके कारण कंज़्यूमर सेंटिमेंट यानी उपभोक्ता के मनोभावों में परिवर्तन आने लगते हैं। वो अपनी नौकरी को लेकर ज्यादा सजग हो जाता है। पैसे बचाने लगता है। पैसा कम खर्च होने से उस पर आधारित कई उद्योगों के नुकसान पहुँचता है, जिसके कारण और नौकरियाँ जाती हैं। ये चक्रीय तरीके से काम करता है।

इसलिए जीडीपी का बढ़ना हमेशा बेहतर होता है। भले ही गरीबी हो, लेकिन बढ़ती जीडीपी के कारण ही उन गरीबों के लिए गेहूँ और चावल को सस्ते दरों में पहुँचाना संभव हो पाता है। इसी बढ़ती जीडीपी के कारण सरकार हाइवे को चौड़ा कर पाती है, गरीबों को मुफ्त इलाज दे पाती है, सब्सिडी के माध्यम से लोगों को लोन दे कर स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर सकती है। इसलिए इसका बढ़ते रहना आवश्यक है।

साथ ही, जब यह घटती है, और कुछ न किया जाए, तो भी स्थिति चिंताजनक होती है। लेकिन सिर्फ एक तिमाही के गिरे आँकड़ों पर परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। इससे अर्थव्यवस्था बर्बाद नहीं होती चाहे कोई कितना भी चिल्ला कर कहे। हर देश को ये उतार-चढ़ाव झेलना होता है। अगर यह लगातार गिरती रहे, और सरकार कदम न उठाए तो परेशानी की बात ज़रूर है। लेकिन सरकार ने जिस तरीके से अपने गलत फैसलों को मोड़ा है, कुछ एहतियाती कदम उठाए हैं, उससे आशा है कि बेहतरी होगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात को आसान शब्दों में समझने के लिए इस लेख का पहला हिस्सा आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

प्रोफेसर बने रहना है तो योग्यता साबित करनी होगी, CV दिखाइए: JNU का रोमिला थापर को नोटिस

हिन्दुओं को बदनाम करने और उनके इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए कुख्यात इतिहासकार और JNU की प्रोफेसर एमेरिटस रोमिला थापर को विश्विवद्यालय प्रशासन ने पद पर बने रहने के लिए अपना CV जमा करने को कहा है। उसके आधार पर प्रशासन यह तय करेगा कि प्रोफेसर एमेरिटस के तौर पर विश्वविद्यालय को उनकी सेवाएँ आगे चाहिए या नहीं। हिन्दू इतिहास में “आर्य आक्रमण सिद्धांत”, “हिन्दुओं ने बौद्धों को प्रताड़ित किया” जैसे झूठों को खुराक देने, अयोध्या में राम मंदिर के अस्तित्व को बेवजह झुठलाने की कोशिशों आदि के लिए जाना जाता है।

सदमे में “बुद्धिजीवी”

मीडिया खबरों के मुताबिक JNU प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद से कई प्रोफेसर झटके में हैं। उनका कहना है कि प्रोफेसर एमेरिटस को पहले कभी भी CV जमा कर अपनी योग्यता साबित नहीं करनी पड़ी है। द टेलीग्राफ़ को दो प्रोफेसरों ने तो बताया कि एक बार जो इस पद पर काबिज़ हो गया, वह अमूमन जीवन-भर पद पर बना रहता है। खुद प्रोफेसर थापर 1993 से यानी 26 वर्षों से इस पद पर कायम हैं।

इतिहास के ही एक दूसरे JNU वाले जानकार प्रोफेसर इरफ़ान हबीब ने ट्वीट किया कि इस प्रशासन से इसके अलावा क्या उम्मीद की जा सकती है।

‘इतिहास के नोबेल’ से मोदी पर हमले तक फैला है थापर का करियर

JNU में 1970 से 1991 तक शिक्षिका रहने वालीं प्रोफेसर थापर को अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ़ कॉन्ग्रेस का प्रतिष्ठित क्लूग प्राइज़ मिल चुका है, यह प्राइज़ उन विषयों के लिए दिया जाता है, जिन विषयों पर नोबेल नहीं मिलता है। लेकिन उन्हें हाल-फ़िलहाल में मोदी के खिलाफ अपनी किताब The Public Intellectual in India में लिखने के लिए अधिक जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने नयनतारा सहगल, अमिताव घोष, मरहूम गिरीश कर्नाड और खूँखार नक्सलियों को “बंदूक वाले गाँधीवादी” और पाकिस्तानी सेना को हिंदुस्तानी सेना से बेहतर बताने वाली लेखिका अरुंधति रॉय के साथ मिलकर मोदी को हराने की अपील वाला पत्र लोकसभा चुनावों के ठीक पहले जारी किया था।